पटना विश्वविद्यालय का 108-वर्ष: प्रधानमंत्री महोदय, कृपया विश्वविद्यालयों के ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ में दरभंगा राज की कुर्सियां पुनः स्थापित करने की कृपा करें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह की परपोती श्रीमती वसुधा झा की प्रार्थना

​पटना / नई दिल्ली: पटना विश्वविद्यालय के 108 वें स्थापना दिवस (8 अक्टूबर) के अवसर पर दरभंगा के महाराजा (दिवंगत) रमेश्वर सिंह की परपोती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के राज्यपालों से – जो अपने-अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपति भी हैं – निवेदन किया है कि दरभंगा के महाराजाओं द्वारा भारतीय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में अतुलनीय योगदान के मद्दे नजर विश्वविद्यालयों में ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ में ‘दरभंगा ​राज के सम्मानार्थ ‘दरभंगा राज कुर्सियों’ को पुनः स्थापित करें। विगत कई दशकों ने उन कुर्सियों को समाप्त कर दिया गया है।

​आज पटना विश्वविद्यालय के 108 वें स्थापना दिवस पर महाराजा रमेश्वर सिंह की परपोती श्रीमती वसुधा झा ने कहा है कि “दरभंगा राज और दरभंगा के महाराजाओं का भारतीय शिक्षा जगत में अहम् योगदान है। तकलीफ इस बात की है कि महाराजा डॉ. सर कामेश्वर सिंह के देहावसान के बाद, न तो दरभंगा राज के तरफ से कोई पहल किया गया ताकि उन विश्वविद्यालयों के सीनेट और सिंडिकेट में दरभंगा राज की कुर्सी बच रहे​, और ना ही विश्वविद्यालय प्रशासन उसे बचा सकी। परिणाम यह हुआ कि दरभंगा राज का योगदान भी किताबों के पन्नों में सिमट कर रह गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।’ श्रीमती वसुधा झा महाराजा रमेश्वर सिंह के सबसे बड़ी बेटी श्रीमती लक्ष्मी दाई जी की तीसरी पीढ़ी की वंशज है।

“मैं स्वयं प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी जी से मिलकर याचना करुँगी,” श्रीमती वसुधा झा ने कहा। इससे पूर्व आज पटना विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध करती हूँ कि ‘बिहार और भारत के लिए दरभंगा राज की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को पुनः प्राप्त करने का समय आ गया है। महाराजा कामेश्वर सिंह के उत्तराधिकारियों को विद्वानों और नीति निर्माताओं के साथ मिलकर उनके दृष्टिकोण को एक जीवंत नीतिगत एजेंडे में बदलना चाहिए, और इसके लिए पहल करनी चाहिए।”

उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि भारतीय ज्ञान प्रणालियों के लिए एक मिथिला केंद्र की स्थापना की जाय, दरभंगा पांडुलिपि संग्रह का डिजिटलीकरण और लोकतंत्रीकरण किया जाय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, यूनेस्को के साथ मिलकर भारत के कई शहरों में दरभंगा राज के मंदिरों, विरासत भवनों और महलों का जीर्णोद्धार, पुनरुद्धार और विकास किया जाय, कामाख्या, काशी, कोलकाता आदि के मंदिर ट्रस्टों में दरभंगा राज परिवार की भागीदारी, जहाँ दरभंगा राज ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, उसे आप के परिपेक्ष में जीवित किया जाय।”

आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से बात करते श्रीमती झा कहती हैं कि ‘लगभग एक वर्ष पहले, दरभंगा एम्स की आधारशिला रखते हुए, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की उदारता को याद किया था। श्रीमती झा ने कहा कि पटना विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मना रहा है, ऐसे में यह राज्य के महानतम दूरदर्शी लोगों में से एक – दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह (1907-1962) को याद करने का एक उपयुक्त अवसर है। आज उनका नाम महलों से परिसर बने परिसरों की फीकी पड़ रही दीवारों में बमुश्किल दिखाई देता है, लेकिन शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण अपने समय से बहुत आगे था। चुनाव नज़दीक आते ही, जब मिथिला के मैदानों में विकास और सशक्तिकरण के वादे गूंज रहे हैं, यह पूछना उचित है: बिहार दरभंगा राज के शिक्षा-आधारित राष्ट्र निर्माण के मॉडल से क्या सीख सकता है?’

