13 फरवरी: वायसराय लॉर्ड इरविन ‘दिल्ली को राजधानी’ के रूप में और नरेंद्र मोदी ‘सेवा तीर्थ’ को ‘प्रधानमंत्री कार्यालय’ के रूप में उद्घाटन किये

13 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री

विजय चौक (नई दिल्ली) : आज से 115-साल पहले 12 दिसंबर, 1911 को दिल्ली दरबार के दौरान किंग जॉर्ज V ने नई दिल्ली को ब्रिटिश इंडिया की राजधानी घोषित किया था। प्रशासनिक दक्षता को बेहतर बनाने और राजनीतिक माहौल को प्रभावकारी तरीके से प्रबंधन करने के लिए अविभाजित भारत की राजधानी को आधिकारिक रूप से कलकत्ता से दिल्ली बदल दिया था। करीब 20 साल बाद 13 फरवरी, 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन ने नए शहर के रूप में दिल्ली को अविभाजित भारत का राजधानी के रूप में उद्घाटन किया था। इसी दिन, यानी 13 फरवरी को ही, लेकिन साल 1879 में महत्व स्वतंत्रता सेनानी सरोजनी नायडू का जन्म हुआ था। 13 फरवरी, 2011 को यूनेस्को ने अलग-अलग समुदायों के बीच जानकारी पहुँचाने, बोलने की आज़ादी और संवाद की कमी को पूरा करने में रेडियो की भूमिका का जश्न मनाने का ऐलान किया जिसे विश्व रेडियो दिवस के रूप में हम मनाते हैं। 

और 13 फरवरी 2026 को भारत के 15वें प्रधानमंत्री ‘प्रधानमंत्री कार्यालय’ के नाम को ‘निरस्त’ कर रायसीना हिल स्थित साउथ ब्लॉक से नीचे आकर नए ‘सेवा तीर्थ’ में प्रवेश लिए। प्रधानमंत्री का नया कार्यालय को अब ‘सेवातीर्थ’ के नाम से जाना जाएगा। साउथ और नॉर्थ ब्लॉक का निर्माण अंग्रेजों द्वारा भारत को गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रहने के लिए हुआ था। 1947 में भारत को गुलामी से तो मुक्ति मिली लेकिन इन भवनों को तत्कालीन सरकार द्वारा अपने कार्यों के निष्पादन हेतु बनाए रखा गया। स्वतंत्रता के बाद से ही प्रधानमंत्री कार्यालय साउथ ब्लॉक के इस भवन से कार्य करता रहा है। ज्ञातव्य हो कि ‘प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ)’ को असल में 1977 तक प्रधानमंत्री सचिवालय कहा जाता था, जब मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री रहने के दौरान इसका नाम बदल दिया गया। अब यह सेवा तीर्थ के रूप में जाना जायेगा।

13 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री

विगत दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन-1 एवं 2 के उद्घाटन करते कहा कि “आज सभी एक नए इतिहास के निर्माण के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि विक्रम संवत 2082, फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी, 24 माघ, शक संवत 1947, जो वर्तमान कैलेंडर के अनुसार 13 फरवरी 2026 है, यह दिन भारत की विकास यात्रा में एक नई शुरुआत का गवाह बना है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शास्त्रों में विजया एकादशी का अत्यंत महत्व है, क्योंकि इस दिन लिया गया संकल्प सदैव विजय की ओर ले जाता है। मोदी ने कहा कि आज विकसित भारत के संकल्प के साथ, हम सभी सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस लक्ष्य में विजय प्राप्त करने के लिए दैवीय आशीर्वाद हमारे साथ है। प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ और इन नए भवनों के लिए पीएमओ टीम, कैबिनेट सचिवालय और विभिन्न विभागों के कर्मचारियों सहित सभी को बधाई दी। उन्होंने इनके निर्माण से जुड़े सभी इंजीनियरों और श्रमिक साथियों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।

सेवा तीर्थ परिसर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का ही एक हिस्सा है और इसके निर्माण में करीब 1,200 करोड़ रुपए की लागत आई है। इसका निर्माण साल 2019 में शुरू हुआ। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनी संसद की नई इमारत का उद्घाटन साल 2023 में और इसके बाद कॉमन केंद्रीय सचिवालय इमारतों का उद्घाटन 2025 में हुआ। सेवा तीर्थ लाल एवं पीले रंग के मिश्रण से युक्त एक तरह का एग्जीक्यूटिव इंक्लेव है और इसे खुले परिसर में बनाया गया है। इसमें भारतीय सभ्यता एवं आधुनिक डिजाइन दोनों का सम्मिश्रण है। साउथ ब्लाक से वित्त, रक्षा, स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, कॉरपोरेट अफेयर, शिक्षा, संस्कृति, कानून एवं न्याय, सूचना एवं प्रसारण, कृषि, किसान कल्याण, रसायन एवं आदिवासी मंत्रालय कर्तव्य भवन 1 एवं दो में शिफ्ट होंगे। 

