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	<title>maharani Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>माधवेश्वर ​शमशान में ​भी दरभंगा राज की महिलाओं को​ वह सम्मान नहीं मिला​, जिसका वे भी हकदार थीं​ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Jan 2026 12:17:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[creamation]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा : दरभंगा राज के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी महारानी काम सुंदरी देवी की मृत्यु के बाद उनकी चिता स्थल पर मंदिर बनाने की चर्चा उत्कर्ष पर है। दरभंगा लाल किला (रामबाग किला) से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है माधवेश्वर शमशान स्थल। इसी स्थान पर दरभंगा राज [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा : दरभंगा राज के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी महारानी काम सुंदरी देवी की मृत्यु के बाद उनकी चिता स्थल पर मंदिर बनाने की चर्चा उत्कर्ष पर है। दरभंगा लाल किला (रामबाग किला) से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है माधवेश्वर शमशान स्थल। इसी स्थान पर दरभंगा राज परिवार के लोगों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया है। महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह के अनुज राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह चिता भूमि सामने दिख रहा है। एक विशालकाय वृक्ष और उसके चतुर्दिक चबूतरा। बरगद के इस वृक्ष के चारो तरफ दरभंगा की महिलाओं का वट सावित्री पूजन का गवाह &#8211; लाल रंग का घागा &#8211; दिख रहा है। चबूतरे के ऊपर स्थानीय लोग, जो इस चबूतरे का इस्तेमान &#8216;बैठकी&#8217; के लिए भी करते हैं, का जूता भी अपने स्वामी के पैर की प्रतीक्षा में है। इस स्थान का देखरेख करने वाले हाथ में फूलझाड़ू लिए वृक्ष से अलग हुए सूखे पत्तों की सफाई कर रहे हैं। </strong></p>
<blockquote><p>इसके अलावे इस चबूतरे का निर्माणकर्ताओं का नाम एक शिलालेख पर भी अंकित है ताकि इस शमशान में आने वाले भ्रमणकारी लोग देख सकें। पार्थिव शरीर तो पढ़ नहीं सकता। काले रंग के पत्थर पर राजा बहादुर के दो पोतों का नाम &#8211; राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह &#8211; अंकित है। दरभंगा के महाराजा अथवा उनके अनुज राजा बहादुर अपनी मृत्यु के बाद दरभंगा के लोगों के लिए सामाजिक कार्य हेतु जितनी सम्पतियाँ छोड़ गए, वे कभी नहीं सोचे होंगे कि जहाँ उनके मृत्यु के बाद चिता सजेगी, समयांतराल उस स्थान पर कुछ मिट्टी और कुछ ईंटों से चबूतरा बनाने के बाद उनका पोता अपना नाम गुदवायेगा।</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-scaled.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-scaled.jpg" alt="" width="1808" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7245" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-scaled.jpg 1808w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-212x300.jpg 212w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-723x1024.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-768x1087.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-1085x1536.jpg 1085w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-1447x2048.jpg 1447w" sizes="(max-width: 1808px) 100vw, 1808px" /></a></p>
<p>दरभंगा ही नहीं देश के किसी कोने में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपने पूर्वज की चिता स्थल पर अपना नाम नहीं गुदवायेगा। अपने जीवन में अब तक ऐसा दृश्य नहीं देखा था। मन दुःखी हो गया। ईश्वर न करें किसी जीवित व्यक्ति का नाम शमशान भूमि में अंकित दिखे। इस दृश्य को देखकर सोचने को विवश हो गया कि कभी दरभंगा राज में विद्वान सिपा सलाहकार होते थे जो &#8216;मानवीय मूल्यों को बरकरार रखने का सलाह देते थे। आज चाटुकार, चापलूसों का साम्राज्य हो गया है।अच्छे,बुरे,शुभ,अशुभ में फ़र्क़ नहीं दिखता।</p>
<p><strong>वैसे राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह के पिता, यानी दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र दिवंगत कुमार शुभेश्वर सिंह अथवा उनकी दिवंगत पत्नी का अपने दिवंगत पूर्वजों के आँगन में कहीं नामोनिशान नहीं दिखा। राजा बहादुर के अन्य दो पुत्रों &#8211; जीवेश्वर सिंह और यज्ञेश्वर सिंह का चिता स्थल भी सुना-सुना दिखा। इतना ही नहीं, इस स्थान को शमशान भूमि में अंकित होने के बाद दरभंगा राज के अनेकानेक महिलाओं &#8211; रानियों, बहुओं &#8211; की भी मृत्यु हुई है, उन्हें भी इसी प्रांगण में अग्नि को सुपुर्द किया गया था। महाराजा रमेश्वर सिंह की बड़ी पत्नी &#8216;राजमाता&#8217; के चिता स्थल पर &#8216;अन्नपूर्णा मंदिर&#8217; भले स्थापित हो; श्यामा काली और अन्नपूर्णा मंदिर के बीच उनकी दूसरी पत्नी के चिता स्थल पर आज तक मंदिर कर कार्य पूरा नहीं हो सका। यह भी दुःख की ही बात है।</strong> </p>
<p>कहते हैं महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को काशी लाभ हुआ। श्यामा मंदिर के सामने &#8216;तारा माय&#8217; को समर्पित करते &#8216;तारा मंदिर&#8217; का निर्माण कर और उसमें एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित कर उसे स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। इसे अपवाद ही माना जा सकता है। अन्नपूर्णा मंदिर​ छोटी राजमाता की चिता स्थान पर है। इस अपवाद छोड़कर दरभंगा राज की किसी भी महिला, रानी को, पुत्र बधुओं  को माधवेश्वर शमशान प्रांगण में भले अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ हो, उन्हें अब तक वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे सभी हकदार थीं, जहाँ तक मंदिर निर्माण का सवाल है। विद्वान और विदुषी दरभंगा राज के बारे में जो भी शब्द का विन्यास करें, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दरभंगा राज में न जीते जी और ना ही मरने के बाद, महिलाओं को जो शिक्षा और सम्मान मिलना चाहिए था, जिसके वे हकदार थीं, नहीं मिला। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7247" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे राज परिसर से महिला सशक्तिकरण की बात करते लोग थकते नहीं। यथार्थ तो यह है कि इस शमशान भूमि में भी &#8216;पुरुषों&#8217; का बाहुल्य आज भी कायम है। पुरुषों में भी जो &#8216;अर्थ से संपन्न&#8217; थे, या महाराजा के &#8216;मन के लोग&#8217; थे। राजा माधव सिंह, जिनका देहावसान दरभंगा में नहीं हुआ था, उनके द्वारा निर्मित &#8216;माधवेश्वर महादेव मंदिर&#8217; प्रांगण में उनका अस्थि कलश अवस्थित है। इतना ही नहीं, लोगों का कहना है कि, परंपरा के अनुसार, इस प्रांगण में जितने भी पार्थिव शरीर लाये जाते हैं, सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से उस पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द करने के पूर्व यहाँ रखना आवश्यक है। </p>
<blockquote><p>&#8216;अन्नपूर्णा&#8217; और &#8216;श्याम तारा&#8217; मंदिर के अलावे दरभंगा राज की किसी भी महिलाओं को इस परिसर में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका एक महारानी अथवा उनकी पुत्र वधु होने के कारण उनके पार्थिव शरीर को भी वह सम्मान मिलता। यह भी उतना ही सत्य है कि राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी का देहांत दरभंगा में नहीं हुआ, लेकिन उनके सम्मानार्थ उनके अस्थि कलश को इस धार्मिक भूमि में अर्पित किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।</p></blockquote>
<p>विद्वज्जनों का कहना है कि <strong>संकर्षण ठाकुर</strong> के वंश में दसवें पीढ़ी पर थे चंद्रपति ठाकुर, जो चान ठाकुर के भी नाम से जाने जाते थे। ये दुबे ठाकुर के नाम से प्रसिद्द श्रीपति ठाकुर के पुत्र थे। तीन भाई थे ये &#8211; हरपति ठाकुर, नरपति ठाकुर और चंद्रपति ठाकुर। ये तीनों सोनकारियां-कर्माहा मूल के गंगेश्वर सूत श्रीधर के दोभित्र थे। इनके ही बालक थे महामहोपाध्याय महेश ठाकुर, जिन्हे अकबर से मिथिला राज्य के सनद प्राप्त हुआ था।  कहते हैं इनके शिष्य रघुनन्दन झा को सनद मिला था जो गुरुदक्षिणा में अपने गुरु महेश ठाकुर को दे दिए। यहीं से प्रारम्भ होता है दरभंगा राज और उसका इतिहास। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7248" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>इस राज्य के पुरुष तो शुरू से ही शिक्षित, विद्वान, महामहोपाध्याय रहे थे, लेकिन स्त्री शिक्षा का सदैव अभाव रहा। दूसरे वंश से भी जो महिलाएं विवाहोपरांत इस वंश में आयीं, उन्हें भी शिक्षा में मामले में कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। इसका ज्वलंत दृष्टान्त है राजा राघव सिंह की दो पत्नियों में बड़ी महारानी राघव कान्ता, जो अपने समय में अपने भाइयों को तो शिक्षित कर पायी, लेकिन अपनी प्रतिभा को दिखने से वंचित रह गयी। </strong></p>
<p>शिक्षा के मामले में यह भी कहा जाता है कि ओईनिवार मूल के राजा कंसनरायण लक्ष्मी नाथ के वंश में स्त्री शिक्षा को बहुत बढ़ावा मिला। कहा जाता है कि कंस नारायण का विवाह भी मनु झा की बेटी सूरमा से तभी हुआ जब वे शास्त्रार्थ में हिस्सा लिए। बाद में कविकोविद जैसे कई दरवारी विद्वानों ने अपने अपने गीतों में विदुषी सोरमा की योग्यता का उल्लेख किये हैं। इसी राज में दूसरी विदुषी थी &#8216;बहुला&#8217; जिनका श्लोक संस्कृत साहित्य में प्रसिद्द है। </p>
<p><strong>विहस्य यस्य षष्ट्यन्ते चतुर्थ्यन्त विहाय च<br />
द्वितीयंतमह: तस्य द्वितीया स्यामहं कथं </strong></p>
<p>दरभंगा के विद्वानों का कहना है कि दरभंगा राज के पिछले राजवंश में स्त्री शिक्षा को बहुत प्रश्रय मिला, लेकिन समयांतराल स्त्री शिक्षा की परंपरा कोई भी बचा कर नहीं रख सके। दरभंगा राज में 1557 से 1962 तक कायम रहा। इस बीच दरभंगा राज परिवार में 22 व्यक्ति राजा हुए, जिसमें 10 व्यक्ति अपने बड़े भाई से सत्ता हासिल किये। अनेकों राजा अपने-अपन नामों पर नगर बसाने के साथ-साथ पोखर बनबाये, दान दक्षिणा दिए, अपने भाई और भतीजे को राज्य सौंपते गए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दरभंगा राज में अधिकांश राज &#8216;नावल्द&#8217; रहे। यह भी कहा जाता है कि जब मिथिला राज्य का अकबर से प्राप्त सनद को रघुनन्दन राय अपने गुरु को सौंप दिए, तब उनकी पत्नी महेश ठाकुर को श्राप दिए थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7249" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, राजा राघव सिंह की पहली पत्नी की मृत्यु के बाद इनकी छोटी (सौतन) राघवप्रिया के पुत्र राजा विष्णु सिंह इनके सारा पर, जहाँ इनका अंतिम संस्कार हुआ था, भौड़ागढ़ी (मधुबनी) में मंदिर बनाये। दरभंगा राज में &#8216;सारा&#8217; पर परिवार के सदस्य के सारा पर यह दूसरा मंदिर है। पहला मंदिर था अपने भाई महिनाथ ठाकुर से राज भार लेने वाले नरपति ठाकुर की धर्मपत्नी उर्वशी देवी के सारा पर रहिका (मधुबनी) में निर्माण। दरभंगा में सारा पर मंदिर बनाने का इसके बाद शुरू हुआ। माधवेश्वर मंदिर वैसे सारा पर नहीं है, लेकिन इस मंदिर के समक्ष माधव सिंह सिंह का अस्थि कलश रखा हुआ है। महाराज रामेश्वर सिंह के सारा पर श्यामा मंदिर है।</strong> </p>
<p>दरभंगा के लोगों का कहना है कि यह पूरा माधवेश्वर शमशान परिसर पचास एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ है। प्रवेश द्वार पर महादेव की प्रतिमा है। स्वाभाविक भी है। मृत्योपरांत प्रत्येक शमशान में महादेव और उनके गनों का ही वास होता है। प्रवेश के साथ दाहिने हाथ माधवेश्वर मंदिर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाराजा माधव सिंह आज से कोई 220 वर्ष पूर्व किये थे। इस परिसर का यह सबसे पुराना मंदिर हैं और यही कारण है कि इस पुरे परिसर को इस मंदिर के नाम से अलंकृत किया गया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5.jpg" alt="" width="2047" height="1275" class="aligncenter size-full wp-image-7250" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-1024x638.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-768x478.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-1536x957.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>राजा माधव सिंह की मृत्यु दरभंगा में नहीं हुयी थी। इसलिए इस परिसर में उनकी चिता स्थान पर कोई मंदिर नहीं है। अलबत्ता, जिस मंदिर का निर्माण उनके काल खंड में हुआ था, उस मंदिर के आगे उनका अस्थि कलश रखा है। लोग यह भी कहते हैं कि इस परिसर में माधवेश्वर महादेव मंदिर के अलावे जितने भी मंदिर हैं उन सभी मंदिरों में देवी की प्रतिमा स्थापित है और तंत्र विद्या के साधक, चाहे वे मिथिला के किसी भी क्षेत्र में रहते हों, यहाँ अपनी साधना करने अवश्य आते हैं। अधिकांश साधकों के लिए देवी ही उनका इष्ट होती हैं। परिसर के लोगों का कहना है कि माधवेश्वर में महाराजा माधव सिंह के पुत्र महाराजा छत्र सिंह का भी चिता स्थल नहीं है, इसलिए मंदिर भी नहीं है। छत्र सिंह अपनी अंतिम सांस बनारस में लिए थे। हाँ, महाराजा छत्र सिंह के पुत्र महाराजा रूद्र सिंह की चिता भूमि पर एक मंदिर अवश्य है जो माँ रुद्रेश्वरी काली के नाम से जाना जाता है। </p>
