
मोकामा / पटना / नई दिल्ली: बिहार के लिए यह भी एक दुर्भाग्य है कि प्रदेश में जनता के द्वारा दो तरह की सरकार चुनी जाती है। एक का चयन भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा प्रत्यक्ष मतदान के आधार पर होता है, जबकि दूसरे अपने-अपने संसदीय अथवा विधानसभा क्षेत्रों में उनके ही मतदाता उन्हें ‘स्वयंभू सरकार’ बना देते हैं। इस अलंकरण में स्थानीय लोगों की भूमिका के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। प्रदेश की राजधानी, राज्यपाल के निवास, मुख्यमंत्री कार्यालय, पुलिस मुख्यालय से कुछ ही दूर पर मोकामा टाल क्षेत्र में समानांतर सरकार की उपस्थिति प्रदेश सरकार की कमजोरी का जीवंत दृष्टान्त है। कहते भी हैं अगर सरकारी ‘लॉ’ की पकड़ ‘लेस’ नहीं होता तो प्रदेश में ‘लवलेसनेस’ भी नहीं होता।
प्रदेश के बुजुर्गों का कहना है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र और लालू प्रसाद यादव के रास्ते वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक, सबों ने अपनी-अपनी कुर्सियां बचाने, सुरक्षित रखने और उन कुर्सियों पर जीवन पर्यन्त विराजमान रहने के लिए प्रदेश में अपराधियों का एक खास वर्ग तैयार किया, इस्तेमाल किया। अंततः वे अपराधी अपनी शारीरिक, आर्थिक, मानसिक दवंगता के कारण अपराध जगत के साथ-साथ राजनीतिक गलियारे में भी अपने-अपने हिस्से का स्थान सुरक्षित करता गया। आखिर सत्ता किसे पसंद नहीं है।
बिहार के लोग जानते भी होंगे। कई वर्ष पहले जब 1984-बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी जब एएसपी थे, अन्वेषण के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार किये थे, जिसका प्रकाशन पटना से प्रकाशित जनशक्ति अख़बार में हुआ था। रिपोर्ट में यह कहा गया था कि मोकामा टाल क्षेत्र के एक अपराधी अपनी शक्ति प्रदर्शन में गंगा के किनारे अपने दुश्मनों को शरीर के नीचले हिस्से से काटना प्रारम्भ करते हैं और कटे अंग को गंगा को सपर्पित करते जाते हैं। इसके अलावे मोकामा टाल क्षेत्र के अन्य अपराधियों के क्रियाकलापों को बहुत विस्तार के साथ अपने रिपोर्ट में जिक्र किये थे।
कालांतर जब वे अधिकारी प्रदेश के पुलिस महकमे में सबसे श्रेष्ठ अधिकारी बने और मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे राजनेता के करीबी माने जाने लगे, तब प्रदेश के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने उस रिपोर्ट को विस्तार से प्रकाशित करने पर बल दिया। लेकिन तब तक प्रदेश की राजनीतिक स्थिति बदल गई थी और वे अधिकारी भी राजनीतिक पार्टी के चादर तले आने के कारण हंसकर बात टाल दिए। आखिर राजनीतिक संरक्षण का भूखा-प्यासा कौन नहीं होता ?
राजनीति में कौन किसका हुआ है? बिहार की राजनीति में बाहुबलियों ने अपना-अपना आधिपत्य नब्बे के दशक और पहले से जमाना शुरू किया। कई बाहुबलियों ने अपना चोला बदलकर कर राजनीति में प्रवेश करना चाहा, जिसमें कुछ सफल हुए और कुछ असफल भी। आनंद मोहन, पप्पू यादव, छोटन शुक्ला, रामू ठाकुर, मो. शहाबुद्दीन, काली पांडेय, दिलीप सिंह को कौन नहीं जानता। ये सभी राजनीति का अपराधीकरण और अपराधी का राजनीतिकरण के ही उपज हैं। प्रदेश की मिट्टी कई बाहुबलियों को अपने में मिलते भी देखी है खून से लथपथ शरीर के साथ।
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि ‘1998 में बिहार के तीन सीटिंग विधायकों की हत्या हुई थी। देवेंद्र नाथ दुबे, बृज बिहारी प्रसाद और अजीत सरकार। बृज बिहारी प्रसाद और अजीत सरकार की हत्या तो 24 घंटे के अंदर ही कर दी गई थी। भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या अन्य कारणों से 2011 में हुई थी। इन चारों की हत्या सदन के सदस्य रहते हुई थी।”
शर्मा कहते हैं कि ‘वीर बहादुर सिंह बक्सर जिले के बगेन गांव के बड़े जोतदार थे। नक्सलियों ने उनके पिता की हत्या कर दी थी। आरोप था कि वे 50 से अधिक नक्सलियों की हत्या में शामिल थे। 1977 का विधानसभा चुनाव में जगदीशपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में वे चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। 1980 में निर्दलीय अभ्यर्थी होकर भी चुनाव जीत गये। 1985 में जब वे चुनाव हार गये तो कुछ उनके स्वजातीय लोगों ने इसे अपने लिए मौका मान लिया। मई 1987 में उनकी ही जाति के गुप्तेश्वर सिंह ने एक पंचायती के सिलसिले में वीर बहादुर सिंह को अपने गांव करथ (भोजपुर) बुलाया। गुप्तेश्वर सिंह भी विधायक बनना चाहते थे। करथ गांव में अचानक वीर बहादुर सिंह का गुप्तेश्वर सिंह से किसी बात पर विवाद हो गया। जिसकी नतीजा ये हुआ कि वीर बहादुर सिंह को गोलियों से भून दिया गया।’
