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	<title>judiciary Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​दुःखद 😢 कोई ब्रेस्ट पकड़ने, पजामे का नाड़ा खोलने को बलात्कार नहीं कह रहे हैं, तो कोई बिना पूरे पेनिट्रेशन के इजैक्युलेट ​करने को बलात्कार नहीं कर रहे हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2026 11:44:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[chattisgarh high court]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>तिलक मार्ग (नई दिल्ली) : कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस विवादित फैसले को पलटने का फैसला किया, जिसमें कहा गया था कि एक बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है। इलाहाबाद उच्च [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/law/ejaculation-without-penetration-not-rape">​दुःखद 😢 कोई ब्रेस्ट पकड़ने, पजामे का नाड़ा खोलने को बलात्कार नहीं कह रहे हैं, तो कोई बिना पूरे पेनिट्रेशन के इजैक्युलेट ​करने को बलात्कार नहीं कर रहे हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>तिलक मार्ग (नई दिल्ली) : कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस विवादित फैसले को पलटने का फैसला किया, जिसमें कहा गया था कि एक बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर कड़ी फटकार लगाते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एनवी अंजारिया के साथ कहा कि सेक्सुअल ऑफेंस के मामलों में फैसले के लिए कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की जरूरत होती है। पीठ ने कहा, &#8220;हम हाई कोर्ट के इस नतीजे से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप सिर्फ रेप के अपराध की तैयारी के लिए हैं, कोशिश के लिए नहीं।&#8221;</strong></p>
<blockquote><p>इस फैसले के कुछ दिन बाद विगत सोमवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक आरोपी की सज़ा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल करते हुए यह कहा कि &#8220;बिना पूरे पेनिट्रेशन के इजैक्युलेट करना रेप की कोशिश मानी जाएगी, असल रेप नहीं। इसलिए, कोर्ट ने आरोपी की सज़ा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दी, क्योंकि मेडिकल सबूतों से पता चला कि पीड़िता की हाइमन सही सलामत थी। </p></blockquote>
<p>जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने कहा कि आरोपी का इरादा &#8220;क्रिमिनल और साफ&#8221; था, प्रॉसिक्यूशन बिना किसी शक के पेनिट्रेशन साबित करने में नाकाम रहा, जो 2004 में IPC के सेक्शन 375 के तहत रेप के लिए एक ज़रूरी हिस्सा था। इसलिए, सेक्शन 376(1) के तहत सज़ा को बदलकर सेक्शन 376/511 (रेप की कोशिश) कर दिया गया। यह मामला 21 मई, 2004 का धमतरी जिले का है।</p>
<p>प्रॉसिक्यूशन के मुताबिक, आरोपी ने विक्टिम को ज़बरदस्ती उसके घर से अपने घर खींच लिया, उसके कपड़े उतार दिए और उसकी मर्ज़ी के खिलाफ सेक्स करने की कोशिश की। यह खौफ़ यहीं खत्म नहीं हुआ। विक्टिम को कथित तौर पर एक कमरे में बंद कर दिया गया, उसके हाथ-पैर बांध दिए गए और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया। कुछ घंटों बाद, उसकी मां ने उसे कैद से छुड़ाया। 2005 में, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376(1) और 342 के तहत दोषी ठहराया और उसे रेप के लिए सात साल की सज़ा और गलत तरीके से कैद करने के लिए छह महीने की सज़ा सुनाई।</p>
<p><strong>बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है सम्बन्धी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय 10 फरवरी, 2026 को दिए गए अपने फैसले में, पीठ ने यह भी चेतावनी दी कि अगर कोर्ट केस करने वालों की खास कमजोरियों के प्रति असंवेदनशील बनी रहती हैं, तो &#8220;पूरा न्याय&#8221; नहीं मिल सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट की विवादित टिप्पणी 17 मार्च, 2025 को आई, जब वह दो आरोपियों के खिलाफ समन ऑर्डर में बदलाव कर रहा था। प्रॉसिक्यूशन ने आरोप लगाया कि आरोपी पवन और आकाश ने एक 11 साल की लड़की के ब्रेस्ट पकड़े, उसके पजामे का नाड़ा तोड़ा, और उसे एक पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की, जिसके बाद राहगीरों ने उन्हें टोका।</strong></p>
<p>ट्रायल कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट के तहत रेप की कोशिश या पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का आधार पाया था और सेक्शन 376 (रेप) और Pocso एक्ट के सेक्शन 18 के तहत आरोपों के लिए समन ऑर्डर जारी किया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने आरोपों को IPC के सेक्शन 354-B (कपड़े उतारने के इरादे से हमला या क्रिमिनल फोर्स का इस्तेमाल) और Pocso एक्ट के सेक्शन 9/10 (गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट) में बदल दिया। अपने ऑर्डर में, जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा कि जैसे ही दोनों आरोपी लड़की के निचले कपड़े की डोरी तोड़ते हुए पकड़े गए, वे मौके से भाग गए। जस्टिस मिश्रा ने फिर कहा कि घटनाओं से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे पता चले कि आरोपी असल में रेप करने के लिए तैयार थे।</p>
<p>बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस मिश्रा ने कहा, &#8220;यह बात यह नतीजा निकालने के लिए काफी नहीं है कि आरोपियों ने पीड़िता के साथ रेप करने का फैसला किया था, क्योंकि इन बातों के अलावा, पीड़िता के साथ रेप करने की उनकी कथित इच्छा को आगे बढ़ाने के लिए उनके नाम पर कोई और काम नहीं है।&#8221; इन घटनाओं के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ऑर्डर पर खुद से संज्ञान लिया और 26 मार्च, 2025 को इसे लागू करने पर रोक लगा दी।</p>
<p>अपने आखिरी फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने जजों के लिए तुरंत गाइडलाइन बनाने से मना कर दिया। बार एंड बेंच के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, &#8220;हम इस स्टेज पर, अलग-अलग कॉन्स्टिट्यूशनल और कानूनी संस्थाओं द्वारा की गई इस तरह की पिछली कोशिशों, ऐसी कोशिशों के ज़मीनी नतीजों, और इसी तरह के सेंसिटिव मामलों में पीड़ितों और शिकायत करने वालों को होने वाली अलग-अलग समस्याओं की पूरी समझ के बिना, कोई भी गाइडलाइन बनाने की नई और बिना गाइडलाइन वाली कोशिश करने में हिचकिचा रहे हैं।&#8221;</p>
<p><strong>भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सेक्सुअल अपराधों और कमज़ोर लोगों से जुड़े मामलों में कोर्ट में सेंसिटिविटी बढ़ाने के लिए साफ़ और आसानी से समझ में आने वाली गाइडलाइन बनाने की मांग की है। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि इन गाइडलाइन में आसान भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए और देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखना चाहिए, जिसका मकसद आम लोगों में ज़्यादा समझ पैदा करना हो। इसके बजाय, कोर्ट ने एक्सपर्ट्स की एक कमेटी बनाने के लिए भोपाल में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) की ओर रुख किया। कमेटी का काम सेक्सुअल अपराधों और दूसरे कमज़ोर मामलों के मामले में जजों और ज्यूडिशियल प्रोसेस में सेंसिटिविटी और दया पैदा करने के लिए गाइडलाइन बनाने पर एक रिपोर्ट तैयार करना है। </strong></p>
<p>कमिटी को यह भी निर्देश दिया गया कि वह इस बारे में डिटेल्ड गाइडलाइंस का ड्राफ्ट तैयार करे कि ज्यूडिशियरी को सेक्सुअल ऑफेंस और कमजोर पीड़ितों, शिकायत करने वालों या गवाहों से जुड़े दूसरे मामलों को कैसे देखना चाहिए। इन गाइडलाइंस को बनाने के लिए बनाई गई कमिटी को अपनी रिपोर्ट &#8220;बेहतर होगा तीन महीने के अंदर&#8221; जमा करने के लिए कहा गया है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि NJA की रिपोर्ट और ड्राफ्ट गाइडलाइंस में भारत की भाषाई विविधता का ध्यान रखा जाना चाहिए और वे आम लोगों को आसानी से समझ में आने वाली होनी चाहिए।उधर, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अनुसार, अपील एक ही, ज़रूरी कानूनी सवाल पर टिकी थी &#8211; क्या पेनिट्रेशन हुआ था? </p>
<p>हाई कोर्ट ने विक्टिम की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट दोनों की ध्यान से जांच की। अपने शुरुआती बयान में, विक्टिम ने पेनिट्रेशन का आरोप लगाया; बाद में, उसने माना कि आरोपी ने असल में पेनिट्रेशन किए बिना सिर्फ़ अपने प्राइवेट पार्ट्स उसके प्राइवेट पार्ट्स पर रखे थे। मेडिकल रिपोर्ट से कन्फर्म हुआ कि हाइमन सही सलामत था। वल्वा पर लाली और कपड़ों पर ह्यूमन स्पर्म की मौजूदगी साबित हुई।</p>
<blockquote><p>कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि सेक्सुअल असॉल्ट और इरादे के साफ़ सबूत थे, लेकिन 2013 से पहले के IPC के तहत रेप के लिए ज़रूरी शर्त, पूरा पेनिट्रेशन, पक्के तौर पर साबित नहीं हुआ। जस्टिस व्यास ने कहा कि जेनिटल को रगड़ना और थोड़ा कॉन्टैक्ट, यहाँ तक कि स्पर्म की मौजूदगी के साथ भी, कोशिश का इशारा था, लेकिन यह रेप की सख्त कानूनी परिभाषा को पूरा नहीं करता था।</p></blockquote>
<p>सुप्रीम कोर्ट के कई उदाहरणों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने तैयारी और कोशिश के बीच का अंतर साफ़ किया। विक्टिम को ज़बरदस्ती एक कमरे में ले जाना, उसके कपड़े उतारना, और अपने जेनिटल को उसके खिलाफ रगड़ना, ये ऐसे काम थे जो तैयारी की हद पार कर गए और साफ़ तौर पर रेप करने की कोशिश को दिखाते थे। हालाँकि, पेनिट्रेशन के पक्के सबूत के बिना, सेक्शन 376 नहीं लगाया जा सकता था। इस तरह, सज़ा को बदलकर सेक्शन 376 कर दिया गया, जिसे IPC की 511 के साथ रेप करने की कोशिश के तौर पर पढ़ा गया। बचाव पक्ष ने विक्टिम की उम्र पर सवाल उठाने की कोशिश की। कोर्ट ने इस दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि स्कूल रजिस्टर एविडेंस एक्ट के सेक्शन 35 के तहत एक वैलिड पब्लिक डॉक्यूमेंट है और इसे गलत साबित करने के लिए कोई भरोसेमंद सबूत पेश नहीं किया गया।</p>
<p>इस फैसले ने 2013 से पहले के कानून के तहत रेप के टेक्निकल मतलब पर बहस फिर से शुरू कर दी है। फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि हल्का सा पेनिट्रेशन भी साफ और लगातार साबित होना चाहिए। कन्फ्यूजन से आरोपी को फायदा होता है। हालांकि हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी नहीं किया, लेकिन उसने कानूनी परिभाषाओं के हिसाब से सज़ा को फिर से तय किया। एक शांत गांव में बंद कमरे में हुए हमले के दो दशक से ज़्यादा समय बाद, कोर्ट ने अपना आखिरी फैसला सुनाया है, इरादा क्रिमिनल था। काम हिंसक था। लेकिन उस समय के कानून की नज़र में यह रेप नहीं, बल्कि कोशिश थी।</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-7 ✍ तिहाड़ सहित ​भारत के कारावासों में सजा काट रही महिलाओं की &#8216;प्रसव पीड़ा&#8217; बढ़ रही है 😢 बच्चे जन्म ले रहे हैं 🙏  न्यायालय चिंतित 😢 अधिकारी मूर्छित 😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/labour-pain-of-women-serving-sentences-in-indian-prisons-including-tihar-is-increasing</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 02 Apr 2025 07:33:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[administration]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाली आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-बौद्धिक रूप से &#8216;गरीबी की रेखा से बहुत नीचे रहने वाली महिलाएं, चाहे वे अपराधी हों अथवा नहीं, चाहती हैं कि उनका प्रसव पीड़ा ऐतिहासिक तिहाड़ कारावास के चहारदीवारी के अंदर हो। वे आज़ादी के 11-वर्ष बाद अपने [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/labour-pain-of-women-serving-sentences-in-indian-prisons-including-tihar-is-increasing">तिहाड़ जेल-7 ✍ तिहाड़ सहित ​भारत के कारावासों में सजा काट रही महिलाओं की &#8216;प्रसव पीड़ा&#8217; बढ़ रही है 😢 बच्चे जन्म ले रहे हैं 🙏  न्यायालय चिंतित 😢 अधिकारी मूर्छित 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली:  आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाली आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-बौद्धिक रूप से &#8216;गरीबी की रेखा से बहुत नीचे रहने वाली महिलाएं, चाहे वे अपराधी हों अथवा नहीं, चाहती हैं कि उनका प्रसव पीड़ा ऐतिहासिक तिहाड़ कारावास के चहारदीवारी के अंदर हो। वे आज़ादी के 11-वर्ष बाद अपने अस्तित्व में आये दिल्ली सल्तनत के केंद्रीय कारावास के दीवारों के बीच अपना प्रसव पीड़ा महसूस करना चाहती हैं।</strong></p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=129s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>वे चाहती हैं कि उनके बच्चे की पहली किलकारी जेल के अंदर दीवारों से टकराए। उन्हें विश्वास है कि वह बच्चा उनके और उनके परिवार के जीवन में नई रोशनी लेकर आएगा। और इसके लिए वे सभी प्रकार की यातनाओं को सहने के लिए सज्ज होती है &#8211; ताकि वे कारावास के अंदर प्रवेश कर लें। वे विभिन्न प्रकार की छोटी-मोटी अपराधों में भी स्वयं को सम्मिलित करना पसंद करती हैं ताकि प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस उन्हें तिहाड़ के अंदर बंद कर दे पेट में पलते बच्चों के साथ। </p>
<blockquote><p>यह तो बच्चे की बात हुई। न केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, बल्कि भारत के कोने-कोने में रहने वाले विद्वान, विदुषी, अधिकारी, पदाधिकारी, संत, महात्मा, नेता, अभिनेता, ठेकेदार, जमादार, डाक्टर, वकील, न्यायमूर्ति, मंत्री, संत्री यानी सभी तबके के लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से तिहाड़ कारावास के अंदर अधिकारियों को निहोरा-विनती करने में तनिक भी कोताही नहीं करते कि एक सांझ के लिए ही सही, उन्हें जेल का खाना उपलब्ध कराया जाए । </p></blockquote>
<p>एक घंटे के लिए ही सही, उन्हें जेल के अंदर प्रवेश कर झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन करने की अनुमति दी जाए &#8211; स्वेच्छा से । उन्हें कारावास परिसर की मिट्टी उपलब्ध करायी जाए । उन्हें उस लकड़ी का छोटा-से-छोटा हिस्सा प्रदान किया जाए जिस पर कैदियों को फांसी दी गयी थी। यह सभी सेवाओं और वस्तुओं की मांग इसलिए होती है कि उन्हें विश्वास है कि ये सभी वस्तुएं उनके जीवन में संकट मोचक के रूप में कार्य करेंगे।  इसे ही कहते हैं &#8216;विश्वास&#8217; और ऐसे विश्वास &#8216;भय&#8217; से ही उत्पन्न होते हैं। खैर। </p>
<p><strong>विगत दिनों पश्चिम बंगाल के एक कारावास में जब एक महिला प्रसव पीड़ा से गुजरी और बच्चे को जन्म दी, यह खबर स्थानीय अख़बारों से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में अपना स्थान सुरक्षित किया। शायद ही कोई क्षेत्र बचा होगा, जहाँ उस महिला के प्रसव पीड़ा से सम्बंधित समाचार प्रकाशित नहीं हुए थे। उस समाचार की मुख्य बात यह थी की जब वह महिला कारावास में आयी थी, वह गर्भवती नहीं थी।</strong> </p>
<figure id="attachment_6282" aria-describedby="caption-attachment-6282" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6282" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6282" class="wp-caption-text">तिहाड़ के अंदर का एक दृश्य। तस्वीर: इंडियन एक्सप्रेस के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>सवाल उठना स्वाभाविक था कि महिला गर्भवती कैसे हो गई? इस घटना के जांच के बाद यह ज्ञात हुआ कि सिर्फ यही महिला नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के विभिन्न जेलों में विगत एक वर्षों में लगभग 196 महिलाओं को प्रसव पीड़ा हुआ और वे बच्चों को जन्म दी। यह सभी महिलाएं जब जेल आयी थी, गर्भ से नहीं थी&#8217; &#8211; आखिर इन बच्चों के पिता कौन है? पिता कैसे बने? फिर शुरू हुआ राजनीतिक आरोप और प्रत्यारोप। कलकत्ता हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की पीठ के तहत एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह मामला सिर्फ बंगाल ही नहीं, अगर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कारावासों को एक वृहद् शोध के अधीन रखा जाए तो न जाने शोध के अंतिम अध्याय में क्या-क्या लिखा जायेगा। जेल में इस तरह से बच्चों का पैदा होना चिंता का विषय है। हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते और हैरानी जताते हुए कहा कि जेल में रहने के दौरान महिला कैदी गर्भवती हो रही हैं, जिसके बाद जेलों के अंदर बच्चे पैदा हो रहे ​हैं। </p>
<p><strong>उधर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और ​न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की ​पीठ ने इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाते हुए स्वतः संज्ञान ​लिया और सभी राज्यों से इस मामले पर तुरंत कार्रवाई का आदेश ​दिया। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की दिसंबर 2023 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल 1330 जेलों में कुल 5 लाख 73 हजार 220 कैदी बंद हैं. इनमें 23 हजार 772 महिलाएं हैं। इनमें से 1537 महिलाएं ऐसी हैं, जिनके बच्चे उनके साथ जेलों में रहते हैं। इसमें आधी संख्या ऐसी महिला कैदियों की है, जिन्होंने जेल में ही रहते हुए बच्चे को जन्म दिया है। गनीमत है कि इन सभी बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र में जेल का जिक्र नहीं ​किया। वैसे आकंड़ों के मुताबिक भारत में प्रत्येक घंटे 2651 बच्चे जन्म लेते हैं। ​खैर।</strong></p>
<p>बहरहाल, &#8216;मदर्स एंड बेबीज़ इन प्रिज़न&#8217; ​से सम्बंधित एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में कहा गया है​ &#8216;जेल शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान नहीं करता है, जिससे अक्सर दीर्घकालिक विकास संबंधी मंदता होती है। फिर भी, यदि शिशुओं और बच्चों को जबरन उनकी माताओं से अलग कर दिया जाता है, तो उन्हें स्थायी भावनात्मक और सामाजिक क्षति होती है। </p>
<p>अधिकांश यूरोपीय जेल प्रणालियाँ शिशुओं को माताओं के साथ रहने के लिए कुछ स्थान प्रदान करती हैं, लेकिन फिर भी कई सैकड़ों शिशुओं को उनकी कैद माताओं से अलग कर दिया जाता है। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि छोटे बच्चों की उन कुछ माताओं के लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो गंभीर अपराध करती हैं और जो समुदाय के लिए खतरा पैदा करती हैं, और छोटे बच्चों वाली महिला अपराधियों की भारी संख्या को समुदाय में प्रबंधित किया जाना चाहिए।&#8217; </p>
<p>अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भी अक्सर यह सिफारिश की जाती है कि गर्भवती महिला जेल के बाहर किसी अस्पताल में (बिना हथकड़ी के) अपने बच्चे को जन्म दे सके। जन्म का स्थान एक सामान्य अस्पताल होगा। उसके बाद जेल में बच्चे को अपनी माँ के साथ लंबे समय तक रहने के लिए अच्छी सुविधाएं होनी चाहिए, जब तक उसे अपनी माँ की शारीरिक देखभाल की आवश्यकता हो। </p>
<figure id="attachment_6283" aria-describedby="caption-attachment-6283" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6283" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6283" class="wp-caption-text">तिहाड़ के अंदर का एक दृश्य। तस्वीर: सबरंग तिहाड़ के सौजन्य से<br /></figcaption></figure>
<p>ये सुविधाएं विभिन्न देशों में अलग-अलग होती हैं। अन्य स्थितियों में माताएं अपने और अपने बच्चों के लिए एक छोटा सा घर बनाने की कोशिश करती हैं​, उन्हें अक्सर सेल साझा करना पड़ता है, जहाँ वे कुछ छोटे-मोटे भोजन भी पकाती हैं​ । अन्य अधिक &#8216;प्रगतिशील&#8217; जेलों में, बच्चे शाम और रात के समय अपनी माताओं के साथ रहते हैं, जबकि वे दिन के समय जेल के अंदर या बाहर नर्सरी में जाते हैं, जबकि माँ काम कर रही होती है। </p>
<p>यह स्वयंसिद्ध है कि बच्चों को जेल में जन्म नहीं लेना चाहिए और काउंसिल ऑफ यूरोप के सदस्य देशों में सामान्य प्रथा यह है कि उचित समय पर गर्भवती महिला कैदियों को बाहरी अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया जाता है। फिर भी, समय-समय पर, ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ गर्भवती महिलाओं को स्त्री रोग संबंधी जांच और/या प्रसव के दौरान बेड या फर्नीचर के अन्य सामान से बाँध दिया जाता है या अन्यथा उन्हें बांध दिया जाता है। </p>
<p>ऐसा दृष्टिकोण पूरी तरह से अस्वीकार्य है, और निश्चित रूप से इसे अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार माना जा सकता है। जेल में बंद कई महिलाएं बच्चों या अन्य लोगों की प्राथमिक देखभाल करने वाली होती हैं, जिनके कल्याण पर उनके कारावास का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस संदर्भ में एक विशेष रूप से समस्याग्रस्त मुद्दा यह है कि क्या &#8211; और यदि हाँ, तो कितने समय तक &#8211; शिशुओं और छोटे बच्चों को अपनी माताओं के साथ जेल में रहना संभव होना चाहिए। यह एक कठिन प्रश्न है, क्योंकि एक ओर, जेल स्पष्ट रूप से शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान नहीं करते हैं, जबकि दूसरी ओर, माताओं और शिशुओं को जबरन अलग करना अत्यधिक अवांछनीय है। </p>
<p><strong>​अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी मामलों में शासकीय सिद्धांत बच्चे का कल्याण होना चाहिए। इसका तात्पर्य विशेष रूप से यह है कि हिरासत में प्रदान की जाने वाली कोई भी प्रसव-पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल बाहरी समुदाय में उपलब्ध देखभाल के बराबर होनी चाहिए। जहां शिशुओं और छोटे बच्चों को हिरासत में रखा जाता है, उनके उपचार की देखरेख सामाजिक कार्य और बाल विकास के विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए। </strong></p>
<p>यह सुनिश्चित करने के लिए भी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जेल में बंद शिशुओं की हरकत और संज्ञानात्मक कौशल सामान्य रूप से विकसित हों। विशेष रूप से, उन्हें जेल के भीतर पर्याप्त खेल और व्यायाम की सुविधाएँ मिलनी चाहिए और जहाँ भी संभव हो, उन्हें जेल से बाहर निकलकर इसकी दीवारों के बाहर सामान्य जीवन का अनुभव करने का अवसर मिलना चाहिए। जहाँ यह संभव नहीं है, वहाँ क्रेच-प्रकार की सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करने पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था से महिला कैदियों को जेल के अंदर काम और अन्य गतिविधियों में अधिक हद तक भाग लेने में मदद मिलेगी, जो अन्यथा संभव नहीं हो पाता।&#8217; </p>
<figure id="attachment_6284" aria-describedby="caption-attachment-6284" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6284" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6284" class="wp-caption-text">तस्वीर हिंदुस्तान टाइम्स के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>स्वीडन में, शिशुओं को जेल में शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है, लेकिन उन्हें एक वर्ष तक के लिए रखा जा सकता है और औसतन तीन महीने तक का समय लगता है। जर्मनी में, छह बंद जेल हैं जो तीन वर्ष तक के बच्चों को अनुमति देते हैं, और दो खुली जेलें हैं जो छह वर्ष की आयु तक के बच्चों को अनुमति देती हैं। नीदरलैंड में, बच्चे अपने चौथे जन्मदिन तक आधी खुली जेल टेर पील में रह सकते हैं। माँ-बच्चे की इकाई एक अलग घर में स्थित है, लेकिन जेल क्षेत्र के भीतर, चार माताओं और चार बच्चों के लिए। पाँच बंद जेलों में बच्चे नौ महीने तक रह सकते हैं। आइसलैंड में, केवल बहुत छोटे बच्चे जो स्तनपान कर रहे हैं या जिनकी विशेष ज़रूरतें हैं, वे जेल में रह सकते हैं। पुर्तगाल और स्विट्जरलैंड तीन साल तक के बच्चों को, फ़िनलैंड दो साल तक के बच्चों को जेल में रहने की अनुमति देता है। डेनमार्क में पुरुष और महिला कैदियों को अपने बच्चों को साथ रखने की अनुमति है, बशर्ते कि उन्हें बच्चे के तीन साल का होने तक रिहा किया जाना हो, लेकिन व्यवहार में बहुत कम बच्चे जेल में रखे जाते हैं। इंग्लैंड और वेल्स में, तीन बंद जेलों में 34 बच्चों के लिए जगह है, और एक खुली जेल में 20 बच्चों के लिए जगह है। बच्चे खुली जेल और एक बंद जेल में 18 महीने की उम्र तक रह सकते हैं, अन्यथा सीमा नौ महीने है।</strong> </p>
<p>पश्चिमी देशों में, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, बच्चे के अपनी माँ के साथ जेल में रहने की अवधि को अक्सर लगाव सिद्धांत द्वारा उचित ठहराया जाता है, हालांकि एक आधुनिक दृष्टिकोण में छोटे बच्चे को अपनी जैविक माँ से जुड़ना ज़रूरी नहीं है। इसलिए, यदि कोई पर्याप्त विकल्प (जैसे पिता, दादी या पालक माता-पिता) है, तो बच्चा उस जेल से बाहर रह सकता है जहाँ उसकी माँ को हिरासत में रखा गया है।​ लेकिन इटली में, घर के माहौल में माँ-बच्चे के लगाव को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों वाली माताओं को कैद नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें घर में नज़रबंद रखा जाता है। जब तक बच्चा दस साल का नहीं हो जाता, तब तक वे जेल के बाहर एक वैकल्पिक कार्यक्रम का पालन करते हैं।​ </p>
<p>आइये, दिल्ली के तिहाड़ जेल चलते हैं। द्वापर युग में जब जेल में जन्माष्टमी पर माता देवकी ने भगवान कृष्ण को जन्म दिया था, तो लोगों ने कामना की थी कि भविष्य में फिर कोई गर्भवती महिला जेल में न जाए और इस तरह से कठिनाईयों के बीच बच्चे को जेल में जन्म न दे। मगर, आज कलियुग में इस तरह की घटना की बार-बार पुनरावृति होती है। अपराध में लिप्त बहुत सी गर्भवती महिलाएं जेल में जाती हैं और जेल में ही बच्चों को जन्म देती हैं। जन्म लेने वाले अबोध मासूम मां की कोख रूपी कैद से आजाद होकर दुनिया में तो आते हैं, मगर मां के साथ जेल में ही कैद होकर रह जाते हैं। जेल में जन्म लेने वाले ऐसे अभागे मासूम अपने बचपन के कुछ शुरुआती साल मां की सजा जेल में ही मां के साथ रहकर काटते हैं। </p>
<figure id="attachment_6289" aria-describedby="caption-attachment-6289" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6289" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6289" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल<br /></figcaption></figure>
