शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन ……​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है

शाहरुख़ खान के वालिद मीर ताज मोहम्मद और वालिदा लतीफ़ फातिमा के ​कब्र

बहादुरशाह ज़फर मार्ग, नई दिल्ली : मैं नहीं जानता हूँ कि बॉलीवुड के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान से मैं कभी रूबरू हो पाउँगा या नहीं। मैं नहीं जानता हूँ कि वे मुझे मिलने को बुलाएँगे या नहीं। मैं यह भी नहीं जानता हूँ कि जंगे आज़ादी में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों और क्रांतिकारियों के वंशजों की खोज से सम्बंधित मेरे प्रयास की बातों को वे सुनेंगे या नहीं। लेकिन आज शाहरुख़ खान की वालिदा मोहतरमा लतीफ़ फातिमा और उनके वालिद मोहतरम मीर ताज मोहम्मद जी सुबह सवेरे रूबरू होने के लिए ‘फरमान’ जारी कर दिए। आज सुबह तक ऐसी कोई बात नहीं थी कि मैं उनके कब्रों पर आऊंगा। 

लेकिन समय कुछ और चाहता था तभी तो उनके वालिद और वालिदा के इंतकाल के क्रमशः 46-वर्ष और 35-वर्ष बाद मैं उनके कब्रों पर जीते-जी आपकी उपस्थिति दर्ज किया ‘भींगी आंखों’ के साथ। थरथराते होठों से अपनी बातें कही। अश्रुपूरित भी हुआ। मेरी बातों को उस कब्रिस्तान में चीर निद्रा में सोये, उनके आसपास आराम फरमाते सैकड़ों, हज़ारों रूहें भी मेरी बात सुन रहे थे। फिर मन हल्का कर दिल्ली के इस सौ साल से अधिक पुराने कब्रिस्तान में, जहाँ लाखों लोग, महिला, पुरुष, बच्चे, जो मुद्दत से चीर निद्रा में सोये हैं, उनसे मिला, अपनी बातों को बताया, उनसे दुआएं भी माँगा और फिर मन हल्का कर दिल्ली स्थित कब्रिस्तानों पर कहानी करने में जुट गया क्योंकि विगत कुछ वर्षों से दिल्ली सल्तनत में कब्रिस्तानों पर भी राजनीति हो रही है। 

अभी सुबह के कोई साढ़े दस बजे हैं और मैं शाहरुख़ खान के वालिद मीर ताज मोहम्मद और वालिदा लतीफ़ फातिमा के कब्रों के पास हूँ। जिस दिन मोहतरमा लतीफ़ फातिमा जी का इंतकाल हुआ था, उस समय कलकत्ता से प्रकाशित आनंद बाजार पत्रिका समूह के ‘संडे’ पत्रिका में संवाददाता था। उसके अगले साल बहादुरशाह ज़फर मार्ग पर स्थित दी इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में संवाददाता बनकर आया था। फातिमा जी का इंतकाल 15 अप्रैल, 1991 को हुआ था जबकि शाहरुख़ खान के वालिद का इंतकाल 19 सितम्बर, 1980 को हुआ था। आज इन दोनों के कब्रों के अलावे, लगभग 110+ वर्ष पुराने इस कब्रिस्तान में लाखों लोग सोये हैं अमन और शांति से। 

जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम इंडियन एक्सप्रेस ही नहीं, लन्दन के तर्ज पर कभी ‘फ्लीट रोड’ कहा जाने वाला बहादुरशाह ज़फर मार्ग के पीछे और आईटीओ की दिशा से लालकिले की ओर जाने वाली सड़क (रिंग रोड) के बाएं हाथ स्थित है। इसे दिल्ली गेट कब्रिस्तान के नाम से भी जाना जाता है। 1950 के दशक तक यह सड़क सुनसान थी और यहाँ कीकर और बबूल के पेड़ उगे हुए थे। आज भी उस परिवेश का नजारा देखा जा सकता है। उसी कालखंड में इस इलाके में कई अखबारों के दफ़्तर खुले। सबसे पहले 1953 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपना दफ़्तर खोला, जिसके बाद ‘पैट्रियट’, ‘नेशनल हेराल्ड’, ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘उर्दू मिलाप’ और कई दूसरे अख़बारों के दफ़्तर भी यहाँ खुल गए। आज भी दिल्ली गेट की दिशा से आईटीओ की ओर जाने वाला बहादुरशाह ज़फर मार्ग के बाएं हाथ निचली सड़क, जहाँ अख़बारों का दफ्तर है, के पीछे सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों कीकर और बबूल के बड़े-बड़े बृक्ष खड़े हैं। 

जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम – दिल्ली के सबसे पुराने और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम कब्रिस्तानों में से एक है। यह कब्रिस्तान शाहजहानाबाद, यानी पुरानी दिल्ली के चारदीवारी के ठीक बाहर है। वैसे इस कब्रिस्तान की शुरुआत मुगल काल में हुई थी, लेकिन इसकी जड़ें तुगलक वंश तक जाती हैं। पारंपरिक रूप से, इस्लामी दफ़न शहर की दीवारों के बाहर होते थे, और यह जगह धीरे-धीरे पुरानी दिल्ली के निवासियों के लिए एक मुख्य दफ़नगाह बन गई। मीर ताज मोहम्मद और लतीफ़ फातिमा के कब्रों के पास खड़े होकर जितनी दूर तक निगाह पहुँच रही थी, लाखों लोगों का अंतिम विश्राम स्थल दिख रहा था। शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा का कब्र देखकर ऐसा लगा जैसे यह कल ही यहाँ आराम फरमाने आयी हों। यहाँ मुशीर झिंझियानवी जैसे जाने-माने कवि, यूनुस जाफ़री जैसे विद्वान, और कल्लू निहारीवाले जैसे मशहूर स्थानीय लोग शामिल हैं । 

बहरहाल, शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा के फरमान का अमल करते आज सुबह-सवेरे जब दिल्ली गेट पर आया, पैर जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम की ओर बढ़ने लगे। वैसे दिल्ली गेट आज भी अपने अंदर अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हैं, लेकिन हम कब्रिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं, पता नहीं क्यों ? कहते हैं समय आपको वहां जरूर लेकर जायेगा, जहाँ समय ने आपने किये लिखा है। नब्बे के कालखंड में जब इंडियन एक्सप्रेस में संवाददाता था, चाहे-अनचाहे इस कब्रिस्तान में आया करते थे। 

अब तक कल का लाल दरवाजा, जो बाद में खुनी दरवाजा के रूप में कलंकित हुआ, के पास पहुंचा था जहाँ दाहिने हाथ मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज का प्रवेश द्वार बना है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान, या यूँ कहें कि आज़ाद भारत के पहले पांच – छह साल तक यहाँ दिल्ली की पुरानी सेंट्रल जेल हुआ करती थी। मुग़ल कल में यह स्थान सरायों के लिए विख्यात था। इससे दस कदम पर ही लाल किले में प्रवेश के लिए दिल्ली गेट था, आज भी है। अंग्रेजों के कालखंड में वह सराय जेल में बदल गया था जिसे भारतीय क्रांतिकारियों और आपराधिक कैदियों को रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यहीं 1912 में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की हत्या की कोशिश के षड्यंत्रकारियों के साथ-साथ, दिल्ली असेम्बली बम कांड के षड्यंत्रकारी, खासकर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को रखा गया था। बहादुर शाह के बेटों और एक पोते को इसी लाल दरवाजा पर ब्रिटिश मेजर हडसन ने गोली मार दी थी। आज यह सड़क लुटियंस दिल्ली और पुरानी दिल्ली के बीच एक कड़ी का काम करती है।

आजादी के बाद के भारत में, दिल्ली में लड़कियों के लिए लेडी हार्डिंग कॉलेज के अलावा कोई मेडिकल कॉलेज नहीं था। भारत में जिन जगहों पर पहले से मेडिकल कॉलेज मौजूद थे, वे थीं बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास और अमृतसर वगैरह। उस समय दिल्ली की आबादी 20 लाख थी, और एक मेडिकल कॉलेज की ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी। 1936 में, इरविन अस्पताल के पहले मेडिकल सुपरिटेंडेंट, लेफ्टिनेंट कर्नल क्रूइकशैंक ने दिल्ली के लिए एक अलग मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में सोचा। एक योजना बनाई गई और पेश की गई कि इरविन अस्पताल के ठीक सामने, मौजूदा रामलीला मैदान के पास एक मेडिकल कॉलेज बनाया जाए। बदकिस्मती से, 1939 में दूसरे विश्व युद्ध की वजह से यह योजना रद्द कर दी गई।1939 से 1947 तक इरविन अस्पताल दिल्ली में इलाज के लिए सबसे सम्मानित जगह थी। यह दौर राजनीतिक रूप से भारत के लिए बहुत अनिश्चितता भरा था। विश्व युद्ध की वजह से ब्रिटिश सरकार पर पैसों की भारी तंगी थी और भारत की आज़ादी भी नज़दीक ही थी, इसलिए किसी ने दिल्ली में मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में नहीं सोचा। 

