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	<title>चुटकुलानन्द की चिठ्ठी Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>79 वर्ष की आज़ादी, 34 करोड़ से 147 करोड़ की आबादी, 13% से 79% शैक्षिक-दर और सरस्वती पूजा यानी &#8216;हाते खोड़ी&#8217; अनुष्ठान</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Jan 2026 13:02:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[artists]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[kolkata]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कोलकाता / पटना / नई दिल्ली : विगत दिनों दिल्ली मेट्रो के द्वारका-नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी मार्ग पर चलने वाली ब्लू लाइन मेट्रो से यमुना लिंक के रास्ते बोटानिकल गार्डन जा रहा था। यमुना लिंक से अक्षरधाम के रास्ते जब आगे बढ़ा, गाजियाबाद से दिल्ली की ओर आती सड़क के किनारे खानाबदोशों द्वारा बनायीं गयी मूर्तियों पर [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कोलकाता / पटना / नई दिल्ली : विगत दिनों दिल्ली मेट्रो के द्वारका-नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी मार्ग पर चलने वाली ब्लू लाइन मेट्रो से यमुना लिंक के रास्ते बोटानिकल गार्डन जा रहा था। यमुना लिंक से अक्षरधाम के रास्ते जब आगे बढ़ा, गाजियाबाद से दिल्ली की ओर आती सड़क के किनारे खानाबदोशों द्वारा बनायीं गयी मूर्तियों पर आखें टिक गयी। रंग-बिरंगी जीवंत मूर्तियां। सड़क के किनारे अपने जीवन का अहम् हिस्सा जीने वाले ये खानाबदोश हिन्दू पर्व-त्योहारों के अनुसार देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाकर अपनी जिंदगी की अगली साँसों को सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक दो-दो मिनट के अंतराल पर हम मयूर विहार, अशोक नगर और नोएडा के विभिन्न सेक्टरों को पार करते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। शरीर से तो दिल्ली मेट्रो में था लेकिन मन से कभी कोलकाता के कुम्हारटोली तो कभी पटना के बंगाली अखाड़ा में आ-जा रहा था। दो-तीन दिन बाद सरस्वती पूजा का दिवस आने वाला था। </strong></p>
<p>पहले चलते हैं कलकत्ता। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध जब आनंद बाजार पत्रिका समूह के दी टेलीग्राफ / संडे पत्रिका के लिए कार्य करना शुरू किया था तो कलकत्ता शहर जैसे रोजमर्रे की जिंदगी में आ गया था। इंटरनेट का जमाना नहीं था और समाचार प्रेषित करने के दो ही साधन थे। हस्तलिखित समाचार या फ़ीचर आम तौर पर स्वीकार नहीं होता था। टंकित कॉपी ही दिया जाता था। या फिर दूरदरस्त होने पर टेलीफोन / ट्रंक काल से कहानियां लिखा दिया जाता था या फिर स्थानीय डाकघरों से टेलीप्रिंटर के माध्यम से कहानियां तत्काल भेजा जाता था। इसके अलावे कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उन दिनों मैं दक्षिण बिहार के धनबाद में पदस्थापित था, लेकिन तत्कालीन सम्पादकों &#8211; एम जे अकबर और शेखर भाटिया (दी टेलीग्राफ) और वीर सांघवी, राजीव बागची, उमेश आनंद (संडे) &#8211; के आदेश से कहीं भी, कभी भी विचरण कर कहानियों को करने, प्रेषित करने की छूट थी। भ्रमण करने का खर्च का वहन दफ्तर कर लिया करता था। उन दिनों मेरे पास यासिका कैमरा था और उसके साथ 42-75 एमएम का लेंस था। यह कमरा धनबाद के बैंक मोड़ स्थित एक मित्र दिए थे। </p>
<p><strong>तत्कालीन दक्षिण बिहार का शायद ही कोई हिस्सा &#8211; रांची, जमशेदपुर, बोकारो, देवघर, दुमका, गुमला, पलामू, गिरिडीह, गोड्डा, पाकुर, खूंटी, रामगढ, घनबाद, कोडरमा, चाईबासा, पुरुलिया, वर्धमान, बीरभूम, आसनसोल, दुर्गापुर आदि &#8211;   बचा था जहाँ इस अदना सा संवाददाता का कदम नहीं पड़ा था जहाँ की कहानियां टेलीग्राफ और सन्डे पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुआ था चाहे लुप्त प्राय बिरहोर जनजाति हो या धधकते भूमिगत कोयला माइंस, या तत्कालीन कोयला सरगनों का लहू लहुआन वर्चस्व चाहे तत्कालीन प्रशासनों का उन माफियाओं और पटना से दिल्ली तक विधान सभा और संसद में बैठे कुर्सी तोड़ते राजनेताओं का मिलीभगत, सभी कभी न कभी अख़बारों के, पत्रिका के पन्नों पर अवतरित जरूर हुए थे। काफी लिखने और नाम के साथ समाचार, फीचर प्रकाशित होने के कारण बिहार-बंगाल सीमा क्षेत्रों के बहुत पाठक पहचानते थे, कुछ नाम से, कुछ चेहरे से। जब कभी भी उनके मोहल्ले में, जिलों में जाते थे, बहुत सम्मान के साथ, आदर-सत्कार के साथ बैठते थे, बात करते थे, खाना भी खिलाते थे &#8211; बिना किसी राजनीति के, बिना यह सोचे कि कल अख़बार में नाम प्रकाशित होगा। कई लोगों से सम्बन्ध आज भी बरकरार है।</strong> </p>
<figure id="attachment_7273" aria-describedby="caption-attachment-7273" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13.jpg" alt="" width="2042" height="1225" class="size-full wp-image-7273" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13.jpg 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-1024x614.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-1536x921.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7273" class="wp-caption-text">माँ सरस्वती &#8211; तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>इसी क्रम में कई मर्तबा कलकत्ता के कुम्हार टोली (कुमार टोली) भी गया था। यहाँ मूर्तियां बनती है। आज का भूगोल अवश्य बदल गया होगा, लेकिन उन दिनों हावड़ा स्टेशन पर उतरकर स्टेशन के बाहर हाबड़ा ब्रिज से आती सड़क अपने बाएं हाथ मुड़कर जब स्टेशन की दीवार तक पहुँचती थी, तो एक रास्ता दाहिना स्टेशन की ओर जाती थी और दूसरा सामने से निकलती शिवपुर होते आगे निकल जाती थी। उन दिनों नया पुल का निर्माण नहीं हुआ था। शिवपुर की ओर जाने वाली सड़क पार कर हुगली नदी के तट पर बांस-फुस आदि से बने दर्जनों होटलों में से एक होटल, जो इस रास्ते हाबड़ा स्टेशन प्रवेश के ठीक सामने था, माँछ &#8211; भात &#8211; दही और दो सफ़ेद रोसगुल्ला खाकर फेरी के रास्ते निकल जाता था। </p>
<blockquote><p>फेरी पर पैर रखते ही जैसे अपने जन्म के दो साल बाद (1961) भारत के सिनेमाघरों में टंगी फिल्म &#8216;काबुलीवाला&#8217; का गीत जिसके गीतकार थे गुलजार, संगीतकार सलिल चौधरी और गायक हेमंत कुमार थे &#8211; गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे, लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे &#8211; गुनगुनाते कभी बाग़ बाजार तो कभी शोवा बाज़ार अहीर टोला फेरी घाट पर उतरकर पैदल कुमार टोली पहुँच जाते थे। वैसे यहाँ आने के लिए लोकल ट्रेन भी थी, लेकिन फेरी से चलने का मजा ही कुछ और होता था। यह अलग बात थी कि उन दिनों पानी में तैरना नहीं आता था, लेकिन जीवन में तैरना शुरू कर दिए थे तभी तो अपने जन्म स्थान दरभंगा के एक गाँव से पटना के रास्ते कलकत्ता में पत्रकारिता सिखने के लिए तैर रहे थे। कभी कभी बस से भी यात्रा कर लेते थे। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7274" aria-describedby="caption-attachment-7274" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7274" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7274" class="wp-caption-text">तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>हकीकत में यह &#8216;कुम्हार टोली&#8217; है, लेकिन बोल चाल की भाषा में यह &#8216;कुमार टोली&#8217; हो गया। ऐतिहासिक दृष्टि से 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने फोर्ट विलियम की एक नई बस्ती बनाने का फैसला किया। इसकी आबादी सुतानाती की ओर चली गई, जबकि जोरासांको और उसके आस-पास के इलाके अमीर लोगों के इलाके बन गया  कंपनी के सीधे आदेशों के तहत शहर के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग कारीगरों के लिए बांटा गया था। जगहों के नाम काम से जुड़े रखे गए, जैसे शराब बेचने वालों के लिए सूरीपारा, तेल बेचने वालों के लिए कोल्लोटोला, बढ़ई के लिए छुत्तरपारा, गाय चराने वालों के लिए अहीरीटोला और कुम्हारों के लिए कुमारटोली। </p>
<p><strong>जब शहर का विकास हुआ और बढ़ा, तो बहुत से लोग इन इलाकों में आकर बस गए, जिससे ये इलाके सिर्फ अपने नामों तक ही सीमित रह गया। हालांकि, उत्तरी कोलकाता के कुमारटोली इलाके के कारीगर बड़ी संख्या में बसे रहे। ये कुम्हार जो नदी के किनारे बर्तन बनाते थे और बाद में उन्हें बाज़ार में बेचते थे, जल्द ही देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने लगे, जिनकी पूजा शहर के आस-पास की हवेलियों और महलों में बहुत लोकप्रिय हो गई। उत्तरी कोलकाता में वैसे यह एक छोटी सी जगह है जहाँ कुम्हारों का बाहुल्य है। लेकिन यह इलाका विश्व पटल पर प्रसिद्ध है। यह जगह पूरे साल पश्चिम बंगाल में अलग-अलग त्योहारों के लिए मिट्टी से भारतीय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने में अपनी महारत के लिए मशहूर है। वे अपनी मूर्तियां दूसरे देशों और समुदायों को भी निर्यात करते हैं। मूर्ति बेचने वालों की मशहूर सड़क का नाम बनमाली सरकार स्ट्रीट है।</strong></p>
<figure id="attachment_7275" aria-describedby="caption-attachment-7275" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7275" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7275" class="wp-caption-text">तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>कुमारटोली के बहुत सारे महिला, पुरुष अपने जीवन को इन्हीं मूर्तियों को बनाने में समर्पित कर दिए । दुर्गा पूजा के कई माह पहले से देवी दुर्गा की, सरस्वती पूजा से कई माह पहले से देवी सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां को जीवंत रूप देते आ रहे ते हैं। ईश्वर भी इन्हें जीवित रहने का मार्ग बताते आ रहे हैं।इन मूर्तियों को बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और जटिल है। यह इस इलाके की गलियों में होती है। कभी कलकत्ता आएं तो बनमाली स्ट्रीट का चक्कर अवश्य लगाएं। कारीगरों को मिटी से मूर्ति और फिर उसका जीवंत स्वरुप देखकर आपका जीवन सफल हो जायेगा। कुमारटुली के काफी पास स्थित बाग बाजार घाट और शारदा देवी घाट का इस्तेमाल दुर्गा पूजा के त्योहार के मौसम में मूर्ति विसर्जन समारोहों के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। कुमारटुली श्यामपुकुर, बरताला, जोरासांको, जोराबगान और हुगली से घिरा हुआ है। </p>
<figure id="attachment_7276" aria-describedby="caption-attachment-7276" style="width: 2037px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14.jpg" alt="" width="2037" height="1033" class="size-full wp-image-7276" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14.jpg 2037w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-300x152.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-1024x519.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-768x389.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-1536x779.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2037px) 100vw, 2037px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7276" class="wp-caption-text">इंदिरापुरम (गाजियाबाद) स्थित शिप्रा रिवेरा में आयोजित सरस्वती पूजा के अवसर पर प्रसन्नचित महिलाएं।  कहते हैं इस वर्ष महिलाओं की भागीदारी विशेष थी और सबों ने महिला शक्तियों का बेहतर प्रदर्शन की </figcaption></figure>
<p><strong>बीते दिन सरस्वती पूजा मनाया गया। पंचमी हिंदू पंचांग के अनुसार वसंत ऋतु के आरंभ का प्रतीक है। हिंदू पंचम के अनुसार यह माघ मास के पांचवें दिन मनाई जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, विद्या, संगीत और कला की देवी सरस्वती का जन्म इसी दिन हुआ था। इसलिए, उनसे ज्ञान और कला की प्राप्ति के लिए लोग बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं। दिल्ली शहर में भले दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं हो, जितना महत्वपूर्ण उनके लिए दिवाली, लेकिन राष्ट्र की राजधानी में कोलकाता, ओड़िसा या बिहार से प्रवासित लोगों के लिए (अपवाद छोड़कर) सरस्वती पूजा उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह एकजुटता और सद्भाव को दर्शाता है। उनके लिए सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक उत्सव भी है। बसंत पंचमी के दिन पूरा बुहार, बंगाल ओड़िसा पिले रंग की आभा में डूब जाता है और हर गली में पंडालों की रौनक होती है। यह दिन युवाओं कलाओं और विद्या के प्रति एक अलग ही माहौल बनता है। कहते हैं पीला रंग शांति, समृद्धि और ऊर्जा का प्रतीक है। यह सभी को आशावाद से भर देता है।</strong> </p>
<p>अब आते हैं पटना। आज के ही दिन कोई 55-साल पहले, पहली बार पूर्णिया (गढ़बनैली) से पटना आया था बाबूजी के पास। बाबूजी श्री गोपाल दत्त झा (श्री गोपाल जी) उन दिनों पटना कालेज के सामने बुक सेन्टर किताब की दूकान को छोड़कर श्री तारा बाबू (श्री तारानन्द झा) के पास नोवेल्टी एण्ड कंपनी, प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता दूकान में अपनी नौकरी की शुरुआत किये थे। उन दिनों नोवेल्टी एक मंजिला मकान था। नोवेल्टी के दाहिने तरफ त्रिवेदी स्टूडियो और बाएं सरदारजी की एक बिजली की छोटी सी दूकान कृष्णा स्टोर्स थी। इसी नाम से अब यह दूकान फ़्रेज़र रोड स्थित चांदनी चौक मार्केट (तत्कालीन आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्र के दफ्तर के बगल में) ‌है। कृष्णा स्टोर्स के ठीक बगल में नेशनल बुक डिपो था (जो अब पटना कालेज के सामने है), एक फल वाले की दूकान थी और उसके बाद रीगल होटल।</p>
<figure id="attachment_7277" aria-describedby="caption-attachment-7277" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7277" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7277" class="wp-caption-text">माँ​ और महिलाएं</figcaption></figure>
<p>रीगल के बाद एक किताब की दूकान पुस्तक महल थी, पुस्तक महल के बगल में नालन्दा के रस्तोगी का पुस्तक जगत था ‌(जो अब बीएन कॉलेज के सामने है)। फिर एक दवाई की दूकान। इन दो दुकानों के बीच बीरबल पान वाला था। इस दूकान से चार कदम पर एक रास्ता नीचे लुढ़कती थी, खजान्ची रोड और खजान्ची रोड के ठीक सामने अशोक राज पथ पर दाहिने तरफ था ऐतिहासिक खुदाबख्श पुस्तकालय। नोवेल्टी के दाहिने तरफ तत्कालीन पटना के एक सम्भ्रान्त फोटो स्टूडियो था – त्रिवेदी स्टूडियो। इस स्टूडियो में पटना के सम्भ्रान्त, सुन्दर लोग ही फोटो खिंचवाते थे। फिर थी उषा सिलाई मशीन का प्रशिक्षण केंद्र। इस प्रशिक्षण केंद्र के दाहिने दीवार से लगी कोई चार-फिट की एक छोटी सी किताब की दूकान थी, जो इस भवन के पीछे बेगम साहिबा के आवासीय कालोनी में रहने वाले कोई सज्जन चलाते थे। उनकी एक आँख खराब थी। सिलाई मशीन और इस किताब की दूकान के सामने फुटपाथ पर साईकिल बनाने वाले एक मिस्त्री देवकी जी कार्य करते थे। इस किताब की दूकान से कोई दस फिट दाहिने हरिहर पान वाले की एक दूकान थी और उन्हीं के दूकान से लगी थी एक चश्मे की दूकान । मुझे इस दो-सौ कदम तक ही चहलकदमी करने की इजाजत थी। इससे अधिक नहीं। मैं कोई पांच-छः साल का था। </p>
<blockquote><p>हमारे नोवेल्टी भवन में बाएँ तरफ लोहे का खींचने वाला गेट था, जो एक गली-नुमा रास्ते से 25-कदम चलने के बाद छोटा सा आँगन में निकलता था। आँगन के दाहिने कोने पर एक सीढ़ी थी। आँगन से सड़क की ओर दूकान में प्रवेश का रास्ता था। आम तौर पर आँगन में किताबों के बण्डल, रस्सी, सुतली, गत्ता, क़ैंची, चाकू, सुराही,  रखा होता था। ग्राहकों का किताब तक्षण इस आँगन में बांधा जाता था। यह आँगन और बरामदा हमारे पिता-रूपी ब्रह्माण्ड की दुनिया थी। यहीं रहते थे मेरे बाबूजी, इस दूकान के अंदर ही वे अपना आशियाना बना रखे थे। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7283" aria-describedby="caption-attachment-7283" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7283" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7283" class="wp-caption-text">माँ और कलाकार &#8211; तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>पूर्णिया से बाद मगध की राजधानी, जहाँ चन्द्रगुप्त मौर्य राजा हुआ करते थे, चाणक्य जैसे उनके गुरु थे – मैं इस राजधानी में पहली बार अपना सर पिता-रूपी ब्रह्माण्ड के नीचे तारा बाबू की दुनिया में अपना सर छुपाया। तारा बाबू को हम सभी “मालिक” कहते थे। बहुत कड़क-मिजाज के थे। अनुशासन उनके जीवन में बहुत महत्व रखता था। समय के बहुत पाबंद थे। मेहनत उनके जीवन का मूल-मंत्र था, गायत्री मन्त्र जैसा। मुझे दूकान के अलावे मछुआ टोली स्थित उनके घर पर आने-जाने की पूरी स्वतंत्रता थी। घर पर हमारे उम्र के उनके पोते-पोतियाँ मुझे अपने घर का हिस्सा ही समझते थे। मुझे आज तक ऐसी कोई घटना याद नहीं है जिसमें हमें उन लोगों की बातों से, व्यवहारों से कोई कष्ट हुआ हो, आत्मा दुखी हुआ हो। उस दिन मैं नहीं जानता था कि नोवेल्टी की भूमि पर ही त्रिनेत्रधारी महादेव मेरे जीवन की रेखाएं खींचने का केन्द्र बिंदु बनाएंगे । लेकिन आज छः दशक बाद भी उन तमाम बातों का याद रखना इस बात का गवाह है कि महादेव को मैं कभी धोखा नहीं दिया। </p>
<p>इस दूकान और दूकान की पुस्तकों की छाया में पटना ही नहीं, अविभाजित बिहार के लाखों-करोड़ों छात्र-छात्राएं विद्यार्थी-अवस्था  से वयस्क हुए, और फिर वृद्ध भी ।  जिस तरह नए किताब के सफ़ेद पन्ने समय और उम्र के साथ अपना रंग बदलते, एक गजब की खुसबू छोड़ते सफ़ेद से सीपिया रंग का हो जाता है, जो इस बात का गवाह होता है की उसने अपने रंग यूँ ही नहीं बदले, बल्कि लोगों को जीने का सबक सीखाते बड़ा हुआ है – पटना के अशोक राज पथ पर स्थित नोवेल्टी एण्ड कम्पनी दूकान की सीढ़ियों पर बैठकर न जाने कितने लोग महज मनुष्य से इन्शान बने और इतिहास में अपना नाम हस्ताक्षरित किये। इस एक-मंजिले मकान में कुछ वर्ष दूकान चलायी गयी। 1966 जनवरी से पुराने एक मंजिला मकान तोड़ना प्रारम्भ कर 12 महीने के भीतर तारा भवन बन गया था ।</p>
<figure id="attachment_7278" aria-describedby="caption-attachment-7278" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7278" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7278" class="wp-caption-text">माँ​ और महिलाएं -तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>उन दिनों पटना अशोक राज पथ के बाएं तरफ पटना विश्वविद्यालय के कालेजों, जैसे पटना कालेज, साइन्स कालेज, मेडिकल कॉलेज का पिछले बॉउंड्री गंगा के किनारे समाप्त होता था। सम्पूर्ण इलाका खुला-खुला था। अशोक राज पथ से दाहिने तरफ कोई आधे-किलोमीटर और कम की दूरी पर एक-एक सड़क दाहिने नीचे निकलती थी, अशोक राज पथ के सामानांतर बारी पथ से मिलती थी। इसी बारी पथ (अब नया टोला) पर जहाँ खजांची रोड बारी पथ से मिलती थी, बाएं हाथ पर नोवेल्टी स्टेशनर्स दूकान थी। यह दूकान, आज की काजीपुर आवासीय मोहल्ला में प्रवेश लेने वाली गली के ठीक सामने स्थित नालंदा ब्लॉक सेन्टर थी। आज की पीढ़ी शायद खजांची रोड का भारत के राजनीतिक मानचित्र पर क्या महत्व है, नहीं जानते होंगे।  इसी खजांची रोड के बीचो-बीच (आधी दूरी अशोक राज पथ और आधी दूरी बरी पथ) दाहिने तरफ एक दो मंजिला मकान पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री श्री विधान चंद्र रॉय का जन्मस्थान है। </strong></p>
<p>विधान चंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई, 1882 को पिता प्रकाश चंद्र रॉय और माता अघोर कामिनी देवी के घर में हुआ था। आज भी वह स्थान बिधान चंद्र रॉय की माता “अघोर” को समर्पित है और वहां एक बच्चों का विद्यालय है – अधोर शिशु विद्या मंदिर।  विधान चंद्र रॉय की प्रारम्भिक शिक्षा पटना के अशोक राज पथ पर स्थित, या यूँ कहें कि आज के नोवेल्टी एंड कंपनी दूकान से कोई पांच सौ गज की दूरी पर स्थित टी के घोष अकादमी और पटना कॉलेजिएट स्कूल में 1897 तक हुआ था। बाद में, उन्होंने आईए प्रेसिडेंसी कालेज कलकत्ता से और बी ए (गणित में सम्मान के साथ) पटना कालेज से किये।   श्री रॉय जनबरी 1948 से जुलाई 1962 तक कोई साढ़े बारह वर्ष तक पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री रहे। </p>
<p>बहरहाल, इस नोवेल्टी में तीन तल्लों में पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहते थे। उन छत्रों में पटना चिकित्सा महाविद्यालय के छात्र भी थे। जहाँ तक सरस्वती पूजा का सवाल है, पटना विश्व्वियालय का सरस्वती पूजा बहुत नाम होता था और बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता था। विश्वविद्यालय के सभी महाविद्यालयों &#8211; पटना विमेंस कॉलेज, बी एन कॉलेज, मगध महिला कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, पटना कॉलेज, साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, न्यू हॉस्टल, जीडीएस हॉस्टल &#8211; छात्रावास में पूजा अर्चना बहुत धूमधाम से होता था। सत्तर के दशक में कई वर्षों तक मेडिकल कॉलेज में सरस्वती पूजा अर्चना करने का दायित्व बाबूजी पर होता था। वजह था नोवेल्टी में मेडिकल कॉलेज के छात्रों का रहना। मैं उसी भवन में लिफ्ट चलाया करता था। बाबूजी का मेडिकल कालेज के छात्र-छात्राएं बहुत सम्मान करते थे। सरस्वती पूजा के दिन दर्जनों छात्र-छात्राएं बाबूजी के लिए धोती, कुर्ता, छाता, ओढ़ना, अन्न, द्वव्य, अन्न आदि निजी तौर पर भी देते थे। </p>
<figure id="attachment_7279" aria-describedby="caption-attachment-7279" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7279" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7279" class="wp-caption-text">देवी और कलाकार &#8211; तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>उस साल मेडिकल कालेज में अंतिम वर्ष के छात्र एक सरदार जी थे। देखने में बेहद सुन्दर और पढ़ने में अति कुशाग्र। कभी भी उनका परीक्षा परिणाम शिथिल नहीं हुआ था। कालेज के सभी छात्र छात्राएं, चाहे सहपाठी हों या कनिष्ठ, शिक्षक हों या शिक्षकेत्तर कर्मचारी, सभी के लिए वे सम्मानित थे। उन्हें अपने की वर्ग की एक छात्र से, जो पढ़ने में बहुत अब्बल थी, विशेष लगाव था । वर्ग के छात्र-छात्राओं के अलावे परिसर के सभी व्यक्ति उनका भी बहुत सम्मान करत्ते थे। सरदार जी का मन उस महिला सहपाठी के प्रति सकारात्मक था।  मन ही मन बहुत प्रेम करते थे उसे। अभी पूजा के लिए विधि-विधान चल रहा था। बाबूजी सरस्वती की मूर्ति के सामने पूजा अर्चना के लिए सामग्रियां एकत्रित कर रहे थे। अंतिम वर्ष के छात्र होने के कारण सभी यह जानते थे कि अगले वर्ष की पूजा में कौन कहाँ रहेंगे यह मालूम नहीं। सरदार जी नोवेल्टी अक्सर आते थे। </p>
<p><strong>पूजा के सामने कई मन प्रसाद, वस्त्र, मिठाइयां, बुँदिया आदि रखे थे। सम्पूर्ण वातावरण में पुष्प-धुप-दीप का सुगंध उपस्थित था। बाबूजी पूजा अर्चना में मग्न थे। जैसे ही बाबूजी अपने हाथ में आरती के लिए थाली सजाये, दीप प्रज्वलित किये, बगल से एक अंतिम वर्ष की छात्रा कहती है: &#8220;अन्नू बोल दो। पंडित जी बैठे हैं।&#8221; अचानक सभी की निगाहें &#8216;अन्नू जी&#8217; की और उठ गयी और वे सामने सरदजी को देखकर जमीन की ओर देखने लगी। सरदार जी समझ गए। वे भी चाहते थे कुछ ऐसा ही माहौल बने जिससे मन की बात मुख होठों पर आ जाये। वे आगे बढ़े और बाबूजी का हाथ पकड़कर कहते हैं: &#8220;गोपाल बाबू, मेरे पिताजी तो अभी यहाँ उपस्थित नहीं हैं, लेकिन आपको, माँ सरस्वती को और यहाँ उपस्थित सभी मित्र मंडलियों को साक्षी मानकर मैं अनु जी से विवाह करने का प्रस्ताव रखता हूँ यदि वह स्वीकार करे। सम्पूर्ण वातावरण प्रेममय हो गया। अन्नू जी आगे आयीं और देवी सरस्वती की पैरों से अबीर उठाकर सरदार जी के गालों पर लगा दी।&#8221; आज भी वह दृश्य याद आता है तो मन प्रसन्नचित हो जाता है। </strong></p>
<figure id="attachment_7280" aria-describedby="caption-attachment-7280" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7280" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7280" class="wp-caption-text">माँ, देवी और पूजा-अर्चना &#8211; तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>आम तौर पर पटना में सरस्वती पूजा के सात दिन पहले से स्थान की साफ़ सफाई, चंदा एकत्रीकरण, प्रसाद आदि का विवरण, आगंतुकों की संख्या पर विचार विमर्श प्रारम्भ हो जाता था। शहर के जितने विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास होते थे, पूजनोत्सव का माहौल बन जाता था। न्यूनतम दो दिन का अवकाश तो होता ही था। सरस्वती पूजा के दिन कोई भी पढ़ने-लिखने का नाम नहीं लेता था। इस दिवस को समयांतराल माता-पिता अपने-अपने पुत्र-पुत्रियों के लिए &#8216;वर&#8217; अथवा  &#8216;वधु&#8217; देखने के लिए भी करने लगे थे ।</p>