<p>कानूनन बच्चे की उम्र छह साल की होने तक उसे उसकी मां से अलग नहीं किया जा सकता। यही, कारण है कि तिहाड़ जेल में जन्म लेने वाले बच्चों को उनकी मां के साथ ही जेल में रहना होता है। छह साल की उम्र होने के बाद कानून के अनुसार बच्चों को मां से अलग कर उसे महिला कैदी के परिजनों के पास भिजवा दिया जाता है। जिससे कि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। जेल में जन्मे बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तिहाड़ जेल में एक अलग विंग काम करता है। यह बच्चों के लिए खिलौने, झूले व खाने-पीने की अन्य वस्तुओं की पूर्ति करता है। </p>
<p>जेल प्रशासन द्वारा इस बात का ध्यान रखा जाता है कि बच्चे को मां के साथ रहते हुए कैद में होने का अहसास न हो। उसे ऐसा लगे कि वह अपने घर पर है। इसके अतिरिक्त जेल में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। अगर किसी महिला कैदी के बच्चे की जिम्मेदारी लेने वाला कोई परिजन नहीं होता तो ऐसे बच्चों का दाखिला बोर्डिग स्कूल में स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से कराया जाता है। </p>
<p>कुछ वर्ष पूर्व मंडल कारा, बांका (झारखण्ड) में बंद महिला कैदी खुशबू खातून सदर अस्पताल में बच्चे को जन्म दी थी। प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। खातून करीब दो माह से जेल में बंद है। उसपर हत्या का आरोप है। उधर, बिहार ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी सम्बंधित अधिकारी जेल प्रशासन को आदेश दिए हैं कि जेल में रहने वाले अथवा जन्म लिए बच्चों को यह महसूस न हो कि वह जेल में है । अधिकारी पत्र भेज कर जेल में बंद महिला कैदी के बच्चे का जन्म दिन मनाने का आदेश दिया। </p>
<p>इतना ही नहीं, बिहार के जहानाबाद जेल में 19 ऐसे बेगुनाह मासूम थे/हैं, जिनका बचपन गुनहगार मां की ममता और आंचल की छांव पाने के लिए सलाखों के पीछे गुजर रहा था/है। ये सभी महिलाएं दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या, मारपीट और शराब बिक्री मामले में जेल में बंद थी। 2022 में शराब बेचने के आरोप में जहानाबाद व अरवल जिले में 514 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, जिसमें 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें तीन महिलाओं की गोद में उनका मासूम बच्चा भी था। मजबूरन अपने साथ मासूम को भी जेल ले जाना पड़ा।  </p>
<figure id="attachment_6285" aria-describedby="caption-attachment-6285" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6285" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6285" class="wp-caption-text">सुनील कुमार गुप्ता, पूर्व जेलर, तिहाड़</figcaption></figure>
<p><strong>विगत दिनों तिहार कारावास के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता जी से मुलाक़ात हुई। गुप्ता साहब अपनी जिंदगी का आधा से अधिक हिस्सा तिहाड़ को दिए है। अब तक के जीवन में उन्होंने जो सांसे ली है, उसमें आधी से अधिक सांसे तिहाड़ जेल के अंदर की हवाओं की है। वे तिहाड़ कारावास के अंदर करीब 35 वर्ष सेवा किये हैं। खूंखार से खूंखार कैदियों से लेकर, फांसी पर लटकने वाले, लटकाये जाने वाले दर्जनों कैदियों का चश्मदीद गवाह बने हैं। तिहाड़ के अंदर रहने विभिन्न मामलों में बंद महिलाओं की कथा-व्यथा को महसूस किये हैं। नीचे के छोटे कर्मचारियों से लेकर ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे बड़े-बड़े अधिकारियों से रूबरू हुए हैं जिनका पदस्थापन तो कारावास और कैदियों की दशा को सुधारने हेतु हुआ था, लेकिन समयांतराल (अपवाद छोड़कर) सभी भ्रष्टाचार की दरिया में गोंता लगाने लगे, बहने लगे। </strong> </p>
<p>गुप्ता साहब दर्जनों ऐसे अधिकारियों का चश्मदीद गवाह बने जिसमें कुछ ने तो कारावास के नियमों को दांत से पकड़कर रखा, कुछ नियमों को दंतहीन बना दिए। उन्हीं सब बातों में कारावास में प्रसव पीड़ा और बच्चों का जन्म भी एक थी। </p>
<p>गुप्ता जी कहते हैं कि &#8220;​स्त्रियों की पुत्र जन्म सुनिश्चित करने हेतु जानबूझ का गिरफ्तार होकर जेल पहुँचने की यह प्रवृति हमें किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी, क्योंकि वह पुत्रियों के विरुद्ध प्राचीन काल की पक्षपाती प्रथा को बढ़ावा देती थी। जेल में पुत्र जन्म से सम्बंधित स्त्रियों का विश्वास इतना मजबूत था कि वे अपनी गर्भावस्था के अंतिम कुछ दिनों में कुछ छोटे मोटे झगड़ों या चोरी करने के अपराध के बहाने जेल पहुँच जाती थी। उनकी पुत्र प्राप्ति की लालसा उन्हें इस अतिरिक्त उपाय को आजमाने हेतु बाध्य करती थी। हमें वहां से बाहर निकालने की चुनौती का सामना करना पड़ता था। हम उन्हें किस भांति समझने वाले थे? हमारे पास क्या वास्तव में उन्हें सच्चाई बताकर जागरूक करने के अतिरिक्त कुछ अन्य करने योग्य नहीं था। वास्तव में, वह इतना सरल नहीं था कि वहां प्रसव के बहाने जेल आने वाली स्त्रियां अधिकतर निम्न आयवर्ग परिवार वाली होती थी और बहुत काम शिक्षित होती थी। हमने उसके आंकड़ों को झुग्गी बस्तियों और जेल के निकटस्थ अन्य क्षेत्रों की दफ़ीवारों पर चिपका दिया परन्तु हमें अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुआ।&#8221;  </p>
<p><strong>गुप्ता जी कहते हैं कि &#8220;वहां एक ऐसा भी अन्धविश्वास था (होगा भी) जिसका जेल के अधिकारियों के रूप में हमने सक्रीय तौर पर सामना करने का प्रयास किया। साल 2001 में हमने पाया कि तिहाड़ में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि हो रही है। चूँकि मैं वार्षिक आंकड़े तैयार कर रहा था, जेल में उस समय काम से काम 50 ऐसी स्त्रियां थी, जो गर्भवती थी। अनेक मामलों में स्त्रियां जमानत हेतु आवेदन करती और शिशु जन्म के बाद वहां से चली जाती थी। हमारा प्रारंभिक अनुमान यह था कि बच्चे के जन्म से पहले वे स्त्रियां इसलिए गिरफ्तार होना चाहती थीं क्योंकि वे जेल के उत्तर प्रसव सुविधाओं का लाभ उठाना चाहती थी। यदि आप गरीब थीं तो आपके लिए जेल में होना एक अच्छा विकल्प था, क्योंकि उसका अर्थ यह था आपको नियमित भोजन मिलेगा और आपकी चिकित्सा आवश्यकताओं का भी पूरा ध्यान रखा जायेगा। एक और जहाँ हमारी सुविधाएँ बहुत आकर्षक नहीं थीं, वहीँ निर्धन कैदियों के लिए तिहाड़ के बाहर मुलभुत चिकित्सा सुविधाएँ भी उनकी पहुँच से कोसों दूर थीं।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_6287" aria-describedby="caption-attachment-6287" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6287" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6287" class="wp-caption-text">तस्वीर: सुश्री चेतना कपूर, डाकूमेंट्री फोटो के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>इतना ही नहीं, &#8220;जब मैंने इन स्त्रियों से साथ बात की तो मुझे दूसरी ही बात पता चली कि वे तिहाड़ में इतनी बड़ी तरह क्यों बानी रहने के इक्षुक थीं। उनमें से अनेक स्त्रियों को इस बात का विश्वास था की जेल में प्रसव कराने से पैदा होने वाला बच्चा लड़की के बजाय लड़का ही पैदा होगा। स्पष्टतया उनके इस विश्वास की जेड भगवान्भ श्रीकृष्ण के जन्म से पोषित थीं। हिंदी धर्मग्रंथों के अनुसार, देवकी को उनके पति बासुदेव के साथ भाई राजा कंस ने कारागार में दाल दिया था, क्योंकि वह जानता था कि देवकी के किसी पुत्र के हाथों उसकी मृत्यु होने वाली थी। क्रूर कंस ने देवकी के बच्चों की हत्या करने की व्यवस्था तो कर ली थी, परन्तु जब भगवान्भ विष्णु ने कृष्ण के रूप में अपना दूसरा अवतार लिया और इनके आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया तो वासुदेव ने स्वयं को बेड़ियों से मुक्त पाया और वह शिशु को नन्द और यशोदा के घर छोड़ने आये तथा वहां से अपने साथ एक कन्या को ले आये। इस प्रकार कृष्ण जीवित बच गए और किवदंती के अनुसार कंस का वध हुआ।&#8221;</p>
<p>गुप्ता जी कहते हैं: &#8220;कारागार के भोजन के अतिरिक्त जेल के अन्य वस्तुओं को भी शांतिदायी शक्तियों से से ओत प्रोत माना जाता है। फांसी के तख्ते में प्रयोग की गयी लड़की की अत्यधिक मांग थी, क्योंकि उसे संकट मोचक माना जाता था। कुछ लोगों का विश्वास था कि ऐसी लकड़ी के टुकड़े को बच्चे के शयनकक्ष में रखने से उसकी या उसके मन से भय दूर करने की सहायता मिलेगी और वह बिस्तर गिला करना बंद कर देगी या देगा। वह किसी बच्चे को परीक्षा के भय से भी मुक्ति कर सटी है। अनेक संत फ़क़ीर भी जेल की मिट्टी से बने ताबीज बेचते थे, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि उसमें असाधारण शक्तियां होती थी। जब भी कभी कोई तिहाड़ की मिटटी या पानी की मांग करता था, हम उसकी मांग मान लेते थे और सिपाही उसके साथ जाकर उन वस्तुओं की व्यवस्था का देता था।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6288" aria-describedby="caption-attachment-6288" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6288" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6288" class="wp-caption-text">तस्वीर: सुश्री चेतना कपूर, डाकूमेंट्री फोटो के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>&#8220;कुछ लोगों का विश्वास है कि यदि आप बड़े दौर से गुजर रहे हैं और जीवन में दुर्भाग्य का अनुभव कर रहे हैं तो आपको उसे दूर करने के लिए केवल इतना करना है की आप जेल की रसोई में बना खाना खा लें। इसके लिए एक संभव दलील यह है की तिहाड़ का घृणित खाना खाने के बाद आपकी समस्त व्यथाएँ समाप्त हो जाएगी। लेकिन मैं यह बात गंभीरता पूर्वक कह रहा हूँ कि मेरे पास अपने दोस्तों, वकीलों और यहाँ तक कि उच्च न्यायालय के अनेक जजों के फोन आये थे, जो चाहते थे कि मैं उनके लिए तिहाड़ में बने भोजन का प्रबंध करूँ, ताकि उनका अपना जीवन अधिक सुखमय हो सके। अनेक अन्य ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने जेल की खाने की मांग इसलिए की, क्योंकि उनकी कुंडली में साफ़ लिखा था कि उन्हें किसी बिंदु पर अपने जीवन में कुछ समय जेल में गुजरना होगा। अपने इस पूर्व निर्धारित दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए वे मुझसे पूछते थे कि क्या वे एक रात जेल में गुजार सकते थे, या जेल का खाना खा सकते थे? यह उपाय सम्भवतः लाल किताब में वर्णित है, जो कुछ लोगों के लिए बाइबल जैसे होती है।</strong> </p>
<p>बहरहाल, यह देखकर बड़ा विचित्र लगता है कि सुशिक्षित व्यक्तियों भी अपने अन्धविश्वास के समक्ष अपने तार्किक मन की बात को ठुकरा देता है। अनेक न्यायधीशों के अलावा एक बैंक के अधिकारी भी थीं जिन्हे अपने काम में कठिनाइयों का सामना करना पर रहा था। उन्होंने किसी से सलाह ली और उन्हें गुप्ता जी से मिलने को कहा गया ,वे मिलने आ गई। गुप्ता जी उन्हें तत्काल खली हाथ नहीं लौटा सके । वह महिला तीन बार आयी और वह वहां न केवल जेल का खाना खाया, बल्कि जेल के अंदर फर्नीचरों, आलमारियों की सफाई की, कमरे में झाड़ू भी लगाई थी। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/labour-pain-of-women-serving-sentences-in-indian-prisons-including-tihar-is-increasing">तिहाड़ जेल-7 ✍ तिहाड़ सहित ​भारत के कारावासों में सजा काट रही महिलाओं की &#8216;प्रसव पीड़ा&#8217; बढ़ रही है 😢 बच्चे जन्म ले रहे हैं 🙏  न्यायालय चिंतित 😢 अधिकारी मूर्छित 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-6 ✍ जहाँ आगंतुकों से पैसे नहीं मिलने पर कैदी के गुदा मार्ग में लोहे का रॉड घुसेड़ा गया था और गलती छुपाने के लिए कह दिया &#8216;बवासीर&#8217; हो गया है😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Apr 2025 04:02:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: भारत में बिलंब से चलने की आदत न केवल भारतीय रेल में प्रचलित है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र से लेकर रोजी-रोजगार के लिए सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाएं और परीक्षा-फल भी ग्रसित हैं। अपवाद छोड़कर, बिरले ही कोई सरकारी कार्यक्रम, योजनाएं आदि हैं जो घड़ी की सूई [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: भारत में बिलंब से चलने की आदत न केवल भारतीय रेल में प्रचलित है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र से लेकर रोजी-रोजगार के लिए सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाएं और परीक्षा-फल भी ग्रसित हैं। अपवाद छोड़कर, बिरले ही कोई सरकारी कार्यक्रम, योजनाएं आदि हैं जो घड़ी की सूई के साथ चलती हो। जब सभी को बिलम्ब से चलने की आदत है तो भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाला राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और उसका वार्षिक प्रतिवेदन समय पर क्यों प्रकाशित हो। यह बिमारी आज से नहीं, बल्कि दशकों से ग्रसित है। यही कारण है कि भारत सरकार का गृह मंत्रालय अथवा गृहमंत्री जब भी देश के संसद में आपराधिक गतिविधियों, खासकर जघन्य अपराध, मसलन हत्या, बलात्कार, न्यायिक / पुलिस हिरासत में मौत की संख्या के बारे में संसद को बताते हैं तो (अपवाद छोड़कर) राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की सांख्यिकी के बदले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सांख्यिकी प्रस्तुत करते हैं। इस कहानी को लिखने के समय तक भी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का वार्षिक प्रतिवेदन अभी सबसे नवीनतम 2022 का ही है जो यह दावा करता है कि 2021 की तुलना में संज्ञेय अपराधों के पंजीकरण में 4.5% की कमी आयी है, साथ ही महिलाओं के खिलाफ अपराधों और साइबर अपराध, विशेष रूप से धोखाधड़ी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।</strong></p>
<p>इसका दृष्टान्त यह है कि विगत दिनों गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय लोकसभा को बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा 2021-22 (28 फरवरी, 2022 तक) में न्यायिक हिरासत में व्यक्तियों की मौत से संबंधित कुल 2,152 मामले और पुलिस हिरासत में मौतों से संबंधित 155 मामले दर्ज किए गए, तो दावा और पक्का हो गया।उन्होंने कहा कि 2021-22 में न्यायिक हिरासत में मौतों के सबसे ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश (448) में दर्ज किए गए, जबकि उस साल पुलिस हिरासत में सबसे ज़्यादा मौतें महाराष्ट्र (29) में हुईं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2021-22 में हिरासत में मौतों के 137 मामलों में कुल 4.53 करोड़ रुपये के मुआवजे की घोषणा की, जो 2020-21 में 161 मामलों में दिए गए 4.88 करोड़ रुपये के मुआवजे से कम है। इसके विपरीत दुखद स्थिति यह है कि पिछले पांच सालों में हिरासत में मौतों के सिर्फ़ 21 मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। हालांकि, किसी भी मामले में अभियोजन को निर्देश नहीं दिया गया।</p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=129s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p><strong>राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 2020-21 में 1840 न्यायिक मौतें हुईं, 2019-20 में 1584, 2018-19 में 1797, 2017-18 में 1636 और 2016-17 में 1616 मौतें हुईं। आयोग के पास पुलिस हिरासत में मौत के मामले 2020-21 में 100, 2019-20 में 112, 2018-19 में 136, 2017-18 में 146 और 2016-17 में 145 थे। 2019 में, भारत का अनुमान है कि 1723 हिरासत में मौतें हुई हैं, जो हर दिन 5 मौतों के बराबर है। हिरासत के दौरान, पुलिस अभियुक्तों से कबूलनामा निकालने और सबूत हासिल करने के लिए विभिन्न थर्ड-डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करती है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6271" aria-describedby="caption-attachment-6271" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6271" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6271" class="wp-caption-text">​तिहाड़ जेल</figcaption></figure>
<p>इस तथ्य के बावजूद कि भारत ने टॉर्चर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन भारत ने इस कन्वेंशन की पुष्टि नहीं की है या हिरासत में हिंसा को रोकने के लिए कोई केंद्रीय कानून पारित नहीं किया है। हालांकि, व्यक्तियों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 214 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी दी गई है, जिसमें “सम्मान के साथ जीने के अधिकार” और प्रत्येक व्यक्ति की भलाई पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हिरासत में यातना सहित मानवाधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करता है। इन कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद, हिरासत में मौतों के आंकड़े मौजूदा कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से हिरासत में हिंसा को रोकने में प्रणालीगत विफलता को इंगित करता है। </p>
<blockquote><p>इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ क्रिमिनल, कॉमन एंड स्टेचुटरी लॉ 2024 में प्रकाशित ईवा वर्मा के रिपोर्ट के अनुसार, &#8220;सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर स्थिति को पहचानते हुए, हिरासत में हिंसा को भारतीय नैतिकता के अनुसार अस्वीकार्य माना है, जिसके कारण अभियुक्त की मृत्यु हो जाती है। इसे न केवल पीड़ित के खिलाफ बल्कि मानवता के खिलाफ भी अपराध के रूप में वर्गीकृत किया गया है। हिरासत में मौत भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत &#8220;जीवन के अधिकार&#8221; का स्पष्ट उल्लंघन है।&#8221; </p></blockquote>
<p>परंतु दुर्भाग्य यह है कि &#8220;पिछले दो दशकों में, पूरे भारत में हिरासत में जितनी मौतें दर्ज की गई है, उसमें मात्र 893 मामले पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज किए गए, जबकि मात्र 358 पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों पर औपचारिक रूप से आरोप लगाए गए। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस अवधि में केवल 26 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया। यहाँ इन बातों का इसलिए जिक्र कर रहा हूँ क्योंकि देश में अभी कुल 1330 काराओं में (2022 का आंकड़ा) &#8211; 143 केंद्रीय कारा हैं, 428 जिला कारा हैं, 574 सब-जेल हैं, 34 महिलाओं के लिए कारावास हैं, 91 खुले जेल हैं, 10 बोर्स्टल स्कूल हैं, 42 स्पेशल जेल हैं और 3 अन्य जेल है &#8211; और इन कारावासों में कैदियों के साथ कैसा व्यवहार होता है, या फिर कैदी कारावास में अपने सह-कैदियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं &#8211; यह प्रशासनिक दृष्टि से सर्वविदित है। खैर। </p>
<p>अन्य कारावासों की बात आगे करेंगे, अभी चलते हैं दिल्ली सरकार के अधीन वाली ऐतिहासिक केंद्रीय कारा तिहाड़। भारतीय संसद और भारत के सर्वोच्च न्यायलय से इस कारावास की दूरी अधिकतम 15-16 किलोमीटर है। अपने स्थापना काल यानी साल 1958 से तिहाड़ जेल विगत 67 वर्षों में कई सौ ऊँची कुर्सियों पर बैठने वाले अधिकारियों से लेकर, सफ़ेद वस्त्र धारी नेताओं तक, हज़ारों समाज सेवियों से लेकर, उतनी ही संख्या और अधिक के कमाई करने वाले, कानून को धज्जी उड़ाने वाले लोगों को देखा है। तिहाड़ पर अब तक कई टन कागजों पर प्रतिवेदन बने होंगे ताकि कारावास के अंदर कैदियों को सजा भुगतते-भुगतते एक अच्छे मनुष्य के रूप में बाहर आने, समाज के मुख्य धाराओं में जुड़ने का अवसर मिले। लेकिन, आज भी जब कारावास को मानवीय दृष्टि से देखने की बात होगी तो किसी भी अन्य अधिकारियों, पदाधिकारियों, न्यायविदों का नाम लेने से पहले और शायद अंतिम नाम भारत के प्रमुख न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर का होगा। </p>
<p>न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर 1970 के दशक में लगभग सात वर्ष तक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे और अपने कार्यकाल में उन्होंने देश के सबसे बड़े न्यायालय तक आम आदमी की पहुँच को सुलभ बनाया। साल 1980 में न्यायमूर्ति अय्यर ने कहा था: &#8220;कैदी विशेषता दोहरे विकलांग होते हैं। पहली बात तो यह कि अधिकतर कैदी समाज के दुर्बल वर्गों से आते हैं, जिनका गरीबी, शिक्षा और सामाजिक स्तर अत्यंत निम्न होता है। दूसरे, जेल एक चहारदीवारी वाली दुनिया होती है, जिसका सामान्य इनसानी दुनिया से संवाद और संपर्क बहुत कम होता है, जिसके परिणामस्वरूप घोषित कैदी अदृश्य होते हैं। उनकी आवाज सुनाई नहीं देती और उनके साथ होने वाला अन्याय उपेक्षित होता है।&#8221; </p>
<p>लोग माने अथवा नहीं, लेकिन इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता है कि तत्कालीन कैदी सुनील बत्रा के कारण भारत के जेलों के अंदर होने वाले उत्पीड़न पर सं 1978 का ऐतिहासिक निर्णय आया था और यही कारण था की उच्चतम न्यायालय ने निर्जन कारावास पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। क्या आपको कभी इस बात की जानकारी थी कि वह स्वयं एक उत्पीड़क था? या आप यह जानते हैं कि दसकों पहले हमारी हिरासत में  हुई उद्योगपति राजन पिल्लई की मृत्यु की हमें कितनी महंगी कीमत चुकानी पड़ी थी? परन्तु इसके वावजूद हम अभी तक तिहाड़ में भविष्य में होने वाली हिरासती मौतों के विरुद्ध कोई प्रभावशाली कदम उठाने में आज तक विफल रहे हैं। इतना अधिक कि मौजूदा समय में सर्वाधिक बीभत्स  अपराधों का वर्ष 2012 के निर्भया केस के बलात्कारियों और हत्यारों को अन्य कैदियों के साथ छोड़ दिया गया था, जहाँ उनके मारे जाने की सम्भावना अत्यधिक प्रवाल थी। इन्हीं तमाम कारणों ने निर्भया केस के प्रमुख अभियुक्त राम सिंह को तिहाड़ के अंदर संदिग्ध परिस्थितियों में मरने को मजबूर कर दिया था।&#8221; </p>
<figure id="attachment_6272" aria-describedby="caption-attachment-6272" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6272" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6272" class="wp-caption-text">सुनील कुमार गुप्ता, पूर्व जेलर, तिहाड़ जेल</figcaption></figure>
<p>विगत दिनों हम तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता से मिले थे। उन्होंने कहा कि &#8220;सुनील बत्रा वाली घटना मेरे तिहाड़ में प्रवेश करने से काफी पहले हुयी थी। मैंने ऐसी व्यक्ति के रूप में तिहाड़ में प्रवेश किया था, जिसे शिकायतों से प्रत्यक्ष निपटना था और जो न्याय प्रक्रिया का एक अंग था और जिसे व्यवस्था बनाये रखने के लिए हिंसा का सहारा भी लेना पड़ा। मैं अँधा नहीं था की अपने इर्द गिर्द अक्सर मडराने वाली उपहास पूर्ण परिस्थितियों को अनदेखा कर देता। जब उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की बात चलती है तो मुझे सर्वाधिक स्मरणीय मामला सुनील बत्रा का दिखाई देता है। मैंने चार्ल्स शोभराज के आगे-पीछे घूमने वाले एक बिगड़ैल बच्चे के रूप में तो वह था ही, वह एक धनी प्राचीन मूर्ति विक्रेता का लाडला पुत्र था और अमीर लोगों की बस्ती सुंदर नगर में रहता था। तिहाड़ में उसका आगमन सं 1973 में एक शास्त्र डकैती के कारण हुआ था, जो इतनी भयानक सिद्ध हुई की उसमें दो लोगों की मृत्यु हो गई थी। बत्रा, जिसकी उम्र उस समय 27 वर्ष थी, को मौत की सजा दी गयी थी और उसे निर्जन कोठरी में बंद कर दिया गया था। लेकिन उसने आगे चलकर जो कार्य किया, उससे न केवल उसके जीवन का लक्ष्य बदल गया, बल्कि मृत्यु दंड प्राप्त अन्य सभी कैदियों की दशा भी बदल दी गयी थी।&#8221; </p>
<p>कहते हैं साल 1977 में सुनील बत्रा ने अपनी काल कोठरी से उच्चतम न्यायालय को एक पत्र लिखा, जिसे न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने याचिका का रूप दे दिया। अनेक कैदी न्यायधीशों और न्यायालयों को पत्र लिखते थे, परन्तु उन पत्रों की बड़ी संख्या केसों के कूड़े में जाकर विलीन हो जाती थी। यह एक सुखद संयोग की बात थी कि न्यायमूर्ति अय्यर ने केरल की पहली सरकार में  जेल मंत्री के रूप में काम किया था और जेल सुधर एक ऐसा क्षेत्र था, जिससे वे पहले से परिचित थे। इसलिए उन्होंने सुनील बत्रा के पत्र को अत्यंत गंभीरता से लिया। वास्तव में, उनके कार्यकाल में  अनेक प्रगतिशील निर्णय पारित किये गए थे। उन्होंने इस व्यापक प्रश्न का निर्णय करने हेतु एक विशेष जांच बैठा दी कि क्या निर्जन कारावास मात्रा एक दंड था या वह सुधार के उद्देश्य से घातक था? मामला अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि न्यायमूर्ति अय्यर उसमें व्यक्तिगत रूप से रूचि ले रहे थे। इसका अर्थ यह था कि हमारी जेलों के इतिहास में एक मात्र और पहली बार उच्चतम न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश तिहाड़ जेल में हेतु पधारे कि क्या वहां की स्थितियां वास्तव में बुरी थी, जितनी कि पत्र में बताई गई थी। </p>
<blockquote><p>ज्ञातव्य हो कि 5 अगस्त 1986 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिला एवं सत्र न्यायाधीश को दो महीने में कम से कम एक बार जिला जेल का दौरा करना चाहिए और बाल कैदियों, चाहे वे दोषी हों या विचाराधीन, का विशेष ध्यान रखना चाहिए तथा किसी भी उल्लंघन की ओर उनका ध्यान आकर्षित करना चाहिए। इसके चौदह साल बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा ने 29 अगस्त 2000 को तिहाड़ सेंट्रल जेल का दौरा किया। यह आयोग के किसी भी अध्यक्ष द्वारा इस जेल का पहला दौरा था । बाद में आयोग ने जेल अधिकारियों के साथ-साथ दिल्ली सरकार को निम्नलिखित सिफारिशें/निर्णय भेजे। लेकिन उसका क्या हुआ यह तो सरकार के साथ साथ जेल अधिकारी अधिक जानते हैं। </p></blockquote>
<figure id="attachment_6273" aria-describedby="caption-attachment-6273" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6273" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6273" class="wp-caption-text">न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, जब न्यायमूर्ति एम एच बेग, न्यायमूर्ति पी एस कैलासम एवं न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने 23 जनवरी, 1978 को तिहाड़ जेल का दौरा किया कि स्थिति उतनी विकराल नहीं थी, जितनी की पत्र में उन्हें बताई गयी थी। इसके वावजूद, जब न्यायमूर्तियों ने पाया  कि अधिकतर कैदी  निर्जन कारावास की अपेक्षा शारीरिक दंड को अधिक प्राथमिकता देते थे तो उन्होंने निर्णय दिया कि सुनील बत्रा या किसी ने कैदी पर अब उसे लागु नहीं किया जायेगा, क्योंकि वह किसी भी उत्पीड़न से कम नहीं था। निर्जन कारावास के विरुद्ध यह ऐतिहासिक निर्णय बन गया। एक ओर जहाँ इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विभिन्न जेलों में निर्जन कारावास की व्यवस्था आज भी विद्यमान है, वह वैधानिक नहीं है और कैदियों के पास उसके विरुद्ध शिकायत करने का एक परतावधान मौजूद है। </p>
