वृद्ध ‘माता-पिता को, विधवा माँ को आज भी लोग उन्हें वृद्धाश्रम या विधवा आश्रम में क्यों छोड़ आते हैं?

​बनारस के विधवा आश्रम में ​दम तोड़ती एक विधवा
​बनारस के विधवा आश्रम में ​दम तोड़ती एक विधवा

बनारस: ​
उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस के सभी ८४ घाट और बनारस की सैकड़ों गलियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं – निःशब्द।

उनके आठ फीट x छः फीट के कमरे में तिलचट्टा और चिपकिल्ली का साम्राज्य था। कोने में प्लास्टिक के डब्बे में रखे लाल रंग का मसूर दाल पर कभी-कभी चिपकिल्ली चढ़कर नीचे उतर रहा था। छोटे-छोटे चूहों के लिए मानो समस्त क्षेत्र खुला मैदान हो और वे बाधा – दौड़ का अभ्यास लगातार कर रहे हों। दरवाजे के चौखट से घर में गिरे पानी एक सुराग से बाहर निकल रहा था। यह पानी कुछ देर पहले बर्तन साफ़ करने में गिरा था। भात के कुछ अंश अभी भी वहां गिरा था जो पानी की कमी के कारण बाहर नहीं निकल पाया था और वह तिलचट्टे के लिए भोजन था।

एक दूसरे कोने में प्लास्टिक के एक बाल्टी में पानी रखा था। इस बाल्टी का क्षेत्रफल भी कमरे के क्षेत्रफल से अधिक नहीं था, जिसमे पांच लीटर पानी से अधिक जाना, यानि कमरे में बाढ़ आने के बराबर था।

सामने पचास के दसक में बने मोटे एल्युमिनियम के चादरों से बना एक बक्सा, जो अपने जवानी में चमकता रहा होगा, आज इस वृद्धा की तरह जीवन की अंतिम साँसे खींच रहा था। न जाने हवा और मिट्टी की कितनी परतें इसके चादरों को ढंककर काला कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे उस घर में रखा एक-एक सामान उस वृद्ध महिला को देख रहा हो और इंतज़ार कर रहा हो की कब सभी गँगा की धाराओं में समर्पित होंगे अपनी संगनी के साथ।

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उस दिन से कोई ६० वर्ष पहले २० वर्ष की आयु में उनके घर के लोग उन्हें बनारस लाये थे। पति की मृत्यु के बाद गँगा स्नान कराने के उद्देश्य से। ललिता घाट स्थित गँगा के किनारे सभी एक साथ थे। पहले पुरुष लोग स्नान किये। फिर कुछ महिलाएँ एक साथ स्नान करने नीचे उतरीं।

हर-हर गंगे -हर – हर गंगे कर जब पानी से मुख को बाहर निकालीं भगवान् सूर्य को जल अर्पित करने, तब तक घर के सभी अपने “पराये” हो चुके थे। उधर सूर्यदेव आसमान पर ऊपर आये, इधर सभी सगे-सम्बन्धी जो बहुत ही विस्वास के साथ कलकत्ता से साथ आये थे, अस्ताचल में चले गए।

अब तो किसी का चेहरा तक याद नहीं है उन्हें। हाँ, इनके पति के पास उस समय कोई ३०० से अधिक बीघा जमीं थी। वे माता-पिता के एकलौते सन्तान थे। पांच बहुत बड़े-बड़े तालाब थे जिसमे मछलियाँ जीवन जीती थी। विवाह के कोई आठ महीने बाद ही समय ने अपना रुख मोड़ा था इनसे और ये विधवा हो गयीं।

उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस और बनारस की सैकड़ों गालियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं – निःशब्द। आज भी बनारस की गलियों में, विधवा आश्रमों में कई हज़ार विधवाएं अपने जीवन की अंतिम बसन्त को समाप्त होते देख रहीं हैं। गंगा की ओर जाती बनारस की पुरानी गलियों में जैसे दो घरों की दीवारें बांस-बल्लों के सहारे एक-दूसरे को संभाले हुए हैं, इस विस्वास के साथ की दोनों एक-साथ गिरेंगे; भारत के गाओं, शहरों से बनारस के घाटों पर, बनारस की तंग गलियों में अपने ही परिवारों, परिजनों, सन्तानो द्वारा फेकीं गयी, पटकी गयी विधवाओं को अब सिर्फ महादेव का सहारा है उनका शरणागत होने के लिए।

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अपने प्रयास के दौरान आज़ादी के एक गुमनाम क्रन्तिकारी के वंशजों में एक विधवा को किताब से जीवन बदलने के लिए सन २०१५ में बनारस और वृन्दावन की विधवाओं पर कार्य किया। किताब का नाम दिया INDIA’S ‘ABANDONED’ MOTHERS.

इस कार्य के दौरान एक प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ नहीं पाया, आज भी प्रयत्नशील हूँ:

“आखिर ‘माता-पिता के वृद्धावस्था होने पर, अथवा माँ को विधवा होने पर, या पिता को विधुर होने पर आज भी भारत के लोग, सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित ही नहीं; पढ़े-लिखे विद्वान और विदुषी भी, धनाढ्य भी, उच्च पदों पर पदस्थापित अधिकारी भी – अपने माता-पिता को विधवा आश्रम या वृद्धा आश्रम में क्यों भेज देते हैं? क्या उनकी जवानी जीवन पर्यन्त बरकरार रहेगी? क्या उनके सन्तान इन्ही बातों को भविष्य में दोहरा नहीं सकेगा?”

“आखिर ‘माता-पिता के वृद्धावस्था होने पर, अथवा माँ को विधवा होने पर, या पिता को विधुर होने पर आज भी भारत के लोग, सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित ही नहीं; पढ़े-लिखे विद्वान और विदुषी भी, धनाढ्य भी, उच्च पदों पर पदस्थापित अधिकारी भी – अपने माता-पिता को विधवा आश्रम या वृद्धा आश्रम में क्यों भेज देते हैं? क्या उनकी जवानी जीवन पर्यन्त बरकरार रहेगी? क्या उनके सन्तान इन्ही बातों को भविष्य में दोहरा नहीं सकेगा?”

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