“एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता ​है……” नमन नाना​ पाटेकर 🙏

तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा भारत के पद्मश्री नागरिक सम्मान से सम्मानित नाना पाटेकर

नई दिल्ली : अनिल माटू और हृदय लानी की कहानी और अनिल माटू के निर्देशन में सन 1997 में जब 5.57 करोड़ रुपये की लागत  पर ‘यशवंत’ सिनेमा भारत के सिनेमा घरों में प्रदर्शित हुआ, तो देश के दर्शकों के होठों पर एक ही डायलॉग था – एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है। ‘यशवंत’ सिनेमा में नौ-शब्दों का यह डायलॉग महज शब्द नहीं थे, बल्कि तत्कालीन व्यवस्था पर एक कुठाराघात था। ऐसी बात नहीं है कि 29-साल बाद इस डायलॉग की सापेक्षता समाप्त हो गयी है, एक-एक शब्द आज भी उतना ही सच है, जितना उस दिन था। दुर्भाग्य यह है कि नौ शब्दों के डायलॉग को जमीनी सतह पर उतारकर व्यवस्था के प्रति विश्वास को आज भी कायम नहीं किया जा सका है। 

‘यशवंत’ सिनेमा से तीन साल पहले 22 जुलाई, 1994 को केके सिंह द्वारा लिखित कहानी और मेहुल कुमार के निर्देशन में एक और सिनेमा बना था। नाम था ‘क्रांतिवीर’, जिसमें डिम्पल कपाड़िया, अतुल अग्निहोत्री, ममता कुलकर्णी, परेश रावल, डैनी डेन्जोंगपा अभिनय किये थे, एक और डायलॉग था – सौ में से अस्सी बेईमान, फिर भी मेरा देश महान। उन दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय में पीवी नरसिम्हा राव बैठे थे और उस कालखंड में अन्य घोटालों के अलावे जेएमएम नेता खरीददारी का मामला, पना-मुक्ता घोटाला, यूरिया घोटाला, हर्षद मेहता घोटाला, बाबरी मस्जिद कांड, हवाला कांड आदि का मामला दिल्ली के न्यायालयों में गूंज रहा था। चंद्रास्वामी कांड तो था ही। कहते हैं इस सिनेमा के निर्माण पर तीन करोड़ रूपये खर्च हुए थे, जबकि इस सिनेमा से 20.6 करोड़ का इजाफा हुआ था। इस सभी फिल्म के पीछे खड़े थे नाना पाटेकर। दुर्भाग्यवश आज तत्कालीन जेएमएम के नेता शिबू सोरेन की पत्नी और झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की माँ भी अनंत यात्रा पर निकली। 

तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा भारत के पद्मश्री नागरिक सम्मान से सम्मानित नाना पाटेकर आज जब सुबह-सवेरे 05.10 बजे नाना पाटेकर गोआ के एक अस्पताल में मृत घोषित किये गए, तो ऐसा लगा जैसे उनकी मृत्यु भी देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, आपराधिक दशा को कोई सकारात्मक दिशा नहीं दे सका। दर्शक ताली पीटते रह गए, नाना अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकल गए। अपनी अंतिम सांस से कोई दो घंटा पूर्व वे अपने डॉक्टर को इतिल्ला भी किए कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। खैर – जाने वाले को कौन रोक सकता है। 

तभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा की बहुत कम अभिनेताओं में वह गहराई, विशिष्‍टता और दमदार उपस्थिति होती है, जो नाना पाटेकर जी में थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि नाना पाटेकर ने प्रत्येक भूमिका में उल्लेखनीय बहुमुखी प्रतिभा और रचनात्मकता का परिचय देते हुए दर्शकों को ऐसे किरदार दिए जो पीढ़ियों तक याद रहेंगे। उन्‍हें उनके स्‍पष्‍ट और बेबाक विचारों के लिए भी सराहा जाता था। वे अपने विचारों को व्यक्त करने में कभी संकोच नहीं करते थे।

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मोदी ने अपने x पर लिखा है: “बहुत कम अभिनेताओं में वह गहराई, विशिष्‍टता और दमदार उपस्थिति होती है, जो श्री नाना पाटेकर जी में थी। उन्होंने हर भूमिका में उल्लेखनीय बहुमुखी प्रतिभा और रचनात्मकता का परिचय दिया और हमें ऐसे किरदार दिए जिन्हें पीढ़ियां याद रखेंगी। उन्‍हें उनके स्‍पष्‍ट और बेबाक विचारों के लिए भी सराहा जाता था। वे अपनी बात कहने में कभी संकोच नहीं करते थे। हिंदी और मराठी सिनेमा में श्री नाना पाटेकर का योगदान अतुलनीय था। उनके निधन से एक बड़ी रिक्‍तता पैदा हो गई है। उनके परिजनों, मित्रों और अनगिनत प्रशंसकों के प्रति मेरी संवेदनाएं। ओम शांति।”