<p>जब 1975 में पटना से प्रकाशित आर्यावर्त और इंडियन नेशन पत्र-समूह में नौकरी शुरू किया, महज माध्यमिक कक्षा उत्तीर्ण का प्रमाण पत्र और आगे पढ़ने की भूख लिए पत्रकारिता की पहली सीढ़ी पर पैर रखा तो पटना शहर में सरस्वती की प्रतिमा को बनाने वालों के जगहों पर आना-जाना शुरू हुआ, कुछ कहानी के लिए तो कभी तस्वीरों के लिए। उस ज़माने में मैं &#8216;टेनिया&#8217; के रूप में अपने वरिष्ठ संवाददाता और छायाकार की सवारी के पीछे बैठ जाया करता था। पटना सिटी के अलावे गाँधी मैदान के दक्षिणी कोने पर जहाँ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के सामने और गाँधी मैदान थाना के बीच खाली स्थान में कलाकार मूर्तियां बनाते थे। यही कालिदास रंगालय भी हुआ करता था। इस स्थान के अलावे मूर्तियां इनकम टैक्स भवन से बाएं हाथ जाती सड़क, जहाँ परिवहन भवन होता था, के बाएं हाथ खुले मैदान में भी मूर्तियां बनायीं जाती थी। इसके अलावे बांस घाट से आगे राजपुर के पास, जहाँ से बाएं हाथ बोरिंग केनाल रोड के लिए लुढ़कते थे, खाली स्थानों पर मूर्तियां बनती थी। </p>
<figure id="attachment_7281" aria-describedby="caption-attachment-7281" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7281" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7281" class="wp-caption-text">तस्वीर पंकज प्रसून के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>उस ज़माने के सर्चलाइट के संवाददाता लव कुमार मिश्र</strong>, जो बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार हुए कहते हैं: &#8220;उस जमाने में मैं गर्दनी बाग़ में रहता था। हमारे इलाके के ठाकुरबाड़ी में भी सरस्वती पूजा बहुत धूमधाम से होता था, लेकिन हम निश्चित तौर पर साईकिल उठाकर पहले अपने कालेज (पटना कालेज) पहुँचते थे, जहाँ कॉमन रूम के तरफ इसका आयोजन होता था। यहाँ से पटना कालेज परिसर के सभी छात्रावासों के रास्ते जीडीएस महिला छात्रावास, साइंस कालेज होते लॉ कालेज तक पहुँचते थे। इस बीच जहाँ जहाँ प्रसाद मिलता था साइकिल के बास्केट में रखते कहते थे। लॉ कालेज से मेरा सीधा गंतव्य मगध महिला कॉलेज होता था। उन दिनों मैं सर्चलाइट में काम करना शुरू कर दिया था, काफी इज्जत होती थी। मगध महिला कालेज में पूजा-अर्चा का भार डॉ.वीणा कर्ण पर होती थी, इसलिए वे कभी भी लड्डू, बुंदिया देने में कोताही नहीं करती थी। बैर, केला या अन्य फल-फूल को पहले ही हटा देती थी। आज समय के साथ-साथ सोच में भी परिवर्तन हो गया है।&#8221;</p>
<p>आज के <strong>वरिष्ठ पत्रकार और उन दिनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र पटना सिटी मंगल तालाब के ज्ञान वर्धन मिश्र</strong> कहते हैं: &#8220;उन दिनों चुकी निजी क्षेत्र के विद्यालयों का कुकुरमुत्तों जैसा विकास नहीं हुआ था, सभी सरकारी विद्यालय थे, सरस्वती पूजा बहुत ही धूम हम से मनाया जाता था। माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरे पिताजी (श्री रामजी मिश्र मनोहर&#8217;) मुझे पटना सिटी के गुरु गोविंद सिंह कालेज में नामांकन करा दिए। हमारे कॉलेज में सरस्वती की मूर्ति नहीं बैठती थी। उसी वर्ष छात्र संघ का चुनाव हुआ और हम विद्यार्थी परिषद के तरफ से मंत्री के रूप में चुने गए। फिर उस वर्ष आयोजित सरस्वती पूजा में पहली बार मूर्ति की स्थापना हुयी। उस समय कॉलेज के प्राचार्य थे सरदार बलवंत सिंह, जो बाद में मेरी इस हरकत के लिए कार्रवाई करने पर आमादा थे। वे काफी डराए, धमकाए। किसी की हिम्मत नहीं थी की उस कॉलेज में मूर्ति पूजन करे। खैर उस वर्ष बहुत ही धूमधाम से पूजा संपन्न हुआ। इंटर पास होते ही मैं वहां से पटना कालेज की ओर भागा। </p>
<figure id="attachment_7282" aria-describedby="caption-attachment-7282" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7282" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7282" class="wp-caption-text">तस्वीर पंकज प्रसून के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, आज देश के विद्यालयों में, खासकर निजी क्षेत्र के विद्यालयों में सरस्वती पूजा अर्चना करने की परंपरा समाप्त ही नहीं, लुप्त हो गयी है। अपवाद छोड़कर छुट्टियां भी नहीं होती। छात्र-छात्राएं भले विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हों, लेकिन विद्या की देवी की पूजा अर्चना नहीं होती है। न शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख अथवा स्थानीय प्रशासन ही इस दिशा में कोई पहल करती। हाँ, इस वर्ष दिल्ली के साथ साथ उत्तर प्रदेश, बिहार  में सरस्वती पूजा के दिन अवकाश की घोषणा की गयी &#8211; वह भी रिस्ट्रिक्टेड। इतना ही नहीं, आगामी 15 अगस्त को हम अपनी आजादी जा 79 वर्षगांठ मनाएंगे और इन 79 वर्षों में देश की आबादी में जितना इजाफा हुआ, शैक्षणिक स्तर में हम पीछे रह गए, आप माने अथवा नहीं। सं १९४७ में देश की आवादी करीब 34 करोड़ थी और आज 79 वर्षों में 147 करोड़ का अनुमान लगा रहे हैं। आंकड़ा यह बताता है कि आज़ादी के वक्त देश में शैक्षिक दर तक़रीबन 13 फीसदी थी। आज 79 वर्ष के बाद व्यावहारिक रूप से 79 फीसदी भजि नहीं पार किये हैं। सैद्धान्ति रूप से आंकड़ा जो भी लिखा जाय।</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/saraswatipuja-and-indias-literacy-rate">79 वर्ष की आज़ादी, 34 करोड़ से 147 करोड़ की आबादी, 13% से 79% शैक्षिक-दर और सरस्वती पूजा यानी &#8216;हाते खोड़ी&#8217; अनुष्ठान</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार विधानसभा चुनाव : 35-वर्ष पहले जब आनंद मोहन &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; सिनेमा का कॉपी-पेस्ट किये थे, आज महिला पत्रकार कर रहीं हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Oct 2025 13:03:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[anand mohan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>डाक बंगला चौराहा (पटना) : बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है। आगामी 6 और 11 नवम्बर को चुनाव होना है। विगत दिनों सोशल मिडिया के प्लेटफॉर्म पर एक महिला टीवी संवाददाता को विधानसभा के सामने घोड़ा पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा। शायद पहली घटना होगी। मोहतरमा को देखकर सन 1971 में अख्तर रोमानी लिखित, राज खोसला द्वारा निर्देशित, लक्ष्मीकांत [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/bihar-assembly-elections-and-horseback-reportimg">बिहार विधानसभा चुनाव : 35-वर्ष पहले जब आनंद मोहन &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; सिनेमा का कॉपी-पेस्ट किये थे, आज महिला पत्रकार कर रहीं हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डाक बंगला चौराहा (पटना) : बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है। आगामी 6 और 11 नवम्बर को चुनाव होना है। विगत दिनों सोशल मिडिया के प्लेटफॉर्म पर एक महिला टीवी संवाददाता को विधानसभा के सामने घोड़ा पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा। शायद पहली घटना होगी। मोहतरमा को देखकर सन 1971 में अख्तर रोमानी लिखित, राज खोसला द्वारा निर्देशित, लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध और धर्मेंद्र &#8211; विनोद खन्ना द्वारा अभिनीत फिल्म “मेरा गाँव मेरा देश” के साथ-साथ बाहुबली से राजनेता बने &#8216;आनंद मोहन&#8217; एक साथ याद आ गया । घटना आज से 35-वर्ष पूर्व की है। </strong></p>
<p>शायद आज के पत्रकारों को मालूम नहीं होगा कि &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; &#8216;अपराधी से राजनेता बने&#8217; उन दिनों के उभरते आनंद मोहन को बहुत अच्छा लगता था। आनंद मोहन उस सिनेमा में अभिनेताओं के साज-सज्जा को देखकर बहुत प्रभावित थे। जिसका प्रभाव आज तक जारी है। वे बॉलीवुड के कलाकार &#8216;जितेंद्र के सफ़ेद वस्त्र&#8217; से भी बहुत प्रभावित थे। </p>
<p>बिहार के लोग जो आज न्यूनतम 35 वर्ष के भी होंगे, उनके जन्म से पहले की यह तस्वीर है आनंद मोहन का। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर खुलेआम कहते थे कि धनबाद का कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह और कोसी क्षेत्र का आनंद मोहन उनके ‘मित्रवत’ हैं और वे ‘मित्रता का सम्मान’ करते हैं। सूर्यदेव सिंह का कोयला माफिया होना, उनकी पेशा है कोयला के क्षेत्र में, हीरा ढूंढने के लिए अगर वे कुछ भी करते हैं तो यह उनका व्यावसायिक क्रियाकलाप है । </p>
<blockquote><p>उसी तरह कोशी के आनंद मोहन प्रदेश की राजनीति में ही नहीं, दिल्ली के राजपथ पर भी अपना अधिपत्य ज़माने की कोशिश कर रहे हैं, यह उनकी चाहत है, होनी भी चाहिए क्योंकि राजनीति में बहुत पापड़ बेलना होता है, और वे बेलन की लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई माप रहे हैं, मापना भी चाहिए। चंद्रशेखर हमेशा चाहते थे कि आनंद मोहन “मजबूत” बने।  समाज में हरेक बड़े-बुजुर्ग युवकों को उनकी योग्यता के अनुसार “मजबूत” बनने की सलाह देते थे।</p></blockquote>
<p>इसलिए जिस क्षेत्र में “तेज और तर्रार” है, उसी में आगे बढ़े, आषीश देते हैं। फिर क्या था, आनंद मोहन “बाहुबली” बन गए। दोनों को चंद्रशेखर बहुत ही सम्मान करते थे। इधर सूर्यदेव सिंह और आनंद मोहन भी उनका उतना ही सम्मान करते थे। आज की नेताओं जैसा नहीं की जैसे ही अपना स्वार्थ सिद्ध हुआ, सामने वालों को पहचानने से भी मुकर जाते हैं। खैर।</p>
<p>यह उन दिनों की बात है जब चंद्रशेखर अपने राजनीतिक जीवन के उत्कर्ष पर थे और बिहार के लालू प्रसाद यादव चंद्रशेखर से आनंद मोहन के लिए ‘शिकायत’ किये थे। यह अलग बात थी कि उसी काल में पूर्णिया के पप्पू यादव भी कनक को बन्दुक की नोक पर रखे थे, अधिकारियों को पैर के नीचे रखते थे; लेकिन लालू प्रसाद के लिए पपू यादव का वह क्रिया-कलाप बचपना था, क्योंकि वे लालू के अपने थे। लालू प्रसाद अपने गुरुदेव चंद्रशेखर से यह भी निवेदन किये कि आनंद मोहन को रोकिये। क्योंकि आनंद मोहन को रोकने का कार्य उन दिनों भारत की चौहद्दी में सिर्फ और सिर्फ चंद्रशेखर ही कर सकते थे। लेकिन चंद्रशेखर लालू प्रसाद को खुश नहीं किये और कहे: “उसे रोको नहीं …छोड़ दो उसे। समय आने पर वह खुद समर्पित कर देगा।”</p>
<p>उस ज़माने में आनंद मोहन और पप्पू यादव में आज़ादी की दूसरी लड़ाई जैसी ताकत की आजमाइश हो रही थी। नित्य खेत-खलिहान, गली-कूची, सड़क, कारखाने में, या यूँ कहें कि उत्तर बिहार में सहरसा-मधेपुरा-सुपौल-पूर्णिया-कटिहार आदि क्षेत्रों में शायद ही कोई इलाका बचा होगा जहाँ खून की होली नहीं खेली गयी थी। चतुर्दिक दोनों गुटों के लोगों का जीता-जागता शरीर “पार्थिव” हो रहा था। सम्पूर्ण क्षेत्र में ख़ौफ़ का माहौल था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1.jpg" alt="" width="1341" height="1883" class="aligncenter size-full wp-image-7161" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1.jpg 1341w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-214x300.jpg 214w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-729x1024.jpg 729w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-768x1078.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-1094x1536.jpg 1094w" sizes="auto, (max-width: 1341px) 100vw, 1341px" /></a></p>
<p><strong>उन्ही दिनों पटना के बी एन कालेज का एक बंगाली छात्र, जो स्वयं को फोटोग्राफी की दुनिया में सुपुर्द कर देना चाहता था, हाथ में एक छोटा सा मैनुअल निकोन कैमरा लेकर अपनी किस्मत को आजमाने  पटना की सड़कों पर उतरा था। खाकी रंग का वाटर-प्रूफ कैमरा बैग अपने दाहिने कंधे पर लटकाकर एक स्ट्रिंगर के रूप में फोटो खींचना प्रारम्भ किया था अपनी रोजी-रोटी के लिए। इसी बीच, लालू-चद्रशेखर संवाद स्थानीय अख़बारों में प्रकाशित होती है। आनंद मोहन और पप्पू यादव को तत्कालीन स्थानीय अख़बारों में जगह तो मिलता था, लेकिन घटना के कई दिनों बाद। </strong></p>
<p>उस ज़माने में संचार के ऐसे कोई साधन नहीं थे जो क्षण-क्षण की सूचना को इस पार से उस पार कर दे। स्थानीय पत्रकार हाथ से लिखते थे, या फिर टाइप करते थे कहानियों को फिर डाक से भजते थे। टेलीप्रिंटर का जमाना था, लेकिन ‘समाचारों के लिए’, बड़ी-बड़ी कहानियां डाक से ही प्रेषित की जाती थी। अगर उन कहानियों के साथ कुछ तस्वीर मिली तो वाह-वाह , नहीं मिली तो भी वाह-वाह। समाचार जब तक प्रकाशित होता था तब तक दूसरी घटना हो जाती थी। टेलीप्रिंटर तो था, लेकिन  जिला संवाददाताओं के पास नहीं होता था। खैर। </p>
<p>उस ज़माने में इलाहाबाद से एक हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन होता था। नाम “माया” था। “माया” के तत्कालीन बिहार के संवाददाता विकास कुमार झा आनंद मोहन पर एक कहानी करना चाहते थे। शायद विकास कुमार झा &#8216;पहला और अंतिम पत्रकार&#8217; हैं जो अपना पूरा नाम लिखते थे। आज तो &#8216;कुमार&#8217; शब्द में भी &#8216;छटनी&#8217; हो गया है और अधिकांश लोग कुमार को &#8216;के&#8217; में बदल दिए हैं। विकास कुमार झा का जन्म 1961 में बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में बतौर पत्रकार जीवन प्रारम्भ किये थे। आनंद मोहन-पप्पू यादव पर कहानी के लिए  जरुरत थी तस्वीरों की, क्योंकि तस्वीरों के बिना कहानी विधवा जैसी होती है । </p>
<p><strong>यहीं उस बंगाली छायाकार की किस्मत आनंद मोहन के साथ जुड़ गयी। एक तस्वीर, एक ओर जहाँ आनंद मोहन को बिहार में ही नहीं, सम्पूर्ण देश में, विदेशों में बाहुबली बना दिया, नाम-शोहरत को दिल्ली के क़ुतुब मीनार पर चढ़ा दिया, उस छायाकार की भी उस ऐतिहासिक तस्वीर के लिए चर्चाएं होने लगी। उन दिनों उस तस्वीर को प्राप्त करने के लिए पटना के उस ज़माने के छायाकारों ने न जाने कितने लोभ-प्रलोभ दिए, लेकिन बंगाली छायाकार हिला नहीं। नाम संजीव बनर्जी है।  </strong></p>
<p>पटना ही नहीं बिहार के पत्रकार अथवा छायाकार आज शायद नहीं जानते होंगे की आनंद मोहन की उस  ऐतिहासिक तस्वीर का “फ्रेम” बनाने के लिए उन दिनों संजीव बनर्जी और सुनील झा किन-किन परिस्थितियों से गुजरे थे, आज के छायाकार कल्पना नहीं कर सकते हैं। संजीव बनर्जी और सुनील झा दोनों बस से पटना से सहरसा के लिए निकले। दोनों आनंद मोहन के एक हितैषी थे और कांग्रेस के नेता थे सुधीर मिश्रा जी से पहले संपर्क स्थापित कर लिए थे। </p>
<p><strong>सहरसा पहुँचने पर वे दोनों रात में वहीं रुके। मिश्रा जी के सहयोग से आनंद मोहन बाबा-आदम का एक पुराना, खटारा एम्बेसडर कार दोनों को लाने के लिए भेजे थे। सहरसा से दोनों आनंद मोहन के गांव पंचगछिया के लिए निकले। रात्रि विश्राम पंचगछिया में था। अगली सुबह दोनों एक गंतब्य स्थान के लिए उसी गाडी से निकले। साथ में आनंद मोहन के भी “आदमी” थे। कुछ  दूर निकलने के बाद संजीब बनर्जी और सुनील झा दोनों की आखों पर कपड़ा बाँध दिया गया ताकि रास्ते का अंदाजा नहीं मिल सके। सुधीर मिश्रा जी का ससुराल नेपाल की तराई में था, जहाँ आनंद मोहन अड्डा जमाये हुए थे। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2.jpg" alt="" width="1336" height="1662" class="aligncenter size-full wp-image-7162" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2.jpg 1336w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-241x300.jpg 241w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-823x1024.jpg 823w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-768x955.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-1235x1536.jpg 1235w" sizes="auto, (max-width: 1336px) 100vw, 1336px" /></a></p>
<p>जिस स्थान पर आनंद मोहन अपना ठिकाना बनाये थे वहां पहुँचने पर ही आँखों से पट्टी हटाया गया। उद्देश्य तस्वीर तरोताजा तस्वीर खिंचा था जिससे विकास कुमार झा कहानी लिखें और तस्वीरों के साथ कहानी का प्रकाशन हो। दोनों पत्रकारों को आवभगत करने में आनंद मोहन और उनके लोग कोई कसार नहीं छोड़े थे, लेकिन दोनों पत्रकारों का रक्तचाप संतुलन से बहुत अधिक था। इस बात की कल्पना आज विधानसभा के सामने घोड़े पर बैठकर टीवी के लिए एंकरिंग करने वाली पत्रकार महोदय नहीं समझेंगी। </p>
<p>दर्जनों राइफल, दो नाली बन्दुक, पिस्टल और अन्य अस्त्र-शस्त्र के साथ सैकड़ों तस्वीरें क्लिक-क्लिक हुए। तभी आनंद मोहन को मेरा गाँव मेरा देश का विनोद खन्ना और धर्मेंद्र याद आ गए। वस्त्र बदला गया। सफ़ेद घोड़ा लाया गया। घोड़ा को साफ़-सुथरा किया गया। गद्दी लगाया गया। आंनद मोहन उस घोड़े पर विराजमान हुए। आनद मोहन बाएं हाथ से विनोद खन्ना जैसा घोड़ा का लगाम पकडे थे और दाहिने हाथ में पिस्तौल लिए दर्जनों फोटो क्लिक क्लिक हुआ । </p>
<p><strong>अब बात आयी एक ऐसी तस्वीर जो पत्रिका का कवर हो। बस क्या था सफ़ेद फुलपैंट, कमीज में तनिक तिरछा होकर बैठे।  पिस्तौल का नोक आसमान की ओर किये। आजु-बाजू आनंद मोहन के हितैषीगण, अंगरक्षक सभी बन्दुक, राइफल लेकर खड़े हो गए –  क्लिक-क्लिक हुआ। उस ज़माने में रंगीन तस्वीर बहुत कम खींची जाती थी।  रंगीन फोटो वाले निगेटिव को “टी पी” कहते थे। डिजिटल कैमरा भी नहीं था। अगर किन्ही के पास होता भी था तो वे समाज से अलग संभ्रांत छायाकार होते थे। अब इस बनर्जी के पास तो फिल्म खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे तो अधिक क्लिक-क्लिक भी नहीं कर सकता था। </strong></p>
<p>कहते हैं “जान बचे तो लाख उपाय”, दोनों हनुमान चालीसा पढ़ते पुनःमुसको भवः हुए – उसी तरह, आखों पर पट्टी बाँध दिया गया। वापसी में पहुंचे मधेरपुरा के जिलाधिकारी के पास। उस ज़माने में जयन्तो दासगुप्ता माडपुरा के जिलाधिकारी थे जो लालू के “खास” थे। मधेपुरा उन दिनों आनंद मोहन – पप्पू यादव का कुरुक्षेत्र था। दोनों में से कोई भी हथियार रखना नहीं कहते थे। खैर जयन्तो दासगुप्ता भी कदम कुआं पटना के थे।  उनके दादाजी थे प्रमाथो दासगुप्ता, जहाँ संजीव बनर्जी बचपन में खेलने-कूदने जाया करते थे।  बस क्या था – दो बंगाली इकठ्ठा हुए, बचपन की बातें दुहराई गयी और आनंद मोहन-पप्पू यादव कुरुक्षेत्र का विस्तार से विन्यास हुआ। सुनील झा सभी बातें अपनी डायरी पर लिख रहे थे। </p>
<p><strong>पटना आते ही, संजीव हम लोगों के ज़माने के माणिकदा @ सत्यजीत मुखर्जी के स्टूडियो “फोटो-मेकर” पहुंचे। निगेटिव साफ़-सुथरा हुआ, तस्वीर निकली और फिर ‘माया’ के दफ्तर में हाजिर हुए झाजी और बनर्जी। विकास कुमार झा कहानी लिख रहे थे। तस्वीर देखने के बाद विकास कुमार झा ने संजीव को तत्काल इलाहाबाद रावण किये तस्वीरों के साथ। इधर पटना में जब छायाकारों को मालूम हुआ की संजीब बनर्जी तस्वीर बनाकर लाये हैं, सभी “मुझे दो-मुझे दो” करने लगे। जब संजीब इलाहाबाद पहुंचे तब ‘माया’ पत्रिका में एक ‘लेखक-ब्रह्मास्त्र’ हुआ करते थे बाबूलाल शर्मा जी। बबूलाल जी तस्वीर देखे। विकास झा की कहानी को पढ़े और जो कहानी बनी वह ऐतिहासिक थी – ये है बिहार (माया, अंक 31 दिसंबर, 1991) </strong></p>
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		<title>छायाकार कृष्ण मुरारी किशन की वह &#8216;ब्रेकहीन, घंटीहीन, मडगार्डहीन साईकिल&#8217; और प्रधानमंत्री द्वारा पूर्णिया हवाई अड्डा का लोकार्पण </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Oct 2025 12:13:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / नई दिल्ली : विगत माह 15 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मिथिलांचल के पूर्णिया में जब हवाई अड्डा का आधिकारिक तौर पर बिहार के लोगों को समर्पित कर रहे थे, उस क्षण विश्व के किसी भी कोने में रहने वाले पूर्णिया के लोग अपने शहर से जुड़ने की बात [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / नई दिल्ली : विगत माह 15 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मिथिलांचल के पूर्णिया में जब हवाई अड्डा का आधिकारिक तौर पर बिहार के लोगों को समर्पित कर रहे थे, उस क्षण विश्व के किसी भी कोने में रहने वाले पूर्णिया के लोग अपने शहर से जुड़ने की बात सोच रहे हों, मेरी आँखों के सामने बिहार के एक सम्मानित छायाकार की छवि नाचने लगा था। काश !! नीतीश कुमार पुनः मुख्यमंत्री बनने के साथ, कृष्ण मुरारी किशन को राष्ट्रीय नागरिक सम्मान से अलंकृत करने की सिफारिश करते। </strong></p>
<blockquote><p>सोचने लगा काश !!! वह छायाकार आज जीवित होता तो अपनी &#8216;ब्रेकहीन&#8217;, &#8216;घंटीहीन&#8217;, &#8216;मडगार्डहीन&#8217;, &#8216;चेनकवरहीन&#8217; साईकिल की ओर प्रधानमंत्री को जरूर लाता, या फिर प्रधानमंत्री स्वयं पैदल चलकर उस छायाकार के रॉकेटनुमा साईकिल को &#8216;नमन&#8217; करने जरूर आते, जिसने सत्तर के दशक में बिहार की सड़कों पर, खेतों में, खलिहानों में, शैक्षणिक संस्थानों में, अस्पतालों में, कारावासों में उस छायाकार का साथ देकर तस्वीरों से इतिहास रचा था। यह अलग बात है कि उसी कालखंड में पटना की सडकों पर अपने चप्पलों के साथ-साथ अपनी राजनीतिक भविष्य को रगड़ने वाले नीतीश कुमार को वह छायाकार याद भी नहीं आया होगा। नेता ऐसे ही होते हैं।</p></blockquote>
<p>कृष्ण मुरारी &#8216;किशन&#8217; जिसने बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर अपनी साईकिल की पहियों से फोटोग्राफी का बुनियाद रखा था। आज जब पटना का हवाई अड्डा का रनवे नई रोशनी में जगमगा रहा था, बिहटा उड़ान भरने की तैयारी हो रही थी, दरभंगा दैनिक प्रस्थान के साथ गुनगुना रहा था, गया आस्था और इतिहास के माध्यम से महाद्वीपों को जोड़ रहा था, और पूर्णिया अपने पहले यात्रियों का स्वागत करने के लिए सज्ज था &#8211; कृष्ण मुरारी किशन की आत्मा अपनी उस ऐतिहासिक साईकिल के साथ खड़े-खड़े प्रदेश के उज्जवल भविष्य को देख रहा था। आज हवाई अड्डों पर कर्मियों के साथ-साथ, मंत्रियों और अधिकारियों के हाथ में &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; था, जो तस्वीर खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे। उन दिनों ऐसी बात नहीं थी। </p>
<p><strong>उन दिनों, आर्यावर्त, द इंडियन नेशन, सर्चलाइट और प्रदीप बिहार के प्रमुख समाचार पत्र थे। फोटो पत्रकारिता के बारे में कोई नहीं जानता था। किशन नियमित रूप से इंडियन नेशन और आर्यावर्त को जेपी आंदोलन की तस्वीरें उपलब्ध कराते थे। अवध कुमार झा, जो दोनों समाचार पत्रों को प्रकाशित करने वाले समूह के मुख्य संवाददाता थे, ने उन्हें यह काम सौंपा था। अखबार उन्हें पारिश्रमिक तो देते ही थे, जेपी उन्हें तस्वीरें बनाने में खर्च होने वाले पैसे भी वापस कर देते थे। उस समय आंदोलन की शुरुआत की नींव रखी जा रही थी। किशन का मिशन राज्य और राष्ट्रीय मीडिया, दोनों को आंदोलन की गतिविधियों से अवगत कराना था। किशन का 1 फरवरी 2015 को निधन हो गया।</strong></p>
<p>इधर, पूर्णिया में हवाई अड्डा के लोकार्पण के बाद यह कहा जाने लगा कि पटना में एक धुंध भरी सर्दियों की सुबह, जैसे ही दिन की पहली उड़ान धुंध को चीरती हुई गुज़रती है, सैकड़ों यात्री नए टर्मिनल पर बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। परीक्षा देने जा रहे घबराए हुए छात्रों के अलावा विवाह में जाने के लिए उत्साहित परिवारों से लेकर व्यापार की तलाश में लगे कुशल उद्यमियों तक, टर्मिनल उड़ान भरने के लिए तैयार कहानियों से गुलज़ार है। कुछ समय पहले तक, इन यात्राओं का अर्थ सिर्फ ट्रेन या बस में घंटों सफ़र करना होता था। आज, बिहार का आसमान नए टर्मिनलों, नए मार्गों और बढ़ते पंखों की एक अलग कहानी बयां कर रहा है। समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और बढ़ती आर्थिक आकांक्षाओं से युक्त राज्य बिहार में, विमानन क्षेत्र राष्ट्रीय और वैश्विक पहुंच के साथ एक परिवर्तनकारी परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है।</p>
