‘सरकार’ बनाम ‘स्वयंभू सरकार’ (भाग-1) ✍ वह ‘सरकार’ है, ‘कुछ भी’ कर सकती है, ‘राजनगर’ क्या ‘रामबाग’ पर भी आधिपत्य जमा सकती है – इतिहास गवाह है

दरभंगा राज के लोग और राजनगर का अवशेष - दुखद है

दरभंगा / पटना : सरकार ‘सरकार’ होती है। ‘सत्ता’ और ‘कानून’ सरकार को ‘राष्ट्र के हित’ में कोई भी कार्य करने का सर्वाधिकार देता है। आज़ादी के चौथे वर्ष 1951 में भारत के संविधान में पहला संशोधन किया गया था, जिसमें अन्य बातों के अलावे ‘भूमि सुधार’ का मामला प्रमुख था, जो अंततः जमींदारी प्रथा की समाप्ति पर विराम लिया। विगत माह हम जश्ने आज़ादी का 80 वां वर्षगाँठ मनाये है और अब तक देश के संविधान में कुल 106 संशोधन हुए हैं। यानी औसतन प्रतिवर्ष 1.3 का संशोधन अनुपात है – आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। 

अगर सरकार देश को आज़ाद होने के कुछ समय बाद ही, राष्ट्र हित को सामने लाकर स्वतंत्र भारत के सैकड़ों जमींदारों की जमींदारी ‘जब्त’ कर सकती है, बैंकों का ‘राष्ट्रीयकरण’ कर सकती है, निजी क्षेत्र के हज़ारों कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है, बैंको का विलय कर सकती है – तो दरभंगा के संतानहीन महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह (अब दिवंगत) द्वारा अपने अनुज राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह (अब दिवंगत) को कल के दरभंगा और आज के मधुबनी जिला में स्थित राजनगर परिसर पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सकती? इसमें कौन सी बड़ी बात है ?  वह ‘सरकार’ है, कुछ भी कर सकती है – इतिहास गवाह है। 

‘सरकार’ और सरकार में बैठे लोग उन दिनों भी ‘आर्थिक सत्ता के केन्द्रीयकरण के खिलाफ थे,’ आज समय के साथ-साथ सोच में भी आमूल परिवर्तन हुआ है। आज भी नहीं चाहते कि किसी एक व्यक्ति अथवा ट्रस्ट के अधीन कई हज़ार करोड़ की संपत्ति केंद्रित’ रहे – चाहे वह पुस्तैनी धन ही क्यों न हो। स्वाभाविक है मधुबनी के राजनगर परिसर पर सत्ता में बैठे लोगों की नजर टिकेगी ही  – 369 एकड़ जमीन कम नहीं होती और इस जमीन को दरभंगा के वर्तमान “स्वयंभू सरकार” अपनी मेहनत से अर्जित नहीं किए हैं। स्वाभाविक है कुछ नियम भी बनेगा, कुछ नियमों में संशोधन भी होगा और ‘स्वयंभू सरकार’  चापलूसों और चाटुकारों के बीच बैठकर दरभंगा राज की गरिमा की बात, संस्कृति की बात करते रहेंगे – दुखद है।
 

राजनगर का अवशेष – यह मानसिकता का जीवंत दृष्टान्त है

श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर सम्राट चौधरी तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे लोग या फिर मिथिला संसदीय क्षेत्रों –  दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, मधेपुरा, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, कटिहार, खगरिया, मुंगेर आदि – से चुनकर भारत के संसद में या फिर मिथिला क्षेत्र के सैकड़ों विधान सभा क्षेत्रों से चुनकर बिहार के विधान सभा में बैठे सम्मानित विधायकगण अपने-अपने क्षेत्र के मतदाताओं के लिए, क्षेत्र के विकास के लिए, शिक्षा के लिए, उद्योगों की स्थापना के लिए, रोजगार के लिए इन आठ दशकों में क्या किये? यह तो प्रदेश के मतदाता अधिक जानते हैं।

