​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-3) : ​​साइकिल से 1​.5​ लाख किमी की यात्रा पुरातत्व स्थल ढूंढ़ने ​के लिए, मंत्री​, मंत्रालय​, अधिकारी ‘निद्रा’ में

मुरारी जी कहते हैं: “आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ

बलिराजगढ़ / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : आप माने या न माने, आपकी मर्जी। देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्नाटक का है जहाँ 506 राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं।

आंकड़ों के अनुसार गुजरात में 293, मध्य प्रदेश में 292, महाराष्ट्र में 285, दिल्ली में 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136, आंध्र प्रदेश में 129, हरियाणा में 91, ओडिसा में 79, बिहार में 70, जम्मू-कश्मीर में 56, असम में 55, छत्तीसगढ़ में 47, उत्तराखंड में 42, हिमाचल प्रदेश में 40, पंजाब में 33, केरल में 27, गोवा में 21, झारखण्ड में 13 और दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।

शायद भरत के लोगों को यह ज्ञात नहीं होगा कि देश की आर्कियोलॉजिकल विरासत में 4 लाख से ज़्यादा स्ट्रक्चर और 58 लाख से ज़्यादा पुरानी चीज़ें शामिल हैं, जिनमें से ज़्यादातर सेंट्रल और स्टेट लेवल की अथॉरिटी, म्यूज़ियम, धार्मिक संस्थाएँ वगैरह के नियंत्रण में हैं। हमारी अनोखी और कीमती कल्चरल और आर्कियोलॉजिकल विरासत, पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाजों और तेज़ी से हो रहे शहरीकरण को देखते हुए, हमारी आर्कियोलॉजिकल विरासत को बचाने के लिए एक खास इंफ्रास्ट्रक्चर और कानूनी ढांचा ज़रूरी है। संस्कृति मंत्रालय भारतीय विरासत और कल्चर के बचाव, संरक्षण और प्रमोशन के लिए जिम्मेदार है। मंत्रालय, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, म्यूज़ियम, नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी और दूसरी एजेंसियों के ज़रिए, नेशनल इंपॉर्टेंस के सभी सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स की सुरक्षा, हिस्टोरिकल साइट्स की खुदाई, आर्टिफैक्ट्स का कलेक्शन और शोकेसिंग, उनका डॉक्यूमेंटेशन और डिजिटाइजेशन वगैरह के लिए जवाबदेह है।

​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी

​चार वर्ष पूर्व साल 2022 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा एक प्रतिवेदन संसद में पेश किया गया था। वह प्रतिवेदन मूल रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वित्तीय नियंत्रण तंत्र में कमियों, देश में स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के दस्तावेज़ीकरण में अंतराल और केंद्रीय विरासत निकाय द्वारा खुदाई और अन्वेषण गतिविधियों पर बहुत कम खर्च को उजागर किया था। तत्कालीन संसद में प्रस्तुत प्रतिवेदन स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण और संरक्षण पर कैग ने स्मारकों में संरक्षण कार्यों और विरासत उद्यानों के प्रबंधन में कमियों और चयनित स्मारकों के भौतिक निरीक्षण के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सार्वजनिक शौचालय, पीने का पानी, वाहन पार्किंग के लिए स्थान, रैंप, गाइड, सुरक्षा आदि की अनुपस्थिति को भी इंगित किया। एक मकसद और था कैग की 2013 की रिपोर्ट नंबर 18 में बताए गए चिंता के क्षेत्रों पर की गई कार्रवाई कार्रवाई की जान-पड़ताल करना और पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की 25 खास सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की सीमा की भी जांच करना था।

