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	<title>Nitish Kumar Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>बिहार को 400000 लाख करोड़+ का &#8216;ऋणी&#8217; बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे &#8216;ठेका खोलो-ठेका खोलो&#8217; (नीतीश के बाद बिहार-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/after-plunging-bihar-into-debt-exceeding-%e2%82%b94-lakh-crore-nitish-headed-to-delhi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 11:27:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[samrat chaudhari]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार में 5 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी के बाद प्रदेश की महिलाओं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण की दिशा में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/after-plunging-bihar-into-debt-exceeding-%e2%82%b94-lakh-crore-nitish-headed-to-delhi">बिहार को 400000 लाख करोड़+ का &#8216;ऋणी&#8217; बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे &#8216;ठेका खोलो-ठेका खोलो&#8217; (नीतीश के बाद बिहार-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार में 5 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी के बाद प्रदेश की महिलाओं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन प्रतिबंधित कालखंड में प्रदेश में गैर-क़ानूनी ढंग से &#8216;देशज-विदेशज शराबों को बोतलों का जितना आयात हुआ, वह भी प्रदेश सरकार की क़ानूनी व्यवस्था को प्रश्न चिन्ह आज भी लगाए बैठा है। आज बिहार के 38 जिलों, 8406 पंचायतों, 534 ब्लॉकों और 45103 गावों एक तरफ जहाँ चिल्लम, चरस, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम की भूसी जैसी मादक पदार्थों के गिरफ्त में है, वहीँ बिहार करीब चार लाख करोड़ कर्ज में डूबा है। </strong></p>
<p>नीतीश कुमार भले &#8216;विकास पुरुष&#8217; के अलंकरण से अलंकृत हों, इन वर्षों में प्रदेश को उन्होंने आर्थिक रूप से &#8216;दिव्यांग&#8217; बना दिया गया है। बिहार के &#8216;विकास पुरुष&#8217; जाते-जाते प्रदेश के ऊपर लगभग 400000 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण का बोझ छोड़कर गए हैं। आशा है यह उनके राज्यसभा में बैठने की शुरूआती दिनों में बढ़कर करीब 4.06 करोड़ पहुँच जाएगी। प्रदेश के कोषागार पर प्रतिमाह 30000 &#8211; 35-000 हज़ार करोड़ का बोझ महज ऋणों के ब्याज पर खर्च होता है। आप प्रतिव्यक्ति आय की गणना जितना भी कर लें, विकास पुरुष प्रदेश के प्रतिव्यक्ति पर तक़रीबन 27000 रुपये का कर्ज बोझ डालकर पटना से अगले छह वर्ष के लिए दिल्ली विस्थापित हुए हैं। यह एक गहन शोध का विषय है। </p>
<p>आप मानें अथवा नहीं। बिहार एक जटिल वित्तीय स्थिति का सामना कर रहा है, जिसमें उच्च आर्थिक विकास के साथ-साथ नकदी की गंभीर कमी भी है। सरकारी कागज पर जहाँ 2025–26 में अर्थव्यवस्था 13.1% की दर से बढ़ी (जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है) और डीएसडीपी ₹9.9 लाख करोड़ के पार पहुँच गई है, वहीँ नकदी की गंभीर कमी  के कारण सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन और पेंशन विलंबित हो रहे हैं। इतना ही नहीं, विभिन्न क्षेत्रों में जितने भी कार्य कराये गए हैं, उसमें ठेकेदारों के ₹12,000–15,000 करोड़ के भुगतान रुके पड़े हैं। अनुमान है कि सरकार को केवल वेतन और पेंशन के भुगतान के लिए हर महीने लगभग 9,000-10,000 करोड़ रुपये का इंतजाम करना पड़ता है। </p>
<blockquote><p>आंकड़ों के आधार पर 2010-11 में वित्तीय देनदारी ₹62,858 करोड़ थी जो बढ़कर 2014-15 में ₹99,055 करोड़ हो गईं। 2021-22 (असल) में फिर बढ़कर ₹1,84,377 करोड़ हो गया। अगले वर्ष, यानी 2022-23 वर्ष में यह देनदारी की राशि ₹2,17,553 करोड़ हुआ और फिर 2023-24 में ₹3,32,740.90 करोड़ हो गया। 2024-25 वित्तीय वर्ष में संशोधित अनुमान के मुताबिक यह राशि ₹3,48,000 करोड़ हुआ। 2025-26 वित्तीय वर्ष ₹3,88,554 करोड़ देनदारी का बजट अनुमान था जो सार्वजनिक खाता और देनदारी सहित यथार्थ में बढ़कर ₹4,46,326.07 करोड़ हो गया। बिहार के मामले में इस राशि को देखकर चावार्क ऋषि का भौतिकवादी श्लोक याद आ गया &#8211; यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः &#8211; बस इतना समझ लें कि विकास पुरुष नीतीश कुमार अपने उत्तराधिकारी को एक ऐसा राज्य देकर गए हैं जो गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7621" aria-describedby="caption-attachment-7621" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7621" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7621" class="wp-caption-text">मुख्यमंत्री बनेंगे तो कर्ज समेत बिहार का नेता बनना होगा</figcaption></figure>
<p>वित्त वर्ष 2024-25 के लिए बिहार का कुल सालाना बजट लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये था । वैसे राज्य सरकार कर और अन्य स्रोतों से करीब 60,000-65,000 करोड़ रुपये एकत्रित कर पाती है, लेकिन लगभग 70 फ़ीसदी हिस्सा बाहरी स्रोतों पर निर्भर करता है। राजनीतिक लाभ उठाने के लिए जिस कदर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर सरकार खर्च करती आ रही है, मसलन , महिलाओं को आर्थिक मदद, स्कॉलरशिप, पेंशन और मुफ़्त राशन योजनाओं जैसी पहल, जो &#8216;उत्पादक&#8217; नहीं है, के कारण भी  हालत खास्ता हुआ है। </p>
<p><strong>वैसे देश के कई शैक्षणिक और शोध संस्थाएं इस दिशा में कार्य कर रही हैं, लेकिन ऐसी आशा की जा रही है कि भारतीय जनता पार्टी सभी राज्यों में समान कानून के तहत बिहार से भी शराबबंदी समाप्त करने की दिशा में पहल करें। वैसे बिहार के प्रशासनिक व्यवस्था से नीतीश कुमार को निकलते ही प्रदेश में शराब के क्षेत्र में कार्य करने वाले &#8216;व्यापारी&#8217;, जिन्हे कथित रूप से &#8216;राजनीतिक संरक्षण&#8217; भी प्राप्त है, शराबबंदी समाप्त करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिलना-जुलना, ज्ञापन देने का कार्य शुरू कर दिए हैं। कहा जाता है कि प्रदेश में जितने भी शराब के देशज/विदेशज ठेके थे, अधिकांश राजनेताओं द्वारा परोक्ष रूप से नियंत्रित हैं। </strong></p>
<p>इस बीच, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद दृष्टान्त हैं। वे मुख्यमंत्री को सुझाव दिए हैं कि प्रतिबंध से राजस्व का नुकसान हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी सिर्फ कागज पर है, धरातल पर नहीं। वैसे प्रदेश के राजनीतिक समीक्षक इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि अन्य भाजपा शासित प्रदेशों की तरह बिहार में तत्काल प्रभाव से शराबबंदी समाप्त किया जायेगा। अगर ऐसा होता है तो यह गलत संदेश जाएगा, साथ ही, वर्तमान सरकार में अभी भी नीतीश कुमार के जनता दल के सदस्यों की संख्या कम नहीं है। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता है। </p>
<p>वैसे शराबबंदी हटाने की मांग कई बार उठाई गई है। पिछले चुनावों के दौरान, कई नेताओं और पार्टियों ने इस नीति की समीक्षा करने या इसे पूरी तरह खत्म करने का वादा किया था। सरकार भी इस बात को स्वीकार करती होगी कि प्रतिबंध को लागू करने का काम पूरी तरह से प्रभावी नहीं रहा।  आलोचकों का तर्क है कि शराब के सेवन को खत्म करने के बजाय, इसने इस व्यापार को &#8216;अंडरग्राउंड&#8217; धकेल दिया है। वैसे सम्राट चौधरी यह स्वीकार किया है कि शराबबंदी के कारण राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ है। दूसरी तरफ, उन्होंने इस नीति की सराहना करते हुए इसे नीतीश कुमार के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक बताया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7622" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>नीतीश कुमार के जाते ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के कुछ दलों ने भी यह सुझाव दिया है कि अब इस नीति की समीक्षा करने का समय आ गया है। नेताओं का तर्क है कि लगभग एक दशक बीत जाने के बाद, सरकार को यह आकलन करना चाहिए कि क्या यह कानून अपने तय मकसद के अनुसार काम कर रहा है, या इसमें कुछ बदलावों की ज़रूरत है। हालाँकि, इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने या इसे वापस लेने के संबंध में अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक कदम आसार नहीं दिखता है, लेकिन राजनीति में कभी भी, कुछ भी हो सकता है। </p>
<p><strong>जब नीतीश कुमार ने शराब की बिक्री और सेवन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया, उस समय महिलाओं ने बड़े पैमाने पर समर्थन किया, क्योंकि इसका मकसद घरेलू हिंसा को कम करना और घर की कमाई को शराब पर खर्च होने से रोकना था। इस कदम से नीतीश कुमार को अपना राजनीतिक समर्थन मजबूत करने में मदद मिली, खासकर महिला मतदाताओं के बीच। जहाँ एक तरफ इस प्रतिबंध के सामाजिक फायदे थे, वहीं इसने कुछ चुनौतियां भी खड़ी कीं। शराबबंदी के कारण राज्य में अवैध शराब के व्यापार में बढ़ोतरी हुई और बार-बार जहरीली शराब से जुड़ी त्रासदियां हुईं। साथ ही, सरकार को एक्साइज ड्यूटी से होने वाले राजस्व का भारी नुकसान हुआ। इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया में, सरकार के सबसे अहम समर्थकों में से एक माने जाने वाले &#8216;महा-दलित&#8217; (दलित समूहों में सबसे गरीब तबका) ही सरकार से दूर हो गए। यह समुदाय अपनी ज्यादातर कमाई देसी शराब बनाकर ही करता था; शराबबंदी की वजह से उनकी कमाई का एक बहुत बड़ा ज़रिया ही खत्म हो गया है। </strong></p>
<p>बिहार का नुकसान उसके पड़ोसी राज्यों का फायदा बन गया है। बिहार की सीमाएँ पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल जैसे राज्यों से लगती हैं। जहाँ एक तरफ़ बिहार हर साल होने वाले 4000 करोड़ रुपये के राजस्व के नुकसान की भरपाई करने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ़ झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के आबकारी राजस्व में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है। उदाहरण के लिए, झारखंड का राजस्व 2015-2016 में 912 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-2018 में 1600 करोड़ रुपये हो गया। पश्चिम बंगाल में तो और भी चौंकाने वाली बढ़ोतरी हुई है; 2015-2016 में 4014 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-2018 में यह 5781 करोड़ रुपये हो गया। </p>
<figure id="attachment_7625" aria-describedby="caption-attachment-7625" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7625" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7625" class="wp-caption-text">अब तो केंद्र सरकार पर ही भरोसा है, कर्जा चुकाने में मदद करें या कर्ज में और डूबा दे। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, जब मोहनदास करमचंद गांधी के जन्म स्थान गुजरात में शराबबंदी के कारण राज्य के कोषागार को हो रहे राजस्व नुकसान की कमी पूर्ति के लिए राज्य सरकार वित्त आयोग के सामने हाथ फैला सकती है, तो बिहार में तो मोहनदास करम चंद गाँधी को &#8216;महात्मा की उपाधि&#8217; मिली थी, यहाँ इस दिशा में कुछ विशेष पहल होने चाहिए ताकि प्रदेश आर्थिक रूप से स्वस्थ रहे। क्योंकि प्रदेश स्वस्थ रहेगा तभी तो मतदाता और महिलाएं भी स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगी। इस वर्ष की शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी अब तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गोवा, मणिपुर और त्रिपुरा में स्वयं अथवा गठबंधन में सरकार का नेतृत्व कर रही हैं। गुजरात छोड़कर, किसी भी राज्यों में शराब बंदी नहीं है। </p>
<blockquote><p>विशेषज्ञ का कहना है कि &#8216;हम यह नहीं कहते कि बिहार में शराबबंदी जारी रहेगा। अभी भाजपा की पूरी निगाह स्वयं को मजबूत करने के साथ-साथ अकेले सरकार बनाने पर ध्यान केंद्रित है। नीतीश कुमार के जाने के बाद, प्रदेश में राजनीतिक समीकरण में बदलाव आना स्वाभाविक है। आज जनता दल यूनाइटेड में कई (दो-तीन दर्जन भी मान सकते हैं) विधायक और सांसद ऐसे हैं जो &#8216;समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं&#8217;, झंडा बदलने के लिए। आप जिन्हें नीतीश कुमार का अनुयायी आप मान रहे हैं, कल कई लोगों को साथ लेकर भाजपा के अनुयायी हो सकते हैं। जनता दल में भी भाजपा के लोग बैठे हैं। राजनीति और सत्ता में शराब से भी अधिक तेजी से नशा चढ़ता है और अभी नशा चढ़ने का वक्त है। राजनेता, विधायक, सांसद भले नीतीश कुमार को सांत्वना दें कि वे उनके सपने को साकार करेंगे; हकीकत यह है कि सभी का अपना-अपना सपना है और वे अपने सपने को साकार करने में कोई कसार नहीं छोड़ेंगे।&#8217; </p></blockquote>
<figure id="attachment_7623" aria-describedby="caption-attachment-7623" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7623" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7623" class="wp-caption-text">हम चले, अब कर्जा चुकाते रहिये</figcaption></figure>
<p>2025 के इंडस्ट्री अनुमानों के अनुसार, भारत में लगभग 80,000 लाइसेंस्ड शराब की दुकानें हैं। आबादी के हिसाब से रिटेल सेक्टर में अभी भी कम पहुंच मानी जाती है, जहाँ हर 1 लाख ग्राहकों पर लगभग 5.2 दुकानें हैं। सबसे ज़्यादा दुकानों वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में है। देश में राज्य सरकारें शराब से भारी राजस्व कमाती है जो लगभग ₹30,000–₹40,000 करोड़ के आसपास होती है। </p>
<p>पहले दिल्ली की बात। दिल्ली की वर्तमान आबादी 32,941,000 में शराब पीने वालों की संख्या उम्मीद से अधिक है। यह बात भी अलग है कि सरकार शराब की बोतलों पर अंग्रेजी में, हिंदी में, पंजाबी में, उर्दू में, चाहे जिस भाषा में लिखकर चिपकाती रहे – शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। शराब की बिक्री से दिल्ली सरकार की कमाई 2025-26 वित्त वर्ष की पहली छमाही में एक्साइज रेवेन्यू लगभग ₹4,192.86 करोड़ तक पहुँच गयी, जो कि 2023-24 वित्त वर्ष में लगभग ₹5,164 करोड़ था। </p>
<p>जबकि, बिहार में शराब पर पूरी तरह से रोक लगने से पहले राज्य में लगभग 6,000 शराब की दुकानें (जिनमें भारतीय-निर्मित विदेशी शराब और देसी शराब की दुकानें शामिल थीं) चल रही थीं। 2006 और 2013 के बीच, लाइसेंसी दुकानों की संख्या 3,436 से बढ़कर 5,467 हो गई, जिससे आबकारी राजस्व में काफ़ी बढ़ोतरी हुई। शराबबंदी के बाद दुकानें तो बंद हुई है, शराब के कारोबार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काम करने वाले लगभग 25,000 से 35,000 लोगों पर इसका असर पड़ा।</p>
<p>बहरहाल, 27 अक्टूबर, 2024 को गुजरात सरकार ने 16वें वित्त आयोग से राज्य की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने का अनुरोध किया था। साथ ही, राज्य के अधिकारियों ने शराबबंदी नीति के कारण हुए भारी राजस्व नुकसान को उजागर किया था, जिसके कारण उत्पाद शुल्क संग्रह में काफी कमी आई है। गुजरात सरकार ने राज्य के लिए आवंटित होने वाले फंड में  काफी बढ़ोतरी की मांग भी की थी। वजह था उत्पाद शुल्क राजस्व में लगभग 12,000 करोड़ रुपये के सालाना नुकसान होता है। तदर्थ शराबबंदी के कारण हुई राजस्व की कमी की भरपाई के लिए वित्त आयोग से अधिक फंड हासिल किया जाए। </p>
<figure id="attachment_7626" aria-describedby="caption-attachment-7626" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7626" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7626" class="wp-caption-text">कुर्सी की हालत इससे बेहतर नहीं है। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>बिहार सरकार भी, शराब बंदी के कारण राज्य के खजाने को होने वाले राजस्व घाटे की बार वित्त आयोग के सामने अनेकों बार उठाया और मुआवजे की मांग की। बिहार सरकार के अनुसार, शराबबंदी पूर्णरूपेण लागू होने के बाद प्रदेश को आबकारी शुल्क से होने वाली लगभग 3000 से 4000 करोड़ की वार्षिक आय बंद हो गयी। बिहार सरकार ने बार-बार यह तर्क दिया कि सामाजिक सुधार/महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए शराबबंदी लागू की गयी, जिससे राजस्व में कमी आयी। साथ ही, केंद्र सरकार और वित्त आयोग से विशेष सहायत की मांग की।  इन वर्षों में एक अनुमान के मुताबिक बिहार को करीब 30000 से 40000 करोड़ राजस्व का नुकसान हुआ है। </p>
<p>शराबबंदी का एक और बुरा नतीजा यह निकला कि लोग शराब छोड़कर नशीले पदार्थों (ड्रग्स) के आदी होने लगे। जहाँ एक तरफ़ सारा ध्यान शराब पर ही केंद्रित था—और अब भी है—वहीं दूसरी तरफ़ नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता पर किसी का ध्यान नहीं गया और नशे के आदी लोगों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। 2017 में तीन डॉक्टरों की एक टीम ने एक पायलट स्टडी की थी, जिसमें पाया गया कि बैन के बाद 25% से ज़्यादा पक्के शराबी ताड़ी, गांजा (मारिजुआना), चरस जैसी चीज़ों की तरफ मुड़ गए। नशीली दवाओं के बढ़ते चलन और फैलाव को समझने का नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो से बेहतर कोई तरीका नहीं है। </p>
<p>इतना ही नहीं, बिहार में अधिकारियों द्वारा जब्त की गई नशीली दवाओं में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जो शराब से नशीली दवाओं के गलत इस्तेमाल की तरफ़ बदलाव का संकेत है। गांजे की ज़ब्ती में 2700 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है; 2015 में यह 14 किलो था, जो 2016 में बढ़कर 10,800 किलो और 2021 में 27,395 किलो हो गया। हशीश की बरामदगी भी 2015 में 0 किलो से बढ़कर 2016 में 115 किलो और 2021 में 363 किलो हो गई। शराब के साथ-साथ बिहार में तंबाकू का इस्तेमाल भी काफ़ी ज्यादा है। </p>
<p>राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, जहां पूरे देश में औसतन 38 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का सेवन करते हैं, वहीं बिहार में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में यह 44 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 46 प्रतिशत, राजस्थान में 42 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 34 प्रतिशत है। आंकड़ों से पता चलता है कि तंबाकू के व्यापक इस्तेमाल के कारण बिहार में टीबी (तपेदिक) के मामले काफ़ी ज़्यादा हैं। जहां पूरे देश में हर एक लाख की आबादी पर 229 लोग टीबी से पीड़ित हैं, वहीं बिहार में यह आंकड़ा 450 है। NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, केवल कम आबादी वाले राज्यों में ही टीबी का बोझ बिहार से ज़्यादा है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7624" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>कुल समय पहले एक टेलीविजन के आर्थिक पत्रकार मयंक मिश्रा ने कहा था कि भारत में हर पांच में से लगभग एक पुरुष शराब पीता है। शराब-मुक्त राज्य बिहार में, यह हिस्सा थोड़ा कम है, लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तुलना में ज़्यादा है। हालांकि, बिहार के विपरीत, इन तीनों राज्यों में शराब की बिक्री और सेवन पर कोई रोक नहीं है। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश, असम के कुछ हिस्सों, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के पुरुषों में शराब का सेवन व्यापक रूप से प्रचलित है। इन राज्यों में, यह दर 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। हालांकि, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों में, शराब पीने वाली आबादी का अनुपात राष्ट्रीय औसत के बराबर या उससे कम है।</strong></p>
<p>बिहार में, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 15 प्रतिशत से अधिक पुरुषों के शराब का सेवन करने का अनुमान है, जबकि राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के लिए ये आँकड़े क्रमशः 11 प्रतिशत, 13.9 प्रतिशत और 14.5 प्रतिशत हैं। बिहार में, 2016 में शराबबंदी लागू हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार, अक्टूबर 2021 तक, बिहार निषेध और आबकारी कानून के तहत लगभग 3.5 लाख मामले दर्ज किए गए और चार लाख से अधिक गिरफ्तारियां की गईं। बताया जाता है कि शराबबंदी के कारण राज्य को हर साल राजस्व में 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। आँकड़े दिखाते हैं कि कड़े उपायों के बावजूद, बिहार में शराब का सेवन अभी भी ज़्यादा है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, गुजरात में, जो एक और शराब-मुक्त राज्य है, छह प्रतिशत से भी कम पुरुष शराब पीते हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही, बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी शराब का सेवन ज्यादा है। और महिलाओं में इसका प्रचलन कम है।</p>
<p>पूरे देश के लिए, पिछले 15 वर्षों में शराब के सेवन का रुझान यह दिखाता है कि अब इसका प्रचलन कम हो गया है। उदाहरण के लिए, 2005-06 में, 35-49 आयु वर्ग के हर दस में से चार पुरुष (39 प्रतिशत) शराब का सेवन करते थे। यह 2015-16 में घटकर 36.8 प्रतिशत हो गया और 2019-21 में और घटकर 27.4 प्रतिशत रह गया। बिहार में भी 2005-06 से शराब की खपत में कमी का ऐसा ही रुझान देखने को मिला है। 15-49 आयु वर्ग के पुरुषों में शराब की खपत में कमी 2005-06 से 2015-16 के बीच लगभग 17 प्रतिशत और उसके बाद के पाँच वर्षों में 41 प्रतिशत रही। पूरे देश के लिए यह कमी क्रमशः 8.5 प्रतिशत और 23 प्रतिशत थी। इससे पता चलता है कि शराबबंदी लागू होने से पहले भी बिहार में शराब की खपत तेज़ी से घट रही थी।</p>
<p><strong>जिंदल स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी की शोधकर्ता आयुश्री खेत्री के अनुसार, 1 अप्रैल 2016 को बिहार सरकार ने राज्य के इलाके में शराब और नशीले पदार्थों के बनाने, बेचने, जमा करने और इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी। यह घोषणा सरकार की अपनी 2005 की आबकारी नीति से बिल्कुल अलग थी। 2005 वह साल था जब राज्य का बजट सिर्फ़ 27,000 करोड़ रुपये था और आमदनी के साधन भी बहुत कम थे। उस समय सरकार का हाल यह था कि पंचायतों में दुकानों की संख्या बढ़ाकर शराब की बिक्री बढ़ाई जाए। इस पहल की वजह से दुकानों की संख्या 2006-07 में 3,436 से बढ़कर 2012-13 में 5,467 हो गई, और गाँवों में 200 प्रतिशत से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी देखी गई। यह राज्य के बजट के लिए एक वरदान साबित हुआ, क्योंकि आबकारी से होने वाली आमदनी 2006 में 500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2015 में 6,000 करोड़ रुपये हो गई।</strong></p>
<figure id="attachment_7627" aria-describedby="caption-attachment-7627" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7627" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7627" class="wp-caption-text">पानी में डुबोकर रोटी खाने को मजबूर हो गया हूँ नीतीश बाबू प्रदेश को इतना कर्ज में डुबो दिए। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>आमदनी में यह तेज़ी से हुई बढ़ोतरी ज़्यादा समय तक नहीं रही, क्योंकि बिहार में नए चुनावों के साथ ही सोच में भी बदलाव आ गया। बिहार में अब एक नया कानून लागू किया जाना था, जो &#8216;राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों&#8217; और गांधीवादी विचारों के सिद्धांतों पर आधारित था, और इसका नाम &#8216;बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम&#8217; रखा गया। इस कानून में सज़ा के बहुत कड़े प्रावधान थे, जैसे कि पूरे समुदाय पर जुर्माना लगाना और अगर परिवार का कोई एक सदस्य शराब पीते हुए पकड़ा जाता है, तो पूरे परिवार को गिरफ़्तार कर लेना। तब से इस कानून में तीन बार बदलाव किए जा चुके हैं, और अब पहली बार अपराध करने वालों को 2,000 से 5,000 रुपये का जुर्माना देकर छोड़ा जा सकता है।</p>
<p><strong>2016 से लेकर अब तक, इस कानून को सख्ती से लागू करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, और विधानसभा में हुई चर्चाओं से इसकी कमियाँ भी सामने आई हैं। कानूनों में लगातार होने वाले बदलाव और मेरे हिसाब से उनका ज़्यादा से ज़्यादा नरम होते जाना, मौजूदा समर्थित विचारधारा से &#8216;यू-टर्न&#8217; लेने का एक और तरीका है, जैसा कि 2005 से साफ तौर पर देखा जा सकता है। गठबंधन में अनिश्चितता और राजनीतिक उथल-पुथल इस बात की ओर इशारा कर सकती है कि यह चुनाव जीतने के लिए उठाया गया एक पूरी तरह से राजनीतिक कदम हो सकता है। विचारधाराओं में इस बदलाव की जांच हम अकेले में नहीं कर सकते। 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव JDU के लिए दोबारा चुने जाने के लिहाज़ से एक मुश्किल साल था। जहाँ RJD और BJP ने वोटों के लिए जाति समूहों पर भरोसा किया, वहीं JDU ने, जिसके पीछे कोई खास जाति नहीं थी, महिला मतदाताओं पर भरोसा करने का फैसला किया।</strong></p>
<p>शुरुआत में, शराबबंदी को दो चरणों में लागू किया जाना था—शराबबंदी का पहला चरण ग्रामीण इलाकों में शराब की सभी दुकानों को बंद करने पर केंद्रित था, और दूसरा चरण वह था जिसमें वे पहले चरण के पूरा होने के छह महीने के भीतर इसे पूरे राज्य में लागू कर देते। लेकिन यह चरणबद्ध और सोच-समझकर बनाया गया प्लान तब तेज़ी से खत्म हो गया, जब राज्य की महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया; दूसरा चरण तय समय से पहले ही लागू कर दिया गया। लागू करने की प्रक्रिया को दो चरणों में बाँटने से लागू करने वाली संस्था को दी गई नीति का मूल्यांकन करने और उसमें सुधार करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह एक जल्दबाजी में लिया गया फैसला था या फिर दूरदर्शिता की कमी का नतीजा।</p>
<p>अब बात करते हैं एक्साइज और टैक्स की; शराब से मिलने वाला टैक्स हमेशा से ही राज्य की अर्थव्यवस्था को बनाए रखने का एक मुख्य ज़रिया रहा है। असल में, ज़रूरत के समय, जब अर्थव्यवस्था में मंदी आती है, तो राज्य इसी शराब का सहारा लेते हैं। लेकिन शराबबंदी के फैसले से बिहार का पहले से ही छोटा खज़ाना खतरे में पड़ गया। साल 2015-16 में इसका एक्साइज़ राजस्व 3,142 करोड़ रुपये था। अगले ही साल, यह गिरकर 46 करोड़ रुपये रह गया। और, 2017-18 में तो यह बिल्कुल शून्य हो गया।</p>
<p><strong>क्रमशः&#8230;&#8230;</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/after-plunging-bihar-into-debt-exceeding-%e2%82%b94-lakh-crore-nitish-headed-to-delhi">बिहार को 400000 लाख करोड़+ का &#8216;ऋणी&#8217; बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे &#8216;ठेका खोलो-ठेका खोलो&#8217; (नीतीश के बाद बिहार-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, &#8216;अभिशप्त है यह इमारत&#8217;, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा&#8221; &#8211; लिख लीजिये</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Mar 2026 00:58:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[7-jantar mantar]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[janta dal (united)]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>7-जंतर मंतर (नई दिल्ली) : आप माने या नहीं माने, आपकी मर्जी । लेकिन 7-जंतर मंतर स्थित जनता दल &#8211; यूनाइटेड का ऐतिहासिक इमारत का इतिहास अगर गलत नहीं है, तो आगामी आने वाले दिनों में जनता दल &#8211; यूनाइटेड का &#8216;दिवाइटेड&#8217; होना भी तय है, यही नियति है। कांग्रेस का आधिपत्य रहने वाले इस भवन का स्वामित्व सन 1969 में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/7-jantar-mantar-a-cursed-building">&#8220;​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, &#8216;अभिशप्त है यह इमारत&#8217;, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा&#8221; &#8211; लिख लीजिये</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>7-जंतर मंतर (नई दिल्ली) : आप माने या नहीं माने, आपकी मर्जी । लेकिन 7-जंतर मंतर स्थित जनता दल &#8211; यूनाइटेड का ऐतिहासिक इमारत का इतिहास अगर गलत नहीं है, तो आगामी आने वाले दिनों में जनता दल &#8211; यूनाइटेड का &#8216;दिवाइटेड&#8217; होना भी तय है, यही नियति है। कांग्रेस का आधिपत्य रहने वाले इस भवन का स्वामित्व सन 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस (ओ) को मिला। सन 1977 में जब कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में विलय हो गया,  जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय 7-जंतर मंतर बना। तब से लेकर आज तक, पिछले पचास वर्षों से यह &#8216;अभिशप्त भवन&#8217; यहाँ दर्जनों राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को उछलते, मुस्कुराते आते तो देखा, लेकिन कोई मुस्कुराते नहीं गए, यह भी सत्य है। इन पांच दशकों में यह कार्यालय “जनता” उपसर्ग और प्रत्यय वाली पार्टियों को चकनाचूर होते देखा है, स्वाभाविक है जनता दल &#8211; यूनाइटेड भी अछूता नहीं रह पाएगा। यही यहाँ की मिट्टी का प्रारब्ध है। आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। </strong></p>
<p>वैसे कोई तीस सीढ़ियों के ऊपर पहली मंजिल पर जनता दल यूनाइटेड का आलीशान कार्यालय है, जहाँ कीमती लकड़ी के फर्नीचर और कुर्सियां भी लगे हैं, सफेद संगमरमर का गलीचा  नुमा सतह भी है, लेकिन लोगों का कहना है कि &#8220;नीतीश कुमार प्रदेश के मतदाताओं के साथ विश्वासघाती राजनीति किए। प्रदेश का मतदाता उन्हें और जनता दल &#8211; यूनाइटेड के नेतृत्व को मत दिया था। अपने हित में, या अपने पुत्र के हित में मतदाताओं के अधिकार को कैसे हस्तांतरित कर सकते हैं नीतीश कुमार ? मतदाताओं के पास कल भी विकल्प था, आज भी है, वैसी स्थिति में प्रदेश का मतदाता ही नहीं, पार्टी का एक बड़ा भाग जंतर मंतर से दीनदयाल उपाध्याय मार्ग अथवा अन्य रास्ता निकल सकता है। और इस बात को हल्के में नहीं लिया जाय। पार्टी के दर्जनों वरिष्ठ नेता जो गणित को बिगाड़ सकते हैं, नीतीश के निशांत को आशीष तो दे सकते, उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते, यह भी तय है। खैर। </p>
<blockquote><p>भारत के संसद से कोई पौने किलोमीटर दूर जंतर मंतर रोड पर ऐतिहासिक जंतर मंतर (जिसके नाम से यह इलाका है) के बाद अगर कोई स्थान बहुत मशहूर है तो दिल्ली पुलिस की आज की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मुद्दत से चलने वाली &#8216;सांभर-बड़ा&#8217; की दूकान, जहाँ नित्य लाखों का व्यवसाय होता है। कल इसी मार्ग पर खड़े होकर, 7-जंतर मंतर ईमारत की  ओर मुख किये सोच रहा था कि राजनीतिक पार्टियों में &#8216;विचारवान&#8217;, &#8216;प्रबुद्धजनों&#8217; की किल्लत क्यों हो गयी है। यह भी सोचने को विवश हो गया कि कैसे तीन दशक पहले एक छोटी से चूक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके समर्थकों को &#8216;वास्तु विज्ञानं&#8217; का अध्ययन करने, निर्णय लेने पर मजबूर किया था। निर्णय लिया गया और फिर इतिहास भी रचा गया। </p></blockquote>
<p>आइये, इसी बहाने पहले 11-अशोक रोड चलते हैं। कभी जीवंत रहने वाला यह बंगला आज भले बिल्कुल शांत दिखा, बिलकुल वीरान दिखा, लेकिन तीन दशक पहले उस रात क्या हुआ था, शायद आज के गणमान्यों को नहीं मालूम होगा। आज भी जीवित हैं गोविन्द आचार्य जी, मन करे तो पूछ लेंगे। आज मुख्य प्रवेश द्वारा पर सुरक्षाकर्मी दिखे। उसके बाएं हाथ लकड़ी का एक और दरवाजा दिखा, जो एक कक्ष में खुल रहा था। सुरक्षाकर्मी महोदय उस दरवाजे की ओर इशारा किये और मैं अपनी पहचान बताते प्रवेश लिया। सामने &#8216;ट्रिंग-ट्रिंग&#8217; करने वाला यंत्र लगा था जिसके रास्ते अंदर आना बाध्यकारी होता है &#8211; सुरक्षा जांच के लिए । कभी यह भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय हुआ करता था, 11 &#8211; अशोक रोड । कभी जीवंत होता था यह बंगला। आज मुश्किल से चार-पांच गाड़ियां इस बंगले के सामने बायीं ओर खड़ी दिखाई दी। कोई बैनर नहीं, कोई झंडा-पताखा नहीं। भाजपा के किसी भी नेता की कहीं कोई तस्वीर नहीं। कहीं भी जिन्दावाद-जिन्दावाद लिखा नहीं दिखाई दिया। लगभग 99 फीसदी नामोनिशान नहीं था। खैर। आज के लोगबाग़ नहीं समझेंगे आखिर ऐसा क्या हुआ कि 11 अशोक रोड तिरस्कृत हो गया। यहाँ आज कोई कर्यालय हैं, लेकिन किसका करयलय है, सभी चुप थे।  </p>
