बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): ‘अन्वेषण और उत्खनन’ के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें ‘निदेशक’ की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर ‘कोषागार’ पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा

बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों हों, ठेकेदारों हों, धनाढ़्य हों, दरिद्र हों, नेता हों, मंत्री हों । यह दो तस्वीरें प्रदेश के नेताओं और अधिकारियों की, खासकर जो सत्ता के गलियारे में स्वयं को शक्तिहीन होने से अनवरत बचाने का प्रयास करते हैं, का जीता-जागता दृष्टान्त है, आप मानें या नहीं मानें आपकी मर्जी। 

इन दो तस्वीरों में एक तस्वीर 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेजों की गोलियों से मृत्यु को प्राप्त किये क्रांतिकारी राम गोविन्द सिंह के पैतृक घर का दीवार है। राम गोविन्द सिंह दशरथ्था (पटना जिला) गांव के रहने वाले थे और पुनपुन हाई स्कूल के नौवीं कक्षा के छात्र थे। पटना सचिवालय के सामने स्थित सात-मूर्ति में एक राम गोविन्द सिंह भी हैं। पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू जी आर्चर ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने  आदेश दिया था।मुझे उम्मीद है बिहार के 90 से अधिक फीसदी लोग, युवापीढ़ी, इस नाम से परिचित नहीं होंगे। दीवारों की दशा की बात छोड़िये। दूसरी तस्वीर झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र के बलिराजगढ़ ब्लॉक में स्थित मिथिला ही नहीं, बिहार ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र की संस्कृति से जुड़े और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन बलिराजगढ़ किले का दीवार है। दोनों बिहार में ही है और दोनों दीवारों पर गोबर पाथने की परंपरा कल भी था, आज भी है और कल भी जारी रहेगा। 

हो भी कैसे ? आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण भले बिहार में शैक्षिक दर 74+ फीसदी पर हस्ताक्षर करे, प्रदेश के शिक्षा विभाग के अधिकारी, मंत्री राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर बिहार से प्रवासित और पलायित लोगों की उपलब्धियों पर अपना ठप्पा और मुहर लगाकर, बिहारी है-बिहारी है, कहकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को लुभाकर राशियों का आवंटन कराने में सफल हो जाए;  हकीकत में बिहार का शैक्षिक दर क्या है? महिला और पुरुषों के शैक्षिक दर के बीच कितने का फासला है? उनकी सोच के बीच कितना बड़ा खाई है? प्रदेश के इतिहास और ऐतिहासिक स्थलों का महत्व उनकी नज़रों में, चाहे नेता हों, अभिनेता हों, अधिकारी हो, पदाधिकारी हों, मतदाता हों, कितना है – इस बात का साक्षात् दृष्टान्त यह दो तस्वीरें हैं। आप मानें या नहीं। 

बलिराजगढ़ का प्रवेश द्वार और कुत्ता -तस्वीर: श्री राज झा

श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़ दीजिये, सन 1961 से 2026 तक, विगत 65 वर्षों में बिहार का मुख्यमंत्री कार्यालय और कक्ष में 21 व्यक्तियों – बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान  शास्त्री,हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडे, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा ‘आज़ाद’, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार – को कक्ष में आते, मंत्रिमंडल बनाते, फिर जाते देखा है। अपवाद को छोड़कर, किसी का भी, चाहे मुख्यमंत्री हों या मंत्रिमंडल के लोग, प्रदेश की ऐतिहासिक गरिमा को बचाने, सुरक्षित और संरक्षित रखने में ‘निजी अभिरुचि’ नहीं दिखा। 

‘आधिकारिक अभिरुचि’ के अनेकानेक कारण हो सकते हैं। प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में अपने-अपने वजूद को कायम रखने के लिए तमाम लोगों ने, कुछ मंच से, तो कुछ नेपथ्य से, वे सभी कार्य किये जिसकी जरुरत नहीं थी, जहाँ तक प्रदेश के विकास का, वजूद का सवाल था, और आज भी है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज बाबूबरही विधानसभा क्षेत्र और झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाला बलिराजगढ़ भी नालंदा, राजगीर, पावापुरी, बोधगया, विक्रमशिला जैसे स्थानों की सूची में दर्ज होता। 