<p>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;देश के शीर्षस्थ न्यायाधीशों  से संवाद स्थापित करने और सफलता का स्वाद चखने के एक वर्ष बाद सुनील बत्रा ने 1979  पत्र लिखा। उसने एक अन्य कैदी प्रेम चंद पर किये जाने वाले अत्याचार के बारे में लिखा था। 26 अगस्त 1979 को प्रेमचंद को अत्यधिक रक्तस्त्राव के कारण लेडी इर्विंग अस्पताल ले जाया गया था। ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने पाया कि उसके गुदा में घाव हो गया है जिसके बारे में उसके साथ गए जेल कर्मचारियों ने उसे यह कहकर दरकिनार करने की कोशिश की थी कि प्रेमचंद के अधिक नशे की लत के कारण उसे रक्तस्त्राव हो रहा था। बहरहाल, डाक्टर ने उनके स्पष्टीकरण को अविश्वसनीय माना और उसके घाव को ठीक करने के लिए शल्य क्रिया करने का निर्णय लिया। उस घटना की शिकायत जब उच्च न्यायालय पहुंचा तो वह भी एक याचिका बन गई और उसकी जांच के लिए न्यायालय ने वाई.एस. चितले एवं मुकुल मुद्गल को कोर्ट द्वारा नियुक्त कर जांच कर्ता बनाया, जो कालांतर में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने। जेल के अधिकारियों ने सच्चाई दबाने की भरपूर कोशिश की थी। &#8216;पतन&#8217; कथा के अतिरिक्त उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि संभवतः प्रेमचंद बवासीर की बीमारी से ग्रस्त था और उन्होंने अपनी कहानी को मनाने के लिए प्रेमचंद पर दबाव भी बनाया था। परन्तु अंततोगत्वा सत्य बाहर आ ही गया। </p>
<p><strong>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;उच्चतम ​न्यायालय के निर्णय के अनुसार, वार्डर मग्गर सिंह ने प्रेमचंद के गुदा मार्ग में लोहे की एक रॉड घुसेड़ दी थी, क्योंकि वह प्रेमचंद से मिलने आने वाले मुलाकातियों से उसकी मुलाक़ात करवाने के बदले रिश्वत की मांग कर रहा था, जिसे पूरी कर पाने में गरीब प्रेमचंद असमर्थ था। इस नियमोलंघन की दुखद प्रकृति ने सभी को हिलाकर रख दिया था, जिससे पता चलता था कि जेल के अंदर की स्थितियां कितनी क्रूर हो सकती हैं कि वहां ऐसा जघन्य कृत किया गया। परन्तु इसके वावजूद मग्गर सिंह को जेल कर्मियों की ओर से समर्थन मिला और उन्होंने उसके अपराध को छिपाने की भरपूर कोशिश की। जांच कार्रवाई का संचालन करने वाले न्यायमूर्तियों ने सुनील बत्रा को धन्यवाद दिया, जो उस समय मौत की सजा काट रहा था (जिसे बाद में बदलकर आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया गया था , जिसने इस निर्दयता के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी और जिसने उच्चतम न्यायालय को सन् 1979 में यह कहने पर विवश कर दिया था कि कैदी भी इन्सान हैं, कोई जानवर नहीं और जेल प्रणाली में मानव कैदी के सम्मान के विरुद्ध आचरण करने वाले उसके पथभ्रष्ट &#8216;अभिभावकों&#8217; को दण्डित करने का आदेश दिया था।&#8221; </strong></p>
<p>चलिए आगे बढ़ते हैं। न्यायिक अधिकारी उत्पीड़न के अन्य प्रकारों की ओर भी सचेत हुए, जो मग्गर सिंह द्वारा किये गए उत्पीड़न के समान मुखर नहीं थे, परन्तु अब भी अत्यंत कष्टप्रद एवं अपमानजनक थे, जिसमें दूरस्थ जेलों में कैदियों का स्थानांतरण, जहाँ कोई उससे मिलने नहीं जा सकता था या शौचालय की सफाई जैसा अमानवीय कार्य कराया जाता था अथवा उन्हें शौचालय के पास सोने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्होंने महसूस किया कि कैदियों को कोड़े मारने जैसे नियम पंजाब जैसे राज्य की जेल नियमावलियों के अंग के रूप में अभी भी विद्यमान थे। वहां वयस्क कैदियों को नितम्बों पर 30 कोड़े तक और किशोरों को 15 कोड़े मारने का नियम मौजूद था। अन्य जेलरों के लिए यह सर्वाधिक पसंदीदा भौतिक अनुशासन था और सं 1971 में उन्होंने एक कैदी को इतने कोड़े मारे कि उसकी मृत्यु हो गयी। </p>
<figure id="attachment_6274" aria-describedby="caption-attachment-6274" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6274" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-683x1024.jpg 683w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-768x1151.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6274" class="wp-caption-text">तिहाड़ में प्रवेश करती एक कैदी का परिजन</figcaption></figure>
<p>सुनील गुप्ता आगे कहते हैं: &#8220;सुनील बत्रा जैसा कोई व्हिसिल ब्लोवर बलात्कारी एवं उत्पीड़क क्यों बन गया? या सदैव वह ऐसा ही था? मैं उससे मारकंडे रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद ही मिला था। तब तक उस रिपोर्ट के आधार पर उसकी शक्तियों में काफी कमी कर दी गई थी और अब उसकी कोठरी में कोई नाबालिग लड़का नहीं जाता था। सुनील बत्रा के इस दोहरे चरित्र का एक उचित कारण यह था कि  वह एक अवसरवादी व्यक्ति था। उसने निर्जन कारावास का मुद्दा केवल इसलिए उठाया था, क्योंकि उसे स्वयं वहां रखा गया था और वहां की दशन अत्यंत दयनीय हो गयी थी। परन्तु जब उसके लिए वही स्थिति सुविधाजनक लगी तो उसे अन्य कैदियों के उत्पीड़न में कोई दोष नजर नहीं आया। वास्तविकता यह है कि जेलों में अप्राकृतिक मैथुन के विषय में कुछ भी असामान्य नहीं है। मैं नहीं जानता कि बत्रा अपनी कोठरी में नाबालिगों को लाने का प्रबंध कैसे करता था, परन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि यदि उन दोनों लड़कों ने अपने खिलाफ होने वाले अप्राकृतिक यौनाचार की शिकायत जेल अधिकारियों से की होती तो उन्हें यह कहकर भगा दिया जाता &#8220;की अरे भाग।&#8221;</p>
<p>परन्तु, गुप्ता जी कहते है कि &#8220;अनेक गैर-सरकारी संगठनों द्वारा सर्वेक्षणों से पता चला है कि जेल में युवा अवस्था अपराधियों में से 50 प्रतिशत के साथ अप्राकृतिक यानाचार किया गया था। जो लोग मजबूर हैं या जेल के आसपास लम्बे समय से रह रहे हैं, वे लोग गुदा मैथुन को प्रताड़ना या अपने शक्ति प्रदर्शन के औजार के रूप में देखते हैं। मुझे नहीं मालूम कि सुनील बत्रा समलैंगिक था या नहीं, क्योंकि मैंने अनेक सीधे-सादे कैदियों को देखा था, जो जेल में समलैंगिकता की ओर मुड़ गए थे। दूरदर्शी न्यायमूर्ति अय्यर ने जेल से गैरहाजिरी यह स्वीकृत अवकाश का समर्थक होने का एक अन्य कारण यह भी था। उत्पीड़न के विरुद्ध दिए गए अपने उसी निर्णय में उन्होंने इस बड़ी समस्या को पहचाना था और कहा था कि युवा अपराधियों को बड़े अपराधियों के साथ रखा जाना या विचाराधीन कैदियों को सजायाफ्ता या दूसरे कैदियों के साथ रखा जाना अप्राकृतिक यौनाचार का कारण बन सकता था।  </p>
<figure id="attachment_6275" aria-describedby="caption-attachment-6275" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6275" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6275" class="wp-caption-text">​तिहाड़ में किरण बेदी (तस्वीर इण्डिया टुडे के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p><strong>सलाखों के पीछे रहने वाले कैदियों के लिए सेक्स निर्विवाद रूप से एक प्रासंगिक विषय था। और सम्भवतः इन्हीं कारणों से उन्होंने आकस्मिक अवकाश प्रणाली को अच्छे आचरण की एक सौगात के रूप में देखा था, ताकि कैदी अपने सछ्वासिक संबंधों को बनाये रख सकें। दरअसल, उन्होंने कैदियों को सप्ताहांत में छुट्टी दिए जाने की वकालत की थी, ताकि वे अपने परिवारों के साथ रह सकें। कालांतर में 90 के दशक के प्रारम्भ में जब किरण बेदी तिहाड़ की प्रमुख बनी, वह जेल में कंडोम बिकने की मशीन की विवादास्पद संकल्पना के साथ सामने आयीं। उनके निर्णय को न्यायालय में चुनौती भी दी गयी, लेकिन जब तक न्यायालय किरण बेदी के निर्णय पर कोई विचार करती, उससे पूर्व ही वह तिहाड़ की प्रमुख नहीं रह गयीं थी ।</strong> </p>
<figure id="attachment_6276" aria-describedby="caption-attachment-6276" style="width: 1347px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom.jpg" alt="" width="1347" height="1367" class="size-full wp-image-6276" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom.jpg 1347w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-296x300.jpg 296w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-1009x1024.jpg 1009w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-768x779.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 1347px) 100vw, 1347px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6276" class="wp-caption-text">​तिहाड़ में किरण बेदी (तस्वीर इण्डिया टुडे के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p>साल 1981 में, उच्चतम न्यायालय के एक विवादस्पद निर्णय के आधार पर सुनील बत्रा की मौत की सजा को संक्षिप्त करते हुए आजीवन कारावास में बदल दिया गया था और कुछ वर्षों बाद उसे रिहा कर दिया गया था। वह कुछ वर्षों तक वकालत करने के बाद तिहाड़ वापस आया। इस बार उसे नशा सम्बन्धी अपराध में जेल लाया गया था। बहरहाल, उसकी विरासत जीवित रही और आज भी जेलों में प्रासंगिक है। यह आवश्यक नहीं है कि उत्पीड़न भौतिक या लैंगिक आघात के रूप में ही हो। अक्सर उसका अर्थ यह होता है कि संरक्षक उत्पीड़न के विरुद्ध अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। न्यायमूर्ति अय्यर ने बेशक आदेश पारित करने  मग्गर सिंह के खिलाफ दशकों पूर्व कार्रवाई करने का आदेश दिया था, परन्तु हिरासत में होने वाली ाबढ़ती मौतों की संख्या के रूप में उत्पीड़न का अस्तित्व आज भी बरकरार है। </p>
<p>तिहाड़ में सर्वाधिक उच्च स्तरीय, नाटकीय और विवादस्पद हिरासती मौत सं 1995 में बिस्कुट निर्माता राजन पिल्लई की थी। उस पुरे समय के दौरान मैं वहीँ था और मुझे याद है कि तिहाड़ ने केटीएस तुलसी और विकास पाहवा जैसे बड़े वकीलों को न्यायमूर्ति लीला सेठ, जो उस घटना की जांच कर रही थी, की अदालत में पेश होने के लिए कितना धन खर्च किया था। मेरे विचार से, वह तिहाड़ की और से अब तक सीखा गया सबसे मंहगा सबक था। </p>
<p>जिस समय ब्रिटानिया कंपनी समूह के अध्यक्ष राजन जनार्दन मोहनदास पिल्लई को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया, उस समय हम उनसे काफी परिचित थे। हमें उस कहानी का पता था कि कैसे उनके सिंगापूर स्थित कारोबारी साझेदारी के साथ उनका विवाद हुआ था और उसने पिल्लई के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई शुरू की थी।सिंगापूर की अदालत ने जब राजन पिल्लई को अप्रैल 1995 में दोषी पाया तो वहां से भागकर दिल्ली आ गए। सिंगापूर ने चुस्ती दिखाते हुएप्रत्यर्पण का नोटिश भेजा और इंटरपोल ने उसके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया, जिसका भारत को पालन करना था। सिंगापूर की ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण के मामले को न्यायमूर्ति एस.पी मेहता को सौंप दिया, जिन्होंने उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया। तीन महीने तक उसका पीछा करने के बाद 3 जून 1995 को शक्तिशाली कारोबारी को राजधानी के ह्रदय स्थली होटल ली मेरिडियन के कामना नंबर 1986 से गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी गिरफ्तारी के समय पुलिस ने उसके होटल के कमरे से दवाओं के साथ साथ शराब भी बरामद की थी। यह एक महत्वपूर्ण जानकारी थी, परन्तु किसी अज्ञात कारण से उसे उसके रिकार्डों में उस रूप में नहीं दर्ज किया गया, जैसा की उसे दर्ज किया जाना चाहिए था। </p>
<figure id="attachment_6277" aria-describedby="caption-attachment-6277" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6277" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6277" class="wp-caption-text">राजन जनार्दन मोहनदास पिल्लई</figcaption></figure>
<p><strong>राजन पिल्लई को मजिस्ट्रेट एस पी मेहता के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिन्हे अगली सुबह उसके प्रत्यर्पण का निर्णय करना था। उसी समय पिल्लई के वकीलों की ओर से अपोलो अस्पताल का एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें कहा गया था कि उसे चिकित्सा पर्यवेक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि वह शराब-जन्य लीवर सिरोसिस की बीमारी से पीड़ित है। सर्वाधिक महत्वपूर्व तथ्य यह था कि अस्पताल के नोट में यह भी कहा गया था कि एक दिन पहले उसे शौच के साथ रक्त स्त्राव हुआ था और उसने खून की उल्टियां भी की थी, जिसका अर्थ यह था कि वह अत्यंत गंभीर अवस्था में था। उसकी चिकित्सा टिपण्णी में इस बात की साफ़-साफ़ चेतावनी दी गयी थी कि यदि समुचित उपचार उपलब्ध नहीं कराया गया तो परिणाम घातक हो सकते थे। उस टिपण्णी में आगे यह भी परामर्श दिया गया था कि उसके लिए वंचित लेजर सर्जरी हेतु उसे एस्कार्ट अस्पताल ले जाना चाहिए। </strong></p>
<p>न्यायमूर्ति मेहता ने उसे जेल भेज दिया, परन्तु उन्होंने उसके साथ ही जेल के रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर को एक &#8216;तात्कालिक&#8217; पत्र लिखा और पूछा कि क्या तिहाड़ पिल्लई की देखभाल कर सकती है और केंद्रीय जांच ब्यूरो से पूछा की वह इसके चिकित्सा आवेदन के विषय में क्या सोचती है? उन्होंने तिहाड़ को इस बात का भी निर्देश दिया कि वह पिल्लई की चिकित्सीय समस्याओं का ध्यान रखे और दूसरी ओर अदालत आरएमओ की अगले दिन आने वाली विस्तृत रिपोर्ट की प्रतीक्षा करती रही। </p>
<p>तिहाड़ में प्रत्येक व्यक्ति को किसी अमीर कैदी को आना अच्छा लगता है, क्योंकि वह उन्हें जेल के उत्पादों को बेचकर धनार्जन का अवसर देता है। परन्तु 48-वर्षीय पिल्लई उन धनि कैदियों से बिलकुल भिन्न था। उसके अंदर ऐसा कोई घमंड या कुंठा नहीं थी, जो सामान्यतया धनि और शक्तिशाली कैदियों से जुडी होती है। वास्तव में पिल्लई एक शांत एवं विनम्र कैदी था। उसके साथ जेल में बातचीत करने वालों के वकीलों ने कहा कि वह अत्यंत कुम्हलाया हुआ था। उन्हें इस बात की बहुत काम जानकारी थी कि कैसे तेजी से चीजें उसके नियंत्रण से बाहर होती जा रही थी। </p>
<p>न्यायमूर्ति मेहता ने जो पत्र तिहाड़ के आरएमओ के पास भेजा था, वह उसके पास कभी पहुंचा ही नहीं, क्योकि उस पत्र को भेजने का दायित्व जिस व्यक्ति पर था, उसने उसकी तात्कालिकता को उतना महत्व ही नहीं दिया था। उसने उस पात्र को स्वयं आरएमओ के पास जाकर देने के वजाय कुरियर से भेज दिया था। इससे भी बुरी स्थिति यह थी कि जो डाक्टर जेल में आने वाले नए कैदियों की चिकित्सा जांच करता था, वह उस दिन अपनी ड्यूटी पर मौजूद ही नहीं था , जिस दिन पिल्लई को तिहाड़ लाया गया था। </p>
<p>अगली सुबह तक भी न्यायमूर्ति मेहता को तिहाड़ की डाक्टरों की ओर से कोई अपेक्षित जानकारी नहीं दी गयी और सीबीआई पिल्लई के ख़राब स्वास्थ्य के बारे में दिए गए किसी सुझाव को सवीकार करने को तैयार नहीं थी। सीबीआई के अधिकारियों ने अदालय को बताया था कि जिस समय उन्होंने पिल्लई को गिरफ्तार किया था, वह शराब पी रहा था। अतः पिल्लई को इलाज के बहाने एस्कॉर्ट अस्पताल भेजने का सुझाव स्वीकार्य नहीं था। इसके प्रत्युत्तर में पिल्लई के वकीलों ने उसके चिकित्सा प्रतिवेदनों को प्रस्तुत किया। परन्तु न्यायाधीश महोदय स्वतंत्र चिकित्सा परामर्श चाहते थे, जो उन्हें तिहाड़ के आरएमओ से प्राप्त करने की अपेक्षा थी, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को अगले दिन, यानी 6 जुलाई तक रोक लिया और पिल्लई को वापस जेल भेज दिया। यह पिल्लई का दुःर्भाग्य था कि जब तक वह अदालत से तिहाड़ पहुंचा, उस समय शाम के पांच बज चुके थे, यानी तिहाड़ का आरएमओ अपनी ड्यूटी समाप्त करे वापस घर जा चूका था। </p>
<blockquote><p>6 जुलाई को राजन पिल्लई को हिरासत में गए तीन दिन बीत चुके थे। उन तीन दिनों में उसने अपनी प्रस्तावित दवाइयां नहीं ली थी, क्योंकि उसकी जांच ही नहीं हुई थी। जेल प्राधिकारियों ने जज को सौंपी अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि उसके पास लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी की चिकित्सा के साधन नहीं थे, परन्तु उन्होंने कहा कि उस बिमारी की इलाज की सुविधा एम्स जैसे सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध थी। न्यायमूर्ति मेहता ने किसी निजी अस्पताल में जांच करने की पिल्लई की मांग को अस्वीकार कर दिया और 11 जुलाई तक के लिए फिर तिहाड़ भेज दिया, लेकिन उसे अपनी दवाएं लेने की अनुमति प्रदान कर दी थी। </p></blockquote>
<p>गुप्ता कहते हैं: &#8220;उस शाम राजन पिल्लई जेल नंबर 4 स्थित अपने लिए नियत वार्ड नंबर 9 में गया। वह तनावग्रस्त था। वह अदालत में ही कांपने लगा था। न्यायाधीश ने अपने आदेश में तिहाड़ के डाक्टर को उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करने का आदेश दिया था। पिल्लई के गृह राज्य केरल के एक अन्य कैदी जॉर्ज कुट्टी ने उसे पहनने के लिए लुंगी और पानी का एक बोतल दी और सोने के लिए सीमेंट का बना चबूतरा दिखाया। अगले दिन सुबह ताला खुलने के समय प्रहरियों ने पिल्लई को सीमेंट के चबूतरे पर लेते देखा था। पिल्लई के शरीर में सूजन आ गयी थी। वह नंगे पांव बार बार शौचालय गया था। इसके बावजूद किसी को उसकी सहायता के लिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वे इसे किसी नए आदमी के जेल में आने पर होने वाली असुविधा के रूप में देख रहे थे।&#8221; </p>
<p><strong>&#8220;जिस समय हमने उसे सीमेंट के चबूतरे पर लेते हुए पाया था, पिल्लई बुरी हालत में था और उसे बहुत तेज बुखार था। लेकिन उसे किसी अस्पताल में ले जाने के बजाय सामान्यतया जेल के चिकित्सक के पास ले जाया गया। जेल के चिकित्सक ने उसे &#8216;कम्पोज&#8217; के एक इंजेक्शन दिया, जिसका उपयोग आम तौर पर कैदियों में होने वाली व्यग्रता के उपचार के लिए किया जाता है। जब उसके वकील प्रदीप दीवान 7 जुलाई की शाम को चार बजे के बाद उससे मिलने आये और उन्होंने मांग की कि पिल्लई को किसी उचित अस्पताल में ले जाना चाहिए।&#8221; </strong></p>
<figure id="attachment_6278" aria-describedby="caption-attachment-6278" style="width: 1536px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC.jpg" alt="" width="1536" height="2048" class="size-full wp-image-6278" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6278" class="wp-caption-text">​हिरासत में मौत</figcaption></figure>
<p>इस बात पर अनेक मत थे कि राजन पिल्लई कैसे और क्यों मारा, परन्तु मेरे विचार से, तिहाड़ की उपेक्षा और असावधानी ने उसकी हत्या की थी। जब पिल्लई को अस्पताल ले लाया गया, तब बहुत कीमती समय नष्ट हो चूका था, क्योंकि उस समय वहां कोई एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी। पिल्लई के परेशान वकील दीवान ने उसे अपनी कार में अस्पताल ले जाने का सुझाव दिया, परन्तु हमने उसे यह कहकर ठुकरा दिया कि वह नियमों के विरुद्ध था। इससे भी बुरी स्थिरी यह थी कि कैदी को अस्पताल ले जाने के लिए कोई सशस्त्र पुलिस उपलब्ध नहीं थी। कुल मिलकर, राजन पिल्लई को अस्पताल ले जाने में दो घंटे से अधिक का विलम्ब हो गया और वह दो घंटे उसके लिए घातक सिद्ध हुआ। </p>
<blockquote><p>पिल्लई को ले जाने वाला स्ट्रेचर एम्बुलेंस के फर्श पर रखा गया था और रास्ते में उसके मुंह से खून की उल्टियां होने लगी थी। अस्पताल पहुंचने पर वहां ड्यूटी पर मौजूद  डॉक्टरों को किसी ने यह नहीं बताया कि पिल्लई को लिवर सिरोसिस की बीमारी थी, इसलिए डॉक्टर ने उसे बचने का असफल प्रयास किया। रात को 8.30 बजे राजन पिल्लई मृत घोषित कर दिया गया। उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया कि उसकी मौत एसोफैगल वेरिस के कारण हुई थी, जिसका मौलिक अर्थ यह है कि उसके गले और पेट की बढ़ी हुयी नाड़ियों ने उसकी श्वास नाली को अवरुद्ध कर दिया था, जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई थी। ऐसी जटिलता सिरोसिस की अग्रिम अवस्था में उत्पन्न होती है। </p></blockquote>
<p><strong>पिल्लई की मृत्यु के लिए कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रत्येक स्तर पर विफलताओं की एक श्रृंखला रही थी। </strong></p>
<p>राजन पिल्लई की मृत्यु ने तिहाड़ में सुविधाओं की दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। तीन वर्ष बाद 1998 में पिल्लई के गृह राज्य केरल के सांसदों ने सरकार पर दबाव बनाना जारी रखा, जिससे तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी को विवश होकर यह आश्वासन देना पड़ा की पिल्लई की तरह सुविधाओं के भाव में किसी अन्य कैदी को अपनी जान नहीं गबानी पड़ेगी। जेल में डॉक्टरों की स्वीकृत संख्या 16 से बढ़ाकर 110 की जाय, चिकित्सा से सम्बद्ध कर्मचारियों की संख्या 80 से बढ़ाकर 200 की गयी। नए कैदियों की चिकित्सा जांच अनिवार्य कर दी गयी। आडवाणी ने वचन दिया कि इस प्रकार की घटना ​भविष्य में पुनः नहीं हो, लेकिन क्या घटना रुकी? या फिर आडवाणी तिहाड़ त्रासदी के बारे में फिर विचार किये?</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/tihar-trauma-when-an-iron-rod-was-inserted-in-prisoners-anus">तिहाड़ जेल-6 ✍ जहाँ आगंतुकों से पैसे नहीं मिलने पर कैदी के गुदा मार्ग में लोहे का रॉड घुसेड़ा गया था और गलती छुपाने के लिए कह दिया &#8216;बवासीर&#8217; हो गया है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-3 ✍ &#8220;ब्लैक वारंट&#8221; &#8216;निर्गत&#8217; और &#8216;निष्पादित&#8217; करने वालों के बीच &#8216;सामाजिक खाई&#8217; 😢 आखिर वह भी तो न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को ही निष्पादित करता है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 05:52:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
		<category><![CDATA[death row]]></category>
		<category><![CDATA[jallad]]></category>
		<category><![CDATA[judgment]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[prisoners]]></category>
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		<category><![CDATA[tihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आज से 30-वर्ष पहले 15 सितम्बर, 1995 को टी.एल.वी. प्रसाद के निर्देश में &#8216;मणिवानां&#8217; की कहानी पर आधारित पहले तमिल फिल्म &#8220;अमिधिपड़े&#8221; बनी। बाद में उसका हिंदी संस्करण &#8220;जल्लाद&#8221; के नाम से बनी थी। &#8220;जल्लाद&#8221; फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, मौशुमी चटर्जी, रम्भा, माधो और कई अन्य अदाकार और अदाकारा काम [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/social-trench-between-those-who-issue-and-execute-a-black-warrant">तिहाड़ जेल-3 ✍ &#8220;ब्लैक वारंट&#8221; &#8216;निर्गत&#8217; और &#8216;निष्पादित&#8217; करने वालों के बीच &#8216;सामाजिक खाई&#8217; 😢 आखिर वह भी तो न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को ही निष्पादित करता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आज से 30-वर्ष पहले 15 सितम्बर, 1995 को टी.एल.वी. प्रसाद के निर्देश में &#8216;मणिवानां&#8217; की कहानी पर आधारित पहले तमिल फिल्म &#8220;अमिधिपड़े&#8221; बनी। बाद में उसका हिंदी संस्करण &#8220;जल्लाद&#8221; के नाम से बनी थी। &#8220;जल्लाद&#8221; फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, मौशुमी चटर्जी, रम्भा, माधो और कई अन्य अदाकार और अदाकारा काम किये थे। फिल्म में संगीत दिया था आनंद मिलन। &#8220;जल्लाद&#8221; फिल्म ने मिथुन चक्रवर्ती को शानदार नाम दिया। मिथुन चक्रवर्ती दो किरदारों की भूमिका निभाए थे और उस किरदार के लिए नेशनल अवॉर्ड से भी नवाजा गया था। इतना ही नहीं, इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी कमाल का प्रदर्शन किया। उस साल कमाई के मामले में वह फिल्म 11वें नंबर पर थी। </strong></p>
<p>मिथुन चक्रवर्ती आज भारतीय अभिनेता, निर्माता और राजनीतिज्ञ बन गए हैं। उनके घर के दीवारों पर तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार का सम्मान लटका होगा। <strong>इतना ही नहीं, विगत 8 अक्टूबर, 2024 को उन्हें 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया जो भारतीय फिल्म जगत में सबसे सम्मानित पुरस्कार माना जाता है।</strong></p>
<blockquote><p>यहाँ मिथुन चक्रवर्ती के बहाने, उनकी फिल्म &#8216;जल्लाद&#8217; के बहाने जिसने कमाई, नाम और शोहरत में मामले में उस कालखंड में हस्ताक्षर किया था, विगत तीन दशकों में क्या मिथुन चक्रवर्ती कभी भारत के वास्तविक &#8220;जल्लादों&#8221; के बारे में सोचे कि वह कैसे जी रहा है? उसकी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक स्थितियां कैसी हैं? शायद नहीं। अगर देखे होते, पूछे होते तो शायद भारत लें &#8216;वास्तविक जल्लादों&#8217; की स्थिति आज ऐसी नहीं होती। वह भी इसी समाज का हिस्सा है और वह भी न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को की निष्पादित कर रहा है।</p></blockquote>
<p>भारत सरकार में तत्कालीन कानून मंत्री अरुण जेटली को प्रस्तुत अपनी 187 वीं रिपोर्ट में, भारतीय विधि आयोग ने कहा था कि वर्तमान में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354(5) के अनुसार मृत्युदंड के निष्पादन की विधि &#8216;मृत्यु तक फांसी&#8217; है। उच्चतम न्यायालय ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1982) 3 एससीसी 25 में कहा है कि मृत्यु दंड की सजा के निष्पादन में होने वाली शारीरिक पीड़ा और कष्ट भी कम क्रूर और अमानवीय नहीं है। इसलिए आयोग ने मृत्यु दंड के निष्पादन का मानवीय तरीका उपलब्ध कराने के लिए अध्ययन किया। भारतीय विधि आयोग का वह रिपोर्ट (डीओ संख्या 6(3)/85/2003-एलसी(एलएस) 17 अक्टूबर, 2003) मृत्यु दंड के निष्पादन विधि और आकस्मिक मामलों से संबंधित था। </p>
