बहनों और भाइयों ………🎤🎧🎼🎹 जन्म दिन मुबारक हो 🎤🎧🎼🎹

अमीन सयानी

नई दिल्ली : उन दिनों अमूमन अखबारों के दफ्तर में देर शाम फोन की घंटी बजती थी (तब मोबाइल नहीं जन्मा था), तो अंदेशा होता था कि “कुछ तो हुआ होगा।” मसलन ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु (तड़के तीन बजे), जान कैनेडी की हत्या (आधी रात), याहया खान द्वारा भारतीय वायुसेना स्थलों पर बांग्लादेश युद्ध पर प्रथम रातवाला हवाई हमला, इत्यादि। उस रात (दिसम्बर, 1966) में मुंबई “टाइम्स ऑफ इंडिया” दफ्तर में अचानक फोन की घंटी बजी। तीसरी मंजिल के रिपोर्टर कक्ष में बैठा, मैंने फोन उठाया। कोई पूछ रहा था : “सिटी डायरी” के लिए फलां कार्यक्रम भेजा था, छाप दीजिएगा।” खोजकर मैने उन्हे बताया कि आइटम दे दिया है।

उधर से वह व्यक्ति अपना नाम बताने ही वाला था कि बीच में मैंने टोका। कह दिया : “आपको कौन नहीं पहचानता ? आपकी आवाज ही आपकी पहचान है” ! वे थे अमीन सयानी। कल (22 दिसंबर 2022) उनका 90वां जन्मदिन है। उनकी दिलकश वाणी सुनकर ही मेरी स्कूली पीढ़ी वयस्क हुई थी। तभी रेडियो सीलोन पर बिनाका गीतमाला शुरू हो गई थी। बुधवार की शाम हुई कि आठ बजते बजते रेडियो से सभी कान सटाकर बैठते थे। हिंदुस्तान ठहर जाता था।

“बहनों और भाइयों,”………… “अमीन सयानी……।”

उनकी उद्घोषणा का अंदाज भी निराला था। मानो श्रोता के सामने बैठकर संवाद कर रहे हों। बीन बजा रहे हों ! उस दौर में फिल्मी गीतों की लोकप्रियता भी खूब थी। कारण था कि नवस्वतंत्र भारत सरकार की रेडियो नीति। सूचना और प्रसारण मंत्री थे उत्तर प्रदेश में बसे मराठी विप्र डॉ बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर जो शास्त्रीय संगीत को ही सब कुछ मानते थे। फिल्म संगीत को वे अपसंस्कृति समझते थे, बाजारू ! वह पूर्णतया प्रतिबंधित था रेडियो पर। डा. केसकर दस वर्ष नेहरू सरकार के सूचना मंत्री रहे। आलमगीर औरंगजेब से वे थोड़ा ही बेहतर थे। इस मुगल बादशाह ने तो संगीत कला को ही दफना दिया था। उनके मजहब की प्रथा के अनुसार। मगर डॉ केसकर शास्त्रीय संगीत के पक्षकार तथा कट्टर प्रचारक रहे। उनके मददगारों में ठा. जयदेव सिंह, श्रीमती वाणीबाई राम जैसे अफसर थे। मंत्रीजी की दृढ़ मान्यता थी कि फिल्मी गानों से जनरुचि ओछी, हरजाई टाइप होती है। नतीजा वही हुआ। जिसे जितना दबाया जाता है वह उतना ही उछलता है, रबड़ की गेंद की मानिन्द। फिल्मी म्यूजिक भी।

ये भी पढ़े   'तिरंगे के रचयिता को ही तिरंगा नसीब न हुआ', इसलिए 'घर-घर तिरंगा' - रचयिता सम्मानार्थ, देश में 680 करोड़ रुपये का व्यवसाय है प्लास्टिक से बना तिरंगा

अतः लाजमी है कि रेडियो सीलोन का फिल्मी प्रोग्राम अपार सफलता पा गया। प्रारंभ हुआ 3 दिसंबर 1952 को, सात गानों की सीरीज का पहला शो रिले किया गया था। काफी कामयाब रहा। एक साल के भीतर अमीन सयानी के कोलाबा ऑफिस में हर हफ्ते 65,000 चिट्टियां आने लगीं। बाद में इस शो में गानों की संख्या सात से बढ़कर 16 हो गई। बुधवार को प्रसारित होने वाले इस शो के लिए पिछले शनिवार को ही रिकॉर्डिंग की जाती थी। सन 1952 में आई हिंदी फिल्म “आसमान” का गाना “पोम पोम बाजा बोले” काफी मशहूर हुआ। इसे ओपी नय्यर द्वारा ट्यून किया गया है। ये “जिंगल बेल, जिंगल बेल” पर आधारित है। गीत माला की यही सिग्नेचर ट्यून थी।

