कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : इससे अधिक दुर्भाग्य कुछ और हो ही नहीं सकता कि ‘वंदे मातरम’ के रचयिता ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के अपने संतानों के संतान को न भारत सरकार में बैठे नेता जानते हैं, न ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे अधिकारी जानते हैं और ना ही भारत के 145 करोड़ लोग जानते हैं। अगर जानते तो शायद इन 77 वर्षों के गणतंत्र या 79 वर्ष की आज़ादी में कभी तो सम्मान के साथ न्योता देते। विश्वास नहीं हो तो खुद से या अपने बगल में बैठे लोगों से पूछ कर देखिये। यह अलग बात है कि विगत 77वे गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के कर्तव्य पथ पर जिन 10,000+ लोगों को आमंत्रित किया गया था, उनमें ‘शत-प्रतिशत’ वे लोग थे (पति-पत्नी सहित) जो ‘सरकार की दृष्टि में आय और रोजगार पैदा करने में बेहतरीन काम किया है। इतना ही नहीं, आगंतुकों की कतार में वे भी आमंत्रित थे, जो “सबसे अच्छे इनोवेटर, रिसर्चर और स्टार्ट-अप, सेल्फ हेल्प ग्रुप और सरकार की मुख्य योजनाओं के तहत सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले लोग थे। कई लोगों ने तो आमंत्रण को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर भी चिपकाया था। लेकिन वे नहीं थे जिनके पूर्वज ‘वंदे मातरम’ गीत लिखे थे।
वे तो शायद यह भी है जानते होंगे कि चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन-त्सांग, जो 627 ईस्वी में भारत आए थे, जिनके दो संस्कृत बौद्ध ग्रंथ जो मूल रूप में खो गए थे और जिन्हें ह्वेन त्सांग ने चीनी भाषा में संरक्षित किया था, उनका इन्होंने विस्तृत संस्कृत-चीनी-अंग्रेजी शब्दावली के साथ अंग्रेजी में अनुवाद कर इतिहास रची हैं। लेकिन वह देश की राजनीतिक कबड्डी से, चाहे कलकत्ता के राइटर्स बिल्डिंग में खेला जाय या दिल्ली के संसद में, मीलों दूर रहकर अपने पूर्वजों के सम्मानार्थ आपका कार्य सतत करती आ रही हैं, कर रही हैं।
अस्सी+ वर्षीय श्रीमती स्वाति गांगुली ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की दूसरी बेटी नीलाब्जकुमारी के पुत्र नीलांद्री नाथ मुखोपाध्याय और उनके पुत्र समीर कुमार मुखर्जी की बेटी हैं। वे तत्कालीन बंगाल के उत्तरपाड़ा के विख्यात वकील और जमींदार थे। श्रीमती गांगुली तीन भाइयों में अकेली बहन हैं । दो भाइयों का निधन हो गया है। तीसरे भाई डॉ. प्रदीप मुखर्जी अमेरिका की एक जानी-मानी फार्मास्युटिकल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद से रिटायर हुए हैं।श्रीमती गांगुली अपनी बेटी, दामाद और बच्चों के साथ है ख़ुशी-ख़ुशी।
आश्चर्य और दुःख की बात यह है कि 24 जनवरी, 1950 को वंदे मातरम को राष्ट्रगीत स्वीकारा गया था। विगत 26 जनवरी, 2026 को कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस के दौरान वंदे मातरम का जश्ने 150 वर्ष मनाया गया। लेकिन आज तक इस गीत के रचयिता ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘अपने वंश के वंशजों को’ कभी भी भारत सरकार गणतंत्र दिवस अथवा स्वाधीनता दिवस के अवसर पर आमंत्रित नहीं की है। करे भी तो कैसे? भारत सरकार के राजनेताओं से लेकर सरकारी महकमे में ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों को यह ज्ञात हो तब तो !!