<figure id="attachment_7454" aria-describedby="caption-attachment-7454" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7454" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7454" class="wp-caption-text">7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय और अंदर दीवारों पर सजे नेताओं का पोस्टर । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>11-अशोक रोड भवन के पास आज की इस विरानीयत की बुनियाद सन 1996 में पड़ गई थी, जब दो सप्तक 13 दिन (मई 16, 1996 से जून 1, 1996) प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद, राष्ट्र का नेतृत्व करने के बाद, भारतीय जनता पार्टी के स्तम्भ सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री कार्यालय से बाहर आना पड़ा, भारी मन से। आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी &#8216;अदृश्य कारणवश&#8217; मुख्यमंत्री की कुर्सी को त्यागकर 250-संख्या वाली राज्यसभा में रखी कुर्सियों की क़तार में छह वर्ष के लिए एक कुर्सी के मालिक बने हैं। लेकिन कल क्या होगा उनके राजनीतिक जीवन में, यह वे भी नहीं जानते, भले उनके सहयोगी, सहकर्मी यह दावा करें कि नीतीश कुमार का अंतरी कई मीलों का है, शरीर मैं कहाँ कहाँ दांत है, कोई नहीं जानता । खैर । </p>
<p><strong>उस ऐतिहासिक, परन्तु, भारतीय राजनीतिक पटल के उस काला दिवस के कुछ ही दिनों के बाद भारत के बड़े-बड़े वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ, ज्ञानी, महात्मा, अंक-दिशा के ज्ञाता इस 11 अशोक रोड बंगला, बंगला की स्थिति की जांच-पड़ताल हुयी थी। कुछ परिस्थितियां भयंकर बाधक थी जो भाजपा के तत्कालीन समय और भविष्य के लिए अपसकुन था, प्रतिकूल था । उन तमाम विशेषज्ञों की एक बैठक हुई थी। पूरी रात, तक़रीबन छः घंटा का मनन-चिंतन किया गया था। उस बैठक में उपस्थित सभी महात्मनों के मुख से निकलने वाले शब्दों को भाजपा के, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सज्जन एकांत-चित होकर सुन रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन महात्मनों, विद्वानों, ज्ञानियों, विशेषज्ञों के जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजमान हों।</strong> </p>
<p>फिर यह निर्णय लिया गया कि संसद की दिशा से जब हम अपने बाएं हाथ कार्यालय परिसर में प्रवेश लेते हैं, प्रवेश के साथ ही विशालकाय नीम का वह वृक्ष सामने खड़ा दीखता है। कोई भी आगंतुक उस वृक्ष को नजर अंदाज नहीं कर सकता, चाहे पार्टी के नेता हों या पार्टी के कार्यकर्त्ता अथवा देश के मतदाता, जो भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान और भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी। सभी विशेषज्ञों का एक मत हुआ &#8211; या तो प्रवेश द्वार बदला जाय अथवा उस नीम के वृक्ष का &#8216;कतरन&#8217; किया जाए। वाजपेयी जी &#8216;सजीव&#8217; थे जीवन पर्यन्त और जीवों की पीड़ा जानते थे, महसूस किये थे। स्वाभाविक है वे वृक्ष के कतरन के विरुद्ध थे। हां, द्वार अलग किया जा सकता है, स्वीकार्य था उन्हें। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=Fw5OhZZ707U" target="_blank">​@अखबारवाला001 यूट्यूब पर सुनें जरूर &#8211; 7-जंतर मंतर:  एक अभिशप्त भवन, जेडी (यू) का राष्ट्रीय कार्यालय​ और नीतीश कुमार का दिल्ली आना </a></p>
<p>वास्तु-विशेषज्ञों, विद्वानों, महात्मनों का यह फैसला हुआ कि इस अवरोध के बाद भारतीय जनता पार्टी का स्थान देश के मतदाताओं के हृदय में अनमोल होगा, लिख लीजिये। अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में बनी और बिगड़ी वह 13 दिन की सरकार भाजपा के भविष्य का केंद्र बिंदु बन गया। 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक की सरकार और उनकी सरकार के विरोधी में, पार्टी के विरोध में जन्म ले रही अन्य पार्टियों की विचारधाराएं वाजपेयी जी के ह्रदय को छल्ली कर दिया था। फिर सरकार बनी और 19 मार्च, 1998 से 13 अक्टूबर, 1999 तक वाजपेयी जी प्रधानमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। बहरहाल, 11 अशोक रोड का वह मनहूस, वास्तु-विरोधी प्रवेश द्वार टूटना प्रारम्भ हो गया था और एक दूसरा रास्ता कोई 20 कदम दूर आगे सुरक्षित कर दिया गया था।   </p>
<blockquote><p>मैं सन 1996 में उस दिन अपने एक मित्र सुश्री अदिति कौल (अब दिवंगत) के साथ 11-अशोक रोड गोविंद आचार्य जी से मिलने आया था। कहानी की तलाश कर रहा था। लिखने के लिए कुछ भी नहीं था। दोपहर के एक बज गया था। उन दिनों गोविन्द जी 11 &#8211; अशोक रोड परिसर वाले भवन में पीछे दाहिने हाथ स्थित एक रसोई युक्त कमरे में रहते थे। हम दोनों को देखकर खुश हो गए। खाना नहीं बना था। फिर खिचड़ी-चोखा बना और बात-बात में बात निकल गई विगत रात की बैठक की, मंथन की, निर्णय की, भाजपा की वर्तमान मांगलिक-दशा की और वास्तु-दोष निवारण हेतु देश के महात्मनों द्वारा सुझाये उपायों की। मैं उस समय इण्डियन एक्सप्रेस का एक छोटा सा रिपोर्टर था। कोई पांच सौ शब्दों की कहानी लिखा गया जिसे प्रथम पृष्ठ पर प्राथमिकता के साथ प्रकाशित किया गया ।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7455" aria-describedby="caption-attachment-7455" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-7455" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7455" class="wp-caption-text"><br />7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय और सन्नाटा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>अगली सुबह दिल्ली सल्तनत के पत्रकार मित्र-मित्राणी मेरी कहानी का मज़ाक उड़ाए। वे कटाक्ष में हंस रहे थे और मैं यथार्थ में स्वीकार कर रहा था। कुछ दिन बाद 11-अशोक रोड का वह द्वार बंद हो गया। नीम के पेड़ का जीवन बच गया। इधर यह सब हो रहा था, उधर समय बदल रहा था। &#8216;वास्तु&#8217; अपना करवट ले रहा था। भाजपा की भाग्य रेखाएं बदल रही थी। &#8216;कुंडली&#8217; के घरों में बैठे तत्कालीन नेताओं का स्थान परिवर्तित हो रहा था। कहीं आकर्षण हो रहा था तो कहीं विकर्षण। 13 अक्टूबर, 1999 से 22 मई, 2004 तक वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किये। लेकिन देश में एक नए राजनेता का अभ्युदय अब तक हो गया था। समय और वास्तु अपने-अपने तरह से उसे संरक्षित, सम्पोषित कर रहा था। दस वर्ष बाद &#8216;वास्तु&#8217; और भाजपा की कुंडली में बैठे सभी नेताओं (अपवाद छोड़कर) के घरों में बेतहाशा परिवर्तन हुआ। एक आंधी चली। कई उस तूफ़ान में दूर अदृश्य हो गए। वास्तु-मंथन के बाद कई नए चेहरे अवतरित हुए।</p>
<p><strong>आज, 7-जंतर मंतर ईमारत के सामने सड़क के दूसरे तरफ चाय की दुकान पर, दिल्ली पुलिस और अन्य तैनात सुरक्षा कर्मियों के बीच चाय की चुस्की लेते, 7-जंतर मंतर मुख्य प्रवेश जंग लगा द्वार पर विशालकाय कूड़ा करकट का अम्बार, कुत्ते को विचरण करते, विशालकाय नीम का वृक्ष से सूखे पत्तों को गिरते देख तीन दशक पूर्व 11-अशोक रोड याद आ गया। कुछ कदम आगे बढ़ने, सड़क के दूसरे तरफ दिल्ली पुलिस द्वारा स्थापित लोहे के बड़े-बड़े पीले रंग के विरोधक के बाद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में दूसरा प्रवेश द्वार के पास बिलखती हुई मिटटी, ऊपर ईंट-से-ईंट अलग होते दीवार के ऊपर जंग लगा लोहे का एक नाम पट्टिका, जिसपर लिखा था &#8216;सरदार वल्लभ भाई पटेल स्मारक ट्रस्ट (निबंधित)&#8217; को देखकर मन बिचलित हो गया। कहने को तो वल्लभ भाई पटेल के नाम की राजनीति उनके मरने के बाद से आज तक हो ही रही है, दिल्ली में भी उनके नाम से पटेल चौक, पटेल चेस्ट अस्पताल, पटेल भवन, आदि हैं; लेकिन सरदार पटेल को दिल्ली में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका वे हकदार थे &#8211; 7, जंतर मंतर ईमारत के दूसरे प्रवेश द्वार पर जंग लगा बोर्ड गवाह है। </strong></p>
<p>आइये इमारत के अंदर चलते हैं। आप माने या नहीं मान आपकी मर्जी। भारत के संसद से पौने किलोमीटर दूर एक तरफ संसद मार्ग और दूसरे तरफ रायसीना रोड के बीच स्थित है 7-जंतर मंतर इमारत है । जंतर मंतर रोड का एक छोड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में निर्मिग नए संसद भवन के एक द्वार से मिलने वाला रायसीना रोड से मिलता है, जबकि दूसरा छोड़ सवई मानसिंह &#8211; II द्वारा निर्मित ऐतिहसिक जंतर मंतर को अपने दाहिने हाथ छोड़ते कनॉट प्लेस से संसद की ओर जाने वाला संसद मार्ग से मिलता है। वैसे इस भवन में इसके स्थापना काल से अनेकानेक राजनीतिक पार्टियां शरणागत हुई, लेकिन सबों ने इसका &#8216;शोषण&#8217; ही किया। परिणामस्वरूप यह भी किसी का भी नहीं हुआ। आज यह एक अभिशप्त इमारत के रूप में जाना जाता है, यह अलग बात है कि नई दिल्ली में इस भवन की, यहाँ की जमीन और मिटटी की कीमत कई सौ नहीं, बल्कि कई हज़ार करोड़ की होगी। </p>
<figure id="attachment_7456" aria-describedby="caption-attachment-7456" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7456" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7456" class="wp-caption-text">7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय का पिछला हिस्सा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>वर्तमान में 7-जंतर मंतर रोड इमारत में जनता दल यूनाइटेड का दफ्तर है, भले पार्टी के अंदर लोगों का मन अपने नेतृत्व के विरुद्ध हो, उनके प्रति खटास हो, मन और आत्मा से लोग &#8216;डिवाइडेड&#8217; हों। जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक नीतीश कुमार हैं । अब यह बंगला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश से राजनीतिक पलायन लिए नीतीश कुमार के लिए कितना &#8216;फलीभूत&#8217; होगा, यह तो समय बताएगा। लेकिन इस भवन का इतिहास यही कहता है कि यह भवन &#8216;अभिशप्त भवन&#8217; है और यह अपने स्थापना काल से किसी का नहीं हुआ है। जो भी इस भवन में आया वह राजनीतिक दृष्टि से अंततः नीचे गिरा ही है &#8211; नीतीश कुमार तरोताजा दृष्टान्त हैं। </p>
<p>7-जंतर मंतर को पिछले साढ़े तीन दशक से देखता आया हूँ। भारत के संसद से कोई पौने किलोमीटर दूर सर इडविन  लुट्येन्स द्वारा डिजाइन की गयी दिल्ली में करीब 950 ऐतिहसिक भवनों, जिसक निर्माण 1920-1940 के बीच हुआ, 7-जंतर मंतर भवन भी उसी भवनों में एक है। यह भवन अपने अंदर इतिहास के पन्नों को समेटे साँस ले रहा है। प्रवेश के साथ ही परिसर का अतिक्रमण दिखने लगता है। जो एक बार उन दिनों इस परिसर में प्रवेश ले लिए, निकलने का नाम नहीं ले रहे हैं। प्रवेश के साथ दाहिने हाथ कोई 105 डिग्री के कोण पर &#8216;पुस्तकालय&#8217; लिखा देख मन खुश तो हो गया। </p>
<p><strong>लेकिन दो कदम आगे बढ़ते ही मन उतना ही खिन्न हो गया जितना इस भवन में आने-जाने वाले राजनेताओं, राजनीतिक पर्टियों का भूत के बारे में सोचकर। इस पुस्तकलय में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ साथ, दीवारों पर टंगी नेताओं की तस्वीरों के साथ-साथ जो असहाय, दर्दनाक हाल किताबों, दस्तावेजों का देखा, वही हाल जनता दल &#8211; यूनाइटेड और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नितीश कुमार की तस्वीरों के साथ साथ पार्टी कार्यालय का। पार्टी कार्यालय के प्रवेश के सामने पान के पीक और अन्य गंदगियों के साथ सफ़ेद संगमरमर &#8216;काला रंग&#8217; का दिखा। चूहे मरने की बदबू भी आ रही थी। अगल-बगल दीवारों के साथ-साथ पेड़ों की टहनियों पर पार्टी के नेताओं की तस्वीरें भी लटके दिखे। परिसर में गंदगियों का अम्बार देखा।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान को निःसहाय परिसर में चतुर्दिक देखा।  </strong></p>
<figure id="attachment_7457" aria-describedby="caption-attachment-7457" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7457" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7457" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ अरविन्द कुमार सिंह</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, <strong>पटना से दिल्ली तक नीतीश कुमार और जनता दल &#8211; यूनाइटेड के भविष्य पर चर्चा करने के लिए दिल्ली सल्तनत के वरिष्ठ और राजनीतिक गलियारे में अपना बेदाग़ हस्तक्षर कायम रखने वाले पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह से बातचीत किया</strong>। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि &#8220;इतिहस गावह है कि यह ईमारत अभिशप्त है। अपने स्थापना काल से आज तक, अपवाद छोड़कर, यह ईमारत इसमें पनाह लेने वालों का कभी नहीं हुआ है। पिछले 50 वर्षों का ही इतिहास अगर देखें तो सन 1977 के बाद, जो भी यहाँ आये, सीढ़ी से ऊपर नहीं चढ़े, अलबत्त नीचे ही गिरते गए। 1947 से 1971 तक इंडियन नेशनल कांग्रेस का मुख्यालय था। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे बड़े नेता अक्सर इस जगह आते थे।जब 1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ, समय एक तरफ इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस (आर) बनी, वहीँ जो पुराने कांग्रेसी, मसलन के. कामराज , मोरारजी देसाई वाली काँग्रेस (ओ) बनी। उस कालखंड में इस भवन पर आधिपत्य कांग्रेस (ओ ) की हो गयी। </p>
<p><strong>इस भवन का एक ऐतिहासिक महत्व और भी है। 12 नवंबर, 1969 को, उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के अंदर उनके और “सिंडिकेट” ग्रुप के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया था। पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा, जो “सिंडिकेट” के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “एक तरह की पर्सनालिटी को बढ़ावा देने” के लिए पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा को निकालने की वजह से आखिरकार कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई। यह कहा जाता है कि सिंडिकेट ने फैसला किया कि विपक्षी जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार सी.डी. देशमुख को दूसरी प्रायोरिटी का वोट दिया जाए। लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी बात मनवा ली और यह पक्का किया कि कांग्रेस के ऑफिशियल उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी, बागी कांग्रेस उम्मीदवार वी.वी. गिरी से हार जाएं। राष्ट्रपति चुनाव के बाद, इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी पर सिंडिकेट की पकड़ कमजोर करने के लिए एक बड़ा कैंपेन शुरू किया। उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया और सिंडिकेट को ताकत दिखाने के लिए कांग्रेसियों को इकट्ठा किया।</strong></p>
<p>यह भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है कि इंदिरा गांधी के समर्थक अपनी ही पार्टी के खिलाफ चले गए, और नए राष्ट्रपति को चुनने के लिए एक स्पेशल कांग्रेस सेशन की मांग की। उन्हें यकीन था कि सिंडिकेट के पास मेजोरिटी नहीं है और वह गलत तरीकों से सत्ता पर काबिज है। इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों से नाराज होकर, निजलिंगप्पा ने एक खुला पत्र  लिखा, जिसमें प्रधानमंत्री और उनके साथियों पर पार्टी की अंदरूनी प्रजातंत्र को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया। पत्र  के जवाब में, इंदिरा गांधी ने निजलिंगप्पा की बुलाई मीटिंग में जाना बंद कर दिया।</p>
<p>अरविन्द जी कहते हैं कि &#8220;फिर 12 नवंबर 1969 को, कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग दो जगहों पर हुई — एक प्रधानमंत्री के घर पर और दूसरी इसी 7-जंतर मंतर में कांग्रेस के पास थी । 7-जंतर-मंतर कार्यालय में हुई मीटिंग में, निजलिंगप्पा ने अनुशासन के आधार पर इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा के निकाले जाने से कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई, जिसमें 705 कांग्रेस सदस्यों में से 446 इंदिरा के साथ चले गए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (आर)  के नाम से जाना जाता था और इसे “इंडिकेट” भी कहा जाता था, जबकि सिंडिकेट नेताओं के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (O) या “सिंडिकेट” के नाम से जाना जाने लगा।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7458" aria-describedby="caption-attachment-7458" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7458" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7458" class="wp-caption-text">7-जंतर मंतर: एक हिस्से में सरदार पटेल क नाम से  पुस्तकालय । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> से बात करते अरविन्द जी कहते हैं कि &#8220;1947 में इस भवन को मुंबई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एस के पाटिल कोई सात लाख रुपये में खरीदकर कांग्रेस पार्टी को दिए थे। वैसे इस भवन पर सरकार भी अपना आधिपत्य जमाती है, लेकिन इस भवन का असली मालिक कौन है, यह भी आज शोध का  विषय बना है। मंत्रालय  के पास यह दिखाने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ दिन पहले भारत के अखबारों में सबसे अधिक पत्र प्रकाशित होने के लिए गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले 76-वर्षीय सूचना का अधिकार कार्यकर्त्ता सुभाष अग्रवाल को सिर्फ यह बताया गया कि यह प्रॉपर्टी 1969 में अविभाजित कांग्रेस पार्टी को दी थी।  </p>
<p>अरविन्द जी आगे कहते हैं कि &#8220;जब 1977 में कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में विलय हो गयी, इस भवन पर जनता पार्टी का आधिपत्य हुआ । सन 1977 में जन्म लिए जनता पार्टी अगले 12-वर्षों में एक नहीं, सहस्त्र खण्डों में विभाजित हो गया और सभी अपने अपने नाम के साथ अलग होते गए। सबसे पहले 1979 में राज नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी (सेकुलर) बनी। यह पहला, लेकिन महत्वपूर्ण खंडन था। सन 1980 में तत्कालीन जनसंघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ भागीदारी सम्बन्धी दोहरी सदस्यता के कारण जनता पार्टी से अलग होकर &#8216;भरतीय जनता पार्टी&#8217; के रूप में राजनीतिक गलियारे में खड़ी हुयी। इसके आठ साल बाद सन 1988 में जनता दल बना। सं 1990 में जनता पार्टी के कभी अग्रणी रहे नेता, जो प्रधानमंत्री भी बने, चंद्रशेखर समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) बनाये। फिर पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह, जो जनता पार्टी में अहम् भूमिका निभाए थे, के पुत्र अजित सिंह राष्ट्रीय लोकदल बनाये।</p>
<p>सल 1992 में जनता दल का एक और खंड हुआ समाजवादी पार्टी के रूप में जिसका नेतृत्व मुलायम सिंह यादव किये। और इसी क्रम में 1997 में सम्पूर्ण क्रांति में अहम् भूमिका निभाने वाले लालू यादव जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल बनाये। उसी वर्ष अपने पिता के सम्मानार्थ नवीन पटनायक ने अपने पिता के नाम पर बीजू जनता दल का गठन किया और 24 वर्षों तक ओड़िसा में स्थायी सरकार दिए। आज प्रतिपक्ष में बैठे हैं। 1999 में पूर्व प्रधनमंत्री एच डी देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दाल का एक खंड जनता दल (स्कुलर) बना। </p>
<p><strong>अरविन्द सिंह कहते हैं कि साल 2003 में नितीश कुमार की अगुवाई में जनता दल (युनाइट्ड) का गठन हुआ। संख्या नहीं होने के बाद भी अपने तीर-कमान से अवसरवादियों का लाभ उठाते नितीश कुमार 20 वर्ष तक बिहार में रहे, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री कार्यालय को त्यागकर दिल्ली आ गए। कांग्रेस से लकर जनता पार्टी के रास्ते जनता दल यूनाइटेड तक, सभी पार्टियों और पार्टी के नेताओं, चाहे वे आदमद के हों या घुटने और तलबे के कद के, सभी की तस्वीरें यहां दीवारों पर, पेड़ों  टहनियों पर लटके &#8211; लेकिन अंततः सभी का क्या हश्र हुआ, इस विषय पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। यह अभिशप्त इमारत है। मैं नहीं समझता कि 20 वर्ष तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद नीतीश कुमार राज्यसभा में बैठकर कोई ऐतिहासिक कार्य कर देंगे। लेकिन यह भी तय है कि यह भवन जनता दल यूनाइटेड एक नेताओं को कितना संरक्षण देगा, यह कहना कठिन है। यदि इतिहास देखें तो संरक्षण नहीं दिया है, अतः इतिहास दोहराने की सम्भावना अधिक है। खैर।</strong> </p>
<p>अरविन्द सिंह कहते हैं कि यहां नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स का लंबे समय तक कार्यालय रहा है। आज भी उसका बोर्ड लटका है। इस भवन में जनता दल (यूनाइटेड), अखिल भारतीय सेवा दल (ऑल इंडिया सर्विसेज पार्टी) और इंडियन फ्रीडम फाइटर्स सक्सेसर्स ऑर्गनाइजेशन के ऑफिस भी हैं। सिंह का कहना है कि 1952 में पंडित नेहरू ने सोचा था की संसद के आस-पास कार्यालय होने से आम कार्यकर्ताओं के अलावे पार्टी को भी विचार-विमर्श करने का स्थान मिल जायेगा। यहाँ महात्मा गांधी भी आये हैं, नेहरू, पटेल और अन्य लोगों का भी आना-जाना तो होता ही था। जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ था, जिसके कर्ताधर्ता लाल बहादुर शास्त्री थे, इसी भवन में बैठकर चुनाव संबधी रणनीति बनाये थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7459" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आज पुस्तकालय में प्रवेश के साथ अध्ययन कक्ष में सफेद दीवारों पर कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेताओं की फ्रेम की हुई तस्वीरें लगी हैं जो इस बात का सबूत है कि उन दिनों यहाँ अलग-अलग विचारधारा वाले कई कांग्रेसी नेता, जिनमें नरमपंथी दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कट्टरपंथी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट का सेल्फ-रूल गुट, चित्तरंजन दास, गोपाल कृष्ण गोखले, कंजर्वेटिव राजेंद्र प्रसाद, मदन मोहन मालवीय और गांधी, नेहरू, बोस, अबुल कलाम आज़ाद और पट्टाभि सीतारमैया जैसे दूसरे देशभक्त शामिल हैं, आते थे। आज इस भवन पर सरकार के अलावे, दिल्ली सल्तनत ही नहीं, भारत के अन्य राज्यों के बड़े-बड़े भू-माफियाओं का, बड़े-बड़े बिल्डरों की नजर टिकी है। </strong></p>
<p>लाइब्रेरी में 23,000 से ज़्यादा किताबें हैं, जिनमें पॉलिटिक्स, बायोग्राफी, इकोनॉमिक्स, स्वतंत्रता संग्राम और इतिहास से जुड़ी किताबें शामिल हैं। ओरिजिनल रिकॉर्ड का यह अनदेखा खजाना ही लाइब्रेरी को शहर की किसी भी दूसरी पब्लिक लाइब्रेरी से अलग बनाता है। लाइब्रेरी में रखे भाषणों का एडिट किया हुआ कलेक्शन, मशहूर नेताओं के लेटर, शोधकर्ताओं को सच में कीमती जानकारी देता है। लाइब्रेरी के आर्काइवल सेक्शन में 1929 से 1974 तक राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी ओरिजिनल रिकॉर्ड पड़े हैं। इसमें कांग्रेस के सभी प्रेसिडेंट के भाषण, प्रस्ताव, अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठकों की कार्यवाही और कांग्रेस के बड़े नेताओं के भाषणों के 400 टेप शामिल हैं। इसके अलावा, कांग्रेस बुलेटिन का कलेक्शन और द जर्नल ऑफ़ इंडियन नेशनल कांग्रेस (1891-1921 के दौरान लंदन से पब्लिश हुआ) के 55 वॉल्यूम का एक सेट भी है, जो मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री के किसी भी शोधकर्ता के लिए बहुत खुशी की बात होगी। लेकिन पुस्तकालय की दीवारों को, छतों को, अलमारी को, किताबों को, रखरखाव को देखकर मन दुःखी हो जाता है।  खैर, शायद यही प्रारब्ध है। </p>
<p>वैसे, सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक ट्रस्ट, प्रॉपर्टी का होल्डर होने का दावा करता है। इसमें दावा किया गया है कि 30 अप्रैल, 1977 को, इंडियन नेशनल कांग्रेस के उस समय के प्रेसिडेंट अशोक मेहता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और चार अन्य लोगों ने सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक ट्रस्ट के पक्ष में डीड बनाई थी, जिसमें 1959 में हुए समझौते के अनुसार सरकार से उस प्रॉपर्टी पर सुविधा पाने के अपने सभी अधिकार और हित ट्रांसफर कर दिए गए थे। सरदार पटेल के नाम पर बने एक ट्रस्ट द्वारा मैनेज की जाने वाली यह लाइब्रेरी गांधी, पटेल और आज़ादी की लड़ाई के दूसरे बड़े नेताओं के आदर्शों और सोच को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7460" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>अरविन्द सिंह का कहना है कि धर्म सिंह का बनाया घर बाद में कांग्रेस हेडक्वार्टर बना। कुछ सालों तक, यह नवाब अब्दुल हसन खान के पास था, लेकिन 1947 के बंटवारे के बाद जब नवाब पाकिस्तान चले गए तो यह खाली प्रॉपर्टी बन गई। यह भी कहा जाता है कि धर्म सिंह को राष्ट्रपति भवन, साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक बनाने के लिए धौलपुर, राजस्थान और आगरा से पत्थर सप्लाई करने का काम सौंपा गया था। शोभा सिंह ने धर्म सिंह के बंगले के बगल वाली ज़मीन पर अपना बंगला बनवाया, जो बाद में केरल हाउस बन गया। शोभा सिंह ने जंतर मंतर में अपने बंगले का डिज़ाइन वाल्टर जॉर्ज को सौंपा, जिन्होंने मिरांडा हाउस, सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी के सबसे पुराने हॉस्टल ग्वायर हॉल और सुजान सिंह पार्क को भी डिजाइन किया था। </p>
<p><strong>अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि “अगर नीतीश कुमार जनता दल यूनाइटेड को मिले जनादेश को कायम रखते तो इतिहास रचते। लेकिन जनादेश मिलने के बाद उन्होंने जो विश्वासघाती राजनीति प्रदेश के मतदाताओं से किए, ग़लत किये। मैं पिछले पांच और अधिक दशकों में बीच की राजनीति कई बार देखा हूँ। अनुग्रह नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री बनने के लिए काफ़ी लॉबिंग किये, लेकिन बन नहीं पाए। यह अलग बात है कि आज बीजेपी कभी भी किसी भी राजनेता को, चाहे अपनी पार्टी का क्यों न हो, इतिहास लिखने नहीं देगा, शायद नीतीश कुमार भी उस चक्रव्यूह में फँस गए। कुछ तो कारण अवश्य है। लेकिन जब 7-जंतर-मंतर का यह इमारत देखता हूँ, तो यह स्पष्ट दिखता है कि यह भवन, यहाँ की मिट्टी इस बात का गवाह है कि यहाँ कोई ऊपर नहीं चढ़ा। अगर नीतीश कुमार राज्य सभा में पहली पंक्ति में भी बैठते हैं जहाँ सोनिया गांधी, मल्लिका अर्जुन, देवगौड़ा या फिर जेपी नड्डा बैठे हैं, उस राज्यसभा में वे क्या कर लेंगे? क्या बोलेंगे क्योंकि हरिवंश और आर सी पी सिन्हा पहले से मौजूद हैं। वैसी स्थिति में मौन द्रष्टा ही रह सकते हैं।” </strong></p>
<p>बहरहाल, नीतीश कुमार को अभी सात दिन भी नहीं हुए हैं बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, यकीन मानिए बिहार के मतदाता, जनता दल यूनाइटेड के अनुयायी या फिर उनके पार्टी के लोग भले उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे हैं, यथार्थ यह है कि सभी उन्हें भूलकर अपना अपना रास्ता देख रहे हैं, मनन मंथन कर रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में आधिकारिक रूप से शराबबंदी कर समाजवादी धारा को मजबूत बनाया, लेकिन राजनीति के अंतिम वसंत में लोहिया के समाजवाद को उनकी तस्वीर के साथ दीवार पर लटका कर भाजपा के आदेशानुसार पटना से दिल्ली का प्रयास उन्हें राजनीति में कहीं का नहीं रखेगा। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/7-jantar-mantar-a-cursed-building">&#8220;​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, &#8216;अभिशप्त है यह इमारत&#8217;, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा&#8221; &#8211; लिख लीजिये</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​भारतीय जनता पार्टी को अभी कई चुनाव और देखने होंगे बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 11:24:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chiel minister]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[vidhan sabha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना/दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : भारतीय जनता पार्टी को अभी कुछ साल और इंतज़ार करनी होगी जब उसके लोग प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में स्थापित होंगे। अगर संसद में 2 सीट (1984) से 240 सीट  (2024) आने में भारतीय जनता पार्टी को 42-वर्ष लगे, तो बिहार में साल 1980 में 21 सीट से 45 साल [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना/दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : भारतीय जनता पार्टी को अभी कुछ साल और इंतज़ार करनी होगी जब उसके लोग प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में स्थापित होंगे। अगर संसद में 2 सीट (1984) से 240 सीट  (2024) आने में भारतीय जनता पार्टी को 42-वर्ष लगे, तो बिहार में साल 1980 में 21 सीट से 45 साल बाद 2025 में 89 ही हो पाया है और बहुमत से मीलों दूर हैं। इस दृष्टि से अभी उसे &#8216;पिछलग्गू&#8217; ही बनकर ही रहना होगा। यानी स्थानीय राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को तुरंत पटक कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना &#8216;स्वप्न&#8217; ही रहेगा।</strong> </p>
<blockquote><p>वैसे भी, प्रदेश में आज की तारीख में और आने वाले दिनों में भी, ऐसे कोई भी भाजपा के नेता नहीं दिखते हैं, मुखरा नहीं है जो केंद्रीय नेतृत्व, यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखौटा के बिना राजनीतिक क्षेत्र में &#8216;जीवित&#8217; रह सकें। जो व्यक्ति भाजपा को बिहार में पहचान दिया, स्थायित्व दिया, घर-घर तक पहुँचाया &#8211; सुशील मोदी &#8211;  अंततः उन्हें भी वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। शब्द कटु है, लेकिन सत्य यही है।</p></blockquote>
<p>राजनीतिक परंपरा के अनुसार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज औपचारिक रूप से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेता चुने गए। इससे पहले वे जनता दल (यूनाइटेड) विधायक दल का नेता चुने गए। अब वे राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को अपना इस्तीफा सौंपेंगे और सरकार गठन के लिए एनडीए के सभी सहयोगियों का समर्थन पत्र पेश करेंगे। आज 17वीं विधानसभा का अंतिम दिन है और कल 18 वीं विधानसभा के गठन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में होगा। यहीं मुख़्यमंत्री सहित अन्य मंत्रीगण शपथ लेंगे। </p>
<p>नीतीश कुमार प्रदेश में दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब एक व्यक्ति किसी प्रदेश का दसवीं बार मुख्यमंत्री बनेगा। विगत चुनाव में 243 में से 202 सीटें जीतकर शानदार जीत हासिल की, जिसमें भाजपा ने 89 और जेडी(यू) ने 85 सीटें जीतीं। </p>
<p><strong>वैसे प्रदेश में जातीय जनगणना और चुनाव आयोग द्वारा &#8216;SIR&#8217; प्रथा के बाद आगामी सरकार के निर्माण में सभी जातियों के लोगों का भागीदारी हो सरकार में, मंथन चल रहा है। राजनीतिक गलियारे में चर्चाएं आम हैं कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते, भाजपा के पास सबसे अधिक मंत्री पद होने की उम्मीद है और वह दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ-साथ अपने स्वयं के विधानसभा अध्यक्ष को भी नामित कर सकती है। इन प्रमुख भूमिकाओं में जातिगत संतुलन सुनिश्चित करने के लिए एक सूत्र लागू किया जाएगा: यदि विधानसभा अध्यक्ष उच्च जाति से है, तो दो उपमुख्यमंत्री ओबीसी/ईबीसी और दलित समुदायों से चुने जा सकते हैं। इसके विपरीत, यदि विधानसभा अध्यक्ष ओबीसी/ईबीसी या दलित समूहों से है, तो एक उपमुख्यमंत्री उच्च जाति से और दूसरा ओबीसी/दलित पृष्ठभूमि से हो सकता है। एक महिला उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।</strong></p>
<p>वैसे, विगत बिहार विधानसभा चुनाव में जनसुराज पार्टी का हारना उसकी सबसे बड़ी जीत है, आप माने या नहीं। यह बात मैं नहीं, प्रधानमंत्री आवास से एक किलोमीटर दूर चाणक्यपुरी स्थित बिहार भवन के दीवार का सहारा लिए एक चाय की दूकान पर बैठा एक बुजुर्ग कर रहा था। दिल्ली के लाल किले पर स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराते देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से नरेंद्र मोदी तक प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने का द्रष्टा होने वाला वह वुजूर्ग कहता है कि अगर संसद में भारतीय जनता पार्टी को अपनी पहचान बनाने में 41-वर्ष लगे, और बिहार में अब तक अपनी पहचान नहीं बना पायी है, तो कल का बिहार जनसुराज पार्टी का ही होगा &#8211; गाँठ बाँध लीजिये महामहिम। </p>
