ना भैय्या !!! जीवन में फिर कभी दरभंगा नहीं आऊंगा : छाया पत्रकार रवि बत्रा

छाया पत्रकार रवि बत्रा

दरभंगा / नई दिल्ली : भारत सरकार में भारतीय रेल को देखने के लिए तीन मंत्री हैं – अश्विनी वैष्णव और उनके दो सहयोगी – रावणीत सिंह तथा वी. सोमन्ना। मुझे उम्मीद है इन तीनों मंत्रियों में आज तक कोई दिल्ली से बिहार के शहरों की ओर यात्रा नहीं किये होंगे। अपवाद स्वरूप अगर ‘राजनीति’ के लिए गए भी होंगे, तो रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर भारतीय रेल के चपरासी तक, सभी स्टेशनों पर नतमस्तक रहे होंगे। आखिर सबकी नौकरी का सवाल है। यात्रा के दौरान दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश का भूभाग आता है और फिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्य का चौहद्दी। उम्मीद है नीतीश कुमार भी शायद ही ट्रेन में सफर करते होंगे, खासकर भारत के मुख्यमंत्रियों की कार्यकाल की सूची में जबसे सबसे लम्बी अवधि के मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हुए।

विगत दिनों दिल्ली के एक प्रख्यात छाया पत्रकार और मेरे इंडियन एक्सप्रेस के पुराने सहकर्मी रवि बत्रा को बिहार चुनाव के मद्देनजर, बिहार में विकास के दावे के मद्देनजर, एक विदेशी असाइनमेंट के सिलसिले में ‘आम मतदाता’ के रूप में दिल्ली से दरभंगा सफर करना था। साथ ही, मिथिला क्षेत्र में विकास के मामले में दिल्ली के साथ-साथ बिहार विधानसभा में ‘बिना क्रिच टूटे वस्त्रों को धारण करने वाले सांसद से लेकर विधानसभा सदस्यों के वादे भी देखने थे – अपनी आखों से और फिर कैमरे से ।

भारतीय (मिथिला) मूल के एक विदेशी ने बत्रा साहब को यह कार्य सौंपा था और कहा था कि आप एक आम नागरिक बनकर, आम नागरिक वाले ट्रेन से दिल्ली से दरभंगा की यात्रा करेंगे, फिर शहर, खासकर दरभंगा लोक सभा क्षेत्र में आने वाले सभी छह विधानसभा क्षेत्रों का भ्रमण-सम्मेलन कैमरे की नजर से करेंगे, तस्वीरें खीचेंगे और तस्वीरों के आधार पर कहानियां लिखी जाएँगी। उनका कहना था कि ‘नेताओं की बोलती को तस्वीर ही बंद करेगी आगामी चुनाव में।’

दिल्ली में ट्रेन पर बैठने और फिर वापस दरभंगा से दिल्ली की ओर यात्रा करने के क्रम में बत्रा साहब लगातार फोन से जुड़े थे। दिल्ली में ट्रेन पर बैठने के साथ ही उन्होंने जो कहा वह कहानी में शब्दबद्ध होंगे; लेकिन दिल्ली से दरभंगा बिहार के लोग कैसे जाते हैं, यह गहन शोध का विषय है। यह विषय भारतीय रेल, भारत के रेल मंत्रालय, ऊंची ऊंची कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों के लिए ‘नकारात्मक टिपण्णी’ है। प्रदेश के मुख्यमंत्री, पूर्व रेलमंत्री होने के बाद भी, अपने प्रदेश में चलने वाली या प्रदेश से गुजरने वाली ट्रेनों की दशा को शायद कभी नहीं देखते होंगे। यकीन मानिए, 65-वर्ष की आयु में पहली बार दरभंगा आया हूँ, और शायद जीवन में फिर कभी नहीं आऊंगा।”