<p>रामेश्वर सिंह महान तंत्र साधक थे, अतः उनके चिता पर श्यामा मंदिर का निर्माण कई। देवी श्यामा की इतनी बड़ी प्रतिमा महाराजा रामेश्वर सिंह जो कामाख्या से वापस आये थे, मधुबनी के राजनगर किला में स्थापित किया था। राजनगर में काली की जो प्रतिमा है वह उनका बात्सल्य रूप है जबकि दरभंगा के माधवेशत में देवी काली का रौद्र रूप हैं। इसका निर्माण 1933 में हुआ था जहाँ देवी काली भगवान् शिव के छाती पर अवस्थित हैं। इस मंदिर परिसर में प्रवेश के साथ ही नहीं, आस-पास भी एक अदृश्य आकर्षण का अनुभव होता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-scaled.jpg" alt="" width="1808" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7251" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-scaled.jpg 1808w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-212x300.jpg 212w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-723x1024.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-768x1087.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-1085x1536.jpg 1085w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-1447x2048.jpg 1447w" sizes="auto, (max-width: 1808px) 100vw, 1808px" /></a></p>
<p><strong>मेरे पिता स्वयं तांत्रिक थे, और महाराजा रमेश्वर सिंह की तांत्रिक विद्या के साथ-साथ कामाख्या में उस सिद्ध पीठ के उपासक रहे थे। वे कहते थे कि पुरुषों के चिता स्थान की अपेक्षा महिलाओं कि चिता स्थान पर बने देवी की मंदिर अधिक शक्तिशाली होती है। वे यह भी कहते थे कि किसी भी शमशान में, जलते चिताओं के बीच एक अदृश्य शक्ति की उपस्थिति होती है। इस मंदिर में काल भैरव भी हैं, वटुक भैरव की भी उपस्थिति है और गणेश की प्रतिमा तो है ही। यह अलग बात है कि कालांतर में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के पिता रमेश्वर सिंह के सारा पर जब जब श्यामा मंदिर का निर्माण हुआ, परिसर उनके नाम से विख्यात हो गया। रमेश्वरी श्यामा मंदिर में तांत्रिक और वैदिक दोनों रीतियों से पूजा होती है, जबकि अन्य मदिरों में पूजा पद्धति तांत्रिक विधि पर आधारित है। यहाँ प्रत्येक मंदिर में &#8216;बलि प्रदान&#8217; होता है।</strong> </p>
<p>इस मंदिर से आगे पश्चिमी दिशा में दरभंगा राज की दो महारानियों महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की बड़ी और मझली पत्नियों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया जाया था। यहाँ कोई भी मंदिर अथवा सम्मानीय स्थान नहीं है। महारानियों के इस चिता स्थल से आगे ऐतिहासिक तालाब के दक्षिण भाग पर राजा बहादुर विश्वेशर सिंह के बड़े पुत्र राज कुमार जीवेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। जीवेश्वर सिंह के चिता स्थल के पास ही उनके अनुज का अंतिम संस्कार किया गया था। </p>
<p>पोखर के आगे पश्चिम-दक्षिण भाग में दरभंगा के अंतिम संतानहीन राजा कामेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। उनकी चिटा भूमि पर ही कामेश्वरी श्यामा मंदिर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी ने अपने सुहाग के गहने बेच कर कराया था। कामेश्वरी श्यामा मंदिर के पास ही महाराजा कामेश्वर सिंह के पहली पत्नी, यानी बड़ी महारानी राजलक्ष्मी का अंतिम संस्कार किया गया था। दुर्भाग्य यह है कि उनके सम्मान में भी यहाँ कोई घार्मिक मंदिर का निर्माण नहीं हो सका अब तक। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-scaled.jpg" alt="" width="1808" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7252" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-scaled.jpg 1808w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-212x300.jpg 212w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-723x1024.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-768x1087.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-1085x1536.jpg 1085w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-1447x2048.jpg 1447w" sizes="auto, (max-width: 1808px) 100vw, 1808px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, कहते हैं दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपनी मृत्यु से छः साल पहले महज 21,274/- रुपये के लिए पटना उच्च न्यायालय से भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक एक कर दिये थे। यह पैसे महाराजा द्वारा बनाए गए धार्मिक न्यास को प्रदत्त भूमि से मिलने वाली कमाई का हिस्सा था। सरकार के नियमानुसार यह राशि “आयकर” नियमों के अधीन था, जबकि महाराजाधिराज के लोगों का कहना था कि चूँकि यह राशि महाराजाधिराज द्वारा धार्मिक न्यास को दी गयी कृषि-भूमि की कमाई का हिस्सा है, और न्यास को आयकर अधिनियम से छूट है; अतः यह राशि आयकर विभाग को भुगतान नहीं करनी चाहिए। आश्चर्य तो यह है कि उन दिनों भी महाराज के आस-पास रहने वाले मिथिला के विद्वान और विदुषी यह नहीं कह सके कि “एक ही राशि ‘दो व्यक्ति’ अथवा ‘दो संस्था’ के लिए अलग-अलग नियमों के अधीन होती है। जो राशि धार्मिक न्यास के लिए आयकर नियमों के अधीन नहीं है, वह राशि महाराजाधिराज के लिए आयकर अधिनियम के अधीन है।” परन्तु ‘बात तो दरभंगा राज की थी’, और उस दिन भी दरभंगा राज में राग-दरबारियों की किल्लत नहीं थी, आज तो पूछिए ही नहीं। </strong></p>
<p>जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया तो सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन  माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे सी शाह और  न्यायमूर्ति एस के दास “Income Tax- Exemption from taxation Agricultural income from trust properties-Trustee’s remuneration a Percentage of such income and  resting  on  trust deed-Remuneration,  whether agricultural  income-Indian  Income-tax Act,  1922  (11  of 1922), SS. 2(1),4(3)(viii) के मद्दे नजर महाराजाधिराज के याचिका की सुनवाई किए।  महाराजा ने दलील दिये कि वे एक ट्रस्टी के हैसियत से ट्रस्ट को प्रदान की गई भूमि से मिलने वाली आय का 15 फीसदी अपनी सेवा के लिए लेते थे, एक रेम्युनेरेशन के रूप में। उन्होंने आयकर विभाग को कहा कि उक्त भूमि के इस्तेमाल से एक ट्रस्टी के रूप में जो भी आमदनी उन्हें प्राप्त होती है वह कृषक सम्पत्तियों के इस्तेमाल से होने वाली कृषक आय है जो की भारतीय आयकर अधिनियम 1922 के धारा  s. 4 (3) (viii) के अधीन आयकर से मुक्त है, साथ ही, कृषि आय से उन्हें तो रेम्युनेरेशन दिया जाता है, वह भी आयकर से मुक्त है क्योंकि उस आय का स्रोत कृषि है जो मंदिरों, ठाकुरबाड़ियों को दी गयी है उसके सफल सञ्चालन के लिए।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7.jpg" alt="" width="2047" height="1275" class="aligncenter size-full wp-image-7253" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-1024x638.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-768x478.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-1536x957.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>महाराजाधिराज दरभंगा ही नहीं, बिहार प्रान्त और देश के अन्य हिस्सों में जिन-जिन मंदिरों, मठों और धार्मिक स्थानों की देख-रेख करने का दायित्व लिए थे, उसका समुचित संरक्षण हो; इस निमित्त अपने राज का एक बहुत बड़ा हिस्सा का कृषि जमीन कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास को दे दिए थे, ताकि आमदनी का स्रोत बना रहे । परन्तु, आज दरभंगा राज रेसिडुअरी ट्रस्ट, कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट या महाराजाधिराज द्वारा सामाजिक-धार्मिक कल्याणार्थ बनाये गए अन्य न्यासों से “अधिक स्वस्थ” कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास का भी नहीं है। </p>
<p>न्यास के बारे में बहुत बातें हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पास ‘सम्पूर्णता के साथ’ ऐसी कोई सूची है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि इस न्यास को बनाते समय महाराजधिराज ने अमुक-अमुक मंदिरों / मठों के निर्माण, रख-रखाव, पंडित/पुजारी के वेतन, प्रसाद, घुपबत्ती, अगरबती, घूमन, भगवान अथवा भगवती के लिए वस्त्र आदि-आदि मदों पर प्रत्येक दिन अथवा प्रत्येक वर्ष होने वाले खर्च कहाँ से आएंगे? क्या उन मंदिरों और मठों के निमित्त सुरक्षित जमीनों की सूची है कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पास ? क्या उन जमीनों के लिए न्यास सरकार के कोषागार में अथवा निबंधन कार्यालय में भूमि-कर का भुगतान कर रखा है? क्या कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के तहत सभी मंदिरों, मठों की स्थिति बेहतर है? क्या उन भूमियों की खरीद-बिक्री में तो हाथ नहीं लगाया गया है? कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के तहत संचालित और संरक्षित मंदिरों/मठों के पुजारियों की कोई सूची उपलब्ध है? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7254" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>सूत्रों का कहना है कि कोई 108 मंदिर और ठाकुरवाड़ी हैं जो कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के अधीन माना जाता है। इतना ही नहीं, यह भी कहा जाता है कि कानपुर स्थित बाजीराव पेशवा – II के महल में स्थित मंदिर का देखभाल सहित, देश में अनेकानेक ‘ऐतिहासिक लोगों द्वारा स्थापित मंदिर है जिसका देखभाल महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने अपने जिम्मे लिय्या था और इसका दायित्व कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास को सौंपा था। बिहार के कुल 38 जिलों में तक़रीबन 534 ब्लॉक हैं और कोई 45,103 गाँव हैं। उन्हीं गाँव में दरभंगा में कुल 1251 गाँव है, और ऐसा कोई गाँव नहीं है जहाँ धार्मिक आस्था से जुड़े स्थान नहीं है। बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद ने 2007 में श्यामा माई मंदिर को अधिग्रहण किया। फिर श्यामा माई मंदिर न्यास समिति का गठन हुआ। </strong></p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved">माधवेश्वर ​शमशान में ​भी दरभंगा राज की महिलाओं को​ वह सम्मान नहीं मिला​, जिसका वे भी हकदार थीं​ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​&#8217;दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र &#8216;राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे&#8217; (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Jan 2026 13:35:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga raaj]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
		<category><![CDATA[property]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा : कल का दरभंगा राज का बेला पैलेस और आज का पोस्ट ऑफिस ट्रेनिंग सेंटर का कार्यालय के सामने खड़े लोग आपस में बात कर रहे हैं। ​कहते हैं इस महल में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों सहित कई प्रमुख हस्तियों ने दौरा किया है महाराजाओं के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/great-grandmother-passed-away-after-waiting-her-entire-life-for-a-glass-of-water">​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​&#8217;दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र &#8216;राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे&#8217; (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा :  कल का दरभंगा राज का बेला पैलेस और आज का पोस्ट ऑफिस ट्रेनिंग सेंटर का कार्यालय के सामने खड़े लोग आपस में बात कर रहे हैं। ​कहते हैं इस महल में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों सहित कई प्रमुख हस्तियों ने दौरा किया है महाराजाओं के कालखंडों में । महल की वास्तुकला में मुगल, राजपूत और यूरोपीय शैलियों का मिश्रण है। आज यह भवन भारत के छह पोस्टल ट्रेनिंग सेंटरों में से एक है।​ यह केंद्र बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल सर्कल की ट्रेनिंग ज़रूरतों को पूरा करता है। ​यह भी कहते हैं कि यहाँ​ डाक विभाग से जुड़े कई श्रेणियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण दी जाती हैं। खैर। </strong></p>
