ऐतिहासिक गांधी मैदान, पटना से: आपको याद हो अथवा नहीं, लेकिन भारत सरकार के दस्तावेजों के साथ-साथ इंटरनेट और विभिन्न टीवी चैनलों, सोशल मीडिया पर आज भी उपस्थित है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को सार्वजनिक मंच से बिहार में उनके राज में भ्रष्टाचार के घोटाले उजागर किये थे। जिस दिन मंच से प्रधानमंत्री यह बोल रहे थे, बिहार के लोगों में, खासकर मतदाताओं में एक आशा की किरण जगी – शायद प्रदेश का कुछ अच्छा होने वाला है। लेकिन समय बदलते गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक होते गए। इतना ही नहीं, आने वाले दिनों में भी शायद उन घोटालों से पर्दा कभी नहीं उठ पायेगा।
नौ साल पहले 30 अक्टूबर, 2015 को चुनाव प्रचार-प्रसार के दौरान लालू प्रसाद यादव के जन्मस्थान गोपालगंज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सार्वजनिक रूप से कहे थे : “नीतीश बाबू …. अरे चुनाव में तो हार जीत होती रहती है, ऐसा क्यों कर रहे हो? मोदी को गालियां देते देते थक गए जो बिहारियों को दे रहे हैं। मोदी पर आरोप लगाते लगाते थक गए, जो अब बिहारियों पर लगा रहे हो। मोदी पर जितना अत्याचार करना है कर लो, लेकिन बिहारियों का अपमान मत करो, आपको महंगा पड़ जाएगा।”
नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा था कि “दिल्ली में भी रोजाना भ्रष्टाचार के मामले आते थे। टूजी हो या कोयला, सब में पैसा खाया। लेकिन 16 महीनों से मुझ पर भ्रष्टाचार को कोई आरोप नहीं है। इतनी गालियां देते हैं लेकिन भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा पाए। मुझ पर भरोसा कीजिये, मैं ये पैसा खाना बंद कराऊंगा।”
नीतीश पर हमला करते हुए मोदी ने कहा, “हालत तो देखिए, नीतीश के मंत्री कैमरे के सामने पैसे लेते पकड़े गए, ये कम बड़ा अपराध है क्या? लेकिन उन्हें कोई शर्म है क्या? नीतीश ने कहा था जो भ्रष्टाचार में पकड़ा जाएगा उसके घर में गरीबों के लिए स्कूल खोला जाएगा। लालू को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल हुई, उनके घर को जब्त किया क्या? किसे पागल बना रहे हो नीतीश बाबू? इतना ही नहीं उनके मंत्री बिहार को बेच रहे हैं। नीतीश बाबू आपने अपने मंत्रियों के घर जब्त किए क्या? कोई कार्रवाई की क्या? अभी तो आपकी सरकार है। इन 25 सालों में इन्होंने जो किया है उसकी सूची है।”
गोपालगंज की सभा में 84 सेकेंड तक महागठबंधन के नेताओं के समय की घोटालों की सूची लगातार 80 सेकेंड में उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार के समय के 25 और लालू यादव के समय के 7 घोटाले गिनाए। फिर 4 सेकेंड में बोले- मैं महागठबंधन के महाशय के चारा घोटाले को तो गिन ही नहीं रहा हूं। उसके बाद वे प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार और जंगलराज पर बोले।
इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने अपने प्रचार के दौरान यह भी कहा था “नीतीश बाबू चुनाव में हार-जीत तो होती रहती है। ऐसे में गुस्सा क्यों हो रहे हो? मोदी को गाली देते-देते थक गए तो अब बिहारियों को गाली देने लगे। बिहारियों के स्वाभिमान पर चोट मत पहुंचाओ महंगा पड़ेगा।” चारा घोटाला के अतिरिक्त नरेंद्र मोदी लालू यादव के कालखंड में अलकतरा घोटाला, इंजीनियरिंग कॉलेज घोटाला, व्याख्याता नियुक्ति घोटाला, सिपाही नियुक्ति घोटाला, नलकूप घोटाला, कंबल खरीद घोटाला, रेलवे घोटाला का नाम उल्लेखित किये।
जिस घोटाले में आपके महाशय को सजा हुई है उसकी तो बात करता ही नहीं। उन्हें सजा मिलनी चाहिए या नहीं? इन्हे बर्खास्त करना चाहिए कि नहीं? अपहरण होता था, दलितों पर जुल्म होता था, मां-बहनों पर अत्याचार होता था, विनाश की लीला थी, चंबल वापस चाहिए था, वो पुराने दिन वापस चाहिए क्या? नीतीश बाबू आपको कुर्सी के लिए पुराने दिन अच्छे लगते होंगे, लेकिन बिहार को ये मंजूर नहीं है। नीतीश कुमार तो यह भी कहे थे कि नरेंद्र मोदी की रैली में पैसे देकर लोग आते हैं।
