बिहार विधानसभा चुनाव : 35-वर्ष पहले जब आनंद मोहन ‘मेरा गाँव मेरा देश’ सिनेमा का कॉपी-पेस्ट किये थे, आज महिला पत्रकार कर रहीं हैं

डाक बंगला चौराहा (पटना) : बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है। आगामी 6 और 11 नवम्बर को चुनाव होना है। विगत दिनों सोशल मिडिया के प्लेटफॉर्म पर एक महिला टीवी संवाददाता को विधानसभा के सामने घोड़ा पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा। शायद पहली घटना होगी। मोहतरमा को देखकर सन 1971 में अख्तर रोमानी लिखित, राज खोसला द्वारा निर्देशित, लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध और धर्मेंद्र – विनोद खन्ना द्वारा अभिनीत फिल्म “मेरा गाँव मेरा देश” के साथ-साथ बाहुबली से राजनेता बने ‘आनंद मोहन’ एक साथ याद आ गया । घटना आज से 35-वर्ष पूर्व की है। 

शायद आज के पत्रकारों को मालूम नहीं होगा कि ‘मेरा गाँव मेरा देश’ ‘अपराधी से राजनेता बने’ उन दिनों के उभरते आनंद मोहन को बहुत अच्छा लगता था। आनंद मोहन उस सिनेमा में अभिनेताओं के साज-सज्जा को देखकर बहुत प्रभावित थे। जिसका प्रभाव आज तक जारी है। वे बॉलीवुड के कलाकार ‘जितेंद्र के सफ़ेद वस्त्र’ से भी बहुत प्रभावित थे। 

बिहार के लोग जो आज न्यूनतम 35 वर्ष के भी होंगे, उनके जन्म से पहले की यह तस्वीर है आनंद मोहन का। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर खुलेआम कहते थे कि धनबाद का कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह और कोसी क्षेत्र का आनंद मोहन उनके ‘मित्रवत’ हैं और वे ‘मित्रता का सम्मान’ करते हैं। सूर्यदेव सिंह का कोयला माफिया होना, उनकी पेशा है कोयला के क्षेत्र में, हीरा ढूंढने के लिए अगर वे कुछ भी करते हैं तो यह उनका व्यावसायिक क्रियाकलाप है । 

उसी तरह कोशी के आनंद मोहन प्रदेश की राजनीति में ही नहीं, दिल्ली के राजपथ पर भी अपना अधिपत्य ज़माने की कोशिश कर रहे हैं, यह उनकी चाहत है, होनी भी चाहिए क्योंकि राजनीति में बहुत पापड़ बेलना होता है, और वे बेलन की लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई माप रहे हैं, मापना भी चाहिए। चंद्रशेखर हमेशा चाहते थे कि आनंद मोहन “मजबूत” बने।  समाज में हरेक बड़े-बुजुर्ग युवकों को उनकी योग्यता के अनुसार “मजबूत” बनने की सलाह देते थे।

इसलिए जिस क्षेत्र में “तेज और तर्रार” है, उसी में आगे बढ़े, आषीश देते हैं। फिर क्या था, आनंद मोहन “बाहुबली” बन गए। दोनों को चंद्रशेखर बहुत ही सम्मान करते थे। इधर सूर्यदेव सिंह और आनंद मोहन भी उनका उतना ही सम्मान करते थे। आज की नेताओं जैसा नहीं की जैसे ही अपना स्वार्थ सिद्ध हुआ, सामने वालों को पहचानने से भी मुकर जाते हैं। खैर।

यह उन दिनों की बात है जब चंद्रशेखर अपने राजनीतिक जीवन के उत्कर्ष पर थे और बिहार के लालू प्रसाद यादव चंद्रशेखर से आनंद मोहन के लिए ‘शिकायत’ किये थे। यह अलग बात थी कि उसी काल में पूर्णिया के पप्पू यादव भी कनक को बन्दुक की नोक पर रखे थे, अधिकारियों को पैर के नीचे रखते थे; लेकिन लालू प्रसाद के लिए पपू यादव का वह क्रिया-कलाप बचपना था, क्योंकि वे लालू के अपने थे। लालू प्रसाद अपने गुरुदेव चंद्रशेखर से यह भी निवेदन किये कि आनंद मोहन को रोकिये। क्योंकि आनंद मोहन को रोकने का कार्य उन दिनों भारत की चौहद्दी में सिर्फ और सिर्फ चंद्रशेखर ही कर सकते थे। लेकिन चंद्रशेखर लालू प्रसाद को खुश नहीं किये और कहे: “उसे रोको नहीं …छोड़ दो उसे। समय आने पर वह खुद समर्पित कर देगा।”

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उस ज़माने में आनंद मोहन और पप्पू यादव में आज़ादी की दूसरी लड़ाई जैसी ताकत की आजमाइश हो रही थी। नित्य खेत-खलिहान, गली-कूची, सड़क, कारखाने में, या यूँ कहें कि उत्तर बिहार में सहरसा-मधेपुरा-सुपौल-पूर्णिया-कटिहार आदि क्षेत्रों में शायद ही कोई इलाका बचा होगा जहाँ खून की होली नहीं खेली गयी थी। चतुर्दिक दोनों गुटों के लोगों का जीता-जागता शरीर “पार्थिव” हो रहा था। सम्पूर्ण क्षेत्र में ख़ौफ़ का माहौल था। 