<figure id="attachment_6234" aria-describedby="caption-attachment-6234" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao.jpg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-6234" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6234" class="wp-caption-text">न्यायमूर्ति एम. जगन्नाथ राव (अब दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जो बाद में सर्वोच्च न्यायालय में भी न्यायाधीश बने, न्यायमूर्ति एम. जगन्नाथ राव (अब दिवंगत) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि &#8220;आयोग ने दुनिया भर में प्रचलित मृत्यु दंड के निष्पादन के विभिन्न तरीकों पर विचार किया। इस परामर्श पत्र पर कई प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं। आयोग ने सिफारिश की है कि सीआरपीसी, 1973 की धारा 354(5) में संशोधन करके अभियुक्त की मृत्यु होने तक घातक इंजेक्शन द्वारा मृत्यु दंड के निष्पादन का वैकल्पिक तरीका उपलब्ध कराया जाए। मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके के बारे में उचित आदेश पारित करना न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर होगा। मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके के प्रश्न पर दोषी को अवश्य सुना जाएगा, इससे पहले कि ऐसा विवेक प्रयोग किया जाए। इसके अलावा, वर्तमान में, ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में अपील का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, जहां उच्च न्यायालय सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित मृत्युदंड की पुष्टि करता है या जहां उच्च न्यायालय सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित सजा को बढ़ाता है और मृत्युदंड देता है।&#8221;</p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=3s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>न्यायमूर्ति एम.जगन्नाथ राव ने कहा था कि &#8220;आयोग, विभिन्न प्रतिक्रियाओं और विचारों पर विचार करने के बाद, मृत्युदंड की पुष्टि या देने वाले उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील का वैधानिक अधिकार प्रदान करने की सिफारिश करता है। तदनुसार, सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अधिकार क्षेत्र का विस्तार) अधिनियम, 1970 को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार प्रदान करने के लिए उपयुक्त रूप से संशोधित किया जाना चाहिए। सशस्त्र बलों के संबंध में एक और पहलू महत्वपूर्ण है। अभी तक सेना अधिनियम, 1950, नौसेना अधिनियम, 1957 और वायु सेना अधिनियम, 1950 के तहत कोर्ट मार्शल द्वारा पारित मौत की सजा के खिलाफ अपील के अधिकार का कोई प्रावधान नहीं है। आयोग ने प्रतिक्रियाओं और विचारों पर विचार करने के बाद सिफारिश की है कि ऊपर वर्णित कोर्ट मार्शल द्वारा पारित मौत की सजा के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जानी चाहिए।&#8221;</p>
<blockquote><p>विधि आयोग का का सुझाव था कि &#8220;कानूनों में मौत की सजा के निष्पादन के मौजूदा तरीकों में से एक यानी &#8216;गर्दन से लटकाना&#8217; को &#8216;आरोपी के मरने तक घातक इंजेक्शन लगाने&#8217; से बदल दिया जाना चाहिए। एक और प्रावधान होना चाहिए कि घातक इंजेक्शन कोर्ट मार्शल द्वारा पारित मौत की सजा के निष्पादन का एक वैकल्पिक तरीका होना चाहिए। इसलिए आयोग ने सिफारिश की है कि इन उद्देश्यों के लिए इन अधिनियमों में उपयुक्त संशोधन किए जा सकते हैं। अंत में,  मौत की सजा के मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच द्वारा की जानी चाहिए। यह भी सिफारिश की गई है कि इन उद्देश्यों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के नियमों में उचित संशोधन किया जा सकता है।&#8221;</p></blockquote>
<p>भारत विधि आयोग के एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से 2015 के मध्य न्यायालयों ने 1790 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी। उसमें 63  प्रतिशत अभियुक्तों की सजा कम कर दिया गया था और 29 प्रतिशत अभियुक्त उच्च न्याययालयों द्वारा रिहा कर दिए गए थे। शेष मामले लंबित पड़े हैं, क्योंकि उनके निर्णयों की प्रतियां खोजी नहीं जा सकी थी। इसलिए विधि आयोग ने निष्कर्ष दिया कि 95 प्रतिशत मामलों में मृत्युदंड गलत तरीके से दिया जाता था।</p>
<p>कहते हैं कि प्रत्येक देश में समाज को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए कानून बनाए जाते हैं ताकि लोगों के मन में डर बना रहें और वह किसी भी गलत काम को करने से पहले दो बार सोचे। जो जैसा जुर्म करता है कानून उसको उसके किए की सजा जरूर देता है। जब इंसान जघन्य और विरल किसी अपराध को अंजाम देता है, तो ऐसे में मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान है। विभिन्न देशों में कई अलग-अलग तरीके से इंसान को मौत के घाट उतारा जाता है। कहीं गोली मार दी जाती है तो कहीं पत्थर मार-मारकर मुजरिम को मार दिया जाता है। </p>
<p>हालांकि ज्यादातर देशों में मौत की सजा के रूप में फांसी दे दी जाती है। बात अगर अपने देश भारत की करें तो भारत में फांसी की सजा का चलन ब्रिटिश काल से पहले से है। यद्यपि देश में फांसी की सजा बहुत ही कम लोगों को दी जाती है। हिन्दुस्तान में रेयर ऑफ रेयरेस्ट केस में ही अपराधी को फांसी की सजा सुनाए जाने का प्रावधान है। मौत की सजा सर्वोच्च दंड है जिसे भले ही अदालत सुनाती हो, लेकिन उसे अंजाम तक पहुंचाने का काम जल्लाद ही करता है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6236" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>विडम्बना यह है कि आजादी के 78-साल बाद भी आज तक किसी ने इस काम को अंजाम देने के लिए नौकरी की दरख्वास्त तक नहीं दी है। इन वर्षों में दो परिवारों के लोग खानदानी पेशे के रूप में इस काम को कर रहे हैं, लेकिन देश और विश्व में बदलती आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक, सांस्कृतिक और अन्य सोच के कारण अब इन परिवारों की अगली पीढ़ियां इस पेशे को अपनाने के लिए तैयार नहीं है। तमिलनाडु की वेल्लोर सेंट्रल जेल में आखिरी बार 1983 में फांसी लगाई गई थी, जबकि तमिलनाडु राज्य में आखिरी बार 1995 में सलेम सेंट्रल जेल में सीरियल कीलर शंकर को फांसी दी गई थी।</p>
<p>मुंबई पर आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब की सुरक्षा पर सरकार करीब 36 करोड़ रुपए खर्च की, लेकिन उसे फांसी पर चढ़ाने वाले जल्लाद को इस काम के लिए कितने पैसे मिले, यह तो सरकारी क्षेत्र में कुर्सियों पर बैठे अधिकारी से लेकर मंत्रालय में बैठे राजनेता बेहतर जानते हैं। महाराष्ट्र में फिलहाल जल्लाद का कोई पद नहीं है।महाराष्ट्र के 1970 के जेल नियमों के मुताबिक किसी को भी जल्लाद के लिए ट्रेनिंग दी जा सकती है। फिर भी पूरे महाराष्ट्र में एक भी रजिस्टर्ड जल्लाद नहीं है। असम में भी कोई जल्लाद उपलब्ध नहीं है। यही स्थिति दिल्ली की तिहाड़ जेल, उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल की जेलों की है। </p>
<p><strong>चलिए तिहाड़ कारावास चलते हैं और आपको मिलाते हैं कालू और फकीरा से । उसकी त्वचा काला होने के कारण उसका नाम कालू रखा गया होगा, परन्तु फकीरा तो कालू से भी अधिक काला था, इसलिए लोग उसे &#8216;भूत&#8217; कहते थे। उसकी बड़ी बड़ी मूंछें थी और वह हमेशा पंजाबी में चुटकुले सुनाता रहता था, जिसे सुनकर हम सभी लोग हंस पड़ते थे। कालू अत्यंत विशाल कद काठी वाला गोल आदमी था और दोनों में सर्वाधिक शांत स्वाभाव वाला था। वे दोनों अत्यंत निपुण पेशेवर जल्लाद थे। जैसे ही उनकी सुरक्षा में गई कारण उन्हें लेकर जेल के अंदर आती थी, वे डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट के विश्राम कक्ष में अपना डेरा जमा लेते थे। उनका विश्राम कक्ष उनके कार्यालय से जुड़ा हुआ एक अन्य कमरा होता था। </strong></p>
<p>तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता कहते हैं: &#8220;एक जल्लाद का काम बड़े अनोखे रिवाजों वाला होता है। हमें प्रत्येक नियमों का बड़े सावधानी से पालन करना होता था, क्योंकि यमराज के द्वारपलों से कौन मिलना जुलना चाहेगा। ऐसी ही एक प्रथा दोनों जल्लादों में से प्रत्येक को एक-एक शराब की बोतलें देने की थी &#8211; हम उन्हें ओल्ड मोंक रम देते थे। जेल परिसर के अंदर मद्यपान कठोरता पूर्वक निषिद्ध है, परंतु नियमों का उल्लंघन केवल कैदियों द्वारा ही नहीं, अपितु जेलरों द्वारा भी किया जाता था। इस खास परंपरा में फांसी से पहले शराब का उन्मुक्त सेवन स्वीकार्य था।&#8221; </p>
<p><strong>गुप्ता का कहना है कि उन्हें बंगाल के एक जल्लाद नाटा मल्लिक का साक्षात्कार याद है जिसमें उसने कहा था की फांसी देने से पहले जमकर शराब पिता था। वह फांसी देने से घटनों पहले खाना छोड़ देता था और केवल शराब पिता था, ताकि उसकी कोई भावना शेष नहीं रहे। &#8220;मुझे नहीं मालूम की क्या कालू और फकीरा भी वैसा ही करते थे, परन्तु जब उन्हें उनकी रम को बोतल मिल जाती थी तो वे अत्यंत प्रसन्न हो जाते थे।&#8221; नाटा मल्लिक एक अन्य रिवाज का भी पालन करता था &#8211; अपना काम पूरा करने के बाद बाद फांसी के तख्ते पर भी थोड़ी शराब उड़ेल देता था। वह कहता था की वह शराब उस व्यक्ति की आत्मा के लिए होती थी, जिसे उसने फांसी पर लटकाया था।</strong> </p>
<blockquote><p>गुप्ता का कहना है कि &#8220;फांसी से पहले एक बड़ा खतरा इस बात का होता था कहीं जल्लादों का अपहरण न हो जाय। मैं आस्वस्त होकर यह बात नहीं कह सकता कभी जल्लाद गायब हुए थे या नहीं, परन्तु जेल अधिकारी इसे लेकर इतने अधिक चिंतित रहते थे की वे जल्लादों को कभी जेल परिसर छोड़ने की अनुमति नहीं देते थे। यह भय उस समय और अधिक बढ़ जाता था जब किसी आतंकवादी या किसी बहु-प्रसंसित व्यक्ति को फांसी दी जानी होती थी, क्योंकि उसके समर्थक उतावलेपन में कुछ भी कर सकते थे। यही कोई उन्हें वहां से लेकर चला गया तो क्या होगा? ऐसा विचार ही अपने आप में अत्यंत डरावना था। यदि वैसा हुआ तो कैदी को फांसी पर कौन लटकाएगा ? इन्हीं सब कारणों से जल्लादों की गतिविधियों को इस हद तक परदे के अंदर रखा जाता था की उनके बारे में जेल कर्मियों को भी कोई जानकारी नहीं होती थी।&#8221; </p></blockquote>
<p>कहते हैं कालू और फकीरा एक साथ क्यों काम करते थे, इसका भी एक कारण था। यदि किसी एक जल्लाद के हाथ-पाऊँ सुन्न हो जाते तो दूसरा जल्लाद आगे बढ़कर उस काम को पूरा कर देता था। बहरहाल, तिहाड़ जेल में ऐसा कभी नहीं हुआ। जल्लाद यह मानते हैं कि वे अत्यंत मूल्यवान हैं, इसलिए नाटा मल्लिक की भांति कालू ने उसे पारिवारिक कारोबार का रूप देने का प्रयास किया। उन दोनों ने अपने पुत्रों को अपना दायित्व सौंपने के लिए प्रशिक्षित किया। </p>
<p>14 अगस्त 2004 को बलात्कारी और हत्यारे धनञ्जय चटर्जी को फांसी देने के पूर्व मल्लिक ने अपने अपने साक्षात्कार के दौरान कहा था: &#8220;एक बार मैंने अपने साथ एक सहायक रखने का प्रयास किया था। चटर्जी ने वर्ष 1990 में एक किशोरी का बलात्कार कर हत्या की थी। जब उसकी सजा के बारे में समाचार चैनलों में बहुत अधिक बहस हुयी थी तो इस जल्लाद के ऊपर भी समाचार जगत ने विचारणीय मात्रा में ध्यान दिया था। 83-वर्षित नाटा मल्लिक ने फांसी की दुनिया में लोगों के समक्ष पहली बार उससे जुड़े रहस्य्मय तरीकों को उजागर किया था। &#8216;जैसे ही हम फांसी के फंदे पर पहुंचे, मेरा सहायक मूर्छित हो गया।  लेकिन मेरा पुत्र पूरी तरह ठीक था। मैं जानता था कि वह अच्छा प्रशिक्षु सिद्ध होगा।&#8217; नाटा मल्लिक के पिता भी अंग्रेजों के जमाने में जल्लाद थे। नाटा के बारे में माना जाता है कि उसने 25 से ऊपर फांसी पर लटकाने का कार्य किया था। अब उसका लड़का मेहताब भी जल्लाद है.</p>
<figure id="attachment_6237" aria-describedby="caption-attachment-6237" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6237" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6237" class="wp-caption-text">तिहाड़ के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता</figcaption></figure>
<p><strong>पूर्व जेलर कहते हैं: &#8220;कालू इतना आश्वस्त था कि  उसका पुत्र उसके बाद वह जिम्मेदारी संभाल लेगा। उसने काम पाने के लिए हमारी तथा अन्य अनेक जेलों में इश्तिहार छपवा कर भेजे थे &#8211; विशेषज्ञ जल्लाद की सेवाएं किराये पर उपलब्ध।  वास्तव में हम उसकी सेवाएं कभी नहीं ले सके, क्योंकि अपने पिता की भांति वह कोई सरकारी कर्मचारी नहीं था, जो की एक पूर्व शर्त थी। हमें यह काम करने के लिए किसी अपने व्यक्ति की आवश्यकता थी, क्योंकि वे मामले को गोपनीय रखने हेतु विश्वसनीय एवं कानून से बंधे हुए थे। निश्चय ही, संगणना के बाद कालू के मौत के इस कारोबार को अपने पुत्र के लिए अपने पदचिन्हों पर चलने हेतु आकर्षक एवं लाभदायक पाया होगा।&#8221; </strong></p>
<p>बहरहाल, प्रवीण शर्मा क्वोरा पर लिखते हैं कि सभी देशों में मृत्युदंड अलग अलग तरीके से दिया जाता है। विकसित देशों में जल्लाद को प्रतिमाह लगभग 5000 अमेरिकी डॉलर के बराबर वेतन दिया जाता है। परंतु हमारे देश में जल्लादों को विकसित देशों के जल्लादों के बनिस्पत बहुत कम वेतन मिलता है। बावजूद इसके भी जल्लाद फांसी देने का कार्य करते हैं। 1980 से पहले जल्लाद को प्रतिमाह जेल प्रशासन (जिस जेल में जल्लाद की नियुक्ति की गई होती है) द्वारा 100 रुपये प्रतिमाह दिया जाता था। 1980 कि बाद यह रकम बढ़कर 3000 प्रतिमाह कर दी गई। परंतु यह भी वक्त के लिहाज से बहुत कम थी इसलिए अब उन्हें 5000 रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। निर्भया कांड के दोषियों को फांसी देने के लिए मेरठ के पवन जल्लाद को नियुक्त किया गया है जिसकी चार पीढ़ियों द्वारा यह कार्य किया जा रहा है। पहले पवन जल्लाद अपने दादा कालू की फांसी देने में सहायता किया करता था। बाद में उसने अपने पिता की भी मदद की। परंतु अब वह स्वतंत्र रूप से यह कार्य करता है और मिलने वाले 5000 रुपये प्रतिमाह वेतन से खुश हैं। आमतौर पर वो साइकल पर कपड़े की फेरी लगाते हैं.</p>
<p>जल्लाद पवन का कहना है कि वो केवल अपना काम कर रहे हैं। जब वो किसी को फांसी देते हैं तो उन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता। क्योंकि उन्हें मालूम है कि जिसे वो फांसी देने जा रहे हैं, उसने जरूर कोई ऐसा अपराध किया होगा कि उसे अदालत ने मृत्युदंड की सजा दी है। इसी तरह, जब अजमल कसाब को फांसी की सजा दी जाने वाली थी तो उसे फांसी देने के लिए तमाम आवेदन जेल में पहुंचे थे। लेकिन ये जिम्मा उत्तर प्रदेश के जल्लाद मम्मू सिंह को दिया गया, जो पवन के पिता थे। मम्मू की खास बात थी कि वो फांसी की सजा देते समय रस्सी को मुलायम और तेजी से सरकाने लायक बनाने में एक्सपर्ट थे। जिस समय कसाब को फांसी देने का काम मम्मू को दिया गया, तब वो 66 साल के हो चुके थे। बीमारी की वजह से कसाब की फांसी से पहले उनकी मौत हो गई।  </p>
<figure id="attachment_6238" aria-describedby="caption-attachment-6238" style="width: 1602px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM.png" alt="" width="1602" height="1031" class="size-full wp-image-6238" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM.png 1602w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-300x193.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-1024x659.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-768x494.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-1536x989.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 1602px) 100vw, 1602px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6238" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल के मुख्य द्वार पर</figcaption></figure>
<p>मम्मू ने दाता राम से लेकर कामता प्रसाद तक अपने जीवनकाल में 15 लोगों को फांसी पर लटकाया था। साल 1973 में उसने बुलंद शहर के रहने वाले दाता राम को सबसे पहले मेरठ जेल में फांसी दी थी। साल 1982 में उसने तिहाड़ जेल में बंद शातिर अपराधी रंगा और बिल्ला को पिता कालू जल्लाद के साथ मिलकर फांसी पर लटकाया था। साल 1997 में जयपुर में कामता प्रसाद तिवारी को फांसी दी थी। साल 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और केहर सिंह को फांसी पर लटकाया था। मम्मू को भी फांसी देने के लिए कई राज्यों में बुलाया गया था। वर्षों तक वह परिवार ख़राब आर्थिक स्थिति से जूझता रहा, लेकिन न समाज, न प्रशासन और ना ही व्यवस्था और ना ही जेल के अधिकारी कभी मदद का हाथ बढ़ाये। उसी दुःख के कारण एक इंटरव्यू में वह कहा भी था कि वो नहीं चाहता कि उसके परिवार से अब कोई इस पेशे में आए लेकिन उसका बेटा पवन भी उसके बाद अब जल्लाद है। </p>
<p>इसी तरह, मुंबई हमले के गुनहगार और पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब को फांसी देने का जिम्मा बाबू जल्लाद को सौंपा गया था। हालांकि बाबू की पहचान कभी उजागर नहीं हो पाई। बाद में बताया गया कि वो पुलिस का ही कोई कांस्टेबल, जिसे फिर नागपुर जेल में याकूब मेमन को वर्ष 2015 में फांसी देने के लिए बुलाया गया था। इन दोनों फांसियों के लिए उसे 5000-5000 रुपए दिए गए थे। फिर, अहमदुल्ला लखनऊ के जल्लाद थे। जल्लाद का काम उनके पिता से उन तक 1965 में आया। उन्हें लगा कि जल्लाद का काम मानवता के खिलाफ है, अतः उन्होंने इस कार्य को छोड़ दियाधार्मिक हो गए। महाराष्ट्र का एक जल्लाद था अर्जुन भीका जाघव जो इस कार्य को नब्बे के दशक में छोड़ दिया। </p>
<p>क्रमशः </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/social-trench-between-those-who-issue-and-execute-a-black-warrant">तिहाड़ जेल-3 ✍ &#8220;ब्लैक वारंट&#8221; &#8216;निर्गत&#8217; और &#8216;निष्पादित&#8217; करने वालों के बीच &#8216;सामाजिक खाई&#8217; 😢 आखिर वह भी तो न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को ही निष्पादित करता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;पत्नी के साथ &#8216;अप्राकृतिक यौन&#8217; &#8216;अप्राकृतिक अपराध&#8217; नहीं है&#8221; 😢 यानी भले पत्नी &#8216;मृत्यु&#8217; को प्राप्त कर ले &#8216;पति&#8217; भा.न्या.सं के धारा 375 और धारा 377 से परे  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Feb 2025 11:59:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[chattisgarh]]></category>
		<category><![CDATA[judgement]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बिलासपुर / नई दिल्ली :  क़ानूनी दृष्टि से न्यायालय का निर्णय सर्वोपरि है, लेकिन पारिवारिक, सामाजिक और मानवीय दृष्टि से आज भले नहीं, आने वाले समय में शीर्षस्थ न्यायालय के सम्मानित न्यायमूर्तिगण के साथ-साथ भारत का संसद इस बात पर विचार जरूर करेगा जब &#8220;छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने यह कहा कि भारतीय न्याय संहिता (भारतीय [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बिलासपुर / नई दिल्ली :  क़ानूनी दृष्टि से न्यायालय का निर्णय सर्वोपरि है, लेकिन पारिवारिक, सामाजिक और मानवीय दृष्टि से आज भले नहीं, आने वाले समय में शीर्षस्थ न्यायालय के सम्मानित न्यायमूर्तिगण के साथ-साथ भारत का संसद इस बात पर विचार जरूर करेगा जब &#8220;छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने यह कहा कि भारतीय न्याय संहिता (भारतीय दंड संहिता) की धारा 375 के तहत पति द्वारा अपनी वयस्क पत्नी के साथ बिना सहमति के भी पत्नी की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा में लिंग का प्रवेश या किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध &#8216;अप्राकृतिक अपराध &#8216; नहीं माना जा सकता है और उक्त न्याय संहिता के धारा 377 के तहत उक्त क्रिया के लिए उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।&#8221; </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/1.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6155" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/1.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/1-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>यह अलग बात है कि उक्त कार्य के बाद पत्नी की मृत्यु हो जाती है। न्यायालय ने बलात्कार, अप्राकृतिक अपराध और अपनी पत्नी के गुदा में हाथ डालने के यौन कृत्य के माध्यम से अपनी पत्नी की मृत्यु का कारण बनने के लिए आरोपी गोरखनाथ शर्मा को बरी कर दिया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/2.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6156" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/2.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/2-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p><strong>न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने 17-पृष्ठ के आदेश में यह कहा कि &#8220;उक्त कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए तथा धारा 375 की संशोधित परिभाषा और संबंध के प्रकाश में, जिसके लिए सहमति न लेने अर्थात पति और पत्नी के बीच और धारा 376 का अपराध न करने का अपवाद प्रदान किया गया है, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि धारा 375 के तहत बलात्कार की परिभाषा में शरीर के उन हिस्सों अर्थात महिला की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा में लिंग का प्रवेश शामिल है, जिसके लिए सहमति की आवश्यकता नहीं है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/3.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6157" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/3.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/3-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>वैसी स्थिति में पति और पत्नी के बीच अप्राकृतिक यौन संबंध को अप्राकृतिक अपराध नहीं बनाया जा सकता है। ऐसे में स्पष्ट रूप से धारा 375 की परिभाषा और धारा 377 के अप्राकृतिक अपराध के प्रकाश में इन दोनों स्थितियों में विरोधाभास है। यह भी कानून का एक अच्छी तरह से स्थापित सिद्धांत है कि यदि बाद के अधिनियमन के प्रावधान पहले वाले के प्रावधानों से इतने असंगत या विरोधाभासी हैं तो दोनों एक साथ नहीं रह सकते।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/4.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6158" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/4.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/4-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p><strong>न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 पर भरोसा जताते हुए यह कहा कि &#8220;यदि पत्नी की आयु 15 वर्ष से कम नहीं है, तो पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ किया गया कोई भी यौन संबंध या यौन कृत्य इन परिस्थितियों में बलात्कार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अप्राकृतिक कृत्य के लिए पत्नी की सहमति की अनुपस्थिति अपना महत्व खो देती है। इसलिए, इस न्यायालय का विचार है कि अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत अपराध नहीं बनता है।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/5.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6159" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/5.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/5-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>न्यायालय ने यह भी कहा की &#8220;इस न्यायालय द्वारा मृत्यु पूर्व कथन की सावधानीपूर्वक जांच करने पर भी, उसे दोषसिद्धि दर्ज करने के लिए पर्याप्त नहीं पाया जा सकता, क्योंकि अन्य साक्ष्यों से इसकी पुष्टि नहीं होती, इसलिए मृत्यु पूर्व कथन की सत्यता पर संदेह है।&#8221; माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नईम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में आपराधिक अपील संख्या 1978/2022 में रिपोर्ट की गई 2024 आईएनसी 169 05.05.2024 को तय की गई है, जिसमें पैराग्राफ 6 और 7 में निम्नानुसार माना गया है।&#8221; </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/6.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6160" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/6.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/6-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>न्यायालय ने कहा, &#8220;धारा 375, 376 और 377 आईपीसी के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि धारा 375 आईपीसी की संशोधित परिभाषा के मद्देनजर, धारा 377 आईपीसी के तहत पति और पत्नी के बीच अपराध का कोई स्थान नहीं है और इस तरह बलात्कार नहीं माना जा सकता। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/7.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6161" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/7.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/7-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>यहां यह उल्लेख करना उचित है कि वर्ष 2013 में धारा 375 आईपीसी में संशोधन में अपवाद-2 प्रदान किया गया है, जो कहता है कि किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संभोग या यौन क्रिया बलात्कार नहीं है और इसलिए यदि धारा 377 के तहत परिभाषित कोई अप्राकृतिक यौन संबंध पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ किया जाता है, तो इसे भी अपराध नहीं माना जा सकता है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/8.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6162" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/8.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/8-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>अपने फैसले में, अदालत ने कहा कि यदि पत्नी 15 वर्ष से अधिक उम्र की है, तो पति द्वारा &#8220;किसी भी संभोग&#8221; या यौन कृत्य को किसी भी परिस्थिति में दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता है और इस तरह, अप्राकृतिक कृत्य के लिए पत्नी की सहमति की अनुपस्थिति महत्व खो देती है। इसलिए अपीलकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और 377 के तहत अपराध नहीं बनाया जा सकता। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/9.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6163" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/9.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/9-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p><strong>भारत में वैवाहिक बलात्कार कानून द्वारा दंडनीय नहीं है। हाई कोर्ट के फैसले में अब अप्राकृतिक यौन संबंध को भी सजा के दायरे से बाहर कर दिया गया है। अप्राकृतिक यौन संबंध और गैर इरादतन हत्या के आरोपी को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था, लेकिन हाई कोर्ट से राहत मिल गई। एक पुरुष और उसकी वयस्क पत्नी के बीच अप्राकृतिक यौन संबंध सजा के लायक नहीं है</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/10.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6164" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/10.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/10-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>विदित हो कि 11 दिसंबर 2017 को आरोपी गोरखनाथ शर्मा पर अपनी पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगा था। आरोप था कि वे कथित तौर पर पीड़िता, अपनी पत्नी के गुदा में अपना हाथ डाला था। बाद में उसने दर्द की शिकायत की और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसकी मौत हो गई। उसकी मृत्यु से पहले, उसका मृत्युपूर्व कथन दर्ज किया गया, जिसमें उसने कहा कि उसके पति द्वारा किए गए अप्राकृतिक यौन कृत्य के कारण वह बीमार हो गई। पति पर बलात्कार (धारा 375), अप्राकृतिक अपराध (धारा 377) और भारतीय दंड संहिता की लापरवाही से मृत्यु (धारा 304) के तहत मामला दर्ज किया गया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/11.