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	<title>movement Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>जिस कंधे का इस्तेमाल कर बिहार के नेता ऊपर बढ़े, ऊपर चढ़े, समयांतराल अपने राजनीतिक गुरु, उनके कंधे और सिद्धांतों को ही चढ़ावा चढ़ा दिया (भाग-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-leaders-of-bihar-used-those-shoulders-to-move-ahead-sacrificed-their-political-gurus-principles</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2025 13:17:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना :  जयप्रकाश नारायण के सन 1974 आंदोलन के गर्भ से जन्म लिए आज के नेताओं की मानसिकता की बात छोड़िये, प्रदेश के लोगों की मानसिकता को अगर आंकना है तो एक बार कदमकुआं स्थित उनके पुस्तैनी घर की तंग गलियों में घूमकर देखिये। आज जयप्रकाश प्रकाश नारायण सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका घर प्रदेश तथाकथित नेताओं की रुग्ण मानसिकता, धनाढ्यों के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-leaders-of-bihar-used-those-shoulders-to-move-ahead-sacrificed-their-political-gurus-principles">जिस कंधे का इस्तेमाल कर बिहार के नेता ऊपर बढ़े, ऊपर चढ़े, समयांतराल अपने राजनीतिक गुरु, उनके कंधे और सिद्धांतों को ही चढ़ावा चढ़ा दिया (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना :  जयप्रकाश नारायण के सन 1974 आंदोलन के गर्भ से जन्म लिए आज के नेताओं की मानसिकता की बात छोड़िये, प्रदेश के लोगों की मानसिकता को अगर आंकना है तो एक बार कदमकुआं स्थित उनके पुस्तैनी घर की तंग गलियों में घूमकर देखिये। आज जयप्रकाश प्रकाश नारायण सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका घर प्रदेश तथाकथित नेताओं की रुग्ण मानसिकता, धनाढ्यों के गगनचुम्बी इमारतों के सामने बौना हो गया है। देखिये जरूर। </strong></p>
<blockquote><p>कदमकुआं स्थित यह इलाका, जहाँ बिहार विधानसभा और बिहार सरकार के मंत्रालय में तीन-तीन नेताओं (उप-मुख्यमंत्री सहित) का आवास हो, जयप्रकाश नारायण के घर तक जाने वाली सड़क जगत नारायण लाल रोड और उससे लगी गलियां अपने भाग्य पर विलख रहा है। पचास वर्ष पहले, जहाँ देश-विदेश के चुनिंदे नेता, पूर्व-प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री तक गली में प्रवेश से पूर्व वहां की मिट्टी को नमन करते थे, आज उन सड़कों पर, उन गलियों में चलना अपनी तौहीन समझते हैं। सब समय है। </p></blockquote>
<p>मानसिकता का दृष्टान्त तो उसी दिन ज्ञात हो गया था जिस दिन जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को गंगा तट पर अग्नि को सुपुर्द किया जा रहा था। उस दिन कुछ काल पूर्व तक जब उनके पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था, पटना के अशोक राजपथ पर करीब पांच लाख से अधिक लोग अश्रुपूरित निगाहों के साथ पीछे-पीछे चल रहे थे। श्रीमती इंदिरा गांधी जिन्हे सत्ता से पदच्युत करने के लिए जय प्रकाश नारायण ने शपथ लिए थे, उन्हें कुर्सी से हटाकर जनता की सरकार (जनता पार्टी) दिल्ली के सिंहासन पर बैठाये थे, श्रीमती गांधी उनके पार्थिव शरीर के साथ चल रही थी। कौन थे, कौन नहीं थे की गणना असंभव था। शायद उस दिन के बाद आज तक पटना कभी किसी हार-मांस वाले पार्थिव शरीर की यात्रा के साथ इतने लोगों को नहीं देखा है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1.jpg" alt="" width="2048" height="1365" class="aligncenter size-full wp-image-6525" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-1536x1024.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>लेकिन, उस यात्रा के कुछ ही पल बाद गंगा के किनारे क्या हुआ यह उस कालखंड के, उक्त अवसर पर उपस्थित लोग चश्मदीद गवाह होंगे। घाट पर बिहार के नेताओं की बात छोड़िये, केंद्र के नेताओं के साथ-साथ देश विदेश के अनेकानेक गणमान्य व्यक्ति, पत्रकार समूह, छायाकार, विद्वान, विदुषी, लेखक सभी घाट पर उपस्थित थे। श्रीमती इंदिरा गांधी प्रवेश के साथ बाएं हाथ अन्य नेताओं के साथ थीं। मुखाग्नि की तैयारी हो रही थी। लाखों की भीड़ में चिता से कुछ दूर दाहिने कोई व्यक्ति अपने बाएं हाथ के तलहत्थी पर खैनी मल रहा था। इधर सम्पूर्ण राष्ट्र शोकाकुल था। इंदिरा गांधी भी अश्रुपूरित थी क्योंकि अब उन्हें &#8216;इंदू&#8217; कहकर सम्बोधित करने वाला कोई नहीं था। अपने प्रिय नेता के अंतिम यात्रा के लिए अग्नि सज्ज थी। </p>
<p><strong>सन 1979 में बिहार का शैक्षिक दर भी 30 फीसदी पार नहीं किया था। आंकड़े यही कहे थे कि 29.76 फीसदी शैक्षिक दर था जिसमें पुरुषों की साक्षरता 36.00% और महिलाओं की 21. 70 % थी। पचास वर्ष बाद आज प्रदेश की सरकार साक्षरता दर के ग्राफ को भले 61.8 फीसदी, जिसमें पुरुषों की साक्षरता 71.2 % और महिलाओं की साक्षरता 51.5 फीसदी (राष्ट्रीय साक्षरता दर 74.04% से भी नीचे) दिखाए, कदमकुआं के जगत नारायण लाल रोड की गलियों में रहने वाले जयप्रकाश नारायण के घरों के दीवार, ईंट, पत्थर गवाह है कि आज भी हम उनके लिए शिक्षित नहीं हुए हैं। </strong></p>
<blockquote><p>उस दिन भी नहीं थे। उस दिन जैसे ही मुखाग्नि दी जा रही थी, दूर लोग अपने तलहथी पर खैनी ठोक रहे थे। उपस्थित लोग उसे ताली समझकर पूरे आसमान को ताली की गड़गड़ाहट में बदल दिया। इंदिरा गांधी के साथ-साथ अपने-अपने राजनीतिक मनमुटाव को छोड़कर, सैकड़ों नहीं, हज़ारों लोग उन तालियों की गड़गड़ाहट को रोकने का असफल प्रयास कर रहे थे। उधर जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को अग्नि अपने में विलय कर रही थी, उधर लोग ताली बजने के अवसर को भी आंकने में विफल हो रहे थे। आज जब जयप्रकाश नारायण के घर को देखता हूँ तो नेताओं की मृत मानसिकता भी दिखाई देती है उसी ताली की गड़गड़ाहट की तरह। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3.jpg" alt="" width="2048" height="1365" class="aligncenter size-full wp-image-6526" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-1536x1024.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>तत्कालीन विपक्षीय और असंतुष्ट राजनेताओं की नजरों में  सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक इंदिरा गांधी का देश की राजनीतिक-प्रशासनिक ब्रह्मांड पर एकाधिकार स्थापित हो चुका था।  उसी कालखंड में रेडिकल ह्यूमैनिस्ट में एक लेख प्रकाशित हुआ था &#8211; गांधी एक एकाधिकारवादी &#8211; और उस लेख के लेखक थे जयप्रकाश नारायण। उस लेख को इंडियन एक्सप्रेस भी प्रकाशित किया था । एक्सप्रेस में प्रकाशन के साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठी श्रीमती इंदिरा गांधी की भृकुटी तन गई थी। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण उन दिनों समाचार भारती के अध्यक्ष थे। और किसी कार्यवश श्रीमती गांधी से मिलना आवश्यक हो गया था। परंतु श्रीमती गांधी रेडिकल ह्यूमैनिस्ट और एक्सप्रेस की कहानी के कारण जयप्रकाश नारायण से नहीं मिली। जब उनके टेबल पर मिलने के लिए निवेदन संबधी कागज आए, श्रीमती गांधी दो टूक में कहबा दी कि इस कार्य के लिए वे आई.के. गुजराल से मिल लें, मुझसे मिलने की जरूरत नहीं है। अलबत्ता वे जयप्रकाश नारायण को तिरस्कृत कर रही थी। नारायण गुजराल से बिना मिले पटना आ गए। </p>
<p>इस बीच नई दिल्ली के राजपथ, संसद मार्ग से लेकर पटना के अशोक राजपथ-मोइनुल हक पथ के रास्ते सचिवालय तक बदलाव वाली राजनीतिक गर्मी चढ़ने लगी थी। पटना की सड़कों पर आंदोलनकारियों में कुछ सचेत लोग जय प्रकाश नारायण से मिले और उन्हें आंदोलन को नेतृत्व देने के लिए निवेदन किए। बहुत बातें हुईं, लेकिन अन्य बातों में एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हम नेतृत्व करेंगे बसरते आंदोलन शांतिपूर्ण हो, हिंसा का कोई स्थान नहीं। तत्कालीन छात्रों के आंदोलन को नेतृत्व मिला। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6527" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>उस दिन साल 1974 का अप्रैल माह का 8 तारीख था। इंदुप्रभा जी, श्रीमती वीणा रानी श्रीवास्तव, रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, राधारमण जी और जयप्रकाश नारायण की अगुआई में एक मौन जुलूस निकला गया था। एक खुली जीप पर जयप्रकाश नारायण खड़े थे। दाहिने-बाएं दिनकर, रेणु, श्रीमती श्रीवास्तव और जेपी को ह्रदय से चाहने वाले उनके अनुयायी-महिला-पुरुष- जीप के पीछे-पीछे कांग्रेस व्यवस्था के प्रति अपना विरोध दिखाते, अपने-अपने मुख पर काला पट्टी बांधे चले जा रहे थे। </strong></p>
<p>डाक बांग्ला चौराहे से कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद जुलुस जब इमाम पैलेस से आगे बढ़ा, फ़्रेज़र रोड स्थित बन्दर बगीचा के नुक्कड़ पर स्थित <strong>प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया</strong> के तत्कालीन राज्य प्रमुख <strong>एस.के. घोष यानी मोंटू दा</strong> बाहर झरोखे पर खड़े दिखे। मोंटू दा समाचार के दुनिया में एक जाना-पहचाना चेहरा थे। उनके शब्द बहुत ही तीखी, लेकिन सत्यता के उत्कर्ष पर होता था। मोंटू डा को देखते ही उनके सम्मानार्थ जयप्रकाश नारायण (उम्र में अधिक होने के बाद भी) अपने दोनों हाथों को एक साथ मिलाकर आसमान की ओर देखते सम्मानपूर्ण प्रणाम किया। अब तक झरोखे पर दो-चार लोग और आ गए थे। यह जुलुस आगे <strong>आर्यावर्त-इण्डियन नेशन</strong> अख़बार के दफ्तर के सामने जैसे पहुंचा, सभी कर्मचारी, पत्रकार, संपादक उनके सम्मानार्थ सड़क पर खड़े थे। सभी जयप्रकाश नारायण और जीप पर उपस्थित गणमान्यों को प्रणाम का जबाब प्रणाम से दिए। कुछ क्षण बाद पीटीआई तीन-टेक में उस शांति जुलूस का समाचार प्रसारित किया जो भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने तक पहुंचा। </p>
<figure id="attachment_6528" aria-describedby="caption-attachment-6528" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu.jpg" alt="" width="2048" height="1380" class="size-full wp-image-6528" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-300x202.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-1024x690.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-768x518.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-1536x1035.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6528" class="wp-caption-text">रघु राय (बीच में), अशोक कर्ण (बाएं) और एक पत्रकार दाहिने</figcaption></figure>
<p>पटना से प्रकाशित <strong>सर्चलाइट जो बाद में हिंदुस्तान टाइम्स बना, के तत्कालीन छायाकार अशोक कर्ण</strong> उन दिनों पुनाईचक मोहल्ला में रहते थे। पटना विश्वविद्यालय के बी.एन. कालेज के छात्र थे, लेकिन कैमरा से दोस्ती हो गयी थी उनकी। जय प्रकाश नारायण की क्रांति अपने उत्कर्ष पर थी। उस क्रांति का चश्मदीद गवाह वे खुद भी थे और उनका कैमरा तो था ही। जय प्रकाश नारायण के घर जाना, वहां उनसे मिलने आने वाले देश-विदेश के लोगों, स्थानीय नेताओं को अपने कैमरे में कैद करना नित्य का क्रियाकलाप था। दशकों बाद वे एक बार फिर अपने पटना की यात्रा के दौरान जन नायक स्वर्गीय जय प्रकाश नारायण जी के आवास पर दोबारा पहुंचे। </p>
<p>कर्ण कहते हैं कि &#8220;कदमकुआं क्षेत्र में स्थित इस ऐतिहासिक स्थान पर मेरी पिछली यात्रा को काफी समय बीत गया था। एक मीडिया पेशेवर के रूप में, जब भी अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसे प्रमुख केंद्रीय नेता जेपी को श्रद्धांजलि देने आते थे, तब मैं इस आवास पर रिपोर्टिंग करता था। अनेक बार यहां आने के कारण, मैंने इस आवास को 1970 के दशक के छात्र आंदोलन का केंद्र बनते देखा। जहां जेपी जी रहते थे और जहां 8 अक्टूबर 1979 को उनका निधन हुआ, वहां खड़े होकर मैंने देखा कि यह स्थान बहुत अच्छी तरह से संरक्षित है। उनकी निजी वस्तुएं सम्मानपूर्वक सजाई गई थी और पूरा घर साफ-सुथरा और सुव्यवस्थित था।&#8221;</p>
<p><strong>कर्ण आगे कहते हैं: &#8220;जो बात सबसे ज़्यादा खली, वह थी यहां आने वालों की कमी। केयरटेकर से बातचीत करने पर पता चला कि यह स्मारक बहुत कम लोगों द्वारा देखा जाता है। आज की युवा पीढ़ी जेपी और उनके कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन से उतनी परिचित नहीं है। दुख की बात है कि उस आंदोलन से उभरे कुछ नेता, जो आज उच्च पदों पर हैं, इस ऐतिहासिक स्थल पर एक साधारण सी यात्रा करने की ज़रूरत भी महसूस नहीं करते। यहां तक कि जेपी की जयंती या पुण्यतिथि पर भी यह स्थान अक्सर सुनसान रहता है। आज जेपी का घर मोहल्ले में बने अन्य मकानों के सामने बौना हो गया है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था।&#8221;</strong></p>