बाबूबरही विधान सभा क्षेत्र से 1977 से 2024 तक नौ विधायक चुनकर प्रदेश के विधानसभा की कुर्सी पर बैठे। उसी तरह झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र से 1971 से 2024 तक नौ सांसद चुनकर गए। यह क्षेत्र मिथिला का क्षेत्र हैं जहाँ आज़ादी के बाद अभी तक शैक्षिक-दर मगध और भोजपुर क्षेत्र के शैक्षिक दरों से न्यूनतम नौ फीसदी कम है। मिथिला में जहाँ सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 55.18 फीसदी शैक्षिक दर है, वहीँ भोजपुर में 66.19 फीसदी और मगध में 64.92 फीसदी है। 

बिहार के 38 जिलों से प्रदेश के विधानसभा में बैठने वाले कुल 243 विधायकों में 130-135 सम्मानित विधायकगण गंगा के उस पार, यानी मिथिला क्षेत्र से आते हैं; जबकि देश के संसद में बिहार से आने वाले 40 सांसदों में 24-25 सांसद मिथिला क्षेत्र से ही हैं। अब सवाल यह है कि जब ये सम्मानित विधायक और सम्मानित सांसदगण ‘जनहित’ से अधिक ‘स्वहित’ में विश्वास रखते हों, फिर बाबूबरही ब्लॉक स्थित बलिराजगढ़ ऐतिहासिक स्थल का यह हश्र होना, लाजिमी है। 

ये भी पढ़े   साख़ और सट्टा : गंगा किनारे की एक कहानी जिसने बिहार के पत्रकारों को दो फांक में बाँट दिया, पटना से दिल्ली तक हिला दिया

विगत दिनों भारत के विज्ञापन-जगत के हस्ताक्षर और मधुबनी के विख्यात पत्रकार राज झा, जो बलिराजगढ़ का भ्रमण किये थे, उनके यह शब्द सम्पूर्ण गाथा का निचोड़ है। उन्होंने कहा: अभी वहां कुछ भी नहीं है। धूल उड़ रही है। चारो तरफ मिट्टी का पहाड़ है। बीच-बीच में खोदा हुआ है। कुछ दिखता नहीं है। थोड़ा बहुत ईंट पत्थर दीखता हैं। लोग क्रिकेट खेलने, गाय भैंस चराने, गाय-बैल-भैंस को नहलाने, गाडी धोने के लिए तालाब का इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि बॉउण्टरी वाल है, लेकिन कई जगह से टूटी हुयी है। एक गेट है उसमें ताला लगा है और बंद है, जहाँ पुरातत्व का साइन बोर्ड लगा हुआ है। बाकी जगह से भी प्रवेश है। मंन्दिर के पास से आप प्रवेश कर सकते हैं। अंदर गए थे। उबड़ खाबड़ है। लोगों का कहना है कि खुदाई को रातो रात बंद कर दिया गया था। उसमें क्या मिला था, या नहीं मिला था लोगों को नहीं मालूम। मिटटी उबड़ खाबड़ है, समतल से बंद नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी नहीं है इसके बारे में।” खैर। 

बलिराजगढ़ परिसर में दशकों पहले हुए उत्खनन से बने तालाब, तालाब में जमा पानी और पानी में नाहते भैंस। इससे बेहतर स्थिति नहीं हैं बिहार में ऐतिहासिक पुरातत्वों की। दुःखद। तस्वीर: श्री राज झा

पिछले दिनों जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार के अन्वेषण और उत्खनन विभाग, धरोहर भवन, नई दिल्ली के  पत्रांक F.No. T-17033/9/2020-EE (13926)/26 फरवरी, 2026  में बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने मंज़ूरी दी, साथ ही यह भी कहा कि यह मंज़ूरी इस पत्र के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैद्य है, मन में सैकड़ों सवालों का उठना स्वाभाविक सा लगा। सबसे पहले यह लगा कि “कहीं यह आदेश सांकेतिक और राजनीतिक लाभ के लिए तो नहीं है ?” शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि डॉ. हरिओम शरण जो अभी सुपरिन्टेन्डेन्ट आर्कियोलॉजिस्ट हैं, निदेशक की कुर्सी पर नजर लगाए हैं। लोगों का यह भी कहना है कि शायद बलिराजगढ़ के अवशेषों की खुदाई उनके प्रोफ़ाइल में एक ईंट का कार्य करेगा। 

पत्र में लिखा गया: “आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 के तहत, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक की मंज़ूरी दी जाती है। यह मंजूरी बिहार के मधुबनी ज़िले के बलिराजगढ़ में राजा बलि का गढ़ नाम से मशहूर पुराने किले के अवशेषों पर खुदाई करने के लिए है। खुदाई की जाने वाली जगह को साथ में दिए गए साइट प्लान पर लाल रंग से मार्क किया गया है।

