​भारत के न्यायालयों में 5.34 करोड़ मामले लंबित: कभी ‘अधिवक्ता’ नहीं, तो कभी ‘आरोपी’ फरार, कभी ‘गवाह’ गायब तो कभी ​’सबूत’ नहीं

​भारत का सर्वोच्च न्यायालय। तस्वीर: संजय शर्मा

नई दिल्ली: बात पिछले साल की है। अगस्त के मध्य में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय से उन मामलों में फैसले देने में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई थी, जिसकी सुनवाई बहुत पहले ही पूरी हो चुकी थी। उन दिनों सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सूर्यकांत (वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा से कहा कि संबंधित न्यायाधीशों को अपने लंबित फैसले लिखने के लिए मंजूर छुट्टी लेनी चाहिए।

मुकदमों की जिरह की समाप्ति और फैसले के नहीं आने से संबंधित तथ्यों (61 मामले लंबित थे) बातों पर अपनी प्रतिक्रिया जताते सर्वोच्च न्यायमूर्तियों की पीठ ने कहा कि “झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से कहिए कि वे 10-12 हफ़्ते की मंज़ूर छुट्टी लें और फैसले लिखें… बस इन मामलों को खत्म करें। लोगों को फैसले चाहिए, उन्हें न्यायशास्त्र या किसी और चीज़ से कोई मतलब नहीं है। राहत दी गई है या नहीं, इस पर तर्क के साथ आदेश दें।” सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता से यह सुझाव झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक पहुंचाने को भी कहा। 

इस मामले की सुनवाई झारखंड के आदिवासी इलाकों के छात्रों द्वारा दायर याचिकाओं के संबंध में हो रही थी। उन दिनों राज्य सरकार द्वारा होमगार्ड के 1,000 से ज़्यादा पदों पर भर्ती रद्द करने के बाद ये छात्र उच्च न्यायालय गए थे। हालांकि सुनवाई 2023 में पूरी हो गई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने अभी तक फैसला नहीं सुनाया था। छात्रों के नाम मेधावी सूची में थे, लेकिन फैसले में देरी से अनिश्चितता बनी हुई थी। 

नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ा के अनुसार, 31 जनवरी, 2026 तक झारखंड उच्च न्यायालय में करीब  206,138 लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं। इसमें लगभग 28,116 सिविल मामले और 178,022 आपराधिक मामले शामिल हैं। झारखण्ड एक दृष्टान्त है। देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है। यह एक बड़ी चिंता का विषय है। 25 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, कुल 5.34 करोड़ मामले लंबित थे। इन मामलों में से एक बड़ा हिस्सा जिला और निचली अदालतों में है। जिला और निचली अदालतों में 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। 

उच्च न्यायालयों में भी बड़ी संख्या में मामले अटके हुए हैं। उच्च न्यायालयों  में 63.8 लाख मामले लंबित हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत, सर्वोच्च न्यायालय में भी मामले लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय में 88,251 मामले लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थिति पर खुद भी गहरी चिंता भी जताई है। न्यायालय ने साफ तौर पर कहा है कि तेज सुनवाई हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार जीवन के अधिकार का एक अटूट हिस्सा है। इसका मतलब है कि हर किसी को जल्द न्याय मिलना चाहिए। 

नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड द्वारा उपलब्ध निचली अदालतों के आंकड़ों के अनुसार निचली अदालतों के 1.78 करोड़ मामलों में देरी के 15 मुख्य कारण बताए हैं। निचली अदालतों में कुल 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। जिन मामलों के कारणों की जानकारी ग्रिड के पास है, उनमें से ज्यादातर आपराधिक मामले हैं। इन मामलों में 81% आपराधिक मामले हैं। बाकी 19% सिविल मामले हैं। यह दिखाता है कि आपराधिक मामलों में देरी ज्यादा हो रही है। हालांकि, एक बड़ी संख्या ऐसे मामलों की भी है जिनके कारणों का पता नहीं है। लगभग 3 करोड़ मामलों के लिए देरी का कोई कारण नहीं बताया गया है। यह अपने आप में एक बड़ी समस्या है। 