<p>कर्ण का कहना है कि &#8220;आज के शांत और सीमित आयोजन उस दौर से एकदम विपरीत हैं जब लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और सुशील मोदी जैसे नेता यहां आकर श्रद्धांजलि अर्पित करते थे। अब राजनीतिक दल एक-दूसरे पर जेपी की विरासत को भुलाने का आरोप लगाते हैं, पर अपने-अपने कार्यालयों में छोटे-मोटे आयोजन करके कर्तव्य पूरा मान लेते हैं। पटना हवाई अड्डे का नाम जेपी के नाम पर है, और कंकड़बाग में एक बड़ा अस्पताल भी उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। हालांकि, महिलाओं के लिए स्थापित महिला चरखा समिति और उससे जुड़ी पुस्तकालय में भी अब उपस्थिति कम हो गई है। जो दुखद है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira.jpg" alt="" width="2042" height="1129" class="aligncenter size-full wp-image-6529" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira.jpg 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-300x166.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-1024x566.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-768x425.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-1536x849.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-696x385.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि राष्ट्र का ध्यान बॉम्बे के जसलोक अस्पताल के एक कमरे पर केंद्रित था, जहाँ जनता पार्टी के संरक्षक संत जयप्रकाश नारायण जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। एक तरह से, राष्ट्र ने उन्हें उनके सबसे गंभीर संकट के समय में फिर से खोजा। इससे पहले, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पदभार ग्रहण करने के बाद से सरकार की सबसे असंवेदनशील गलती की, जब जेपी की &#8220;मृत्यु&#8221; की खबर लोकसभा में घोषित की गई।</p>
<p>ऐतिहासिक फोटो-पत्रकार/संपादक’ <strong>रघु राय</strong> जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के चश्मदीद गवाह थे। जिस दिन जय प्रकाश नारायण पर पटना की सड़कों पर लाठी प्रहार हुआ था, रघु राय उनके बगल में, उसी जीप पर सवार थे चालक के पास लटके हुए। जेपी पर लाठी प्रहार की वह तस्वीर दो दिन बाद दिल्ली से प्रकाशित स्टेट्समैन अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी। उधर संसद अपने सत्र में था। उस तस्वीर को देखकर एक और जहाँ सत्ता पक्ष के लोग लाठी प्रहार को गलत कह रहे थे, सत्ता से पदच्युत करने वाले सत्ताधारियों की तीव्र आलोचना कर रहे थे। रघु राय की वह तस्वीर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में भूचाल ला दी थी उन दिनों। पटना से लेकर भारत के प्रत्येक राज्यों में, दिल्ली में रघु राय ‘राय साहब’ हो गए। </p>
<p><strong>रघु राय</strong> कहते हैं: “उस दिन 4 नवम्बर था। मैं दिल्ली से पटना पहुँच गया था। सुबह-सवेरे तैयार होकर, कैमरे उठाकर मैं जयप्रकाश नारायण के कदमकुआं स्थित घर पर पहुँचने निकल गया था। घर पर बहुत उथल-पुथल नहीं था। शांति थी। एक जीप सामने लगी थी। कुछ तीन-चार छात्र वाहिनी के युवक-युवतियां उपस्थित थी। लोगों की उपस्थिति नहीं देखकर किसी ने जेपी साहब को सलाह दिया कि या तो यात्रा रोक देते हैं अथवा कुछ समय और प्रतीक्षा करते हैं। इन शब्दों को सुनकर जेपी साहब कहते हैं ‘ना’ ‘ना’, हम जो भी हैं निकलेंगे और निकल लिए। “जब चलने की बात आई तब मैं जेपी साहब से कहा कि क्या मैं चालक के तरफ रह सकता हूँ? मैं किसी तरह कुछ स्थान बनाकर चालक की ओर खड़ा हो गया। तस्वीर लेने के लिए हमें कुछ स्थान भी चाहिए था और सामने जेपी साहब भी। हम लोग जब निकले अधिकाँश लोगों के घरों के द्वार बंद थे। कुछ चलने पर एक-दो- मंजिले मकान की खिड़कियों पर खड़े दो-चार लोग दिखे जो जेपी साहब को नमन कर रहे थे, हौसला बढ़ा रहे थे। जिंदाबाद – जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। यह देखकर हम सबों का मनोबल बढ़ा। मैं और मेरा कैमरा अपना काम कर रहा था – क्लिक-क्लिक।” </p>
<p>राय साहब कहते हैं: “जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए दो, चार, दस, बीस लोग साथ होते गए। सड़क पर स्थानीय प्रशासन के तरफ से बहुत अधिक मात्रा में सुरक्षा की व्यवस्था थी। स्थानीय पुलिस (पटना पुलिस, बिहार पुलिस) के अलावे केंद्रीय रिजर्व पुलिस के बल तैनात थे। लेकिन टुकड़ियों में लोगों का हम लोगों के साथ मिलने के कारण जन सैलाब क्रमशः बढ़ रहा था। जैसे-जैसे घडी की सुई आगे बढ़ रही थी, जेपी साहब के प्रति लोगों का विस्वास भी बढ़ रहा था। उनके घर से आगे निकलने पर धीरे-धीरे उनके जीप के पीछे, आगे, दाहिने-बाएं सैकड़ों, हज़ारों की संख्या में लोग चलने लगे थे। रास्ते में विशाल जन सैलाब हो गया था।”  </p>
<p>“कई घंटे बाद हम सभी आयकर चौराहे के पास पहुंचे थे। वहां की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही मजबूत थी। एक तरफ जनसैलाब था तो दूसरे तरफ वर्दी-टोपी धारी पुलिस बल। अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ होने वाला है। मैं तो जेपी के साथ था, इसलिए यह देख नहीं पाया कि और कितने छायाकार है। तभी अचानक पहले अश्रु गैस के गोले चले और फिर लाठी प्रहार। उस भगदड़ में कैमरा और स्वयं को सँभालते, सुरक्षित रखते क्लिक-क्लिक करता रहा। </p>
<figure id="attachment_6530" aria-describedby="caption-attachment-6530" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor.jpg" alt="" width="2042" height="1129" class="size-full wp-image-6530" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor.jpg 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-300x166.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-1024x566.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-768x425.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-1536x849.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-696x385.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6530" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री सुरेंद्र किशोर</figcaption></figure>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री सुरेंद्र किशोर</strong> कहते हैं कि &#8220;जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों को समझना और उसे पालन करना आज के नेताओं के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। जयप्रकाश नारायण के आदर्शों को समझना आज के नातों के वंश में नहीं है। आज उनकी नजरों में सिर्फ और सिर्फ जातिगत सामाजिक समीकरण, जो अंततः मतों में बदलता है, महत्वपूर्ण है।&#8221;</p>
<p><strong>सरयू राय, लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील मोदी, राम बहादुर राय, वशिष्ठ नारायण सिंह, विक्रम सिंह, राम जतन सिन्हा, अशोक प्रियदर्शी और न जाने कितने तत्कालीन छात्र नेताओं ने जय प्रकाश के कन्धों का इस्तेमाल किया गद्दी तक पहुँचने के लिए। लेकिन जो उस कालखंड के गवाह है वे शायद यह भी जानते होंगे की इन छात्र नेताओं का जेपी के साथ सानिग्ध 1974 के बाद हुई। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जेपी की मृत्यु से पहले जेपी के नाम और गरिमा को इन नेताओं ने जितना शोषण किया, शायद कोई नहीं किया होगा। इन नेताओं ने जेपी के आदर्श सिद्धांतों, विचारों को कभी ग्रहण नहीं किया बल्कि सत्ता में बैठने के लिए साम-दंड-भेद सभी हथकंडों का इस्तेमाल किया। जेपी के सिद्धांतों को अमल करना या उस पर चलना इन नेताओं के कूबत में नहीं है। जिस आंदोलन के मूल्य को लेकर जेपी चले थे, इन नेताओं की नज़रों में उसका मूल्य बदल गया। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद कदमकुआं स्थित जेपी के घर अथवा उस मंदिर का जहाँ दूसरी स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद पड़ी थी, आज यह हश्र नहीं होता। आज कदमकुआं की उस तंग गलियों में जेपी का घर गम हो गया है। बड़े-बड़े महल, अट्टालिकाएं चतुरदिक बमन गयी है। </strong></p>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र</strong> कहते हैं: &#8220;यही अंतर है कांग्रेस की सोच में और गैर-कांग्रेसी नेताओं में। हम देश की बात नहीं करेंगे अभी, लेकिन पटना में रहने वाले जान उन छात्र नेताओं को एक नजर याद करते हैं तो पाते हैं कि वे सभी नेता जिन्हें पैजामा का नारा बाँधने का ज्ञान नहीं था जयप्रकाश नारायण द्वारा 1974 आंदोलन का नेतृत्व सँभालने, आज आकाश में कहाँ से कहाँ उड़ रहे हैं, जबकि जेपी का वह ऐतिहासिक घर, परिसर रसातल में चला गया है, उपेक्षित पड़ा है। चाहिए तो यह कि उस सम्पूर्ण परिसर का इतना विकास किया जाता कि विश्व के लोग यहाँ आते। उस संत के विचारों से अवगत होते। </p>
<figure id="attachment_6531" aria-describedby="caption-attachment-6531" style="width: 1441px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan.jpg" alt="" width="1441" height="1126" class="size-full wp-image-6531" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan.jpg 1441w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan-300x234.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan-1024x800.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan-768x600.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1441px) 100vw, 1441px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6531" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र</figcaption></figure>
<p>ज्ञानवर्धन आगे कहते हैं: कुंभरार के विधायक अरुण कुमार सिंह का घर इसी कदमकुआं इलाके के लोहानीपुर में है। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के पुत्र नितिन नवीन आज नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में मंत्री हैं। वे बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। प्रदेश के डिप्टी मुख्यमंत्री विजय सिन्हा का विशालकाय भवन इसी इलाके में हैं। लेकिन सवाल यह ही कि ऊँचे-ऊँचे,  बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले चमचमाता मकानों में रहने का अर्थ तो यह नहीं है कि मानसिकता भी बेहतर हो, सोच भी बेहतर हो जो जेपी जैसे संत का सम्मान कर सके।  इतिहास को जीवित रखकर अगली पीढ़ियों को सौंपने का काम कर सके। लालू यादव, नीतीश कुमार या ने लोगों की बात करना ही व्यर्थ है। ये सभी नेता जन्मदिन और मृत्यु दिवस पर माल्यार्पण करने के लिए ही अवतरित हुए हैं। आपको दृष्टान्त देखना है तो इन मंत्रियों के आवास के सामने से निकलने वाली सड़कें जो जेपी के घर तक जाती है &#8211; दुर्दशा देख लें।&#8221;</p>
<p>विगत वर्ष जेपी के जन्म स्थान सिताब दियारा गए थे <strong>केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह </strong>जेपी की भूमिका पर वे अपने भाषण में कहे 1973 में गुजरात में तत्कालीन सरकार ने सार्वजनिक रूप से धन उगाही का काम सरकार को दे दिया, जिससे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार शुरू हो गया। इसके खिलाफ श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गुजरात के छात्रों ने एक सशक्त आंदोलन किया और गुजरात में सरकार बदल दी। इसके बाद बिहार में भी आंदोलन हुआ। आपातकाल की घोषणा कर दी गई और जयप्रकाश नारायण के साथ-साथ विपक्ष के कई नेताओं को जेल में डाल दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल लगाने वाली भ्रष्ट और अन्यायी सरकार के खिलाफ पूरे विपक्ष को एकजुट करके देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। जे.पी. ने सत्ता से बाहर रहकर देश के सामने परिवर्तन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।</p>
<p><strong>बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और जाने मने राजनीतिक विशेषज्ञ लव कुमार मिश्र </strong>कहते हैं &#8216;आज बिहार के सिंहासन से लेकर बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले दिल्ली के संसद और मंत्रालय में बैठने वाले सैकड़े नब्बे फीसदी नेता जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के उपज है। अगर जेपी अपना कन्धा नहीं दिया होता तो शायद उनकी वह पहचान नहीं हो पाती जो आज स्वयं को कह रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस कंधे का इस्तेमाल कर वे ऊपर बढ़ें ऊपर चढ़ें अपने राजनीतिक गुरु को ही राजनीति में चढ़ावा चढ़ा दिया। जेपी अपने जीवन में 76 वर्ष में अंतिम सांस लिए। साल 1979 था। उनके देहांत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय में दस लोग मुख्यमंत्री बने। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि किसी ने भी सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप में जयप्रकाश नारायण को वह सम्मान नहीं दिए जिसके वे हकदार थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6532" aria-describedby="caption-attachment-6532" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law.jpg" alt="" width="2048" height="1448" class="size-full wp-image-6532" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-300x212.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-1024x724.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-768x543.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-1536x1086.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6532" class="wp-caption-text">बिहार​ के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p>मिश्रा का कहना है &#8220;जय प्रकाश नारायण के सिद्धांतों में कहीं इस बात का दृष्टान्त नहीं मिलता है कि आप राष्ट्र की उन्नति, प्रदेश के विकास को त्याग कर अपने, अपने परिवार, अपने इष्ट-अपेक्षित, सगे सम्बन्धियों का विकास करें। तत्कालीन  प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सत्तर से पदच्युत कर आम लोगों के प्रतिनिधित्व को सत्ता के सिंहासन पर बैठने का हिम्मत कोई कर सका तो वह जय प्रकाश नारायण थे। लेकिन आज ने नेताओं की मानसिक स्थिति को देखकर कभी नहीं लगता कि उन्हें अपने राजनीतिक पथ-प्रदर्शक के प्रति कोई भी सम्मान है। वे जन्मदिन और मृत्यु दिवस पर हनुमान मंदिर के पास से गेंदा का माला लेकर उन्हें अर्पित कर देते हैं, जेपी के प्रति उनका सम्मान वहीँ समाप्त हो जाता है। आज सभी अवसरवादी है। आज के नेताओं को, यहाँ तक कि जो उस आंदोलन के पैदाइश हैं, जेपी के सिद्धांतों, विचारों से कोई वास्ता नहीं है। वैसी स्थिति में उनके आवास को एक धरोहर के रूप में विकसित करने की बात उन्हें सोचना, उनकी सोच से परे हैं।&#8221;</p>