लेकिन ऋषि बंकिम बाबू की बेटियों की तीसरी पीढ़ी के प्रत्यक्ष वंशज दिल्ली में कल के किंगवे और राजपथ तथा आज के कर्तव्य पथ पर अपने ‘परदादा की कीर्तियों पर नाज करती रही। सड़क के बाएं-दाएं खड़े होकर राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के सम्मानार्थ गर्व से सर उठाये आजादी और गणतंत्र को अपने सीने में संजोते रहे। विगत 77वें जश्ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्वास्थ ख़राब होने के कारण पुरे कार्यक्रम को स्वयं और अपने परिवार के बच्चों के साथ देख रही थी। वे अपने बच्चों को अपने पूर्वजों की गौरव गाथाओं को भी कहानी बता रही थी।
आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से बात करते 80+ वर्षीय श्रीमती स्वाति गांगुली कहती हैं : “मैं अस्सी वर्ष से अधिक आयु की हो गयी हूँ। देश को आज़ाद होते मैं देखी हूँ। मैं अपने पिता के मुख से, दादा के मुख से ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की गौरव गाथा को सुनती आयी हूँ। आज भी उनके शब्द हृदय में विराजमान हैं। मैं ऋषि बंकिम बाबू रचित वंदे मातरम को संविधान सभा में राष्ट्रगीत स्वीकारते भी देखी हूँ। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ। दिल्ली में इस वर्ष बहुत ठंढ़ हो गयी है। मैं फंगल निमोनिया से पीड़ित हो गयी थी। स्वास्थ बहुत बेहतर नहीं होने के कारण राजपथ पर नहीं जा सकी, लेकिन टीवी पर देखी।”

जब उनसे पूछा कि इन वर्षों में कभी भी आप आधिकारिक रूप से आमंत्रित नहीं हुयी? श्रीमती गांगुली हँसते कहती हैं: “गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित होना या न होना मेरे लिए कोई मुद्दा नहीं है। मैं अपनी मातृभूमि का सम्मान करती हूँ। वैसे किसको जरूरत है? आज़ादी के बाद आज तक कभी कोई यह जानने की जरुरत नहीं किये कि आखिर ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के परिवार में, उनके अपने खून के वंशज कहीं है अथवा नहीं? जीवित है अथवा नहीं ? देश आज़ाद हो गया। नेता बदलते गए। हमारा परिवार भारत माँ के लिए समर्पित है। हमने उस कालखंड में वंदे मातरम गीत-गाते मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करते क्रांतिकारियों को देखी हूँ। मुझे नाज है, गर्व है अपने पूर्वजों द्वारा शब्दबद्ध किये उस गीत पर।”
श्रीमती गांगुली कहती हैं: “इन वर्षों में हम स्वाधीनता दिवान भी मानते गए, गणतंत्र दिवस भी मनाते गए। ऋषि बंकिम चद्र चट्टोपाध्याय रचित जो गीत भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों के लिए अभूतपूर्व शस्त्र के रूप में काम आया, उस गीत को तो लोग याद रखे, यह एक श्रद्धांजलि है उन्हें। लेकिन उनके परिवार को भूल गए। हमें अथवा हमारे परिवार को कभी स्वाधीनता दिवस पर या गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित भी नहीं किया गया क्योंकि सरकार और सरकार में बैठे लोगों को मालूम ही नहीं है, कभी कोई जानने की जरूरत भी नहीं किये कि कोई जीवित है अथवा नहीं।” – दुखद हैं।
ज्ञातव्य हो कि जिस वर्ष शहनाई सम्राट भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का इंतकाल हुआ, बनारस के सराय हड़हा की गलियों में स्थित अपने घर के दूसरे तल्ले पर अपनी अश्रुपूरित आँखों को पोछते उन्होंने ने कहा था: “देखो !!! राजपथ पर गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है। मेरी शहनाई की मांगलिक धुन भी बज रहा है। लेकिन किसी ने मुझे इस अवसर पर बुलाया नहीं।” ओह !!!