इसी तरह, देवेन्द्र नाथ दुबे पश्चिम चम्पारण के टिकुलिया गांव के रहने वाले थे। यह कहा जाता है कि कालेज के दिनों में जब कुछ लड़कों ने लड़कियों से बदसलूकी की, विवाद बढ़ा। जिन लड़कों ने छेड़खानी की थी उनकी हत्या कर दी गई। हत्या का आरोप देवेन्द्र दुबे पर लगा और वे 1991 में गिरफ्तार हुए। जिन तीन लोगों की हत्या हुई थी उनमें से एक का भाई विनोद सिंह तब तक मोतिहारी का दबंग बन चुका था।
देवेन्द्र नाथ दुबे जेल से ही अपने गिरोह का संचालन करने लगे। उनका संपर्क उत्तर प्रदेश के अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल से हुआ। 1994 में देवेंद्र दुबे जेल से कोर्ट में पेशी के लिए आये थे। तभी विरोधी गैंग के शूटर ने उन पर गोलीबारी कर दी। दुबे बुरी तरह जख्मी हुए। उन्हें विशेष इलाज के लिए पटना भेज दिया गया। 1995 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार जिताऊ उम्मीदवारों की खोज में थे। इसी खोज में देवेन्द्र दुबे की भी किस्मत चमक गयी। गोविंदगंज से उन्हें समता पार्टी के टिकट पर (लाख विरोध के बावजूद) जनता दल के सीटिंग विधायक को करीब 14 हजार वोटों से हरा दिया। समता पार्टी ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। इसकी वजह से उन्हें सदन में निर्दलीय विधायक के रूप में मान्यता मिली।
22 फरवरी 1998 को बिहार में लोकसभा के दूसरे चरण का मतदान था। गोविंदगंज के विधायक देवेंद्र दुबे कार में बैठ कर किसी का इंतजार कर रहे थे। तभी अचानक आधुनिक हथियारों से लैस हमलावरों ने उनकी कार पर गोलियों से भून डाला। आरोप लगा कि बिहार सरकार के मंत्री बृजबिहारी प्रसाद के इशारे पर विनोद सिंह ने इस घटना को अंजाम दिया। विधायक की हत्या के बाद गोविंदगंज की सीट खाली हुई तो उपचुनाव में देवेन्द्र दुबे के भाई भूपेन्द्र नाथ दुबे खड़े हुए। भूपेन्द्र दुबे भी विधायक बने। दिसम्बर 1994 में छोटन शुक्ला चुनाव प्रचार कर मुजफ्फरपुर लौट रहे थे। इसी दौरान उनकी हत्या कर दी गयी। जिस इलाके में छोटन शुक्ला की हत्या हुई वह बृज बिहारी प्रसाद का था। इस हत्या का आरोप बृज बिहारी प्रसाद पर लगा। छोटन शुक्ला की हत्या के बाद छोटे भाई भुटकुन शुक्ला ने गिरोह की कमान संभाली। कहा जाता है कि बृजबिहारी प्रसाद ने भुटकुन शुक्ला के अंगरक्षक को मनमाना पैसा देकर अपने साथ मिला लिया था। इसी अंगरक्षक ने भुटकुन शुक्ला की हत्या कर दी।
बृज बिहारी प्रसाद लालू यादव के करीब थे। 1990 में लालू यादव ने उन्हें आदापुर विधानसभा सीट से जनता दल का उम्मीदवार बनाया था। चुनाव जीत कर वे विधायक बने । लालू यादव ने उन्हें मंत्री भी बना दिया। बृज बिहारी जब मुजफ्फरपुर में पढ़ते थे तभी से उनकी भूमिहार दबंग छोटन शुक्ला से अदावत चल रही थी। 1995 का विधानसभा चुनाव होने वाला था। वैशाली लोकसभा उप चुनाव जीतने के बाद भूमिहार दबंग छोटन शुक्ला और राजपूत दबंग आनंद मोहन में गहरी दोस्ती हो चुकी थी। आनंद मोहन ने अपनी पार्टी (बिहार पीपुल्स पार्टी) से छोटन शुक्ला को केसरिया विधानसभा सीट से उम्मीदवार बना दिया। इस बीच बृज बिहारी प्रसाद इंजीनियरिंग एडमिशन घोटाला में जेल चले गये। इलाज के बहाने पटना के आईजीआईएमएस अस्पताल में भर्ती हो गये। अस्पताल के कमरे को ही कैंप जेल मान लिया गया।
13 जून 1998 को बृज बिहारी प्रसाद रोज की तरह शाम छह बजे अपने कमरे से बाहर निकल कर टहल रहे थे। टहलने के बाद वे अस्पताल के अपने कमरे की तरफ लौट रहे थे। तभी एक एम्बेसडर और सूमो गाड़ी वहां पहुंची। गाड़ी में सवार हमलावरों ने आधुनिक हथियारों से बृज बिहारी प्रसाद पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। बृज बिहारी के सुरक्षा गार्ड ने गोलियां चला कर बचाने की कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हुआ। अस्पताल जैसी व्यस्त जगह पर एक मंत्री की हत्या से पूरे बिहार में हड़कंप मंच गया। 26 साल बाद 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बृज बिहारी प्रसाद हत्याकांड में अपना फैसला सुनाया। इस मामले में शीर्ष अदालत ने पूर्व विधायक और अब राजद नेता मुन्ना शुक्ला और मंटू तिवारी की उम्र कैद की सजा बरकरार रखी। पूर्व सांसद सूरजभान सिंह और अन्य को कोर्ट ने सबूत के अभाव में बरी कर दिया था।