<p><strong>अमित शाह</strong> ने कहा था कि 1974 में जयप्रकाश जी ने बिहार में जो अराजनीतिक आंदोलन शुरू किया था, उसमें सभी विचारधाराओं के छात्रों ने हिस्सा लिया था। जेपी का नाम लेकर राजनीति में आए लोग अब पाला बदल कर जेपी के सिद्धांतों को दरकिनार कर सत्ता के सुख के लिए विपक्ष की सरकार में बैठे हैं। उनके अनुसार आने वाली पीढ़ी जेपी के विचारों से प्रेरणा लेकर देश के विकास को नई गति दे सके, इसके लिए यहां स्मारक के साथ ही एक शोध केंद्र बनाने का भी निर्णय लिया। यहां शोध केंद्र बनने के बाद छात्र जेपी के सिद्धांतों और ग्रामीण विकास के लिए किए गए उनके कार्यों पर शोध कर सकेंगे। लेकिन किसी ने भी यह प्रश्न नहीं पूछा कि &#8216;सिताब दियारा&#8217; क्यों, कदमकुआं क्यों नहीं?&#8221; </p>
<figure id="attachment_6533" aria-describedby="caption-attachment-6533" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant.jpg" alt="" width="2048" height="1448" class="size-full wp-image-6533" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-300x212.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-1024x724.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-768x543.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-1536x1086.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6533" class="wp-caption-text">बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व संवाददाता मणिकांत ठाकुर</figcaption></figure>
<p>पटना की गलियों के साथ-साथ  गाँव-गाँव से परिचित <strong>बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व संवाददाता मणिकांत ठाकुर </strong>कहते हैं: &#8220;इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है। हम सभी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के प्रथम द्रष्टा हैं। हम भी देखे हैं, लिखें हैं, आप भी देखे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि जिस सपने को लेकर जय प्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा बुलंद किये, जिस सिद्धांत को लेकर वे राष्ट्र के युवकों, खासकर बिहार के तत्कालीन युवकों को आह्वान किये &#8211; परिवर्तन हो &#8211; सत्ता, समाज, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक क्षेत्रों में मौलिकम बदलाव आये &#8211; वह सपना ही चकनाचूर हो गया। आज बिहार में जितने भी सफेदपोश नेता दिख रहे हैं, उसमें अधिकांशतः उस आंदोलन के हिस्सा हैं। लेकिन जयप्रकाश नारायण शायद यह नहीं समझते थे कि आज जो स्वयं को उनका अनुयायी कह रहे हैं, कल प्रदेश को जातिवाद, परिवादवाद, घोटलावाद और सभी प्रकार के कुकर्मों में धकेल देंगे।&#8221;</p>
<p>मणिकांत ठाकुर कहते है: आज जयप्रकाश के सिद्धांतों पर आज के नेताओं का कुकर्म अधिक भारी हो गया है। फिर उनके सिद्धांतों के बारे में, उनके घरों के बारे में कौन सोचेगा? मैं तो यह भी कहूंगा कि शायद आज के नेताओं को आत्मग्लानि होती होगी। वे जेपी की तस्वीरों से भी नजर मिलाने लायक स्वयं को नहीं पाते होंगे। आज जेपी के घर तक पहुँचने वाली गली नेताओं की बंद मानसिकता का द्योतक बन गयी हैं। यह दुर्भाग्य है।&#8221;</p>
<p>क्रमशः </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-leaders-of-bihar-used-those-shoulders-to-move-ahead-sacrificed-their-political-gurus-principles">जिस कंधे का इस्तेमाल कर बिहार के नेता ऊपर बढ़े, ऊपर चढ़े, समयांतराल अपने राजनीतिक गुरु, उनके कंधे और सिद्धांतों को ही चढ़ावा चढ़ा दिया (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>गृहमंत्री अमित शाह: आजादी के अमृत महोत्सव का यह वर्ष भारत को हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेने का वर्ष है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Aug 2022 11:06:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : हर घर तिरंगा अभियान पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है कि भारत का हर नागरिक हमारे संविधान निर्माताओं की कल्पना और अपेक्षाओं के अनुसार भारत की समृद्धि, सुरक्षा और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए एकजुट होकर काम कर रहा है, साथ ही, इसी तिरंगे की कसम खाकर सीमा पर देश का जवान अपना [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : हर घर तिरंगा अभियान पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है कि भारत का हर नागरिक हमारे संविधान निर्माताओं की कल्पना और अपेक्षाओं के अनुसार भारत की समृद्धि, सुरक्षा और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए एकजुट होकर काम कर रहा है, साथ ही, इसी तिरंगे की कसम खाकर सीमा पर देश का जवान अपना सर्वस्व अर्पण कर देता है, इसी तिरंगे को देखकर देश के करोड़ों किसान पूरी दुनिया का पेट भरने के लिए पुरुषार्थ करते हैं, ये तिरंगा ही है जो देशवासियों के दिल में देश का निशान बनकर प्रस्थापित हुआ है। आजादी के अमृत महोत्सव का यह वर्ष भारत को हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेने का वर्ष है और अगर 2047 तक करोड़ों भारतीय एकजुट होकर इन सभी संकल्पों को पूरा करते है तो भारत माता पुन: निश्चित रूप से विश्वगुरु के स्थान पर विराजमान होंगी। </strong></p>
<p>केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज नई दिल्ली में तिरंगे की अभिकल्पना करने वाले पिंगलि वेंकय्या जी की जयंती पर आयोजित &#8216;तिरंगा उत्सव&#8217; कार्यक्रम को सम्बोधित करते कहा कि तिरंगे की अभिकल्पना करने वाले पिंगलि वेंकय्या जी ने गांधी जी और लोकमान्य तिलक के सिद्धांतों पर चलकर बिना किसी स्वार्थ के एक मूक राष्ट्र सेवक की तरह अपना पूरा जीवन राष्ट्रहित को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि पिंगलि वेंकय्या जी ने करोड़ों भारतीयों की आशाओं,उमंगो और उनकी श्रद्धा को तीन रंगों में समाहित कर पूरे भारत को एकता के सूत्र में जोड़ने का काम किया, समग्र कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से पिंगली वैंकया जी को कोटि-कोटि नमन करता हूँ। </p>
<figure id="attachment_4263" aria-describedby="caption-attachment-4263" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677.jpg" alt="" width="2200" height="1458" class="size-full wp-image-4263" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677-1024x679.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677-1536x1018.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115677-2048x1357.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4263" class="wp-caption-text">तिरंगा उत्सव Photo:PIB</figcaption></figure>
<p><strong>इस अवसर पर श्री अमित शाह ने पिंगलि वेंकय्या जी के परिवार के सदस्यों का सम्मान किया और उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया। साथ ही गृह मंत्री ने हर घर तिरंगा थीम गीत को भी लॉन्च किया। गृह मंत्री ने कहा कि देश के युवाओं से कहना चाहता हूँ कि हर घर तिरंगा अभियान आपका अभियान है, यह महान भारत की रचना का एक बार फिर से शुभारम्भ करने वाला अभियान है, इस अभियान से जुड़कर अपने घर पर तिरंगा फहरायें और उसके साथ सेल्फी लेकर www.harghartiranga.com पर अपलोड करें। </strong></p>
<p>मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद विश्व में तिरंगे का मान सम्मान बढ़ाने का काम किया है,आज किसी वैश्विक समस्या पर जब तक प्रधानमंत्री मोदी जी का विचार नहीं आता, दुनिया कभी भी समस्या पर अपना विचार तय नहीं करती। मोदी जी के नेतृत्व में ऐसे भारत की रचना हो रही है जो आत्मनिर्भर हो, जो अपने अतीत पर गौरव करता हो और भविष्य के लिए न केवल आश्वस्त हो बल्कि भविष्य की रूप रेखा देश के युवाओं में स्पष्ट हो। देश के हर युवा के मन में अगर राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत होती है तो वो राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी शक्ति बनती है, जिससे राष्ट्र के विकास को नई ऊर्जा और गति मिलती है।   </p>
<figure id="attachment_4264" aria-describedby="caption-attachment-4264" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681.jpg" alt="" width="2200" height="1407" class="size-full wp-image-4264" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681-300x192.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681-1024x655.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681-768x491.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681-1536x982.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/H20220803115681-2048x1310.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4264" class="wp-caption-text">तिरंगा उत्सव में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और अन्य गणमान्य व्यक्ति Photo:PIB</figcaption></figure>
<p>इस अवसर पर अपने संबोधन में केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि आज महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगलि वेंकय्या जी की 146वीं जयंती है, जिन्होंने हमारी आन, बान, शान और देश के निशान तिरंगे को बनाया और लोगों के बीच प्रस्थापित कियाश्री शाह ने कहा कि इसी तिरंगे की कसम खाकर सीमा पर देश का जवान अपना सर्वस्व अर्पण कर देता है, इसी तिरंगे को देखकर देश के करोड़ों किसान पूरी दुनिया का पेट भरने के लिए पुरुषार्थ करते हैं और ये तिरंगा ही है जो देशवासियों के दिल में देश का निशान बनकर प्रस्थापित हुआ है। </p>
<p>केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि हमें कभी भी तिरंगे की रचना की प्रक्रिया को नहीं भूलना चाहिए। अगर हम तिरंगे की रचना और फिर संविधान सभा द्वारा इसकी स्वीकृति की यात्रा को समझ लेते हैं तो पिंगलि वेंकय्या जी को याद किए बिना नहीं रह सकते। इस महान तेलुगु राष्ट्रसेवक और स्वतंत्रता सेनानी नने करोड़ों भारतीयों की आशाओं,उमंगो और उनकी श्रद्धा को तीन रंगों में समाहित कर पूरे भारत को एकता के सूत्र में जोड़ने का काम किया,समग्र कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से पिंगलि वेंकय्या जी को कोटि-कोटि नमन करता हूँ। उन्होंने कहा कि तिरंगे की अभिकल्पना करने वाले पिंगलि वेंकय्या जी ने गाँधी जी और लोकमान्य तिलक के सिद्धांतों पर चलकर बिना किसी स्वार्थ के एक मूक राष्ट्र सेवक की तरह अपना पूरा जीवन राष्ट्रहित को समर्पित किया। जब देश ने तिरंगे को स्वीकार किया तब यही तिरंगा हमारी देश की आन,बान और शान बना।</p>
<p>श्री अमित शाह ने कहा कि राष्ट्रध्वज की यात्रा 7 अगस्त 1906 से शुरू हुई। 1921 में महात्मा गांधी ने श्री पिंगलि वेंकय्या जी को नया राष्ट्रध्वज डिजाइन करने का काम दिया। 29 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में महान स्वतंत्र सेनानी नेताजी सुभाष बाबू ने तिरंगा फहराया था। उन्होंने कहा कि तिरंगे का भगवा रंग त्याग,बलिदान और शौर्य का प्रतीक है,हरा रंग समृद्धि का प्रतीक है,सफेद रंग शांति और एकता का प्रतीक है। बीच में धर्म चक्र की 24 कंडिकाएं भारत के एक होने का प्रतिक है। आज पूरी दुनिया भारत को और भारत के राष्ट्रध्वज को सम्मान के साथ देख रही है। उन्होंने कहा कि उस दिन की कल्पना कीजिए जब देश के 20 करोड़ घरों पर तिरंगा शान से लहरा रहा हो, यह कल्पना करते ही आज़ादी के अमृत महोत्सव का महत्व हमारे दिलोदिमाग़ में सजीव हो जाएगा। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/aazadi-ka-amrit-mahotsav-to-take-a-pledge">गृहमंत्री अमित शाह: आजादी के अमृत महोत्सव का यह वर्ष भारत को हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेने का वर्ष है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;जेपी आंदोलन के बाद बिहार में पनपे नेता बिहार का विध्वंस कर दिया, नहीं तो आज मुजफ्फरपुर भी &#8216;अध्यात्म का शहर&#8217; कहलाता&#8221;&#8216; : लंगट सिंह के प्रपौत्र</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 May 2022 13:34:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[baikunth shukla]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chaparan]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