​ऑडिट के दौरान शामिल यूनिट्स में संस्कृति मंत्रालय, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी, नेशनल कल्चर फंड, नेशनल मिशन ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड एंटीक्विटीज़ और छह नेशनल-लेवल म्यूज़ियम शामिल थे।
​कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा कि PAC की सिफारिश के बावजूद, मिनिस्ट्री/ASI के कंट्रोल में म्यूज़ियम के लिए कोई यूनिफॉर्म प्रोसेस नहीं था। मिनिस्ट्री/ASI ने बताया कि इनमें से ज़्यादातर काम अंडर प्रोसेस थे । नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी​, जिसे 2011 में​, एक कानूनी संस्था के तौर पर बनाई गई थी ताकि स्मारकों के रोके गए/रेगुलेटेड एरिया में कंस्ट्रक्शन के काम करने के लिए नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दिए जा सकें। इसका असली मकसद हर स्मारक के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़ और साइट-प्लान तैयार करके कानूनी नियमों को लागू करना था। लेकिन, 3693 सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स में से, सिर्फ़ 31 स्मारकों के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़ नोटिफ़ाई किया गया है, जबकि 210 स्मारकों के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़ को फ़ाइनल करने का काम अलग-अलग स्टेज पर था, जैसे नोटिफ़िकेशन, कंसल्टेशन, वगैरह।

​रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया था कि ASI के पास अपना काम पूरा करने के लिए कोई स्ट्रैटेजी या रोड-मैप (लॉन्ग टर्म/मीडियम टर्म) नहीं था। कंज़र्वेशन के काम एड-हॉक/सालाना आधार पर किए जा रहे थे। आर्कियोलॉजी से जुड़े मामलों पर ASI को सलाह देने के लिए सबसे बड़ी बॉडी के तौर पर सोची गई सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑन आर्कियोलॉजी मार्च 2018 के बाद से एक्टिव नहीं थी और 2014-18 के दौरान (अक्टूबर 2014 में) इसकी सिर्फ़ एक मीटिंग हुई थी। PAC की सिफारिश के बावजूद, अतिक्रमण की घटनाओं को रोकने के लिए सेंट्रल या सर्कल लेवल पर कोई कोऑर्डिनेशन और मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं बनाया गया।

जब बलिराजगढ़ पटना उच्च न्यायालय पहुंचा था

दस वर्ष पहले पटना उच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता सुनील कुमार कर्ण​ बलिराजगढ़ खुदाई ो लेकर पटना उच्च न्यायालय पहुंचे थे। आज कहते हैं “आखिर कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली ी नींद दस वर्ष बाद ही साई, खुली तो।” आर्यावर्तइंडियननेशन कॉम स बट करते अधिवक्ता कारण कहते हैं कि “मिथिला में बलिराजगढ़ का किला अत्यंत प्रसिद्ध है तथा देश के विशालतम पुरातात्विक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि यह दानवराज बली का किला था जो हजारों साल से जमीन के नीचे दबा हुआ है। इतिहासकार इसे मिथिला की प्राचीन राजधानी कहते हैं जिसके उत्खनन के बाद ही मिथिला की गौरवशाली इतिहास एवं संस्कृति उजागर होगी।​ इस स्थल की महत्ता को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 1962 ई में उत्खनन कराया गया था। पुनः बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय द्वारा 1972-73 एवं 1974-75 में सांकेतिक उत्खनन कराया गया तथा 2013-14 में पुनः भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन कराया गया। यद्यपि प्रत्येक सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन में हजारों साल पुरानी संस्कृति के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त होते रहे फिर भी कोई न कोई बहाना बनाकर उत्खनन रोक दिया गया।​”

