तीन मूर्ति भवन (नई दिल्ली) : “बहुत साल पहले हमने किस्मत से एक वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपना वादा पूरा करेंगे – पूरी तरह से नहीं, लेकिन काफी हद तक। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आज़ादी के लिए जागेगा। इतिहास में कभी-कभी ऐसा पल आता है जब हम पुराने से नए की ओर बढ़ते हैं, जब एक युग खत्म होता है, और जब एक देश की आत्मा, जो लंबे समय से दबी हुई थी, अपनी आवाज़ पाती है। यह सही है कि इस खास पल में, हम भारत और उसके लोगों की सेवा और मानवता के बड़े मकसद के लिए खुद को समर्पित करने का संकल्प लें।
इतिहास की शुरुआत में, भारत ने अपनी कभी न खत्म होने वाली खोज शुरू की थी, और सदियों का सफर उसकी कोशिशों और उसकी सफलता-असफलता की भव्यता से भरा है। अच्छे और बुरे दोनों समय में, उसने कभी उस खोज को नहीं छोड़ा, और न ही उन आदर्शों को भुलाया जिन्होंने उसे ताकत दी थी। आज हम मुश्किलों के दौर को खत्म कर रहे हैं और भारत खुद को फिर से खोज रहा है। आज हम जिस कामयाबी का जश्न मना रहे हैं, वह बस एक कदम है, एक मौका है उन बड़ी जीतों और कामयाबियों के लिए जो हमारा इंतज़ार कर रही हैं।
क्या हम इतने बहादुर और समझदार हैं कि इस मौके को पकड़ सकें और भविष्य की चुनौती को स्वीकार कर सकें? आज़ादी और ताकत के साथ जिम्मेदारी भी आती है। यह ज़िम्मेदारी इस सभा पर है, जो भारत के आजाद लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक आज़ाद संस्था है। आज़ादी मिलने से पहले, हमने बहुत तकलीफ सही हैं और उन दुखों की याद से हमारे दिल भारी हैं। उनमें से कुछ तकलीफें अभी भी बनी हुई हैं। फिर भी, बीता हुआ समय बीत चुका है और अब भविष्य हमें बुला रहा है।”

मैं नहीं जानता की 14 अगस्त 1947 की आधी रात को संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू जिन शब्दों को ‘A Tryst With Destiny’ पढ़कर स्वतंत्र भारत का सुस्वागतम किये थे, उन शब्दों को लिखते समय पंडित नेहरू की मानसिक स्थिति कैसी रही होगी? लिखते समय उनकी उंगलियां ख़ुशी से काँप रही थी या नहीं? अगस्त के महीने में दिल्ली का तापमान भी उष्म ही रहा होगा, उनके चेहरे और कपाल से पसीने की बूंदें कागज पर गिरी अवश्य होगी, कागज पर लिखे शब्द पसीने में भींगे जरूर होंगे – आज जब तीन मूर्ति भवन में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आवासीय कार्यालय के सामने खड़े होकर उस कालखंड की कल्पना कर रहा हूँ तो सोचता हूँ ‘भारत यूँ ही नहीं बना है।”

कल के फ्लेग स्टाफ हॉउस और आज के तीन मूर्ति भवन की पाहकलि मंजिल पर खड़ा हूँ। मैं जहाँ खड़ा हूँ मेरे बाएं और दाहिने हाथ हमारी उम्र से लम्बी, साफ़-सुधरी गलियारा है, जहाँ कुछ सुरक्षाकर्मी अपनी पैनी निगाह आवक-जावक पर लगाए हैं। मेरे बाएं हाथ शीशे के अंदर एक ऊँचे स्थान पर श्रीमती कमला (कौल) नेहरू की एक 10″x8″ आकार की तस्वीर रखी है। शीशा तो साफ़ दिख रहा है, लेकिन श्रीमती कमला नेहरू की तस्वीर की शीशे पर धूल की परतें जमी होने का आभास हो रहा है।