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6165" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/11.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/11-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने कहा कि मृत्यु का कारण पेरिटोनिटिस और मलाशय में छेद होना था। बाद में कुछ गवाह अपने बयान से पलट गए और मृतक का मृत्यु पूर्व कथन दर्ज करने वाले कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अदालत में कहा कि यद्यपि मृतक ने उसे बताया था कि उसके पति ने उसके साथ जबरदस्ती अप्राकृतिक यौन कृत्य किया था, लेकिन इसका उल्लेख मृत्यु पूर्व कथन में नहीं किया गया था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/12.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6166" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/12.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/12-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>साक्ष्यों पर विचार करने और मृत्युपूर्व कथन पर भरोसा करने के बाद निचली अदालत ने शर्मा को आईपीसी की धारा 375, 377 और 304 के तहत अपराधों का दोषी पाया और उसे दस साल की सजा सुनाई। इसके परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय में अपील की गई।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/13.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6167" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/13.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/13-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>आरोपी के वकील अधिवक्ता राज कुमार पाली ने दलील दी कि दोषसिद्धि केवल मृत्यु पूर्व कथन पर आधारित थी और उसकी प्रामाणिकता ही संदिग्ध थी। यह भी दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने दो गवाहों के बयानों पर विचार नहीं किया, जिन्होंने अपने न्यायालयीन बयानों में स्वीकार किया था कि पीड़िता को अपने पहले प्रसव के तुरंत बाद बवासीर हो गई थी, जिसके कारण उसके गुदा से रक्तस्राव होता था और पेट में दर्द होता था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/14.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6168" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/14.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/14-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>राज्य के वकील ने दलील का विरोध किया और कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य के आधार पर आरोपी को सही ढंग से दोषी ठहराया है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। तर्कों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, न्यायालय ने धारा 375 और धारा 377 की जांच की। राज्य की और से उप-सरकारी अधिवक्ता प्रमोद श्रीवास्तव दलील कर रहे थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/15.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6169" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/15.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/15-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p><strong>न्यायालय ने रेखांकित किया, &#8220;यदि पत्नी की आयु 15 वर्ष से कम नहीं है, तो पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ किया गया कोई भी यौन संबंध या यौन कृत्य इन परिस्थितियों में बलात्कार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अप्राकृतिक कृत्य के लिए पत्नी की सहमति की अनुपस्थिति अपना महत्व खो देती है, इसलिए, इस न्यायालय का विचार है कि अपीलकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत अपराध नहीं बनता है।&#8221; </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/16.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/16.jpg" alt="" width="622" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-6170" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/16.jpg 622w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/16-182x300.jpg 182w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></a></p>
<p>मृत्यु पूर्व कथन के संबंध में, न्यायालय ने कहा कि किसी अन्य साक्ष्य द्वारा इसकी पुष्टि नहीं की गई है। &#8220;इस न्यायालय द्वारा मृत्यु पूर्व कथन की सावधानीपूर्वक जांच करने पर भी इसे दोषसिद्धि दर्ज करने के लिए पर्याप्त नहीं पाया जा सकता, क्योंकि अन्य साक्ष्यों से इसकी पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए मृत्यु पूर्व कथन की सत्यता पर संदेह है।&#8221; धारा 304 भारतीय दंड संहिता के तहत दोषसिद्धि के संबंध में, उच्च न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस बारे में कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया है कि वर्तमान मामले में अपराध कैसे हुआ। इसलिए, धारा 304 के तहत दोषसिद्धि विकृत और स्पष्ट रूप से अवैध है, न्यायालय ने कहा।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/law/unnatural-sex-with-wife-without-her-consent-not-offence">&#8220;पत्नी के साथ &#8216;अप्राकृतिक यौन&#8217; &#8216;अप्राकृतिक अपराध&#8217; नहीं है&#8221; 😢 यानी भले पत्नी &#8216;मृत्यु&#8217; को प्राप्त कर ले &#8216;पति&#8217; भा.न्या.सं के धारा 375 और धारा 377 से परे  </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 11:39:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bhattacharjee]]></category>
		<category><![CDATA[indian express]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[justice]]></category>
		<category><![CDATA[mumbai high court]]></category>
		<category><![CDATA[supreme court]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गजब की है दिल्ली। यहाँ की पत्रकारिता के बारे में तो पूछिए ही नहीं। अच्छे-अच्छे लोग यहाँ गच्चा खा जाते हैं। यहाँ चिकनी-चुपड़ी सड़क, उपगामी-अधोगामी सड़क, मेटो रेल, गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह कतई नहीं सोच सकते हैं कि यहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले, काम सीखने वालों को उनके वरिष्ठ या संपादक उनके कार्य [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook">संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गजब की है दिल्ली। यहाँ की पत्रकारिता के बारे में तो पूछिए ही नहीं। अच्छे-अच्छे लोग यहाँ गच्चा खा जाते हैं। यहाँ चिकनी-चुपड़ी सड़क, उपगामी-अधोगामी सड़क, मेटो रेल, गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह कतई नहीं सोच सकते हैं कि यहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले, काम सीखने वालों को उनके वरिष्ठ या संपादक उनके कार्य सम्बन्धी पुरुषार्थ  का क़द्र करते हों, उन पर विश्वास करते हों।</strong></p>
<p>देश में तक़रीबन 125000 से अधिक समाचार पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। वैसे 900+ निबंधित निजी टीवी चैनल हैं, लेकिन भारत के आसमानों के रास्ते कोई 4000 चैनेल्स 140 करोड़ लोगों के टीवी स्क्रीन पर पहुँचता है। आज जिस तरह देश की सड़कों पर चार पहिया वाहनों में, दो-पहिया वाहनों में नंबर प्लेट के आगे, शीशों पर, अतिरिक्त प्लेट लगाकर &#8216;पत्रकार&#8217;, &#8216;संपादक&#8217;, &#8216;संपादक के सहयोगी&#8217;, &#8216;पत्रकार संघ के अध्यक्ष&#8217; लिखा उसी प्रकार दिख रहा है जैसे &#8216;पार्षद के मित्र&#8217;, विधायकजी का साला&#8217; &#8216;मंत्री जी का पोता&#8217;, &#8216;मंत्री जी के दूर के रिस्तेदार, &#8216;थाना प्रभारी का दामाद / साला&#8217; आदि लिखा दिख रहा है। आज तो स्थिति ऐसी है कि वास्तविक रूप में बेहतरीन पत्रकार होने के बावजूद दफ्तरों में आपकी पूछ नहीं होती होगी, अगर आप सिर्फ अपने कार्य से, अपनी कहानियों से मतलब रखते होंगे। आपको सभी लोग कहते होंगे &#8216;बहुत एटीट्यूड&#8217; रखती है/रखता है। </p>
<p>दिल्ली से प्रकाशित इण्डियन एक्सप्रेस में कार्य की शुरुआत करने के साथ ही, सर्वप्रथम देर रात तक रहने की आदत डाल लिया। रात्रिकालीन सत्र में जो भी सहकर्मी होते थे उन्हें आठ-साढ़े आठ बजते बजते घर जाने को कह देते थे। परिणाम यह हुआ कि समय के साथ-साथ सभी को &#8216;यह आदत&#8217; से हो गई आठ-साढ़े आठ तक निकलना। एक्सप्रेस ब्यूरो में तो बड़े-बड़े संवाददाता थे, उसमें एक &#8216;सर्वोच्च न्यायालय&#8217; कवर करते थे। श्री नायर साहब नाम था उनका। मैं निचली अदालत के साथ साथ दिल्ली उच्च न्यायालय कवर करता था। </p>
<blockquote><p>उस रात कोई साढ़े-बारह के करीब &#8216;एक्सप्रेस बम्बई&#8217; कार्यालय से एक फोन आया, साथ ही, कम्प्टयूटर पर संवाद भी। संवाद था कि बम्बई उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी (25 अक्टूबर, 1994 से 24 मार्च, 1997) को अपना त्यागपत्र प्रेषित करना। न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी के विरुद्ध चर्चा हो गई थी कि वे मुस्लिम लॉ और संविधान से सम्बंधित एक किताब के लिए एक लन्दन स्थित प्रकाशक से $ 80 000 स्वीकार किये थे, साथ ही, एक दूसरे &#8216;मैन्युस्क्रिप्ट&#8217; के लिए $ 75 000 का ऑफर भी स्वीकार के अधीन था।&#8221; उस ज़माने में यह एक बहुत बड़ी घटना थी।</p></blockquote>
<p>एक्सप्रेस के सम्पादकीय कक्ष में सहायक समाचार संपादक श्री राजेश्वर प्रसाद साहब ड्यूटी पर थे। वे संवाददाता कक्ष में दौड़ते-भागते आये। मुझे देख लम्बी सांस लेते कहते हैं: &#8220;ओ माई गॉड !!!! शिवनाथ !!! यह कहानी बम्बई से है। तुम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से बात कर इसे &#8216;कंफर्म&#8217; करो और कोई 1500 + शब्दों में कहानी लिखकर तत्काल प्रेषित करो। यह आज का लिड है और बम्बई कार्यालय बैठा है इस कहानी के लिए।&#8221; </p>
<p>प्रसाद साहेब सारी बातें एक सांस में बोल गए। सम्पादकीय विभाग (डेस्क) पर भूचाल आ गया था। प्रथम पृष्ठ का ले-आउट बदल गया था। उन दिनों श्री पी सी एम त्रिपाठी जी समाचार संपादक थे (त्रिपाठी जी आपको श्रद्धांजलि) । मैं श्री प्रसाद साहेब का अपने प्रति यह विश्वास देखकर उछल गया। प्रसाद साहेब कहते हैं: &#8220;तुम अपने काम में लग जाओ पहले। मैं तुम्हारे काम में हाथ बंटाता हूँ।&#8221; उधर श्री प्रसाद साहब लाइब्रेरी जाकर न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी से सम्बंधित जितने भी समाचार प्रकाशित हुए थे, का कतरन लाने में लग गए। अब तक रात का कोई 12 बजकर 40 मिनट हो गया था और छोटी-बड़ी सुइयों की रफ़्तार भी ह्रदय गति जैसी बढ़ गई थी । </p>
<p>इस घटना से कोई एक महीना पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी साहब से मेरी मुलाककट हुई थी एक कार्यक्रम में। मैं उनसे निजी तौर पर मिला था। जब मैं बताया कि मैं &#8220;एक्सप्रेस&#8221; का रिपोर्टर हूँ, वे मुझे पीठ ठोके और कहे कभी भी, किसी भी समय आप बात कर सकते हैं। उनका इतना बोलना था कि मैं अपनी डायरी और कलम उनके तरफ कर दिया ताकि &#8216;अंदर वाला नंबर&#8217; मिल जाय। वे अपने शयन कक्ष वाला नंबर लिख दिए। एक रिपोर्टर को और क्या चाहिए। शायद यही मेरा प्रारब्ध था और समय भी यह चाह रहा था। अब तक प्रसाद साहब मेरे सामने बैठ गए थे &#8216;पैडिंग&#8217; वाला अंश कंप्यूटर पर लिख रहे थे। नीचे डेस्क से लोगों का आना जाना बढ़ गया था।</p>
<p><strong>मैं डायरी में न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी द्वारा लिखित नंबर निकला। सामने ऊँगली घुसाकर डॉयल करने वाला फोन को अपनी ओर खिंचा और फिर सात अंकों पर सात बार ऊँगली घुसाकर गोल चक्कर को घुमाया। तत्काल दूसरे छोड़ पर &#8216;ट्रिंग-ट्रिंग&#8217; होने लगी। कुछ ही सेकेण्ड बाद दूसरे छोड़ से आवाज आई &#8220;हेल्लो&#8221; &#8211; इससे पहले की दूसरे छोड़ से मुझसे पूछा जाता, न्यायमूर्ति का &#8216;हेल्लो&#8217; शब्द को पहचान लिया और सुनते ही मैं अंग्रेजी को दरभंगा में छोड़कर हिंदी में बोल पड़ा: &#8220;सर प्रणाम। मैं एक्सप्रेस वाला शिवनाथ झा बोल रहा हूँ। माफ़ कर देंगे इतनी रात फोन करने के लिए। लेकिन नौकरी का सवाल है।&#8221; मेरी बात वे समझ गए थे। आखिर देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे वे।</strong> </p>
<p>मैं बोलता रहा: &#8220;सर !! बम्बई कार्यालय से अभी एक संवाद आया है कि न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी अपना त्यागपत्र आपके पास प्रेषित कर दिए हैं?&#8221; </p>
<p>न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी कहते हैं: &#8220;उस दिन का नंबर आज आपको काम आ गया &#8230;.  जी। वे अपना त्यागपत्र शाम में भेजे हैं। शेष कहानी आप जानते ही हैं। लेकिन आप मुझे उल्लेखित नहीं करेंगे।&#8221; <br />
 <br />
न्यायमूर्ति का &#8216;हाँ&#8217; शब्द मेरे लिए दिल्ली सल्तनत का किला फ़तेह जैसा था। ऐसा लग रहा था कि लाल किले पर मैं अपना झंडा गाड़ दिया हूँ आज रात। प्रसाद साहब का चेहरा चमक रहा था। वे झट से उठे और कहते नीचे डेस्क की ओर भागे : &#8220;शिवनाथ !!!! तुम्हारे लॉगिन में टाइप किया है। उसे निकालकर कहानी में जोड़ लेना। शेष और बातें जोड़ते दस मिनट के अंदर स्टोरी रिलीज कर देना। मैं बम्बई ऑफिस को बताता हूँ। वह इंतज़ार कर रहा है। वेल डन शिवनाथ।&#8221;</p>
<p>उस रात मैं &#8220;शेर&#8221; था &#8220;एक्सप्रेस&#8221; में। अभी तक रात का 1.10 हो गया था। कोई 1800 शब्दों की कहानी बन गई थी। श्री प्रसाद साहेब का चेहरा चमक रहा था। कहानी को मेरे नाम से तत्काल बम्बई कार्यालय प्रेषित किया गया। बम्बई कार्यालय उस समाचार को देखकर बहुत खुश हुआ। वहां यह समाचार &#8216;डीप डबल कॉलम (ऊपर से नीचे बॉटम तक) मेरे नाम से प्रकाशित हुआ By Shivnath Jha ।</p>
<p>इधर दिल्ली में घड़ी की सुइयाँ आपसे में लड़ रही थी। कभी छोटी सुई ऊपर तो कभी बड़ी सुई ऊपर। फोन चार कोने पर चार लोग बैठे थे। राजनीति हो रही थी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय कवर करने वाले संवाददाता (श्री नायर साहब) और दिल्ली संस्करण की सम्पादिका श्रीमती कुमी कपूर मुझ जैसे छोटे से रिपोर्टर के वजूद पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे थे। कह रहे थे कि लोवर जुडिसियरी कवर करने वाला रिपोर्टर का क्या वजूद है की देर रात सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश फोन पर इस कहानी को कन्फर्म करे।&#8221; श्री प्रसाद साहेब &#8216;हताश&#8217; हो गए। श्रीमती कुमी कपूर मेरी कहानी को &#8216;अंडर प्ले&#8217; कर दी &#8211; 1800 शब्दों की कहानी &#8216;एक पैरा&#8217; में सुबह के दिल्ली संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर एक कोने में प्रकाशित हुआ। </p>
<p>अगले दिन सुबह की मीटिंग में अश्विनी सरीन के साथ-साथ मेरे मेट्रो के सभी रिपोर्टर उपस्थित थे। सरीन साहब &#8216;शेर&#8217; की तरह गरज रहे थे। वजह भी था &#8211; उनके रिपोर्टिंग रूम और रिपोर्टर को &#8216;अंडर एस्टीमेट&#8217; किया गया। तभी श्रीमती कुमी कपूर का प्रवेश हुआ। कुमी कपूर के चेहरे के भाव से यह विदित था कि वे &#8216;राजनीति&#8217; में फंस गई थी रात को। अपना निर्णय लेने में चूक गयी थी वे। इससे पहले भी कुमी कपूर एक गलती की थी उसका जिक्र बाद में करूँगा। उनकी नजर उठ नहीं रही थी। मैं तो उनके सामने बहुत छोटा सा रिपोर्टर था, लेकिन वे भी समझ रही थी कि &#8216;मैं उन्हें आंक लिया हूँ&#8217; अब तक, जहाँ तक पत्रकारिता का सवाल है।</p>
<p><strong>इससे पहले की रिपोर्टर कक्ष में श्री सरीन साहब का गर्जन तेज हो &#8211; श्रीमती कुमी कपूर कहती हैं: &#8220;सॉरी शिवनाथ, आप सही थे, आपकी कहानी सही थी। आपकी बात देर रात जस्टिस अहमदी से हुई थी। दिल्ली में आपकी कहानी के साथ जस्टिस नहीं हुआ । सॉरी। &#8221; दिल्ली के सम्पादकीय विभाग में, चाहे अखबार हो या आज का टीवी, प्रधानमंत्री कार्यालय से अधिक राजनीति होती है </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook">संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार का सत्यानाश (7)😢 विशेष कहानी ✍ एक भूमिहार&#8217; और एक &#8216;राजपूत&#8217; छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय के 75वें वर्ष तक तीसरे मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक आ सके, राजनीतिक अखाड़े में 214 जातियां</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/one-rajput-and-one-bhumihar-and-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Jan 2025 11:32:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[advocates]]></category>
		<category><![CDATA[bhumihar]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[castes]]></category>
		<category><![CDATA[chief justice]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुजफ्फरपुर / गया / पटना / नई दिल्ली :  देश को अभी आज़ादी भी नहीं मिली थी। मध्य बिहार के गया जिले में साल 1928 में जन्म लिए ललित मोहन शर्मा पटना विश्वविद्यालय से 1946 में स्नातक और फिर 1948 में विधि में स्नातक करने के बाद 1949 में पटना उच्च न्यायालय में आर्टिकल्ड क्लर्क के [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुजफ्फरपुर / गया / पटना / नई दिल्ली :  देश को अभी आज़ादी भी नहीं मिली थी। मध्य बिहार के गया जिले में साल 1928 में जन्म लिए ललित मोहन शर्मा पटना विश्वविद्यालय से 1946 में स्नातक और फिर 1948 में विधि में स्नातक करने के बाद 1949 में पटना उच्च न्यायालय में आर्टिकल्ड क्लर्क के रूप में नामांकित हुए और फिर 1950 के प्रारंभिक वर्षों से उच्च न्यायलय में एक अधिवक्ता के रूप में अभ्यास शुरू किये। सात साल बाद 1957 में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए। देश आज़ाद हो गया था, साथ ही, देश को एक गणराज्य घोषित हुए सात वर्ष हो गए थे। शर्मा जी अपनी लगन, मेहनत के बल पर सर्वोच्च न्यायलय के वरिष्ठ अधिवक्ता नामित हुए। पंद्रह वर्ष बाद साल 1973 में पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार ग्रहण किये और फिर साल 1987 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार ग्रहण किये। सर्वोच्च न्यायालय में पांच वर्ष बाद न्यायमूर्ति ललित मोहन शर्मा को 18 नवंबर 1992 को तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर.नारायणन भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाये। यह भूमिहार ब्राह्मण समाज के लिए गर्व की बात थी। </strong></p>
<p>न्यायमूर्ति शर्मा से पूर्व, कल के <strong>शाहाबाद</strong> और आज के भोजपुर जिले के <strong>न्यायमूर्ति भुवनेश्वर प्रसाद सिन्हा</strong> पटना विश्वविद्यालय से 1919 में स्नातक और 1921 में स्नातकोत्तर करने के बाद 1922 से 1927 तक पटना उच्च न्यायालय में वकालत किये। बाद में, विधि महाविद्यालय में प्राध्यापक भी बने। समयांतराल अपने ही विश्वविद्यालय के विधि संकाय की सीनेट और विधि परीक्षा बोर्ड के सदस्य भी बने। साल 1940 आते-आते सरकारी अधिवक्ता और फिर पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे। आज़ादी के महज चार साल बाद पहले नागपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और फिर 1954 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सम्मानित न्यायमूर्ति के पद पर आसीन हुए। जब देश 12 वां जश्ने आज़ादी मना रहा था, उसके दो माह बाद, न्यायमूर्ति सिन्हा (​राजपूत) न केवल अपने प्रदेश, अपना न्यायालय (पटना उच्च न्यायालय), बल्कि अपने समाज का नाम रौशन कर भारत के <strong>सर्वोच्च न्यायालय के छठे सम्मानित मुख्य न्यायाधीश</strong> के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा शपथ लिए। </p>
<p>साल 1912 में <strong>बिहार</strong> बंगाल से अलग होकर अपने नये अस्तित्व में आया था। इसके चार साल बाद 3 फरवरी, 1916 को <strong>पटना उच्च न्यायालय</strong> की स्थापना हुई। 26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के साथ ही <strong>उच्चतम न्यायालय</strong> अस्तित्व में आया। 28 जनवरी 1950 को, भारत के एक प्रभुतासंपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के दो दिन बाद, उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन किया गया था। इसका उद्घाटन पुराने संसद भवन के नरेंद्र मंडल में हुआ, जहाँ 1937 से 1950 तक, भारत संघ न्यायालय 12 वर्षों के लिए कार्यरत था। भारत का उच्चतम न्यायालय 1958 में तिलक मार्ग, नई दिल्ली में स्थित वर्तमान भवन में स्थानांतरित होने से पहले पुराने संसद भवन में था। अब विचार कीजिए  &#8211; पिछले 76 वर्षों में बिहार के पटना उच्च न्यायालय से अब तक सिर्फ दो न्यायमूर्ति देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठ पाए हैं। एक: <strong>न्यायमूर्ति भुवनेश्वर प्रसाद सिन्हा</strong> (​राजपूत &#8211; अक्टूबर, 1959 से 31 जनवरी, 1964 तक) और दो: <strong>न्यायमूर्ति ललित मोहन शर्मा</strong> (भूमिहार &#8211; 18 नवम्बर, 1992 से 11 फरवरी, 1993 तक) &#8211; यह बिहार के लिए गर्व की बात है। </p>
<figure id="attachment_6085" aria-describedby="caption-attachment-6085" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6085" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/SC1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6085" class="wp-caption-text">भारत का सर्वोच्च न्यायालय</figcaption></figure>
<blockquote><p>चलिए आगे बढ़ते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में अब तक 51 मुख्य न्यायाधीश हुए हैं और बिहार में विगत 2022 जाति- आधारित जनगणना के आधार पर प्रदेश में 214 जातियां हैं, जिसमें 22 जातियां &#8211; अनुसूचित जाति, 32 जातियां &#8211; अनुसूचित जनजाति, 30 जातियां &#8211; पिछड़ी जाति, 113 जातियां &#8211; अत्यंत पिछड़ी जाति और 7 जातियां &#8211; ऊँची जाति घोषित किये गए । इन आंकड़ों को यहाँ इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ कि बिहार के वर्त्तमान (2024) जनगणना के आधार पर प्रदेश की कुल आवादी 132,790, 000 में से अब तक एक कायस्थ और एक भूमिहार को छोड़कर, दिल्ली सल्तनत में आईटीओ चौराहे से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नाम से अंकित तिलक मार्ग और दिल्ली से कृष्ण की नगरी मथुरा की ओर जाने वाली सड़क मथुरा रोड के बीच स्थित भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सम्मानित मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक पहुँचने वाले इन दो जातियों &#8211; कायस्थ और भूमिहार के अलावे &#8211; कोई नहीं हैं? यह भी शर्म की बात है।</p></blockquote>
<p>क्योंकि प्रदेश में कुकुरमुत्तों की तरह नेता, ठेकेदार, बिचौलिए तो उत्पन्न हो रहे हैं अपने-अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए, ऐसी स्थिति में कल तक जो गरिमा का प्रतीक थे, आज इन नेताओं के सामने ठेंघुने- घुटने के बल खड़े रहकर अपनी गरिमामय अतीत को ना ही सुरक्षित रख पा रहे हैं और ना ही इसमें इजाफा करने में सफल हो रहे हैं। अगर कर भी रहे हैं तो उस क्षेत्र में विख्यात नहीं, &#8216;तथाकथित रूप से कुख्यात&#8217; हो रहे हैं, अपने समाज और पूर्वजों के सम्मान में इजाफा नहीं कर पा  रहे हैं, यह भी दुखद है। शब्द बहुत कटु है, लेकिन शायद सत्य यही है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था में बिहार का, खासकर भूमिहारों, कायस्थों और ब्राह्मणों का क्या योगदान रहा, अथवा है, एक गहन शोध का विषय है। लेकिन अगर प्रदेश में सातवाँ, आठवाँ, कक्षा पास, मैट्रिक अनुत्तीर्ण, अविचारवान, अकुशल, अयोग्य व्यक्ति राजनीतिक गलियारे में कुर्सी तोड़ेंगे, तो आप ऐसे शोध के बारे में सोच भी नहीं सकते। आज 77 वर्ष गणतंत्र के बाद अगर प्रदेश की साक्षरता दर महिला-पुरुषों में 77 फ़ीसदी भी नहीं हो पाया है, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है।  </p>
<p><strong>चलिए बिहार के कुछ ऐसे हस्ताक्षरों के बारे में चर्चा करते हैं जो सात उच्च जाति की श्रेणी में हैं (उन दिनों राजनीतिक लाभ के लिए जातीय जनगणना होने की बात नहीं थी) भूमिहार, कायस्थ, राजपूत और ब्राह्मण समाज के लोग अव्वल थे। शुरुआत न्यायमूर्ति एन.पी. सिंह से करते हैं। सिंह 1956 को अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए और अप्रैल 1973 में पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए गए। साल 1991 में पटना उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने और फिर फरवरी 1992 को कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार संभाले। चार माह बाद जून 1992 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए गए। न्यायमूर्ति नागेंद्र राय साल 1966 में एक अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए थे। वे मुख्य रूप से पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक, सिविल और संवैधानिक मामलों में अभ्यास किये थे। साल 1990 में पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और 2005 में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने।</strong></p>
<p>न्यायमूर्ति  नारायण रॉय साल 1972 में एक अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए। उन्होंने मुख्य रूप से पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक, सिविल और संवैधानिक मामलों में अभ्यास किये। साल 1986 में पटना उच्च न्यायालय की रांची पीठ में सरकारी अधिवक्ता बने।वर्ष 1991 में पटना उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने और अक्टूबर 2007 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने। वह झारखंड के गिरिडीह जिले के एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं।</p>
<figure id="attachment_6086" aria-describedby="caption-attachment-6086" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6086" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Patna-HC-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6086" class="wp-caption-text">पटना उच्च न्यायालय</figcaption></figure>
