देश की आज़ादी के लिए आदिवासियों ने दर्जनों विद्रोह किये, ‘आज़ादी के अमृत महोत्सव’ पर, ‘आज़ाद भारत’ में एक ‘आदिवासी महिला राष्ट्राध्यक्ष’ बनी – स्वागतम

भावी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का अभिवादन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली (रायसीना हिल) : वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का ‘विदाई’ का समय आ गया है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी आज रात उनके सम्मानार्थ ‘विदाई भोज’ का आयोजन किये हैं। इसके साथ ही, भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अग्रणी रहने वाला आदिवासी-संथाल समुदाय, जिसके अनेकानेक विद्रोह, चाहे ब्रितानिया सरकार के विरुद्ध हो या फिर स्वतंत्र भारत में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़कर ‘झारखण्ड’ राज्य का सृजन हो; आदिवासी समुदाय के भावी राष्ट्राध्यक्ष श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के सम्मानार्थ निवर्तमान राष्ट्रपति कोविंद रविवार को ‘रात्रिभोज’ का आयोजन किये हैं। दिल्ली का रायसीना हिल जमीन से जुड़ी एक सशक्त महिला के सम्मानार्थ प्रतीक्षारत है। 

ओडिशा के मयूरभंज के उपरबेड़ा गांव में जन्म लीन,  बेहद साधारण पृष्ठभूमि से उभरकर रायसीना हिल्स स्थित बेहद खास भारत के राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने वाली द्रौपदी मुर्मू, सबसे कम उम्र की राष्ट्रपति व आजादी के बाद जन्मीं देश की पहली राष्ट्रपति जैसी वजहों से तो असाधारण हैं हीं; लेकिन दो जवान बेटों और पति को खोने के बाद भी खुद को संभाले रखना, अपने आदर्शों व मूल्यों पर अडिग रहना उन्हें अनोखा और अभेद्य बनाता है। उन्हें करीब से जानने वालों का कहना है कि दया और दायित्वों के प्रति अटूट समर्पण उनकी असल ताकत है।

कहते हैं ब्रितानिया सरकार और उसकी शासन के खिलाफ आदिवासियों और संथालों ने अनेकानेक विद्रोह किये। उन दिनों देश के अन्य भागों में भारत की आज़ादी, या भारत के लोगों की आज़ादी के लिए किसी भी प्रकार की कोई राजनीतिक आंदोलन का सूत्रपात सतह पर नहीं दिख रहा था। बिहार, बंगाल और उड़ीसा के आदिवासी-संथाली बाहुल्य इलाकों में ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ बिगुल बज चूका था,  जिसमें सन 1785 के ऐतिहासिक तिलका मांझी विद्रोह, 1832 के बंधू-भगत विद्रोह, 1850 का तेलंगा-करिया विद्रोह, 1855 का सिधु-कान्हु विद्रोह, 1899 का बिरसा-मुंडा विद्रोह, 1857 का सुरेंद्र साईं विद्रोह, 1872 का दिवा-किशुन सोरेन विद्रोह प्रमुख थे। इन क्षेत्रों के आदिवासी और संथाली अपने-अपने हक़ के लिए, अपने-अपने क्षेत्रों के बचाव के लिए, अपनी जमीन के लिए, संस्कृति के लिए, अपने अस्तित्व के लिए परतंत्र भारत से लेकर स्वतंत्र भारत तक दर्जनों विद्रोह किये। झारखंड राज्य का बनना भी उन्हीं विद्रोहों की एक कड़ी थी। 