मिथिला विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम से कहते हैं: “सनद रहे: अगर कोई मैथिल अथवा गैर-मैथिल मैथिली भाषा में मुस्कुराकर बात कर रहे हैं, राजनेता हैं, तो इस बात से कदापि भ्रमित नहीं हो कि वे वास्तविक रूप से मिथिला का विकास चाहते हैं। वे स्वहित में बरगला रहे हैं। आज मिथिला क्षेत्र में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं, बाढ़ है।”

वे आगे कहते हैं: “वैसे इस बात से भली भांति परिचित होने के बाद भी की आज न मिथिला में ‘पोखर है (अधिकांश बिक गए या भूमाफियाओं ने मिट्टी भरकर मकान बना दिए, न माँछ है (दक्षिण भारत से आयात होता है), मखान अब पोखर में नहीं बल्कि खेतों में व्यवसाय के लिए पैदा होता है, मधुर वाणी की किल्लत हो गयी है; फिर भी “पग पग पोखर, माछ-मखान,मधुर वाणी, मुख मेँ पान, ई थिक मिथिला के पहचान” फकरा गाते लोग थक नहीं रहे हैं।”

राजनगर का अवशेष – यह मानसिकता का जीवंत दृष्टान्त है

बहरहाल, बिहार का पहला मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक थे । इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। फिर बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968 तक, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972 तक, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक और कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। 

कर्पूरी ठाकुर के बाद आये केदार पांडे जो 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक मुख्यमंत्री थे। इनके बाद अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक, डॉ. जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक, सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक, डॉ. जगन्नाथ मिश्रा 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक मुख्यमंत्री रहे।
 
डॉ. मिश्र कांग्रेस युग के अंतिम कड़ी थे। उनके बाद आ गए लालू प्रसाद यादव 10 मार्च 1990 से 25 जुलाई 1997 तक, राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 2 मार्च 2000 फिर 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक, नितीश कुमार बीच में आठ दिन के लिए (3 – 11 मार्च  2000) फिर 24 नवम्बर 2005 से 20 मई 2014 फिर 22 फरवरी 2015 से 15 अप्रैल 2026 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। हां बीच में 20 मई 2014 से 22 फरवरी 2015 तक जीतन राम मांझी भी मुख्यमंत्री बने। विगत 15 अप्रैल 2026 से सम्राट चौधरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के कृपा से मुख्यमंत्री कार्यालय में उपस्थित हुए। इस बात से कटाई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार विधानसभा की कुल 243 की संख्या में भारतीय जनता पार्टी (89 विधायक) और जनता दल – यूनाइटेड के (85-विधायक) के कुल 174 विधायकों में कई ऐसे विधायक हैं जो मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खैर। 

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राजनगर: मानसिकता का दृष्टान्त 

समयांतराल सत्ता के गलियारे में बैठे लोग टकटकी निगाहों देख रहे हैं अथवा दरभंगा राज की सम्पत्तियों पर मालिकाना हक़ रखने वाले अवसर की तलाश में हैं। कुमार शुभेश्वर सिंह के कालखंड में दरभंगा राज का क्या हश्र हुआ, मिथिला के लोग देखे हैं और उनकी मृत्यु के बाद क्या हश्र हुआ, हो रहा है – यह भी मिथिला के लोग गवाह बन रहे हैं। 

विगत दिनों जब प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनगर आये थे, यह जानते हुए भी कि ‘यह संपत्ति और रास्ता आम नहीं है,’ संपत्ति के वर्तमान मालिक को बुलाने के बारे में सोचे भी नहीं। कहते हैं कि स्थानीय नेता उनके भ्रमण के अंतिम क्षण में राजनगर के एक अधिकारी को फोन कर सूचना दिए कि ‘आप आ जाएँ’ – यह मानसिकता को भी दर्शाता है और यह भी बताता है कि आपकी संपत्ति होने के बाद भी सत्ता के गलियारे में आपका क्या महत्व है। यह इस बात का द्योतक है कि राजनगर परिसर के मालिक से प्रदेश की नेताओं की क्षमता अधिक है। जिला प्रशासन, जानकारी के वावजूद सरकार के सामने कुछ नहीं कर सकती है।

दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पौत्र और कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र कपिलेश्वर सिंह को इस कहानी को लिखने से पहले कई संवाद उनके मोबाइल पर दिए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। रत्नेश्वर सिंह से जब पूछा की क्या वे राजनगर संपत्ति के मामले में वे कुछ सोच रहे हैं? उनका कहना था की उनमें उतनी शक्ति नहीं है कि वे वे इस दिशा में कोई पहल कर सकें। कुछ समय पहले वे न्यायालय में एक मुकदमा किए थे, लेकिन बाद में उसे निष्क्रिय कर दिए। वैसे दरभंगा राज और उसकी सम्पत्तियों पर महाराजा की अंतिम सांस से कोई दो महीने पहले से ही तत्कालीन राजनेताओं की नजर अटक गयी थी। आज महाराजा की मृत्यु के 62 साल बाद अगर दरभंगा के रास्ते पटना और दिल्ली तक के नेताओं की नजर टिकी है तो इसमें नया क्या है? 

राजनगर: मानसिकता का दृष्टान्त 

उन दिनों भी दरभंगा राज परिवार के लोगों के साथ-साथ मिथिला के लोग, जो दरभंगा राज के करीबी कहते थे, दरभंगा के राजा के नहीं हुए थे, आज तो हैं ही नहीं। उन दिनों भी दरभंगा राज में, महाराजा के आसपास चापलूसों, चाटुकारों, हामी भरने वालों की लम्बी कतार थी; आज तो फ़ौज बनी है। सवाल कई हज़ार करोड़ का यह है कि क्या संतानहीन दिवंगत महाराजा के अनुज राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पौत्र और कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र द्वय सत्ता से लड़कर राजनगर स्थित ऐतिहासिक परिसर को बचाने की क्षमता रखते हैं? या फिर बंद कमरे में राजनेताओं के साथ हाथ मिलकर राजनगर की संपत्ति को सुपुर्द करने की योजना बनाकर समाज और लोगों के बीच ‘घड़ियाली आंसू’ बहाकर ‘सांत्वना बटोरने का प्रयास कर रहे हैं? मिथिला के लोग अधिक ज्ञानवर्धन करेंगे क्योंकि अन्य सम्पत्तियों के अलावे महाराजा द्वारा स्थापित ‘आर्यावर्त’ और ‘इंडियन नेशन’ अखबारों का नामोनिशान मिटना, भवन को बिल्डर के हाथ बेचकर सैकड़ों लोगों को सड़क पर लाने का दृष्टान्त भी बहुत पुराना नहीं है।  

आज़ाद भारत के तीसरे, बाइसवें, चौब्बीसवें, और छब्बीसवें वर्षों में जब भारत की सरकार कानून के तहत जमींदारी प्रथा को समाप्त की, बैंकों का, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण की तो देश के लोग क्या कर लिए? या जब जमींदारी प्रथा की समाप्ति हुई तो दरभंगा के राजा भले न्यायालय में मुकदमा लड़े, लेकिन दरभंगा अथवा मिथिला के कितने लोग आगे आये जमींदारी बचने के लिए? शायद कोई नहीं। और अंततः महाराजा की मृत्यु होने के बाद, और फिर उनकी पत्नियों की मृत्यु होने के बाद दरभंगा राज का क्या हश्र हुआ, हो रहा है – सबों के सामने है। 