यह खुदाई डॉ. हरिओम शरण, सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना सर्कल के डायरेक्शन में की जाएगी। आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 से 12.15 के अनुसार, जहाँ भी ज़रूरत हो, खर्च की मंज़ूरी ली जा सकती है। खुदाई के दौरान मिली पुरानी चीज़ों की पूरी लिस्ट इस ऑफिस को दी जानी चाहिए। ऑफिसर को इस बारे में समय-समय पर जारी नियमों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। खुदाई के नतीजों की एक डिटेल्ड रिपोर्ट फील्डवर्क पूरा होने के तीन महीने के अंदर डायरेक्टर जनरल को जमा करनी होगी। खुदाई का काम कब शुरू किया जाए और कब बंद किया जाए, इसकी जानकारी इस ऑफिस को दी जा सकती है। यह मंज़ूरी इस लेटर के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैलिड है।” 

आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करेंगे जिस आनन्-फानन में, बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना पर अध्ययन किये अन्वेषण और उत्खनन विभाग द्वारा यह पत्र निर्गत किया गया, ‘राजनीति से प्रेरित’ है। यह आदेश किसी ‘अदृश्य इरादे’ से भी निर्गत किया गया हो, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अधिकारीगण सिर्फ ‘ऊपर के आदेश’ को मानते हैं और ऊपर का आदेश कहाँ से आता है, कब आता है – यह सभी जानते हैं। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय में ‘अपवाद को  छोड़कर’, शायद ही कोई अधिकारी हैं जो वास्तविक रूप से इन अन्वेषण और उत्खनन में विश्वास रहते हैं। सभी (अपवाद छोड़कर) की निगाहें ‘निदेशक’ बनने अथवा अवकाश प्राप्ति से पूर्व सुरक्षित और सुसज्जित पदों पर आसीन होने का स्वप्न होता है। अब सवाल यह है कि अगर उत्खनन का आदेश बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये ही जारी किया गया है तो यकीन मानिये, यह राजनीति ही है मिथिला की भूमि के साथ। क्योंकि मिथिला क्षेत्र से राजनीतिक गलियारे में धोती सिटने वाले या फिर रंग-बिरंगे पाग पहनने वाले मिथिला की संस्कृति और गरिमा को बचाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को तैयार करने के लिए करते हैं। 

ये भी पढ़े   बिहार का सत्यानाश(9)😢 बेतिया में मोहनदास 'महात्मा गांधी' बने 🙏 बेतिया में शिक्षा पदाधिकारी 'भ्रष्ट' मिले 😢 और पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शहादत दिवस पर ताली ठोकने लगे 😢
बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर – राज झा

इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि इस मद में कई सौ करोड़ राशि सरकारी खजाने से निकल जाय और बलिराजगढ़ में अब तक हुए चार खुदाइयों जैसा ही पाँचवाँ भी हो, और फिर मिट्टी से ढंक दिया जाय। विश्वास नहीं हो तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों से पूछकर देखिये, मांगकर देखिये की पिछले एक-डेढ़ दशक में बिहार में सम्पन उत्खनन और एंटिक्विटी की उपलब्धिता से सम्बंधित कार्यों का प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ है या नहीं? उत्तर ना ही मिलेगा। यकीन नहीं होता तो देश में 2022-2023/2023-2024/2024-2025 में सरकारी खजाने से केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल के संरक्षण और रखरखाव (अन्वेषण और उत्खनन नहीं) पर कितना आवंटन हुआ और क्या खर्च हुआ। 

विगत दिनों (12 फरवरी, 2026) केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यसभा में लिखित उत्तर बताया कि देश भर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन 3686 केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इनके संरक्षण एवं रखरखाव की नियमित प्रक्रिया है जो राष्ट्रीय संरक्षण नीति के अनुसार स्मारक/स्थलों की आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार की जाती है। पिछले तीन वर्षों के दौरान इन स्मारक/स्थलों के लिए 2022-23 में 392.71 करोड़ का आवंटन (खर्च: 391.93 करोड़),  2023-24 में 443.53 का आवंटन (खर्च:  443.53 अरोड रूपए)  और 2024-25 में 313.43 करोड़ रुपये का आवंटन (खर्च: 313.04 करोड़ रूपये) हुआ। खैर। 

