मुजफ्फरपुर / पटना : उस दिन तुमलुक से आती सड़क. जो आगे पश्चिम मिदनापुर मुख्य शहर से मिलती है, दाहिने हाथ एक पोखर के किनारे खड़ा था। मेरे साथ मेरी शिक्षिका पत्नी श्रीमती नीना झा और पुत्र आकाश झा थे। पिता-पुत्र कंधे पर कैमरा लटकाये चतुर्दिक देख रहे थे। दूर-दूर तक सड़क के दोनों तरफ पेड़-पौधे और खेत नजर आ रहे थे। खेत में पानी का जमाव था। मिदनापुर जिला में चाहे पूर्वी हो या पश्चिमी, धान (चावल) की खेती मुख्य रूप से होती है। इसके अलावे ईख, आलू, दाल, सब्जियां और कपास की भी खेती होती है।
यह इलाका समुद्र के किनारे का इलाका है। समुद्र बहुत दूर नहीं है यहाँ से। यहाँ की मिट्टी दिल्ली के लाल किला के रंग का बलुआहा लाल होती है। सड़क के किनारे लाल मिट्टी को हाथ में लेकर अनुभव कर रहे थे कि दशकों पहले इस शहर में जन्म लिए क्रांतिकारियों के खून का रंग लाल होना भी स्वाभाविक था। जहाँ की मिट्टी लाल हो, क्रांति की बुनियाद तो वहीँ पड़ेगी। तमलुक और मिदनापुर तो क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है। यह पूरा इलाका भारत का एक ऐसा इलाका था उन दिनों जहाँ दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों क्रांतिकारी अपने-अपने माँ की कोख से जन्म लेकर मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दिए।
आश्चर्य तो तब हुआ जब एक नब्बे वर्षीय वृद्ध, जो एक क्रांतिकारी का पौत्र थे, कहते हैं “সেই বিপ্লবীদের মায়েরা তাদের সন্তানদের নয় মাস ধরে তাদের গর্ভে রেখেছিলেন শুধুমাত্র মাতৃভূমির জন্য জীবন উৎসর্গ করার জন্য। দেশটি ঠিক সেভাবেই স্বাধীন হয়নি। এটা আলাদা বিষয় যে আজ কেউ সেই বিপ্লবীদের, তাদের পরিবার এবং আত্মীয়স্বজনদের চেনে না বা চিনতে পারে না এবং তাদের নামে রাজনীতি করা হচ্ছে” (मातृभूमि पर बलिदान देने के लिए ही उन क्रांतिकारियों की माँ अपने बच्चे को नौ महीने कोख में रखी। देश यूँ ही नहीं आज़ाद हुआ है। यह अलग बात है कि आज उन क्रांतिकारियों, उनके परिवार और परिजनों को कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं और उनके नाम पर राजनीति में व्यापार हो रहा है।)

सड़क के किनारे जहाँ खड़ा था, मेरे पीछे से अधकच्ची सड़क जा रही थी, जो मूलतः उस तालब का ऊपरी हिस्सा (महार) था। इस अधकच्ची सड़क के बाएं हाथ दर्जनों फुस के घर थे। उन घरों को देखकर प्रतीत हो रहा था कि यहाँ श्रमिक रहते हैं जिन्हें अपनी मजदूरी पर नाज है। यही कारण है कि घर के बाहर बरामदे पर मिट्टी के चूल्हे का रंग अग्नि की ज्वाला के कारण काला हो गया था। आसपास का वातावरण भी गर्म ही था। शायद खाना बनाकर, लेकर वे सभी अपनी मजदूरी पर शहर की ओर प्रस्थान कर गए थे। यदा-कदा तमलुक और मिदनीपुर को जोड़ने वाली सड़क पर दो पहिया वाहन, साईकिल, स्कूटर, कभी मोटर आ जा रही थी।
मेरे सामने चहारदीवारी से घिरा, जिसमें पाम ट्री, फूल आदि के अनेकानेक पौधे लगे थे, हरा-भरा दिख रहा था। अंदर बाएं हाथ कोने पर एक छोटा सा मकान भी था। इस मकान में एक कमरा इस परिसर को देख-रेख करने वाले के लिए था और दूसरा कमरा ‘ऐतिहासिक’ था। यहाँ दरवाजे पर एक सूचना लिखा था और दरवाजे में ताला बंद था। पूरा क्षेत्र एक बेहतरीन पार्क में तब्दील था। यह कमरा इसलिए ऐतिहासिक इसलिए था कि यहीं जन्म हुआ था खुदीराम बोस का।