इस तस्वीर के सामने बाएं हाथ तीन माननीया/मान्यवरों के बैठने के लिए एक सोफा और उसके बाएं-दाहिने एक-एक व्यक्ति के बैठने के लिए एक-एक सोफे रखा है। सोफे सफ़ेद वस्त्रों से ढंके हैं। सामने जिस तरफ एक सोफे लगा है, वहां एक चौकोर और दूसरा गोलाकार छोटा-छोटा मेज रखा है, जिसपर एक टेबुल लैम्प भी जल रहा है। इसी मेज पर एक एस्ट्रे भी रखा है। कोई दो हाथ हटके बाएं दीवार से सटे एक और गोलाकार मेज है जिस पर एक और एस्ट्रे के अलावे पानी रखने वाला एक धातु का सुराही रखा है। यह सभी वस्तुएं पंडित नेहरू की ही हैं।

दो हाथ हटकर फिर एक चौकोर आकार का मेज है जिसपर एक और टेबुल लैम्प जला है। मेज पर कुछ अन्य सामन भी रखे हैं । इस मेज से कोई पांच फुट बाएं एक और चौकोर मेज स्थित है जिसपर एक घड़ी और बुद्ध की दो प्रतिमा रखा है। इस कमरे में अगर बाएं हाथ श्रीमती कमला नेरू की तस्वीर से प्रारम्भ करें तो अंत भगवान् बुद्ध की प्रतिमा से होती है। बुद्ध वाली मेज के पीछे एक कुर्सी रखी है। इन दोनों मेजों के बीच कोई चार फुट चौड़ा और छः फुट लम्बा एक गद्देदार बिस्तर है, बिना किसी सिलबट के। बिस्तर पर सफ़ेद चादर बिछा है और उसके ऊपर सोने वाले व्यक्ति को अपना शरीर ढंकने के लिए एक चादर भी, जो पुरे बिस्तर को लगभग 70 फीसदी हिस्से को ढंका है।
मैं टुकुर-टुकुर इस कक्ष को देख रहा हूँ । इस कक्ष में रखी सभी वस्तुओं को भी देख रहा हूँ और मन ही मन सोच भी रहा हूँ कि इसी कक्ष में, इसी बिस्तर पर भारत का पहला प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अपनी अंतिम सांस कैसे लिए होंगे। इस छोटे से कमरे में जब एक पांच फुट दस इंच का व्यक्ति, जिसका वजन उस समय शायद 65-68 किलो था, अंतिम सांस लेकर भारत के लोगों की अपूर्ण आशाओं को बीच रास्ते में छोड़कर कैसे जा सकते हैं?
74-वर्ष के नेहरू 27 मई, 1964 को अंतिम सांस लिए। उस दिन रविवार था। इस कमरे के सामने खड़े होकर सोच रहा हूँ कि अपनी अंतिम सांस से पहली रात को वे देर रात (करीब 11 .30) तक कार्य किये थे। अगली सुबह कोई 06.30 बजे शौचालय से वापस आने के बाद सीने में दर्द महसूस किये। कुछ समय अचेत रहे। बाद में उपस्थित चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिए। भारत में तत्कालीन प्रकाश अन्धकार में बदल गया। आधिकारिक रूप से भारत के संसद में पंडित नेहरू की मृत्यु की सूचना दोपहर बाद 2 बजे दी गयी। पंडित नेहरू के बारे में बहुत तो नहीं जानता, लेकिन मेरा जन्म (1959) नेहरू के कालखंड में ही हुआ था। शायद मेरा प्रारब्ध था कि मैं पंडित नेहरू के शयन कक्ष के सामने उस दृश्य की कल्पना कर सकूँ, तभी आज यहाँ खड़ा हूँ।

जब मैं गलियारों में घूम रहा था, तो मुझे भारत की आज़ादी की लड़ाई के बारे में बहुत जानकारी मिल रही थी। मैंने उन महान पुरुषों और महिलाओं की तस्वीरें देखीं, जिनसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री की मुलाकात हुई थी। मुख्य इमारत के कुछ कमरों को वैसे ही रखा गया है, जैसे वे पूर्व प्रधानमंत्री के समय में थे। उम्र से लम्बी गलियारे में जब पीछे मुड़ा, पंडित नेहरू का अध्ययन कक्ष दिखा। कोई छह फुट-चार फुट आकार का टेबुल, जिसके दोनों तरफ एक-एक कुर्सी रखी दिखी। इसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आमतौर पर अध्ययन कक्ष में इस मेज पर उनके साथ सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति ही बैठ सकता था।