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आज़ाद भारत में 1947 से 1955 के बीच ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता जिससे पता चले कि किसी ने नया मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में सोचा हो। लेकिन दस्तावेज यह कहता है कि डॉ. पी. डिश ने दिल्ली में मेडिकल कॉलेज की कमी की समस्या के बारे में चीफ कमिश्नर ए. डी. पंडित को बताया और उन्होंने डॉ. डिश को सलाह दी कि वे तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत से इस बारे में बात करें। संयोग से, डॉ. डिश नेहरू जी के निजी डॉक्टर भी थे। यह कहा जाता है कि उस समय नेहरू जी इसके लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि आर्थिक हालात ठीक नहीं थे। उसी समय, उनके कुछ साथियों ने दिल्ली की ठेठ बोली में कहा: “पंडितजी, करेला में भी तीन मेडिकल कॉलेज हैं।” पंडितजी ने चिल्ला कर जवाब दिया, “केरल, मेरे प्यारे दोस्त, करेला नहीं; करेला तो एक सब्जी है।”

पंडितजी का मूड ठीक करने के लिए, डॉ. पी. सी. ढांडा ने बड़ी होशियारी से बात का रुख मोड़ दिया और एक सुझाव दिया कि अगर कोई मेडिकल कॉलेज मंजूर होता है, तो उसे उनके जाने-माने साथी मौलाना आज़ाद के नाम पर रखना सबसे सही श्रद्धांजलि होगी, जो उनके बहुत करीब थे। इसी बीच, भारत सरकार को भी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की ज़रूरत महसूस हुई, जिसमें मेडिकल कॉलेजों और मेडिकल शिक्षा की ज़रूरतें भी शामिल थीं। भारत सरकार ने दूसरी पंचवर्षीय योजना में—जिसे 2 मई 1956 को पास किया गया था, देश के स्वास्थ्य स्तर को बेहतर बनाने के लिए कई लक्ष्य रखे। 

इस जेल का ज़िक्र कई ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है, जिनमें सैयद अहमद खान की ‘आसार-उस-सनादीद’ और ‘द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़’ में छपी 1858 की एक नक्काशी शामिल है। आज मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज प्रागण में पुरानी जेल के सम्मानार्थ एक स्थान सुरक्षित है, जहाँ उन दिनों दर्जनों क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाया गया था। साल 1958 में केंद्रीय कारावास तिहाड़ के बनने के बाद दिल्ली की जेल यानी तिहाड़ जेल बन गयी और दिल्ली की पुरानी जेल इतिहास के पन्नों में दफ़न हो गया। बहरहाल, दिल्ली गेट की दिशा से इंडियन एक्सप्रेस भवन के पहले पूरब की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ा। यह इस नुक्कड़ से कब्रिस्तान की दूरी सौ कदम से अधिक नहीं है। मुज्जे विश्वास है कि आज इस सड़क पर स्थित कार्यालयों में काम करने वाले लोग इस कब्रिस्तान के बारे में शायद जानते भी होंगे। वे तो यह भी नहीं जानते होंगे कि इसी कब्रिस्तान में शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा के अलावे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के नेता सैय्यद शहाबुद्दीन भी आराम फार्मा रहे हैं। खैर। 

जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम में समुदाय की गहरी भावना झलकती है। यहाँ कई कब्रों पर ऐसे पत्थर लगे हैं जिन पर न सिर्फ़ मरने वाले का नाम लिखा है, बल्कि पुरानी दिल्ली की उन तंग गलियों का भी ज़िक्र होता है जहाँ वे कभी रहते थे। शहरीकरण के दबाव और जगह की कमी के बावजूद, इस कब्रिस्तान का रखरखाव बहुत अच्छी तरह से किया जाता है। इसमें कुछ खास हिस्से भी हैं, जैसे कि मृत पैदा हुए शिशुओं के लिए एक अलग जगह।  इतना ही नहीं, कोविड-19 में मृत्यु को प्राप्त किये लोगों को इस कब्रिस्तान में एक अलग हिस्सा दिया है। अनेकानेक चुनौतियों के बाद भी यह दिल्ली के मुस्लिम समुदाय के लिए एक शक्तिशाली सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतीक बना हुआ है, जो तेज़ी से बदलते शहरी परिवेश में परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। इस जगह पर जाने से पुरानी दिल्ली के बहु-स्तरीय इतिहास की एक अनोखी झलक मिलती है, जहाँ हर कब्र शहर के दिल में बिताए गए जीवन की एक कहानी बयाँ करती है।

कुछ वर्ष पहले दिल्ली में कब्रिस्तानों की समस्याओं और स्थिति का अध्ययन करने का विचार दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार द्वारा सामने रखा गया था। कहते हैं कि यह पहल शहर में मुस्लिम आबादी में हो रही वृद्धि और कब्रिस्तानों के लिए जगह की कमी को लेकर मुस्लिम समुदाय की बढ़ती चिंताओं को ध्यान में रखते हुए किया गया था । अख़बारों में, टीवी पर पर, पत्रिकाओं में इस बात को बारम्बार लिखा जा रहा था, कहा जा रहा था कि दिल्ली में  कब्रिस्तानों के लिए जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके कई कारण भी बताए गए। मसलन, कब्रिस्तान की ज़मीन पर अतिक्रमण, शहरीकरण, नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन का आवंटन न होना, मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े कब्रिस्तानों की भारी मांग, और कंक्रीट की कब्रों का निर्माण। 

तत्कालीन शोधों में, जो बाद में प्रतिवेदन का रूप लिया, यह कहा गया कि  दिल्ली वक्फ बोर्ड और अन्य एजेंसियों के साथ पंजीकृत अधिकांश मुस्लिम कब्रिस्तान, पिछले कुछ वर्षों में व्यावहारिक रूप से विलुप्त हो चुके हैं। सार्वजनिक और सरकारी, दोनों ही प्रकार की एजेंसियों ने कब्रिस्तानों पर या तो कब्जा कर लिया है अथवा उन पर अतिक्रमण कर लिया है। वहीं दूसरी ओर, नगर-नियोजन योजनाओं में नए कब्रिस्तानों के लिए नई भूमि भी आवंटित नहीं की गयी। परिणाम यह हुआ की प्रतिवेदन में इस बात को उद्धृत किया गया कि मौजूदा (तत्कालीन) कब्रिस्तानों में शेष बची जगह, मुश्किल से अगले दो वर्षों के लिए ही हो सकती है। 

लेकिन जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम में कब्र खोदने वाले एक श्रमिक, जिसे कब्र खोदने के लिए 700/- रुपये मजदूरी मिलते हैं, कहता है कि “मैं कई वर्षों से यहाँ काम करता हूँ। इस कब्रिस्तान में लाखों लोग, बड़े, बच्चे, महिला, पुरुष आराम फार्मा रहे हैं। कई जन्म के साथ ही यहाँ आ गया तो कई जीवन के अंतिम दिनों में बीमारी के कारण यहाँ आये। कई गरीब थे तो कइ अमीर, कई जनाजों के पीछे गिनती के लोग थे तो कई जनाजों के पीछे समुदाय के काफी लोग थे। आज कल कब्रिस्तानों को भी राजनीति में घसीटा जा रहा है। सरकारी मुलाजिम और सरकार के साथ जुड़े लोग कागज पर यह दिखने लगे हैं की दिल्ली के कब्रिस्तानों में जगह की किल्लत है। यह कहना गुनाह है। इस कब्रिस्तान में पीछे सौ सैलून से लाखों लोग ,आराम फरमा रहे हैं। यकीन  कीजिये, आने वाले सौ सालों तक यहाँ लाखों लोग अगर आएंगे तो अल्लाह उन्हें भी दो गज जमीन मिबा किसी तकलीफ के दे देंगे।”  