उनके अनुसार, “भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,​ नयी दिल्ली की उपेक्षापूर्ण रवैए से परेशान हो कर 16-2-2015 को संस्कृति मंत्री,​ भारत सरकार, सचिव, संस्कृति मंत्रालय,​ भारत सरकार तथा महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को आवेदन पत्र भेजकर बलिराजगढ़ के पुरातात्विक उत्खनन कराने के लिए आग्रह किया था। मेरे आवेदन पत्र कोई निर्णय नहीं लिया गया उसके बाद मैंने माननीय पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका 9026/2015 दायर किया। जिसका निष्पादन माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति श्री मती अंजना मिश्रा द्वारा 20-6-2016 को कर दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा जवाब दिया गया कि अभी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अन्य पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन में व्यस्त है इसलिए अभी बलिराजगढ़ का उत्खनन संभव नहीं है।​” यह आर्य दस वर्ष पहले होनी चाहिए थी। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण दस वर्ष आगे बढ़ गयी। विगत कई दशकों से लगातार बलिराजगढ़ पर अनुसंधान करने एवं पुरातात्विक उत्खनन के लिए यथासंभव प्रयास करने के लिए पुराविद् ​डॉ शिव कुमार मिश्र​ धन्यवाद के पात्र हैं।

अधिवक्ता कर्ण का कहना है कि “अब तक बलिराजगढ़ का चार बार पुरातात्विक उत्खनन कराया जा चुका है लेकिन सभी सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन ही कराया गया जिससे इस स्थल की संस्कृति एवं इतिहास उजागर नहीं हो सका। आशा है कि बिहार के अन्य प्रमुख पुरास्थलों नालंदा, विक्रमशिला, कोल्हुआ आदि की तरह विस्तृत परियोजना बनाकर बलिराजगढ़ का संपूर्ण एवं लगातार उत्खनन कराया जाएगा। उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों से साइट म्यूजियम स्थापित किया जायेगा तथा उत्खनन प्रतिवेदन भी प्रकाशित किया जायेगा।”

​साईकिल वाला शोधार्थी : मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगा​ के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा

साईकिल वाला शोधार्थी

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विगत दिनों पूर्व में कोसी से आरम्भ होकर पश्चिम में गंडक तक 24 योजन और दक्षिण में गंगा से आरम्भ होकर उत्तर में हिमालय की तराई तक 16 योजन में फैले मिथिला इलाके को अपनी साइकिल के पहियों से नापने वाले ललित नारायण मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगा​ के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा से बात हुई। झा अपने नाम के आगे ‘पुरातत्व’ लिखते हैं। मुरारी​ जी शायद देश का पहला शोधार्थी है जो साइकिल को अपने शोध का हिस्सा बनाकर मिथिलांचल के ऐतिहासिक पुरातत्वों को ढूंढकर दस्तावेज बना रहे हैं। पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके मंत्रिमंडल के आला मंत्री-संत्री-अधिकारीगण दांत निपोड़ रहे हैं, कह रहे हैं “अच्छा !!!! वह आर्यन काल का है…. अच्छा गुप्ता काल का है, अच्छा वह…. क्योंकि न उन्हें पुरा से मतलब है और ना ही तत्व से। फिर मिथिला का इतिहास बचेगा कैसे?

स्वतंत्र भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में मुरारी जी शायद पहला शोधार्थी है जो साइकिल से ही पुरास्थलों को खोजने हेतु दूर-दूर तक जाते हैं।​ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों को खोजने के लिए अपने साइकिल से ये अभी तक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, वैशाली, पटना आदि जिलों के लगभग 400 से 500 पुरास्थलों का भ्रमण कर चुके हैं। इससे संबंधित इनके दर्जन भर से अधिक आलेख भी प्रकाशित हैं। इनके सहयोग से देकुली (बहादुरपुर, दरभंगा) से एक शिवलिंग, ओझौल (बहादुरपुर, दरभंगा) से विष्णु प्रतिमा, भटौरा मठ (शिवाजीनगर, समस्तीपुर) से विष्णु प्रतिमा को दरभंगा जिला स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संगृहीत किया जा​ चुका है। धरोहर संरक्षण हेतु, इन्हें चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के दौरान ‘पुरातत्व भूषण सम्मान-2023′ से सम्मानित किया गया।