श्रीमती गांगुली से जुड़े कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल) के एक शोधकर्ता पार्थो प्रतिन चट्टोपाध्याय का कहना है कि ‘बंकिम चंद्र के छोटे भाई पूर्ण चंद्र चट्टोपाध्याय और दीनबंधु मित्रा के बेटे ललित चंद्र मित्रा के लेखों से पता चलता है कि बंकिम चंद्र ने ‘आनंदमठ’ में छपने से बहुत पहले ही ‘वंदे मातरम’ गीत लिखा गया था। एक दिन, जब बंकिम चंद्र ‘बंगदर्शन’ के संपादक थे, तो ‘बंगदर्शन पत्रिका’ के एक कर्मचारी राम चंद्र बंद्योपाध्याय आए और कहा कि लगभग एक पेज का मैटर कम है। इसलिए आपको कुछ लिखना होगा।
वे कहते हैं: ‘वंदे मातरम’ की पांडुलिपि बंकिम चंद्र के सामने मेज पर रखी थी। जब राम चंद्र ने उस पर नज़र डाली, तो उन्होंने कहा, ‘अगर देर हुई तो काम रुक जाएगा, यह गाना लिखा हुआ है, यह बुरा नहीं है, तो आप मुझे यह क्यों नहीं दे देते?’ संपादक बंकिम चंद्र नाराज़ हो गए और कागज़ को मेज की दराज में रख दिया और कहा, ‘तुम अभी यह नहीं समझ सकते कि यह अच्छा है या बुरा, तुम्हें कुछ समय बाद समझ आएगा, हो सकता है तब मैं ज़िंदा न रहूँ, तुम रह सकते हो।’ यानी, यह साफ़ है कि बंकिम चंद्र ने ‘वंदे मातरम’ गीत तब रचा था जब वे ‘बंगदर्शन’ के संपादक थे।’
हम सभी जानते हैं कि भावनात्मक समानता के मामले में, ‘वंदे मातरम’ गीत को ‘कमलाकान्तेर दफ्तर’ में शामिल ‘अमर दुर्गात्सव’ का लयबद्ध रूप कहा जाता है। ‘अमर दुर्गात्सव’ 1281 के कार्तिक अंक में ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ था। बंगाल लाइब्रेरी कैटलॉग के अनुसार, इस अंक के प्रकाशन की तारीख 12 अक्टूबर 1874 है। उस साल सप्तमी 18 अक्टूबर को थी। पूर्ण चंद्र चट्टोपाध्याय के लेखों से पता चलता है कि उस साल महाष्टमी की रात, 19 अक्टूबर को, बंकिम चंद्र अपने घर के पूजा कक्ष में रेनेटी घराना के गायक बलहारी दास द्वारा गाए गए गीत ‘एसो एसो बंधु एसो, आधो आंचरे बसो’ सुनकर भावुक हो गए थे। और उस गीत के बारे में, बंकिम चंद्र ने उसी साल ‘बंगदर्शन’ के चैत्र अंक में ‘एकटी गीत’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। वहाँ उन्होंने यह भी लिखा था ‘मेरी देशलक्ष्मी कहाँ चली गई?’ नतीजतन, यह साफ़ है कि उस समय बंकिम चंद्र मातृभूमि के बारे में सोच रहे थे। तो, स्वाभाविक रूप से, यह बात मन में आती है कि वंदे मातरम जैसा महान मंत्र उस रात ब्रह्म मुहूर्त में एक भावनात्मक स्थिति में रचा गया था?’