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ग्रिड ने देरी के कुछ खास कारण बताए हैं। ये कारण न्याय प्रक्रिया को धीमा कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण अधिवक्ताओं का उपलब्ध न होना है। ग्रिड के अनुसार, 62 लाख से ज्यादा मामलों में अधिवक्ता मौजूद नहीं होते। इससे सुनवाई आगे नहीं बढ़ पाती। दूसरा बड़ा कारण आरोपी का फरार होना भी बताया है। ग्रिड के अनुसार 35 लाख से ज्यादा मामलों में आरोपी फरार हैं। जब आरोपी ही नहीं होता, तो केस कैसे चलेगा? इतना ही नहीं, लगभग 27 लाख मामलों में गवाह गायब हैं। गवाहों के बिना सबूत पेश करना मुश्किल हो जाता है। 23 लाख से ज्यादा मामलों पर अलग-अलग अदालतों ने रोक लगा रखी है। यह रोक भी मामलों को आगे बढ़ने से रोकती है। आंकड़ों के अनुसार, 14 लाख से ज्यादा मामलों में ‘दस्तावेजों का इंतजार’ होता है। जरूरी कागजात न मिलने से भी देरी होती है। और लगभग 8 लाख मामलों में ‘पार्टियों का दिलचस्पी न लेना’ शामिल है। जब पक्षकार ही रुचि नहीं दिखाते, तो मामला कैसे सुलझेगा? ये सभी कारण मिलकर न्याय में देरी करते हैं।

​भारत का सर्वोच्च न्यायालय और बाहर निर्णय की प्रतीक्षा । तस्वीर: संजय शर्मा

ग्रिड ने देरी के कुछ और भी कारण बताए हैं। इनमें बार-बार अपील करना शामिल है। लोग एक ही मामले में बार-बार अपील करते रहते हैं। इससे भी सुनवाई में लंबा समय लगता है। रिकॉर्ड का उपलब्ध न होना भी एक समस्या है। जब जरूरी रिकॉर्ड नहीं मिलते, तो कार्यवाही रुक जाती है। सुनवाई को रोकने वाले विविध आवेदन भी देरी का कारण बनते हैं। पार्टियां अक्सर सुनवाई रोकने के लिए अलग-अलग तरह के आवेदन देती रहती हैं। पार्टियां द्वारा अतिरिक्त गवाहों की मांग करना भी एक कारण है। इससे भी केस लंबा खींचता है। मृत पार्टियों के कानूनी प्रतिनिधियों का कोर्ट रिकॉर्ड में न होना भी एक बड़ी बाधा है। जब किसी पक्षकार की मृत्यु हो जाती है और उसके कानूनी वारिसों का पता नहीं होता, तो मामला अटक जाता है। इन सभी कारणों से न्याय मिलने में बहुत देर होती है।

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ग्रिड के अनुसार, न्यायपालिका में 5,600 से अधिक पद रिक्त हैं। 2006 और 2024 के बीच, हाईकोर्ट्स में रिक्तियों की दर 16% से बढ़कर 30% हो गई है। कम न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात: भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 21 न्यायाधीश हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में यह संख्या 150 है। लगभग 50% मुकदमे सरकारी एजेंसियों के कारण होते हैं। इतना ही नहीं, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट, 2022 के अनुसार, न्यायालयों में पर्याप्त कोर्ट रूम और प्रशासनिक कर्मचारियों की कमी वजह से मामलों के निपटान में बाधा उत्पन्न होती है। साथ ही, मामलों के निपटान के लिए कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है, बार-बार स्थगन और लंबी छुट्टियां भी देरी का कारण बनती हैं।

और इसका परिणाम यह होता है कि इससे पीड़ितों की पीड़ा बढ़ती है और न्याय के निवारक प्रभाव में कमी आती है। व्यवसाय और आम नागरिक अतिरिक्त बोझ उठाते हैं, सरकार और न्यायपालिका पर दबाव बढ़ता है। उदाहरण के लिए- कॉन्ट्रैक्ट्स लागू करने से जुड़ी कमजोरियों के कारण भारत की ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग खराब होती है और जेलों में भीड़ भी बहती हैं।इंडियन जस्टिस रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, भारत की आधी से अधिक जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं। इनमें से 76% कैदी विचाराधीन हैं।