<p><strong>कई साल पहले की एक डायरी पर लिखे शब्दों को देखकर बुजुर्ग बिहार के विगत चुनाव परिणाम पर तीखी टिप्पणी करते कहता है: &#8216;बिहार में किसी पार्टी की विजय नहीं हुयी है। प्रदेश में चुनाव चतुर्भुज चुनाव था जिसमें &#8211; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पुत्रों के उम्र के राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और जनसुराज पार्टी के बीच थी। प्रदेश में भाजपा के किसी भी अभ्यर्थी की अपनी कोई कमाई नहीं थी जो मत में बदल सके। भाजपा को मत सिर्फ़ और सिर्फ़ नरेंद्र मोदी के कारण मिला, न कि पार्टी को। </strong></p>
<p>नीतीश कुमार को कुछ अपने और कुछ अभ्यर्थियों के निजी छवि के कारण मिला। जबकि तेजस्वी यादव को कुछ पिता, कुछ अपने और कुछ अपनी छवि के कारण मिला। चाहे जितनी भी आलोचना की जाय, आज देश में सभी भाजपाइयों के लिए नरेंद्र मोदी एक मुखौटा हैं। आज हालात यह है की नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी ऊपर की छवि बन गए हैं। यह अलग बात है कि देश में लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर है। आज दस हज़ार पर बिका, कल बीस-पच्चीस हज़ार पर अपना मत बेच देगा। वजह भी है। जब व्यापारी पैसा लगाएगा राजनीति में तो वर्चस्व भी उसी का होगा और मुनाफा भी लेगा। </p>
<p>साल 1984 में भाजपा 229 स्थानों पर लोक सभा चुनाव लड़ी थी । लेकिन सिर्फ दो स्थानों पर विजय हासिल कर सकी। सभी 227 अभ्यर्थिओ चारो खाने चित हो गए। 1989 और 1991 में यह संख्या 85 और 120 पहुंची। 11 वीं लोकसभा चुनाव 1996 में 161, 1998 और 1999 में 182 स्थान पर रही। 2004 में 138 स्थान मिले, जबकि 2009 में सीटों की संख्या 116 हो गयी। जब भाजपा के नेतृत्व में चेहरे में बदलाव आया 2014 के चुनाव में 282, 2019 में 303 और फिर 2024 के चुनाव में 240 हो गयी। भाजपा की जो भी आज स्थिति है वह पार्टी के कारण नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष की छवि के कारण है। जो कार्य दीनदयाल उपाध्याय अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जोशी नहीं कर सके, नरेन्द्र मोदी अमित शाह की जोड़ी कर दिखाया। आप माने या नहीं। </p>
<p>2025 विधानसभा चुनाव, जिसे पत्रकारों से लेकर, दिल्ली  राजनीतिक विशेषज्ञ &#8216;अनोखा चुनाव और अनोखा परिणाम&#8217; से संबोधित कर रहे हैं, वे शायद इस बात को माने अथवा नहीं, बिहार विधानसभा के इस परिणाम से भाजपा का कोई ऐतिहासिक विजय नहीं हुआ और ना ही नीतीश कुमार का और ना ही तेजस्वी यादव का पराजय, आप माने अथवा नहीं। </p>
<p>आज भी आरजेडी को जितनी ही संख्या में सीटें मिली हैं, उसमें 80 से अधिक फीसदी लालू यादव को चारा चोर होने के बाद भी, उनकी ही कमाई का फल है। तेजस्वी अभी नीतीश को राजनीतिक टक्कर देने लायक नहीं हुए हैं, वहीँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ भाजपा के अन्य केंद्रीय अथवा प्रदेश के नेता नीतीश के बराबर कद पर खड़े होने लायक भी नहीं हुए हैं। आज नितीश कुमार को जो भी 85 सीटें मिली हैं, यह उनकी अपनी कमाई है। जबकि भाजपा भले 74 से 89 स्थान पर पहुंची हो, यह प्रदेश भाजपा के किसी भी सदस्य के निजी कमाई की ताकत से परे है। अगर नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे नहीं होता तो इस बात को नजर अंदाज नहीं कर सकते थे कि यह संख्या आधी-अधूरी भी नहीं होती। </p>
<p><strong>पत्रकार कमलाकांत पांडे कहते हैं कि &#8220;नीतीश कुमार को 2020 के चुनाव में मोदी जी के हनुमान ने उनको 43 विधायक वाली पार्टी बना दिया था। इस चुनाव में भाजपा और जदयू दोनों 101 और 101 सीटों पर लड़े। संख्या के हिसाब से नीतीश भले विधानसभा में दूसरे स्थान पर हैं, लेकिन यह ध्यान रखने की ज़रूरत है कि नीतीश की 43 विधायकों वाली पार्टी से 85 विधायकों वाली पार्टी बनी है और भाजपा 74 विधायकों वाली पार्टी से 89 बनी। यानी नीतीश कुमार 42 नई सीट जीते जबकि भाजपा सिर्फ़ 15 नई सीटें जीत पाई। भले ही भाजपा तकनीकी तौर पर अपने गठबंधन में सबसे बड़ी दिखती है, लेकिन हकीकत में नीतीश कुमार इस गठबंधन में सबसे आगे हैं। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा उन पर कृपा नहीं कर रही है। और यह बात नरेंद्र मोदी भी समझते हैं और अमित शाह भी। प्रदेश के लोग और भाजपाई नेता तो समझते ही हैं।&#8221;</strong></p>
<p>पांडे जी कहते हैं कि सम्पूर्ण हिंदी पट्टी में बिहार ही एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां भाजपा अब तक अपनी सरकार नहीं बना पाई है। बिहार बुद्ध की धरती है। यहीं चंपारण के सत्याग्रह के ज़रिए महात्मा गाँधी संपूर्ण देश में जाने गये। यह लोहिया और जयप्रकाश के संघर्ष की धरती है। इस धरती ने अब तक स्वतंत्र रूप से हिंदुत्व की विचारधारा को अपनी धरती पर फलने फूलने नहीं दिया है। आज भी भाजपा यहां अन्य दलों से आयातित लोगों के कंधों पर ही टिकी हुई है।&#8221;</p>
<p>जहाँ तक प्रदेश में भाजपा का नेतृत्व और लोगों पर उसकी पकड़ का प्रश्न है, वह अभी 20 फीसदी से अभी अधिक नहीं है। अगर इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं होता तो औसतन 60 फीसदी से अधिक अभ्यर्थी मुंह के बल गिरते। कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24) और दिलीप कुमार जायसवाल (2024 से अब तक) ये सभी पिछले 44 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। </p>
<p>सवाल यह है कि इन लोगों के कार्यकाल में भाजपा मजबूत हुआ, पार्टी मजबूत हुयी, भाजपा में बिहार के मतदाताओं का रुझान क्या रहा, यह इस बात का ,प्रमाण है कि आज भी 43 विधायकों के साथ नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और भाजपा के नेता उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। 2015 में विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या भले 53 से बढ़कर 17वीं विधानसभा में 74 हो गया हो; लेकिन यह संख्या भाजपा की अपनी नहीं है। यह संख्या नीतीश कुमार द्वारा दान स्वरुप हैं। 2015 में जनता दल यूनाइटेड की विधानसभा में संख्या 71 थी, जो 17वीं विधानसभा में 43 हो गयी। राष्ट्रीय जनता दल की संख्या भले 80 से घटकर 75 हो गया हो, लेकिन आज भी मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ है।</p>
<p>बहरहाल, आज़ाद भारत में अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत 75 वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। आज भले प्रदेश के नेताओं को, लोगों को, मतदाताओं को दिखाई नहीं दे सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण, आने वाली पीढ़ियां कभी माफ़ नहीं करेगी – न नेताओं को और ना ही मतदाताओं को। </p>
<p><strong>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक।</strong> </p>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता – सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है – का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा। </p>
<p>10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। </p>
<p>11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में ”चाराचोर” के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के वावजूद राबड़ी देवी प्रदेश की मतदाताओं के विश्वास और अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतरीं। </p>
<p>10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। </p>
<p>11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे – सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं। </p>
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		<title>जो खिल सके न वो फूल हम हैं &#8211; तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं &#8211; दया की दृष्टि सदा ही रखना 🙏</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/who-will-be-the-next-cm-of-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 03 Aug 2025 12:58:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[jdu]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार किसी भी तथ्य को कितना &#8216;गोपनीय&#8217; रख सकते हैं, यह कहना कठिन है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिवेश के मद्दे नजर उन्होंने कोई 13-करोड़ के प्रश्न पर चर्चाएं छेड़े कि आगामी 2 नवम्बर को देवोत्थान एकदशी और तीन दिन बाद 5 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा के बाद बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? नीतीश कुमार रहेंगे या नीतीश कुमार पूर्व-मुख्यमंत्री की कतार में पंक्तिबद्ध होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं का नाम बिना अपने होठों पर लाये दोनों एक स्वर में कहते हैं: &#8216;कुछ ऐसा ही होने वाला है।&#8217;</strong></p>
<p>दोनों नेता आपस में इस बात पर चर्चा करते हैं कि कल के जिस किंग्सवे और राजपथ को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कर्तव्य पथ का नाम देकर भारत के लोगों को अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया, विगत कुछ महीनों में प्रधानमंत्री का तीन-तीन बार बिहार का भ्रमण-सम्मेलन के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्रियों का बिहार का दौरा करना इस बात का सूचक है कि श्री मोदी जी अब अधिक संख्या होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को &#8216;सहायक&#8217; के रूप में और उसके नेताओं को &#8216;जनता दल यूनाइटेड&#8217; के नीचे नहीं रहने देना चाहते हैं। कर्तव्यपथ के दोनों तरफ की हरियाली को देखते, उस पर सकारात्मक टिपण्णी करते पहले कहते हैं कि &#8216;आज भारत का शायद ही कोई व्यक्ति होगा तो पैदल इस चमचमाते सड़क पर नहीं चलना चाहेगा। आज अगर राज कपूर जीवित होते, या फिर सत्यजीत रे जीवित होते, बिमल राय जीवित होते, गुरु दत्त जीवित होते, यश चोपड़ा जीवित होते, बीआर चोपड़ा जीवित होते तो मोदी जी की इस महानतम उपहार को देखकर कर्तव्यपथ को अपने किसी न किसी सिनेमा में स्थान अवश्य देते। </p>
<p><strong>तभी एक नेता कहते हैं, आज भी बिहार में प्रदेश के मुख्यमंत्री जो भी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रदेश के विकास में चार चाँद लगा दिया है, यह कहने में हिचकी लेने लगते हैं कि विगत 11-वर्षों में अगर प्रधानमंत्री का सहयोग नहीं रहता उन्हें तो कुर्सी पर भी विराजमान नहीं होते। अब आप ही सोचिये, वर्तमान विधानसभा में भाजपा की जितनी संख्या (80) है, उसकी आधी संख्या (45) है जनता दल यूनाइटेड है। वैसी स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना नीतीश कुमार के लिए तो सपना ही होता न। वह तो प्रधानमंत्री की उदारता है कि उन्हें बैठा दिए। लेकिन अगर यह प्रक्रिया इस बार भी दोहराते हैं तो भाजपा के प्रादेशिक नेताओं का अपमान होगा। यह बात मोदी जी जानते हैं।</strong> </p>
<p>अब तक दोनों नेता मौलाना आज़ाद रोड और सेना भवन की ओर से आने वाली सड़क जो कर्तव्य पथ से मिलती आगे निकल जाती है, पहुँच गए थे। तभी दूसरे नेता कहते हैं, नवम्बर 22 को बिहार का वर्तमान विधानसभा का काल समाप्त होने जा रहा है। स्वाभाविक है चुनाव के मद्दे नजर, खासकर आचार संहिता लगने से पूर्व, दिल्ली से पटना तक, प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री तक सबकी निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय में लगी कुर्सी पर टिकी है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मन में मनभर का लड्डू फूटना स्वाभाविक है &#8211; फिर एक बार मुख्यमंत्री बनने के लिए। लेकिन दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर नवनिर्मित कॉर्पोरेट कार्यालय नुमा भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर मंथन जारी है कि बिहार में राजनीतिक किला फतह के लिए बिहार से ही उपराष्ट्रपति लाना होगा, वह भी ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं, अपितु वैश्य या शूद्र। गणना आप सभी ज्ञानी महात्मा करें।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg" alt="" width="2032" height="1268" class="aligncenter size-full wp-image-7044" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-768x479.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-1536x958.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a></p>
<p>इस बात को सुनते है पहले नेता कहते हैं आपको याद होगा ही कि 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद जिन्हे राष्ट्र का गोविन्द बनाया गया था, दलित समुदाय से थे। परिणाम यह हुआ कि 2019 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के 30 से अधिक स्थानों को प्रधानमंत्री के चरणों में अर्पित कर दिए। इसका फल उन्हें 42 संख्या आने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। आप माने अथवा नहीं, साल 2019 से अभी तक, सैद्धांतिक रूप से भले नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं, व्यावहारिक रूप से नियंत्रण भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से ही है। वैसी स्थिति में आगामी चुनाव में जनता दल यूनाइटेड 42 से 20 पर आएंगे या 2 पर, यह तो नीतीश कुमार की आत्मा ही जानती है; लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग की हवाएं यह बता रही है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी के आला कमान इस बात से आश्वस्त हैं कि उन्हें प्रदेश में सरकार बनाने में &#8216;बैसाखी&#8217; की जरूरत नहीं होनी चाहिए। </p>
<p><strong>वैसे रायसीना पहाड़ी पर आते आते दोनों नेता दो दिशाओं में हो गए, लेकिन जाने से पहले दोनों इस बात पर जोर से ठहाका लगाए कि सन 1990 से पहले बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर टकटकी निगाहों से देखते रहते थे। कई मर्तबा तो एक ही विधानसभा काल में चार-पांच मुख्य मंत्री कुर्सी पर बैठे। आया-राम-गया-राम का मुहाबरा बिहार से ही चला। राष्ट्रीय जनता दल की सरकार तो प्रदेश को सत्यानाश कर ही दिया। लेकिन जब से नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उनकी भी रीढ़ की हड्डी उतनी मजबूत नहीं रही। कभी इधर, कभी उधर देखते, नाप-जोख करते कुर्सी पर विराजमान रहे। जब से मोदी जी प्रधानमंत्री बने, तबसे नीतीश कुमार भी उन्हें उसी तरह देखते आ रहे हैं &#8216;अपेक्षा की नज़रों&#8217; से जैसे कांग्रेस के कालखंड में मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर इंदिरा गांधी को देखते थे। वह तो मोदी जी सब कुछ जानकार भी अनजान बने हैं। </strong></p>
<p>बहरहाल, भारत के 17वां उपराष्ट्रपति के निर्वाचन हेतु निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना 7 अगस्त, 2025 को जारी की जाएगी। नाम-निर्देशन करने की अंतिम तारीख 21 अगस्त, 2025 और नाम-निर्देशनों की संवीक्षा की तारीख 22 अगस्त, 2025 होगी। अभ्यर्थिताएं वापस लेने की अंतिम तारीख  25 अगस्त, 2025, मतदान की तारीख 9 सितंबर, 2025 और मतदान की और गणना 9  सितम्बर को ही होगी।  राष्ट्रपतीय और उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन नियम, 1974 के नियम 8 के अनुसार, निर्वाचन के लिए मतदान संसद भवन में आयोजित किया जाएगा। मतदान, यदि आवश्यक हुआ तो, कमरा सं. एफ-101, वसुधा, प्रथम तल, संसद भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।</p>
<p>निर्वाचन आयोग ने केंद्र सरकार के परामर्श से, 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से भारत के उपराष्ट्रपति के पद के वर्तमान निर्वाचन के लिए रिटर्निंग अधिकारी के रूप में राज्य सभा के महासचिव को नियुक्त किया है। आयोग ने 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से संसद भवन (राज्य सभा) में रिटर्निंग अधिकारी की सहायता करने के लिए दो सहायक रिटर्निंग अधिकारियों की भी नियुक्ति की है। 17वें उपराष्ट्रपति निर्वाचन, 2025 के लिए निर्वाचक-मंडल में निम्न शामिल हैं:  राज्य सभा के 233 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 05 सीटें रिक्त हैं), राज्य सभा के 12 मनोनीत सदस्य, और लोक सभा के 543 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 01 सीट रिक्त है) निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के कुल 788 सदस्य (वर्तमान में 782 सदस्य) शामिल हैं। चूंकि, सभी निर्वाचक संसद के दोनों सदनों के सदस्य हैं, इसलिए संसद के प्रत्येक सदस्य के मत का मान एक समान अर्थात 1 (एक) होगा। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg" alt="" width="2032" height="1268" class="aligncenter size-full wp-image-7045" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-768x479.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-1536x958.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, चुनाव आयोग द्वारा नए उप-राष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा के साथ ही, इस संवैधानिक पद पर अगला पदभार ग्रहण करने वाले व्यक्ति को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। कहा जा रहा था कि चूंकि इस चुनाव के लिए कोई समय सीमा नहीं है, इसलिए इसमें देरी हो सकती है, क्योंकि राज्यसभा के उपसभापति उच्च सदन के मुख्य पीठासीन अधिकारी होंगे। हालांकि, चुनाव की घोषणा से संकेत मिलता है कि भाजपा इस मुद्दे पर किसी भी तरह की अटकलों को खत्म करने के लिए जल्द ही नए उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है।</strong></p>
<p>पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर अपने कार्यकाल के दौरान हर मुद्दे पर बोलने और पक्ष लेने के कारण सदन की मर्यादाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। इस संदर्भ में, यह याद रखना होगा कि जब 2022 में धनखड़ उपराष्ट्रपति चुने गए थे, तब भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था, इसलिए उन्हें उपराष्ट्रपति पद दिलाने में कोई समस्या नहीं थी। 2024 के चुनावों के बाद कम संख्या बल के साथ, भाजपा, अपने उम्मीदवार को निर्वाचित कराने की स्पष्ट स्थिति में है, लेकिन उसे अपने गठबंधन सहयोगियों की संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना होगा। आज की स्थिति में, सहयोगी दल पूरी तरह से भाजपा नेतृत्व के साथ हैं, और अगर विपक्ष अपना उम्मीदवार खड़ा करके कोई औपचारिक लड़ाई नहीं लड़ने का फैसला करता है, तो अगला उप-राष्ट्रपति सर्वसम्मति से चुना जाएगा। ऐसी खबरें भी हैं कि इस मामले में आरएसएस की भूमिका हो सकती है, इसलिए उसकी स्वीकृति भी आवश्यक होगी।</p>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक पंकज वोहरा का मानना है कि &#8216;कई राजनीतिक विश्लेषक नए उप-राष्ट्रपति के चयन को अगले भाजपा अध्यक्ष के फैसले से भी जोड़ रहे हैं। यह सर्वविदित है कि वर्तमान भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का विस्तारित कार्यकाल जल्द ही समाप्त होने वाला है, और यदि उनके उत्तराधिकारी का चयन नहीं हो पाया है, तो इसका मुख्य कारण पार्टी नेतृत्व और आरएसएस के बीच किसी एक नाम पर सहमति न बन पाना है। कई नाम सार्वजनिक रूप से सामने आए, लेकिन एक-एक करके, आम सहमति के अभाव में वे गायब हो गए। भाजपा के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह अगले उपराष्ट्रपति के रूप में अपना उम्मीदवार चुने, ताकि राजनीतिक हलकों में इस मामले में उसकी पूर्ण भागीदारी का स्पष्ट संदेश जाए। उपराष्ट्रपति की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह राज्यसभा के सभापति भी हैं।&#8217;</strong></p>
<p>उनका कहना है कि जो लोग भाजपा-आरएसएस संबंधों पर, खास कर पिछले एक साल से, नज़र रखे हुए हैं, उनके लिए आरएसएस केवल उसी व्यक्ति को हाँ कहेगा जिसका संघ के संबंध में एक सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड हो। इससे धनखड़ जैसे किसी भी व्यक्ति का चयन संभव नहीं है, जिन्हें चुना गया, हालांकि उनके करियर के अलग-अलग दौर में जनता दल और कांग्रेस, दोनों के साथ रहने का अनुभव रहा है। दूसरे शब्दों में, अगला उप-राष्ट्रपति संघ परिवार से ही होना चाहिए, जब तक कि भाजपा मोहन भागवत और उनके साथियों को ऐसे चुनाव में आने वाले राजनीतिक लाभ के बारे में समझाने में सफल न हो जाए।</p>
<p>हालाँकि, संघ के भीतर के माहौल को देखते हुए, यह करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। एक तरीका यह हो सकता है कि अगर भाजपा का वर्तमान नेतृत्व और संघ, पार्टी के अगले अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों पर एक साथ सहमति बना लें, तो आरएसएस इस पर सहमत हो सकता है। अगर अगले पार्टी प्रमुख के लिए आरएसएस की बात मान ली जाती है, तो वह अगले उपराष्ट्रपति के लिए भाजपा की पसंद को स्वीकार कर सकता है। यह एक तरह से लेन-देन जैसा हो सकता है। इस बात की भी ज़ोरदार अटकलें हैं कि मानसून सत्र के तुरंत बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। यह निश्चित रूप से प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन इस प्रक्रिया का उपयोग सभी हितधारकों को संतुष्ट करने और आगे आने वाली किसी भी नई चुनौती का सामना करने के लिए किया जा सकता है।</p>
<p>मंत्रिमंडल में फेरबदल और पार्टी का पुनर्गठन, दोनों ही शायद यह सुनिश्चित करने की कुंजी होंगे कि भाजपा और संघ के बीच सौहार्द किसी भी तरह से न बिगड़े। अगले उपाध्यक्ष पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगला उपाध्यक्ष वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने पर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिए भी योग्य होगा। कई उपराष्ट्रपति आगे चलकर राष्ट्रपति बने हैं, लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं जो राष्ट्रपति नहीं बन पाए। उपराष्ट्रपति पद के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम भी चर्चा में है, जिन्हें संघ के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्त है और वे अपने विरोधियों को भी स्वीकार्य हैं।</p>
<p>सवाल यह उठेगा कि क्या प्रधानमंत्री उन्हें उनके वर्तमान पद से मुक्त करना चाहेंगे, क्योंकि सरकार के अनुसार &#8220;ऑपरेशन सिंदूर&#8221; अभी भी &#8220;जारी&#8221; है। कुछ हलकों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, जो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों के करीबी हैं, के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। उनका चयन संघ की स्वीकृति पर निर्भर करेगा। आरिफ मोहम्मद खान, गुलाम नबी आज़ाद और नीतीश कुमार जैसे अन्य नाम भी चर्चा में हैं।</p>
<p>हालांकि, मुख्य मुद्दा यह है कि अगला भाजपा अध्यक्ष कौन होगा, क्योंकि दोनों मामलों पर एक साथ निर्णय लिया जाएगा और वे किसी न किसी तरह आपस में जुड़े हुए हैं। आरएसएस ने भाजपा के शीर्ष पद के लिए अपनी प्राथमिकताएँ पहले ही बता दी हैं और अब भाजपा की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहा है। यह भविष्य के भाजपा-आरएसएस संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है।</p>
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		<title>पटना के नेताओं की सुखी आंखों के सामने बारिश में जब शहर जलमग्न हुआ 👁 श्री फणीश्वरनाथ &#8216;रेणु&#8217; जी बहुत याद आये </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 02 Aug 2025 12:00:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बहिरा नाचे अपने ताल]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>डाक बंगला चौराहा (पटना): पिछले दिनों पटना में था। डाक बंगला चौराहा पर एक जंग लगा लोहे के बोर्ड पर लिखा देखा &#8216;रवींद्र चौक&#8217;, और वहीँ रिक्शा पर बैठे एक सज्जन से बात करते रिक्शा चालक उन्हें इस चौराहे को डाक बंगला चौराहा&#8217; नाम से सम्बोधित करते स्थान का इतिहास बता रहा था। मैं आकाशवाणी की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/remembering-renu-in-innundated-patna">पटना के नेताओं की सुखी आंखों के सामने बारिश में जब शहर जलमग्न हुआ 👁 श्री फणीश्वरनाथ &#8216;रेणु&#8217; जी बहुत याद आये </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डाक बंगला चौराहा (पटना): पिछले दिनों पटना में था। डाक बंगला चौराहा पर एक जंग लगा लोहे के बोर्ड पर लिखा देखा &#8216;रवींद्र चौक&#8217;, और वहीँ रिक्शा पर बैठे एक सज्जन से बात करते रिक्शा चालक उन्हें इस चौराहे को डाक बंगला चौराहा&#8217; नाम से सम्बोधित करते स्थान का इतिहास बता रहा था। मैं आकाशवाणी की ओर अपना मुख किये, ऑटो में बैठे उसकी बातों को सुन रहा था। रिक्शा वाले की आयु 40-वर्ष से अधिक नहीं थी। वह सन चौहत्तर में लालू यादव को कैसे पटना पुलिस कुटी थी, प्रथम द्रष्टा जैसा बयान कर रहा था। मैं उसकी बातों का मजा ले रहा था। आखिर पटना हैं, यहाँ लोग &#8216;छोड़ते&#8217; अधिक हैं। वहां खड़ी यातायात पुलिस जैसे ही अपने हाथ का इशारा की, पों,पां पों पां पीं ट्रिंग, ट्रिंग के बीच सभी की आवाज दब गयी। खैर। </strong></p>
<p>डाक बंगला चौराहे का गुरु रविंद्र नाथ टैगोर के नाम से नामकरण करने वाले अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री, किरानी, चपरासी, बड़ा बाबू चाहे जो भी कह लें, यह राजनीतिक लाभ के लिए ही था। पटना में बंगाली मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक है। पटना से दिल्ली होते कलकत्ता तक, भारत का शायद ही कोई बंगाली समुदाय का घर होगा जिस घर में &#8216;गुरुदेव&#8217;, &#8216;माँ काली&#8217; और &#8216;विवेकानंद&#8217; की तस्वीरें दीवारों पर नहीं लटकी दिखती हो। उनके प्रति बंगाली समुदाय का जो स्नेह, प्रेम, आस्था, विश्वास है, &#8216;अपवाद छोड़कर&#8217;, वह किसी भी अन्य समुदाय का नहीं हो सकता है।</p>
<p>सत्तर के दशक तक यह चौराहा अपने अस्तित्व को, इतिहास को समेटे था। बाद में जैसे-जैसे पटना सचिवालय में बैठे मंत्री-संत्री-अधिकारी-पदाधिकारी दिल्ली, अमेरिका, लन्दन घूमने लगे, डाकबंगला चौराहे पर अस्तित्व मिटता गया। जब बिहार-बंगाल-उड़ीसा प्रान्त था, उस कालखंड में 1893 में बांकीपुर रेलवे स्टेशन से आती सड़क जब अपने बाएं हाथ बिहार और उड़ीसा के तत्कालीन अधिकारी सर स्टुअर्ट कॉल्विन बैले के नाम से अंकित बेली रोड (आज का जवाहर पथ) को छोड़ती आगे निकलता था, बाएं हाथ कोने पर (लखनऊ स्वीट हॉउस) के सामने एक खूबसूरत डाक बंगला हुआ करता था, जिसका निर्माण 1893 में हुआ था। बहुत सारी बातें हैं इस चौराहे के साथ जुड़ी हुई। खैर। </p>
<figure id="attachment_7035" aria-describedby="caption-attachment-7035" style="width: 2036px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1-.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1-.jpg" alt="" width="2036" height="1225" class="size-full wp-image-7035" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1-.jpg 2036w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1--300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1--1024x616.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1--768x462.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-1--1536x924.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2036px) 100vw, 2036px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7035" class="wp-caption-text">डाकबंगला चौराहे पर बच्चे</figcaption></figure>
<p><strong>विगत दिनों जब घनघोर बारिश में पटना डूबा तो कई बातें याद आ गई। और सबसे अधिक याद आये फणीश्वर नाथ रेणु जी। सन 1975 में अगस्त महीने में पटना पनियाई थी। वजह सोन नदी से कोई 14.48 लाख क्यूसेक पानी का पटना शहर में ढुकना था । उसी वर्ष मार्च के महीने में पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन समाचार पत्र में नौकरी की शुरुआत किये थे। मार्च महीने से अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह तक पटना की सड़कों पर, पाटलिपुत्र कालोनी में, बेलीरोड में, कंकड़बाग में, राजेंद्र नगर में या यूँ कहें की पटना जिला के निचले क्षेत्रों में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। </strong></p>
<p>तभी हमारे दफ्तर (आर्यावर्त-इण्डियन नेशन समाचार पत्र का कार्यालय) के प्रवेश द्वार और तत्कालीन स्थित केंद्रीय कारा के प्रवेश द्वार के बीचोबीच सड़क के बाएं कोने पर स्थित भूमिगत नाला से पानी का बुलबुला फ़्रेज़र रोड को धोना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो सभी तत्कालीन मुख्यमंत्री को गलियाना प्रारम्भ किये। भूमिगत नालों को बनाने वाले अभियंताओं को ठूसना प्रारम्भ किये। धीरे-धीरे पहले सड़क भींगी, फिर लोगों के तलबे भींगे, फिर घुटने, फिर ठेंघुना और फिर जांघ को स्पर्श करने लगा। </p>
<p>क्या मर्द, क्या महिला, क्या बच्चा, क्या जवान, क्या बूढ़ा, क्या बूढ़ी सबों ने प्रारम्भ में तो पानी का मजा लिए, लेकिन कोई 24-36 घंटे के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र की राजधानी का अधिकांश हिस्से को अपने में समेट लिया। यानि पूरा पटना जलमग्न। जान -माल की कितनी हानि हुई, आंकना मुश्किल था। पनियाई पटना में पटना के संभ्रांत कितनी महिलाओं की भींगी वस्त्र को उतारे, इसे भी आंकना मुश्किल ही नहीं, ह्रदय विदारक था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3.jpg" alt="" width="2036" height="1225" class="aligncenter size-full wp-image-7036" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3.jpg 2036w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3-1024x616.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3-768x462.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-3-1536x924.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2036px) 100vw, 2036px" /></a></p>
<p>हमारा दफ्तर भी पानी में डूब गया। प्रेस का हिस्सा, लाइनों, मोनो मशीन, रोटरी मशीन, लाखों टन न्यूजप्रिंट सभी पानी में समा गए। प्रकाशन ठप्प, लेकिन दफ्तर तो आना ही था। बाढ़ का यह पानी अशोक राज पथ पर सब्जी बाग़ से कुछ आगे बी एन कालेज तक था। नित्य हाथ में एक डंडा लिए सड़क के बीचो-बीच चला करते थे। </p>
<p>जब गाँधी मैदान के कोने से बिस्कोमान से बाएं हाथ का रास्ता लेते थे, तब डिवाईडर को पकड़-पकड़ कर आगे बढ़ते थे। उसी तैरते पानी में मानव-मल नाव की भांति तैरते मिलता था। वैसे उस समय तक सुलभ शौचालय के डॉ बिंदेश्वर पाठक यदा-कड़ा दीखते थे। लेकिन उनके प्रागण में शंका दूर करने का अर्थ था “अपने है प्रसाद अपने ही सर”, क्योंकि पानी कमर तक थी। इसलिए लोग बाग़ जब तक पानी का स्तर नीचे सतह तक नहीं आया था, बैठकर शंका दूर करना या तो भूल गए थे, या फिर परहेज करने लगे  थे। बहुत भयानक स्थिति थी। </p>
<p>विगत दिनों बारिश के कारण बिहार की राजधानी में जलजमाव के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। उसी क्रम में कुछ तस्वीरें ढूंढ रहे थे, तभी अचानक पटना आकाशवाणी की यह तस्वीरें दिखी। इन तस्वीरों के देखते ही दो बातें मानस पटल पर राजधानी एक्सप्रेस की गति से टकराई। </p>
<p><strong>एक: सन 1967 में फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी की ‘रिक्सा-यात्रा’ और दूसरा” सन 1975 के इसी महीने के अंतिम सप्ताह में पटना के डाक बंगला चौराहे पर नाव का चलना। सन 1967 की त्रादसी तो नहीं देखा था, लेकिन सन 1975 की त्रादसी भी लगभग बराबर थी। वैसे दो त्रादसी को आंकना मानवता से पड़े है, क्योंकि जान एक की जाय या हज़ार की – पटना वाले रोने में पीछे नहीं रहते। ह्रदय के अन्तः कोने से रोते हैं। हां, आंसू पोछने के बाद एक-एक बून्द से राजनीति करने में, पंचायत से विधान सभा और विधान परिषद् तक ढुकने में कोई कसर नहीं छोड़ते। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8.jpg" alt="" width="2036" height="1225" class="aligncenter size-full wp-image-7037" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8.jpg 2036w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8-1024x616.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8-768x462.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-8-1536x924.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2036px) 100vw, 2036px" /></a></p>