इतना ही नहीं, मोदी ने कहा कि “नीतीश कुमार ने 24 अगस्त, 2005 को ही अपने इरादे साफ कर दिए थे। लेकिन जब मैंने आरोप लगाया कि वे अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और अति पिछड़ों के आरक्षण कोटा में से पांच प्रतिशत एक समुदाय विशेष को दे देंगे तो वे अपना आपा खो बैठे। भारतीय संविधान के निर्माता भी इसके खिलाफ (धर्म के आधार पर आरक्षण) थे। उन्होंने कहा कि मेरे पास दस्तावेज हैं कि अगस्त, 2005 को संसद में उन्होंने(:नीतीश) क्या कहा था। मैं उन्हें चुनौती देता हूं कि अगर उनमें हिम्मत है तो इसका जवाब दें। वह इतने बड़े झूठ बोलते हैं और घटिया बातों में शामिल होते हैं। यह खेल ज्यादा दिन नहीं चलेगा।”
नितीश कुमार के कालखंड में हुए घोटालों को गिनाते, मसलन दवा खरीद घोटाला, ट्रांसफाॅर्मर खरीद घोटाला, एस्टीमेट घोटाला, फर्टिलाइजर सब्सिडी घोटाला, मस्टर रोल घोटाला, राशन-किरासन घोटाला, शराब घोटाला, इंदिरा आवास घोटाला, मनरेगा घोटाला, शौचालय घोटाला, कोसी केनाल निर्माण घोटाला, मिड डे मील घोटाला, आंगनबाड़ी घोटाला, कुलपति घोटाला, पथ निर्माण घोटाला, पुल निर्माण घोटाला, शिक्षा अभियान घोटाला, टेक्स्टबुक छपाई घोटाला, परिवहन घोटाला, वायरलेस बैटरी खरीद घोटाला, बियाडा जमीन घोटाला, बुद्ध स्मृति पार्क घोटाला और चावल घोटाला, प्रधानमंत्री सांस भी नहीं लिए। लेकिन दुर्भाग्य है कि इन विगत वर्षों में कौन किसकी आलोचना क्यों किये यह तो वे भी जानते हैं और नितीश कुमार – लालू यादव एंड कंपनी तो जानते ही हैं।
गोपालगंज के उस मंच से लेकर कल से ऑनलाइन मंच तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक बाल भी बांका नहीं कर सकते। अलबत्ता अनेकाने विशेषणों से वे स्वयं और उनके मंत्रिमंडल के सीपा-सलाहकार नीतीश कुमार को अलंकृत करते रहे। कल नरेन्द्र मोदी ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बिहार की मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना का शुभारंभ किया – नाम दिया मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना जो राष्ट्र के कोषागार पर एक दस मिनट के दौराम 7500 करोड़ रूपये का बोझ रख दिया।

इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने नवरात्रि के पावन अवसर पर सभी को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने बिहार की महिलाओं के साथ इस उत्सव में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना का शुभारंभ हो रहा है। श्री मोदी ने बताया कि 75 लाख महिलाएं पहले ही इस पहल से जुड़ चुकी हैं। उन्होंने घोषणा की कि इन 75 लाख महिलाओं में से प्रत्येक के बैंक खातों में एक साथ 10,000 रुपये हस्तांतरित किए जा चुके हैं।
कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री ने बिहार की 75 लाख महिलाओं के बैंक खातों में सीधे 10-10 हज़ार रुपये हस्तांतरित किए, जो कुल 7,500 करोड़ रुपये की राशि है। बिहार सरकार की एक पहल, इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और स्व-रोज़गार एवं आजीविका के अवसरों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। यह योजना राज्य के प्रत्येक परिवार की एक महिला को वित्तीय सहायता प्रदान करेगी, जिससे वे अपनी पसंद का रोजगार या आजीविका से जुड़े कार्य शुरू कर सकेंगी। इससे आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा।