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		<category><![CDATA[langat singh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुजफ्फरपुर / पटना : वैसे आधुनिक भारत का इतिहास के ज्ञाता &#8216;तर्क-वितर्क&#8217; भले करें, जातिवाद-सम्प्रदायवाद की राजनितिक अखाड़े में कुस्ती लड़ते रहें अपने-अपने हितों के लिए। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत में रेलवे की शुरुआत के दो दशक बाद, जिस समय दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह सन 1874 में उत्तर बिहार में तिरहुत रेलवे के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुजफ्फरपुर / पटना : वैसे आधुनिक भारत का इतिहास के ज्ञाता &#8216;तर्क-वितर्क&#8217; भले करें, जातिवाद-सम्प्रदायवाद की राजनितिक अखाड़े में कुस्ती लड़ते रहें अपने-अपने हितों के लिए। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत में रेलवे की शुरुआत के दो दशक बाद, जिस समय दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह सन 1874 में उत्तर बिहार में तिरहुत रेलवे के रूप में निजी रेल सेवा की शुरुआत किये थे, उसी कालखंड में हाजीपुर-मुजफ्फरपुर रेल खंड के धरहरा गांव का एक बीस-वर्षीय बालक समस्तीपुर-दरभंगा रेल लाइन की पटरियों के बगल में टेलीफोन लाइन जोड़ने का काम शुरू किया था। कार्य सीखने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्तर बिहार का वह गरीब बालक ब्रितानिया सरकार के तत्कालीन अभियंता जेम्स विल्सन को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन दिनों उत्तर बिहार में भीषण अकाल पड़ा था। तिरहुत सरकार के द्वारा एक ओर जहाँ पूरे उत्तर बिहार में रेल लाइन की जाल बिछाई जाने लगी थी, ताकि सरकार-पदाधिकारियों, राजनेताओं, राजा-महाराजों, धनाढ्यों, समाज के संभ्रांतों के साथ-साथ आम नागरिकों को सुविधा उपलब्ध हो सके, वहीँ धरहरा गाँव के उस बालक जी जीवन-रेखा भी रेल की पटरियों की तरह चिकनी होती गयी। तत्कालीन समाज के लोग शायद इस बात से अनभिज्ञ थे कि रेल लाइन के बगल में टेलीफोन का तार खींचने वाला वह नवयुवक आने वाले दिनों में उत्तर बिहार के शैक्षिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनेगा, जहाँ भारत के श्रेष्टतम अध्यापक-प्राध्यापक विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करेंगे एक नए राष्ट्र के निर्माण के लिए । नाम था &#8211; लंगट सिंह।  </strong></p>
<p>बिहार की शैक्षिक व्यवस्था को स्वस्थ रखने के लिए, विकास करने में अगर दरभंगा के महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह अथवा उनके पूर्वजों का योगदान अपने उत्कर्ष पर है (उसके बाद क्या हुआ यह तो दरभंगा और मिथिला के लोग अधिक जानते हैं); तो हमें इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना होगा की बाबू लंगट सिंह और भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय के लोगों की क्या भूमिका थी। हम इस बात पर कतई पर्दा नहीं डाल सकते हैं कि बाबू लंगट सिंह और तत्कालीन समाज के अन्य भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय के लोगों के कारण बिहार का मुजफ्फरपुर-वैशाली-हाजीपुर का इलाका &#8216;सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का क्षेत्र है,&#8217; &#8216;अध्यात्म का इलाका&#8217; है। </p>
<p><strong>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज मुजफ्फरपुर के लोग क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ला के भतीजे  &#8216;बैकुंठ शुक्ला&#8217; को नहीं जानते और &#8216;छोटन शुक्ला&#8217; का पोस्टर गली-मोहल्ले-सड़कों पर टांग रहे हैं। वैकुण्ठ शुक्ला को फणीन्द्रनाथ घोष को मारने के जुर्म में फांसी दी गयी थी। फणीन्द्रनाथ घोष तत्कालीन अंग्रेजी सरकार के &#8216;अप्रूवर&#8217; बन गए थे जो अंततः भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटकाया। वैकुण्ठ शुक्ला तो उस समय के जलालपुर गाँव, जो उस समय मुजफ्फरपुर में था, आज हाजीपुर में है। वे एक मास्टर भी थे और हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्न्लिकन आर्मी के सदस्य भी। वे नमक सत्याग्रह का एक अहम् हिस्सा भी थे। आज महात्मा गांधी की चम्पारण यात्रा वाले राजकुमार शुक्ला को सभी जानते, लेकिन जलालपुर गाँव का वह शिक्षक जो फांसी पर लटका, कोई नहीं जानता। यह दुखद है। यह सामाजिक अवनति का एक अहम् हिस्सा है। यह विध्वंस मानसिकता का परिचायक है। </strong></p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> आज बाबू लंगट सिंह के प्रपौत्र डॉ प्रगति कुमार सिंह से गपशप किया। डॉ सिंह अपने परदादा के महाविद्यालय &#8211; लंगट सिंह कालेज, मुजफ्फरपुर &#8211; से विज्ञान में स्नातक किये थे। साल 1971 था और उसी वर्ष बिहार के चिकित्सा महाविद्यालयों में प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा की शुरुआत भी हुयी थी। डॉ सिंह उस परीक्षा में अव्वल आये और उन्हें जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला। चिकित्सा विज्ञान में स्नातक और स्वर्ण-पदक विजेता प्रगति बाबू पटना के कुर्जी अस्पताल से अपना चिकित्सा ज्ञान आगे बढ़ाये। लेकिन परिवार कुछ और चाहता था &#8211; सरकारी नौकरी। परिवार तो आखिर परिवार होता है, अतः प्रगति बाबू बिहार सरकार के चिकित्सा सेवा में नौकरी करने लगे। साल अस्सी के दशक का शुरूआती वर्ष था। डॉ प्रगति सिंह को &#8216;रेडियोलॉजी&#8217; के क्षेत्र में आगे बढ़ना था। समय का तकाजा देखिये कि में विश्व के बेहतरीन संत थॉमस हॉस्पिटल, लन्दन के रेडियोलॉजी विभाग का अहम् हो गए। कोई चार वर्ष से अधिक समय तक इस क्षेत्र में महारथ होने के बाद, बिहार सरकार की सेवा से स्वयं को मुक्त किये और आज पटना के बोरिंग रोड इलाके में &#8216;मौर्या स्केन सेंटर&#8217; के माध्यम से अपनी शिक्षा को, अपने ज्ञान को आगे बढ़ा रहे हैं और मानव सेवा कर रहे हैं। </p>
<p>बातचीत के दौरान डॉ सिंह के मन में जो वेदना थी, वह सम्मुख आ रहा था। प्रदेश की वर्तमान स्थिति के प्रति हताश थे। वैसे इन शब्दों को पढ़कर विद्वान और विदुषी से लेकर समाज के प्रतिष्ठित ठेकेदार तक स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन बिहार में यह बात आम है कि जिसे आप &#8216;सहारा&#8217; दे रहे हैं, जिसे &#8216;उपकृत&#8217; कर रहे हैं; लाख में शायद ही कोई एक व्यक्ति होगा तो जीवन पर्यन्त उस उपकार को याद रखेगा, अन्यथा लगभग सभी &#8216;उपकृत लोग&#8217; अवसर मिलने पर &#8216;उपकार करने वाले&#8217; को छिटकिनी लगाने, पटकने में पीछे नहीं रहता है। बिहार में इसका अनेकानेक दृष्टान्त मिलेगा। पटकने की क्रिया कहीं भी हो सकती है। राजनीति में तो पूछिए ही नहीं और इसका सबसे बड़ा दृष्टान्त &#8216;जार्ज फर्नांडिस&#8217; साहब हैं। आज हमारे बीच नहीं हैं, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें। लेकिन इतिहास तो इतिहास है। जॉर्ज फर्नांडिस को बाबू लंगट सिंह के पौत्र बाबू दिग्विजय नारायण सिंह मुजफ्फरपुर में तनिक &#8216;राजनीतिक जगह क्या दिए&#8217;, सन 1980 के आम चुनाव में फर्नांडिस साहब बाबू दिग्विजय नारायण सिंह पर ही निशाना साध दिए। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1.png" alt="" width="640" height="480" class="alignleft size-full wp-image-4025" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1.png 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1-300x225.png 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a></p>
<p><strong>बाबू दिग्विजय नारायण सिंह लगभग तीन दशक तक भारतीय संसद के निचले सदन में मुजफ्फरपुर, पुपरी, हाजीपुर, वैशाली का प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे। लेकिन तत्कालीन जनता पार्टी (सोशलिस्ट) नेता जॉर्ज फर्नांडिस का शिकार हो गए और महज 6000 मतों से सं 1980 के आम चुनाव में हार गए। सं 1980 तक मुजफ्फरपुर ही नहीं, देश के सभी विधान सभा, लोक सभा संसदीय क्षेत्रों के मतदाताओं का मानसिक स्वरुप में बदलना प्रारम्भ हो गया था। यह अलग बात थी कि जिस समय बाबू दिग्विजय नारायण सिंह के दादाजी का देहांत हुआ था (1912), भारत में एक अमेरिकन डालर की कीमत 0.09 थी। लेकिन जिस समय बाबू दिग्विजय सिंह चुनाव हारे थे, लोगों की मानसिकता क्या, अमेरिकन डॉलर की तुलना में भारतीय रुपयों की कीमत भी काफी लुढ़क गई थी और एक अमेरिकन डालर के बदले 7.86 भारतीय रुपये देने होते थे। आज की स्थिति तो पूछें ही नहीं। बड़े-बड़े समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, गणितज्ञ ज्ञान अर्जित करने के लिए भारतीय चौराहों पर बैठे हैं और समाज के चापलूस-चाटुकार सोने के सिक्के निगल रहे हैं, बिना डकारे। खैर।</strong> </p>
<p>दिग्विजय नारायण सिंह सन 1952 से 1980 तक 28 लगातार वर्ष सांसद रहे। वे सन 1952 से 1957 (मुजफ्फरपुर), 1957-1962 पुपरी, 1962-1971 मुजफ्फरपुर, 1971-1977 हाजीपुर और 1977-1980 वैशाली लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किये थे। लेकिन जिस जॉर्ज फर्नांडिस को आपातकाल के बाद दिग्विजय नारायण सिंह ने बिहार की राजनीति में मार्ग दर्शन किये, सं 1980 के आम चुनाव में मुजफ्फरपुर में उन्ही के विरुद्ध खड़े होकर 6000 मतों से शिकस्त दे दिया। </p>
<p>उस समय के राजनीतिक समीक्षक आज भी इसे &#8216;विश्वासघात&#8217; मानते हैं। सं 1980 चुनाव की &#8216;हार&#8217; उन्हें अंदर से झकझोड़ दिया। जिस व्यक्ति ने, जिसके पिता, पितामह और परिवार के अन्य सदस्य मुजफ्फरपुर ही नही, बल्कि गंगा के उस पार के इलाके में शिक्षा के माध्यम से एक क्रांति लाये थे, वह व्यक्ति ही उस क्रांति का शिकार हो गया। परिणाम यह हुआ कि बाबू दिग्विजय नारायण सिंह राजनीति से संन्यास ले लिए और सं 1980 आम चुनाव के 11-वर्ष होते-होते अपनी अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकल गए। </p>
<p><strong>लोग माने अथवा नहीं। लेकिन सत्य तो यही है कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से बिहार की राजनीतिक गलियारे में जिस तरह कुकुरमुत्तों की तरह राजनेताओं का जन्म हुआ, वे सभी विगत चार दशकों में बिहार को ध्वस्त ही नहीं, विध्वंस की ओर उन्मुख कर दिया &#8211; चाहे गंगा के इस पार का आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, बौद्धिक इत्यादि वातावरण हो अथवा गंगा के उस पर का। चाहे मध्य बिहार का इलाका को या फिर बाबा विश्वनाथ की नगरी देवघर-भागलपुर-सुल्तानगंज का &#8211; विध्वंस चतुर्दिक है और विकास रसातल में विलीन हो गया है। </strong></p>
<p>आज बिहार में महज &#8216;वोट की राजनीति&#8217; होती है। किसी भी राजनेता को, चाहे पंचायत के स्तर के हों, जिला के परिषदों में बैठे हों, प्रदेश के विधानसभा या विधान परिषद में बैठे हों या फिर दिल्ली के संसद में कुर्सी तोड़ रहे हों; प्रदेश के विकास के प्रति रत्तीभर चिंता नहीं है। यह विकास चाहे आर्थिक हो या शैक्षिक। आज अगर प्रदेश के सभी शैक्षिक संस्थाओं को बंद कर &#8216;राजनीतिक पाठशाला, विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय खोल दिया जाय तो यकीन मानिये इन नव-निर्मित राजनीतिक शैक्षिक संस्थाओं में क्या बच्चा, क्या बुढ़ा, क्या महिला, क्या पुरुष सभी पंक्तिबद्ध हो जायेंगे क्योंकि स्वहित की चिंता अधिक है, &#8216;सामाजिक हित&#8217; की तुलना में। </p>
<figure id="attachment_4026" aria-describedby="caption-attachment-4026" style="width: 750px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Langatsingh.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Langatsingh.jpeg" alt="" width="750" height="938" class="size-full wp-image-4026" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Langatsingh.jpeg 750w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Langatsingh-240x300.jpeg 240w" sizes="auto, (max-width: 750px) 100vw, 750px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4026" class="wp-caption-text">आदरणीय श्री लंगट सिंह</figcaption></figure>
<p>डॉ प्रगति कुमार सिंह के प्रत्येक शब्द उनकी अन्तः वेदना को बता रही थी। सहस्त्र फांकों में फटे ह्रदय की आवाज, वेदना, संवेदना को दर्शा रहा था। बाबू लंगट सिंह के पौत्र बाबु दिग्विजय नारायण सिंह दो पुत्रों है &#8211; श्री अलख कुमार सिंह और डॉ प्रगति कुमार सिंह । डॉ सिंह का किसी भी राजनीतिक दल से या राजनीति से सम्बन्ध नहीं है। चिकित्सा के क्षेत्र में विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त करने के बाद डॉ प्रगति कुमार सिंह पटना में रेडियोलॉजी के एक विख्यात डॉक्टर हैं। आज अपने, अपने पिता का, अपने दादा का, अपने परदादा के प्रदेश को, जिसे वे अपने खून-पसीने से सींचे थे, वर्तमान दशा को देखकर विह्वलित हो गए। </p>
