छायाकार कृष्ण मुरारी किशन की वह ‘ब्रेकहीन, घंटीहीन, मडगार्डहीन साईकिल’ और प्रधानमंत्री द्वारा पूर्णिया हवाई अड्डा का लोकार्पण 

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्णिया हवाई अड्डे का लोकार्पण करते। साथ में हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

पूर्णिया / नई दिल्ली : विगत माह 15 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मिथिलांचल के पूर्णिया में जब हवाई अड्डा का आधिकारिक तौर पर बिहार के लोगों को समर्पित कर रहे थे, उस क्षण विश्व के किसी भी कोने में रहने वाले पूर्णिया के लोग अपने शहर से जुड़ने की बात सोच रहे हों, मेरी आँखों के सामने बिहार के एक सम्मानित छायाकार की छवि नाचने लगा था। काश !! नीतीश कुमार पुनः मुख्यमंत्री बनने के साथ, कृष्ण मुरारी किशन को राष्ट्रीय नागरिक सम्मान से अलंकृत करने की सिफारिश करते। 

सोचने लगा काश !!! वह छायाकार आज जीवित होता तो अपनी ‘ब्रेकहीन’, ‘घंटीहीन’, ‘मडगार्डहीन’, ‘चेनकवरहीन’ साईकिल की ओर प्रधानमंत्री को जरूर लाता, या फिर प्रधानमंत्री स्वयं पैदल चलकर उस छायाकार के रॉकेटनुमा साईकिल को ‘नमन’ करने जरूर आते, जिसने सत्तर के दशक में बिहार की सड़कों पर, खेतों में, खलिहानों में, शैक्षणिक संस्थानों में, अस्पतालों में, कारावासों में उस छायाकार का साथ देकर तस्वीरों से इतिहास रचा था। यह अलग बात है कि उसी कालखंड में पटना की सडकों पर अपने चप्पलों के साथ-साथ अपनी राजनीतिक भविष्य को रगड़ने वाले नीतीश कुमार को वह छायाकार याद भी नहीं आया होगा। नेता ऐसे ही होते हैं।

कृष्ण मुरारी ‘किशन’ जिसने बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर अपनी साईकिल की पहियों से फोटोग्राफी का बुनियाद रखा था। आज जब पटना का हवाई अड्डा का रनवे नई रोशनी में जगमगा रहा था, बिहटा उड़ान भरने की तैयारी हो रही थी, दरभंगा दैनिक प्रस्थान के साथ गुनगुना रहा था, गया आस्था और इतिहास के माध्यम से महाद्वीपों को जोड़ रहा था, और पूर्णिया अपने पहले यात्रियों का स्वागत करने के लिए सज्ज था – कृष्ण मुरारी किशन की आत्मा अपनी उस ऐतिहासिक साईकिल के साथ खड़े-खड़े प्रदेश के उज्जवल भविष्य को देख रहा था। आज हवाई अड्डों पर कर्मियों के साथ-साथ, मंत्रियों और अधिकारियों के हाथ में ‘स्मार्ट फोन’ था, जो तस्वीर खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे। उन दिनों ऐसी बात नहीं थी। 

उन दिनों, आर्यावर्त, द इंडियन नेशन, सर्चलाइट और प्रदीप बिहार के प्रमुख समाचार पत्र थे। फोटो पत्रकारिता के बारे में कोई नहीं जानता था। किशन नियमित रूप से इंडियन नेशन और आर्यावर्त को जेपी आंदोलन की तस्वीरें उपलब्ध कराते थे। अवध कुमार झा, जो दोनों समाचार पत्रों को प्रकाशित करने वाले समूह के मुख्य संवाददाता थे, ने उन्हें यह काम सौंपा था। अखबार उन्हें पारिश्रमिक तो देते ही थे, जेपी उन्हें तस्वीरें बनाने में खर्च होने वाले पैसे भी वापस कर देते थे। उस समय आंदोलन की शुरुआत की नींव रखी जा रही थी। किशन का मिशन राज्य और राष्ट्रीय मीडिया, दोनों को आंदोलन की गतिविधियों से अवगत कराना था। किशन का 1 फरवरी 2015 को निधन हो गया।