आजादी के बाद से प्रधानमंत्री कार्यालय ऐतिहासिक साउथ ब्लॉक से चलता रहा है। अब तक यह देश के बड़े फैसलों का गवाह बना। इस दौर में इसने कई प्रधानमंत्री देखे। देश को दशा और दिशा लेने वाले फैसले यहीं लिए जाते रहे। साउथ ब्लॉक से पीएमओ का शिफ्ट होना उस औपनिवेशक अतीत से दूर जाना है, जिसकी परछाई से आज भी भारतीय शासन व्यवस्था पूरी तरह से मुक्ति नहीं हो पाई है। कहते हैं कि  यह ‘सेवा तीर्थ’ बदले हुए भारत की आकांक्षाओं और सपनों का एक तरह से मूर्त रूप है। 

प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला कि स्वतंत्रता के पश्चात देश के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय और नीतियां साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसे भवनों से बनाई गईं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इन इमारतों का निर्माण ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीकों के रूप में किया गया था, जिसका उद्देश्य भारत को सदियों तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रखना था। उन्होंने कहा कि कोलकाता कभी देश की राजधानी हुआ करता था, लेकिन 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान वह ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों का एक सशक्त केंद्र बन गया था। इसी कारण, 1911 में अंग्रेजों ने राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया।
 
उन्होंने उल्लेख किया कि इसके पश्चात, औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं और मानसिकता को ध्यान में रखते हुए नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक का निर्माण शुरू हुआ। जब रायसीना हिल्स पर इन भवनों का उद्घाटन हुआ था, तब तत्कालीन वायसराय ने कहा था कि ये नई संरचनाएँ ब्रिटिश सम्राट की इच्छाओं के अनुरूप बनाई गई हैं—अर्थात, वे गुलाम भारत की धरती पर ब्रिटेन के राजा की सोच को थोपने का एक माध्यम थीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि रायसीना हिल्स का चयन इसलिए किया गया था ताकि ये इमारतें अन्य सभी से ऊपर रहें और कोई भी इनके बराबर खड़ा न हो सके। 

जबकि, भारत के पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने कहा था कि ‘‘इस पहाड़ी पर प्रासाद दृश्यावली का मुकुट लगती है। मीलों दूर से दिखने वाला यह प्रासाद क्षितिज पर एक ऐसे स्मारक की भांति स्थित है जो बिलकुल अलग प्रतीत होता है। यह इमारतों में एक कंचनजंघा है जिसे दिल्ली की गर्मी की धूल भरी धुंधलाहट तथा इसकी सर्दियों का कोहरा ढक देता है, अनावृत्त कर देता है और पुनः ढक देता है। एक आकर्षक ढांचा जो निकट भी और दूर भी लगता है, यह एकदम नजदीक प्रतीत होता है परंतु आवरण के पीछे छिप जाता है।’’

ज्ञातव्य हो कि 12 दिसंबर को 1911 का दिल्ली दरबार किंग जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। दरबार में सबसे महत्त्वपूर्ण घोषणा जिसे लगभग एक लाख लोगों ने सुना, ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली करना था। कलकत्ता को वाणिज्य केंद्र के रूप में जाना जाता था जबकि दूसरी ओर, दिल्ली शक्ति और शान का प्रतीक थी। घोषणा के पश्चात, शाही आवास की खोज अत्यावश्यक हो गई थी। उत्तर का किंग्जवे कैंप पहली पसंद थी। 

विजय चौक से नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक। तस्वीर: संजय शर्मा

एक ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुट्येन्स को भारत की नई राजधानी की योजना बनाने के लिए चुना गया और वह दिल्ली नगर योजना समिति का भाग थे जिसका कार्य स्थल और उसके नक्शे का निर्माण करना था। सर लुट्येंस और उनके सहयोगी, जो स्वच्छता विशेषज्ञ थे, को उत्तरी क्षेत्र यमुना नदी के समीप होने के कारण बाढ़ के प्रति अधिक संवेदनशील लगा। इस प्रकार, दक्षिणी ओर की रायसीना पहाड़ी, जहां खुलादार और ऊंचा स्थान और बेहतर जल निकासी थी, वायसराय हाऊस के लिए उपयुक्त स्थान प्रतीत हुआ। 
अन्य भवनों के अलावे इस ऐतिहासिक राष्ट्रपति भवन का वास्तुकार सर एडविन लुटियंस थे जो 1912-29 में बनाया गया था। महलनुमा घर में चार पंख और एक केंद्रीय खंड है जो 180 फीट (55 मीटर) ऊंचे तांबे के गुंबद से ढका है। इकतीस चौड़ी सीढ़ियां पोर्टिको और दरबार हॉल के मुख्य प्रवेश द्वार की ओर जाती हैं। हॉल एक गोलाकार संगमरमर का प्रांगण है, जो लगभग 75 फीट (23 मीटर) चौड़ा है। इस भवन में 300 से अधिक कमरे, कार्यालय, रसोई, एक डाकघर और आंगन हैं। घर 600 फीट (183 मीटर) से अधिक लंबा है और 4.5 एकड़ (1.8 हेक्टेयर) क्षेत्र में फैला है। 

