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	<title>बनारस Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>काशी में &#8216;उनकी&#8217; सरकार नहीं, &#8216;उनकी सरकार&#8217; है, जिसे विश्व के लोग &#8220;काशी का कोतवाल&#8221; कहते हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Dec 2021 13:14:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस : सत्तर के दशक के पूर्वार्ध मैं अशोक राजपथ स्थित पटना कॉलेज मुख्य द्वार के सामने वाली गली में रहता था। साल सन 1971 था। मैं नवमीं कक्षा का छात्र था पटना के उसी ऐतिहासिक विद्यालय में जहाँ स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी अपने जीवन का कुछ अध्याय शिक्षा ग्रहण किए [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बनारस : सत्तर के दशक के पूर्वार्ध मैं अशोक राजपथ स्थित पटना कॉलेज मुख्य द्वार के सामने वाली गली में रहता था। साल सन 1971 था। मैं नवमीं कक्षा का छात्र था पटना के उसी ऐतिहासिक विद्यालय में जहाँ स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी अपने जीवन का कुछ अध्याय शिक्षा ग्रहण किए थे। बिहार के किसी कोने में जयप्रकाश नारायण आंदोलन प्रदेश की मिटटी में बीजारोपण नहीं हुआ था। सत्तर के ज़माने के विद्वान और विदुषीगण सोचे भी नहीं थे कि देश में एक राजनीतिक भूकंप आने वाला है। वह भूकंप न्यूनतम 12+ रेक्टर स्केल पर आएगा और भूकंप के बाद बिहार की गली-कूचियों में कुकुरमुत्तों की तरह नेताओं का जन्म होगा होगा। </strong></p>
<p>गुरुगोविंद सिंह के पटना सिटी के मालसलामी से लेकर गौतम बुद्ध के बोधगया के रास्ते, शेरशाह सूरी के मकबरे को प्रणाम करते पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण, सभी दिशाओं में विकास तो चतुर्मुख होगा, लेकिन उस विकास का केंद्र बिंदु प्रदेश के लोगों का घर नहीं, बल्कि नेताओं और उनके ससुराल वालों का घर होगा। प्रदेश में विद्यालय तो हर गली-नुक्कड़ पर होगा, लेकिन शैक्षिक-स्तर बढ़ने, बढ़ाने के लिए नहीं, अपितु निरीह, गरीब माता-पिता-अभिभावकों का &#8216;शुल्क के रूप में&#8217; रक्त चूसने के लिए। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद बिहार से पढ़ने वाले छात्र/छात्राओं का पलायन भी नहीं होता। काम-काज के लिए, रोजी-रोजगार के लिए लोग बाग़, औरतें अपने &#8216;दूघ मुंहे बच्चे&#8217; को मोटरी में बांधकर पंजाब, बंगाल, दिल्ली, राजस्थान की ओर उन्मुख नहीं होते। परिजनों की अनुपस्थिति में बूढ़े माता-पिता अपने जीवन का अंतिम सांस नहीं लेते। </p>
<p>पटना जंक्शन के कोने पर लाल रंग में रंगे पत्थर-रूपी पवन पुत्र, जिसे लोगों ने स्वहित में भगवान् बना दिए, वे भी नहीं जानते थे कि उनका कल्याण उनके इष्ट अयोध्या वाले नहीं करेंगे, बल्कि पटना के ही हार-मांस वाले मनुष्य उनका कल्याण करेंगे। प्रदेश के मतदाताओं, गरीब-गुरबों का, रिक्शावालों का, रेड़ीवालों का, उनके मंदिर के बगल वाली गली में कचौड़ी-घुघनी बेचने वालों का, आगे जक्कनपुर रेलवे फाटक पर अपनी जान को जोखिम में डालकर तरकारी बेचने वालों का अपना घर &#8211; फुस का ही सही &#8211; बन पाए अथवा नहीं; बजरंगबली जी का घर चार-तल्ला, वातानुकूलित बनेगा। बहुत सारी बातें हैं, उन दिनों का, जिसका जिक्र तो किया जा सकता है, लेकिन यहाँ उचित नहीं होगा। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2.jpeg" alt="" width="2200" height="1807" class="alignright size-full wp-image-3655" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-300x246.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-1024x841.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-768x631.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-1536x1262.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-2048x1682.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p><strong>हमारे उसी मोहल्ले में एक सज्जन रहते थे। नाम था श्री जगदीश बाबू। जगदीश बाबू की खानदानी बर्तन की दूकान थी। उन्हें अपनी बेटी की शादी के सिलसिले में बनारस जाना था। जगदीश बाबू शाम में बाबूजी को बताये और उनसे मुझे अपने साथ ले जाने का आज्ञा भी मांगे। बाबूजी बनारस का नाम सुने और &#8216;ना&#8217; कहें, यह संभव ही नहीं था। अगली सुबह हम दोनों बनारस रेलवे स्टेशन पर दस्तक दिए। बाबूजी कोई साढ़े तीन दशक पहले बनारस के मणिकर्णिका घाट पर अर्सों रहे थे अपने तंत्र-मन्त्र साधना के क्रम में। आज भी बनारस के मणिकर्णिका घाट पर हज़ामों (नाई) के नामों की जो सूची एक सफ़ेद शिलापट्ट पर लिखा है, उसमें &#8216;गोपालजी&#8217; का नाम लिखा है। इतना ही नहीं, उसके कई वर्षों के बाद एक और नाम लिखा है &#8216;शिवनाथ&#8217; &#8211; सौभाग्य देखिये, उस शिलापट्ट पर लिखा गोपालजी के पुत्र का ही नाम शिवनाथ था। खैर, यह सब विधाता के कारनामे हैं।</strong> </p>
<p>जगदीश बाबू को कोतवालपुरा जाना था। हम दोनों रिक्शा पर बैठे और कोतवालपुरा पहुँच गए। कोतवालपुरा से बाबा विश्वनाथ का मंदिर कुछ साँसों की दूरी पर था। ऐसा प्रतीत हुआ, बाबा विश्वनाथ ही बुलाये हैं, जगदीश बाबू की बेटी की शादी तो महज एक बहाना है। कुछ क्षण बातचीत के बाद हम दोनों लाहौरी टोला के लिए रवाना हुए, जहां उनके एक सम्बन्धी रहते थे। जगदीश बाबू से इजाजत लेकर हम पहले दशाश्वमेध घाट की ओर उन्मुख हुए फिर बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजरी लगाने पहुंचे। जीवन में पहली बार बनारस की धरती पर आया था, बाबा विश्वनाथ के मंदिर में दस्तक दिया था और फिर मणिकर्णिका घाट पर धधकती चिताओं से चट-चट-फट-फट-फुट-फ़टाक आवाज के बीच बैठा था। कुछ भी अनजान नहीं लग रहा था। सभी परिचित लग रहे थे। वहां के लोग, वहां का वातावरण, वहां की हवा, मणिकर्णिका घाट के प्रवेश के ठीक दाहिने तरफ महादेव का विशालकाय शिवलिङ्ग, लकड़ी बेचने वाला, हजाम सभी परिचित लग रहे थे। इस यात्रा के बाद सन 1989 में धनबाद से बनारस पहुंचे थे, अपने एक अभिन्न मित्र के माँ का अस्थि लेकर। पहले इलाहाबाद संगम में प्रवाह किये और फिर बनारस। इस यात्रा में भी वही अनुभव हुआ जो पहली बार हुआ था। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2.jpeg" alt="" width="2200" height="1354" class="aligncenter size-full wp-image-3656" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-300x185.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-1024x630.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-768x473.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-1536x945.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-2048x1260.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-356x220.jpeg 356w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>वापस पटना आने पर अपने बाबूजी को वृतांत में सभी बातें बताया और पूछा भी &#8211; ऐसा क्यों? वे मुझे देखे और मुस्कुरा दिए। उन्होंने कहाँ कि संभव है बनारस से, मणिकर्णिका से, विश्वनाथ मंदिर से तुम्हारा कोई पूर्व जन्म का सम्बन्ध रहा हो। उन्होंने यह भी कहा कि तुम बहुत भाग्यशाली हो कि बनारस को ना तुम भूले हो और ना ही बनारस तुम्हे। इस &#8216;पहचान&#8217; को जीवित रखना। बनारस तो जीवित रहेगा ही। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि आने वाले समय में कुछ ऐसी घटना हो, कुछ ऐसी बातें हो, जो ऐतिहासिक हो और बनारस के साथ तुम और अधिक नजदीक हो जाओ। बाबूजी 1992 महादेव के शरण में अपनी उपस्थिति दर्ज कर दिए। </p>
<p><strong>बाबूजी की मृत्यु के कोई दस साल बाद, यानी 2002 में जब देश का बागडोर सम्मानित अटलबिहारी वाजपेजी जी के हाथों में था, बिस्मिल्लाह खान के बहाने बनारस से फिर जुड़े। जीवन के अंतिम वसंत में बिहार के लाल, भारत के रत्न, शहनाई के सम्राट और इंसानियत के मसीहा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए मदद का हाथ बढ़ाना। हम जैसा दीन, निर्धन, अर्थ से अपाहिज़ ब्राह्मण भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को क्या मदद कर सकते हैं? लेकिन त्रिनेत्रधारी महादेव, कशी का कोतवाल और उनका मणिकर्णिका घाट जब मुझे ही चुने, फिर क्या विद्वान, क्या विदुषी, गया ज्ञानी, क्या महात्मा, क्या धनाढ्य, क्या भिखमंगा, क्या कमजोर, क्या पहलवान, क्या राजा, क्या महाराजा &#8211; सभी शून्य थे महादेव चयन के सामने। तभी तो बिस्मिल्लाह खान अपने जीवन के अंतिम &#8216;जन्मदिन&#8217; पर 90 किलो का केक काटे, तीन किलो चांदी की शहनाई हस्तगत किये, मेरी पत्नी, पुत्र के सर पर हाथ रखकर आशीष दिए। महीना मार्च का था और तारीख 25 तथा साल 2006 &#8211; इस तारीख के पांचवे महीने में, यानी 21 अगस्त, 2006 को उस्ताद भी महादेव के शरण में उपस्थित हो गए। यूट्यूब, कैसेट्स, पेनड्राइव से भले उनकी बजाई शहनाई आज भी बजती है, लेकिन बनारस का शहनाई शांत हो गया।</strong> </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1.jpeg" alt="" width="2200" height="1724" class="aligncenter size-full wp-image-3657" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-300x235.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-1024x802.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-768x602.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-1536x1204.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-2048x1605.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>लेकिन, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी अंतिम सांस के साथ हमारे लिए जो छोड़ गए, भारत के 135 करोड़ लोगों के नसीब में शायद नहीं था । बिस्मिल्लाह खान की मृत्यु-लेख, जिसे भारत का श्रेष्ठ्तम संवाद एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया ने निर्गत किया, उस 770 शब्द वाले मृत्युलेख में 92 शब्द हमारे बारे में था। हमारे कार्यों के बारे में था। शायद इसे ही गरीबों का प्रारब्ध करते हैं। बिस्मिल्लाह खान अपनी मृत्यु से पहले &#8220;शहीद&#8221; शब्द का इस्तेमाल किये। वे अपनी इक्षा जाहिर किए कि मरने से पहले दिल्ली के इण्डिया गेट पर अपनी शहनाई से शहीदों की आत्मा को आमंत्रित करेंगे और फिर शहनाई की धुन से ही उन्हें विसर्जित करेंगे। हमने कोशिश की &#8211; लेकिन &#8216;शहीद&#8217; शब्द का बीजारोपण कर वे बनारस से विसर्जित हो गए, सदा के लिए। उनकी मृत्यु के दस वर्ष होते-होते भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों, शहीदों के 75 वंशजों को ढूंढा। छः किताबों से छः परिवारों का जीवन बदला, कामयाब रहा। </p>
<p>जब सातवें वंशज की बात आई तब बनारस पर एक अद्वितीय किताब का डमी बनकर तैयार हुआ। इस डमी को मणिकर्णिका घाट के डोम राजा के परिवार के सदस्यों ने जलती, धधकती चिताओं के बीच पुष्पांजलि के साथ महादेव को प्रस्तुत किये। किताब अपने अगले चरण में उन्मुख होने के लिए तैयार था। लेकिन महादेव कुछ और चाहते थे। उस दिन तक बनारस का, बाबा विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के बारे में केदारनाथ से बद्रीनाथ तक, जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोई सुगबुगाहट भी नहीं थी। &#8216;रीविजिटिंग बनारस&#8217; किताब का नाम था और शायद महादेव यह चाहते थे कि एक नए तेवर के साथ इस ऐतिहासिक किताब में वह सभी बातें, वह सभी तस्वीरें &#8216;हस्ताक्षर&#8217; स्वरूप उपस्थित रहे। उन बातों की चर्चा आज ही नहीं आने वाले सैकड़ों सालों बाद भी उसी तरह हो जिस तरह कल, यानी 13 दिसंबर विक्रम संवत् दो हजार अठहत्तर, मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष, दशमी तिथि को किया गया &#8211; भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस इतिहास को दोहराते, नवनिर्मित इतिहास पर हस्ताक्षर किये। </p>