​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी

झा का जन्म 15 फरवरी 1994ई० को दरभंगा जिले के ही बेनीपुर प्रखंड अंतर्गत आने वाले लवानी गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और इनका लालन-पालन एवं सम्पूर्ण पढाई जिले के ही बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत देकुली गाँव स्थित नाना-नानी के घर से हुआ।​ ​स्नातकोत्तर के दौरान ही 02 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ मदन मोहन मिश्र, शिक्षक डॉ अयोध्या नाथ झा और विभागीय कर्मचारी श्री कैलाश प्रसाद के समक्ष प्राचीन इतिहास विभाग​(मोतीमहल परिसर) से प्राप्त हुए 1341ई० के “मोती महल स्तंभ लेख” के ऐतिहासिक खोज के साथ ही इन्होंने पुरातत्व के दुनिया में अपना पहला कदम रखा। किंतु, आगे की खोज जारी रखने हेतु इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में साधन और संसाधन का अभाव था, बावजूद इसके; इन्होंने अपना खोज-कार्य जारी रखा। चूंकि, नवीन खोज करना इनका प्रथम पसंद था; इसीलिए तत्काल इन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को ही साधन के रूप में उपयोग किया।

​मुरारी जी कहते हैं: “आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ, एक दिन में सबसे अधिकतम 202 किमी की दूरी थी, जो अब एक दिन में लगातार बीस घंटा पचास मिनट की साइकिल यात्रा करते हुए 310 किमी हो चुकी है​ साइकिल यात्रा में लगभग 3000 से अधिक पुरास्थल, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक धरोहर, क्षेत्रीय आयूर्वेद, गाँव, नदी, नहर, पोखर, झील, पक्षी अभ्यारण, कृषि, पशुपालन सहित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों का विवरण और सूचीकरण किया ​हूँ । इस परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तक में इन सभी स्थलों का विवरण और चित्रण सहित उनसे जुड़ी सांस्कृतिक व्याख्या सम्मिलित होगी। यह परियोजना मिथिला की धरोहर और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के साथ ही आम जनमानस को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है।”

जब परियोजना का उद्देश्य​ पूछा तो मुरारी जी कहते हैं कि “इस परियोजना का उद्देश्य एक साइकिल यात्रा के माध्यम से मिथिला क्षेत्र के पुरास्थलों, प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों का गहन अध्ययन और उनका सूचीकरण के साथ ही इस वृत्तांत को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना है, ताकि इन धरोहरों के बारे में शोधपूर्ण जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक​ पहुंचना है ताकि लोगों में अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासतों के बारे में पता चले। इससे स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर धरोहर और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।​”

​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी

जब उनसे पूछा कि इस यात्रा, शोध और पुस्तक की छपाई के लिए आर्थिक श्रोत क्या है? मुरारजी जी कुछ क्षण रुके, लम्बी सांस लिए और फिर कहते हैं: “यही बिडम्बना है। यही हमारा दुर्भाग्य है। हम वीरसातों की महत्ता को तो समझते हैं, उसे उजागर करने के लिए सतत ​प्रयत्नशील हैं और चाहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दस्तावेज छोड़े जो उनके ​गांव, प्रखंड, अंचल, जिला, क़स्बा के धरोहरों का जिवंत दृष्टान्त होगा। अर्थ के मामले में हम हैं कमजोर जो जाते हैं। हम एक शोधार्थी हैं। हम जानते हैं कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं वह न केवल जिला प्रशासन के लिए, प्रदेश की सरकार के लिए या फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, इस कार्य से करोड़ों रूपये कमाए जा सकते हैं। हम अपने प्रदेश के, देश के लोगों से, जो देश से बाहर रहते हैं, उसने प्रार्थना कर रहे हैं कि इस कार्य में वे सभी हमारा हाथ पकड़ें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मिथिला में लोग हाथ पकड़ते नहीं, हाथ झटक देते हैं।”