<blockquote><p>शहर का तापमान अठारह डिग्री के आस पास है। जो भी लोग उपस्थित हैं उनमें बीड़ी और सिगरेट पीने वाले नहीं हैं, अन्यथा इस तापमान पर तो कितने डिब्बे सिगरेट और कितने बंडल बीड़ी फूंके गए होते। बातचीत का सिलसिला जारी है। दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित &#8216;दी इंडियन नेशन&#8217; अख़बार के अस्सी के ज़माने के तत्कालीन संपादक श्री दीनानाथ झा कहे थे &#8216;एक संवाददाता के लिए सबसे आवश्यक है कि वह अच्छा श्रोता हो। आँख खुला रखता हो और बिना कलम का इस्तेमाल किये अपने मानस पटल पर लिखने की क्षमता रखता हो।&#8217; बेला पैलेस के सामने उनकी याद बहुत आ रही है। </p></blockquote>
<p><strong>दरभंगा मैथिली भाषा का केंद्र है, परन्तु यहाँ उपस्थित  निनानबे फ़ीसदी लोग हिंदी में बात कर रहे हैं। शब्दों का उच्चारण कभी कभी मुख में दाँत के अभाव के कारण अथवा तंबाकू और गुटका भरे होने के कारण, जिस तरह क्रिकेट खेल में बॉल स्लीप और गली से निकल जाता, शब्द भी फिसल रहे हैं। मिथिला के बुजुर्ग इसलिए कहते हैं कि &#8216;न दंतहीन सर्प अच्छा होता और न ही दंतहीन व्यक्ति शब्दों का सही उच्चारण कर पाता। यहाँ दृष्टान्त देख रहा हूँ। </strong></p>
<p>महारानी को अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकले आज पांच दिन हो गया। शहर में अब महारानी के प्रति वेदना-संवेदना की बात, चर्चाएं थम सी गयी है। जैसे-जैसे समय एकादशा, द्वादशा और मांस-माँछ तिथि की ओर बढ़ रहा है, जहाँ भोज में अनेकानेक व्यंजन, दही, रसगुल्ला परोसे जायेंगे, दरभंगा के लोग, खासकर जिनका प्रवेश दरभंगा के लालकोठी (रामबाग परिसर) या कल्याणी निवास में &#8216;आम&#8217; या &#8216;खास&#8217; है, महारानी की मृत्युभोज के बारे में, मरणोंपरांत कर्म के दौरान दान स्वरुप मिलने वाली वस्तुओं, आभूषणों के बारे में चर्चाएं कर रहे हैं। </p>
<p><strong>कई लोगों के मुख से यह भी कहते सुना हूँ कि अगर भारत-चीन के दौरान सन बासठ में दरभंगा राज की ओर से तत्कालीन महारानी (बड़ी महारानी) और तत्कालीन ट्रस्टी (श्री लक्ष्मीकांत झा) के प्रयास से (राजनीति ही सही) 15 मन सोना दान किया जा सकता है, तो महादेव की नगरी में महारानी की आत्मा को जगह मिले, वे अपने पति देव महाराजा कामेश्वर सिंह से, अपनी दोनों बड़ी बहनों (महाराजा की दो पत्नियां) से मिलें, तदर्थ अन्य दानों के अलावे स्वर्णदान अवश्य करेंगे। पंद्रह मन ना सही, पंद्रह किलो का ही दान होना चाहिए। विदित हो कि महारानी काम सुंदरी की मृत्यु के बाद दरभंगा ही नहीं, पटना ही नहीं, देश-विदेश से प्रकाशित अख़बारों में, इंटरनेटों पर, वेबसाइटों पर 15 मन सोना दान करने का श्रेय महारानी कामसुन्दरी को दिया गया। खैर।</strong> </p>
<figure id="attachment_7235" aria-describedby="caption-attachment-7235" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52.jpeg" alt="" width="1080" height="720" class="size-full wp-image-7235" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52-1024x683.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52-768x512.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7235" class="wp-caption-text">दिवंगत महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह और उनकी तीसरी पत्नी (दिवंगत) महारानी काम सुंदरी देवी</figcaption></figure>
<p>महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा रमेश्वर सिंह, राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, महाराजा कामेश्वर सिंह की अथवा दरभंगा राज में अब तक मृत्यु को प्राप्त किये महिलाओं के मृत्यु भोज में इस डाक ट्रेनिंग कार्यालय के सामने खड़े लोग (कुछ को छोड़कर) सरिक नहीं हुए थे। इनमें से किसी भी व्यक्ति का उस काल खंड में जन्म भी नहीं हुआ था। जो दरभंगा में सत्तर-अस्सी वसंत देखे हैं (उनकी संख्या बहुत कम है) वे महाराजा के साथ-साथ राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, उनके पुत्र जीवेश्वर सिंह, बड़ी महारानी, जीवेश्वर सिंह की पत्नी आदि की मृत्यु और मृत्युभोज में सरिक अवश्य हुए थे, लेकिन किन्ही भी दो व्यक्तियों के मृत्यु भोज अथवा मृत्यु कर्म में समानता नहीं थी। लोगों को तो यहाँ तक कहते सुना कि जीवेश्वर सिंह, जो दरभंगा राज के उस काल खंड से लेकर आज के काल खंड तक, सभी पुरुषों से सबसे मेधावी और यशस्वी थे, उनकी पत्नी के देहावसान के समय दरभंगा राज के लोगों का ह्रदय नहीं पसीजा था। सब समय है। </p>
<blockquote><p>महारानी काम सुंदरी देवी भले 64-वर्ष विधवा का जीवन व्यतीत कीं, उनकी मृत्यु के बाद उनके शव के समक्ष कल्याणी निवास में &#8216;राजनीति&#8217; भले हुआ हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वे &#8216;भाग्यशाली&#8217; भी थी। उनकी शव यात्रा में उनका सबसे बड़ा पौत्र कन्धा दिया था। उनके शव के पीछे दरभंगा शहर के लोग, इष्ट अपेक्षित, संबंधी, तथाकथित संबंधी सभी साथ थे। सभी का अश्रुपूरित था। </p></blockquote>
<p>भले उनका देहावसान 96 वर्ष में हुआ हो, सभी इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि दरभंगा की महारानी (भले देख रेख के भाव में उन्हें बेड सोर हो गया हो, कमजोरी के कारण पिछले कुछ दिनों से बोलने, आँखें खोलने में असमर्थ रही हो, लोगबाग स्वयं को &#8216;महारानीहीन समझ रहे थे। मिथिला की यही तो गरिमा है। यही तो संस्कृति है। समाज में कुछ होने पर समाज के लोगों में हर्ष और विषाद होता है, भले परिवार के लोग संवेदनहीन हो जाएँ। </p>
<p>तभी एक महाशय कहते हैं: &#8220;महाराजा की मृत्यु के बाद वसीयत में महारानी को महाराजा की संपत्ति पर जो भी अधिकार या उपयोग करने का अधिकार दिया गया हो, वे भले संतानहीन रही हों, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन काल में गाँव, समाज के सैकड़ों परिवारों को पाली पोसी। कई लोगों को अपने पास रखकर शिक्षित करने की कोशिश की।&#8221; </p>
<p><strong>अपने धोती के खूंट से अपनी अश्रुपूरित आंखों को पोछते एक महाशय कहते हैं: &#8220;करीब 64 वर्ष विधवा जीवन व्यतीत की महारानी। अपने जीवन के अंतिम सांस तक वाट जोहते रही अपने पोतों की। रत्नेश्वर बाबू को छोड़कर कभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक नहीं दिया। काश !! दरभंगा राज के &#8216;तथाकथित&#8217; या &#8216;स्वयंभू&#8217; युवराज कभी अपने हाथों से एक गिलास पानी पिलाए होते !! काश !!! थर-थर काँपते हाथों से दवाई लेकर, रुग्ण अवस्था में बेडसोर से पीड़ित अपनी दादी को उठाकर दो शब्द बात किए होते। दुखद हैं। खैर !!! कहते हैं भगवान सब देखता है, यह भी देखा होगा।&#8221;</strong></p>
<p>तभी वहां खड़े कोई चालीस वर्षीय युवक कहता है : &#8220;जीवन में दोनों के बीच संपत्ति को लेकर कई मुकदमें हुए। शायद दो बार मिले उनके जीवन काल में &#8216;स्वयंभू युवराज&#8217; और दोनों बार सबसे पहले दूसरे अख़बारों में ही फोटो छपा। महाराजा द्वारा स्थापित अख़बारों को तो बेच-बाचकर सभी डकार लिए। अब महारानी के मरने के बाद देश, विदेश के राजा आएं, मंत्री आएं संत्री आएं, भोज करें, अख़बार में नाम छपायें, इससे लोगों को क्या? दरभंगा राज के आज के सबसे बड़े पुरुष, जिन्होंने मुखाग्नि दिए, उनसे भी सम्बन्ध एकादशा और द्वादशा तक ही रहेगा। माँछ -मौस आते-आते संधि युक्त नहीं संधि विच्छेद हो जायेगा। पत्रकार लोग भी गजब का प्रश्न करते हैं &#8220;श्राद्ध का इंतज़ाम कैसा होगा?&#8221;  </p>
<figure id="attachment_7237" aria-describedby="caption-attachment-7237" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7237" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7237" class="wp-caption-text">महारानी का पार्थिव शरीर</figcaption></figure>
<p>उनकी बातों को काटते एक अन्य व्यक्ति एक स्थानीय पत्रकार के प्रश्न पर चुटकी लेते कहते हैं: &#8220;पिछले पाँच और अधिक वर्षों में, जबसे महारानी का शरीर शिथिल हुआ, एक भी पत्रकार दो शब्द उस दर्दनाक काल का नहीं लिखा (अपवाद छोड़कर), आज प्रश्न पूछ रहा है कौन-कौन राजा आ रहे हैं? श्राद्ध का कैसा इन्तज़ाम होगा, कहाँ चूल्हा लगेगा, कहाँ पत्तल, क्या क्या उपहार मिलेगा? ओह !!&#8221;</p>
<p><strong>इस बीच धोती कुर्ता कोट पहने, ऊनी चादर से सर और कान ढँके, लाठी का सहारा लिए एक बुजुर्ग का प्रवेश होता है। डाक विभाग के कार्यालय के पास उपस्थित लोगों की ओर देखते कहते है “यह भी पूछना चाहिए कि भोज का आयोजन करने वाले केश कटायेंगे अथवा नहीं? अमेरिका और दिल्ली में रहने वाले की संस्कृति कुछ अलग होती है।&#8221; चलते चलते बुजुर्ग कहते हैं, “जो भी हो, इस अवस्था में महारानी का जाना उनके शरीर के लिए अच्छा हुआ। बेडसोर होने के कारण बहुत कष्ट में थी। वैसे भी दरभंगा के कितने लोग, जिनकी आयु आज पचास वर्ष भी है, महारानी को देखे हैं? हम सभी तो महारानी शब्द के प्रति ही संवेदना व्यक्त कर रहे हैं। एक युग का अंत हो गया। अब दरभंगा के शब्दकोष से &#8216;महारानी&#8217; शब्द निरस्त हो गया।  दरभंगा राज में महिलायें पहले विधवा होती हैं, और वर्षों बाद विधवा जीवन जी कर  मृत्यु को प्राप्त करती है, यही होता आया है। आगे महादेव की मर्जी।&#8221;</strong></p>
<p>कुछ देर पहले लाल बाग की ओर से आती सड़क जो आगे विश्वविद्यालय और राम बाग परिसर से होते निकलती है, खड़ा था यहाँ से दाहिने हाथ संस्कृत विश्वविद्यालय प्रवेश द्वार होते कल्याणी निवास की ओर बढ़ा था। इसी आवास में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाऊंडेशन का कार्यालय भी है। विशालकाय सफ़ेद रंग का घर। बीच के हिस्से में आसमानी रंग को पोताई जिसे एक फूल का पौधा आधी दीवार को ढंका है, दिखा। दाहिने हाथ दो तीन गाड़ियां लगी दिखी । कुछ कुर्सियां भी लगी थीं आगंतुकों के लिए। महारानी की मृत्यु की जिज्ञासा करने आये कई लोग कुर्सियों पर बैठे दिखे तो कई खड़े होकर बात करते दिखे। शहर का तापमान वैसे 20 डिग्री के आस-पास थी, लेकिन लोगों के शरीर पर स्वेटर, कोट और अन्य ऊनी वस्त्रों का जमाव है। अपवाद छोड़कर सभी लोग कान गुलेबन्द से ढंके हैं। </p>
<p>इसी बीच पैर के नीचे एक मोटा गद्दा रखे, सफ़ेद वस्त्र में, शरीर पर मात्र ठंढ़ से परहेज करने के कारण कुछ वस्त्र पहने दरभंगा राज के सबसे बड़े पुरुष रत्नेश्वर सिंह बैठे थे। वस्त्र के ऊपर &#8216;उतरी&#8217; लटका दिख रहा था। चेहरे पर शालीनता दिख रही थी। यह भी दिख रहा था कि परिवार में अब कोई वृद्ध नहीं रहा। रत्नेश्वर के पिता का हाल ही में देहांत हुआ है। माँ जीवित हैं। </p>
<p><strong>वैसे महारानी की मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देने से पूर्व इस कल्याणी निवास में बहुत बड़ी राजनीति का बीजारोपण हुआ था, लेकिन बड़ा प्रपौत्र होने के नाते रत्नेश्वर ही महारानी काम सुंदरी जी को अग्नि के रास्ते महादेव और उनके पति तक भेजने का दायित्व लिया। उनके मुखाग्नि के साथ ही महारानी को अपने पति महाराजा कामेश्वर सिंह, अपने ससुर महाराजा रमेश्वर सिंह और महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, देवर (महाराजा के छोटे भाई) राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, उनके पुत्र यज्ञेश्वर सिंह से मुलाकात होगी। रत्नेश्वर सिंह राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के तीन पुत्रों में एक पुत्र यज्ञेश्वर सिंह के पुत्र रत्नेश्वर सिंह हैं। </strong></p>
<p>रत्नेश्वर सिंह के बाएं हाथ कोई पांच फूट की दूरी पर राजा बहादुर के सबसे छोटे पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह के कनिष्ठ पुत्र कपिलेश्वर सिंह बैठे दिखे। कपिलेश्वर सिंह पैंट, कमीज, गोल गले वाला (हाईनेक) स्वेटर, जूता पहने थे। कभी कभार काले रंग का चश्मा भी आँखों के सामने आ जाता था। उनके पीछे कई लोग खड़े थे। सामने कुछ पत्रकारों का जमाव दिखा। सामने उपस्थित सभी लोगों के हाथों में वीडियो बनाने के लिए &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; भी तैयार दिखा। </p>
