‘कफ सिरप’ से लेकर ‘मेथ’, ‘चरस’, ‘स्मैक’, ‘ब्राउन शुगर’, ‘अफीम की भूसी’ जैसी ‘सिंथेटिक ड्रग्स’ के बीच बिहार में 18वें विधानसभा गठन के लिए ‘चुनावी हो-हल्ला’ शुरू (बिहार चुनाव-1)

पूरा प्रदेश सूखा नशा के गिरफ्त में है।

पटना / मधेपुरा / दरभंगा : एक तरफ जहाँ मिथिला क्षेत्र के साथ साथ पटना से दिल्ली तक मैथिल और मैथिली भाषा भाषी स्वार्थ सिद्धि के लिए ‘मिथिला के पाग’ पर ‘कसीदाकारी’ और उसे रंगबिरंगा’ कर राजनीतिक बाजार में ‘दो पंचे दस’ कर रहे हैं; बिहार में सत्तारूढ़ पार्टियों की असीम इच्छा है कि ‘ड्राई स्टेट’ होने के बाद भी, चुनाव तक प्रदेश का मतदाता ‘सिंथेटिक ड्रग्स और चिल्लम’ की नशा में मग्न रहकर ही अपने-अपने मताधिकार का प्रयोग करें। क्या पता विरोधी पार्टियों के अभ्यर्थियों के स्थान पर सत्तारूढ़ पार्टियों के अभ्यर्थियों को ‘उंगली’ कर दें, और वह विजय हो जाय। यह बिहार है। कुछ भी हो सकता है यहाँ क्योंकि हज़ारों बोतलों में बंद शराब जब ‘चूहा’ गटक जाता है और प्रशासन के लोग ‘हंसकर’ बात को समाप्त कर देते हैं।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘पाग’ पहनी हुई तस्वीर प्रकाशित हुई प्रादेशिक से राष्ट्रीय अख़बारों तक। उस तस्वीर में प्रधानमंत्री के माथे पर पाग और हाथों में राम-जानकी की वरमाल की फ्रेम में मढ़ी मिथिला-पेंटिंग थी। पाग के अग्रभाग में मिथिला-पेंटिंग शैली की कुछ चित्रकारी भी थी। कुछ दिन बाद एक और तस्वीर प्रकाशित हुई जिसमें प्रधानमंत्री ‘लाल पाग’ तो पहले हुए थे ही, भारी-भरकम मखान का माला भी पहने हुए थे। जाहिर है, कटिहार, पूर्णिया, मधुबनी के मैथिलों ने पाग पहना कर, मखाने का माला पहनाकर प्रधानमंत्री का सम्मान किया होगा।

इतना ही नहीं, राष्ट्रीय जनता दल के नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव के नवमीं कक्षा पास पुत्र और उनकी अर्धांगिनी के सर पर भी पाग पहना दिखा था। यह पाग मिथिला के नेता ही पहनाये थे नव दंपत्ति को उनके सम्मानार्थ। दोनों मंगलसूत्र में बंधे थे। उस तस्वीर में मिथिला के नेतागण भी पंक्तिबद्ध थे। अगर मिथिला के लोग इन व्यक्तियों को पाग पहनाते हैं, तो इसका अर्थ सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दुकानदारी ही माना जायेगा। सम्मान करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन क्या ये पाग पहनने के लायक है? तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी को वैवाहिक जीवन पर बधाई देने का अनेकानेक तरीका हो सकता था परन्तु पाग पहना कर ‘मिथिला के पाग का अपमान’ ही किये।

कल 11 अक्टूबर था। कल के ही दिन 1902 में जय प्रकाश नारायण का जन्म हुआ था। और कल के ही दिन अगले महीने, यानी 11 नवम्बर, 2025 को बिहार में 18 वें विधानसभा के गठन के लिए मतदान समाप्त हो जायेगा और 243 लोगों का भविष्य बंद हो गया होगा। खैर।

आइये आगे चलते हैं सिंथेटिक ड्रग्स पर चर्चा करने। विगत दिनों दी पायनियर अख़बार के सभी 9-संस्करणों के कार्यकारी संपादक सम्मानित दीपक झा मिथिला के कुछ जिलों में भ्रमण सम्मेलन करने गए थे। उनकी यात्रा ‘व्यक्तिगत’ थी, लेकिन ‘वास्तविक पत्रकारों’ की ‘निजी यात्रा’ कब होती है’, वह भी ‘संपादक’ के स्तर पर। अपनी यात्रा के दौरान वे सैकड़ों लोगों से मिल रहे थे, बातें कर रहे थे। ग्रामीणों की शारीरिक और मानसिक भाषाओँ के साथ-साथ उनकी आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक स्थितियों को आंकने के लिए भी दीपक झा अपनी नजर खुला रखे थे।