पायदानों पर गीत का स्थान तय कौन करें ? इसकी पद्धति निर्धारित थी। शो में कौन से गाने जाने चाहिए ? इसके लिए देशभर के प्रमुख रिकॉर्ड डीलरों से रिपोर्ट मांगी जाती थी। पहले दो दशकों तक नौशाद अली, सी. रामचंद्र, हेमंत कुमार, रोशन और मदन मोहन साप्ताहिक हिट परेड में प्रमुखता से शामिल रहे। वहीं 1960 के दशक में शंकर-जयकिशन, ओपी नय्यर और एसडी बर्मन आए। फिर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी और आरडी बर्मन ने उनकी जगह ले ली। प्रसिद्ध लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जोड़ी के प्यारेलाल ने कहा : “मैं और लक्ष्मीभाई दोनों बिनाका गीतमाला के प्रबल प्रशंसक थे। मुंबई के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में जूनियर संगीतकार के रूप में संघर्ष करते हुए, हमने एक दिन का सपना देखा था जब हमारे गीत गीत माला चार्ट-बस्टर होंगे।”

यूं पहले दिन से ही विज्ञापनों के मार्फत रेडियो सीलोन पर धन बरसना शुरू हो गया था। उसके पूर्व तक अमीन सयानी का साप्ताहिक परिश्रमिक केवल 25 रूपये थे। उस वक्त आठ आने सेर शक्कर बिकती थी। चावल एक रुपये सेर। उन्होने वह भी जमाना देखा जब वे आकाशवाणी के हिन्दी प्रभाग के लिए ऑडिशन देने गए थे। उनसे कहा गया कि उनके उच्चारण में अंग्रेजी और गुजराती का आभास आता है। मगर वे हतोत्साहित नहीं हुये। उन्होने कई विदेशी रेडियों कार्यक्रमों के लिए भी अपनी आवाज दी है। वह अब तक बढ़ते गये वो 50 हजार से ज्यादा कार्यक्रमों और करीब 20 हजार जिंगल कर चुके है। सन 1992 में उन्हे लिमका बुक ऑफ रिकॉर्ड ने “पर्सन ऑफ द ईयर” के खिताब से उन्हे नवाजा गया। उन्हे पद्मश्री से 2009 में सम्मानित किया गया। रेडियो का पर्याय वे बन गये थे। भाग्य देखिये कभी वे गायक बनना चाहते थे, लेकिन बाद में जाने-माने ब्रॉडकास्टर हो गए। उनकी मान्यता है कि अच्छी हिन्दी बोलने के लिए थोड़ा-सा उर्दू का ज्ञान भी ज़रूरी है।

ये भी पढ़े   PM: "Time is not far when the children would say 'Chanda Mama ek tour ke' i.e. the moon is only a tour away"

एकदा बॉलीवुड में किस्मत आजमाने से पहले अमिताभ बच्चन रेडियो उद्घोषक बनना चाहते थे। इसके लिए वह ‘ऑल इंडिया रेडियो’ के मुंबई के स्टूडियो में ऑडिशन देने भी गए थे अमीन सयानी के पास। तब अमिताभ से मिलने का समय नहीं था, क्योंकि अभिनेता ने वॉयस ऑडिशन के लिए पहले से समय नहीं लिया था। अमीन सयानी को याद कभी हुआ, कि “जब मैं एक हफ्ते में 20 कार्यक्रम करता था तो हर दिन मेरा अधिकतर समय साउंड स्टूडियो में गुजरता था। मैं रेडियो प्रोग्रामिंग की हर प्रक्रिया में शामिल रहता था।”

सयानी याद करते हैं कि एक दिन अमिताभ बच्चन नाम का एक युवक बिना समय लिए वॉयस ऑडिशन देने आया। मेरे पास उस पतले-दुबले व्यक्ति के लिए बिल्कुल समय नहीं था। उसने इंतजार किया और लौट गया। इसके बाद भी वह कई बार आया, लेकिन मैं उससे नहीं मिल पाया और रिसेप्शनिस्ट के माध्यम से यह कहता रहा कि वह पहले समय ले, फिर आए।”

हालांकि 1970 के दशक में निजी टीवी चैनलों के आने और फिल्मी गीतों की गुणवत्ता में लगातार गिरावट के कारण गीत माला ने अपनी चमक खोनी शुरू कर दी थी। आज जो विविध भारती चमक रही है, उसमें भी अमीन सयानी को ही श्रेय देना चाहिए। आकाशवाणी के संचालक समझ गये कि फिल्मी गीत धनोपार्जन का अजेय स्रोत हैं। उसे परिमार्जित कर चलाया गया। आज वह शीर्ष पर है। उम्र के तकाजे से सयानी साहब पर भी सीमाएं आ गई। पर उन्होंने राष्ट्र के जनजीवन में अपार अमरत्व तो कायम कर ही दिया है। अगला दशक वे पूरा करें। सेंचुरी लगायें। इंशाल्लाह !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here