<p>पहले रेणु जी की बातें करते हैं। सं 1975 की बाढ़ से पहले भी पटना शहर में 1967 में भयानक जलजमाव हुआ था। आकाशवाणी की यह तस्वीर शायद उस जलजमाव से काम था। रेणुजी लिखते हैं कि “जब अट्ठारह घंटे की अविराम वृष्टि के कारण पुनपुन का पानी राजेंद्र नगर, कंकड़बाग तथा अन्य निचले हिस्सों में घुस आया था। अर्थात् बाढ़ को मैंने भोगा है, शहरी आदमी की हैसियत से। इसलिए इस बार जब बाढ़ का पानी प्रवेश करने लगा, पटना का पश्चिमी इलाका छाती-भर पानी में डूब गया तो हम घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, सिगरेट, पीने का पानी और कांपोज की गोलियां जमाकर बैठ गये और प्रतीक्षा करने लगे।”</p>
<p>ऋणजल – धनजल” में रेणु जी ने लिखा है: “सुबह सुना, राजभवन और मुख्यमंत्री-निवास प्लवित हो गया है। दोपहर में सूचना मिली, गोलघर जल से घिर गया है! (यों, सूचना बंगला में इस वाक्य से मिली थी – “जानो! गोलघर डूबे गेछे !”) और पांच बजे जब कॉफी हाउस जाने के लिए (तथा शहर का हाल मालूम करने) निकला तो रिक्शेवाले ने हंसकर कहा – “अब कहां जाइयेगा? कॉफी हाउस में तो ‘अबले’ पानी आ गया होगा।”</p>
<p>“चलो, पानी कैसे घुस गया है, वही देखना है,” …कहकर हम रिक्शा पर बैठ गये। साथ में नयी कविता के एक विशेषज्ञ व्याख्याता-आचार्य-कवि मित्र थे, जो मेरी अनवरत अनर्गल-अनगढ़ गद्यमय स्वगतोक्ति से कभी बोर नहीं होते (धन्य हैं!)।</p>
<p>मोटर, स्कूटर, ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, ट्रक, टमटम, साइकिल, रिक्शा पर और पैदल लोग पानी देखने जा रहे हैं, लोग पानी देखकर लौट रहे हैं। देखने-वालों की आंखों में, जुबान पर एक ही जिज्ञासा – ‘पानी कहां तक आ गया है?’ देखकर लौटते हुए लोगों की बातचीत – “फ्रेजर रोड पर आ गया! आ गया क्या, पार कर गया। श्रीकृष्णपुरी, पाटलिपुत्र कॉलोनी, बोरिंग रोड, इंडस्ट्रियल एरिया का कहीं पता नहीं…अब भट्टाचार्जी रोड पर पानी आ गया होगा..छाती-भार पानी है। विमेंस कॉलिज के पास ‘डुबाव-पानी’ है।…आ रहा है!… आ गया !!… घुस गया…डूब गया…डूब गया…बह गया !”</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5.jpg" alt="" width="2036" height="1225" class="aligncenter size-full wp-image-7038" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5.jpg 2036w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5-1024x616.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5-768x462.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-5-1536x924.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2036px) 100vw, 2036px" /></a></p>
<p>हम जब कॉफी हाउस के पास पहुंचे, कॉफी हाउस बंद कर दिया गया था। सड़क के एक किनारे एक मोटी डोरी की शक्ल में गेरुआ-झाग-फेन में उलझा पानी तेजी से सरकता आ रहा था। मैंने कहा –“आचार्यजी, आगे जाने की जरूरत नहीं। वह देखिए-आ रहा है…मृत्यु का तरल दूत !”</p>
<p>आतंक के मारे मेरे दोनों हाथ बरबस जुड़ गये और सभय प्रणाम-निवेदन में मेरे मुंह से कुछ अस्फुट शब्द निकले (हां, मैं बहुत कायर और डरपोक हूं !)।</p>
<p>रिक्शावाला बहादुर है। कहता है – “चलिए न – थोड़ा और आगे !” भीड़ का एक आदमी बोला – “ए रिक्शा, करेंट बहुत तेज है। आगे मत जाओ !”</p>
<p>मैंने रिक्शेवाले से अनुनय-भरे स्वर में कहा – “लौटा ले भैया। आगे बढ़ने की जरूरत नहीं।”</p>
<p><strong>रिक्शा मोड़कर हम ‘अप्सरा’ सिनेमा-हॉल (सिनेमा-शो बंद!) के बगल से गांधी मैदान की ओर चले। पैलेस होटल और इंडियन एयर लाइंस दफ्तर के सामने पानी भर रहा था। पानी की तेज धारा पर लाल-हरे ‘नियन’ विज्ञापनों की परछाइयां सैंकड़ों रंगीन सांपों की सृष्टि कर रही थी। गांधी मैदान की रेलिंग के सहारे हजारों लोग खड़े देख रहे थे। दशहरा के दिन रामलीला के ‘राम’ के रथ की प्रतीक्षा में जितने लोग रहते हैं उससे कम नहीं थे…गांधी मैदान के आनंद-उत्सव, सभा-सम्मेलन और खेल-कूद की सारी स्मृतियों पर धीरे-धीरे एक गैरिक आवरण आच्छादित हो रहा था। हरियाली पर शनैः शनैः पानी फिरते देखने का अनुभव सर्वथा नया था।कि इसी बीच एक अधेड़, मुस्टंड और गंवार जोर-जोर से बोल उठा- “ईह ! जब दानापुर डूब रहा था तो पटनियाँ बाबू लोग उलटकर देखने भी नहीं गये…अब बूझो !”</strong></p>
<p>मैंने अपने आचार्य-कवि मित्र से कहा – “पहचान लीजिए। यही है वह ‘आम आदमी’, जिसकी खोज हर साहित्यिक गोष्ठियों में होती रहती है। उसके वक्तव्य में ‘दानापुर’ के बदले ‘उत्तर बिहार’ अथवा कोई भी बाढ़ ग्रस्त ग्रामीण क्षेत्र जोड़ दीजिए…”</p>
<p>शाम के साढ़े सात बज चुके और आकाशवाणी के पटना-केंद्र से स्थानीय समाचार प्रसारित हो रहा था। पान की दुकानों के सामने खड़े लोग चुपचाप, उत्कर्ण होकर सुन रहे थे…“…पानी हमारे स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुंच चुका है और किसी भी क्षण स्टूडियो में प्रवेश कर सकता है।”</p>
<p>समाचार दिल दहलाने वाला था। कलेजा धड़क उठा। मित्र के चेहरे पर भी आतंक की कई रेखाएँ उभरीं। किंतु हम तुरंत ही सहज हो गये यानी चेहरे पर चेष्टा करके सहजता ले आये, क्योंकि हमारे चारों ओर कहीं कोई परेशान नजर नहीं आ रहा था। पानी देखकर लौटे हुए लोग आम दिनों की तरह हंस-बोल रहे थे; बल्कि आज तनिक अधिक ही उत्साहित थे। हां, दुकानों में थोड़ी हड़बड़ी थी। नीचे के सामान ऊपर किये जा रहे थे। रिक्शा, टमटम, ट्रक और टेंपो पर सामान लादे जा रहे थे। खरीद-बिक्री बंद हो चुकी थी। पानवालों की बिक्री अचानक बढ़ गयी थी। आसन्न संकट से कोई प्राणी आतंकित नहीं दिख रहा था।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2.jpg" alt="" width="2036" height="1225" class="aligncenter size-full wp-image-7039" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2.jpg 2036w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2-1024x616.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2-768x462.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-2-1536x924.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2036px) 100vw, 2036px" /></a></p>
<p>पानवाले के आदमकद आईने में उतने लोगों के बीच हमारी ही सूरतें ‘मुहर्रमी’ नजर आ रही थीं। मुझे लगा, अब हम यहां थोड़ी देर भी ठहरेंगे तो वहां खड़े लोग किसी भी क्षण ठठाकर हम पर हंस सकते थे – ‘जरा ईन बुजदिलों का हुलिया देखो?’ क्योंकि वहां ऐसी ही बातें चारों ओर से उछाली जा रही थीं – “एक बार डूब ही जाये !…धनुष्कोटि की तरह पटना लापता न हो जाये कहीं !… सब पाप धुल जायेगा…चलो, गोलघर के मुंडेरे पर ताश की गड्डी लेकर बैठ जायें…विस्कोमान बिल्डिंग की छत पर क्यों नहीं? …भई, यही माकूल मौका है। इनकम टैक्सवालों को ऐन इसी मौके पर काले कारबारियों के घर पर छापा मारना चाहिए। आसामी बा-माल…”</p>
<p><strong>राजेंद्रनगर चौराहे पर ‘मैगजिन कॉर्नर’ की आखिरी सीढ़ियों पर पत्र-पत्रिकाएं पूर्ववत् बिछी हुई थीं। सोचा, एक सप्ताह की खुराक एक ही साथ ले लूं।</strong></p>
<p>क्या-क्या ले लूँ? …हेडली चेज, या एक ही सप्ताह में फ्रेंच/जर्मन सिखा देनेवाली किताबें, अथवा ‘योग’ सिखाने वाली कोई सचित्र किताब? मुझे इस तरह किताबों को उलटते-पलटते देखकर दुकान का नौजवान मालिक कृष्णा पता नहीं क्यों मुस्कराने लगा। किताबों – को छोड़ कई हिंदी-बंगला और अंग्रेजी सिने पत्रिकाएं लेकर लौटा। मित्र से विदा होते हुए कहा – “पता नहीं, कल हम कितने पानी में रहें।…बहरहाल, जो कम पानी में रहेगा वह ज्यादा पानी में फंसे मित्र की सुधि लेगा।”</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9.jpg" alt="" width="2036" height="1225" class="aligncenter size-full wp-image-7040" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9.jpg 2036w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9-1024x616.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9-768x462.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Patna-9-1536x924.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2036px) 100vw, 2036px" /></a></p>
<p>फ्लैट में पहुंचा ही था कि ‘जनसंपर्क’ की गाड़ी भी लाउडस्पीकर से घोषणा करती हुई राजेंद्र नगर पहुंच चुकी थी। हमारे ‘गोलंबर’ के पास कोई भी आवाज, चारों बड़े ब्लॉकों की इमारतों से टकराकर मंडराती हुई, चार बार प्रतिध्वनित होती है। सिनेमा अथवा लॉटरी की प्रचार-गाड़ी यहां पहुंचते ही – ‘भाइयों’ पुकारकर एक क्षण के लिए चुप हो जाती है। पुकार मंडराती हुई प्रतिध्वनित होती है- भाइयों ..भाइयों भाइयों…! एक अलमस्त जवान रिक्शाचालक है जो अक्सर रात के सन्नाटे में सवारी पहुंचाकर लौटते समय इस गोलंबर के पास अलाप उठाता है – ‘सुन मोरे बंधु रे-ए-ए…सुन मोरे मितवा-वा-वा-य।’</p>
<blockquote><p>गोलंबर के पास जनसंपर्क की गाड़ी से ऐलान किया जाने लगा- ‘भाइयों!’ ऐसी संभावना है कि बाढ़ का पानी …रात्रि के करीब बारह बजे तक लोहानीपुर, कंकड़बाग और राजेंद्रनगर में घुस जाये । अतः आप लोग सावधान हो जायें।प्रतिध्वनि। सावधान हो जायें ! सावधान हो जायें !!</p></blockquote>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/remembering-renu-in-innundated-patna">पटना के नेताओं की सुखी आंखों के सामने बारिश में जब शहर जलमग्न हुआ 👁 श्री फणीश्वरनाथ &#8216;रेणु&#8217; जी बहुत याद आये </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अधिक खुश नहीं हों, &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन &#8216;आपके लिए नहीं&#8217;, बल्कि &#8216;विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए&#8217; किया गया है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jul 2025 03:21:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अन्ने मार्ग (पटना) / कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : &#8216;शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।&#8217; एग्यारह शब्दों की हिदायत वाली कविता को बिहार ही नहीं, भारत के लोग, मतदाता, चाहे वे किसी भी उम्र के हों, किसी भी जाति और समुदाय के हों, अवश्य पढ़े होंगे। लेकिन चुनाव का समय आते [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-youth-commission-has-been-formed-not-for-you-but-for-mlas">अधिक खुश नहीं हों, &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन &#8216;आपके लिए नहीं&#8217;, बल्कि &#8216;विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए&#8217; किया गया है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अन्ने मार्ग (पटना) / कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : &#8216;शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।&#8217; एग्यारह शब्दों की हिदायत वाली कविता को बिहार ही नहीं, भारत के लोग, मतदाता, चाहे वे किसी भी उम्र के हों, किसी भी जाति और समुदाय के हों, अवश्य पढ़े होंगे। लेकिन चुनाव का समय आते ही राजनेताओं द्वारा &#8216;वशीकरण मन्त्र&#8217; से ओत-प्रोत आकर्षक योजनाओं को चुनावी मैदान में फेंका जाता है कि मतदाता मतदान केंद्र पर पहुँचते-पहुँचते जाल में फंस ही जाते हैं और फिर अगले पांच साल तक सरकार, शासन, व्यवस्था की आलोचना करते नहीं थकते।  </strong></p>
<p>बिहार में 18 वीं विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी हुई भी नहीं कि नेताओं और राजनीतिक पार्टियों द्वारा जाल बिछाये जाने लगा है। आज फिर से भांति भांति के आकर्षक दाने और रंग बिरंगी जाल बिछाकर एक बार फिर से मतदाताओं को फांसने की तमन्ना मे कमर कस कर निकल रहे हैं। देखना है अब कि समाज सुधारकों, समाज को तथाकथित रूप से जागृत करने वालों, मार्गदर्शकों की बात को मतदाता रूपी तोता कितना अमल करता है । विगत चार दशक में कितने आयोग यह बिहार सरकार के सचिवालय से जानकारी प्राप्त कर लें। यह भी देखें की उन आयोगों की सिफारिशों पर कितने मन मिट्टी जमी है। </p>
<p><strong>जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति वर्ष (1974) के चार साल बाद 1978 में प्रमोद चक्रवर्ती अपने निर्देशन में &#8216;आज़ाद&#8217; सिनेमा का निर्माण किये थे। इस फिल्म में मुख्य भूमिका में थे धर्मेंद्र, मालिनी, अजित, प्रेम चोपड़ा और केश्टो मुखर्जी। इस इस ऐक्शन थ्रिलर में सिनेमा में एक गीत था, जिसके गीतकार थे आनंद बक्शी, संगीतकार राहुलदेव वर्मन और गाये थे किशोर कुमार-लता मंगेशकर।</strong> </p>
<p>गीत का मुखरा था:</p>
<p><em>अरे जान की कसम,<br />
सच कहते हैं हम, <br />
खुशी हो या ग़म, <br />
बाँट लेंगे हम आधा आधा, <br />
ये वादा… हाँ वादा…<br />
ये वादा रहा… &#8230; ये वादा रहा।</em> </p>
<blockquote><p>कल जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 18 वीं विधानसभा चुनाव के पूर्व &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; के नाम से एक और आयोग गठन करने की घोषणा किये, अचानक साल 1978 का &#8216;आज़ाद&#8217; सिनेमा का वह गीत याद आ गया। पता हैं क्यों? आप को भले इस बात का वादा किया गया हो कि युवकों के कल्याणार्थ प्रदेश में बिहार युवा आयोग गठन करने का फैसला ली है सरकार; हकीकत यह है कि नीतीश कुमार अपने और सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के विधायकों को समायोजित करने के लिए आयोगों का गठन हैं। सभी विधायकों को मंत्रिमंडल में तो कुर्सी नहीं दी जा सकती है, स्वाभाविक है इन आयोगों में समायोजित कर उन्हें कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों को मिलने वाली सुविधाओं से सज्ज देंगे। </p></blockquote>
<p>इतना ही नहीं, अब तक बने सभी आयोगों और संगठनों में कौन भारतीय जनता पार्टी के &#8216;अतृप्त&#8217; विधायकों के हिस्से आएगा और कौन जनता दल यूनाइटेड के विधायकों को मिलेगा, इसका दस्तावेज भी तैयार कर लिया गया है। अध्यक्ष से लेकर सदस्य तक, औसतन एक आयोग में आठ से दस विधायक तो समायोजित हो ही जायेंगे। बिहार में वर्तमान में नवगठित &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; के अलावे किसान आयोग, सवर्ण आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल श्रमिक आयोग, सुन्नी वक्फ बोर्ड, पिछड़ा वर्ग आयोग, युवा आयोग, व्यापार आयोग एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड, महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अति पिछड़ा आयोग, महादलित आयोग, खाद्य संरक्षण आयोग, शिया वक्फ बोर्ड, बाल संरक्षण आयोग, मदरसा शिक्षा बोर्ड एवं नागरिक परिषद हैं। </p>
<p><strong>आंतरिक सूत्रों का यह भी मानना है कि अगर विधायकों को समायोजित करने में तकलीफ होगी तो वर्तमान के आयोग और परिषदों में भी विभाजन संभव है और इसके लिए सरकारी बोर्ड और आयोगों का पुनर्गठन होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह-सह-सहकारिता मंत्री अमित शाह ने प्रदेश के नीतीश कुमार से सम्पूर्ण आयोगों सूची मांगे हैं। साथ ही, भाजपा इस बात पर भी विशेष पहल कर रही है कि प्रदेश ही नहीं, केंद्र में भी जिन-जिन राजनीतिक पार्टियों का उसे सहयोग मिल रहा है, उसे अपने-अपने राज्यों में (बिहार सहित) बराबर का और संतोषजनक हिस्सा मिले। इन आयोगों और परिषदों के माध्यम से सत्तारूढ़ दलों के करीब डेढ़ सौ नेताओं-कार्यकर्ताओं को राज्य मंत्री, उप मंत्री का दर्जा, वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलेंगी। </strong></p>
<p>यह कहा जा रहा है कि युवा आयोग के साथ-साथ किसान आयोग, सवर्ण आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल श्रमिक आयोग, सुन्नी वक्फ बोर्ड, पिछड़ा वर्ग आयोग, युवा आयोग, व्यापार आयोग एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड भाजपा के हिस्से में अंकित किया गया है, जबकि महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अति पिछड़ा आयोग, महादलित आयोग, खाद्य संरक्षण आयोग, शिया वक्फ बोर्ड, बाल संरक्षण आयोग, मदरसा शिक्षा बोर्ड एवं नागरिक परिषद आदि जनता दल यूनाइटेड के हिस्से में गया है। ज्ञातव्य हो कि आयोग और बोर्ड के अध्यक्ष को बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को उसके सदस्य के समकक्ष वेतन, भत्ता एवं अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। राज्य सरकार अपने विवेक से मंत्री, राज्यमंत्री और उप मंत्री का दर्जा भी देती है।</p>
<p>वर्षों पहले <strong>प्रोफ़ेसर डी एम दिवाकर</strong> ने कहा था कि बिहार सरकार की ओर से 1971 में मुंगेरी लाल आयोग का गठन और लोकतंत्र को बचाने के लिए 1974 का जेपी आंदोलन भी उनमें से एक था, जिसमें महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने के साथ सामाजिक परिवर्तन का नारा दिया गया। नेतृत्व का सामाजिक समीकरण बदला। 1977 की जनता पार्टी की सरकार में कर्पूरी ठाकुर इस धारा के सर्वमान्य नेता थे। यह इस बात का भी प्रमाण था कि सर्वमान्य नेता बनने के लिए विचार और आचरण का मूल्य महत्वपूर्ण था, संख्या बल नहीं। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1977 में दी थी। जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में उन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए लागू कर दिया जिसमें 127 पिछड़ी जातियों की पहचान करके सामाजिक न्याय का व्यावहारिक शास्त्र गढ़ा गया था। हालांकि उच्च जाति के लोग इसके बाद कल तक के सर्वमान्य नेता कर्पूरी ठाकुर को पिछड़ी जाति का नेता समझने लगे और जाति की राजनीति खत्म होने के बजाय संगठित होने लगी। </p>
<p>उसी दौरान केंद्र में जनता पार्टी ने भी देश में सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए मोरारजी देसाई की सरकार की अगुवाई में 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। वीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की कोशिश की और आखिरकार सभी सिफारिशों को तो नहीं लेकिन 1993 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने आरक्षण की सिफारिशों को लागू कर दिया। सामाजिक न्याय और हिंदुत्व के टकराव में सामाजिक ताना-बाना चरमराया। लालू प्रसाद की सरकार ने आडवाणी का रथ बिहार में रोका।मुसलमानों का विश्वास सामाजिक न्याय की सरकार पर बढ़ा। बिहार की राजनीति में यादव और मुसलमान की संयुक्त ताकत परवान चढ़ी। पटना का गांधी मैदान विभिन्न जातियों की रैलियों का गवाह बना। </p>
<p>पिछड़ी जातियों में भी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा का जगना और असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक था। हालांकि उसे रोकने के लिए सामाजिक न्याय को मजबूत कदम उठाने के बजाय लालू प्रसाद ने अगड़ी जातियों के विरुद्ध कथित तौर पर &#8216;भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो&#8217; का नारा दिया। मंझोली जातियों की असंतुष्ट धारा ने उच्च जाति के साथ संगठित होकर नया विकल्प उभारा और जिन्होंने राजद को सत्ता से बाहर रखने के लिए नीतीश कुमार में संभावना तलाश की और उनका साथ दिया। केंद्र में एनडीए की सरकार ने राज्य में लालू-राबड़ी के सरकार के प्रति गुस्से को आधार बनाया।बिहार में भी राजग की सरकार बनी। एक नए सामाजिक समीकरण जिसमें मंझोली जातियों के नेतृत्व के साथ सरकार में प्रमुखता भी रही और अगड़ी जाति की सत्ता में भागीदारी भी।बिहार की एनडीए सरकार ने इस नए सामाजिक समीकरण में जाति के ऊपर विकास के मुद्दे को रखा। </p>
<figure id="attachment_6941" aria-describedby="caption-attachment-6941" style="width: 2326px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4.jpg" alt="" width="2326" height="1297" class="size-full wp-image-6941" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4.jpg 2326w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-300x167.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-1024x571.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-768x428.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-1536x856.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-2048x1142.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2326px) 100vw, 2326px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6941" class="wp-caption-text">पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न प्रणब मुखर्जी और पूर्व भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी श्री मुचकुंद दुबे (दोनों दिवंगत: श्रद्धांजलि)<br /></figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, नीतीश कुमार ने 2005 में जब सत्ता संभाली थी तब शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने के लिए 2006 में पूर्व विदेश सचिव मुचकुन्द दुबे की अध्यक्षता में कॉमन स्कूल सिस्टम कमीशन बनाया था। शिक्षा विभाग के सचिव भी उसमें शामिल थे। आयोग ने 1 साल के अंदर ही रिपोर्ट नीतीश सरकार को सौंप दी। आज मुचकुन्द दुबे नहीं हैं और उनकी रिपोर्ट 19 वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है।उस रिपोर्ट को कौन बाहर निकलेगा एक बड़ा सवाल है, क्योंकि उस रिपोर्ट को तो सभी सही बता रहे हैं लागू होने पर क्रांतिकारी बदलाव होने की बात कह रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट को लागू करने में जितनी बड़ी राशि खर्च होगी वह बिहार जैसे राज्य के लिए आसान नहीं है, कहकर बात को दरकिनार कर रहे हैं। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी पद पर रहने के बावजूद दुबे देश में शिक्षा को लेकर सबसे सजग माने जाते हैं</strong>। </p>
<p>अपने जीवन काल में एक अन्तर्वीक्षा में दुबे ने कहा था कि वैश्वीकरण के बाद पूरे विश्व की शिक्षा में बदलाव आया है। इसकी कई सीमाएं हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में मैं यह अवश्य कहूंगा कि यहां शिक्षा के नाम पर वंचितों के साथ हकमारी की जा रही है। पूरे विश्व में एजुकेशन का यूनिवर्सलाइजेशन किया जा रहा है। यूनिवर्सलाइजेशन मतलब शिक्षा का समानीकरण। विकास के मामले में भारत से अपेक्षाकृत कम विकासशील देशों में भी समान स्कूली शिक्षा को महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अपने भारत में इसके प्रति कोई गंभीर नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। </p>
<p>दुबे कहे थे कि  &#8216;मुझे एक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था और इसके मूल में शिक्षा थी। श्रोताओं में नीतीश कुमार स्वयं बैठे थे। मैंने अपने संबोधन में समान स्कूली शिक्षा को लेकर बातें कही थी। संगोष्ठी समाप्त हुई और मैं दिल्ली वापस चला आया। करीब एक महीने के बाद मुख्यमंत्री के सचिव का फ़ोन आया। बात हुई तो कहने लगे कि वे भी बिहार में समान स्कूली शिक्षा लागू करना चाहते हैं। यह कैसे हो और उसकी रूपरेखा कैसी हो, इसके लिए एक आयोग का गठन किया जाय। इसकी जिम्मेदारी उन्होंने मुझे दे दी। मैंने तय समयसीमा के अंदर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप दी। मुझे विश्वास था कि मुख्यमंत्री ने जिस उच्च स्तर की संवेदनशीलता के साथ मुझे महती जिम्मेवारी सौंपी थी, वे उससे अधिक संवेदनशीलता के साथ मेरी अनुशंसाओं को लागू करेंगे। लेकिन मुझे निराशा मिली।&#8217; लेकिन आज दुबे नहीं नहीं है और उनकी रिपोर्ट मिट्टी फांक रही है।  </p>
<blockquote><p>पूर्व विदेश सचिव ने कहा भी था एक अन्तर्वीक्षा में: &#8220;मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह सब एक साजिश के तहत किया जा रहा है। एक ऐसी साजिश, जिसका शिकार देश के मासूम बच्चे हो रहे हैं। हालांकि मुझे अभी भी विश्वास है कि कोई न कोई राह जरुर निकलेगी। मुझे तो लगता है कि शिक्षा का सवाल राजनीतिक सवाल नहीं बन पाया है। जब तक राजनेताओं को यह महसूस नहीं होगा कि इसके जरिए वे सत्ता प्राप्ति कर सकते हैं तब तक कुछ भी होना मुश्किल है।  जब तक वंचित वर्ग अपना राजनीतिक महत्व नहीं समझेगा तब तक उसके अधिकारों का हनन होता रहेगा। जिन वर्गों व जाति-समुदायों की बात आप कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि समान स्कूली शिक्षा लागू नहीं कर सरकारें उनके साथ कितना अहित कर रही हैं।&#8221; </p></blockquote>
<p>ज्ञातव्य हो कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल का कहना है कि &#8220;रिपोर्ट को लेकर वे लोग बहुत गंभीर थे। हम लोग तो चाहते थे कि रिपोर्ट पर चर्चा हो और पूरे देश में एक माहौल बने लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यदि वह रिपोर्ट लागू हो जाती तो बिहार की शिक्षा में मूलचूल सुधार होता और बिहार पूरे देश के लिए एक नजर बन जाता। रिपोर्ट के आधार पर जब हम लोगों ने अध्ययन करवाया कि कितनी राशि खर्च होगी तो वह राशि काफी बड़ी थी। बिहार की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। शिक्षकों की भी कमी थी, स्कूल भवन भी नहीं था तो कई मोर्चे पर काम करना था आदि आदि।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3.jpg" alt="" width="2326" height="1297" class="aligncenter size-full wp-image-6943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3.jpg 2326w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-300x167.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-1024x571.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-768x428.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-1536x856.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-2048x1142.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2326px) 100vw, 2326px" /></a></p>
<p><strong>विगत कई वर्षों में बिहार को बदलने के लिए कई महत्वकांशी आयोगों का गठन किया गया। लेकिन उन आयोगों ने जो भी अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, आज भी सरकारी आलमीरा का शोभा बढ़ा रही है। 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने भी भूमि सुधार को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। डेढ़ दशक बाद वर्ष 2005 में नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए, तो उन्होंने भूमि सुधार के लिए डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया। तारीख 16 जून 2006 था। आयोग ने अगस्त 2006 से काम करना शुरू किया था। आठ कार्यक्षेत्र दिए गए थे जिनमें मुख्य थे भूमि हदबंदी के प्रभावी उपाय, जमीन का सर्वेक्षण, मालिकाना और बटाईदारी के अधिकार तथा जमीन से जुड़े सामान्य सवाल।</strong></p>
<p>आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1990 के दशक के दौरान भूमिहीनता का आंकड़ा रखा जो चिंताजनक था। आयोग के अनुसार 67 प्रतिशत ग्रामीण गरीब 1993-1994 में भूमिहीन या करीब-करीब भूमिहीन थे। यह आंकड़ा 1999-2000 तक 75 प्रतिशत हो गया। इस दौरान भूमि संपन्न समूहों में गरीबी घटी जबकि भूमिहीन समूहों की गरीबी 51 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गई। सनद रहे कि सन 1977 में पश्चिम बंगाल में जब वाममोर्चा की सरकार बनी थी, तो वहां के वर्गादार (बटाईदार) किसानों को समुचित अधिकार देने के लिए ‘ऑपरेशन वर्गा’ चलाकर भूमि सुधार किया था, जिसे अब तक का सबसे सफलतम भूमि सुधार माना जाता है। </p>
<p><strong>इस ऑपरेशन का नेतृत्व डी. बंद्योपाध्याय ने ही किया था। दो वर्षों तक माथापच्ची करने के बाद डी. बंद्योपाध्याय ने अप्रैल 2008 में नीतीश सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में बटाईदारों को अधिकार देने की बात कही गई थी और इसके लिए एक क़ानून बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। जगजाहिर है कि जन संगठन एकता परिषद के संस्थापक पी व्ही राजगोपाल ने राष्ट्रीय स्तर पर और प्रदेश स्तर पर एकता परिषद के प्रांतीय संयोजक प्रदीप प्रियदर्शी ने मिलकर डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता वाली भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए अहिंसात्मक आंदोलन चलाया। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5.jpg" alt="" width="2326" height="1297" class="aligncenter size-full wp-image-6944" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5.jpg 2326w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-300x167.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-1024x571.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-768x428.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-1536x856.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-2048x1142.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2326px) 100vw, 2326px" /></a></p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया था कि : लैंड सीलिंग को 15 एकड़ तक सीमित किया जाए। भूमि के सभी 6 तरह के वर्गीकरण को खत्म किया जाए। सभी भूमि को एक समझा जाये अर्थात कृषि योग्य और कृषि अयोग्य भूमि जैसे वर्गीकरण को खत्म किया जाए।16.68 लाख भूमिहीन कृषक परिवारों को 0.66 एकड़ से 1 एकड़ तक भूमि दी जाए; 5.48 गैर कृषि मजदूर जिनके पास घर नहीं है, प्रत्येक को 10 डिसमिल भूमि घर बनाने के लिये दिया जाए। बिहार बटाईदारी क़ानून लाया जाए और ये प्रावधान किया जाए, यदि भूमि का मालिक कृषि उत्पादन का खर्च उठा रहा तो बटाईदार को उत्पाद में 60% हिस्सा मिले। यदि बटाईदार उत्पादन में अपनी लागत लगाता है तो तो बटाईदार को उत्पाद का 70-75% शेयर मिले। </p>
<p>आयोग के अनुसार कृषि और गैर कृषि भूमि के बीच अंतर को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। भूमि को उसके सरल अर्थ में परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि किसी को सीलिंग प्रावधानों से किसी जमीन को कृषि योग्य और किसी को अन्य प्रकार का बनाकर, बच निकलने का अवसर न मिले। सीलिंग के दायरे से प्लांटेशन, बगीचा, आम-लीची के बगीचे, मत्स्य पालन तथा अन्य विशिष्ट श्रेणियों के भूमि उपयोग को दी गई छूट समाप्त कर दी जाए। पांच या अधिक सदस्यों वाले परिवार के लिए 15 एकड़ भूमि की सीमा होनी चाहिए। यदि परिवार का कोई प्लान्टेशन, बाग-बगीचा आदि हो तो उसे यह चुनाव का अधिकार रहे कि वह या तो उन्हें 15 एकड़ तक रखें अथवा 15 एकड़ तक धान/गेहूँ की ज़मीन रखें। </p>
<p>बिहार में कुल 18 लाख एकड़ तक फैली अतिरिक्त ज़मीनें हैं। ये ज़मीनें या तो सरकारी नियंत्रण में है या भूदान समिति के नियंत्रण में, जिसे बांटा नहीं जा सका है या सामुदायिक नियंत्रण में या कुछ अन्य लोगों के कब्जे में है। आयोग ने इन ज़मीनों को भूमिहीनों में बांटने की अनुशंसा की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि हर बटाईदार को उस जमीन का पर्चा देना चाहिए, जिस जमीन पर वह खेती कर रहा है। इस पर्चे में भू-स्वामी का नाम व खेत का नंबर रहेगा। पर्चे की एक प्रमाणित प्रति जमीन मालिक को भी देने की भी बात कही गई थी। इन सबके अलावा भी कई तरह की सिफारिशें थीं, लेकिन, ज़मींदार वोट बैंक को बचाने की राजनीति मजबूरियों के चलते नीतीश कुमार ने भी पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की लीक पर ही चलने का फैसला लिया और सिफारिशों को धूल फांकने के लिए छोड़ दिया। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-youth-commission-has-been-formed-not-for-you-but-for-mlas">अधिक खुश नहीं हों, &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन &#8216;आपके लिए नहीं&#8217;, बल्कि &#8216;विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए&#8217; किया गया है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>नीतीश कुमार के हाथों &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; अख़बार का &#8216;लोकार्पण&#8217; : &#8216;अख़बार&#8217; का &#8216;कद घटा&#8217; या &#8216;नीतीश कुमार&#8217; का &#8216;कद बढ़ा&#8217;, एक &#8216;गहन शोध&#8217; का विषय</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumars-launch-of-indian-express-its-a-matter-of-deep-research</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 05:31:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[edition]]></category>