मेज पर बाएं हाथ एक शब्दाबली, बीच में होल्डर वाला कलम-दबात, दाहिने हाथ काला, सफ़ेद और आसमानी रंग का तीन टेलीफोन, सामने (जिधर दूसरे व्यक्ति बैठेंगे) के बाएं- दाहिने फाइलों और अन्य कागजातों को रखने के लिए दो ट्रे भी रखा दिखा। पंडित नेहरू के मेज के सामने पांच लोगों के बैठने के लिए सोफे (एक पर तीन व्यक्ति और एक-एक अलग अलग आमने सामने ) रखा दिखा जिस पर आसमानी रंग के वस्त्र के गद्दे लगे थे। इसे देखकर सोच रहा था कि जब पंडित नेहरू से मिलने एक से अधिक व्यक्ति आते होंगे इस कक्ष में, वे या तो सोफे पर आकर बातचीत करते होंगे, या फिर अपनी कुर्सी पर बैठे सोफे पर बैठे लोगों से बात करते होंगे। पंडित नेहरू की कुर्सी के बाएं हाथ एक और मेज लगी थी। शायद इस मेज का इस्तेमाल पानी रखने के लिए किया जाता होगा।

नेहरू जी की मृत्यु के बाद, इस घर को एक राष्ट्रीय संग्रहालय में बदल दिया गया, जिसमें एक लाइब्रेरी और एक म्यूज़ियम शामिल है। तीन मूर्ति के अंदर, घर के बड़े लॉन में एक बड़े पत्थर पर “आखिरी भाषण” – ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ (आधी रात को आजादी) लिखा हुआ है।

नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी तीन मूर्ति भवन के ऊँची छतों वाले हॉल में स्थित है। 1966 में संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित, इसे “आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू के स्मारक” के रूप में बनाया गया था। लाइब्रेरी खुद को “औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक भारत के लिए शोध और संदर्भ केंद्र” बताती है। इसमें बड़े पैमाने पर अभिलेखागार भी हैं, जिनमें 19वीं और 20वीं सदी के भारतीयों के निजी कागजात और मौखिक इतिहास का बड़ा संग्रह है। राष्ट्रीय आंदोलन की घटनाओं को बहुत ही क्रमबद्ध तरीके से रखा गया है। कांग्रेस का गठन और गांधी का उदय, होमरूल, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन, अलग-अलग ब्रिटिश कमीशन, दो विश्व युद्ध, कॉन्फ्रेंस का दौर और आख़िरकार, बंटवारे के साये में आज़ादी – एक दस्तावेज जैसा रखा है जिसे कोई भी व्यक्ति उस घटनाक्रम को समझ सकता है।

अंदर घुसते ही युवा नेहरू की प्रदर्शनी दिखती है – कभी वे अपनी माँ की गोद में हैं, तो कभी पूरे ठाठ-बाट के साथ अपने पिता के बगल में खड़े हैं, कभी घोड़े पर सवार हैं, तो कभी कैम्ब्रिज से ग्रेजुएट हो रहे हैं या कश्मीर से पोस्टकार्ड भेज रहे हैं। युवा नेहरू की ज़िंदगी कांग्रेस के शुरुआती दौर से जुड़ जाती है, जिसमें नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच बंटवारा और एक दशक बाद उनका फिर से एक होना शामिल है। म्यूज़ियम में घूमते तस्वीरों, चिट्ठियों और अख़बार की कतरनों के ज़रिए दिखाए गए राष्ट्रीय आंदोलन के बीच-बीच में, इन कमरों में गुज़री ज़िंदगी की झलकियाँ भी मिलती हैं।
आज़ादी की लड़ाई की मुख्य कहानी कांग्रेस के उतार-चढ़ाव और अंग्रेज़ों के साथ बातचीत के इर्द-गिर्द घूमती है। सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज, नौसेना विद्रोह और लाल किले में चले मुकदमों का ज़िक्र बस ‘साइडलाइट्स’ या गौण घटनाओं के तौर पर ही मिलता है। यही वह कहानी है जो पीढ़ियों से छात्रों को पढ़ाई जाती रही है, जिसमें नेहरू और गांधी केंद्र में हैं और आज़ादी सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन से मिली है।