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कब्रिस्तानों की प्रबंधन संरचनाएं कब्रिस्तानों की ज़मीन के मालिकाना हक की प्रकृति पर निर्भर करती हैं। जहां दिल्ली वक्फ बोर्ड, दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और समुदायों के मालिकाना हक वाले कब्रिस्तानों के लिए प्रबंधन समितियां मौजूद हैं; वहीं कुछ जगहों पर ऐसे कब्रिस्तान भी हैं जिनका मालिकाना हक परिवारों या समुदायों के पास है, और वहां किसी भी तरह की प्रबंधन समिति मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों में रखरखाव के लिए कर्मचारी/व्यक्ति बहुत कम जगहों पर ही उपलब्ध हैं, क्योंकि ज़्यादातर कब्रिस्तानों (कुल 131 में से 85 या 65%) में इस काम के लिए कोई भी मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही के स्तर को बेहतर बनाने की गुंजाइश है, खासकर उन कब्रिस्तानों में जो रखरखाव के लिए पैसे लेते हैं और खर्च करते हैं।

जिन कब्रिस्तानों में एक महीने में कम अंतिम संस्कार होते हैं (51 कब्रिस्तानों में 5 या उससे कम अंतिम संस्कार), उनकी संख्या उन कब्रिस्तानों से ज़्यादा है जहां ज्यादा अंतिम संस्कार होते हैं (9 कब्रिस्तानों में 30 से ज़्यादा अंतिम संस्कार)। कब्रिस्तान में दस्तावेजों की ज़रूरत बहुत कम होती है, क्योंकि कब्रिस्तानों में अंतिम संस्कार के समय केवल पहचान का सबूत मांगा जाता है। ज़्यादातर कब्रिस्तानों (75 या 57%) ने बताया कि उनके अधिकार क्षेत्र में होने वाली मौतों की संख्या के हिसाब से उनके पास जगह कम है। इतना ही नहीं, जहां ज़्यादातर कब्रिस्तान (73 या 56%) इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए लोगों से कोई पैसा नहीं लेते, वहीं जो कब्रिस्तान पैसे लेते हैं (42 या 32%), उनमें पैसे की रकम 201 रुपये से लेकर 2000 रुपये के बीच होती है। साथ ही, ज़्यादा क्षमता वाले कब्रिस्तानों (4 कब्रिस्तानों की क्षमता 5000 से ज़्यादा है) की संख्या, कम क्षमता वाले कब्रिस्तानों (25 कब्रिस्तानों की क्षमता 200 या उससे कम है) की तुलना में कम है।

दस्तावेजों के अनुसार, कहने के लिए तो दिल्ली में 704 मुस्लिम कब्रिस्तान हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से महज 131 कब्रिस्तान हैं जो मौजूद हैं।शहर के 11 ज़िलों में से, दक्षिण दिल्ली में सबसे ज़्यादा कब्रिस्तान (33 या 25%) है। इसके बाद उत्तर-पश्चिम दिल्ली (19), उत्तर दिल्ली (17), दक्षिण-पश्चिम दिल्ली (11), उत्तर-पूर्व दिल्ली (10), पश्चिम दिल्ली और पूर्वी दिल्ली (हर एक में 9), दक्षिण-पूर्वी दिल्ली (8), मध्य दिल्ली (6), शाहदरा (5), और नई दिल्ली (4)है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि 131 कब्रिस्तानों में से 16 अभी इस्तेमाल में नहीं हैं। इस्तेमाल न होने के कारणों में कब्रिस्तान की ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर कानूनी मामले, खराब बनावट जिसके कारण पानी भर जाता है या दूसरी समस्याएँ हैं, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ विवाद शामिल हैं।

दिल्ली में क़ब्रिस्तानों की समस्याओं और उनकी स्थिति का अध्ययन करते समय बहादुर शाह ज़फ़र का यह शेर याद आ जाता है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: “ज़फ़र कितना बदनसीब है कि उसे अपने प्यारे वतन में दफ़्न होने के लिए दो गज़ ज़मीन भी नसीब न हुई!” हालाँकि यह शेर उन्होंने अपने निर्वासन काल (रंगून, जिसे अब म्यांमार में यांगून कहा जाता है) के संदर्भ में कहा था, लेकिन दिल्ली के क़ब्रिस्तानों के अध्ययन के संदर्भ में भी यह पूरी तरह प्रासंगिक है।

भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, दिल्ली में मुस्लिम आबादी 20 लाख (दो मिलियन) से भी अधिक है। शहर में मुस्लिम आबादी में हो रही वृद्धि के साथ-साथ, क़ब्रिस्तानों के लिए जगह की कमी को लेकर समुदाय की चिंताएँ भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल के दिनों की समाचार रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि क़ब्रिस्तानों के लिए उपलब्ध जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे—क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर अतिक्रमण, शहरीकरण, नए क़ब्रिस्तानों के लिए ज़मीन का आवंटन न होना, मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े क़ब्रिस्तानों की भारी माँग, और कंक्रीट की क़ब्रें बनाने का चलन। 

कब्रिस्तानों की उम्र जहाँ 34% कब्रिस्तान 101 से 200 साल पुराने हैं, वहीं कुल कब्रिस्तानों में से 12% (या 16) 200 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। दूसरे शब्दों में, शहर के लगभग आधे कब्रिस्तान (46%) 100 साल से ज़्यादा पुराने हैं। 51 से 100 साल की श्रेणी में 24 कब्रिस्तान (18%) हैं, और 26 कब्रिस्तान (20%) 10 से 50 साल पुराने हैं। 10 साल से कम की श्रेणी में सिर्फ़ पांच कब्रिस्तान (4%) होने से, यह कहा जा सकता है कि शहर में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बावजूद, हाल के दिनों में बहुत कम कब्रिस्तान बनाए गए हैं।

इतना ही नहीं, क्षेत्रफल की दृष्टि से ज्यादातर कब्रिस्तान (68% या 89) आकार में छोटे हैं, जिनका क्षेत्रफल 10 बीघा या उससे कम है। इन 68% कब्रिस्तानों में से; 38% के पास एक से पाँच बीघा जमीन है, 22% के पास छह से 10 बीघा जमीन है और केवल 8% बहुत छोटे हैं जिनके पास एक बीघा से भी कम जमीन है। तुलनात्मक रूप से बड़े आकार के कब्रिस्तानों में, 14% के पास 11 से 20 बीघा जमीन है, 8% के पास 20 से 50 बीघा ज़मीन है और केवल 2% या तीन कब्रिस्तानों के पास 50 बीघा से ज़्यादा ज़मीन है। कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा कब्रिस्तान की ज़मीन पर कब्ज़ा एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण इसके मूल उद्देश्य के लिए उपलब्ध जगह लगातार कम होती जा रही है।

ऐसे सैकड़ों कब्रिस्तान हैं जो कागज़ों में तो मौजूद हैं, पर मुख्य रूप से कब्ज़े के कारण ज़मीनी स्तर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि DWB के पास 624 कब्रिस्तानों की सूची है, लेकिन उनमें से ज्यादातर आज ढूँढ़े नहीं जा सकते। दिल्ली के 131 कब्रिस्तानों में से, 43 (33%) कब्रिस्तानों की ज़मीन पर कब्ज़ा हो चुका है। जहाँ 30% कब्रिस्तानों में कब्ज़े वाले क्षेत्र का आकार एक से पाँच बीघा के बीच है, वहीं नौ कब्रिस्तानों (21%) में यह एक बीघा से भी कम है। इतना ही नहीं, बड़े आकार की जमीन पर कब्ज़े वाले कब्रिस्तानों की संख्या कम है: चार कब्रिस्तानों में 11 से 20 बीघा ज़मीन पर कब्ज़ा है; दो-दो कब्रिस्तानों में छह से 10 बीघा और 21 से 50 बीघा ज़मीन पर कब्ज़ा है; और केवल एक कब्रिस्तान में 50 बीघा से ज़्यादा ज़मीन पर कब्जे की सूचना मिली है।