स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों और शहीदों के वंशजों की खोज से सम्बंधित प्रयास के क्रम में हम तीनों उस तालाब के किनारे वाले घर पर पहुँचे जहाँ खुदीराम बोस का जन्म हुआ था, उस स्थान को देखकर ख़ुशी हुई – आज भी वह कमरा सुरक्षित दिखा। कमरे के बाहर लिखा दिखा – खुदीराम बोस का जन्म स्थान। परिसर का देखरेख मिदनापुर प्रशासन के द्वारा होता है।
इस पार्क में प्रवेश द्वार से दस कदम पहले फुस का घर आज भी विराजमान है । आँख मूंदकर सोचा उस ज़माने में जब खुदीराम बोस का जन्म हुआ होगा, शायद पहली किलकारी इस घर में रहने वाले लोग जरूर सुने होंगे। प्रवेश द्वार के पास ही बाएं हाथ जिला प्रशासन का अतिथि गृह भी देखा। स्थानीय लोग कहे भी इस अतिथि गृह में कलकत्ता से नेता, अधिकारी आदते हैं, विश्राम करने के लिए। परिवार वाले लगभग सभी लोग खुदीराम बोस का जन्मस्थान के साथ साथ उनके गुरुदेव का घर, उस घर में रहने वाले आज की पीढ़ियों से भी मिलते हैं। खैर।

बहरहाल, अगले सितम्बर महीने में 17 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष पूरा करेंगे। विगत 25 जुलाई को पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए लगातार सबसे लंबे समय तक भारत के प्रधानमंत्री रहने वाले दूसरे सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री में अपना हस्ताक्षर कर दिए। 25 जुलाई, 2025 को उनका लगातार 4,078 दिन का कार्यकाल पूरा हो गया । इंदिरा गांधी 24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक 4,077 दिनों तक लगातार प्रधानमंत्री रहीं। 1980 में वे फिर से निर्वाचित हुईं और 1984 में अपने निधन तक इस पद पर रहीं। इससे पूर्व नरेंद्र मोदी 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन थे।
लेकिन विगत 25 वर्षों में – मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यकाल – में कभी बिहार में मुजफ्फरपुर के बारे में, खासकर जंगे आज़ादी में मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग करने वाले उस क्रांतिकारी के बारे में उनके मुख से नहीं सुना था। या फिर 50-वर्ष अखबारी दुनिया में रहते कभी अख़बारों के पन्नों पर, चाहे बिहार से प्रकाशित होता हो या दिल्ली या फिर अन्य राज्यों से; मुजफ्फरपुर के बारे में कोई प्रकाशन नहीं देखा, पढ़ा। लेकिन अकस्मात् मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) में जन्म लिए, अपने गुरुदेव सत्येन्द्रनाथ मुखर्जी के सानिग्ध में देशभक्ति की शिक्षा प्राप्त करने वाले खुदीराम बोस के बहाने 117 साल पहले का वह दृश्य अपने 124वें ‘मन की बात’ में जिस कदर उद्घोषित किये – सुनकर लगा ‘बिहार में विधानसभा का चुनाव’ आने वाला है।
आश्चर्य तो तब लगा जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो बिहार के ही हैं, मुख्यमंत्री कार्यालय में रिकॉर्ड बनाए हैं, शिक्षण में प्रधानमंत्री से तनिक अधिक ही हैं; लेकिन अपने कार्यकाल में कभी उस सुबह के दृश्य की कल्पना भी शायद नहीं किये होंगे, जब खुदीराम बोस को फांसी दिया गया था।
खुदीराम बोस पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में 3 दिसंबर, साल 1889 में जन्में थे। उनके पिता का नाम त्रैलोक्य नाथ बोस था, और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया था। बचपन में ही खुदीराम बोस के सिर से मां-बाप का साया उठ गया था, जिसके बाद बड़ी बहन ने उनकी परवरिश की थी। आज भी उनकी बहन का घर खुदीराम बोस के नाम से अंकित नाट्यशाला के पास सुरक्षित है।