लेकिन विगत 300 वर्षों और अधिक समय में, चाहे अविभाजित भारत मुगलों के अधीन हो या अंग्रेजों के शासनाधीन या फिर स्वतंत्र भारत में नई दिल्ली के अधीनस्थ; कोई भी आदिवासी, चाहे महिला हों या पुरुष, अपने सपने में भी नहीं सोचे थे कि उनके समुदाय की एक महिला स्वतंत्र भारत के 75 वर्ष में, जब देश का 135 करोड़ लोग आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाएंगे, 20 जून, 1958 को संथाल जनजाति के कबीलाई मुखिया बिरंची नारायण टूडू के घर जन्मीं द्रौपदी मुर्मू, सन  1979 में भुवनेश्वर के रमादेवी कॉलेज से बीए उत्तीर्ण करने वाली मुर्मू, रायरंगपुर के श्रीअरविंदो इंटिग्रल एजुकेशन सेंटर की शिक्षिका मुर्मू और ओडिसा सरकार की सिंचाई और ऊर्जा विभाग की कनिष्ठ सहायक मुर्मू देश का राष्ट्राध्यक्ष बनेंगी। 

भावी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का अभिवादन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

कहते हैं, कॉलेज के दौरान ही वह सहपाठी श्याम चरण मुर्मू से प्रेम करने लगीं। पिता नाराज थे, स्वाभाविक था। द्रौपदी और श्याम के धैर्य व संकल्प के आगे पिता को झुकना पड़ा और आदिवासी गांव में उनका विवाह संपन्न हुआ। द्रौपदी मुर्मू का व्यक्तिगत जीवन अंतहीन पीड़ा से भरा है। सं 1984 में भी उनकी पहली संतान की तीन वर्ष की उम्र में मौत हो गई थी।सं 2010 से 2014 के बीच उनके दो बेटों और पति की मौत हो गई। बड़े बेटे लक्ष्मण की मौत रहस्यमयी ढंग से घर में ही हुई। 2012 में एक सड़क हादसे में छोटे बेटे बिरंची की मौत हो गई और 2014 में पति श्याम चरण मुर्मू की मौत हुई। इन हादसों के बाद मुर्मू ने गांव के अपने घर को बोर्डिंग स्कूल में बदल दिया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को बधाई देते हुए ट्वीट किया: “श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी का जीवन, उनके शुरुआती संघर्ष, उनकी समृद्ध सेवा और उनकी अनुकरणीय सफलता प्रत्येक भारतीय को प्रेरित करती है। वह हमारे नागरिकों, विशेष रूप से गरीबों, हाशिए पर और दलितों के लिए आशा की किरण बनकर उभरी हैं। श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी एक उत्कृष्ट विधायक और मंत्री रही हैं। झारखंड के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल शानदार रहा। मुझे विश्वास है कि वह एक उत्कृष्ट राष्ट्रपति होंगी जो आगे बढ़कर नेतृत्व करेंगी और भारत की विकास यात्रा को मजबूत करेंगी। मैं उन सभी सांसदों और विधायकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने पार्टी लाइन से इतर द्रौपदी मुर्मू जी की उम्मीदवारी का समर्थन किया है। उनकी रिकॉर्ड जीत हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।”

मतगणना

एक रिपोर्ट के अनुसार, एक दशक सरकारी नौकरी के बाद उन्होंने 1997 में जनसेवा को ही जीवन बनाने का फैसला किया। ओडिशा में 1990 के दशक में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद उनके दादा और पिता दोनों गांव के सरपंच रहे। सियासत से मुर्मू का बस इतना ही परिचय था। वे रायरंगपुर नगर पंचायत के चुनाव में पार्षद चुनी गईं और नगर पंचायत की उपाध्यक्ष बनीं। सन 2000 और 2009 में रायरंगपुर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर विधायक भी बनीं। 2000 से 2004 तक नवीन पटनायक के मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री रहीं। वाणिज्य, परिवहन, मत्स्य पालन व पशु संसाधन जैसे मंत्रालय संभाले। सन 2006 में भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चे की प्रदेश अध्यक्ष बनीं। 2015 में जब वह राज्यपाल बनीं, तो उन्होंने राजभवन जनता के लिए खोल दिया। झारखंड के हजारों लोंगों के पास ऐसी कहानियां हैं, जिनमें मुर्मू ने उनकी मदद की। सत्ता पक्ष और विपक्ष को समभाव से देखते हुए वह हमेशा विवादों से दूर रहीं। 2017 में भाजपा सरकार के सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक को आदिवासियों के खिलाफ बताकर वापस लौटा दिया था। ऐसे मौके विरले ही होते हैं, जब अपनी ही पार्टी की सरकार के विधेयकों को कोई राज्यपाल इस तरह से लौटा दे।

केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की “प्रभावशाली” जीत पर उन्हें बधाई दी और कहा कि “उनकी विजय भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि मुर्मू गरीबों और समाज के वंचित वर्ग के कल्याण के लिए सक्रिय रही हैं और अब वह सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंची हैं। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की उम्मीदवार मुर्मू ने चुनाव के तीसरे दौर की मतगणना के बाद 50 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर लिया है। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी यशवंत सिन्हा को पछाड़ कर यह लक्ष्य हासिल किया। मतगणना के बाद मुर्मू की विजय की आधिकारिक घोषणा की जा सकती है।”

भावी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का अभिवादन करते, मिठाई खिलाते केंद्रीय गृहमंत्री श्री अमित शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी को राष्ट्रपति पद पर उनकी ऐतिहासिक जीत की बधाई दी। श्री शाह आज उनसे भेंट कर उन्हें शुभकामनाएं दीं। शाह ने कहा कि “एक अति सामान्य जनजातीय परिवार से आने वाली NDA प्रत्याशी श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी का भारत का राष्ट्रपति चुना जाना पूरे देश के लिए गौरव का पल है। उन्होंने कहा कि मोदी जी के नेतृत्व में NDA के सहयोगियों, अन्य राजनीतिक दलों व निर्दलीय जनप्रतिनिधियों का जनजातीय गौरव श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी के पक्ष में मतदान करने पर आभार व्यक्त करता हूँ।”

अमित शाह के अनुसार: “यह विजय अन्त्योदय के संकल्प को चरितार्थ करने व जनजातीय समाज के सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर है। राष्ट्रपति चुनाव में उनकी प्रचंड विजय पर पूरा देश विशेषकर जनजातीय समाज उत्साह व हर्षोल्लास के साथ जश्न मना रहा है। एक अति सामान्य जनजातीय परिवार से आने वाली NDA प्रत्याशी श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी का भारत का राष्ट्रपति चुना जाना पूरे देश के लिए गौरव का पल है, उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ। यह विजय अन्त्योदय के संकल्प को चरितार्थ करने व जनजातीय समाज के सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर है। श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी जिन विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए आज देश के इस सर्वोच्च पद पर पहुँची है वो हमारे लोकतंत्र की अपार शक्ति को दर्शाता है। इतने संघर्षों के बाद भी उन्होंने जिस नि:स्वार्थ भाव से खुद को देश व समाज की सेवा में समर्पित किया वो सभी के लिए प्रेरणादायी है।”

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वैसे मुर्मू की जीत तो तय थी। हालांकि, कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के विधायकों द्वारा की गई क्रॉस वोटिंग ने इस जीत को और पुख्ता कर दिया। सबसे ज्यादा क्रॉस वोटिंग असम में हुई। 126 सदस्यीय इस विधानसभा में एनडीए विधायकों की संख्या 79 है, जबकि मुर्मू के समर्थन में 104 वोट पड़े। इसके अलावा मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में भी जमकर क्रॉस वोटिंग हुई। विधायक तो विधायक, सांसदों तक ने मुर्मू के समर्थन में क्रॉस वोटिंग की। विपक्षी दलों के 17 सांसदों ने पार्टी के रुख के इतर यशवंत सिन्हा की जगह राजग उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मु के पक्ष में वोट किए। बड़ी संख्या में सांसदों की क्रॉस वोटिंग के कारण मुर्म को मत मूल्य में 12000 का इजाफा हुआ। गौरतलब है कि राजग उम्मीदवार को इसके घटक दलों के इतर शिवसेना, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, बसपा, अकाली दल, जदएस, सहित कुछ निर्दलीय सांसदों ने समर्थन की घोषणा की थी। संसद के दोनों सदनों को मिला कर इन सभी दलों और राजग के सांसदों की संख्या 529 होती है। इनमें से भाजपा, शिवसेना और बसपा के दो-दो सांसदों ने वोट नहीं डाले थे। इस हिसाब से राजग उम्मीदवार को 523 सांसदों का समर्थन मिलना था, जबकि इसके उलट उसे 540 सांसदों का समर्थन हासिल हुआ। 