<p>बहरहाल, हाजीपुर मुजफ्फरपुर रेल खण्ड के सराय स्टेशन से 5 किमी पश्चिम वैशाली जिले के धरहरा ग्राम के गोउनाइत् मूल के भूमिहार ब्राह्मण किसान बाबू बिहारी सिंह के पुत्र के रूप में लंगट सिंह का जन्म 10 अक्टूबर सन 1850 के अश्विन माह में हुआ। इनके दादा उजियार सिंह पढ़े लिखे किसान थे। गांव में कोई स्कूल नही होने की वजह से उनकी शिक्षा प्राइमरी तक हुई और सम्भवतः 15-16 वर्ष में ही उनकी शादी हो गई। लंगट सिंह  के परिवार के पास कोई ज्यादा भूमि नही थी जिस वजह से लंगट सिंह आजीविका के लिये समस्तीपुर आ गए।उन दिनों समस्तीपुर- दरभंगा रेल लाइन का काम चल रहा था, वहाँ इनको रेल पटरी के बगल में टेलीफोन लाइन में लाइनमैन का काम मिल गया। रेल लाइन का काम कर रहे अंग्रेज अभियंता जेम्स विल्सन इनके काम के लगन से प्रभावित होकर इनको मजदूरों का सुपरवाइजर बना दिया और लंगट सिंह जेम्स साहब के साथ दरभंगा में रहने लगे।</p>
<p>कहा जाता है कि जेम्स साहब की पत्नी की बहन मुजफ्फरपुर रहती थी जिसके पति विलियम विल्सन मुजफ्फरपुर के निलहे जमींदार थे। उन दिनों मुजफ्फरपुर-दरभंगा टेलीफोन से ज़ुरा हुआ नहीं था, जिस वजह से जेम्स साहब की पत्नी का जरूरी पत्र लेकर लंगट सिंह पैदल मुजफ्फरपुर आये और 18 घंटे में जवाब लेकर लौट आये। जेम्स साहब की पत्नी लंगट सिंह को काफी मानने लगी और लंगट सिंह को अंग्रेजी लिखना बोलना सिखाई। जेम्स साहब से पैरवी कर दरभंगा- नरकटियागंज रेल लाइन निर्माण में ठेकेदारी दिलवा दी और लंगट सिंह मजदूर से ठेकेदार हो गए। इस बीच रेल लाइन निर्माण के क्रम में ट्राली से जाते समय लंगट सिंह का ट्राली मालगाड़ी से टकरा गया जिसके चलते इनको अपना एक पैर गवाना पड़ा। लेकिन लंगट सिंह ने हार नहीं मानी और न अंग्रेज जेम्स ने लंगट बाबु का साथ छोड़ा। ठेकेदार के काम में इनके लड़के श्यामानन्द प्रसाद सिंह उर्फ आनन्द बाबू सहयोग देने लगे। </p>
<p>दरभंगा से जेम्स साहब कलकत्ता महानगर निगम के अभियंता बनकर कलकत्ता आ गए तब जेम्स दम्पति के अनुरोध पर लंगट सिंह भी अपने पुत्र आनन्द बाबु के साथ 1880 के लगभग कलकत्ता आ गए और कलकत्ता महानगर निगम  में ठेकेदारी करने लगे। ठेकेदार और काम में ईमानदारी के लिये लंगट सिंह का नाम आदर के साथ लिया जाता था। मैकडोनाल्ड बोर्डिंग हाउस के निर्माण के दौरान लंगट सिंह का पंडित मदन मोहन मालवीय से सम्पर्क हुआ। मालवीय जी के अलावे वहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, ईश्वरचंद विद्यासागर, सर आशुतोष बनर्जी से भी सम्पर्क हुआ।</p>
<p>इन महापुरुषों के सम्पर्क में आने के बाद लंगट सिंह का झुकाव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ओर हो गया। लंगट सिंह स्वदेशी के समर्थक हो गए। कलकत्ता में स्थापित प्रथम स्वदेशी बिक्री केंद्र, स्वदेशी स्टोर, बंग कॉटन मिल्स के लंगट सिंह भी एक निर्देशक थे।लंगट सिंह ने मुजफ्फरपुर में भी पहला स्वदेशी तिरहुत स्टोर खुलबाया। सन 1890 के आस-पास लंगट सिंह को मुजफ्फरपुर जिला परिषद के अंदर भी बड़े- बड़े कार्यो का ठेका मिलना शुरू हो गया। मुजफ्फरपुर में जो आज सुतापट्टी है, वहां से कल्याणी तक लंगट सिंह ने करीब 50 बीघा जमीन खरीदी तथा बहुत से मौजे की जमींदारी भी खरीदी।</p>
<p>1886 में संपन्न कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में कलकत्ता प्रवास के दौरान मदन मोहन मालवीय और अन्य विद्वानों के सानिध्य में लंगट सिंह ने देश दुनिया का ज्ञान अर्जित किया और अपना समय समाज सेवा में देने लगे और लंगट सिंह ने कांग्रेस के कलकत्ता महाधिवेशन में भाग लिया। फिर, सं 1895 में मालवीय जी के अनुरोध पर लंगट सिंह भूमिहार ब्राह्मण महासभा में पहली बार बनारस में सम्मिलित हुई । काशी नरेश की अध्यक्षता में हुई इस महासभा में तमकुही नरेश, दरभंगा महाराज, हथुआ महाराज, टेकारी महाराज, माझा स्टेट सहित भूमिहार जमींदार  सम्मिलित हुए। </p>
<p>महासभा में मालवीय जी के प्रयास से बनारस में हिन्दू विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव पास हुआ। सभी राजाओं ने चंदा देने की बात कही लेकिन जब चंदा के रूप में लंगट सिंह ने एक लाख टका की अपनी बोरी रखी तो सभी चकित हो गए की एक बैसाखी से चलने वाला साधारण व्यक्ति इतना बड़ा चंदा दे सकता है तब मालवीय जी ने लंगट सिंह का सभा मे परिचय कराया। उक्त महासभा में लंगट सिंह को काफी सम्मान मिला। सभा में ही लंगट सिंह को मुजफ्फरपुर में भी कॉलेज खोलने का विचार आया और लंगट सिंह ने इसी उद्देश्य से मुजफ्फरपुर में भूमिहार-ब्राह्मणों की सभा बुलाने का काशी नरेश से आग्रह किया जिसे सभा ने स्वीकार किया।</p>
<figure id="attachment_4027" aria-describedby="caption-attachment-4027" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College.jpeg" alt="" width="2048" height="1156" class="size-full wp-image-4027" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College-1024x578.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College-768x434.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/LS-College-1536x867.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4027" class="wp-caption-text">लंगट सिंह कॉलेज का दृश्य</figcaption></figure>
<p>बाबू लंगट सिंह के प्रयास से जनवरी 1899 में भूमिहार-ब्राह्मण सभा का मुजफ्फरपुर में अधिवेशन हुआ जिसमें काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह, दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह, तमकुही नरेश, हथुआ महाराज, टेकरी नरेश, माझा स्टेट के अलावे मुजफ्फरपुर के आस पास के सभी जमींदार और विद्वान जन सम्मिलित हुए। महासभा में लंगट सिंह द्वारा मुजफ्फरपुर में डिग्री कॉलेज खोलने के प्रस्ताव को महासभा द्वारा पास किया गया और कॉलेज निर्माण के लिये सभी ने चंदा देना स्वीकार किया। </p>
<p>महासभा की समाप्ति के बाद हथुआ महाराज और दरभंगा महाराज ने मुजफ्फरपुर में कॉलेज खोले जाने को लेकर बाबू लंगट सिंह को सहयोग नहीं दिया क्योंकि दरभंगा महाराज  दरभंगा में कॉलेज खोलने चाहते थे जबकि हथुआ महाराज छपरा में, जिस वजह से लंगट सिंह को परेशानी होने लगी। तब लंगट सिंह ने मुजफ्फरपुर के सभी जमींदारों की मुजफ्फरपुर में बैठक बुलाई, जिसमें सभी ने मुजफ्फरपुर में हाई स्कूल के साथ कॉलेज खोलने का प्रस्ताव दिया, क्योंकि मुजफ्फरपुर में जो जिला स्कूल था जिसमें गरीब बच्चों का प्रवेश नहीं हो पाता था। इस बैठक में हाई स्कूल और कॉलेज खोलने और उसका खर्च और संचालन का जिम्मेवारी उठानेवाले एक 22 सदस्यों की प्रबन्ध समिति गठित की गई जिसमे बाबू लंगट सिंह के अलावे शिवहर नरेश शिवराज नन्दन सिंह, हरदी के जमींदार बाबू कृष्ण नारायण सिंह, जैतपुर स्टेट के रघुनाथ दास, यदुनन्दन शाही, महंत प्रमेश्वर नारायन, महंत द्वारिक नाथ, योगेंद्र नारायन सिंह थे। इसी बैठक में बाबू लंगट सिंह ने स्कूल और कॉलेज खोलने के लिए अपनी सरैयागंज वाली 13 एकड़ जमीन दान दे दिया ।</p>
<p>बाबू लंगट सिंह के नेतृत्व में गठित प्रबन्ध समिति के सदस्यों द्वारा 3 जुलाई 1899 को सरैयागंज में बाबू लंगट सिंह द्वारा दी गई भूमि 13 एकर भूखंड में भूमिहार ब्राह्मण कॉलेजिएट स्कूल और भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज की नींव रखते हुए शुभारम्भ किया और 2 माह के अंदर ही छात्रों को पढ़ने के लिए कमरा तैयार हो गया और शिक्षकों की व्यवस्था कर पढ़ाई चालू हो गई । बाबू लंगट सिंह के प्रयास से सन 1900 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से कॉलेज को प्री-डिग्री कॉलेज के रूप में मान्यता मिल गई और बाद में लंगट सिंह के मित्र और सहयोगी जेम्स साहब के सहयोग से कॉलेज को डिग्री तक मान्यता मिल गई।</p>
<p>सन 1906 में बाबू लंगट सिंह कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लेने गए जहाँ उनकी मुलाकात बाबू राजेन्द्र प्रसाद से हुई और लंगट सिंह ने राजेन्द्र प्रसाद को कॉलेज में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया और राजेंद्र प्रसाद सन 1908 में प्रोफेसर के रूप में कॉलेज में आ गए। सन 1909 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि कॉलेज निरीक्षण के लिये मुजफ्फरपुर आया और विश्वविद्यालय प्रतिनिधिने एक ही कैम्पस मे स्कूल और कॉलेज और छोटे छोटे कमरों में छात्रों की पढ़ाई की व्यवस्था पर भड़क गया और प्रबन्ध समिति को धमकी दिया की कॉलेज के लिये अलग जमीन और भवन की व्यवस्था नही हुई तो कॉलेज की मान्यता खत्म हो जायेगी ।</p>
<p>जिसके बाद बाबू लंगट सिंह और प्रबन्ध समिति के सदस्यों ने खबरा के जमींदार के सहयोग से दामू चक और कलमबाग चौक के बीच 22 एकर जमीन खरीद किया और इस भूमि में 1911 से कॉलेज के लिए मकान बनना शुरू हुआ इसी बीच 15 अप्रैल 1912 को बाबू लंगट सिंह का स्वर्गवास हो गया। उनकी मृत्यु के बाद लगा की कॉलेज का काम ठप हो जायेगा लेकिन लंगट बाबू के पुत्र अनन्दा बाबू ने अपने पिता द्वारा शुरू किये गए इस कॉलेज के भवन का कार्य पूरा करवाया और कॉलेज अपने नए भवन में 1915 में आ गया। </p>
<p>सन 1915 में सरकार ने इस कॉलेज को अपने हाथों में ले लिया और इस कॉलेज के विकास में तिरहुत कमिश्नर  ग्रीयर साहब ने लंगट बाबू की मृत्यु के बाद काफी सहयोग किया जिस वजह से कॉलेज के नाम के आगे ग्रीयर का नाम भी जोड़ा गया और कॉलेज का नाम ग्रीयर भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज हो गया और बाद में इस  कॉलेज का नाम लंगट सिंह कॉलेज हो गया और पटना विश्वविद्यालय के गठन के बाद लंगट सिंह कॉलेज 1917 में पटना विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गया ।</p>
<p>बाबू लंगट सिंह के सम्बन्ध में समाज में यह भ्रांति है कि वे अनपढ़ थे। यह सही है कि वे किसी स्कूल कॉलेज में नहीं पढ़े ।बचपन में वे सिर्फ प्राइमरी तक पढ़ना- लिखना सीख सके, लेकिन कार्य के दौरान अपने स्वाध्याय के बल पर अंग्रेजी, बंगला और हिंदी का अध्ययन किया। यदि लंगट बाबू अनपढ़ होते तो कलकत्ता के विद्वतजन और मालवीय जी या अंग्रेज अधिकारी से उनका संपर्क होना मुश्किल था। बाबू लंगट सिंह को 7 दिसंबर 1910 में हुई इलाहाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में मुजफ्फरपुर का प्रतिनिधि निर्वाचित किया गया। इलाहाबाद कुंभ में धर्म संसद द्वारा बाबू लंगट सिंह को बिहार रत्न से सम्मानित किया गया साथ ही, इंग्लैंड के राजा द्वारा लंगट बाबू को बिहार का शिक्षा स्तम्भ घोषित किया गया।</p>
<p>मुजफ्फरपुर जिले का रैनी स्टेट का शाहू परिवार में सबसे धनी घराना था। कुछ मुकदमो के दौरान लंगट बाबू के परिवार के जमीन संबंधी केवला दस्तावेज 1900 से 1917 के बीच का देखने का मुझे मौका मिला, जिसमें कई एक दस्तावेज लंगट बाबू के लड़के अनन्दा बाबू और रैनी स्टेट के वारिसों के संयुक्त नाम में है। लोगो ने बताया कि रेल की ठेकेदारी या अन्य जगहों की ठेकेदारी में लंगट सिंह को पैसा रैनी स्टेट से मिलता था यानी लंगट बाबू के परिवार का रैनी स्टेट से व्यावसायिक सम्बन्ध था ।</p>
<p>अनन्द बाबू शुरू से ही अपने पिता की ठेकेदारी का काम देखते थे। उनके पिता का अंग्रेज अधिकारी और गवर्नर जनरल तक नाम आदर के साथ लिया जाता था और अनन्दा बाबू का भी उनसे सम्बन्ध अच्छा था। पिता की जिंदगी से ही अनन्दा बाबु कॉलेज का काम देखते आए और पिता की मृत्यु के बाद अनन्दा बाबू ने अपने पिता द्वारा शुरू किये गए कॉलेज को भव्य बनाने के उद्देश्य से अपने अंग्रेज मित्र से सम्पर्क किया और इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वेलियोल कॉलेज के भवन के समान कॉलेज भवन बनाने के लिये प्रयास शुरू किया। वर्तमान में जो लंगट सिंह कॉलेज का भवन है वह 1912 में बनना शुरू हुआ जिसका उद्घाटन 22 जुलाई, 1922 को राज्य के गवर्नर द्वारा किया गया और अनन्दा बाबू के प्रयास से कॉलेज को सरकार ने ले लिया।</p>
<p>इस तरह अनन्दा बाबू ने अपने पिता द्वारा शुरू कॉलेज को पूर्णता और भव्यता प्रदान किया।अनन्दा बाबू ने अपने गांव में एक हाई स्कूल के अलावे कई संस्था का निर्माण किया। अनन्दा बाबु देश के स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों को आर्थिक सहयोग दिया करते थे। फणीन्द्र नाथ घोष हत्या में फंसे क्रांतिकारी बैकुंठ शुक्ल और उनके साथियों को बचाने के लिये प्रिवी कौंसिल तक कानूनी खर्च किये। आज अनन्दा बाबु द्वारा समाज के लिए किया गये उनके कार्यो को लोग भुला चुके है तथा नई पीढ़ी को उनके बारे में कोई जानकारी भी नहीं है।</p>
<p>बाबू लंगट सिंह के पौत्र बाबु दिग्विजय नारायण सिंह राजनीतिक संत हुए 1930 में कांग्रेस से जुड़े और आजादी के बाद सन 1952 से 1980 तक कुल 28 वर्ष तक लगातार मुजफ्फरपुर और वैशाली से सांसद रहे ।1980 में चुनाव हारने के बाद चुनावी राजनीति से संन्यास ले लिया। दिग्विजय बाबू ने समाज सेवा में अपने पुरखों की संपत्ति बेच कर लगा दिया। सं 1952 में बिहार विश्वविद्यालय के लिये करीब 70 बीघा जमीन दान दे दी । अलख कुमार सिंह और उनकी पत्नी नीलम सिंह जी द्वारा धरहरा दरबार के प्रवेश द्वार पर बाबू लंगट सिंह की प्रतिमा स्थापित होने को है।</p>