दिल्ली गेट-रिंग रोड कब्रिस्तान के सचिव शमीम अहमद खान का कहना है कि “इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि जनसंख्या की वृद्धि के मद्दे नजर कब्रिस्तानों के पास जितनी जमीन होने किये, वह नहीं है। कई कब्रिस्तान क़ानूनी डाव-पेच में पड़े हैं। अगर सर्कार एयर व्यवस्था के लोग चाहे तो इस मसले को बहुत आसानी से सुलझाया जा सकता है। मथुरा रोड से भैरव मंदिर के रास्ते जब रिंग रोड पर पहुँचते हैं, वहां करीब 14 एकड़ जमीन जो कब्रिस्तान का था, उसे जोतकर मिलेनियम पार्क बना दिया गया है। जब लोग जन्म लेंगे तो उनकी मृत्यु तय है। वैसी स्थिति में उन्हें इज्जत के साथ दफ़नाने की जबावदेही तो सरकार की ही होनी चाहिए। वैसे दिल्ली गेट कब्रिस्तान दिल्ली के किसी भी कब्रिस्तान से सभी मामले में बेहतर है। यहाँ भी जमीन की किल्लत है। आम तौर पर हम एक कब्र पर उसी परिवार के लोग को न्यूनतम दस साल के बाद जगह देते हैं। हमारे कब्रिस्तान में कोरोना काल में तक़रीबन 1600 लोगों को दफनाया गया था। यहाँ जन्म के साथ मृत्यु को प्राप्त करने या छोटे-छोटे बच्चों के आराम के लिए अलग स्थान है।”

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शमीम अहमद खान का कहना है कि किसी भी कब्रिस्तान में, जहाँ समाज के बड़े-बड़े लोग, अमीर लोग आराम फार्मा रहे हैं, मेरा मानना है कि उनके परिवार के लोगों को कब्रिस्तानों में आकर देखना जरूर चाहिए कि आखिर जहाँ वे अपने लोगों को आराम से सुलाए थे, उनका कब्र कैसा है। कहना नहीं चाहिए, लेकिन दफ़नाने के बाद, शायद ही लोग कभी देखने आते हैं। वे कब्रिस्तानों को जीवंत बनाये रख सकते हैं, लेकिन ऐसा करते नहीं। जब उनसे पूछा कि शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद यहीं आराम फार्मा रहे हैं, क्या कभी वे आये हैं? खान साहब कहते है, ‘मुझसे मुलाकात नहीं हुई है।’

कब्रिस्तान की ज़मीनों पर ज्यादातर (24 या 56%) समुदाय के लोगों/संगठनों ने कब्ज़ा कर लिया है। सरकार, 10 कब्रिस्तानों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करने वाली के तौर पर, कब्जा करने वालों की सूची में दूसरे स्थान पर है। एक समाचार रिपोर्ट में दर्ज DWB के एक RTI जवाब के अनुसार, शहर में कब्रिस्तानों की संख्या में कमी ज्यादातर जनता और सरकारी एजेंसियों द्वारा किए गए कब्जे के कारण है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने दिल्ली में 11 कब्रिस्तानों पर कब्ज़ा कर लिया है। लोगों के साथ बातचीत और समाचार रिपोर्टों से पता चला कि मथुरा रोड पर दिल्ली पब्लिक स्कूल, रिंग रोड पर इंद्रप्रस्थ पार्क और लोधी रोड पर CGO कॉम्प्लेक्स कब्रिस्तान की ज़मीन पर बनाए गए हैं। छह कब्रिस्तानों की ज़मीनों पर निजी व्यक्तियों ने कब्ज़ा कर लिया है।

कुल कब्रिस्तानों में से 46 कब्रिस्तान बसी हुई कॉलोनियों में स्थित हैं। हालांकि 15% उत्तरदाताओं ने कब्रिस्तानों को अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने का समर्थन किया, लेकिन सभी 46 कब्रिस्तानों को अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की गुंजाइश है, क्योंकि वे आवासीय क्षेत्रों में स्थित हैं। किसी धार्मिक स्थल के बहुत करीब या उसके भीतर स्थित कब्रिस्तान, कई मुसलमानों के लिए अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार करने के लिए एक पसंदीदा विकल्प होता है। मौजूदा 131 कब्रिस्तानों में से 17 (13%) मस्जिदों के बहुत करीब स्थित हैं, छह किसी पीर या मज़ार की कब्र के पास स्थित हैं, और पाँच ईदगाह की जमीन के भीतर संचालित हो रहे हैं। हालाँकि, 103 कब्रिस्तान (79%) ऐसे हैं जो किसी भी धार्मिक स्थल के बहुत करीब स्थित नहीं हैं। ये केवल कब्रिस्तान की ज़मीन हैं। कब्रिस्तान की जमीन के स्वामित्व के संबंध में, उनमें से अधिकांश (47%) का स्वामित्व DWB के पास है। इसके बाद 29 कब्रिस्तानों (22%) के मामले में जमीन का सामुदायिक स्वामित्व आता है, जिसका अर्थ है गाँव या ग्राम सभा या किसी विशिष्ट जाति समूह का स्वामित्व। जहाँ आठ कब्रिस्तानों के मामले में ज़मीन MCD की है और पाँच कब्रिस्तानों के मामले में DDA की, वहीं 11 कब्रिस्तान ऐसे हैं जो निजी व्यक्तियों की ज़मीन पर बने हैं।