रायसीना हिल पर न्याय के लिए आँखें बैठाये भारत के पांच करोड़ से अधिक लंबित मुकदमों के पीड़ित। तस्वीर: संजय शर्मा

ज्ञातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों – न्यायमूर्ति पारदीवाला और न्यायमूर्ति विश्वनाथन – की पीठ ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई थी । पीठ ने कहा भी था, ‘यह लगभग एक सामान्य प्रथा और नियमित घटना है कि ट्रायल कोर्ट इस आदेश का खुलेआम उल्लंघन करते हैं। यहां तक कि जब गवाह मौजूद होते हैं, तब भी मामलों को बहुत कम गंभीर कारणों या मामूली आधारों पर स्थगित कर दिया जाता है।’ 

वैसे, सरकार दावा करती है कि केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मामलों के शीघ्र निपटारे और लंबित मामलों की संख्या को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है और उसने न्यायपालिका द्वारा मामलों के त्वरित निपटारे के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करने हेतु कई पहल भी शुरू की हैं, जिनमें अन्य बातों के अलावा, ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तहत न्याय तक पहुंच बढ़ाने और अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकियों का एकीकरण और न्यायपालिका के लिए अवसंरचना सुविधाओं के विकास हेतु केंद्र प्रायोजित योजना के तहत जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए उपयुक्त अवसंरचना सुविधाएं प्रदान करने के लिए राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों के संसाधनों की पूर्ति करना शामिल है।

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14वें वित्त आयोग ने 2015-2020 की अवधि के दौरान जघन्य अपराधों, महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों से जुड़े दीवानी मामलों सहित विशिष्ट श्रेणियों के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 1800 त्वरित न्यायालयों (एफटीसी) की स्थापना की सिफारिश की थी। उच्च न्यायालयों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 31.10.2025 तक 21 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 866 एफटीसी कार्यरत हैं।

बलात्कार और बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (पीओसीएसओ) से संबंधित लंबित मामलों के समयबद्ध निपटारे के लिए विशेष रूप से गठित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी), जिनमें विशेष पीओसीएसओ (ई-पीओसीएसओ) कोर्ट भी शामिल हैं, समर्पित हैं। उच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक 29 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 773 एफटीएससी, जिनमें 400 विशेष पीओसीएसओ कोर्ट शामिल हैं, कार्यरत हैं। केंद्र प्रायोजित योजना की शुरुआत से लेकर अब तक इन न्यायालयों ने सामूहिक रूप से 3,50,685 मामलों का निपटारा किया है, जबकि 2,43,615 मामले वर्तमान में लंबित हैं।

​दिल्ली के तिहाड़ जेल के बाहर कैदियों के परिजन। तस्वीर: संजय शर्मा

भारत के संविधान के अनुच्छेद 130 में यह प्रावधान है कि सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में या ऐसे अन्य स्थानों पर बैठेगा, जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की स्वीकृति से समय-समय पर नियुक्त करें। उच्च न्यायालय की पीठों की स्थापना का प्रस्ताव, भारत सरकार द्वारा राज्य सरकार से पूर्ण प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद ही विचार किया जाता है, जिस पर संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल की सहमति ज़रुरी है। राज्य सरकार को उच्च न्यायालय की पीठ की स्थापना के लिए ज़रुरी अवसंरचनात्मक सुविधाएं और साथ ही उच्च न्यायालय और उसकी पीठ का संपूर्ण व्यय वहन करना होगा। जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के मामले में, निर्णय राज्य सरकार और संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा लिया जाता है।

इसके अलावा, न्याय व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़, सुगम और सुलभ बनाने के मकसद से ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण (2023-2027) को 13.09.2023 को 7,210 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई। अब तक उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में 579.53 करोड़ पृष्ठों के न्यायालयी अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 3.81 करोड़ से अधिक सुनवाई हो चुकी हैं और 11 उच्च न्यायालयों में लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा उपलब्ध है। उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ई-सेवा केंद्रों की संख्या बढ़कर 1987 हो गई है।

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