<figure id="attachment_7238" aria-describedby="caption-attachment-7238" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7238" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7238" class="wp-caption-text">राम नाम सत्य है &#8211; महारानी अनंत यात्रा पर</figcaption></figure>
<p><strong>इस बीच एक व्यक्ति कहते हैं: &#8220;आजकल नेता बनने के चक्कर में हैं। इसलिए स्थानीय अख़बारों में तस्वीर की पूर्ति बनी रहे, सोशल मीडिया पर कहानियां, वीडियो और तस्वीरें चिपकती रहे, कई लोगों को इस कार्य पर लगा रखे हैं। उनकी बातें ख़त्म हुई भी नहीं थी कि एक अन्य व्यक्ति जो न्यूनतम सत्तर वसंत देखे होंगे, कहते हैं: &#8220;सब पैसा का खेल है। सुनते हैं नेताओं के संसर्ग में हैं। यह शायद नहीं जानते कि नेताओं के कारण भी दरभंगा राज का यह हश्र हुआ है। आज अगर अपना अख़बार जिन्दा होता तो महारानी के ऊपर क्या-क्या नहीं लिखा जाता। &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;इंडियन नेशन&#8217; अख़बार में नामी रिपोर्टर थे। विश्वास नहीं होता है तो जिस दिन महाराजाधिराज की मृत्यु हुयी थी, अगले दिन का अखबार देख लो। नेताओं ने ही दरभंगा राज को, अख़बारों को नेश्तोनाबूद कर दिया। खैर भगवान् अच्छजा करें, यही प्राथना करता हूँ। </strong></p>
<p>वैसे महारानी की मृत्यु के बाद अथवा उनकी पार्थिव शरीर जब तक अग्नि में सुपुर्द नहीं हुआ था, वे राष्ट्र की राजधानी, जहाँ वे रहते हैं, से दरभंगा के कल्याणी निवास अथवा माधवेश्वर, जहाँ महारानी का अंतिम संस्कार हुआ, नहीं आये थे। प्रवेश द्वार के बाएं हाथ खड़े कुछ लोग आपस में बात करते सुना कि &#8216;रत्नेश्वर जी सीधा-साधा आदमी है। जब तक महारानी जिन्दा थी, कभी कोई नहीं पूछा था सिवाय रत्नेश्वर के। मेरी आयु आज 65 साल हो गयी है, लेकिन दरभंगा के अख़बारों में कभी नहीं पढ़ा, फोटो नहीं देखा की छोटा कुमार का बेटा महारानी से मिलने, हाल-चाल पूछने आया हो। तभी एक अन्य बुजुर्ग कहते हैं: &#8216;सुनते हैं महाराजा का सभी संपत्ति अब उसी के नाम हो गयी है। जब तक महारानी जीवित थी, तब तक कागजात में जो भी उनके हिस्से ही संपत्ति थी, उनकी थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद दरभंगा राज की सभी संपत्ति अब छोटे वाले को मिल गयी है।&#8221; मैं उनकी बातों को सुन रहा था। </p>
<p>इस बीच उन लोगों की बात को काटते धोती-कुर्ता और स्वेटर, कोट पहने एक शिक्षित व्यक्ति कहते हैं: &#8220;छोटका कुमार के बेटा सब संपत्ति के लेल महारानी पर केस केने छलै। दरभंगा के अख़बार में पढ़ने रहिये। खजाना से आभूषण के चोरी के समाचार सेहो छपल रहै।&#8221; विगत 12 जनवरी को दरभंगा राज की अंतिम महारानी काम सुंदरी देवी का इसी भवन के अंदर लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था। महारानी अपनी अंतिम सांस, ऐसा कहा जाता है, सुबह-सवेरे 3 बजे के आस-पास ली, लेकिन उनकी मृत्यु को कई घंटों तक सार्वजानिक नहीं होने दिया गया था। ऐसा क्यों हुआ यह तो दरभंगा राज से जुड़े लोग, या फिर जो महारानी की देखरेख करते आ रहे थे, बेहतर बताएँगे। </p>
<blockquote><p>लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि कल्याणी निवास से जब यह खबर कल्याणी फॉउंडेशन के बनाने वाले प्रोफ़ेसर हेतुकर झा (अब दिवंगत) के घर पहुंचा, उनके पुत्रद्वय यहाँ पहुंचे। उनका कहना था कि यह महज एक महिला की मृत्यु नहीं हुयी है, बल्कि दरभंगा राज की अंतिम महारानी, जो महाराजा डॉ कामेश्वर सिंह की मृत्यु के करीब 64 वर्ष तक विधवा रही, जिसके कारण ही दरभंगा राज की अब तक की गरिमा बची रही, के अंतिम संस्कार के समय तक उनके परिवार के सभी लोगों का उपस्थित होना आवश्यक है। </p></blockquote>
<p>इस बीच शुभेश्वर सिंह के छोटे पुत्र कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से दरभंगा की ओर निकल गए थे, लेकिन हवाई जहाज में विलम्ब हो रहा था। उनके बड़े भाई राजेश्वर सिंह अमेरिका में सूचित कर दिया गया था और वे भी दरभंगा की ओर निकल गए थे। कुछ लोगों का कहना था कि सभी को कपिलेश्वर सिंह की प्रतीक्षा करनी चाहिए, आखिर खून हैं। </p>
<p>इसके अन्य जो भी कारण हो, सैद्धांतिक रूप में  महारानी की मृत्यु के बाद दरभंगा राज से सम्बंधित, ट्रस्ट्स से सम्बंधित जितनी भी आधिकारिक जवाबदेही है, सम्पत्तियों का स्वामित्व है, &#8216;संपत्ति की वसीयत&#8217; के अनुसार&#8217; स्वतः कपिलेश्वर सिंह को प्राप्त होना है। कपिलेश्वर सिंह भले अपने जीवन काल में अब तक महारानी (उनकी दादी) से अधिकतम तीन बार मिले हों, सम्पत्तियों के लिए उनपर मुकदमें किये हों, उन्हें न्यायालय लाये हों; लेकिन क़ानूनी तौर पर महारानी की मृत्यु के बाद सभी सम्पत्तियों पर उन्हीं का हक़ है। लेकिन हवाई जहाज में बिलम्ब के कारण वे समय निकलता चला जा रहा था। </p>
<p><strong>इसी बीच उस दिन किसी कोने से &#8216;अपशब्द&#8217; हवा में उछला और फिर चाटों की आवाज जो सम्पूर्ण वातावरण को घूमिल कर दिया। कुछ लोग उनका भी इंतज़ार नहीं करना चाहते थे और आनन् फानन में महारानी को मुखाग्नि देकर उन्हें विदा करना चाहते थे, जो व्यावहारिक रूप से गलत था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विगत कई वर्षों से महारानी की देखरेख करने के लिए महारानी के नैहर के एक सम्बन्धी और उनका परिवार करते आया है। स्वाभाविक है, अंतिम संस्कार करने के लिए उनका आगे आना। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह गलत हो जाता है जब महारानी के परिवार के लोग, प्रपौत्र जीवित हैं और वे सबसे बड़े भी हैं। </strong></p>
<figure id="attachment_7239" aria-describedby="caption-attachment-7239" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1.jpg" alt="" width="2048" height="1153" class="size-full wp-image-7239" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-1024x577.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-1536x865.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7239" class="wp-caption-text">राम नाम सत्य है &#8211; महारानी अनंत यात्रा पर</figcaption></figure>
<p>स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, इंटरनेट पर इस खबर को &#8216;कुछ और तरीके से&#8217; प्रस्तुत किया गया, जो दरभंगा राज के लिए शुभ संकेत नहीं देता है। इतना ही नहीं, महारानी को उन अख़बारों में, ख़बरों में जिस तरह प्रस्तुत किया गया &#8211; भारत चीन युद्ध के दौरान उनकी भूमिका, स्वर्ण दान &#8211; यह भी तथ्य से परे था। भारत चीन युद्ध के दौरान महारानी काम सुंदरी की कोई भूमिका नहीं थी, अलबत्ता, बड़ी महारानी राजलक्ष्मी देवी तत्कालीन ट्रस्टी लक्ष्मीकांत झा के द्वारा भारत सरकार के मंत्री मोरार जी देसाई को दी थी। महारानी काम सुंदरी बड़ी महारानी को &#8216;माँ&#8217; स्वरुप मानती थी। मड़ई महारानी की मृत्यु सत्तर के दशक के मध्य हुई। </p>
<p>दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थी, परन्तु कोई संतान नहीं था उन तीनों पत्नियों से। दो महारानियां की मृत्यु पहले हो गई थी। महाराजाधिराज के अंतिम सांस के समय दो महारानियां (बड़ी और सबसे छोटी) और तीन भतीजे थे। ये तीनों भतीजे महाराजाधिराज के भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के पुत्र थे। इन तीनों भाइयों में सबसे बड़े थे राजकुमार जीवेश्वर सिंह, फिर थे राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और सबसे छोटे थे राजकुमार शुभेश्वर सिंह। महाराजाधिराज की मृत्यु के समय सिर्फ राजकुमार जीवेश्वर सिंह का ही विवाह हुआ था और उनकी पत्नी थी श्रीमती राजकिशोरी जी। शेष दो भाई – राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह नाबालिग थे। </p>
<p><strong>राजकुमार जीवेश्वर सिंह अपनी प्रथम पत्नी श्रीमती राजकिशोरी जी के रहते हुए भी, दूसरी शादी भी किए। कुमार जीवेश्वर सिंह के प्रथम पत्नी से दो बेटियां – कात्यायनी देवी और दिब्यायानी देवी हुई और दूसरी पत्नी से पांच बेटियां – नेत्रायणी देवी, चेतना, द्रौपदी, अनीता, सुनीता  – हुई । कहा जाता है की जीवेश्वर सिंह दूसरी शादी अपने ही घर के एक ब्राह्मण, जो उनके पूजा-पाठ इत्यादि का बंदोबस्त करते थे, फूल तोड़ते थे, की बेटी से किये। जीवेश्वर सिंह को दोनों पत्नियों से पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। यह भी कहा जाता है कि किसी भी अन्य सदस्यों की तुलना में जीवेश्वर सिंह अधिक शिक्षित थे और महाराजाधिराज के समय-काल में दुनिया भी देखे थे। दरभंगा राज के लोग उन्हें “युवराज” भी कहते थे।</strong> </p>
<p>कहा जाता है कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद कुमार जीवेश्वर सिंह को महाराजा की संपत्ति से “बेदखल” कर दिया गया। ऐसा क्यों हुआ यह तो शोध का विषय तो है, लेकिन शोध से परे नहीं है। विवाह के बाद जब तक महाराजाधिराज जीवित थे, राज किशोरी दरभंगा के नरगौना पैलेस में ही रहती थीं। बाद में, अपने पति के साथ वे बेला पैलेस आ गई ।तत्कालीन सरकार ने दरभंगा राज के ही किसी ‘महत्वकांक्षी’ व्यक्ति के ताल-मेल से जब बेला पैलेस पर अपनी निगाहें जमा ली, तो राज किशोरी यूरोपियन गेस्ट हाउस में रहने लगीं। लेकिन सरकार की नजर उनके साथ-साथ चल रही थी। यूरोपियन गेस्ट हॉउस भी दरभंगा राज के स्वामित्व से फिसल गया। इसके बाद वे बलभद्रपुर स्थित आवास में ही उनका शेष समय बीता। अपने पति की मृत्यु के बाद राज किशोरी बेहद एकांत में रहने लगी थी। पिछले वर्ष श्रीमती राज किशोरी का देहांत हो गया। वे दरभंगा के लहेरियासराय के बलभद्रपुर मोहल्ले स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। </p>
<p>राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह, जो राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के मझले बेटे थे, को तीन बेटे हुए  – कुमार रत्नेश्वर सिंह, कुमार रश्मेश्वर सिंह और कुमार राजनेश्वर सिंह। इसमें कुमार रश्मेश्वर सिंह की अकाल मृत्यु हो गई थी। अपने मझले बेटे की अकाल-मृत्यु के बाद वे अपने अन्तःमन से टूट गए। जबकि राजबहादुर के सबसे छोटे पुत्र राजकुमार शुभेश्वर सिंह के दो पुत्र हुए – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह। कुमार शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी दोनों वर्षों पहले मृत्यु को प्राप्त किये। </p>
<p><strong>आगे पढ़ें : माधवेश्वर में दरभंगा राज की महिलाओं को वह सम्मान, स्थान  नहीं मिला जिसका वे भी हकदार थीं </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/great-grandmother-passed-away-after-waiting-her-entire-life-for-a-glass-of-water">​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​&#8217;दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र &#8216;राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे&#8217; (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>An end to an era: Maharani Adhirani Kamsundari Devi of Darbhanga died at 94</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Desk Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Jan 2026 14:31:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अन्य]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>Obituary Darbhanga : With the passing of Maharani Adhirani Kamsundari of Darbhanga, an era of royalty in Bihar, and Raj Darbhanga quietly came to an end. Maharani Sahiba, the third wife of Maharajadhiraja Kameshwar Singh, was unwell for some time and passed away at the age of 94. She was married in 1940, widowed in [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>Obituary</strong></p>
<p>Darbhanga : With the passing of Maharani Adhirani Kamsundari of Darbhanga, an era of royalty in Bihar, and Raj Darbhanga quietly came to an end. Maharani Sahiba, the third wife of Maharajadhiraja Kameshwar Singh, was unwell for some time and passed away at the age of 94. </p>