		<category><![CDATA[indian]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : बिहार की पत्रकारिता के इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने घर इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बार के मालिक, संपादक, अधिकारी और पत्रकारों को बुलाकर उनके ही अखबार को लोकार्पित किये। बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा के कालखंड से आज तक कभी भी ऐसी घटना नहीं हुई थी। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumars-launch-of-indian-express-its-a-matter-of-deep-research">नीतीश कुमार के हाथों &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; अख़बार का &#8216;लोकार्पण&#8217; : &#8216;अख़बार&#8217; का &#8216;कद घटा&#8217; या &#8216;नीतीश कुमार&#8217; का &#8216;कद बढ़ा&#8217;, एक &#8216;गहन शोध&#8217; का विषय</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : बिहार की पत्रकारिता के इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने घर इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बार के मालिक, संपादक, अधिकारी और पत्रकारों को बुलाकर उनके ही अखबार को लोकार्पित किये। बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा के कालखंड से आज तक कभी भी ऐसी घटना नहीं हुई थी। अलबत्ता, उन दिनों अख़बारों के सम्पादकों की, मालिकों की ऊंचाई इतनी अधिक थी की मुख्यमंत्रियों को पैदल चलकर उनके कार्यालयों तक पहुंचना होता था। यह घटना किसी भी पत्रकार को सोचने पर विवश कर दिया है कि इससे इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की &#8216;गरिमा&#8217; कम हुई, अथवा राजनीतिक बाजार में नीतीश कुमार अपना मोल बढ़ाये, या एक्सप्रेस जैसे अख़बार के मालिकों को, संपादकों को, संवाददाताओं का कद छोटा किया। आज अगर &#8216;रामनाथ गोयनका&#8217; जीवित होते तो शायद यह दुर्घटना नहीं घटी होती। </strong></p>
<blockquote><p>घर वापसी अच्छी बात है। इंडियन एक्सप्रेस के पटना संस्करण के लोकार्पण के अवसर पर जब संस्थान के अध्यक्ष विवेक गोयनका की &#8216;घर वापसी&#8217; वाली बात अख़बारों के पन्नों के साथ-साथ इंटरनेट पर प्रकाशित हुआ, रामनाथ गोयनका के जन्मस्थान दरभंगा के लोग हंसने लगे। दरभंगा के टाउन हॉल से पश्चिम कायस्थों और मारवाड़ियों की वस्तियों से लेकर दक्षिण के उर्दू बाजार इलाके के लोग भी हंस रहे थे। रामनाथ गोयनका का जन्म 3 अप्रैल 1904 को इसी इलाके में  हुआ था। लोगों का कहना हैं कि &#8216;अपने जीवन काल में गोयनका जी दरभंगा से जाने वाले किसी भी व्यक्ति को मुंबई में बहुत सम्मान करते थे, यह सच है; लेकिन यह भी उतना ही सच है कि विगत कई दशकों में गोयनका परिवार का कोई भी व्यक्ति दरभंगा की मिट्टी पर पैर नहीं रखे हैं। फिर कैसा घर वापसी?&#8221; </p></blockquote>
<p>इस &#8216;ऐतिहासिक घटना&#8217; के बाद पूर्व दिशा की ओर मुखकर मन ही मन गुनगुनाने लगा-&#8216;उगहु हे सूरज देव भइल अरघिया के बेर&#8217;- एक्सप्रेस का घर जाकर राजनेता के हाथों अख़बार का संस्करण लोकार्पित करना एक्सप्रेस की पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नहीं है, यह कुछ अलग संवाद दे रहा है। आज रामनाथ गोयेनका की आत्मा भी मन ही मन सोचती होगी कि क्या ऐसे दिन देखने के लिए ही इस अखबार को स्थापित किया था। जो राजनेता कुर्सी पर चिपके रहने के लिए कब किसके साथ चल देगा, प्रदेश के मतदाता क्या, पार्टी के विधायक भी नहीं जानते, वैसी स्थिति में इंडियन एक्सप्रेस को पटना लाने के पीछे, इसे लोकार्पित करने के पहले एक-अन्ने मार्ग क्या-क्या शर्त रखा होगा, यह गहन शोध का विषय है। </p>
<p><strong>मुख्यमंत्री महोदय को इंडियन एक्सप्रेस अखबार हाथ में लिए, एक्सप्रेस के संपादक उन्नी राजन, संतोष कुमार और अन्य गणमान्य लोगों को पंक्ति बद्ध तस्वीर खिंचवाते देख, ट्विटर और सामाजिक क्षेत्र के अन्य प्लेटफार्मों पर चिपका देख अचानक वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल भी याद आ गए जो नौ वर्ष पहले 2 नवंबर 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामनाथ गोयनका पत्रकारिता उत्कृष्टता पुरस्कार की अध्यक्षता कर रहे थे,  कार्यक्रम का बहिष्कार किए थे। अक्षय मुकुल इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक के सम्मान में स्थापित पुरस्कार से अलंकृत किए गए थे । लेकिन एक पत्रकार के रूप में उन्हें इस बात की तकलीफ़ थी कि जिस व्यक्ति के नाम पर यानी रामनाथ गोयनका के नाम पर स्थापित पुरस्कार जिस व्यक्ति के हाथों दिया जा रहा था, उनके साथ मंच पर खड़े होकर पुरस्कार प्राप्त करना, उनके साथ तस्वीर खिंचवाना पत्रकारिता के लिए शुभ नहीं है।  उनकी अनुपस्थिति में उनकी पुस्तक, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया के प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स इंडिया के प्रकाशक और मुख्य संपादक कृष्ण चोपड़ा ने उनकी ओर से पुरस्कार ग्रहण किया था।</strong> </p>
<figure id="attachment_6725" aria-describedby="caption-attachment-6725" style="width: 1985px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-scaled.jpg" alt="" width="1985" height="2560" class="size-full wp-image-6725" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-scaled.jpg 1985w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-233x300.jpg 233w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-794x1024.jpg 794w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-768x990.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-1191x1536.jpg 1191w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-1588x2048.jpg 1588w" sizes="auto, (max-width: 1985px) 100vw, 1985px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6725" class="wp-caption-text">चुनाव से पूर्व इंडियन एक्सप्रेस का पटना आना अनेकानेक प्रश्न उठा रहे हैं </figcaption></figure>
<p>इंडियन एक्सप्रेस के पटना संस्करण का अपने घर पर लोकार्पण करते नीतीश कुमार ने कहा कि अच्छी पत्रकारिता नागरिकों को सशक्त बनाती है और सुशासन के लिए आवश्यक है। पटना संस्करण इंडियन एक्सप्रेस का 11वां संस्करण है। यहाँ के अलावे यह नई दिल्ली, मुंबई, नागपुर, अहमदाबाद, वडोदरा, जयपुर, लखनऊ, कोलकाता, चंडीगढ़, पुणे से प्रकाशित होता है। नीतीश कुमार कहते हैं: “मैं इंडियन एक्सप्रेस के पटना संस्करण के शुभारंभ पर बहुत खुश हूं। यह अच्छी बात है कि अखबार पटना आया है। मैं अपने कॉलेज के दिनों से ही अखबार का शौकीन पाठक रहा हूं। अच्छी पत्रकारिता नागरिकों को सशक्त बनाती है और सुशासन के लिए आवश्यक है।”</p>
<p><strong>आश्चर्य की बात तो यह है कि बंगाल की आवाज यानी आनंद बाज़ार पत्रिका समूह द्वारा प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार का पटना संस्करण नीतीश कुमार के ऐतिहासिक कालखंड में ही दिसंबर 14 2018 को पटना को नमस्कार कर अनंत यात्रा पर निकला गया। इस अखबार में काम करने वाले कामगारों का, पत्रकारों का, गैर-पत्रकारों का क्या हुआ, उसके परिवार, परिजनों का क्या हाल हुआ, उम्मीद नहीं है कि नीतीश कुमार कभी पूछे भी होंगे। इससे वर्षों पहले आर्यावर्त, इंडियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप और अनेकानेक दैनिक पटना में अंतिम सांस लिया और प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर सभी राजनेता, अभिनेता मूकदर्शक बने रहे। खैर। </strong></p>
<p>पटना से इंडियन एक्सप्रेस के प्रकाशन को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के क्या भाजपा, क्या राष्ट्रीय जनता दल सभी स्वागत किया। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का कहना था &#8216;यह बहुत गर्व और सम्मान की बात है कि इंडियन एक्सप्रेस पटना में आया है। यह अख़बार अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाना जाता है। हम जमीनी स्तर से लेकर शासन तक की अच्छी और व्यापक रिपोर्ट की उम्मीद कर रहे हैं।&#8221; इसी तरह, राजद के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा  कि &#8220;ऐसे युग में जहां सनसनीखेजता समझदारी पर विजय पा लेती है और कई मीडिया प्लेटफॉर्म अपना संतुलन खो चुके हैं, इंडियन एक्सप्रेस शोर पर समाचार का झंडा बुलंद करता है&#8230; उच्च गुणवत्ता वाले, अच्छी तरह से तर्क किए गए संपादकीय और ऑप-एड पर कोई समझौता नहीं करता है जो हमें राजनीति, नीति, समाज और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर सूक्ष्म दृष्टिकोण की सराहना करने में मदद करता है।&#8221; अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु अनुसार, “द इंडियन एक्सप्रेस के पटना/बिहार संस्करण के लॉन्च की खबर सुनकर बहुत खुशी हुई। मुझे उम्मीद है कि यह संस्करण यहां पत्रकारिता के लिए मानक स्थापित करेगा।”</p>
<p>संस्थान का कहना है कि पटना संस्करण का लॉन्च 1975 में आपातकाल लागू होने के 50 साल पूरे होने के महीने में हुआ है। लोकार्पण की घोषणा करते हुए, मुख्य संपादक राज कमल झा ने कहा: &#8220;अपनी खोजी और व्याख्यात्मक पत्रकारिता के माध्यम से, मूल फील्ड रिपोर्टिंग पर जोर देते हुए, हम बदलते बिहार की कहानी के साथ न्याय करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेंगे।&#8221; जबकि, इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका ने कहा: “बिहार हमेशा रामनाथ जी के दिल में एक बहुत ही खास जगह रखता था। पटना संस्करण हमारे समृद्ध इतिहास को एक राज्य और उसके लोगों के रोमांचक भविष्य की कहानी बताने के लिए इस्तेमाल करेगा।” मुख्यमंत्री को धन्यवाद देते हुए उन्नी राजन शंकर ने कहा: “पटना में इंडियन एक्सप्रेस बिहार की आवाज़ को पूरे देश तक ले जाएगा। प्रौद्योगिकी और समाज में इस तरह के विध्वंसकारी बदलाव के समय में यह और भी प्रासंगिक हो जाता है।” इस अवसर पर इंडियन एक्सप्रेस के उपाध्यक्ष (मार्केटिंग, उत्तर) प्रदीप शर्मा और पटना स्थित वरिष्ठ सहायक संपादक संतोष सिंह मौजूद थे। </p>
<figure id="attachment_6722" aria-describedby="caption-attachment-6722" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6722" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6722" class="wp-caption-text">अक्षय मुकुल &#8211; गजब का पत्रकार</figcaption></figure>
<p>चलिए <strong>अक्षय मुकुल की पत्रकारिता</strong> पर चलते हैं। 2 नवंबर 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामनाथ गोयनका पत्रकारिता उत्कृष्टता पुरस्कार की अध्यक्षता कर रहे थे &#8211; जिसे इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संस्थापक के सम्मान में स्थापित किया था &#8211; कम से कम एक प्राप्तकर्ता अपनी अनुपस्थिति के कारण चर्चा में था। टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल ने समारोह का बहिष्कार किया। मुकुल के स्थान पर उनकी पुस्तक, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया के प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स इंडिया के प्रकाशक और मुख्य संपादक कृष्ण चोपड़ा ने उनकी ओर से पुरस्कार ग्रहण किया।</p>
<p><strong>मुकुल, जो करीब 20 वर्षों तक एक संवाददाता के रूप में काम कर चुके थे, को उनकी पुस्तक के लिए पुस्तकों (गैर-काल्पनिक) की श्रेणी में रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो हिंदुत्व के वैचारिक आधार पर प्रकाश डालती है &#8211; विडंबना यह है कि यह प्रधानमंत्री की राजनीति का मुख्य आधार है। अगस्त 2015 में अपनी रिलीज़ के बाद से, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया ने शानदार समीक्षा प्राप्त की है और टाटा लिटरेचर लाइव जैसे साहित्यिक पुरस्कार जीते हैं! बुक ऑफ द ईयर अवार्ड और अंग्रेजी में सर्वश्रेष्ठ गैर-काल्पनिक कृति के लिए अट्टा गलाटा-बैंगलोर लिटरेचर फेस्टिवल बुक प्राइज। मुकुल को आरएनजी पुरस्कारों से कोई शिकायत नहीं थी। यह पुरस्कार जीतना एक “सम्मान” था। उनकी समस्या प्रधानमंत्री से पुरस्कार प्राप्त करने में थी। मुकुल ने कहा, “मैं इस विचार के साथ नहीं रह सकता कि मोदी और मैं एक ही फ्रेम में हों, कैमरे की ओर देखकर मुस्कुरा रहे हों और वे मुझे पुरस्कार दे रहे हों।” और बहुत सारी बातें उन दिनों अख़बारों के पन्नों पर सुर्खियां बनी थी। </strong></p>
<p>वैसे इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि इंडियन एक्सप्रेस का मुद्रण आज भी काले अक्षरों में ही होता है। लेकिन पटना सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिहार में अख़बार खुलने, प्रकाशन होने और राजनेताओं द्वारा इस्तेमाल होने के बाद जिस तरह डाक बंगला चौराहे पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, उसके विरुद्ध आज किसी भी अखबार के संस्थान के स्वामियों में यान पत्रकारों में, यहाँ तक की सम्पादकों में ताकत नहीं है।  खासकर नब्बे के दशक के बाद से। कल जब बिहार में इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार का पटना संस्करण लांच करते प्रदेश के मुख्यमंत्री को देखा तो हैरान रह गया। उससे भी अधिक यह देखकर लगा कि एक्सप्रेस के संपादक से लेकर अधिकारी और संवाददाता तक पैदल चलकर मुख्यमंत्री आवास पहुंचे। जब यह कहा गया कि पटना संस्करण को 1975 में आपातकाल लागू होने के 50 साल पूरे होने के महीने में हो रहा है, अचानक आर्यावर्त-इंडियन नेशन अखबार के दफ्तर का पोर्टिको याद आ गया। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति बिहार ही नहीं, देश के लोगों के मगज पर चढ़ रहा था। देश के मतदाता देश की राजनितिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। स्वाभाविक है। सत्तारूढ़ के अलावे विपक्ष के नेताओं को भी सत्ता का रसास्वादन करने का संवैधानिक अधिकार है। देश का क्या होगा, यह न तो उन दिनों लोगों को, राजनेताओं को चिंता थी, न आज है। पंचायत से संसद तक चाहे क्रिया-कलाप ठीक-ठाक संचालित होता भी रहे, कुर्सियों को देखकर कुकुरमुत्तों की तरह पनपते नेताओं को खुजली होने लगती है, वे चक्रव्यूह रचने लगते हैं, ताकि सतारूढ़ दल धराम से नीचे गिरे और वे मुस्कुराते शपथ लेकर कुर्सी से चिपक जायँ। यह मानव का लक्षण है। जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के समय बिहार में यह बात तनिक अधिक देखने को मिला।  </p>
<p>वैसे तो चौथी विधान सभा से ही, लेकिन पांचवी विधान सभा काल आते-आते सरकारी महकमे में “आया-राम-गया-राम” वाली बात पटना के सर्कुलर रोड, सरपेंटाइन रोड, बेली रोड, फ़्रेज़र रोड पर अधिक प्रचलित हो गया था। मंत्री से लेकर संत्री तक, अधिकारी से लेकर चपरासी तक, जिलाधिकारी से लेकर मुंशी तक सभी हनुमान चालीसा पढ़ते सोते थे और सुवह विष्णुसहस्रनाम पढ़ते जागते थे, ताकि विपत्ति का पहाड़ न टूट पड़े उनपर ।  </p>
<figure id="attachment_6726" aria-describedby="caption-attachment-6726" style="width: 1524px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a.jpg" alt="" width="1524" height="922" class="size-full wp-image-6726" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a.jpg 1524w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a-1024x620.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a-768x465.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1524px) 100vw, 1524px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6726" class="wp-caption-text">साल 1975: इंडियन नेशन अख़बार के तत्कालीन संपादक दीना नाथ झा</figcaption></figure>
<p>राजनेताओं की तो बात ही नहीं करें। उनकी गर्दन हमेशा बक्सर के पुल पर लटका होता था। कब नीचे गंगा में प्रवाहित हो जायेंगे, कब पदच्युत हो जायेंगे, कब कौन लंगड़ी मार देगा, कब कौन छिटकिनी लगाकर मुंह के बल गिरा देगा, कोई नहीं जानता था। विहार विधान सभा और विधान परिषद् में आज भी दर्जनों “सम्मानित विधायकगण” हैं, जिनकी स्थिति फ़्रेज़र रोड के कोने पर स्थित (उस समय) उडप्पी से आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के कार्यालय से दस कदम आड़े पिंटू होटल तक आते-आते भय से रक्तचाप बढ़ जाता था। वे गवाह होंगे,  सांस ले रहे हैं । कई बार ऐसी स्थिति का सामना वे सभी किये थे जब ‘प्रेस रिलीज’ निर्गत करते समय जिस पदभार का मुहर प्रेस रिलीज पर लगाए थे, समाचार बनने के समय तक पदभार से मुक्त हो जाया करते थे। बिहार विधान परिषद् में आज भी ऐसे अनेकानेक माननीय सदस्य हैं जो उन दिनों उस समय के उभरते नेताओं के पीछे-पीछे चलते थे। वे हँसते थे तो इस ठहाका लगा देते थे। </p>
<p>लेकिन आज वे राजनीति में मठाधीश बने बैठे हैं। उन दिनों पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्रों में अपना नाम प्रकाशित करने के लिए, अपना विज्ञप्ति छपाने के लिए, जो सुबह से शाम तक “दण्ड बैठकी” करते थे, आज उसी संस्थान के सैकड़ों-हज़ारों कर्मचारियों, उनके परिवारों को “प्राणायाम” कराते नहीं थकते। कई तो प्राणायाम करते ईश्वर को प्राप्त हो गए, कुछ कतारबद्ध हैं। लेकिन उन्हें क्या? राजनीतिक गलियारे में, मंत्री-संत्री की कुर्सियों पर चिपकने के बाद जनता के बारे में कौन सोचता है? या उन लोगों के बारे में कौन सोचता है, जो शुरूआती दिनों में ‘ऊँगली’ पकड़कर नाम, प्रतिष्ठा, शोहरत दिलाया था। खैर। </p>
<p><strong>उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री थे अब्दुल गफ्फूर। कहने के लिए तो छठा विधान सभा कालखंड था, लेकिन गफ्फूर साहेब 13 वें मुख्यमंत्री के रूप में कुर्सी पर बैठे थे। एक मुख्यमंत्री का कार्यकाल, जो पांच साल का (विधान सभा अवधि के बराबर) होनी चाहिए थी, औसतन ढाई-साल और उससे कम की अवधि में कुर्सी को नमस्कार कर “भूतपूर्व” हो जाया करते थे। गफूर साहब 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक बिहार राज्य के तेरहवें मुख्यमंत्री के रूप में सेवा किये । वे राजीव गांधी के समय में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी शोभायमान हुए थे। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें गफ्फूर साहेब। </strong></p>
<p>वैसे, 1967 और 1971 के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तूती बोलती थी, चाहे पार्टी हो या सरकार। सबों को अपने नियंत्रण में ले ली थी श्रीमती गाँधी। आज की तरह ही, उन दिनों भी केंद्रीय सरकार का अर्थ केंद्रीय मंत्रिमंडल कोई नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री के सचिवालय ही हो गया था। सम्पूर्ण सरकार वहीँ केंद्रित थी। जो उनके भरोसे मंद थे, उनका तेवर कुछ और था, जो विश्वासभाजन नहीं थे, उनकी तो तो बात ही नहीं करें। सत्तर के दशक के प्रारंभिक महीनों, वर्षों में जो हुआ वह देश जानता है, जहां तक राजनीति का सवाल है। परन्तु जो नहीं जानता है वह यह की उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन-मिथिला मिहिर पत्र समूह का सम्पादकगण न केवल अपनी कलम में ताकत रखते थे, बल्कि उस समय के मंत्रियों, चाहे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, पुलिसकर्मियों चाहे पुलिस महानिदेशक ही क्यों न हो, उन्हें उनकी औकात दिखने की क्षमता रखते थे। कुछ ऐसी ही ऐतिहासिक घटना हुई थी उस दिन। </p>
<figure id="attachment_6728" aria-describedby="caption-attachment-6728" style="width: 2194px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-scaled.jpg" alt="" width="2194" height="2560" class="size-full wp-image-6728" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-scaled.jpg 2194w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-257x300.jpg 257w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-878x1024.jpg 878w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-768x896.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-1317x1536.jpg 1317w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-1756x2048.jpg 1756w" sizes="auto, (max-width: 2194px) 100vw, 2194px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6728" class="wp-caption-text">इंडियन एक्सप्रेस के सहायक संपादक संतोष कुमार सिंह, जो बिहार के संवाददाता भी है</figcaption></figure>
<p>1975 की तपती गर्मी के दौरान अचानक भारतीय राजनीति में भी बेचैनी दिखी। यह सब हुआ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से जिसमें इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी । उस दिन आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, “जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।” 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में देश में आपातकाल घोषित था।जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के तहत पटना के दो प्रमुख अख़बारों के दफ्तरों को सुपुर्दे ख़ाक करने की तैयारी हो चुकी थी। नेता से लेकर, व्यापारी तक, पुलिस से लेकर अपराधी तक, आंदोलन में कतारबद्ध लोगबाग यह निर्णय ले लिए थे कि अमुक दिन पहले सर्चलाइट-प्रदीप और फिर आर्यावर्त-इण्डियन नेशन – मिथिला मिहिर का दफ्तर फूंका जायेगा।</p>
<p><strong>सर्चलाइट-प्रदीप जलकर स्वाहा हो गया परन्तु, जब आर्यावर्त-इण्डियन नेशन की बात आई तो इण्डियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा सामने खड़े हो गए। उस दिन वैसे तो संस्थान के लगभग सभी कर्मचारी गोलबंद हो गए थे, लेकिन संध्याकाळ होते-होते संस्थान के मुख्य द्वार के बजाय पिछले दीवारों को, जो जमाल रोड से मिलती थी, लांघ कर अपने-अपने घरों की ओर बच-बचाकर कूच कर रहे थे। धीरे-धीरे सम्पूर्ण परिसर वीरान हो गया। मुख्य द्वार पर 50-60 किलो शारीरिक वजन वाले दरवान ही रह गए थे। यह स्थान प्रवेश द्वार के ठीक सामने पोर्टिको का था। दिना बाबू वहीं बैठ गए। अब तक ‘जॉब-विभाग’ में कार्य करने वाले बागेश्वरी प्रसाद ही बच गए थे, जो दीना बाबू के बगल में खड़े थे। बागेश्वरी प्रसाद का शारीरिक वजन भले 65 किलो के आसपास रहा होगा उस शाम, लेकिन उन्होंने हज़ारों-हज़ार किलो के मानसिक वजन वाले लोग जैसा कार्य किया था। दीना बाबू उन्हें भी जाने को कहे। वे दीना बाबू का बाहर सम्मान करते थे। </strong></p>
<p>इसी बीच लाइनों विभाग में कार्य करने वाला जयप्रकाश, जो शरीर से कोई छः फिट लम्बा था, कुछ पल दीना बाबू और बागेश्वरी प्रसाद के पास खड़े रहे, लेकिन तक्षण संस्थान के पिछले दीवार की ओर भागे, जिधर से सभी कर्मचारी अपने-अपने घरों की ओर उन्मुख थे। जयप्रकाश जोर से आवाज लगाया : “रुक जाओ…रुक जाओ कहीं दीना बाबू अपना दाह नहीं कर लें। वे कह रहे हैं अगर संस्थान बचेगा तभी हम सभी कर्मचारियों का जीवन है, अन्यथा कोई अस्तित्व नहीं है। सभी कर्मचारियों के कदम वापस हो गए। परिसर में अखबार बेचने वालों की साईकिल लगी थी, संख्या सैकड़ों में थी। सभी साईकिल सामने के भवन के छत पर क्षणभर में चले गए। ईंट, पत्थर आदि भी एकत्रित हो गए। चतुर्दिक आंदोलनकारी भी भर गए थे फ़्रेज़र रोड पर। लेकिन ऊपर से साइकिलों, पत्थरों और ईंटों के प्रहार से वे संस्थान के अंदर प्रवेश नहीं ले सके। इस बीच, दिना बाबू तत्कालीन पुलिस महानिदेशक वाई.एन. झा से संस्थान की सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल मुहैया करने को कहा। पुलिस महानिदेशक, बिहार में प्रचलित उस कहावत को चरितार्थ कर दिए जब एक व्यक्ति के पेशाब की जरूरत हुई और वह व्यक्ति कहने लगा की वह पिछले छः माह से पेशाब किया ही नहीं और अगले एक वर्ष तक लघुशंका करेगा भी नहीं। अब तक पोर्टिको में कर्मचारियों का बैठक बन गया था। टेलीफोन भी लग गए थे। </p>
<p><strong>दूसरे दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर अपने चेला-चपाटियों के साथ आर्यावर्त-इण्डियन नेशन कार्यालय में धमके। प्रांगण के अंदर प्रवेश के साथ ही कार्यालय परिसर के समस्त कर्मचारी गोलबंद हो गए। मुख्यमंत्री अपने काफिले के साथ पोर्टिको तक पहुंचे। दीना बाबू वहीँ थे। अब्दुल गफूर को देखते ही दीनानाथ झा का रक्तचाप बढ़ गया। वे जब गुस्स में होते थे तो उनका सम्पूर्ण शरीर कांपने लगता था। दृश्य बहुत संवेदनशील था। दीनानाथ जी बाहर गेट के तरफ अपनी ऊँगली से इशारा करते अब्दुल गफूर को बाहर निकलने को कहा। स्थिति बद से बत्तर हो रही थी। एक पत्रकार और मुख्यमंत्री आमने सामने था। तभी फोन की घंटी टनटनायी – “हेल्लो !!! रेस्पेक्टेड दीना बाबू, मैडम विश तो टॉक तो यु…. प्लीज सर।” </strong></p>
<p>फोन के दूसरे छोड़ पर दिल्ली से श्रीमती इंदिरा गाँधी थीं। अब्दुल गफूर उलटे पैर वापस अपने कार्यालय में आ गए। फ़्रेज़र रोड पर बड़े-बड़े बसों में लदे तक़रीबन 50 बन्दुक, राइफलों से लैश केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के लोग कार्यालय परिसर में प्रवेश लिए और बिहार के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक तत्काल प्रभाव से हस्तानांतरित हो गए। इसके बाद विद्याचरण शुक्ल – अब्दुल गफूर के साथ फिर एक बार रूबरू बकझक हुआ। और दोनों नेता पुनः मुंह के बल गिरे। पत्रकारिता में सम्मान था। पत्रकार भी सम्मानित थे। </p>
<p>सत्तर के दशक या उससे पूर्व की पत्रकारिता की तुलना नब्बे के दशक के बाद से लगातार, आज तक, हम नहीं कर सकते हैं। उन दिनों की पत्रकारिता, या पत्रकारों के प्रति, पत्रकारिता के प्रति तत्कालीन राजनेताओं का जो सम्मान था, पत्रकारों की कलम में जो ताकत थी, उनकी जो सोच थी, समाज के प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता थी; आज की तुलना नहीं कर सकते हैं। आज सब कुछ बदल गया है। मालिकों की सोच बदल गयी है। कर्मचारियों की सोच बदल गयी है। लेकिन बाबूजी कहते थे: “अंतिम दम तक लड़ना सीखो, क्या पता अंतिम चाल में ही कामयाबी मिल जाय।” आज आर्यावर्त – इंडियन नेशन – मिथिला मिहिर अखबार बंद हो गया, नामोनिशान मिटा दिया पटना के फ़्रेज़र रोड पर। कुछ कर्मचारी भी दोषी थे, कुछ प्रबंधन भी, मालिक तो थे ही। </p>
<p><strong>क्या एक्सप्रेस चुनाव प्रचार-प्रसार के लिए आया है पटना </strong></p>
<p>2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। </p>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि  सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे। </p>
<p><strong>बिहार में अख़बारों का इतिहास </strong></p>
<p>इसी बहाने आनंद वर्धन लिखित बिहार में अख़बारों के जन्म और मृत्यु को भी देखते चलते हैं। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से, बिहार ने भारतीय प्रेस के स्थिर विकास में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। बिहार के प्रेरित और उद्यमी पुरुषों द्वारा स्थापित और स्वामित्व वाले तथा प्रांत से संचालित समाचार प्रकाशन, ब्रिटिश शासन के तहत बिहार की यात्रा का हिस्सा थे। स्वतंत्रता के कुछ दशक बाद भी यह ऐसा ही रहा। विद्वानों और शोधकर्ताओं ने बिहार के प्रेस के लंबे इतिहास में कुछ पहलुओं को तलाशने की कोशिश की है। बिहार सरकार और केंद्र सरकार के तत्वावधान में किए गए दो आधिकारिक अध्ययन बिहार में समाचार प्रकाशनों के विकास पर जानकारी के उपयोगी स्रोत हैं: एन कुमार की जर्नलिज्म इन बिहार (बिहार राज्य गजेटियर, बिहार सरकार, 1971 के पूरक के रूप में) और जे नटराजन की हिस्ट्री ऑफ इंडियन जर्नलिज्म (प्रेस आयोग, प्रकाशन विभाग, 1954 की रिपोर्ट का दूसरा भाग)। हाल के वर्षों में, इतिहासकार सुमिता सिंह ( भारतीय इतिहास कांग्रेस की कार्यवाही , खंड 73, 2012) और मीडिया आलोचक सेवंती निनान ( हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड , 2007) ने भी बिहार में समाचार प्रकाशन के शुरुआती चरणों पर उपयोगी सामग्री खोजी है। विभिन्न स्रोतों से बिहार में प्रेस के विकास में मील के पत्थर की रूपरेखा उभरती है। </p>
<p><strong>आधुनिक इतिहास में, बिहार में पहला ज्ञात समाचार प्रकाशन 1856 तक का माना जा सकता है। उससे पहले, जैसा कि बिहार रिसर्च सोसाइटी के जर्नल में उल्लेख किया गया है , 1850 में शाह कबीरुद्दीन अहमद द्वारा एक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की गई थी। हालाँकि, इसका उपयोग समाचार पत्र प्रकाशित करने के लिए नहीं किया गया था। </strong></p>
<p>यह पहला अख़बार ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए प्रकाशित किया गया था। उस समय पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने 3 सितंबर, 1856 को उर्दू अख़बार अख़बार-ए-बिहार का प्रकाशन शुरू करने की पहल की। बिहार को अपना पहला अख़बार देखने में 16 साल लग गए, जिसे क्षेत्र के शिक्षित लोगों के बीच अच्छी खासी पाठक संख्या मिली। 1872 में, बालकृष्ण भट्ट और केशवराम भट्ट द्वारा स्थापित एक हिंदी अख़बार बिहार बंधु ने कलकत्ता से प्रकाशन शुरू किया, लेकिन 1874 में इसे पटना ले जाया गया। मुंशी हसन अली इसके पहले संपादक थे। पटना में एक उचित बिहार-आधारित अख़बार बनने के बाद, बिहार बंधु ने कानूनी अदालतों में हिंदी की शुरूआत के लिए एक सफल अभियान शुरू किया। अगले दशकों में अलग-अलग संपादकों के तहत, अख़बार ने 20वीं सदी के दूसरे दशक तक अपनी यात्रा जारी रखी। जिस साल बिहार में पहला हिंदी अख़बार शुरू हुआ, उसी साल पहला अंग्रेज़ी अख़बार भी शुरू हुआ। बिहार हेराल्ड की स्थापना 1872 में हुई थी। इसका संपादन गुरु प्रसाद सेन ने किया और 1900 में अपनी मृत्यु तक वे इस पद पर बने रहे। हालाँकि, यह अख़बार बिहार में रहने वाले बंगालियों के हितों पर केंद्रित था और इसलिए इसकी कवरेज बहुत व्यापक नहीं थी। </p>
<p><strong>अगले दो दशकों के दौरान, बिहार में तीन नए अंग्रेजी अख़बारों ने अलग-अलग वर्षों में अपनी यात्रा शुरू की: इंडियन क्रॉनिकल (1881), बिहार टाइम्स (1894), और बिहार गार्जियन (1899)। इनमें से, बिहार टाइम्स ने बंगाल प्रांत से बिहार को अलग करने के एक दृढ़ समर्थक के रूप में अपनी पहचान बनाई। बिहार टाइम्स की स्थापना 1894 में सचिदानंद सिन्हा ने की थी, जब वे अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंग्लैंड से लौटे थे। उनके साथ उनके समकालीन महेश नारायण, विशेश्वर सिंह, सालिग्राम सिंह, महावीर सहाय और नंद किशोर लाल भी थे। महेश नारायण इसके पहले संपादक थे और 1907 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने इसका संपादन किया। सचिदानंद सिन्हा उस समय बिहार से एक महत्वपूर्ण बौद्धिक आवाज़ थे, और उन्होंने अखबार का समर्थन किया। राष्ट्रीय आंदोलन में एक बेहद सम्मानित व्यक्ति, उन्होंने भारत की संविधान सभा के पहले अध्यक्ष की अस्थायी जिम्मेदारी संभाली, इससे पहले कि एक और प्रतिष्ठित बिहारी, डॉ राजेंद्र प्रसाद, संविधान सभा के पूर्णकालिक अध्यक्ष के रूप में उनकी जगह लेते। बिहार टाइम्स ने बंगाल प्रांत से बिहार को अलग करने के लिए एक संपादकीय अभियान चलाया, और इस मांग की पत्रकारीय अभिव्यक्ति में इसकी भूमिका का उल्लेख इतिहासकार सुमिता सिंह ने अलग बिहार के निर्माण में प्रेस की भूमिका (2012) में किया है। 19वीं सदी के आखिरी सालों और 20वीं सदी की शुरुआत में बिहार में जातिगत संबद्धता के आधार पर एक अलग तरह का प्रकाशन भी देखा जा सकता था। हालाँकि, वे मूल रूप से सामुदायिक समाचार पत्र थे, समाचार पत्र नहीं, और इसमें पटना से कायस्थ गजट (1889) , गया से कायस्थ मैसेंजर, क्षत्रिय समाचार, भूमिहार ब्राह्मण पत्रिका, तेली समाचार और रौनियार वैश्य शामिल थे ।</strong></p>
<p>1906 में बिहार टाइम्स ने अपना नाम बदलकर बिहारी रख लिया । उसी साल बिहार गार्जियन ने अपना नाम बदलकर बिहारी रख लिया । दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों अख़बारों ने अदालत के आदेश के बाद अपने नए नामों की अलग-अलग स्पेलिंग तय कर ली। नया नाम बिहारी ज़्यादा दिन तक नहीं चल सका और कुछ ही सालों में बंद हो गया। बिहारी का प्रकाशन सच्चिदानंद सिन्हा के साथ-साथ सैयद हसन इमाम के संपादकीय के तहत हुआ। 1913 में जब यह दैनिक बना तो इसके संपादक महेश्वर प्रसाद थे। लेकिन यह इस रूप में सिर्फ़ चार साल ही चला और 1917 में बंद हो गया। </p>
<figure id="attachment_6727" aria-describedby="caption-attachment-6727" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss.jpg" alt="" width="1363" height="1949" class="size-full wp-image-6727" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-210x300.jpg 210w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-716x1024.jpg 716w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-768x1098.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-1074x1536.jpg 1074w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6727" class="wp-caption-text">आज The Hindustan Times में कार्य करने वाले पत्रकारों को शायद मालूम नहीं हो कि पटना अथवा दिल्ली से प्रकाशित The Hindustan Times का वजूद यही अख़बार है।</figcaption></figure>