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इतिहासकार कहते हैं कि इसके निर्माण के समय चुने गए स्थान की चट्टानी पहाडि़यों को विस्फोट से तोड़ा गया तथा वायसराय के आवास और अन्य कार्यालयी भवनों के निर्माण के लिए भूमि समतल की गई। इस स्थान पर शिलाओं ने मजबूत नींव के रूप में अतिरिक्त फायदा पहुंचाया। निर्माण सामग्री के लाने ले जाने के लिए इमारतों के चारों ओर विशेष तौर पर एक रेलवे लाइन बिछाई गई। चूंकि नगर की योजना नदी से दूर बनाई गई थी और दक्षिण में कोई नदी नहीं बहती थी इसलिए पानी की सभी जरूरतों के लिए जमीन के भीतर से पम्प द्वारा पानी निकाला गया। इस क्षेत्र की अधिकतर भूमि जयपुर के महाराजा की थी। 

सेवाधर्म के स्थानांतरण के बाद विजय चौक । तस्वीर: संजय शर्मा 

राष्ट्रपति भवन के अग्रप्रांगण में खड़ा जयपुर स्तंभ दिल्ली को नई राजधानी बनाने की स्मृति में जयपुर के महाराजा, सवाई माधो सिंह ने उपहार में दिया था। इसके निर्माण में सत्रह वर्ष से अधिक समय लगा। लॉर्ड हॉर्डिंग, तत्कालीन गवर्नर जनरल तथा वायसराय जिनके शासन काल में निर्माण कार्य आरंभ हुआ था, चाहते थे कि इमारत चार वर्ष में पूरी हो जाए। परंतु 1928 के शुरू में भी इमारत को अंतिम रूप देना असंभव था। तब तक प्रमुख बाहरी गुंबद बनना शुरू भी नहीं हुआ था। यह विलंब मुख्य रूप से प्रथम विश्व युद्ध के कारण हुआ था। अंतिम शिलान्यास भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने किया और वह 6 अप्रैल, 1929 को नवनिर्मित वायसराय हाउस के प्रथम आवासी बने। मुख्य भवन का निर्माण हारून-अल-रशीद ने किया जबकि अग्रप्रांगण को सुजान सिंह और उनके पुत्र शोभा सिंह ने बनाया। 

ऐसा अनुमान है कि इस महलनुमा इमारत के निर्माण में सात सौ मिलियन ईंटें और तीन मिलियन क्यूबिक फुट पत्थर लगा और तकरीबन तेईस हजार श्रमिकों ने काम किया। वायसराय हाऊस के निर्माण की अनुमानित लागत 14 मिलियन रुपए आई। आखिरी पत्थर भारत के वाइसराय और गवर्नर-जनरल लॉर्ड इरविन, और 6 अप्रैल, 1 9 2 9 को नवनिर्मित वाइसराय हाउस के पहले अधिवासर द्वारा रखे गए थे। मुख्य भवन हरान-अल-रशीद ने बनाया था, जबकि फोरकोर्ट द्वारा किया गया था सुजन सिंह और उनके पुत्र सोभा सिंह यह अनुमान लगाया गया है कि सात सौ मिलियन ईंट और तीन लाख क्यूबिक फीट पत्थर इस विशाल संरचना के निर्माण के लिए चले गए थे जिसमें करीब 21 हजार मजदूर काम कर रहे थे। वाइसराय हाउस के निर्माण की अनुमानित लागत रू। 14 मिलियन लगा।
 
सर एडविन लुट्येंस का मानना था, ‘‘वास्तुशिल्प अन्य किसी कला से कहीं अधिक प्राधिकारी की बौद्धिक प्रगति को प्रस्तुत करता है।’’ लुट्येंस इस भवन के वास्तुशिल्प और अभिकल्पना के बारे में बहुत संजीदा थे तथा प्राचीन यूरोपीय शैली को पसंद करते थे। एच आकार का भवन एक भव्य शैली में विस्तृत भौगोलिक भिन्नताओं को दर्शाता है। आजादी पूर्व अंग्रेजी शासन के दौरान वायसराय हाउस को ब्रिटिश अधिनायकवाद और सार्वभौमिक सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक के तौर पर बनाया गया था, जिसमें सम्राट के प्रतिनिधि के तौर पर वायसराय का निवास था। इसलिए इसे वायसराय हाउस कहा जाता था। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता हासिल होने के बाद इसे गवर्नमेंट हाउस कहा जाने लगा, जिसमें पहले भारतीय गवर्नर जनरल के तौर पर 21 जून 1948 को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी यानी राजा जी का प्रवेश हुआ। 

रायसीना हिल पर कल के प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर: तस्वीर: संजय शर्मा

भारतीय संविधान के लागू होने के बाद 26 जनवरी 1950 से ये राष्ट्रपति भवन के तौर पर जाना गया, राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति के तौर पर इसमें करीब सवा बारह वर्षों तक रहे। राजेंद्र बाबू के बाद एक के बाद एक तमाम राष्ट्रपतियों का निवास स्थल रहा। राजाजी के समय से ही देश के सर्वोच्च संवैधानिक आसन पर बैठने वाले सभी सोलह लोगों ने वायसराय के इस्तेमाल के लिए बने कमरों का कभी इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उसे गेस्ट हाउस में तब्दील कर अपेक्षाकृत छोटे कमरों में निवास किया। द्रौपदी मुर्मू भी उसी परंपरा का पालन कर रही हैं। वैसे प्रधान मंत्री ने विगत शुक्रवार को कहा भी कि राष्ट्रपति भवन परिसर में अनेकानेक परिवर्तन किए गए हैं। खैर। 