<p>She was married in 1940, widowed in 1962, and went on to establish the Kalyani Foundation and a library in the memory of her late husband. She is survived by her adopted daughter Noor, and her grand nephews and nieces. Ratneshwar Singh, her eldest grand nephew performed her last rites today at the Shyama Mai Temple complex in Darbhanga, where such rituals for the members of the Darbhanga royal family traditionally take place.</p>
<p>Maharani Kameshwari Devi was not a ruling Maharani and did not exercise authority in matters of state or involve herself in politics. Her role was domestic, cultural, and moral—typical of women of her generation in the Mithila community yet was deeply significant. </p>
<p>In her white, seedha palla sari, Maiyyaji was the epitome of grace, carrying her royal status with dignity. She valued order, simplicity, and emotional control. Speech was measured, routines were followed faithfully, and personal hardship was borne without complaint. It is a huge loss to the family and the Raj Darbhanga lineage, and as the next generations the values we have learned from her will be followed in the days to come.</p>
<p>Maharani Sahiba was my great-grand aunt, the eldest in our family, and we called her Maiiyaji. Childhood memories, and a face that was always smiling, always cheerful, flashed through my mind when I heard of her demise, the times we spent with her at Sagar Apartments and Mansingh Road in New Delhi, or at our home in Allahabad, or the kalpwas camps by the Ganga, where Maiyyaji and my grandmother camped, almost every year at the Magh mela. </p>
<p>While Maiyyaji was her mamiya saas (aunt–in-law), being of the same age, they were close friends and called each other by the pet name of ‘Prem” (love), hence spent a lot of time together. </p>
<p>With her passing, the dignity of quiet restraint as a way of life will fade further into memory. She was among the last living links to a royal culture where values were lived daily, without any show of wealth or power. Her absence feels like the closing of a door on an era that shaped me deeply, even before I understood it.</p>
<p>I will always remember her with deep affection, gratitude, and respect—not only as my great grandaunt, but as a reminder of an era gone by. May her soul rest in peace and may the values she embodied continue to live through the next generations and all those who remember her. Pranam Maiiyaji, your blessings will live with us. </p>
<p><strong>— by Vasudha Jha</strong></p>
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		<title>दरभंगा राज की मिट्टी फिर धंसी, शहर-रामबाग को जोड़ने वाली सड़क फिर टूटी &#8211; &#8216;सरकार निद्रा में&#8217;😪</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Dec 2022 05:23:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[adminsitratin]]></category>
		<category><![CDATA[bloodlines]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
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		<category><![CDATA[maharaja]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
		<category><![CDATA[rambag]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा (रामबाग) : दरभंगा ही नहीं, प्रदेश सहित देश-विदेश को कल तक दरभंगा का लालकिला से जोड़ने वाला यह पथ, जो कभी राष्ट्र की राजनीतिक धाराओं को नियंत्रित करता था, आज उसी लालकिले के उत्तराधिकारियों की उपेक्षा के कारण धराशायी होना पड़ा।  वजह &#8211; &#8220;सरकार सोये हुए हैं और दरभंगा राज सहित मिथिला की संस्कृति [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा (रामबाग) : दरभंगा ही नहीं, प्रदेश सहित देश-विदेश को कल तक दरभंगा का लालकिला से जोड़ने वाला यह पथ, जो कभी राष्ट्र की राजनीतिक धाराओं को नियंत्रित करता था, आज उसी लालकिले के उत्तराधिकारियों की उपेक्षा के कारण धराशायी होना पड़ा।  वजह &#8211; &#8220;सरकार सोये हुए हैं और दरभंगा राज सहित मिथिला की संस्कृति बहाल हो रही है &#8211; सोये-सोये।&#8221;</strong></p>
<p>शहर के साथ साथ लालकिले के अंदर दरभंगा राज परिवार के लोगों को जानने-पहचानने वाले तो कुछ और कह रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि इस ऐतिहासिक मार्ग को देखने वाला कोई नहीं है। वैसे किले के अंदर रहने वाले और सम्पत्तियों के स्वामी यह कहते नहीं थकते कि &#8220;वे दरभंगा राज परिवार की, मिथिला की गरिमा और संस्कृति को पुनः स्थापित करने, बहाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।&#8221; लेकिन इस पुल के अस्तित्व को देखकर दरभंगा के लोग कुछ और सोच रहे हैं। </p>
<p>स्थानीय लोग, स्थानीय प्रशासन को दोषी करार करते हैं कि प्रशासन का इस दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है। लेकिन दरभंगा के ही अन्य लोगों का कहना है कि &#8220;यह मार्ग निजी है और उसकी देखरेख, रखरखाव करने का एकमात्र दायित्व दरभंगा राज और ट्रस्ट के लोगों का है। चुकी इस परिसर के अंदर की जमीनों को ट्रस्ट-डीड के विरुद्ध जाकर निजी लाभ के लिए निजी लोगों के हाथों बेचा गया है, इस दृष्टि से विक्रेता का और भी महत्वपूर्ण दायित्व होता है कि वह क्रेताओं को बेहतर मार्ग प्रशस्त करे। बहरहाल, स्थानीय पुलिस इस मामले में एक ट्रेक्टर को पकड़ी है। बेचारा ट्रेक्टर !!!</p>
<p><strong>दरभंगा के आशीष कुमार (पत्रकार) का कहना है कि &#8220;आज पुल अंतिम सांसे गिन रहा है। जिन्हें खतरे का आभास है वो तो बच कर निकल जाते पर अनजान लोगों के लिए जान पर आफत है। आज भी एक दर्दनाक हादसा होते होते बचा है। एक बालू लदा ओवरलोडेड ट्रक पुल से जा रहा था, जानकारी के अभाव में ट्रक समेत टूटे पूल के कारण पोखर में समा गया, उसे तत्काल तत्परता दिखाते हुए अपने जान को जोखिम में डाल कर ट्रक को निकाल दिया गया।&#8221; </strong></p>
<p>दरभंगा के रामबाग पैलेस के मुख्य द्वार पर दरभंगा राज के पूर्व के 20 महाराजाओं की ‘ना’ ‘सही, महाराजा माधव सिंह के बाद से लेकर महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह तक के “सात राजाओं की आत्मा” अवश्य बिलखती होगी, सोचती होगी कि इस परिसर में कल तक तो ‘अनुशासन’ अपनी ‘पराकाष्ठा’ पर थी, रास्ता ‘खास’ था – आज ‘आम’ कैसे हो गया? छोड़िये पीपल के पेड़ को। रहने दें बरगद के बृक्षों को जो दरभंगा के रामबाग किले के चारो तरफ दीवारों में जहाँ-जहाँ छेद दिखा, अपनी जड़ें मजबूत करने में लग गया। यह बात सिर्फ पेड़-पौधों के साथ नहीं, बल्कि दरभंगा के अंतिम महाराजा सर कामेशर सिंह के शरीर को पार्थिव होने के बाद उस चारदीवारी के अंदर या फिर कुछ अपने, कुछ दूर-दराज के सम्बधी, सभी अपना-अपना ठिकाना उन्हीं बृक्षों की भांति रामबाग के छत्रछाया में करने लगे, कुछ जीवन-यात्रा सफल कर लिए, कुछ मसक्कत कर रहे हैं । महाराज की पत्नी महारानी राज्यलक्ष्मी की मृत्यु के बाद इस परिसर का स्वामित्व जिनके हाथों आया उनसे दरभंगा राज की, महाराज की, संस्कृति की, पुरातत्व की, घरोहर की सुरक्षा और संरक्षित रहने की बात सोचा नहीं जा सकता। </p>
<figure id="attachment_4691" aria-describedby="caption-attachment-4691" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2.jpg" alt="" width="1600" height="1090" class="size-full wp-image-4691" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-1024x698.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-768x523.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-1536x1046.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-218x150.jpg 218w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4691" class="wp-caption-text"><br />दरभंगा के ऐतिहासिक रामबाग परिसर को शहर, प्रदेश और देश से जोड़ने वाला पुल मिट्टी में धंसा &#8211; तस्वीर आशिष कुमार पत्रकार</figcaption></figure>
<p><strong>दिनांक 5 जुलाई, 1961 को “दि लास्ट विल एंड टेस्टामेंट” में दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपना वसीयत बनाते समय वसीयत के आठवें पैरा में लिखा है: “I, bequeath the property mentioned in Schedule “A” to my wife Maharani Rajyalakshmi for her life for her residence (and for no other purposes). She shall be entitled to reside in the said house and use the furniture and fittings only without let or hindrance by anybody. After her demise the said property shall vest in my youngest nephew Rajkumar Subheshawra Singh absolutely.“ और महारानी राज्यलक्ष्मी अपने पति और दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज की मृत्यु के 16-वर्ष बाद अंतिम सांस ली। दस्तावेज के अनुसार उक्त संपत्ति महाराजाधिराज के छोटे भतीजे कुमार शुभेश्वर सिंह का हो गया “अब्सॉल्युटली” – आगे कुमार शुभेश्वर सिंह भी मृत्यु को प्राप्त किये। स्वाभाविक है यह संपत्ति उनके दो पुत्रों को हस्तगत हुआ होगा। </strong></p>
<p>लेकिन आज जब महाराजाधिराज के इस ऐतिहासिक परिसर के प्रवेश द्वार पर प्रवेश कर्ज का यह हाल देखा तो मन विह्वलित हो उठा। महाराजाधिराज की आत्मा विलखती होगी। क्योंकि महाराजधिराज वसीयत के 11वें पारा में ऐसा क्यों लिखा की उनकी दोनों पत्नियों की मृत्यु के बाद संपत्ति का एक-तिहाई हिस्सा उनके सबसे छोटे भतीजे, राजकुमार शुभेश्वर सिंह के “हिन्दू ब्राह्मण समुदाय” की पत्नी द्वारा उत्पन्न बच्चों का होगा। </p>
<p>महाराज की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को होती है। उनकी पत्नी महारानी राज्यलक्ष्मी सन 1978 में मृत्यु को प्राप्त कर अपने पति के पास पहुँचती हैं, और 1934  में दरभंगा के लालकिला, यानी रामबाग परिसर के प्रवेश के साथ बाहरी दीवार और किले के अंदर प्रवेश करने के द्वार के बीच बना ऐतिहासिक 86-वर्ष का वृद्ध पुल अपनी रख-रखाव, इस विशाल परिसर के स्वामित्व रखने वाले की उपेक्षा के कारण आंशिक रूप से मृत्यु को प्राप्त करता है, ध्वस्त हो जाता है। कहते हैं  कभी दरभंगा राज परिवार के लोग इसी पुल से एक किले से दूसरे किले जाते थे। यह भी एक धरोहर ही था। ध्वस्त हो भी क्यों नहीं? देखते ही देखते कभी “खास” रास्ता “आम” हो गया। कहते हैं यह पुल तब धंसा जब एक जरूरत-से-अधिक सामानों से लदा ट्रक इस रास्ते से गुजर रही थी। </p>
<p>इतना ही ”ओवरलोडेड”  मानसिक स्थिति होती तो आज महाराजाधिराज का नाम, उनकी संपत्ति इस तरह “ध्वस्त” नहीं ऐसी घटना पहले भी हो चुकी है। उस समय विश्वविद्यालय थाना में ट्रक के मालिक पर प्राथमिकी दर्ज किया गया था। जिला प्रशासन से कई बार ये मांग की थी कि पुल पर से भारी वाहनों को गुजरने से रोका जाय। लेकिन किसी ने रामबाग पैलेस के स्वामी की ओर ऊँगली नहीं उठाया। किसी ने यह नहीं पूछा, जो रास्ता कल तक “खास” था, आज “आम” कैसे हो गया ? कहा जाता है कि इस भव्य किले का निर्माण कोई 240 वर्ष पूर्व राजा प्रताप सिंह के काल में हुआ था। बाद में राजा माधव सिंह के काल-खंड में कुछ पुनर्निर्माण और विस्तार हुआ । </p>
<p>ज्ञातब्य हो कि महाराजाधिराज दिल्ली के लाल किले के तर्ज पर अपने 85 एकड़ की जमीन पर एक किला बनाना प्रारम्भ किये थे जिसका प्रारम्भ 1934 के ऐतिहासिक भूकंप के बाद प्रारम्भ हुआ था। इस किले के निर्माण के लिए ब्रिटिश फर्म के ठेकेदार बैग कैगटीम को जिम्मेदारी दी गई थी। किले के तीन तरफ लगभग 90 फ़ीट ऊंची यह दीवार तैयार की गयी। तीन तरफ तो दीवार बन गई, चौथी तरफ, यानी, पश्चिम इलाके में यह दीवार नहीं बन सका । कुछ लोग कहते हैं कि तीन तरफ दीवार बनते-बनते देश आज़ाद हो गया, जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई, इसलिए पश्चिमी दीवार अछूता रह गया। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि इस किले के पश्चिम इलाके में रहने वाले लोगों शिकायत की कि इस दीवार से उनके घरों में आने वाली रोशनी अवरुद्ध हो गयी है। सभी न्यायालय से न्याय मांगे और और फिर अदालत ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी। खैर।इस किले में लाल ईंटों का प्रयोग किया गया | इसका डिज़ाइन फतेहपुर, सिकरी के बुलंद दरवाज़ा से प्रेरित है | </p>