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मुरारी​ जी ​का कहना कि “केवल दरभंगा जिला को ही लें तो, शंकरपुर डीह, खैरा-सिरुआ, कुर्सों-नदियामी, इनाई, महथावन आदि पुरास्थलों से प्राचीन सिक्के, भच्छी, कोर्थू, पिपरौलिया, पंचोभ, तिलकेश्वर मठ, दरभंगा राज परिसर आदि पुरास्थलों से अभिलेख, बहेरा, बरई, शंकरपुर डीह, देवकुली, रतनपुर, ब्रह्मपुर, हावीडीह, कोर्थू आदि पुरास्थलों से प्राचीन भवनों मंदिरों के प्रमाण, रमौली, हरहच्चा, कोइलवाड़ा, महथावन, वाराही आदि पुरास्थलों से टेराकोटा और समस्त दरभंगा जिला से सैकड़ों प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं और समय-समय प्राप्त होते रहते हैं। इस जिले के 300 से अधिक ऐसे पुरास्थल और गांव हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। ये सभी पुरावशेष ईस्वी पूर्व से आधुनिक काल तक के हैं, जिसका वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन होना अति आवश्यक है।​ मेरी कोशिश है कि अपनी यात्रा के दौरान ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक धरोहर, मानव स्वास्थ्य, जल संचयन एवं संरक्षण, संस्कृति के संरक्षण, जैविक कृषि आदि के महत्व को बताते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक ​करते रहें क्योंकि जीवन में निरंतरता, लगन, एकाग्रता, सहनशीलता और बुद्धिमता सबसे आवश्यक है।’

मिथिला की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली और कृषि पद्धतियों का भी मुरारी ने गहन अध्ययन किया है। वे आयुर्वेद, कृषि, और पशुपालन में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की वकालत करते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर आयुर्वेदिक पौधों और पारंपरिक कृषि तकनीकों का संरक्षण और प्रोत्साहन किया है। मुरारी कुमार झा एक कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर, पुरातात्विक स्थलों, और स्थानीय परंपराओं पर आधारित कई आलेख का लेखन किया है। अभी इससे संबंधित पुस्तक का लेखन कर रहे हैं।। उनकी लेखनी में गहराई और स्पष्टता है, जो पाठकों को मिथिला की समृद्ध धरोहर के प्रति आकर्षित करती है। इसके अलावा, कला में उनकी रुचि, खासकर मिथिला पेंटिंग्स और अन्य पारंपरिक कलाओं में, उन्हें एक बहु-आयामी व्यक्तित्व बनाती है।

​बलिराजगढ़​

मुरारी जी के अनुसार बलिराजगढ़

हालांकि मिथिलांचल बहुत बड़ा इलाका नहीं है, लेकिन अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शानदार इतिहास की वजह से भारतीय संस्कृति में इसकी एक बहुत खास जगह है। मिथिला, जिसे मिथिलांचल भी कहा जाता है, भारतीय महाद्वीप में मौजूद एक भौगोलिक और सांस्कृतिक इलाका है। इसमें भारत के उत्तरी बिहार के कुछ हिस्से और नेपाल के पूर्वी तराई के आस-पास के जिले शामिल हैं। नेपाल का बॉर्डर इस इलाके के ऊपरी किनारे से होकर गुजरता है। गंडक और कोसी नदियां मिथिला की पश्चिमी और पूर्वी सीमाएं हैं। यहां की भाषा मैथिली है और इसे बोलने वालों को मैथिल कहा जाता है।मिथिला का ज़्यादातर इलाका आज के भारत में आता है, खासकर बिहार राज्य में। मिथिला उत्तर में हिमालय से और दक्षिण, पश्चिम और पूर्व में गंगा, गंडकी और महानंदा नदियों से घिरा है। यह नेपाल के दक्षिण-पूर्वी तराई तक फैला हुआ है। इस इलाके को तिरहुत का पुराना नाम तिरभुक्ति भी कहा जाता था। रामायण में अयोध्या के राजकुमार राम और मिथिला के राजा जनक की बेटी सीता के बीच एक शाही शादी का ज़िक्र है।