<p><strong>कल रात काशी का कोतवाल और महादेव स्वप्न में मुस्कुरा रहे थे। कह रहे थे &#8211; वत्स !!! इसलिए हवा का रुख बदल दिया था। अब तुम्हारे द्वारा रचित इतिहास में वह सभी ऐतिहासिक बातों का, ऐतिहासिक तस्वीरों का, ऐतिहासिक शब्दों का समावेश होगा तो आने वाले समय में, आने वाली पीढ़ियों के लिए, धर्माथियों के लिए लाभकारी होगा। वे यह भी कह रहे थे कि अपने कर्म के प्रति मलिन नहीं होना। हम तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे कर्मों के पीछे खड़े रहेंगे। क्योंकि तुम अपने किताब से भारत ही नहीं, देश-दुनिया के लोगों को बनारस की पुनः यात्रा (रीविजिटिंग बनारस) करा रहे हो &#8211; तथास्तु। मैं निःशब्द महादेव के समक्ष खड़ा था और मेरी आखों से अश्रुधारा गंगा की अविरल धारा की तरह कशी के कोतवाल का, महादेव के पैरों को धो रहा था ।</strong></p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2.jpeg" alt="" width="2200" height="1322" class="aligncenter size-full wp-image-3658" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-300x180.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-1024x615.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-768x461.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-1536x923.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-2048x1231.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p><strong>कल, एक इतिहास की रचना हुई।</strong> यह सत्य है। प्राचीन काल में भारत के धार्मिक संस्थाओं के साथ, स्थानों के साथ, पीठों के साथ क्या हुआ, क्या नहीं हुआ &#8211; यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। लेकिन स्वतंत्र भारत में, विगत 75 वर्षों में, जो भी हुआ, वह भारत के लोगों के मानस-पटल पर उद्धृत हैं। बनारस और बनारस का विश्वनाथ मंदिर इसका जीता-जागता गवाह है। हमारे पुराणों में कहा गया है कि जैसे ही कोई काशी में प्रवेश करता है, सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। भगवान विश्वेश्वर का आशीर्वाद, एक अलौकिक ऊर्जा यहाँ आते ही हमारी अंतर-आत्मा को जागृत कर देती है। और आज, आज तो इस चिर चैतन्य काशी की चेतना में एक अलग ही स्पंदन है! कल आदि काशी की अलौकिकता में एक अलग ही आभा थी ! कल शाश्वत बनारस के संकल्पों में एक अलग ही सामर्थ्य दिख रहा था ! प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी कि &#8220;हमने शास्त्रों में सुना है, जब भी कोई पुण्य अवसर होता है तो सारे तीर्थ, सारी दैवीय शक्तियाँ बनारस में बाबा के पास उपस्थित हो जाती हैं। कुछ वैसा ही अनुभव आज मुझे बाबा के दरबार में आकर हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि,  हमारा पूरा चेतन ब्रह्मांड इससे जुड़ा हुआ है। वैसे तो अपनी माया का विस्तार बाबा ही जानें, लेकिन जहां तक हमारी मानवीय दृष्टि जाती है, ‘विश्वनाथ धाम’ के इस पवित्र आयोजन से इस समय पूरा विश्व जुड़ा हुआ है।&#8221; </p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि विश्वनाथ धाम का ये पूरा नया परिसर एक भव्य भवन भर नहीं है, ये प्रतीक है, हमारे भारत की सनातन संस्कृति का! ये प्रतीक है, हमारी आध्यात्मिक आत्मा का! ये प्रतीक है, भारत की प्राचीनता का, परम्पराओं का! भारत की ऊर्जा का, गतिशीलता का! आप यहाँ जब आएंगे तो केवल आस्था के ही दर्शन होंगे ऐसा नहीं है। आपको यहाँ अपने अतीत के गौरव का अहसास भी होगा। कैसे प्राचीनता और नवीनता एक साथ सजीव हो रही हैं, कैसे पुरातन की प्रेरणाएं भविष्य को दिशा दे रही हैं,  इसके साक्षात दर्शन विश्वनाथ धाम परिसर में हम कर रहे हैं।&#8221; जो मां गंगा, उत्तरवाहिनी होकर बाबा के पाँव पखारने काशी आती हैं, वो मां गंगा भी कल बहुत प्रसन्न थीं। अब जब हम भगवान विश्वनाथ के चरणों में प्रणाम करेंगे, ध्यान लगाएंगे, तो माँ गंगा को स्पर्श करती हुई हवा हमें स्नेह देगी, आशीर्वाद देगी। और जब माँ गंगा उन्मुक्त होंगी, प्रसन्न होंगी, तो बाबा के ध्यान में हम ‘गंग-तरंगों की कल-कल’ का दैवीय अनुभव भी कर सकेंगे। बाबा विश्वनाथ सबके हैं, माँ गंगा सबकी हैं। उनका आशीर्वाद सबके लिए हैं। लेकिन समय और परिस्थितियों के चलते बाबा और माँ गंगा की सेवा की ये सुलभता मुश्किल हो चली थी, यहाँ हर कोई आना चाहता था,  लेकिन रास्तों और जगह की कमी हो गई थी। बुजुर्गों के लिए, दिव्यांगों के लिए यहाँ आने में बहुत कठिनाई होती थी। जो मंदिर क्षेत्र केवल तीन हजार वर्ग फीट में था, वो अब करीब करीब 5 लाख वर्ग फीट का हो गया है। अब मंदिर और मंदिर परिसर में 50, 60, 70  हजार श्रद्धालु आ सकते हैं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-2.jpeg" alt="" width="2200" height="1737" class="aligncenter size-full wp-image-3659" /></a></p>
<p><strong>जब मैं बनारस आया था तो एक विश्वास लेकर आया था। विश्वास अपने से ज्यादा बनारस के लोगों पर था, आप पर था। आज हिसाब-किताब का समय नहीं है लेकिन मुझे याद है, तब कुछ ऐसे लोग भी थे जो बनारस के लोगों पर संदेह करते थे। लेकिन काशी तो काशी है! काशी तो अविनाशी है। काशी में एक ही सरकार है, जिनके हाथों में डमरू है, उनकी सरकार है। जहां गंगा अपनी धारा बदलकर बहती है, उस काशी को भला कौन रोक सकता है? काशीखण्ड में भगवान शंकर ने खुद कहा है- “विना मम प्रसादम् वै, कः काशी प्रति-पद्यते”। अर्थात्, बिना मेरी प्रसन्नता के काशी में कौन आ सकता है, कौन इसका सेवन कर सकता है? काशी में महादेव की इच्छा के बिना न कोई आता है, और न यहाँ उनकी इच्छा के बिना कुछ होता है। बाबा के साथ अगर किसी और का योगदान है तो वो बाबा के गणों का है। “इदम् शिवाय, इदम् न मम्”</strong></p>
<p>वाराणसी ने युगों को जिया है, इतिहास को बनते बिगड़ते देखा है, कितने ही कालखंड आए, गए! कितनी ही सल्तनतें उठीं और मिट्टी में मिल गईं, फिर भी, बनारस बना हुआ है, बनारस अपना रस बिखेर रहा है। बाबा का ये धाम शाश्वत ही नहीं रहा है, इसके सौन्दर्य ने भी हमेशा संसार को आश्चर्यचकित और आकर्षित किया है। पुराणों में प्राकृतिक आभा से घिरी काशी के ऐसे ही दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। अगर हम ग्रंथों को देखेंगे, शास्त्रों को देखेंगे। इतिहासकारों ने भी वृक्षों, सरोवरों, तालाबों से घिरी काशी के अद्भुत स्वरूप का बखान किया है। लेकिन समय कभी एक जैसा नहीं रहता। आततायियों ने इस नगरी पर आक्रमण किए, इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए! औरंगजेब के अत्याचार, उसके आतंक का इतिहास साक्षी है। जिसने सभ्यता को तलवार के बल पर बदलने की कोशिश की, जिसने संस्कृति को कट्टरता से कुचलने की कोशिश की! लेकिन इस देश की मिट्टी बाकी दुनिया से कुछ अलग है। यहाँ अगर औरंगजेब आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं! अगर कोई सालार मसूद इधर बढ़ता है तो राजा सुहेलदेव जैसे वीर योद्धा उसे हमारी एकता की ताकत का अहसास करा देते हैं। और अंग्रेजों के दौर में भी, वारेन हेस्टिंग का क्या हाल काशी के लोगों ने किया था, ये तो काशी के लोग समय समय पर बोलते रहतें हैं और काशी की जुबान पर निकलता है। घोड़े पर हौदा और हाथी पर जीनजान लेकर भागल वारेन हेस्टिंग।</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2.jpeg" alt="" width="2200" height="2379" class="aligncenter size-full wp-image-3661" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-277x300.jpeg 277w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-947x1024.jpeg 947w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-768x830.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-1420x1536.jpeg 1420w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-1894x2048.jpeg 1894w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>आज समय का चक्र देखिए, आतंक के वो पर्याय इतिहास के काले पन्नों तक सिमटकर रह गए हैं! और मेरी काशी आगे बढ़ रही है, अपने गौरव को फिर से नई भव्यता दे रही है। काशी शब्दों का विषय नहीं है, काशी संवेदनाओं की सृष्टि है। काशी वो है- जहां जागृति ही जीवन है, काशी वो है- जहां मृत्यु भी मंगल है! काशी वो है- जहां सत्य ही संस्कार है! काशी वो है- जहां प्रेम ही परंपरा है।हमारे शास्त्रों ने भी काशी की महिमा गाते, और गाते हुये आखिर में, आखिर में क्या कहा, ‘नेति-नेति’ ही कहा है। यानी जो कहा, उतना ही नहीं है, उससे भी आगे कितना कुछ है! हमारे शास्त्रों ने कहा है- “शिवम् ज्ञानम् इति ब्रयुः, शिव शब्दार्थ चिंतकाः”। अर्थात् शिव शब्द का चिंतन करने वाले लोग शिव को ही ज्ञान कहते हैं। इसीलिए, ये काशी शिवमयी है, ये काशी ज्ञानमयी है। और इसलिए ज्ञान, शोध, अनुसंधान, ये काशी और भारत के लिए स्वाभाविक निष्ठा रहे हैं। भगवान शिव ने स्वयं कहा है- “सर्व क्षेत्रेषु भू पृष्ठे, काशी क्षेत्रम् च मे वपु:”। अर्थात्, धरती के सभी क्षेत्रों में काशी साक्षात् मेरा ही शरीर है। इसीलिए, यहाँ का पत्थर, यहां का हर पत्थर शंकर है। इसलिए, हम अपनी काशी को सजीव मानते हैं, और इसी भाव से हमें अपने देश के कण-कण में मातृभाव का बोध होता है। हमारे शास्त्रों का वाक्य है- “दृश्यते सवर्ग सर्वै:, काश्याम् विश्वेश्वरः तथा”॥ यानी, काशी में सर्वत्र, हर जीव में भगवान विश्वेशर के ही दर्शन होते हैं।  इसीलिए, काशी जीवत्व को सीधे शिवत्व से जोड़ती है। हमारे ऋषियों ने ये भी कहा है- “विश्वेशं शरणं, यायां, समे बुद्धिं प्रदास्यति”। अर्थात्, भगवान विश्वेशर की शरण में आने पर सम बुद्धि व्याप्त हो जाती है। बनारस वो नगर है जहां से जगद्गुरू शंकराचार्य को श्रीडोम राजा की पवित्रता से प्रेरणा मिली, उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बांधने का संकल्प लिया। ये वो जगह है जहां भगवान शंकर की प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस जैसी अलौकिक रचना की है।</p>
<p>भाव विह्वलित शब्दों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि यहीं की धरती सारनाथ में भगवान बुद्ध का बोध संसार के लिए प्रकट हुआ। समाजसुधार के लिए कबीरदास जैसे मनीषी यहाँ प्रकट हुये। समाज को जोड़ने की जरूरत थी तो संत रैदास जी की भक्ति की शक्ति का केंद्र भी ये काशी बनी।ये काशी अहिंसा और तप की प्रतिमूर्ति चार जैन तीर्थंकरों की धरती है। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से लेकर वल्लभाचार्य और रमानन्द जी के ज्ञान तक, चैतन्य महाप्रभु और समर्थगुरु रामदास से लेकर स्वामी विवेकानंद और मदनमोहन मालवीय तक, कितने ही ऋषियों और आचार्यों का संबंध काशी की पवित्र धरती से रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहां से प्रेरणा पाई। रानीलक्ष्मी बाई से लेकर चंद्रशेखर आज़ाद तक, कितने ही सेनानियों की कर्मभूमि-जन्मभूमि काशी रही है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद, पंडित रविशंकर, और बिस्मिल्लाह खान जैसी प्रतिभाएं, इस स्मरण को कहाँ तक लेते जायें, कितना कहते जायें! भंडार भरा पड़ा है। जिस तरह काशी अनंत है वैसे ही काशी का योगदान भी अनंत है। काशी के विकास में इन अनंत पुण्य-आत्माओं की ऊर्जा शामिल है। इस विकास में भारत की अनंत परम्पराओं की विरासत शामिल है। इसीलिए, हर मत-मतांतर के लोग, हर भाषा-वर्ग के लोग यहाँ आते हैं तो यहाँ से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं।</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8.jpeg" alt="" width="2048" height="1826" class="aligncenter size-full wp-image-3662" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-300x267.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-1024x913.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-768x685.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-1536x1370.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>काशी हमारे भारत की सांस्कृतिक आध्यात्मिक राजधानी तो है ही, ये भारत की आत्मा का एक जीवंत अवतार भी है। आप देखिए, पूरब और उत्तर को जोड़ती हुई यूपी में बसी ये काशी, यहाँ विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा गया तो मंदिर का पुनर्निमाण, माता अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया। जिनकी जन्मभूमि महाराष्ट्र थी, जिनकी कर्मभूमि इंदौर-माहेश्वर और अनेक क्षेत्रों में थी। उन माता अहिल्याबाई होल्कर को आज मैं इस अवसर पर नमन करता हूं। दो सौ-ढाई सौ साल पहले उन्होंने काशी के लिए इतना कुछ किया था। तब के बाद से काशी के लिए इतना काम अब हुआ है। बाबा विश्वनाथ मंदिर की आभा बढ़ाने के लिए पंजाब से महाराजा रणजीत सिंह ने 23 मण सोना चढ़ाया था, इसके शिखर पर सोना मढ़वाया था। पंजाब से पूज्य गुरुनानक देव जी भी काशी आए थे, यहाँ सत्संग किया था। दूसरे सिख गुरुओं का भी काशी से विशेष रिश्ता रहा था। पंजाब के लोगों ने काशी के पुनर्निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दिया था। पूरब में बंगाल की रानी भवानी ने बनारस के विकास के लिए अपना सब कुछ अर्पण किया। मैसूर और दूसरे दक्षिण भारतीय राजाओं का भी बनारस के लिए बहुत बड़ा योगदान रहा है। ये एक ऐसा शहर है जहां आपको उत्तर, दक्षिण, नेपाली, लगभग हर तरह की शैली के मंदिर दिख जाएंगे। विश्वनाथ मंदिर इसी आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है, और अब ये विश्वनाथ धाम परिसर अपने भव्य रूप में इस चेतना को और ऊर्जा देगा।</p>