उस तारीख के 76 वर्ष बाद 24 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान सभा काँटालपाड़ा, नैहाटी, 24 परगना, बंगाल के निवासी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय लिखित ‘वंदे मातरम’ गीत को आधिकारिक तौर पर भारत का राष्ट्रीय गीत अपनाया गया। साथ ही, ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया। वंदे मातरम महज एक गीत नहीं बल्कि एक ऐसा मार्ग है, जो साहित्य, राष्ट्रवाद और भारत के स्वाधीनता संग्राम को जोड़ता है। इस स्तुति गान का एक कविता से राष्ट्रीय गीत बनने तक का सफ़र, औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत की सामूहिक जागृति का उदाहरण है।
उपन्यास ‘आनंद मठ’ का मूल कथानक संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें संतान कहा जाता है, जिसका आशय बच्चे होता है, जो अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जिंदगी समर्पित कर देते हैं। वे मातृभूमि को देवी माँ के रूप में पूजते हैं; उनकी भक्ति सिर्फ़ अपनी जन्मभूमि के लिए है। यह “राष्ट्रभक्ति के धर्म” का प्रतीक था, जो आनंद मठ का मुख्य विषय था। अपने मंदिर में, उन्होंने मातृभूमि को दर्शाने वाली माँ की तीन मूर्तियां रखीं: माँ जो अपनी भव्य महिमा में महान और गौरवशाली; माँ जो अभी दुखी और धूल में पड़ी है; माँ जो भविष्य में अपनी पुरानी महिमा में पुन: प्रतिष्ठित होगी। श्री अरबिंदो के शब्दों में, “उनकी कल्पना की माँ के 14 करोड़ हाथों में भिक्षा पात्र नहीं, बल्कि तेज़ धार वाली तलवार थीं।”
श्रीमती गांगुली आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से कहती हैं: “श्री नीलाद्री नाथ मुखोपाध्याय बाबू का छोटा पुत्र समीर कुमार मुखर्जी बंगाल के डिप्टी कमिश्नर थे। नीलाद्री नाथ करीब 12-14 वर्ष बंकिम चंद्र चट्टोपाध्यय के साथ रहे थे। मैंने लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज कोलकाता, कोलकाता यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनोइस, अर्बाना शैम्पेन, USA में पढ़ाई की। कोलकाता यूनिवर्सिटी से संस्कृत में D.Phil किया। मैं UGC सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट के पद से रिटायर हुई। मेरे कई रिसर्च पेपर भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। मैं गणित में कमजोर नहीं थी। जब मैं नवमीं कक्षा में थी तब मुझे यह कहा गया कि आगे की पढाई में जो भी विषय लो, गणित, इतिहास के अलावे संस्कृत अवश्य पढ़ना है। जब चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन-त्सांग की पुस्तक को संस्कृत में अनुवाद की तो अपने वे सभी पूर्वज बहुत याद आये जिन्होंने संस्कृत पढ़ने को कहे थे। यह किताब उन्हें एक श्रद्धांजलि भी है।”
वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी (1838–1894), 19वीं सदी के बंगाल की सबसे जानी-मानी हस्तियों में से एक थे। 19वीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। एक जाने-माने उपन्यासकार, कवि और निबंधकार के तौर पर उनके योगदान ने आधुनिक बंगाली गद्य के विकास और उभरते भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। उनके विशेष कार्यों में आनंदमठ (1882), दुर्गेश नंदिनी (1865), कपालकुंडला (1866), और देवी चौधरानी (1884) शामिल हैं , जो अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे गुलाम समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चिंताओं को दिखाते हैं ।
कहते हैं वंदे मातरम की रचना को राष्ट्रवादी चिंतन में मील का पत्थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद के मेल का प्रतीक है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी लेखनी के ज़रिए, न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारत के शुरुआती राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बुनियादी वैचारिक सिद्धांत भी रखे। वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि को माँ के रूप में देखने का नज़रिया दिया।