कहते हैं कि जो इलाके किसी खास कब्रिस्तान पर निर्भर होते हैं, वे उसकी भौगोलिक पहुँच के साथ-साथ उस सुविधा पर लोगों की निर्भरता की सीमा को भी दर्शाते हैं। 72 कब्रिस्तानों (सबसे ज़्यादा संख्या) के मामले में, कब्रिस्तानों पर निर्भर सबसे दूर के इलाके दो से पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। जबकि 19 कब्रिस्तानों के मामले में सबसे दूर के इलाके कब्रिस्तान से छह से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, 17 कब्रिस्तानों के मामले में सबसे दूर के इलाके दो किलोमीटर से कम दूरी पर और तीन कब्रिस्तानों के मामले में 10 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी पर स्थित हैं। शहर के केवल 32 कब्रिस्तानों में ही नमाज़-ए-जनाज़ा के लिए जगह है और 33 में पानी के बोरवेल हैं। जहाँ 77 कब्रिस्तानों में चारदीवारी है और 31 में स्ट्रीट लाइटें हैं, वहीं केवल 30 में ही गार्ड तैनात हैं। जिन कब्रिस्तानों में चारदीवारी नहीं है, वे खुले मैदानों की तरह हैं।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि शहर में हर साल तकरीबन 13,000 मुस्लिमों का अंतिम संस्कार होता है लेकिन 2017 तक मौजूदा कब्रिस्तानों में 29,370 लोगों को ही दफनाने की जगह बची थी। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इसी हिसाब से दफनाने का सिलसिला जारी रहा तो तो आज से एक साल बाद तक कोई जगह नहीं बचेगी। ऐसे में इसके लिए अभी से जरूरी हल खोजने की जरूरत है। वैसे आधिकारिक रूप से दिल्ली में मुसलमानों की कितनी संख्या है यह तो आगामी जनगणना में आएगी, लेकिन जनगणना 2011 के आंकड़ों से प्राप्त 2026 के अनुमानों के आधार पर, दिल्ली में मुस्लिम आबादी लगभग 1.41 मिलियन के आस-पास है, जो कुल आबादी का लगभग 13% से 15% है। इतना ही नहीं, कब्रिस्तानों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। 

इस्तेमाल हो चुकी सभी ज़मीनों का दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है, क्योंकि हमारा धर्म तीन साल बाद कब्रिस्तानों को समतल करने की इजाज़त देता है। कुछ सालों के बाद एक ही परिवार के कई शवों के लिए एक ही कब्र का इस्तेमाल करते हैं। ईसाई कब्रिस्तानों पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आयोग को सिर्फ़ 13 चालू कब्रिस्तान मिले, जिनमें से एक — कश्मीरी गेट स्थित लोथियन कब्रिस्तान — बंद हो चुका है और उसे एक संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया है। कुल कब्रिस्तानों में से सिर्फ़ पाँच ही शहर के सभी ईसाइयों के लिए खुले हैं, जबकि पाँच कब्रिस्तान सिर्फ़ पारिवारिक कब्रों या एक ही कब्र में दो शव दफनाने (doubling) के लिए खुले हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से दो कब्रिस्तान — एक ओखला में और दूसरा महरौली में — क्रमशः सिर्फ़ पादरी परिवारों और ‘चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया’ के सदस्यों के लिए खुले हैं।

तस्वीरें: संजय शर्मा 

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