<p>दक्षिण भारत के लोगों की काशी के प्रति आस्था, दक्षिण भारत का काशी पर और काशी का दक्षिण पर प्रभाव भी हम सब भली-भांति जानते हैं। एक ग्रंथ में लिखा है- तेनो-पयाथेन कदा-चनात्, वाराणसिम पाप-निवारणन। आवादी वाणी बलिनाह, स्वशिष्यन, विलोक्य लीला-वासरे, वलिप्तान। कन्नड़ भाषा में ये कहा गया है, यानि जब जगद्गुरु माध्वाचार्य जी अपने शिष्यों के साथ चल रहे थे, तो उन्होंने कहा था कि काशी के विश्वनाथ, पाप का निवारण करते हैं। उन्होंने अपने शिष्यों को काशी के वैभव और उसकी महिमा के बारे में भी समझाया। सदियों पहले की ये भावना निरंतर चली आ रही है। महाकवि सुब्रमण्य भारती, काशी प्रवास ने जिनके जीवन की दिशा बदल दी, उन्होंने एक जगह लिखा है, तमिल में लिखा है- &#8220;कासी नगर पुलवर पेसुम उरई दान, कान्जिइल के-पदर्कोर, खरुवि सेवोम&#8221; यानि &#8220;काशी नगरी के संतकवि का भाषण कांचीपुर में सुनने का साधन बनाएंगे&#8221; काशी से निकला हर संदेश ही इतना व्यापक है, कि देश की दिशा बदल देता है। वैसे मैं एक बात और कहूंगा। मेरा पुराना अनुभव है। हमारे घाट पर रहने वाले, नाव चलाने वाले कई बनारसी साथी तो रात में कभी अनुभव किया होगा तमिल, कन्नड़ा, तेलुगू, मलयालम, इतने फर्राटेदार तरीके से बोलते हैं कि लगता है कहीं केरला-तमिलनाडू या कर्नाटक तो नहीं आ गए हम! इतना बढ़िया बोलते हैं!  </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1.jpeg" alt="" width="2200" height="1385" class="aligncenter size-full wp-image-3663" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-300x189.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-1024x645.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-768x483.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-1536x967.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-2048x1289.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>भारत की हजारों सालों की ऊर्जा, ऐसे ही तो सुरक्षित रही है, संरक्षित रही है। जब अलग-अलग स्थानों के, क्षेत्रों के एक सूत्र से जुड़ते हैं तो भारत ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के रूप में जाग्रत होता है।इसीलिए, हमें ‘सौराष्ट्रे सोमनाथम्’ से लेकर ‘अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका’ का हर दिन स्मरण करना सिखाया जाता है। हमारे यहाँ तो द्वादश ज्योतिर्लिंगों के स्मरण का ही फल बताया गया है- “तस्य तस्य फल प्राप्तिः, भविष्यति न संशयः”॥ यानी, सोमनाथ से लेकर विश्वनाथ तक द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करने से हर संकल्प सिद्ध हो जाता है, इसमें कोई संशय ही नहीं है। ये संशय इसलिए नहीं है क्योंकि इस स्मरण के बहाने पूरे भारत का भाव एकजुट हो जाता है। और जब भारत का भाव आ जाए, तो संशय कहाँ रह जाता है, असंभव क्या बचता है?</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10.jpeg" alt="" width="2200" height="1601" class="aligncenter size-full wp-image-3664" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-300x218.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-1024x745.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-768x559.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-1536x1118.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-2048x1490.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-324x235.jpeg 324w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>ये भी सिर्फ संयोग नहीं है कि जब भी काशी ने करवट ली है, कुछ नया किया है, देश का भाग्य बदला है। बीते सात वर्षों से काशी में चल रहा विकास का महायज्ञ, आज एक नई ऊर्जा को प्राप्त कर रहा है। काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण, भारत को एक निर्णायक दिशा देगा, एक उज्जवल भविष्य की तरफ ले जाएगा। ये परिसर, साक्षी है हमारे सामर्थ्य का, हमारे कर्तव्य का। अगर सोच लिया जाए, ठान लिया जाए, तो असंभव कुछ भी नहीं है। नए भारत में अपनी संस्कृति का गर्व भी है और अपने सामर्थ्य पर उतना ही भरोसा भी है। नए भारत में विरासत भी है और विकास भी है। आज का भारत अपनी खोई हुई विरासत को फिर से संजो रहा है। यहां काशी में तो माता अन्नपूर्णा खुद विराजती हैं। मुझे खुशी है कि काशी से चुराई गई मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा, एक शताब्दी के इंतजार के बाद, सौ साल के बाद अब फिर से काशी में स्थापित की जा चुकी है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से कोरोना के कठिन समय में देश ने अपने अन्न भंडार खोल दिए, कोई गरीब भूखा ना सोए इसका ध्यान रखा, मुफ्त राशन का इंतजाम किया। गुलामी के लंबे कालखंड ने हम भारतीयों का आत्मविश्वास ऐसा तोड़ा कि हम अपने ही सृजन पर विश्वास खो बैठे। आज हजारों वर्ष पुरानी इस काशी से, मैं हर देशवासी का आह्वान करता हूं- पूरे आत्मविश्वास से सृजन करें और बार-बार, अनेकानेक बार बनारस आते रहें, बाबा विश्वनाथ का दर्शन करते रहें, इतिहास पर गवाह स्वरूप हस्ताक्षर करते रहें। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/vishwnath-temple-banaras-dedicated-to-people">काशी में &#8216;उनकी&#8217; सरकार नहीं, &#8216;उनकी सरकार&#8217; है, जिसे विश्व के लोग &#8220;काशी का कोतवाल&#8221; कहते हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>यह मणिकर्णिका है ​,​ यहाँ तराजू पकड़ने वालों की आखों पर काली-पट्टी नहीं होती। यहाँ न्याय से अधिक न्याय मिलता है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 May 2018 14:38:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[दशास्वमेध घाट]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[मणिकर्णिका घाट]]></category>
		<category><![CDATA[विश्वनाथ मन्दिर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस पर ​&#8221;रीविजिटिंग बनारस&#8221; बनाने के क्रम में उस दिन सुवह-सुवह विश्वनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने चाय पी रहा था। एक-एक चुस्की के साथ सोच रहा था बाएं जाऊँ या दाहिने। बायीं ओर मणिकर्णिका था और दाहिने अस्सी। इस बीच एक वृद्ध महिला सामने आयीं। वे मुझे देखीं, मैं उन्हें देखा और [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-maniknirka-ghat">यह मणिकर्णिका है ​,​ यहाँ तराजू पकड़ने वालों की आखों पर काली-पट्टी नहीं होती। यहाँ न्याय से अधिक न्याय मिलता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>बनारस पर ​&#8221;रीविजिटिंग बनारस&#8221; बनाने के क्रम में उस दिन सुवह-सुवह विश्वनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने चाय पी रहा था। एक-एक चुस्की के साथ सोच रहा था बाएं जाऊँ या दाहिने। बायीं ओर मणिकर्णिका था और दाहिने अस्सी।</p></blockquote>
<p>इस बीच एक वृद्ध महिला सामने आयीं। वे मुझे देखीं, मैं उन्हें देखा और एक कप चाय के साथ दो बिस्कुट उनके तरफ बढ़ाया। वे मुस्करायीं जैसे मैंने कोई जमीन्दारी उन्हें लिख दिया हो। लेकिन प्रारब्ध तो यही था। हम दोनों का उस स्थान पर मिलना, उन्हें मेरे द्वारा चाय पीना, बिस्कुट खाना। इसे कौन मिटा सकता है। उसके बाद बनारस दर्जनों बार गया, वे फिर नहीं दिखीं।</p>
<p>इधर सुवह-सुवह ९ बजे तक दशास्वमेध घाट से गदौलिया मोड़ तक गाडी के आने-जाने पर स्थानीय प्रशासन का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता और खाकीधारी भी अपने-अपने कपाल पर स्वेत-चन्दन लगाकर मस्तष्क को ठंढा किये होते हैं। कोई हंगामा नहीं। कोई वसूली नहीं। कोई छल नहीं। कोई प्रपञ्च नहीं। कभी-कभी तो लोगों को राह भी दिखाते देखे जाते हैं, तो कभी वृद्ध महिला-पुरुष को हाथ पकड़कर सड़क पार करते। परन्तु अचानक ९ बजे के बाद सब कुछ बदलने लगता है। प्रतिबन्ध भी लग जाता है और माथा भी गर्म होने लगता है।</p>
<p>तीसरी प्याली चाय खत्म करने के बाद अपने झोले को सँभालते गंगा की ओर निकल पड़ा। पैर मणिकर्णिका की ओर बढ़ा । मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। बाबूजी कहते थे &#8220;पुरुष का बायाँ पैर पहले उठता है और वह कभी गलत नहीं होता।&#8221; पिता तो स्वयं एक ब्रह्माण्ड होता है, वह गलत हो ही नहीं सकता।</p>
<p>बाबूजी कहते थे जीवित मणिकर्णिका देखना सबों के भाग्य में नहीं होता। चट &#8211; चट &#8211; पट &#8211; पट &#8211; फटाक &#8211; फाटक आवाज के बीच जलती चिताओं से जो ऊर्जा निकलता है, सभी जलते पार्थिव शरीर की ऊर्जाएं एक-दूसरे से मिलकर जो समग्र ऊर्जा का निर्माण करते हैं; उसे ग्रहण करना सबों के वश की बात नहीं होती। उनकी बातें सत्य का पराकाष्ठा।</p>
<p>गंगा किनारे चलते-चलते मैं अब तक मणिकर्णिका पहुँच गया था। शरीर मणिकर्णिका पर। आत्मा महादेव के प्रति समर्पित और मन में दिवंगत पिता की बातें। मेरे पिताजी मणिकर्णिका में वर्षों साधना किये थे कामाख्या जाने से पूर्व।</p>
<p>मैं इस तस्वीर वाले स्थान पर आकर रुक गया। सामने सुखी-भींगी लकड़ियों का अम्बार। एक रंगीन तराजू जिसका रंग आसमान और पानी दोनो से मिलता-जुलता था। तराजू पर कोई &#8216;काली-पट्टी&#8217; नहीं यानि &#8216;सम्पूर्ण न्याय&#8217; &#8211; मैं उसे देख भी रहा था और मुस्कुरा भी रहा था।</p>
<p>इस बीच कोई नब्बे से अधिक वर्षीय सज्जन, झुकी कमर, हाथ में लाठी, कंधे पर गमछा लिए मेरे कंधे को थपथपाते बोले: &#8220;बाबूजी !! क्या देख रहे हो ? उनकी आवाज में गूँज थी जैसे कोई लाउडस्पीकर पर बोल रहा हो। कंधे पर रहे हाथ में वजन था और नब्बे बसंत देखने के बाद आँखों में तेज।</p>
<p>यह मणिकर्णिका है बाबूजी। यहाँ तराजू पकड़ने वालों की आखों पर काली-पट्टी नहीं होती। ऐसी बात आपके समाज में कुख्यात है। यहाँ न तो जीवित शरीर से और न ही पार्थिव से &#8211; अन्याय नहीं किया जाता। सम्पूर्ण न्याय और वह भी बराबर।</p>
<p>वे बोले: &#8220;यहाँ बट्टी मारने (गलत माप, गलत न्याय) की प्रथा नहीं है। यहाँ वजन (मृतक के पार्थिव शरीर) से अधिक वजन (लकड़ी का वजन) दिया जाता है। यानि, अगर लकड़ी का वजन कुछ अधिक भी हो गया, तो कम नहीं किया जाता। यहाँ की न्यायिक व्यवस्था बहुत ही सख्त और बहुत ही उदार है।&#8221;</p>
<p>वे फिर बोले: &#8220;इसका वजह यह है कि यहाँ पढ़े-लिखे-विद्वानों का राज नहीं, हम डोमों का साम्राज्य है। हम अशिक्षित हैं। अज्ञानी है। इसलिए हम लोग न तो जीवित शरीर से और न ही पार्थिव शरीर से छल-प्रपञ्च करते हैं। सात मन में पार्थिव शरीर मिटटी में और उनकी आत्मा महादेव के शरण में.। अनंत बार बनारस और मणिकर्णिका जाने के बाद भी उस पुण्यात्मा से अब तक नहीं मिल पाया हूँ।</p>
<p>तस्वीर लेकर मैं पीछे बने चबूतरे पर बैठ गया और सामने के द्वार को देखने लगा जो गँगा नदी में खुलती है &#8211; मन में कोई हलचल नहीं था, शांत पानी की तरह। </p>