प्रधानमंत्री का कहना है कि साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक का निर्माण औपनिवेशिक मानसिकता को लागू करने के लिए किया गया था, वहीं आज सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन भारत के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यहाँ लिए जाने वाले निर्णय अब किसी सम्राट की सोच को प्रतिबिंबित नहीं करेंगे, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने की नींव बनेंगे। इसी भावना के साथ, प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन को भारत की जनता को समर्पित किया। 

13 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री

ज्ञातव्य हो कि देश की आधुनिक राजधानी नई दिल्ली के बीचो-बीच बना भव्य रायसीना हिल्स भारत की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाली राजधानी के इस हिस्से से कई इतिहास जड़े हुए हैं। रायसीना हिल्स परिसर में इमारतों को बनाने के लिए रायसीना गांव के 300 परिवारों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया था और करीब 4000 एकड़ जमीन पर इमारतें बनाई गईं। इमारतों को बनाने के लिए 4 साल का समय निर्धारित किया गया था। लेकिन विश्‍वयुद्ध के चलते इसे बनाने में लगभग 20 साल लग गए। भारत की राजधानी कलकत्‍ता (अब कोलकाता) से दिल्‍ली स्‍थानांतरित करने के लिए रायसीना हिल्‍स के बाकी के इलाके का अधिग्रहण किया गया और नए प्रशासनिक भवन बनाए गए, जिनमें नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक भी शामिल है।

नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक की इमारतें दिल्ली के इतिहास का अहम हिस्सा हैं। नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की सचिवालय भवन  गुलाबी और हल्के पीले सैंडस्टोन से बनी हैं। यह स्ट्रक्चर उत्तर और दक्षिण दोनों तरफ से सिमेट्रिकल है, जो राजपथ के साथ बना है। इसे राष्ट्रपति भवन जैसे ही मटीरियल से बनाया गया है, राजस्थान से मंगाए गए लाल और क्रीम धौलपुर सैंडस्टोन से। हर ब्लॉक में चार मंज़िलें हैं और अंदर के आंगन के चारों ओर लगभग 1000 कमरे बने हैं। दोनों ब्लॉक में चौड़े हॉलवे और पैसेज भी हैं, जो उनके फॉर्म से वेंटिलेशन को बढ़ावा देते हैं, और ऊपर गुंबदों से ढके हुए हैं।

बिल्डिंग की बनावट मुगल और राजपूताना स्टाइल की झलक देती है। दोनों इमारतें पत्थर की स्क्रीन से अलंकृत हैं जिन्हें ‘जाली’ के रूप में जाना जाता है। इमारतों को छत के साथ तिरछा प्रदान किया गया है जो इमारत की कलाकृति को गर्मी और मानसून की बौछारों से आश्रय देता है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका की सरकारों ने चार डोमिनियन स्तंभ दान किए जो ग्रेट कोर्ट के भीतर खड़े हैं। कोर्ट के केंद्र को लाल बलुआ पत्थर के जयपुर स्तंभ से सुशोभित किया गया है, जिसमें सफेद अंडे, कांस्य कमल और भारत के छह-नुकीले कांच के सितारे की संरचनाएं हैं।

रायसीना हिल और वहां निर्माणाधीन भवन। तस्वीर : राष्ट्रपति भवन पुरालेख से

अगस्त 1947 में जब आज़ादी पास आ रही थी, तो हर्बर्ट बेकर के डिज़ाइन किए हुए साउथ और नॉर्थ ब्लॉक की लाइटें देर रात तक जलती रहती थीं। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी और बंटवारे की प्रक्रिया को आखिरी रूप देने के लिए अपने साउथ ब्लॉक ऑफिस में अपने स्टाफ के साथ चौबीसों घंटे काम किया, जबकि गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने नॉर्थ ब्लॉक में 562 से ज़्यादा रियासतों को भारतीय संघ में आसानी से मिलाने के लिए मेहनत की। अपनी मशहूर किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में, लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपिएरे ने दो सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग के अंदर उन दिनों की इंटेंसिटी को दिखाया है।

बहरहाल, विगत शुक्रवार को मोदी ने उल्लेख किया कि साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक में जगह की कमी और सीमित सुविधाएं थीं साथ ही, लगभग सौ साल पुराने होने के कारण वे भीतर से जर्जर हो रहे थे और कई अन्य चुनौतियों का सामना कर रहे थे। राष्ट्र को इन चुनौतियों के बारे में निरंतर अवगत कराना महत्वपूर्ण है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी, भारत सरकार के कई मंत्रालय दिल्ली में 50 से अधिक अलग-अलग स्थानों से कार्य कर रहे थे। उन्होंने रेखांकित किया कि हर साल इन मंत्रालयों के भवनों के किराए पर ₹1,500 करोड़ खर्च किए जा रहे थे, जबकि कार्यालयों के बीच आवाजाही करने वाले 8,000 से 10,000 कर्मचारियों के लिए दैनिक लॉजिस्टिक लागत भी वहन करनी पड़ती थी। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के निर्माण से इन खर्चों में कमी आएगी और कर्मचारियों के समय की बचत होगी।