भारत की आजादी के बाद, राज्य सरकार ने जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने के लिए बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 लागू किया। 25 सितंबर, 1950 को बिहार सरकार ने इस अधिनियम के तहत एक आधिकारिक अधिसूचना जारी की, जिससे दरभंगा राज की विशाल ज़मीनें तुरंत राज्य के अधिकार में आ गईं। तत्कालीन और अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह ने इस ज़ब्ती को ज़ोरदार तरीके से चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने शुरू में इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके बाद भारतीय संसद ने 1951 में भारत के संविधान का पहला संशोधन पारित किया (जिसमें भूमि सुधार कानूनों की सुरक्षा के लिए नौवीं अनुसूची जोड़ी गई)। यह कानूनी लड़ाई 27 मई, 1952 को खत्म हुई, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ‘बिहार राज्य बनाम दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह’ के ऐतिहासिक मामले में भूमि सुधारों को सही ठहराया। 

राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है 

हालांकि 1950 के दशक की शुरुआत में ही उनके राजस्व इकट्ठा करने के अधिकार खत्म हो गए थे, लेकिन अक्टूबर 1962 में बिना किसी उत्तराधिकारी के महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के साथ ही ‘राज’ की बची-खुची निजी संपत्ति और ढांचागत विरासत भी पूरी तरह खत्म हो गई। इसके बाद दशकों तक पारिवारिक विवाद चले और सरकार ने धीरे-धीरे उनके बचे हुए महलों और संपत्तियों को अपने कब्जे में ले लिया। 

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आज़ादी से पहले सं 1921 में बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास का विलय होकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बना, जो बाद में  1955 में भारतीय स्टेट बैंक के नाम से विख्यात हुआ। 1 जनवरी, 1949 को भारत के केंद्रीय बैंकिंग संस्थान, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण ‘रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (सार्वजनिक स्वामित्व में हस्तांतरण) अधिनियम, 1948’ के तहत किया गया। 1 जुलाई, 1955 को ‘स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया अधिनियम, 1955’ के तहत इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया और इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) कर दिया गया। 19 जुलाई, 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 बड़े कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। पुनः, 15 अप्रैल, 1980 को दूसरा बड़ा दौर आया और 6 अन्य कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।

चौदह बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, और बाद में छह और बैंकों को इसमें शामिल किया गया। ये ज़्यादातर बड़े बैंक थे जिनका पूरे भारत में ब्रांच नेटवर्क फैला हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इन बैंकों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए एक अध्यादेश जारी किया। उन बैंकों को चुना गया जिनका कुल जमा कारोबार ₹50 करोड़ से ज़्यादा था। इस कदम का मकसद वित्तीय समावेश को बेहतर बनाना, खेती को बढ़ावा देना और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लोन देना था। उस समय देश में कुल बैंक जमा का लगभग 80% से 85% हिस्सा इन्हीं 14 बैंकों के पास था। कोई पचपन+ साल बाद बैंकिंग क्षेत्र में 1 अप्रैल 2017, 1 अप्रैल 2019 और 1 अप्रैल 2020 कोफिर एक भूचाल आया। 

राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है 

सन 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय हुआ। 1 अप्रैल 2017 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के 5 सहयोगी बैंकों (स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर) और भारतीय महिला बैंक के साथ विलय हुआ। 1 अप्रैल 2019 बैंक ऑफ बड़ौदा का देना बैंक और विजया बैंक के साथ विलय हुआ। ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का 1 अप्रैल 2020 को पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय हुआ। इसी तरह, केनरा बैंक का सिंडिकेट बैंक के साथ विलय हुआ। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के साथ विलय हुआ। इंडियन बैंक का इलाहाबाद बैंक के साथ विलय हुआ। लोग क्या कर लिए?