<p>हाल की परियोजनाओं ने पटना, दरभंगा, गया, बिहटा और पूर्णिया को शेष भारत से जोड़ते हुए बिहार को पहले से कहीं अधिक प्रमुखता से विमानन मानचित्र पर ला दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने पूर्णिया हवाई अड्डे के न्यू सिविल एन्क्लेव में अंतरिम टर्मिनल भवन का उद्घाटन करते हुए हवाई संपर्क के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाया। नई सुविधा यात्री प्रबंधन क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है, जिससे क्षेत्र में हवाई यात्रा की बढ़ती मांग को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए हवाई अड्डे की स्थिति  और अत्याधुनिक बन जाती है। यह न केवल बिहार के विमानन बुनियादी ढांचे को मजबूत करता है, बल्कि राज्य के प्रमुख जिलों में से एक में आर्थिक गतिविधि, पर्यटन और पहुंच को बढ़ावा देने का भी वादा करता है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-scaled.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1526" class="aligncenter size-full wp-image-7108" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-300x179.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-1024x610.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-768x458.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-1536x915.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/2-2048x1221.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>उधर पटना में भी, लोग कह रहे हैं कि विशाल लाउंज, कुशल चेक-इन सिस्टम और आराम के लिए निर्मित सुविधाओं के साथ, एक चमचमाता हुआ नया टर्मिनल अब पटना के जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तैयार है और बिहार की विमानन यात्रा में एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है। आधुनिक वास्तुकला और उन्नत यात्री सुविधाओं के साथ डिज़ाइन किया गया, टर्मिनल वार्षिक 10 मिलियन यात्रियों को संभाल सकता है, एक ऐसा पैमाना जो बिहार की बढ़ती आकांक्षाओं से मेल खाता है। वर्ष  2014 से 2024 के दौरान, पटना हवाई अड्डा बिहार के विमानन नेटवर्क में एक प्रमुख नोड के रूप में उभरा, जिसने लगभग 3 करोड़ यात्रियों को संभाला, लगभग 83,000 टन माल ढुलाई की और सालाना 24,026 औसत विमानों की आवाजाही दर्ज की। </p>
<p><strong>विमानन गति को बढ़ावा देने की एक और उपलब्धि बिहटा हवाई अड्डे का विकास है। 1,413 करोड़ रूपए के निवेश वाली एक परियोजना, बिहटा वायु सेना स्टेशन में नए सिविल एन्क्लेव की आधारशिला रखी गई है जो पटना के पश्चिम में एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करेगी। 50 लाख यात्रियों को संभालने के लिए डिज़ाइन की गई इसकी आधुनिक सुविधाएं पटना के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की पूरक होंगी, जिससे क्षेत्र की कनेक्टिविटी और मजबूत होगी। बिहटा टर्मिनल आधुनिक विमानन वास्तुकला को बिहार के सुनहरे अतीत की गूँज के साथ मिश्रित करता है, जो मौर्य और गुप्त राजवंशों की भव्यता के साथ-साथ नालंदा और विक्रमशिला की विद्वतापूर्ण विरासतों से प्रेरणा लेता है। बिहटा न केवल उत्कृष्ट बुनियादी ढांचे में, बल्कि दृष्टिकोण के मामले में उन्नत है। यह बिहार के विमानन विकास के अगले चरण के लिए एक लॉन्चपैड बनने की ओर अग्रसर है, इससे आसान यात्रा को सक्षम बनाया जाएगा, व्यापार का समर्थन होगा और यह राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसरों को आकर्षित करेगा।</strong></p>
<p>वर्ष 2020 में उड़ान क्षेत्रीय संपर्क योजना के तहत चालू होने के बाद से, दरभंगा हवाई अड्डा तेजी से बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी बन चुका है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे प्रमुख महानगरों के लिए सीधी उड़ानों के साथ, इसने देश भर में अवसरों और गंतव्यों के द्वार खोल दिए हैं। अकेले वित्त वर्ष 2023-24 में, 5 लाख से अधिक यात्रियों ने दरभंगा को अपने लॉन्चपैड के रूप में चुना, प्रत्येक उड़ान एक संकेत है कि कनेक्टिविटी उनके द्वार पर पहुंच चुक है। दरभंगा का बढ़ता उड़ान नेटवर्क समावेशन का प्रतीक है। यह उत्तर बिहार के लोगों को भारत के शहरी केंद्रों के करीब लाता है, साथ ही उनकी संस्कृति, प्रतिभा और उद्यम को राज्य की सीमाओं से परे भी ले जाता है।</p>
<p>कुछ हवाई अड्डे गया की तरह इतिहास और आधुनिक यात्रा दोनों का प्रबंधन संभालते हैं। हर साल, यह छात्रों और पेशेवरों का स्वागत करता है, साथ ही बोधगया में बुद्ध के मार्ग पर चलने वाले हजारों तीर्थयात्रियों, भिक्षुओं और साधकों के लिए अपने द्वार भी खोलता है। 954 एकड़ में फैला और सटीकता के साथ निर्मित, यह 250 आगमन और 250 प्रस्थान  को संभालने में सक्षम है ।गया हवाई अड्डा बिहार को दुनिया के बौद्ध स्थलों से जोड़ने वाले एक सांस्कृतिक सेतु के रूप में निरंतर प्रगति कर रहा है। यह बिहार की कालातीत विरासत को वैश्विक दर्शकों से जोड़ता है और भारत के विमानन मानचित्र पर राज्य को दृढता से स्थापित करता है।</p>
<blockquote><p>बहरहाल, सत्तर के दशक से अपने जीवन की अंतिम सांस तक कृष्ण मुरारी किशन बिहार राज्य में हुए लगभग हर महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने कई ब्रेकिंग न्यूज़ स्टोरीज़ की तस्वीरें खींचीं। जोखिम उठाने से कभी नहीं हिचकिचाते हुए, उन्हें दो बार गोली लगी थी। वे कई मीडिया संस्थानों और समाचार एजेंसियों से जुड़े रहे। वे बिहार में समाचार फोटोग्राफी के एक स्तंभ थे। किशन का फोटोग्राफी करियर ऐतिहासिक बिहार आंदोलन के दिनों में शुरू हुआ। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य थे और संगठन की गतिविधियों में भाग लेने के लिए पटना के कदमकुआं स्थित कांग्रेस मैदान में अक्सर आते थे। </p></blockquote>
<p>कहते हैं, एक बार, मैदान से लौटते समय, वे जेपी से मिलने गए। किशन ने पानी पिया, कुछ देर बैठे और फिर घर चले गए। उनके अपने शब्दों में, &#8220;इस तरह, हम जेपी से लगभग हर दिन मिलते थे। उन दिनों, वे बिहार राहत समिति में एक उच्च पद पर थे। वे हमें नान खटाई परोसते थे। मुझे याद भी नहीं कि उन्होंने मुझे फोटोग्राफी के लिए कैसे और क्यों प्रेरित किया।&#8221; रघु राय और सत्यनारायण के साथ, वे बिहार आंदोलन का इतिहास लिखने वाले शीर्ष फोटोग्राफरों में से एक थे।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-scaled.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1575" class="aligncenter size-full wp-image-7109" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-300x185.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-1024x630.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-768x472.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-1536x945.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-2048x1260.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/3-356x220.jpeg 356w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>उन दिनों फोटो पत्रकारिता का कोई अस्तित्व नहीं था और अखबारों की संख्या बहुत कम थी। डिजिटल मीडिया अभी भी भविष्य में था। तस्वीरों को डेवलप करके &#8220;ब्लॉक&#8221; पर उकेरा जाता था। ब्लॉक तैयार करवाने के लिए उन्हें घंटों स्टूडियो में बैठना पड़ता था और फिर राष्ट्रीय अखबारों में छपवाने के लिए साइकिल से हवाई अड्डे जाना पड़ता था। लेकिन उन्होंने आंदोलन के हर पहलू को कैमरे में कैद करने का अपना दृढ़ संकल्प कभी नहीं छोड़ा, चाहे इसके लिए उन्हें पुलिस की लाठियों के कुछ वार ही क्यों न सहने पड़े। एक फोटोग्राफर के रूप में किशन का सफ़र कितना महँगा, जोखिम भरा और संघर्षों से भरा रहा होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।</p>
<p>किशन का जन्म (1952) एक पिछड़े लुहार (लोहार) परिवार में हुआ था। उनके पिता द्वारिका विश्वकर्मा पटना के दरियापुर गोला मोहल्ले में साइकिल मरम्मत की दुकान चलाते थे। किशन दुकान में अपने पिता का हाथ बटाते थे। बाद में, उन्होंने 20-25 साइकिल रिक्शा खरीदे और उन्हें किराए पर देकर जीविका चलाने लगे। किशन ने पटना कॉलेजिएट स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और 1968 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्होंने 1977 में पटना के कॉमर्स कॉलेज से आई.कॉम. की डिग्री हासिल की। वह चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहते थे। हालाँकि, अपनी पीढ़ी के कई लोगों की तरह, वह बिहार आंदोलन में शामिल होने के आह्वान का विरोध नहीं कर सके और कैमरा चलाने का फैसला किया, और अंततः एक प्रसिद्ध फोटो पत्रकार बन गए।</p>
<p><strong>कहते हैं कि जब वे अपनी प्री-यूनिवर्सिटी डिग्री की पढ़ाई कर रहे थे, तो जेब खर्च के लिए वे दो-तीन ट्यूशन लिया करते थे। संयोगवश, जिन लड़कियों को वे पढ़ाते थे, उनमें से एक के पिता के पास एक फोल्डिंग कोडक कैमरा था (जिससे एक फिल्म रोल में आठ तस्वीरें ली जा सकती थीं)। इसी कैमरे का इस्तेमाल शुरू करते ही फोटोग्राफी के प्रति उनका प्रेम शुरू हुआ। जल्द ही उन्होंने एक ल्यूबिटेल-2 कैमरा खरीद लिया, जिसकी कीमत उस समय ₹350 थी।</strong></p>
<p>किशन ने खुद को बिहार आंदोलन के दस्तावेजीकरण तक ही सीमित नहीं रखा। अपने लंबे करियर में, उन्होंने फोटो पत्रकारिता के सर्वोच्च मानक स्थापित किए। वे अपने काम के प्रति समर्पित थे और डर उनके लिए बिलकुल भी मायने नहीं रखता था। चाहे पुलिस अत्याचार हो या सामंती उत्पीड़न, या राजनीतिक उथल-पुथल या जनांदोलन, वे हमेशा मौके पर पहुँचने वाले पहले फोटोग्राफर होते थे। भागलपुर में अंधाधुंध गोलीबारी, इंदिरा गांधी की बेलछी यात्रा और अपने इलाके के लोगों को आतंकित करने वाले डाकू मोहन बिंद की उनकी तस्वीरें उनके करियर के मील के पत्थर साबित हुईं। उन्होंने ये तस्वीरें बिना किसी जोखिम की परवाह किए लीं। उनकी तस्वीरें रविवार, धर्मयुग और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं। उनका मानना था कि उनकी तस्वीरें उस स्थान के इतिहास को बताये। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/photographer-krishn-murari-kishan-should-be-awarded-with-padma">छायाकार कृष्ण मुरारी किशन की वह &#8216;ब्रेकहीन, घंटीहीन, मडगार्डहीन साईकिल&#8217; और प्रधानमंत्री द्वारा पूर्णिया हवाई अड्डा का लोकार्पण </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जो खिल सके न वो फूल हम हैं &#8211; तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं &#8211; दया की दृष्टि सदा ही रखना 🙏</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 03 Aug 2025 12:58:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार किसी भी तथ्य को कितना &#8216;गोपनीय&#8217; रख सकते हैं, यह कहना कठिन है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिवेश के मद्दे नजर उन्होंने कोई 13-करोड़ के प्रश्न पर चर्चाएं छेड़े कि आगामी 2 नवम्बर को देवोत्थान एकदशी और तीन दिन बाद 5 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा के बाद बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? नीतीश कुमार रहेंगे या नीतीश कुमार पूर्व-मुख्यमंत्री की कतार में पंक्तिबद्ध होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं का नाम बिना अपने होठों पर लाये दोनों एक स्वर में कहते हैं: &#8216;कुछ ऐसा ही होने वाला है।&#8217;</strong></p>
<p>दोनों नेता आपस में इस बात पर चर्चा करते हैं कि कल के जिस किंग्सवे और राजपथ को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कर्तव्य पथ का नाम देकर भारत के लोगों को अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया, विगत कुछ महीनों में प्रधानमंत्री का तीन-तीन बार बिहार का भ्रमण-सम्मेलन के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्रियों का बिहार का दौरा करना इस बात का सूचक है कि श्री मोदी जी अब अधिक संख्या होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को &#8216;सहायक&#8217; के रूप में और उसके नेताओं को &#8216;जनता दल यूनाइटेड&#8217; के नीचे नहीं रहने देना चाहते हैं। कर्तव्यपथ के दोनों तरफ की हरियाली को देखते, उस पर सकारात्मक टिपण्णी करते पहले कहते हैं कि &#8216;आज भारत का शायद ही कोई व्यक्ति होगा तो पैदल इस चमचमाते सड़क पर नहीं चलना चाहेगा। आज अगर राज कपूर जीवित होते, या फिर सत्यजीत रे जीवित होते, बिमल राय जीवित होते, गुरु दत्त जीवित होते, यश चोपड़ा जीवित होते, बीआर चोपड़ा जीवित होते तो मोदी जी की इस महानतम उपहार को देखकर कर्तव्यपथ को अपने किसी न किसी सिनेमा में स्थान अवश्य देते। </p>
<p><strong>तभी एक नेता कहते हैं, आज भी बिहार में प्रदेश के मुख्यमंत्री जो भी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रदेश के विकास में चार चाँद लगा दिया है, यह कहने में हिचकी लेने लगते हैं कि विगत 11-वर्षों में अगर प्रधानमंत्री का सहयोग नहीं रहता उन्हें तो कुर्सी पर भी विराजमान नहीं होते। अब आप ही सोचिये, वर्तमान विधानसभा में भाजपा की जितनी संख्या (80) है, उसकी आधी संख्या (45) है जनता दल यूनाइटेड है। वैसी स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना नीतीश कुमार के लिए तो सपना ही होता न। वह तो प्रधानमंत्री की उदारता है कि उन्हें बैठा दिए। लेकिन अगर यह प्रक्रिया इस बार भी दोहराते हैं तो भाजपा के प्रादेशिक नेताओं का अपमान होगा। यह बात मोदी जी जानते हैं।</strong> </p>
<p>अब तक दोनों नेता मौलाना आज़ाद रोड और सेना भवन की ओर से आने वाली सड़क जो कर्तव्य पथ से मिलती आगे निकल जाती है, पहुँच गए थे। तभी दूसरे नेता कहते हैं, नवम्बर 22 को बिहार का वर्तमान विधानसभा का काल समाप्त होने जा रहा है। स्वाभाविक है चुनाव के मद्दे नजर, खासकर आचार संहिता लगने से पूर्व, दिल्ली से पटना तक, प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री तक सबकी निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय में लगी कुर्सी पर टिकी है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मन में मनभर का लड्डू फूटना स्वाभाविक है &#8211; फिर एक बार मुख्यमंत्री बनने के लिए। लेकिन दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर नवनिर्मित कॉर्पोरेट कार्यालय नुमा भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर मंथन जारी है कि बिहार में राजनीतिक किला फतह के लिए बिहार से ही उपराष्ट्रपति लाना होगा, वह भी ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं, अपितु वैश्य या शूद्र। गणना आप सभी ज्ञानी महात्मा करें।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg" alt="" width="2032" height="1268" class="aligncenter size-full wp-image-7044" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-768x479.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-1536x958.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a></p>
<p>इस बात को सुनते है पहले नेता कहते हैं आपको याद होगा ही कि 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद जिन्हे राष्ट्र का गोविन्द बनाया गया था, दलित समुदाय से थे। परिणाम यह हुआ कि 2019 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के 30 से अधिक स्थानों को प्रधानमंत्री के चरणों में अर्पित कर दिए। इसका फल उन्हें 42 संख्या आने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। आप माने अथवा नहीं, साल 2019 से अभी तक, सैद्धांतिक रूप से भले नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं, व्यावहारिक रूप से नियंत्रण भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से ही है। वैसी स्थिति में आगामी चुनाव में जनता दल यूनाइटेड 42 से 20 पर आएंगे या 2 पर, यह तो नीतीश कुमार की आत्मा ही जानती है; लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग की हवाएं यह बता रही है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी के आला कमान इस बात से आश्वस्त हैं कि उन्हें प्रदेश में सरकार बनाने में &#8216;बैसाखी&#8217; की जरूरत नहीं होनी चाहिए। </p>
<p><strong>वैसे रायसीना पहाड़ी पर आते आते दोनों नेता दो दिशाओं में हो गए, लेकिन जाने से पहले दोनों इस बात पर जोर से ठहाका लगाए कि सन 1990 से पहले बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर टकटकी निगाहों से देखते रहते थे। कई मर्तबा तो एक ही विधानसभा काल में चार-पांच मुख्य मंत्री कुर्सी पर बैठे। आया-राम-गया-राम का मुहाबरा बिहार से ही चला। राष्ट्रीय जनता दल की सरकार तो प्रदेश को सत्यानाश कर ही दिया। लेकिन जब से नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उनकी भी रीढ़ की हड्डी उतनी मजबूत नहीं रही। कभी इधर, कभी उधर देखते, नाप-जोख करते कुर्सी पर विराजमान रहे। जब से मोदी जी प्रधानमंत्री बने, तबसे नीतीश कुमार भी उन्हें उसी तरह देखते आ रहे हैं &#8216;अपेक्षा की नज़रों&#8217; से जैसे कांग्रेस के कालखंड में मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर इंदिरा गांधी को देखते थे। वह तो मोदी जी सब कुछ जानकार भी अनजान बने हैं। </strong></p>
<p>बहरहाल, भारत के 17वां उपराष्ट्रपति के निर्वाचन हेतु निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना 7 अगस्त, 2025 को जारी की जाएगी। नाम-निर्देशन करने की अंतिम तारीख 21 अगस्त, 2025 और नाम-निर्देशनों की संवीक्षा की तारीख 22 अगस्त, 2025 होगी। अभ्यर्थिताएं वापस लेने की अंतिम तारीख  25 अगस्त, 2025, मतदान की तारीख 9 सितंबर, 2025 और मतदान की और गणना 9  सितम्बर को ही होगी।  राष्ट्रपतीय और उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन नियम, 1974 के नियम 8 के अनुसार, निर्वाचन के लिए मतदान संसद भवन में आयोजित किया जाएगा। मतदान, यदि आवश्यक हुआ तो, कमरा सं. एफ-101, वसुधा, प्रथम तल, संसद भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।</p>
<p>निर्वाचन आयोग ने केंद्र सरकार के परामर्श से, 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से भारत के उपराष्ट्रपति के पद के वर्तमान निर्वाचन के लिए रिटर्निंग अधिकारी के रूप में राज्य सभा के महासचिव को नियुक्त किया है। आयोग ने 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से संसद भवन (राज्य सभा) में रिटर्निंग अधिकारी की सहायता करने के लिए दो सहायक रिटर्निंग अधिकारियों की भी नियुक्ति की है। 17वें उपराष्ट्रपति निर्वाचन, 2025 के लिए निर्वाचक-मंडल में निम्न शामिल हैं:  राज्य सभा के 233 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 05 सीटें रिक्त हैं), राज्य सभा के 12 मनोनीत सदस्य, और लोक सभा के 543 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 01 सीट रिक्त है) निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के कुल 788 सदस्य (वर्तमान में 782 सदस्य) शामिल हैं। चूंकि, सभी निर्वाचक संसद के दोनों सदनों के सदस्य हैं, इसलिए संसद के प्रत्येक सदस्य के मत का मान एक समान अर्थात 1 (एक) होगा। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg" alt="" width="2032" height="1268" class="aligncenter size-full wp-image-7045" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-768x479.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-1536x958.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, चुनाव आयोग द्वारा नए उप-राष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा के साथ ही, इस संवैधानिक पद पर अगला पदभार ग्रहण करने वाले व्यक्ति को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। कहा जा रहा था कि चूंकि इस चुनाव के लिए कोई समय सीमा नहीं है, इसलिए इसमें देरी हो सकती है, क्योंकि राज्यसभा के उपसभापति उच्च सदन के मुख्य पीठासीन अधिकारी होंगे। हालांकि, चुनाव की घोषणा से संकेत मिलता है कि भाजपा इस मुद्दे पर किसी भी तरह की अटकलों को खत्म करने के लिए जल्द ही नए उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है।</strong></p>
<p>पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर अपने कार्यकाल के दौरान हर मुद्दे पर बोलने और पक्ष लेने के कारण सदन की मर्यादाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। इस संदर्भ में, यह याद रखना होगा कि जब 2022 में धनखड़ उपराष्ट्रपति चुने गए थे, तब भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था, इसलिए उन्हें उपराष्ट्रपति पद दिलाने में कोई समस्या नहीं थी। 2024 के चुनावों के बाद कम संख्या बल के साथ, भाजपा, अपने उम्मीदवार को निर्वाचित कराने की स्पष्ट स्थिति में है, लेकिन उसे अपने गठबंधन सहयोगियों की संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना होगा। आज की स्थिति में, सहयोगी दल पूरी तरह से भाजपा नेतृत्व के साथ हैं, और अगर विपक्ष अपना उम्मीदवार खड़ा करके कोई औपचारिक लड़ाई नहीं लड़ने का फैसला करता है, तो अगला उप-राष्ट्रपति सर्वसम्मति से चुना जाएगा। ऐसी खबरें भी हैं कि इस मामले में आरएसएस की भूमिका हो सकती है, इसलिए उसकी स्वीकृति भी आवश्यक होगी।</p>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक पंकज वोहरा का मानना है कि &#8216;कई राजनीतिक विश्लेषक नए उप-राष्ट्रपति के चयन को अगले भाजपा अध्यक्ष के फैसले से भी जोड़ रहे हैं। यह सर्वविदित है कि वर्तमान भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का विस्तारित कार्यकाल जल्द ही समाप्त होने वाला है, और यदि उनके उत्तराधिकारी का चयन नहीं हो पाया है, तो इसका मुख्य कारण पार्टी नेतृत्व और आरएसएस के बीच किसी एक नाम पर सहमति न बन पाना है। कई नाम सार्वजनिक रूप से सामने आए, लेकिन एक-एक करके, आम सहमति के अभाव में वे गायब हो गए। भाजपा के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह अगले उपराष्ट्रपति के रूप में अपना उम्मीदवार चुने, ताकि राजनीतिक हलकों में इस मामले में उसकी पूर्ण भागीदारी का स्पष्ट संदेश जाए। उपराष्ट्रपति की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह राज्यसभा के सभापति भी हैं।&#8217;</strong></p>
<p>उनका कहना है कि जो लोग भाजपा-आरएसएस संबंधों पर, खास कर पिछले एक साल से, नज़र रखे हुए हैं, उनके लिए आरएसएस केवल उसी व्यक्ति को हाँ कहेगा जिसका संघ के संबंध में एक सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड हो। इससे धनखड़ जैसे किसी भी व्यक्ति का चयन संभव नहीं है, जिन्हें चुना गया, हालांकि उनके करियर के अलग-अलग दौर में जनता दल और कांग्रेस, दोनों के साथ रहने का अनुभव रहा है। दूसरे शब्दों में, अगला उप-राष्ट्रपति संघ परिवार से ही होना चाहिए, जब तक कि भाजपा मोहन भागवत और उनके साथियों को ऐसे चुनाव में आने वाले राजनीतिक लाभ के बारे में समझाने में सफल न हो जाए।</p>
<p>हालाँकि, संघ के भीतर के माहौल को देखते हुए, यह करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। एक तरीका यह हो सकता है कि अगर भाजपा का वर्तमान नेतृत्व और संघ, पार्टी के अगले अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों पर एक साथ सहमति बना लें, तो आरएसएस इस पर सहमत हो सकता है। अगर अगले पार्टी प्रमुख के लिए आरएसएस की बात मान ली जाती है, तो वह अगले उपराष्ट्रपति के लिए भाजपा की पसंद को स्वीकार कर सकता है। यह एक तरह से लेन-देन जैसा हो सकता है। इस बात की भी ज़ोरदार अटकलें हैं कि मानसून सत्र के तुरंत बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। यह निश्चित रूप से प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन इस प्रक्रिया का उपयोग सभी हितधारकों को संतुष्ट करने और आगे आने वाली किसी भी नई चुनौती का सामना करने के लिए किया जा सकता है।</p>
<p>मंत्रिमंडल में फेरबदल और पार्टी का पुनर्गठन, दोनों ही शायद यह सुनिश्चित करने की कुंजी होंगे कि भाजपा और संघ के बीच सौहार्द किसी भी तरह से न बिगड़े। अगले उपाध्यक्ष पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगला उपाध्यक्ष वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने पर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिए भी योग्य होगा। कई उपराष्ट्रपति आगे चलकर राष्ट्रपति बने हैं, लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं जो राष्ट्रपति नहीं बन पाए। उपराष्ट्रपति पद के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम भी चर्चा में है, जिन्हें संघ के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्त है और वे अपने विरोधियों को भी स्वीकार्य हैं।</p>
<p>सवाल यह उठेगा कि क्या प्रधानमंत्री उन्हें उनके वर्तमान पद से मुक्त करना चाहेंगे, क्योंकि सरकार के अनुसार &#8220;ऑपरेशन सिंदूर&#8221; अभी भी &#8220;जारी&#8221; है। कुछ हलकों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, जो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों के करीबी हैं, के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। उनका चयन संघ की स्वीकृति पर निर्भर करेगा। आरिफ मोहम्मद खान, गुलाम नबी आज़ाद और नीतीश कुमार जैसे अन्य नाम भी चर्चा में हैं।</p>
<p>हालांकि, मुख्य मुद्दा यह है कि अगला भाजपा अध्यक्ष कौन होगा, क्योंकि दोनों मामलों पर एक साथ निर्णय लिया जाएगा और वे किसी न किसी तरह आपस में जुड़े हुए हैं। आरएसएस ने भाजपा के शीर्ष पद के लिए अपनी प्राथमिकताएँ पहले ही बता दी हैं और अब भाजपा की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहा है। यह भविष्य के भाजपा-आरएसएस संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/who-will-be-the-next-cm-of-bihar">जो खिल सके न वो फूल हम हैं &#8211; तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं &#8211; दया की दृष्टि सदा ही रखना 🙏</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>प्रधानमंत्री आज भी उस दृश्य की कल्पना कर सकते है जिस सुबह खुदीराम बोस को फाँसी लगी थी, लगता है बिहार में चुनाव 🗳️ है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 Jul 2025 04:13:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[martyrs]]></category>