इस योजना के तहत, प्रत्येक लाभार्थी को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से 10,000 रुपये का प्रारंभिक अनुदान मिलेगा और बाद के चरणों में 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त वित्तीय सहायता की संभावना है। इस सहायता का उपयोग लाभार्थी अपनी पसंद के क्षेत्रों में कर सकता है, जिसमें कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, सिलाई-बुनाई और अन्य लघु-स्तरीय उद्यम शामिल हैं। यह योजना समुदाय-संचालित होगी, जिसमें वित्तीय सहायता के साथ-साथ, स्वयं सहायता समूहों से जुड़े सामुदायिक संसाधन व्यक्ति उनके प्रयासों को समर्थन देने के लिए प्रशिक्षण भी प्रदान करेंगे। उनकी उपज की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए, राज्य में ग्रामीण हाट-बाजारों का और अधिक विकास किया जाएगा।
मोदी ने बताया कि जब उन्हें पहली बार मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना की परिकल्पना से परिचित कराया गया था, तब वे इससे बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार में कम से कम एक महिला लाभार्थी होगी। 10,000 रुपये की शुरुआती वित्तीय सहायता से शुरू होकर, यह योजना उद्यम की सफलता के आधार पर 2 लाख रुपये तक प्रदान कर सकती है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि बिहार की महिलाएं अब किराने का सामान, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, खिलौने और स्टेशनरी बेचने की दुकानें खोल सकती हैं। वे पशुपालन और मुर्गीपालन जैसे पशुधन से संबंधित व्यवसाय भी कर सकती हैं। इन सभी उपक्रमों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि बिहार में पहले से ही स्वयं सहायता समूहों का एक मजबूत नेटवर्क है, जिसमें लगभग 11 लाख समूह सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। इसका मतलब है कि एक सुस्थापित प्रणाली पहले से ही मौजूद है। प्रधानमंत्री ने कहा, “इस महीने की शुरुआत में मुझे जीविका निधि क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी का शुभारंभ करने का अवसर मिला। इस प्रणाली की ताकत अब मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के साथ एकीकृत हो जाएगी, जिससे यह योजना अपनी शुरुआत से ही पूरे बिहार में प्रभावी हो जाएगी।”
सब समय है। कल जयप्रकाश नारायण के अनुयायी उनके देहावसान के बाद लोकनायक के सभी सिद्धांतों और मूल्यों को उनके पार्थिव शरीर के साथ दफनाते बिहार में लूट-खसोट की राजनीति की बुनियाद रखे। प्रदेश का मतदाता, जो चालाक था, गिरगिट के तरह रंग बदलने में माहिर हो गया था, समय के साथ-साथ जेपी के अनुयायियों का पैजामा, पतलून, पकड़कर लटकते गए। कुछ बैतरणी पार किये, कुछ बीच में ही दम तोड़ दिए।
जिस कालखंड में जेपी अंतिम सांस लिए, प्रदेश की आवादी करिब्ब साढ़े पांच करोड़ के आस-पास थी। प्रदेश में शैक्षिक दर करीब 34-36 फीसदी तक आयी थी, जिसमें पुरुषों का शैक्षिक दर तक़रीबन 45 फीसदी आँका गया था और महिलाओं की शैक्षिक दर 22 फीसदी। आज जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के 46 वर्ष बाद प्रदेश में शैक्षिक दर कागज पर भले 74+ फीसदी लिखा हो, पुरुषों (82+%) की तुलना में महिलाएं (66+%) आज भी 20 फीसदी पीछे हैं। और 20 फीसदी अशिक्षित महिला मतदाताओं को को चुनाबी मैदान में ठगना कोई बड़ी बात नहीं है।
चुनाब के 50 दिन पूर्व प्रदेश के 75 लाख महिलाओं (मतदाताओं) के बैंकों में दस-दस हज़ार रुपये का जाना, यानि 7500 करोड़ रूपये का सरकारी कोषागार से निकलना, इसे क्या कहेंगे ? आज दावा किया गया है कि अगली क़िस्त छह माह बाद निर्गत की जाएगी। अब सवाल यह है कि इस छह माहों के बिच ही [प्रदेश में विधानसभा का चुनाव है। इसे चुनाव पूर्व दान भी कहा जा सकता है। क्योंकि अगर आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश के मुख्यमंत्री (जिन्होंने 2015 में सार्वजनिक मंच से भ्रष्टाचार गिनाये थे गोपालगंज से) नीतीश कुमार के माध्यम से शायद चुनावी खेल खेल गए।