खुदीराम ने अपनी शुरुआती पढ़ाई हेमिल्टन हाईस्कूल से की थी। खुदीराम बोस के मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना थी, इसलिए उन्होंने स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरु कर दिया था। साथ ही वे उस दौरान ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में शामिल होने लगे थे। इसके साथ ही उस दौरान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए गए अत्याचारों और जुर्म को देखकर उनके मन में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इतनी नफरत पैदा हो गई थी कि उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद करवाने की ठान और अपनी पढ़ाई छोड़ वे देश के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

साल 1905 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बंगाल विभाजन के विरोध में चल रहे आंदोलन में खुदीराम बोस ने अपना पूरा समर्थन दिया और इसके बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह स्वाधीनता आंदोलन में समर्पित कर दिया और फिर आजादी की इस लड़ाई के सबसे शक्तिशाली और युवा क्रांतिकारी के रूप में उभर कर सामने आए एवं उस समय देश के कई युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने। इसके बाद वे पहले रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हुए। वे क्रांतिकारी सत्येन्द्रनाथ बोस के शिष्य थे।
साल 1906 में जब खुदरीम बोस अंग्रेजों द्धारा बैन मैग्जीन “सोनार बांग्ला” बांट रहे थे, तब उन्हें ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया, हालांकि उस समय खुदीराम अंग्रेज अधिकारी को घायल करके भागने में कामयाब हो गए। इस घटना के बाद साल 1907 में उन्होंने पुलिस स्टेशनों के पास बम ब्लास्ट किए, डाकघरों को लूटा, अंग्रेज अफसरों पर हमला किए और तमाम अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। जिसके बाद उन पर राजद्रोह का केस चल गया, लेकिन नाबालिग होने की वजह से उन्हें बाद में छोड़ दिया गया।
कलकत्ता में उन दिनों चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के पद पर किंग्सफोर्ड था, जो कि बेहद सख्त और क्रूर अधिकारी था एवं भारतीय क्रांतिकारियों के खिलाफ अपने सख्त फैसलों के लिए जाना जाता था। उसके अत्याचारों से त्रस्त आकर युगांतर दल के नेता वीरेन्द्र कुमार घोष ने किंग्सफोर्ड को मारने की साजिश रखी और इसके लिए उन्होंने खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी को चुना। जिसके बाद वे दोनों इस काम को अंजाम देने के मकसद से मुजफ्फरपुर पहुंच गए और किंग्सफोर्ड की दैनिक गतिविधियों पर नजर रखने लगे।
30 अप्रैल 1908 में, खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने जब रात के अंधेरे में किंग्सफोर्ड जैसी एक बग्घी सामने से आती हुई देखी तो उस पर बम फेंक दिया लेकिन दुर्भाग्य से इस घटना में किंग्सफोर्ड की पत्नी और बेटी मारी गईं, लेकिन खुदीराम और उनके साथी उस समय यह समझ लिया कि वे किंग्सफोर्ड को मारने में सफल हो गए, इसलिए आनन-फानन में वे दोनों क्रांतिकारी घटनास्थल से भाग निकले। इस घटना के बाद खुदीराम के साथी प्रफुल्ल चाकी ने ब्रिटिश अधिकारियों द्धारा घेर लिए गए, जिसे देख उन्होंने खुद को गोली मारकर अपनी शहदात दे दी, इसके बाद खुदीराम को ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया, और हत्या का केस दर्ज किया गया।