श्रीमती कमला नेहरू से रूबरू
अंतिम सांस लेने के कोई नब्बे साल छह महीने बाद श्रीमती कमला कौल नेहरू से रूबरू हुआ था। भारतवर्ष में आज़ादी से पूर्व और आज़ादी के बाद दो ही कमला नामक महिला चर्चित हुई। एक-श्रीमती कमला कॉल जो पंडित जवाहरलाल नेहरू की अर्धांगिनी थी। विवाहोपरांत नेहरू उपनाम के साथ वे कमला कौल नेहरू बनी। और दूसरी: 1980 के दशक में इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन संवाददाता श्री अश्विनी सरीन की ‘कमला’ (नाम बदल दिया गया था) जिसे वे भारत के एक राज्य से खरीदकर लाये थे यह दर्शाने की आज़ादी के 35-वर्ष बाद भी महिलाओं की खरीद-बिक्री जारी है। यह अलग बात है कि इस कार्य के लिए अश्विनी सरीन को दिल्ली के तिहाड़ कारावास भी जाना पड़ा था।

बहरहाल, पिछले दिनों जब पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार गया था तो हक्सर की हवेली भी गया था। वह हवेली कभी दो-मंजिला इमारत थी और उसी इमारत में कमला कौल रहती थी। यही उनका पारिवारिक घर था और उसी घर में जवाहरलाल नेहरू का विवाह हुआ था सुश्री कमला कॉल के साथ, साल 1916 था । आज़ादी के बहुत बाद तक यह स्थान बहुत बेहतर था और स्थानीय लोगों के अलावे, शहर के विद्वान, विदुषी इस स्थान को जवाहरलाल नेहरू का ससुराल के नाम से जानते थे। सीताराम बाजार की तंग गलियों में रहने वाले उस कालखंड की तीसरी-छठो पीढ़ी के लोग आज भी फक्र से कहते हैं कि इसी गली से सुश्री कमला का विवाह हुआ था देश के एक होनहार नौजवान के साथ। यह हवेली दो गलियों की नुक्कड़ पर होने के कारण, समयंतराल दोनों तरफ कोई 18 दुकानें बनी। दुकानदारों की तीसरी पीढ़ियां आज तक यहाँ से अपने अपरिवार का भरण पोषण करते आ रहे हैं।

पूर्व भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारी पवन के वर्मा द्वारा लिखित वॉल्ड सिटी में हवेलियों पर एक किताब – ‘मैन्शन एट डस्क: द हवेलिस ऑफ ओल्ड डेल्ही’ के अनुसार 1857 के विद्रोह के दौरान हवेली को बहुत नुकसान पहुंचा था। जंगे आज़ादी के दौरान इस हवेली को तत्कालीन ब्रिटिश सैनिकों ने इसमें तोड़फोड़ की थी। परिणाम यह हुआ कि यहां रहने वाले लोग यहाँ नहीं रह सकते थे। सन् सत्तावन के युद्ध के करीब तीन दशक बाद 1887 के आस-पास इसका पुनर्निर्माण कराया गया था। यह भी कहा जाता है कि हक्सर परिवार ने 1970 के दशक के मध्य में यह संपत्ति दिल्ली यार्न एसोसिएशन को बेच दी थी।
चूड़ीवालान और बाजार सीताराम का यह इलाका उन दिनों कश्मीर से आये लोगों के लिए विख्यात था। यहाँ कई सौ नहीं, बल्कि कई हज़ार कश्मीरी परिवार रहते थे। यह भी माना जाता है कि आज़ादी के बाद, कश्मीर के वासिंदे क्रमशः यहाँ से विस्थापित होकर दिल्ली के अन्य इलाकों के अलावे कश्मीर भी वापस हुए थे। हक्सर की हवेली एक भव्य संरचना हुआ करती थी जिसमें पारंपरिक शाहजहानाबादी हवेली की सभी विशेषताएं थी। कौल परिवार ने 1970 के दशक की शुरुआत या मध्य में हवेली बेच दी थी और नए मालिक ने इसका रखरखाव नहीं किया, जिसके कारण यह ढह गई। संपत्ति का एक हिस्सा 1980 के दशक में ढह गया और दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा 90 के दशक में ढह गया।