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		<title>&#8220;​बनारस के ठग&#8221; आप प्रगतिशील हो गए हैं, ​  नित्य नये हथकंडों का आविष्कार करते रहते हैं &#8211; &#8220;होशियार&#8221; ​रहें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 May 2018 14:26:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[ठग]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>​बनारस: ​ वैसे भारत में &#8220;ठगों&#8221; का अब ​कोई सीमा निर्धारण नहीं रहा, कलकत्ता में एस्प्लेनेड पर भी मिलेंगे, पटना के सर्पेंटाईन रोड पर भी मिलेंगे और दिल्ली के राजपथ पर तो भरे-परे हैं। लेकिन &#8220;बनारस के ठगों&#8221; की &#8220;बात ही कुछ और&#8221; है उसमें भी अगर &#8220;ठग&#8221; &#8220;आयातित&#8221; हो तो क्या बात है। बनारस [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>​बनारस: ​<br />
वैसे भारत में &#8220;ठगों&#8221; का अब ​कोई सीमा निर्धारण नहीं रहा, कलकत्ता में एस्प्लेनेड पर भी मिलेंगे, पटना के सर्पेंटाईन रोड पर भी मिलेंगे और दिल्ली के राजपथ पर तो भरे-परे हैं। लेकिन &#8220;बनारस के ठगों&#8221; की &#8220;बात ही कुछ और&#8221; है उसमें भी अगर &#8220;ठग&#8221; &#8220;आयातित&#8221; हो तो क्या बात है।</p></blockquote>
<p>बनारस में कौन ठग है और कौन रईस, यह बात ज़रा मुश्किल से समझ में आती है। ‘ठग ही जाने ठग की भाषा’ कहावत के अनुसार जहाँ भाषा में इतना अन्तर है तब उनकी वेश-भूषा और हथकंडों में कितना अन्तर होगा, यह समझने की बात है। सच पूछिए तो बनारसी ठगों की कोई खास पहचान नहीं है। वह आपके पास सरकारी अधिकारी बनकर आ सकता है​, आपका पुरोहित बनकर आ सकता है, नेता बनकर आ सकता है, सफाई कर्मचारी बनकर आ सकता है, नाविक बनकर आ सकता है, दुकानदार बनकर आ सकता है, व्यापारी बनकर आ सकता है, उद्यमी बनकर आ सकता है, उद्योगपति बनकर आ सकता है, पत्रकार बनकर आ सकता है, लेखक बनकर आ सकता है, गेस्ट हॉउस का मालिक बनकर आ सकता है, आपके ससुराल के सम्बन्धी बनकर आ सकता है, यहां तक की साला-साली बनकर भी आ सकता है और आप उनकी बातों से मंत्रमुग्ध होकर दिन-दहाड़े, बीच चौराहे पर &#8220;लूट&#8221; सकते हैं। बहरहाल, &#8220;हाल-फिलहाल का अनुभव तो होगा ही आप सबों को&#8221; !!!!!</p>
<p>आप अस्सी घाट पर बैठकर &#8220;चाय पर बहसबाजी&#8221; करते रहेंगे, उधर आपके नाम पर गदौलिया चौक पर कोई &#8220;हाथ साफ़ कर&#8221; निकल जायेगा। गजब का शहर है बनारस। पिछले कुछ वर्षों से &#8220;ठगी के किस्से&#8221; तो बनारस ही नहीं, राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गुल खिला रहा है। प्राचीन काल में इस विद्या की उत्पत्ति चाहे जहाँ हुई हो, पर आधुनिक युग में इस कला के सर्वश्रेष्ठ आचार्य काशी में हो चुके हैं, ऐसा माना जाता है।</p>
<p>​वैसे तो अब कश्मीर से कन्याकुमारी तक ठग हो गए हैं, इस व्यवसाय का न केवल राजनीतिकरण बल्कि कॉर्पोरेटाइजेशन भी हो गया है, बस &#8220;पेटेंट&#8221; लेना शेष है क्योंकि ​ठगों के माई-बाप नहीं होते। वक्त जरूरत पर वे अपने बाप को भी ठग लेते हैं।</p>
<p>बना रहे बनारस के सम्मानित श्री विश्वनाथ मुखर्जी साहेब कहते हैं एक बार एक सुनार परिवार में उन्हीं के घर की लड़की ससुराल से कुछ सोना लेकर अपने पिता के घर जेवर बनवाने के लिए आयी। बेटा आग में तपाकर जेवर बनाने लगा तभी पिता ‘राम-राम’ कह उठे। बेटे को इशारा समझते देर नहीं लगी। उसने कहा, ‘‘क्या राम-राम बकते हो। सोने की लंका मिट्टी में मिल गयी है।’’ पिता ने सोचा था कि बेटा कहीं बहन के प्रति रियायत न बरते। इधर बेटा पिता से भी होशियार निकला। पिता के इशारा करने के पहले ही उसने बहन के जेवर से सोना कपटकर राख में मिला दिया था। यह है ठगों की भाषा का नमूना।</p>
<p>आवेश तिवारी जी का कहना है कि बनारस के ठग ही थे जिन्होंने १७ अगस्त १७८१ को वारेन हस्टिंग और उनकी फ़ौज को भगा दिया। हुआ ये की वारेन हास्टिंग काशीराम चेतसिंह से पचास लाख रुपया बतौर जुरमाना वसूल करना चाहता था। राजा चेत सिंह के हर अनुरोध को उसने ठुकरा दिया और बनारस आकर कबीर चौरा स्थित एक मकान में जो माधोदास के नाम से जाना जाता है, आकर ठहर गया। शहर में राजा साहेब के गिरफ्तार होने की बात फैली। किसी बनारसी ने तुकबंदी गढ़कर प्रचारित किया तो हर आदमी के जुबान पर एक ही बात सुनाई पड़ने लगी &#8211;</p>
<p>&#8220;घोड़े पे हौदा और हाथी पे जीन डर कर भाग वारेन हेस्टिंग&#8221;</p>
<p>&#8220;घोड़े पे हौदा और हाथी पे जीन&#8221; की बात अंग्रेजों को रहस्यमय प्रतीत हुयी। वे इसका अर्थ नहीं समझ सके और यह सोचकर की भागने में ही कल्याण है, रातो रात वारेन हास्टिंग साढ़े चार सौ फौजियों लेकर, अपने दलाल बेनीराम की सहायत से भगा और चुनार की किला में शरण ली।</p>
<p>मुखर्जी साहेब कहते है कि गले में सिकड़ी, आँखों पर चश्मा, पैरों में नागरा जूता, कान में इत्र का फाहा, तन पर तंजेब का कुर्ता, सर पर दोपल्लिया टोपी पहने और हाथ में चाँदी की मूठ की छड़ी लिये बाजार में टहलनेवाला व्यक्ति शहर का नामी रईस हो सकता है और नम्बरी ठग भी। वह व्यक्ति आवारा या शोहदा भी हो सकता है और एक पक्का जासूस भी। इसलिए बनारस में कौन व्यक्ति क्या है, जब तक अच्छी तरह जान न लिया जाए, उसके बारे में राय देना उचित नहीं।</p>
<p>आज तो हालत यह है कि बेटा बाप को ठगता है तो बाप बेटे को। पति पत्नी को ठग समझता है तो पत्नी पति को। अधिक दूर क्यों रेल, बस और रिक्शे पर सवार होते समय लोग अपने सहयात्री को इस प्रकार घूरते हैं मानो किसी ‘चाइयाँ’ या गिरहकट के पास बैठ रहे हों। सिर्फ यही नहीं, बल्कि तुरन्त अपनी अगल-बगल की जेबों को उठाकर सामने की ओर कर लेते हैं ताकि उनका सहयात्री उसका नाजायजज फायदा न उठा ले।</p>
<p>अगर आप यह सोचते हों कि खास बनारस के व्यक्ति ठगों के चंगुल में नहीं फँसते तो आपका यह खयाल गलत है। यह ठीक है कि बनारसी लोग ठगों के अनेक हथकंडों से परिचित हो गये हैं। इधर &#8220;ठगों का दल भी प्रगतिशील&#8221; हो गया है। वे नित्य नये हथकंडों का आविष्कार करते रहते हैं।</p>
<p>एक जमाना था, जब नकली मृत बच्चा बनाकर औरतें आने-जानेवाले मुसाफिरों को ठगा करती थीं। परेदशी यात्री बनकर ‘हमारा सब सामान चोरी चला गया’ कहकर लोग लोटा बेचते हुए दिखाई देते थे। कुछ बाबा दो-एक चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगा करते थे। कुछ लोग दूसरों की कमजोरी का और औरतों के प्रेमपत्रों को कब्जे में कर ठगने का कौशल रचते हैं। नयी कम्पनी, नयी फर्म और नयी संस्था बनाकर लोगों को ठगना साधारण बात हो गयी है।</p>
<p>सिर्फ पुरुष ठग ही इस कार्य में लिप्त नहीं रहते। पुरुषों से कहीं अधिक महिलाएँ इस दिशा में अधिक सक्रिय भाग लेती हैं। एक बार एक दुकानदार के यहाँ चालीस रुपया का कपड़ा लेकर अपने सोते हुए बच्चे को उसके यहाँ रख महिला ठग अपना सौ रुपये का नोट भुनाने के लिए आगे बढ़ गयी। जब काफी देर तक नहीं लौटी तब दुकानदार ने सोचा कि आखिर लड़का रो क्यों नहीं रहा है? कपड़ा हटाकर जब देखा तब वहाँ लड़के के स्थान पर रबड़ का पुतला था। उस समय तक हजरत चालीस रुपये का कपड़ा खो चुके थे।</p>
<p><strong>मुखर्जी साहेब फिर कहते हैं</strong><br />
नेपाल के राजपरिवार से सम्बद्ध एक राणा साहब परिवार सहित काशी दर्शन के निमित्त पधारे थे। गंगास्नान करनेवाली औरतों को कलात्मक ढंग से गायब करके उनके शरीर पर के आभूषणों पर हाथ साफ़ कर देने की घटनाएँ पर्याप्त सुख्याति प्राप्त कर चुकी थीं। होता यह था कि गंगा के अन्दर, घाट से दूर खूँटे गाड़ दिये गये थे। घाट से डुबकी लगाकर औरतों को घसीटकर उन्हीं खूँटों में बाँध दिया जाता था। घटना-स्थल से काफी दूर होने के कारण किसी माई के लाल को रहस्य का भास भी नहीं होता था। आभूषण तो जाते ही थे, लाश तक का कोई पता नहीं चलता था।</p>
<p>उक्त राणा साहब अपने को जरा होशियार समझते थे। उन्होंने सोचा, ऐसी घटनाएँ औरतों के शरीर के आभूषणों के कारण ही घटित होती हैं। सो उन्होंने परिवार की औरतों से स्नान के पूर्व शरीर के आभूषणों को उतार देने को कहा। सारे आभूषणों को एक मजबूत टोकरी के नीचे दबा, उसके ऊपर हाथ में नंगी खुखरी लेकर हजरत जम गये। मन में ठगों को एक बढ़िया-सी गाली देकर निश्चिन्त हो गये। बनारसी ठगों की नजर आभूषणों पर पहले ही पड़ चुकी थी और इसका मतलब था, जैसे भी हो, उन पर अधिकार जमाना। औरतों का शरीर निराभूषण था, सो वे व्यर्थ थीं। आकर्षण का केन्द्र राणा साहब ही थे।</p>
<p>थोड़ी ही देर बाद राणा साहब ने देखा, साठ-सत्तर वर्ष का एक वृद्ध स्नानोपरान्त भीगे ही वस्त्रों में सीढ़ी पर चढ़ रहा है। भीड़-भाड़ बहुत थी। अचानक उस वृद्ध की गीली धोती से एक गिन्नी झन्न-से राणा साहब के पास ही गिरी। परन्तु वृद्ध राम-राम कहता हुआ आगे ही बढ़ता गया। राणा साहब ने चौंककर देखा, दस कदम बाद फिर एक गिन्नी, दस कदम बाद एक और—ऐसे ही हर दस कदम बाद बीसों गिन्नियाँ पड़ी थीं, पर लगता था उनकी ओर वृद्ध का ध्यान ही न गया हो। गिन्नियों की चमक ने राणा को विचलित-सा कर दिया। धीरे से उठे और उन गिन्नियों को समेट ले आये। वृद्ध अदृश्य हो चुका था। गिन्नियों को जेब के हवाले कर वे फिर टोकरी पर जा बैठे। खेल समाप्त हो चुका था। औरतें जब स्नान करके वापस आयीं तब टोकरी के नीचे आभूषणों के स्थान पर बड़ा-सा ‘जीरो’ रखा था।</p>
<p>आवेश तिवारी जी के अनुसार बनारस में ठगी सिर्फ दूसरों की धन हड़पने के लिए नहीं की जाती, मौज मस्ती के लिए भी ठगी की जाती है। यानि एक तरह से यह लोक व्यवहार का हिस्सा है। अगर आप बनारस भ्रमण के लिए आ रहे हैं और नए हैं तो घाटों, गलियों, मंदिरों, साँढ़ों के अलावे ठगों से सामना होना निश्चित है। बनारस की ठगी शेष दुनिया की ढगी से विलक्षण है। यहाँ की ठगी बहुत हद तक धार्मिक ठगी रह गयी है, जो मंदिरों, घाटों और पुरानी गलियों में पराकाष्ठा पर है। यहाँ की ठगी के पीछे आपराधिक अवधारणा काम है, लिप्सा अधिक है। कशी के साथ ठगी का नाता सिर्फ इसलिए जुड़ा है क्योंकि यहीं से मुक्ति का भी नाता जुड़ा है। यहाँ की ठगी में हास्य भी है और रस भी।</p>
<p>मुखर्जी साहेब के अनुसार कहा जाता है कि ​ईस्ट इंडिया कम्पनी का बनारसी ठगों से खूब पाला पड़ा था। आधुनिक युग की सबसे बड़ी ठगी ‘रेशमी रूमाल ठगी’ को माना जाता है (कहा जाता है मध्यप्रदेश में ‘रूमाल ठगों’ का एक गिरोह था। ये लोग रेशमी रूमाल की सहायता से ठगी करते थे। जब इन्हें यह मालूम हो जाता था कि अमुक यात्री या व्यक्ति के पास रकम है तब ये राह चलते यात्री के पीछे से रेशमी रूमाल का फन्दा फेंककर पीछे खींच लेते थे। रेशमी रूमाल में पैसा रखकर दो गाँठ बाँध दी जाती थीं। जब यह दोनों गाँठ आपस में मिलकर कस जाते थे तब श्वासनलिका दब जाती थी और इस प्रकार दम घुट जाने की वजह से यात्री का प्राणान्त हो जाता था।) यह ठगी मध्य भारत में होती थी। उस ठगी का संचालन और रेशमी रूमाल का निर्माण बनारस में ही होता था। शायद इसीलिए लार्ड विलियम वेंटिंक को इसे दबाने के लिए फौज भेजनी पड़ी थी।</p>
<p>बनारस में ठगी का पुराना है बनारस। यह अपने आप में ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। धार्मिक नगरी होने के कारण लोग यहाँ धर्म के नाम पर पुण्य लूटने की गरज से और मठ-मन्दिर बनवाने के लिए अपने साथ काफी रकम लाते थे। उस रकम को यहाँ के ठग नकली तीर्थ-पुरोहित बनकर उड़ाते थे। स्वर्ग में अपनी सीट रिजर्व कराने के कांक्षी को पूजा-अर्चना में उलझाकर बेचारे की गर्दन इस सफाई से उतार ली जाती थी कि क्या मजाल जो आँख भी झपक सके।</p>
<p>बाँझ औरतों को बच्चा होने की दवा देनेवाले, अबारे पति को वश में करने के लिए पूजा-पाठ करनेवाले, मुकदमे जितानेवाले और कीमिया (नकली सोना) बनानेवालों की कमी यहाँ नहीं है।</p>
<p>तिवारी जी के अनुसार औरंगजेब के समय बनारस में ठगों की संख्या सर्वाधिक थी। उस समय एक ठगी विद्या जिसे काशी करवट कहा जाता था, काफी प्रचलन में थी। दरअसल कशी करवट एक कुएं का नाम है जो आज भी कशी-विश्वनाथ परिसर में है मगर बंद कर दिया गया है। बताया जाता है की बनारस में आकर बहुत से मुर्ख यात्री, बहुत से पैसे देकर कशी करवट लिया करते थे, यानि आरे से काटकर या तलवार पर कूदकर मुक्ति के लिए अपनी जान दे देते थे। बाद में आपराधिक मनोवृति के पंडों ने बोले-भले यात्रियों को मारकर उनकी लाश कुएं में फेंकना शुरू कर दिया।</p>