<p>हालांकि, एक साल बाद ही सचिदानंद सिन्हा ने पटना से एक और समाचार प्रकाशन शुरू करके इस कमी को पूरा किया, अंग्रेजी समाचार द्विसाप्ताहिक, सर्चलाइट । 1920 में यह त्रैमासिक और फिर 1930 में दैनिक बन गया। सर्चलाइट की शुरुआत के प्रयासों में कई लोगों ने सहयोग किया , जिसका आधार एक प्रगतिशील राष्ट्रवादी संपादकीय दृष्टिकोण था, जिसमें डॉ राजेंद्र प्रसाद भी शामिल थे, जो अखबार के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। सैयद हैदर हुसैन और महेश्वर प्रसाद सर्चलाइट के पहले दो संपादक थे, लेकिन बाद के वर्षों में सीआर सौम्याजुलु और एस रंगा अय्यर जैसे संपादकों के उत्तराधिकार ने अखबार का संपादन किया। इसके शुरुआती कुछ दशकों में मुरली मनोहर प्रसाद इसके सबसे लंबे समय तक संपादक रहे। बाद में, के रामाराव, एम शर्मा, डीके शारदा, टीजेएस जॉर्ज, एससी सरकार, एसके राव और आरके मक्कड़ पटना में इसके संपादकीय कार्यालय के प्रमुख रहे। </p>
<p>1930 में, बिहार को प्रांत में एक नया अंग्रेजी समाचार पत्र मिला, इंडियन नेशन । इसकी स्थापना दरभंगा के महाराजा ने की थी, जो आंशिक रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र पर अख़बार के अधिक ध्यान को समझाता है। यह इसके कर्मचारियों की संरचना में भी स्पष्ट था, क्योंकि कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा मिथिला क्षेत्र से था। 1941 में, इंडियन नेशन को दैनिक आर्यवर्त के रूप में एक सहयोगी हिंदी प्रकाशन भी मिला । आज़ादी के बाद लगभग चार दशकों तक इन दैनिकों ने बड़े राष्ट्रीय अख़बारों की व्यापक पहुँच और संसाधनों के मुक़ाबले अपनी स्थिति बनाए रखी। ख़ास तौर पर, सर्चलाइट की रिपोर्ट्स की चर्चा उच्च पदों पर बैठे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होती थी, कभी-कभी तो हद से भी आगे निकल जाती थी। 1960 के दशक में, बिहार की केबी सहाय के नेतृत्व वाली सरकार में भ्रष्टाचार और सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ़ रिपोर्ट्स के कारण इसके संपादक टीजेएस जॉर्ज को जेल जाना पड़ा। यहां तक कि इसका हिंदी प्रकाशन, प्रदीप , 1970 के दशक के आरंभ में भ्रष्टाचार विरोधी जेपी आंदोलन के दौरान समाचार का सबसे अधिक मांग वाला स्रोत था। </p>
<p><strong>हालाँकि, 1980 के दशक के उत्तरार्ध में परिदृश्य बदल गया। इस समय, बिड़ला समूह ने सर्चलाइट और प्रदीप का अधिग्रहण कर लिया था । हालाँकि, इसने पटना में उनके संपादकीय कामकाज और सामग्री निर्माण में कोई छेड़छाड़ नहीं की। फिर 1986 में, बिड़ला समूह ने फैसला किया कि अब उनके राष्ट्रीय अखबारों &#8211; हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान &#8211; के लिए बिहार मीडिया बाजार में प्रवेश करने का समय आ गया है। अपने राष्ट्रीय अखबारों के लिए रास्ता बनाने के लिए, सर्चलाइट और प्रदीप को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। अंग्रेजी समाचार पत्र क्षेत्र में अग्रणी टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी शीघ्र ही इसका अनुसरण किया और 1980 के दशक के अंत में पटना संस्करण शुरू किया।  इसी समय, इंडियन नेशन और आर्यवर्त को अपने सीमित फोकस, घटती पाठक संख्या और यूनियन हड़तालों के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। प्रिंट उत्पादन के तकनीकी उन्नयन में निवेश करने में उनकी विफलता ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया। विज्ञापन राजस्व में ठहराव या गिरावट ऐसे कारकों का संचयी प्रभाव था। इंडियन नेशन किसी तरह 90 के दशक में चलता रहा, लेकिन बीच-बीच में छपने के बाद दशक के अंत में बंद हो गया। आर्यावर्त भी बंद हो गया। </strong></p>
<p>1990 के दशक के प्रारंभ में, विद्वान अरविंद एन दास ने अपनी पुस्तक, द रिपब्लिक ऑफ बिहार (पेंगुइन, 1992) में इन परिवर्तनों का उल्लेख किया था। उन्होंने लिखा: &#8220;शहर में लंबे समय से एक समृद्ध प्रेस का बोलबाला रहा है। अब हालांकि सर्चलाइट और प्रदीप जैसे प्रमुख स्थानीय समाचारपत्रों को विशाल हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान के रूप में राष्ट्रीय मीडिया प्रतिष्ठान में शामिल कर लिया गया है , लेकिन इंडियन नेशन , आर्यावर्त और बिहार हेराल्ड जैसे अन्य समाचारपत्रों की मृत्यु हो गई है , लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे नए और बड़े प्रकाशन राज्य में सामने आए हैं।&#8221; हालांकि, यह भी सवाल है कि 1980 के दशक के बाद से राष्ट्रीय मीडिया को बिहार की ओर क्या आकर्षित करने लगा। दास और मीडिया आलोचक सेवंती निनान की किताबों ने इसका जवाब देने की कोशिश की है। दास ने कहा, &#8220;यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बिहार, जो कि प्रति व्यक्ति आय में बहुत कम है, में समाचार पत्रों का संयुक्त प्रसार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से कहीं अधिक है।&#8221; </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2.jpg" alt="" width="1984" height="2559" class="aligncenter size-full wp-image-6731" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-233x300.jpg 233w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-794x1024.jpg 794w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-768x991.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-1191x1536.jpg 1191w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-1588x2048.jpg 1588w" sizes="auto, (max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a></p>
<p>पंद्रह साल बाद, निनान ने बिहार के अख़बार बाज़ार में बड़े मीडिया खिलाड़ियों के निवेश के बारे में अपने तर्क में उसी संभावना को पहचाना। हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड में , निनान ने लिखा: &#8220;भारत के सबसे पिछड़े राज्य के रूप में अपनी छवि के बावजूद, बिहार एक अख़बार के लिए एक अच्छा निवेश था। यहाँ की आबादी राजनीतिक रूप से जागरूक थी, भले ही साक्षरता कम थी। और प्रेषण और कृषि संपदा के कारण, राज्य में बहुत सारा पैसा था जिसका दोहन किया जा सकता था।&#8221; यहाँ, यह देखना भी दिलचस्प है कि दास ने किस तरह एक दुष्चक्र की ओर इशारा किया जिसने 1980 और 1990 के दशक में बिहार के प्रमुख अखबारों को आर्थिक रूप से कमज़ोर कर दिया था। स्थिर विज्ञापन राजस्व के कारण उनके पास प्रिंट उत्पादन तकनीक में निवेश करने के लिए बहुत कम पैसे बचे थे, और उनके संचालन की पुरानी तकनीक ने उन्हें संभावित विज्ञापनदाताओं के लिए आकर्षक नहीं बनाया। दास ने यह भी तर्क दिया कि पाठकों की कम क्रय शक्ति विज्ञापनदाताओं के उदासीन दृष्टिकोण का कारण है। दास ने तर्क दिया, &#8220;जबकि प्रसार में वृद्धि हुई है, विज्ञापन आनुपातिक रूप से नहीं बढ़े हैं&#8230;नतीजतन, मुद्रण तकनीक या प्रकाशन गुणवत्ता में बहुत कम सुधार हुआ है। इसलिए, उदाहरण के लिए, रंगीन मुद्रण की कोई सुविधा नहीं है &#8211; उच्च श्रेणी के विज्ञापन के लिए एक आवश्यक आवश्यकता जो प्रकाशन के लिए आवश्यक सब्सिडी प्रदान करती है।&#8221;</p>
<p>पाटलिपुत्र टाइम्स जैसे अख़बार को नए सिरे से शुरू करने के छिटपुट प्रयास भी लंबे समय तक नहीं चल पाए। अभी भी कई हिंदी दैनिक और अविनाश चंद्र मिश्रा की राजनीतिक समाचार पत्रिका, समकालीन तापमान (1997 में स्थापित) जैसी पत्रिकाएँ हैं, जो क्षेत्रीय समाचार क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं। पटना में स्थित कुछ उर्दू समाचार प्रकाशनों को राज्य में अभी भी सीमित पाठक मिल रहे हैं। हालाँकि, पटना स्थित हिंदी और उर्दू प्रकाशन अब उस पहुंच और प्रभाव के आसपास भी नहीं हैं जो बिहार स्थित समाचार प्रकाशनों के पास हुआ करता था। राज्य से मीडिया उद्यम प्रयास स्पष्ट रूप से स्थानीय टेलीविजन समाचार चैनलों या डिजिटल स्पेस में स्थानांतरित हो गए हैं। डिजिटल उपस्थिति को राज्य की राजधानी में स्थित विशेष रूप से ऑनलाइन समाचार प्लेटफार्मों के प्रसार में देखा जा सकता है।</p>
<p><strong>1990 के दशक के मध्य में जब बिहार में चारा घोटाला उजागर हुआ था, तब राष्ट्रीय समाचार पत्रों के पटना संस्करण ने इस पर पूरी दिलचस्पी से काम नहीं किया था। रांची स्थित क्षेत्रीय दैनिक प्रभात खबर ने इसके विभिन्न चरणों, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो की जांच भी शामिल थी, पर काम किया। उस समय यह एक बहुत ही लोकप्रिय अखबार था। कोई भी व्यक्ति आश्चर्य में पड़ सकता है कि क्या बिहार का कोई प्रमुख दैनिक अखबार इस घिनौनी कहानी को बता सकता था। पटना का कोई भी प्रमुख अखबार इस कहानी को बताने के लिए बच नहीं पाया। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumars-launch-of-indian-express-its-a-matter-of-deep-research">नीतीश कुमार के हाथों &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; अख़बार का &#8216;लोकार्पण&#8217; : &#8216;अख़बार&#8217; का &#8216;कद घटा&#8217; या &#8216;नीतीश कुमार&#8217; का &#8216;कद बढ़ा&#8217;, एक &#8216;गहन शोध&#8217; का विषय</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>प्रधानमंत्री जी, उन लोगों की &#8216;कल्पना वाला बिहार&#8217; की बात नहीं करें, उनके अनुयायी &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; कर दिए 😢 आप &#8216;अपनी सोच को जमीन पर उतारें&#8217;, लोग साथ खड़े मिलेंगे 👣 बशर्ते 👁</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 31 May 2025 12:25:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: पटना हवाई अड्डे पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्तीपुर के ताजपुर प्रखंड के प्रतिभाशाली युवा क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी और उनके माता-पिता से मुलाक़ात कर, दो-टूक बात कर वैभव को आशीष दिए, शायद पटना के खेल-कूद के इतिहास में ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई थी। अपनी व्यस्तता भरे समय से चार [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prime-minister-ji-should-not-talk-about-their-imaginary-bihar-their-followers-have-been-destroyed">प्रधानमंत्री जी, उन लोगों की &#8216;कल्पना वाला बिहार&#8217; की बात नहीं करें, उनके अनुयायी &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; कर दिए 😢 आप &#8216;अपनी सोच को जमीन पर उतारें&#8217;, लोग साथ खड़े मिलेंगे 👣 बशर्ते 👁</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: पटना हवाई अड्डे पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्तीपुर के ताजपुर प्रखंड के प्रतिभाशाली युवा क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी और उनके माता-पिता से मुलाक़ात कर, दो-टूक बात कर वैभव को आशीष दिए, शायद पटना के खेल-कूद के इतिहास में ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई थी। अपनी व्यस्तता भरे समय से चार मिनट चौबीस सेकेंड्स का समय निकालकर हवाई अड्डे की तपती धूप में वैभव के खेलों की प्रशंसा करना या भविष्य के प्रयासों के किये शुभकामनायें देना, प्रधानमंत्री की खेल के प्रति, खिलाड़ी के प्रति उनकी &#8216;अपनी सोच&#8217; को उजागर करता है &#8211; भले इस रंगमंच का निर्माण राजनीतिक लाभ लेने के लिए ही किया गया हो। </strong></p>
<p>लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार में बिजली के बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देते हुए औरंगाबाद जिले में 29,930 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली नबीनगर सुपर थर्मल पावर परियोजना, चरण-II (3&#215;800 मेगावाट) की आधारशिला रखते यह कहे कि &#8216;बिहार को बाबा साहब अंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, बाबू जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण द्वारा कल्पित बिहार में बदलने के विजन को रेखांकित कर विकसित बिहार बनाने का लक्ष्य है&#8217;, मन में सैकड़ों प्रश्न उपस्थित हो गए। सभी प्रश्नों के अंत में &#8216;तारांकित सवाल&#8217; था &#8216;क्या सच में वर्तमान राजनीतिक वातावरण और नेतृत्व में उनकी कल्पनाओं को दिशा दिया जा सकता है? अगर विगत 35-वर्षों का गैर-कांग्रेसी और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकलने नेताओं के नेतृत्व और उनके द्वारा कार्यों के निष्पादन को देखते हैं तो लगता है शायद &#8216;नहीं&#8217; दे पाएंगे। यह असली राजनीति है। </p>
<figure id="attachment_6671" aria-describedby="caption-attachment-6671" style="width: 1597px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3.jpg" alt="" width="1597" height="1190" class="size-full wp-image-6671" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3.jpg 1597w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3-300x224.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3-1024x763.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3-768x572.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_3-1536x1145.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1597px) 100vw, 1597px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6671" class="wp-caption-text">पटना हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री और वैभव सूर्यवंशी के माता-पिता</figcaption></figure>
<p><strong>डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अन्य सोचों को छोड़ कर अगर सिर्फ सामाजिक न्याय को लेते हैं तो उन्होंने &#8216;सामाजिक न्याय को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा जो जाति, नस्ल, लिंग, शक्ति, पद या धन के बावजूद सभी मनुष्यों के लिए स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सुनिश्चित करती हो। उनकी दृष्टि जाति व्यवस्था जैसी दमनकारी संरचनाओं को खत्म करने और एक ऐसे समाज की वकालत करने पर केंद्रित थी जहाँ व्यक्तियों का मूल्य जन्म से नहीं बल्कि योग्यता और उपलब्धि से निर्धारित होता है।&#8217;</strong> </p>
<blockquote><p>लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार और राजनीतिक पार्टियां प्रदेश में सम्पादित जातीय जनगणना के आधार पर मतदाताओं सहित, प्रदेश के लोगों को 215 जातियों में चीड़-फाड़ कर दिए। अन्य जातियों को छोड़िये, अनुसूचित जाति को 22 खण्डों में, अनुसूचित जनजाति को 32 फांकों में, पिछड़ी जाति को 30 फांकों में, अत्यंत पिछड़ी जाती को 113 भागों में चीड़फाड़ दिए। ऊंची जाति सात के सात ही रहे क्योंकि प्रदेश के मतदाताओं की संख्या में उनकी भागीदारी औसतन कम है। वैसी स्थिति में बाबा साहेब की सोच वाली बिहार बनना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। शब्द कटु है, लेकिन सत्य यही है।</p></blockquote>
<p> <br />
शायद प्रधानमंत्री यह भी नहीं सोचे की भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर प्रदेश में जिस &#8216;समतावादी&#8217; समाज की स्थापना करना चाह रहे थे, जिसके लिए जीवन पर्यन्त लड़ते रहे, लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में सिर्फ उनका नाम बिका, उनकी जाति बिकी और उनकी सोच और उनका समाज जस-का-तस रहा। इतना ही नहीं, साल 1994 में तत्कालीन नेता जॉर्ज फर्नांडिस की अगुवाई में &#8216;समता पार्टी&#8217; बनी। &#8216;समता पार्टी&#8217; के अभ्यर्थी के रूप में नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। गुटबाजी शुरू हुआ और &#8216;समता पार्टी&#8217; लालू प्रसाद यादव वाली &#8216;राष्ट्रीय जनता दल&#8217; के नक़्शे कदम पर &#8216;जनता दल (यूनाइटेड) बनी। &#8216;समता पार्टी&#8217; प्रदेश के मतदाताओं को &#8216;युनाइट&#8217; करने में असमर्थ रही। आज बिहार में &#8216;समता पार्टी&#8217; को कोई जानता भी नहीं है, फिर भारतरनत कर्पूरी ठाकुर की समतावादी समाज को कौन पूछता है। विश्वास नहीं होता तो जांच-पड़ताल करा लें। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3.jpg" alt="" width="2200" height="1475" class="aligncenter size-full wp-image-6672" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3-300x201.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3-1024x687.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3-768x515.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3-1536x1030.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-3-2048x1373.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>जहाँ तक बाबू जगजीवन राम की सोच वाली समाज और प्रदेश का सवाल है, उनकी इच्छा थी कि प्रदेश में भेदभाव और असमानता से मुक्त समाज हो, विशेष रूप से दलितों और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए। वे अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग में गहराई से शामिल थे, जिसका उद्देश्य अछूतों के लिए समानता हासिल करना था। उनका दृष्टिकोण सामाजिक न्याय, समानता और दलितों के उत्थान के प्रति प्रतिबद्धता में निहित था।  </p>
<p>लेकिन प्रदेश में जब 22 खण्डों में अनुसूचित जाति, 32 खण्डों में जनजाति, 30 खण्डों में पिछड़ी जाति और 113 खण्डों में अत्यंत पिछड़ी जाति बन गयी हो; तो बाबू जगजीवन राम की सोच सासाराम ही नहीं, पटना की सड़कों पर तहस-नहस हो गयी। इतना ही नहीं, बाबू जगजीवन राम की सुपुत्री और भारतीय विदेश सेवा की शीर्षस्थ अधिकारी, जो लोकसभा की अध्यक्ष भी बने, बिहार के विकास में, अपने पिता बाबू जगजीवन राम की सोच को जमीनी स्तर पर उतारने में क्या की? यह तो प्रदेश का मतदाता जानता ही है। यदि देखा जाय तो बिहार की स्थिति जितना भयानक विगत 35 वर्षों में ही हुआ, पहले कभी नहीं हुआ था। और इस कालखंड में राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार के साथ-साथ जनता दल (यूनाइटेड) के मुखिया नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। </p>
<p><strong>अब जहाँ तक लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सामाजिक सोच और विचारधारा का प्रश्न है, नब्बे के मार्च महीने में उनके सबसे प्रिय नेता लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। फिर उनकी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी कुर्सी पर बैठीं। पुत्र भी उप-मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए।  दूसरे पुत्र भी मंत्री बने। परिवार के अन्य सदस्य लोकसभा, राज्य सभा को सुशोभित किये। समय निकलता गया और विराजमान हो गए जयप्रकाश नारायण द्वारा आंदोलन के लिए निर्मित समिति के प्रमुख सदस्य नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय में। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5.jpg" alt="" width="2200" height="1144" class="aligncenter size-full wp-image-6673" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5-300x156.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5-1024x532.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5-768x399.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5-1536x799.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-5-2048x1065.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>प्रधानमंत्री जी आप तो गवाह रहे हैं कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहने के लिए कभी लालू की पार्टी को साथ लिए, कभी आपकी पार्टी से हाथ मिलाये; कभी लालू को झटका दिए तो कभी बीजेपी को करेंट लगाए। जयप्रकाश नारायण की आत्मा आज बिलखती होती यह देखकर कि जिस सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिवेश को बदलने के लिए सम्पूर्ण क्रांति की लड़ाई लड़ी गयी थी, उस आंदोलन से उभरे नेताओं ने प्रदेश का क्या हाल कर दिया। अगर विश्वास नहीं हो तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के कालखंड के पत्रकारों से, नेताओं से, सामान्य लोगों से पूछ कर देखिये। या फिर कभी मौका लगे तो जयप्रकाश नारायण के कदमकुआं स्थित घर &#8211; चरखा समिति &#8211; में भ्रमण, सम्मेलन करके देखिये। खैर। </p>
<blockquote><p>हाँ, आपकी यह बात लोगों को स्वीकार होगा जब आपने कहा कि &#8220;जब भी बिहार ने प्रगति की है, भारत ने विश्व स्तर पर नई ऊंचाइयों को छुआ है। आप विश्वास भी व्यक्त किये कि सभी लोग मिलकर विकास की गति को तेज करेंगे।&#8221; अतः आप अपनी सोच वाली बिहार का निर्माण करें ताकि प्रदेश के लोगों का जीवन में बदलाव आये। </p></blockquote>
<p>बहरहाल,  काराकाट में 48,520 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली कई विकास परियोजनाओं की आधारशिला रख कर राष्ट्र को समर्पित किये । सासाराम के महत्व पर टिप्पणी करते हुए तथा इस बात पर बल देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इसका नाम भी भगवान राम की विरासत को दर्शाता है।  वे भगवान राम की वंशावली की गहरी जड़ों वाली परंपराओं पर प्रकाश डाला, तथा अटूट प्रतिबद्धता के सिद्धांत – एक बार जो वादा किया जाता है, उसे पूरा किया जाना चाहिए- को रेखांकित किया।</p>
<p>बिहार के रेलवे बुनियादी ढांचे में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए मोदी ने बिहार में विश्वस्तरीय वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत और रेलवे लाइनों के दोहरीकरण और तिहरेकरण की चल रही है। उन्होंने कहा कि छपरा, मुजफ्फरपुर और कटिहार जैसे क्षेत्रों में में काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। सोन नगर और अंडाल के बीच मल्टी-ट्रैकिंग का काम चल रहा है, जिससे ट्रेनों की आवाजाही में काफी सुधार होगा। उन्होंने यह भी घोषणा की कि अब सासाराम में 100 से अधिक ट्रेनें रुकती हैं, जो इस क्षेत्र की बढ़ती कनेक्टिविटी को दर्शाता है। उन्होंने पुष्टि की कि लंबे समय से चली आ रही चुनौतियों का समाधान किया जा रहा है, साथ ही रेलवे नेटवर्क को आधुनिक बनाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ये विकास पहले भी क्रियान्वित किए जा सकते थे, लेकिन बिहार की रेलवे प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए जिम्मेदार लोगों ने निजी लाभ के लिए भर्ती प्रक्रियाओं का फायदा उठाया और लोगों को उनके सही अवसरों से वंचित किया। उन्होंने बिहार के लोगों से उन लोगों के धोखे और झूठे वादों के प्रति सतर्क रहने का आग्रह किया, जिन्होंने पहले &#8216;जंगल राज&#8217; के तहत शासन किया था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7.jpg" alt="" width="2200" height="1273" class="aligncenter size-full wp-image-6674" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7-300x174.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7-1024x593.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7-768x444.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7-1536x889.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/7-2048x1185.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>यह रेखांकित करते हुए कि बिजली के बिना विकास अधूरा है, उन्होंने कहा कि औद्योगिक प्रगति और जीवन की सुगमता विश्वसनीय बिजली आपूर्ति पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले की तुलना में बिहार में बिजली की खपत चार गुना बढ़ गई है। प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि नबीनगर में 30,000 करोड़ रुपये के निवेश से एक प्रमुख एनटीपीसी बिजली परियोजना निर्माणाधीन है और यह परियोजना बिहार को 1,500 मेगावाट बिजली प्रदान करेगी। उन्होंने बक्सर और पीरपैंती में नए थर्मल विद्युत संयंत्रों की शुरुआत पर भी प्रकाश डाला। भविष्‍य पर ध्यान देने, विशेष रूप से बिहार को हरित ऊर्जा की ओर आगे बढ़ाने पर सरकार के फोकस को रेखांकित करते हुए, प्रधानमंत्री ने राज्य की अक्षय ऊर्जा पहल के हिस्से के रूप में कजरा में एक सौर पार्क के निर्माण पर प्रकाश डाला। </p>
<p><strong>उन्होंने कहा की कि पीएम-कुसुम योजना के तहत, किसानों को सौर ऊर्जा के माध्यम से आय उत्पन्न करने के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं, जबकि अक्षय कृषि फीडर खेतों को बिजली की आपूर्ति कर रहे हैं, जिससे कृषि उत्पादकता में और सुधार हो रहा है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, लोगों के जीवन में सुधार हुआ है, और महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं। आधुनिक बुनियादी ढाँचा गाँवों, गरीबों, किसानों और छोटे उद्योगों को सबसे अधिक लाभ पहुँचाता है, क्योंकि वे बड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से जुड़ सकते हैं। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि राज्य में नए निवेश से नए अवसर पैदा होते हैं और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। </strong></p>
<p>बिहार में किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार के निरंतर प्रयासों को रेखांकित करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि बिहार में 75 लाख से अधिक किसान पीएम-किसान सम्मान निधि योजना के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की और जोर देकर कहा कि बिहार के मखाना को जीआई टैग दिया गया है, जिससे मखाना किसानों को अत्यंत लाभ हुआ है। इस साल के बजट में बिहार में राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण संस्थान की घोषणा भी शामिल है। प्रधानमंत्री ने टिप्पणी की कि अभी दो-तीन दिन पहले ही कैबिनेट ने खरीफ सीजन के लिए धान सहित 14 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि को मंजूरी दी है और जोर देकर कहा कि इस निर्णय से किसानों की उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित होगा और उनकी आय बढ़ेगी।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1.jpg" alt="" width="2200" height="1482" class="aligncenter size-full wp-image-6675" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1-300x202.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1-1024x690.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1-768x517.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1-1536x1035.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/8-1-2048x1380.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन लोगों ने बिहार को सबसे अधिक धोखा दिया है, वे अब सत्ता हासिल करने के लिए सामाजिक न्याय के झूठे आख्यानों का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि उनके शासन के दौरान, बिहार के गरीब और हाशिए के समुदायों को बेहतर जीवन की तलाश में राज्य छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा, “दशकों तक, बिहार में दलितों, पिछड़े वर्गों और आदिवासी समुदायों के पास बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं भी नहीं थीं”, ये समुदाय बैंकिंग की सुविधा से वंचित थे, अक्सर उन्हें बैंकों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था और व्यापक स्तर पर बेघर बने रहे। लाखों लोगों के पास उचित आश्रय नहीं था। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या पिछली सरकारों के दौरान बिहार के लोगों द्वारा सहे गए दुख, कठिनाई और अन्याय ही विपक्षी दलों द्वारा वादा किया गया सामाजिक न्याय था। प्रधानमंत्री ने कहा कि अब जबकि दलितों, हाशिए पर पड़े समूहों और पिछड़े समुदायों ने विपक्ष की गलत कृत्यों के कारण उससे दूरी बना ली है, पार्टी सामाजिक न्याय का हवाला देकर अपनी पहचान पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि कोई भी गांव या पात्र परिवार उसके कल्याणकारी कार्यक्रमों से वंचित न रहे और उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि बिहार ने इसी विजन के साथ डॉ. भीमराव अंबेडकर समग्र सेवा अभियान शुरू किया है। उन्होंने रेखांकित किया कि इस अभियान के तहत सरकार 22 अनिवार्य योजनाओं के साथ गांवों और समुदायों तक एक साथ पहुंच रही है और इसका उद्देश्य दलितों, महादलितों, पिछड़े वर्गों और गरीबों को सीधे लाभ पहुंचाना है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अब तक 30,000 से अधिक शिविर आयोजित किए जा चुके हैं और लाखों लोग इस अभियान से जुड़ चुके हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब सरकार सीधे लाभार्थियों तक पहुंचती है, तो भेदभाव और भ्रष्टाचार खत्म हो जाता है और इसे एक ऐसा दृष्टिकोण बताया जो सामाजिक न्याय का सच्चा अवतार है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1.jpg" alt="" width="2200" height="1602" class="aligncenter size-full wp-image-6676" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1-300x218.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1-1024x746.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1-768x559.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1-1536x1118.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1-2048x1491.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/9-1-324x235.jpg 324w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;हमारी लड़ाई देश के हर दुश्मन से है, फिर वो चाहे सीमा पार हो, या देश के भीतर हो। बीते वर्षों में हमने हिंसा और अशांति फैलाने वालों का कैसे खात्मा किया है, बिहार के लोग इसके साक्षी हैं। आप याद करिए, कुछ साल पहले तक सासाराम, कैमूर, और आसपास के इन जिलों में क्या हालात थे? नक्सलवाद कैसे हावी था, मुंह पर नकाब लगाए, हाथों में बंदूक थामे, नक्सली कब-कहाँ सड़कों पर निकल आयें, हर किसी को ये खौफ रहता था। सरकारी योजना आती थी, पर नागरिकों तक पहुंचती ही नहीं थी। नक्सल प्रभावित गांव में न तो अस्पताल होता था, न मोबाइल टावर। कभी स्कूल जलाए जाते थे, कभी सड़क बनाने वालों को मार दिया जाता था। इन लोगों का बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान पर कोई विश्वास नहीं था।&#8217;</p>
<p><strong>2014 के बाद से हमने इस दिशा में और तेजी से काम किया। हमने माओवादियों को उनके किए की सजा देनी शुरू की। हम युवाओं को विकास की मुख्यधारा में भी लेकर आए। 11 सालों की दृढ़ प्रतिज्ञा का फल आज देश को मिलना शुरू हुआ है। 2014 से पहले देश में सवा सौ से ज़्यादा ज़िले नक्सल प्रभावित थे, अब सिर्फ, सवा सौ से ज़्यादा, अब सिर्फ 18 जिले नक्सल प्रभावित बचे हैं। अब सरकार सड़क भी दे रही है, रोजगार भी दे रही है। वो दिन दूर नहीं जब माओवादी हिंसा का पूरी तरह से खात्मा हो जाएगा, शांति, सुरक्षा, शिक्षा और विकास गाँव-गाँव तक बिना रुकावट के पहुंचेंगे।</strong></p>
<p>कभी बिहार में एक ही एयरपोर्ट था– पटना। आज दरभंगा एयरपोर्ट भी शुरू हो गया है। अब यहां से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों की फ्लाइट मिलती है। बिहार के लोगों की लंबे समय से मांग थी कि पटना एयरपोर्ट के टर्मिनल को आधुनिक बनाया जाए, अब ये मांग भी पूरी हो गई है। कल शाम मुझे पटना एयरपोर्ट की नई टर्मिनल बिल्डिंग का लोकार्पण करने का सौभाग्य मिला है। ये नया टर्मिनल अब 1 करोड़ यात्रियों को संभाल सकता है। बिहटा एयरपोर्ट पर भी 1400 करोड़ रुपए का निवेश हो रहा है। बिहार में आज हर तरफ फोर लेन और सिक्स लेन सड़कों का जाल बिछ रहा है। पटना से बक्सर, गयाजी से डोभी, पटना से बोधगया जी, पटना–आरा–सासाराम ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, हर तरफ तेजी से काम हो रहा है। गंगा, सोन, गंडक, कोसी समेत सभी प्रमुख नदियों पर नए पुल बनाए जा रहे हैं। हजारों करोड़ की ऐसी परियोजनाएं बिहार में नए अवसरों और संभावनाओं का निर्माण कर रही हैं। इन प्रोजेक्ट्स से हजारों युवाओं को रोज़गार मिलेगा। यहाँ टूरिज्म और व्यापार दोनों को फायदा होगा।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355.jpg" alt="" width="2200" height="1576" class="aligncenter size-full wp-image-6677" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355-300x215.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355-1024x734.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355-768x550.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355-1536x1100.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/H20250529184355-2048x1467.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8220;मैं आपसे पूछता हूँ, बिहार के लोगों की ये दुर्दशा, ये पीड़ा, ये तकलीफ, क्या ये काँग्रेस और आरजेडी का, क्या यही सामाजिक न्याय था? गरीबों को इस प्रकार से मजबूरी में जीने के लिए सारी नीतियां बनाने के आदी लोग, साथियों इससे ज्यादा अन्याय कोई नहीं हो सकता है। कांग्रेस और आरजेडी वालों, इन्होंने कभी दलित, पिछड़ों की इतनी तकलीफ़ों की चिंता तक नहीं की। ये लोग विदेशियों को बिहार की गरीबी दिखाने के लिए घुमाने लाते थे। अब जब दलित, वंचित और पिछड़ा समाज ने कांग्रेस को उसके पापों की वजह से छोड़ दिया है, तो इन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए सामाजिक न्याय की बातें याद आ रही हैं।&#8221;</p>