नाना पाटेकर

हिंदी और मराठी सिनेमा में उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके निधन से एक बड़ी रिक्‍तता पैदा हो गई है। उन्होंने उनके परिजनों, मित्रों और अनगिनत प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की। अपनी अलग-अलग तरह की भूमिकाओं और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के लिए मशहूर अनुभवी कलाकार नाना पाटेकर का गुरुवार तड़के गोवा स्थित उनके घर पर निधन हो गया। वे 76 साल के थे। मेडिकल फैसिलिटी के सीनियर डॉक्टर डॉ. शेखर सालकर ने बताया कि पणजी के पास डोना पाउला में अपने अपार्टमेंट में बेहोश पाए जाने के बाद एक्टर को एक प्राइवेट हॉस्पिटल लाया गया था। 45 मिनट तक CPR (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) देने के बावजूद पाटेकर को बचाया नहीं जा सका और सुबह 5.10 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

अस्पताल के डॉक्टरों को पाटेकर के एक दोस्त से मिली जानकारी के अनुसार, एक्टर ने उन्हें सुबह करीब 3.30 बजे मैसेज करके बताया था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। सालकर ने कहा, “दोस्त ने सुबह करीब 4 बजे मैसेज देखा और तुरंत पाटेकर के अपार्टमेंट पहुंचे, जहां वे एक केयरटेकर के साथ रह रहे थे।”केयरटेकर तुरंत प्राइवेट हॉस्पिटल पहुंचे, जहां से उनके घर एम्बुलेंस भेजी गई। सालकर ने कहा, “एम्बुलेंस में ही इलाज शुरू हो गया था।” पाटेकर का घर अस्पताल से करीब 5 मिनट की दूरी पर है।अस्पताल लाने के बाद डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन सुबह 5.10 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

नाना पाटेकर आखिरी बार विशाल भारद्वाज की रोमांटिक एक्शन थ्रिलर ‘ओ रोमियो’ में दिखे थे, जिसमें शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी भी थे। फरवरी 2026 में रिलीज़ हुई इस फिल्म में पाटेकर ने मुंबई इंटेलिजेंस ब्यूरो चीफ इस्माइल खान का रोल किया था। उन्होंने अनिल कपूर की ‘सूबेदार’ में भी काम किया था, जो मार्च 2026 में प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई थी। इससे पहले वे ‘हाउसफुल 5’ (2025) और ‘वनवास’ (2024) में नज़र आए थे। पाटेकर ने 2026 में प्रकाश झा की पॉलिटिकल ड्रामा सीरीज़ ‘संकल्प’ से OTT में भी डेब्यू किया था, जिसमें उन्होंने मा’अत साहब/कन्हैया लाल का मुख्य किरदार निभाया था।

थिएटर और सिनेमा की दुनिया में आने से पहले पाटेकर ने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में पढ़ाई की थी। उन्होंने 1978 में ‘गमन’ फिल्म से हिंदी सिनेमा में डेब्यू किया। उनकी शुरुआती फिल्मों में हिंदी और मराठी दोनों तरह की फ़िल्में शामिल थीं; ‘आज की आवाज़’, ‘प्रतिघात’, ‘मोहरे’ और ‘त्रिशग्नि’ जैसे प्रोजेक्ट्स ने धीरे-धीरे उन्हें एक ऐसे कलाकार के तौर पर स्थापित किया जो चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ निभाने में सक्षम था।

उनके करियर को ‘अंकुश’ (1986) से काफ़ी रफ़्तार मिली, लेकिन विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ (1989) उनके करियर का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। पाटेकर ने इसमें गुस्सैल गैंगस्टर ‘अन्ना’ का किरदार निभाया और अपनी परफ़ॉर्मेंस के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड जीता। उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड भी मिला। पाटेकर की फिल्मों में काफी विविधता देखने को मिली। उन्होंने कभी खूंखार विलेन, कभी नैतिक रूप से उलझे हुए हीरो, तो कभी बेहद संवेदनशील किरदार निभाए, लेकिन दर्शकों के बीच उनकी जो खास पहचान थी, वह हमेशा बनी रही।