		<category><![CDATA[midnipur]]></category>
		<category><![CDATA[politicsm khudiram bose]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुजफ्फरपुर / पटना : उस दिन तुमलुक से आती सड़क. जो आगे पश्चिम मिदनापुर मुख्य शहर से मिलती है, दाहिने हाथ एक पोखर के किनारे खड़ा था। मेरे साथ मेरी शिक्षिका पत्नी श्रीमती नीना झा और पुत्र आकाश झा थे। पिता-पुत्र कंधे पर कैमरा लटकाये चतुर्दिक देख रहे थे। दूर-दूर तक सड़क के दोनों तरफ [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुजफ्फरपुर / पटना :  उस दिन तुमलुक से आती सड़क. जो आगे पश्चिम मिदनापुर  मुख्य शहर से मिलती है, दाहिने हाथ एक पोखर के किनारे खड़ा था। मेरे साथ मेरी शिक्षिका पत्नी श्रीमती नीना झा और पुत्र आकाश झा थे। पिता-पुत्र कंधे पर कैमरा लटकाये चतुर्दिक देख रहे थे। दूर-दूर तक सड़क के दोनों तरफ पेड़-पौधे और खेत नजर आ रहे थे। खेत में पानी का जमाव था। मिदनापुर जिला में चाहे पूर्वी हो या पश्चिमी, धान (चावल) की खेती मुख्य रूप से होती है। इसके अलावे ईख, आलू, दाल, सब्जियां और कपास की भी खेती होती है। </strong></p>
<p>यह इलाका समुद्र के किनारे का इलाका है। समुद्र बहुत दूर नहीं है यहाँ से। यहाँ की मिट्टी दिल्ली के लाल किला के रंग का बलुआहा लाल होती है। सड़क के किनारे लाल मिट्टी को हाथ में लेकर अनुभव कर रहे थे कि दशकों पहले इस शहर में जन्म लिए क्रांतिकारियों के खून का रंग लाल होना भी स्वाभाविक था। जहाँ की मिट्टी लाल हो, क्रांति की बुनियाद तो वहीँ पड़ेगी। तमलुक और मिदनापुर तो क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है। यह पूरा इलाका भारत का एक ऐसा इलाका था उन दिनों जहाँ दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों क्रांतिकारी अपने-अपने माँ की कोख से जन्म लेकर मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दिए।</p>
<p>आश्चर्य तो तब हुआ जब एक नब्बे वर्षीय वृद्ध, जो एक क्रांतिकारी का पौत्र थे, कहते हैं <strong>&#8220;সেই বিপ্লবীদের মায়েরা তাদের সন্তানদের নয় মাস ধরে তাদের গর্ভে রেখেছিলেন শুধুমাত্র মাতৃভূমির জন্য জীবন উৎসর্গ করার জন্য। দেশটি ঠিক সেভাবেই স্বাধীন হয়নি। এটা আলাদা বিষয় যে আজ কেউ সেই বিপ্লবীদের, তাদের পরিবার এবং আত্মীয়স্বজনদের চেনে না বা চিনতে পারে না এবং তাদের নামে রাজনীতি করা হচ্ছে&#8221;</strong> (मातृभूमि पर बलिदान देने के लिए ही उन क्रांतिकारियों की माँ अपने बच्चे को नौ महीने कोख में रखी। देश यूँ ही नहीं आज़ाद हुआ है। यह अलग बात है कि आज उन क्रांतिकारियों, उनके परिवार और परिजनों को कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं और उनके नाम पर राजनीति में व्यापार हो रहा है।)</p>
<figure id="attachment_7025" aria-describedby="caption-attachment-7025" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7025" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7025" class="wp-caption-text">खुदीराम बोस के जन्म स्थान के सामने फुस का घर</figcaption></figure>
<p>सड़क के किनारे जहाँ खड़ा था, मेरे पीछे से अधकच्ची सड़क जा रही थी, जो मूलतः उस तालब का ऊपरी हिस्सा (महार) था। इस अधकच्ची सड़क के बाएं हाथ दर्जनों फुस के घर थे। उन घरों को देखकर प्रतीत हो रहा था कि यहाँ श्रमिक रहते हैं जिन्हें अपनी मजदूरी पर नाज है।  यही कारण है कि घर के बाहर बरामदे पर मिट्टी के चूल्हे का रंग अग्नि की ज्वाला के कारण काला हो गया था। आसपास का वातावरण भी गर्म ही था। शायद खाना बनाकर, लेकर वे सभी अपनी मजदूरी पर शहर की ओर प्रस्थान कर गए थे। यदा-कदा तमलुक और मिदनीपुर को जोड़ने वाली सड़क पर दो पहिया वाहन, साईकिल, स्कूटर, कभी मोटर आ जा रही थी। </p>
<blockquote><p>मेरे सामने चहारदीवारी से घिरा, जिसमें पाम ट्री, फूल आदि के अनेकानेक पौधे लगे थे, हरा-भरा दिख रहा था। अंदर बाएं हाथ कोने पर एक छोटा सा मकान भी था। इस मकान में एक कमरा इस परिसर को देख-रेख करने वाले के लिए था और दूसरा कमरा &#8216;ऐतिहासिक&#8217; था। यहाँ दरवाजे पर एक सूचना लिखा था और दरवाजे में ताला बंद था। पूरा क्षेत्र एक बेहतरीन पार्क में तब्दील था। यह कमरा इसलिए ऐतिहासिक इसलिए था कि यहीं जन्म हुआ था खुदीराम बोस का। </p></blockquote>
<p>स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों और शहीदों के वंशजों की खोज से सम्बंधित प्रयास के क्रम में हम तीनों उस तालाब के किनारे वाले घर पर पहुँचे जहाँ खुदीराम बोस का जन्म हुआ था, उस स्थान को देखकर ख़ुशी हुई &#8211; आज भी वह कमरा सुरक्षित दिखा। कमरे के बाहर लिखा दिखा &#8211; खुदीराम बोस का जन्म स्थान। परिसर का देखरेख मिदनापुर प्रशासन के द्वारा होता है। </p>
<p><strong>इस पार्क में प्रवेश द्वार से दस कदम पहले फुस का घर आज भी विराजमान है । आँख मूंदकर सोचा उस ज़माने में जब खुदीराम बोस का जन्म हुआ होगा, शायद पहली किलकारी इस घर में रहने वाले लोग जरूर सुने होंगे। प्रवेश द्वार के पास ही बाएं हाथ जिला प्रशासन का अतिथि गृह भी देखा। स्थानीय लोग कहे भी इस अतिथि गृह में कलकत्ता से नेता, अधिकारी आदते हैं, विश्राम करने के लिए। परिवार वाले लगभग सभी लोग खुदीराम बोस का जन्मस्थान के साथ साथ उनके गुरुदेव का घर, उस घर में रहने वाले आज की पीढ़ियों से भी मिलते हैं। खैर। </strong></p>
<figure id="attachment_7026" aria-describedby="caption-attachment-7026" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7026" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7026" class="wp-caption-text">खुदीराम बोस &#8211; जन्म स्थान</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, अगले सितम्बर महीने में 17 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष पूरा करेंगे। विगत 25 जुलाई को पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए लगातार सबसे लंबे समय तक भारत के प्रधानमंत्री रहने वाले दूसरे सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री में अपना हस्ताक्षर कर दिए। 25 जुलाई, 2025 को उनका लगातार 4,078 दिन का कार्यकाल पूरा हो गया । इंदिरा गांधी 24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक 4,077 दिनों तक लगातार प्रधानमंत्री रहीं। 1980 में वे फिर से निर्वाचित हुईं और 1984 में अपने निधन तक इस पद पर रहीं। इससे पूर्व नरेंद्र मोदी 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन थे। </p>
<blockquote><p>लेकिन विगत 25 वर्षों में &#8211; मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यकाल &#8211; में कभी बिहार में मुजफ्फरपुर के बारे में, खासकर जंगे आज़ादी में मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग करने वाले उस क्रांतिकारी के बारे में उनके मुख से नहीं सुना था। या फिर 50-वर्ष अखबारी दुनिया में रहते कभी अख़बारों के पन्नों पर, चाहे बिहार से प्रकाशित होता हो या दिल्ली या फिर अन्य राज्यों से; मुजफ्फरपुर के बारे में कोई प्रकाशन नहीं देखा, पढ़ा। लेकिन अकस्मात् मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) में जन्म लिए, अपने गुरुदेव सत्येन्द्रनाथ मुखर्जी के सानिग्ध में देशभक्ति की शिक्षा प्राप्त करने वाले खुदीराम बोस के बहाने 117 साल पहले का वह दृश्य अपने 124वें &#8216;मन की बात&#8217; में जिस कदर उद्घोषित किये &#8211; सुनकर लगा &#8216;बिहार में विधानसभा का चुनाव&#8217; आने वाला है। </p></blockquote>
<p>आश्चर्य तो तब लगा जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो बिहार के ही हैं, मुख्यमंत्री कार्यालय में रिकॉर्ड बनाए हैं, शिक्षण में प्रधानमंत्री से तनिक अधिक ही हैं; लेकिन अपने कार्यकाल में कभी उस सुबह के दृश्य की कल्पना भी शायद नहीं किये होंगे, जब खुदीराम बोस को फांसी दिया गया था। </p>
<p>खुदीराम बोस पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में 3 दिसंबर, साल 1889 में जन्में थे। उनके पिता का नाम त्रैलोक्य नाथ बोस था, और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया था। बचपन में ही खुदीराम बोस के सिर से मां-बाप का साया उठ गया था, जिसके बाद बड़ी बहन ने उनकी परवरिश की थी। आज भी उनकी बहन का घर खुदीराम बोस के नाम से अंकित नाट्यशाला के पास सुरक्षित है। </p>
<p>खुदीराम ने अपनी शुरुआती पढ़ाई हेमिल्टन हाईस्कूल से की थी। खुदीराम बोस के मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना थी, इसलिए उन्होंने स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरु कर दिया था। साथ ही वे उस दौरान ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में शामिल होने लगे थे। इसके साथ ही उस दौरान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए गए अत्याचारों और जुर्म को देखकर उनके मन में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इतनी नफरत पैदा हो गई थी कि उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद करवाने की ठान और अपनी पढ़ाई छोड़ वे देश के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। </p>
<figure id="attachment_7027" aria-describedby="caption-attachment-7027" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/126.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/126.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7027" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/126.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/126-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/126-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/126-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7027" class="wp-caption-text">मिदनापुर में एक शहीद क्रांतिकारी का घर</figcaption></figure>
<p>साल 1905 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बंगाल विभाजन के विरोध में चल रहे आंदोलन में खुदीराम बोस ने अपना पूरा समर्थन दिया और इसके बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह स्वाधीनता आंदोलन में समर्पित कर दिया और फिर आजादी की इस लड़ाई के सबसे शक्तिशाली और युवा क्रांतिकारी के रूप में उभर कर सामने आए एवं उस समय देश के कई युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने। इसके बाद वे पहले रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हुए। वे क्रांतिकारी सत्येन्द्रनाथ बोस के शिष्य थे। </p>
<p>साल 1906 में जब खुदरीम बोस अंग्रेजों द्धारा बैन मैग्जीन “सोनार बांग्ला” बांट रहे थे, तब उन्हें ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया, हालांकि उस समय खुदीराम अंग्रेज अधिकारी को घायल करके भागने में कामयाब हो गए। इस घटना के बाद साल 1907 में उन्होंने पुलिस स्टेशनों के पास बम ब्लास्ट किए, डाकघरों को लूटा, अंग्रेज अफसरों पर हमला किए और तमाम अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। जिसके बाद उन पर राजद्रोह का केस चल गया, लेकिन नाबालिग होने की वजह से उन्हें बाद में छोड़ दिया गया।</p>
<p>कलकत्ता में उन दिनों चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के पद पर किंग्सफोर्ड था, जो कि बेहद सख्त और क्रूर अधिकारी था एवं भारतीय क्रांतिकारियों के खिलाफ अपने सख्त फैसलों के लिए जाना जाता था। उसके अत्याचारों से त्रस्त आकर युगांतर दल के नेता वीरेन्द्र कुमार घोष ने किंग्सफोर्ड को मारने की साजिश रखी और इसके लिए उन्होंने खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी को चुना। जिसके बाद वे दोनों इस काम को अंजाम देने के मकसद से मुजफ्फरपुर पहुंच गए और किंग्सफोर्ड की दैनिक गतिविधियों पर नजर रखने लगे। </p>
<p>30 अप्रैल 1908 में, खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने जब रात के अंधेरे में किंग्सफोर्ड जैसी एक बग्घी सामने से आती हुई देखी तो उस पर बम फेंक दिया लेकिन दुर्भाग्य से इस घटना में किंग्सफोर्ड की पत्नी और बेटी मारी गईं, लेकिन खुदीराम और उनके साथी उस समय यह समझ लिया कि वे किंग्सफोर्ड को मारने में सफल हो गए, इसलिए आनन-फानन में वे दोनों क्रांतिकारी घटनास्थल से भाग निकले। इस घटना के बाद खुदीराम के साथी प्रफुल्ल चाकी ने ब्रिटिश अधिकारियों द्धारा घेर लिए गए, जिसे देख उन्होंने खुद को गोली मारकर अपनी शहदात दे दी, इसके बाद खुदीराम को ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया, और हत्या का केस दर्ज किया गया। </p>
<figure id="attachment_7028" aria-describedby="caption-attachment-7028" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7028" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7028" class="wp-caption-text">मुजफ्फरपुर</figcaption></figure>
<p>गिरफ्तारी के बाद भी खुदीराम बोस अंग्रेज अफसरों से डरे नहीं, बल्कि उन्होंने किंग्सफोर्ड को हत्या का प्रयास करने का अपना अपराध कबूल कर लिया। जिसके चलते इस युवा क्रांतिकारी को 13 जुलाई, साल 1908 में कोर्ट द्वारा फांसी की सजा का ऐलान किया गया और फिर, 11 अगस्त, 1908 को इस निर्भीक क्रांतिकारी को फांसी के फंदे से लटका दिया गया। खैर।</p>
<p><strong>जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 124 वें संस्करण में कहा: &#8220;मेरे प्यारे देशवासियों, आप कल्पना कीजिए, बिल्कुल भोर का वक्त, बिहार का मुजफ्फरपुर शहर, तारीख है, 11 अगस्त 1908 हर गली, हर चौराहा, हर हलचल उस समय जैसे थमी हुई थी। लोगों की आँखों में आँसू थे, लेकिन दिलों में ज्वाला थी। लोगों ने जेल को घेर रखा था, जहां एक 18 साल का युवक, अंग्रेजों के खिलाफ अपना देश-प्रेम व्यक्त करने की कीमत चुका रहा था। जेल के अंदर, अंग्रेज अफसर,एक युवा को फांसी देने की तैयारी कर रहे थे। उस युवा के चेहरे पर भय नहीं था, बल्कि गर्व से भरा हुआ था। वो गर्व, जो देश के लिए मर-मिटने वालों को होता है। वो वीर, वो साहसी युवा थे, खुदीराम बोस। सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्होंने वो साहस दिखाया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। तब अखबारों ने भी लिखा था –“खुदीराम बोस जब फांसी के फंदे की ओर बढ़े, तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी”। ऐसे ही अनगिनत बलिदानों के बाद, सदियों की तपस्या के बाद, हमें आज़ादी मिली थी। देश के दीवानों ने अपने रक्त से आजादी के आंदोलन को सींचा था।&#8221;</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि अगस्त का महीना इसलिए तो क्रांति का महीना है।अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि होती है। इसी महीने, 8 अगस्त को गाँधी जी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी। फिर आता है 15 अगस्त, हमारा स्वतंत्रता दिवस, हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, उनसे प्रेरणा पाते हैं।</p>
<p>बहरहाल, सन 1957, 1962 1967, 1971 और 1984 को छोड़कर मुजफ्फरपुर लोक सभा सीट हमेशा प्रजा सोसलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, जनता दाल, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी का ही रहा है। श्याम नांदल सहाय, अशोक मेहता, दिग्विजय नारायण सिंह, नवल किशोर सिन्हा, जॉर्ज फर्नांडिस, जय नारायण प्रसाद निषाद, अजय निषाद और राज भूषण चौधरी को शायद खुदीराम बोस नहीं याद आये। </p>
<figure id="attachment_7029" aria-describedby="caption-attachment-7029" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7029" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7029" class="wp-caption-text">कुछ समय पूर्व: जहाँ फ़ांसी लगी थी उसके आस-पास का दृश्य ऐसा था</figcaption></figure>
<p>सांसदों की बात अगर तनिक देर के लिए छोड़ भी दें तो गायघाट, औराई, मीनापुर, बोचहां, सकरा, कुढ़नी, काँटी, बरुराज, पारू और मुजफ्फरपुर के आसपास के विधानसभा क्षेत्रों से सन 1952 चुनाव के बाद अगर सम्मानित विधायक लोग कभी खुदीराम बोस के त्याग के बारे में सोचे होते, कभी यह सोचे होते की एक 18 वर्ष के युवा को, जिसकी माँ बचपन में ही मृत्यु को प्राप्त की, बड़ी बहन पाल-पास कर बड़ा की; लेकिन 18 वर्ष की आयु में वह ऐसा कार्य कर गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसके फांसी लगने के 117 वर्ष बाद उस घटना को ह्रदय विदारक बनाकर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए हथकंडा बनाये। लेकिन बिहार के मुजफ्फरपुर में जहाँ खुदीराम बोस को फांसी पर लटकाया गया था, उसके इर्द गिर्द कुछ वर्ष पहले तक मुर्गा, मछली की दुकानें थी। शराब की भी दूकान होती थी। चतुर्दिक बियर की बोतलें फेंकी होती थी। आज नितीश कुमार के राज्य में शराबबंदी होने से संभव है उन दुकानों का भी अस्तित्व समाप्त हो गया हो। खैर। </p>
<p>वैसे आधुनिक भारत का इतिहास के ज्ञाता ‘तर्क-वितर्क’ भले करें, जातिवाद-सम्प्रदायवाद की राजनितिक अखाड़े में कुस्ती लड़ते रहें अपने-अपने हितों के लिए। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत में रेलवे की शुरुआत के दो दशक बाद, जिस समय दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह सन 1874 में उत्तर बिहार में तिरहुत रेलवे के रूप में निजी रेल सेवा की शुरुआत किये थे, उसी कालखंड में हाजीपुर-मुजफ्फरपुर रेल खंड के धरहरा गांव का एक बीस-वर्षीय बालक समस्तीपुर-दरभंगा रेल लाइन की पटरियों के बगल में टेलीफोन लाइन जोड़ने का काम शुरू किया था। कार्य सीखने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्तर बिहार का वह गरीब बालक ब्रितानिया सरकार के तत्कालीन अभियंता जेम्स विल्सन को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन दिनों उत्तर बिहार में भीषण अकाल पड़ा था। </p>
<p>तिरहुत सरकार के द्वारा एक ओर जहाँ पूरे उत्तर बिहार में रेल लाइन की जाल बिछाई जाने लगी थी, ताकि सरकार-पदाधिकारियों, राजनेताओं, राजा-महाराजों, धनाढ्यों, समाज के संभ्रांतों के साथ-साथ आम नागरिकों को सुविधा उपलब्ध हो सके, वहीँ धरहरा गाँव के उस बालक जी जीवन-रेखा भी रेल की पटरियों की तरह चिकनी होती गयी। तत्कालीन समाज के लोग शायद इस बात से अनभिज्ञ थे कि रेल लाइन के बगल में टेलीफोन का तार खींचने वाला वह नवयुवक आने वाले दिनों में उत्तर बिहार के शैक्षिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनेगा, जहाँ भारत के श्रेष्टतम अध्यापक-प्राध्यापक विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करेंगे एक नए राष्ट्र के निर्माण के लिए । नाम था – लंगट सिंह।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7030" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Khudiram-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>बिहार की शैक्षिक व्यवस्था को स्वस्थ रखने के लिए, विकास करने में अगर दरभंगा के महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह अथवा उनके पूर्वजों का योगदान अपने उत्कर्ष पर है (उसके बाद क्या हुआ यह तो दरभंगा और मिथिला के लोग अधिक जानते हैं); तो हमें इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना होगा की बाबू लंगट सिंह और भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय के लोगों की क्या भूमिका थी। हम इस बात पर कतई पर्दा नहीं डाल सकते हैं कि बाबू लंगट सिंह और तत्कालीन समाज के अन्य भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय के लोगों के कारण बिहार का मुजफ्फरपुर-वैशाली-हाजीपुर का इलाका ‘सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का क्षेत्र है,’ ‘अध्यात्म का इलाका’ है। </strong></p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज मुजफ्फरपुर के लोग क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ला के भतीजे  ‘बैकुंठ शुक्ला’ को नहीं जानते और ‘छोटन शुक्ला’ का पोस्टर गली-मोहल्ले-सड़कों पर टांग रहे हैं। वैकुण्ठ शुक्ला को फणीन्द्रनाथ घोष को मारने के जुर्म में फांसी दी गयी थी। फणीन्द्रनाथ घोष तत्कालीन अंग्रेजी सरकार के ‘अप्रूवर’ बन गए थे जो अंततः भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटकाया। वैकुण्ठ शुक्ला तो उस समय के जलालपुर गाँव, जो उस समय मुजफ्फरपुर में था, आज हाजीपुर में है। वे एक मास्टर भी थे और हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्न्लिकन आर्मी के सदस्य भी। वे नमक सत्याग्रह का एक अहम् हिस्सा भी थे। आज महात्मा गांधी की चम्पारण यात्रा वाले राजकुमार शुक्ला को सभी जानते, लेकिन जलालपुर गाँव का वह शिक्षक जो फांसी पर लटका, कोई नहीं जानता। यह दुखद है। यह सामाजिक अवनति का एक अहम् हिस्सा है। यह विध्वंस मानसिकता का परिचायक है। </p>
<p>बाबू दिग्विजय नारायण सिंह लगभग तीन दशक तक भारतीय संसद के निचले सदन में मुजफ्फरपुर, पुपरी, हाजीपुर, वैशाली का प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे। लेकिन तत्कालीन जनता पार्टी (सोशलिस्ट) नेता जॉर्ज फर्नांडिस का शिकार हो गए और महज 6000 मतों से सं 1980 के आम चुनाव में हार गए। सं 1980 तक मुजफ्फरपुर ही नहीं, देश के सभी विधान सभा, लोक सभा संसदीय क्षेत्रों के मतदाताओं का मानसिक स्वरुप में बदलना प्रारम्भ हो गया था। यह अलग बात थी कि जिस समय बाबू दिग्विजय नारायण सिंह के दादाजी का देहांत हुआ था (1912), भारत में एक अमेरिकन डालर की कीमत 0.09 थी। लेकिन जिस समय बाबू दिग्विजय सिंह चुनाव हारे थे, लोगों की मानसिकता क्या, अमेरिकन डॉलर की तुलना में भारतीय रुपयों की कीमत भी काफी लुढ़क गई थी और एक अमेरिकन डालर के बदले 7.86 भारतीय रुपये देने होते थे। आज की स्थिति तो पूछें ही नहीं। बड़े-बड़े समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, गणितज्ञ ज्ञान अर्जित करने के लिए भारतीय चौराहों पर बैठे हैं और समाज के चापलूस-चाटुकार सोने के सिक्के निगल रहे हैं, बिना डकारे। खैर। </p>
<p>दिग्विजय नारायण सिंह सन 1952 से 1980 तक 28 लगातार वर्ष सांसद रहे। वे सन 1952 से 1957 (मुजफ्फरपुर), 1957-1962 पुपरी, 1962-1971 मुजफ्फरपुर, 1971-1977 हाजीपुर और 1977-1980 वैशाली लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किये थे। लेकिन जिस जॉर्ज फर्नांडिस को आपातकाल के बाद दिग्विजय नारायण सिंह ने बिहार की राजनीति में मार्ग दर्शन किये, सं 1980 के आम चुनाव में मुजफ्फरपुर में उन्ही के विरुद्ध खड़े होकर 6000 मतों से शिकस्त दे दिया।उस समय के राजनीतिक समीक्षक आज भी इसे ‘विश्वासघात’ मानते हैं। सं 1980 चुनाव की ‘हार’ उन्हें अंदर से झकझोड़ दिया। जिस व्यक्ति ने, जिसके पिता, पितामह और परिवार के अन्य सदस्य मुजफ्फरपुर ही नही, बल्कि गंगा के उस पार के इलाके में शिक्षा के माध्यम से एक क्रांति लाये थे, वह व्यक्ति ही उस क्रांति का शिकार हो गया। परिणाम यह हुआ कि बाबू दिग्विजय नारायण सिंह राजनीति से संन्यास ले लिए और सं 1980 आम चुनाव के 11-वर्ष होते-होते अपनी अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकल गए। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/pm-can-still-imagine-the-scene-when-khudiram-bose-was-hanged">प्रधानमंत्री आज भी उस दृश्य की कल्पना कर सकते है जिस सुबह खुदीराम बोस को फाँसी लगी थी, लगता है बिहार में चुनाव 🗳️ है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लालू जी, अगर तेज प्रताप की भूमिका &#8216;आर.जे.डी.&#8217; में नहीं रही, तो &#8216;विधानसभा&#8217; अध्यक्ष को भी लिखित दें &#8216;छः साल के लिए सदस्यता समाप्त करें&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 May 2025 11:19:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : लालू प्रसाद यादव &#8216;नाटक&#8217; करने में, &#8216;अखबार और टीवी में सुर्खियों में बने रहने के लिए&#8217; कुछ भी कर सकते हैं, चाहे 76-वर्ष की आयु में अपने बड़े पुत्र को ही घर से बाहर निकलना पड़े। दिल्ली, कलकत्ता, बनारस, कानपुर, चेन्नई, लखनऊ या फिर देश के तक़रीबन 8000 शहरों में रहने [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/write-to-the-vidhan-sabha-speaker-to-terminate-membership-tej-pratap-for-six-years">लालू जी, अगर तेज प्रताप की भूमिका &#8216;आर.जे.डी.&#8217; में नहीं रही, तो &#8216;विधानसभा&#8217; अध्यक्ष को भी लिखित दें &#8216;छः साल के लिए सदस्यता समाप्त करें&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : लालू प्रसाद यादव &#8216;नाटक&#8217; करने में, &#8216;अखबार और टीवी में सुर्खियों में बने रहने के लिए&#8217; कुछ भी कर सकते हैं, चाहे 76-वर्ष की आयु में अपने बड़े पुत्र को ही घर से बाहर निकलना पड़े। दिल्ली, कलकत्ता, बनारस, कानपुर, चेन्नई, लखनऊ या फिर देश के तक़रीबन 8000 शहरों में रहने वाले, जो विगत पांच दशकों से अख़बारों के पन्नों को देखते आये हैं, पढ़ते आये हैं, लालू को भलीभांति पहचानते होंगे। बिहार सहित, देश के अन्य भागों के अख़बारों के पाठकों और टीवी के दर्शकों का कहना है कि &#8216;जिस तरह लालू प्रसाद यादव पारिवारिक संस्कृति और नैतिकता का दृष्टान्त देकर अपने बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव को घर और पार्टी से छह वर्ष के लिए बाहर निकाल दिए हैं; क्या वे प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर तेज प्रताप यादव की विधान सभा की सदस्यता को छह वर्षों के लिए समाप्त करने के लिए कह सकते हैं? शायद नहीं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-6650" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Chacha-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>लोग तो यह भी कह रहे हैं कि आज परिवार में नए उम्र की नयी फसल के आने से जो खुशियां है, क्या तेजप्रताप उन खुशियों में शामिल होने का हकदार नहीं है? लोगों का यह भी कहना है कि तेज प्रताप अपने छोटे भाई को बड़ा होने का सभी गुण  सिखाये, त्याग भी किये, आज जब घर में छोटे भाई को दूसरा बेटा हुआ, तो उसके छठी में तेजप्रताप की अनुपस्थिति लालू को नहीं खलेगी। शायद लोग नहीं जानते हैं जब मीसा का जन्म हुआ था तो उसके पिता जेल में थे और माता राबड़ी देवी रो-रोकर मेरे एक मित्र को घर बुलाई थी, निहोरा विनती की थी &#8220;बच्चा के बाबू के बिना कैसे छट्ठी मनाएंगे मिश्र जी? कुछ कीजिये न।&#8221; शायद उस क्षण को लालू भी भूल गए। </p>