14 जून 1998 को पूर्णिया में सीपीएम विधायक अजीत सरकार शाम को शहर में घूम रहे थे। तभी उन्हें हथियारबंद अपराधियों ने घेर लिया। काफी देर तक उन पर गोलियों की बौछार की गयी। अजीत सरकार समेत कुल तीन लोग इस गोलीबारी में मारे गये थे। पोस्टमार्टम के बाद चला कि अजीत सरकार को करीब 107 गोलियां मारी गई थीं। अजीत सरकार 1980, 1985, 1990 और 1995 में पूर्णिया से लगातार 4 बार विधायक चुने गये थे। इस हत्याकांड में पप्पू यादव, राजन तिवारी समेत पांच लोगों को आरोपी बनाया गया था। 1999 में पप्पू यादव की इस मामले में गिरफ्तारी हुई थी। 2008 में निचली अदालत ने पप्पू यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसकी वजह से वे 2009 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सके थे। लेकिन 2013 में पटना हाईकोर्ट ने पप्पू यादव को सबूत के अभाव में इस मामले से बरी कर दिया था।
4 जनवरी 2011 की सुबह पूर्णिया के भाजपा विधायक अपने आवास पर लोगों से मुलाकात कर रहे थे। जाड़े का समय था। तभी एक महिला अचानक वहां पहुंची। उसने शॉल ओढ़ रखी थी और उसके अंदर एक चाकू छिपा रखा था। वह जैसे ही विधायक राज किशोर केसरी के पास पहुंची उसने चाकू निकाल कर उन पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। जब तक उस महिला को पकड़ा जाता तब तक विधायक लहूलुहान हो कर गिर पड़े थे। बहुत ज्यादा खून निकल चुका था। इस हमले में राजकिशोर केसरी की मौत हो गयी। हमलावर महिला एक निजी स्कूल की शिक्षिका थी। महिला ने 2010 में विधायक और उनके एक सहयोगी के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था।
मोकामा का टाल क्षेत्र और खून की राजनीति
चलिए दुलारचंद यादव-अनंत सिंह के साथ मोकामा की ओर आगे बढ़ते हैं। ‘दाल का कटोरा’ कहे जाने वाला ‘मोकामा टाल’ बिहार के चार जिलों पटना, नालंदा, लखीसराय और शेखपुरा के एक लाख हेक्टेयर से भी अधिक जमीन पर फैला हुआ है। इस क्षेत्र के लगभग 1.5 लाख किसान और 3 लाख खेतिहर मजदूर दाल की खेती करते हैं। इस क्षेत्र में धान, चना, गेहूँ, तिलहन, मक्का, चीनी और ज्वार बाजरा की खेती और व्यापार होता है। मोकामा का टाल क्षेत्र एक और घटना के लिए प्रसिद्ध है।
इतना तो तय है कि दुलारचंद यादव-अनंत सिंह पर आने वाले समय में नेटफ्लिक्स दस-बीस किस्तों में सिनेमा बनाकर मोकामा के लोगों से ही नहीं, बिहार और भारत के लोगों से हुमचकर पैसा वसूलेगा और दर्शक वृन्द ख़ुशी-ख़ुशी ताली भी थपथायेंगे और उसके झोली में पैसे डालते जायेंगे। प्रदेश की राजधानी पटना और अपराधियों से राजनेता बने लोगों के घरों (मोकामा) को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 31 आने वाले समय में चर्चाएं आम नहीं, चर्याएं खास की जाएँगी।
यह राजमार्ग कई मामलों में विख्यात और कुख्यात रहा है। आज से कोई 48 वर्ष पहले मई 27, 1977 को पटना जिला के बाढ़ सबडिवीजन के बेलछी गाँव में कुर्मी जाति के एक ज़मींदार के नेतृत्व में 60-70 लोगों के एक समूह ने दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के घरों को घेर लिया। ग्यारह दलितों को बाँधकर गोली मार दी गई और जला दिया गया। उस समय जनता पार्टी के कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे। विगत 2020 विधानसभा के चुनाव में बेलछी गांव के जानकी पासवान नीतीश कुमार को सत्ता से बेदखल करने की अपनी इच्छा को लेकर मुखर था।
घटना के चार दशक बाद, पासवान ने कहा कि अगर नीतीश कुमार सत्ता में रहे, तो उनके जाति के लोग इलाके के दलितों से अपनी दुश्मनी के कारण उनके गाँव में कभी कोई विकास नहीं होने देंगे। मई 1977 की उस भयावह दोपहर महावीर महतो के हथियारबंद कुर्मी गिरोह के चंगुल से बचकर भागे थे जानकी पासवान। वे प्रत्यक्षदर्शी थे उस घटना के जब मक्के के खेतों में 11 सबसे ग़रीब लोगों को गोली मारी, काटा और मार डाला और फिर सबूत मिटाने के लिए उन्हें जला दिया गया था। जिन 11 लोगों को गोली मार दी थी, जिसमें आठ दलित और तीन पिछड़ी जाती के थे। इसके बाद, जानकी पासवान की प्रमुख गवाही के आधार पर, 2 आरोपियों को मौत की सजा मिली, 11 अन्य को आजीवन कारावास की सजा दी गई।