कमला कौल नेहरू का जन्म अगस्त के महीने में ही पहली तारीख को हुआ था। साल 1899 था। वे एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक भी थीं । भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान एक शांत लेकिन मजबूत ताकत बनकर उभरीं थीं।पारंपरिक परवरिश की बंदिशों के बावजूद, उन्होंने राष्ट्रवादी कामों का समर्थन करने और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने के लिए सभी बाधाओं को तोड़ा। 17 साल की उम्र में जवाहरलाल नेहरू से साथ विवाहोपरांत वे राजनीति के केंद्र में आ गईं। 1920 के दशक के असहयोग आंदोलन में अहम भूमिका निभाई और ‘सेवा मंदिर’ की कमान संभाली, जो महिलाओं के सशक्तिकरण और शिक्षा के लिए समर्पित एक संस्था थी। उसी दौरान अंग्रेज़ों ने नेहरू को जेल में डाल दिया, तो कमला ने निडर होकर जनसभाओं को संबोधित किया और विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, जिसमें उन्हें अक्सर गिरफ़्तारी और पुलिस की बर्बरता का सामना करना पड़ा।
यह भी कहा जाता है कि उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर काम किया और महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक भागीदारी की जोरदार वकालत की। उनकी शांत शक्ति और नैतिक दृढ़ता ने उन्हें उभरती महिला नेताओं के लिए एक रोल मॉडल बना दिया।बार-बार जेल जाने और सही इलाज न मिल पाने के कारण कमला नेहरू की सेहत खराब हो गई। आज जब श्रीमती कमला नेहरू की तस्वीर को उनके पति के शयन कक्ष में जहाँ वे अंतिम सांस लिए, रखा देख सोचने पर विवश हो गया कि नेहरू कितना प्यार करते थे अपनी पत्नी को। श्रीमती कमला नेहरू को टीबी हो गया था और 1936 में स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन में 37 साल की कम उम्र में 28 फरवरी को उनका निधन हो गया। उनकी मौत ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन और उनके पति व बेटी के जीवन में एक गहरा खालीपन छोड़ दिया।

तीन मूर्ति भवन की यात्रा
यह वृक्ष और यह भवन एक साथ वृद्ध हो रहा है [/caption]
कल का “फ्लैग स्टाफ हाउस’ और आज का तीन मूर्ति भवन ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल ने 1929-30 में नई दिल्ली की शाही राजधानी के हिस्से के तौर पर डिजाइन किया था और यह आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन नमूना है। आज का तीन मूर्ति मार्ग कल का रॉबर्ट्स रोड कहा जाता था। शुरू में यह ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ का घर था, लेकिन बाद में यह आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आधिकारिक घर बन गया। नेहरू यहाँ सोलह साल तक रहे और 1964 में अपने निधन तक । उनकी 75वीं जयंती पर, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस एस्टेट को ‘नेहरू मेमोरियल म्यूजियम’ के तौर पर देश को समर्पित किया।
आज के ही दिन (12 अगस्त) को कभी भारत नहीं आने वाले सिरिल रैडक्लिफ की अध्यक्षता में बनी बाउंड्री कमीशन, जिसे रेडक्लिफ लाइन के रूप में जाना जाता है – पंजाब और बंगाल की सीमा रेखा – को सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना को आधिकारिक तौर पर बताया गया था। साल १९४७ था। उन दिनों सिरिल रैडक्लिफ 1, रायसीना रोड, जहाँ आज प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया है, रहते थे।