<p>डॉ. कृष्ण नंदन सिंह पटना उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष थे। वे दून स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने मुख्य रूप से पटना और रांची उच्च न्यायालयों में संवैधानिक, प्रशासनिक, कॉर्पोरेट, आपराधिक और मध्यस्थता मामलों में महारत प्राप्त किये। शिवहर राज के डॉ. के.एन. सिंह का नाम उद्धृत किया जा सकता है। उसी तरह, आर.वी.शाही, भारत के पूर्व ऊर्जा सचिव जो एनटीपीसी के निदेशक और बीएसईएस के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।प्रख्यात चार्टर्ड एकाउंटेंट एस.के.शाही, पी.के. शाही वर्तमान में बिहार सरकार के महाधिवक्ता हैं, भारत के पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह का नाम कैसे छोड़ जा सकता है। </p>
<p><strong>बाबू दिग्विजय नारायण सिंह के पुत्र डॉ. प्रगति सिन्हा</strong> कहते हैं: भूमिहार, राजपूत और कायस्थ समाज के लोगों ने सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और अन्य व्यवस्थाओं में अपनी पहचान अद्भुत बनाये &#8211; इस बात को कोई नकार नहीं सकता। लेकिन सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों से इस समाज के  साथ साथ बिहार के सभी ऊँची जाति के लोगों में ऐसी कौन सी अवधारणा का विकास हो गया जिससे एक तो यह समाज &#8216;व्यवस्था&#8217; से &#8216;भयभीत&#8217; होने लगा, उनकी गरिमा पर आँच आना शुरू हुआ, और वे व्यवस्था से टकराने की हिम्मत छोड़ कर मूक-बधिर हो गए। इसे यूँ  भी कह सकते हैं कि वे अपने समाज और तत्कालीन हस्ताक्षरों की गरिमा को रेल की पटरियों की तरह अलग-थलग कर जीवन का मार्ग बदल दिये। तभी तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद बिहार में यह समाज, पहले जहाँ हुंकार भरने की कूबत रखता था, हुंकार से भयभीत होने लगा। </p>
<p>डॉ. प्रगति सिन्हा का कहना है कि &#8220;आज जो स्थिति देखता हूँ उसे देखकर कतई विश्वास नहीं होता। चतुर्दिक गिरावट है। पढ़ने-लिखने की बात तनिक देर के लिए छोड़ भी दें, तो आज भूमिहार ब्राह्मण के लोग रंगदारी से राजनीति तक, सिनेमा हॉल के मालिक से बसों, ट्रकों के परिवहन व्यवसाय में प्रवेश कर लिए हैं। कल इस समाज को जहाँ कलम-दवात की ताकत से आँका जाता था, आज आंकने का यंत्र भी बदल गया है। आज सभी एक दूसरे के पेअर खींचने में लगे हैं। निजी स्वार्थ के लिए राजनीती होती है। सामाजिक सरोकार से अब (अपवाद छोड़कर) लोगों को दूर-दूर तक कोई नाता-रिश्ता नहीं रह गया है। यह इस समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है, जहाँ तक अगली पीढ़ी का सवाल है।&#8221; वैसे यह भी एक गहन शोध का विषय है क्योंकि गिरावट लालू यादव के कालखंड से प्रारब्ध हुआ । </p>
<figure id="attachment_6087" aria-describedby="caption-attachment-6087" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86.jpg" alt="" width="640" height="640" class="size-full wp-image-6087" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/a44aff93-dba0-4da6-af75-3ca04b822c86-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6087" class="wp-caption-text">डॉ. प्रगति सिन्हा </figcaption></figure>
<p><strong>चिकित्सा</strong> सेवा में बिहार के भूमिहारों का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। डॉ शीतल प्रसाद सिंह जिनका नाम प्रदेश के मेडिकल सोसायटी में सबसे अधिक सम्मान से लिया जाता है। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ शल्य चिकित्सकों में डॉ विजय नारायण सिंह का नाम सम्मान से लिया जाता है। पटना चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल के शल्य चिकित्सा विभाग के सबसे लंबे समय तक विभागाध्यक्ष रहे और सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पटना में कृष्णकांत बाबू के साथ एक मेडिकल कॉलेज शुरू किया, जिसे नालंदा मेडिकल कॉलेज के नाम से जाना जाता है। इसी तरह डॉ ए के एन सिन्हा जो भारतीय चिकित्सा संघ में सबसे बड़े व्यक्ति और कॉमनवेल्थ मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष के साथ-साथ मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के सबसे लंबे समय तक सेवारत अध्यक्ष रहे। डॉ. सिन्हा एक प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ भी थे।</p>
<p>पश्चिम पटना के पैथोलॉजिस्ट डॉ जी पी शर्मा जिन्होंने डॉ जी पी शर्मा लैब की शुरुआत की। 1948 में पीएमसीएच से एमबीबीएस की डिग्री पास की और रेडियोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए लंदन गए और पीएमसीएच में रेडियोलॉजी के आजीवन विभागाध्यक्ष बने डॉ जे पी सिन्हा। डॉ. सिन्हा 1980 में प्रतिष्ठित पीएमसीएच के प्रिंसिपल के रूप में सेवानिवृत्त हुए। उनके पोते भी वर्तमान में लन्दन में रेडियोलॉजिस्ट हैं। डॉ सिन्हा भगवानपुर-रत्ती, लालगंज, वैशाली के मूल निवासी हैं। </p>
<p>इसी तरह डॉ आर के सिंह और डॉ अमित कुमार डॉ राज किशोरी सिंह प्रसूति एवं स्त्री रोग में विशेषज्ञता वाली बिहार की सबसे प्रसिद्ध डॉक्टरों में से एक हैं। उनके बेटे डॉ अमित कुमार भी बिहार में एक प्रसिद्ध बांझपन विशेषज्ञ हैं। डॉ यू एन शाही। डॉ धन पति राय जिन्होंने 1939 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज से मेडिसिन की डिग्री प्राप्त की और समाज की सेवा करने के लिए अपने पैतृक स्थान पर बस गए। उनके पुत्र डॉ बी बी राय भी 1962 के डीएमसीएच के पूर्व छात्र हैं और एचईसी रांची में आर्थोपेडिक्स विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर चुके हैं। डॉ बी बी राय के पुत्र श्री संजीव कुमार रॉय सिंगापुर में बसे हुए हैं और एशिया प्रशांत क्षेत्र के क्षेत्रीय श्रेणी प्रबंधक की क्षमता में एक एमएनसी का नेतृत्व कर रहे हैं। जबकि उनके दूसरे पुत्र श्री राजीव कुमार राय एक सिविल सेवक थे, लेकिन अब कनाडा में बस गए हैं।</p>
<figure id="attachment_6088" aria-describedby="caption-attachment-6088" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6088" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Bhune-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6088" class="wp-caption-text">न्यायमूर्ति भुवनेश्वर प्रसाद सिन्हा​ तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेते हुए</figcaption></figure>
<p>डॉ बी पी मिश्रा मुजफ्फरपुर में एस के मेडिकल कॉलेज के पहले प्राचार्य बने। डॉ. बी पी मिश्रा मुजफ्फरपुर में मॉडर्न डायग्नोस्टिक लैब नाम से अपनी पैथोलॉजी क्लिनिक चलाते हैं। उनके बेटे डॉ. रंजन मिश्रा भी पैथोलॉजी विशेषज्ञ हैं, जबकि उनके भतीजे डॉ. के के मिश्रा ने मनियारी महंत की पोती डॉ. रंजना मिश्रा से विवाह किया है और वे अपना पैथोलॉजी क्लिनिक स्टैंडर्ड डायग्नोस्टिक लैब चलाते हैं। डॉ. के के सिन्हा रांची के एक न्यूरोसर्जन, पूर्वी भारत, विशेष रूप से झारखंड और बिहार के चिकित्सा पेशे में प्रमुख हस्तियों में से एक हैं। डॉ. अनमोला सिन्हा एक दुर्लभ चिकित्सक। डॉ एन के एन सिन्हा, पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से मेडिसिन के सेवानिवृत्त प्रोफेसर  उद्धृत किया जा सकता है। वे रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियन (एफआरसीपी) के फेलो हैं और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं। </p>
<p>डॉ राजेश्वर ठाकुर एक प्रसिद्ध सर्जन होने के साथ-साथ एक उत्कृष्ट चिकित्सा शिक्षक भी हैं। वे कमरगामा, कल्याणपुर, समस्तीपुर के मूल निवासी हैं। चिकित्सा शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद वे सर गणेश दत्त सेवा संस्थान, पीएमसीएच ओल्ड बॉयज एसोसिएशन सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों का नेतृत्व कर रहे हैं। डॉ आर बी शर्मा और डॉ उषा शर्मा न्यूरो सर्जरी के क्षेत्र में सबसे प्रसिद्ध सर्जन हैं और उन्होंने लंदन और अमेरिका में कई वर्षों तक अपनी सेवाएं दी हैं। डॉ शांति रॉय और डॉ अनीता सिंह बिहार की सबसे प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ और प्रसूति एवं स्त्री रोग डॉक्टरों में से एक हैं। उनके बेटे डॉ हिमांशु राय भी बिहार के जाने-माने बांझपन विशेषज्ञ हैं। डॉ शांति रॉय की छोटी बहन डॉ अनीता सिंह भी एक प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ वीरेंद्र प्रसाद सिन्हा हृदय रोग विशेषज्ञ हैं, जो पटना मेडिकल कॉलेज में शिक्षक के रूप में प्रैक्टिस कर रहे हैं और बिहार में कार्डियोलॉजी में दूसरे डीएम हैं।</p>
<p>पद्मश्री डॉ. चंद्रेश्वर प्रसाद ठाकुर जिन्हें आमतौर पर डॉ. सी. पी. ठाकुर कहा जाता है, पटना मेडिकल कॉलेज, पटना के मेडिसिन के एमेरिटस प्रोफेसर हैं, उन्हें कालाजार के उपचार में दवा की प्रतिक्रिया को समझने में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारत के माननीय राष्ट्रपति डॉ. ए.पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा चिकित्सा विज्ञान (क्लीनिकल रिसर्च) के क्षेत्र में रैनबैक्सी रिसर्च अवार्ड्स भी मिल चुका है। उनका नया ज्ञान जल्द ही कालाजार, विसराल लीशमैनियासिस के इलाज के लिए आयुर्वेदिक दवा से एक दवा विकसित करने की दिशा में ले जा सकता है। वह स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के लिए पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और पटना निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार लोकसभा के सदस्य हैं। </p>
<p>प्रबंधन गुरु पद्मश्री डॉ. प्रीतम सिंह सिंह जिन्होंने अपना जीवन भारत और विदेशों में प्रबंधन शिक्षा के विकास के लिए समर्पित कर दिया है। उन्होंने आईआईएम लखनऊ और एमडीआई के लिए दुनिया भर में सहयोग विकसित किया और अमेरिकी, यूरोपीय, कनाडाई, ऑस्ट्रेलियाई और एशियाई प्रबंधन स्कूलों के साथ छत्तीस समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए। प्रशासनिक स्टाफ कॉलेज में बौद्धिक पूंजी के निर्माण और आईआईएम बैंगलोर को वास्तव में एकीकृत प्रबंधन स्कूल के रूप में फिर से केंद्रित करने में उनके योगदान के कारण उन्हें एक उत्कृष्ट परिवर्तन गुरु और पुनर्जागरण नेता के रूप में जाना जाता है। एमडीआई के निदेशक के रूप में उनके पहले कार्यकाल के दौरान एमडीआई के नाटकीय बदलाव और आईआईएम लखनऊ को आईआईएम एल के निदेशक के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान नंबर 1 संस्थान के रूप में फिर से स्थापित करने के कारण उन्हें जादुई निदेशक की प्रतिष्ठा मिली। देश के लगभग सौ संस्थानों के बोर्ड सदस्य के रूप में उन्होंने कॉर्पोरेट जगत में परिवर्तन प्रक्रिया को सक्रिय रूप से शुरू और सक्षम किया है। </p>
<p>वे भारतीय रिजर्व बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, आईसीआरए, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और भारत में यूएस एजुकेशनल फाउंडेशन के बोर्ड में हैं। वे प्रबंधन शिक्षा और कॉर्पोरेट प्रबंधन दोनों से जुड़े नीतिगत मुद्दों के भी प्रमुख सदस्य रहे हैं। इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया विलय समिति और प्रबंधन शिक्षा के लिए नीति-परिप्रेक्ष्य समिति की उल्लेखनीय सदस्यताएँ हैं। उनकी विशिष्ट सेवाओं को देश द्वारा स्वीकार किया गया जब भारत के राष्ट्रपति ने वर्ष 2003 में उन्हें प्रतिष्ठित &#8216;पद्मश्री&#8217; से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>पटना के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</strong> का कहना है कि &#8220;बिहार में जातियां और उपजातियां राजनीति में  वोट के लिए निर्णायक रही हैं। सरकारी सेवा में आजादी के पहले और बाद में कायस्थ जो कभी राजाओं और जमींदारों के यहां मुंशी होते तथा बंगाली (बिहार बंगाल से ही अलग हुआ रहता) की संख्या सबसे ज्यादा रही। भूमिहार और राजपूत जमीन से जुड़े रहे, दोनों को शोषक वर्ग (एक्सप्लोइटर्स क्लास) ही मानते हैं। जबकि भारतीय प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं में ये लोग काफी आगे आते रहे। इसका वजह यह था और आज भी है इनका शासन करने का अन्तर्निहित प्रकृति।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6089" aria-describedby="caption-attachment-6089" style="width: 960px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/law1-fotor-2025012216548.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/law1-fotor-2025012216548.jpg" alt="" width="960" height="714" class="size-full wp-image-6089" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/law1-fotor-2025012216548.jpg 960w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/law1-fotor-2025012216548-300x223.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/law1-fotor-2025012216548-768x571.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6089" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p>मिश्र आगे कहते हैं कि  &#8220;वकालत में मुंशी जी मिलेंगे, जिन्हें पहले मुख्तार कहते थे, इनकी अगली पीढ़ी के अधिवक्ता और बैरिस्टर बना।  पटना उच्च न्यायालय में एडवोकेट्स एसोसिएशन के पहले अध्यक्ष राजेंद्र बाबू बने जो राष्ट्रपति हुए। आजादी के लड़ाई में बृजकिशोर बाबू जैसे वकील ने मोहन दास करमचंद गांधी की पैरवी की। उच्चतम न्यायालय में हाल तक नवीन संज्ञा, चंद्रमौली प्रसाद गेट, जो कायस्थ थे, कुल्हाड़ियां वाले के बी न सिंह पटना और मद्रास हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश हुए। परिस्थितियों के कारण 1990 में लालू प्रसाद और नीतीश के काल में पिछड़ी जाति के वकील जज बने, दलित भी नियुक्त किए गए और भूमिहार तथा राजपूत की एकाधिकार खत्म हो रही  है। ब्राह्मण तो उपेक्षित ही रहे।&#8221;</p>
<p>बहरहाल,  11वें विधानसभा के कालखंड में जब प्रदेश ही नहीं, देश ही नहीं, विश्व के पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों पर और टीवी के पर्दों पर ऐतिहासिक चारा घोटाला काण्ड प्रकाशित होने लगा और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव को बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर का रास्ता इस कदर दिखाया गया कि फिर कभी वापस नहीं आये, लालू यादव 4 अप्रैल, 1995 से 25 जुलाई, 1997 तक दो साल 112 दिन रहने के बाद अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी को बिहार के सचिवालय में प्रवेश दिलाये। श्रीमती राबड़ी देवी 25 जुलाई, 1997 से 11 फरबरी, 1999 तक राष्ट्रीय जनता दल की ओर से प्रदेश का कमान संभाली। </p>
<p>उन दिनों ये.आर. किदवई बिहार के लात साहब थे। यह कालखंड 11 वें विधानसभा का था। 11 फरवरी, 1999 से 9 मार्च, 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा और फिर 9 मार्च, 1999 से 2 मार्च, 2000 तक एक साल में छह दिन कम, यानी, 359 दिनों के लिए 11 वीं विधानसभा कालखंड में ही श्रीमती राबड़ी देवी पुनः मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुई। अब तक प्रदेश के लाट साहेब सुन्दर सिंह भण्डारे आ गए थे। सुन्दर सिंह भंडारे के बाद न्यायमूर्ति एम.बी. लाल और सूरज भान प्रदेश के लाट साहब कब बने और कब गए, बिहार के लोगों को मालूम भी नहीं हो सका। तभी 23 नवम्बर, 1999 से 12 जून, 2003 के कालखंड में तीन साल 201 दिनों के लिए लाट साहब के कोठी में विराजमान हुए विनोद चंद्र पांडे। पांडे जी राजस्थान कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे जो 1989-1990 प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कालखंड में मंत्रिमंडल सचिव भी थे। मंत्रिमंडल सचिव के पूर्व जब विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के वित्त मंत्री थे, पांडे जी राजस्व सचिव थे। बाद में वे झारखंड और अरुणाचल प्रदेश के भी राज्यपाल बने। खैर। </p>
<p>2000 के कालखंड में, यानी 12 वें विधानसभा में, नीतीश कुमार समता पार्टी के तरफ से सात दिनों के लिए (3 मार्च से 10 मार्च, 2000 तक) मुख़्यमंत्री कार्यालय में आये और फिर बाहर निकल गए। विनोद चंद्र पांडे के कालखंड में ही श्रीमती राबड़ी देवी फिर एक बार मुख्यमंत्री (11 मार्च, 2000 से 6 मार्च, 2005) बनी। फिर समय आया राष्ट्रपति शासन का जो 7 मार्च, 2005 से 24 नवम्बर, 2005 तक कायम रहा। 13 वें विधानसभा के लिए चुनाव तो हुआ लेकिन सरकार नहीं बन सकी और फिर आया समय नीतीश कुमार का जो 24 नवम्बर, 2005 को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। </p>
<p>बिहार में साल 1990 से 2005 तक और फिर उसके आगे प्रदेश के शाशन, प्रशासन, अर्थ, सभी क्षेत्रों में क्या दशा हुआ और क्या दुर्दशा हुआ, यह बिहार के मतदाता मुझसे अधिक जानते हैं। अगर प्रशासनिक दृष्टि से इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन के आंकड़े को ही देखें तो लालू-राबड़ी के 1991 से 2005 के बीच प्रदेश के चिकित्सक किस मानसिक तनाव से गुजरे, यह वे तो जानते ही हैं, प्रदेश के नेता, पत्रकार, लेखक, विश्लेषक अधिक जानते हैं। क्योंकि उसी कालखंड में अख़बारों के पन्नों पर, पत्र-पत्रियकाओं में, टीवी के पार्डन पर &#8216;लालू का जंगल राज&#8217; लिखा मिलता था। वैसे, देश में लोग बाग़ कहते हैओं कि उस कालखंड में लालू यादव के बाद श्रीमती राबड़ी देवी भी मुख्यमंत्री थी, फिर &#8216;लालू का जंगल राज&#8217; क्यों? अब ऐसे प्रश्नकर्ता को कैसे समझाया जाय कि आज़ादी के 78 साल और देश को गणतंत्र घोषित होने के 77 साल बाद भी देश में अभी महिलाओं को वह अधिकार नहीं मिला है, देश में अभी भी पैतृक सत्ता है &#8211; पुरुष प्रधान समाज है, और इतने दिनों बाद भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के लिए माथा पीटना पड़ रहा है। </p>
<p><strong>लालू-राबड़ी के कालखंड में कोई भी सुरक्षित नहीं था। विधायक अजीत सरकार, विधायक देवेंद्र दुबे, चुनाव लड़ रहे छोटन शुक्ला या मंत्री बृजबिहारी प्रसाद, सभी की हत्या कर दी गई। आईएएस अधिकारी बीबी विश्वास की पत्नी चंपा विश्वास, उनकी मां, भतीजी और दो मेड के साथ दुष्कर्म किया गया। डीएम जी कृष्णैया की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। यह वह दौर था जब जनप्रतिनिधि सुरक्षित नहीं थे। यहां तक कि अधिकारी भी सुरक्षित नहीं थे।  लालू यादव के साले सुभाष यादव और साधु यादव की दबंगई जगजाहिर है। </strong></p>
<figure id="attachment_6090" aria-describedby="caption-attachment-6090" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6090" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lalit-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6090" class="wp-caption-text">सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ललित मोहन शर्मा</figcaption></figure>
<p>इन 15 सालों में से 8 साल तक उनकी पत्नी राबड़ी देवी राज्य की मुख्यमंत्री रहीं। लेकिन उनके कार्यकाल के पीछे वे ही मास्टरमाइंड थे। इन 15 सालों में बिहार में हत्या और अपहरण एक &#8216;उद्योग&#8217; बन गया। यह पैसा कमाने का सबसे पसंदीदा जरिया था। अधिकारियों, माफियाओं और राजनेताओं के बीच जो गठजोड़ बना, वह भारत के इतिहास में कभी नहीं देखा गया। यह वह दौर था जब डॉक्टर से लेकर इंजीनियर और नौकरशाह से लेकर व्यवसायी तक, उस दौर में जो भी अच्छी कमाई कर रहा था, उसे सुरक्षित रहने के लिए अपराधियों को पैसे देने पड़ते थे। लालू यादव के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति सबसे खराब थी। यह इतनी खराब स्थिति में थी कि अगर कोई शाम 6 बजे तक घर वापस नहीं आता तो परिवार और रिश्तेदारों में कोहराम मच जाता था। पता नहीं कब कौन मारा जाएगा या धरती से गायब हो जाएगा। जब भी पुलिस किसी की लाश बरामद करती तो लोग अपने रिश्तेदारों या किसी और के बारे में सोचते थे। रोजगार और शिक्षा तो चर्चा का विषय भी नहीं थे। </p>
<p>कारोबारियों के लिए स्थिति इतनी दर्दनाक थी कि कोई भी बिहार में कारोबार नहीं करना चाहता था। बिहार में कई गुंडे-बदमाश नेता और ठेकेदार थे। यह एक पूरी व्यवस्था थी, जिसमें माफिया विकास कार्यों के टेंडर लेते थे। ऐसे गिरोहों के अधीन पूरी हो चुकी परियोजनाओं की स्थिति समझी जा सकती है। जब कोई अपराधी नेता बन जाता है और अपने जैसे सौ लोगों को पालता-पोसता है, तो यह &#8216;उद्योग&#8217; बिना किसी डर के तेजी से बढ़ता है। 2003 में 3652 हत्याएं और 1956 अपहरण हुए। 2004 में 3861 लोगों की हत्या हुई, 1297 डकैती के मामले दर्ज किए गए, 9199 दंगे दर्ज किए गए और 2566 अपहरण के मामले दर्ज किए गए और 8189 दंगे हुए। हर साल राज्य में करीब 10,000 दंगे होते हैं। 2004 में बिहार में 3948 लोगों की हत्या हुई। इसके अलावा, जबरन वसूली के लिए 411 अपहरण और 1390 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। उनके कार्यकाल में नक्सली हमलों में कई गुना वृद्धि हुई। 2005 में बिहार में 3471 हत्याएं दर्ज की गईं। 251 अपहरण की घटनाएं और 1147 बलात्कार की घटनाएं भी दर्ज की गईं। </p>
<p>आईएमए के आंकड़े के अनुसार उस कालखंड में तक़रीबन चार दर्जन से अधिक  चिकित्सकों या उनके आश्रितों का अपहरण किया गया था और एक दर्जन से अधिक चिकित्सकों को फिरौती के लिए मार दिया गया था। इसमें आईएमए-बिहार और बिहार राज्य स्वास्थ्य सेवा संघ के चिकित्सक थे। पिछले वर्ष नवम्बर के आईएमए के एक आंकड़े  के अनुसार (2017 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार) देश में 75 फीसदी से अधिक चिकित्सकों ने अपने-अपने कार्य स्थल पर हिंसा का अनुभव किया, जबकि लगभग 63% हिंसा के डर के बिना मरीजों को देखने में असमर्थ थे। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि लगभग 70% डॉक्टरों को काम के दौरान हिंसा का सामना करना पड़ा। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/one-rajput-and-one-bhumihar-and-bihar">बिहार का सत्यानाश (7)😢 विशेष कहानी ✍ एक भूमिहार&#8217; और एक &#8216;राजपूत&#8217; छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय के 75वें वर्ष तक तीसरे मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक आ सके, राजनीतिक अखाड़े में 214 जातियां</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>छोड़िये सेबी की श्रीमती माधाबी पुरी बुच को, जिस दिन IAS अधिकारी &#8216;एक जुट&#8217; हो जायेंगे, कोई भी राजनेता धूर्तता से उनसे काम नहीं निकाल सकता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Aug 2024 07:49:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bungling]]></category>
		<category><![CDATA[corruption]]></category>
		<category><![CDATA[finance]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[Ministry]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना हिल के बरामदे से (नई दिल्ली): पिछले दिनों संघ लोक सेवा आयोग के 1972 परीक्षा बैच के प्रथम स्थान धारक और भारतीय रिजर्व बैंक के 22 वें अध्यक्ष (अब अवकाशप्राप्त) डी सुब्बाराव एक किताब Just A Mercenary: Notes From My Life &#038; Career का लोकार्पण किये। यह किताब उन्होंने ही लिखा है। इस किताब के बारे में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-day-ias-officers-become-united-no-politician-will-be-able-to-subtly-work-with-them">छोड़िये सेबी की श्रीमती माधाबी पुरी बुच को, जिस दिन IAS अधिकारी &#8216;एक जुट&#8217; हो जायेंगे, कोई भी राजनेता धूर्तता से उनसे काम नहीं निकाल सकता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना हिल के बरामदे से (नई दिल्ली): पिछले दिनों संघ लोक सेवा आयोग के 1972 परीक्षा बैच के प्रथम स्थान धारक और भारतीय रिजर्व बैंक के 22 वें अध्यक्ष (अब अवकाशप्राप्त) डी सुब्बाराव एक किताब Just A Mercenary: Notes From My Life &#038; Career का लोकार्पण किये। यह किताब उन्होंने ही लिखा है। इस किताब के बारे में अनेकानेक कहानियां लिखी गई, प्रकाशित हुई। उसी क्रम में उन्होंने FORTUNE INDIA पत्रिका से भी बात किये। अपने साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा कि &#8220;कभी अपनी क्षमता, अपनी ईमानदारी और अपनी प्रतिबद्धता के लिए विख्यात थे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी। आज अपनी अयोग्यता, अपनी अकुशलता और अपनी भ्रष्टाचार में लिप्तता के कारण कुख्यात हो गए हैं 25% IAS अधिकारी।&#8221; यह छोटी बात नहीं है। </p>
<p>उन्होंने आगे कहा: &#8220;भारत का प्रशासनिक कार्य 25 फीसदी प्रशासनिक अधिकारी करते हैं और शेष 50 फीसदी &#8216;मध्यस्थ है। आज प्रशासनिक अधिकारियों में एकता का सम्पूर्ण अभाव है। जिस दिन उनमें एकता आ जाएगी, एक हो जायेंगे, भारत का कोई भी राजनेता उनकी ओर ऊँगली नहीं उठा सकता है। वे अपनी क्षमता, ईमानदार और प्रतिबद्धता के लिए पुनः जाने जायेंगे।&#8221; राव साहब की बातों में बहुत दम है। </strong></p>
<p>तभी तो सं 1970 के बाद से 2024 के हिंडनबर्ग की खोज तक भारत में 100 से अधिक घोटाले हुए हैं और इन घोटालों में राजनेताओं के अलावे, सैकड़ों भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी लिप्त हैं। अब तो देश में आईएएस बनाने का कारखाना भी चल रहा है, भले कारखाने के स्वामी या उस कारखाने में कार्य करने वाले अधिकारियों, पदाधिकारियों में देखता हो अथवा नहीं। देश की बात बाद में करेंगे, महज दिल्ली शहर में सैकड़ों आईएएस कोचिंग केंद्र केंद्र हैं और औसतन 14लाख अभ्यर्थी प्रतिवर्ष कोचिंग लेते हैं। आंकड़े के हिसाब से प्रति अभ्यर्थी से औसतन 50,000 ₹ से 2,00,000 ₹ शुल्क लेता है कोचिंग संस्था। कहानी को सरल बनाने के लिए हम औसतन 1,50,000 ₹ आंकते हैं। यानी 14,00,000 (अभ्यर्थियों की संख्या) x ₹ 1,50,000 रुपये प्रति अभ्यर्थी। यानी कुल: ₹ 210000000000 का व्यवसाय है कोचिंग केंद्र। इन कोचिंग केंद्रों के कितने छात्र-छात्राओं का नाम संघ लोक सेवा आयोग के बाहर प्रकाशित होता है अंतिम सूची में, यह गहन शोध का विषय है। खैर। </p>
<p><strong>आज़ादी के कोई तीन साल बाद एक घोटाला सन 1950 में पहला घोटाला हुआ था और इस घोटाले में कलकत्ता के हरिदास मूंदड़ा मुख्य अभियुक्त थे। स्वतंत्र भारत का पहला वित्तीय घोटाला था। मूंदड़ा कलकत्ता के एक स्टॉक सट्टेबाज थे। इस अनियमितता को 1958 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के फ़िरोज़ गांधी उजागर किये थे । फिरोज गांधी भारत की संसद में रायबरेली सीट का प्रतिनिधित्व करते थे उन दिनों और उनकी शादी तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी से हो गई थी। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के नेता के रूप में नेहरू चाहते थे कि एलआईसी मामले को चुपचाप निपटाया जाए क्योंकि इससे सरकार की छवि ख़राब हो सकती थी।</strong></p>