उस कालखंड में श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर थी। वे पीड़ितों के परिवारों से मिलने के लिए हाथी पर सवार होकर बेलछी गांव की ओर निकली थी । पटना ही नहीं, भारत ही नहीं, विश्व भर से प्रकाशित समाचार पत्र, पत्रिका, रेडियो और टीवी में श्रीमती गांधी के इस अदम्य साहस को सकारात्मक छवि मिला और दिल्ली के सिंहासन पर उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त कर दिया। जो उस दृश्य को देखे थे, या फिर जो कृष्ण मुरारी किशन की उस तस्वीर को देखे जिसमें श्रीमती गांधी हाथी पर सवार हो रही थी, उनके बगल में एक महिला प्रतिभा सिंह को सहारा देकर हाथी पर चढ़ाया गया था, याद होगा।
उस दिन हरनौत और बेलछी के बीच एक ट्रैक्टर से जुड़ी जीप कीचड़ में फँस गई थी। हाथी शांतिपूर्वक वहां खड़ा था। श्रीमती गाँधी उसे गौर से देख रही थी। फिर हाथी शांत भाव से बैठ गया। इंदिरा गांधी ने बिना देर किए पीछे से उसकी पीठ पर चढ़ गईं। सांसद प्रतिभा सिन्हा हाथ पर चढ़ नहीं पा रही थी, लेकिन चढ़ीं। इस घटना ने उनके और कांग्रेस पार्टी के लिए किस्मत बदल दी।
मोकामा एक और कारण से प्रसिद्ध है। साल 1908 के मई महीने के 2 तारीख को तत्कालीन जुगांतर पार्टी के क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी मोकामा रेलवे स्टेशन पर आत्महत्या कर लिए थे। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी दोनों मिलकर मुजफ्फरपुर के तत्कालीन जिला न्यायाधीश डगलस किंग्सफोर्ड के ऊपर बम फेंक कर हत्या करना चाहते थे। जिस सवारी पर पर वे चलते थे, उस दिन उस सवारी से डगलस नहीं, बल्कि दो ब्रिटिश महिला जा रही थी, जो बंब के धमाके से मृत्यु को प्राप्त की। खुदीराम बोस बाद में गिरफ्तार हुए और 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई । जबकि प्रफुल्ल चाकी जो फ़रार हो गए थे, अपनी गिरफ़्तारी और पुनः जेल की सजा को टालने के लिए मोकामा रेलवे स्टेशन पर पुलिस को देखते ही अपने पिस्टल से स्वयं को गोली ली
सन सत्तर के दशक में तत्कालीन स्वास्थ्य आयुक्त नागमणि की पत्नी का पार्थिव शरीर इसी क्षेत्र से बरामद हुआ था। 3 मार्च 1973 को बख्तियारपुर पुलिस स्टेशन में कथित हत्या के संबंध में एक मामला दर्ज किया गया था। 19 अगस्त 1975 को सत्र सुनवाई शुरू हुई। अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के अंतर्गत आरोप तय किए गए। लेकिन साख्य के आभाव में नागमणी मुक़दमे से बरी हो गए थे ।
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं: “जब अदालत ने नागमणि को बरी किया, उस कालखंड में प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान थे डॉ. जगन्नाथ मिश्र। विधानसभा में पत्रकार दीर्घा में बैठे पत्रकारों को जब ज्ञात हुआ कि नागमणि को बरी कर दिया गया है, इस पर सरकार की प्रतिक्रिया जाने के लिए कि क्या और ऊपर की अदालत में निर्णय को चुनौती देगी? यूएनआई के तत्कालीन संवाददाता श्री धैर्यानन्द झा ने एक पुर्जी पर इस बात को लिखकर विधानसभा के कर्मचारी के मार्फ़त मुख्यमंत्री तक उस पुर्जी को पहुंचाए। सदन में बैठे मुख्यमंत्री डॉ. मिश्र ऊपर पत्रकार दीर्घा की ओर देखे। सामने डी एन झा को देखकर उसी पुर्जी पर बड़े अक्षरों में NO लिखकर भेज दिए। तीन तक की कहानी कुछ ही क्षण में रिलीज हुई।
इसी तरह, नब्बे के दशक में जब मुख्यमंत्री कार्यालय में लालू प्रसाद यादव आये उस समय पटना के जिलाधिकारी थे अरविन्द प्रसाद । लालू प्रसाद यादव का “चरवाहा विद्यालय” जिसकी शुरुआत 1991 में हुई थी, मोकामा क्षेत्र में भी होना था। चरवाहा विद्यालय का उद्देश्य था चरवाहों के बच्चों को शिक्षा प्रदान करना था। तुर्की, मुजफ्फरपुर में देश का पहला चरवाहा विद्यालय खोला गया था और इस योजना के तहत अविभाजित बिहार में 354 विद्यालय खोले गए थे।