<p>अंततः, प्रख्यात समाजसेवी बाबू लंगट सिंह द्वारा स्थापित अनेक शिक्षण संस्थाओ की श्रृंखला में लंगट सिंह महाविद्यालय एक प्रमुख माना जाता है। सं 1899 में स्थापित यह महाविद्यालय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आंदोलनकारियों का केंद्र बिंदु था।डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रथम राष्ट्रपति इसके संस्थापक प्राध्यापकों में से एक थे। महात्मा गांधी चंपारण आंदोलन के क्रम में ड्यूक हॉस्टल में ठहरे थे तथा सुबह में आम जनता और विद्यार्थियों के सामने संकल्प लिया था &#8211; किसानों को मुक्त करने का। इसी महाविद्यालय के प्राध्यापक आचार्य जे .बी.कृपलानी स्वतंत्रता के समय कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। आचार्य मलकानी, जो उस समय ड्यूक हॉस्टल के वार्डन थे। रामधारी सिंह दिनकर इसी महाविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक थे तथा यही से राज्यसभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होकर संसद पहुंचे थे। कहा जाता है की ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कृति उर्वशी का अधिकांश हिस्सा उन्होंने यही लिखा था। </p>
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		<title>मिथिला की महिलाओं से अपील: पारिवारिक कार्यों के बाद आप अपना अतिरिक्त समय &#8216;मातृभाषा&#8217; को मजबूत करने में दें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Feb 2022 10:36:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>रांची / दरभंगा / पटना :  प्रतिभा और संवेदना &#8212; &#8220;मिथिला&#8221; की यह दो खास देन है। मिथिलांचल से आने वाली प्रतिभाओं की कमी नहीं है। मिथिला की प्रतिभाएं आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी खास पहचान बना चुकी है। लेकिन मिथिलांचल से आने वाली अधिकांश महिलाओं की प्रतिभाओं सहित अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की महिलाओं से [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रांची / दरभंगा / पटना :  प्रतिभा और संवेदना &#8212; &#8220;मिथिला&#8221; की यह दो खास देन है। मिथिलांचल से आने वाली प्रतिभाओं की कमी नहीं है। मिथिला की प्रतिभाएं आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी खास पहचान बना चुकी है। लेकिन मिथिलांचल से आने वाली अधिकांश महिलाओं की प्रतिभाओं सहित अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की महिलाओं से (पुरुष की तुलना में) हम आम तौर पर अपरिचित हैं। मिथिला की महिलाओं से अनुरोध है कि पारिवारिक (घरेलू) कार्यों के बाद यदि आप या आपके परिवार की अन्य महिला सदस्य अतिरिक्त समय में खाली बैठती हैं तो इस खाली समय में &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; को अपनी अवैतनिक सेवा देकर स्वयं को व्यस्त रखें तथा अपनी प्रतिभा व क्षमता के प्रदर्शन से मैथिली को राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में भरपूर सहयोग करें।</strong></p>
<p>अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद, केन्द्रीय समिति, बिहार के संरक्षक, राष्ट्रीय शैक्षिक महोत्सव सह पटना-राॅ॑ची पुस्तक मेला के संस्थापक और नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के प्रबंध निदेशक नरेन्द्र कुमार झा ने लिखा है कि सोमवार दिनांक 7 फरवरी, 2022  को प्रोफेसर शांति श्री धूलिपुडी़‌ पंडित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली की कुलपति नियुक्त की गई है। उन्हें जेएनयू पहली महिला कुलपति बनने का भी गौरव मिला है। उनका कार्यकाल 5 वर्ष होगा। वह अभी महाराष्ट्र के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय, पुणे के राजनीति व लोक प्रशासन विभाग में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर थीं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा रहीं शांति श्री ने 1986 में यहीं से एमफिल और 1990 में पीएचडी की थी। तमिलनाडु से सम्बन्ध रखने वाली‌‌ जेएनयू की पूर्व छात्रा को यह जिम्मेदारी सौंपने के लिए प्रधानमंत्री का आभार है। उन्होंने कार्यभार संभाल लिया है।</p>
<p>झा ने लिखा है कि हमेशा नहीं लेकिन कभी-कभार ही हमें महिलाओं की प्रतिभा व क्षमता का उदाहरण मिल पाता है हालांकि मिथिला के धरती की अधिकांश महिलाएं  प्रतिभासम्पन्न होती हैं। इसका मूल कारण यह है कि मिथिला की परम्परागत संस्कृति के कारण अधिकांश महिलाओं की प्रतिभा व क्षमता का प्रदर्शन विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न विषयों पर नहीं हो पाता है। ले-देकर उनके लिए मात्र शिक्षण का ही क्षेत्र बचता है जिसमें वे अपनी प्रतिभा व क्षमता का प्रदर्शन अपनी परम्परागत संस्कृति का निर्वाह करते हुए कर सकें। लेकिन महाविद्यालयों में उनकी लगभग 6 घंटे तक उपस्थिति की अनिवार्यता के फलस्वरूप अधिकांश महिलाएं शिक्षण कार्य के साथ-साथ अपने पारिवारिक (घरेलू) कार्य में समुचित समय नहीं दे पातीं हैं जिसके कारण कतिपय अन्य विषयों के संघर्षों हेतु प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी महिलाओं का कम प्रतिशत ही इस क्षेत्र में भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है।</p>
<figure id="attachment_3782" aria-describedby="caption-attachment-3782" style="width: 638px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp.jpg" alt="" width="638" height="638" class="size-full wp-image-3782" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp.jpg 638w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 638px) 100vw, 638px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3782" class="wp-caption-text">अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद, केन्द्रीय समिति, बिहार के संरक्षक, राष्ट्रीय शैक्षिक महोत्सव सह पटना-राॅ॑ची पुस्तक मेला के संस्थापक और नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के प्रबंध निदेशक नरेन्द्र कुमार झा</figcaption></figure>
<p>हमारे विचार से &#8216;मैथिली भाषा संघर्ष समिति&#8217; के स्थान पर &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; नामकरण माध्यम से हम महिलाओं व विभिन्न क्षेत्रों के आम नागरिक से भी अभूतपूर्व सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ तक झारखंड में अपनी मातृभाषा की सफलता का प्रश्न है इसमें बिहार-झारखंड की अधिक से अधिक महिलाओं की एकजुटता को शामिल करना तो अति आवश्यक है ही। हमें पूरा विश्वास है कि बिहार व झारखण्ड में प्रतिभाओं की उर्वरक धरती मिथिला से आई महिलाओं के सहयोग से असम्भव को सम्भव किया जा सकता है। एक ओर जहाँ शिक्षण-प्रशिक्षण विषय पर इन प्रतिभासम्पन्न महिलाओं की क्षमता का प्रदर्शन किसी भी महाविद्यालय को श्रेष्ठता प्रदान कराता है वहीं दूसरी ओर झारखण्ड में मातृभाषा की अनिवार्यता विषय पर भी सहयोगी महिलाओं की क्षमता का प्रदर्शन हमें सफलता प्रदान करेगा।<br />
 <br />
<strong>हम विशेषकर बिहार-झारखंड के मिथिलांचल क्षेत्र के उन आम नागरिकों की एकजुटता से ही अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं जो मूलतः बिहार के ही हैं हालांकि वे अब नए प्रदेश झारखंड के आजीवन वासी  हैं। कार्य कठिन है लेकिन असंभव नहीं। मिथिला की प्रतिभा ही इस कार्य को सम्भव कर सकती है।</strong></p>
<p>उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हम अनुरोध करते हैं कि पारिवारिक (घरेलू) कार्यों के बाद यदि आप या आपके परिवार की अन्य महिला सदस्य अतिरिक्त समय में खाली बैठती हैं तो इस खाली समय में &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; को अपनी अवैतनिक सेवा देकर स्वयं को व्यस्त रखें तथा अपनी प्रतिभा व क्षमता के प्रदर्शन से मैथिली को राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में भरपूर सहयोग करें। हम आपसे आग्रह करते हैं कि बिहार-झारखण्ड की उन महिलाओं का भी नाम, मोबाइल नंबर व डाक पता आदि ह्वाट्सएप करने का कष्ट करें ताकि उन्हें  अविलम्ब &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; समूह में शामिल किया जा सके। महिलाओं के इस समूह हेतु एक &#8220;संचालन समिति&#8221; का निर्माण भी अति आवश्यक है।<br />
 <br />
अन्ततः हम समझते हैं कि मिथिला की पहचान बनाने की संवेदना आप में अवश्य होगी। अतः हम जिस सहयोग की अपेक्षा रखते हैं वह नि:संदेह आप अपनी मातृभाषा को देंगी। हमें आपकी सहभागिता आपके खाली समय में ही चाहिए।‌ समय आप अपनी सुविधानुसार जो भी देना चाहें, हमें स्वीकार्य होगा।  आपके समूह की प्रतिभा हमें मातृभाषा के स्तर को बरकरार रखने में जहाँ एक ओर मदद करेगी, वहीं दूसरी ओर किसी भी अन्य सामूहिक संघर्ष में भी आप सहयोगी बनने में आकर्षित होंगी। </p>
<figure id="attachment_3783" aria-describedby="caption-attachment-3783" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1.jpg" alt="" width="640" height="640" class="size-full wp-image-3783" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3783" class="wp-caption-text">डॉ धनाकर ठाकुर</figcaption></figure>
<p><strong>उधर, </strong>विगत 8 फरवरी को गूगल मीटिंग आयोजन के द्वारा  तिरहुत मित्र मंडल का  स्थापना  दिवस मनाया गया जो उसी दिन 2011 में रांची में स्थापित हुआ था। मीटिंग की अध्यक्षता डॉ धनाकर ठाकुर ने की । उन्होंने कहा की अब इसे दिल्ली समेत सभी महानगर में संगठित किया जायेगा ताकि मिथिला राज्य और मैथिली भाषा का प्रचार संगठित रूप से इस क्षेत्र में हो जिसके बिना मिथिला राज्य एवं मैथिली भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती है। मिथिलाक्षर का पहिला शिलालेख यहीं नरकटियागंज निकट सहोदरा गाँव में मिला है जो दशवीं सदी का है।</p>
<p>उन्होंने कहा क़ि तिरहुत क्षेत्र वह है जहाँ ब्राह्मण त्रिकाल संध्या करते थे जो गुरु गोलवलकर का मत है वैसे बिहार में गंगा का उत्तरी भाग तिरहुत क्षेत्र कहा जाता है जो नदी के किनारे सामान्य अर्थ में है। तुर्क-अफगान काल में तिरहुत स्वतंत्र प्रशासनिक ईकाई बना जो बंगाल राज्य के  अंतर्गत था। गंगा, गंडक तथा कोशी नदी  से घिरा सघन आबादी वाला मैदानी हिस्सा सन 1856 तक बंगाल प्रांत में भागलपुर प्रमंडल का अंग था। संथाल विद्रोह के पश्चात तिरहुत को पटना प्रमंडल में मिला दिया गया।</p>
<p>सन् 1875 में बंगाल से अलग होकर मुजफ्फरपुर एवं दरभंगा नामक दो जिला में बँट गया । 1875 में दरभंगा को तिरहुत से अलग कर स्वतंत्र जिला बना दिया गया। 19 वीं सदी के उत्तरार्द्धमें इस क्षेत्र मे अकाल पड़ने के बाद बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंड्रू फ्रेजर ने तिरहुत को अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की आवश्यकता का अनुभव किया। जनवरी 1908 में भारत के गवर्नर जनरल की मंजूरी पश्चात तिरहुत प्रमंडल बनाया गया जिसमें सारण, चंपारण, मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा जिला रख मुजफ्फरपुर मुख्यालय बनाया गया। ब्रिटिश भारत में सन 1908 में जारी एक आदेश के तहत तिरहुत पटना से अलग प्रमंडल बना ।</p>
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		<title>पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Sep 2021 11:35:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[1974]]></category>
		<category><![CDATA[dakbungalow]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
		<category><![CDATA[jp]]></category>
		<category><![CDATA[movement]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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		<category><![CDATA[rajiv]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : सत्तर के दशक में पटना में डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर स्थित सत्कार होटल के नीचे खड़ा होना, उस विशाल भवन के सतही-तल्ले पर बाएं तरफ रीडर्स कॉर्नर से किताब, दिल्ली वाला अखबार, पत्रिका खरीदना; इस भवन से कोई दस कदम आगे चलकर भारत कॉफी हॉउस में मसाला डोसा खाना या [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : सत्तर के दशक में पटना में डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर स्थित सत्कार होटल के नीचे खड़ा होना, उस विशाल भवन के सतही-तल्ले पर बाएं तरफ रीडर्स कॉर्नर से किताब, दिल्ली वाला अखबार, पत्रिका खरीदना; इस भवन से कोई दस कदम आगे चलकर भारत कॉफी हॉउस में मसाला डोसा खाना या कॉफी पीना पटना के तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में &#8220;गर्व&#8221; और &#8220;गौरव&#8221; की बात होती थी। उसी सड़क पर स्टेशन की ओर कोई 500 कदम आगे पिंटू होटल की &#8216;ब्रुक-बॉन्ड पत्ती&#8221; की चाय और &#8220;सफ़ेद सगुल्ला&#8221; मगध की राजधानी की गरिमा में गिनी जाती थी। अगर पतलून के पिछवाड़े वाले जेब में, अथवा देशी-विदेश बटुआ में, भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर लक्ष्मीकांत झा द्वारा हस्ताक्षरित कागज के टुकड़ों की मोटाई होती थी; तो डाक बंगला रोड चौराहे से दाहिने हाथ एग्जिविशन रोड की ओर जाने वाली सड़क के ठीक बाएं कोने पर स्थित लखनऊ स्वीट हॉउस या इस दूकान के प्रवेश द्वार से 135 डिग्री कोण पर स्थित पाल स्वीट्स की दूकान से सफ़ेद रसगुल्ला या छेना वाला कोई भी मिठाई खाने, या फिर उसे बंधवाकर घर, परिवार, परिजनों, मित्रों के लिए ले जाना &#8211; सामाजिक संभ्रांतों की सूची में सबसे ऊपर नाम दर्ज होता था। लोग बाग़ डब्बे पर लिखा नाम देखकर ही कुर्सी आगे कर देते थे। </strong></p>