आइये वापस कर्तव्य पथ पर चलते हैं। विगत 26 जनवरी को भारत गणराज्य अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाया। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू कर्तव्य पथ पर ऐतिहासिक समारोह का नेतृत्व की । यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष श्री एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष सुश्री उर्सुला वॉन डेर लेयेन इस महत्वपूर्ण अवसर पर मुख्य अतिथि थे। कुल 90-मिनट के इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति भवन से लेकर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक तक फैला कर्तव्य पथ, राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 साल, भारत की अभूतपूर्व प्रगति, मजबूत सैन्य शक्ति, इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों की भागीदारी का एक अविस्मरणीय संगम पेश किया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर आये जहाँ वे शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित करके राष्ट्र की ओर से श्रद्धांजलि दिए। तत्पश्चात वे परेड देखने के लिए कर्तव्य पथ पर सलामी मंच पर पहुंचे।
श्रीमती गांगुली कहती है: “बंकिम चंद्र की कीर्तियाँ, लेखनी उस कालखंड में जिन-जिन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे, कॉपीराइट को लेकर काफी संघर्ष हुए। उनके सभी कीर्तियों और पांडुलिपियों के लिए सभी अपने-अपने तरह से युद्ध किये। साल 1930 में इस सम्बन्ध में कुछ फैसला भी हुआ था। लेकिन आज यह अधिकार इसके पास है, नहीं मालूम। मैं जिस उम्र में हूँ, किसी भी राजनीति में नहीं पड़ना चाहती हूँ। उन नाम पर राजनीति भी नहीं करना चाहती हूँ। उम्मीद करती हूँ कि यह अधिकार सरकार के पास सुरक्षित होगा।”
इस वर्ष कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस परेड का थीम ‘वंदे मातरम के 150 साल’ था। अलग-अलग क्षेत्रों के 10,000 लोग विशेष अतिथि के तौर पर परेड देखे। तक़रीबन 2,500 कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रदर्शन किये। कुल 30 झांकियां कर्तव्य पथ पर निकली। श्री तेजेंद्र कुमार मित्रा द्वारा 1923 में बनाई गई पेंटिंग्स की एक श्रृंखला, जो ‘वंदे मातरम’ के छंदों को दर्शाती है और ‘बंदे मातरम एल्बम’ (1923) में प्रकाशित हुई थी, गणतंत्र दिवस परेड के दौरान कर्तव्य पथ के किनारे व्यू-कटर के रूप में प्रदर्शित की गयी।
श्रीमती गांगुली कहती हैं: विगत गणतंत्र दिवस पर पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के नैहाटी के कांठलपारा में ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का पैतृक घर और जन्म स्थान को देखकर अद्भुत अनुभूति का अनुभव की । पिछले दिनों वहां गयी भी थी। कुछ दिन पहले तक उस महल की स्थिति जीर्ण-शीर्ण हो गयी थी। लेकिन सरकार द्वारा पहल कर उसे सुन्दर बनाया गया है। अभी ‘बंकिम भवन गवेषणा केंद्र’, बना दिया गया है, जिसे ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का निवास और संग्रहालय या बंकिम संग्रहालय भी कहा जाता है) के नाम से जाना जाता है।
आइये 77 वर्ष पीछे चलते हैं उस दिन 26 जनवरी 1950 की ऐतिहासिक सुबह उस ऐतिहासिक दिन, नई दिल्ली में वायसराय हाउस का दरबार हॉल, जो अब राष्ट्रपति भवन है, एक गंभीर समारोह का केंद्र था। ठीक 10:18 बजे सुबह में, भारत के पहले और आखिरी गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी ने भारत को गणतंत्र घोषित किया। ठीक छह मिनट बाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, जो औपनिवेशिक प्रशासकों से भारतीय नेतृत्व में एक प्रतीकात्मक बदलाव था।
बाहर, किंग्सवे पर भीड़ लगी हुई थी, जो राष्ट्रपति को सोने की परत वाली, घोड़ों से खींची जाने वाली शाही बग्घी में, घुड़सवार अंगरक्षकों के साथ बाहर निकलते देखने का इंतजार कर रही थी। सोने की परत वाली, छह घोड़ों वाली बग्घी, जिसमें लाल मखमल का इंटीरियर और उभरा हुआ अशोक चक्र लगा था। भारत के गणतंत्र दिवस के सबसे स्थायी प्रतीकों में से एक रही है। यह मूल रूप से, यह ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के वायसराय की थी और वायसराय की संपत्ति के आसपास औपचारिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाती थी। 1950 में भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस बग्घी में राष्ट्रपति भवन से इरविन एम्फीथिएटर तक गए थे, उनके साथ घुड़सवार बॉडीगार्ड थे, जो औपनिवेशिक सत्ता से भारतीय नेतृत्व में बदलाव का प्रतीक था।