उन्ही दिनों पटना के बी एन कालेज का एक बंगाली छात्र, जो स्वयं को फोटोग्राफी की दुनिया में सुपुर्द कर देना चाहता था, हाथ में एक छोटा सा मैनुअल निकोन कैमरा लेकर अपनी किस्मत को आजमाने  पटना की सड़कों पर उतरा था। खाकी रंग का वाटर-प्रूफ कैमरा बैग अपने दाहिने कंधे पर लटकाकर एक स्ट्रिंगर के रूप में फोटो खींचना प्रारम्भ किया था अपनी रोजी-रोटी के लिए। इसी बीच, लालू-चद्रशेखर संवाद स्थानीय अख़बारों में प्रकाशित होती है। आनंद मोहन और पप्पू यादव को तत्कालीन स्थानीय अख़बारों में जगह तो मिलता था, लेकिन घटना के कई दिनों बाद। 

उस ज़माने में संचार के ऐसे कोई साधन नहीं थे जो क्षण-क्षण की सूचना को इस पार से उस पार कर दे। स्थानीय पत्रकार हाथ से लिखते थे, या फिर टाइप करते थे कहानियों को फिर डाक से भजते थे। टेलीप्रिंटर का जमाना था, लेकिन ‘समाचारों के लिए’, बड़ी-बड़ी कहानियां डाक से ही प्रेषित की जाती थी। अगर उन कहानियों के साथ कुछ तस्वीर मिली तो वाह-वाह , नहीं मिली तो भी वाह-वाह। समाचार जब तक प्रकाशित होता था तब तक दूसरी घटना हो जाती थी। टेलीप्रिंटर तो था, लेकिन  जिला संवाददाताओं के पास नहीं होता था। खैर। 

उस ज़माने में इलाहाबाद से एक हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन होता था। नाम “माया” था। “माया” के तत्कालीन बिहार के संवाददाता विकास कुमार झा आनंद मोहन पर एक कहानी करना चाहते थे। शायद विकास कुमार झा ‘पहला और अंतिम पत्रकार’ हैं जो अपना पूरा नाम लिखते थे। आज तो ‘कुमार’ शब्द में भी ‘छटनी’ हो गया है और अधिकांश लोग कुमार को ‘के’ में बदल दिए हैं। विकास कुमार झा का जन्म 1961 में बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में बतौर पत्रकार जीवन प्रारम्भ किये थे। आनंद मोहन-पप्पू यादव पर कहानी के लिए  जरुरत थी तस्वीरों की, क्योंकि तस्वीरों के बिना कहानी विधवा जैसी होती है । 

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यहीं उस बंगाली छायाकार की किस्मत आनंद मोहन के साथ जुड़ गयी। एक तस्वीर, एक ओर जहाँ आनंद मोहन को बिहार में ही नहीं, सम्पूर्ण देश में, विदेशों में बाहुबली बना दिया, नाम-शोहरत को दिल्ली के क़ुतुब मीनार पर चढ़ा दिया, उस छायाकार की भी उस ऐतिहासिक तस्वीर के लिए चर्चाएं होने लगी। उन दिनों उस तस्वीर को प्राप्त करने के लिए पटना के उस ज़माने के छायाकारों ने न जाने कितने लोभ-प्रलोभ दिए, लेकिन बंगाली छायाकार हिला नहीं। नाम संजीव बनर्जी है।  

पटना ही नहीं बिहार के पत्रकार अथवा छायाकार आज शायद नहीं जानते होंगे की आनंद मोहन की उस  ऐतिहासिक तस्वीर का “फ्रेम” बनाने के लिए उन दिनों संजीव बनर्जी और सुनील झा किन-किन परिस्थितियों से गुजरे थे, आज के छायाकार कल्पना नहीं कर सकते हैं। संजीव बनर्जी और सुनील झा दोनों बस से पटना से सहरसा के लिए निकले। दोनों आनंद मोहन के एक हितैषी थे और कांग्रेस के नेता थे सुधीर मिश्रा जी से पहले संपर्क स्थापित कर लिए थे। 

सहरसा पहुँचने पर वे दोनों रात में वहीं रुके। मिश्रा जी के सहयोग से आनंद मोहन बाबा-आदम का एक पुराना, खटारा एम्बेसडर कार दोनों को लाने के लिए भेजे थे। सहरसा से दोनों आनंद मोहन के गांव पंचगछिया के लिए निकले। रात्रि विश्राम पंचगछिया में था। अगली सुबह दोनों एक गंतब्य स्थान के लिए उसी गाडी से निकले। साथ में आनंद मोहन के भी “आदमी” थे। कुछ  दूर निकलने के बाद संजीब बनर्जी और सुनील झा दोनों की आखों पर कपड़ा बाँध दिया गया ताकि रास्ते का अंदाजा नहीं मिल सके। सुधीर मिश्रा जी का ससुराल नेपाल की तराई में था, जहाँ आनंद मोहन अड्डा जमाये हुए थे। 