<figure id="attachment_4692" aria-describedby="caption-attachment-4692" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3.jpg" alt="" width="1600" height="1201" class="size-full wp-image-4692" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-1024x769.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-1536x1153.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4692" class="wp-caption-text"><br />दरभंगा के ऐतिहासिक रामबाग परिसर को शहर, प्रदेश और देश से जोड़ने वाला पुल मिट्टी में धंसा &#8211; तस्वीर आशिष कुमार पत्रकार</figcaption></figure>
<p>इस किले के अंदर दो महल हैं। ऐसा माना जाता है कि राज परिवार की “कुल देवता” यहीं हैं । विगत कई भूकम्पों के दौरान महल नष्ट हो गया। लालकिला कई जगहों से दरक गया। लेकिन तब इसकी मरम्मत का कोई काम नहीं हुआ। फिर 2015 के तेज भूकंप में कई जगहों पर न सिर्फ छतिग्रस्त हुआ बल्कि किले के ऊपरी हिस्से का मलबा सड़को पर भी गिर था। किले की मरम्मत नहीं होने से किला लगातार जर्जर हाल होता जा रहा है। जगह-जगह.दीवाल पर बड़े-बड़े पेड़ निकल आए हैं। कई जगहों पर 10 से 20 फ़ीट तक ऊंची दीवारों में दरार साफ दिखाई दे रही है। दीवार के दक्षिण इलाके में 90 फ़ीट की दीवार घट कर 20-25 फ़ीट ही रह गई है। </p>
<p>महाराजाधिराज के इस ऐतिहासिक किले का क्षेत्रफल में उत्तरोत्तर कमी हो रही है। किले की दक्षिण दीवार की ऊंचाई में भी क्रमशः कम हो रही है। महाराजा कामेश्वर सिंह की जब मृत्यु हुई उसके बाद, उनके उत्तराधिकारियों ने कई महलों के भूखंड को  बेचना शुरू कर दिया था । उन प्लॉटों को खरीदने वाले लोगों ने कॉलोनियों और घरों का निर्माण किया। तो कही,होटल, रेस्तरां और दुकानों को खोला गया |  महाराजाधिराज के वसीयत के शिड्यूल ‘A’ और ‘B’ में उद्धृत सम्पत्तियाँ, यानी महारानी राजलक्ष्मी और महारानी कामसुंदरी को जीवन पर्यन्त रहने के लिए जिन भवनों को महाराज बहुत “स्नेह” और “प्रेम” से लिखा था, ताकि उन्हें महाराज के बिना भी, अपनी अंतिम सांस तक “तकलीफ” नहीं हो; महाराजा की मृत्यु के बाद विगत छः दशकों से उन महलों की दीवारें, महलों की ईंट, बरामदे, खम्भे, छत, परिसर सभी टकटकी निगाहों से सूर्य की रोशनी में प्रत्येक आवक-जावक जीव को देखता आ रहा है, सोचता आ रहा है – कोई उसका भी हाल पूछे !! बारिस में बादलों की गर्जन के साथ भवनों के एक-एक ईंटों के रूह काँप जाते हैं। सभी डर से थर-थर कांपते हैं। परन्तु कोई नहीं आता, कोई नहीं पूछता। चतुर्दिक ‘उपेक्षाओं के पेड़-पौधे, घास-फूस कुकुरमुत्तों जैसा फ़ैल गया है। </p>
<p>बहरहाल, कोई सात सात पहले, बिहार सरकार द्वारा बिहार के एन्सिएंट मोनुमेंट्स एंड आर्किओलॉजिकल साईट्स के अधीन दरभंगा के रामबाग पैलेस को एन्सिएंट मोन्यूमेंट की श्रेणी में रखने से पूर्व लोगों से उनका विचार, ऑब्जेक्शन मांगी थी। जैसे ही लोगों से आपत्ति मांगने से संबंधित सूचना के प्रकाशन के साथ ही दरभंगा राज फोर्ट में रहने वाले लोगों में खलबली मच गई। कोर्ट-मुकदमा हो गया। कला, संस्कृति और युवा विभाग, बिहार सरकार के सचिव, विभाग के उप-सचिव, पुरातत्व विभाग के निदेशक, अधीक्षक (पटना अंचल), दरभंगा के जिला मजिस्ट्रेट, सब-डिविजनल अधिकारी और अंचल अधिकारी प्रतिवादी बन गए।  महाराजाधिराज के भतीजे दिवंगत कुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह – पटना उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि बिहार सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी, आर्ट, कल्चर और यूथ डिपार्टमेंट द्वारा दिनांक 17 अगस्त, 2010 को जारी एक अधिसूचना, जिसमें उपरोक्त अधिकारी ने ‘आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1976 के अधीन लोगों से ‘ऑब्जेक्शन’ मांगे थे की दरभंगा स्थित महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के दरभंगा राज फोर्ट को क्यों नहीं “बिहार एन्सिएंट मोनुमेंट्स एंड आर्किओलॉजिकल साईट्स रिमेंस” के अधीन ले लिया जाय, निरस्त कर दिया जाय। </p>
<p>वादी का कहना था कि नियमानुसार उसी स्थान / भवनों को उक्त नियमों के तहत ‘एन्सिएंट मोनुमेंट्स’ के रूप में नहीं माना जा सकता है जो न्यूनतम 100-वर्ष पूरे नहीं किये हों। और नियमानुसार, दरभंगा राज फोर्ट 100 वर्ष की आयु के नहीं हैं, अतः नियमनुसार यह ‘एन्सिएंट मोनुमेंट्स’ के रूप में नहीं माना जा सकता। नियमों के अनुसार, कोई भी ऐसी चीज जो 100 साल या इससे अधिक पुरानी हो तो वह ‘पुरातात्विक’ है। इस ऐतिहासिक निर्णय का श्रेय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के एंटीक्वटीज एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1972 को जाता है। यह कानून 1976 से लागू हुआ। इसका मकसद भारतीय सांस्कृतिक विरासत की बहुमूल्य वस्तुओं की लूट और उन्हें गैर-कानूनी माध्यमों से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाना था। वैसे, इसके सिर्फ नकारात्मक और अनपेक्षित परिणामों का अतिरेक ही सामने आया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह कानून इतने कड़े और अभावग्रस्त नियमों से भरा हुआ है कि बेईमान ‘कला के सौदागर’ सरकारी अधिकारियों और कस्टम अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अपना रास्ता निकाल ही लेते है।  </p>
<p><strong>सवाल यह है कि रामबाग परिसर में पैसे के लिए जमीन बिकेगी, भवन निर्माण होगा तो जमीन के क्रेता/भवन निर्माण कर्ता तो भवन निर्माण सामग्री लाएंगे ही। दूकान ही खोल दिए। पिछले कुछ सालों में एक बड़ी आबादी बस गई है। आप कुछ कर सकते नहीं। बेचारे महाराजाधिराज की आत्मा भी रामबाग परिसर में कराहती होगी। दरभंगा के लोगों का मानना है कि दरभंगा राज की नींव क्रमशः कमजोर हो रही है। उनके पुरखों का उदाहरण देकर जिस दरभंगा राज की गरिमा की, यहाँ के राजा-महाराजाओं की वर्चस्व की चर्चाएं की जाती थी, आज समय के गर्त में धूमिल हो गई है। आज दरभंगा राज की गरिमा समाप्त हो गयी है। लेकिन वे स्वयं में इतना सामर्थ नहीं जुटा पा रहे हैं कि वे दरभंगा राज की गरिमा को पुनः स्थापित कर सकें। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/state/darbhanga-raj-soil-sank-again-connectivity-broken">दरभंगा राज की मिट्टी फिर धंसी, शहर-रामबाग को जोड़ने वाली सड़क फिर टूटी &#8211; &#8216;सरकार निद्रा में&#8217;😪</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम का एक प्रयास: &#8216;कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट&#8217; में &#8216;मिथिला का प्रतिनिधित्व&#8217; हो, अधिकारी ने कहा: &#8220;वंडरफुल इनिसिएटिव&#8221; </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Apr 2022 06:20:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[assam]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[goverrnment]]></category>
		<category><![CDATA[kamakhya]]></category>
		<category><![CDATA[maharaja]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गौहाटी :  आज जब सम्पूर्ण भारत &#8220;आज़ादी का अमृत महोत्सव&#8221; मन रहा है, आज़ादी के पूर्व और आज़ादी भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों के विकास में अहम् भूमिका अदा करने वाले दरभंगा के महाराजाओं &#8211; लक्ष्मेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और डॉ सर कामेश्वर सिंह &#8211; के सम्मानार्थ तथा मिथिला की सांस्कृतिक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गौहाटी :  आज जब सम्पूर्ण भारत &#8220;आज़ादी का अमृत महोत्सव&#8221; मन रहा है, आज़ादी के पूर्व और आज़ादी भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों के विकास में अहम् भूमिका अदा करने वाले दरभंगा के महाराजाओं &#8211; लक्ष्मेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और डॉ सर कामेश्वर सिंह &#8211; के सम्मानार्थ तथा मिथिला की सांस्कृतिक गरिमा को पुनः बहाल करने के उद्देश्य से नीलांचल पहाड़ पर स्थित कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट में &#8220;मिथिला का एक प्रतिनिधि&#8221; हेतु एक विशेष पहल किया गया है। इस पहल को कामरूप कामाख्या के अधिकारी ने &#8220;वंडरफुल इनिसिएटिव&#8221; बताया और विश्वास दिलाया कि परिणाम &#8220;सकारात्मक&#8221; ही होगा।  </p>
<p>भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के गुमनाम क्रांतिकारियों के वंशजों की खोज कर रहे INDIANMARTYRS.IN नामक संस्था और दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डाक्टर सर कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित &#8216;दी इण्डियन नेशन और &#8216;आर्यावर्त&#8217; (अब मृत) अख़बारों के नामों को और महाराजाओं की गरिमा को पुनः स्थापित करने वाला वेबसाइट https://www.aryavartaindiannation.com  प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री हिमंता बिस्वा सर्मा और कामरूप कामाख्या के प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र भी लिखा है। </strong></p>
<p>कोई 40-पृष्ठ के दस्तावेजों के साथ लिखे गए पत्र में असम सरकार और कामरूप कामाख्या के अधिकारियों से निवेदन किया गया है कि नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर और उसके ऊपर भुनेश्वरी मंदिर में, आस-पास के इलाकों के विकास में दरभंगा के तत्कालीन महाराजा रामेश्वर सिंह और तत्पश्चाय्त उनके बड़े पुत्र महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह का योगदान आज भी जीवित है। इस बात का जिक्र करते कि असम और गौहाटी के लोग आज भी दरभंगा के महाराजाओं की उदारता को याद रखे हुए हैं, पत्र आगे लिखता है कि मिथिला के महाराजाओं और भारत में कोई चार करोड़ मैथिलों के सम्मानार्थ कामाख्या मंदिर ट्रस्ट में मिथिला से एक प्रतिनिधि को स्थान दिया जाय।    </p>
<p>पत्र में इस बात की भी चर्चा की गई है कि दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह, जो कामाख्या शक्तिपीठ के एक सिद्ध पुरुष भी थे, जिन्होंने भुनेश्वरी मंदिर के एक गेस्ट हॉउस भी बनाया था (आज उस पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्ज़ा है) की मृत्यु 1929 में हुई। महाराजा रामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह दरभंगा राज का बाग़-डोर संभाले। कामाख्या के विकास और असम के लोगों के विकास के लिए उनका भी योगदान अक्षुण रहा। डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु आज से कोई छः दशक पूर्व देश की आज़ादी के कोई 14 वर्ष बाद 1 अक्टूबर, 1962 को हुई।</p>
<figure id="attachment_3912" aria-describedby="caption-attachment-3912" style="width: 1000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya.jpeg" alt="" width="1000" height="1503" class="size-full wp-image-3912" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya.jpeg 1000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya-200x300.jpeg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya-681x1024.jpeg 681w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya-768x1154.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3912" class="wp-caption-text">कामरूप कामाख्या मंदिर</figcaption></figure>
<p><strong>महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद दरभंगा राज में उनका अपना कोई रक्त-सम्बन्ध नहीं था, सिवाय उनकी पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के अलावे। महाराजाधीरज की तीन पत्नियां थी, लेकिन सभी संतानहीन रहीं।  उनकी मृत्यु के बाद उनके द्वारा बनाये गए वसीयत नामा और बाद में फेमिली सेटेलमेंट के तहत दरभंगा राज की सम्पत्तियाँ उनकी &#8220;विधवाओं&#8221; और उनके छोटे भाई राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के संतानों में विभक्त कर दिया गया। सम्पत्तियों की ओर सबों का रुझान इतना अधिक हो गया की दरभंगा राज की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक और अन्य क्षेत्रों की गरिमा क्रमशः मिट्टी पलीद होती चली गई।</strong> </p>
<p>पत्र में यह भी लिखा गया है कि चुकी महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी (विधवा) महारानी अधिरानी कामसुन्दरी भी अपने जीवन के 92 वें वसंत को पार कर चुकी हैं और ढलती उम्र तथा गिरते स्वास्थ्य के कारण वे अपने पति और ससुर की इक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ पा रही हैं। कोई चौदह वर्ष पूर्व सं 2008 के जून महीने में महारानी कामरूप कामाख्या मंदिर में स्वयं पूजा-अर्चना की थी और उस समय इस बात पर चर्चा की गई थी की मिथिला के लोगों के सम्मानार्थ, महाराजाओं के सम्मानार्थ कामरूप कामाख्या मंडित ट्रस्ट में मिथिला का एक प्रतिनिधि को स्थान मिले। </p>