रवि बत्रा की बातों को सुनकर भारत रत्न शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान याद आ गए। आज से कोई सैंतालीस वर्ष पूर्व सन 1974 में भारत के शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान दरभंगा किले के अंदर अपनी साँसों को रोकते, शहनाई की धुन को कुछ पल ‘वाधित’ करते दरभंगा राज के तत्कालीन सभी ‘धनाढ्यों’ के सम्मुख, वहां उपस्थित मिथिलाञ्चल के तथाकथित ज्ञानी-महात्माओं के सम्मुख बिना किसी भय के कहते हैं: “मैं राजा बहादुर (विश्वेश्वर सिंह) की शादी में शहनाई बजाया, मैं युवराज (राजकुमार जीवेश्वर सिंह) के विवाह में शहनाई से नई बहु का स्वागत किया। आज उसी शहनाई के धुन से युवराज की सबसे बड़ी बेटी की मांग में उसके शौहर द्वारा सुंदर भरते समय सुखमय जीवन का आशीर्वाद देता हूँ। और आज से यह प्रण लेता हूँ कि आज के बाद कभी दरभंगा राज परिसर में, इस लाल किले के अंदर नहीं आऊंगा, कभी शहनाई नहीं बजाऊंगा।”

बिस्मिल्लाह खान ने कहा था: “आज महाराजाधिराज के लिए, राजा बहादुर के लिए मन व्याकुल हो रहा है। उनकी अनुपस्थिति खल रही है। आज उनके बिना रोने का मन कर रहा है। आज इस भूमि पर उन दो महारथियों की अनुपस्थिति ने संगीत की दुनिया को अस्तित्वहीन महसूस कर रहा हूँ। आज शहनाई का मंगल ध्वनि बिलख गया है। आज युवराज को देखकर दरभंगा राज का भविष्य देख रहा हूँ। इस लाल किले की दीवारों के ईंटों से सरस्वती जाती दिख रही हैं। इस दीवार का रंग और भी लाल होना इसका प्रारब्ध है। आज बड़ी महारानी को छोड़कर कोई भी बिस्मिल्लाह खान की शहनाई को देखने वाला, पूछने वाला, समझने वाला नहीं रहा …… और वे फ़ुफ़क फ़ुफ़क कर रोने लगे। उनकी साँसे जिस रफ़्तार से ”रीड” के रास्ते ”पोली” होते हुए ”शहनाई” तक पहुँच रही थी, और जिस प्रकार का धुन निकल रहा था, वह न केवल महाराजाधिराज, राजाबहादुर और युवराज के लिए समर्पण था, बल्कि जीवन में कभी फिर दरभंगा के उस लाल किले में पैर नहीं रखने का वादा भी था। मंगल ध्वनि बजाने वाला वह नायक अपने शब्दों पर जीवन पर्यन्त खड़ा उतरा – कभी पैर नहीं रखा।”

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आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम से बात करते रवि बत्रा कहते हैं : मुझे 22 जून को सुबह 5.15 पर ट्रेन पकड़नी थी दरभंगा के लिए। लेकिन रात को ही मैसेज आ गया कि गाड़ी शाम 6.15 पर चलेगी फिर दोबारा मैसेज आया कि और देरी हुई है। अब ट्रेन 6.15 के स्थान पर रात को 9.15 पर चलेगी। आनंद बिहार स्टेशन से उसका पहुंचने का समय 23 तारीख रात 80 बजे के करीब था। यहाँ से ट्रेन की यात्रा शुरू हुई। यह ट्रेन 24 जून सुबह 2.42 AM पर दरभंगा स्टेशन पहुंची। दुर्भाग्य से ट्रेन में पानी नहीं, शौचालय का बुरा हाल था। ऐसा लग रहा था कि पुरे प्रदेश का दुर्गन्ध उसी ट्रेन में आ गयी हो।”

बत्रा जी आगे कहते हैं: “इतना ही नहीं, उस ट्रेन में जो आधिकारिक एटेंडेंट चल रहे थे, वही चोरी भी कर रहे थे। चोरी के चार मामले हुए। यात्रा के दौरान ही एक यात्री के हैंड बैग और मोबाइल उठाने का प्रयास किया, लेकिन यात्रियों ने उसे दबोच डाला। उस ट्रेन में जब पुलिस आई और बाद में स्टाफ की कोशिश से सब सामान मिल गया। मैं जिस काम के लिए दरभंगा गया था, निपटा कर फिर 26 की वापसी पर टिकट थी और 12.05 बजे का समय था। लेकिन फिर पता चला कि ट्रेन सुबह 5 बजे आयेगी। दुर्भाग्य से ट्रेन दिन के 2.42 मिनट पर आई और आनंद बिहार पहुंची 28 जून रात 1.33 पर।”