मतगणना

विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा मतगणना के पहले ही राउंड में बाहर हो गए थे। मुर्मू की पहले राउंड में वोट वैल्यू 3.78 लाख थी। जबकि, सिन्हा 1.45 पर टिके थे। इसके बाद तीसरे राउंड तक जीत का अंतर बढ़ता गया। चौथे राउंड में सिन्हा ने वापसी जरूरी की, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। आंकड़ों के मुताबिक, मुर्मू को 6,76,803 वोट मिले, जबकि सिन्हा को 3,80,177 वोट मिले। इस तरह द्रौपदी मुर्मू देश की नई राष्ट्रपति होंगी। 2017 में रामनाथ कोविंद ने आसान जीत हासिल की थी। तब रामनाथ कोविंद को 702,044 (65.65%) मत प्राप्त हुए थे। वहीं उपविजेता मीरा कुमार को मिले 367,314 (34.35%) मत मिले थे। वहीं  द्रौपदी मुर्मू को कुल 2824 वोट मिले। इन मतों का मूल्य 6,76,803 रहा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘चंद दिन पहले तक आम गांव की श्रेणी वाला मुर्मू का गांव बेहद खास हो गया है। ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव की बेटी द्रौपदी देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति जो बनने जा रही हैं। बृहस्पतिवार शाम से ही यहां जश्न शुरू हो गया। मगर, आम से खास बने इस गांव की कहानी तमाम चुनौतियों का सामना करने वाले दूसरे तमाम गांवों की ही तरह है। हालांकि, स्थानीय लोगों को अपने दिन बहुरने की उम्मीद दिखने लगी है।

रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण बताते हैं, इस गांव की सड़कें तब बनीं थीं, जब द्रौपदी पहली बार विधायक चुनी गई थीं। तब ही गांव में पानी की पाइप बिछी। कान्हू नदी पर पुल बना। पशुओं का अस्पताल खुला। चंद दिनों पहले तक गांव के डुंगरीसाई मजरे के तीस से ज्यादा घरों के लोग लालटेन की रोशनी में रातें काटा करते थे। मुर्मू के राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी बनने पर यहां बिजली के बल्ब जले हैं। अब गांव में सरकारी अमले का आना-जाना बढ़ गया है और अधूरे विकास कार्यों में भी तेजी आई है। 
गांव में काफी लोगों के पास पक्का मकान नहीं है। हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज 20 किमी दूर हैं। इससे सबसे ज्यादा मुश्किल लड़कियों को होती है। उन्हें इतनी दूर साइकिल या अन्य साधनों से जाना पड़ता है। यहां बैंक भी नहीं है। अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। लोग चाहते हैं कि उनके गांव में ही बैंक हो। हाईस्कूल को अपग्रेड कर इंटरमीडिएट कर दिया जाए।  अस्तपाल में कम से कम 14 बेड की सुविधा हो जाए, जिससे लोगों को स्थानीय स्तर पर ठीक से इलाज मिल सके।

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने द्रौपदी मुर्मू के भारत की राष्ट्रपति निर्वाचित होने पर उन्हें बुधाई दी। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘द्रौपदी मुर्मू जी को भारत का 15वां राष्ट्रपति निर्वाचित होने पर बधाई और शुभकामनाएं।’’