गिरफ्तारी के बाद भी खुदीराम बोस अंग्रेज अफसरों से डरे नहीं, बल्कि उन्होंने किंग्सफोर्ड को हत्या का प्रयास करने का अपना अपराध कबूल कर लिया। जिसके चलते इस युवा क्रांतिकारी को 13 जुलाई, साल 1908 में कोर्ट द्वारा फांसी की सजा का ऐलान किया गया और फिर, 11 अगस्त, 1908 को इस निर्भीक क्रांतिकारी को फांसी के फंदे से लटका दिया गया। खैर।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 124 वें संस्करण में कहा: “मेरे प्यारे देशवासियों, आप कल्पना कीजिए, बिल्कुल भोर का वक्त, बिहार का मुजफ्फरपुर शहर, तारीख है, 11 अगस्त 1908 हर गली, हर चौराहा, हर हलचल उस समय जैसे थमी हुई थी। लोगों की आँखों में आँसू थे, लेकिन दिलों में ज्वाला थी। लोगों ने जेल को घेर रखा था, जहां एक 18 साल का युवक, अंग्रेजों के खिलाफ अपना देश-प्रेम व्यक्त करने की कीमत चुका रहा था। जेल के अंदर, अंग्रेज अफसर,एक युवा को फांसी देने की तैयारी कर रहे थे। उस युवा के चेहरे पर भय नहीं था, बल्कि गर्व से भरा हुआ था। वो गर्व, जो देश के लिए मर-मिटने वालों को होता है। वो वीर, वो साहसी युवा थे, खुदीराम बोस। सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्होंने वो साहस दिखाया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। तब अखबारों ने भी लिखा था –“खुदीराम बोस जब फांसी के फंदे की ओर बढ़े, तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी”। ऐसे ही अनगिनत बलिदानों के बाद, सदियों की तपस्या के बाद, हमें आज़ादी मिली थी। देश के दीवानों ने अपने रक्त से आजादी के आंदोलन को सींचा था।”
प्रधानमंत्री ने कहा कि अगस्त का महीना इसलिए तो क्रांति का महीना है।अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि होती है। इसी महीने, 8 अगस्त को गाँधी जी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी। फिर आता है 15 अगस्त, हमारा स्वतंत्रता दिवस, हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, उनसे प्रेरणा पाते हैं।
बहरहाल, सन 1957, 1962 1967, 1971 और 1984 को छोड़कर मुजफ्फरपुर लोक सभा सीट हमेशा प्रजा सोसलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, जनता दाल, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी का ही रहा है। श्याम नांदल सहाय, अशोक मेहता, दिग्विजय नारायण सिंह, नवल किशोर सिन्हा, जॉर्ज फर्नांडिस, जय नारायण प्रसाद निषाद, अजय निषाद और राज भूषण चौधरी को शायद खुदीराम बोस नहीं याद आये।