भारत के दार्शनिक उद्भव के साथ सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास के क्षेत्र में मिथिला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मिथिला का इतिहास निःसंदेह गौरवमय रहा है, किन्तु इस क्षेत्र के पुरातात्त्विक अवशेषों के अन्वेषण, विश्लेषण में पाषाण कालीन अवशेषों को प्रकाश में आना अभी तक बाकी है। इस तिरभूक्ति क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टिकोण से वैशाली पुरास्थल के बाद अगर कोई दूसरा महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल प्रकाश में आया तो, वह है; बलिराजगढ़, जिसे डी.आर. पाटिल बलराजपुर लिखते हैं। बलिराजगढ़ हिमालय की तराई क्षेत्र में भारत-नेपाल के सीमा से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर बिहार राज्य के मधुबनी जिला अन्तर्गत बाबूबरही प्रखण्ड में अवस्थित है। प्राचीन मिथिला के लगभग मध्य भाग में मधुबनी जिला मूख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए रेल और सड़क मार्ग दोनों की सुविधाएँ उपलब्ध है। बलिराजगढ़ की स्थिति कमला बलान नदी से 09 किमी पूरब, भूतही नदी से 15 किमी पश्चिम और कोसी नदी से 45 किमी पश्चिम में है। बलिराजगढ़ का महत्व देखते हुए कुछ विद्वान् इसे प्राचीन मिथिला की राजधानी के रूप में संबोधित करते हैं। यहां का विशाल दुर्ग रक्षा प्राचीर से रक्षित पुरास्थल निश्चित रूप से तत्कालीन नगर व्यवस्था में सर्वोत्कृष्ट स्थान रखता होगा।

​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी

175 (मेरे पैमाइस से मात्र 136 बिग्घा) एकड़ भू-भाग में फैले इस विशाल भू-खंड को बलिराजगढ़, बलराजगढ़ या बलिगढ़ भी कही जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है की ये महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित दानव राज बलि की राजधानी के ध्वंषावशेष हैं। स्थानीय लोगों में यह मान्यता है कि आज भी राजा बलि अपने सैनिकों के साथ इस किले में निवास करते हैं। सम्भवतः इसी वजह से कोई भी खेती के लिए जोतने की हिम्मत नहीं करता है। इसी मान्यता के कारण इस भूमि और किले की सुरक्षा अपने आप होती रही है। बुकानन के अनुसार वेणु, विराजण और सहसमल का चौथा भाई बलि एक राजा था। यह बंगाल के राजा बल का किला था, जिसका शासनकाल कुछ दिनों के लिए मिथिला पर भी था। बुकानन के अनुसार ही वे लोग दोमकटा ब्राह्मण थे, जो महाभारत में वर्णित राजा युधिष्ठिर के समकालीन थे। किन्तु, डी.आर. पाटिल इसे ख़ारिज करते हुए कहते हैं, कि वेणुगढ़ तथा विरजण गढ़ के किले से बलिराजगढ़ की दूरी अधिक है, इसीलिए यह उनसे संबंधित नहीं हो सकती।

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कुछ अन्य विद्वान् इस गढ़ को विदेह राज जनक के अंतिम सम्राट द्वारा निर्मित मानते हैं। उनके अनुसार जनक राजवंश के अंतिम चरण में आकर वंश कई शाखाओं में बंट गया और उन्हीं में से एक शासक द्वारा किले का नाम बलिगढ़ रखा गया होगा। प्रो उपेन्द्र ठाकुर ने बलिराजगढ़ का उल्लेख करते हुए लिखा है, कि प्रख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग ने तीरभुक्ति भ्रमण करते हुए वैशाली गए थे। वैशाली (चेन-सुन-ना) से संभवतः बलिगढ़ गए और वहां से बड़ी नदी अर्थात कोसी (वर्तमान महानन्दा) के निकट गए। बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व के लिए एक तर्क यह भी है कि विदेह राज जनक की राजधानी अर्थात रामायण में वर्णित मिथिलापुरी यहीं स्थित रही होगी। यद्यपि मिथिलापुरी की पहचान आधुनिक जनकपुर (नेपाल) से की गयी है, किन्तु पुरातात्विक सामग्रियों के आभाव में इसे सीधे मान लेना कठिन है।

रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र गौतम आश्रम से ईशाण कोण की ओर चलकर मिथिला के यज्ञ मण्डप पहुंचे। गौतम आश्रम की पहचान दरभंगा जिले के ब्रह्मपुर गांव से की गयी है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण में भी मिलता है। आधुनिक जनकपुर गौतम आश्रम अर्थात ब्रह्मपुर से ईशाण कोण न होकर उत्तर दिशा में है। इस तरह गौतम आश्रम से ईशाण कोण में बलिराजगढ़ के अलावा और कोई ऐतिहासिक स्थल दिखाई नहीं देता है, जिस पर प्राचीन मिथिलापुरी होने की सम्भावना व्यक्त की जा सके। अतः बलिराजगढ़ के पक्ष में ऐसे तर्क दिए जा सकते हैं, की मिथिलापुरी इस स्थल पर स्थित थी।

पाल साहित्य में कहा गया है कि अंग की राजधानी आधुनिक भागलपुर से मिथिलापुरी साठ योजन की दूरी पर थी। महाउम्मग जातक के अनुसार नगर के चारों द्वार पर चार बाजार थे, जिसे यवमज्क्ष्क कहा जाता था, बलिराजगढ़ से प्राप्त पुरावशेष इस बात की पुष्टि करती है। बौद्धकालीन मिथिलानगरी का ध्वंशावशेष भी बलिराजगढ़ ही है। बलिराजगढ़ के पुरातात्विक महत्व को सर्वप्रथम 1884 में प्रसिद्ध प्रसाशक, इतिहासकार और भाषाविद् जार्ज ग्रीयर्सन ने उत्खनन के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया, किन्तु बात यथा स्थान ही रह गयी। ग्रियर्सन के उल्लेख के बाद भारत सरकार के द्वारा 1938 ई. में इस महत्वपूर्ण पुरास्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया।

​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी

क्या होना चाहिए

सर्वप्रथम इस पुरास्थल का उत्खनन 1962-63 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रघुवीर सिंह के निर्देशन में संपादित हुई। इस उत्खनन से ज्ञात हुआ की जो इस विशाल सुरक्षा दीवाल के निर्माण में पक्की ईंट के साथ मध्य भाग में कच्ची ईंट का भी प्रयोग किया गया है। सुरक्षा प्राचीर के दोनों ओर पक्की ईंटों का प्रयोग सुरक्षा दीवार को मजबूती प्रदान करती है। सुरक्षा दीवार की चौड़ाई सतह पर 8.18 मी. और 3.6 मी. तक है। सुरक्षा दीवार का निर्माण लगभग तीसरी शताब्दी ई. पू. से लेकर लगातार पाल काल लगभग 12वीं-13वीं शताब्दी तक में समय-समय पर होती रही है। यहां से प्राप्त पुरावशेषों में सुंदर रूप से गढ़ित मृण्मूर्ति महत्वपूर्ण है।