<p>काशी करवट के बारे में मुहम्मद जायसी के पद्मावत में लिखा है:<br />
<strong>&#8220;करवट तापा होंहि जिमि चुरू&#8221;</strong></p>
<p>अलेक्जेंडर हेमिल्टन (१७४४) लिखे हैं कि काशी में पण्डे भरी रकम लेकर वेवकूफ लोगों को पकड़कर उन्हें बुर्ज पर चढ़कर नीचे तलवार और खंजर लगे कुएं में यह कहकर कूदा देते थे की यहाँ मरने वाला सीधे स्वर्ग जाता है।</p>
<p>अब तो बनारस के लोग काफी होशियार हो गये हैं। नकली साले-रिश्तेदारों पर भी विश्वास नहीं करते। बहरहाल, देखिये क्या होता है ? </p>
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		<item>
		<title>वृद्ध &#8216;माता-पिता को, विधवा माँ को आज भी लोग उन्हें वृद्धाश्रम या विधवा आश्रम में क्यों छोड़ आते हैं?</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/widow-ashram-of-varanasi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 May 2018 05:08:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[अस्सी ​घाट]]></category>
		<category><![CDATA[अस्सी नदी]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[वरुणा नदी]]></category>
		<category><![CDATA[विधवा आश्रम]]></category>
		<category><![CDATA[वृद्धा आश्रम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस: ​ उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस के सभी ८४ घाट और बनारस की सैकड़ों गलियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं &#8211; निःशब्द। उनके आठ फीट x छः फीट के कमरे में तिलचट्टा और चिपकिल्ली का साम्राज्य था। कोने में प्लास्टिक के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/widow-ashram-of-varanasi">वृद्ध &#8216;माता-पिता को, विधवा माँ को आज भी लोग उन्हें वृद्धाश्रम या विधवा आश्रम में क्यों छोड़ आते हैं?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>बनारस: ​<br />
उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस के सभी ८४ घाट और बनारस की सैकड़ों गलियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं &#8211; निःशब्द। </p></blockquote>
<p>उनके आठ फीट x छः फीट के कमरे में तिलचट्टा और चिपकिल्ली का साम्राज्य था। कोने में प्लास्टिक के डब्बे में रखे लाल रंग का मसूर दाल पर कभी-कभी चिपकिल्ली चढ़कर नीचे उतर रहा था। छोटे-छोटे चूहों के लिए मानो समस्त क्षेत्र खुला मैदान हो और वे बाधा &#8211; दौड़ का अभ्यास लगातार कर रहे हों। दरवाजे के चौखट से घर में गिरे पानी एक सुराग से बाहर निकल रहा था। यह पानी कुछ देर पहले बर्तन साफ़ करने में गिरा था। भात के कुछ अंश अभी भी वहां गिरा था जो पानी की कमी के कारण बाहर नहीं निकल पाया था और वह तिलचट्टे के लिए भोजन था।</p>
<p>एक दूसरे कोने में प्लास्टिक के एक बाल्टी में पानी रखा था। इस बाल्टी का क्षेत्रफल भी कमरे के क्षेत्रफल से अधिक नहीं था, जिसमे पांच लीटर पानी से अधिक जाना, यानि कमरे में बाढ़ आने के बराबर था।</p>
<p>सामने पचास के दसक में बने मोटे एल्युमिनियम के चादरों से बना एक बक्सा, जो अपने जवानी में चमकता रहा होगा, आज इस वृद्धा की तरह जीवन की अंतिम साँसे खींच रहा था। न जाने हवा और मिट्टी की कितनी परतें इसके चादरों को ढंककर काला कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे उस घर में रखा एक-एक सामान उस वृद्ध महिला को देख रहा हो और इंतज़ार कर रहा हो की कब सभी गँगा की धाराओं में समर्पित होंगे अपनी संगनी के साथ।</p>
<p>उस दिन से कोई ६० वर्ष पहले २० वर्ष की आयु में उनके घर के लोग उन्हें बनारस लाये थे। पति की मृत्यु के बाद गँगा स्नान कराने के उद्देश्य से। ललिता घाट स्थित गँगा के किनारे सभी एक साथ थे। पहले पुरुष लोग स्नान किये। फिर कुछ महिलाएँ एक साथ स्नान करने नीचे उतरीं।</p>
<p>हर-हर गंगे -हर &#8211; हर गंगे कर जब पानी से मुख को बाहर निकालीं भगवान् सूर्य को जल अर्पित करने, तब तक घर के सभी अपने &#8220;पराये&#8221; हो चुके थे। उधर सूर्यदेव आसमान पर ऊपर आये, इधर सभी सगे-सम्बन्धी जो बहुत ही विस्वास के साथ कलकत्ता से साथ आये थे, अस्ताचल में चले गए।</p>
<p>अब तो किसी का चेहरा तक याद नहीं है उन्हें। हाँ, इनके पति के पास उस समय कोई ३०० से अधिक बीघा जमीं थी। वे माता-पिता के एकलौते सन्तान थे। पांच बहुत बड़े-बड़े तालाब थे जिसमे मछलियाँ जीवन जीती थी। विवाह के कोई आठ महीने बाद ही समय ने अपना रुख मोड़ा था इनसे और ये विधवा हो गयीं।</p>
<p>उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस और बनारस की सैकड़ों गालियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं &#8211; निःशब्द। आज भी बनारस की गलियों में, विधवा आश्रमों में कई हज़ार विधवाएं अपने जीवन की अंतिम बसन्त को समाप्त होते देख रहीं हैं। गंगा की ओर जाती बनारस की पुरानी गलियों में जैसे दो घरों की दीवारें बांस-बल्लों के सहारे एक-दूसरे को संभाले हुए हैं, इस विस्वास के साथ की दोनों एक-साथ गिरेंगे; भारत के गाओं, शहरों से बनारस के घाटों पर, बनारस की तंग गलियों में अपने ही परिवारों, परिजनों, सन्तानो द्वारा फेकीं गयी, पटकी गयी विधवाओं को अब सिर्फ महादेव का सहारा है उनका शरणागत होने के लिए।</p>
<p>अपने प्रयास के दौरान आज़ादी के एक गुमनाम क्रन्तिकारी के वंशजों में एक विधवा को किताब से जीवन बदलने के लिए सन २०१५ में बनारस और वृन्दावन की विधवाओं पर कार्य किया। किताब का नाम दिया INDIA&#8217;S &#8216;ABANDONED&#8217; MOTHERS.</p>
<p>इस कार्य के दौरान एक प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ नहीं पाया, आज भी प्रयत्नशील हूँ:</p>
<p>&#8220;आखिर &#8216;माता-पिता के वृद्धावस्था होने पर, अथवा माँ को विधवा होने पर, या पिता को विधुर होने पर आज भी भारत के लोग, सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित ही नहीं; पढ़े-लिखे विद्वान और विदुषी भी, धनाढ्य भी, उच्च पदों पर पदस्थापित अधिकारी भी &#8211; अपने माता-पिता को विधवा आश्रम या वृद्धा आश्रम में क्यों भेज देते हैं? क्या उनकी जवानी जीवन पर्यन्त बरकरार रहेगी? क्या उनके सन्तान इन्ही बातों को भविष्य में दोहरा नहीं सकेगा?&#8221;</p>
<p>&#8220;आखिर &#8216;माता-पिता के वृद्धावस्था होने पर, अथवा माँ को विधवा होने पर, या पिता को विधुर होने पर आज भी भारत के लोग, सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित ही नहीं; पढ़े-लिखे विद्वान और विदुषी भी, धनाढ्य भी, उच्च पदों पर पदस्थापित अधिकारी भी &#8211; अपने माता-पिता को विधवा आश्रम या वृद्धा आश्रम में क्यों भेज देते हैं? क्या उनकी जवानी जीवन पर्यन्त बरकरार रहेगी? क्या उनके सन्तान इन्ही बातों को भविष्य में दोहरा नहीं सकेगा?&#8221;</p>
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		<title>इस जन्म में ​अगर ​बनारस की गलियों में नहीं घूमे तो जीवन व्यर्थ और दूसरा जन्म मनुष्य योनि में ही होगा, इसका गारण्टी तो ​है नहीं ?</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-street</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-street#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 May 2018 14:40:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[अस्सी ​घाट]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[दशास्वमेध घाट]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[​बाबा विश्वनाथ मन्दिर]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=566</guid>

					<description><![CDATA[<p>बनारस: यह तो बनारस ही है जहाँ दो दीवारों भी इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है एक-दूसरे के प्रति। लोगबाग के प्रेम और स्नेह को तो शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता। बस बनारस आइये तभी समझ पाएंगे असली प्रेम की परिभाषा। और गलियों में घूमना भूलेंगे नहीं। क्योंकि यदि बनारस की गलियों का आनन्द नहीं [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-street">इस जन्म में ​अगर ​बनारस की गलियों में नहीं घूमे तो जीवन व्यर्थ और दूसरा जन्म मनुष्य योनि में ही होगा, इसका गारण्टी तो ​है नहीं ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>बनारस:  यह तो बनारस ही है जहाँ दो दीवारों भी इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है एक-दूसरे के प्रति। लोगबाग के प्रेम और स्नेह को तो शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता। बस बनारस आइये तभी समझ पाएंगे असली प्रेम की परिभाषा। और गलियों में घूमना भूलेंगे नहीं। क्योंकि यदि बनारस की गलियों का आनन्द नहीं लिए, तो जीवन व्यर्थ। </p>
<p>लेकिन एक बात कबहुँ नहीं भूलियेगा &#8211; इस प्रेम के लिए किसी राजनेता को धन्यवाद नहीं देंगे। ऊ तो आते रहेंगे &#8211; जाते रहेंगे। बनारस की गलियों और दीवारों का प्रेम तो अनन्तकाल तक रहेगा। </p>
<p>​बाबा विश्वनाथ मन्दिर मुख्य द्वार से दशास्वमेध घाट की ओर चल रहा था। दाहिने कंधे पर कैमरा बाबू लटक रहे थे। निकलने से पहले कैमरा बाबू से गुफ़्तगू हो चूका था विषय पर और उस दिन बनारस की गलियों में घूमना था तस्वीरों के लिए। सामने बनारस पुलिस की गाडी खड़ी थी। समय सुवह का कोई आठ बजा होगा। पुलिस बाबू की गाड़ी से पांच कदम पर एक गोलगप्पा बेचने वाला खड़ा था। यह भी कोई गोलगप्पा बेचने का समय है, लेकिन कुछ बच्चे सुवह-सुवह गोलगप्पा का आनन्द ले रहे थे। गोलगप्पा बेचने वाला बोलने में उस्ताद था। ​वैसे भी बनारस तो उस्तादों से ही भरा पड़ा है। ​लगातार बोलते जा रहा था ​शिवगंगा ट्रेन की तरह। ​और अगल-बगल के लोगबाग सुन भी रहे थे। तभी पहलवान के तरह एक नौजवान वहां आया और दूकानदार को खिलाने के लिए इशारा किया। पलक अभी नीचे भी नहीं हुआ था तभी गोलगप्पा बेचने वाला कहता है:<br />
<strong>​&#8221;​मर्दाना जाय खटाई से​ &#8211; जनाना जाय मिठाई से​&#8221;​</strong></p>
<p>यह सुनते ही पुलिस बाबू ठहाका लगाए और उनके साथ बगल में खड़े कुछ और लोग भी हँस दिए। इस दसक में पहली बार किसी पुलिस बाबू को इतना खुलकर ठहाका लगाते देखा था। पहलवान जी का गोलगप्पा मूंह में ऐसा पचका की गंजी (बनियान) का अगला भाग मटमैला हो गया। वे पैसा देकर अपना रास्ता ले लिए। पुलिस बाबू मेरे कंधे पर कैमरा देखकर कहते हैं &#8216;पत्रकार बाबू इसका मतलब समझे?&#8221; मैं हँसते हुए कहा: &#8216;तभी तो पहलवान जी निकल पड़े।&#8221; </p>
<p>यही है बनारस और इस बनारसी कहावत का मतलब है यदि पुरुष अधिक खट्टा खाये तो उसका पुरुषत्व लुढ़कने लगेगा, कम होता जायेगा और जब महिला मिठाई का अधिक सेवन करें तो मासिक धर्म में बिघ्न-बाधाएं आने लगेगी। अब अईसन &#8211; अईसन कहावत कहाँ सुनियेगा ?</p>
<p>बनारस प्राचीन जीवंत शहरों में एक है। &#8216;वामन पुराण&#8217; के अनुसार वरूणा और असि नदियां काल के प्रारंभ में स्वत: ही आद्य पुरूष के शरीर से निकली हैं। इन दोनो नदियों के मध्य की भूमि ही ​बनारस है। </p>
<p>अँग्रेजी के प्रख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन बनारस की पवित्रता और मिथकीय विश्वास से अभिभूत थे। एक बार उन्होंने लिखा-&#8220;बनारस इतिहास से प्राचीन है, परंपरा से प्राचीन है, मिथकों से भी प्राचीन है और इतना प्राचीन दिखता है, जैसे इन सभी को एक साथ रख दिया गया हो।&#8221; </p>
<p>विश्वनाथ मुखर्जी​ (बना रहे बनारस) ​के अनुसार ​शैतान की आंत की भांति यह भूल-भुलैया संसार का एक आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थान है। इन गलियों में कितनी आजादी है। नंगे​ घूमें, गमच्छा ​पहनकर चलें, जहां जी में ​आये बैठ जाएँ, जहां जी आए सो ​जाएँ । कोई बिगड़ेगा नहीं, भगाएगा नहीं और न ही डांटेगा। गावटी का गमच्छा या सिल्क का कुरता पहने बनारसी रईस भी इन गलियों में छाता लगाए चलते हैं। शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस गली में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती, बरसात का मौसम नहीं है, फिर भी लोग वहां छाता लगाकर क्यों चलते हैं? कारण है​ ​- गंदगी। </p>