उस दिन मोकामा में चरवाहा विद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर जिलाधिकारी के साथ एक अन्य अधिकारी आरएन झा भी साथ हो गए। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो वापसी के समय अनंत सिंह के भाई दिलीप सिंह 200 किलो वाले बोड़ी में बंद चना यह कहते हुए उनकी गाड़ी में रखवा दिए कि यह ‘अपने खेत की उपज है। खाइयेगा तो बहुत ताकत मिलेगी।” इस धृष्टता को देखकर दोनों अधिकारी को गुस्सा तो आया लेकिन सत्ता के सिंहासन से करीब होने के कारण दोनों खून का घूंट पी लिए। बाद में ज्ञात हुआ कि झाजी उस बोड़े को अपने गांव भेज दिए।
नदमा गांव में पिता चंद्रदीप सिंह के घर में सन 1950 में जन्म लिए दिलीप सिंह 1 अक्टूबर 2006 को हृदय की गति रुकने के कारण अंतिम साँस लिए। इससे पहले इनके दो और भाइयों फ़ाजो सिंह और विरांची सिंह को स्थानीय अपराधियों ने मार दिया था। अपने चार भाइयों में अनंत सिंह अंतिम भाई हैं। दिलीप सिंह बिहार में दो बार विधायक और मंत्री रहे थे। वे राष्ट्रीय जनता दल के सदस्य थे और लालू प्रसाद यादव का वरदहस्त था उनपर।
कहते हैं कि कांग्रेस विधायक श्याम सुंदर धीरज 80 के दशक में लिए बूथ कब्जाने का काम दिलीप सिंह किया करते थे। धीरज से किसी बात पर अनबन के बाद दिलीप से खुद 1990 में जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़े और अपने ही गुरु श्याम सुंदर सिंह धीरज को हराकर विधायक बने। सत्ता मिली तो उसे संभालने के लिए एक मजबूत हाथ चाहिए था, जो अनंत सिंह बन गए। बड़े भाई बिरंची सिंह की हत्या हुई तो अनंत सिंह बदला लेने नदी पार गए और अपने भाई के हत्यारे को ईंटों से कुचलकर मार डाला और फिर सिलसिला चल पड़ा। मोकामा में दिलीप सिंह को बाद में सूरजभान सिंह से चुनौती मिली। बाद में अनंत सिंह उसी मोकामा क्षेत्र से कई बार विधायक चुने गए। बिहार के राजनीति में बाहुबलियों का प्रवेश 90 के दशक से शुरू होता है. 90 के दशक में कई बाहुबलियों ने अपना चोला बदलकर कर राजनीति में प्रवेश करना चाहा, जिसमें कुछ सफल हुए और कुछ असफल भी।
1990 में जब लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने तो दुलारचंद यादव की ताकत और बढ़ गई। तब विपक्ष के नेता जगन्नाथ मिश्र ने आरोप लगाया था कि लालू यादव जाति के आधार पर अपराधियों को संगठित कर रहे हैं। उस समय लालू यादव की पार्टी (जनता दल) से दिलीप सिंह मोकामा के विधायक थे। कहा जाता है कि बाढ़-मोकामा में दिलीप सिंह को कंट्रोल करने के लिए लालू यादव ने दुलारचंद यादव को खड़ा किया था। 2010 में दिए चुनावी हलफनामा के अनुसार दुलारचंद यादव पर एक दर्जन से अधिक मामले थे जिसमें हत्या से संबंधित चार आरोप, हत्या के प्रयास से संबंधित चार आरोप, हत्या की नीयत से अपहरण का एक आरोप शामिल थे। जमीन कब्जा और जबरन वसूली के भी कई आरोप थे। 1991 में हुए बहुचर्चित सीताराम सिंह हत्या में भी अभियुक्त थे दुलारचंद यादव।
दुलारचंद को लालू यादव का हनुमान कहा जाता था, लेकिन लालू यादव ने दुलारचंद यादव को कभी अपनी पार्टी से टिकट नहीं दिया। दुलारचंद यादव लालू के साथ साथ कभी नीतीश कुमार के भी करीबी थे। 1991 के नवंबर में बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र में मध्यावधि चुनाव हो रहा था, नीतीश कुमार जनता दल के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में उतरे थे। शाम के जब मतदान बंद होने वाला था बाढ़ के पंडारक थाने के ढीबर मध्य विद्यालय बूथ पर फायरिंग हो गई, जिसमें ढीबर गांव के कांग्रेस कार्यकर्ता सीताराम सिंह की मौत हो गई। मामले में केस दर्ज करवाने वाले अशोक सिंह ने अपने परिवाद पत्र में कहा था कि नीतीश कुमार के साथ उस समय तत्कालीन मोकामा विधायक दिलीप सिंह, दुलारचंद यादव, योगेंद्र प्रसाद और बौधु यादव थे। उस हत्या में नीतीश कुमार के साथ साथ दुलारचंद को भी अभियुक्त बनाया गया था। खैर।
वापस दुलारचंद यादव हत्याकांड पर आते हैं। दुलारचंद हत्याकांड की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मौत गोली से नहीं, बल्कि गाड़ी से कुचलने और फेफड़ा फटने से हुई। इस हत्याकांड मामले में पुलिस मुख्य आरोपी और जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी के बाद उन्हें सीधे पटना एसएसपी ऑफिस के रंगदारी सेल में रखा गया। सूत्रों के अनुसार, अब तक 80 से अधिक लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा चुकी है। इस हत्या के मामले में कर्मवीर, राजवीर और छोटन सिंह को मुख्य रूप से नामजद किया है। इस मामले में दूसरे पक्ष के आरोपी जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी समेत कई अन्य लोगों पर भी पुलिस की नजर बनी हुई है।