इसके बाद 1972-73 और 1974-75 में बिहार सरकार द्वारा उत्खनन कार्य करवाई गई। इस उत्खनन कार्य में बी.पी. सिंह के सामान्य निर्देशन में सीता राम रॉय द्वारा के.के. सिन्हा, एन. सी.घोष, एल. पी. सिन्हा तथा आर.पी. सिंह के सहयोग से की गई। उक्त खुदाई में कई पुरावशेषों के साथ भवनों के अवशेष भी प्राप्त हुए। इस उत्खनन में उत्तर कृष्ण मर्जित मृद्भाण्ड परम्परा से लेकर पाल काल तक के मृद्भांड मिले। यहां से प्राप्त सुंदर मृण्मूर्ति सैकडों की संख्या में मिले थे, इसके अलावे अर्ध्यमूल्य वाला पत्थर से बनी मोती, तांबे के सिक्के, मिट्टी से निर्मित मुद्राएं भी प्राप्त हुई। अभी कुछ वर्ष पूर्व में 2013-14 में एक बार फिर उत्खनन कार्य भरतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना मण्डल के मदन सिंह चौहान, सुनील कुमार झा और उनके सहयोगी के द्वारा उत्खनन कार्य किया गया। इस स्थल के उत्खनन में मुख्य रूप से चार संस्कृति काल प्रकाश में आए।

1. उत्तर कृष्ण मर्जित मृदभांड
2. शुंग कुषाण काल
3. गुप्त उत्तर गुप्तकला
4. पालकालीन अवशेष

इस स्थल से अभी तक प्राप्त पुरावशेषों में तस्तरी, थाली, पत्थर से निर्मित वस्तुएं, हड्डी एवं लोहे, बालुयुक्त महीन कण, विशाल संग्रह पात्र, सिक्के, मनके, मंदिर के भवनावशेष प्राप्त हुए हैं और एक महिला की मूर्ति भी प्राप्त हुई है, जो अपने गोद में बच्चे को स्तन से लगायी हुई है। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य में प्राचीन सुरक्षा दीवार है, जो पक्की ईंटों से बनी हुई है और अभी तक सुरक्षित अवस्था में है दीवार में कहीं-कहीं कच्ची ईटों का भी प्रयोग किया गया है। इसमें प्रयोग की गई प्रायः ईंटों की लंबाई 20 से 25 ईंच और चौड़ाई 10 से 14 ईंच तक है। पाल या सेन काल के अंत समयावधि में भीषण बाढ़ के दौरान पानी के साथ आए मिट्टी के जमाव कहीं-कहीं 3 से 5 फीट तक है। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि बलिराजगढ़ में जिन किन्हीं का भी शासन रहा हो, किन्तु उनके पतन का प्रमुख कारण बाढ़ ही रही होगी। वर्तमान समय तक मिथिला परिक्षेत्र में इससे विशाल पुरास्थल प्राप्त नहीं हुई है। कुछ विद्वानों के द्वारा इस पुरास्थल की पहचान प्राचीन मिथिला नगरी के राजधानी के रूप में की गई है। ये पुरास्थल मिथिला की राजधानी है या नहीं इस विषय में और अधिक अध्ययन और विस्तृत पुरातात्विक उत्खनन एवं अन्वेषण की आवश्यकता है।

​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी

शोधार्थी मुरारी के अनुसार:

1.⁠ ⁠सम्पूर्ण पुरास्थल का विस्तृत उत्खनन हो, जिससे तत्कालीन लोगों की सांस्कृतिक विशिष्टता यथा- राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्थितियों के साथ ही स्थापत्य कला, रहन-सहन, खान-पान, कृषि-पशुपालन, व्यापार, शिल्प, विभिन्न राज्यों से अन्तर्सम्बन्ध आदि स्पष्ट होंगे।

2.⁠ ⁠उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को संरक्षित कर उक्त पुरास्थल पर ही संग्रहालय(Site Museum) स्थापित कर संगृहित/प्रदर्शित किए जाएं। इससे मिथिला की सांस्कृतिक विविधताओं एवं धरोहरों के प्रति आमजनों में जागरूकता आने के साथ ही स्थानीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

3.⁠ ⁠विभिन्न स्तरों के सांस्कृतिक विविधताओं का वैज्ञानिक शोधपरक विश्लेषण करते हुए अब तक के उत्खनन का विस्तृत प्रतिवेदन प्रकाशित किए जाएं, जिससे तत्कालीन शासक या समुदाय की पहचान संभव हो पाएगी।

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