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प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि इस परिवर्तन के बीच, पुराने भवनों में बिताए गए वर्षों की स्मृतियाँ सदैव शेष रहेंगी, क्योंकि वहीं से देश को नई दिशा देने वाले और सुधारों की शुरुआत करने वाले कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि वे परिसर भारत के इतिहास का एक अमर हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि “इसी भाव के साथ साउथ ब्लॉक के उ‌द्घाटन के करीब 95 वर्षों के बाद, आज 13 फरवरी 2026 को भारत सरकार इन भवनों को खाली कर रही है और ‘सेवातीर्थ’ तथा ‘कर्तव्य भवनों’ में स्थानांतरित हो रही है। यह प्रतीकात्मक रूप से गुलामी के अतीत से ‘विकसित भारत’ के भविष्य की ओर बढ़ने की ओर देश का एक और कदम है। बीते वर्षों में देश में ‘सत्ता भाव’ के बजाय ‘सेवा भाव’ की संस्कृति सशक्त हुई है। आज का ये स्थानांतरण, इन संस्कारों को और मजबूती देगा। साथ ही, आज कैबिनेट यह संकल्प भी लेती है कि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को ‘युगे युगीन भारत राष्ट्रीय संग्रहालय’ का हिस्सा बनाया जाए, जो हमारी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता से पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। ये संग्रहालय, हमारी कालातीत और शाश्वत सांस्कृतिक विरासत का उत्सव मनाएगा और हमारे गौरवशाली अतीत को समृद्ध भविष्य से जोड़ेगा।

आज हमें हर्ष है कि साउथ ब्लॉक के इस कक्ष में अंतिम बार केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हो रही है। ये केवल स्थान परिवर्तन का क्षण नहीं है, यह इतिहास और भविष्य के संगम के भी पल हैं। इस परिसर ने गुलामी से आज़ादी और फिर स्वतंत्र भारत की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को देखा है, गढ़ा है। इस परिसर ने देश के 16 प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व में बनी कैबिनेट के महत्वपूर्ण फैसले होते देखे हैं। इसकी सीढ़ियों पर नेहरू जी से लेकर प्रधानमंत्री श्नरेंद्र मोदी जी तक के पदचिन्ह हैं। इस भवन की सीढ़ियों पर चढ़ते कदमों ने देश को नई ऊंचाई पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है।

बहरहाल, साउथ ब्लॉक के इन कमरों ने विभाजन की विभीषिका भी देखी, युद्ध और आपातकाल की चुनौतियों को भी देखा और शांतिकाल की नीतियों पर भी चिंतन और मनन किया। इन्होंने टाइपराइटर से लेकर डिजिटल गवर्नेंस तक, तकनीक की लंबी छलांग को महसूस किया है। यहाँ बैठकर अधिकारियों की कई पीढ़ियों ने ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने भारत को आज़ादी के तुरंत बाद की अनिश्चितता से निकालकर स्थिरता की राह पर आगे बढ़ाया। सबके प्रयासों का परिणाम है कि आर्थिक चुनौतियों और संकटों से निकलकर, आज भारत एक आत्मविश्वासी राष्ट्र बनकर खड़ा हुआ है। आज का भारत दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत आज एक सुरक्षित और सक्षम राष्ट्र के रूप में उभरकर सामने आया है और वैश्विक मंचों पर अपनी स्पष्ट और प्रभावशाली आवाज़ रख रहा है।

ज्ञातव्य हो कि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शनिवार को यहां पत्रकारों के समक्ष पारित प्रस्ताव को पढ़ा जिसके मुताबिक यह कदम ‘महज स्थान परिवर्तन का क्षण नहीं है, बल्कि अतीत और भविष्य का संगम है।’ उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक का निर्माण किया था, लेकिन आजादी के बाद भी लगातार सरकारों ने इन इमारतों का इस्तेमाल कार्यालय के तौर पर किया। मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय सचिवालय के नए भवन ’विकसित भारत’ की दिशा में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर हैं और ये नागरिक-केंद्रित शासन और राष्ट्रीय प्रगति के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

रायसीना हिल और वहां निर्माणाधीन भवन। तस्वीर : राष्ट्रपति भवन पुरालेख से

रायसीना हिल के दो ब्लॉक – नॉर्थ और साउथ ब्लॉक, जिन्हें राज के दौरान सेक्रेटेरिएट के नाम से जाना जाता था – एक नई ज़िंदगी की तैयारी कर रहे हैं। इन शानदार इमारतों को युगे युगीन भारत म्यूज़ियम में बदल दिया जाएगा, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा म्यूज़ियम माना जा रहा है, जो 155,000 स्क्वायर मीटर में फैला है। यह म्यूज़ियम देश के इतिहास को दिखाएगा, जिसका ये इमारतें लंबे समय से हिस्सा रही हैं। 