आज़ादी के बाद, इस शानदार बग्घी का भविष्य एक अंतरराष्ट्रीय संयोग का मामला बन गया। भारत और नए बने पाकिस्तान दोनों ने इस बग्घी पर अपना दावा किया। विवाद को सुलझाने के लिए, एक सरल लेकिन असाधारण फैसला लिया गया: सिक्का उछालना। भारत का प्रतिनिधित्व कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह ने किया, और पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व याकूब खान ने। किस्मत से, कर्नल सिंह ने टॉस जीत लिया, और यह ऐतिहासिक बग्घी आधिकारिक तौर पर भारत की हो गई। अगले कुछ सालों में, यह बग्घी भारत के राष्ट्रपतियों की सेवा करती रही, उन्हें संसद में शपथ ग्रहण समारोह और गणतंत्र दिवस समारोह के समापन पर विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए ले जाती रही।
परेड का नेतृत्व गोरखा रेजिमेंट के ब्रिगेडियर मोती सागर कर रहे थे, जो शुरुआती भारतीय सेना में अपने नेतृत्व के लिए जाने जाने वाले एक सम्मानित अधिकारी थे। ब्रिगेडियर सागर की कमान ने यह सुनिश्चित किया कि परेड में अनुशासन और व्यावसायिकता बनी रहे, जो युवा राष्ट्र की आकांक्षाओं को दर्शाता था। परेड का समापन भारतीय वायु सेना के फ्लाई-पास्ट के साथ हुआ, जिसमें लिबरेटर विमानों का एक छोटा सा गठन था, जबकि 31 तोपों की सलामी ने समारोह को और खास बना दिया। अपनी सादगी में भी, यह परेड भारत की संप्रभुता और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने की क्षमता का एक बयान था। यह कार्यक्रम पूरी तरह से सशस्त्र बलों पर केंद्रित था। लगभग 3,000 सैनिक टुकड़ियों में मार्च कर रहे थे, जिसमें इन्फेंट्री, तोपखाना और घुड़सवार सेना की इकाइयाँ शामिल थीं।
खुली हवा वाली बग्घी ने 2014 में वापसी की, जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बीटिंग रिट्रीट समारोह में शामिल होने के लिए इसका इस्तेमाल किया। श्रीमती गांगुली कहती हैं: “प्रणब मुखर्जी भी बंगाल के मुखर्जी वंशावली के हिस्सा थे। वह वंशावली आज चादर जैसी हो गयी है। जब भी उस वंशावली को देहटी हूँ मन आनंदित हो जाता है। ज्ञातव्य हो कि भारत के 75वें गणतंत्र दिवस पर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों राष्ट्रपति भवन से कर्तव्य पथ तक इस बग्घी में गए।
वापस कर्तव्य पथ के रास्ते विजय चौक पर आते हैं। गणतंत्र दिन से तीसरे दिन संध्याकाळ, यानी 29 जनवरी को संख्याकाल बीटिंग रिट्रीट भी समाप्त हो गया। बीटिंग रिट्रीट एक ऐसा समारोह है जो भारत में गणतंत्र दिवस समारोह के खत्म होने का प्रतीक है। यह हर साल 29 जनवरी की शाम को, गणतंत्र दिवस के तीन दिन बाद, विजय चौक पर होता है।यह एक म्यूजिकल शो है जिसमें भारतीय सेना, नौसेना, वायु सेना, दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बैंड शामिल होते हैं।
भारत के राष्ट्रपति की अध्यक्षता में, यह कार्यक्रम अनुशासन, एकता और राष्ट्रीय समारोहों के औपचारिक समापन का प्रतीक है। इस समारोह की अध्यक्षता भारत के राष्ट्रपति करते हैं, जो सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर हैं। भारत में बीटिंग रिट्रीट समारोह पहली बार 1950 के दशक में महारानी एलिजाबेथ और प्रिंस फिलिप की राजकीय यात्रा के दौरान आयोजित किया गया था। तब से, यह समारोह भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता और बलिदान को श्रद्धांजलि देने के लिए एक सालाना कार्यक्रम बन गया है।
जब श्रीमती गांगुली से पूछा कि इन सात दशकों में कभी भी आप राष्ट्रीय मानचित्र पर क्यों नहीं आयी, जहाँ तक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन का सवाल है? श्रीमती गांगुली कहती हैं: “मैं जिस चीज के लिए जन्म ली, शायद माँ वह कार्य मुझसे करा ली, करा रही है। मैं किसी भी राजनीति पार्टी या ग्रुप में नहीं आयी। मेरा स्वभाव नहीं था, आज भी नहीं है। मैं दस वर्षों तक बंगाल के एशियाटिक सोसाइटी में थी। मैं अपने कार्य में लगातार व्यस्त रही, आज भी हूँ। मैं जो कार्य कर रही हूँ, उम्मीद है आने वाली पीढ़ी के लिए वह लाभायक ही होगा।”