<p>मान लीजिए आप बाजार से लौट रहे हैं, अचानक ऊपर से कूड़े की बरसात हो गई। यह बात अच्छी तरह जान लीजिए-बनारसी तीन मंजिले या चार मंजिले पर से बिना नीचे झांके थूक सकता है, पानी फेंक सकता है और कूड़ा गिरा सकता है। दुकान झाड़ बटोरकर आपके चेहरे पर सारा गर्द फेंक सकता है। यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, नीचे इस सत्कार्य से घायल व्यक्ति जब गालियां देता है तब सुनकर भाई लोग प्रसन्न हो उठते हैं। उनका रोम-रोम गाली देनेवाले को साधुवाद देगा। अगर कहीं वे सज्जन चुपचाप चले गए तो इसका उन्हें अपार दुख होगा और उस दुख को मिटाने के लिए मुख से अनायास ही निकल जाएगा- ‘मुर्दार निकसल!’</p>
<p>किसी-किसी गली में बनारसी रईसों का पनाला इस अदा से चूता है कि फुहारे का मजा आ जाता है। गर्मी के दिनों में रात को ऐसी गलियों से गुजरना और खतरनाक होता है। सोते समय ‘शंका समाधान’ के लिए बनारसी अपने को अधिक कष्ट नहीं देगा। परिणाम स्वरुप छत के पनाले से आप पर ‘शुद्ध गंगाजल’ बरस सकता है। गुस्सा उतारने के लिए ऐसे घरों में आप घुसने की हिम्मत नहीं कर सकते। एक तो बाहर का भारी दरवाजा बंद है, दूसरे भीतर जाने पर भी यह पता चलना मुश्किल है कि यह सत्कार्य किसने किया है। मुंह आपका है, गालियां बक लीजिए और राह लीजिए, बस! खासकर नंगे पैर चलना तो और भी मुश्किल है। घर के बच्चे ‘ दीर्घशंका’ गलियों में रात को कर देते हैं।</p>
<p>अगर इन गलियों में भगवान शंकर के किसी मस्ताने वाहन से भेंट हो गई अर्थात उसने नाराज होकर आपको हुरपेटा तो जान बचाकर भागना मुश्किल हो जाएगा। खासकर उन गलियों में जो आगे बंद मिलती है। क्योंकि आप पीछे भाग नहीं सकते, आगे रास्ता बंद है, बगल के सभी मकानों में भीतर से भारी सांकल लगी है और इधर सांड महाराज हुरपेटे आ रहे हैं! ​ ​साल में दो एक व्यक्ति इन सांडों के कारण काशी-लाभ करते हैं। लगे हाथ एक उदाहरण सुन लीजिए। लिंकन के बाद जनरल ग्रांट अमेरिका के राष्ट्रपति हुए थे। एक बार जब वे हिंदुस्तान में दौरे पर आए तब बनारस भी आए थे। उन्होंने इस शहर को ‘एक सिटी ऑफ लेंस’ अर्थात गलियों का शहर कहा है। कहा जाता है कि उनकी पत्नी को शंकर भगवान के वाहन ने अपने सींग पर उठा लिया था।</p>
<p>​<strong style="text-align:center; display:block">बहरहाल,</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;काशी कबहुँ न छोड़िये, विश्वनाथ को धाम,<br />
मरने पर गंगा मिले, जियते लंगड़ा आम !!&#8221; </p></blockquote>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-street">इस जन्म में ​अगर ​बनारस की गलियों में नहीं घूमे तो जीवन व्यर्थ और दूसरा जन्म मनुष्य योनि में ही होगा, इसका गारण्टी तो ​है नहीं ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अस्सी ​घाट पर कैरमबोर्ड खेलते एक दूकानदार ​ने कहा:  &#8220;आगे दूकान से ​पानी ​ लय लो, अभी &#8216;क्वीन को लेना&#8217; है&#8221;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2018 14:26:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[अस्सी ​घाट]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस स्टेशन के पास आगे जा रहा था की बगल से १०० ग्राम से अधिक पान का पिरकी पैर के आगे दस्तक दिया। पिरकी फेकने वाले को देखकर पूछा &#8220;क्या भाई&#8221;! उसने तुरन्त कहा: &#8220;इतना सड़क खाली है, किनारे-किनारे काहे चल रहे हैं? * गदौलिया चलोगे ? एक ऑटो वाला से पूछा। ऑटोवाला बेहिचक कहता [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/assi-ghat-varanasi">अस्सी ​घाट पर कैरमबोर्ड खेलते एक दूकानदार ​ने कहा:  &#8220;आगे दूकान से ​पानी ​ लय लो, अभी &#8216;क्वीन को लेना&#8217; है&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>बनारस स्टेशन के पास आगे जा रहा था की बगल से १०० ग्राम से अधिक पान का पिरकी पैर के आगे दस्तक दिया। पिरकी फेकने वाले को देखकर पूछा &#8220;क्या भाई&#8221;! उसने तुरन्त कहा: &#8220;इतना सड़क खाली है, किनारे-किनारे काहे चल रहे हैं?</p>
<p>* गदौलिया चलोगे ? एक ऑटो वाला से पूछा। ऑटोवाला बेहिचक कहता है &#8220;कउनो दूसरा गाडी लय लो। अभी चाय पीना है फिर तनिक विश्राम।&#8221;</p>
<p>* अस्सी पर कुछ लोग कैरमबोर्ड खेल रहे थे। सामने कोल्डड्रिंक की दूकान से पानी का बोतल लेना था। दूकानदार के सामने रखा बोर्ड पर &#8220;क्वीन&#8221; उसके स्ट्राईकर पर थी। बोर्ड के सामने छेद &#8211; क्वीन और स्ट्राईकर एक सीध में। दुकानदार की लम्बाई कम थी इसलिए अपने पैर के नीचे एक पत्थर का टुकड़ा रख खड़ा था। उसने कहा &#8220;आगे दूकान से लय लो, अभी क्वीन को लेना है।&#8221;</p>
<p>* गदौलिया बाज़ार में एक दुकानदार से पूछा : &#8220;रुमाल&#8221; है? इससे पहले की अगली साँस लूँ दुकानदार झटपट कहा: &#8220;ई गर्दनमा में गमछी लटकाय ल। धूप लगे त माथा पर रखि लिह अउ पसीना चले तो पोछि लिह &#8211; एक पन्थ दुहि काज।</p>
<p>* राजेंद्र प्रसाद घाट पर एक नौजवान नाविक जिसका शरीर नाव का पतवार चलाते चलाते &#8216;मदमस्त&#8217; हो गया था, सामने दूसरे नाव से उसके उम्र से कोई दस साल अधिक का दूसरा नाविक कहता है: &#8220;का देहवा त हाथी के बच्चा जईसन लगता।&#8221; नौजवान नाविक तुरन्त कहता है: &#8220;हाँ तोहरे ससुराल के लोग हमरा घरे बासमती चावल भेजलन हाँ।&#8221;<br />
<strong>ई है बनारस।</strong></p>
<p>हमारे देश में लड़का-लड़की की शादी हुयी नहीं, अभी वर और वधु के माता-पिता सोनार के यहाँ इंगेजमेंट रिंग बनने का आदेश भी नहीं दिए, ऊँगली की मोटाई को सोनार नापा भी नहीं; की स्मार्ट फोन पर लड़के-लडकियां मध्-चन्द्रमा (हनीमून) के लिए घर से हज़ारो किलोमीटर दूर एकदम शान्त इलाके में स्थित होटल में अपना कमरा सुरक्षित करने के लिए बेचैन हो जाते हैं। लड़का अगर फोन पर मोहतरमा के मैसेज का जबाब देने में ९-सेकेण्ड भी देरी किया, तो &#8220;वुड-बी पत्नी&#8221; शुतुरमुर्ग की तरह रूठ जाती हैं। लेकिन इस तस्वीर को देखिये। अभी-अभी दोनों की शादी हुयी है। सपरिवार गँगा माय से आशीर्वाद लेने दशाश्वमेध घाट पर मजे में बैठकर आनन्द ले रहे हैं। कउनो परवाह नहीं। केकरो परवाह नहीं। जो देख रहे हैं &#8211; खूब निहारें। है हिम्मत दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई, पटना, जयपुर, कानपूर, लखनऊ, शिमला, हिमाचल में रहने वाले नव-दम्पत्तियों का?<br />
<strong>ई है बनारस।</strong></p>
<p>अगर आपको हिम्मत है तो दिल्ली में राजपथ से ७-लोक कल्याण मार्ग तक बनारस के सांसद से मिलने के लिए गमछी लपेट के निकलकर देखिये। पूरी दिल्ली सल्तनत और दिल्ली पुलिस आपको तिहार में ठूस देगी और जमानत भी नहीं मिलेगा। लेकिन यहाँ आप गमछी लपेट के पूरा ४३ वर्गमील बनारस घूम जाईये कोई नहीं पूछेगा क्या बात है? अपनी मर्जी &#8211; अपनी आजादी ।<br />
<strong>ई है बनारस।</strong></p>
<p>दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई या भारत का कोई भी शहर हो लोगबाग पुलिस को देखते ही रफू चक्कर होने लगते हैं। कहीं कोई मुकदमा में पूछताछ न कर बैठे, न फंसा दे। यहाँ पुलिस वाले और नागरिक, चाहे सड़क के बीचोबीच कोई खड़ा होकर बतियाते हों या ऑटो वाला सड़क के बीच में अपनी गाडी खड़ी कर उसका पिछला पहिया बदलते रहे और ट्रैफिक जाम भी रहे &#8211; कोई फ़िक्र नहीं। पों-पाँ-पों-पाँ-पों-पीं-ट्रिंग-ट्रिंग- के अलावे कुछ नहीं। पैदल चलने वाले भी उसी तरह आपके बगल से निकलेंगे जैसे -४५ डिग्री तापमान पर लोग अपने शरीर को सिकुड़े रखते हैं। कभी-कभी तो आपके माथा के ऊपर से छलांग भी लगाकर पार कर लेंगे। न उन्हें बुरा लगता है और न। है अईसन कोई शहर भारत में?<br />
<strong>ई है बनारस।</strong></p>
<p>भारत को सन 1947 में आजादी मिली। अब हम आजाद हैं। आजादी का क्या उपयोग है, इसकी शिक्षा लेनी हो तो बनारस जरूर आएं। ऐसी शिक्षा आपको न तो सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एडुकेशन दे सकती है और न ही विभिन्न राज्यों के बोर्ड। एकदम व्यावहारिक अनुभव के साथ आप दक्षता प्राप्त करेंगे। बनारसवाले 1947 से ही नहीं, अनादिकाल से अपने को आजाद मानते आ रहे हैं। अब ई अलग बात है कि सं १९४७ के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता वहां जाकर, वहां से चुनते ही &#8220;ज्ञान बांटने लगते हैं। आज़ादी का अर्थ समझने लगते हैं। परन्तु वे यह नहीं जानते की पांच साल बाद &#8220;ऊ चल जहियैं बनारस के लोग उहें रहियैं।&#8221;</p>
<p>बनारस में लोगों को नयी व्यवस्था, नया कानून या नयी बात कतई पसन्द नहीं। इसके विरुद्ध वे हमेशा आवाज़ उठाएँगे। बनारस कितना गन्दा शहर है, इसकी आलोचना नेता, अतिथि और हर तरह के लोग कर चुके हैं, करते आ रहे हैं, करते रहेंगे, लिखते रहेंगे, चिचियाते रहेंगे, भौंकते रहेंगे; पर यहाँ की नगरपालिका इतनी आजाद है कि इन बातों का खयाल कम करती है। खास बनारसवाले भी सोचते हैं कि कौन जाए बेकार का सरदर्द लेने।</p>
<p>हिन्दुस्तान में सर्वप्रथम हड़ताल 24 अगस्त, सन 1790 ई. में बनारस में हुई थी और इस हड़ताल का कारण थी — गन्दगी। सिर्फ़ इसी बात के लिए ही नहीं, सन 1809 ई. में जब प्रथम गृहकर लगाया गया तब बनारसी लोग अपने मकानों में ताला बन्द कर मैदानों में जा बैठे। शारदा बिल, हिन्दू कोड बिल, हरिजन मन्दिर प्रवेश, गल्ले पर सेल टैक्स और गीता कांड आदि मामलों में सर्वप्रथम बनारस में हड़तालें और प्रदर्शन हुए हैं। कहने का मतलब बनारसवाले हमेशा से आजाद रहे और उन्हें अपने जीवन में किसी की दखलन्दाजी पसन्द नहीं आती।</p>
<p>यहाँ तक कि वेश-भूषा में परिवर्तन लाना पसन्द नहीं हुआ। आज भी यहाँ हर रंग के, हर ढंग के व्यक्ति सड़कों पर चलते-फिरते दिखाई देंगे। एक ओर ऊँट, बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी है तो दूसरी ओर मोटर, टैक्सी, लारी और फिटन है। एक ओर अद्धी तंजेब झाड़े लोग अदा से टहलते हैं तो दूसरी ओर खाली गमछा पहने दौड़ लगाते हैं।</p>
<p>आप कलकत्ता की सड़कों पर धोती के ऊपर बुशर्ट पहनें या कोट-पैंट पहनकर पैरो में चप्पल पहनें तो लोग आपको इस प्रकार देखेंगे मानों आप सीधे राँची (पागलखाना) से चले आ रहे हैं। यही बात दिल्ली और बम्बई में भी है। वहाँ के कुली-कबाड़ी भी कोट-पैंट पहने इस तरह चलते हैं जैसे बनारस में ई.आई.आर. के स्टेशन मास्टर। यहाँ के कुछ दुकानदार ऐसे भी देखे गये हैं जो ताश, शतरंज या गोटी खेलने में मस्त रहते हैं, अगर उस समय कोई ग्राहक आकर सौदा माँगता है तो वे बिगड़ जाते हैं। ‘का लेब? केतन क लेब? का चाही, केतना चाही?’ इस तरह सवाल करेंगे। अगर मुनाफेदार सौदा ग्राहक ने न माँगा, तबियत हुई दिया, वरना माल रहते हुए वह कह देंगे—नाहीं हव &#8211; भाग जा। खुदा न खास्ता ग्राहक की नजर उस सामान पर पड़ गयी तो उस हालत में भी वह कह उठते हैं—‘जा बाबा, जा, हमें बेचे के नाहीं हव।’</p>
<p>है किसी शहर में ऐसा कोई दुकानदार? कभी-कभी झुँझलाकर वे माल का चौगुना दाम बता देते हैं। अगर ग्राहक ले लेता है तो वह ठगा जाता है और दुकानदार &#8230; की उपाधि मुफ्त में पा जाता है।</p>
<p>बनारस की सड़कों पर चलने-फिरने की काफी आजादी है। सरकारी अफसर भले ही लाख चिल्लाएँ, पर कोई सुनता नहीं। जब जिधर से तबियत हुई चलते हैं। अगर किसी साधारण आदमी ने उन्हें छेड़ा तो तुरन्त कह उठेंगे—‘तोरे बाप क सडक हव, हमार जेहर से मन होई, तेहर से जाब, बड़ा आयल बाटऽ दाहिने-बायें रस्ता बतावे।’ जब सरकारी अधिकारी यह कार्य करते हैं तब उन्हें भी कम परेशानियाँ नहीं होतीं। लाचारी में हार मानकर वे भी इस सत्कार्य से मुँह मोड़ लेते हैं।</p>
<p>सडक पर घंटों खड़े होकर प्रेमालाप करना साधारण बात है, भले ही इसके लिए ट्रैफिक रुक जाए। जहाँ मन में आया लघुशंका करने बैठ जाते हैं, बेचारी पुलिस देखकर भी नहीं देखती। डबल सवारी, बिना बत्ती की साइकिल चलाना और वर्षों तक नम्बर न लेना रोजमर्रे का काम है। यह सब देखते-देखते यहाँ के अफसरों का दिल पक गया है। पक क्या गया है, उसमें नासूर भी हो गया है। यही वजह है कि वे लोग साधारण जनता की कम परवाह करते हैं। परवाह उस समय करते हैं जब ये सम्पादक नामधारी जीवाणु उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। कहा गया है कि खुदा भी पत्रकारों से डरता है।</p>