अपवाद छोड़कर परिसर में प्रवेश के साथ कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिखा। जो पेड़-पौधे छोटे थे, अब बड़े दिखे। लेकिन दो ऐसे वृक्ष दिखे जो उस समय अपने युवास्था में था जब पंदिर नेहरू इस परिसर में देश का प्रथम प्रधानमंत्री बनकर आये थे। इन अस्सी वर्ष में नेहरू के प्रति अनेकों आरोप-प्रत्यारोप होने के बाद भी उनके व्यक्तित्व पर आंच नहीं आने देने के लिए भवन की सुरक्षा और सुंदरता बरकरार रखने के लिए खड़ा है। यह दोनों वृक्ष जंगे आज़ादी भी देखा, स्वतंत्र भारत का स्वागत भी किया और आज़ादी के बाद तत्कालीन भारतीय नेताओं को छांव भी दिया है। इस बृक्ष और भवन के बीच जिस मैदान को आप देख रहे हैं इस मैदान में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू मैदान के एक हिस्से को खेत में परिवर्तित कर राष्ट्र के लोगों को आह्वान किया था “अधिक अन्न उपजायें ” और मैदान के आधे हिस्से में गेंहू की खेती किये । फसल होने के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी फसल को काफी थी।
बहरहाल, नई दिल्ली के ऐतिहासिक सत्ता के गलियारों के बीच यह एक ऐसा म्यूज़ियम है जो दुनिया में अपनी तरह का अकेला है। यह एक ऐसा संस्थान है जो भारत की कहानी को सिर्फ़ तारीखों या समय-सीमाओं के जरिए नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद देश को आगे ले जाने वाले नेताओं के जीवन, उनके नेतृत्व और उनकी विरासत के ज़रिए बताता है। यह म्यूज़ियम सिर्फ़ नेताओं के बारे में नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र-निर्माण, निरंतरता और नागरिकता के बारे में भी है। यह म्यूज़ियम आने वालों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाता है जो व्यक्तिगत पहल और सामूहिक प्रयास, दोनों को उजागर करती है—ये दोनों ही आज़ादी के बाद भारत की तरक्की की मुख्य ताकतें रही हैं।

यह इमारत, जिसका मुख राष्ट्रपति भवन (तब वायसराय हाउस) की दक्षिण दिशा की ओर है, पत्थर और स्टको से बनी है। इसमें विक्टोरियन और फ़्रेंच आर्किटेक्चर का संगम देखने को मिलता है। ‘फ्लैगस्टाफ हाउस’ का नाम जल्द ही बदलकर ‘तीन मूर्ति भवन’ कर दिया गया था । यह नाम ब्रिटिश मूर्तिकार लियोनार्ड जेनिंग्स द्वारा बनाई गई तीन मूर्तियों के कारण रखा गया था। ये मूर्तियाँ जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर लांसर्स की याद में बनाई गई थीं, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सीरिया, फिलिस्तीन और सिनाई के युद्ध-क्षेत्रों में बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी। ये मूर्तियाँ भवन के मुख्य गेट के सामने बने गोल चक्कर पर लगी हुई हैं।