इसका वजह यह था कि नीतीश कुमार के 243 विधान सभा क्षेत्रों में से कुछ क्षेत्रों के मतदाताओं के साथ-साथ, प्रशासन से जुड़े लोग, प्रशासन के नियमों को लागू करने वाले वर्दीधारियों का चरित्र-चित्रण लिखना था। यात्रा के दौरान उन्होंने अपने समाचार पत्र में एक मार्मिक कहानी भी लिखे। जब उनसे बात किया तो वे कहते हैं: “हमारे प्रदेश के लोग जिस दिशा में उन्मुख हो गए हैं, वह दिशा न केवल आर्थिक, सामाजिक रूप से मार्मिक है, बल्कि मिथिला के पाग के तरह लोगों की सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक, मानसिक स्थितियां नेस्तनाबूद भी हो जायेगा। बिहार के लोग गांजा, भांग, चरस, अफीम के युग में आ गए हैं।”

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दीपक झा का कहना था कि “बिहार में सामाजिक और आर्थिक जीवन पर शराबबंदी का प्रभाव और शराबखाने के नए स्वरूपों का प्रभाव आगामी चुनाव पर पड़ने वाला है, यह तय है। विगत दिनों राज्य में चुनाव की घोषणा हो गयी है और तलबे कद से लेकर आदम कद तक के राजनेता अपनी-अपनी टोपियां चुनावी मैदान में फेंक दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दाल (यूनाइटेड), वामपंथी, लोक जनशक्ति पार्टी, हिंदुस्तान आवाम मोर्चा, राष्ट्रिय लोक मोर्चा, जन सुराज पार्टी, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के झंडे तले सैकड़ों नहीं, हज़ारों नहीं, लाखों नेताओं के साथ-साथ करोड़ों उनके अनुयायियों की टोली बन गयी है। लेकिन हमने गंगा पार के मिथिला क्षेत्र के जिलों में जो देखा, वह भी प्रदेश में ‘शराबबंदी’ के कालखंड में, वह चिंतनीय ही नहीं, शर्मनाक भी है। पुरे प्रदेश में यत्र-तत्र-सर्वत्र लोगों में चुनाव-चिलम और चस्का का लत लग गया है। दुखद है।”

गंगा के उस पार के जिलों में, विधानसभा क्षेत्रों में, लोगों की, मतदाताओं की जो हालत और हालात है, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि सरकार भले शराब बंदी कर दी हो राज्य में, लेकिन आज भी पूरा प्रदेश, खासकर युवापीढ़ी, महिलाएं नशे में भुत्त हैं। आज पूरा प्रदेश मोबाइल डेटा और गांजा, कोकीन, हेरोइन और अन्य मादक पदार्थों जैसे सूखे नशीले पदार्थों या सुखा नशा की लत में धुत्त है । सहरसा, मधुबनी और पूर्णिया जैसे अविकसित जिलों के दूरदराज के गाँवों में भी नशीले पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है । यह दुर्भाग्य है।

दीपक कुमार झा, कार्यकारी संपादक, दी पायनियर

सूत्रों के अनुसार, बिहार में नशे की लत बच्चों और महिलाओं को भी अपनी गिरफ्त में ले रही है। शराब महिलाओं या बच्चों द्वारा स्कूल बैग में 100-200 रुपये में पहुँचाई जाती है, क्योंकि उन पर शक की सुई नहीं जा सकती। शराबबंदी के बावजूद, राज्य को कई अवैध शराब की घटनाओं का सामना करना पड़ा है, जिनमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह ज़िला नालंदा भी शामिल है। जो लोग तस्करी की महंगी शराब या नशीले पदार्थ नहीं खरीद सकते, वे कफ सिरप और वाष्पशील विलायक, नेल पॉलिश रिमूवर, शू लोशन, थिनर, डाइल्यूटर्स आदि जैसे सस्ते विकल्पों का इस्तेमाल करके नशे में धुत हो जाते हैं।

उधर, चुनाव, चिल्लम, चरस, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम की भूसी जैसी मादक पदार्थों की प्रचलन को मिथिला-पाग से तुलना करते दरभंगा के एक विद्वान कहते हैं कि ‘पाग मिथिला का एक सम्मान है। मिथिला के प्रत्येक लोगों की इज्जत है। मिथिला का एक-एक बच्चा पाग के सांस्कृतिक गरिमा को पहले समझता था। पाग के रंगों की महत्ता को समझता था। वह यह भी समझता था कि किस रंग का पाग किस अवसर पर कौन पहनता है। पाग किसे पहनाया जाए । पाग पहनाने का शाब्दिक अर्थ और वास्तविक अर्थ क्या है। परन्तु, तकलीफ इस बात कि है कि मिथिला में अब पाग की राजनीति होती है और उस राजनीति में मिथिला का पाग धरल्ले से इस्तेमाल होता है। ऐसा लगता है कि राजनीति के नशे में लोग इतना धुत्त हो गए हैं कि अपनी ही आवरू, संस्कृति, गरिमा को अपने लाभ के लिए राजनीतिक चौराहे पर बेच रहे हैं।”