​बत्रा कहते हैं कि “वापसी के समय उस ट्रेन के 13 स्टेशन भी कैंसिल किए ओर रूट भी बदला via बनारस or lucknow के रास्ते, मगर फिर भी 36 घंटे का रास्ता। न ही पीने के पानी की व्यवस्था ऊपर से टॉयलेट के बुरे हाल ओर टॉयलेट में भी पानी नहीं था ओर तो ओर उसके दरवाजों पर कुंडिया नहीं साथ ही सफाई के लिए शॉवर टूटे हुए थे, यह हाल था A/C coach का, गरीब रथ स्पेशल ट्रेन का यह हाल देख करके दुख लगा। यात्री मुफ्त में नहीं जाते, उचित पैसे देते हैं, लेकिन उचित सुविधा नहीं मिलती, परिवेश नहीं मिलता।”

गरीब रथ एक्सप्रेस ट्रेनों का उद्घाटन 2006 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने किया था। पहली गरीब रथ ट्रेन सेवा को बिहार के सहरसा से पंजाब के अमृतसर तक हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया था। इन ट्रेनों को उन यात्रियों को किफायती वातानुकूलित यात्रा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था जो नियमित एसी कोचों का अधिक किराया वहन नहीं कर सकते थे। भारत में वर्तमान में 26 जोड़ी गरीब रथ एक्सप्रेस ट्रेनें चल रही हैं। ये ट्रेनें नियमित एसी-3 टियर किराए से कम किराए पर पूरी तरह से वातानुकूलित यात्रा प्रदान करती हैं। इन्हें यात्रियों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए एसी यात्रा को अधिक किफायती बनाने के लिए शुरू किया गया था।

​बत्रा का कहना है कि “खाने और पीने के लिए पानी की बहुत दिक्कत, क्योंकि कोच में कैंटीन नहीं, ऑनलाइन ऑर्डर पर जब स्टेशन आएगा तभी मिलेगा ट्रेन का कोई समय नहीं, मैंने ऑर्डर किया डिनर का 8 बजे​ के स्थान पर आया रात 1.30 बजाए तो भूखे ही सो गए, अकेल होने से समान की भी निगरानी रखनी पड़ती हैं क्योंकि की चोरी का डर, सेशन से नीचे उतरो तो तब भी खतरा, ऑनलाइन खाना भी बासा ओर बेस्वाद होने खाया नहीं जाता, ​प्लेटफॉर्म पर ताजा चाय और बिस्कुट के अलावा कुछ मिलता नहीं, कोई लोकल बेचने आता भी हैं तो भरोसा नहीं पता नहीं कब और कैसा बना ​है।

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​बहरहाल, बिहार के चालीस लोक सभा सांसदों में दरभंगा संसदीय क्षेत्र के वर्तमान सांसद सम्मानित गोपाल जी ठाकुर की स्थिति यशपाल की अख़बार में नाम कहानी के आस-पास ही भ्रमण करती है। दरभंगा संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं, जिसमें विद्वान भी हैं, विदुषी भी, सब्जी वाला भी है, रेड़ी वाला भी, व्याख्याता भी हैं, पत्रकार भी, किसान भी हैं, जमींदार भी, निर्धन भी हैं, धनाढ्य भी, दो-टूक बोलने वाले भी हैं, चापलूस भी, बनिया भी हैं, दलाल भी, छात्र भी हैं, छात्राएं भी, स्मार्ट लोग भी हैं, स्मार्ट फोन धारक भी, सभी तबके के लोग सम्मिलित हैं। लेकिन सभी लोगों में एक बात ‘सामान्य’ है।

एक : सांसद महोदय को आम मतदाता नहीं जानता। आम मतदाताओं की समस्याओं से न तो अवगत हैं और ना ही अवगत होना चाहते हैं। दरभंगा राज के वंशजों की तरह चतुर्दिक चमचों और चापलूसों से घीरे हैं। संसदीय क्षेत्र में दीखते नहीं, परन्तु सोशल मीडिया पर, विशेषकर फेसबुक पर, 24x7x356 अवतरित रहते हैं। मतदाताओं से यहीं मिलन सम्मेलन होता है। समस्याएं भी उन्ही के लोग वहीँ लिखते हैं और समाधान भी वहीँ टिपण्णी पेटी में हो जाता है। एक बात और, शायद भयवश, सांसद साहेब स्थानीय पत्रकारों, विद्वानों, समाज सेवकों से रूबरू नहीं होते कहीं कोई गंभीर सवाल न पूछ ले।