अगर चुनाव में भाजपा या जनतादल (यूनाइटेड) को उनकी अपेक्षा के अनुसार मत नहीं मिला, वे सरकार नहीं बना सके, तो क्या गारंटी है कि बिहार के 75 लाख महिलाओं को अगली क़िस्त छह माह बाद मिलेगी अथवा नहीं? शायद नहीं। क्योंकि अगर वर्तमान राजनीतिक पार्टी के नेता सत्ता में नहीं आये तो महिला सशक्तिकरण की बात, महिला को वित्तीय सहायता प्रदान करने की बात, उनके लिए रोजगार की बात, आजीविका की बात फिर आगामी चुनाव में चुनावी मुद्दा बनकर आएगा – हमें तो आपकी मदद करनी चाही, लेकिन आप हमारा मदद नहीं किये।
चलिए आगे बढ़ते हैं। नीतीश कुमार आज जिसके ‘सहारे’ ‘सत्ता’ के सिंहासन पर कब्ज़ा बनाये रखना चाहते हैं, कल जब उनके पीठ से ‘वह हाथ’ हट जायेगा, यानी उनकी सत्ता कमजोर हो जाएगी, जनता दल ‘यूनाइटेड’ को ‘दो-फांक होने में क्षण भी नहीं लगेगा। और शोले फिल्म के तरह ‘आधे लोग जो ‘मंदिर के पुजारी’ है, भारतीय जनता पार्टी की ओर और आधे लोग, जो ‘मंडल के तथाकथित मशीहा’ मानते हैं, राष्ट्रीय जनता दल के रास्ते निकल जायेंगे। आपको सुनकर, पढ़कर अपच हो रहा होगा, लेकिन इस कहानी का कतरन काटकर रख लें। इतना ही नहीं, दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर इस बात पर भी मंत्रणा जारी है कि जनता दल (यूनाइटेड) में तीन युवा नेता ‘फ्रोजेन हॉर्स’ हैं नीतीश कुमार के पार्टी में और नीतीश कुमार को कमजोर होते कब भाजपा का राह पकड़ लेंगे, नीतीश कुमार क्या, बिहार का मतदाता भी सोच भी नहीं सकता। सनद रहे – राजनीति में कुछ भी हो सकता है।
दूसरी ओर, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो ‘साख’ थी, या जिन ‘राजनीतिक कारणों’ से वे नीतीश कुमार के पीठ पर हाथ रखना पड़ा था, तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद न केवल उनकी साख ‘बढ़ी’ है, बल्कि राजनीतिक ‘दावपेंच’, खासकर बिहार में, से वे भली भांति भिज्ञ हो गए हैं। बाहरी मन से भले लोग समझते हों की ‘अबकी बार भी नीतीशे कुमार’, नीतीश कुमार भी समझते हैं कि कल क्या होने वाला है। वैसे भी, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी किसी भी राज्य में ‘सह-पार्टी’ बनकर ‘सत्ता’ में क्यों रहना चाहेगी, एकाधिकार की इच्छा तो होगी है।
चलिए पीछे चलते हैं। वर्ष 1990 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 324 में से 122 सीटें लाकर जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा था । विभिन्न पार्टियों को जोड़कर अक्टूबर 1988 में गठित जनता दल ने वर्ष 1990 के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया और गठबंधन की सरकार बनी। लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने। विधायक दल का नेता कौन होगा, इसको लेकर लालू प्रसाद और पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के बीच कड़ी टक्कर हुई। र्वोंटग के जरिये लालू प्रसाद विधायक दल के नेता चुने गए। इस तरह दोबारा मुख्यमंत्री बनने से राम सुंदर दास चूक गए।
राजनीतिक मानचित्र पर आज भी स्वर्णाक्षरों में उद्धृत है: “उस समय जैसा कि केंद्र में हुआ था, ठीक वैसी ही स्थिति बिहार में दसवें विधानसभा की थी। कांग्रेस पार्टी के 125 सीटों का नुकसान हुआ और पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई। जनता दल को 122 सीटों पर विजय हासिल हुई, बीजेपी को 23 सीटों का फायदा हुआ और अब पार्टी के 39 विधायक थे। और वाम मोर्चा के 42 विधायक चुने गए। तीन-सौ चौबीस सदस्यों वाली विधानसभा में जनता दल के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन था। पर अब सवाल था कि कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री?