<figure id="attachment_6655" aria-describedby="caption-attachment-6655" style="width: 768px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/sadhu-768x432-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/sadhu-768x432-1.jpg" alt="" width="768" height="432" class="size-full wp-image-6655" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/sadhu-768x432-1.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/sadhu-768x432-1-300x169.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6655" class="wp-caption-text">साधु यादव</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार के वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक समीक्षक लव कुमार मिश्र कहते हैं: “हम गर्दनीबाग़ के सड़क संख्या 30 में रहते थे। एक दिन सुबह-सुबह लालू यादव का साला साधु यादव साईकिल से घर के दरवाजे पर दस्तक दिया। पैडिल से पैर नीचे करते कहता हैं: “लव भैय्या….. दीदी जल्दी से बुलाई है …रो रही है।” मोहल्ले के नागरिक थे साधु यादव की बहन और उनका दूल्हा। मैं समय की गंभीरता को देखते, साधु यादव के चेहरे को पढ़ते, तुरंन्त निकल पड़ा । घर पहुँचने पर राबड़ी सामने बैठी थी। चेहरे में चमक तो था, परन्तु मन उदास था। आँखें लाल थी। सभी लक्षण दिख रहे थे कि वह काफी रोना-धोना हुआ है। मैं चारो तरफ देख रहा था। मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा था।&#8221;</strong> </p>
<blockquote><p>मिश्र जी कहते हैं: तभी भोकार पारकर, फफककर राबड़ी रोने लगी और रोते-रोते बोलने लगी – ” ई त जेल में हथिन….. बचिया के छट्ठी उनके बिना कैसे करबई ? पहिला बच्चा हैं। मिश्र जी कुछ मदद करिये न।”  यह सुनते ही मामला समझ में आ गया। लल्लू यादव (अब लालू यादव) उन दिनों जेल में थे। कारावास के दौरान राबड़ी देवी माँ बनी। लालू के घर में बेटी का जन्म हुआ था। साधु यादव वहीँ राबड़ी के बगल में खड़ा था। मैं आश्वासन देकर उठा।</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6651" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/MISA-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>लवकुमार जी कहते हैं: &#8220;उसी शाम पांच बजे डॉ जगन्नाथ मिश्रा प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। वे नित्य शाम पांच बजे संवाददाताओं से मिलते थे। उस ज़माने में श्री धैर्या बाबू (डी. एन. झा) यूएनआई के वरिष्ठ संवाददाता थे। मैं डॉ मिश्रा से बताया। उन्होंने कहा की एक आवेदन पत्र दे दें।  मैं चार आना में टाइप कराया। उस आवेदन पत्र के कोने पर ‘कुछ अपठनीय’ लिखा गया और अगले दिन लल्लू यादव अपनी बेटी को देखने, छठ्ठी में उपस्थित होने 15 दिन के पे-रोल पर फ़्रेज़र रोड केंद्रीय कारा से घर वापस आये। एक निमंत्रण पत्र लिखा गया, छपाया गया बेटी होने की ख़ुशी में । छठ्ठी के अवसर पर सत्यनारायण भगवान का पूजा भी था। पटना विश्वविद्यालय के कुलपति देवेन्द्रनाथ शर्मा भी उपस्थित हुए। बेटी का नाम ‘मीसा’ रखा गया।” शेष तो मीसा के जीवन से, शिक्षा से, राजनीति से बिहार के लोग बाग परिचित ही हैं।&#8221;</p>
<p>आइये दिल्ली चलते हैं। साल 2007 के जुलाई के प्रथम सप्ताह की बात है। लालू प्रसाद यादव भारत सरकार में रेल मंत्री थे। उस दिन पूर्वान्ह काल समाप्त हो रहा था और मध्यान्ह काल की शुरुआत हो गयी थी। रेल मंत्री कार्यालय में लालू यादव प्रवेश के साथ बाएं हाथ रखे सोफा पर बैठे थे। तभी कमरे में मंत्री जी के मेज पर पंक्तियों में रखे टेलीफोन में से एक फोन की घंटी टनटनायी । यह फोन सीधा 25-तुग़लक़ रोड से जुड़ा था। यह टाइप-VIII बंगला जुलाई 2002 में लालू यादव के नाम लिखा गया था, जब वे राज्य सभा के सदस्य थे। मंत्री बनने के बाद भी इसी बंगला में रहे। </p>
<p><strong>फोन उठाते ही अधिकारी लपककर लालू जी के तरफ बढे। दूसरे छोड़ पर अर्धांगिनी राबड़ी देवी थीं जो उस समय बिलख रही थी। लालू बार-बार पूछ रहे थे ‘का हुआ? काहे रो रही हो?” तभी दूसरे छोड़ से हिचकी लेते राबड़ी देवी कहते ही: “बड़का आम के पेड़ से गिर गया है। हाथ-पैर तो नहीं टूटा है, कमर में और पीछे बहुत चोट लगी है।” तभी लालू कहते हैं: “कोई बात नहीं, मजबूत हो जायेगा। डॉक्टर पहुँचने वाले हैं।” और फिर फोन रख दिए। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6652" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<blockquote><p>जुलाई 2007 में बड़का (तेज प्रताप यादव) 19 वर्ष के थे जब आम के पेड़ से नीचे गिरे थे। आज 37 वर्ष के हैं और आज माता-पिता-परिवार-परिजनों की ‘नज़रों से गिर गए हैं।’ यह मैं नहीं, तेज प्रताप यादव के पिता लालू प्रसाद यादव का अपने बड़े पुत्र के प्रति किया गया व्यवहार दर्शाता है, साथ ही, उन्होंने जो सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर लिखा, वह गवाह है। </p></blockquote>
<p><strong>पटना सिटी के राजनीतिक विशेषज्ञ उमेश प्रसाद सिंह</strong> लालू के इस करनी को &#8216;लालू के पुत्र का वनवास प्रकरण&#8217; की संज्ञा देते कहते हैं &#8216;लालू यादव एक ऐसे सामाजिक न्याय के पुरोधा राजनेता है जो अपने निर्णयों से इस देश को चमत्कृत कर देते हैं, ऐसा कम ही देखने को मिलता है? वे चाहे इन्दिरा गांधी या मोरारजी भाई या अन्य कोई हो? लालू जी ने अपने पुत्र तेजप्रताप यादव को गलत आचरण के आरोप पर पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से छः-वर्ष के लिए निकाल दिया और घर के अभिभावक की हैसियत से घर से भी निष्कासित कर दिया।&#8217;</p>
<figure id="attachment_6653" aria-describedby="caption-attachment-6653" style="width: 722px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_ac21aa87-d552-468a-a471-d32e82bd8015-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_ac21aa87-d552-468a-a471-d32e82bd8015-1.jpg" alt="" width="722" height="812" class="size-full wp-image-6653" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_ac21aa87-d552-468a-a471-d32e82bd8015-1.jpg 722w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_ac21aa87-d552-468a-a471-d32e82bd8015-1-267x300.jpg 267w" sizes="auto, (max-width: 722px) 100vw, 722px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6653" class="wp-caption-text">उमेश प्रसाद सिंह</figcaption></figure>
<p>सिंह जी का कहना है कि &#8220;मेरा उनका बहुत पुराना रिश्ता रहा है। 1968 में मैं जब समाजवादी युवजन सभा का चुनाव- प्रभारी था तब लालू यादव संयुक्त सचिव बने थे; लालू जी लोहिया जी के समाजवादी आंदोलन के उपज है ना कि जे पी आंदोलन के। इस नाते मेरा अनुरोध है कि वे विधानसभा अध्यक्ष को माननीय तेज प्रताप यादव विधायक की सदस्यता समाप्त करने का पत्र लिखकर आग्रह करें । इसके साथ ही अपने दल के अन्य आचरण हीन विधायकों की भी सदस्यता खत्म करने और आगामी चुनाव में टिकट नहीं देने की घोषणा करें, भाजपा &#8211; जदयू &#8211; कांग्रेस में आचरणहीन विधायकों की लम्बी सूची है। लालू जी के इस कार्रवाई से अन्य दलों की भी कलई खुलेगी।&#8221;</p>
<p>वैसे प्रदेश के पण्डितजनों का मानना है कि तेजप्रताप की पत्नी का पैर इतना सुलक्षण है कि उसके कदम पड़ते ही लालू-राबड़ी दादा-दादी बने, पूर्व-मुख्यमंत्री और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव अपने दूसरे बच्चे का पिता बने, घर-परिवार में ख़ुशी का माहौल बना। तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री ने कोलकाता के एक निजी अस्पताल में बेटे को जन्म दी। तेजस्वी यादव ने अपने फेसबुक पर नन्हे बेटे की फोटो शेयर करते हुए लिखा की &#8220;सुप्रभात इंतजार की घड़ी हुई खत्म घर में छोटे बेटे के आने से बहुत खुश हूँ। अब 76-वर्ष की आयु में क्या चाहिए लालू प्रसाद को?</p>
<p>चलिए तत्कालीन 25-तुग़लक़ रोड चलते हैं। तेजप्रताप यादव के आम के पेड़ से गिरने की घटना से छह साल पहले चलते दिल्ली के रायसीना रोड स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया आते हैं। गणतंत्र भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन 51 वां गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करने को सज्ज हो रहे थे। उधर ग्वालियर की राजमाता के रूप में लोकप्रिय रहीं श्रीमती विजया राजे सिंधिया अंतिम सांस ले रही थी। तारीख साल 2001 का 25 जनवरी था। भारत के संसद, जहाँ (अपवाद छोड़कर) सन 1957 से 1999 तक वे सांसद रही, से 100-कदम दूर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में राजमाता के सचिव रहे बाल आँगरे ने 20 सितंबर, 1985 को राजमाता की हाथ से लिखी बारह पन्नों की वसीयत पढ़ रहे थे जिसमें राजमाता अपने पुत्र माधवराव सिंधिया को अपने जीवन का सबसे दुखी अंग घोषित की थी।खैर। </p>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, राजनीतिक विशेषज्ञद्वय वीर सांघवी और नमिता भंडारे माधवराव सिंधिया की जीवनी में लिखते हैं, “राजमाता के अंतिम दिनों में माधवराव अक्सर उनके अस्पताल जाते, उनका हाथ पकड़ कर उनकी बगल में बैठते और हनुमान चालीसा पढ़ते थे।वसुंधरा राजे ने बाद में याद किया कि माधवराव की आवाज़ सुनते ही राजमाता की आंखों में चमक आ जाती। माधवराव की छोटी बहन यशोधरा ने बताया कि वो उन दिनों मां और बेटे की आंखों में आँसू देखती थी। उन्होंने कठिनतम समय में मेरा साथ दिया है।माधवराव ने जवाब में पूछा था आप आँगरे को तब भी नहीं छोड़ेगीं अगर आपका इकलौता बेटा आपसे दूर हो जाए। इस पर राजमाता ने कोई जवाब नहीं दिया था और इस बात से नाराज़ होकर माधवराव कमरा छोड़ कर चले गए थे।”</strong></p>
<p>उस वसीयत पर दो गवाहों प्रेमा वासुदेवन और एस गुरुमूर्ति के हस्ताक्षर जिसमें माधवराव के बारे में कहा गया था कि वो न सिर्फ़ अपने राजनीतिक आकाओं के गुलाम बन गए हैं बल्कि उन्होंने मुझे और मेरे समर्थकों को परेशान करने में उनके औजार की भूमिका निभाई है। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा कि वो अब इस लायक भी नहीं रहे कि वो अपनी माँ का अंतिम संस्कार करें।” माधवराव सिंधिया ने 1971 में जनसंघ के समर्थन से चुनाव जीते लेकिन 1979 आते-आते उन्होंने कांग्रेस का दामन पकड़ लिए। बावजूद इसके, माधवराव सिंधिया ने अपनी माता का अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया था। </p>
<p>आइए, लालू के घर चलते हैं। लालू यादव आज 76-वर्ष के हैं। अनेकानेक बीमारियों से पीड़ित हैं। वैसे स्वयं को वे न तो वृद्ध मानते और ना ही बीमार, ताकि “हौसला बुलंद” रहे। इसलिए अपने जन्मदिन पर लिखे भी कि “लालू में आज भी वही ऊर्जा है जिसे लिए मैं फुलवरिया के अपने गांव से पटना चला था, ऊंच-नीच का भाव मिटाने की ऊर्जा, सामंती और तानाशाही सत्ता को हटाने की ऊर्जा, गरीब-गुरबों के हक़ की आवाज़ उठाने की ऊर्जा।”  खैर। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_500475977_1772850543639303_498903747009044029_n.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_500475977_1772850543639303_498903747009044029_n.jpg" alt="" width="677" height="1076" class="alignleft size-full wp-image-6635" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_500475977_1772850543639303_498903747009044029_n.jpg 677w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_500475977_1772850543639303_498903747009044029_n-189x300.jpg 189w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_500475977_1772850543639303_498903747009044029_n-644x1024.jpg 644w" sizes="auto, (max-width: 677px) 100vw, 677px" /></a></p>
<p>विगत रविवार को लालू यादव ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा कि उनके बड़े बेटे (तेजप्रताप) की “गतिविधि, लोक आचरण और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हमारे पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों के अनुरूप नहीं है। अब से पार्टी और परिवार में तेज प्रताप यादव की किसी भी प्रकार की कोई भूमिका नहीं रहेगी।” लालू लिखते हैं: “निजी जीवन में नैतिक मूल्यों की अवहेलना करना हमारे सामाजिक न्याय के लिए सामूहिक संघर्ष को कमजोर करता है। ज्येष्ठ पुत्र की गतिविधि, लोक आचरण तथा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हमारे पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों के अनुरूप नहीं है। अतएव उपरोक्त परिस्थितियों के चलते उसे पार्टी और परिवार से दूर करता हूं। अब से पार्टी और परिवार में उसकी किसी भी प्रकार की कोई भूमिका नहीं रहेगी।”</p>
<p>लालू लागे लिखते हैं कि “उसे पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किया जाता है। उन्हें अपने निजी जीवन का भला -बुरा और गुण-दोष देखने में वह स्वयं सक्षम हैं। उससे जो भी लोग संबंध रखेंगे वो स्वविवेक से निर्णय लें। लोकजीवन में लोकलाज का सदैव हिमायती रहा हूं। परिवार के आज्ञाकारी सदस्यों ने सार्वजनिक जीवन में इसी विचार को अंगीकार कर अनुसरण किया है। धन्यवाद।”</p>
<p>पटना महानगर जिला कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष सह प्रवक्ता राकेश कपूर कहते हैं कि &#8220;राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपने बड़े बेटे पूर्व उपमुख्यमंत्री व विधायक तेज प्रताप यादव को अपनी सामाजिक छवि के बचाव में राष्ट्रीय जनता दल से निष्कासित करते हुए परिवार से भी निकाल दिया है। यह समाजवादियों का विशेष गुण मौकापरस्त होना होता है।लालू प्रसाद यादव तो अपनी छवि बचाने के लिए किसी भी स्तर पर जाकर रक्षा करेंगे, वो भी आगामी बिहार चुनाव को देखते हुए तो यह और जरूरी हो जाता है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6654" aria-describedby="caption-attachment-6654" style="width: 462px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rakesh-Kapoor-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rakesh-Kapoor-1.jpg" alt="" width="462" height="547" class="size-full wp-image-6654" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rakesh-Kapoor-1.jpg 462w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rakesh-Kapoor-1-253x300.jpg 253w" sizes="auto, (max-width: 462px) 100vw, 462px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6654" class="wp-caption-text">राकेश कपूर</figcaption></figure>
<p>कपूर कहते हैं कि &#8220;वैसे लालू जी की राजनीति परिवार की सुरक्षा के लिए सदा रही है और सभी स्तर का जनप्रतिनिधि अपने  परिवार में चाहते हैं। लालू प्रसाद यादव जी में नैतिकता होती तो तेज प्रताप यादव को राष्ट्रीय जनता दल से निष्कासित करने के साथ-साथ बिहार विधान सभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनकी सदस्यता भी खत्म करने का अनुरोध करना चाहिए था।&#8221;काश !! धृतराष्ट्र लालू यादव जैसा निर्णय ले पाते तो महाभारत नहीं होता। </p>
<p>उधर तेज प्रताप यादव के फेसबुक अकाउंट पृष्ठ पर एक तस्वीर चिपकी, और चिपकते ही निरस्त कर दी गई। इसके बाद तेज प्रताप यादव ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि उनके सोशल मीडिया हैंडल को हैक कर लिया गया है और उन्हें बदनाम और परेशान करने की कोशिश की जा रही है। अब इतनी सारी तस्वीरें चिपक रही है, पिताजी अनुशासनिक कार्रवाई भी कर दिए, लेकिन बड़का ननकीरबा कुच्छो बोल रहा है। </p>
<p>राजनीतिक दृष्टि से तेज प्रताप पहली बार 2015 में वैशाली के महुआ सीट से विधायक बने।  इसके बाद नवंबर 2015 से जुलाई 2017 तक वह नीतीश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रहे। 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने उनकी सीट बदली दी और उन्हें हसनपुर से चुनाव लड़ाया तेजप्रताप यहां से भी चुनाव जीतने में कामयाब रहे और जब 26 जुलाई 2017 को नीतीश कुमार ने राजद को छोड़कर एनडीए के साथ दोबारा सरकार का गठन किया तो इस बार तेज प्रताप यादव को पर्यावरण व वन एवं जलवायु परिवर्तन का प्रभार दिया गया। अभी हसनपुर से विधायक हैं। </p>
<p>इतना ही नहीं,  2017 में Y कैटेगरी की सुरक्षा श्रेणी में भी रहे  उसी वर्ष जब केंद्र सरकार ने लालू यादव की सुरक्षा मे कटौती की तो तेज प्रताप ने प्रधानमंत्री मोदी को खाल उधेड़ने की धमकी दी थी। लेकिन दुख इस बात की रही कि लालू यादव उस दिन अपने पुत्र को नहीं ललकारे अलबत्ता बचाव किया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_rabri-devis-brother-subhash-prasad-yadav.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_rabri-devis-brother-subhash-prasad-yadav.jpg" alt="" width="468" height="451" class="alignleft size-full wp-image-6656" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_rabri-devis-brother-subhash-prasad-yadav.jpg 468w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_rabri-devis-brother-subhash-prasad-yadav-300x289.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_rabri-devis-brother-subhash-prasad-yadav-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 468px) 100vw, 468px" /></a></p>
<p>इस बीच राबड़ी देवी के भाई और पूर्व सांसद सुभाष यादव युद्ध के बीच में आये और कहा कि लालू यादव ने किसी के दबाव में आकर तेज प्रताप को पार्टी और परिवार से निकाला है। किसी ज़माने में लालू के चाहते साला सुभाष यादव का कहना है कि ‘वे पार्टी से निकाल सकते हैं’, लेकिन परिवार से नहीं।” परिवार से निकलने के लिए उन्हें न्यायालय जाना पड़ेगा। सुभाष यादव तो यहाँ तक कहे कि तेज प्रताप यादव की पहली शादी परिवार के लोगों ने जबरदस्ती करवाई थी जबकि वह शादी करना ही नहीं चाहता था। पूरा मामला दो लड़कियों से जुड़ा हुआ मामला है, जिनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ किया गया है। </p>
<p>बहरहाल, लालू के बारे में लव कुमार मिश्र कहते हैं जून 1993 में, लालू प्रसाद यादव ने पटना के गांधी मैदान में “गरीब रैली” नामक एक विशाल रैली का आयोजन किया। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हर जिला मुख्यालय का दौरा किया और लोगों से इसमें भाग लेने का आग्रह किया। एक दिन, उन्होंने गांधी मैदान के पास उत्तरी पटना पुलिस मुख्यालय का दौरा किया और सिटी एसपी अजय कुमार के कक्ष में एक बैठक की। ठीक बगल में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अनिल कुमार मलिक का कक्ष था – तकनीकी रूप से सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी – लेकिन मुख्यमंत्री ने उन्हें अनदेखा करना चुना।</p>
<p>मलिक स्पष्ट रूप से नाराज़ थे। मैंने उनसे बात की और पूछा, “मुख्यमंत्री ने आपको अनदेखा किया और अपने जूनियर को प्राथमिकता दी। आप इस बारे में कैसा महसूस करते हैं?” उनका जवाब साफ़ था: “मुझे लालू की परवाह नहीं है।” मैंने उनसे साफ़ कहा कि उनका जवाब प्रकाशन के लिए था। “क्या आपको लालू से डर नहीं लगता?” मैंने पूछा। मलिक ने जवाब दिया, “मुझे इस जोकर की परवाह नहीं है।” जब लालू को बताया गया कि मलिक ने उन्हें “जोकर” कहा है, तो उनका जवाब था, “वह मेरा नौकर है।”</p>
<p>इसी तरह, गया से लौटने के बाद लालू ने अचानक मुख्यमंत्री आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। इस दौरान पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) भी मौजूद थे। लालू ने कहा, “मुझे बम से उड़ाने की साजिश थी और एक रिक्शा चालक को गिरफ्तार किया गया है।” जब पत्रकारों ने और जानकारी मांगी तो उन्होंने एसएसपी मलिक को विस्तार से बताने को कहा। मलिक ने कहा, “यह राजीव गांधी की हत्या की तरह ही एक गंभीर साजिश थी।” पत्रकारों ने तुरंत पूछा, “क्या पटना में लिट्टे के कार्यकर्ता मौजूद हैं?”</p>
<figure id="attachment_6657" aria-describedby="caption-attachment-6657" style="width: 316px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law-2.jpg" alt="" width="316" height="395" class="size-full wp-image-6657" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law-2.jpg 316w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law-2-240x300.jpg 240w" sizes="auto, (max-width: 316px) 100vw, 316px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6657" class="wp-caption-text">राजनीतिक विशेषज्ञ लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p>लालू ने मलिक पर झल्लाते हुए कहा, “क्यों हकला रहे हो?” एक महीने के भीतर मलिक का बिहार से तबादला कर दिया गया। उसी रैली की तैयारी के दौरान आरा में एक जनसभा में जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) खुद लालू के लिए मंच पर पानी का गिलास लेकर आए। गया में डीएम अपने घर से खाना लेकर आईं। मुजफ्फरपुर में लालू ने डीएम को मंच पर बुलाया और लोगों से पूछा, “ये कौन हैं?” जब भीड़ उन्हें पहचान नहीं पाई तो लालू ने कहा, “ये किस तरह के डीएम हैं? कोई उन्हें जानता तक नहीं है। लालू प्रसाद यादव का अफसरों से रिश्ता राजा और प्रजा जैसा था। वे फोन पर निर्देश देते और अफसर के जवाब देने से पहले ही फोन काट देते। वे अक्सर अफसरों को सलाह देते कि वे अपने परिवार के बारे में सोचें।</p>
<p>एक बार, 1976 बैच के एक आईएएस अफसर जो अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे, एक फाइल लेकर लालू के घर पहुंचे। लालू ने पूछा, “क्या तुम कुछ अतिरिक्त कमाते हो?” जब अफसर ने कहा कि नहीं, तो लालू ने उसे डांटा: “मूर्ख! अगर तुम मर गए, तो तुम्हारे परिवार की देखभाल कौन करेगा? कोई नहीं करेगा।” उनके नियमों का पालन करने वालों को कई जिलों का प्रभार दिया गया और महत्वपूर्ण विभागों का प्रमुख बनाया गया। एक बार, 1980 बैच के एक आईएएस अफसर की पदोन्नति की फाइल लालू के घर पर धूल खा रही थी। निराश होकर अफसर लॉन में चले गए जहां लालू बैठे थे और अंग्रेजी में उन्हें गालियां देने लगे। सुरक्षा गार्ड अफसर को बाहर निकालने के लिए आगे बढ़े, लेकिन लालू ने उन्हें रोक दिया: “उसे बोलने दो।” </p>
<p>इसके बाद उन्होंने अपने प्रधान सचिव को बुलाया और तुरंत पदोन्नति की फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए। हालांकि, कुख्यात चारा घोटाले में लालू के आदेश का पालन करने वाले आईएएस अधिकारियों को बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने गिरफ्तार कर लिया था। अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया। मुख्य सचिव बने सजल चक्रवर्ती की जेल में ही मौत हो गई।फूलचंद सिंह, के. अरुमुगम, महेश प्रसाद, बांके जूलियस और एस.एन. दुबे जैसे अन्य आईएएस अधिकारियों को घोटाले में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया और जेल भेजा गया। लालू फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। जब 1997 में लालू को पहली बार जेल भेजा गया था, तो बिहार सैन्य पुलिस मुख्यालय में आईपीएस मेस को अस्थायी जेल में बदल दिया गया था। वहां भी, मुख्य सचिव सहित वरिष्ठ नौकरशाह उनसे निर्देश लेने आते थे। </p>