1910 के दशक में, जब दिल्ली को ब्रिटिश इंडियन एम्पायर की राजधानी घोषित किया गया, तो एडवर्ड लुटियंस को वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) के साथ पूरे शहर की प्लानिंग करने के लिए अपॉइंट किया गया था। हर्बर्ट बेकर उनकी टीम का हिस्सा थे, और उन्होंने सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग का डिज़ाइन तैयार किया था। अपनी-अपनी बिल्डिंग्स के कंस्ट्रक्शन के दौरान लुटियंस और बेकर के बीच अच्छे रिश्ते नहीं थे। लुटियंस चाहते थे कि सेक्रेटेरिएट की ऊंचाई वायसराय हाउस से कम हो, क्योंकि सेक्रेटेरिएट के सामने की पहाड़ी से पूरा व्यू ब्लॉक हो जाता था, लेकिन बेकर चाहते थे कि वे एक ही लेवल पर हों, और आखिरकार उन्होंने अपनी बात पर अड़े रहे।

हर्बर्ट बेकर एक ब्रिटिश आर्किटेक्ट थे जिन्होंने नई दिल्ली में सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग का डिज़ाइन तैयार किया था। वे दिल्ली शहर के आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस के अंडर सेकंड इन कमांड थे। हर्बर्ट बेकर एक ऐसे आर्किटेक्ट थे जिनका काम साउथ अफ्रीका में उनकी बिल्डिंग्स के ज़रिए सामने आया, जहाँ उन्होंने लगभग दो दशकों तक काम किया। भारत में, सेक्रेटेरिएट के अलावा, उन्होंने पार्लियामेंट मेंबर्स के बंगले और पार्लियामेंट हाउस का भी डिज़ाइन तैयार किया। अफ्रीका में हर्बर्ट बेकर की पिछली बिल्डिंग्स का असर सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग में दिखता है। साउथ अफ्रीका के प्रिटोरिया में यूनियन बिल्डिंग और सेक्रेटेरिएट में काफी समानताएं हैं। एक जैसे टावर वाले एक जैसे सिमेट्रिक ब्लॉक और कोलोनेड बालकनी की वजह से, ये बिल्डिंग एक-दूसरे की कॉपी लगती हैं। दोनों बिल्डिंग में सबसे बड़ा अंतर यह है कि सेक्रेटेरिएट में, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक अलग-अलग हैं और एक-दूसरे के आमने-सामने हैं, जबकि यूनियन बिल्डिंग में, दोनों ब्लॉक एक सेमी-सर्कुलर ब्रिज से जुड़े हुए हैं।

रायसीना हिल और वहां निर्माणाधीन भवन। तस्वीर : राष्ट्रपति भवन पुरालेख से

बिल्डिंग को इंडो-सरसेनिक रिवाइवल आर्किटेक्चरल स्टाइल में डिज़ाइन किया गया है। यह स्टाइल उन आर्किटेक्चरल फीचर्स और एलिमेंट्स को बताता है जिनका इस्तेमाल ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स ने भारतीय पब्लिक और सरकारी बिल्डिंग्स में खास तौर पर किया था। यह स्टाइल मुगल आर्किटेक्चर के साथ-साथ हिंदू मंदिर आर्किटेक्चर से भी इंस्पिरेशन लेता है और इसे गोथिक और नियो-क्लासिकल जैसे दूसरे रिवाइवल आर्किटेक्चरल स्टाइल के साथ मिलाता है। बिल्डिंग के मोटिफ्स और मीनारों में मुगल और राजस्थानी फीचर्स भी शामिल हैं। राजस्थानी किलों से इंस्पायर्ड जालियां (छेद वाली खिड़कियां) और झरोखे (डेकोरेटिव खिड़कियां) का इस्तेमाल किया गया है। ये जालियां शहर में लगातार पड़ने वाली धूप में दिलचस्प पैटर्न बनाती हैं और गर्मी और बारिश से भी कुछ राहत देती हैं। छतरियों (छातों) का भी इस्तेमाल किया गया था, जिनका इस्तेमाल पारंपरिक भारतीय गुंबदों में थके हुए यात्रियों को राहत देने के लिए ऐतिहासिक रूप से किया जाता था।

स्ट्रक्चर की दीवारें ज़्यादातर खाली हैं, और ज़्यादातर डेकोरेशन छत पर है। हर बिल्डिंग के बीच में गुंबद हैं और मेन दरवाज़े कनाडा, साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के डोमिनियन कॉलम में बने हैं। इन कॉलम को हर ब्रिटिश कॉलोनी ने डोमिनियन के बीच दोस्ती और एकता की निशानी के तौर पर पेश किया था। कोलकाता के बाद सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी दूसरी सबसे बड़ी सेंट्रल गवर्नमेंट लाइब्रेरी है। इसमें 8.5 लाख से ज़्यादा किताबें और जर्नल हैं। लाइब्रेरी के रिसोर्स में आज़ादी से पहले की कई लाइब्रेरी और दूसरे पुराने इंस्टीट्यूशन, जैसे इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी का कलेक्शन है। बिल्डिंग से होकर एक रास्ता भी जाता है, जो ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी तक जाता है, जिसमें देश की सबसे पुरानी गैलरी में से एक है, जिसमें जाने-माने कलाकारों की कला और मूर्तियां हैं। बिल्डिंग मेट्रो स्टेशन से भी जुड़ी हुई है, जिसकी शहर के अलग-अलग हिस्सों में जाने के लिए कई लाइनें हैं। इस तरह, यह पक्का होता है कि शहर सरकारी बिल्डिंग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