जिस स्थान पर आनंद मोहन अपना ठिकाना बनाये थे वहां पहुँचने पर ही आँखों से पट्टी हटाया गया। उद्देश्य तस्वीर तरोताजा तस्वीर खिंचा था जिससे विकास कुमार झा कहानी लिखें और तस्वीरों के साथ कहानी का प्रकाशन हो। दोनों पत्रकारों को आवभगत करने में आनंद मोहन और उनके लोग कोई कसार नहीं छोड़े थे, लेकिन दोनों पत्रकारों का रक्तचाप संतुलन से बहुत अधिक था। इस बात की कल्पना आज विधानसभा के सामने घोड़े पर बैठकर टीवी के लिए एंकरिंग करने वाली पत्रकार महोदय नहीं समझेंगी। 

दर्जनों राइफल, दो नाली बन्दुक, पिस्टल और अन्य अस्त्र-शस्त्र के साथ सैकड़ों तस्वीरें क्लिक-क्लिक हुए। तभी आनंद मोहन को मेरा गाँव मेरा देश का विनोद खन्ना और धर्मेंद्र याद आ गए। वस्त्र बदला गया। सफ़ेद घोड़ा लाया गया। घोड़ा को साफ़-सुथरा किया गया। गद्दी लगाया गया। आंनद मोहन उस घोड़े पर विराजमान हुए। आनद मोहन बाएं हाथ से विनोद खन्ना जैसा घोड़ा का लगाम पकडे थे और दाहिने हाथ में पिस्तौल लिए दर्जनों फोटो क्लिक क्लिक हुआ । 

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अब बात आयी एक ऐसी तस्वीर जो पत्रिका का कवर हो। बस क्या था सफ़ेद फुलपैंट, कमीज में तनिक तिरछा होकर बैठे।  पिस्तौल का नोक आसमान की ओर किये। आजु-बाजू आनंद मोहन के हितैषीगण, अंगरक्षक सभी बन्दुक, राइफल लेकर खड़े हो गए –  क्लिक-क्लिक हुआ। उस ज़माने में रंगीन तस्वीर बहुत कम खींची जाती थी।  रंगीन फोटो वाले निगेटिव को “टी पी” कहते थे। डिजिटल कैमरा भी नहीं था। अगर किन्ही के पास होता भी था तो वे समाज से अलग संभ्रांत छायाकार होते थे। अब इस बनर्जी के पास तो फिल्म खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे तो अधिक क्लिक-क्लिक भी नहीं कर सकता था। 

कहते हैं “जान बचे तो लाख उपाय”, दोनों हनुमान चालीसा पढ़ते पुनःमुसको भवः हुए – उसी तरह, आखों पर पट्टी बाँध दिया गया। वापसी में पहुंचे मधेरपुरा के जिलाधिकारी के पास। उस ज़माने में जयन्तो दासगुप्ता माडपुरा के जिलाधिकारी थे जो लालू के “खास” थे। मधेपुरा उन दिनों आनंद मोहन – पप्पू यादव का कुरुक्षेत्र था। दोनों में से कोई भी हथियार रखना नहीं कहते थे। खैर जयन्तो दासगुप्ता भी कदम कुआं पटना के थे।  उनके दादाजी थे प्रमाथो दासगुप्ता, जहाँ संजीव बनर्जी बचपन में खेलने-कूदने जाया करते थे।  बस क्या था – दो बंगाली इकठ्ठा हुए, बचपन की बातें दुहराई गयी और आनंद मोहन-पप्पू यादव कुरुक्षेत्र का विस्तार से विन्यास हुआ। सुनील झा सभी बातें अपनी डायरी पर लिख रहे थे। 

पटना आते ही, संजीव हम लोगों के ज़माने के माणिकदा @ सत्यजीत मुखर्जी के स्टूडियो “फोटो-मेकर” पहुंचे। निगेटिव साफ़-सुथरा हुआ, तस्वीर निकली और फिर ‘माया’ के दफ्तर में हाजिर हुए झाजी और बनर्जी। विकास कुमार झा कहानी लिख रहे थे। तस्वीर देखने के बाद विकास कुमार झा ने संजीव को तत्काल इलाहाबाद रावण किये तस्वीरों के साथ। इधर पटना में जब छायाकारों को मालूम हुआ की संजीब बनर्जी तस्वीर बनाकर लाये हैं, सभी “मुझे दो-मुझे दो” करने लगे। जब संजीब इलाहाबाद पहुंचे तब ‘माया’ पत्रिका में एक ‘लेखक-ब्रह्मास्त्र’ हुआ करते थे बाबूलाल शर्मा जी। बबूलाल जी तस्वीर देखे। विकास झा की कहानी को पढ़े और जो कहानी बनी वह ऐतिहासिक थी – ये है बिहार (माया, अंक 31 दिसंबर, 1991) 

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