9 अगस्त, 1968 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फैसला किया कि इस इमारत में भारत के अगले प्रधानमंत्री रहेंगे। हालाँकि, ऐसा नहीं हुआ और सभी संबंधित अधिकारियों ने सहमति जताई कि इसके बजाय तीन मूर्ति हाउस को नेहरू के स्मारक में बदल दिया जाए । स्मारक संग्रहालय के अलावा, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी, जो 1966 में शुरू हुई थी, का औपचारिक उद्घाटन 1974 में किया गया। शुरुआत में यह मुख्य इमारत से ही चलती थी, जब तक कि बाद में इसके लिए एक अलग इमारत नहीं बनाई गई।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर डेरेक एल. इलियट ने लिखा कि: “तीन मूर्ति एक ऐसी जगह है जो भारतीय इतिहास में रची-बसी है और यहाँ का बौद्धिक माहौल दिल्ली के किसी भी अन्य बड़े आर्काइव (अभिलेखागार) से कहीं बेहतर है। बिना किसी का पक्ष लिए यह ज़रूर कहा जा सकता है कि यह इमारत सिर्फ़ इतिहास का प्रतीक नहीं है – बल्कि यह खुद इतिहास है।” यह परिसर 30 एकड़ भूखंड में फैला है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में बने नए प्रधानमंत्री म्यूजियम में पर अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों का, जिन्होंने 15 अगस्त को ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्र को सम्बोधित किये, के भाषण को सुन सकते हैं – विज्ञान का चमत्कार
इस इमारत का नाम पास ही बने एक स्मारक के नाम पर पड़ा है, जिसमें तीन मूर्तियाँ हैं। 23 सितंबर 1918 को, 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड — जिसमें मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के घुड़सवार सैनिक और भावनगर, कश्मीर और काठियावाड़ की टुकड़ियाँ शामिल थीं — ने हाइफ़ा के किलेबंद बंदरगाह शहर पर हमला किया। उन्होंने हाइफ़ा पर कब्ज़ा कर लिया और मित्र देशों के लिए एक अहम रास्ता खोल दिया। हाइफ़ा को आज़ाद कराने के दौरान इन तीन रियासतों के कुल 44 सैनिक शहीद हुए। असल में, भारतीय सेना 23 सितंबर को ‘हाइफ़ा दिवस’ के तौर पर मनाती है।1914-18 के महान युद्ध के दौरान दस लाख से ज़्यादा भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में सेवा की। इनमें से लगभग 62,000 सैनिक मारे गए और 67,000 अन्य दुनिया भर में युद्ध के अलग-अलग मोर्चों पर घायल हुए। इन्हीं जगहों में से एक था इज़राइल का सबसे बड़ा बंदरगाह, हाइफ़ा।
तीन मूर्ति भवन के बगल में एक ट्रैफिक गोलचक्कर पर एक ओबिलिस्क (स्तंभ) बना है, जो हाइफ़ा की घेराबंदी में शहीद हुए सैनिकों को समर्पित है। यह स्मारक 1924 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने की 10वीं बरसी पर बनाया गया था और इसका उद्घाटन भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने किया था। काँसे की ये मूर्तियाँ मशहूर ब्रिटिश मूर्तिकार लियोनार्ड जेनिंग्स ने बनाई थीं। तीनों तरफ कांस्य की एक-एक पट्टिका भी लगी है, जिस पर लिखा है – ‘देयर नेम लिवेथ फॉर एवरमोर’ (उनके नाम हमेशा जीवित रहेंगे)। इस लेख के ऊपर घुड़सवार रेजिमेंटों – मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद लांसर्स – के नाम और लोगो बने हैं। पट्टिकाओं के ऊपर, ओबेलिस्क के किनारों पर उन सैनिकों के नाम खुदे हुए हैं जो शहीद हुए या लापता हो गए थे।त्रिकोणीय स्मारक के आधार पर भी तीन लेख लिखे हैं – दो में इस घटना का विवरण अंग्रेजी और उर्दू में है, और तीसरे में उन आस-पास की जगहों के नाम हैं जहां इन सैनिकों ने लड़ाई लड़ी थी। इनमें स्वेज नहर, गाजा, यरूशलेम, जॉर्डन घाटी, हाइफ़ा, दमिश्क और अलेप्पो शामिल हैं।