<figure id="attachment_3381" aria-describedby="caption-attachment-3381" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3381" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3381" class="wp-caption-text">चंद्रशेखर का नमन स्वीकार करें जय प्रकाश जी</figcaption></figure>
<p>यह अलग बात थी कि उन दिनों भी बेली रोड स्थित डॉ जगन्नाथ मिश्र वाले इण्डियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ बिजनेस एंड पर्सनल मैनेजमेंट शैक्षणिक ससंस्थान के दाहिने हाथ बोरिंग रोड चौराहे की ओर जाने वाली सड़क और चौराहे के दाहिने तरफ कोने पर भी पॉल स्वीट्स की दूकान हुआ करती थी; परन्तु डाक बंगला की बात ही कुछ और थी। उन दिनों घर के छोटे-छोटे बच्चे तो इस दूकान से मिठाई खा लेते थे, लेकिन जब &#8220;मिष्ठान&#8221; खाने की बात होती थी, तब क्या बोरिंग रोड, क्या बोरिंग केनाल रोड, क्या पाटलिपुत्र कालोनी, क्या राजवंशी नगर, क्या गर्दनीबाग &#8211; सभी डाक बंगला की ओर ही उन्मुख होते थे। डाक बंगला चौराहे की बात ही कुछ और थी। चाहे लखनऊ स्वीट हॉउस हो या पाल स्वीट्स, शीशे के अंदर रखी बेहतरीन मिष्ठानों की अधिकतम कीमत अठन्नी भी नहीं होती थी। छेना वाला सफ़ेद रसगुल्ला की कीमत महज 20 पैसे हुआ करता था। यह बात भी अलग थी कि पटना की आवादी सत्तर के दशक के प्रारम्भिक वर्षों से मध्य तक सात लाख भी नहीं थी, लेकिन तत्कालीन समाज के आम लोगों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की लखनऊ स्वीट हॉउस या पाल स्वीट्स से मिष्ठान खरीद पाते। औसतन एक हज़ार में पांच से दस लोग ही मिष्ठान खरीद पाते थे। शेष हम लोग जैसा व्यक्ति दो वक्त की रोटी, गुड़ और मसूर दाल के लिए उस दिन भी जेद्दोजेहद करते थे, आज भी करते हैं। अब सभी तो रामानंद तिवारी, डॉ जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार तो हो नहीं सकते। यह चौराहा कितने &#8220;कुकुरमुत्तों&#8221; की तरह &#8220;सफ़ेद-सफ़ेद&#8221; वस्त्र पहनने वालों को नेता बना दिया, तो वहीँ क्लिक-क्लिक करने वाले राष्ट्रीय स्तर के फोटोग्राफर बन गए। </p>
<figure id="attachment_3382" aria-describedby="caption-attachment-3382" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3382" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3382" class="wp-caption-text">सहरसा-मधेपुरा के लिए रवाना होने राजीव</figcaption></figure>
<p>संध्याकाल इधर घड़ी की सूई साढ़े पांच बजे घड़ी की बड़ी सूई छोटी सूई पर चढ़ाई करती थी, उधर पटना के संभ्रांत लोग, उनका परिवार सच-धज कर, इत्र-परफ्यूम छिड़ककर डाक बंगला चौराहे के इर्द-गिर्द दिखाई देने लगते थे। लखनऊ स्वीट हॉउस के तरफ ही एग्जिविशन रोड की ओर उन्मुख होने पर कुछ दुकानों के बाद एक दर्जी की दूकान थी। सिलाई दूकान में वस्त्र नापने वाले से लेकर सिलाई करने वाले तक, सभी पटना के अन्य सिलाई-दुकानों के कारीगरों से बिलकुल अलग होते थे। उनकी प्रतिष्ठा, शानो-शौकत वैसे ही हुआ करता था जैसे अनपढ़-गवाँर-जाहिल क़स्बा में एक सांस में दो से 19 तक पहाड़ा गिनने वाला। यहाँ पुरुषों के वस्त्रों की सिलाई नहीं होती थी। पुरुष कारीगर &#8220;महिलाओं के वस्त्रों&#8221; को सिलने में माहिर थे। </p>
<p>डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर &#8220;शंकर पानवाला&#8221; सुबह आठ बजे से देर रात 12 बजे तक सपरिवार सुबह पाली से लेकर दोपहर पाली के रास्ते रात्रि पाली तक अपनी &#8211; अपनी ड्यूटी बजाते थे। हंसमुख चेहरा बाप-बेटा सबों का। जो दूकान में काम भी करता था, उसकी मुस्कान भी मगही पान जैसा सुगन्धित होता था। उन दिनों पटना की पान खाने वाली संभ्रांत महिलाएं भी पान की दूकान पर कहीं-कहीं दिखती थी। अन्यथा वे भी सड़क और समाज का सम्मान करती थी, और सड़क तथा समाज भी उनका अन्तःमन से, ह्रदय से सम्मान करता था। जो रास्ता बेली रोड की ओर जाती थी, आगे कुछ कदम दाहिने हाथ एक पेट्रोल पम्प हुआ करता था और बाएं हाथ तत्कालीन डाक बंगला का बाउंड्री वाल होता था। इस बाउंड्री वाल पर पटना के लोग, नेतागण, रिक्शावाला, पैदल यात्री, छोटे-छोटे व्यापारी, जो सड़क पर अपने जूते रगड़ कर आगे बढ़ रहे थे, किसी भी समय &#8216;लघु शंका&#8217; से मुक्त होने में देरी नहीं करते थे। इस बाउंड्री वॉल के अंदर पीले रंग के खपड़ैल वाला ब्रितानिया सरकार के ज़माने में बना डाक बंगला में बिहार के अन्य क्षेत्रों से, जिलों से आये नेतालोग, अधिकारीगण शरणागत होते थे। गजब का मौहौल था उन दिनों। </p>
<figure id="attachment_3383" aria-describedby="caption-attachment-3383" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3383" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3383" class="wp-caption-text">वो सरकार निकम्मी है</figcaption></figure>
<p>आज लोग सोच नहीं सकते हैं। आज जैसे ही युवकों को, युवतियों को कहते हैं कि यहां एक डाक बंगला हुआ करता था। उस डाक बंगला के पीछे खाली मैदान नुमा स्थान था। एक रास्ता बन्दर बगीचा के रास्ते एक महिला कालेज की ओर उन्मुख होता था। आज जहाँ विशालकाय गगनचुम्बी ईमारतें खड़ी हैं, कल पटना के लोग भाग, संभ्रांतों के साथ, कुछ खड़े, कुछ बैठकर &#8220;लघुशंका&#8221; से मुक्त हुआ करते थे। रात्रि के अँधेरे में दीर्घशंका से भी मुक्ति पाते थे। उन दिनों तक दिल्ली के पालम वाले बिंदेश्वर पाठक वाला सुलभ शौचालय का अभ्युदय नहीं हुआ था। पटना के लोगों की न तो सोच बदला था और न शौचालय। आज उसी स्थान पर पटना के संभ्रांत खड़े-खड़े &#8220;गोलगप्पा&#8221; खाते हैं, &#8220;चीन-निर्मित&#8221; खाने के अनेकानेक व्यंजनों का आनंद लेते हैं।  </p>
<p>आज के लोग बाग़ शायद नहीं जानते होंगे अथवा जानते भी होंगे तो अगली पीढ़ी को बताने में संकोच करते हैं कि बैद्यनाथ मिश्र यानी नागार्जुन, रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; और फणीश्वर नाथ &#8216;रेणु&#8217; फोटोग्राफी के बहुत शौक़ीन थे। और पटना का यह डाक बंगला चौराहा उन लोगों के लिए एक पसंदीदा स्थान हुआ करता था। तत्कालीन समाज में, खासकर पटना के फोटोग्राफर उन्हें बहुत पसंद करते थे और ये त्रिमूर्ति भी छायाकारों को बहुत चाहते थे। रेणु जी ने तो साठ और सत्तर के ज़माने और उससे पहले के एक छायाकार मित्र सत्यनारायण दूसरे जी के क्रियाकलापों का अनेकों बार अपनी रचनाओं में उद्धृत किये थे। नागार्जुन और रेणु जी जब भी उन दिनों डाक बंगला कोने पर, तत्कालीन आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के छायाकारों को देखते थे, राजीव सहित, मन में एक इक्षा दोनों को अवश्य होतो थी की एक तस्वीर हो जाए। आज भी पटना के उन दिनों के छायाकारों के पास दिनकर, नागार्जुन और रेणु की असंख्य तस्वीरें होंगी। दिनकर जी का देहावसान 24 अप्रैल, 1974 को हुआ जबकि रेणु जी 11 अप्रैल, 1977 को और नागार्जुन 5 नबम्बर, 1998 को ईश्वर के शरणागत हुए।  उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन सम्पादकीय विभाग में संपादक से लेकर सम्पादकीय विभागों तक, सभी लोग विद्वान तो होते ही थे, आत्मीयता और आत्मसम्मान भी उत्कर्ष पर था। और इन तीन विद्वानों को और क्या चाहिए। समय समय पर वे इस दफ्तर में अवश्य आते थे। खासकर नागार्जुन।  </p>
<figure id="attachment_3384" aria-describedby="caption-attachment-3384" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3384" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3384" class="wp-caption-text">बिहार  की जनता और लालकृष्ण आडवाणी</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, समय बदल रहा था। आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कृषि, विज्ञान आदि के क्षेत्रों में आधारभूत प्रतिवर्तन हो, प्रदेश के लोग बाग़, गरीब-गुरबा का जीवन भी हंसमुख हो, रिक्शावाले को, जूता सिलने वाले को, कपड़ा सिलने वाले को भी भर पेट भोजन मिले, उसके बच्चे भी विद्यालय जायँ; इसके बारे में पटना के लोग, बिहार के लोग, विद्वान-विदुषी, नेता भले नहीं सोचें; लेकिन सबों के मानस-पटल पर पटना के बेली रोड से दिल्ली के राजपथ तक यह अवश्य था की देश में राजनितिक सत्ता के गलियारे में जो बैठे हैं, उन्हें उठाकर बाहर फेक दिया जाय। जो कल तक उस गलियारे का हिस्सा थे, उस दिन झंडा लेकर विरुद्ध में खड़े हो गए थे। स्वाभाविक है प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों की गद्दीदार कुर्सियां किसे नहीं अच्छी लगेगी। बिहार के तत्कालीन नेता अपने-अपने कपाल को तो साफ़ कर ही रहे थे, अपने-अपने पिछवाड़े के वस्त्र को भी उन कुर्सियों के उपयुक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। बिहार के लोगों में यह आम बात होती है। </p>
<p>सन चौहत्तर की क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। विद्यालय से महाविद्यालय तक, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से पटना, मगध, बिहार विश्वविद्यालय तक आंदोलन के बिगुल का आवाज पहुँच गया था। एक ओर छात्राएं अपने-अपने घरों में सीमित हो गयी थी, वहीँ दूसरी ओर &#8216;राजनीति में अपना-अपना जीवन संवारने वाले, प्रदेश तत्कालीन नेतागण अपने घरों को भरने के लिए सड़क पर उतर गए थे। कोई मूंछ-दाढ़ी कटा रहे थे तो कोई मूंछ &#8211; दाढ़ी को अपनी पहचान का मन्त्र मान रहे थे। अगर भारत के निर्वाचन आयोग के दफ्तर में तत्कालीन नेताओं द्वारा पेश किये गए आर्थिक दस्तावेजों की तुलना विगत लोक सभा और विधान सभा के दस्तावेजों से कर लें, खुद को संतुष्ट कर लें की उनकी सम्पत्तियों में कितना इजाफ़ा हुआ है, मतदाता तो वहीँ का वहीँ है । जो उस समय बिहार के वेटेनरी कालेज के चपरासी क्वाटर्स में रहते थे, आज कितने भवनों के मालिक हैं। जो उस समय गांधी मैदान स्थित भारतीय स्टेट बैंक में पैसे की निकासी के लिए पंक्तिबद्ध होते थे, आग बैंकों के अध्यक्ष घर पर पेटियां पहुंचते हैं। ऐतिहासिक गांधी मैदान की घास को पटना के ही लोग अपने अपने पैरों तले उसे दफना रहे थे। </p>
<figure id="attachment_3385" aria-describedby="caption-attachment-3385" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3385" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3385" class="wp-caption-text">आडवाणी, जाबिर हुसैन और आर के सिन्हा<br /></figcaption></figure>
<p>अब तक जून का महीना आ गया था और साल था सन चौहत्तर। पांच जून, 1974 को गांधी मैदान में एक सभा हुई। मंच पर जय प्रकाश नारायण थे और कर्पूरी ठाकुर भी थे। विगत तीन दशकों से बिहार की सत्ता के गलियारे में जो राज किये, कर रहे हैं, सभी वहां &#8220;चवन्नी छाप&#8221; नेता के रूप में, मैले-कुचैले कपड़े पहने खड़े थे। देख रहे थे कि जय प्रकाश जी की नजर में उनकी उपस्थिति दर्ज हो रही है अथवा नहीं। सुई रखने का जगह नहीं थी गांधी मैदान में। अपने जीवन में जय प्रकाश नारायण भी ऐसा जनसैलाब नहीं देखे थे। इसी मंच पर उपस्थित थे फणीश्वरनाथ रेणु, जिन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता पाठ कर रहे थे :</p>
<p>&#8220;सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,<br />
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,<br />
सिंहासन खाली करो कि &#8220;जनता&#8221; आती है । </p>
<figure id="attachment_3386" aria-describedby="caption-attachment-3386" style="width: 196px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/7-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/7-2.jpg" alt="" width="196" height="274" class="size-full wp-image-3386" /></a><figcaption id="caption-attachment-3386" class="wp-caption-text">जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी &#8211; जेपी के निवास पर</figcaption></figure>
<p>दिनकर जी अरविन्द के भक्त थे। जय प्रकाश नारायण की इस क्रांति-तिथि से कोई दो माह पूर्व दिनकर जी दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। कहा जाता है कि वे आश्रम पहुंचे और अपने आराध्य के कहें: &#8220;मैं आ गया&#8221; आपके शरण में। दिनकर की मृत्यु ह्रदय गति रुकने के कारण वे अंतिम सांस लिए । बाद में उनका पार्थिव शरीर पटना लाया गया।  उस पार्थिव शरीर को कदमकुआं के हिंदी साहित्य सम्मेलन परिसर में श्रद्धांजलि स्वरुप रखा गया। अनेकानेक प्रगतिशील विचारधरा वाले लेखक श्रद्धांजलि देने भी नहीं पहुंचे। लेकिन आगंतुकों की संख्या कम नहीं थी। फिर लेखकों और उनके कलमों को साक्षी मानकर, जहाँ रेणु जी भी उपस्थित थे, गंगा तट पर गायघाट में अग्नि को सुपुर्द किया गया। </p>