दो: ‘अख़बार में नाम’ के लिए ये गुरुदास के बराबर हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि यशपाल का गुरदास कहीं ‘ट्रिंग ट्रिंग’ नहीं करता था, लेकिन दरभंगा के सांसद साहेब स्थानीय अख़बारों में सुबह-सवेरे अपना नाम, अपनी तस्वीर नहीं देखते तो सीधा अखबार के संपादक को ‘ट्रिंग-ट्रिंग’ कर देते हैं। किसी भी राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों से बात नहीं करते। स्थानीय पत्रकारों को क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति पर, मतदाताओं की आकांक्षाओं पर और सांसद द्वारा दुःख निवारण टीकाकरण पर किसी भी प्रकार की टीका-टिप्पणी करने की सख्त मनाही है। अगर कोई मुख खोले, तो कार्यालय मुख मोड़ लेता है ।

दरभंगा के एक विद्वान कहते हैं कि “मैं किसी सांसद को नहीं जानता हूँ। अख़बारों में नित्य नाम पढता हूँ, बस इतना ही। आज तक मिला नहीं हूँ। बिहार इन दी आईज ऑफ़ ट्रैवेलर्स एंड पेंटर्स 1780-1850, बायोग्राफी ऑफ़ डॉ राजेंद्र प्रसाद के अलावे पांच बेहतरीन किताबों के लेखक, तेजकर कहते हैं: ‘दरभंगा के सांसद को मुझ जैसा पढ़ा लिखा मनुष्य के अलावे समाज के दबे-कुचले, उपेक्षित लोग भी नहीं जानते। इसका वजह यह है कि आम तौर पर लोक सभा का सांसद आम चुनाब में जीत कर भले संसद जाते हों, अपने संसदीय क्षेत्र में कभी आम नहीं होता है। दरभंगा संसदीय चुनाव क्षेत्र से जीतकर कोई अगर संसद तक पहुँच रहे हैं तो यह सिर्फ सम्बद्ध पार्टी अथवा उस पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को ब्रांड होने के कारण। आज दरभंगा ही नहीं, बिहार के 40 संसदीय क्षेत्रों में शायद ही कोई क्षेत्र होगा जिसके उम्मीदवार अथवा विजय नेता की अपनी पहचान होगी। जनता ‘उन्हें’ चयनित की होगी। क्योंकि आज “ब्रांड की सेवा”, “ब्रांड का भजन” “ब्रांड की चापलूसी” ही मूल मंत्र हो गया है राजनीति में जीवित रहने के लिए। और सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार स्थिति को और भी जटिल बना दिया है।”

सन् 1990 ई.में पड़री भाजपा पंचायत अध्यक्ष से राजनीतिक सफ़र तय करते हुए सन् 1994 में दरभंगा जिला महामंत्री किसान मोर्चा का दायित्व निभाते हुए सन् 1996 में विरौल अनुमंडल संग़ठन प्रभारी बने। फ़िर बेनीपुर मंडल अध्यक्ष फिर सन 2003 ई.में काफी संघर्ष और कार्यकर्ताओं की माँग पर सर्वसम्मति से दरभंगा जिला अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए। साथ ही साथ पैक्स अध्यक्ष, समस्तीपुर रेलवे परामर्शदाता समिति सदस्य, ललित नारायण विश्वविद्यालय सीनेट सदस्य सहित कई सरकारी और सामाजिक पदों पर भी रहते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सन 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर जीत कर पहली बार विधायक बने और 2017 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष पद से नवाजा गया ।”

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दरभंगा के सांसद गोपालजी ठाकुर और यशपाल की कहानी ‘अख़बार में नाम’ के मुख्य पात्र गुरुदास में एक समानता और है। गुरुदास की हमेशा इक्षा होती थी कि वर्ग में शिक्षक उसका भी नाम लें, उसकी ओर भी दिखें। अब अगर भारत के संसद को ‘वर्ग’ माना जाय, गोपालजी ठाकुर को छात्र और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को शिक्षक – तो गोपालजी ठाकुर कोई अपनी जानकारी में कोई भी अवसर छोड़ते नहीं हैं जिससे वर्ग (संसद) में उनकी पूछ बनी रहे; शिक्षक (प्रधान मंत्री) उनके तरफ देखते रहें। गोपाल जी ठाकुर पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं। स्वाभाविक है दूसरी और तीसरी बार पहुँचने के लिए (पहले टिकट प्राप्ति हेतु) शिक्षक की नजर में ‘विश्वासपात्र’ बने रहना होगा – चाहे उनकी हरकत, क्रिया-कलापों से संसदीय क्षेत्र दरभंगा के मतदाताओं की जीवन रेखा में कोई सकारात्मक परिवर्तन हो अथवा नहीं।