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे कहते हैं: “बिहार की राजधानी पटना जिला मुख्यालय से केवल 70 किलोमीटर दूर है मोकामा का तारतर गाँव। यही यादव का घर है और परिवार के साथ यहीं गांव में रहकर सामाजिक ताना-बाना में जुटे रहते थे। आगामी 6 नवम्बर को मोकामा विधानसभा सीट के लिए मतदान होना है। इसे बिहार का सबसे हॉट सीट मन जाता है। मोकामा में दुलारचंद यादव हत्याकांड में तीन FIR दर्ज, अनंत सिंह और जन सुराज के पीयूष नामजद जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। इस घटना को लेकर अब तक तीन अलग-अलग प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई हैं — एक मृतक पक्ष की ओर से, दूसरी अनंत सिंह समर्थकों द्वारा और तीसरी पुलिस की ओर से।
पहली FIR (संख्या 110/25) दुलारचंद यादव के पोते नीरज कुमार के बयान पर भदौर थाना में दर्ज की गई है। इसमें अनंत सिंह, राजवीर सिंह, कर्मवीर सिंह, छोटन सिंह और कंजम सिंह को नामजद किया गया है। नीरज के अनुसार, गुरुवार दोपहर प्रचार के दौरान अनंत सिंह अपने समर्थकों के साथ पहुंचे और विवाद शुरू हो गया। आरोप है कि अनंत सिंह ने पिस्टल से गोली चलाई, जो दादा के पैर में लगी, और बाद में छोटन व कंजम सिंह ने थार गाड़ी से कुचलकर उनकी हत्या कर दी। इस मामले में हत्या और साजिश से संबंधित धारा 103, 3(5), BNS 2023 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 27 लगाई गई है।
वहीं, दूसरी FIR (संख्या 111/25) अनंत सिंह के समर्थक जीतेन्द्र कुमार के बयान पर दर्ज की गई है। इसमें जनसुराज प्रत्याशी पियूष प्रियदर्शी, लखन महतो, बाजो महतो, नीतीश महतो, ईश्वर महतो, अजय महतो और अन्य अज्ञात व्यक्तियों पर हमला और साजिश रचने का आरोप लगाया गया है। इस पर BNS 2023 की धाराएँ 126(2), 115(2), 109(1), 324(9), 352/351(2), 35 लागू की गई हैं।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर के कई हिस्सों पर गहरे घाव, फटे हुए जख्म (lacerated wounds) और घिसने के निशान (abrasions) की भी चर्चा की गई है। रीढ़ की हड्डी के पास चोट, सिर, पीठ, घुटने और टखनों पर गंभीर चोटें की विशेष रूप से रिपोर्ट में चर्चा की गई है। रिपोर्ट के अनुसर दाहिने पैर के तलवे के पास गोली लगने का निशान भी मिला है। जिससे स्पष्ट है कि उन्हें पहले गोली मारी गई । इसके बाद दुलारचंद यादव के सीने पर जोरदार प्रहार या भारी दबाव पड़ा, जिससे उनकी पसलियां टूट गईं और फेफड़े फट गए। इसकी वजह से अधिक मात्रा में इंटरनल ब्लीडिंग हुई।
फेसबुक पर अलोक रंजन लिखते हैं कि “मोकामा में दुलारचंद यादव की दिनदहाड़े हत्या सिर्फ़ एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में चल रही नई जोड़–तोड़ की साज़िश का हिस्सा ज्यादा लगती है या अब उस हत्या से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। हत्या के बाद सबसे चौंकाने वाली बात है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुप्पी। न कोई बयान, न कोई संवेदना, न कोई निंदा। यह चुप्पी अब महज राजनीतिक संयम नहीं, बल्कि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मोकामा की साज़िश को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है।”
रंजन आगे लिखते हैं कि “प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ इस हत्या में जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह पर सीधे आरोप लग रहे हैं। खुद अनंत ने झड़प की बात स्वीकारी है, वीडियोज़ सार्वजनिक है। असल में नीतीश इस वक्त महागठबंधन की यादव–भूमिहार एकता से असहज हैं। तेजस्वी यादव ने टिकट वितरण में जो सामाजिक संतुलन रचा, वही अब नीतीश के लिए राजनीतिक खतरा बन गया है। संभव है कि यह हत्या और उसके बाद की चुप्पी उसी रणनीति का हिस्सा हो ताकि ‘यादव बनाम भूमिहार’ की खाई दोबारा गहरी हो और विपक्ष का सामाजिक आधार टूट जाए और अपना समीकरण अक्षुण्ण रहे।”