1952 : पहला राष्ट्रपति चुनाव: डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बने : 5,07,400 (83.81%) मत मिले थे, जबकि प्रतिद्वंद्वी केटी शाह को 92,827 मत, लक्ष्मण थाट्टे को 2,672, चौधरी हरिराम को 1,954 और कृष्ण चटर्जी को 533 वोट मिले थे। सन 1957 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 4,59,698  (99.99%) मत मिले था जबकि चौधरी हरिराम को 2,672 मत। स्वतंत्र भारत में अब तक डॉ. प्रसाद दूसरी बार चुनाव जीतने वाले देश के अकेले राष्ट्राध्यक्ष हैं। सं 1962 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को 5,53,067 (98.24%) मत मिले थे और उनके प्रतिद्वंद्वी चौधरी हरिराम को 6,341 मत मिले। इसी तरह, सं 1967 में डॉ. जाकिर हुसैन को 4,71,244 (56.23%) मत मिले थे। डॉ हुसैन पहले राष्ट्रपति थे जिनका पद पर रहते देहांत हुआ।प्रतिद्वंद्वी कोका सुब्बाराव को 3,63,971 (43.43%)। 

सन 1969 में  वराह वेंकट गिरि को 4,01,515 (48%) मत मिले और नीलम संजीव रेड्डी के पक्ष में 3,13,548 मत मिले। कहते हैं गिरि एकमात्र राष्ट्रपति, जिन्हें 50% से कम वोट मिले थे और देश में पहली बार सेकंड प्रिफरेंस यानी दूसरी पसंद चुनने का मौका मिला। वोट गुप्त रखे, बैलेट पेपर पर नंबर छापे गए। सन 1974 में फखरुद्दीन अली अहमद को 7,65,587, (80.18%) मत मिले थे और इनके प्रतिद्वंदी त्रिदिव चौधरी को 1,89,186, (19.81%) मत मिले थे। इनके समय काल में ही देश में आपातकाल लगी थे। सं 1977 में राष्ट्रपति पद के लिए कुल 37 आवेदन आये थे, जिसमें 36 निरस्त हो गए और रेड्डी निर्विरोध चुने गए। उस समय उनकी आयु 64 वर्षी थी और रेड्डी उस समय राष्ट्रपति बनने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे। 

सन 1982 में ज्ञानी जैल सिंह को 7,54,113, (72.73%) मत मिले थे जबकि हंसराज खन्ना को  मिले 2,82,685 (27.26%) मत मिले थे। इसी तरह, सन 1987 में आर वेंकटरमण को 7,40,148 (72.28%) वोट मिले थे और उनके प्रतिद्वंद्वी वीआर कृष्णा अय्यर को 2,81,550 (27.49%) वोट मिले। कहते हैं वेंकटरमन पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्होंने चुनाव में बहुमत न होने के बावजूद सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाया था । सन 1992 में डॉ. शंकर दयाल शर्मा को 675,804 (65.85%) मत मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंदी जॉर्ज गिलबर्ट स्वेल को 346,485 (33.76%) मिले थे। कहा जाता है कि डॉ शर्मा चार प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने वाले पहले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति थे।

सन 1997 में डॉ. के आर नारायणन काे 956,290 (94.97%) वोट मिले थे और उनके प्रतिद्वंदी टीएन शेषन को 50,631 (5.02%) वोट मिले थे। नारायणन देश के पहले दलित राष्ट्रपति बने। सन 2002 में  डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को 9,22,994 (89.58%) वोट मिले थे और उनके प्रतिद्वंद्वी लक्ष्मी सहगल को 1,07,366 (10.42%) वोट मिले थे । सन  2007 में  प्रतिभा पाटिल को 638,116 (65.8%) वोट मिले और उनके प्रतिद्वंदी भैरोंसिंह शेखावत को 331,306 (34.2%) को वोट मिले थे। श्रीमती पाटिल स्वतंत्र भारत की पहली महिला राष्ट्राध्यक्ष थीं। सन 2012 में प्रणब मुखर्जी को 713,763 (69.3%) मत मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंदी पीए संगमा को 3,15,987 (30.7%) मत प्राप्त हुआ था। और सन 2017 में रामनाथ कोविंद को 702,044 (65.65%) मत मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंदी मीरा कुमार को 367,314 (34.35%) मत मिला था। 

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