<p>मतलब यह कि हिन्दुस्तान का असली रूप देखना हो तो काशी अवश्य देखें। बनारस को प्यार करनेवाले कम हैं, उसके नाम पर डींग हाँकनेवाले अधिक हैं। सभ्यता-संस्कृति की दुहाई देकर आज भी बहुत लोग जीवित हैं, पर वे स्वयं क्या करते हैं, यह बिना देखे नहीं समझा जा सकता। सबके अन्त में यह कह देना आवश्यक समझता हूँ कि बनारस बहुत अच्छा भी है और बहुत बुरा भी। (बना रहे बनारस के सम्मानित श्री विश्वनाथ मुखर्जी साहेब के मदद से) </p>
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		<title>भारत की धार्मिक राजधानी में एक व्यक्ति अब तक 16,000 से भी अधिक मनुष्यों के शरीर को &#8220;पार्थिव&#8221; होते देखा, आत्मा को मोक्ष पाते महसूस किया</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/a-person-in-the-religious-capital-of-india-has-seen-the-body-of-more-than-16000-people-being-pious-till-now-the-soul-felt-liberated</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Apr 2018 12:36:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[दक्षप्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[पराशक्ति]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[भैरव नाथ शुक्ला]]></category>
		<category><![CDATA[मोक्ष का नगरी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>काशी (बनारस) : वैसे यह मनुष्य के कल्पना से परे हैं, परन्तु सत्य ही नहीं, सत्य का पराकाष्ठा है। काशी (बनारस) के एक मकान से पिछले साठ वर्षों में अब तक सोलह हज़ार से अधिक लोग इस पृथ्वी पर अपने &#8211; अपने नश्वर शरीर को त्यागकर ईश्वर में लीन हो गए हैं, अपनी-अपनी आत्मा के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/a-person-in-the-religious-capital-of-india-has-seen-the-body-of-more-than-16000-people-being-pious-till-now-the-soul-felt-liberated">भारत की धार्मिक राजधानी में एक व्यक्ति अब तक 16,000 से भी अधिक मनुष्यों के शरीर को &#8220;पार्थिव&#8221; होते देखा, आत्मा को मोक्ष पाते महसूस किया</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>काशी (बनारस) : वैसे यह मनुष्य के कल्पना से परे हैं, परन्तु सत्य ही नहीं, सत्य का पराकाष्ठा है। काशी (बनारस) के एक मकान से पिछले साठ वर्षों में अब तक सोलह हज़ार से अधिक लोग इस पृथ्वी पर अपने &#8211; अपने नश्वर शरीर को त्यागकर ईश्वर में लीन हो गए हैं, अपनी-अपनी आत्मा के साथ, मोक्ष को प्राप्त किये हैं। वैसे भी, हिन्दू धर्म के अनुसार, यदि एक मनुष्य की मृत्यु काशी कहें या बनारस में होती है, तो जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाकर उसकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है और यही कारण है कि भारत ही नहीं, विश्व के कई देशों से लोग काशी में अपना शरीर त्यागने की असीम ईक्षा रखते हैं, काशी तो आते हैं &#8211; परन्तु कभी वापस नहीं जाने के लिए।</p>
<p>काशी शिव का नगरी है। सती का नगरी है। भूत-प्रेत-पचासों का नगरी है। मोक्ष का नगरी है। कहा जाता है कि दक्षप्रजापति ने सहस्त्रों वर्षों तक तपस्या करके पराम्बा जगदम्बिका को प्रसन्न किया और उनसे अपने यहां पुत्रीरूप में जन्म लेने का वरदान मांगा। पराशक्ति के वरदान से दक्षप्रजापति के घर में दाक्षायणी का जन्म हुआ और उस कन्या का नाम &#8216;सती&#8217; पड़ा। उनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ।</p>
<p>एक बार ऋषि दुर्वासा ने पराशक्ति जगदम्बा की आराधना की। देवी ने वरदान के रूप में अपनी दिव्यमाला ऋषि को प्रदान की। उस माला की असाधारण सुगन्ध से मोहित होकर दक्षप्रजापति ने वह हार ऋषि से मांग लिया।दक्षप्रजापति ने वह दिव्यमाला अपने पलंग पर रख दी और रात्रि में वहां पत्नी के साथ शयन किया। फलत: दिव्यमाला के तिरस्कार के कारण दक्ष के मन में शिव के प्रति दुर्भाव जागा। इसी कारण दक्षप्रजापति ने अपने यज्ञ में सब देवों को तो निमन्त्रित किया, किन्तु शिव को आमन्त्रित नहीं किया। सती इस मानसिक पीड़ा के कारण पिता को उचित सलाह देना चाहती थीं, किन्तु निमन्त्रण न मिलने के कारण शिव उन्हें पिता के घर जाने की आज्ञा नहीं दे रहे थे। किसी तरह पति को मनाकर सती यज्ञस्थल पहुंचीं और पिता को समझाने लगीं।</p>
<p>दक्षप्रजापति अपनी पुत्री से कहते हैं कि वे देवयज्ञ किया है, प्रेतयज्ञ नहीं। जहां देवताओं का आवागमन हो वहां प्रेत नहीं आ सकते। तुम्हारे पति भूत, प्रेत, पिशाचों के स्वामी हैं, अत: मैंने उन्हें नहीं बुलाया है। महामाया सती ने पिता द्वारा पति का अपमान होने पर उस पिता से सम्बद्ध और शरीर को त्याग देना ही उचित समझा। </p>
<p>पिता के तिरस्कार से क्रोध में सती ने अपने ही समान रूप वाली छायासती को प्रादुर्भूत किया और अपने चिन्मयस्वरूप को यज्ञ की प्रखर ज्वाला में दग्ध कर दिया। सती के यज्ञाग्नि में प्रवेश के समाचार को जानकर भगवान शंकर कुपित हो गए। उन्होंने अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और पर्वत पर दे मारी जिससे उसके दो टुकड़े हो गए। एक भाग से भद्रकाली और दूसरे से वीरभद्र प्रकट हुए। उनके द्वारा यज्ञ का विध्वंस कर दिया गया। सभी देवताओं ने शिव के पास जाकर स्तुति की। शिव स्वयं यज्ञस्थल पहुंचे। सारे अमंगलों को दूर कर शिव ने यज्ञ को तो सम्पन्न करा दिया, किन्तु सती के पार्थिव शरीर को देखकर वे उसके मोह में पड़ गए। सती का शरीर यद्यपि मृत हो गया था, किन्तु वह महाशक्ति का निवासस्थान था। अर्धनारीश्वर भगवान शंकर उसी के द्वारा उस महाशक्ति में रत थे। अत: मोहित होने के कारण उस शवशरीर को छोड़ न सके।</p>
<p>महादेव छायासती के शवशरीर को कभी सिर पर, कभी दांये हाथ में, कभी बांये हाथ में तो कभी कन्धे पर और कभी प्रेम से हृदय से लगाकर अपने चरणों के प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे। शिव के चरणप्रहारों से पीड़ित होकर कच्छप और शेषनाग धरती छोड़ने लगे। शिव के नृत्य करने से प्रचण्ड वायु बहने लगी जिससे वृक्ष व पर्वत कांपने लगे। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया।  </p>
<p>संसार का में त्रादसी को देखकर देवताओं और भगवान विष्णु ने महाशक्ति सती के देह को शिव से वियुक्त करना चाहा। भगवान विष्णु ने शिव के मोह की शान्ति एवं अनन्त शक्तियों के निवासस्थान सती के देह के अंगों से लोक का कल्याण हो &#8211; यह सोचकर सुदर्शन चक्र द्वारा छायासती के शरीर के खण्ड-खण्ड करने लगे। सती के मृत शरीर के विभिन्न अंग और उनमें पहने आभूषण ५१ स्थलों पर गिरे जिससे वे स्थल शक्तिपीठों के रूप में जाने जाते हैं। सती के शरीर के हृदय से ऊपर के भाग के अंग जहां गिरे वहां वैदिक एवं दक्षिणमार्ग की और हृदय से नीचे भाग के अंगों के पतनस्थलों में वाममार्ग की सिद्धि होती है।</p>
<p>काशी में सती की &#8216;कान की मणि&#8217; गिरी थी। यहां सती &#8216;विशालाक्षी&#8217; तथा शिव &#8216;कालभैरव&#8217; कहलाते हैं। काशी अपने आप में रहस्यों से भरा शहर है। काशी शहर जिसकी जड़ें खुद इतिहास समेटे है, जो परम्पराओं से भी प्राचीन है, जो महागाथाओं से भी परे है। </p>
<p>महादेव के इसी नगरी काशी के बेहद भीड़-भाड़ वाले इलाके में, एक कोने में, एक अनोखी ईमारत है जिसके कमरे मृत्यु की लिए सुरक्षित होता हैं। यहाँ देश भर से लोग इसलिए ठहरने आते हैं, जिन्हे अपनी मृत्यु का आभास होता है, इंतज़ार होता है । बनारस के गिरजाघर चौराहे के पास स्थित काशी लाभ मुक्ति भवन में लोग आते हैं, मगर फिर यहाँ से कभी नहीं जाते। यहाँ से जाता है उनका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए, दाह संस्कार के लिए।</p>
<figure id="attachment_528" aria-describedby="caption-attachment-528" style="width: 300px" class="wp-caption alignleft"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/04/Get-salvation-in-Kashi-300x191.jpg" alt="मुक्ति-भवन" width="300" height="191" class="size-medium wp-image-528" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/04/Get-salvation-in-Kashi-300x191.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/04/Get-salvation-in-Kashi-768x488.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/04/Get-salvation-in-Kashi-696x442.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/04/Get-salvation-in-Kashi-661x420.jpg 661w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/04/Get-salvation-in-Kashi.jpg 850w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><figcaption id="caption-attachment-528" class="wp-caption-text">मुक्ति-भवन</figcaption></figure>
<p>बनारस का यह &#8216;मुक्ति-भवन&#8217; चैरिटी से चलता है। यहाँ १२ कमरे हैं, एक मंदिर है, और पुजारियों के लिए छोटे-छोटे क्वार्टर बने हैं &#8211; मृत्यु के इंतजार का। नियमतः यहां दो हफ़्ते तक रह सकते हैं। यह दो-मंज़िला इमारत जो जीवन के सत्य की साक्षी है। उसके दरवाज़े हर पल, हर घड़ी खुले हैं। हवा के झोंके की तरह शरीर के बंधन में उलझी अात्मा यहाँ आती है। कुछ गहराती सांसें, अवचेतन मन, साथ छोड़ता शरीर और सही मौक़ा पाकर अनंत में विलय हो जाता है। राजा हो या रंक सभी को इस प्रक्रिया से गुजरना है। मुक्ति भवन में तक पहुँचते-पहुँचते ग़रीबी-अमीरी, पद -प्रतिष्ठा, चाहत -दुश्मनी, ईर्ष्या-द्वेष सब गेट के बाहर ही समाप्त हो जाता है। </p>
<p>इस संस्था के प्रबंधक हैं भैरव नाथ शुक्ला जो लोगों की मुक्ति के लिए कई दसकों से प्रार्थना करते आ रहे हैं। ये लोगों को कुछ और दिन ठहरने की इजाज़त दे देते हैं, वो भी तब, जब उन्हें लगता है कि यह मनुष्य कुछ ही दिन में इस लोक से सिधारने वाला है। अब तक यहाँ पंद्रह हज़ार से अधिक लोग ठहर चुके हैं। </p>
<p>शुक्ला जी के अनुसार: &#8220;जो व्यक्ति संसार के सुखों को त्यागकर ईश्वर को पाने की इच्छा रखता है वह अंतिम समय में काशी प्रवास करता है। ऐसे ही लोगों लिए यह मुक्ति भवन बनाया गया है।&#8221;</p>
<p>इस भवन का निर्माण विष्णु बिहारी डालमिया ने करवाया और उन लोगों को समर्पित किया था जो काशी में मोक्ष पाना चाहते हैं। ऐसे लोगों के लिए यहां निःशुल्क रखने की व्यवस्था की गयी। मुक्ति भवन के भीतर बने मंदिर में काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह आरती और अभिषेक साल 2000 से परस्पर किया जा रहा है। पहले यहां 8 पुजारी हुआ करते थे और एक सेवक पर अब सिर्फ 3 पुजारी है और एक सेवक बचे हैं।</p>
<p>इस भवन में रहने से लेकर , रोजाना के रीति रिवाज और यहां तक कि देह से आत्मा के मुक्त होने के बाद अंतिम संस्कार तक का खर्चा ट्रस्ट द्वारा वहन किया जाता है। शुक्लाजी के अनुसार : एक पवित्र स्थान है हमारा ट्रस्ट। भोजन से लेकर सभी रीति रिवाजों का खर्चा उठाता है क्योंकि हम आध्यात्मिक संतोष उपलब्ध कराने में विश्वास रखते हैं। यहाँ न केवल भारत से बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु मोक्ष की अवधारणा को समझने के लिए यहाँ समय व्यतीत करते हैं। </p>
<p>वाराणसी भारत की धार्मिक राजधानी के रूप में मशहूर है जहां हजारों लोग विभिन्न आध्यात्मिक मकसदों को लेकर आते हैं। कुछ अंतिम संस्कार के लिए आते हैं, कुछ अपने नवजात शिशुओं के जन्म संस्कार के आते हैं तो कुछ शांति से मृत्यु को पाने के लिए। जो लोग मरने वाले हैं या मृत्युशैय्या पर हैं और मोक्ष में यकीन रखते हैं वे आध्यात्मिक संतोष के लिए यहां आते हैं।</p>