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हिंदुस्तान टाइम्स के एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के पूर्व कमिश्नर (प्लानिंग) ए.के. जैन, जिन्होंने नई दिल्ली के बनने पर कई किताबें लिखी हैं, कहते हैं, “ब्रिटिश एक शानदार कैपिटल बनाना चाहते थे जो ब्रिटिश एम्पायर का शोपीस बने। बेकर, जिन्होंने सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग डिज़ाइन की थी, उन्हें इंडियन आर्किटेक्चर बहुत पसंद था और उन्होंने इसे इंडो-सरसेनिक रिवाइवल स्टाइल में डिज़ाइन किया, जिसमें क्लासिकल यूरोपियन शान को इंडियन मोटिफ्स जैसे लाल और क्रीम रंग के धौलपुर सैंडस्टोन, बड़े डोम, कॉलोनेड वाली बालकनी, प्रोजेक्टिंग छज्जे, बारीक जालियां और झरोखे के साथ मिलाया गया।” इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने अपनी किताब ‘कॉनॉट प्लेस एंड द मेकिंग ऑफ़ न्यू डेल्ही’ में लिखा है, “सेक्रेटेरिएट की इमारतें गवर्नमेंट हाउस जितनी ही शानदार थीं। वे ग्रेट प्लेस से शान से ऊपर उठी हुई थीं, जिससे बेकर का बनाया ‘शानदार प्लेटफॉर्म’ बन गया था। यह असर पूरी तरह से हुआ, क्योंकि भारतीयों ने जल्द ही सेक्रेटेरिएट को ‘रायसीना का किला’ या ‘रायसीना का किला’ कहना शुरू कर दिया। यहाँ, भारतीय चीज़ें ज़्यादा साफ़ थीं और लुटियंस के आर्किटेक्चर की तुलना में क्लासिकल वेस्टर्न चीज़ों के साथ कम आसानी से मिली हुई थीं।”

रायसीना हिल और वहां निर्माणाधीन भवन। तस्वीर : राष्ट्रपति भवन पुरालेख से

कंस्ट्रक्शन में टकराव भी हुआ। लुटियंस और बेकर के बीच वायसराय हाउस, जो अब राष्ट्रपति भवन है, के मुकाबले सेक्रेटेरिएट को ऊँचा करने को लेकर मशहूर टकराव हुआ था। जबकि लुटियंस सेक्रेटेरिएट को नीचे चाहते थे, उन्हें डर था कि इससे वायसराय के घर का नज़ारा नहीं दिखेगा। लेकिन, बेकर ने बराबर अहमियत पर ज़ोर दिया – और आखिर में उनकी जीत हुई, जैन ने कहा। बेकर ने साउथ अफ्रीका में अपने पहले के काम से बहुत प्रेरणा ली। प्रिटोरिया में यूनियन बिल्डिंग – जो साउथ अफ़्रीकी सरकार की सीट है – दिल्ली सेक्रेटेरिएट से काफ़ी मिलती-जुलती है, जिसमें एक जैसे टावर वाले एक जैसे सिमेट्रिक ब्लॉक से लेकर इसकी बड़ी खंभों वाली बालकनी तक शामिल हैं। अपनी शान के बावजूद, 10 फरवरी, 1931 को नई दिल्ली के उद्घाटन को कई लोगों ने एक शाही थोपना माना, जैसा कि उस समय के कई अख़बारों की रिपोर्ट में बताया गया था, जिसमें हिसंदुस्तान टाइम्स भी शामिल है।

लिडल अपनी किताब में द टाइम्स, लंदन की एक रिपोर्ट का ज़िक्र करती हैं, “यह दिखावा करना बेकार होगा कि समारोह को कोई पॉपुलर सपोर्ट मिला था। इसमें सिर्फ़ वही लोग शामिल हुए जिन्हें ऑफ़िशियल इनविटेशन पर आने दिया गया था। नई दिल्ली के सभी रास्तों पर हथियारबंद पुलिस तैनात थी, और जो कोई भी दोस्ताना या किसी और तरह से प्रदर्शन करना चाहता था, उसे बहुत कम बढ़ावा दिया गया।” उनकी किताब में 13 फरवरी के हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटोरियल का भी ज़िक्र है: “कार्यवाही का पूरा माहौल शाही था और ऐसा लगता था कि इसे गोरे आदमी का दबदबा दिखाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।”

रायसीना हिल पड़ाव, राष्ट्रपति भवन । तस्वीर : संजय शर्मा

लेकिन, आज़ादी के बाद, ये गलियारे एक नए देश की नींव बन गए। भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू, साउथ ब्लॉक से काम करते थे, जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल नॉर्थ ब्लॉक से काम करते थे, और 562 रियासतों के एकीकरण की देखरेख करते थे। इन दीवारों के अंदर पंचवर्षीय योजनाओं, युद्ध और शांति के फैसलों और आर्थिक सुधारों की दिशा तय होती थी। “नेहरू के समय में, जिसे PM सेक्रेटेरिएट के नाम से जाना जाता था, उसमें लगभग आठ लोग थे; लाल बहादुर शास्त्री के समय में PMO को संस्थागत बनाया गया और यह एक सलाहकार संस्था बन गई, और इंदिरा गांधी के समय में इसे ताकत का माहौल मिला। आज़ादी के बाद से शायद ही कोई बदलाव हुआ था, लेकिन राजीव गांधी के समय में, इसे कंप्यूटराइज़ किया गया, बेसमेंट को अपग्रेड किया गया, और नई कुर्सियाँ लगाई गईं,” हिमांशु रॉय, JNU के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ (CPS) के चेयरपर्सन और PMO: प्राइम मिनिस्टर्स ऑफिस थ्रू द इयर्स के लेखक ने कहा। “इमारत की शान ने इसमें ताकत का माहौल जोड़ा।”