<p>सन चौहत्तर की क्रांति और जय प्रकाश नारायण का नेतृत्व ऐसा फैल गया कि देखते ही देखते राजनीति का चेहरा ही पूरी तरह बदल गया। वह आंदोलन करीब एक साल चला। फिर आपातकाल का समय आया।  जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए वचनबद्ध थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई इस क्रांति में बाद में बहुत सी चीजें जुड़ गई। गांधी मैदान में सभा को संबोधित करने से पहले जेपी ने दोपहर सर्वोदय संगठन के कई कार्यकर्ताओं व अन्य के साथ जुलूस में शामिल हो राजभवन की ओर प्रस्थान किया। राजभवन में तत्कालीन राज्यपाल को पत्र सौंप सभा के लिए वापस गांधी मैदान लौटने लगे तो रास्ते में जुलूस पर फायरिंग की गई। संपूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने कोने में फैलकर आग बनकर भड़क रही थी। </p>
<figure id="attachment_3387" aria-describedby="caption-attachment-3387" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3387" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3387" class="wp-caption-text">खामोश</figcaption></figure>
<p>उस ज़माने में बेगूसराय जिला के मझौल गाँव के महान क्रांतिकारी परिवार का एक परिवार बिमला कांत प्रसाद और अहिल्या देवी पटना के गर्दनीबाग रोड नंबर &#8211; 4 में रहते थे। बिमला कांत बाबू बिहार सरकार के एक विभाग में कार्यरत थे। बाद में वे पटना के आयुक्त आर आर एस पी सिन्हा के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी भी बने। बिमला कांत जी और अहिल्या देवी के एक पुत्र राजीव थे, आज भी स्वस्थ हैं। राजीव साहब के परिवार का, उनके पुरखों का देश की आज़ादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। मुंगेर, बेगुसराय आदि इलाकों में इनके दादाजी और उनके भाइयों की राजनीतिक गलियारे में तूती बोलती थी आज़ादी से पहले। सभी क्रांतिकारी विचारधारा के थे और महात्मा गांधी की चम्पारण यात्रा और उसके बाद के सभी आंदोलनों में राजीव जी के पूर्वजों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। कहा जाता है कि तत्कालीन क्रांतिकारी युगल किशोर प्रसाद सिन्हा, अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा, इन्दु बाबू सबों ने महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस सबों के साथ आज़ादी की लड़ाई में सक्रीय भूमिका निभाए। </p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम </strong>से बातचीत करते राजीव जी कहते हैं: &#8220;सन 1942 के आंदोलन में जब पटना सचिवालय के सामने राष्ट्रध्वज फहराने के लिए क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे, उनमें मेरे फूफा जी जगत नंदन सहाय भी थे। आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक रूप ले लिया । पुलिस क्रांतिकारियों को आगे बढ़ने से रोक रही थी और क्रांतिकारी आगे बढ़कर राष्ट्रध्वज को लहराना चाह रहे थे। दोनों तरफ भारतीय ही थे। एक लड़ रहे थे, दूसरा रोक रहा था। इस बीच ब्रितानिया सरकार की हुकूमत की ओर से गोलियों का बौछार हो गया। भीड़ तीतर-बितर हो गयी। लेकिन सात छात्र मृत्यु को प्राप्त किये। मेरे फूफा जी उस गोली कांड में घायल एक क्रांतिकारी को अपने कंधे पर लादकर, साईकिल से एक और मित्र के सहारे पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए। गर्दनीबाग इलाके से काफी संख्या में क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे, जो घायल हुआ था उसका नाम &#8216;जगत नारायण लाल&#8217; था। इस बीच कुछ लोग घर में आकर यह कह दिए कि &#8220;जगत नारायण मर गया,&#8221; इस बात को बुआ बर्दाश्त नहीं कर सकी और तत्काल ह्रदय गति रुकने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। शाम में जब फूफा जी घर आये तब सभी कहने लगे &#8211; भूत आया &#8211; भूत आया &#8211; यह घटना हमारे परिवार को हिलाकर रख दिया था।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3388" aria-describedby="caption-attachment-3388" style="width: 717px" class="wp-caption alignright"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg" alt="" width="717" height="976" class="size-full wp-image-3388" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg 717w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2-220x300.jpg 220w" sizes="auto, (max-width: 717px) 100vw, 717px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3388" class="wp-caption-text">जेपी और देसाई &#8211; कदमकुआं में</figcaption></figure>
<p>राजीव आगे कहते हैं: &#8220;यही कारण था कि जब जय प्रकाश नारायण की क्रांति सन 1942 की क्रांति के कोई 32 साल बाद एक बार फिर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से लेकर पटना की सड़कों पर दिखने लगा था; जब भी बाहर निकलता था, घर के सभी लोग कहते थे &#8220;किसी भी हालत में गिरफ्तार नहीं होना है&#8221;, सभी यह सोचते थे कि गिरफ्तार होने पर पुलिस कहीं मार न दे। घर के बड़े-बुजुर्ग, खासकर महिलाओं में यह बात घर कर गयी थी कि सं 1942 में भी भारत के लोग, बिहार के लोग, पटना के लोग पुलिस में थे; आज भी वही लोग हैं। कहीं आवाज बुलंग करने पर गिरफ्तार कर मार नहीं दे।&#8221;</p>
<p>राजीव का कैमरा पकड़ना और फिर कैमरे के क्लिक-क्लिक से इतिहास बनाना भी एक इत्तिफाक ही था। राजीव जी कहते हैं: &#8221; सन सत्तर की बात है। मेरे घर में चोरी हुई। चोर घर से एक-एक सामान को उठाकर ले गया। तत्कालीन बक्से में कपडा-लत्ता, पैसा-कौड़ी, गहने सभी ले गया। उन्ही बक्सा में बाबूजी का एक कैमरा था। चूँकि बाबूजी बिहार सरकार की नौकरी में थे और उस समय बिहार का पर्यटन विभाग को बढ़ावा देने के लिए भरपूर प्रयास किता जा रहा था; इसलिए बाबूजी जहाँ कहीं भी जाते थे, उस कैमरे से तस्वीर खींचकर सरकारी कार्यों में उपयोग करते थे। चोर ने सभी सामान छांट &#8211; छाँट कर ले लिया। जो उसके जरुरत के नहीं थे, उसे सामने एक सूखे कुएं में फेक सिया। बाबूजी का बी-2 आकार का कैमरा भी वहीँ फेका मिला। बाद में यह कैमरा ही मेरे जीवन का निर्माता बना। उस कैमरे में आठ फिल्म (निगेटिव) लगता था और परिणाम बहुत बेहतर होता था।&#8221;</p>
<p>राजीव कहते हैं: &#8220;जयप्रकाश नारायण की क्रांति के दौरान शिक्षा में सुधार, बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर क्रांति किया गया था। लेकिन यदि सच पूछें तो जो स्थिति उन दिनों थी, आज भी बहुत बेहतर नहीं है, जहाँ तक बिहार का सवाल है। इंदिरा गांधी चाहती थी कि जेपी का आंदोलन बिहार से बाहर न जाय। इंदिरा गाँधी के विरुद्ध कचहरी का आदेश जेपी आंदोलन को एक नया आयाम दिया। इस आंदोलन के दौरान जेपी सहित कई हज़ार क्रांतिकारी और नेतागण गिरफ्तार किये गए थे। गुजरात की चमनभाई पटेल सरकार के खिलाफ छात्रों का आंदोलन जेपी आंदोलन का बुनियाद था। जेपी आंदोलन से नेताओं की ऐसी फौज निकली जो बाद में राज्यों एवं केंद्र की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई। अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे अनेक नेता हैं जो जेपी आंदोलन से निकले। इस क्रांति में वामपंथी व कांग्रेस को छोड़कर समाज के सभी तबके के लोग, मसलन साहित्यकार, डॉक्टर, किसान नेता, वकील, कर्मचारी, महिलाएं, रिक्शावाला, मजदूर भी शामिल थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3389" aria-describedby="caption-attachment-3389" style="width: 853px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg" alt="" width="853" height="1280" class="size-full wp-image-3389" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg 853w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-682x1024.jpg 682w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-768x1152.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 853px) 100vw, 853px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3389" class="wp-caption-text">नागार्जुन</figcaption></figure>
<p>राजीव आगे कहते हैं: &#8220;जिस दिन कई लाख चिट्ठियों को एक ट्रक पर लादकर लाखों की संख्या में लोग जय प्रकाश नारायण की अगुआई में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आर डी भंडारे को देने जा रहे थे, जुलूस वैसे निकला तो कदमकुआं से था, लेकिन कुछ समय के बाद यह निश्चित कर पाना कठिन हो गया था की जुलुस का  प्रारंभिक छोड़ कहा पहुंचा । कई लोग यह कह रहे थे कि अगली छोड़ जब राज्यपाल के निवास पर पहुँच गया था, कदमकुआं में उस प्रराम्भित स्थान पर हज़ारों लोग एकत्रित थे। उस समय पटना की सड़कों पर मैं अपने 120/बी-2 कैमरा से क्लिक-क्लिक तो कर ही रहा था, आर्यावर्त &#8211; इण्डियन नेशन के लिए फोटो का काम करने वाला कृष्ण मुरारी किशन भी दिखाई देता था। मुरारीजी उम्र में हमसे छोटे थे, लेकिन कैमरे पर उनकी पकड़ बहुत बेहतर थी। हम पुलिस से बहुत डरते थे। इसलिए जैसे ही किसी पुलिस की गाड़ी देखते थे, मैं कहीं छिप जाता था। इस दौरान गर्दनीबाग से कदमकुआं की दूरी कम होती गई और हम जेपी के नजदीक आते गए। उस ज़माने में जेपी की तस्वीर के लिए मुरारी और इण्डियन नेशन के विक्रम जी को छोड़कर शायद ही कोई दिखाई देता था। बाद में आपातकाल के बाद, सन 1978 के पूर्वार्ध अशोक कर्ण और प्रभाकर दिखने लगे। उन दिनों &#8216;यासिका डी-120&#8217; कैमरा होता था।  फिर बाद में &#8216;लोवीटल&#8217; कैमरा हुआ। उन कैमरों को लेकर पटना की सड़कों पर क्लिक-क्लिक करते रहे, इतिहास का हिस्सा बनते गए।&#8221;</p>
<p>उस ज़माने में पटना में इंदिरा गांधी की यात्रा का वर्णन करते राजीव कहते हैं: गाँधी मैदान में आल इण्डिया कॉंग्रेस सेवा दल का सम्मलेन था। इंदिरा गाँधी राजीव गाँधी को लेकर आयी थी। उस ज़माने में गांधी मैदान में सुरक्षा की दृष्टि से छोटे-छोटे पॉकेट बनाये गए थे। फोटोग्राफर्स की संख्या भी दस से अधिक नहीं रही होगी। इंदिरा जी को सबों से मिलना संभव नहीं था। अतः वे एक खुले जीप पर आगे खड़ी हो गयी और सभी पॉकेट में घूम रही थीं, ताकि मिल भी लें और छायाकारों को तस्वीर भी बन जाय। हम सभी भी एक जीप पर थे। अचानक हम सबों की जीप पलट गयी। इसे देखते ही इंदिराजी आगे बढ़ी और जोर-जोर से कहने लगी, उठाओ सबको, देखों किसी को चोट तो नहीं लगी। मैं सबसे नीचे था। चूँकि मैं कुछ पहलवान जैसा था लम्बा-चौड़ा, इसलिए सबों की निगाहें मुझ पर जल्दी रूकती थी। इसी तरह, जान जेपी बीमार हुए, तब इंदिराजी उनसे मिलने आयी थी। उन दिनों राजनीतिक रिश्ते राजनेताओं की चाहे जैसे रहती हो, कटु या मधुर, लेकिन आत्मीयता में कमी नहीं होती थी। इंदिरा जी में भी वह बात थी।&#8221;  </p>
<figure id="attachment_3390" aria-describedby="caption-attachment-3390" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3390" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3390" class="wp-caption-text">लालू, नितीश और अन्य सभी अंडा-कढ़ी दबोच रहे हैं &#8211; समाजवाद</figcaption></figure>
<p>आज जब कंकड़बाग देखता हूँ और सन 1984 से तुलना करता हूँ तो आसमान जमीन सा फर्क दीखता है। उस  ज़माने में चिरैयांटांड पुल पार करने के बाद जब बाईपास पर आते थे, तो कुछ दूर दाहिने &#8211; बाएं दुकाने थी, पेट्रोल पम्प था, फिर अचानक दुकानों, मकानों की संख्या कम होने लगती थी। बाईपास ओर रेलवे लाइन बराबर दीखता था। उस ज़माने में कंकड़बाग में एच आई जी और एम आई जी नहीं बना था। एक बहुत बड़ा खाली मैदान हुआ करता था। राष्ट्रीय जनता पार्टी का सम्मलेन हुआ था। उस सम्मलेन में देश के शायद ही  कोई ऐसे बड़े नेता रहे होंगे जो अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराये थे।चंद्रशेखर, चौधरी देवी लाल, राजनारायण, सुरेंद्र मोहन, राम कृष्ण हेडगे, शहाबुद्दीन, राम बिलास पासवान, कपिल देव सिंह, सत्येंद्र नारायण सिंह, जॉर्ज फर्नांडिस, मोहन धारिया, मधु दंडवते, प्रमिला दंडवते, सुब्रम्हण्यम स्वामी, जाबिर हुसैन, सुबोध कांत सहाय, सुषमा स्वराज इत्यादि सभी आये थे। सत्तारूढ़ को छोड़कर। चंद्रशेखर के नेतृत्व में 8 मार्च से 11 मार्च, 1984 तक ऐतिहासिक सम्मलेन हुआ था। सम्मलेन सुवह से शाम तक तीन सत्र में हुआ करता था । खाना, नास्ता चाहे बड़े हो या छोटे, सभी कार्यकर्त्ता पंडाल में ही किया करते थे। </p>
<p>आज राजीव जी के परिवार में उनका एक बेटा रोहित है जो वस्त्र निर्माण की दुनिया में है। उसकी पत्नी सौम्या एक फैशन डिजाइनर है।​ बेटी सरस्वती है।​राजीव कहते हैं : समय बहुत बदल गया लेकिन आज भी डाक बंगला का चौराहा का नाम आते ही मन कुछ क्लिक-क्लिक करने लगता है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists">पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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