​यह हस्तिनापुर नहीं, मुजफ्फरपुर है जहाँ ​’धृतराष्ट्र’ भी हैं, ‘कौरव’ भी हैं ; कमी है तो अर्जुन और कृष्ण की

मुजफ्फरपुर में सुशासन और मीडिया दोनों के चेहरे पर बालिका संरक्षण गृह के कुकृत्‍यों ने कालिख पोत दी है।
मुजफ्फरपुर में सुशासन और मीडिया दोनों के चेहरे पर बालिका संरक्षण गृह के कुकृत्‍यों ने कालिख पोत दी है।

यह भारतवर्ष का हस्तिनापुर नहीं बिहार का मुजफ्फरपुर है। यहां कौरवों का शासन नहीं भाजपा और जदयू का सुशासन है। महिलाओं की बात तो छोड़िये, यहाँ बच्चियों तक को निर्वस्त्र करने के लिये न तो चौसर खेलने की जरूरत है और न ही उसे दांव पर लगाने की। बल्कि इस काम के लिये शासन की तरफ से दिया जाता है लाखों रुपये का टेंडर।

यहां के राजा धृतराष्ट्र नहीं हैं। वह देख सकते हैं। देखते हैं चुपचाप। या यूं कहें कि देखने के लिए विवश हैं नीचतम और निर्लज्जतम अपराध की चरम परिणति। वे अपनी ही लुंज पुंज और नपुंसक होती जा रही व्यवस्था की बेचारगी देखने के लिए विवश हैं। रोज रोज हो रहे नए नए खुलासे देखने के लिए विवश हैं।

विवश हैं देखने के लिये अपने ही मंत्री की बेहयाई। कठघरे में खड़े आरोपी पति के पक्ष में दिये जाने वाले; मंत्री के जातिगत और भड़काऊ भाषण का प्रसारण देखने के लिए वे विवश हैं। बच्चियों की आबरू की कीमत पर अपना वोट बैंक बचाने के लिये विवश हैं। धिक्कारती अंतर आत्मा की आवाज़ नहीं सुनने के लिये विवश हैं।

वे विवश हैं यह देखने के लिये कि उनके स्वनामधन्य सुशासन का खुफिया तंत्र कितना क्षत विक्षत हो चुका है जो अपराधियों के लिये मुखबिरी कर शासन को कुंभकर्णी निद्रा में सुलाने में व्यस्त है। वे यह भी देखने के लिये विवश हैं कि जिस कानून को वे “अपना काम करेगा” कहते नहीं अघाते वह कतई अपना काम नहीं कर रहा।

सुशासन से निर्लज्जता, बेशर्मी और महापाप का टेंडर हासिल कर, सुशासन का ही लाडला निर्ममता के चरम पर खड़े होकर वर्षों तक कानून का मखौल उड़ाता है; मज़ाक बनाता है, बच्चियों की आबरू और जिंदगी के साथ बेरहमी से खेलता है, खेलवाता है। और इस खेल में शामिल होते हैं बड़े बड़े लोग। पदाधिकारियों से लेकर नेताओं तक की लंबी फेहरिस्त। ऊपर से बेशर्मी का आलम यह कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी किसी की आत्मा किसी को नहीं धिक्कारती। संवेदनहीनता का आलम यह कि तुलना इस बात से की जाती है कि, किसके शासन में महिलाओं और बच्चियों के साथ अधिक हिंसा हुई, अधिक यौनाचार हुए।

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अस्मत लूटने का विरोध करने वाली बच्चियों को दवा देकर नींद में सुलाया जाता रहा तो इससे इन्कार करने वाली को मौत की नींद सुला कर वहीं दफना दिया जाता रहा।

हालांकि बच्चियों की तरह ही अपनी आबरू को बचाने की कोशिश और उल्टा तमाशा; सुशासन भी हमेशा करता रहा है। और यही है सुशासन का पतन। सूबे की मशीनरी का पतन। बच्चियों के घिनौने देह व्यापार के कारोबार के उद्भेदन के बाद भी चुप्पी ओढ़ तमाशा देखने वाले शीत रक्त युक्त हमारे समाज का पतन। और ऐसे मामले को पक्ष और विपक्ष में बांट कर बहस करने वाली राजनीति का पतन।

अब सी बी आई जांच के जाल में फंसे आरोपी खुश हैं। इतने दिनों से सूबे की पुलिस क्या कर क्या रही थी, सुशासन क्यों मौन था, इस पर चिंतन आप करें। हम आपको बस इतना याद दिला दें कि बुद्ध, महावीर, चंद्रगुप्त, अशोक और चाणक्य की इस धरती पर नगरवधू आम्रपाली भी हुई और कोशा भी। पूरे नगर की वधू होने के बावजूद नारी की इज्जत और उसका सम्मान ऐसा कि आज भी उसका नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। लेकिन आज…?

यही है सूबे की सोच का परिवर्तन और पतन। इतिहास तो उनका भी लिखा जाएगा जो मौन हैं ; सरकार की चापलूसी में। मीडिया की खामोशी और उसके महापाप का भी आकलन होगा।

​बहरहाल,​ मुजफ्फरपुर में सुशासन और मीडिया दोनों के चेहरे पर बालिका संरक्षण गृह के कुकृत्‍यों ने कालिख पोत दी है। और इस पुती कालिख को धो पाना शायद कभी संभव न हो।
हर बिहारवासी जाति, धर्म, लोभ, लालच और राजनीति से ऊपर उठकर बेसहारा बच्चियों को न्याय देने के लिये व्यवस्था को विवश कर दें; तो शायद नया इतिहास लिखा जा सके….!!

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