इससे पहले, प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि इन निर्णयों के पीछे एक गहरा भाव और स्पष्ट दृष्टिकोण है, जो भारत के वर्तमान, अतीत और भविष्य को राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ता है। उन्होंने समझाया कि जिस स्थान को कभी राजपथ के रूप में जाना जाता था, वहाँ आम नागरिकों के लिए पर्याप्त सुविधाओं और व्यवस्थाओं का अभाव था। आज उसे कर्तव्य पथ के रूप में पुनर्विकसित किया गया है, जो परिवारों, बच्चों और नागरिकों के लिए एक जीवंत सार्वजनिक स्थल बन चुका है। उन्होंने रेखांकित किया कि इसी परिसर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जो यह सुनिश्चित करती है कि देश की राजधानी अब अपने महान नायकों का सम्मान करती है और नई पीढ़ी को प्रेरित करती है। 

रायसीना हिल । तस्वीर : संजय शर्मा

मोदी ने आगे कहा कि राष्ट्रपति भवन परिसर में भी परिवर्तन किए गए हैं, जहाँ मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान किया गया। उन्होंने उल्लेख किया कि जब नए संसद भवन का निर्माण हुआ, तो पुराने भवन को भुलाया नहीं गया, बल्कि उसे ‘संविधान सदन’ के रूप में एक नई पहचान दी गई। उन्होंने कहा कि जब मंत्रालयों को एक ही परिसर में साथ लाया गया, तो उन भवनों का नाम ‘कर्तव्य भवन’ रखा गया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि नाम बदलने की ये पहलें केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं हैं, बल्कि ये एक निरंतर वैचारिक सोच को प्रतिबिंबित करती हैं—एक ऐसा स्वतंत्र भारत जिसकी अपनी पहचान हो और जो औपनिवेशिक स्मृतियों के प्रभाव से मुक्त हो।

प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि पिछले ग्यारह वर्षों में गवर्नेंस का एक नया मॉडल उभर कर सामने आया है, जहाँ निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में नागरिक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि “नागरिक देवो भवः” केवल एक वाक्यांश नहीं है, बल्कि यह हमारी कार्य-संस्कृति है, जिसे इन नए भवनों में प्रवेश करते समय सभी अधिकारियों को आत्मसात करना चाहिए। श्री मोदी ने घोषणा की कि सेवा तीर्थ में लिया जाने वाला हर निर्णय, आगे बढ़ने वाली हर फाइल और यहाँ बिताया गया हर पल 140 करोड़ नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए समर्पित होना चाहिए। उन्होंने प्रत्येक अधिकारी, कर्मचारी और कर्मयोगी से आग्रह किया कि जब भी वे इस भवन में कदम रखें, तो एक पल के लिए रुकें और स्वयं से पूछें—क्या आज का उनका कार्य करोड़ों नागरिकों के जीवन को आसान बनाएगा। 

उन्होंने जोर देकर कहा कि यही आत्म-चिंतन इस स्थान की सबसे बड़ी शक्ति बनेगा। प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि विकसित भारत 2047 केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि विश्व के समक्ष भारत का एक अटूट संकल्प है। इसलिए, यहाँ बनने वाली हर नीति और लिया जाने वाला हर निर्णय निरंतर सेवा भाव से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक दिन, जब अधिकारी सेवानिवृत्त होंगे या इस भवन से विदा लेंगे, तो वे अपने यहाँ बिताए दिनों को याद करेंगे और इस संतोष के साथ सुकून पाएंगे कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में उनका हर पल नागरिकों की सेवा के लिए समर्पित था और हर निर्णय राष्ट्रहित में लिया गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि और व्यक्तिगत पूँजी होगी, जो उनके जीवन को गौरव से भर देगी।

2 COMMENTS

  1. Poora padhne par Bahut sunder jankari mila Sir. Apke aise aise lekh agar aajkal ke uva padhe to asha hi nahin purna viaswash hai ki unko harek Exam men ye apke dwara likha gaya kahani se labh milega. Apko bahut bahut dhanyabad aur aabhav Aadarniye Sir.
    उन्होंने कहा कि एक दिन, जब अधिकारी सेवानिवृत्त होंगे या इस भवन से विदा लेंगे, तो वे अपने यहाँ बिताए दिनों को याद करेंगे और इस संतोष के साथ सुकून पाएंगे कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में उनका हर पल नागरिकों की सेवा के लिए समर्पित था और हर निर्णय राष्ट्रहित में लिया गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि और व्यक्तिगत पूँजी होगी, जो उनके जीवन को गौरव से भर देगी।

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