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श्रीमती वसुधा झा

बिहार ही नहीं, अविभाजित भारत में शिक्षा के विकास के मामले में दरभंगा के महाराजाओं का योगदान ‘अक्षुण’ है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन पटना विश्वविद्यालय के मामले में मुंगेर के जमींदार देवीकी नंदन प्रसाद सिंह के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता है। दुर्भाग्य से, प्रदेश के लोगों ने प्रदेश की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक विकास के मामले में अपने प्रदेश के राजाओं और जमींदारों की भूमिका को ‘भुला’ ही नहीं, अपितु मानसिक तौर पर ‘दफना’ भी कर दिया। अपने ही प्रदेश में उन लोगों को वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अगर ऐसा नहीं होता तो पटना विश्वविद्यालय के ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ में उन राजाओं और जमींदारों का स्थान आज भी ‘सुरक्षित’ रहता।

श्रीमती वसुधा झा का कहना है कि “इस परिवार के सदस्य और महाराजा कामेश्वर सिंह की परपोती होने के नाते, मुझे बड़ी निराशा के साथ स्वीकार करना होगा कि यह उन दुर्लभ उदाहरणों में से एक है जब भारत के किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने दरभंगा राज और उसके महाराजाओं की विरासत को याद किया है, जिन्होंने भारत में सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक विचारों के विकास में अप्रतिम योगदान दिया। उनकी मृत्यु के मात्र छह दशक बाद, उनका नाम बिहार के राजनीतिक विमर्श या भारत की शिक्षा नीति की कहानी में बमुश्किल ही दिखाई देता है।​”

उनका कहना है कि “यदि भारत “विश्व गुरु” बनने के लिए गंभीर है, तो उसे उन लोगों को याद रखना चाहिए जिन्होंने चुपचाप उस आदर्श को जिया। दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह ऐसे ही एक दूरदर्शी व्यक्ति थे – जिन्होंने प्राचीन ज्ञान और आधुनिक शासन के बीच कोई अंतर नहीं देखा। उनके आदर्शों को पुनर्जीवित करते हुए, हम केवल एक शासक का सम्मान ही नहीं करते – हम एक ऐसे ज्ञान-दर्शन को पुनर्जीवित करते हैं जो एक बार फिर भारत के भविष्य का मार्गदर्शन कर सकता है।”

महाराजा कामेश्वर सिंह का भारतीय शिक्षा में योगदान केवल संस्थाओं तक ही सीमित नहीं था — यह प्रबुद्ध नेतृत्व का दर्शन था। उन्होंने शिक्षा को भारत के सभ्यतागत ज्ञान और आधुनिक प्रगति के बीच एक सेतु के रूप में देखा। ऐसे समय में जब सार्वजनिक विमर्श भारतीय ज्ञान प्रणालियों को पुनर्जीवित करने और क्षेत्रीय शिक्षा सशक्तीकरण की मांग कर रहा है, राज दरभंगा की शैक्षिक विरासत को पुनर्जीवित करना कोई पुरानी यादें ताज़ा करने वाली बात नहीं है — यह एक नीतिगत आवश्यकता है। आज के संदर्भ में, नेतृत्व का यह मॉडल विरासत और आधुनिकता के बीच एक सेतु का प्रतिनिधित्व करता है। उनका जीवन दर्शाता है कि कैसे परोपकारी कार्य सार्वजनिक नीति का पूरक हो सकते हैं, खासकर बिहार जैसे राज्यों में जहाँ निजी संपत्ति, विरासत संपत्ति और शैक्षिक आवश्यकताएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

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एक ऐसे युग में जब औपनिवेशिक शिक्षा मुख्यतः शहरी और अभिजात्य वर्ग तक सीमित थी, महाराजा ने बिहार के भीतरी इलाकों में ज्ञान तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया। उनके परोपकार ने कलकत्ता, दरभंगा, बनारस, इलाहाबाद, पटना विश्वविद्यालयों को एक शैक्षिक केंद्र में बदल दिया – जो आज हम “क्षेत्रीय ज्ञान केंद्र” कहते हैं, उसका अग्रदूत था। दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह पटना के गंगा-तट पर करीब 15 एकड़ और अधिक भूमि पर बने ऐतिहासिक ‘दरभंगा हॉउस’ का सम्पूर्ण परिसर के साथ-साथ भविष्य में प्रदेश में शिक्षा और विज्ञान को अधिकाधिक मजबूत बनाने के लिए करीब सात लाख रूपये का दान स्वाधीनता मिलने के करीब आठ साल बाद सन 1955 में किये। पटना मेडिकल कालेज आज भी गवाह है।