भारत ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1971 और 1973 के बीच दो बड़े चरणों में अपनी कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया, ताकि श्रमिकों की सुरक्षा बेहतर हो सके, उनका शोषण रोका जा सके और उत्पादन बढ़ाया जा सके।पहला चरण (कोकिंग कोल) अक्टूबर 1971 में शुरू हुआ जब सरकार ने कोकिंग कोल खदानों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। 1 मई 1972 को ‘कोकिंग कोल माइन्स (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972’ के तहत औपचारिक रूप से राष्ट्रीयकरण किया गया। दूसरे चरण (नॉन-कोकिंग कोल) की शुरुआत जनवरी 1973 में हुई, जब नॉन-कोकिंग कोयला खदानों का प्रबंधन अपने हाथ में लिया गया। इसे औपचारिक रूप से 1 मई, 1973 को ‘कोल माइन्स (नेशनलाइज़ेशन) एक्ट, 1973’ के तहत राष्ट्रीयकृत किया गया। इस राष्ट्रीयकरण के साथ भारत कोकिंग कोल् लिमिटेड का गठन किया गया। लोग क्या कर लिए सरकार की ?

राष्ट्रीयकरण से पहले, भारत में 226 प्राइवेट कोकिंग कोल खदानें और 711 प्राइवेट नॉन-कोकिंग कोल खदानें थी, यानी कुल 937 प्राइवेट कोयला खदानें थीं। IISCO, TISCO और DVC की कैप्टिव खदानों को छोड़ कर सभी निजी खदानों का इस आधार पर राष्ट्रीयकरण कर दिया गया क्योंकि उनमें अवैज्ञानिक तरीके से खनन हो रहा था, भंडार का संरक्षण ठीक से नहीं हो रहा था, मजदूरों की सुरक्षा और रहने की स्थिति खराब थी, और प्राइवेट मालिकों की ओर से पूंजी निवेश की कमी थी।
आइये फिर वापस दरभंगा चलते हैं। अपनी मृत्यु से 52-दिन पहले दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपने कलकत्ता निवास से 9 अगस्त, 1962 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह को एक पत्र लिखे थे। पत्र में महाराजाधिराज सत्येंद्र नारायण सिंह से अनुरोध किये थे कि इस पत्र की कृपया अपने पत्रांक 1945, दिनांक 11 जुलाई, 1962 का निर्देश करें। 

महाराजाधिराज लिखते हैं: “यह बात अपने कानों तक पहुंची है कि कुछ ऐसे कॉलेजों को जो संस्कृतेतर विषयों के अध्यापन करते हैं और राज्य में कार्य करने वाले क्षेत्रीय विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में उचित रूप से हैं, संस्कृत विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में लाकर इसके रूप में परिवर्तन करने की चेष्टा की जा रही है। मेरी समझ से संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य, पाली और प्राकृत के साथ संस्कृत का विशिष्ट ज्ञान देना होना चाहिए जिससे की प्राचीन विद्वता की रक्षा हो और यथा-संभावदयातन बनाया जा सकते। इस विश्वविद्यालय की विशिष्ट स्वरूप में रक्षा अवश्य ही होनी चाहिए। मैंने इस विश्वविद्यालय के लिए  जो दान दिया है वह इसलिए दिया कि मेरे पूज्य पिताजी की इक्षा को इससे पूर्ति होती थी।  “यदि इस विश्वविद्यालय को क्षेत्रीय सामान्य विश्वविद्यालय का रूप दिया जाएगा तो मैं समझूंगा कि मेरा दिया हुआ दान बर्बाद हो गया।” 