<p>बहरहाल, काशी के मणिकर्णिका घाट पर जाकर देखिए। वहां रोजाना सैकड़ों मृतकों का दाह संस्कार होता है। अगर कोई वहां बैठ कर साधना करता है तो उसे उस स्थान का महत्व समझ आता है। इसका मुख्य कारण यह है कि वहां प्रचुर मात्रा में और बहुत वेग के साथ शरीरों से उर्जा बाहर निकलती है। यही कारण है कि शिव समेत कुछ खास किस्म के योगी हमेशा श्मशान घाट में साधना करते हैं, क्योंकि बिना किसी की जिंदगी को नुकसान पहुंचाए साधक जीवन ऊर्जा का उपयोग करता हैं। ऐसी जगहों पर खासकर तब जबर्दस्त ऊर्जा होती है, जब वहां आग जल रही हो। अग्नि की खासियत है कि यह अपने चारों ओर एक खास किस्म का प्रभामंडल पैदा कर देती है या आकाश तत्व की मौजूदगी का एहसास कराने लगती है।मानव के बोध के लिए आकाश तत्व बेहद महत्वपूर्ण है। जहां आकाश तत्व की अधिकता होती है, वहीं इंसान के भीतर बोध की क्षमता का विकास होता है। (सुश्री ईशा बनर्जी और सुश्री श्रद्धा बक्शी के सहयोग से.)</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/a-person-in-the-religious-capital-of-india-has-seen-the-body-of-more-than-16000-people-being-pious-till-now-the-soul-felt-liberated">भारत की धार्मिक राजधानी में एक व्यक्ति अब तक 16,000 से भी अधिक मनुष्यों के शरीर को &#8220;पार्थिव&#8221; होते देखा, आत्मा को मोक्ष पाते महसूस किया</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>मोदी जी &#8220;इन&#8221; बनारस या मोदीजी का &#8220;डमी&#8221; बनारस या मोदीजी का &#8220;बाय-बाय&#8221; बनारस !!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[आलोक कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Mar 2018 09:23:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र बदलने की तैयारी में हैं? क्या हाथी के साइकिल पर सवार होने से बन रहे त्रिकोण ने प्रधानमंत्री के उत्तर प्रदेश का सांसद बने रहने में रोड़ा खड़ा कर दिया है? या, 2014 में जिस तरह से बनारस में स्थापित होने के लिए प्रधानमंत्री ने बड़ोदरा को डमी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/modi-ji-in-banaras-or-modijis-dummy-banaras-or-modijis-bye-bye-banaras1">मोदी जी &#8220;इन&#8221; बनारस या मोदीजी का &#8220;डमी&#8221; बनारस या मोदीजी का &#8220;बाय-बाय&#8221; बनारस !!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र बदलने  की तैयारी में हैं?  क्या हाथी के साइकिल पर सवार होने से बन रहे त्रिकोण ने प्रधानमंत्री के उत्तर प्रदेश का सांसद बने रहने में रोड़ा खड़ा कर दिया है?  या, 2014 में जिस तरह से बनारस में स्थापित होने के लिए प्रधानमंत्री ने बड़ोदरा को डमी संसदीय सीट के तौर पर इस्तेमाल किया था, उसी तरह आगामी लोकसभा चुनाव में कोई नई रणनीति बन रही है। जिसमें बनारस के अलावा पटना और अहमदाबाद जैसे सीटों पर भी चुनाव लड़ने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं ?</p>
<p>उत्तर प्रदेश से प्रकाशित देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय अखबार की सुर्खियां बनी एक खबर के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री को पटना और अहमदाबाद से चुनाव लड़ाने की तैयारी में है। अगर ऐसा होता है, तो प्रधानमंत्री इस कहावत को सत्यापित करेंगे कि आज के बिहार की राजनीति जैसी है देश में वैसी राजनीतिक तस्वीर दस साल के बाद पैदा होने वाली है। मतलब बिहार राजनीतिक तौर पर देश से दस साल आगे है। बिहार बाकी और किन क्षेत्रों में आगे है, यह बताना आसान नहीं है। </p>
<p>पहले पटना के बहाने बिहार से प्रधानमंत्री के चुनाव लड़ने की संभावना को समझते हैं। पटना से केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव सांसद हैं। उन्होंने जटिल मेहनत से पटना संसदीय सीट को बड़ी मेहनत से सींचकर अपना बनाया है। वह लंबे समय तक राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी)के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के प्राण प्यारे हुआ करते थे। आरजेडी में उनका व्यवहार लालू प्रसाद के दत्तक पुत्र सरीखा हुआ करता था। लेकिन 2014 में जैसे ही आरजेडी प्रमुख ने अपनी बेटी डॉ मीसा भारती को सांसद बनाने की लालसा पाली और रामकृपाल से पटना संसदीय सीट के परित्याग का आग्रह किया, दत्तक पुत्र रामकृपाल ने छिपकिली को शर्मसार करने के जैसा रंग बदल लिया। झट पाला बदलकर ताउम्र जी भरकर कोसते रहे चिरविरोधी बीजेपी के पाले में आ गए। रामकृपाल के रंग बदलने से आरजेडी को एतिहासिक नुकसान का सामना करना पड़ा। रामकृपाल से पहले आरजेडी के ज़ड़ में मट्ठा डालने के लिए नीतिश कुमार के साथ हो लिए प्रोफेसर रंजन यादव की नजर पटना संसदीय क्षेत्र पर गडी थी। लेकिन रामकृपाल ने न सिर्फ रंजन यादव की संभावनाओं पर पानी फेर दिया बल्कि संसदीय राजनीति में आरजेडी के लिए घर का भेदी लंका डाहे, वाला काम कर दिया।</p>
<p>ऐसे में अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए पटना संसदीय क्षेत्र से दावेदारी छोड़ने के लिए केंद्रीय मंत्री रामकृपाल को राजी किया जा सकता है। क्या रामकृपाल ने जो काम पितातुल्य लालू प्रसाद के लिए नहीं किया वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए करने जा रहे हैं। यह लाख टके का सवाल है। वैसे राज्यसभा सांसद के बजट को लेकर पटना पर फोकस कर रही डॉ मीसा भारती अपनी दावेदारी को लेकर फिर से सक्रिय हैं। ऐसे में जातीय समीकरण व अन्य कारणों के लिए लगातरा चर्चा मे  रहने वाला पाटलीपुत्र का सीट प्रधानमंत्री के लिए आसान नहीं होगा।  </p>
<p>हालांकि प्रधानमंत्री अगर बिहार के ही अन्य सीट से चुनाव लड़ने की लालसा रखते हैं, तो उनके लिए पटना साहिब की सीट मुफीद हो सकती है। वहां के फिलहाल सिने अभिनेता और बिहारी बाबू के नाम से मशहूर शत्रुध्न सिन्हा बीजेपी के सांसद हैं। सिन्हा ने केंद्र में मंत्री न बनाए जाने से खफा होकर पार्टी के अंदर छत्तीस का आंकड़ा बना रखा है। उनकी सीट पटना साहिब से प्रधानमंत्री लड़े या कोई और लेकिन बीजेपी की ओर से सिन्हा को फिर टिकट नहीं मिलने की बाद अभी से कही जा रही है।</p>
<p>वैसे प्रधानमंत्री के लिए बिहार में संसदीय सीटों की कमी नहीं होगी। घोर जातिवादी राजनीति के शिकार बनकर अंदर से छिन्न भिन्न तरीके से टूटे बिहार के मतदाताओं का रिकार्ड रहा है कि यहां बाहर से आए नेता को चुनावी राजनीति में आंखों पर बैठाया जाता रहा है। जार्ज फर्नाडींस, मधु लिमये, शरद यादव बिहार से आसानी से चुनाव जीतकर संसद में जाते रहे हैं। इस लिहाज से जार्ज का सींचा मुजफ्फरपुर और नीतिश कुमार की ओर से कभी जार्ज को उपहार में दिया नालंदा संसदीय क्षेत्र के अलावा मुंगेर और भागलपुर के अलावा जेटली की नाराजगी के शिकार होकर मौन पड़े कीर्ति झा आजाद का दरभंगा संसदीय क्षेत्र मुफीद हो सकता है।</p>
<p>जहां तक अहमदाबाद से प्रधानमंत्री के चुनाव लड़ने की अटकलों का सवाल है, तो इसके पीछे खालिस कारण गुजराती अस्मिता की रक्षा है। गुजराती गौरव ज्यादा है। उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए अहमदाबाद की अहमियत देने में कोई कसर नहीं चोड़ी है। ऐतिहासिक रुप से प्रधानमंत्री पद पर नरेन्द्र मोदी के बैठने के बाद से ही विदेशी मेहमानों को अहमदाबाद ले जाया ताता है। अहमदाबाद प्रोटोकॉल का शहर बन गया है। कई मामलों में काशी से पहले प्रधानमंत्री ने अहमदाबाद को प्रधानता दी है।  </p>
<p>जब दो में से एक संसदीय क्षेत्र को रखने के जटिल फैसले का वक्त आया तो बड़ोदरा से ज्यादा मार्जिन से हुई जीत के बावजूद प्रधानमंत्री ने काशी को चुनना ज्यादा पसंद किया। इसके पीछे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश के सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले प्रदेश के तौर पर होती रही गणना है। उत्तर प्रदेश का होकर प्रधानमंत्री 81 संसदीय सीटों को प्रभावित करते हैं। पिछली बार भी काशी से चुनाव लड़ते वक्त प्रघानमंत्री ने बडोदरा को नहीं भूला था। दरसल गुजरात को प्रधानमंत्री ने असीम पसीने की मेहनत से सींचा है। गुजरात, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की मजबूत सीढ़ी है। प्रधानमंत्री तो क्या घर को आसानी से कोई नहीं छोड़ता।</p>
<p>वैसे अबतक का रिकार्ड रहा है कि चुनाव को लेकर प्रधानमंत्री जैसी बड़ी शख्सियत के मन में क्या चल रहा है उसे पढना आसान नहीं रहा है। फिर भी चर्चा चली है, तो इसके निहितार्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए। अव्वल यह कि प्रधानमंत्री के स्तर पर चुनाव क्षेत्र बदलने की बात क्यों चली है। क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बनारस के विकास कार्यों से संतुष्ट नहीं हैं। क्या उनको लग रहा है कि उनके काम से बनारस के लोग नाराज हैं। या, गोरखपुर और फुलपुर में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मोर्य के परित्यक्त संसदीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति का सत्यानाश हो गया। जिस तरह से मायावती ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से चुनावी एलायंस करने का स्पष्ट संकेत दे रखा है, उससे बीजेपी की मुसीबत भढी है। कोई अपशकुन उनको सता रहा है जिससे घबराकर संसदीय क्षेत्र का परित्याग करने का निर्णय कर लिया है। ऐसी धारणा प्रधानमंत्री के चुनावी प्रतिद्वंदी भी नहीं सोच सकते हैं। इसे लेकर आसानी से विरोधी व्यूहरचना की सफलता की कल्पना तो की जा सकती है, लेकिन व्यवहार में उसे उतार लेना आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा है। क्योंकि बनारस की राजनीति में फिलहाल प्रधानमंत्री के घोर विरोध को लेकर कोई हवा नहीं चल रही है। जिसके आधार पर ऐसे नतीजे निकाले जा सके।</p>
<p>इसके विपरीत बनारस फिलहाल उन संसदीय क्षेत्रों में शामिल है, जिसने पिछले चार सालों में बदलाव के कई मानक तोड़े हैं। गुजरात से आने वाले राज्यसभा के एक विश्वस्त सांसद को बनारस के विकास कार्यों पर सुक्ष्म निगरानी के लिए होल टाइम काम दिया गया है। फिलहाल तो उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। प्रदेश में जब समाजवादी पार्टी की सरकार हुआ करती थी तब भी प्रधानमंत्री ने तात्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इतनी ट्विनिंग बना रखी थी कि बनारस में सबसे सक्षम जिलाधिकारी, अनुमंडलाधिकारी और अंचलाधिकारी की नियुक्ति हो और ये सब प्रधानमंत्री कार्यालय के सीधे संपर्क में रहकर काम करते रहे।  </p>
<p>प्रधानमंत्री स्वंय झाडू लेकर अस्सी घाट से लेकर बनारस के कई कोने में दबे कूड़े को झाड़ने की पहल कर चुके हैं। उनके सांसद बनने के बाद से वायदे के मुताबिक काशी को क्योटो तो नहीं बनाया जा सकता है लेकिन विकास और बदलाव के नाम पर बनारस में जमीन आसमान का फर्क आया है। यह दीगर है कि चुनाव जीतने के बाद के शुरुआती चरण ने शिव की नगरी बनारस ने प्रधानमंत्री के लिए “बहुत कठिन है डगर पनघट के” वाला अहसास देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।</p>
<p>शुरुआती दौर में बनारस में आयोजित कई धन्यवाद कार्यक्रमों को प्राकृतिक आंधी तूफान की वजह से प्रधानमंत्री को टालने को मजबूर होना पड़ा था। लेकिन बाद के चरणों में उनपर काबू पा लिया गया। बीते विधानसभा चुनाव के वक्त बनारस में भाजपा का कमल की कली फूल बनकर जमकर खिली। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रांगण से संचालित छात्र राजनीति के उत्पात और आप्लावन को छोड़कर शेष शहर में विपक्ष को जमने के लिए पैर देने वाला फिलहाल कोई ठौर नहीं दिख रहा है। बनारस के विकास के जरुरतमंद बुनकर से लेकर हाशिए पर फंसे हर जाति बिरादरी के मतदातों की सुध ली जा रही है।</p>
<p>बनारस में चुनावी चुनौती देने के लिए विपक्ष को चट्टानी एकता का परिचय देना होगा। उस मुताबिक व्यूह रचना बनानी होगी। जो फिलहाल नजर नहीं आता। राज्यसभा चुनाव में जिस तरह से समाजवादी पार्टी को जया बच्चन की कीमत पर बहुजन समाज पार्टी के दलित चहेरे भीमराव अम्बेडकर को जीतवाना कबूल नहीं हुआ, उससे गोरखपुर और फुलपुर उपचुनाव से जगी संभावना को पलीता ही लगा है।</p>
<p>दूसरा, प्रधानमंत्री बिहार या गुजरात से चुनाव लड़कर नया किस्म की राजनीति करना चाहता है।</p>
<p>जहां तक नतीजों की आशंका से घबराकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बदलने की बात चली है, तो हार की आशंका से घबराहट की वजह पर यकीन करना आसान नहीं है। खासकर जिन्होंने प्रधानमंत्री के कामकाज के तरीके को देख रखा है, वह अगर विपक्ष में भी हैं, तो इस पर यकीन करना मुश्किल है।उनकी ओर से किए गए वायदों के मुताबिक नहीं हो पाया है ? काशी को क्योटो बना देने का संकल्प अधूरा है। अधूरे संकल्प के व्याधिपूर्ण नतीजों की आशंका से चुनाव क्षेत्र बदलने पर विचार चल रहा है। </p>
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