इधर, पूर्णिया में हवाई अड्डा के लोकार्पण के बाद यह कहा जाने लगा कि पटना में एक धुंध भरी सर्दियों की सुबह, जैसे ही दिन की पहली उड़ान धुंध को चीरती हुई गुज़रती है, सैकड़ों यात्री नए टर्मिनल पर बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। परीक्षा देने जा रहे घबराए हुए छात्रों के अलावा विवाह में जाने के लिए उत्साहित परिवारों से लेकर व्यापार की तलाश में लगे कुशल उद्यमियों तक, टर्मिनल उड़ान भरने के लिए तैयार कहानियों से गुलज़ार है। कुछ समय पहले तक, इन यात्राओं का अर्थ सिर्फ ट्रेन या बस में घंटों सफ़र करना होता था। आज, बिहार का आसमान नए टर्मिनलों, नए मार्गों और बढ़ते पंखों की एक अलग कहानी बयां कर रहा है। समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और बढ़ती आर्थिक आकांक्षाओं से युक्त राज्य बिहार में, विमानन क्षेत्र राष्ट्रीय और वैश्विक पहुंच के साथ एक परिवर्तनकारी परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है।

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हाल की परियोजनाओं ने पटना, दरभंगा, गया, बिहटा और पूर्णिया को शेष भारत से जोड़ते हुए बिहार को पहले से कहीं अधिक प्रमुखता से विमानन मानचित्र पर ला दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने पूर्णिया हवाई अड्डे के न्यू सिविल एन्क्लेव में अंतरिम टर्मिनल भवन का उद्घाटन करते हुए हवाई संपर्क के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाया। नई सुविधा यात्री प्रबंधन क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है, जिससे क्षेत्र में हवाई यात्रा की बढ़ती मांग को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए हवाई अड्डे की स्थिति  और अत्याधुनिक बन जाती है। यह न केवल बिहार के विमानन बुनियादी ढांचे को मजबूत करता है, बल्कि राज्य के प्रमुख जिलों में से एक में आर्थिक गतिविधि, पर्यटन और पहुंच को बढ़ावा देने का भी वादा करता है।

उधर पटना में भी, लोग कह रहे हैं कि विशाल लाउंज, कुशल चेक-इन सिस्टम और आराम के लिए निर्मित सुविधाओं के साथ, एक चमचमाता हुआ नया टर्मिनल अब पटना के जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तैयार है और बिहार की विमानन यात्रा में एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है। आधुनिक वास्तुकला और उन्नत यात्री सुविधाओं के साथ डिज़ाइन किया गया, टर्मिनल वार्षिक 10 मिलियन यात्रियों को संभाल सकता है, एक ऐसा पैमाना जो बिहार की बढ़ती आकांक्षाओं से मेल खाता है। वर्ष  2014 से 2024 के दौरान, पटना हवाई अड्डा बिहार के विमानन नेटवर्क में एक प्रमुख नोड के रूप में उभरा, जिसने लगभग 3 करोड़ यात्रियों को संभाला, लगभग 83,000 टन माल ढुलाई की और सालाना 24,026 औसत विमानों की आवाजाही दर्ज की। 

विमानन गति को बढ़ावा देने की एक और उपलब्धि बिहटा हवाई अड्डे का विकास है। 1,413 करोड़ रूपए के निवेश वाली एक परियोजना, बिहटा वायु सेना स्टेशन में नए सिविल एन्क्लेव की आधारशिला रखी गई है जो पटना के पश्चिम में एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करेगी। 50 लाख यात्रियों को संभालने के लिए डिज़ाइन की गई इसकी आधुनिक सुविधाएं पटना के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की पूरक होंगी, जिससे क्षेत्र की कनेक्टिविटी और मजबूत होगी। बिहटा टर्मिनल आधुनिक विमानन वास्तुकला को बिहार के सुनहरे अतीत की गूँज के साथ मिश्रित करता है, जो मौर्य और गुप्त राजवंशों की भव्यता के साथ-साथ नालंदा और विक्रमशिला की विद्वतापूर्ण विरासतों से प्रेरणा लेता है। बिहटा न केवल उत्कृष्ट बुनियादी ढांचे में, बल्कि दृष्टिकोण के मामले में उन्नत है। यह बिहार के विमानन विकास के अगले चरण के लिए एक लॉन्चपैड बनने की ओर अग्रसर है, इससे आसान यात्रा को सक्षम बनाया जाएगा, व्यापार का समर्थन होगा और यह राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसरों को आकर्षित करेगा।