महाराजाधिराज आगे लिखते हैं: यदि सरकार मिथिला में एक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करे तो मैं इसका स्वागत करूँगा किन्तु उसे संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ किसी भी रूप में मिलाना नहीं चाहिए जो कि एक निश्चित उद्देश्य और निश्चित विचार से स्थापित किया गया है। वह विश्वविद्यालय इससे सर्वथा पृथक रहना चाहिए। इतना ही नहीं, सम्भवतः जिस लिफ़ाफ़े में महाराजाधिराज को पत्र-प्रेषित किया गया था, अथवा पत्र में सावधान किया गया था, उसमें “श्व” के स्थान पर “स्व” लिखा था। यह महाराजाधिराज को अच्छा नहीं लगा। इसलिए शिक्षा मंत्री के जवाबी पत्र में उन्होंने बहुत ही “शालीनता” के साथ लिखे: “मेरे नाम का शुद्ध विवरण ‘कामेश्वर सिंह’ है न कि ‘कामेस्वर सिंह।” मेरे पास भेजे गए विधेयक के प्रारूप पर मुझे सामान्यतः कोई टिप्पणी नहीं करनी है। किन्तु यदि इसमें कोई परिवर्तन हुआ तो स्थिति भिन्न हो जाएंगी –भवदीय, कामेश्वर सिंह। सरकार और सरकार में बैठे लोग ऐसे ही होते हैं जो ‘श्व’ और ‘स्व’ में फर्क नहीं समझते, साथ ही, ‘क्षेत्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना सम्बन्धी विचार को कूड़ेदान में फेंक देते हैं। 

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राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है 

सन 1960 के 30 मार्च को महाराजाधिराज द्वारा पटना में स्थापित दि इण्डियन नेशन समाचार पत्र में “लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” को दान-स्वरुप देने के उपलक्ष्य में वहां उपस्थित महामानवों के सम्मुख, सर कामेश्वर सिंह अश्रुपूरित आखों से जो भाषण दिए थे, उस भाषण के शब्द कुछ ऐसे थे : 

डॉ जाकिर हुसैन साहब, बिहार केसरी, महिलाओं और सज्जनों !

“जिस वस्तुओं को किसी ने अपने बाल्यकाल से ही न केवल प्यार किया हो बल्कि समादर भी किया हो, उससे अलग होना सामान्यतः दुःखद होता है, किन्तु राज्यपाल जी ने और मुख्यमंत्री महोदय ने जो संस्कृत विश्वविद्यालय का केंद्र बनाने के लिए उसे ग्रहण करने की कृपा कर, स्वयं यहां पधारने का कष्ट किया है, इससे मुझे प्रसन्नता है। 

डॉ जाकिर हुसैन साहब, मैं आपका अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जो स्वयं आपने कृपापूर्वक आज के अपरान्ह में यहाँ पधारने का कष्ट किया। मैं अपने मुख्यमंत्री महोदय का भी आभारी हूँ, जिन्होंने न केवल मेरे अनुरोध को स्वीकार ही किया, बल्कि मिथिला में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में गहरी दिलचस्पी ली। यदि हमारे शिक्षा मंत्री महोदय का उनके पदभार ग्रहण करने के समय से ही लगातार समर्थन और सहयोग नहीं प्राप्त होता, तो शायद यह स्वप्न साकार नहीं हो पाता। संस्कृत की विद्वता के सम्मान में आज से चार सौ वर्ष पहले हमारे पूर्वज महामहोपाध्याय महाराज महेश ठाकुर को बादशाह अकबर ने तिरहुत का राज्य दिया था। इसलिए यह बिलकुल उचित है कि हमारा संस्कृत पुस्तकालय, जिसको हमारे पूर्वजों ने वंश परंपरा से विगत शताब्दी में संघटित किया है, वह संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का केंद्र बने।” 

राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है 

“यह भी उचित है कि लक्ष्मीश्वर विलास प्रसाद जो कि केवल हमलोगों का घर ही नहीं था, बल्कि वह स्थान था, जहाँ अनेक वर्षों तक राज के अनेक प्रकार के उत्सव होते रहे, वह संस्कृत विश्वविद्यालय का स्थान बने। मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत विश्वविद्यालय केवल जीवित ही नहीं रहेगा बल्कि इस प्राचीन भूमि में जो कुछ भी उत्तम तत्व है, उसको प्रोत्साहित करेगा और उसका उद्धार करेगा। इसी विश्वास के साथ मैं आपके हाथों में वह बहुमूल्य खजाना सौंप रहा हूँ, जो मैंने पैतृक संपत्ति के रूप में पाया है, और विश्वास करता हूँ कि आपके छत्र-छाया में संस्कृत शिक्षा की श्री-वृद्धि होगी। संस्कृत सदा अमर रहे।” 