वैसे, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का इतिहास भारत के पुराने अतीत को बचाने की कहानी है, जो इसके औपचारिक रूप से बनने से बहुत पहले 1784 शुरू हुई थी। भारत के इतिहास को सही तरीके से पढ़ने की दिशा में पहला कदम सर विलियम जोन्स ने 1784 में उठाया था। उन्होंने कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। इस ग्रुप ने संस्कृत और फ़ारसी में पुराने ग्रंथों की पढ़ाई को बढ़ावा दिया। 1837 में एक बड़ी कामयाबी मिली जब जेम्स प्रिंसेप ने पुरानी ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक समझ लिया। इससे चट्टानों और खंभों पर लिखे पुराने लेखों को पढ़ना मुमकिन हो गया। सं 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना स्थापना हुई। 

बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर – राज झा

यह कहा जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की औपचारिक स्थापना एक आदमी की पूरी कोशिशों का नतीजा थी। इसे अलेक्जेंडर कनिंघम ने शुरू किया था। वह एक ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर थे जिन्हें आर्कियोलॉजी में बहुत दिलचस्पी थी। कनिंघम कई सालों से ज़रूरी बौद्ध जगहों का सर्वे कर रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि इस काम की देखरेख के लिए एक परमानेंट सरकारी संस्था की ज़रूरत है। वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर-जनरल बने।

वित्त की कमी की वजह से 1865 और 1871 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कुछ समय के लिए बंद हो गया था। लेकिन, भारत के वायसराय लॉर्ड लॉरेंस ने 1871 में सर्वे को फिर से शुरू किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को बनाने में अहम भूमिका के लिए अलेक्जेंडर कनिंघम को अक्सर ‘इंडियन आर्कियोलॉजी का पिता’ कहा जाता है। 1902 के सदी की शुरुआत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नई अहमियत और ताकत मिली। 1902 में, लॉर्ड कर्जन ने डायरेक्टर-जनरल का पद फिर से बहाल किया, जो पुराने स्मारकों को बचाने में पक्का यकीन रखते थे। सर जॉन मार्शल को 1902 में डायरेक्टर-जनरल बनाया गया। उन्होंने खुदाई और बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली टेक्निक को मॉडर्न बनाया। मार्शल के समय की सबसे बड़ी कामयाबी 1921 और 1922 के बीच हड़प्पा और मोहनजो-दारो जैसी सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों की खोज थी। इस खोज ने भारत के पुराने इतिहास की समझ को पूरी तरह से बदल दिया। बाद में, 1940 के दशक में, मॉर्टिमर व्हीलर ने भारत में आर्कियोलॉजी के लिए और ज्यादा साइंटिफिक तरीके शुरू किए।

आज़ादी के बाद, सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को एक सही कानूनी ढांचा दिया। 1958 में, प्राचीन स्मारक और आर्कियोलॉजिकल साइट और अवशेष एक्ट (AMASR एक्ट) पास हुआ। इस एक्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को पूरे देश में सांस्कृतिक विरासत वाली जगहों को आधिकारिक तौर पर बचाने और सुरक्षित रखने की ताकत दी। आज, ASI संस्कृति मंत्रालय के तहत अपना काम जारी रखे हुए है, और UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स समेत हज़ारों जगहों को मैनेज कर रहा है।

ये भी पढ़े   #भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (17) ✍️ दिल्ली के 12-जनपथ में नामोनिशान मिट गया राम विलास पासवान का 😪

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब देश का प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 12 जुलाई 2018 को नई दिल्ली के तिलक मार्ग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नए मुख्यालय – धरोहर भवन का उद्घाटन किया। उन्होने कहा भी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पिछले लगभग 150 सालों में बहुत बड़ा काम किया है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने इतिहास और समृद्ध पुरातत्व विरासत पर गर्व करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने कस्बों, शहरों और इलाकों के स्थानीय इतिहास और पुरातत्व के बारे में जानने में आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय पुरातत्व के पाठ स्कूल के सिलेबस का हिस्सा बन सकते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत में आर्कियोलॉजी के लिए सबसे बड़ा संगठन है। यह देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की देखरेख करती है। यह देश भर में 3,600 से ज़्यादा स्मारकों और ऐतिहासिक जगहों की देखभाल करता है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। 