<p><strong>&#8220;हम चाहते हैं कि कोई भी गांव छूटे नहीं, कोई भी हकदार परिवार सरकार की योजनाओं से वंचित न रह जाए। मुझे खुशी है, इसी सोच के साथ बिहार सरकार ने डॉ. भीमराव अंबेडकर समग्र सेवा अभियान शुरू किया है। इस अभियान में 22 ज़रूरी योजनाएं एक साथ लेकर सरकार गांव-गांव, टोला-टोला पहुँच रही है। हमारा लक्ष्य है– हर दलित, महादलित, पिछड़े, अति-पिछड़े गरीब के घर तक सीधे पहुंचना। जब सरकार खुद लाभार्थियों तक पहुंचती है, तो ना कोई भेदभाव होता है, और ना ही कोई भ्रष्टाचार होता है। और तभी सच्चा-सामाजिक न्याय होता है।</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prime-minister-ji-should-not-talk-about-their-imaginary-bihar-their-followers-have-been-destroyed">प्रधानमंत्री जी, उन लोगों की &#8216;कल्पना वाला बिहार&#8217; की बात नहीं करें, उनके अनुयायी &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; कर दिए 😢 आप &#8216;अपनी सोच को जमीन पर उतारें&#8217;, लोग साथ खड़े मिलेंगे 👣 बशर्ते 👁</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 May 2025 04:59:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[arif mohammad khan]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chief ministers]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[governor]]></category>
		<category><![CDATA[lalu yadav]]></category>
		<category><![CDATA[mafia]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना: सम्भवतः विगत तीन दिनों से देश के वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, विशेषज्ञों से पूछ रहा हूँ कि क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी राज्य का व्यक्ति अपने राज्य का राज्यपाल नहीं बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 157 के तहत राज्यपाल हेतु जो अहर्ताएं निर्धारित हैं, उसका पालन [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar">&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना: सम्भवतः विगत तीन दिनों से देश के वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, विशेषज्ञों से पूछ रहा हूँ कि क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी राज्य का व्यक्ति अपने राज्य का राज्यपाल नहीं बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 157 के तहत राज्यपाल हेतु जो अहर्ताएं निर्धारित हैं, उसका पालन होना आवश्यक है। लेकिन सबों का उत्तर &#8216;नकारात्मक&#8217; ही रहा। आज़ादी के बाद आज तक एक राज्य में जन्म लिए व्यक्ति दूसरे राज्य का राज्यपाल बनते आ रहे हैं और कहते हैं &#8216;यही परम्परा&#8217; है। वैसे प्रदेश का एक व्यक्ति का अगर अपने प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में कोई संवैधानिक अर्चन नहीं है, तो राज्यपाल / कुलाधिपति के मामले में भी देश के विद्वान-विदुषियों को, राजनीतिक विशेषज्ञों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। बदलाव की शुरुआत करने की अपेक्षा की नजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर ही उठती है, क्योंकि मोदी जी हैं तो मुमकिन है। </strong></p>
<p>जब अपने प्रदेश के नेता अपने ही पंचायत क्षेत्र, विधानसभा क्षेत्र, लोकसभा क्षेत्र, राज्यसभा क्षेत्र का विकास मतदाताओं के नाक रगड़ने पर भी नहीं करते (विधानमंडल/संसद द्वारा विधायकों/सांसदों को विकास के लिए अनुमोदित राशि का आवंटन और बिना खर्च उस राशि का पड़ा होना आंक लें), तो फिर दूसरे प्रदेश से आयातित राज्यपाल उस प्रदेश के विकास में कितना भूमिका निभाएंगे &#8211; यह एक गंभीर शोध का विषय है। वजह यह है कि आज़ादी के बाद बिहार में अब तक दूसरे राज्यों से 42 महानुभाव (मोहतरमा नदारत) आयातित हुए और राज्यपाल की कुर्सी पर विराजमान हुए। हालांकि,  प्रदेश के राज्यपाल बिहार  के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, दुर्भाग्यवश  प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने में &#8216;सूई मात्र&#8217; भी पहल नहीं किये विगत 78 वर्षों में  &#8211; कुलाधिपति का कार्यालय गवाह है। </p>
<blockquote><p>दूसरी ओर, जब आज के परिपेक्ष में प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था को देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार के वर्तमान राज्यपाल/बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, जिस कार्य की शुरुआत केरल में किये थे, बिहार में दोहरा रहे हैं। यह मैं नहीं, राजनीतिक धनुर्धर कह रहे हैं। अपनी राज्यपाल की सेवा अवधि के दौरान केरल में आरिफ मोहम्मद खान के साथ स्थानीय सरकार से नोकझोंक भी हुई थी, अखबारों के पन्ने गवाह हैं। वे &#8216;विवाद&#8217; में भी आये। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी उनकी गतिविधि &#8216;अपच्य&#8217; हो जाय। </p></blockquote>
<p>वैसे नीतीश कुमार अपने कार्यकाल में अब तक कभी भी छात्रों के साथ &#8216;पन्गा&#8217; नहीं लिए, भले प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था रसातल में चली गयी हो, चली जा रही हो। नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों से आज तक विगत 35 वर्षों में प्रदेश का कमान जिन दो व्यक्तियों &#8211; लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार &#8211; के हाथों केंद्रित रहा, प्रदेश में शिक्षा के विकास को कितना महत्व दिया, यह वर्तमान स्थिति से आँका जा सकता है। इतना ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, उनकी पत्नी पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उनके दोनों पुत्र &#8211; एक पूर्व उप-मुख्यमंत्री और दूसरे पूर्व मंत्री &#8211; की नज़रों में शिक्षा का क्या महत्व रहा, यह उनकी शैक्षणिक योग्यता दर्शाता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि &#8216;वैसे वर्तमान राज्यपाल और कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान भी छात्रों की ताकत को जानते हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो जानते ही नहीं। </p>
<figure id="attachment_6577" aria-describedby="caption-attachment-6577" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg" alt="" width="1600" height="900" class="size-full wp-image-6577" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6577" class="wp-caption-text">राज्यपाल के रूप में शपथ लेते आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>आरिफ मोहम्मद अन्य राज्यपालों/कुलाधिपतियों जैसे नहीं हैं।  इनका कार्य करने का तरीका कुछ अलग है। प्रदेश के मुख्यमंत्री (पूर्व मुख्यमंत्री सहित), नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के किसी भी मंत्री से अधिक शिक्षित, जुझारू हैं। वाक्पटुता अधिक है,  क्योंकि ये भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता रह चुके हैं उसी कालखंड में जब नीतीश कुमार या लालू यादव पटना विश्वविद्यालो छात्र नेता बन रहे थे । आरिफ मोहम्मद खान अलीगढ़ मुस्लिक विश्वविद्यालय छात्र संघ के पहले सचिव (1972-73) बने और फिर अध्यक्ष (1973-74) बने। तीन साल बाद, उत्तर प्रदेश के सियाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक (1977-80) बने। फिर सातवीं, आठवीं, नवमी और बारहवीं लोकसभा में कानपुर और बहराइच से सांसद बने। केंद्र में मंत्री भी रहे। लेकिन चर्चा में अपनी वाक्पटुता के कारण आये। नीतीश और लालू के जीवनवृत भी कुछ ऐसा ही है। हाँ, ये अकेले हैं और बिहार में नीतीश &#8211; लालू का समूह है।</strong> </p>
<p>अब सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपने ही राज्य में, राज्य के बाहर से आये (ऐसा होता आया है) राज्यपाल के क्रियाकलापों पर अपनी पैनी निगाह नहीं रखे होंगे? यह माना नहीं जा सकता। आखिर विधानसभा का चुनाव आने वाला है। अगर चुनाब के मद्दे नजर प्रदेश में कोई राजनीतिक एजेंडा कार्य करना प्रारम्भ किया है तो निश्चित तौर पर नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के इस पड़ाव पर बिहार के मतदाताओं की नज़रों में हंसी के पात्र नहीं बनना चाहेंगे? नितीश कुमार को चाहे कितने भी तथाकथित अलंकरणों से नवाजा गया हो, हकीकत तो यह अवश्य है कि उन्होंने सत्ता की गलियारे से लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को बहुत दूर कर दिया। हां, वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के मद्दे नजर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि नीतीश कुमार को भी राजनीति की मुख्यधारा (मुख्यमंत्री कार्यालय) से बाहर निकालने का प्रयास नहीं हो रहा है। कोई तो है जो नेपथ्य से सब कुछ कर रहा है। ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में आरिफ मोहम्मद खान &#8211; नीतीश कुमार &#8211; लालू यादव अख़बारों की सुर्ख़ियों में छा जाएँ। गाँठ बाँध लीजिये। </p>
<figure id="attachment_6578" aria-describedby="caption-attachment-6578" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6578" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6578" class="wp-caption-text">पटना कॉलेज का ऐतिहासिक कॉरिडोर</figcaption></figure>
<p><strong>हाक़ी-डैगर-बन्दूक-पिस्तौल के बीच बिलखती शिक्षा </strong></p>
<p>बहरहाल, हॉकी स्टिक से डैगर, फिर डैगर से कट्टा, कट्टा से बन्दूक, पिस्टल, बम तक आने में बिहार के विश्वविद्यालय परिसरों को चार दशक भी नहीं लगा। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के कालखंड और उसके बाद जिस तरह प्रदेश ने नेताओं ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों के छात्रों का स्वहित में इस्तेमाल कर शैक्षिक वातावरण को मिट्टी में मिलाया, आज अगर पटना विश्वविद्यालय के बिहार नेशनल कॉलेज परिसर में गोलियां चली तो विश्वविद्यालय के कुलाधिपति को इतनी तकलीफ क्यों हो रही है। वे भी तो छात्र आंदोलन के उपज हैं। आज़ादी के बाद अब तक बिहार में 42 राज्यपाल बने जो पटना विश्वविद्यालय सहित, बिहार सभी विश्वविद्यालयों कुलाधिपति भी थे। लेकिन इन वर्षों में कोई भी कुलाधिपति विश्वविद्यालय परिसर में शैक्षिक वातावरण का निर्माण कैसे हो, नहीं सोचे। अगर सोचे होते तो शायद प्रदेश की शैक्षिक व्यवस्था का यह हश्र नहीं होता। </p>
<blockquote><p>आज के लोगों को ज्ञात हो अथवा नहीं, लेकिन मुद्दत पहले पटना साइंस कॉलेज के प्रोफ़ेसर बिल्टू सिंह की हत्या की गयी थी। प्रोफ़ेसर रघुजी वर्मा को मौत के घाट उतार दिया गया था। वाणिज्य महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रोफ़ेसर पी.एन. शर्मा पर बम फेंक कर कातिलाना हमला किया गया था। पटना साइंस कॉलेज के स्नातकोत्तर रसायन शास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर सिद्धेश्वर प्रसाद को 22 वर्ष पहले गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। उसकी कालखंड में पटना कॉलेज के पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष और पटना विश्वविद्यालय सीनेट के सदस्य प्रोफेसर शैलेंद्र धारी सिंह की उनके घर के पास निर्मम हत्या की गयी थी। पटना विश्वविद्यालय के ही दक्षिण एशियाई इतिहास विभाग की प्रोफ़ेसर पापिया घोष के साथ उनकी और उनकी बुज़ुर्ग नौकरानी मालती देवी की हत्या कर दी गई थी। पिछले वर्ष पटना लॉ कॉलेज परिसर में अंतिम वर्ष के एक छात्र, हर्ष राज, की हॉकी स्टिक, लोहे की रॉड, ईंट और लाठी से 10 से अधिक अज्ञात लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।</p></blockquote>
<p>सत्तर के दशक के बाद आज तक, न केवल पटना विश्वविद्यालय, बल्कि बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में कितनी गोलियां चली, कितने बम्ब फटे, कितने हॉकी स्टिक का इस्तेमाल कर अपना-किताब बराबर किया गया, यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की बिहार के शिक्षा मंदिरों को अब ईंट की दीवारों से, लोहे के ग्रिलों से जकड़ दिया गया है। आखिर इन गिरती, लुढ़कती मानसिकता, व्यवस्था के कालखंडों में भी तो इन विश्वविद्यालयों में कुलपति थे, प्रदेश में इन विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासकीय व्यवस्था को देखने के लिए कुलाधिपति थे &#8211; लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं किया। </p>
<figure id="attachment_6579" aria-describedby="caption-attachment-6579" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg" alt="" width="1363" height="1811" class="size-full wp-image-6579" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-226x300.jpg 226w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-771x1024.jpg 771w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-768x1020.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-1156x1536.jpg 1156w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6579" class="wp-caption-text">पटना कॉलेज का प्रवेश द्वार</figcaption></figure>
<p><strong>प्रदेश के कुलाधिपति ही जिम्मेदार है </strong></p>
<p>बिहार में धूल चाटती शिक्षा की स्थिति का अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है बिहार के &#8216;लाट साहब&#8217;, यानी प्रदेश के प्रथम नागरिक, जो संवैधानिक दृष्टि से सबसे सबल हैं और कल से लेकर आज तक के कुल 41 विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। आज बिहार में 41 विश्वविद्यालय है जिसमें 8 राष्ट्रीय स्तर के हैं, 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, २० राज्य विश्वविद्यालय हैं, 7 निजी विश्वविद्यालय हैं, 1 डीम्ड विश्वविद्यालय है और 4 केंद्र द्वारा पोषित। इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होने के नाते क्या अब तक राज्यपाल भवन में आये 42 कुलाधिपतियों का जबाबदेही नहीं था कि अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को अव्वल बनाते? शायद नहीं। </p>
<p>आज़ादी के बाद भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित राज्यपालों, उप-राज्यपालों की कार्य अवधि और उस अवधि के दौरान राज्य का प्रथम नागरिक, संवैधानिक प्रमुख होने के नाते प्रदेशों का कितना विकास हो पाया है, इसकी विवेचना तो देश के वातानुकूलित कक्षों में बैठे राजनीतिक समीक्षक और विशेज्ञों के साथ-साथ अवकाशप्राप्त प्रदेश प्रमुख ही करेंगे, लेकिन हमारे प्रदेश बिहार में एक औसतन राज्यपालों की कार्य अवधि एक साल आठ महीने ही है। इन आठ महीनों में वे प्रदेश का विकास करने में सफल होंगे अथवा सेवा काल के समाप्ति के साथ &#8216;पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स&#8217; के साथ जीवन का समय गुजरेंगे, आज ही नहीं, आने वाले दिनों में भी राजनीतिक विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों के लिए बहुत बड़ा शोध का विषय रहेगा। दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के अलावे इन विशेषज्ञों का ध्यान प्रदेश प्रमुख की ओर जाता ही नहीं है। </p>
<p>बिहार के वर्तमान राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के राज्यपाल भवन की सूची पट्टिका में 42 वें स्थान पर अंकित हैं। आज़ादी के बाद सर्वप्रथम जयरामदास दौलतराम (15 अगस्त 1947-11 जनवरी 1948) प्रदेश के राज्यपाल बनाये गए।  उनकी कार्य अवधि छः माह की थी। आज प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आधिकारिक आवास जिस सड़क पर स्थित है, वह सड़क (अणे मार्ग) बिहार के दूसरे राज्यपाल माधव श्रीहरि अणे के नाम से अंकित है। अणे 12 जनवरी 1948 &#8211; 14 जून 1952 तह राज्यपाल थे। इसने बाद आये आर. आर. दिवाकर (15 जून 1952 &#8211; 5 जुलाई 1957) और फिर  जाकिर हुसैन (6 जुलाई 1957 &#8211; 11 मई 1962) । जाकिर हुसैन के बाद एम. ए. एस. अय्यंगार (12 मई 1962 &#8211; 6 दिसम्बर 1967), नित्यानंद कानूनगो (7 दिसंबर 1967 &#8211; 20 जनवरी 1971), न्यायमूर्ति यू.एन. सिन्हा (कार्यवाहक) (21 जनवरी 1971 से 31 जनवरी 1971), देव कांत बरुआ (1 फरवरी 1971 से 4 फरवरी 1973) और रामचन्द्र धोंडीबा भंडारे (4 फरवरी 1973 से 15 जून 1976) प्रदेश के राज्यपाल बने। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg" alt="" width="1920" height="1080" class="aligncenter size-full wp-image-6580" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a></p>
<p><strong>शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि बिहार के एक लाट साहब अपने दो साल की कार्य अवधि में पटना के इतिहास को जानने और समझने में दिलचस्पी दिखाए और यत्र-तत्र-सर्वत्र धूमने की इच्छा भी जाहिर किये। प्रदेश के लाट साहब&#8217; की इच्छा थी &#8211; पूरी तो होगी ही।  लाट साहब बिहार के नहीं थे। महाराष्ट्र में जन्म लिए बाबा साहब आंबेडकर के सहकर्मी भी थे और अनुयायी भी। दो बार सांसद भी बने। जिस कालखंड में वे बिहार के राज्यपाल थे उस कालखंड में बिहार के जनसम्पर्क निदेशक थे मोहम्मद सफी साहब और सफी साहब के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी की राज्यपाल के साथ पटना के इतिहास को बताने के लिए किस महानुभाव को लिया जाय। दो व्यक्तियों का नाम बार-बार आ रहा था श्री बेदार साहब (खुदाबक्श पुस्तकालय के निदेशक) और शिक्षाविद श्री सुरेंद्र गोपाल। परन्तु के आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन समाचार संपादक श्री रामजी मिश्र मनोहर को चुने और दीघा से दीदारगंज तक गंगा में स्टीमर से भ्रमण किये। गंगा तट पर बसा प्रत्येक ऐतिहासिक स्थानों, भवनों को मनोहर साहब व्याख्या किये। अंत में भंडारे साहेब को कहना पड़ा कि &#8220;मनोहर जी आप पटना के इनसाइक्लोपीडिया हैं।&#8221; लेकिन इस भ्रमण सम्मलेन से बिहार को क्या मिला? प्रदेश के इतिहास को क्या मिला? ऐतिहासिक स्थलों को क्या मिला?</strong></p>
<p>भंडारे के बाद राज्यपाल भवन में आये जगन्नाथ कौशल (16 जून 1976 से 31 जनवरी 1979), न्यायमूर्ति के.बी.एन. सिंह (कार्यवाहक) (31 जनवरी 1979 से 19 सितंबर 1979), अखलाकुर रहमान किदवई (20 सितंबर 1979 से 15 मार्च 1985), पी. वेंकटसुब्बैया (15 मार्च 1985 से 25 फरवरी 1988), गोविंद नारायण सिंह (26 फरवरी 1988 से 24 जनवरी 1989) तक। गोविन्द नारायण सिंह के बारे में उस कालखंड में चर्चाएं आम थी कि वे प्रदेश में स्थित सभी विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होने के कारण कुलपतियों की कक्षा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। वे राज्यपाल भवन के बाहर मैदान में बैठ जाते थे, जहाँ कुलपतियों की बैठक होती थी। डांट-फटकार होती थी और फिर सभी अपने-अपने रास्ते। अख़बारों में छपता था, आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार में वाचन होता था। गोविन्द नारायण सिंह भी 11 महीने की अवधि पूरा कर घर चले गए। अब आये न्यायमूर्ति दीपक कुमार सेन (कार्यवाहक) (24 जनवरी 1989 से 28 जनवरी 1989), आर.डी. प्रधान (29 जनवरी 1989 से 2 फरवरी 1989), जगन्नाथ पहाड़िया (3 मार्च 1989 से 2 फरवरी 1990), न्यायमूर्ति जी.जी. सोहोनी (कार्यवाहक) (2 फरवरी 1990 से 16 फरवरी 1990), मोहम्मद सलीम (16 फरवरी 1990 से 13 फरवरी 1991), बी. सत्य नारायण रेड्डी (कार्यवाहक) (14 फरवरी 1991 से 18 मार्च 1991) तक। </p>
<figure id="attachment_6581" aria-describedby="caption-attachment-6581" style="width: 466px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg" alt="" width="466" height="559" class="size-full wp-image-6581" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg 466w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar-250x300.jpg 250w" sizes="auto, (max-width: 466px) 100vw, 466px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6581" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं कि 1990 के बाद जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, बिहार के विश्वविद्यालयों की स्थिति तेजी से बिगड़ गई। कुलपतियों की नियुक्ति में मेरिट की सबसे बड़ी क्षति हुई, और जातीय आधार पर नियुक्तियों की परंपरा शुरू हुई। विश्वविद्यालयों को विभिन्न जातियों के नाम पर &#8220;डिस्ट्रिब्यूट&#8221; कर कुलपति बनाए जाने लगे। राजभवन की जगह आर्य कुमार रोड की एक गली में राष्ट्रीय जनता दल के नेता रंजन प्रसाद यादव के घर कुलपतियों की बैठक होने लगी। यहीं पर उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक और इंटरमीडिएट काउंसिल के अध्यक्ष भी बैठने लगे। यहीं नीतिगत फैसले लिए जाने लगे, यहां तक कि शिक्षकों के प्रोमोशन और डिमोशन के फैसले भी वहीं होते थे। तत्कालीन राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी, जो चांसलर भी थे, ने एक बार कहा था, &#8220;अब तो रंजन यादव सुपर चांसलर हो गए हैं।&#8221; एक कुलपति, जो दिल्ली-पटना राजधानी एक्सप्रेस से नेता जी के साथ सफर कर रहे थे, उनके साथ नेता जी का परिवार भी था। बच्चे ने कोच में शौच कर दिया, और कुलपति ने अपने हाथों से सफाई की।</strong></p>
<p>लालू प्रसाद यादव के आगमन के साथ शिक्षा लज्जित होकर गंगा में गोंता लगाने लगी और पुरे प्रदेश में तथकथित नेताओं का जन्म होने लगा। इसी कालखंड में पहले राज्यपाल आये मोहम्मद शफी कुरैशी (19 मार्च 1991 से 13 अगस्त 1993), फिर आए अखलाकुर रहमान किदवई (14 अगस्त 1993 से 26 अप्रैल 1998), सुंदर सिंह भंडारी (27 अप्रैल 1998 से 15 मार्च 1999), न्यायमूर्ति बी.एम. लाल (अभिनय) (15 मार्च 1999 से 5 अक्टूबर 1999), सूरज भान (अतिरिक्त प्रभार) (6 अक्टूबर 1999 से 22 नवंबर 1999), वी. सी. पांडे (23 नवंबर 1999 से 12 जून 2003), एम आर जोइस (12 जून 2003 से 31 अक्टूबर 2004), वेद प्रकाश मारवाह (1 नवंबर 2004 से 4 नवंबर 2004), बूटा सिंह (5 नवंबर 2004 से 29 जनवरी 2006), गोपालकृष्ण गांधी (31 जनवरी 2006 से 21 जून 2006), आर. एस. गवई ( 22 जून 2006 से 9 जुलाई 2008), आर. एल. भाटिया (10 जुलाई 2008 से 28 जून 2009), देवानंद कोंवर (29 जून 2009 से 21 मार्च 2013), डी. वाई. पाटिल (22 मार्च 2013 से 26 नवंबर 2014), केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार) (27 नवंबर 2014 से 15 अगस्त 2015) आदि। </p>
<p><strong>भारत के चौदहवें राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द पटना के राज्यपाल की कुर्सी से ही आये थे। वे 16 अगस्त 2015 से 20 जून 2017) तक लाट साहब थे। कोविंद साहब का राज्यपाल भवन में समय समाप्त हुआ, वे राष्ट्रपति भवन आ गए। उनके राज्यपाल के रूप में कार्यकर्ते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोध गया भ्रमण किये थे। बिहार के लोगों को आस्वाशन दिए की गया को सांस्कृतिक शहर बनाएंगे। कोविंद साहब राष्ट्रपति बनकर अवकाश भी ले लिए, प्रधानमंत्री पहली बार से तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, गया और बोधा गया आज भी वैसा ही है। फिर राज्यपाल भवन में आये केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार) (20 जून 2017 से 29 सितंबर 2017), सत्यपाल मलिक (30 सितंबर 2017 से 23 अगस्त 2018), लालजी टंडन (23 अगस्त 2018 से 28 जुलाई 2019), फाल्गुन चौधरी (29 जुलाई 2019 &#8211; 13 फरवरी 2023), राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर 14 फरवरी 2023 से 1 जनवरी 2025 और आज विराजमान हैं आरिफ मोहम्मद खान (2 जनवरी 2025 से लगातार ) । </strong></p>
<blockquote><p>प्रदेश के विश्वविद्यालय अभी तक 42 कुलाधिपतियों को आते-जाते देखा है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था के साथ प्रदेश की अन्य व्यवस्था &#8216;अव्यवस्थित&#8217; ही रहा, और आगे भी रहेगा। क्योंकि अगर 78 वर्ष की आज़ादी में प्रदेश के राज्यपाल निवास में 42 लाट साहेब &#8216;आये और गए&#8217; तो पटना विश्वविद्यालय में अब तक 55 (आज़ादी के पहले 6 और 49 आज़ादी के बाद)  कुलपति का भी वही हश्र रहा। </p></blockquote>
<p>इन वर्षों में जे. जी. जेनिंग्स (01.10.1917 -15.10.1920), वी. एच. जैक्सन (16.10.1920 से 14.10.1923), सर एस. सुल्तान अहमद (15.10.1923 &#8211; 11.11.1930), स्टीवर्ट मैकफर्सन (12.11.1930 से 22.08.1933), न्यायमूर्ति के. एम. नूर (23.08.1933 से 22.08.1936), सचिदानंद सिन्हा (23.08.1936 से 31.12.1944), सी. पी. एन. सिंह (01.01.1945 से 20.06.1949), सारंगधर सिंह (21.06.1949 से 01.01.1952), डॉ के एन बहल (02.01.1952 से 31.01.1953), वी.के.एन. मेनन (30.03.1953 से 31.12.1953), डॉ बासुदेव नारायण (01.01.1954 से 19.03.1957), डॉ बलभद्र प्रसाद (20.03.1957 से 11.07.1960), श्री बी एन राय (12.07.1960 से 28.02.1962), डॉ जॉर्ज जैकब (14.03.1962 से 13.03.1965), डॉ. के.के.दत्ता (14.03.1965 से 13.11.1970), महेंद्र प्रताप (14.11.1970 से 20.04.1972), के. अब्राहम (21.04.1972 से 07.05.1972), सचिन दत्त (08.05.1972 से 10.08.1973), श्रीमती रमोला नंदी (11.08.1973 से 16.09.1973), श्री डी. एन. शर्मा (17.09.1973 से 07.01.1977), डॉ. ए.के. धन (11.01.1977 से 24.08.1978), जी.एस. ग्रेवाल (25.07.1978 से 01.08.1978), डॉ. टी. बी. मुखर्जी (02.08.1978 से 31.07.1979), डॉ. आर. सी. सिन्हा (05.08.1979 से 08.08.1979) पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने। </p>
<p>सत्तर के दशक के अंत में पटना कालेज के प्राचार्य, स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. केदार नाथ प्रसाद कुलपति बने। वे 09.18.1979 से 21.04.1980 तक कार्यालय में थे। लव कुमार मिश्र कहते हैं: &#8220;पहले जब शारंगधर सिंह, के.के. दत्त, सचिन दत्त और महेन्द्र प्रताप जैसे विद्वान कुलपति होते थे, वे शिक्षा मंत्री के यहां भी नहीं जाते थे। स्वयं मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह पटना विश्वविद्यालय के कुलपति से सलाह लेने उनके घर जाते थे। 1977 तक पटना विश्वविद्यालय के कुलपति का आधिकारिक आवास गांधी मैदान के दक्षिण कोने पर था, जहां अब मौर्य होटल है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. केदारनाथ प्रसाद, जो इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे, ने मुख्य सचिव को लिखित आपत्ति दी थी कि उनकी अनुमति के बिना पटना कॉलेज में डीएम ने पुलिस भेज दी। उन्होंने कहा था कि वे प्रमंडल के आयुक्त से भी वरिष्ठ हैं। जब पटना के डीएम ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में परीक्षा पर रोक लगाई, तो कुलपति अतर देव सिंह ने विरोध करते हुए परीक्षा का आयोजन कराया। वे भी इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे।&#8221;</p>
<p>अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में सबसे पहले कुलपति बने डॉ. आर. शुक्ला (22.04.1980 से 13.07.1981), डॉ. एस. पी. सिन्हा (14.07.1981 से 03.02.1983), डॉ. जी. पी. सिन्हा (04.02.1983 से 31.10.1985), डॉ. के. एन. प्रसाद (31.10.1985 से 17.04.1987), डॉ एस एन दास (18.04.1987 से 01.09.1988), डॉ ए एल साहा (02.09.1988 से 14.12.1988), डॉ. आर.के.अवस्थी (15.12.1988 से 25.06.1990), डॉ. एम. मोहिउद्दीन (26.06.1990 से 25.06.1993), राहुल सरीन (26.06.1993 से 05.05.1994), अनिल कुमार (06.05.1994 से 20.01.1995), डॉ. एस. एन. पी. सिन्हा (21.01.1995 से 20.01.1998), डॉ एस नज़र अहसन (21.01.1998 से 02.04.2001), डॉ एल एन राम (03.04.2001 से 23.06.2001), डॉ. के.के. झा (01.08.2001 से 31.07.2004), डॉ. विभाष के. यादव (01.08.2004 से 16.08.2004), डॉ.जगन्नाथ ठाकुर (16.08.2004 से 23.08.2005), डॉ सैयद एहतेशामुद्दीन (24.08.2005 से 20.11.2006), प्रो. वाई. सी. सिम्हाद्री (20.11.2006 से 21.01.2008), डॉ श्याम लाल (25.01.2008 से 24.01.2011), डॉ सुदीप्तो अधिकारी (25.01.2011 से 01.08.2011), प्रो. शंभु नाथ सिंह (02.08.2011 से 22.03.2013), प्रो. यू.के. सिन्हा (22.03.2013 से 26.04.2013), प्रोफेसर अरुण कुमार सिन्हा (26.04.2013 से 31.01.2014), प्रो. येदला सी. सिम्हाद्री (31.01.2014 से 31.01.2017), प्रो.सुधीर कुमार श्रीवास्तव (31.01.2017 से 01.05.2017), प्रो. रासबिहारी सिंह (02.05.2017 से 01.05.2020), प्रो. (डॉ.) एच.एन. प्रसाद (02.05.2020 से 23.09.2020), प्रो. (डॉ.) गिरीश कुमार चौधरी (23.09.2020 से 25.10.2023), प्रो. के.सी. सिंह (26.10.2023 से 03.05.2024), प्रो. अजय कुमार सिंह (03.07.2024 से ) और आज आरिफ मोहम्मद खान हैं। कल ये भी संख्या में जुड़ जायेंगे।  </p>
<p><strong>मिश्र कहते हैं &#8220;यदि आज विश्वविद्यालयों की स्थिति खराब है, तो उसके लिए राज्यपाल भी जिम्मेदार हैं। पिछले 15 वर्षों में बिहार में कुछ ऐसे राज्यपाल भी आए, जिन पर खुले तौर पर यह आरोप लगे कि उनके करीबियों ने दो-दो करोड़ रुपये में कुलपति पद बेचे। एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजभवन द्वारा नियुक्त छह कुलपतियों की नियुक्ति को रोक दिया था। वर्तमान में सत्ता पक्ष के अनुषांगिक संगठनों द्वारा भेजे गए नामों पर नियुक्तियाँ हो रही हैं। एक कुलपति ने दावा किया कि उनका नाम “हाई कमान” से भेजा गया था। जब हम विद्यार्थी थे, तब कुलपति भी लेक्चर लेने आते थे। मुझे स्मरण है कि सचिन दत्त, जो केंद्र में वित्त सचिव थे, सेवानिवृत्त होकर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने और पटना कॉलेज के बी.ए. लेक्चर थिएटर में इकोनॉमिक्स पढ़ाने आते थे। महेन्द्र प्रताप, जो कैम्ब्रिज से पीएचडी थे, अंग्रेजी का क्लास लेते थे। जॉर्ज जैकब और ए.के. धान, जो यूपीएससी के अध्यक्ष रहे थे, कुलपति रहते हुए भी कक्षाएं लेते थे। अब यदि राज्यपाल को पीड़ा हो रही है, रोना आता है, तो उन्होंने ऐलान कर दिया है – अब राजभवन में नहीं, कॉलेज में ही बैठकें होंगी।&#8221;</strong></p>
<p>विगत शनिवार को बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने पटना में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आरोप लगाये कि बिहार के विश्वविद्यालय अराजक तत्वों के हाथों सौंप दिए गए हैं। राज्यपाल ने पहले बीएन कॉलेज में हुई बम की घटना में एक छात्र की मौत पर रोआंसी आवाज में कहा कि मेरा दिल रोता है, जब सुनता हूं, जो कुछ भी यूनिवर्सिटी में हो रहा है। यह हैरत की बात है कि यूनिवर्सिटी में बम मार के तीन दिन पहले बच्चे की जान ले ली गई। राज भवन में मीटिंग हुई। कुलपति से पूछा कि उस मीटिंग में जो फैसले लिए गए थे, उस पर क्या कार्रवाई हुई उसकी रिपोर्ट भी अभी तक नहीं आई है? तो कुलपति ने कहा कि रिपोर्ट आ गई है। फिर कहते हैं यूनिवर्सिटी सरस्वती का मंदिर है और इसे अराजक तत्वों  के हवाले हमने कर दिया है। फिर हाथ जोड़कर कहने लगे कि हमारा देश ज्ञान की संस्कृति है, अगर ज्ञान के मंदिर में बम चलेंगे या ऐसी घटना होती है, जिससे शर्मिंदा होना पड़े, यह तो मैं कह भी नहीं सकता हूँ। कुलाधिपति महोदय विश्वविद्यालय परिसर में भ्रमण-सम्मलेन करने निकल गए। हॉस्टल में अवैध कब्जा को लेकर नाराज हो गए। लेकिन नीतीश कुमार अपनी आँखें बंद नहीं रखे हैं।<br />
 <br />
45 साल पहले जब जगन्नाथ कौशल चंडीगढ़ से बिहार के राज्यपाल बनकर आए थे, तब उनके बच्चों ने भी पटना विश्वविद्यालय में नामांकन कराया था। उसी विवादास्पद बिहार नेशनल कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान कॉमन रूम का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था, &#8220;यदि मेरा वश चले तो मैं राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को बंद कर दूं, ताला लगा दूं।&#8221; आज की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg" alt="" width="1994" height="1213" class="aligncenter size-full wp-image-6582" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg 1994w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-300x182.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-1024x623.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-768x467.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-1536x934.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1994px) 100vw, 1994px" /></a></p>