<p>जब पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लेकर अराजपत्रित कर्मचारियों की हड़ताल दो महीने से अधिक समय तक जारी रही, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों और कर्मचारी संघ के साथ बैठक की। उन्होंने मुख्य सचिव से पूछा, “क्या आपको राज्य सरकार का वेतनमान या वेतन संशोधन आयोग द्वारा अनुशंसित वेतन मिल रहा है?” अधिकारी ने स्पष्ट किया, “चूंकि आईएएस अधिकारी अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित हैं, इसलिए उन्हें केंद्रीय अधिकारियों के बराबर संशोधित वेतनमान मिलता है।” </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo.jpg" alt="" width="1364" height="1740" class="aligncenter size-full wp-image-6658" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo.jpg 1364w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo-235x300.jpg 235w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo-803x1024.jpg 803w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo-768x980.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Laluuuuuuooo-1204x1536.jpg 1204w" sizes="auto, (max-width: 1364px) 100vw, 1364px" /></a></p>
<p>मुख्यमंत्री ने जवाब दिया, “लेकिन आप राज्य में काम कर रहे हैं। अन्य कर्मचारियों की तरह, आप भी राज्य सरकार में हैं, हड़ताली कर्मचारियों की तरह। उन्हें भी केंद्रीय वेतनमान दें।” और हड़ताल वापस ले ली गई। राबड़ी देवी के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने एक बार छपरा प्रमंडल के आयुक्त पंचम लाल को फोन करके कहा, “आप मेरे पिता को परेशान कर रहे हैं। आप उनके बंदूक के लाइसेंस का नवीनीकरण क्यों नहीं कर रहे हैं?” आयुक्त ने उनके पिता की उम्र पूछी। यह जानने पर कि वे 76 वर्ष के हैं, आयुक्त ने जवाब दिया, “तो मुझे आपके पिता को गिरफ्तार करना होगा और हथियार जब्त करना होगा।</p>
<p>आप जानते हैं, 75 वर्ष से अधिक आयु के लोग कानूनी रूप से हथियार नहीं रख सकते।” मुख्यमंत्री ने दुखी स्वर में कहा, “तो जाने दीजिए।” कुछ सबसे पसंदीदा जिला मजिस्ट्रेट थे जो अपने मुख्यालय से बाहर निकलते समय अपने प्रमंडलीय आयुक्तों और सामान्य प्रशासन विभाग के प्रधान सचिव को दरकिनार कर देते थे। वे सीधे लालू से बात करते थे, तब भी जब वे सीएम नहीं थे, अपने नियंत्रण अधिकारियों से अनुमति लेने के बजाय उन्हें केवल सूचित करते थे। एक बार वर्दी में एक महिला आईपीएस अधिकारी लालू के आवास पर पहुंची और कुछ मिनट तक इंतजार किया। लालू ने उससे पूछा कि वह सीएम के बंगले पर क्यों है। उसने झिझकते हुए जवाब दिया, “सर, मैं आपसे निजी तौर पर बात करना चाहती हूं।” </p>
<p>लालू ने उससे कहा, “निजी तौर पर, मैं केवल एक महिला से बात करता हूं – राबड़ी।” फिर अधिकारी ने अपने आईपीएस पति की पोस्टिंग के पड़ोसी जिले में तबादले का अनुरोध किया। लालू ने तुरंत उनकी बात मान ली और कहा, “आपके अनुरोध में कुछ भी निजी नहीं था।</p>
<p><strong>अब यह सब देखकर लगता है कि लालू का यह कोई राजनीतिक स्टंट तो नहीं है। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/write-to-the-vidhan-sabha-speaker-to-terminate-membership-tej-pratap-for-six-years">लालू जी, अगर तेज प्रताप की भूमिका &#8216;आर.जे.डी.&#8217; में नहीं रही, तो &#8216;विधानसभा&#8217; अध्यक्ष को भी लिखित दें &#8216;छः साल के लिए सदस्यता समाप्त करें&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने की जरूरत क्यों पड़ी? कहते हैं: &#8216;​देर से असंतोष बढ़ता है, काम जल्द निबटाइए-देश को आगे बढ़ाइए​&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 May 2025 11:40:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[appointment of governor]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>​नई दिल्ली : क्या देश में राज्यपालों की नियुक्ति के लिए भारत के संविधान में एक और संशोधन की आवश्यकता है? समय की जरुरत को माने तो &#8216;हां&#8217; &#8211; भले अपवाद के तौर पर ही सही। सैद्धांतिक रूप से राज्यों के राज्यपाल प्रदेशों में भले राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करें, व्यावहारिक रूप से केंद्र सरकार की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/delay-increases-discontent-finish-the-work-quickly">​राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने की जरूरत क्यों पड़ी? कहते हैं: &#8216;​देर से असंतोष बढ़ता है, काम जल्द निबटाइए-देश को आगे बढ़ाइए​&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>​नई दिल्ली : क्या देश में राज्यपालों की नियुक्ति के लिए भारत के संविधान में एक और संशोधन की आवश्यकता है? समय की जरुरत को माने तो &#8216;हां&#8217; &#8211; भले अपवाद के तौर पर ही सही। सैद्धांतिक रूप से राज्यों के राज्यपाल प्रदेशों में भले राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करें, व्यावहारिक रूप से केंद्र सरकार की इच्छाओं के विरुद्ध नहीं जा सकते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो गैर-केंद्रीय सत्ता के राजनीतिक पार्टियों वाली प्रदेश की सरकारों के साथ, मुख्यमंत्रियों के साथ छत्तीस का आंकड़ा नहीं होता।</strong> </p>
<p>​दर्जनों दृष्टांतों में सबसे बड़ा दृष्टान्त 13 मई 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा राज्य विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में 14 प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह ​मांगने की है । तमिलनाडु के राज्यपाल मामले पर हाल ही में आए फैसले के विभिन्न पहलुओं को संबोधित किया गया है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करने के राज्यपाल के फैसले को खारिज कर दिया था। उसने माना कि विधेयकों पर राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए सभी परिणामी कदम निरर्थक थे।</p>
<p>इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपने अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए इन विधेयकों को राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की तिथि पर स्वीकृत घोषित कर दिया, यह देखते हुए कि उन्हें बहुत लंबे समय तक लंबित रखा गया था। मजे की बात यह है कि संदर्भ में सावधानीपूर्वक फैसले का कोई उल्लेख नहीं किया गया है, जैसे कि इस विषय पर कानून के बारे में राष्ट्रपति के ‘संदेह’ स्वतंत्र रूप से उत्पन्न हुए हों।</p>
<blockquote><p>लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के पोस्ट को शेयर करते हुए आरोप लगाया है कि मोदी सरकार राज्यों की आवाज़ को दबाने और निर्वाचित राज्य सरकारों को परेशान करने के लिए राज्यपालों का इस्तेमाल कर रही है।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_6610" aria-describedby="caption-attachment-6610" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1699" class="size-full wp-image-6610" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-1024x680.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-768x510.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-1536x1019.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Rahut-2048x1359.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6610" class="wp-caption-text">राहुल गाँधी</figcaption></figure>
<p>भारत के संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए इस ज्ञापन में, राष्ट्रपति ने कुछ सवाल पूछे हैं। इन नोट में यह सवाल भी शामिल है कि &#8220;क्या राज्य विधानमंडल से पारित विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के बिना लागू किया जा सकता है?&#8221; यह भी पूछा गया है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए राज्य विधानमंडल में पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय-सीमा निर्धारित करना संभव है? </p>
<p>आठ अप्रैल को तमिलनाडु सरकार की एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्यपाल विधेयकों को लंबे समय तक रोक कर नहीं रख सकते है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए तमिलनाडु सरकार के विधेयकों को अपनी स्वीकृति दी थी, जिसमें कहा गया कि राज्यपाल का तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विश्वविद्यालयों से संबंधित विधेयकों को अपनी स्वीकृति न देना &#8216;अवैध&#8217; है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा विधेयकों को स्वीकृति देने के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की थी। इस फैसले के साथ ही विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय-सीमा राष्ट्रपति के लिए भी निर्धारित की थी।</p>
<figure id="attachment_6611" aria-describedby="caption-attachment-6611" style="width: 1860px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8.jpg" alt="" width="1860" height="1287" class="size-full wp-image-6611" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8.jpg 1860w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8-300x208.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8-1024x709.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8-768x531.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8-1536x1063.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8-100x70.jpg 100w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/PM-Buddha-8-218x150.jpg 218w" sizes="auto, (max-width: 1860px) 100vw, 1860px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6611" class="wp-caption-text">यह तस्वीर 5 सितम्बर 2015 की है जब प्रधानमंत्री तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन के समापन समारोह में भाग लेने के लिए बोध​ गया ​आये थे । ​उन दिनों बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ​थे जो बाद में देश के राष्ट्रपति पर पर आसीन हुए।</figcaption></figure>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि केरल के पूर्व राज्यपाल (अब बिहार के राज्यपाल हैं) आरिफ मोहम्मद खान अपने कार्यकाल के दौरान आठ विधेयकों को दो वर्षों से रोके थे । बिलों को रोकने की वजहें कभी साफ-साफ नहीं बताया । बाद में केरल सरकार इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंची । हालांकि अकेले आरिफ ही नहीं हैं, बल्कि तीन और भी राज्यपालों का नाम भी चर्चा में रहा जिनके खिलाफ मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँच था । पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित और तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि के खिलाफ तमिलनाडु सरकार ने अदालत में याचिका दायर की थी । विपक्ष का सीधा आरोप था भी, और है भी, कि केंद्र सरकार विपक्षी शासित राज्यों के खिलाफ राज्यपालों का इस्तेमाल एक औजार के रूप में कर रही है। केरल सरकार ने अपनी याचिका में कहा था कि &#8220;राज्यपाल का मौजूदा आचरण कानून के शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था सहित हमारे संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।</strong> </p>
<p>इनके अलावा झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, बिहार के राज्यपालों के बारे में भी चर्चाएं खुलेआम हुयी थी। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोशयारी इतना बदनाम हुए कि अदालत को तीखी टिप्पणियां तक करना पड़ीं। पंजाब सरकार ने भी विधेयकों की मंजूरी रोकने के लिए राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। हालांकि, इसके बाद, पंजाब माल और सेवा कर (संशोधन) विधेयक, 2023 और भारतीय स्टाम्प (पंजाब संशोधन) विधेयक, 2023 सहित दो विधेयकों पर अपनी सहमति दे दी। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इतने दिनों से विधेयकों को रोककर क्यों बैठे थे।</p>
<figure id="attachment_6612" aria-describedby="caption-attachment-6612" style="width: 2043px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4.jpg" alt="" width="2043" height="1227" class="size-full wp-image-6612" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4.jpg 2043w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4-1024x615.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-4-1536x923.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2043px) 100vw, 2043px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6612" class="wp-caption-text">​देश के एक राज्य का राज्यपाल निवास</figcaption></figure>
<p><strong>दिल्ली में उपराज्यपाल वीके सक्सेना और आम आदमी पार्टी सरकार का विवाद भी दिल्ली की सडकों पर यात्रा-तत्र सर्वत्र दिखा । कई बार अदालतों ने भी हस्तक्षेप किया है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। इसी तरह तेलंगाना भी राज्यपाल विवाद से अछूता नहीं रहा है।  किसी भी राज्य में राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को लेकर इस तरह के विवाद बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं।</strong></p>
<blockquote><p>बहरहाल, भारतीय संविधान का प्रारूप 1948 के अनुच्छेद 131 के अनुसार, किसी राज्य के राज्यपाल का चुनाव उन सभी व्यक्तियों के प्रत्यक्ष मत द्वारा किया जाएगा, जिन्हें राज्य की विधान सभा के लिए आम चुनाव में मतदान का अधिकार है। और फिर वैकल्पिक रूप में यह भी कहा गया है कि &#8216;किसी राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मोहर सहित अधिपत्र द्वारा चार अभ्यर्थियों के पैनल में से नियुक्त करेगा, जो उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा, या जहां राज्य में विधान परिषद है, वहां उस राज्य की विधान सभा और विधान परिषद के सभी सदस्यों द्वारा संयुक्त अधिवेशन में समवेत होकर आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित किए जाएंगे और ऐसे चुनाव में मतदान गुप्त होगा।&#8217;</p></blockquote>
<p>कहते हैं कि 30 मई और 31 मई 1949 को को ड्राफ्ट आर्टिकल 131 (आर्टिकल 155) पर बहस हुई। इस ड्राफ्ट आर्टिकल के दो संस्करण थे &#8211; एक में राज्यपाल के चुनाव की प्रक्रिया बताई गई थी और दूसरे में नियुक्ति की प्रक्रिया बताई गई थी। बहस इस बात पर केंद्रित थी कि राज्यपाल को चुनाव के माध्यम से चुना जाना चाहिए या नियुक्ति के द्वारा। चुनाव के पक्ष में कुछ सदस्यों ने बताया  कि विधानसभा ने दो साल पहले एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल का चुनाव चुनाव के माध्यम से किया जाएगा। एक सदस्य ने तर्क दिए कि नियुक्त राज्यपाल किसी भी राज्य से हो सकता है, और इसलिए वह एक अक्षम प्रशासक होगा क्योंकि उसे लोगों या भाषा का कोई ज्ञान नहीं होगा।</p>
<p>कई सदस्यों ने नियुक्ति की प्रणाली का समर्थन किया, लेकिन मसौदा अनुच्छेद में निर्धारित प्रक्रिया को अस्वीकार कर दिया। एक सदस्य ने तर्क दिया कि प्रांतीय स्वायत्तता और सफल राज्य कैबिनेट सरकारें केवल &#8216;काफी निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख के अस्तित्व&#8217; से ही सुनिश्चित की जा सकती हैं। उन्होंने मसौदा अनुच्छेद में उम्मीदवारों के पैनल से नियुक्ति की प्रणाली का भी विरोध किया क्योंकि यह सौहार्दपूर्ण संबंधों के लिए अनुकूल नहीं था। इसमें किसी पार्टी के भीतर गुटबाजी को बढ़ावा मिलेगा। </p>
<figure id="attachment_6613" aria-describedby="caption-attachment-6613" style="width: 2043px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5.jpg" alt="" width="2043" height="1227" class="size-full wp-image-6613" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5.jpg 2043w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5-1024x615.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-5-1536x923.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2043px) 100vw, 2043px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6613" class="wp-caption-text">​देश के एक राज्य का राज्यपाल निवास</figcaption></figure>
<p>मसौदा समिति के एक सदस्य ने भी सहमति जताई और कहा कि नियुक्ति अधिक उपयुक्त थी क्योंकि राज्यपाल का कार्य &#8216;संवैधानिक प्रमुख, एक बुद्धिमान परामर्शदाता और मंत्रालय का सलाहकार होना था जो मुश्किलों में तेल डाल सकता है&#8217;। प्रधानमंत्री ने इन तर्कों से सहमति जताई और कहा कि नियुक्ति यह सुनिश्चित करेगी कि राज्यपाल राज्य की राजनीति से अलग रहे और निष्पक्ष और निष्पक्ष रूप से काम करने में सक्षम हो। एक अन्य सदस्य ने तर्क दिया कि नियुक्ति करने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित होनी चाहिए।</p>
<p><strong>एक सदस्य ने मसौदा अनुच्छेद को पूरी तरह से बदलने का प्रस्ताव रखा, जिसमें कहा गया कि &#8216;राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।&#8217; उन्होंने तर्क दिया कि मसौदा अनुच्छेद की भाषा विधानमंडल को बहुत अधिक छूट देती है और राष्ट्रपति की पसंद को प्रतिबंधित करती है। उनके अनुसार, संशोधन की प्रक्रिया को सरल बना दिया है और राष्ट्रपति को राज्यपाल नियुक्त करने का अप्रतिबंधित अधिकार दिया है। इसे मसौदा समिति के सदस्यों सहित विधानसभा का लोकप्रिय समर्थन प्राप्त हुआ। विधानसभा ने राज्यपाल को नियुक्ति द्वारा चुनने के पक्ष में मतदान किया और प्रस्तावित एकमात्र संशोधन को  स्वीकार कर लिया। संशोधित मसौदा अनुच्छेद 31 मई 1949 को अपनाया गया। </strong></p>
<p>यह भी कहा जाता है कि संविधान निर्माण के दौरान, संविधान सभा ने गवर्नर की नियुक्ति की चार वैकल्पिक योजनाओं पर विचार किया &#8211;  वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव;  विधानमंडल द्वारा चुनाव;  प्रांतीय विधानमंडल द्वारा प्रस्तुत नामों के पैनल में से राष्ट्रपति द्वारा नामांकन; और  राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधीन नियुक्ति। </p>
<blockquote><p>बहरहाल, पहला सुझाव संविधान सभा के विचारार्थ मसौदा संविधान में शामिल किया गया था। हालांकि, संविधान निर्माताओं ने तर्क दिया कि, यदि राज्यपाल सीधे निर्वाचित होता है, तो वह राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ऊपर नहीं हो सकता है, और वह कुछ स्थितियों में वास्तविक शक्ति का दावा कर सकता है। राज्यपाल के लोकप्रिय प्रतिनिधित्व के दावे के कारण, मुख्यमंत्री के साथ टकराव आम बात होगी। संविधान सभा ने विधानमंडल द्वारा चुनाव के दूसरे विचार को अस्वीकार कर दिया। </p></blockquote>
<p>इस स्थिति में यह बताया गया कि वह स्थानीय प्रमुख पार्टी के हाथों में एक शक्तिहीन साधन होगा और इस तरह की नियुक्ति से राज्यपाल की स्वतंत्रता ख़तरे में पड़ जाएगी। राष्ट्रपति द्वारा विधायिका या मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्तुत चार व्यक्तियों की सूची में से राज्यपाल को चुनने का सुझाव भी अस्वीकार कर दिया गया। ऐसा माना गया कि ऐसी स्थिति में मतभेद और गुटबाजी उभरेगी, जिससे बहुमत-समेकित पार्टी की स्थिति खराब होगी। और इन मौजूदा प्रथाओं के पक्ष और विपक्ष पर विचार करते समय, हमारे संविधान निर्माताओं ने कनाडाई मॉडल को चुना।</p>
<figure id="attachment_6614" aria-describedby="caption-attachment-6614" style="width: 2043px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7.jpg" alt="" width="2043" height="1227" class="size-full wp-image-6614" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7.jpg 2043w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7-1024x615.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-7-1536x923.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2043px) 100vw, 2043px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6614" class="wp-caption-text">​देश के एक राज्य का राज्यपाल निवास</figcaption></figure>
<p>अनुच्छेद 155 के अनुसार, राष्ट्रपति को राज्यपाल के नामांकन पर पूर्ण और अप्रतिबंधित नियंत्रण दिया गया था। आलोचकों के अनुसार केंद्र ऐसे व्यापक अधिकार का दुरुपयोग कर सकता है। हालांकि, इसे नियंत्रित रखने के लिए कुछ नियम हैं: ऐसा माना जाता है कि यदि कोई निवासी किसी अन्य राज्य का निवासी है तो उसके उस राज्य के राजनीतिक मामलों में शामिल होने की संभावना कम होगी, और इसलिए वह अधिक ईमानदारी और निष्पक्षता से व्यवहार करेगा। इससे इतने बड़े और विविध समुदाय के बीच विद्यमान एकजुटता और एकजुटता की उच्च भावनाओं को भी बढ़ावा मिलेगा। </p>
<p>1956 में भारत की संसद में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया था, जिसके तहत 14 राज्य और 5 केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना की गई थी। संशोधन की घोषणा के कारण महाराष्ट्र राज्य के लोगों ने व्यापक दंगे किए और लगभग अस्सी लोग मारे गए। इसके कारण बॉम्बे राज्य का विभाजन गुजरात और महाराष्ट्र में हो गया, जिसके बाद बॉम्बे एक अलग राज्य बन गया, जिसे बाद में निरंतर विरोध और सार्वजनिक आक्रोश के कारण महाराष्ट्र का हिस्सा बना दिया गया। मई 1960 में बॉम्बे को महाराष्ट्र की राजधानी और अहमदाबाद को गुजरात की राजधानी घोषित किया गया। 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के भाग II के रूप में, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संविधान की चौथी अनुसूची के पूर्ण संशोधन में शामिल किया गया था, जिसमें राज्य परिषद की सीटें मौजूदा राज्यों को आवंटित की गई थीं।</p>
<p><strong>भारत के राष्ट्रपति ने 7वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुच्छेद 258 ए के तहत संशोधन नीतियों के तहत केंद्र शासित प्रदेशों का नेतृत्व राज्य के राज्यपालों को सौंप दिया। हालांकि, राज्यपाल इस अनुच्छेद के तहत केंद्र सरकार को केंद्र शासित प्रदेशों का नेतृत्व या कार्य नहीं सौंप सकते। नेतृत्व के इस हस्तांतरण मुद्दे को बाद में राष्ट्रपति कानून का उपयोग करते हुए अनुच्छेद 258 ए में संशोधित किया गया। </strong></p>
<p>इसके अलावा, राज्यों के राज्यपालों को भारत की केंद्र सरकार के साथ चर्चा करके राज्य को सौंपे गए अधिकारियों को कार्य या कोई जिम्मेदारी सौंपने की शक्ति दी गई। जब तक राज्य के कानूनों का पालन किया जा रहा था, भारत के राज्यपाल ने कर्तव्यों के इस हस्तांतरण की अनुमति दी। एक अन्य अनुच्छेद 258A यह प्रावधान करने के लिए जोड़ा गया कि किसी राज्य का राज्यपाल भारत सरकार की सहमति से केंद्र सरकार या उसके अधिकारियों के साथ राज्य के किसी भी पद को साझा कर सके। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11.jpg" alt="" width="2043" height="1227" class="aligncenter size-full wp-image-6615" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11.jpg 2043w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11-1024x615.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/G-11-1536x923.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2043px) 100vw, 2043px" /></a></p>
<p><strong>वैसे संविधान स्वीकार करने के बाद से, भारतीय संविधान में अब तक 106 संशोधन किए जा चुके हैं। पहला संशोधन 1951 में किया गया था और नवीनतम संशोधन 2023 में हुआ।कहते हैं कि संशोधन भारतीय संविधान को समय के साथ बदलने और सुधारने की एक प्रक्रिया है जो अनुच्छेद 368 के तहत निर्धारित है। सबसे महत्वपूर्ण संशोधन 1976 में 42 वां के रूप में जाना जाता है जिसमें  राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका की शक्तियों को प्रभावित किया था। 44 वां संशोधन आपातकाल के दौरान हुआ था। साल 1992 में पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता देने के लिए 73 वां संशोधन किया गया था और फिर 2002 में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए 86 वां संशोधन किया गया। संविधान के संशोधन के क्रम में सत्तारूढ़ पार्टी कटी है कि यह संशोधन संविधान को गतिशिक और लचीला बनाने के लिए किया जाता है जो समय के साथ देश की जरूरतों के अनुरूप बदलता रहता है।</strong> </p>
<p>नरेंद्र मोदी जब साल 2014 में प्रधानमंत्री बने, तब से अब तक (2014 से 2025 तक) भी ​सात बार संविधान में संशोधन किये गए हैं। साल 2015 में 99 वां संशोधन हुआ जिसके तहत राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना की गयी, जो न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाला था।हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। एक साल बाद साल 2016 में वस्तु एवं सेवा कर लागू किया जो देश में कर प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव था। यह 101 वां संशोधन के रूप में जाना गया। दो साल बाद 2018 में 102 वां संशोधन किया गया जिससे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया। उसके अगले वर्ष 103 वां संशोधन के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को शिक्षा और नौकरी में 10% आरक्षण की अनुमति दी गयी। </p>