रामविलास पासवान के मुख्यमंत्री बनने पर सभी सहमत थे और पासवान का सपना था डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़ा नेता बनने का। बिहार के मुख्यमंत्री का पद उस सपने को पूरा करने के लिए काफी छोटा रंगमंच था, लिहाजा उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने रहने का फैसला किया। बात अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा की भी चली पर विश्वनाथ प्रताप सिंह का सिन्हा के प्रति रुख नकारात्मक रहा। सिंह पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के पक्ष में थे और चंद्रशेखर रघुनाथ झा को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। विवाद पहुंचा उप-प्रधानमंत्री देवीलाल के पास। देवीलाल ने दूसरी बार सांसद बने लालू प्रसाद यादव के नाम का प्रस्ताव रखा। फिर विधायक दल का चुनाव हुआ और लालू प्रसाद यादव जीत कर मुख्यमंत्री बन गए।
1995 का विधानसभा चुनाव के कालखंड में बिहार में ना ही राष्ट्रीय जनता दल थी और ना ही जनता दल(यूनाइटेड) का अस्तित्व था। यह अलग बात है कि इस चुनाव के एक वर्ष पूर्व नीतीश कुमार जॉर्ज फर्नांडिस के सहयोग से 1994 में समता पार्टी बनाकर लालू यादव से अलग हो गए थे। 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 264 सीटों पर बिहार चुनाव लड़ा और वो 167 सीटें जीतने में सफल हुई। भाजपा ने 315 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन सिर्फ़ 41 सीटें ही जीत पाई, जबकि कांग्रेस 320 सीटों पर चुनाव लड़कर 29 सीटें ही जीत पाई। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 63 में से 10 सीटें मिली थी और नीतीश कुमार जके समता पार्टी को 310 में से सात सीटें मिली थी। इस चुनाव के बाद लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। यह सभी जानते हैं।
मार्च 2000 में विधानसभा चुनाव हुए। यह वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था। साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था। तब बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की जरूरत होती थी। इन चुनावों में राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें मिली थी। वहीं, भाजपा को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थी। इसके अलावा समता पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थी। 2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी।
साल 2005 में ऐसा पहली बार हुआ था जब बिहार में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी 2005 में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाई। वहीं, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें मिली। कांग्रेस इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही मिली थी / इन चुनावों में 122 सीटों को स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए।

इस चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई। जनता दल 139 सीटों पर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीती, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिली और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई। यहाँ भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय में राखी कुर्सी पर बैठे।
साल 2010 में 243 सीटों पर हुए इन चुनावों में नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इन चुनावों में एनडीए गठबंधन में जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके सामने राजद और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन था। इन चुनावों में जनता दल यूनाइटेड ने 141 में से 115 सीटें और बीजेपी ने 102 में से 91 सीटें जीती। वहीं, राजद ने 168 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीटें ला पायी। लोजपा 75 सीटों में से तीन सीटें लेकर आई थी। कांग्रेस ने पूरी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे सिर्फ़ चार सीटें ही मिली। इसके बाद से कांग्रेस ने महागठबंधन में ही चुनाव लड़ा। इन चुनाव में बिहार की बड़ी पार्टी माने जाने वाली राजद का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था जो फरवरी 2005 के चुनावों की 75 सीटों के मुक़ाबले सिमटकर 22 सीटों पर आ गई थी। 2010 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।