<p>उन दिनों फिरोज गांधी रायसीना रोड के नुक्कड़ पर स्थित 1, रायसीना रोड में रहते थे। आज 1, रायसीना रोड में प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया है। फ़िरोज़ गांधी उस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पीछे प्राथमिक शक्ति थे, जिसके परिणामस्वरूप 1956 में भारत के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक, राम किशन डालमिया को अपनी जीवन बीमा कंपनी को धोखा देने के लिए कारावास में डाल दिया गया था। इसके बाद, संसद ने 19 जून 1956 को भारतीय जीवन बीमा अधिनियम पारित किया, जिसके तहत 245 संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया गया और जीवन बीमा निगम के तहत समेकित किया गया। इसलिए, उन्होंने एलआईसी को &#8220;संसद के बच्चे&#8221; कहा। यह प्रश्न भी संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में पूछा जा चूका है। </p>
<p>फिरोज गांधी इस मामले पर कोई नरमी नहीं बरती और मामले को सीधे संसद में ले गए। उन्होंने संसद में भाषण के दौरान कहा कि &#8220;संसद को अपने द्वारा बनाए गए सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली वित्तीय संस्थान, भारतीय जीवन बीमा निगम, जिसके सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की जांच के साथ-साथ सतर्कता और नियंत्रण रखना चाहिए।&#8221; मूंदड़ा कांड ने नौकरशाही, शेयर बाजार के सट्टेबाजों और छोटे दुष्ट व्यापारियों के बीच सांठगांठ को उजागर किया। यह घटना दामाद-ससुर के संबंधों को मानसिक रूप से विच्छेद कर दिया। उस कालखंड में भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णामाचारी को इस्तीफा देना पड़ा। </p>
<blockquote><p>मूंदड़ा कांड, नागरवाला कांड, चारा घोटाला, बोफोर्स, इंडियन स्टॉक मार्केट स्केम, स्टाम्प पेपर कांड, मैच फिक्सिंग, जयललिता मामला, जलगाओं हाउसिंग स्केम, पुरुलिआ आर्म्स ड्राप, हवाला, ऑपरेशन वेस्ट एन्ड, केतन पारेख कांड, बेस्ट बेकरी कांड, ताज कॉरिडोर कांड, जेबीटी शिक्षक नियुक्ति स्कीम, हसन अली मनी लॉन्ड्रिंग कांड, 2जी स्पेक्ट्रम कांड, सत्यम कांड, आदर्श हाउसिंग, बलकेरी पोर्ट कांड, यूपी सैंड घोटाला, व्यापम कांड, रेलवे घूस कांड, एनएसई को-लोकेशन कांड, पीएनबी कांड, नीरव मोदी कांड सहित सन 1950 के बाद भारत में अब तक 100 से अधिक वित्तीय काण्ड हुआ है।</p></blockquote>
<p>देश के सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ प्रदेशों के उच्च न्यायालय के रास्ते इन मुकदमों को देखने-सुनने वाली अदालतों में आज भी कई हज़ार लाल वस्त्र में बंधे गठरियों में मुकदमों का भविष्य बंद पड़ा होगा। कई मामलों में अदालत का निर्णय हो गया होगा, कई मालमों में निर्णय लिखने हेतु प्रतीक्षा कर रहा होगा। कई मामले में अभियुक्त अंतिम सांस लेकर ईश्वर की अदालत में पहुँच गए होंगे, तो कई न्यायालय के फैसले का सम्मान करते आम जीवन जी रहे होंगे। कई नेता बन गए होंगे तो कई अधिकारी &#8211; पदाधिकारियों के साथ मिलकर कोई दूसरा काम शुरू कर दिए होंगे।  </p>
<p>समय दूर नहीं है जब विश्व के अख़बारों में भारत का नाम स्कैम्स, घोटाला, घपला का देश कहा जायेगा। लेकिन इन घोटालों में, घपलो में राजनेता तो मुख्य हाथ तो होता ही है, भारतवर्ष में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित और प्रतिष्ठित परीक्षा, जो भारतोय प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारिओं को जन्म देता है, उन अधिकारियों का हाथ सर्वोपरि होता है। देश में कोई भी घोटाला या स्केम इन प्रशासनिक अधिकारियों, चाहे वे आईएएस हो, आईपीएस हो, आईआरएस हों या किसी भी सेवा और कैडर के हों, के मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। </p>
<p>अगर देश में यह तथाकथित प्रशासनिक अधिकारी ईमानदार हो जाएँ, कर्तव्यनिष्ठ हो जाएँ, अपने पद की गरिमा को समझें, अपनी सत्यनिष्ठा को समझें, अपनी योग्यता को समझें, उनके प्रति भारत के लोगों के विश्वास को समझें तो शायद कोई भी राजनेता इस तरह के भ्रष्टाचार या स्केम को जन्म नहीं दे सकता है। किसी बीज को अंकुरित होने के लिए मिट्टी, पानी या मौसम की जरुरत होती है। भारत में ये सभी प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (अपवाद छोड़कर) उसी मिट्टी, पानी और मौसम का कार्य करते हैं।</p>
<p><strong>विगत दिनों भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष सुश्री माधाबी पुरी बुच का नाम हिंडनबर्ग खोज के तहत एक स्केम में आया है । इनपर छह आरोप लगाए गए हैं। उन आरोपों से सुश्री बुच के साथ-साथ उनके पति भी विवादों के दायरे में हैं। हिंडनबर्ग रिसर्च ने बुच दंपत्ति पर अडानी स्टॉक हेराफेरी मामले में अपनी ताकत का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। इन आरोपों के कारण सुश्री बुच विगत सप्ताह दिल्ली के रायसीना हिल पर वित्त मंत्रालय के अलावे कई अन्य संवेदनशील कार्यालयों में भी प्रवेश ली जो आम तौर पर संदेहास्पद स्थिति में होता है। खैर। </strong></p>
<p>रायसीना हिल पर सुश्री बुच के विरुद्ध तत्काल किसी भी प्रकार का अनुशासनिक कार्रवाई करने के मामले में विचारधारा दो फांक में बंटा है। एक पक्ष का कहना है कि चुकि यह बात प्रत्यक्ष रूप से अदानी से सम्बंधित है, और अदानी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी हैं, वैसी स्थति में  इस बात की भी चर्चा है कि बुच दंपत्ति हिंडनबर्ग खुलासे से भी सेबी प्रमुख के रूप में उनके कार्यकाल पर कोई असर पड़ने की संभावना नहीं है। जबकि दूसरा पक्ष यह कहता है कि अन्य घोटालों के तरह यह भी एक घोटालों के संख्या में जुड़ जायेगा। </p>
<p>दो वर्ष पूर्व नरेंद्र मोदी की सरकार सुश्री माधबी पुरी बुच को तीन साल की अवधि के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड का नया अध्यक्ष बनाया था। वह सेबी अध्यक्ष बनने वाली निजी क्षेत्र की पहली महिला और व्यक्ति हैं। बुच पिछले साल तक सेबी सेबी में पूर्णकालिक सदस्य के रूप में कार्यरत थीं और उससे पहले शंघाई में न्यू डेवलपमेंट बैंक में कार्यरत थीं। वह सेबी के नए अध्यक्ष के रूप में अजय त्यागी (सेवानिवृत्त आईएएस: 1984: एचपी) का स्थान लीं। त्यागी को 1 मार्च 2017 को तीन साल की अवधि के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद, उन्हें छह महीने का विस्तार दिया गया और बाद में अगस्त 2020 में उनका कार्यकाल 18 महीने बढ़ा दिया गया।</p>
<p>रायसीना हिल के सूत्रों के अनुसार सेबी के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में सुश्री माधबी पुरी बुच की नियुक्ति ने सेबी प्रमुख के चयन से संबंधित एक दिलचस्प पहलू है जब जिसमें अजय त्यागी विजेता के रूप में उभरे। बहुत कम लोग जानते हैं कि अंतिम चरण में सेबी प्रमुख पद की दौड़ त्यागी और सुश्री बुच के बीच थी। हालांकि, अधिकांश मीडिया रिपोर्ट में यह अनुमान लगाती रहीं कि बिजली सचिव पी के पुजारी (IAS: 1981: GJ) या DEA सचिव शक्तिकांत दास (IAS: 1981: TN) को इस पद के लिए चुना जा सकता है। कहा जाता है कि उस समय सेबी प्रमुख के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए अंतिम पैनल में केवल दो नाम थे &#8211; पहला: अजय त्यागी और दूसरा: सुश्री बुचोन। सुश्री बुच इस पद के लिए एक गंभीर दावेदार थीं। चूंकि त्यागी विजयी हुए थे, इसलिए शीर्ष पर यह उचित माना गया कि यह सेबी के व्यापक हित में होगा यदि सुश्री बुच को शेयर बाजार नियामक का पूर्णकालिक सदस्य नियुक्त किया गया। </p>
<p>बहरहाल, एगोरा एडवाइजरी प्राइवेट लिमिटेड की संस्थापक सदस्य सुश्री बुच न्यू डेवलपमेंट बैंक (शंघाई) में कार्यरत थी । इससे पहले उन्होंने आईसीआईसीआई समूह की वित्तीय सेवा शाखा के सीईओ और एमडी के रूप में भी काम किया था और व्यक्तिगत कारणों से और सिंगापुर में स्थानांतरित होने के लिए 2011 में आईसीआईसीआई छोड़ दिया था। यह भी ध्यान दिया जा सकता है कि उनके पति धवल बुच को कॉर्पोरेट जगत के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक माना जाता है और वह वैश्विक एफएमसीजी प्रमुख यूनिलीवर के साथ सिंगापुर में तैनात हैं और हरीश मनवानी की टीम का हिस्सा हैं जो एशिया, अफ्रीका के लिए कंपनी के कारोबार का नेतृत्व कर रहे हैं। और कुछ अन्य क्षेत्र। बुच पहले यूनिलीवर की वैश्विक टीम का हिस्सा थे और यूके में स्थित थे।</p>
<p>वापस आते हैं आईएएस अधिकारियों के मामले में। भारतीय रिजर्व बैंक के स्थापना के बाद 1 अप्रैल 1935 से अब तक 25 गवर्नर हुए &#8211; ओस्बोर्न स्मिथ, जेम्स ब्रैड टेलर, सीडी देशमुख, बेनेगल रामा राव, केजी आंबेडकर, एचवीआर लेंगर, पीसी भट्टाचार्य, लक्ष्मीकांत झा, बीएन अदरकर, सरुक्काई जगन्नाथ, एनसी सेनगुप्ता, के आर पूरी, एम नरसिम्हन, आईजी पटेल, मनमोहन सिंह, अमिताभ घोष, आरएन मल्होत्रा, एस वेंकटरमन, सी रंगराजन, विमल जालान, वीवी रेड्डी, डी सुब्बाराव, रघुराम राजन, उर्जित पटेल और शक्तिकांत दास। रिजर्व बैंक के 22 वे गवर्नर डी सुब्बाराव पिछले दिनों एक किताब &#8211; Just A Mercenary: Notes From My Life &#038; Career &#8211; का लोकार्पण किये। सुब्बाराव संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित 1972 बैच के प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के प्रथम स्थान धारक थे और उन्हें आंध्र प्रदेश कैडर मिला था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D.jpg" alt="" width="1654" height="2551" class="aligncenter size-full wp-image-5724" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D.jpg 1654w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D-195x300.jpg 195w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D-664x1024.jpg 664w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D-768x1185.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D-996x1536.jpg 996w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/D-1328x2048.jpg 1328w" sizes="auto, (max-width: 1654px) 100vw, 1654px" /></a></p>
<p>इस किताब के लोकार्पण के बाद <strong>FORTUNE INDIA</strong> को दिए गए एक साक्षात्कार में सुब्बाराव ने कहा कि सं 1950 से 1970 के दशक तक आईएएस अधिकारी अपनी क्षमता (कंपीटेंस), ईमानदारी (इंटिग्रिटी) अपने प्रतिबद्धता (कमिटमेंट्स) के लिए विख्यात थे। लेकिन आज उनकी प्रतिष्ठा उनकी अयोग्यता (इनेप्टीच्यूड), अकुशलता (इनएफ़्फीसिएन्सी) और भ्रष्टाचार में बदल गई है।  आज 2024 हो गया है यानी 52 साल में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की प्रतिष्ठा इतनी ख़राब हो गयी है।</p>
<blockquote><p>उन्होंने कहा: &#8220;Currently, 25% of IAS officers are either corrupt, incompetent, or inefficient. The middle 50% started well but have become complacent, while only the top 25% are truly delivering. Ideally, we need 75% to be effective. The problem lies in the wrong incentives &#8211; no rewards for good performance and no penalties for no performance. Some officers blame politicians for their inability to deliver, but if IAS officers stood united, politicians would not be able to manipulate them. The entire service has suffered because of this.&#8221; </p></blockquote>
<p>शासन और सेवा के सिद्धांतों को कायम रखने की जिम्मेदारी संभालने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को अक्सर &#8216;स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया&#8217; के रूप में जाना जाता है, यह शब्द सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा राष्ट्रीय अखंडता बनाए रखने और नीति को लागू करने में उनकी अपरिहार्य भूमिका को दर्शाने के लिए गढ़ा गया था। लेकिन भारत के गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय से जुड़े सभी जान संस्थानों में आज भी सैकड़ों ऐसे फ़ाइल संसथान और अदालत का यात्रा कर रहे हैं, जिसमें सैकड़ों भारतीय और प्रशासनिक सेवा के अधिकारीयों का नाम उल्लिखित है &#8211; अभियुक्त के रूप में।</p>
<p><strong>छत्तीसगढ़ कैडर </strong>के 2009 बैच के आईएएस अधिकारी समीर विश्नोई को प्रवर्तन निदेशालय ने खनन कार्यों के लिए रिश्वत वसूली से जुड़े बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया था। उनके निर्देश के तहत, खनिजों को भेजने के लिए मैन्युअल अनुमोदन प्रक्रिया को फिर से शुरू किया गया, जिससे परिवहन परमिट के लिए लेवी के संग्रह में व्यापक भ्रष्टाचार हुआ। 16 महीने की अवधि में, कथित तौर पर रिश्वत के रूप में ₹500 करोड़ से अधिक एकत्र किया गया था।</p>
<p><strong>झारखंड कैडर</strong> की 2000 बैच की आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल को प्रवर्तन निदेशालय ने मनरेगा फंड के गबन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया था। उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट ने खुलासा किया कि छापे के दौरान बरामद की गई बड़ी मात्रा में नकदी उनकी थी, जिसका इस्तेमाल संपत्ति खरीदने और रिश्वत देने के लिए किया गया था। आरोपों में ग्रामीण विकास परियोजना के लिए बड़ी रकम का दुरुपयोग शामिल है। </p>
<p><strong>गुजरात कैडर</strong> के 2011 बैच के आईएएस अधिकारी के राजेश को रिश्वत मामले में शामिल होने के आरोप में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने गिरफ्तार किया था। यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने बंदूक लाइसेंस जारी करने के लिए रिश्वत ली और सुरेंद्रनगर जिले के कलेक्टर के रूप में कार्य करते हुए संदिग्ध भूमि सौदों में शामिल थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद सिलसिलेवार छापेमारी की गई, जिसमें महत्वपूर्ण आपत्तिजनक सबूत सामने आए।उत्तर प्रदेश कैडर के नीरा यादव उत्तर प्रदेश और एनसीआर में विभिन्न भूमि घोटालों में शामिल थी, वह अक्सर बड़ी रकम के बदले राजनेताओं और व्यापारियों को पॉश इलाकों में भूमि भूखंड आवंटित करती थी। घनिष्ठ राजनीतिक संपर्क बनाए रखने के बावजूद, उन्हें अंततः 2017 में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति रखने के लिए दोषी ठहराया गया और दो साल की जेल की सजा सुनाई गई। </p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश कैडर</strong> के आईएएस अधिकारी राकेश कुमार जैन को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण 2010 में निलंबन और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा। उन पर विशेष रूप से वाणिज्य विभाग के निदेशक के रूप में कार्य करते हुए कुल ₹7.5 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया था। यह आरोप व्यक्तिगत लाभ के बदले में अवैध लेनदेन को सुविधाजनक बनाने में उनकी संलिप्तता से उपजे हैं।</p>
<p>नोएडा में ₹4000 करोड़ के भूमि घोटाले में शामिल उत्तर प्रदेश कैडर के राकेश बहादुर को 2009 में निलंबित कर दिया गया था। इन आरोपों के बावजूद, राज्य सरकार में बदलाव के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया और नोएडा विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। </p>
<p><strong>छत्तीसगढ़ कैडर</strong> के राज्य के कृषि सचिव के रूप में, बाबूलाल अग्रवाल के पास आईटी छापे के दौरान ₹500 करोड़ से अधिक की संपत्ति पाई गई, जिसमें 446 बेनामी बैंक खातों में पैसा और हवाला लेनदेन के लिए इस्तेमाल की गई 16 शेल कंपनियों का स्वामित्व शामिल था। 2010 में उनके निलंबन के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने उनकी संपत्तियों को जब्त कर लिया था।</p>
<p><strong>हिमाचल प्रदेश कैडर</strong> के और मुख्यमंत्री के प्रधान निजी सचिव के रूप में कार्यरत सुभाष अहलूवालिया पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की जांच की गई थी। उन्हें और उनकी पत्नी को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा निलंबित कर दिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि बाद में विभागीय जांच में मंजूरी के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया। </p>
<p><strong>राजस्थान कैडर के </strong>वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और प्रमुख सचिव (खान) अशोक सिंघवी को राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने ₹2.55 करोड़ के भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किया था। यह रिश्वत कथित तौर पर बंद खदानों को फिर से खोलने की अनुमति देने के लिए थी, जिससे छापेमारी के दौरान ₹3.82 करोड़ की अवैध नकदी जब्त हुई।</p>
<p><strong>तमिलनाडु कैडर के</strong> धर्मपुरी के जिला कलेक्टर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान कथित भ्रष्टाचार के लिए सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय द्वारा एस मालारविज़ी की जांच की गई थी। उन पर एक आपराधिक साजिश में शामिल होने का आरोप है जिसके कारण सरकारी धन से ₹1.31 करोड़ का दुरुपयोग हुआ।</p>
<p>वापस चलते हैं सेबी में। सेबी के गठन के बाद बुच 10 वें अध्यक्ष हैं। सबसे पहले आये डॉ. एस ए दवे, जी वी रामकृष्णा, एसएस नाडकर्णी, डीआर मेहता, जीएन बाजपेयी, एम दामोदरन, सी बी भावे, यु के सिन्हा, अजय त्यागी और सुश्री माधबी पुरी बुच। पिछले कई अध्यक्षों के कालखंड में कई घोटाले हुए जो उन दिनों के अखबारों के प्रथम पृष्ठ से लेकर पत्रिकाओं के अंतिम पृष्ठ तक विराजमान रहे।  टीवी, रेडियो या इंटरनेट पर उनकी उपस्थिति तो थी ही। लगभग 18 महीने पहले हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह के भीतर स्टॉक हेरफेर के बारे में चिंता जताई थी। अब अमेरिका स्थित शॉर्ट सेलर ने नया दावा किया है कि इस घोटाले में भारत के शेयर बाजार नियामक सेबी का हाथ है। हिंडनबर्ग ने इस घोटाले को &#8220;अडानी मनी साइफ़ोनिंग स्कैंडल&#8221; नाम दिया है।</p>
<p>बहरहाल, यह आरोप लगाया गया है कि हिंडनबर्ग रिसर्च ने सेबी चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच पर जटिल व्यवस्थाओं के माध्यम से बरमूडा और मॉरीशस स्थित ऑफशोर फंड में हिस्सेदारी रखने का आरोप लगाया है। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि 2017 में माधबी पुरी बुच को पूर्णकालिक सेबी सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने से कुछ हफ्ते पहले, उनके पति ने मॉरीशस फंड प्रशासक से उन्हें &#8220;खातों को संचालित करने के लिए अधिकृत एकमात्र व्यक्ति&#8221; बनाने का अनुरोध किया था।<br />
यह भी कहा जाता है कि हिंडनबर्ग ने मॉरीशस में अडानी समूह के छिपे हुए ऑफशोर संस्थाओं के कथित नेटवर्क की गहन जांच नहीं करने के लिए सेबी की आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि अदानी के एक निदेशक ने इंडिया इंफोलाइन लिमिटेड (आईआईएफएल) के माध्यम से &#8220;आईपीई प्लस फंड&#8221; नामक एक छोटा ऑफशोर फंड स्थापित किया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर गौतम अदानी के भाई विनोद अदानी ने अदानी समूह से पैसा निकालने और भारतीय बाजारों में निवेश करने के लिए किया था।</p>
<p>अब तक प्रकाशित ख़बरों के अनुसार, हिंडनबर्ग ने यह भी दावा किया है कि सेबी चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच ने अडानी समूह की कथित मनी लॉन्ड्रिंग गतिविधियों से जुड़े ऑफशोर फंड में निवेश किया था। उन्होंने बताया कि माधाबी पुरी बुच के पास एगोरा पार्टनर्स नामक एक अपतटीय सिंगापुर परामर्श फर्म में 100% हिस्सेदारी थी, जब तक कि उन्होंने सेबी अध्यक्ष बनने के दो सप्ताह बाद ही इसे अपने पति को हस्तांतरित नहीं कर दिया।</p>
<p>हिंडनबर्ग ने दावा किया कि जब माधाबी पुरी बुच सेबी के अधिकारी थे, उनके पति को ब्लैकस्टोन के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था, भले ही उन्हें रियल एस्टेट या पूंजी बाजार में कोई पूर्व अनुभव नहीं था। अपने कार्यकाल के दौरान, ब्लैकस्टोन ने भारत में दो प्रमुख रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (आरईआईटी) को प्रायोजित किया, जिन्हें आईपीओ के लिए सेबी की मंजूरी मिली। हिंडनबर्ग ने यह भी नोट किया कि सेबी ने इस दौरान भारत के आरईआईटी नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए, जिससे संभावित रूप से ब्लैकस्टोन को फायदा हुआ।यह भी कहा जाता है कि, हिंडनबर्ग ने माधाबी पुरी बुच पर अपने पति के ब्लैकस्टोन से संबंध का खुलासा किए बिना उद्योग सम्मेलनों में आरईआईटी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जिसे परिसंपत्ति वर्ग से लाभ होने वाला था। हिंडनबर्ग ने बताया कि माधबी पुरी बुच के पास कथित तौर पर एक भारतीय कंसल्टिंग कंपनी, एगोरा एडवाइजरी का 99% स्वामित्व था, जिसने सेबी द्वारा बताए गए उनके वेतन की तुलना में कंसल्टिंग से काफी अधिक कमाई की। </p>
<p>बहरहाल, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अडानी के अपतटीय शेयरधारकों की फंडिंग की सेबी की जांच में &#8220;कोई नतीजा नहीं निकला।&#8221; हिंडनबर्ग ने सुझाव दिया कि सेबी को अपने अध्यक्ष की संलिप्तता को देखते हुए अपनी जांच शुरू करनी चाहिए थी।हालाँकि, माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच ने इन आरोपों का दृढ़ता से खंडन किया है। उन्होंने हिंडनबर्ग रिपोर्ट को &#8220;निराधार,&#8221; &#8220;झूठा,&#8221; और उनके &#8220;चरित्र हनन&#8221; का प्रयास बताया।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-day-ias-officers-become-united-no-politician-will-be-able-to-subtly-work-with-them">छोड़िये सेबी की श्रीमती माधाबी पुरी बुच को, जिस दिन IAS अधिकारी &#8216;एक जुट&#8217; हो जायेंगे, कोई भी राजनेता धूर्तता से उनसे काम नहीं निकाल सकता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अखिल भारतीय न्यायिक सेवा ही क्यों, अखिल भारतीय राजनीतिक सेवा के लिए भी तो परीक्षा हो सकती है, अपराधियों का राजनीतिकरण तो नहीं होगा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Aug 2024 12:42:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना पर्वत शिखर (नई दिल्ली) : पिछले दिनों भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित संविधान दिवस समारोह में बोलते कही थी देश में एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा हो सकती है जो प्रतिभाशाली युवाओं का चयन कर सकती है और उनकी प्रतिभा को निचले स्तर से उच्च स्तर तक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना पर्वत शिखर (नई दिल्ली) : पिछले दिनों भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित संविधान दिवस समारोह में बोलते कही थी देश में एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा हो सकती है जो प्रतिभाशाली युवाओं का चयन कर सकती है और उनकी प्रतिभा को निचले स्तर से उच्च स्तर तक पोषित और बढ़ावा दे सकती है। राष्ट्रपति महोदया यह भी कही कि बेंच की सेवा करने की इच्छा रखने वालों को देश भर से चुना जा सकता है ताकि प्रतिभाओं का एक बड़ा समूह बनाया जा सके। ऐसी प्रणाली कम प्रतिनिधित्व वाले सामाजिक समूहों को भी अवसर प्रदान कर सकती है। बहुत बेहतर विचार है सम्मानित राष्ट्रपति महोदया का। </strong></p>
<p>संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की स्थापना का प्रावधान है, जिसमें जिला न्यायाधीश से कमतर कोई पद शामिल नहीं होगा। संवैधानिक प्रावधान जिला न्यायाधीश स्तर पर AIJS के निर्माण को सक्षम बनाता है। सरकार के विचार में, समग्र न्याय वितरण प्रणाली को मजबूत करने के लिए एक उचित रूप से तैयार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा महत्वपूर्ण है। यह एक उचित अखिल भारतीय योग्यता चयन प्रणाली के माध्यम से चयनित उपयुक्त रूप से योग्य नई कानूनी प्रतिभाओं को शामिल करने का अवसर प्रदान करेगा और साथ ही समाज के हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व प्रदान करके सामाजिक समावेशन के मुद्दे को संबोधित करेगा।</p>
<p>राष्ट्रपति ने कहा कि आज हम संविधान में निहित मूल्यों का जश्न मनाते हैं और राष्ट्र के दैनिक जीवन में उन्हें बनाए रखने के लिए खुद को फिर से समर्पित करते हैं। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य वे सिद्धांत हैं जिन पर हम एक राष्ट्र के रूप में खुद को संचालित करने के लिए सहमत हुए हैं। इन मूल्यों ने हमें स्वतंत्रता हासिल करने में मदद की। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इनका प्रस्तावना में विशेष उल्लेख है और ये हमारे राष्ट्र निर्माण प्रयासों का मार्गदर्शन करना जारी रखते हैं। उनका कहना था कि न्याय का उद्देश्य सबसे बेहतर तरीके से तभी पूरा हो सकता है जब इसे सभी के लिए सुलभ बनाया जाए। इससे समानता भी मजबूत होती है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हर नागरिक न्याय पाने की स्थिति में है। आत्मनिरीक्षण करने पर हमें पता चलता है कि इस राह में कई बाधाएं हैं। लागत सबसे महत्वपूर्ण कारक है। भाषा जैसी अन्य बाधाएं भी हैं, जो अधिकांश नागरिकों की समझ से परे हैं।</p>
<p><strong>राष्ट्रपति ने कहा कि बेंच और बार में भारत की अनूठी विविधता का अधिक विविध प्रतिनिधित्व निश्चित रूप से न्याय के उद्देश्य को बेहतर ढंग से पूरा करने में मदद करता है। इस विविधीकरण प्रक्रिया को तेज करने का एक तरीका एक ऐसी प्रणाली का निर्माण हो सकता है जिसमें न्यायाधीशों को योग्यता आधारित, प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से विभिन्न पृष्ठभूमि से भर्ती किया जा सके। एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा हो सकती है जो प्रतिभाशाली युवाओं का चयन कर सकती है और उनकी प्रतिभा को निचले स्तर से उच्च स्तर तक पोषित और बढ़ावा दे सकती है। बेंच की सेवा करने की इच्छा रखने वालों को देश भर से चुना जा सकता है ताकि प्रतिभाओं का एक बड़ा समूह बनाया जा सके। ऐसी प्रणाली कम प्रतिनिधित्व वाले सामाजिक समूहों को भी अवसर प्रदान कर सकती है।</strong></p>
<p>राष्ट्रपति ने कहा कि न्याय तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए हमें समग्र प्रणाली को नागरिक-केंद्रित बनाने का प्रयास करना चाहिए। हमारी प्रणालियाँ समय की देन हैं; अधिक सटीक रूप से कहें तो उपनिवेशवाद की देन हैं। इसके अवशेषों को मिटाने का काम जारी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हम अधिक सचेत प्रयासों से सभी क्षेत्रों में उपनिवेशवाद के उन्मूलन के शेष भाग को गति दे सकते हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान दिवस मनाते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि संविधान आखिरकार एक लिखित दस्तावेज ही है। यह तभी जीवंत होता है और जीवंत बना रहता है जब इसकी विषय-वस्तु को व्यवहार में लाया जाता है। इसके लिए व्याख्या की आवश्यकता होती है। उन्होंने हमारे संस्थापक दस्तावेज की अंतिम व्याख्याकार की भूमिका को बखूबी निभाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस न्यायालय के न्यायाधीशों ने न्यायशास्त्र के मानकों को लगातार ऊंचा उठाया है। उनकी कानूनी सूझबूझ और विद्वता सर्वोत्कृष्ट रही है। हमारे संविधान की तरह हमारा सर्वोच्च न्यायालय भी कई अन्य देशों के लिए आदर्श रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि एक जीवंत न्यायपालिका के साथ, हमारे लोकतंत्र का स्वास्थ्य कभी भी चिंता का विषय नहीं होगा।</p>