<blockquote><p>विगत पांच वर्षों में भी तीन संशोधन किये गए। 2020 में 104 वां संशोधन के लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी और एसटी के लिए सीटों की समाप्ति की समय सीमा 70 से बढ़ाकर 80 साल कर दी। फिर 2023 में 106 वां संशोधन के तहत लोकसभा, राज्य विधान सभाओं और दिल्ली विधान सभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गयी, जो महिला आरक्षण अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।</p></blockquote>
<p>आज जब इन तमाम परिदृश्यों को देखते भारत के राज्यों में पदस्थापित राज्यपालों को देखता तो सोचता हूँ कि देश के 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों का प्रथम नागरिक, वास्तविक तौर पर उस राज्य का नागरिक होता ही नहीं है। दिल्ली के कनॉट प्लेस से भारत के संसद को मिलाने वाली सड़क संसद मार्ग पर राजनेताओं का कहना है यही परंपरा है। नेतागण कहते हैं कि &#8216;राज्यपाल प्रदेश में राष्ट्रपति की भूमिका अदा करते हैं और हमेशा केंद्र सरकार के निर्देशों का अक्षरशः अनुपालन करते हैं। राज्यपाल का दूसरे प्रदेश का नागरिक होना कोई कानूनी बाध्यता नहीं हैं, एक परंपरा है। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार अपनी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति राजपाल के द्वारा करा सकती है। क्योंकि औसतन राज्यपालों को अपनी कुर्सी पर जमे रहने के लिए केंद्र सरकार के आदेश को मानना ही होगा।</p>
<figure id="attachment_6607" aria-describedby="caption-attachment-6607" style="width: 696px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra-1024x737.jpg" alt="" width="696" height="501" class="size-large wp-image-6607" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra-1024x737.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra-300x216.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra-768x553.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra-1536x1105.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra.jpg 1698w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6607" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा</figcaption></figure>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा</strong> कहते हैं की &#8220;बेशक। समय की जरूरत के हिसाब से बदलाव करना पड़ता है। हालांकि यह अपवाद के तौर पर ही होना चाहिए और ऐसे मामलों में कोई सख्त नियम नहीं हो सकता। एक समय में, किसी खास राज्य के निवासी या मतदाता ही उस प्रांत से राज्यसभा में हो सकते थे। समय के साथ राजनेताओं ने अपने हिसाब से बदलाव किए। इसके बावजूद राज्यसभा को काउंसिल ऑफ स्टेट्स कहा जाता है।&#8221; </p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक तंत्र की विफलता के उदाहरणों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया: राजनीतिक संकट.आंतरिक तोड़फोड़,  शारीरिक टूटन, संघ कार्यकारिणी के संवैधानिक निर्देशों का अनुपालन न करना। ज्ञातव्य हो कि एसआर बोम्मई मामले (1994) में , सरकारिया आयोग की सिफारिशों के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि संवैधानिक तंत्र के टूटने से राज्य में शासन चलाने में मात्र कठिनाई नहीं, बल्कि लगभग असंभवता का संकेत मिलता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यद्यपि इस तरह की विफलता के संबंध में राष्ट्रपति की व्यक्तिपरक सन्तुष्टि न्यायिक जांच से परे है, फिर भी जिस सामग्री पर ऐसी संतुष्टि आधारित है, उसका विश्लेषण निश्चित रूप से राज्यपाल की रिपोर्ट सहित न्यायपालिका द्वारा किया जा सकता है। न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में मनमाने ढंग से राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने के बाद निलंबित की गई सरकारों को बहाल कर दिया।</strong>  </p>
<p><strong>नबाम रेबिया</strong> मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में फैसला सुनाया था कि राज्यपाल के विवेकाधिकार का प्रयोग अनुच्छेद 163 के तहत सीमित है और उनके द्वारा किया जाने वाला कार्य मनमाना या काल्पनिक नहीं होना चाहिए। यह तर्क से प्रेरित, सद्भावना से प्रेरित और सावधानी से किया जाने वाला निर्णय होना चाहिए। प्रशासनिक सुधार आयोग (1968) ने सिफारिश की थी कि राष्ट्रपति शासन के संबंध में राज्यपाल की रिपोर्ट वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए तथा राज्यपाल को इस संबंध में स्वयं निर्णय लेना चाहिए। राजमन्नार समिति (1971) ने भारत के संविधान से अनुच्छेद 356 और 357 को हटाने की सिफारिश की थी । अनुच्छेद 356 के तहत केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधानों को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए। राजमन्नार समिति ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य के राज्यपाल को स्वयं को केंद्र का एजेंट नहीं समझना चाहिए, बल्कि राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। </p>
<p><strong>सरकारिया आयोग</strong> (1988) ने सिफारिश की थी कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग अत्यंत दुर्लभ मामलों में किया जाना चाहिए, जब राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता को पुनः स्थापित करना अपरिहार्य हो जाए। आयोग ने सिफारिश की कि अनुच्छेद 356 के तहत कार्रवाई करने से पहले राज्य सरकार को चेतावनी जारी की जानी चाहिए कि वह संविधान के अनुसार काम नहीं कर रही है। फिर, न्यायमूर्ति वी. चेल्लिया आयोग (2002) ने सिफारिश की थी कि  अनुच्छेद 356 का प्रयोग संयम से किया जाना चाहिए तथा अनुच्छेद 256, 257 और 355 के तहत सभी कार्रवाइयों के समाप्त हो जाने के बाद इसे अंतिम उपाय के रूप में ही प्रयोग किया जाना चाहिए । &#8220;पंछी आयोग&#8221; ने सिफारिश की थी कि इन अनुच्छेदों 355 और 356 में संशोधन किया जाना चाहिए। इसने केंद्र द्वारा इनके दुरुपयोग को रोकने की कोशिश करके राज्यों के हितों की रक्षा करने की कोशिश की।</p>
<figure id="attachment_6608" aria-describedby="caption-attachment-6608" style="width: 696px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1-1024x737.jpg" alt="" width="696" height="501" class="size-large wp-image-6608" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1-1024x737.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1-300x216.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1-768x553.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1-1536x1105.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Pankaj-Vohra1.jpg 1698w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6608" class="wp-caption-text">​वरिष्ठ पत्रकार और अधिवक्ता बिराजा महापात्रा</figcaption></figure>
<p><strong>प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के पूर्व विधि संवाददाता और वर्तमान में अधिवक्ता बिराजा महापात्रा</strong> कहते हैं कि &#8216;राज्यपाल की नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कानूनी तौर पर गृह राज्य से राज्यपाल नियुक्त करने में कोई बाधा नहीं है। लेकिन राज्यपाल सिर्फ राज्य का औपचारिक मुखिया नहीं होता। वह केंद्र के एजेंट के तौर पर भी काम करता है। राज्यपाल से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राज्यपाल के तौर पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए निष्पक्षता और तटस्थता बनाए रखे। बी.जी. खेर, के.एन. काटजू और पी. सुब्बारायण की संविधान सभा की एक उप समिति ने सुझाव दिया था कि राज्यपाल को मुख्यमंत्री की तरह ही एक निर्वाचित प्रतिनिधि होना चाहिए। लेकिन संविधान सभा मुख्यमंत्री और राज्यपाल की शक्तियों के बीच टकराव की आशंका के कारण इससे सहमत नहीं थी।&#8217;</p>
<p>महापात्रा के अनुसार, अगर आपको 1994 का एस.आर. बोम्मई मामला याद हो, तो सुप्रीम कोर्ट ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों को तोड़ने के लिए राज्यपाल की संस्था का इस्तेमाल किया। राज्यपाल के पद के दुरुपयोग के आरोप मणिपुर, गोवा (2017), मेघालय, कर्नाटक (2018) और हाल ही में तमिलनाडु से जुड़े कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट में आए हैं। हालांकि राज्यपाल की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायिक जांच के दायरे में आती है, लेकिन ऐसा शायद ही कभी होता है। शायद हाल ही में तमिलनाडु का मामला इसका अपवाद है। इसलिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि राज्यपाल राज्य से है या नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्यपाल को निष्पक्ष रोल मॉडल होना चाहिए और अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय तटस्थता बनाए रखनी चाहिए।&#8217;</p>
<p>ज्ञातव्य हो कि स्वतंत्रता के बाद पहली भारतीय राज्य राज्यपाल सरोजिनी नायडू थीं, जिन्होंने 1947 से 1949 तक उत्तर प्रदेश की राज्यपाल के रूप में कार्य किया। उनकी नियुक्ति से पहले, उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत के रूप में जाना जाता था। इसी तरह कर्नाटक में जयचामराजेंद्र वाडियार, केरल में बुर्गुला रामकृष्ण राव, मध्य प्रदेश में डॉ. पट्टाभि सीतारमैया, महाराष्ट्र में राजा सर महाराज सिंह नियुक्त हुए थे। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर, 1 नवंबर 1956 ई. से राजप्रमुख की संस्था को 7वें संविधान संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया था। श्री गुरुमुख निहाल सिंह को 25 अक्टूबर 1956 ई. को राजस्थान के पहले राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/delay-increases-discontent-finish-the-work-quickly">​राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने की जरूरत क्यों पड़ी? कहते हैं: &#8216;​देर से असंतोष बढ़ता है, काम जल्द निबटाइए-देश को आगे बढ़ाइए​&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संवाददाता के लेखन-पुस्तिका से ✍ अफ़जल अमानुल्लाह नहीं चाहे आडवाणी को गिरफ्तार करना धनबाद में, नहीं किये; जो किये वे रायसीना पहाड़ पर भाजपा के मंत्री बने</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Feb 2025 11:50:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[advani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : बात कोई 35-साल पहले की है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय के अध्यक्ष थे लाल कृष्ण आडवाणी। आडवाणी जी भाजपा को तीन बार अपना नेतृत्व दिए। साल 1986-91, 1993-98 और 2004-2005 में पार्टी के अध्यक्ष रहे। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में  केंद्र में सरकार बनी, वे गृह मंत्री बने फिर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/afzal-amanullah-did-not-want-to-arrest-advani-in-dhanbad">संवाददाता के लेखन-पुस्तिका से ✍ अफ़जल अमानुल्लाह नहीं चाहे आडवाणी को गिरफ्तार करना धनबाद में, नहीं किये; जो किये वे रायसीना पहाड़ पर भाजपा के मंत्री बने</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : बात कोई 35-साल पहले की है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय के अध्यक्ष थे लाल कृष्ण आडवाणी। आडवाणी जी भाजपा को तीन बार अपना नेतृत्व दिए। साल 1986-91, 1993-98 और 2004-2005 में पार्टी के अध्यक्ष रहे। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में  केंद्र में सरकार बनी, वे गृह मंत्री बने फिर उप-प्रधान मंत्री का भी पद संभाला। आज देश का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, वह भी तीसरी बार, लेकिन वे कभी पार्टी का नेतृत्व नहीं किये &#8211; प्रत्यक्ष रूप से। </strong></p>
<p>लाल कृष्ण आडवाणी से मैं पहली बार रूबरू हुआ था धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में। उन दिनों गोल्ड ग्राउंड में धनबाद के छोटे-छोटे बच्चे क्रिकेट, फुलबॉल खेलते थे। बड़े-बुजुर्ग सुबह-शाम मैदान में बर्जिस करते थे। स्थानीय पुलिस यहीं अपना अभ्यास भी करती थी। आज तो गोल्फ ग्राउंड का भी राजनीतिकरण हो गया है। अब इसका नाम रणधीर प्रसाद वर्मा स्टेडियम हो गया। </p>
<p>इस गोल्फ ग्राउंड में प्रवेश और निकास के तीन रास्ते थे उन दिनों। एक मुख्य मार्ग से। दूसरे एसएसएलएनटी कॉलेज और राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ कार्यालय से आगे दाहिने हाथ से और एक हाउसिंग कालोनी के तरफ से। जो रास्ता महिला कालेज की ओर से आती थी उसी रास्ते के दाहिने हाथ पर पुलिस अधीक्षक का आवास था। रणधीर वर्मा भी उस आवास में रहे थे। जिस दिन वे अपनी अनंत यात्रा पर निकले थे, सुबह इसी गोल्फ ग्राउंड में बर्जिस किये थे। खैर।  </p>
<p>रणधीर वर्मा, जो समय धनबाद के पुलिस अधीक्षक थे और उनका पदोन्नति डीआईजी, बोकारो के लिए हुआ था, 3 जनवरी, 1991 को मृत्यु को प्राप्त किये। जब रणधीर वर्मा हीरापुर के बैंक ऑफ़ इण्डिया में बैंक लुटेरों की गोलियों का शिकार हुए तो सबसे पहले उनके नाम का राजनीतिक लाभ उनकी पत्नी को मिली। श्रीमती रीता वर्मा धनबाद का सांसद बन गयी। उसी वर्ष मई और जून में दसवीं लोक सभा के लिए चुनाव हुआ। भारतीय जनता पार्टी श्रीमती रीता वर्मा को चुनावी मैदान में उतार दी। श्रीमती वर्मा 1991-1996, 1996-1998, 1988-1999 और 1999-2004 यानी 14 वर्ष धनबाद को भारत के संसद में प्रतिनिधित्व की। </p>
<blockquote><p>आज 35 वर्ष बीतने के बाद भी धनबाद के लोगों का जो सम्मान तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रणधीर वर्मा के लिए है, या आगे भी रहेगा, वहां की पूर्व सांसद और रणधीर वर्मा की पत्नी श्रीमती रीता वर्मा को नहीं प्राप्त हुआ। आज जब धनबाद के लोग उनके कालखंड में मतदाताओं और संसदीय क्षेत्र को एक साथ देखते हैं तो रोना आता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि 14 साल सांसद होने के बाद भी अपने क्षेत्र के लिए श्रीमती रीता वर्मा का योगदान &#8220;शून्य&#8221; रहा। खैर। </p></blockquote>
<p>तत्कालीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी 20 अक्टूबर, 1990 को धनबाद के इस गोल्फ ग्राउंड में पधारे थे अपने रथ यात्रा के क्रम में। भारत के आज के 70 फीसदी से अधिक पत्रकार, लोगबाग, विश्लेषक शायद उस दृश्य को नहीं देखे होंगे। मैं वहाँ था एक संवाददाता के रूप में। हज़ारों लोगों की तायदात थी वहां उपस्थित। स्थानीय पत्रकार तो थे ही, पटना, कलकत्ता, दिल्ली से प्रकाशित अख़बारों के संवाददाता और छायाकार भी उपस्थित थे। </p>
<p>आडवाणी जी के साथ पत्रकारों का एक काफिला भी चल रहा था उनके साथ ताकि पग-पग की कहानी अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं को प्रेषित कर सकें। उसी दिन धनबाद डाकधार में टेलेक्स और टेलीप्रिंटर की विशेष व्यवस्था की गयी थी। कुछ अख़बारों के दफ्तर भी थे वहां जहाँ टेलीप्रिंटर लगा था। कलकत्ता समाचार भेजने के लिए डाकघर के टेलीप्रिन्टर का इस्तेमाल करते थे।<br />
 <br />
उस ज़माने में भी कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार अपने स्थानीय पत्रकारों को बहुत अहमियत देता था, संभवतः सम्भतः आज भी देता होगा। अभी तक दी टेलीग्राफ अखबार के तत्कालीन संपादक एमजे अकबर का नाम ही अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित होता था। यह अलग बात है कि कुछ ही समय बात अकबर अपने अखबार और स्वयं से जुड़े सभी लोगों को एक पत्र द्वारा सूचित किये थे कि आखिर वे पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में क्यों प्रवेश ले रहे हैं 1991 लोक सभा चुनाब में किशनगंज से लड़ने। खैर। उनकी अलग कहानी है। </p>
<p><strong>अब आइये आडवाणी जी और मोदी जी के कालखंडों को एक नजर से देखते हैं। आडवाणी जी पत्रकारों का काफ़िला लेकर चलते थे और श्री मोदी जी बंद कमरे में अपना काफ़िला बनाते हैं। वैसे समय में परिवर्तन के साथ-साथ यह होना भी लाज़िमी है, लेकिन जब दोनों कालखंडों की तुलना करते हैं तो सोचता हूँ सब विज्ञान की माया है। </strong></p>
<p>जिस कालखंड में आडवाणी जी कदमताल कर रहे थे, उस ज़माने में क्वींसवे राजपथ ने नाम से चर्चित था और गूगल बाबू विज्ञान के गर्भ में उत्पन्न भी नहीं हुए थे। जबकि सम्मानित नरेंद्र मोदी जी के ज़माने में राजपथ कर्तव्य पथ बन गया, औरंगजेब रोड डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम निबंधित हो गया और गूगल महाशय ही नहीं, पारम्परिक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, टीवी चैनलों के अलावे पूरा ब्रह्माण्ड एक कमरे में सिमट गया &#8211; जहाँ तक लिखने-लिखाने, छपने-छापने, वितरण करने, पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाने का सवाल है। </p>
<p>इस दृष्टि से श्रीमान आडवाणी जी की तुलना में सम्मानित मोदी जी अधिक भाग्यशाली है। वैसे मोदी जी तो भाग्यशाली हैं ही, एक नहीं तीसरी बार देश का नेतृत्व कर रहे हैं। जिस ज़माने में वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, दिल्ली के नेता उन्हें घास भी नहीं डालते थे। लोग माने अथवा नहीं, आडवाणी जी भी उन नेताओं में एक थे। सब समय का खेल है। कल उनका था, आज इनका है और फिर कल किसी और का होगा। </p>
<p><strong>आज मोदीजी के राज में जब सामाजिक क्षेत्र के मीडिया घरों पर, मसलन ट्विटर, X, फेसबुक आदि देखता हूँ जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से पृष्ठ है, क्षण-क्षण का समाचार, विश्लेषण, तस्वीर प्रकाशित होते हैं। मन प्रसन्न हो जाता है। सोचता हूँ आज़ाद भारत के 78 वर्ष में देश को [पहला प्रधानमंत्री मिला जो जिसके नाम से पृष्ठ है। भले लिखने वालों की, शुद्धिकरण करने वालो की, तथ्यों की जांच-पड़ताल करने वालों की फ़ौज हो उस कमरे में, लेकिन नाम तो मोदी जी का ही है। तभी तो पारम्परिक पत्र-पत्रिकाएं, यहाँ तक की टीवी वाले भी उन प्रकाशित तथ्यों को उद्धृत करते हैं प्रधानमंत्री के नाम से। आडवाणी जी के कालखंड में ऐसी बात नहीं थी, तभी तो वे काफिला लेकर चलते थे।</strong> </p>
<p>उन दिनों भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्रकाशित पारम्परिक पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय विभाग भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय के हल्के पीले रंग वाले लिफाफे में बंद प्रेस विज्ञप्ति के साथ-साथ दिल्ली की सरकारी तस्वीरों की प्रतीक्षा करते थे। गोदरेज या हाल्दा मशीन से टंकित शब्दों की कहानियों के लिए इंतज़ार करते थे। भारत सरकार द्वारा अनुशंसित कागज के कोटों को बरकरार रखने के लिए, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा निर्गत विज्ञापनों को प्राप्त करने के लिए प्रकाशन करते थे। मन में भय बना होता था कि अगर प्रकाशित नहीं करेंगे तो कहीं न्यूजप्रिंट का कोटा न काम हो जाये, कहीं विज्ञापन न रद्द हो जाये, स्वाभाविक भी था। बाज़ार में निजी क्षेत्र से विज्ञापनों के पैदाइश नहीं थी इतनी। अगर थी भी तो उनके पास पैसे नहीं थे अखबार में छापने के लिए। आज समय बदला-बदला सा है। </p>
<p>बहरहाल, आडवाणी जी का रथ 19 अक्टूबर, 1990  को बिहार में प्रवेश किया था। दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह बैठे थे। उधर पटना सचिवालय में नए-नए मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव बैठे थे। शायद लालू को मुख्यमंत्री बने सात महीने भी नहीं हुए थे। &#8216;मंदिर वहीँ बनाएंगे&#8217; का नारा धनबाद का बच्चा बच्चा बोल रहा था &#8211; कुछ तुतलाकर, कुछ हकलाकर। वजह भी था। वैसे बच्चे नहीं जानते थे कि आडवाणी कौन हैं और यह रथ यात्रा क्या है ? </p>
<p>उस समय कोयला अंचल के इस कोयला माफिया वाले इलाके की आबादी करीब आठ लाख से कुछ अधिक थी। जिसमें अनुसूचित जाति के कोई सवा दो लाख और अनुसूचित जनजाति के करीब पौने दो लाख लोग थे। इस आबादी का मूल भोजन भात था, वह भी अगर रात का बासी भात मिल जाय तो सोना में सुहागा। धनबाद में अन्य जो थे वे सभी भारत के विभिन्न शहरों से नौकरी की तलाश में, रोजी रोटी की तलाश में या फिर दबंगता और माफियागिरी करने, पैसे लूटने के लिए यहाँ आये थे। वीपी सिंह के साथ लालू का तार जुड़ा था। लेकिन सिंह साहब चिंतित इसलिए थे कि उन्हें सरकार में भाजपा और बामपंथियों का सहयोग था। कुछ भी उन्नीस-बीस होने से सरकार धड़ाम। और ऐसा ही हुआ। </p>
<p><strong>उस ज़माने में गोल्फ ग्राउंड में उपस्थित लोग जो देख रहे थे, वह तो विश्वसनीय था ही, जो नहीं देख रहे थे वह एक विश्वसनीय जानकारी के रूप में वहां के उपायुक्त के कार्यालय से प्राप्त हो रहा था। धनबाद से प्रकाशित अख़बारों का अपना अलग रुतबा था, लेकिन कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ धनबाद के पाठकों के बीच अपना अलग महत्व रखता था। स्वाभाविक है उस अख़बार का स्थान उपयुक्त के कार्यालय में भी सर्वोपरि था अलावे इसके कि उस अखबार का संवाददाता कोई हाई प्रोफ़ाइल पत्रकार नहीं था। आज इतने दिन बाद भी तत्कालीन उपायुक्त मित्रवत हैं।</strong> </p>
<p>उपायुक्त कार्यालय में बैठे थे भारत के पूर्व विदेश सेवा के अधिकारी से राजनेता बने सैय्यद सहाबुद्दीन के दामाद अफ़ज़ल अमानुल्लाह। बेहद साफ़ सुधरे व्यक्तित्व के अधिकारी। सैय्यद सहाबुद्दिबन बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के संयोजक भी थे। बहुत सारी बातें थी। अंदर-ही-अंदर, पटना-दिल्ली गर्म तार से जुड़ा था और बीच-बीच में लालू यादव उछल-कूद रहे थे ताकि आडवाणी की गिरफ्तारी हो जाय। अफ़ज़ल समय की गंभीरता को समझ रहे थे। बहुत सारी बातें वे अपनी नज़रों से इशारा कर देते थे ताकि समाचार लिखते समय तथ्यों में कोई गड़बड़ी नहीं हो। वे जानते थे कि अगर लालू के चक्कर में आ जायेंगे, आडवाणी को गिरफ्तार कर लेंगे तो धनबाद में क्या हो जायेगा, कहा नहीं जा सकता। </p>
<p><strong>अपरान्ह काल होते-होते अडवाणी का रथ धनबाद की सीमा को पार किया। दो दिन बाद 23 अक्टूबर को पटना के रास्ते समस्तीपुर पहुंचा जहाँ वे सर्किट हॉउस में रुके। उधर पटना में लालू लगातार न्यूज में बने रहने के कारण पटना के जिलाधिकारी आर के सिंह को आडवाणी की गिरफ़्तारी का भार सौंपे। और अगले सुबह आडवाणी गिरफ्तार। उनकी गिरफ़्तारी के साथ ही राजा साहेब की 11 महीने पुरानी सरकार रायसीना पहाड़ पर धड़ाम से गिरी और नीचे लुढ़क गयी। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/afzal-amanullah-did-not-want-to-arrest-advani-in-dhanbad">संवाददाता के लेखन-पुस्तिका से ✍ अफ़जल अमानुल्लाह नहीं चाहे आडवाणी को गिरफ्तार करना धनबाद में, नहीं किये; जो किये वे रायसीना पहाड़ पर भाजपा के मंत्री बने</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 11:39:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bhattacharjee]]></category>
		<category><![CDATA[indian express]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गजब की है दिल्ली। यहाँ की पत्रकारिता के बारे में तो पूछिए ही नहीं। अच्छे-अच्छे लोग यहाँ गच्चा खा जाते हैं। यहाँ चिकनी-चुपड़ी सड़क, उपगामी-अधोगामी सड़क, मेटो रेल, गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह कतई नहीं सोच सकते हैं कि यहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले, काम सीखने वालों को उनके वरिष्ठ या संपादक उनके कार्य [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook">संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गजब की है दिल्ली। यहाँ की पत्रकारिता के बारे में तो पूछिए ही नहीं। अच्छे-अच्छे लोग यहाँ गच्चा खा जाते हैं। यहाँ चिकनी-चुपड़ी सड़क, उपगामी-अधोगामी सड़क, मेटो रेल, गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह कतई नहीं सोच सकते हैं कि यहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले, काम सीखने वालों को उनके वरिष्ठ या संपादक उनके कार्य सम्बन्धी पुरुषार्थ  का क़द्र करते हों, उन पर विश्वास करते हों।</strong></p>
<p>देश में तक़रीबन 125000 से अधिक समाचार पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। वैसे 900+ निबंधित निजी टीवी चैनल हैं, लेकिन भारत के आसमानों के रास्ते कोई 4000 चैनेल्स 140 करोड़ लोगों के टीवी स्क्रीन पर पहुँचता है। आज जिस तरह देश की सड़कों पर चार पहिया वाहनों में, दो-पहिया वाहनों में नंबर प्लेट के आगे, शीशों पर, अतिरिक्त प्लेट लगाकर &#8216;पत्रकार&#8217;, &#8216;संपादक&#8217;, &#8216;संपादक के सहयोगी&#8217;, &#8216;पत्रकार संघ के अध्यक्ष&#8217; लिखा उसी प्रकार दिख रहा है जैसे &#8216;पार्षद के मित्र&#8217;, विधायकजी का साला&#8217; &#8216;मंत्री जी का पोता&#8217;, &#8216;मंत्री जी के दूर के रिस्तेदार, &#8216;थाना प्रभारी का दामाद / साला&#8217; आदि लिखा दिख रहा है। आज तो स्थिति ऐसी है कि वास्तविक रूप में बेहतरीन पत्रकार होने के बावजूद दफ्तरों में आपकी पूछ नहीं होती होगी, अगर आप सिर्फ अपने कार्य से, अपनी कहानियों से मतलब रखते होंगे। आपको सभी लोग कहते होंगे &#8216;बहुत एटीट्यूड&#8217; रखती है/रखता है। </p>