दरभंगा हाउस, पटना विश्वविद्यालय

भारत के बौद्धिक पुनर्जागरण की भव्य गाथा में, महाराजा कामेश्वर सिंह की तरह शास्त्रीय और आधुनिक दुनिया के बीच सेतु का काम बहुत कम लोग कर पाते हैं। एक विद्वान, राजनेता और संस्कृत शिक्षा के संरक्षक, महाराजा ने शिक्षा के एक ऐसे दृष्टिकोण को मूर्त रूप दिया जो भारतीय ज्ञान प्रणालियों (आईकेएस) में गहराई से समाया हुआ था – नीतिगत हलकों में इस शब्द के प्रचलन में आने से सदियों पहले। उन्होंने उस बात को पहचाना जो अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 स्पष्ट करती है: कि भारत के विकास को उसकी सभ्यतागत जड़ों से अलग नहीं किया जा सकता। राज्य द्वारा “भारतीय ज्ञान परंपरा” की बात करने से बहुत पहले, दरभंगा राज ने इसे संस्थागत रूप दे दिया था।

भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में, वे उन कुछ राजघरानों में से एक थे जिन्होंने भारत के संवैधानिक निर्माण में बौद्धिक योगदान दिया, शिक्षा में सांस्कृतिक स्वायत्तता और संस्कृत विरासत के संरक्षण की वकालत की। महाराजा कामेश्वर सिंह के पास 20,000 से अधिक पांडुलिपियों, दुर्लभ पुस्तकों और संस्कृत ग्रंथों का एक निजी संग्रह था, जिन्हें बाद में सार्वजनिक भंडारों को दान कर दिया गया था। उन्होंने मिथिला चित्रकला, मैथिली भाषा, साथ ही तांत्रिक और न्याय दर्शन पर शोध को वित्तपोषित किया, जिससे स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की निरंतरता सुनिश्चित हुई। उनका मानना ​​था कि भारत का भविष्य तर्क और आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और शास्त्रीय के बीच सामंजस्य स्थापित करने में निहित है। ऐसे समय में जब नीति निर्माता राष्ट्रीय शिक्षा ढाँचे में संस्कृत, आयुर्वेद और भारतीय ज्ञानमीमांसा की पुनर्खोज कर रहे हैं, उनकी आवाज़ अत्यंत समकालीन बनी हुई है।

पटना विश्वविद्यालय के एक अवकाश प्राप्त प्राध्यापक का कहना है कि “जब प्रदेश में शिक्षा को अपाहिज कर गंगा में डुबकी लगाने के लिए छोड़ दिया गया, आप सीनेट और सिंडिकेट की बात करते हैं। आज ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और भावार्थ बताने वालों की भी किल्लत है शैक्षणिक संस्थानों में। हम किस संस्कार और गरिमा की बात करते हैं? पटना विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल अपने ही प्रदेश के एक नागरिक का देन है जिन्होंने आज से सौ वर्ष पहले शिक्षा के महत्व को समझा। शिक्षाओं की बैठकी का महत्व समझा। दीक्षांत समारोह का महत्व समझा। आज अगर विश्वविद्यालय अथवा प्रदेश की सरकार उस स्थान पर मॉल या वातानुकूलित बाजार खोलने की बात कर दे तो यकीन कीजिये प्रदेश के लाखों लोग पैसे फूंकने को तैयार हो जाएंगे । आज शिक्षा का कोई मोल नहीं है। शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। प्रदेश में जो भी पढ़ने पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं हैं वे अपने जीवन निर्माण के लिए, पढ़ने के लिए प्रदेश से पहले ही बाहर निकल जाते हैं।”

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व्हीलर सीनेट हाउस, पटना विश्वविद्यालय