मनोहर झा एक शिक्षक हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। कहते हैं: “माननीय सांसद महोदय एक प्रश्न लोक सभा में पूछे थे। वह यह था कि “दरभंगा, उतर बिहार व मिथिला का केंद्र है एवं भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है। दरभंगा का अतीत अत्यंत गौरवशाली है, यह विद्वानों की धरती रही है। पूर्व से ही दरभंगा के लिए सुरक्षा अत्यंत चिंता का विषय बना रहा है। यह क्षेत्र काफी शांतिप्रिय है एवं क्षेत्र के लोग मृदु भाषी होते है। दरभंगा का एक-एक नागरिक अपनी सुरक्षा, जिले की सुरक्षा, प्रदेश की सुरक्षा और राष्ट्र के सुरक्षा के लिए कटिबद्ध है, प्रतिबद्ध है।”

मनोहर जी का कहना है कि “सवाल यह है कि यहाँ जो गिरोह कार्य कर रहा है, नित्य किसी न किसी को अपना शिकार बना रहा है जो भी उसके हित के विरुद्ध जाता है, चाहे पत्रकार अविनाश झा ही क्यों न हो; कभी ये सांसद महोदय स्थानीय प्रशासन के क्रिया-कलापों के विरुद्ध सड़क पर उतरे? नहीं। झा का कहना है कि “अपनी छवि को यत्र-तत्र-सर्वत्र फ़ैलाने के लिए एक खास नेकवर्क तैयार किये हुए हैं जो सोसल साइटों पर कार्य करते हैं। स्थानीय अख़बारों में सांसद के कार्यों का लेखा-जोखा नहीं प्रकाशित हो सकता है। लिखने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता। उसे नौकरी से हाथ धोनी होगी। इनसे तो कई गुना बेहतर पूर्व सांसद कीर्ति आज़ाद थे जो जनता की बात सुनते तो थे। यह बात भी सत्य है कि किसी भी सांसदों ने स्थानीय लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया जिसे आपको बता सकूँ। झा कहते हैं : “हां, एक बात अवश्य है कि गोपाल जी ठाकुर मृदुभाषी हैं। लेकिन, मौध (मधु) जनता को खाने का अवसर अभी तक नहीं मिला हैं।”

​बहरहाल, दरभंगा लोकसभा क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र है – गौरा बौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा और बहादुरपुर। दरभंगा के विधाक है संजय सरोगी, बहादुरपुर के विधायक हैं मदन साहनी, गौरा बौरान की विधायिका है श्रीमती स्वर्ण सिंह, बेनीपुर के विनय कुमार चौधरी, अलीनगर के मिश्री लाल यादव, दरभंगा ग्रामीण के ललित कमर यादव विधायक हैं। दरभंगा से लगभग 214 ट्रेन गुजरती है। स्वाभाविक है कि भारतीय रेल के लिए याग मार्ग कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन कितना उपेक्षित है यह न तो नेता मानेंगे, न भारतीय रेल के अधिकारी, न केंद्रीय मंत्री स्वीकार करेंगे और ना ही प्रदेश के मुख्यमंत्री। जनता में अपने-अपने नेताओं, राजनीतिक पार्टियों के अनुसार विभाजन है।

​विस्तार से कहानी आगे

2 COMMENTS

  1. Bahut sundar aur sahi baat likhe hai Sir. Jitne bhi dal hai uska bidhayak aur Sansad koi kishi se kam nahin hai apbaad ko chhor kar. Ek baat Sansodhan karna parega ki Alinagar ke bidhayak ab nahin hai Mishri Laal Yadav. Party ne unko sajayafta hote hi Bidhayiki se hanta diya.

    Aapne ekbaat bahut sahi kaha ki kishi bhi Party ke neta se Gopal Jee Thakur mridubhashi hai. Ek din unse milne gya jab wo 2baar jitke aaye the to wo Kirti Azad jee ke bare men ye sahi men bole ki Mithila Maithili ke karan unko niskasan ka talbaar latak gya.

    Un dono ka sasural bhi ek hi gao Nehra hi hai. Apko pta hoga

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