विगत गणतंत्र दिवस परेड देखने के लिए जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों से लगभग 10,000 विशेष मेहमानों (पति/पत्नी सहित) को आमंत्रित आये थे। लेकिन उस आमंत्रण में वंदे मातरम के रचयिता परिवार और परिजनों का नाम नहीं था। सरकारी अधिकारी कहते हैं इन मेहमानों में वे लोग शामिल थे जिन्होंने आय और रोज़गार पैदा करने में बेहतरीन काम किया है, सबसे अच्छे इनोवेटर, रिसर्चर और स्टार्ट-अप, सेल्फ हेल्प ग्रुप और सरकार की मुख्य योजनाओं के तहत सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले लोग शामिल हैं।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बेशक, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के साथ ही भारत में औपनिवेशिक शासन का अंत हो गया था। लेकिन कानून, संस्थागत जवाबदेही और नागरिकों की इच्छा पर आधारित स्वशासन के रूप में भारत का परिवर्तन संविधान को स्वीकार किए जाने के साथ ही पूरा हुआ। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस घोषित करने का फैसला भारत की सांवैधानिक शुरुआत को उसके स्वतंत्रता संग्राम के मील के पत्थरों में शामिल करने के सोचे समझे ऐतिहासिक चयन को प्रतिबिंबित करता है।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद 1929 में पूर्ण स्वराज की मांग औपचारिक राजनीतिक लक्ष्य बन गई। भारतीयों ने 26 जनवरी, 1930 को समूचे देश में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया। इसके जरिए उन्होंने ब्रिटिश शासन के अधीन उपनिवेश के दर्जे को नकारते हुए पूर्ण स्वराज के लक्ष्य के लिए खुद को समर्पित किया। यह स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ था जिसके माध्यम से देशवासियों ने औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत सांवैधानिक सुधारों की मांगों से आगे बढ़ते हुए एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य सामने रखा।
भारत की संविधान सभा ने अपनी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को कॉन्सटिट्यूशन हॉल में की जिसे अब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष के रूप में जाना जाता है। इसके साथ ही भारत के संविधान के निर्माण की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत हो गई। इस सभा ने स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए 2 वर्ष, 11 महीने और 17 दिन काम किया। उसने इस ऐतिहासिक कार्य को पूरा करने के लिए 165 दिनों में 11 सत्र आयोजित किए। संविधान के मसौदे पर 114 दिन विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। संविधान सभा के सदस्यों का प्रत्यक्ष चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं और रियासतों के प्रतिनिधियों ने किया। यह सुनिश्चित किया गया कि संविधान का निर्माण एक व्यापक प्रतिनिधित्व और विचार-विमर्श की प्रक्रिया के जरिए हो।
लगभग तीन वर्षों के व्यापक विचार-विमर्श के बाद, संविधान सभा ने भारत का संविधान अपनाया, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण कामों में से एक था। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में भारतीय राज्य के स्वरूप, नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों, सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति संतुलन, और सामाजिक न्याय और समानता के लिए सुरक्षा उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। संविधान को अपनाना लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित शासन व्यवस्था स्थापित करने के इस सामूहिक प्रयास की पराकाष्ठा संकेत था। इसे अंगीकार करने की तारीख 26 नवंबर 1949, औपचारिक रूप से प्रस्तावना की अंतिम पंक्ति में दर्ज है, जो इसके संवैधानिक अधिकार और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है।
क्रमशः