दुलारचंद यादव की नृशंस हत्या ने बिहार की राजनीति और सुशासन के दावों का सच उजागर कर दिया है। दुलारचंद यादव कायर की तरह नहीं मरे। लड़ते-लड़ते मरे। अब भी मैं यह सोचकर हैरान होता हूं कि जिस दौर में मोकामा में दिलीप सिंह और उसके गुंडों का आतंक था। हालांकि यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है कि वे गांधीवादी की राह चले। मोकामा में यह मुमकिन भी नहीं था। मैं तो याद करता हूं बीपी मंडल को। जब वे मुख्यमंत्री बने थे तब बरौनी रिफाइनरी से रिसाव होकर गंगा में पानी की सतह पर फैल गया था। विधानसभा में विनोदानंद झा ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि “शूद्र मुख्यमंत्री होगा तो पानी में आग लगेगा ही।” इसके जवाब में मंडल ने कहा था कि “गंगा में आग तो तेल के रिसाव से लगी है परंतु एक पिछड़े वर्ग के बेटे के मुख्यमंत्री बनने से आपके दिल में जो आग लगी है, उसे हर कोई महसूस कर सकता है।”
असल में दुलारचंद यादव क्या थे, यह समझने के लिए मोकामा को समझना आवश्यक है। इसे बेगूसराय से जोड़कर देखा जाना चाहिए। बेगूसराय बिहार में वामपंथ का केंद्र रहा। खासकर सीपीआई का। दुलारचंद भी सीपीआई से जुड़े थे। लेकिन वे अलग हो गए। वजह क्या रही होगी? इसकी वजह निस्संदेह यही कि सीपीआई में तब सवर्णों की तुती बोलती थी। और बेगूसराय के वामपंथियों के बारे में में तो यह भी कहा जाता है कि वे भूमि जोतने वाले की बात जरूर करते थे और जमीन बांटे जाने की बात करते थे, लेकिन अपनी जमीन छोड़ कर। मुझे नहीं पता कि दुलारचंद ने सीपीआई को क्यों छोड़ा या यह हो सकता है कि सीपीआई ने किसी कारण से उन्हें अलग कर दिया होगा। लेकिन मूल बात यह है कि दुलारचंद एक जननेता थे और वे जिन लोगों से जिस तरीके की लड़ाई लड़ रहे थे, वह एकदम अलग था।
भूमिहारों के आतंक का गढ़ माने जानेवाले मोकामा में दुलारचंद ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। उनके ऊपर गैर-भूमिहारों की हत्या करने की बात भी सामने आती है। एक तो यह कि 1992 में पंडारक में दो यादव भाइयों की हत्या में उनका नाम आया। उनके साथ नीतीश कुमार का भी नाम था। मुकदमा भी चला, लेकिन पटना हाई कोर्ट ने मुकदमे को ही खत्म कर दिया। एक वजह यह भी कि नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री थे।
सवाल है कि हम दुलारचंद यादव को एक नायक के रूप में देखें या एक गैंगस्टर के रूप में? इसे इस तरीके से देखें कि दुलारचंद यादव ने किसकी लड़ाई लड़ी। क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि जिस अनंत सिंह को वे खुलेआम चुनौती दे रहे थे, उसके ऊपर नीतीश कुमार का हाथ है? फिर भी वे विरोध करते रहे। उनकी लड़ाई को किसी खास विचारधारा से जोड़कर देखना गलत होगा। लेकिन यह कहना कि वे अनंत सिंह के जैसे ही गुंडे थे, बिल्कुल गैर-वाजिब बात होगी। याद करिए 1960 का दशक जब सहार में रामेश्वर अहीर, जगदीश मास्टर और रामनरेश राम ने हथियार उठा लिया था। कुछ साथियों का कहना है कि दुलारचंद यादव को इस श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। लेकिन सवाल यही है कि क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? मुझे तो रामलखन सिंह यादव की याद आ रही है। उनके विरोधी उन्हें भी गुंडा ही कहते थे। ठीक वैसे ही लालू प्रसाद को उनके विरोधी चारा चोर की गालियां देते हैं।
दुलारचंद यादव बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मोकामा क्षेत्र से प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में प्रचार कर रहे थे। इससे पहले वे कभी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव, तो कभी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी रहे हैं। उनकी गिनती लालू प्रसाद यादव के उन गिने-चुने नेताओं के तौर पर की जाती थी, जिनकी मोकामा टाल क्षेत्र में गहरी सियासी पकड़ थी। 2022 के मोकामा विधान सभा उपचुनाव में दुलारचंद ने बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को खुलकर सपोर्ट किया था, जो राजद के टिकट पर लड़कर चुनाव जीती थी।
दुलारचंद यादव का बख्तियारपुर, बाढ़ और मोकामा के टाल इलाके में खासा प्रभाव रहा। उनकी छवि दबंग नेता की थी। हालांकि, उनकी पृष्ठभूमि में आपराधिक इतिहास से लबरेज रहा है। हत्या, अपहरण और रंगदारी के अलग-अलग मामलों में वे आरोपी रहे हैं। बकौल दुलारचंद यादव जीवन मे 32 बार जेल जाने की बातें कई मौकों पर स्वीकार किए थे। जून 2019 में पटना पुलिस ने दुलारचंद यादव को उनके बाढ़ वाले घर से जमीन कब्जा, रंगदारी, फायरिंग जैसे विभिन्न मामलों में गिरफ्तार किया था।