1966 में, इस संस्थान को ‘नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी’ के तौर पर औपचारिक रूप दिया गया। यह आधुनिक और समकालीन भारत पर एडवांस्ड रिसर्च को बढ़ावा देने वाली एक सोसाइटी थी। दशकों के दौरान, यह आर्काइव्स, ओरल हिस्ट्री और विद्वानों की रिसर्च के लिए देश के प्रमुख केंद्रों में से एक बन गया। खैर।
15 अगस्त 2023 को इसका नाम बदलकर ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय सोसाइटी’ कर दिया गया। यह बदला हुआ नाम इसके व्यापक दायरे को दिखाता है, जिसमें भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का सम्मान किया जाता है। ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय’ देश के प्रधानमंत्रियों के जीवन, संघर्षों और योगदान के ज़रिए आधुनिक भारतीय इतिहास को बताने की एक अनोखी कोशिश है। नेतृत्व का सम्मान करने के विज़न के तौर पर शुरू हुई यह पहल अब एक जीवंत राष्ट्रीय संस्थान बन गई है। यह संस्थान आर्काइव्स, मल्टीमीडिया और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी को जोड़कर भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का एक जीवंत इतिहास तैयार करता है।
प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय में लाइब्रेरी, आर्काइव्स, ओरल हिस्ट्री डिवीज़न, रिसर्च और पब्लिकेशन सेक्शन, रिप्रोग्राफी सेक्शन, प्रधानमंत्री संग्रहालय और तारामंडल (प्लेनेटेरियम) के साथ-साथ एडमिनिस्ट्रेशन और फाइनेंस ब्लॉक भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री संग्रहालय में, ‘ओल्ड ब्लॉक’ (ब्लॉक I) नेहरू के मूल संग्रहालय के नए रूप में तैयार किए गए स्वरूप को बनाए रखता है, जबकि नई इमारत (ब्लॉक II) इस कहानी को आगे बढ़ाते हुए सभी प्रधानमंत्रियों को शामिल करती है। इस तरह, यह जगह एक प्रतीकात्मक निरंतरता को दर्शाती है: आज़ादी के बाद के नेतृत्व का जन्मस्थान अब उसी नेतृत्व की विरासत का संरक्षक भी है।
भारत के लोकतांत्रिक विकास और नेतृत्व की विरासत को याद करने के लिए, भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल 2022 को प्रधानमंत्री संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसका मकसद यह दिखाना है कि कैसे अलग-अलग प्रधानमंत्रियों ने निष्पक्ष और समावेशी तरीके से भारत की प्रगति का मार्गदर्शन किया है। यह संग्रहालय सिर्फ़ हस्तियों को श्रद्धांजलि देने के बजाय, प्रधानमंत्रियों को राष्ट्रीय बदलाव लाने वाले लोगों के तौर पर पेश करता है। यह राजनीतिक फैसलों, नीतिगत विकल्पों और सामाजिक-आर्थिक उपलब्धियों को एक बड़ी लोकतांत्रिक गाथा के हिस्से के रूप में दिखाता है। हर नेता की गैलरी में इन बातों पर गौर किया जाता है: • शुरुआती जीवन और उन पर पड़े प्रभाव • राजनीतिक सफर और जनसेवा • अहम फैसले और देश को आकार देने वाले पल • समाज, अर्थव्यवस्था और विदेश संबंधों पर व्यापक असर इस नज़रिए से, आने वाले लोग न सिर्फ़ व्यक्तिगत उपलब्धियों को देखते हैं, बल्कि समय के साथ भारत के शासन में निरंतरता, अंतर और जटिलताओं को भी समझते हैं।
मैं आभारी हूँ श्री अनुराग अरोड़ा, प्रशासनिक प्रबंधक और सुश्री आस्था राजवळ, शोधार्थी, प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय लाइब्रेरी का।

