<figure id="attachment_5647" aria-describedby="caption-attachment-5647" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688.jpg" alt="" width="2200" height="1467" class="size-full wp-image-5647" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688-1536x1024.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/H20230620133688-2048x1366.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5647" class="wp-caption-text">भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू और उप-राष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ अपनी पत्नी के साथ</figcaption></figure>
<p>अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के गठन के लिए एक व्यापक प्रस्ताव तैयार किया गया था और नवंबर, 2012 में सचिवों की समिति द्वारा इसे मंजूरी दी गई थी। देश में कुछ बेहतरीन प्रतिभाओं को आकर्षित करने के अलावा, यह न्यायपालिका में हाशिए के वर्गों और महिलाओं से सक्षम व्यक्तियों को शामिल करने में भी मदद कर सकता है। अप्रैल, 2013 में आयोजित मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में इस प्रस्ताव को एजेंडा आइटम के रूप में शामिल किया गया था और यह निर्णय लिया गया था कि इस मुद्दे पर आगे विचार-विमर्श और विचार-विमर्श की आवश्यकता है।​ प्रस्ताव पर राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की राय मांगी गई थी। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों के बीच मतभेद था। जहाँ कुछ राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय प्रस्ताव के पक्ष में थे, वहीं कुछ अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के पक्ष में नहीं थे, जबकि कुछ अन्य केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव में बदलाव चाहते थे।</p>
<p>जिला न्यायाधीशों के पदों पर भर्ती में सहायता करने तथा सभी स्तरों पर न्यायाधीशों/न्यायिक अधिकारियों की चयन प्रक्रिया की समीक्षा के लिए न्यायिक सेवा आयोग के गठन का मामला भी 3 और 4 अप्रैल, 2015 को आयोजित मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन के एजेंडे में शामिल किया गया था, जिसमें यह संकल्प लिया गया था कि जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए रिक्तियों को शीघ्रता से भरने के लिए मौजूदा प्रणाली के भीतर उपयुक्त तरीके विकसित करने के लिए संबंधित उच्च न्यायालयों को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए । उच्च न्यायालयों तथा राज्य सरकारों से प्राप्त विचारों के साथ अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का प्रस्ताव भी 5 अप्रैल, 2015 को आयोजित मुख्यमंत्रियों तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन के एजेंडे में शामिल किया गया था ।</p>
<p><strong>अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना के प्रस्ताव पर 16 जनवरी 2017 को विधि एवं न्याय मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में पात्रता, आयु, चयन मानदंड, योग्यता, आरक्षण आदि बिंदुओं पर फिर से चर्चा की गई। इस बैठक में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री, भारत के अटॉर्नी जनरल, भारत के सॉलिसिटर जनरल, न्याय विभाग, विधिक मामलों के विभाग और विधायी विभाग के सचिव उपस्थित थे। मार्च, 2017 में संसदीय परामर्शदात्री समिति और 22.02.2021 को अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी संसदीय समिति की बैठक में भी एआईजेएस की स्थापना पर विचार-विमर्श किया गया। प्रमुख हितधारकों के बीच मौजूदा मतभेद को देखते हुए, वर्तमान में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना के प्रस्ताव पर कोई आम सहमति नहीं है।</strong></p>
<p>क्या ऐसे विचार राजनीतिक क्षेत्र में लागू नहीं हो सकता है। पंचायत से संसद तक चुनाव पद्धति को समाप्त कर एक राज्यीय-राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का आयोजन किया जा सकता है?  पंचायत से लेकर विधान सभा, विधान परिषद के रास्ते लोकसभा और राज्यसभा में अपना स्थान प्राप्त करने के लिए अभ्यर्थियों को परीक्षा में बैठना और उत्तीर्ण करना आवश्यक और बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता ? जब भारत का निर्वाचन आयोग पर ही समय-समय पर &#8216;उंगलियां उठती&#8217; रही है। राज्यपालों या राष्ट्रपति की नियुक्ति राष्ट्रीय मेधावी परीक्षा के आधार पर नहीं हो सकता है? अगर ऐसा होता है तो पंचायत से लेकर विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा और राज्यसभा में सदस्यों की गुणवत्ता तो बढ़ेगी ही, इन संवैधानिक सभाओं में शिक्षित, विचारवान, संवेदनशील व्यक्तियों का जमघट होगा। इससे राष्ट्र का कल्याण तो होगा ही, समाज के प्रत्येक स्तर पर गुणवत्ता का स्तर भी बढ़ेगा।</p>
<p>चुनाव निगरानी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2024 में 8,337 उम्मीदवारों में से 20 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। लगभग 14 प्रतिशत ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं जिनमें बलात्कार, हत्या, हत्या के प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं। एडीआर ने इन आम चुनावों में 8,360 उम्मीदवारों में से 8,337 के स्व-शपथ पत्रों का विश्लेषण किया। इनमें से 1,333 उम्मीदवार राष्ट्रीय पार्टियों से, 532 उम्मीदवार राज्य पार्टियों से, 2,580 उम्मीदवार पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों से और 3,915 उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रहे हैं। एडीआर द्वारा विश्लेषण किए गए लोकसभा चुनाव 2024 में 8,337 उम्मीदवारों में से 1,643 (20 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। </p>
<p>एडीआर के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2024 में चुनाव लड़ने वाले लगभग 1,191 (14 प्रतिशत) उम्मीदवारों ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें बलात्कार, हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध आदि से संबंधित आरोप शामिल हैं। पार्टियों में भारतीय जनता पार्टी के 440 उम्मीदवारों में से 191 (43 प्रतिशत), कांग्रेस के 327 उम्मीदवारों में से 143 (44 प्रतिशत), बसपा के 487 उम्मीदवारों में से 63 (13 प्रतिशत), बसपा के 487 उम्मीदवारों में से 33 (63 प्रतिशत) एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि सीपीआई (एम) द्वारा मैदान में उतारे गए 52 उम्मीदवारों और 3,903 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 550 (14 प्रतिशत) ने अपने हलफनामों में अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं।</p>
<p><strong>यह तो लोकसभा की बात हुई। एडीआर के अनुसार भारत भर में राज्य विधानसभाओं में लगभग 44 प्रतिशत विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों के स्व-शपथ पत्रों की जांच की गई। यह डेटा विधायकों द्वारा उनके हालिया चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए हलफनामों से निकाला गया था। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और दो केंद्र शासित प्रदेशों में सेवारत 4,033 व्यक्तियों में से कुल 4,001 विधायकों को शामिल किया गया। एडीआर ने कहा कि विश्लेषण किए गए विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_5648" aria-describedby="caption-attachment-5648" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PR-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PR-1.jpg" alt="" width="1200" height="900" class="size-full wp-image-5648" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PR-1.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PR-1-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PR-1-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PR-1-768x576.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5648" class="wp-caption-text">भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू संसद की ओर</figcaption></figure>
<p>इतना ही नहीं, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2016-17 और 2021-22 के बीच 10,122.03 करोड़ रुपये के दान की घोषणा की, इसके बाद कांग्रेस (1,547.43 करोड़ रुपये) और तृणमूल कांग्रेस (823.30 करोड़ रुपये) का स्थान रहा। इसमें कहा गया है कि भाजपा द्वारा घोषित कुल चंदा अन्य सभी राष्ट्रीय दलों द्वारा घोषित कुल चंदे से तीन गुना से अधिक है। 4,614.53 करोड़ रुपये का दान, कुल का लगभग 28 प्रतिशत, कॉर्पोरेट क्षेत्र से प्राप्त हुआ और 2,634.74 करोड़ रुपये (16.03 प्रतिशत) अन्य स्रोतों से प्राप्त हुआ। एडीआर ने कहा कि 80 प्रतिशत से अधिक दान, लगभग 13,190.68 करोड़ रुपये, राष्ट्रीय दलों को और 3,246.95 करोड़ रुपये (19.75 प्रतिशत) क्षेत्रीय दलों को प्राप्त हुए।</p>
<p>काश !!! राष्ट्रपति महोदया कभी देश में विधायकों और सांसदों पर &#8216;उनके विधानपालिका और संसदीय क्षेत्रों के विकास के नाम पर होने वाले खर्चों की तुलना उक्त क्षेत्रों में हुए विकासों से करती।  लेकिन ऐसा नहीं होता। सरकारी आंकड़ों को यह जोड़-घटाव-गुणा करते हैं तो सं 2011-12 से लेकर आज तक देश के 4123 विधायकों और लोक सभा के 543 तथा राज्य सभा के 245 सांसदों को उनके कोष में 256100 करोड़ रुपयों का आवंटन किया गया है। राशियां पानी की तरह बहाया भी गया है। लेकिन शायद विकास का कार्य भी उसी पानी में बह गया। अगर ऐसा नहीं है तो आज भारत के विभिन्न राज्यों के सम्मानित विधायक और विभिन्न रेयान तथा केंद्र शासित प्रदेशों से दिल्ली में लोकसभा और राज्यसभा में बैठने वाले सांसद इतने अमीर कैसे होते? आज सैकड़ों विधायक और सांसद ऐसे हैं जिनके विरुद्ध भारत के विभिन्न न्यायालयों में मुकदमें चल रहे हैं, लंबित हैं। </p>
<p>लोक सभा के 543 और राज्य सभा के 245 सांसदों के अलावे देश से २८ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुछ 4123 विधायक हैं। मसलन: आंध्र प्रदेश &#8211; 175, अरुणाचल प्रदेश &#8211; 60, असम &#8211; 126, बिहार &#8211; 243, छत्तीसगढ़ &#8211; 90, दिल्ली &#8211; 70, गोवा &#8211; 40, केरल &#8211; 140, मध्यप्रदेश &#8211; 288, मणिपुर &#8211; 60, मेघालय &#8211; 60, मिजोरम &#8211; 40, नागालैंड &#8211; 60, ओडिशा &#8211; 147, पुडुचेरी &#8211; 30, त्रिपुरा &#8211; 60, उत्तर प्रदेश &#8211; 403, उत्तराखंड &#8211; 70, पश्चिम बंगाल &#8211; 294, गुजरात &#8211; 182, हरयाणा &#8211; 90, हिमाचल प्रदेश &#8211; 68, जम्मू और कश्मीर &#8211; 90, झारखण्ड &#8211; 81, कर्नाटक &#8211; 224, पंजाब &#8211; 117, राजस्थान &#8211; 200, सिक्किम &#8211; 32, तमिल नाडु &#8211; 234, तेलंगाना &#8211; 119 &#8211; आंकड़ों के अनुसार राज्यों के विधायकों को उनके विधानपालिका क्षेत्र के विकास हेतु प्रत्येक वर्ष 3 करोड़ रुपये (3 करोड़ x 5 वर्ष = 15 करोड़) और सांसदों को 5 करोड़ प्रतिवर्ष (5 करोड़/वर्ष x 5 वर्ष = 25 करोड़) दिए जाते हैं। जिससे वे अपने क्षेत्र का विकास कर सकें। लेकिन आज जो स्थिति हैं वह सर्वविदित हैं। </p>
<p><strong>वापस संविधान की बात करते हैं। आज़ादी के बाद और खासकर भारत का संविधान देश में लागू होने के बाद विगत 74 वर्षों में अब तक 103 संशोधन किये गए हैं संविधान में और इसके लिए 124 संविधान संशोधन विधेयक पारित किये गए।28 मार्च 1989 संविधान के 61 वें संशोधन कर मताधिकार के लिए उम्र 21 से घटाकर 18 किया गया, क्या जिस उद्देश्य से यह किया गया था, उस उद्येश्य को प्राप्त कर सका? 12 दिसंबर, 2002 को संविधान के 86 संसोधन के द्वारा चौदह वर्ष की आयु तक शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया।  एएसईआर के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 3-16 वर्ष की आयु के 50 से अधिक फीसदी बच्चे पढ़-लिक नहीं सकते।  इतना ही नहीं 5 वर्ष से 16 वर्ष की आयु वाले बच्चों को गणितीय ज्ञान नहीं है। आकंड़ा तो यह भी कहता है की देश में 2021 तक 287 मिलियन भारतीय पढ़-लिख नहीं सकते। </strong></p>
<p>आज तो कुछ और हो रहा है। विद्यालय के किताबों से संविधान का प्रस्तावना ही हटा दिया गया है। एनसीईआरटी की किताबों से संविधान की प्रस्तावना को हटा दिया गया है। छोटी क्लास से ही बच्चे संविधान और देश को मिली आजादी का महत्व इस प्रस्तावना के जरिए जानना शुरू करते हैं लेकिन ठीक उसी वर्ग को अब संविधान की प्रस्तावना पढ़ने से रोक दिया गया है। अब यह प्यारा शब्द &#8230;हम भारत के लोग&#8230; छोटी क्लास के बच्चे नहीं पढ़ सकेंगे। इस साल, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा 3 और कक्षा 6 की कई पाठ्यपुस्तकों से संविधान की प्रस्तावना को हटा दिया है। प्रस्तावना की जगह भाषा और पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं। प्रस्तावना पहले दोनों ग्रेडों की पुस्तकों के पहले पन्नों में छपती थी। प्रस्तावना कक्षा III की सभी पाठ्यपुस्तकों में नहीं है, हालाँकि यह कक्षा VI की केवल दो पुस्तकों में शामिल है: हिंदी पुस्तक मल्हार और विज्ञान पुस्तक क्यूरियोसिटी। हाल ही में लागू राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष कक्षा III और VI के लिए नई पाठ्यपुस्तकें जारी की गई हैं। </p>
<p>एनसीईआरटी के पाठ्यचर्या अध्ययन और विकास विभाग की प्रमुख प्रोफेसर रंजना अरोड़ा के अनुसार, इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है कि प्रस्तावना को एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया गया। प्रस्तावना, मौलिक कर्तव्य, मौलिक अधिकार और राष्ट्रगान भारतीय संविधान के उन पहलुओं में से हैं जिन पर एनसीईआरटी अब पहली बार उच्च प्राथमिकता दे रहा है। यह समझ कि केवल प्रस्तावना ही संविधान और संवैधानिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है, त्रुटिपूर्ण और संकीर्ण सोच है। बच्चों को प्रस्तावना के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों, मौलिक अधिकारों और राष्ट्रगान से संवैधानिक मूल्य क्यों नहीं प्राप्त होने चाहिए? हम समग्र विकास के लिए इन सभी को समान महत्व देते हैं।&#8221; एनसीईआरटी और अन्य स्कूल बोर्डों ने तो महात्मा गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर से जुड़े कई चैप्टर पिछले साल ही हटा दिए थे। मुगलों से जुड़े इतिहास के कई चैप्टर तमाम किताबों से हटा दिए गए हैं। अकबर को महान बताने वाले चैप्टर हटाए जा चुके हैं। यह सब एक साजिश के तहत हो रहा है। देश की आजादी से जुड़ा दक्षिणपंथियों का कोई इतिहास नहीं है, इसलिए यह सारी छटपटाहट दिखती है। जिनकी भूमिका आजादी की लड़ाई में रही है, वे उनका नामोनिशान मिटाने पर तुल गए हैं।</p>
<p>फिर वापस न्यायपालिका के तरफ चलते हैं। कभी सोचे हैं कि भारत में तक़रीबन 1,99,404.76 लोगों पर एक अदालत है। अदालतों में हम जिला अदालत से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक मानते हैं। भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों का न्यायिक भार एक से अधिक उच्च न्यायालयों पर है। देश में तक़रीबन 672 जिला न्यायालय हैं और एक सर्वोच्च न्यायालय। यानी 698 न्यायालय। देश की आवादी अगर हम 134 करोड़ माने तो इस संख्या के आधार पर और देश में उपलब्ध न्यायालयों की संख्या के आधार पर देश के कुल 199404.76 लोगों को न्यायिक न्याय दिलाने का भार एक न्यायालय पर है। देश में तक़रीबन 14 लाख &#8216;निबंधित&#8217; सम्मानित अधिवक्तागण हैं। आज दिल्ली में जिस कदर न्यायालय &#8216;सुरक्षा कवच&#8217; के अधीन है, अथवा कुछ ख़ास प्रदेश के मुख्यालयों में स्थित न्यायालयों को जो &#8216;सुरक्षा-कवच&#8217; के अधीन रखा गया हैं; को छोड़कर देश के अन्य न्यायालयों में उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था &#8211; एक शोध का विषय है, आप माने अथवा नहीं। </p>
<p>विगत दिनों रामप्रसाद बिस्मिल, अस्फाकुल्लाह खान, रोशन सिंह, प्रेम कृष्णा खन्ना, बनवारी लाल, हरगोविंद, इंद्रभूषण, जगदीश, बनारसी इत्यादि जैसे क्रांतिकारियों, जिन्होंने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए कुछ भी कर गुजरने को सज्ज थे, किये; उनके ही शहर शाहजहांपुर में एक 57-वर्षीय अधिवक्ता को &#8216;भूमि विवाद&#8217; में अदालत के प्रांगण में ढ़िशूम-ढ़िशूम कर दिया गया। अधिवक्ता मृत्यु को प्राप्त किये। मोहनदास करमचंद गाँधी के चम्पारण में, जहाँ से गाँधी भारत की आज़ादी और अंग्रेजी अफसरानों के अत्याचार के खिलाफ अपना आंदोलन प्रारम्भ किये थे, कुछ अपराधी किस्म के लोग अदालत परिसर में ही एक कर्मचारी को ठांय-ठांय कर मृत्यु को प्राप्त करा दिए। इसी तरह पंजाब के सोलान के एक अदालत में एक कैदी को, जब उसे एक मुकदमें की सुनवाई के लिए अदालत में पेश किया जा रहा था, ढ़िशूम-ढ़िशूम कर दिया और वह वहीँ अंतिम सांस लिया।आपको याद भी होगा कि विगत दिनों दिल्ली के रोहिणी अदालत में दो दिल्ली पुलिसकर्मी सहित एक अधिवक्ता पर बेतहाशा गोलियों की बारिश की गयी। तीन व्यक्ति वहीँ मृत्यु को प्राप्त किये। तीन महिला विधवा हो गई। तीनों के बच्चे अनाथ हो गए। जब घटना घटी, सम्मानित न्यायमूर्ति अदालत में उपस्थित थे। </p>
<p>भारत सरकार के एक आंकड़े के अनुसार इस वर्ष के मई महीने तक भारत के विभिन्न अदालतों में &#8211; सर्वोच्च न्यायालय से जिला न्यायालयों तक &#8211; कुल चार करोड़ सात लाख मुकदमें लाल रंग के वस्त्रों में बंधे हैं। इसमें तक़रीबन 87.4 फीसदी सबॉर्डिनेट कोर्ट्स में लंबित हैं। करीब 12.4 फीसदी उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। इसी तरह कुल 71,411 मुकदमें देश के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मुकदमों में कुल 56,365 सीविल मुकदमें हैं और 15,076 आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। इतना ही नहीं, करीब 10,491 लंबित मुकदमें &#8216;डिस्पोजल&#8217; के लिए दशकों के पड़े हैं। इसी तरह देश के सभी 25 उच्च न्यायालयों में कुल 59,55,907 मुकदमें, जिसमें 42,99,954 सिविल मुकदमे हैं और 16,55,953 आपराधिक मुकदमे हैं। कई मुकदमे ऐसे हैं जिसमें &#8220;आदेश&#8221; नहीं लिखा गया है और &#8220;लंबित&#8221; हैं। न्यायिक व्यवस्था से जब भी आवाज उठती है सरकार अपना पल्लू झाड़ने की कोशिश करती है। लेकिन कभी किसी भी न्यायालयों से सम्बंधित कार्यकारिणी के सम्मानित लोग, निजी तौर पर देश की न्यायिक व्यवस्था को किस कदर वादी-प्रतिवादी के बीच &#8216;फ्रेंडली&#8217; बनाया जाय, अपने-अपने कक्षों से बाहर निकलकर देश के न्यायालयों में आये, शायद नहीं। वैसी स्थिति में आखिर सम्मानित न्यायमूर्ति, सम्मानित न्यायाधीश, सम्मानित अधिवक्तागण क्या कर सकते हैं ? </p>
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		<title>राहुल को &#8216;जमानत&#8217; और सिसोदिया को &#8216;न्यायिक हिरासत&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Apr 2023 14:07:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सूरत (गुजरात) : लोकसभा की सदस्यता गंवाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने &#8216;मोदी उपनाम’ टिप्पणी को लेकर आपराधिक मानहानि मामले में अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए यहां सोमवार को सत्र अदालत में एक अपील दायर की और उन्हें जमानत दे दी गई। गांधी को ‘मोदी उपनाम’ के संदर्भ में उनकी 2019 की [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सूरत (गुजरात) : लोकसभा की सदस्यता गंवाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने &#8216;मोदी उपनाम’ टिप्पणी को लेकर आपराधिक मानहानि मामले में अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए यहां सोमवार को सत्र अदालत में एक अपील दायर की और उन्हें जमानत दे दी गई। गांधी को ‘मोदी उपनाम’ के संदर्भ में उनकी 2019 की टिप्पणी के लिए निचली अदालत ने दो साल की जेल की सजा सुनाई थी। अब 13 अप्रैल को अगली सुनवाई होगी। उधर, दिल्ली के कथित आबकारी घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के एक मामले में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की एक विशेष अदालत ने पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की न्यायिक हिरासत की अवधि सोमवार को 17 अप्रैल तक के लिए बढ़ा दी।</strong></p>
<p>निचली अदालत के फैसले को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सूरत की सत्र अदालत में चुनौती दी है। न्यायालय के आदेश के अनुसार, राहुल गांधी का अगली सुनवाई में मौजूद रहना जरूरी नहीं है। वैसे, अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि मामले में प्रतिवादियों से 10 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने को कहा है।  कांग्रेस नेता सुनवाई के लिए सूरत कोर्ट पहुंचे थे। </p>
<p>राहुल गांधी के साथ उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी उपस्थित थी। साथ ही कांग्रेस शासित तीन राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी उपस्थित थे। सूरत में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एचएच वर्मा की कोर्ट ने मोदी सरनेम को लेकर राहुल गांधी की ओर से की गई एक टिप्पणी के संबंध में दायर आपराधिक मानहानि के मुकदमे में उन्हें 23 मार्च को दोषी करार देते हुए दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी। </p>
<p>हालांकि, अदालत ने राहुल गांधी को उसी दिन जमानत भी दे दी थी और उनकी सजा के अमल पर 30 दिन के लिए रोक लगा दी थी, ताकि वह ऊपरी अदालत में अपील दाखिल कर सकें। ज्ञातव्य हो कि विगत 24 मार्च को सुबह 8.26 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रमजान की शुरुआत पर अपनी शुभकामनाएं देते अपने एक ट्वीट में कहा कि “रमजान की शुरुआत की शुभकामनाएं”, और कुछ घंटे बाद केरल की वायनाड संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सूरत की एक अदालत द्वारा वर्ष 2019 के मानहानि के एक मामले में सजा सुनाये जाने के मद्देनजर लोकसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराया गया और यह भी कहा कि उनकी अयोग्यता संबंधी आदेश 23 मार्च से प्रभावी होगा। </p>
<p>लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि उन्हें (राहुल गांधी) संविधान के अनुच्छेद 102 (1) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 धारा 8 के तहत अयोग्य घोषित किया गया है। विगत 23 मार्च को देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का शहादत दिवस मनाता है। मानहानि के मामले में सूरत की अदालत ने कल राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई थी। राहुल गांधी पर 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरनेम को लेकर विवादित टिप्पणी का आरोप लगा था। राहुल के खिलाफ गुजरात भाजपा के विधायक पूर्णेश मोदी ने मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। </p>
<p>लोकसभा सचिवालय की तरफ से इस बारे में सात पंक्तियों की एक अधिसूचना जारी की गई है। इसमें कहा गया है कि सूरत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत की तरफ से दोषी करार दिए जाने के बाद केरल के वायनाड से लोकसभा सदस्य राहुल गांधी को लोकसभा की सदस्यता से अयोग्य किया जाता है। यह अयोग्यता उन पर दोष साबित होने के दिन यानी 23 मार्च 2023 से लागू रहेगी। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (e) के प्रावधानों और जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा आठ के तहत लिया गया है। </p>
<p>लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह के नाम से जारी हुई इस अधिसूचना की एक-एक प्रति राहुल गांधी, राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री सचिवालय, राज्यसभा सचिवालय, चुनाव आयोग, केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय और विभाग, केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, लाइजन अधिकारी, संपदा निदेशालय, संसद भवन एनेक्सी, एनडीएमसी सचिव, दूरसंचार लाइजन अधिकारी और लोकसभा सचिवालय के सभी अफसरों और शाखाओं को भेजी भी प्रेषित की गई है।</p>
<p>अधिसूचना में कहा गया है कि ‘‘सूरत की एक अदालत द्वारा मानहानि के एक मामले में सजा सुनाये जाने के मद्देनजर केरल की वायनाड संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे राहुल गांधी को 23 मार्च 2023 से अयोग्य ठहराया जाता है।’’ उल्लेखनीय है कि सूरत की एक अदालत ने ‘‘मोदी उपनाम’’ संबंधी टिप्पणी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ 2019 में दर्ज आपराधिक मानहानि के एक मामले में उन्हें बृहस्पतिवार को दो साल कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने, हालांकि गांधी को जमानत दे दी तथा उनकी सजा के अमल पर 30 दिनों तक के लिए रोक लगा दी, ताकि कांग्रेस नेता फैसले को चुनौती दे सकें। </p>
<p>जनप्रतिनिधि कानून के मुताबिक किसी भी सांसद या विधायक को अगर किसी मामले में दो या दो साल से ज्यादा की सजा सुनाई जाती है तो उनकी सदस्यता रद्द हो जाएगी। साथ ही वह छह साल तक चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य हो जाते हैं। ऐसे में अगर राहुल गांधी को ऊपरी अदालत से राहत नहीं मिली तो राहुल गांधी 2024 का लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे, जो कि उनके लिए बड़ा झटका होगा। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि 2019 लोकसभा चुनाव के लिए कर्नाटक के कोलार में एक रैली में राहुल गांधी ने कहा था, कैसे सभी चोरों का उपनाम मोदी है? इसी को लेकर भाजपा विधायक व गुजरात के पूर्व मंत्री पूर्णेश मोदी ने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कराया था। उनका आरोप था कि राहुल ने अपनी इस टिप्पणी से समूचे मोदी समुदाय का मान घटाया है। वायनाड से लोकसभा सदस्य राहुल ने 2019 के आम चुनाव से पहले कर्नाटक के कोलार में आयोजित जनसभा में इस मामले से जुड़ी टिप्पणी की थी। </p>
<p><strong>उधर, दिल्ली के कथित आबकारी घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के एक मामले में यहां की एक विशेष अदालत ने पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की न्यायिक हिरासत की अवधि सोमवार को 17 अप्रैल तक के लिए बढ़ा दी। विशेष न्यायाधीश एम.के. नागपाल ने अदालत में सिसोदिया को पेश किये जाने के बाद उनकी हिरासत की अवधि 14 दिनों के लिए बढ़ा दी। सिसोदिया की न्यायिक हिरासत सोमवार को समाप्त होने वाली थी।</strong></p>
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