इतना ही नहीं, मैथिली और मिथिला के ‘विकास’ से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात विगत दिनों संगठन द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया। जबकि आज़ादी के 78 वर्ष बाद आज भी मिथिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी से आगे बढ़ने पर कुथ रहा है।

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अगर उक्त संगठन के उक्त ‘प्रेस विज्ञप्ति’ के मद्दे नजर मिथिला की शैक्षिक दर को देखें – जो माथे के विस्तार का सूचक हो सकता है और बड़े आकार के पाग की जरुरत हो सकती है – तो बिहार का औसत शैक्षिक दर 63.82 फीसदी है जिसमें मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55.18 से अधिक नहीं हैं। प्रदेश में सबसे अधिक शैक्षिक दर भोजपुरी क्षेत्र में है जहाँ औसतन शैक्षिक दर 66.19 फीसदी है। भोजपुरी क्षेत्र में रोहतास क्षेत्र में शैक्षिक दर 73.37 फीसदी है। इतना ही नहीं, मगध क्षेत्र में शैक्षिक दर मिथिला की तुलना में 9 फीसदी अधिक है, यानी 64.92 फीसदी है।

कल के ‘करवाचौथ’ का दृष्टान्त देते महाशय कहते हैं कि “मिथिला में तो करवा चौथ नहीं होता है। वहां की महिलाएं अपने पति के लिए मधुश्रावणी पूजा करती हैं। लेकिन अब देखादेखी में मिथिला के प्रस्तावित मिथिला राज्य निर्माण के सभी 24 जिलों, मसलन अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका के अलावे पटना के कंकड़बाग, शिवपुरी, लोहानीपुर, कदमकुआं और अन्य इलाकों सहित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अनेकानेक क्षेत्रों में, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और अन्य प्रांतों में मिथिला की महिलाएं अब करवा चौथ करती हैं।”

वे यह भी कहते हैं कि “अब अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिथिला क्षेत्र के करीब 120 विधानसभा और 12 से अधिक लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा करने के लिए मैथिली और संस्कृत में भारत का संविधान छाप दिए तो क्या गलत किये? क्या समझे – सब राजनीति है। मिथिला के कितने लोग मैथिली और संस्कृत में संविधान को पढ़कर अपने अधिकार-कर्तव्य का बोध करेंगे? यह भी आने वाले दिनों में शोध का विषय होगा।”

बहरहाल, आज़ादी के बाद, या यूँ कहें कि महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु तक मिथिला की संस्कृति जितनी मजबूत और सुरक्षित थी, आज नहीं है। यानि. अक्टूबर 1962 के बाद मिथिलांचल में मिथिला की संस्कृति को संरक्षित रखने वाला नहीं रहा। आज भले हम मिथिला लोक-चित्रकला को विश्व में प्रचार-प्रसार के माध्यम से फैलाएं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मिथिला लोक चित्रकला के कलाकार आज मृत प्राय हो गया है। समाज, सरकार अथवा मिथिलांचल के जिला प्रमुखों से इस ऐतिहासिक लोक चित्रकला को उतना संरक्षण नहीं मिलता है जितने का वह हकदार हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है की मिथिलाञ्चल के लोग, विशेषकर पुरुष समुदाय, न केवल “पाग के वास्तविक महत्व” से अपरिचित हैं, बल्कि उसका सम्मान भी नहीं कर पाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इस पाग को “सब धन बाईस पसेरी” जैसा सबों के माथे पर सजाकर फोटो-सेशन नहीं करते, सोसल मीडिया पर या भारत की सड़कों पर “पाग का राजनीतिकरण नहीं होने देते, नहीं करते।”

देवशंकर नवीन का कहना है कि “इसके अतिरिक्त, क्या सर्वजन मैथिलों ने आम सहमति से अपने पारंपरिक प्रतीक ‘पाग’ के स्वरूप में यह फेरबदल स्वीकार कर लिया? अब तक पाग पर किसी तरह की चित्रकारी की मान्यता नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाजार की चमक-दमक ने मैथिलों के सांस्कृतिक संकेत पर अपना कब्जा बना लिया! दूसरा सवाल पाग की पारंपरिक मान्यता को लेकर है। बचपन से देखता आ रहा हूं कि अनेक शहरों में मैथिल जनता अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए महाकवि विद्यापति की बरसी मनाती है। उन आयोजनों में आमंत्रित विशिष्ट जनों का पाग-दोपटा से सम्मान करते और अपने सांस्कृतिक उत्कर्ष का दावा करते हुए मैथिल आत्ममुग्ध होते हैं। गीत, कविता, चुटकुला, नाच-नौटंकी सब आयोजित करते हैं। आयोजन का नाम रहता है ‘विद्यापति स्मृति पर्व’, पर विद्यापति वहां सिरे से गायब रहते हैं। आयोजन का लक्ष्य शायद ही कहीं साहित्य और संस्कृति का उत्थान या अनुरक्षण रहता हो!”