<blockquote><p>पटना विश्वविद्यालय के एक अवकाश प्राप्त प्राध्यापक का कहना है कि “जब प्रदेश में शिक्षा को अपाहिज कर गंगा में डुबकी लगाने के लिए छोड़ दिया गया, आप सीनेट और सिंडिकेट की बात करते हैं। आज ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और भावार्थ बताने वालों की भी किल्लत है शैक्षणिक संस्थानों में। हम किस संस्कार और गरिमा की बात करते हैं? पटना विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल अपने ही प्रदेश के एक नागरिक का देन है जिन्होंने आज से सौ वर्ष पहले शिक्षा के महत्व को समझा। शिक्षाओं की बैठकी का महत्व समझा। दीक्षांत समारोह का महत्व समझा। आज अगर विश्वविद्यालय अथवा प्रदेश की सरकार उस स्थान पर मॉल या वातानुकूलित बाजार खोलने की बात कर दे तो यकीन कीजिये प्रदेश के लाखों लोग पैसे फूंकने को तैयार हो जाएंगे । आज शिक्षा का कोई मोल नहीं है। शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। प्रदेश में जो भी पढ़ने पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं हैं वे अपने जीवन निर्माण के लिए, पढ़ने के लिए प्रदेश से पहले ही बाहर निकल जाते हैं।”</p></blockquote>
<p>बहरहाल, <strong>बी.एन. कॉलेज की स्थापना 1889 में कुल्हरिया राज, भोजपुर, बिहार के दो उत्साही शिक्षाविदों और राष्ट्रवादियों बाबू बिशेश्वर सिंह और शालिग्राम सिंह </strong>ने की थी। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के बाद औपनिवेशिक शासन के दौरान, इन दोनों भाइयों ने छात्रों के बीच राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने की सख्त जरूरत महसूस की और इस कॉलेज का नाम बिहार नेशनल कॉलेज रखा, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन पर राष्ट्रीय शब्द को हटाने के लिए बहुत दबाव डाला और राजा की उपाधि और एक बहुत बड़ी जागीर देने का वादा किया। लेकिन चूंकि ये भाई इस मायने में दूसरे ज़मींदारों से अलग थे कि जहाँ दूसरे लोग शिक्षा के प्रसार को अपने अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा मानते थे, वहीं ये सिंह भाई शिक्षा के उत्कृष्ट और महान उद्देश्यों के लिए प्रतिबद्ध थे, इसलिए उन्होंने दबावों के आगे घुटने नहीं टेके। उस समय बिशेश्वर सिंह कलकत्ता कॉलेज ऑफ़ लॉ में अंतिम वर्ष (लॉ) के छात्र थे। कलकत्ता के गवर्नर जनरल ने उन्हें कॉलेज से निकाल दिया। इतना ही नहीं जब बिशेश्वर सिंह ने पीएल प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद पटना सिविल कोर्ट में वकालत शुरू की तो उन्हें बार एसोसिएशन में बैठने की भी इजाजत नहीं दी गई। उन्हें अनेक कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ा। सरकार ने उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया और अंततः शालिग्राम सिंह के पुत्र शशिशेखर सिंह, जो न्यायमूर्ति केबीएन सिंह के पिता थे, की 1942 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसलिए यह राष्ट्रीय शब्द बहुत ही सार्थक है जिसका लंबा और गौरवशाली इतिहास आज भी छात्रों में राष्ट्रवादी भावनाओं और जज्बे को भर देता है। सात शहीदों में शामिल जगपति कुमार इसी कॉलेज के छात्र थे।</p>
<p><strong>शुरू में कॉलेज में अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, हिंदी, दर्शनशास्त्र आदि की ऑनर्स स्तर तक शिक्षा दी जाती थी। बिहार में पहली बार इसी कॉलेज में लॉ की पढ़ाई शुरू हुई थी। प्रो. आत्माराम, जो बाद में पटना कॉलेज के प्राचार्य बने, लॉ संकाय के प्रथम प्रभारी थे। तीन संकायों में स्तरीय शिक्षा दी जाती है, मानविकी संकाय, विज्ञान संकाय और सामाजिक विज्ञान संकाय। स्नातकोत्तर स्तर पर अंग्रेजी में पढ़ाई होती है। चार व्यावसायिक पाठ्यक्रम: फंक्शनल इंग्लिश, बायोटेक्नोलॉजी, बीसीए और बीबीए सफलतापूर्वक और कुशलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं। कई छात्रों ने वैश्विक स्तर पर अपनी योग्यता साबित की है। 1892 में, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इसे प्रथम स्तर के कॉलेज का दर्जा दिया। 1923 में, पटना के तत्कालीन आयुक्त एकडेल एर्लियो के प्रयासों से इस कॉलेज को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया और इसे पूर्ण घाटा अनुदान कॉलेज का दर्जा दिया गया। 1952 में, इस कॉलेज को पटना विश्वविद्यालय की एक घटक इकाई में बदल दिया गया।</strong></p>
<p>श्री अक्षय कुमार मजूमदार, डॉ. डी.एन. सेन, मोइनुल हेग, डॉ. डी.पी. विद्यार्थी, डॉ. एस.के. बोस, डॉ. अमरनाथ सिन्हा, डॉ. एम.पी. सिन्हा, डॉ. पी.के. पोद्दार और अन्य जैसे गतिशील और ऊर्जावान प्राचार्यों के तहत कॉलेज ने शानदार विकास किया है। कॉलेज देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए रोल मॉडल है।  इस कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है और विभिन्न क्षेत्रों में पथप्रदर्शक और अग्रणी रहे हैं। इस कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. मोइनुल हक ने भारतीय ओलंपिक टीम का नेतृत्व किया था। उनकी याद में पटना के राजेंद्र नगर में मोइनुल हक स्टेडियम की स्थापना की गई है। भारत के पहले अटॉर्नी जनरल लाल नारायण शर्मा, 11 साल तक केंद्रीय मंत्री रहे और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक और पद्म भूषण पुरस्कार विजेता डॉ. बिंदेश्वर पाठक इसी महाविड़फयालय के छात्र रहे। भारत के माननीय न्यायमूर्ति मिहिर कुमार झा, पटना उच्च न्यायालय आदि इस कॉलेज के पूर्व छात्र रहे हैं। पद्म पुरस्कार विजेता जैसे डॉ. मोइनुल हक (1971 में पद्म श्री), डॉ. कलीम अजीज (1989 में पद्म श्री), डॉ. शैलेंद्र नाथ श्रीवास्तव (2003 में पद्म श्री), डॉ. शरफे आलम (2004 में पद्म श्री) भी इसी महाविद्यालय के छात्र थे। </p>
<p><strong>लेकिन इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि 1990 में जब प्रदेश का बागडोर लालू प्रसाद यादव के हाथों आया, जो ऐतिहासिक चारा घोटाला में मुख्य आरोपी, सजा पाने वाले रहे, इसी महाविद्यालय के छात्र थे। लव कुअमार मिश्र कहते हैं कि &#8216;हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। </strong></p>
<p>उनके अनुसार, एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है। <br />
बहरहाल, आज प्रदेश ही नहीं, देश-विदेश में रहने वाले विद्वान-विदुषियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण शोध का विषय है कि विगत 78 वर्षों में बिहार के राज्यपाल / कुलाधिपति की कार्यालय/कुर्सी पर कोई विदुषी क्यों नहीं विराजमान हुई? इतना ही नहीं इतिहास साक्षी है कि पटना विश्वविद्यालय के इतिहास में आज तक सिर्फ 37 दिनों के लिए श्रीमती रमोला नंदी (11.08.1973 से 16.09.1973) को छोड़कर कोई भी विदुषी कुलपति भी नहीं बनी और लगातार पुरुषों ने सिंहासन पर कब्ज़ा बनाये रखा। </p>
<figure id="attachment_6583" aria-describedby="caption-attachment-6583" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6583" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6583" class="wp-caption-text">डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>आइये राज्यपाल के साथ सहरसा चलते हैं </strong></p>
<p>सहरसा जिले की स्थापना &#8216;अप्रैल फूल&#8217; के दिन 1 अप्रैल, 1954 को हुआ था। विगत 71 वर्षों में सहरसा में कितना विकास हुआ सरकारी स्तर पर, यह सहरसा के मतदाता तो जानते ही हैं, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद और सरकार के नुमाइंदे भी अवगत है, चाहे समस्या शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, सड़क की हो, रोजगार की हो। आज पुरे देश में श्रमिकों का पलायन जितना सहरसा-मधेपुरा क्षेत्र से हो रहा है, दुखद है। ऐसे मुनाफा कमाने के उद्देश्य से ही सही, इन क्षेत्रों में निजी क्षेत्रों का प्रादुर्भाव एक सकारात्मक संकेत दे रहा है। इसी कड़ी के तहत डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन की अगुवाई में विगत 15 मई को सहरसा जिला के  राष्ट्रीय राजमार्ग 107 पर स्थित ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज परिसर में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो का विधिवत प्रसारण हेतु उद्घाटन किया। इस कॉलेज इसका उद्देश्य बी.एड. और डी.एल.एड. की शिक्षा देना तो है ही, ठोस नैतिक आधार पर शिक्षण के पेशे को विकसित करना है। वैसे आंकड़ों के अनुसार, भारत के 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन संचालित हैं। इन स्टेशनों को 36 निजी प्रसारकों द्वारा चलाया जाता है। 234 नए शहरों में 730 नए निजी एफएम रेडियो चैनलों की हाल ही में स्वीकृति के साथ भारत में निजी एफएम रेडियो स्टेशनों की संख्या में वृद्धि होने की उम्मीद है। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar">&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार: चुनाव का समय आ रहा है इसलिए &#8216;चमचागिरी&#8217; में &#8216;आलतू-फालतू तेल &#8216;न&#8217; लगाएं&#8217; और &#8216;अच्छे स्वास्थ्य&#8217; के लिए &#8216;कोल्हू प्रेस्ड तेल&#8217; ही खाएं (भाग-2)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 May 2025 07:11:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[mustard.]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[oil]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना: पटना में आज जो पचास वर्ष के होंगे और उनकी याददाश्त आँख की ज्योति की तरह कमजोर नहीं हुई होगी तो शायद उन्हें अस्सी के दशक के उत्तरार्ध का कालखंड याद होगा मजहरुल हक़ पथ स्थित तत्कालीन केंद्रीय कारा से पूर्व दाहिने हाथ का अंतिम पाँच मंजिला भवन का घेराव। पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन को डाक बंगला [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/for-good-health-consume-only-kolhu-pressed-oil">बिहार: चुनाव का समय आ रहा है इसलिए &#8216;चमचागिरी&#8217; में &#8216;आलतू-फालतू तेल &#8216;न&#8217; लगाएं&#8217; और &#8216;अच्छे स्वास्थ्य&#8217; के लिए &#8216;कोल्हू प्रेस्ड तेल&#8217; ही खाएं (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना: पटना में आज जो पचास वर्ष के होंगे और उनकी याददाश्त आँख की ज्योति की तरह कमजोर नहीं हुई होगी तो शायद उन्हें अस्सी के दशक के उत्तरार्ध का कालखंड याद होगा मजहरुल हक़ पथ स्थित तत्कालीन केंद्रीय कारा से पूर्व दाहिने हाथ का अंतिम पाँच मंजिला भवन का घेराव। पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन को डाक बंगला चौराहा, आकाशवाणी के रास्ते गाँधी मैदान से जोड़ने वाली सड़क अपने अंदर आज भी इतिहास के कई अध्याय संजोये बैठी है। हज़ारों की भीड़ लगी थी उस दिन। सड़क पर &#8216;डालडा&#8217; बनस्पति के विरुद्ध &#8216;मुर्दावाद &#8211; मुर्दावाद&#8217; के नारे बुलंद हो रहे थे। उस दिन दोपहर उस भवन के बगल से अंदर माड़वाड़ी वासा जाने वाली संकीर्ण सड़क पर लोगों का जमाव भयंकर था। बैंक ऑफ़ इंडिया के बाहर जरूरत से अधिक पटना पुलिस के कर्मियों को सुरक्षा के मद्दे नजर तैनात कर दिया गया था। मजहरुल हक़ पथ को आज भी लोग फ़्रेज़र रोड के नाम से जानते हैं। </strong></p>
<p>वैसे इस सड़क का नामकरण ब्रितानिया हुकूमत के कालखंड में तत्कालीन ब्रिटानिया अभियंता जेम्स फ़्रेज़र के नाम पर हुआ, जिन्होंने शहर का विकास किया था। आज़ादी के बाद इसका आधिकारिक नाम महान धर्मशास्त्री, शिक्षाविद्, राजनीतिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी, वकील मजहरुल हक़ के नाम अंकित हुआ। वैसे आज भी यह सड़क को पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन को गाँधी मैदान से जोड़ती है, लोगबाग फ़्रेज़र रोड के नाम से ही जानते हैं। वजह भी है &#8211; आज़ादी के बाद क्रांतिकारियों, शहीदों, कार्यकर्ताओं को स्वतंत्र भारत के लोग जानते कहाँ हैं? क्योंकि 140 करोड़ की आवादी में शायद 12 फीसदी लोग ही हैं जो 78+ वर्ष के हैं और देश को आज़ाद होते देखे हैं। और जो देखे देश को आज़ाद होते वे उस दृश्य को कभी अपने होठों तक आने नहीं दिए, घर, परिवार, समाज के लोगों को नहीं बताये। यह भी दुख की बात है।  </p>
<blockquote><p>राज्य की राजधानी में कई अन्य प्रमुख सड़कें हैं, जिनका नाम स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों ने रखा था और बाद में स्वतंत्र भारत में उनका नाम बदलकर, ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखा गया। लेकिन, लोग अज्ञानता के कारण, अधिकांश समय उन्हें उनके पुराने नामों से ही पुकारते हैं। क्योंकि आज़ादी के 78 साल बाद आज प्रदेश की सरकार साक्षरता दर के ग्राफ को भले 61.8 फीसदी, जिसमें पुरुषों की साक्षरता 71.2 % और महिलाओं की साक्षरता 51.5 फीसदी (राष्ट्रीय साक्षरता दर 74.04% से भी नीचे) दिखाए, पटना का मजहरुल हक़ पथ के साथ-साथ गाँधी मैदान गवाह है कि आज भी शिक्षा का प्रसार कागजों पर अधिक हुआ।</p></blockquote>
<p>दृष्टान्त देखिये &#8211; <strong>गार्डिनर रोड</strong>। यह सड़क आयकर भवन गोलंबर को आर-ब्लॉक गोलंबर को जोड़ती है। गार्डिनर एक ब्रिटिश अधिकारी थे। आज़ादी के बाद इसका नाम <strong>बीर चंद पटेल पथ</strong> के नाम पर अंकित कर दिया। पटेल साहब बहुआयामी व्यक्तित्व के थे। लेकिन प्रदेश की राजनीति उन दिनों भी व्यक्तिगत होती थी, आज तो जाति, धर्म, व्यवसाय और बहुत तरह की बातें जुड़ गयी है उसमें। मुख्यमंत्री बनने की सभी काबिलियत रखते थे बीर चंद पटेल जी । लेकिन मुख्यमंत्री बनने नहीं दिया राजनीति के कारण। चाहिए तो यह कि उनके नाम से सामाजिक शोध संस्थान संग्रहालय बनता।  उनकी जीवनी को प्रदेश की शिक्षा पद्धति में,  पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जाता ताकि आज की ही नहीं, आने वाली पीढ़ियां भी वीर चंद पटेल को जान पाती। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6565" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>डाकबंगला चौराहे</strong> से सचिवालय के रास्ते चिड़िया घर की ओर जाने वाली सड़क जहाँ आज न तो ऐतिहासिक डाक बंगला रहा, पहले <strong>बेली रोड</strong> के नाम से जाना जाता था। इस सड़क का नामकरण <strong>सर स्टोर्ट कॉल्विन बैले </strong>पर पड़ा था। ब्रिटानिया हुकूमत के कालखंड में वे बिहार और ओड़िसा के पहले <strong>लियूटेनैंट गवर्नर</strong> थे। वर्षों पहले बेली रोड को नया नाम मिला <strong>पंडित जवाहरलाल नेहरू</strong> के नाम पर &#8211; <strong>नेहरू पथ</strong>। लेकिन आज भी आम बोलचाल में लोग इस सड़क को बेली रोड ही कहते हैं। </p>
<p>इसी तरह, गाँधी मैदान को पटना जंक्शन को एक अलग रास्ते से जोड़ने वाली सड़क <strong>एग्जिविशन रोड</strong> का नामकरण सप्ताह में लगने वाले बाजार के नाम पर पड़ा था। कालखंड आज़ादी के पूर्व का था। समयांतराल इसका नाम <strong>ब्रज किशोर पथ</strong> हो गया। ब्रज किशोर सिन्हा संविधान सभा के सदस्य थे, साथ ही, राज्य सभा में बिहार का प्रतिनिधित्व किये थे। इसी तरह, बैंक रोड बी.पी. कोइराला मार्ग बन गया और टेलर रोड पीर अली खान मार्ग हो गया और ऐसे दो दर्जन से अधिक सड़क, गली हैं तो राजनेताओं के नाम से गोदना गोदए हुए हैं ।  खैर। </p>
<p>चलिए वापस <strong>मजहरुक हक़ पथ</strong> आते हैं जहाँ हज़ारों की संख्या में लोग एकत्रित थे उस दिन । मसला था <strong>डालडा बनस्पति में चर्वी की मिलावट</strong>। उन दिनों पटना ही नहीं, बिहार के लोग, यहाँ तक की ग़रीब-गुरबा भी, घी के स्थान पर रोटी के ऊपर, छौंका लगाने में, पूरी जलेबी छानने में डालडा का प्रयोग करते थे। धार्मिक पर्व छठ में भी बिहार का ऐतिहासिक ठेकुआ बनाने में डालडा वनस्पति का इस्तेमाल होता था। पीला रंग का डब्बा, उसके ऊपर खजूर का पेड़ और हिंदी अंग्रेजी में डालडा लिखा प्रदेश के बाजारों पर कब्जा किए बैठा था। पीरबहोर थाना से सटी महेंद्रू घाट की ओर जाने वाली सड़क पर लगने वाला <strong>सोमवारी</strong> मेला में खानपान बनाने वाले गौरव के साथ कहते थे <strong>&#8216;डालडा&#8217;</strong> में बना है। लेकिन उस दिन जब कलकत्ता की ख़बर से स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई कि डालडा में चर्बी का प्रयोग किया जाता है &#8211; लोगों की धार्मिक भावनाएं मजहरुल हक़ पथ पर उतर गई थी। रात में खाये भोजन सड़क पर निकल रही थी उल्टी के रूप में। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6566" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>उस दिन के दृश्य को देखकर बैरकपुर सैनिक छावनी और मंगल पाण्डे याद आ गए थे। कलकत्ता से करीब 16 मील दूर बैरकपुर की सैनिक छावनी में अचानक विद्रोह की चिंगारी ज्वाला बन गई। आज हम सभी स्वाधीनता संग्राम के लिए &#8216;प्रथम युद्ध&#8217; की शुरुआत भी कहते हैं। जाने-माने इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी की एक किताब है, ‘डेटलाइन 1857 रिवोल्ट अगेंस्ट द राज’ में उन्होंने लिखा कि 29 मार्च की दोपहर में रेजिमेंट का कोट और धोती पहने मंगल पांडे नंगे पैर एक भरी हुई बंदूक लेकर छावनी में पहुंचे और सैनिकों से चिल्लाकर कहा कि फिरंगी यहां पर है। ये कारतूस काटने से हमारा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा। धर्म के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। अंग्रेजों की सेना में इनफील्ड पी- 53 रायफल में इस्तेमाल किए जाने वाले कारतूस, जिसे अपने दांत से खींचना पड़ता था और जो चर्बी से बना था। उस कालखंड में डालडा वनस्पति पर भी आरोप लगाया गया कि डालडा में पशु वसा है और यह खाने के लिए अनुपयुक्त है।</strong></p>
<p>बहरहाल, <strong>इंग्लैंड के लीवर ब्रदर्स ने नाम में &#8216;L&#8217; अक्षर डालने पर जोर नहीं दिया होता, तो शायद भारत के उस कालखंड का सबसे पसंदीदा वनस्पति घी को &#8216;दादा&#8217; कहा जाता।</strong> &#8216;दादा&#8217; दरअसल &#8216;डच&#8217; कंपनी का नाम था जिसने 1930 के दशक में गाय के दूध से बने देसी घी या मक्खन के सस्ते विकल्प के रूप में वनस्पति घी का आयात भारत में किया था। &#8216;घी&#8217; एक महंगा उत्पाद था और भारतीय घरों में इसका इस्तेमाल बहुत कम किया जाता था &#8211; सप्ताहांत पर या कोई स्वादिष्ट व्यंजन या मिठाई बनाते समय। </p>
<p>दूसरी ओर, वनस्पति घी एक प्रकार का वनस्पति छोटा करने वाला पदार्थ था जो हाइड्रोजनीकृत या अत्यधिक संतृप्त वनस्पति तेल से बना होता था और देसी घी की नकल करने के लिए बनाया जाता था। लीवर ब्रदर्स, जो अब यूनिलीवर (भारत में हिंदुस्तान यूनिलीवर) है, जानता था कि देसी घी के विकल्प के लिए एक बाजार है, क्योंकि कई भारतीय मुश्किल से घी खरीद पाते थे। घरेलू और व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों के निर्माता ने 20वीं सदी की शुरुआत में ही यूरोप में खाद्य उत्पादन में प्रवेश कर लिया था और भारत में वनस्पति घी का उत्पादन करना चाह रहे थे। इस उद्देश्य के लिए इसने 1931 में हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी नामक एक कंपनी भी शामिल की थी।</p>
<p>घरेलू वनस्पति घी बाजार में पैठ बनाने के अवसर को भांपते हुए, लीवर ने भारत में &#8216;दादा&#8217; बनाने के अधिकार खरीद लिए। बिक्री की एक पूर्व शर्त थी: &#8216;दादा&#8217; नाम बरकरार रखना होगा। बेशक, लीवर ने इसके विपरीत सोचा। उत्पाद पर कहीं न कहीं इसके स्वामित्व की मुहर तो होनी ही थी। इसलिए चतुर उपभोक्ता वस्तु विपणक एक समाधान लेकर आया: लीवर के लिए एल अक्षर को ठीक बीच में रखा गया। इस प्रकार, डालडा का जन्म हुआ, जिसे 1937 में पेश किया गया। लेकिन, लीवर का काम अभी खत्म नहीं हुआ था। भारतीय जनता इस बात से कतई सहमत नहीं थी कि घी का कोई विकल्प हो सकता है। घी आमतौर पर खाना पकाने के माध्यम के रूप में या यहां तक कि भोजन पर छिड़कने पर अपना स्वाद और सुगंध देता है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6567" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कहते हैं कि शुरुआती वर्षों में &#8216;डालडा&#8217; के लिए चुनौती यह थी कि लोगों को यह बताया जाए कि इसका स्वाद देसी घी जैसा ही है, इसमें तलने के गुण भी देसी घी की तरह हैं, लेकिन घी के विपरीत, यह जेब या तालू पर भारी नहीं लगेगा।&#8221; यहीं से लीवर की विज्ञापन एजेंसी लिंटास की शुरुआत हुई। लिंटास में डालडा का खाता संभालने वाले हार्वे डंकन ने 1939 में भारत का पहला मल्टी-मीडिया विज्ञापन अभियान बनाया। इसमें थिएटरों में दिखाने के लिए एक छोटी फिल्म, सड़कों पर घूमने के लिए एक गोल टिन के आकार की वैन, पढ़े-लिखे लोगों के लिए प्रिंट विज्ञापन, सैंपलिंग को बढ़ावा देने के लिए स्टॉल और विज्ञापन अभियान के तहत वितरण के लिए विस्तृत पर्चे थे। </p>
<p>&#8216;डालडा&#8217; न केवल अपने व्यापक प्रचार के लिए बल्कि पीले रंग पर हरे ताड़ के पेड़ के विशिष्ट लोगो वाले टिन के कारण भी अलग पहचान बनाने लगा। लीवर ने इन विशिष्ट डिब्बों को अपने वितरण नेटवर्क के माध्यम से पूरे देश में पहुँचाया। अलग-अलग उपभोक्ताओं को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग आकार के पैक बनाए गए: होटल और रेस्तराँ जैसे संस्थागत उपयोगकर्ताओं के लिए एक बड़ा चौकोर डिब्बा और घर में इस्तेमाल के लिए छोटे गोल डिब्बे। लीवर ने डालडा को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, इसे घी के एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश किया। </p>
<p>विज्ञापन इतिहासकारों का कहना है कि अपने अस्तित्व के पहले 25-30 वर्षों तक, &#8216;डालडा&#8217; को स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय खाद्य तेल निर्माताओं से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं मिली। 1980 के दशक तक &#8216;डालडा&#8217; का बाजार पर एकाधिकार था। डालडा ने शुरुआती विवादों को झेला, जैसे कि 1950 के दशक में, जिसमें डालडा पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी, क्योंकि यह एक &#8220;झूठ&#8221; था &#8211; एक ऐसा उत्पाद जो देसी घी की नकल करता था, लेकिन असली नहीं था। दूसरे शब्दों में, आलोचकों ने तर्क दिया कि डालडा देसी घी का एक मिलावटी रूप है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। </p>
<p><strong>तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश भर में जनमत सर्वेक्षण कराने का आह्वान किया, जो अनिर्णायक साबित हुआ। घी में मिलावट रोकने के उपाय सुझाने के लिए सरकार ने एक समिति गठित की। लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। बेशक, सालों बाद डालडा को एक और विवाद का सामना करना पड़ा, जिसमें कहा गया कि इसमें पशु वसा है। तब तक, डालडा को &#8220;साफ़ तेल&#8221; या परिष्कृत वनस्पति तेलों जैसे कि मूंगफली (पोस्टमैन), सरसों, कुसुम (सफोला), सूरजमुखी (सनड्रॉप) और ताड़ के तेल (पामोलीन) से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही थी।</strong></p>
<p>इन्हें वनस्पति घी के मुकाबले ज़्यादा स्वास्थ्यवर्धक विकल्प माना जाता था। &#8216;डालडा&#8217; भारतीय रसोई पर अपनी पकड़ खो रहा था और 2003 तक एचयूएल ने इसे अमेरिकी कृषि और खाद्य दिग्गज बंगे को कथित तौर पर 100 करोड़ रुपये से कम में बेच दिया था। उस कालखंड में &#8216;डालडा&#8217; का अधिग्रहण खाद्य तेल बाजार में एक बड़ी छलांग थी। वनस्पति घी की विरासत के कारण कुछ हद तक यह गलत शुरुआत थी। 2007 में डालडा के नाम से खाद्य तेल की रेंज लॉन्च की गई। इसे &#8216;हसबैंड चॉइस&#8217; टैगलाइन के तहत लॉन्च किया था।  2013 में, &#8216;डब्बा खाली, पेट भरा&#8217; टैगलाइन के तहत रेंज को फिर से लॉन्च किया और ब्रांड की इस नई स्थिति को बढ़ावा देने के लिए लाइन के ऊपर के अभियानों के अलावा लाइन के नीचे की गतिविधियों को भी व्यापक रूप से चलाया।&#8221; </p>
<p><strong>लेकिन कल जब पटना में पिछले 22 वर्षों से &#8216;स्टूडेंट्स ऑक्सीजन मूवमेंट&#8217; और &#8216;ऑक्सीजन गौशाला&#8217; चलाने वाले विनोद सिंह से बात किये तो डालडा या भारतीय विपणन बाजार में उपलब्ध किसी भी वनस्पति अथवा अन्य तरल पदार्थों के बारे में चर्चा नहीं कर, छींटा अस्सी नहीं कर उनका सिर्फ यही कहना था कि &#8216;हमें देशी&#8217; होना होगा, सोच में भी, उत्पादन में भी और सुरक्षा में भी। पिछले 22 वर्षों से विनोद सिंह-मनोज सिंह और उनका परिवार पटना में स्टूडेंट्स ऑक्सीजन मूवमेंट और ऑक्सीजन गौशाला चला रहे हैं। अपने प्रयास को उन्होंने कभी पेटेंट नहीं कराया। इसका वजह यह है कि सिंह ब्रदर्स कहते हैं कि चूँकि उनका प्रयास सामाजिक सरोकार से जुड़ा है, पेटेंट का अर्थ है उनपर एकाधिकार। लेकिन उनका मानना है कि यह प्रयास बिहार ही नहीं, भारत के घर-घर तक पहुंचे एक जागरूकता के तहत। उनकी पूरी कोशिश है कि लोग अधिकाधिक स्वस्थ रहें, निरोग रहे। अगर भारत के लोग स्वस्थ रहेंगे तो देश का विकास स्वतः हो जायेगा।</strong> </p>
<figure id="attachment_6568" aria-describedby="caption-attachment-6568" style="width: 480px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh.jpg" alt="" width="480" height="479" class="size-full wp-image-6568" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh.jpg 480w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Vinod-singh-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 480px) 100vw, 480px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6568" class="wp-caption-text">विनोद सिंह</figcaption></figure>
<p><strong>विनोद सिंह</strong> कहते हैं कोल्हू द्वारा तैयार तेल सबसे बेहतर है, देसी है, आँखों के सामने निकला जाता है। आप आइये, देखिये, आश्वस्त होइए और अपनी जरूरत के हिसाब से आदेश दीजिये। आपका आदेश न केवल प्रदेश में पशुओं को सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि पर्याप्त भोजन के अभाव में घटती प्रजनन क्षमता के कारण देशी नस्ल की गायों की संख्या भी उत्तरोत्तर काम हो रही है।&#8221;</p>
<p>ज्ञातव्य हो कि भारत में दस प्रमुख सरसों उत्पादक राज्यों में, मसलन राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, झारखंड, असम, पंजाब के साथ बिहार भी है। बिहार में सरसों (रबी) का फसल बेगूसराय, समस्तीपुर, नालंदा और गया में अधिक होता है जबकि तीसी या अलसी (रबी) के लिए औरंगाबाद, किशनगंज, पश्चिम चंपारण और भभुआ प्रसिद्ध है। तिल (खरीफ / रबी) के मामले में सुपौल, समस्तीपुर, किशनगंज और मधुबनी, सूरजमुखी (रबी) के मामले में मधेपुरा, पूर्णिया, कुसुम (खरीफ / रबी) दरभंगा, मुजफ्फरपुर और खगड़िया और मूंगफली (रबी) के लिए नवादा, पश्चिम चंपारण, गया और नालंदा प्रसिद्ध है।  वैसे लोगों का खाना है कि विगत कई वर्षों से लगातार पारंपरिक खेती से मुनाफा अधिक नहीं हो पाने के कारण लोग तिलहन में सरसों की खेती करना शुरू किये हैं। सरसों का मूल्य भी किसानों को अधिक मिलता है। </p>
<blockquote><p>बिहार के कैमूर को धान का कटोरा कहा जाता है। यहाँ आज भी बड़े पैमाने पर किसान धान की खेती होती है। लेकिन यहां भी खेती की क्रिया में लोग परिवर्तन कर रहे हैं &#8211; अब किसान अवधान के अलावा गेहूं दलहन और तिलहन की भी खेती करने लगे हैं। लोगों का कहना है कि ऑक्सीजन गौशाला, जो अपने आप में एक विशेष स्थान और दृष्टान्त रखता है, जैसा कोने-कोने में लघु और कुटीर उद्योगों जैसा विकास होता है तो सरसों का उत्पादन लाभकारी होगा। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="alignleft size-full wp-image-6569" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वरिष्ठ पत्रकार <strong>मनोज कुमार</strong> कहते हैं कि देशभर में 19.25 करोड़ गाय हैं।  देश की कुल गायों की संख्या का 7.95% बिहार में है। यानी बिहार में गायों की संख्या 1.54 करोड़ है। लेकिन, इनमें बिहार की मूल नस्ल की गाय न के बराबर है। हाइब्रिड नस्ल और दूसरे राज्यों से लायी गयी गाय ही बिहार में हैं। गायों की संख्या के लिहाज से देशभर में बिहार चौथे स्थान पर है। लेकिन, राज्यभर में चिह्नित रूप से सिर्फ दो मूल नस्ल की गाय ही शेष रह गयी है। पूर्णिया और बचौर ये दो नस्ल की गाय ही अब बिहार की मूल नस्ल रह गयी है। वर्तमान में दूसरे राज्यों से लायी गयी और हाइब्रिड नस्ल की गायों का ही दूध बिहार के लोग पी रहे हैं। </p>
<p>पूर्णिया नस्ल की गाय पूर्णिया, अररिया, कटिहार, मधेपुरा, किशनगंज, सुपौल में ही कहीं-कहीं मिलेगी। बचौर नस्ल की गाय दरभंगा, सीतामढ़ी और मधुबनी के क्षेत्रों में ही पायी जाती है। इन दोनों नस्लों की गायों की संख्या लगभग एक से डेढ़ हजार के आसपास होगी। इनका भी संरक्षण नहीं हुआ तो ये नस्लें भी विलुप्त हो जायेंगी। गाय की गंगातीरी नस्ल उत्तर प्रदेश और बिहार में पायी जाती थी, लेकिन अब बिहार में यह गाय नहीं मिलती है। यह मध्यम आकार की होती है। यह प्रति ब्यांत में औसतन 900-1200 लीटर दूध देती है। इसके दूध में 4.1-5.2 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। वैसे बिहार में गुजरात, पंजाब और राजस्थान की गायों की भरमार है। यहां पंजाब की साहीवाल, राजस्थान की थारपारकर और गुजरात की गिर नस्ल की गाय की भरमार है। राज्य में इस साल इन्हीं नस्लों की गायों की भी सरकारी अनुदान के तहत खरीदारी कर बिहार लाया जा रहा है। बिहार में 7.3% की दर से दूध का उत्पादन हो रहा है, जबकि राष्ट्रीय औसत 5.29% ही है। </p>
<p>पत्रकार <strong>गुलशन सिंह</strong> कहते हैं कि दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने और बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए सरकार ने देसी गो-पालन प्रोत्साहन योजना की शुरुआत की है। देसी गो-पालन प्रोत्साहन योजना से न सिर्फ रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे, बल्कि देसी गायों की संख्या में वृद्धि के साथ दूध का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही, डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार ने अनुदान का भी प्रावधान किया है। गौ पालन योजना के के माध्यम से सरकार देसी गायों की संख्या में वृद्धि करना चाहती है, इसके लिए सरकार गाय खरीदने पर 50 से 75% तक किसानों को सब्सिडी देगी। इससे राज्य में डेयरी फार्म की संख्या में काफ़ी वृद्धि भी होगी, इसी के साथ-साथ बेरोजगार युवाओं को एक नया रोजगार भी हासिल होगा। इस योजना के माध्यम से बिहार सरकार राज्य के सभी किसान एवं बेरोजगार युवाओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसके माध्यम से दोनों लाभान्वित हो सकेंगे। सरकार यह स्वीकार रही है कि दरअसल समाज में देशी गायों की संख्या में धीरे-धीरे बहुसंख्यक रूप से कम होती  जा रही है, जिसके कारण पौष्टिक दूध की भी कमी देखने को मिल रही है। गौ पालन योजना का मुख्य उद्देश्य देसी गायों की संख्या में वृद्धि करना है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6569" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>बहरहाल, <strong>विनोद सिंह</strong> कहते हैं &#8220;हम स्वयं या अपने बच्चों को दूध के साथ अन्य कोई वस्तु पीने के लिए क्यों दें ? दूध से अधिक पौष्टिक इस पृथ्वी पर कुछ और है क्या? अन्य पदार्थों को मिलाने से बेहतर है कि दूघ पीने की मात्रा बढ़ाएं। इससे दुघ की मांग भी बढ़ेगी, गौशालाओं की सख्या भी बढ़ेगी, गायों की रक्षा भी होगी और साथ ही, दूध अधिक बिकने से गायों को भर पेट भोजन भी मिलेगा, जिससे उसकी प्रजनन क्षमता भी बढ़ेगी और अंततः विलुप्त होती गायों को हम रोक पाएंगे। क्योंकि दूध में जो भी हम मिलकर खुद पिटे हैं अथवा बच्चों को देते हैं वह सांप के जहर से भी अधिक खतरनाक है। <strong>(समाप्त)</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/for-good-health-consume-only-kolhu-pressed-oil">बिहार: चुनाव का समय आ रहा है इसलिए &#8216;चमचागिरी&#8217; में &#8216;आलतू-फालतू तेल &#8216;न&#8217; लगाएं&#8217; और &#8216;अच्छे स्वास्थ्य&#8217; के लिए &#8216;कोल्हू प्रेस्ड तेल&#8217; ही खाएं (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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