बलिराजगढ़ : तस्वीर – राज झा

वापस फिर बलिराजगढ़ चलते हैं। कोई 61 वर्ष पहले रघुबीर सिंह के नेतृत्व में सर्वे के मिड-ईस्टर्न सर्कल ने एस. मुखेरी की मदद से दरभंगा से 80 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बलिराजगढ़ में छोटे पैमाने पर खुदाई की। चार कटिंग की गईं, दो-दो डिफेंस-वॉल के आर-पार और दो-दो हैबिटेशन-एरिया में। इलाके में वॉटर-टेबल ज़्यादा होने की वजह से, कुदरती मिट्टी तक नहीं पहुँचा जा सका। फिर भी, खुदाई से किले की बनावट की डिटेल्स पर रोशनी पड़ी। डिफेंस-वॉल (प्लस X A) में मिट्टी-ईंटों का कोर था जिसके ऊपर ईंटों का कवर था, बाहरी कवर अंदर वाले कवर से चार गुना चौड़ा था। दीवार टूटी-फूटी थी और नीचे 5.18m और ऊपर 3-65m चौड़ी थी। मरम्मत समेत कंस्ट्रक्शन के तीन फेज़ पहचाने गए। सबसे शुरुआती फेज़ में मिट्टी की ईंटों का कोर (pl. XB) था, जिस पर पक्की ईंटों की दीवारें थीं, जिसके बाहरी हिस्से की चौड़ाई मिट्टी के प्लेटफॉर्म से लगभग तीन गुना थी, जिसमें मिट्टी के टुकड़े मिले हुए थे, जो किले के अंदरूनी हिस्से के सामने बने थे। भारी बाढ़ के कारण मज़बूती की ज़रूरत पड़ी, जैसा कि गाद के जमाव से पता चलता है। बचाव से पहले के जमाव से, उत्तरी काले पॉलिश किए हुए बर्तनों के टुकड़े मिले थे। 

ऐसा लगता है कि किलेबंदी दूसरी सदी B.C. में कहीं बनाई गई थी और पाल काल तक इस्तेमाल में रही; जुड़े हुए लेवल से मिली दूसरी चीज़ों में मोती, सिक्के, शुंग टेराकोटा पट्टिकाएँ (pl. XI), हड्डी की चीज़ें वगैरह शामिल थीं; इसके अलावा, साइट के अलग-अलग हिस्सों में BRG-2 से BRG-4 लेबल वाली तीन और कटिंग भी की गईं। इनमें से BRG-2 एक डंप पाया गया और उसमें कोई कब्ज़ा जमा नहीं था, लेकिन इस इलाके से सुंदर टेराकोटा पट्टिकाएँ मिलीं। BRG-3 में एक मंदिर के अवशेष मिले और BRG-4, जो दक्षिणी सुरक्षा पर था, ने BRG-1 जैसी ही जानकारी दी। बेड-रॉक; पीली मिट्टी, कंकड़-पत्थर के साथ मिली हुई; बोल्डर-जमाव; और लाल मिट्टी। उन्हें नदी के तल से शुरुआती पाषाण युग के कुछ औज़ार मिले, साथ ही पीली मिट्टी और ऊपर पड़े पत्थरों के अलग-अलग हिस्सों से भी। इसके अलावा, भीम-का-बांध और रेहाना जैसे आस-पास के इलाकों से भी मध्य और बाद के पाषाण युग के औज़ार इकट्ठा किए गए। इसके अलावा, रिंग या हैमर-स्टोन के दो टुकड़े और एक छोटे साइज़ का पॉलिश किया हुआ सेल्ट भी मिला। यह बात 61 साल पहले की है। 

बहरहाल, तिलक मार्ग के नुक्क्ड़ पर स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कार्यालय में बिहार के नेताओं को लेकर, जो इस प्रकरण के साथ राजनीतिक लाभ उठा रहे हैं, पर चर्चाएं आम हो रही हैं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मिथिला के एक सांसद को तो यह भी मालूम नहीं था कि बलिराजगढ़ मिथिला में कहाँ है ? वे किसी भी विषय को लिखकर मांगते हैं और मंच पर उसे पढ़कर वाह-वाही लूटने में, ताली बजबाने में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर ‘कपड़े पर बिना किसी सिकुड़न के’ फोटो खिंचवाने पर कोई कसर नहीं छोड़ते। लोगों का तो यह भी कहना है कि संस्कृति मंत्रालय, बिहार के उच्च नेताओं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों के बीच एक बड़ा खेल चल रहा है। बलिराजगढ़ उत्खनन इ नाम पर प्रचुर मात्रा में पैसा तो खर्च किया जायेगा (कागज पर) और अंततः इसका भी वही हश्र होगा जो पिछले चार उत्खनन में हुआ है।” ……..

आगे जारी भाग-2

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here