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वर्ष 2020 में उड़ान क्षेत्रीय संपर्क योजना के तहत चालू होने के बाद से, दरभंगा हवाई अड्डा तेजी से बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी बन चुका है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे प्रमुख महानगरों के लिए सीधी उड़ानों के साथ, इसने देश भर में अवसरों और गंतव्यों के द्वार खोल दिए हैं। अकेले वित्त वर्ष 2023-24 में, 5 लाख से अधिक यात्रियों ने दरभंगा को अपने लॉन्चपैड के रूप में चुना, प्रत्येक उड़ान एक संकेत है कि कनेक्टिविटी उनके द्वार पर पहुंच चुक है। दरभंगा का बढ़ता उड़ान नेटवर्क समावेशन का प्रतीक है। यह उत्तर बिहार के लोगों को भारत के शहरी केंद्रों के करीब लाता है, साथ ही उनकी संस्कृति, प्रतिभा और उद्यम को राज्य की सीमाओं से परे भी ले जाता है।

कुछ हवाई अड्डे गया की तरह इतिहास और आधुनिक यात्रा दोनों का प्रबंधन संभालते हैं। हर साल, यह छात्रों और पेशेवरों का स्वागत करता है, साथ ही बोधगया में बुद्ध के मार्ग पर चलने वाले हजारों तीर्थयात्रियों, भिक्षुओं और साधकों के लिए अपने द्वार भी खोलता है। 954 एकड़ में फैला और सटीकता के साथ निर्मित, यह 250 आगमन और 250 प्रस्थान  को संभालने में सक्षम है ।गया हवाई अड्डा बिहार को दुनिया के बौद्ध स्थलों से जोड़ने वाले एक सांस्कृतिक सेतु के रूप में निरंतर प्रगति कर रहा है। यह बिहार की कालातीत विरासत को वैश्विक दर्शकों से जोड़ता है और भारत के विमानन मानचित्र पर राज्य को दृढता से स्थापित करता है।

बहरहाल, सत्तर के दशक से अपने जीवन की अंतिम सांस तक कृष्ण मुरारी किशन बिहार राज्य में हुए लगभग हर महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने कई ब्रेकिंग न्यूज़ स्टोरीज़ की तस्वीरें खींचीं। जोखिम उठाने से कभी नहीं हिचकिचाते हुए, उन्हें दो बार गोली लगी थी। वे कई मीडिया संस्थानों और समाचार एजेंसियों से जुड़े रहे। वे बिहार में समाचार फोटोग्राफी के एक स्तंभ थे। किशन का फोटोग्राफी करियर ऐतिहासिक बिहार आंदोलन के दिनों में शुरू हुआ। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य थे और संगठन की गतिविधियों में भाग लेने के लिए पटना के कदमकुआं स्थित कांग्रेस मैदान में अक्सर आते थे। 

कहते हैं, एक बार, मैदान से लौटते समय, वे जेपी से मिलने गए। किशन ने पानी पिया, कुछ देर बैठे और फिर घर चले गए। उनके अपने शब्दों में, “इस तरह, हम जेपी से लगभग हर दिन मिलते थे। उन दिनों, वे बिहार राहत समिति में एक उच्च पद पर थे। वे हमें नान खटाई परोसते थे। मुझे याद भी नहीं कि उन्होंने मुझे फोटोग्राफी के लिए कैसे और क्यों प्रेरित किया।” रघु राय और सत्यनारायण के साथ, वे बिहार आंदोलन का इतिहास लिखने वाले शीर्ष फोटोग्राफरों में से एक थे।