<p>लेकिन दरभंगा राज के तरफ से, खासकर जो उनके पति की मृत्यु के बाद उनकी सम्पतियों के लाभार्थी हुए, किसी के तरफ से कोई यत्न नहीं किया गया। आज महारानी अधिरानी कामसुन्दरी का स्वास्थ्य बहुत बेहतर नहीं है। ईश्वर न करे, लेकिन प्रारब्ध और नियति को कौन टाल सकता है; महारानी अधिरानी अगर आँख बंद कर लेती हैं तो दरभंगा राज में दरभंगा के महाराजा के &#8220;प्रत्यक्ष रक्त सम्बन्ध&#8221; का मनुष्य का भी अंत हो जायेगा, साथ ही, वे अपने पति और ससुर की सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक गरिमा को बिना बहाल किये, पूरा किये इस लोक से प्रस्थान कर लेंगी, जो अच्छा संकेत नहीं होगा। </p>
<p><strong>पत्र में लिखा गया है: &#8220;आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम और इण्डियनमार्टियर्स(डॉट)इन का आपसे निवेदन है कामाख्या ट्रस्ट में स्थापना काल से महाराजा रामेश्वर सिंह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उनके पश्चयात महाराजा कामेश्वर सिंह भी सकारात्मक कार्य किये। लेकिन महाराजा की मृत्यु के बाद दरभंगा राज में ऐसा कोई &#8216;पुरुष&#8217; नहीं बचा जो दरभंगा राज की, महाराजाधिराज की गरिमा और संस्कृति को बचा सके। समयांतराल कामरूप कामाख्या में भी दरभंगा की भूमिका नगण्य होती गयी और लोगों के मानस पटल से मिथिला का नाम मिटने लगा, मिट गया। कामाख्या ट्रस्ट में दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह की भूमिका को मद्दे नजर, भुनेश्वरी मंदिर के निर्माण में उनकी भूमिका को ध्यान में रखकर, मिथिला के लोगों के सम्मानार्थ, दरभंगा राज के सम्मानार्थ &#8211; कामरूप कामाख्या ट्रस्ट में एक स्थायी स्थान दिया जाय। हम सबों का यह प्रयास सम्पूर्ण मिथिला के लिए बहुत प्रभावकारी होगा।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_3913" aria-describedby="caption-attachment-3913" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1.jpeg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-3913" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3913" class="wp-caption-text">कामरूप कामाख्या</figcaption></figure>
<p>दोनों संस्थाओं के इस पहल को &#8220;बेहतर&#8221; बताये हुए, कामरूप कामाख्या के अधिकारी ने कहा कि &#8220;यह एक अद्भुत, आश्चर्यजनक प्रयास है। इस दिशा में हम कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट के लोगों से बात कर इस विषय को अवश्य देखेंगे।&#8221; सूत्रों के अनुसार कामरूप कामाख्या के अधिकारियों और कामरूप प्रशासन शीघ्र ही कामाख्या मंदिर ट्रस्ट के चयनित पदाधिकारियों से ट्रस्ट में मिथिला (दरभंगा राज) के करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए &#8220;एक स्थान&#8221; हेतु वार्तालाप करेगी। कामाख्या मंदिर में दशकों पूर्व दरभंगा के महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह के योगदान को मद्दे नज़र मंदिर के ट्रस्ट में मिथिला/दरभंगा राज की और से एक प्रतिनिधि को उचित स्थान मिले; के लिए प्रदेश के राज्यपाल जगदीश मुखी से भी मिलने का कार्यक्रम है। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि दरभंगा के महाराजा सर लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु 122 वर्ष पहले हुयी। उनकी मृत्यु के उपरांत दरभंगा राज की गद्दी पर बैठने वाले उनके अनुज महाराजा सर रामेश्वर सिंह की मृत्यु भी करीब 91 वर्ष पहले हुई । तत्पश्चाय्त महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह को भी 59 वर्ष से अधिक जो गए इस पृथ्वी को छोड़े हुए। परन्तु 12 जून सं 1897 से लेकर आज तक महाराजा का वचन पूरा नहीं हो सका। हो भी कैसे? महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद तो दरभंगा राज की सम्पत्ति कौड़ी-जैसा लोगों ने लुटा – कुछ अपने, कुछ पराए – फिर शक्तिपीठ कामरूप कामाख्या मंदिर में दिए गए उस सम्मानित वचन को पूरा करने वाला शायद आज की पीढ़ी मेंकोई है अथवा नहीं, यह खरबों का प्रश्न है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्यादरभंगा राज की वर्तमान पीढ़ी मिथिलाञ्चल के लोगों की सांस्कृतिक अस्तित्व औरगरिमा बचा पायेगी जिसके लिए दरभंगा के महाराजाओं ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिए ? </p>
<p>कोई चौदह वर्ष पहले महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की पत्नी महरानी अधिरानी कामसुन्दरी देवी कामाख्या की यात्रा पर थीं। एक उत्सव था महारानी की यात्रा। उस  यात्रा के दौरान कामाख्या मंदिर अथवा नीलांचल पर्वत श्रंखला पर स्थित शायद ही कोई मनुष्य रहा होगा, जो उस उत्सव में शामिल नहीं हुआ होगा। कामाख्या मंदिर के सभी पण्डितगण महारानी की अगुआई किए थे। महारानी भी अपने पुरखों द्वारा संपन्न सभी कार्यों को देखीं। वे भुनेश्वरी मंदिर भी देखीं जहाँ उनके ससुर महाराजा रामेश्वर सिंह माँ काली की साधना करते थे । उस यात्रा के दौरान एक सवाल व्ही उठाया गया था कि “असम के इस कामरूप कामख्या मंदिर के अध्यक्ष थे उनके ससुर – महाराजा रामेश्वर सिंह और दरभंगा राज और महाराजाओं का इस मंदिर और आसपास के क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान – था, फिर कामाख्या मंदिर के ट्रस्ट में राज दरभंगा का एक स्थायी-सदस्य क्यों नहीं है? वैसे भी महाराजा रामेश्वर सिंह कामाख्या मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। लोगों ने महारानी साहेब के इस कथन का ह्रदय से स्वागत किया था, सर-आंखों पर लिया। </p>
<p>लेकिन फिर क्या हुआ? क्यों नहीं दरभंगा राज के वंशज इस दिशा में अग्रसर हुए? क्या राज दरभंगा की सदस्यता सिर्फ मिथिलाञ्चल के करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करता? क्या दरभंगा राज की आज  की पीढ़ियों में इतनी क्षमता नहीं है जो अपने पूर्वजों की संस्कृति-गरिमा को बचा सकें? अनंत सवाल है। </p>
<figure id="attachment_3914" aria-describedby="caption-attachment-3914" style="width: 872px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1.jpeg" alt="" width="872" height="543" class="size-full wp-image-3914" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1.jpeg 872w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1-300x187.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1-768x478.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 872px) 100vw, 872px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3914" class="wp-caption-text">महाराजा रामेश्वर सिंह</figcaption></figure>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह का कामाख्या मंदिर में ऐतिहासिक योगदान है। सर हेनरी कॉटन के ज़माने में जब भयंकर भूकंप आया था, महाराजा रमेश्वर सिंह कामाख्या मंदिर, भुनेश्वरी मंदिर , आस-पास के क्षेत्रों का विकास किया था। असम में लाखों-लाख एकड़ जमीन दरभंगा राज का है। महाराजा रामेश्वर सिंह कामाख्या मंदिर के अध्यक्ष भी थे। दशकों पहले डॉ हेतुकर झा, जो महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन के संस्थापक-प्रबंधक ट्रस्टी थे, आवाज भी बुलंद किये की क्यों न कामाख्या मंदिर ट्रस्ट में राज दरभंगा का एक स्थायी सदस्य पुनः स्थापित किया जाय. साथ ही, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से दरभंगा महाराजाओं की कीर्तियों को बरकरार कर पुनः स्थापित करे। </p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य है। शिक्षित मनुष्य अथवा जो आज ही नहीं, आने वाले समय में भी शिक्षा के महत्व को समझेगा, वही दरभंगा राज या महाराजा श्री लक्ष्मेश्वर सिंह से लेकर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह तक के ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से इन तथ्यों को समझेगा, बचाने का प्रयास करेगा। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज के समय में सम्पूर्णता के साथ शिक्षा और सोच का नामोनिशान ख़त्म हो गया है, ख़त्म हो रहा ही। राज दरभंगा के महाराजा की कीर्तियाँ मिट्टी में मिल गई हैं। सबों की निगाहें अंततः उनकी संपत्तियों पर जा टिकी है, फिर आप क्या उम्मीद करते हैं कि महाराजा, महाराजाधिराज या महारानीजी की सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक इत्यादि क्षेत्रों में जो योगदान हैं – वह बच पायेगा ? कभी नहीं। </p>
<p>जब महाराजा रमेश्वर सिंह अपने मानवीय-धार्मिक-राजनीतिक कार्यों के उत्कर्ष पर थे उसी समय सर हेनरी कॉटन भारत के असम के तत्कालीन चीफ़ कमीशनर से प्रभार लेकर असम के नए कमीश्नर बन गए थे। इन राज्यों में 12 जून, 1897 को भूकंप आया था। इस भूकंप और उसके बाद महाराजा रमेश्वर सिंह का योगदान ‘स्वर्णाक्षरों” में लिखने योग्य है।  लेकिन लिखेगा कौन? यहाँ तो सभी सोने के पीछे भाग रहे हैं। </p>
<p>टाईम्स ऑफ़ इण्डिया ने एक बेहतरीन सम्पादकीय भी लिखा था उन दिनों जो इस बात का गवाह है कि तत्कालीन महाराजा दरभंगा श्री रामेश्वर सिंह जी और उनके पूर्व उनके अग्रज महाराजा श्री लक्ष्मेश्वर सिंह न केवल अपने सल्तनत के लोगों के लिए चिंतित रहते थे, बल्कि देश की सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा के विकास और आर्थिक उन्नति के लिए भी उतने ही संवेदनशील थे। उनके ह्रदय में अपने परिवार और परिजनों के प्रति सकारात्मक विचार प्रति-पल उद्वलित होते थे। लेकिन आज और आज की पीढ़ी अपने पूर्वजों के उस सम्मान को, उस संवेदना को, बरकरार रखी ? असम के लोग कहते हैं – नहीं। </p>
<figure id="attachment_3915" aria-describedby="caption-attachment-3915" style="width: 594px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2.jpeg" alt="" width="594" height="1024" class="size-full wp-image-3915" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2.jpeg 594w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2-174x300.jpeg 174w" sizes="auto, (max-width: 594px) 100vw, 594px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3915" class="wp-caption-text">उन दिनों लिखा गया टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का सम्पादकीय</figcaption></figure>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह, दरभंगा, मिथिला एक असाधारण देवी रहस्य के जानकार और साधक तथा देवी रहस्य के विज्ञान और तकनीकी के प्रतिपादक  थे। उनकी दिनचर्या था कि वे 2 बजे पूर्वाहन में उठकर बिछावन पर हीं दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ पूर्ण करने के उपरांत 3.30 बजे स्नान करने के बाद संध्या वंदन और सहस्त्र गायत्री जप तदुपरांत एक मन चावल से पिण्ड दान, फिर ब्रह्म मुहूर्त में पार्थिव शिवलिंग की पूजा के बाद देवी भगवती के मंदिर के लिए प्रस्थान करते थे, वहां तांत्रिक विधि से तंत्र  संध्या, पात्रस्थापन के बाद भगवती  काली की उपासना आवरण पूजा, जप, पञ्चांग पाठ और उसके बाद पुष्पांजलि के साथ ककरदी  सहस्त्रनाम उसके बाद कुमारी, सुवासिनी, बटुक का पूजन तर्पण और महा प्रसाद लेने के बाद एक घंटा आराम के बाद 11 बजे से 3.30 बजे तक राजकाज  देखते थे । </p>
<p>उसके बाद स्नान करने के बाद  वैदिक संध्या वंदन और गयात्री जप और प्रदोष समय के अन्तराल में पार्थिव पूजा संपन्न करते थे l रात्रि में वे सांगोपांग निशार्चन, 108 ब्राह्मण सामूहिक रूप से दुर्गा सप्तसती का पाठ और 51 ब्राह्मण से  रुद्राभिषेक संपन्न कराते थे । महाराजा अपनी पूरी जीवन महानुष्ठान में परिवर्तित कर दिये थे l वे काफी पढ़े लिखे और महान विद्वान थे l अंग्रेजी, फ्रेंच, बंगाली,  मैथिलि, हिंदी, संस्कृत, फारसी  के विशेषज्ञ थे l वे तंत्र विज्ञान के मास्टर के साथ वेदान्त, सांख्य योग . व्याकरण के अच्छे जानकार थे।” </p>
<p>12 जून, 1897 उत्तर-पूर्व भारत में आये भूकंप के बाद जिस सम्मान के साथ दरभंगा राज के महाराजाओं ने गौहाटी के ऐतिहासिक कामाख्या मंदिर का जीर्णोद्धार किये, जिस तरह नीलांचल पर्वत पर स्थित भुनेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार किये, उसी नीलांचल पर्वत श्रृंखला पर ऐतिहासिक आठ-कमरों का आवास बनाये, कामाख्या संस्था को दरभंगा की मिट्टी रहते मंदिर  और उसके आस-पास के क्षेत्रों का विकास करने के प्रति वचनबद्धता दिखाए, जिस तरह कामाख्या संस्था के तत्कालीन पंडितों से लेकर अधिकारियों तक दरभंगा राज के एक सदस्य को कामाख्या ट्रस्ट में आजीवन-सदस्यता हेतु वचनबद्धता दिखाए – आज तक किसी ने चूं तक नहीं किये। </p>