सांसदों की बात अगर तनिक देर के लिए छोड़ भी दें तो गायघाट, औराई, मीनापुर, बोचहां, सकरा, कुढ़नी, काँटी, बरुराज, पारू और मुजफ्फरपुर के आसपास के विधानसभा क्षेत्रों से सन 1952 चुनाव के बाद अगर सम्मानित विधायक लोग कभी खुदीराम बोस के त्याग के बारे में सोचे होते, कभी यह सोचे होते की एक 18 वर्ष के युवा को, जिसकी माँ बचपन में ही मृत्यु को प्राप्त की, बड़ी बहन पाल-पास कर बड़ा की; लेकिन 18 वर्ष की आयु में वह ऐसा कार्य कर गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसके फांसी लगने के 117 वर्ष बाद उस घटना को ह्रदय विदारक बनाकर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए हथकंडा बनाये। लेकिन बिहार के मुजफ्फरपुर में जहाँ खुदीराम बोस को फांसी पर लटकाया गया था, उसके इर्द गिर्द कुछ वर्ष पहले तक मुर्गा, मछली की दुकानें थी। शराब की भी दूकान होती थी। चतुर्दिक बियर की बोतलें फेंकी होती थी। आज नितीश कुमार के राज्य में शराबबंदी होने से संभव है उन दुकानों का भी अस्तित्व समाप्त हो गया हो। खैर।
वैसे आधुनिक भारत का इतिहास के ज्ञाता ‘तर्क-वितर्क’ भले करें, जातिवाद-सम्प्रदायवाद की राजनितिक अखाड़े में कुस्ती लड़ते रहें अपने-अपने हितों के लिए। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत में रेलवे की शुरुआत के दो दशक बाद, जिस समय दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह सन 1874 में उत्तर बिहार में तिरहुत रेलवे के रूप में निजी रेल सेवा की शुरुआत किये थे, उसी कालखंड में हाजीपुर-मुजफ्फरपुर रेल खंड के धरहरा गांव का एक बीस-वर्षीय बालक समस्तीपुर-दरभंगा रेल लाइन की पटरियों के बगल में टेलीफोन लाइन जोड़ने का काम शुरू किया था। कार्य सीखने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्तर बिहार का वह गरीब बालक ब्रितानिया सरकार के तत्कालीन अभियंता जेम्स विल्सन को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन दिनों उत्तर बिहार में भीषण अकाल पड़ा था।
तिरहुत सरकार के द्वारा एक ओर जहाँ पूरे उत्तर बिहार में रेल लाइन की जाल बिछाई जाने लगी थी, ताकि सरकार-पदाधिकारियों, राजनेताओं, राजा-महाराजों, धनाढ्यों, समाज के संभ्रांतों के साथ-साथ आम नागरिकों को सुविधा उपलब्ध हो सके, वहीँ धरहरा गाँव के उस बालक जी जीवन-रेखा भी रेल की पटरियों की तरह चिकनी होती गयी। तत्कालीन समाज के लोग शायद इस बात से अनभिज्ञ थे कि रेल लाइन के बगल में टेलीफोन का तार खींचने वाला वह नवयुवक आने वाले दिनों में उत्तर बिहार के शैक्षिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनेगा, जहाँ भारत के श्रेष्टतम अध्यापक-प्राध्यापक विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करेंगे एक नए राष्ट्र के निर्माण के लिए । नाम था – लंगट सिंह।
बिहार की शैक्षिक व्यवस्था को स्वस्थ रखने के लिए, विकास करने में अगर दरभंगा के महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह अथवा उनके पूर्वजों का योगदान अपने उत्कर्ष पर है (उसके बाद क्या हुआ यह तो दरभंगा और मिथिला के लोग अधिक जानते हैं); तो हमें इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना होगा की बाबू लंगट सिंह और भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय के लोगों की क्या भूमिका थी। हम इस बात पर कतई पर्दा नहीं डाल सकते हैं कि बाबू लंगट सिंह और तत्कालीन समाज के अन्य भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय के लोगों के कारण बिहार का मुजफ्फरपुर-वैशाली-हाजीपुर का इलाका ‘सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का क्षेत्र है,’ ‘अध्यात्म का इलाका’ है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज मुजफ्फरपुर के लोग क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ला के भतीजे ‘बैकुंठ शुक्ला’ को नहीं जानते और ‘छोटन शुक्ला’ का पोस्टर गली-मोहल्ले-सड़कों पर टांग रहे हैं। वैकुण्ठ शुक्ला को फणीन्द्रनाथ घोष को मारने के जुर्म में फांसी दी गयी थी। फणीन्द्रनाथ घोष तत्कालीन अंग्रेजी सरकार के ‘अप्रूवर’ बन गए थे जो अंततः भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटकाया। वैकुण्ठ शुक्ला तो उस समय के जलालपुर गाँव, जो उस समय मुजफ्फरपुर में था, आज हाजीपुर में है। वे एक मास्टर भी थे और हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्न्लिकन आर्मी के सदस्य भी। वे नमक सत्याग्रह का एक अहम् हिस्सा भी थे। आज महात्मा गांधी की चम्पारण यात्रा वाले राजकुमार शुक्ला को सभी जानते, लेकिन जलालपुर गाँव का वह शिक्षक जो फांसी पर लटका, कोई नहीं जानता। यह दुखद है। यह सामाजिक अवनति का एक अहम् हिस्सा है। यह विध्वंस मानसिकता का परिचायक है।
बाबू दिग्विजय नारायण सिंह लगभग तीन दशक तक भारतीय संसद के निचले सदन में मुजफ्फरपुर, पुपरी, हाजीपुर, वैशाली का प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे। लेकिन तत्कालीन जनता पार्टी (सोशलिस्ट) नेता जॉर्ज फर्नांडिस का शिकार हो गए और महज 6000 मतों से सं 1980 के आम चुनाव में हार गए। सं 1980 तक मुजफ्फरपुर ही नहीं, देश के सभी विधान सभा, लोक सभा संसदीय क्षेत्रों के मतदाताओं का मानसिक स्वरुप में बदलना प्रारम्भ हो गया था। यह अलग बात थी कि जिस समय बाबू दिग्विजय नारायण सिंह के दादाजी का देहांत हुआ था (1912), भारत में एक अमेरिकन डालर की कीमत 0.09 थी। लेकिन जिस समय बाबू दिग्विजय सिंह चुनाव हारे थे, लोगों की मानसिकता क्या, अमेरिकन डॉलर की तुलना में भारतीय रुपयों की कीमत भी काफी लुढ़क गई थी और एक अमेरिकन डालर के बदले 7.86 भारतीय रुपये देने होते थे। आज की स्थिति तो पूछें ही नहीं। बड़े-बड़े समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, गणितज्ञ ज्ञान अर्जित करने के लिए भारतीय चौराहों पर बैठे हैं और समाज के चापलूस-चाटुकार सोने के सिक्के निगल रहे हैं, बिना डकारे। खैर।
दिग्विजय नारायण सिंह सन 1952 से 1980 तक 28 लगातार वर्ष सांसद रहे। वे सन 1952 से 1957 (मुजफ्फरपुर), 1957-1962 पुपरी, 1962-1971 मुजफ्फरपुर, 1971-1977 हाजीपुर और 1977-1980 वैशाली लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किये थे। लेकिन जिस जॉर्ज फर्नांडिस को आपातकाल के बाद दिग्विजय नारायण सिंह ने बिहार की राजनीति में मार्ग दर्शन किये, सं 1980 के आम चुनाव में मुजफ्फरपुर में उन्ही के विरुद्ध खड़े होकर 6000 मतों से शिकस्त दे दिया।उस समय के राजनीतिक समीक्षक आज भी इसे ‘विश्वासघात’ मानते हैं। सं 1980 चुनाव की ‘हार’ उन्हें अंदर से झकझोड़ दिया। जिस व्यक्ति ने, जिसके पिता, पितामह और परिवार के अन्य सदस्य मुजफ्फरपुर ही नही, बल्कि गंगा के उस पार के इलाके में शिक्षा के माध्यम से एक क्रांति लाये थे, वह व्यक्ति ही उस क्रांति का शिकार हो गया। परिणाम यह हुआ कि बाबू दिग्विजय नारायण सिंह राजनीति से संन्यास ले लिए और सं 1980 आम चुनाव के 11-वर्ष होते-होते अपनी अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकल गए।
