<p>दिल्ली से प्रकाशित इण्डियन एक्सप्रेस में कार्य की शुरुआत करने के साथ ही, सर्वप्रथम देर रात तक रहने की आदत डाल लिया। रात्रिकालीन सत्र में जो भी सहकर्मी होते थे उन्हें आठ-साढ़े आठ बजते बजते घर जाने को कह देते थे। परिणाम यह हुआ कि समय के साथ-साथ सभी को &#8216;यह आदत&#8217; से हो गई आठ-साढ़े आठ तक निकलना। एक्सप्रेस ब्यूरो में तो बड़े-बड़े संवाददाता थे, उसमें एक &#8216;सर्वोच्च न्यायालय&#8217; कवर करते थे। श्री नायर साहब नाम था उनका। मैं निचली अदालत के साथ साथ दिल्ली उच्च न्यायालय कवर करता था। </p>
<blockquote><p>उस रात कोई साढ़े-बारह के करीब &#8216;एक्सप्रेस बम्बई&#8217; कार्यालय से एक फोन आया, साथ ही, कम्प्टयूटर पर संवाद भी। संवाद था कि बम्बई उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी (25 अक्टूबर, 1994 से 24 मार्च, 1997) को अपना त्यागपत्र प्रेषित करना। न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी के विरुद्ध चर्चा हो गई थी कि वे मुस्लिम लॉ और संविधान से सम्बंधित एक किताब के लिए एक लन्दन स्थित प्रकाशक से $ 80 000 स्वीकार किये थे, साथ ही, एक दूसरे &#8216;मैन्युस्क्रिप्ट&#8217; के लिए $ 75 000 का ऑफर भी स्वीकार के अधीन था।&#8221; उस ज़माने में यह एक बहुत बड़ी घटना थी।</p></blockquote>
<p>एक्सप्रेस के सम्पादकीय कक्ष में सहायक समाचार संपादक श्री राजेश्वर प्रसाद साहब ड्यूटी पर थे। वे संवाददाता कक्ष में दौड़ते-भागते आये। मुझे देख लम्बी सांस लेते कहते हैं: &#8220;ओ माई गॉड !!!! शिवनाथ !!! यह कहानी बम्बई से है। तुम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से बात कर इसे &#8216;कंफर्म&#8217; करो और कोई 1500 + शब्दों में कहानी लिखकर तत्काल प्रेषित करो। यह आज का लिड है और बम्बई कार्यालय बैठा है इस कहानी के लिए।&#8221; </p>
<p>प्रसाद साहेब सारी बातें एक सांस में बोल गए। सम्पादकीय विभाग (डेस्क) पर भूचाल आ गया था। प्रथम पृष्ठ का ले-आउट बदल गया था। उन दिनों श्री पी सी एम त्रिपाठी जी समाचार संपादक थे (त्रिपाठी जी आपको श्रद्धांजलि) । मैं श्री प्रसाद साहेब का अपने प्रति यह विश्वास देखकर उछल गया। प्रसाद साहेब कहते हैं: &#8220;तुम अपने काम में लग जाओ पहले। मैं तुम्हारे काम में हाथ बंटाता हूँ।&#8221; उधर श्री प्रसाद साहब लाइब्रेरी जाकर न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी से सम्बंधित जितने भी समाचार प्रकाशित हुए थे, का कतरन लाने में लग गए। अब तक रात का कोई 12 बजकर 40 मिनट हो गया था और छोटी-बड़ी सुइयों की रफ़्तार भी ह्रदय गति जैसी बढ़ गई थी । </p>
<p>इस घटना से कोई एक महीना पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी साहब से मेरी मुलाककट हुई थी एक कार्यक्रम में। मैं उनसे निजी तौर पर मिला था। जब मैं बताया कि मैं &#8220;एक्सप्रेस&#8221; का रिपोर्टर हूँ, वे मुझे पीठ ठोके और कहे कभी भी, किसी भी समय आप बात कर सकते हैं। उनका इतना बोलना था कि मैं अपनी डायरी और कलम उनके तरफ कर दिया ताकि &#8216;अंदर वाला नंबर&#8217; मिल जाय। वे अपने शयन कक्ष वाला नंबर लिख दिए। एक रिपोर्टर को और क्या चाहिए। शायद यही मेरा प्रारब्ध था और समय भी यह चाह रहा था। अब तक प्रसाद साहब मेरे सामने बैठ गए थे &#8216;पैडिंग&#8217; वाला अंश कंप्यूटर पर लिख रहे थे। नीचे डेस्क से लोगों का आना जाना बढ़ गया था।</p>
<p><strong>मैं डायरी में न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी द्वारा लिखित नंबर निकला। सामने ऊँगली घुसाकर डॉयल करने वाला फोन को अपनी ओर खिंचा और फिर सात अंकों पर सात बार ऊँगली घुसाकर गोल चक्कर को घुमाया। तत्काल दूसरे छोड़ पर &#8216;ट्रिंग-ट्रिंग&#8217; होने लगी। कुछ ही सेकेण्ड बाद दूसरे छोड़ से आवाज आई &#8220;हेल्लो&#8221; &#8211; इससे पहले की दूसरे छोड़ से मुझसे पूछा जाता, न्यायमूर्ति का &#8216;हेल्लो&#8217; शब्द को पहचान लिया और सुनते ही मैं अंग्रेजी को दरभंगा में छोड़कर हिंदी में बोल पड़ा: &#8220;सर प्रणाम। मैं एक्सप्रेस वाला शिवनाथ झा बोल रहा हूँ। माफ़ कर देंगे इतनी रात फोन करने के लिए। लेकिन नौकरी का सवाल है।&#8221; मेरी बात वे समझ गए थे। आखिर देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे वे।</strong> </p>
<p>मैं बोलता रहा: &#8220;सर !! बम्बई कार्यालय से अभी एक संवाद आया है कि न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी अपना त्यागपत्र आपके पास प्रेषित कर दिए हैं?&#8221; </p>
<p>न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी कहते हैं: &#8220;उस दिन का नंबर आज आपको काम आ गया &#8230;.  जी। वे अपना त्यागपत्र शाम में भेजे हैं। शेष कहानी आप जानते ही हैं। लेकिन आप मुझे उल्लेखित नहीं करेंगे।&#8221; <br />
 <br />
न्यायमूर्ति का &#8216;हाँ&#8217; शब्द मेरे लिए दिल्ली सल्तनत का किला फ़तेह जैसा था। ऐसा लग रहा था कि लाल किले पर मैं अपना झंडा गाड़ दिया हूँ आज रात। प्रसाद साहब का चेहरा चमक रहा था। वे झट से उठे और कहते नीचे डेस्क की ओर भागे : &#8220;शिवनाथ !!!! तुम्हारे लॉगिन में टाइप किया है। उसे निकालकर कहानी में जोड़ लेना। शेष और बातें जोड़ते दस मिनट के अंदर स्टोरी रिलीज कर देना। मैं बम्बई ऑफिस को बताता हूँ। वह इंतज़ार कर रहा है। वेल डन शिवनाथ।&#8221;</p>
<p>उस रात मैं &#8220;शेर&#8221; था &#8220;एक्सप्रेस&#8221; में। अभी तक रात का 1.10 हो गया था। कोई 1800 शब्दों की कहानी बन गई थी। श्री प्रसाद साहेब का चेहरा चमक रहा था। कहानी को मेरे नाम से तत्काल बम्बई कार्यालय प्रेषित किया गया। बम्बई कार्यालय उस समाचार को देखकर बहुत खुश हुआ। वहां यह समाचार &#8216;डीप डबल कॉलम (ऊपर से नीचे बॉटम तक) मेरे नाम से प्रकाशित हुआ By Shivnath Jha ।</p>
<p>इधर दिल्ली में घड़ी की सुइयाँ आपसे में लड़ रही थी। कभी छोटी सुई ऊपर तो कभी बड़ी सुई ऊपर। फोन चार कोने पर चार लोग बैठे थे। राजनीति हो रही थी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय कवर करने वाले संवाददाता (श्री नायर साहब) और दिल्ली संस्करण की सम्पादिका श्रीमती कुमी कपूर मुझ जैसे छोटे से रिपोर्टर के वजूद पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे थे। कह रहे थे कि लोवर जुडिसियरी कवर करने वाला रिपोर्टर का क्या वजूद है की देर रात सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश फोन पर इस कहानी को कन्फर्म करे।&#8221; श्री प्रसाद साहेब &#8216;हताश&#8217; हो गए। श्रीमती कुमी कपूर मेरी कहानी को &#8216;अंडर प्ले&#8217; कर दी &#8211; 1800 शब्दों की कहानी &#8216;एक पैरा&#8217; में सुबह के दिल्ली संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर एक कोने में प्रकाशित हुआ। </p>
<p>अगले दिन सुबह की मीटिंग में अश्विनी सरीन के साथ-साथ मेरे मेट्रो के सभी रिपोर्टर उपस्थित थे। सरीन साहब &#8216;शेर&#8217; की तरह गरज रहे थे। वजह भी था &#8211; उनके रिपोर्टिंग रूम और रिपोर्टर को &#8216;अंडर एस्टीमेट&#8217; किया गया। तभी श्रीमती कुमी कपूर का प्रवेश हुआ। कुमी कपूर के चेहरे के भाव से यह विदित था कि वे &#8216;राजनीति&#8217; में फंस गई थी रात को। अपना निर्णय लेने में चूक गयी थी वे। इससे पहले भी कुमी कपूर एक गलती की थी उसका जिक्र बाद में करूँगा। उनकी नजर उठ नहीं रही थी। मैं तो उनके सामने बहुत छोटा सा रिपोर्टर था, लेकिन वे भी समझ रही थी कि &#8216;मैं उन्हें आंक लिया हूँ&#8217; अब तक, जहाँ तक पत्रकारिता का सवाल है।</p>
<p><strong>इससे पहले की रिपोर्टर कक्ष में श्री सरीन साहब का गर्जन तेज हो &#8211; श्रीमती कुमी कपूर कहती हैं: &#8220;सॉरी शिवनाथ, आप सही थे, आपकी कहानी सही थी। आपकी बात देर रात जस्टिस अहमदी से हुई थी। दिल्ली में आपकी कहानी के साथ जस्टिस नहीं हुआ । सॉरी। &#8221; दिल्ली के सम्पादकीय विभाग में, चाहे अखबार हो या आज का टीवी, प्रधानमंत्री कार्यालय से अधिक राजनीति होती है </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook">संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कक्का यौ!! जुलुम भ गेल!!!✍मिथिला का शैक्षिक-दर 55% से ऊपर उठने में कुथ रहा है😢, मिथिला पाग के आकार को बढ़ाने का निवेदन हो रहा है😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/mithilas-educational-rate-is-struggling-to-rise-above-55</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Dec 2024 11:47:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: मैथिली और मिथिला के &#8216;विकास&#8217; से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात विगत दिनों संगठन द्वारा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/mithilas-educational-rate-is-struggling-to-rise-above-55">कक्का यौ!! जुलुम भ गेल!!!✍मिथिला का शैक्षिक-दर 55% से ऊपर उठने में कुथ रहा है😢, मिथिला पाग के आकार को बढ़ाने का निवेदन हो रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: मैथिली और मिथिला के &#8216;विकास&#8217; से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात विगत दिनों संगठन द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया। जबकि आज़ादी के 78 वर्ष बाद आज भी मिथिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी से आगे बढ़ने पर कुथ रहा है। </strong></p>
<p>कल भारत के संसद के बाहर, विजय चौक के रास्ते रायसीना हिल और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय के आस-पास मिथिला क्षेत्र के कर्मचारियों का कहना था कि &#8220;उक्त संगठन द्वारा पाग के मामले में जारी प्रेस विज्ञप्ति का प्रत्येक शब्द एक गहन शोध का विषय है। उनका कहना है कि &#8220;पाग का आकार बढ़ाने पर बल देने का सीधा अर्थ यही माना जायेगा कि &#8220;मिथिला में पाग पहनने वालों का माथा (शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा)  का आकार या तो बढ़ गया है या फिर पाग के निर्माण कर्ता पाग के महत्व को इतना महत्वहीन बना दिए हैं कि उन्हें औसतन मानव माथे का आकर का ज्ञान नहीं रहा और पाग का आकार छोटा होता गया।&#8221; </p>
<p><strong>गृहमंत्रालय के सामने चबुतरे पर खड़े एक अधिकारी कहते हैं: &#8220;यौ झाजी !!! एहि बात से इंकार नै कयल जा सकैत अछि कि मिथिला के बाल-बच्चा शैक्षिक दुनिया में अव्वल अछि आ आवि रहल अछि। लेकिन इ सब बच्चा, चाहे बेटी होय अथवा बेटा, वैह अव्वल आवि रहल अछि जेकर माता-पिता अपन-अपन जीवनक निर्माण हेतु, बच्चाक जीवनक निर्माण हेतु गामक सीमा पार केलैथ।&#8221; </strong></p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;अगर चेन्नई, बंगलुरु, मुंबई, अहमदाबाद, कानपुर, नागपुर, दिल्ली, भोपाल आदि शहरों में मुद्दत से रहने वाले, पढ़ाने-लिखाने वाले किसी महानुभाव की बेटी विश्व के पटल पर अपना हस्ताक्षर करती है तो दरभंगा और लहेरियासराय के जिलाधिकारी उसकी शैक्षिक योग्यता को या उसकी उपलब्धि को अपनी सांख्यिकी में नहीं जोड़ सकता है न? पाग के साथ भी वही हश्र है, जो दुखद है। मिथिला में रहने वाले, पाग पहनने वाले, पाग पहनाने वाले औसतन 90 से अधिक फीसदी लोग (अपवाद छोड़कर) पाग के रंग का महत्व, कौन किसे पहनायेगा, किस अवसर पर किस रंग का पाग पहनाया जायेगा नहीं जानते।&#8221;</p>
<blockquote><p>हकीकत यह है, वे आगे कहते हैं: &#8220;राजनीतिक गलियारे से लेकर, आर्थिक मंडी तक सभी अपना-अपना उल्लू सीधा करने के लिए पाग को एक हथकंडा बना लिए हैं। वजह यह है कि मिथिला में पाग का सांस्कृतिक महत्व में सोच से अधिक गिरावट आया है। पाग में रंग नहीं, राजनीतिक कसीदा कारी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इतना ही नहीं, पाग किसके सर पर कौन रखेगा, यह अब महत्वहीन बन गया है। आज स्थिति वैसी ही है जब भारत के लोग विदेशों में अपना ठिकाना, आसियाना बना लेते हैं तो भारत के प्रति उनकी राष्ट्रभक्ति अधिक हो जाती है। जबकि वे ग्रीन-कार्ड होल्डर होते हैं। भारत की राष्ट्रीयता को दर किनार का विदेशी राष्ट्रीयता ग्रहण करते हैं। आज मिथिला, मैथिली, पाग, लोक चित्रकला सबों की हालत ऐसी ही है।  सभी आज व्यापार का एक हिस्सा बन गया है। यही कारण है कि बाहर वाले लोगों के माथे के नाप के हिसाब से पाग का आकार निर्धारित करने को कहा जा रहा है। यह व्यवसाय है न कि संस्कृति और गरिमा की बात है।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_5943" aria-describedby="caption-attachment-5943" style="width: 1424px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu.jpeg" alt="" width="1424" height="721" class="size-full wp-image-5943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu.jpeg 1424w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu-300x152.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu-1024x518.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu-768x389.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1424px) 100vw, 1424px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5943" class="wp-caption-text">इन महानुभावों और मोहतरमा को तो आप सभी जानते ही हैं</figcaption></figure>
<p>इसका ज्वलंत दृष्टान्त राष्ट्रीय जनता दल के नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव के नवमीं कक्षा पास पुत्र और उनकी अर्धांगिनी के सर पर पाग है। अगर मिथिला के लोग इन व्यक्तियों को पाग पहनाते हैं, तो इसका अर्थ सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दुकानदारी ही माना जायेगा। क्या ये पाग पहनने के लायक है? तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी को वैवाहिक जीवन पर बधाई देने का अनेकानेक तरीका हो सकता था परन्तु पाग पहनाकर पाग का अपमान भी किये। </p>
<p><strong>अगर उक्त संगठन के उक्त &#8216;प्रेस विज्ञप्ति&#8217; के मद्दे नजर मिथिला की शैक्षिक दर को देखें &#8211; जो माथे के विस्तार का सूचक हो सकता है और बड़े आकार के पाग की जरुरत हो सकती है &#8211; तो बिहार का औसत शैक्षिक दर 63.82 फीसदी है जिसमें मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55.18 से अधिक नहीं हैं। प्रदेश में सबसे अधिक शैक्षिक दर भोजपुरी क्षेत्र में है जहाँ औसतन शैक्षिक दर 66.19 फीसदी है। भोजपुरी क्षेत्र में रोहतास क्षेत्र में शैक्षिक दर 73.37 फीसदी है। इतना ही नहीं, मगध क्षेत्र में शैक्षिक दर मिथिला की तुलना में 9 फीसदी अधिक है, यानी 64.92 फीसदी है। </strong></p>
<p>यही कारण है कि दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में अपना हस्ताक्षर रखने वाले एक नौकरशाह कहते हैं: &#8220;पाग मिथिला का एक सम्मान है। मिथिला के प्रत्येक लोगों की इज्जत है। मिथिला का एक-एक बच्चा पाग के सांस्कृतिक गरिमा को पहले समझता था। पाग के रंगों की महत्ता को समझता था। वह यह भी समझता था कि किस रंग का पाग किस अवसर पर कौन पहनता है। पाग किसे पहनाया जाए । पाग पहनाने का शाब्दिक अर्थ और वास्तविक अर्थ क्या है। परन्तु, तकलीफ इस बात कि है कि मिथिला में अब राजनीति होती है और उस राजनीति में मिथिला का पाग धरल्ले से इस्तेमाल होता है। अन्यथा आज मिथिला पाग की यह स्थिति नहीं होती। मिथिला की संस्कृति की यह स्थिति नहीं होती।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="aligncenter size-full wp-image-5944" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>अधिकारी आगे कहते हैं: &#8220;मिथिला में तो करवा चौथ नहीं होता है। वहां की महिलाएं अपने पति के लिए मधुश्रावणी पूजा करती हैं। लेकिन अब देखादेखी में मिथिला में ही नहीं प्रस्तावित मिथिला राज्य निर्माण के लिए सभी 24 जिलों, मसलन अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका के अलावे पटना के कंकरबाग, शिवपुरी, लोहानीपुर, कदमकुआं और अन्य इलाकों सहित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अनेकानेक क्षत्रों में, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई और अन्य प्रांतों में मिथिला की महिलाएं अब करवा चौथ करती हैं। और मैथिली भाषा के स्थान पर स्थानीय भाषाओँ का प्रयोग कर &#8216;मैथिली भाषा&#8221; की दुकानदारी करने में तनिक भी लज्जा नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो दिल्ली के करोलबाग स्थित दिल्ली सरकार की दारू की खरीद-बिक्री वाले कार्यालय (भवन) के निचले तल्ले में मैथिली &#8211; भोजपुरी अकादमी को ठिठुरते देख लीजिये।</strong> </p>
<p>अब अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिथिला क्षेत्र के करीब 120 विधानसभा और 12 से अधिक लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा करने के लिए मैथिली और संस्कृत में भारत का संविधान छाप दिए तो क्या गलत किये? क्या समझे &#8211; सब राजनीति है। मिथिला के कितने लोग मैथिली और संस्कृत में संविधान को पढ़कर अपने अधिकार-कर्तव्य का बोध करेंगे? यह भी आने वाले दिनों में शोध का विषय होगा। वैसे मिथिला के लोग लालू प्रसाद यादव के छोटका ननकिरबा और उसकी कनिया का वैवाहिक जीवन लड्डू जैसा मीठा हो, जीवन पर्यन्त, लालू प्रसाद यादव जैसा ही उनके छोटका ननकिरबा का परिवार पढ़े, दर्जनों बच्चों का माता-पिता बने, पाग की लाज बचाये रखें &#8211; और क्या चाहिए। लोग तो यह भी कहते हैं कि अब मिथिला में पोखर कहाँ है कि प्रधानमंत्री कमल खिलाएंगे। </p>
<p>बहरहाल, अगर बिहार के किसी भी विद्वान-विदुषी के पास, दरभंगा राज परिवार से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्बन्ध रखने वाले महानुभावों के पास ऐसी कोई तस्वीर हो जहाँ महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह, राजा बहादुर विशेश्वर सिंह अथवा तत्कालीन राज परिवार के गणमान्य व्यक्ति अपने प्रदेश, राज्य में आये किसी भी गणमान्य महानुभावों को “मिथिला का पाग”, “सम्मानार्थ ही सही” पहनाए हों। अगर वे “मिथिला का पाग  उन आंगतुकों को नहीं पहनाए तो क्या हम समझेंगे कि उन दिनों “आगंतुकों का सम्मान नहीं होता था राज दरभंगा में, मिथिलाञ्चल में? या यह समझा जा सकता है कि दरभंगा राज अथवा उनकी नजर में “मिथिला-पाग” पहनने के लायक आगंतुक नहीं होते थे ? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37.jpg" alt="" width="1522" height="1469" class="aligncenter size-full wp-image-5945" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37.jpg 1522w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-300x290.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-1024x988.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-768x741.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1522px) 100vw, 1522px" /></a></p>
<p>आज़ादी के बाद, या यूँ कहें कि महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु तक मिथिला की संस्कृति जितनी मजबूत और सुरक्षित थी, आज नहीं है। यानि. अक्टूबर 1962 के बाद मिथिलांचल में मिथिला की संस्कृति को संरक्षित रखने वाला नहीं रहा। आज भले हम मिथिला लोक-चित्रकला को विश्व में प्रचार-प्रसार के माध्यम से फैलाएं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मिथिला लोक चित्रकला के कलाकार आज मृत प्राय हो गया है । समाज, सरकार अथवा मिथिलांचल के जिला प्रमुखों से इस ऐतिहासिक लोक चित्रकला को उतना संरक्षण नहीं मिलता है जितने का वह हकदार हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है की मिथिलाञ्चल के लोग, विशेषकर पुरुष समुदाय, न केवल “पाग के वास्तविक महत्व” से अपरिचित हैं, बल्कि उसका सम्मान भी नहीं कर पाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इस पाग को “सब धन बाईस पसेरी” जैसा सबों के माथे पर सजाकर फोटो-सेशन नहीं करते, सोसल मीडिया पर या भारत की सड़कों पर “पाग का राजनीतिकरण नहीं होने देते, नहीं करते।” </p>
<p><strong>अगर मिथिलांचल के लोग, विशेषकर जो “पाग की अहमियत” समझते हैं, अपने ही घरों में, अपने ही समाज में, टोले-मुहल्लों में एक सर्वे करें की किनके – किनके घरों में “वास्तविक पाग (सफ़ेद रंग का अथवा भटमैला रंग का) है ? हाल, पीला, हरा, ब्लू, रंग बिरंगा, सतरंगी, लोक चित्रकला वाला नहीं; तो औसतन सैकड़े घरों की बात नहीं करें, हज़ार घरों में शायद दस अथवा बीस घरों में पाग की उपस्थिति दर्ज होगी। विश्वास नहीं तो हो आजमा कर देखिए। अब स्थिति यह है कि हम अपने घरों में, मिथिला के समाजों में पाग के महत्व को नहीं बता सके, वर्तमान पीढ़ी को नहीं बता सके, लेकिन देश के मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई, बंगलुरु, मंगलुरु, कानपूर, नागपुर, बराकर के अतिरिक्त देश के 718 जिलों में “पाग से अर्थ कमाने के लिए पाग का विपरण करने में जुटे हैं।” </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1.jpg" alt="" width="501" height="540" class="alignleft size-full wp-image-5946" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1.jpg 501w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1-278x300.jpg 278w" sizes="auto, (max-width: 501px) 100vw, 501px" /></a></p>
<p>देवशंकर नवीन का कहना है : इसके अतिरिक्त, क्या सर्वजन मैथिलों ने आम सहमति से अपने पारंपरिक प्रतीक ‘पाग’ के स्वरूप में यह फेरबदल स्वीकार कर लिया? अब तक पाग पर किसी तरह की चित्रकारी की मान्यता नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाजार की चमक-दमक ने मैथिलों के सांस्कृतिक संकेत पर अपना कब्जा बना लिया!  दूसरा सवाल पाग की पारंपरिक मान्यता को लेकर है। बचपन से देखता आ रहा हूं कि अनेक शहरों में मैथिल जनता अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए महाकवि विद्यापति की बरसी मनाती है। उन आयोजनों में आमंत्रित विशिष्ट जनों का पाग-डोपटा से सम्मान करते और अपने सांस्कृतिक उत्कर्ष का दावा करते हुए मैथिल आत्ममुग्ध होते हैं। गीत, कविता, चुटकुला, नाच-नौटंकी सब आयोजित करते हैं। आयोजन का नाम रहता है ‘विद्यापति स्मृति पर्व’, पर विद्यापति वहां सिरे से गायब रहते हैं। आयोजन का लक्ष्य शायद ही कहीं साहित्य और संस्कृति का उत्थान या अनुरक्षण रहता हो!  </p>
<p>सतही मनोरंजन के अलावा वहां ऐसा कुछ भी नहीं दिखता, जिसमें ‘मैथिल’ का कोई वैशिष्ट्य सिर उठाए। ‘पाग’ जैसे सांस्कृतिक प्रतीक की अधोगति भी ऐसे अवसरों पर भली-भांति हो जाती है। दरअसल, मिथिला में ‘पाग’ का विशष्ट महत्त्व है। पर उल्लेखनीय है कि यह पूरी मिथिला का सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है। ‘पाग’ की प्रथा मिथिला में सिर्फ ब्राह्मण और कायस्थ में है। इन जातियों के भी ‘पाग’ की संरचना में एक खास किस्म की भिन्नता होती है, जिसे बहुत आसानी से लोग नहीं देख पाते। पाग के अगले भाग में एक मोटी-सी पट्टी होती है, वहीं इसकी पहचान-भिन्नता छिपी रहती है। इससे आगे की व्याख्या यह है कि इन दो जातियों में भी सारे लोग पाग नहीं पहनते। परिवार या समाज के सम्मानित व्यक्ति इसे अपने सिर पर धारण करते हैं। यह उनके ज्ञान और सामाजिक सम्मान का सूचक है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag.jpg" alt="" width="891" height="420" class="alignright size-full wp-image-5947" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag.jpg 891w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag-300x141.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag-768x362.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 891px) 100vw, 891px" /></a></p>
<p>समय के ढ़लते बहाव में धीरे-धीरे यह प्रतीक उन सम्मानित जनों के लिए भी विशिष्ट आयोजनों-अवसरों का आडंबरधर्मी प्रतीक बन गया। संरचना के कारण इसे धारण करना बहुत कठिन है। विनीत भाव से भी इसके धारक कहीं थोड़ा झुक जाएं, तो यह सिर से गिर जाता है। मैथिली में ‘पाग गिरना’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है ‘पगड़ी गिरना’, ‘इज्जत गंवाना’। लिहाजा, संशोधित परंपरा में आस्था रखने वाले आधुनिक सोच के लोगों के सामने इसने बड़ी दुविधा खड़ी कर दी है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/mithilas-educational-rate-is-struggling-to-rise-above-55">कक्का यौ!! जुलुम भ गेल!!!✍मिथिला का शैक्षिक-दर 55% से ऊपर उठने में कुथ रहा है😢, मिथिला पाग के आकार को बढ़ाने का निवेदन हो रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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