<p>परिणाम: असम राज्य में महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह से लेकर महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह तक अर्जित लाखों-लाख एकड़ भूमि और अन्य सम्पत्तियाँ न केवल मिथिलांचल से प्रवासित लोगों ने अधिपत्य जमा लिए। इतना ही नहीं भुनेश्वरी मंदिर के पास नीलांचल पर्वत पर बना वह पुरात्तव जैसा आवासीय महल पर भी कब्ज़ा है। कामाख्या के स्थानीय लोगों का कहना है कि उस भवन में कोई व्यक्ति विगत पांच दसक से भी अधिक समय से रह रहे हैं। इस दिशा में न तो कभी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट अथवा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाऊंडेशन द्वारा पहल किया गया। </p>
<p>टाईम्स ऑफ़ इण्डिया का यहसम्पादकीय महाराजा सर रामेश्वर सिंह की कामाख्या यात्रा के साथ-साथ स्थानीय लोगोंकी शिकायतों के निवारण के इर्द-गिर्द लिखा गया है। इस लेख से यह भी स्पष्ट है किकैसे महाराजा रामेश्वर सिंह अपने बड़े भाई महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह के कार्यों कीभूरी-भूरी प्रसंशा किये थे; बल्कि इस बात को भी स्पष्ट लिखा है कि वे सामाजिककार्यों में, स्थानीय लोगों के कल्याणार्थ, अपने बड़े भाई के पदचिन्हों पर ही चलेंगे।यह भी उद्धृत किया है कि कैसे महाराजा साहेब ने तत्कालीन असम के कमिश्नर द्वाराकिये गए कार्यों की प्रशंसा किये हैं। साथ ही, तत्कालीन हुकूमत और व्यवस्था मेंदरभंगा राज की पकड़ के कारण लोगों को विस्वास दिलाये की वे स्थानीय लोगों केकल्याणार्थ वह सभी कार्य निष्पादित करेंगे, जो बड़े भाई करते थे। साथ ही, यह भीविस्वास दिलाया की उनकी बातों को व्यवस्था कभी भी ठुकराएगी नहीं</p>
<p>अपने बड़े भ्राता के मृत्यु के उपरान्त वे सन 1898 में  महाराजा बने और जीवन पर्यन्त महाराजा रहे। वे भारतीय सिविल सेवा में भर्ती हुए थे और दरभंगा, छपरा तथा भागलपुर में सहायक मजिस्ट्रेट भी रहे। लेफ्टिनेंट गवर्नर की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले वे पहले भारतीय थे। वह 1899 में भारत के गवर्नर जनरल की भारत परिषद के सदस्य थे और 21 सितंबर 1904 को एक गैर-सरकारी सदस्य नियुक्त किये गए थे जो बम्बई प्रान्त के गोपाल कृष्ण गोखले के साथ बंगाल प्रांतों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।</p>
<p>वे बिहार लैंडहोल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष, ऑल इंडिया लैंडहोल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष, भारत धर्म महामंडल के अध्यक्ष, राज्य परिषद के सदस्य, कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल के ट्रस्टी, हिंदू विश्वविद्यालय सोसायटी के अध्यक्ष, एम.ई.सी. बिहार और उड़ीसा के सदस्य और भारतीय पुलिस आयोग के सदस्य(1902–03) थें। उन्हें 1900 में कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया गया था। वे भारत पुलिस आयोग के एकमात्र सदस्य थे, जिन्होंने पुलिस सेवा के लिए आवश्यकताओं पर एक रिपोर्ट के साथ असंतोष किया, और सुझाव दिया कि भारतीय पुलिस सेवा में भर्ती एक ही परीक्षा के माध्यम से होनी चाहिए। केवल भारत और ब्रिटेन में एक साथ आयोजित किया जाएगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भर्ती रंग या राष्ट्रीयता पर आधारित नहीं होनी चाहिए। इस सुझाव को भारतीय पुलिस आयोग ने अस्वीकार कर दिया। </p>
<p>उन्हें 26 जून 1902 को नाइट कमांडर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एंपायर (KCIE) के नाम से जाना गया, 1915की बर्थडे ऑनर्स लिस्ट में एक नाइट ग्रैंड कमांडर (GCIE) में पदोन्नत किया गया और उन्हें नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का नाइट कमांडर नियुक्त किया गया, 1918 बर्थडे ऑनर्स लिस्ट में सिविल डिवीजन (KBE) में। </p>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह जिनके चिता पर दरभंगा (मिथिला ) में श्यामा काली की भव्य मूर्ति स्थापित है, भारत के महान साधक थे l  वे असम के कामाख्या मंदिर के प्रेसिडेंट थे और असम में  हुए1898 के भूकंप से हुए क्षतिग्रस्त मंदिर का निर्माण कराये थे। वे एक उदार राजा थे जरूरतमंद को मदद करते थे । उनकी अदम्य इच्छा थी कि  तंत्र के वैज्ञानिक  पहलू को लोग समक्षे । इसी निमित 1908 में उन्होंने तंत्र के सभी प्रमुख विद्वानों का कांफ्रेंस दरभंगा में आयोजित किये थे जिसमे विद्वान ब्राह्मण, महान साधक और वैज्ञानिक उपस्थित हुए थे । </p>
<p>वैधनाथ धाम के पंडित प्रकाश नन्द झा, काशी के पंडित शिवचरण भट्टाचार्य, श्रीविद्या साधक पंडित सुब्रमन्यम शास्त्री, जॉन वुडरोफ्फ़ अगम अनुसंधान समिति कोलकाता के प्रेसिडेंट प्रमुख थे। वह जॉन वुड रुफ्फ़ थे जिन्हें तंत्र ज्ञान और रहस्य को पश्चिमी जगत को रूबरू कराने का श्रेय जाता है उनके साथ इवान स्टीवेंसन, ब्रिटेन के महान चिकित्सक और वैज्ञानिक जिनका नाम विलियम होप्किंसों भी आये थे। इस अवसर पर महाराजा रमेश्वर सिंह के मित्र पटियाला के महाराज भूपेंद्र सिंह भी आये थे । वे भी देवी शक्ति  के बड़े साधक हो गये थे । महाराजा  स्वंय अपने मेहमान को नजदीक के स्थान भगवती उग्रतारा पीठ, महिषी ले गये थे । </p>
<p>तीन- चार दिनों के इस भ्रमण में विदेशी विद्वानों ने तंत्र साधना के वैज्ञानिक सत्य को आत्मसात करना प्रारम्भ कर दिया था। इसलिए आज प्रातः इस विशेष सम्मेलन का प्रारम्भ हुआ तो वे भी उत्साहपूर्वक भागीदारी कर रहे थे। इसकी अध्यक्षता का भार पं. शिवचन्द्र भट्टाचार्य पर था, जिन्होंने स्वयं महाराज को तन्त्र साधना के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन दिया था। इसी के साथ वह जॉन वुडरफ के भी दीक्षा गुरु थे। महाराज जी की प्रेरणा से ही सर जॉन वुडरफ ने पण्डित शिवचन्द्र भट्टाचार्यसे शक्ति साधना की दीक्षा ली थी। वह कह रहे थे- तन्त्र दरअसल सृष्टि के विराट अस्तित्त्व में एवं व्यक्ति के स्वयं के व्यक्तित्व में प्रवाहित विविध ऊर्जा प्रवाहों के अध्ययन- अनुसन्धान एवं इनके सार्थक सदुपयोग का विज्ञान है। तंत्र मानता है कि जीवन एवं सृष्टि का हर कण शक्ति से स्पन्दित एवं ऊर्जस्वित है। यह बात अलग है कि कहीं यह शक्ति प्रवाह सुप्त है तो कहीं जाग्रत्। इस शक्ति की अभिव्यक्ति यूं तो अनन्त रूपों में है, पर इसकी मूलतः दशमहाधाराएँ हैं, जिन्हें दश महाविद्या कहा जाता है। </p>
<figure id="attachment_3916" aria-describedby="caption-attachment-3916" style="width: 775px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3.jpeg" alt="" width="775" height="450" class="size-full wp-image-3916" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3.jpeg 775w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3-300x174.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3-768x446.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 775px) 100vw, 775px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3916" class="wp-caption-text">उन दिनों लिखा गया टाइम्स ऑफ़ इण्डिया</figcaption></figure>
<p>पं. शिवचन्द्र भट्टाचार्य तन्त्र के मूलभूत वैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित कर रहे थे। वे बता रहे थे कि विराट् ब्रह्माण्ड में प्रवाहित ये शक्ति प्रवाह व्यक्ति में प्राण प्रवाह के रूप में प्रवाहित हैं। ब्रह्माण्ड में इन्हीं प्रवाहों से सृष्टि सृजन हुआ है। इसी के साथ उन्होंने निवेदन किया कि व्यक्ति में प्राण प्रवाह के रूप में प्रवाहित इन शक्ति धाराओं का स्वरूप विवेचन महाराज रमेश्वर  सिंह करेंगे एवं ब्रह्माण्ड व्यापी इनके स्वरूप की विवेचना स्वयं महापण्डित सुब्रह्मण्यम् शास्त्री करेंगे। आचार्य शिवचन्द्र के इस निर्देश को थोड़ा संकोचपूर्वक स्वीकारते हुए महाराज उठे। उनका भरा हुआ गोल चेहरा, रौबदारमूँछे, औसत कद, गेहुँआ रंग, माथे पर श्वेत भस्म का ऊर्ध्व तिलक उन्हें भव्य बना रहे थे।  </p>
<p>उन्होंने कहना प्रारम्भ किया- योग शास्त्र में वर्णित पाँच प्राण एवं पाँच उपप्राण ही दरअसल व्यक्ति के अस्तित्त्व में व्याप्त दश महाविद्याएँ हैं, जो व्यक्ति को विराट् से जोड़ती हैं। इनमेंआदिविद्या महाकाली एवं तारा अपान एवं इसके उपप्राण कूर्म के रूप में जननेन्द्रिय में वास करती हैं। षोडशी एवं भुवनेश्वरी प्राण एवं इसके उपप्राण नाग के रूप में हृदय में स्थित है। भैरवी एवंछिन्नमस्ता उदान एवं देवदत्त के रूप में कण्ठ स्थान में निवास करतीहैं। धूमावती एवं बगलामुखीसमान एवं कृकल के रूप में नाभिप्रदेश में स्थित हैं। मातंगी एवं कमला व्यान एवं धनञ्जय के रूप मेंमस्तिष्क में अवस्थित हैं। ऐसा कहकर महाराज थोड़ा रूके और बोले- मैंने महामायाके इन रूपों का स्वयं में इसी तरह से साक्षात्कार किया है। </p>
<p>महाराज के अनुभव परक ज्ञान ने सभी को विमुग्ध किया। आचार्य शिवचन्द्र का संकेत पाकर महाराज के बैठने के पश्चात् महापण्डित सुब्रह्मण्यम् शास्त्री उठे। इन्होंने अभी कुछ वर्षों पूर्व महाराज रमेश्वर  सिंह को तन्त्र साधना की साम्राज्य मेधा नाम की विशिष्ट दीक्षा दी थी। उनका स्वर ओजस्वी था, उन्होंने गम्भीर वाणी में कहना प्रारम्भ किया- इस अखिल ब्रह्माण्ड में आदिविद्यामहाकाली शक्ति रात्रि १२ से सूर्योदय तक विशेष सक्रिय रहती हैं। ये आदि महाविद्या हैं, इनके भैरव महाकाल हैं और इनकी उपासना महारात्रि में होती है। </p>
<p>महाविद्या तारा के भैरव अक्षोम्य पुरुष हैं, इनकी विशेष क्रियाशीलता का समय सूर्योदय है एवं इनकी उपासना का विशेष समय क्रोधरात्रि है। षोडशी जो श्रीविद्या है, इनके भैरव पञ्चमुख शिव हैं। इनकी क्रियाशीलता का समय प्रातःकाल की शान्ति में है। इनकी उपासना काल दिव्य रात्रि है। चौथी महाविद्या भुवनेश्वरी के भैरव त्र्यम्बकशिवहैं। सूर्य का उदय काल उनकी सक्रियता काल है। इनकी उपासना सिद्धरात्रि में होती है। पाँचवीमहाविद्या भैरवी है इनके भैरव दक्षिणामूर्ति हैं। इनका सक्रियता काल सूर्योदय के पश्चात् है। इनकी उपासना कालरात्रि में होती है छठवी महाविद्या छिन्नमस्ता है, इनके भैरव कबन्धशिव हैं। मध्याह्न सूर्य का समय उनकी सक्रियता काल है, इनकी उपासना काल वीर रात्रि है। </p>
<p>धूमावती सातवीं महाविद्या हैं, इनके भैरव अघोर रूद्र हैं। मध्याह्न के पश्चात् इनका सक्रियता काल है एवं उनकी उपासना दारूण रात्रि में की जाती है। बगलामुखी आठवी महाविद्या हैं, इनके भैरव एक वक्त्र महारुद्र हैं। इनकी सक्रियता का समय सायं हैं। उनकी उपासना वीर रात्रि में होती है। मातंगी नौवीं महाविद्या है, उनके भैरव मतंग शिव हैं। रात्रि का प्रथम प्रहर इनका सक्रियता काल है। इनकी उपासना मोहरात्रि में होती है। भगवती कमला दशम महाविद्या है। इनके महाभैरव सदाशिव हैं, रात्रि का द्वितीय प्रहर इनका सक्रियता काल है। इनकी उपासना महारात्रि में की जाती है। इन दस महाविद्याओं से ही सृष्टि का व्यापक सृजन हुआ है। इसलिए ये सृष्टि विद्या भी हैं। </p>
<p>इसी के साथ महाराज द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में तन्त्रविज्ञान की व्यापक परिचर्चा होते- होते सांझ हो आयी। महाराज की विशेष अनुमति लेकर उनकी सायं साधना के समय जॉन वुडरफ के साथ आए वैज्ञानिकों ने महाराज का विभिन्न यंत्रों से परीक्षण किया। इस परीक्षण के बाद उन्हें आश्चर्यपूर्वक कहना पड़ा- कि तन्त्र साधक में प्राण विद्युत् एवं जैव चुम्बकत्व सामान्य व्यक्ति की तुलना में आश्चर्यजनक ढंग से अधिक होता है। उनके इस कथन पर महाराज रामेश्वर  सिंह हँसते हुए बोले- दरअसल यह दृश्य के साथ अदृश्य के संयोग के कारण है। इसका वैज्ञानिक अध्ययन ज्योतिर्विज्ञान के अन्तर्गत होता है।बहरहाल, कामाख्या का यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। </p>
<p>यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है। इसका महत् तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है। देश भर मे अनेकों सिद्ध स्थान है जहाँ माता सुक्ष्म स्वरूप मे निवास करती है प्रमुख महाशक्तिपीठों मे माता कामाख्या का यह मंदिर सुशोभित है हिंगलाज की भवानी, कांगड़ा की ज्वालामुखी, सहारनपुर की शाकम्भरी देवी, विन्ध्याचल की विन्ध्यावासिनी देवी आदि महान शक्तिपीठ श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र एवं तंत्र- मंत्र, योग-साधना के सिद्ध स्थान है। </p>
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