2015 का चुनाव कुल 243 सीटों पर हुआ था जिसमें जीतने के लिए 122 सीटों की ज़रूरत थी। इन चुनावों में लालू यादव की राजद और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। चुनाव के नतीजे आने पर राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसके बाद जदयू को 71 सीटें और भाजपा को 53 सीटें मिली थी। इन चुनावों में कांग्रेस को 27 सीटें मिली। इन चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, 2017 में जेडीयू महागठबंधन से अलग हो गई और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई।
अब तक नीतीश कुमार भले नवमी बार प्रदेश का मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए हैं, हकीकत यह है कि स्थापना काल से अब तक जनता दल यूनाइटेड अपने बल पर नहीं, अपितु सांठ-गाँठ से ही प्रदेश सरकार बना पाई है। वैसे 2010 के विधानसभा चुनाव परिणाम में भाजपा को 91 स्थान मिले थे, फिर 74 स्थान हैं।
यहाँ हम वायसराय चार्ल्स हार्डिंग की बात इसलिए करना चाहा कि आज बिहार के निर्माण के 113 वर्ष और वायसराय चार्ल्स हार्डिंग की मृत्यु के 81 वर्ष (जन्म: 20 जून, 1858 मृत्यु: 2 अगस्त, 1944) बाद आज भी वायसराय चार्ल्स हार्डिंग जीवित हैं – हार्डिंग रोड और हार्डिंग पार्क के रूप में पटना में। लेकिन प्रथम विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे श्रीकृष्ण सिंह से लेकर वर्तमान में तथाकथित ‘सुशासन कुमार’ के अन्य साथ-साथ लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और जीतन राम मांझी अपने प्रदेश के नागरिकों और मतदाताओं के ह्रदय में कितना स्थान रखते हैं – यह तो वे स्वयं भी जानते हैं और मतदाता तो जानते ही नहीं।
विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के छतरी के नीचे जिन्दावाद-जिन्दावाद के नारे लगाने वाले उनके अनुयायी प्रत्यक्ष रूप से भले इस बात को स्वीकार करें अथवा नहीं, लेकिन अपने हृदय पर हाथ रखकर, अपने-अपने परिवार, बाल-बच्चों के तरफ आँखों को मिलाकर जब सोचेंगे तब शायद इस बात से रूबरू हो जायेंगे कि किसी भी नेताओं ने, आम मतदाताओं के लिए कुछ भी नहीं किया। अलबत्ता, इन विगत वर्षों में सभी नेता अपने-अपने श्री के वजनों के साथ-साथ चल-अचल संपत्तियों को अर्जित कर धन्नासेठ हो गए, लेकिन मतदाता आज भी निराला रूपी भिक्षुक जैसा पेट-पीठ एक किये प्रदेश में राजनीतिक बाजार में खड़ा है।
“1977 चुनाव के बाद बिहार ही नहीं, पूरे देश में राजनीतिक पार्टियों के लोगों का गुटबंदी होने लगा। कांग्रेस के लोगों ने गुटबंदी को और मदद की। परिणाम यह हुआ कि अप्रत्यक्ष रूप से अपने-अपने हिस्से के प्रदेशों में गुटबाजी होने। कई खेमें बने। राज्य बाटने लगे कहाँ की सरकार गिराना हैं, कहाँ की बचानी है परंपरा की शुरुआत हो गयी। यह गुटबंदी तत्कालीन उत्तर प्रदेश की सरकार को, बिहार की सरकार को, हरियाणा की सरकार को गिराया। 1979 आते-आते मोरारजी देसाई की सरकार को केंद्र में भी गिरा दिया।”
कहते हैं समय किसी को नहीं छोड़ा है, लालू यादव भी अछूते नहीं रहे। सन 1997 में चारा घोटाले में फंसने के कारण लालू यादव को बिहार के मुख्यमंत्री के पद से हटना पड़ा। उसी वर्ष उन्होंने जनता दल की आलोचना के मद्दे नजर राष्ट्रीय जनता दाल का गठन किये और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिए। इसके बाद मार्च 2000 में विधानसभा चुनाव हुए. ये वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था।
साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था. तब बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की ज़रूरत होती थी। इन चुनावों में राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें मिली थी। वहीं, भाजपा को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थी। इसके अलावा समता पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थी। 2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी थी।
साल 2005 में ऐसा पहली बार हुआ था जब बिहार में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी 2005 में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाई। वहीं, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें मिली। कांग्रेस इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही मिली थी / इन चुनावों में 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत ना मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए।
इस चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उआई। जनता दल 139 सीटों पर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की। वहीँ, राष्ट्रीय जनता दल ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीती, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिली और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई। यहाँ भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय में राखी कुर्सी पर बैठे।
भगवान राम बारह वर्ष तक अपनी माता की अज्ञान पालन करने के लिए वनवास चले गए ताकि न माँ की और ना ही उनके परिवार की मर्यादा पर कोई आंच आये, तभी पुरषोत्तम कहलाये। लेकिन आज से 12 वर्ष पहले बिहार में एक घटना घटी थी जो गर्भाशय शल्य-चिकित्सा घोटाला के नाम से विख्यात हुआ था। यह घोटाला राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत हुआ था जिसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं व युवतियों का अवैध तरीके से गर्भाशय निकाल कर बीमा की राशि हड़प ली गयी थी। इसमें एक महिला का गर्भाशय निकालने के लिए 30 हजार रुपये बीमा की राशि निर्धारित थी।
केंद्र सरकार ने साल 2011 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू की थी। इसके तहत बीपीएल श्रेणी में आने वाले परिवारों का 30 हजार रुपये तक का इलाज मुफ्त में होना था। इस योजना के क्रियान्वयन के लिए बिहार के 350 अस्पतालों का चयन किया गया था। बिहार 45 अस्पतालों और 13 डॉक्टरों ने मिलकर 46 हजार से अधिक महिला और पुरुषों के गर्भाशय निकाल लिये थे। आरोप था कि सबसे ज्यादा जमुई के 83 पुरुषों के गर्भाशय निकाले गये थे। 703 ऐसी महिलाओं के गर्भाशय निकाल लिये गये थे, जिन्हें सर्जरी की कोई जरूरत नहीं थी। इन सर्जरी के जरिए मोटी राशि का गबन किया गया था।
मानवाधिकार आयोग में साल 2012 में सबसे पहले यह मामला सामने आया था। साल 2017 में पटना हाई कोर्ट में एक लोकहित याचिका दायर की गई। याचिका में कहा गया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का गलत फायदा लेने के लिए बिहार के कई अस्पतालों और डॉक्टरों की ओर से बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय उनकी सहमति के बगैर सर्जरी करके निकाल लिए गए थे। हाई कोर्ट को बताया गया कि हद तो तब हो गई जब बीमा राशि के लिए कथित रूप से दर्जनों पुरुषों के भी गर्भाशय की सर्जरी कर दी गई। आरोप लगे कि इस घोटाले में कथित तौर पर 20-40 साल की गरीब अविवाहित महिलाओं से लेकर 40 साल से अधिक आयु की महिलाओं का गर्भाशय सर्जरी करके निकाला गया। याचिकाकर्ता के वकील दीनू कुमार ने हाई कोर्ट से कहा कि 44619 महिलाओं में 27511 का गर्भाशय उनकी परमिशन के बिना निकाले गए।
आगे पढ़ें * क्या इस चुनाव के बाद जनता दल यूनाइटेड ‘डिवाइडेड’ होने वाला है, नीतीश कुमार को कौन-कौन नेता, सहयोगी लेकर डूबने वाले हैं
