पटना विश्वविद्यालय में राजा देवीकी नंदन प्रसाद सिंह के ऐतिहासिक योगदान के निमित्त तत्कालीन व्यवस्था द्वारा चिकित्सा महाविद्यालय और साइंस कॉलेज में दो-दो सीट दिया गया था। पहले यह स्थान पटना विश्वविद्यालय सीनेट के लिए निमित्त हुआ, परन्तु तत्कालीन व्यवस्था से अनुरोध करने पर दो-दो स्थान दो कालेजों में सुरक्षित रखा गया। लेकिन पिछले कई वर्षों से हम सभी प्रदेश के राज्यपालों की लिखते आये रहे हैं, लेकिन कोई निर्णय नहीं हो पाया। पटना विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक ‘सीनेट हॉउस’ के निर्माण में राजा देवकी नंदन प्रसाद सिंह का योगदान अक्षुण है।

मुंगेर के जमींदार राजा देवीकी नंदन प्रसाद सिंह पटना विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल का निर्माण कार्य का सम्पूर्ण खर्च वहां किये। उस कालखंड में इसके निर्माण पर कुल 125000/- रुपये खर्च हुए थे। करीब एक हज़ार लोगों की बैठने की क्षमता वाले इस सीनेट हॉल का निर्माण कार्य सन 1926 में पूरा हो गया। इस विशाल हॉल का नाम ‘सर हैनरी व्हीलर’ के नाम पर रखा गया जो उस समय अविभाजित बिहार-उड़ीसा प्रान्त के राज्यपाल थे। सर हैनरी सन 1926 में ‘व्हीलर सीनेट हॉल’ का लोकार्पण किया।

ज्ञातव्य है कि व्हीलर सीनेट हॉल अपने अस्तित्व काल में लार्ड माउंटबेटन, सरदार वल्लभभाई पटेल, सरोजनी नायडू, सी. डी. देशमुख, विजया लक्ष्मी पंडित, जयप्रकाश नारायण, जगदीश चंद्र बॉम सी.वी. रमन, सत्येन्द्रनाथ बोस जैसे महान हस्तियों को अपने छत के नीचे छात्रों को, शिक्षकों को सम्बोधित करते देखा है। अपने निर्माण के एक दशक बाद 17 मार्च, 1936 को इसी सीनेट हॉल में रवीन्द्रनाथ टैगोर का अभिनन्दन समारोह का भी आयोजन हुआ था। आज़ादी के पूर्व वर्ष में जवाहरलाल नेहरू को भी इसी हॉल में तत्कालीन सांप्रदायिक दंगों के कारण शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था।

पटना विश्वविद्यालय की स्थापना अक्टूबर, 1917 में बिहार और उड़ीसा के अलग प्रांत के निर्माण के बाद की गई थी। बिहार में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक सकारात्मक कदम उठाया गया है। जुलाई 1919 में पटना कॉलेज में विभिन्न कला विषयों में स्नातकोत्तर कक्षाएं शुरू की गईं। उच्च वैज्ञानिक शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए 1927 में साइंस कॉलेज एक अलग इकाई बन गया।

1 COMMENT

  1. Bahut sundar aur sahi baat likhe hai Sir. Afsos jo ki phle jo nirnay liya gaya tha usmen Param Aadarniye MaharajaDhiraj Sir Kameswar Singh je ke marnoparant unke yogdan ko iskadar side kar diyajaurga jo siksha ke liye itna kargaye. Unke parivaar ke logon ko syndicate aur synate men jahah surakshit hona. Afsos is baat ka ki kuchh unke parivaar aur banki sarkaritantra dwara mukhmorne ke karan aisa isthit utpan hua 😢.
    Khair jab Aadarniye Vasudha Jha mahodaya dwara isko sucharu roop se chalu karne ke liye paramaadarniye Pradhanmantri se anurodh karna jsyaj mang hai. PM Narendra Modi jee bhi Maharajadhiraj ke byaktitea aur krititwa ke bare men bol rahe the.
    Mai ek Darbhanga jila ke nagrik hone ke nate kamna karta hun ki Maa Saraswati Maa Jagdamba Janki Mahadev se kamna karta hun ki apna kripa banaye rakhe rahna 💐🙏

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