कमलाकांत पांडे कहते हैं कि करीब डेढ़ दशक बाद 2009 में यह हत्याकांड फिर चर्चा में आया जब बाढ़ एसीजेएम कोर्ट में नीतीश कुमार को आरोपी बनाने का अनुरोध करते हुए केस चलाने की अर्जी लगाई गई थी। बाढ़ कोर्ट ने नीतीश कुमार को आरोपी बनाकर केस चलाने की अनुमति दे दी। इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2019 में बरी हो गए। इसके अगले साल सुप्रीम कोर्ट ने भी नीतीश कुमार को राहत देते हुए उन्हें सीताराम सिंह मर्डर केस से बरी कर दिया था।
पण्डे जी आगे कहते हैं कि “साल 2017 में जब नीतीश कुमार महागठबंधन छोड़कर लालू यादव से अलग हुए तब यह मामला राजद ने उठाया था। राजद ने नीतीश को मर्डर केस का आरोपी बताते हुए सीएम पद से इस्तीफा देने की मांग की थी। माना जाता है कि उस समय दुलारचंद यादव ने ही इस केस की जानकारी राजद के नेताओं को दी थी। यह प्रकरण साल 2015 और 2020 के चुनाव के दौरान भी समाचार की खूब सुर्खियां बटोरी थी। हकीक़त है कि लालू प्रसाद यादव के उड़ान लबरेज काल 1990 से लेकर साल 2017 तक लालू के करीबी रहे दुलारचंद यादव बाद में नीतीश कुमार के नजदीकी हो गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में वे नीतीश कुमार के साथ कई चुनावी रैलियों में भी दिखे थे. हालांकि, उस चुनाव के कुछ दिनों बाद ही दुलारचंद की गिरफ्तारी हो गई। फिर उनके नीतीश कुमार से भी संबंधों में खटास आ गई।
2022 के मोकामा विधान सभा उपचुनाव में दुलारचंद ने बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को खुलकर सपोर्ट किया था, जो राजद के टिकट पर लड़कर चुनाव जीती थी. बीते 30 अक्टूबर, 2025 को घोसवरी थाना क्षेत्र के बसावनचक गांव में प्रचार के दौरान ही दो गुटों में हुए खूनी संघर्ष में हाथापाई, फिर गोली मारकर और अंत में गाड़ी से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया।
फेसबुक पर आनंद कुमार लिखते हैं कि बिहार के सभी राजनीतिक दलों के हाथ खून से सने हुए हैं. सबने बाहुबलियों और अपराधियों को टिकट दिया है। मोकामा में जो हुआ इसकी ही परिणति है। इस हत्या की व्याख्या भी लोग अपनी जातीय और दलीय प्रतिबद्धता के हिसाब से कर रहे हैं। सबसे दुखद है कि इसमें सबसे बड़ी संख्या नौजवान साथियों की है। सामाजिक न्याय और वंचित जातियों के हक की लड़ाई ने बेशक प्रजातंत्र को मजबूती दी है। लेकिन एक हद से ज्यादा आईडेंटिटी पॉलिटिक्स समाज के लिए घातक है। मौजूदा स्थिति देखकर दिनकर की पीड़ा याद आती है. जो उन्होंने पत्र के माध्यम से रामसागर चौधरी के सामने प्रकट किया था।
दिनकर लिखते हैं,”अगर आप भूमिहार-वंश में जनमे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्छा से तो नहीं किया, उसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्म पर अधिकार नहीं होता। हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें। अपनी जाति का आदमी अच्छा और दूसरी जाति का बुरा होता है, यह सिद्धान्त मान कर चलनेवाला आदमी छोटे मिजाज का आदमी होता है। आप-लोग यानी सभी जातियों के नौजवान-इस छोटेपन से बचिये। प्रजातंत्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है, सभी वर्गों के लोग उससे न्याय की आशा करते हैं। कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूल कर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिये कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता। वह बहुतों के समर्थन से चलता है। यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजनिक जीवन गल जायेगा।”

















Bahut sundar baat likhe hai Sir. Usme Dinkar jee bala baat ki apne jati ka aadmi achha aur dusre jati ka aadmi bura.
Jaise mera sochna hai Jaise mai dekhta hun ki, pahle (Lalu jee se pahle) bhi rajniti men dhanbal bahubal ka prayog hota hoga. Lekin jabse Lalu jee ka samay aaya dinanudin ye samasya vikral roop men dekha ja raha hai abhi tak (Nitish Kumar sarkar tak) jo behad dukhad hai.
Mai kamna karta hun ki isse aab nijat mile aur hamara pradesh, desh men sab kushal mangal purvak hota rahe.
💐🙏