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उन दिनों फोटो पत्रकारिता का कोई अस्तित्व नहीं था और अखबारों की संख्या बहुत कम थी। डिजिटल मीडिया अभी भी भविष्य में था। तस्वीरों को डेवलप करके “ब्लॉक” पर उकेरा जाता था। ब्लॉक तैयार करवाने के लिए उन्हें घंटों स्टूडियो में बैठना पड़ता था और फिर राष्ट्रीय अखबारों में छपवाने के लिए साइकिल से हवाई अड्डे जाना पड़ता था। लेकिन उन्होंने आंदोलन के हर पहलू को कैमरे में कैद करने का अपना दृढ़ संकल्प कभी नहीं छोड़ा, चाहे इसके लिए उन्हें पुलिस की लाठियों के कुछ वार ही क्यों न सहने पड़े। एक फोटोग्राफर के रूप में किशन का सफ़र कितना महँगा, जोखिम भरा और संघर्षों से भरा रहा होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

किशन का जन्म (1952) एक पिछड़े लुहार (लोहार) परिवार में हुआ था। उनके पिता द्वारिका विश्वकर्मा पटना के दरियापुर गोला मोहल्ले में साइकिल मरम्मत की दुकान चलाते थे। किशन दुकान में अपने पिता का हाथ बटाते थे। बाद में, उन्होंने 20-25 साइकिल रिक्शा खरीदे और उन्हें किराए पर देकर जीविका चलाने लगे। किशन ने पटना कॉलेजिएट स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और 1968 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्होंने 1977 में पटना के कॉमर्स कॉलेज से आई.कॉम. की डिग्री हासिल की। वह चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहते थे। हालाँकि, अपनी पीढ़ी के कई लोगों की तरह, वह बिहार आंदोलन में शामिल होने के आह्वान का विरोध नहीं कर सके और कैमरा चलाने का फैसला किया, और अंततः एक प्रसिद्ध फोटो पत्रकार बन गए।

कहते हैं कि जब वे अपनी प्री-यूनिवर्सिटी डिग्री की पढ़ाई कर रहे थे, तो जेब खर्च के लिए वे दो-तीन ट्यूशन लिया करते थे। संयोगवश, जिन लड़कियों को वे पढ़ाते थे, उनमें से एक के पिता के पास एक फोल्डिंग कोडक कैमरा था (जिससे एक फिल्म रोल में आठ तस्वीरें ली जा सकती थीं)। इसी कैमरे का इस्तेमाल शुरू करते ही फोटोग्राफी के प्रति उनका प्रेम शुरू हुआ। जल्द ही उन्होंने एक ल्यूबिटेल-2 कैमरा खरीद लिया, जिसकी कीमत उस समय ₹350 थी।

किशन ने खुद को बिहार आंदोलन के दस्तावेजीकरण तक ही सीमित नहीं रखा। अपने लंबे करियर में, उन्होंने फोटो पत्रकारिता के सर्वोच्च मानक स्थापित किए। वे अपने काम के प्रति समर्पित थे और डर उनके लिए बिलकुल भी मायने नहीं रखता था। चाहे पुलिस अत्याचार हो या सामंती उत्पीड़न, या राजनीतिक उथल-पुथल या जनांदोलन, वे हमेशा मौके पर पहुँचने वाले पहले फोटोग्राफर होते थे। भागलपुर में अंधाधुंध गोलीबारी, इंदिरा गांधी की बेलछी यात्रा और अपने इलाके के लोगों को आतंकित करने वाले डाकू मोहन बिंद की उनकी तस्वीरें उनके करियर के मील के पत्थर साबित हुईं। उन्होंने ये तस्वीरें बिना किसी जोखिम की परवाह किए लीं। उनकी तस्वीरें रविवार, धर्मयुग और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं। उनका मानना था कि उनकी तस्वीरें उस स्थान के इतिहास को बताये। 

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