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चलिए, फिर चुनाव, चिल्लम, चरस, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम की भूसी जैसी मादक पदार्थों की ओर चलते हैं जो बिहार के सभी 38 जिलों, 8406 पंचायतों, 534 ब्लॉकों और 45103 गावों को अपने गिरफ्त में कास लिया है। बिहार में अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। हालाँकि, ब्रांडेड शराब राज्य में हर जगह 30 मिनट के भीतर उपलब्ध है। सभी ब्रांड पड़ोसी देशों नेपाल, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और झारखंड से तस्करी करके लाए जाते हैं। वैसे प्रशासन के अधिकारी शराबबंदी और मादक पदार्थ इकाइयों के कार्यक्षेत्र को मिलाकर एक राज्यव्यापी टास्क फोर्स बना दिया है। सरकार यह भी कही कि अवैध व्यापार और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ समन्वित कार्रवाई के लिए जल्द ही थाने स्थापित किए जाएँगे।

पूरा प्रदेश सूखा नशा के गिरफ्त में है। लाखो लोग ऐसे हैं जिन्हें उन ड्रग्स का नाम भी मालूम नहीं है, लेकिन उसका सेवन कर रहे हैं। यह एक सामानांतर अर्थव्यवस्था चला रहा है। यह नशा गाँवों, देहातों, कस्बों और शहरों में युवाओं, खासकर किशोरों, कॉलेज के छात्रों और दिहाड़ी मज़दूरों के बीच गहराई तक पैठ बना चुका है। घरेलू हिंसा में वृद्धि हुई है, जो बिहार जैसे राज्यों में पहले कभी नहीं देखी गई थी और यह सब इसी तरह की लत के कारण है। बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई के आंकड़ों के अनुसार इन 9 वर्षों में नशीली दवाओं से संबंधित मामलों में लगभग चार गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) के उप महानिरीक्षक मानवजीत ढिल्लों को उद्धृत करने इंडियन एक्सप्रेस ने भी लिखा था कि “शराबबंदी के बाद से, हमने ग्रामीण इलाकों में गांजे और शहरी इलाकों में स्मैक की खपत में वृद्धि दर्ज की गई है। शहरी इलाकों में युवा मेथ, ब्राउन शुगर और कफ सिरप (इनमें कोडीन होता है, जो एक ओपिओइड है) जैसे सिंथेटिक नशीले पदार्थों का प्रयोग तेज़ी से कर रहे हैं।” सिंथेटिक ड्रग्स लैब में गांजा और अफीम से तैयार किए जाते हैं। वस्तुत: प्राकृतिक नशीले पदार्थों से लैब में नशीले पदार्थ तैयार किए जाते हैं जिसे सिंथेटिक ड्रग्स कहा जाता है। यह प्राकृतिक नशा के मुकाबले कई गुणा ज्यादा शक्तिशाली होते हैं। सिंथेटिक ओपियोइड्स का इस्तेमाल दर्द कम करने या मरीजों को सर्जरी से पहले बेहोश करने के लिए किया जाता है। लेकिन इसके ज्यादा इस्तेमाल से किसी मौत भी हो सकती है। एक आंकड़े के अनुसार, अमेरिका में 18 से 45 वर्ष के युवाओं की मौत का एक सबसे बड़ा कारण सिंथेटिक ड्रग्स का अंधाधुंध इस्तेमाल है।

पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टरों ने पिछले छह-सात वर्षों में नशीली दवाओं, नींद की गोलियों, दर्द निवारक दवाओं और अन्य कृत्रिम पदार्थों के आदी हो चुके लोगों की संख्या में वृद्धि की पुष्टि की है। उनका कहना है कि पिछले छह-सात सालों में हर महीने कम से कम 200 ऐसे मरीज़ों का इलाज किया गया है। इनमें से ज़्यादातर मरीज़ हेरोइन, ब्राउन शुगर, गांजा, स्मैक, डोडा आदि जैसे नशीले पदार्थों या इनहेलेंट (गोंद, व्हाइटनर, बोनफिक्स चिपकने वाले पदार्थ आदि) के आदी हो चुके हैं।

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