बहरहाल, दिनांक 30-03-1960 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री के नाम लिखे गए पत्र में महाराजाधिराज ने लिखा कि दरभंगा नगर में अवस्थित ‘लक्ष्मीश्वर – विलास’ नामक अपना प्रसाद उसके आस-पास की सम्बद्ध भूमि के साथ ‘संस्कृत विश्वविद्यालय’ के लिए दान स्वीकार किया है बशर्ते कि वह विश्वविद्यालय दरभंगे में स्थापित और अवस्थित किया जाय और चूँकि बिहार विधान सभा द्वारा दरभंगे में  इस तरह के एक विश्वविद्यालय को स्थापित करने के लिए एक अधिनियम पारित किया जा चुका है, जिसको बिहार के राज्यपाल की स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है  और चूँकि बिहार राज्यपाल ने दरभंगे में इस प्रकार का एक विश्वविद्यालय अगले सत्र से स्थापित करने का प्रस्ताव किया है और चूँकि सम्बद्ध भूमि के साथ अपने उपर्युक्त भवन को दरभंगे में “संस्कृत विश्वविद्यालय के उपयोग के लिए” दान देने को इच्छुक हैं, और चूंकि दान-ग्रहीता उपर्युक्त दान को स्वीकार करने को इच्छुक हैं और चुंकि एक उचित दान पात्र लिख देना आवश्यक है, अतः यह दान-पात्र प्रमाणित करता है कि :

राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है 

दरभंगा नगर में अवस्थित लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” नामक भवन, उससे सम्बद्ध भूमि जिसका सम्पूर्ण विवरण परिशिष्ट ‘ए’ में दिया गया है तथा भूमि के नक़्शे में जिसे लाल और पीले रंगों में पृथक कर दिया गया है और जिसे ‘बी’ से चिन्हित किया गया है और जो इस दान पत्र का अंग है, उसे कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के उपबंधों के अनुसार स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के उपयोग के लिए डाटा इसके दान ग्रहीता को हस्तान्तरित और पत्यर्पित करते हैं। दान ग्रहीता इस दान को स्वीकार करते हैं और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के अनुसार स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए दान-पत्र के द्वारा प्रदत भवन और भूमि का उपयोग करने को सहमत होते हैं। 

दाता को नरगौना स्थित अपने आवासीय प्रसाद में आने जाने के मार्ग के उपयोग को अधिकार रहेगा जो मार्ग लक्ष्मीश्वर विलास-प्रसाद के सटे पूर्व से निकलता है और जिसे “बी” चिन्हित नक़्शे में पीले रामनग से पृथक दिखया गया है और उनके यातायात के अधिकार का उपयोग दाता और उनके कार्यकर्त्ता नरगौना प्रसाद में जाने-आने में कर सकते हैं। लक्ष्मीश्वर विलास प्रसाद के सटे पश्चिम में अवस्थित तलाबन के सटे दक्षिण में पश्चिम से पूर्व की ओर जाने वाली सड़क, जिसे पृथक कृत तथा बी चिन्हित नक़्शे में हरे रंग में दिखलाया गया है, विश्वविद्यालय में आने जाने वाले लोगों के उपयोग में आयेगी, किन्तु सामान्य जनता या अन्य कार्य के लिए खुली नहीं रहेगी। लक्ष्मीश्वर विलास प्रासाद के सटे पूर्व से जाने वाली सड़क पर, जहाँ दान में दी गयी भूमि का  अंत होता है, दाता एक फाटक बनवा सकते हैं। जिनके प्रमाण के रूप में यह दान पात्र लिख दिया है और दान ग्रहीता ने दान स्वीकार करने के प्रमाण में अपना हस्ताक्षर कर दिया है। 

क्रमशः….. 

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