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1990 के दशक ने हिंदी सिनेमा के सबसे दमदार अभिनेताओं में से एक के तौर पर पाटेकर की पहचान को और मज़बूत किया। उन्होंने ‘अंगार’ (1992) के लिए बेस्ट विलेन का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता और इसके बाद ‘तिरंगा’ (1993) से उन्हें एक और बड़ी कामयाबी मिली। ‘क्रांतिवीर’ (1994) में उन्होंने गुस्सैल प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड और बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। इसके बाद उन्होंने ‘अग्नि साक्षी’ (1996) में काम किया, जिसके लिए उन्हें अपना तीसरा नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला, इस बार बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के तौर पर। इसी दौरान वे ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ जैसी फिल्मों में भी नज़र आए, जिससे यह साबित हुआ कि उनकी दमदार एक्टिंग इमोशनल ड्रामा में भी उतनी ही असरदार हो सकती है।

​केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और नाना पाटेकर

2000 के दशक में भी हिंदी सिनेमा में पाटेकर का अहम योगदान रहा। ‘अब तक छप्पन’ (2004) में उन्होंने साधु अगाशे का किरदार निभाया, जो मुंबई पुलिस का एक सख्त अफसर था और अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी और पर्सनल ज़िंदगी के बीच फंसा हुआ था। यह रोल उस दशक के उनके सबसे बेहतरीन किरदारों में से एक बन गया। ‘अपहरण’ (2005) में नैतिक रूप से उलझे हुए राजनेता के रोल में भी वे उतने ही असरदार रहे और बेस्ट विलेन का एक और फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता। लेकिन पाटेकर ने यह भी दिखाया कि उनकी दमदार एक्टिंग कॉमेडी में भी कमाल कर सकती है। ‘वेलकम’ (2007) में गैंगस्टर उदय शेट्टी के रोल ने उन्हें एक बिल्कुल अलग अंदाज़ में बड़े पैमाने पर दर्शकों के बीच पहचान दिलाई। उन्होंने ‘वेलकम बैक’ (2015) में भी यही रोल दोबारा निभाया। वहीं, ‘राजनीति’ (2010) में उनकी एक्टिंग ने उन्हें पॉलिटिकल ड्रामा जॉनर में वापस ला खड़ा किया।

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भले ही पाटेकर एक बड़े हिंदी फ़िल्म स्टार बन गए, लेकिन मराठी सिनेमा उनके करियर का एक अहम हिस्सा बना रहा। उनके बाद के दौर के सबसे मशहूर कामों में से एक मराठी फ़िल्म ‘नटसम्राट’ (2016) थी, जिसमें उन्होंने एक रिटायर्ड थिएटर एक्टर का रोल निभाया था जो बुढ़ापे, परिवार और अपनों को खोने के दुख से जूझ रहा था। इस रोल के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर (मराठी) का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला। हिंदी और मराठी सिनेमा में उनके काम की वजह से उन्हें अपने पूरे करियर में कमर्शियल फ़िल्मों और दमदार एक्टिंग वाले प्रोजेक्ट्स के बीच काम करने का मौका मिला। पाटेकर ने तमिल सिनेमा में भी काम किया। वह भारतीराजा की फ़िल्म ‘बोम्मलटम’ में नज़र आए और बाद में रजनीकांत की फ़िल्म ‘काला’ (2018) में एक अहम रोल निभाया। ‘काला’ में उन्होंने हरिनाथ देसाई का रोल किया, जो एक पॉलिटिकल विलेन था और रजनीकांत के मुख्य किरदार से टकराता है। यह फ़िल्म साउथ इंडियन सिनेमा में उनके यादगार कामों में से एक थी।

पाटेकर सिर्फ़ एक एक्टर नहीं थे। उन्होंने 1991 की फ़िल्म ‘प्रहार: द फ़ाइनल अटैक’ से बतौर डायरेक्टर डेब्यू किया, जिसमें उन्होंने लीड रोल भी निभाया था। यह फ़िल्म सैनिकों की ज़िंदगी और ट्रेनिंग से प्रेरित थी और इसमें मिलिट्री लाइफ़ में उनकी पुरानी दिलचस्पी झलकती थी। वह समाज सेवा से भी जुड़े थे। 2015 में, उन्होंने और साथी मराठी एक्टर मकरंद अनासपुरे ने ‘नाम फ़ाउंडेशन’ शुरू किया, जो किसानों से जुड़े मुद्दों, खासकर महाराष्ट्र में सूखे से प्रभावित समुदायों के लिए काम करता है। पाटेकर टेरिटोरियल आर्मी से भी जुड़े थे और उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल का मानद रैंक दिया गया था। पाटेकर 70 साल की उम्र के बाद भी काम करते रहे। उनकी हालिया फिल्मोग्राफी में वनवास (2024), हाउसफुल 5 (2025), ओ’ रोमियो और 2026 में सूबेदार शामिल हैं। 

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