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	<title>jp Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>जिस कंधे का इस्तेमाल कर बिहार के नेता ऊपर बढ़े, ऊपर चढ़े, समयांतराल अपने राजनीतिक गुरु, उनके कंधे और सिद्धांतों को ही चढ़ावा चढ़ा दिया (भाग-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-leaders-of-bihar-used-those-shoulders-to-move-ahead-sacrificed-their-political-gurus-principles</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2025 13:17:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना :  जयप्रकाश नारायण के सन 1974 आंदोलन के गर्भ से जन्म लिए आज के नेताओं की मानसिकता की बात छोड़िये, प्रदेश के लोगों की मानसिकता को अगर आंकना है तो एक बार कदमकुआं स्थित उनके पुस्तैनी घर की तंग गलियों में घूमकर देखिये। आज जयप्रकाश प्रकाश नारायण सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका घर प्रदेश तथाकथित नेताओं की रुग्ण मानसिकता, धनाढ्यों के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-leaders-of-bihar-used-those-shoulders-to-move-ahead-sacrificed-their-political-gurus-principles">जिस कंधे का इस्तेमाल कर बिहार के नेता ऊपर बढ़े, ऊपर चढ़े, समयांतराल अपने राजनीतिक गुरु, उनके कंधे और सिद्धांतों को ही चढ़ावा चढ़ा दिया (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना :  जयप्रकाश नारायण के सन 1974 आंदोलन के गर्भ से जन्म लिए आज के नेताओं की मानसिकता की बात छोड़िये, प्रदेश के लोगों की मानसिकता को अगर आंकना है तो एक बार कदमकुआं स्थित उनके पुस्तैनी घर की तंग गलियों में घूमकर देखिये। आज जयप्रकाश प्रकाश नारायण सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका घर प्रदेश तथाकथित नेताओं की रुग्ण मानसिकता, धनाढ्यों के गगनचुम्बी इमारतों के सामने बौना हो गया है। देखिये जरूर। </strong></p>
<blockquote><p>कदमकुआं स्थित यह इलाका, जहाँ बिहार विधानसभा और बिहार सरकार के मंत्रालय में तीन-तीन नेताओं (उप-मुख्यमंत्री सहित) का आवास हो, जयप्रकाश नारायण के घर तक जाने वाली सड़क जगत नारायण लाल रोड और उससे लगी गलियां अपने भाग्य पर विलख रहा है। पचास वर्ष पहले, जहाँ देश-विदेश के चुनिंदे नेता, पूर्व-प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री तक गली में प्रवेश से पूर्व वहां की मिट्टी को नमन करते थे, आज उन सड़कों पर, उन गलियों में चलना अपनी तौहीन समझते हैं। सब समय है। </p></blockquote>
<p>मानसिकता का दृष्टान्त तो उसी दिन ज्ञात हो गया था जिस दिन जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को गंगा तट पर अग्नि को सुपुर्द किया जा रहा था। उस दिन कुछ काल पूर्व तक जब उनके पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था, पटना के अशोक राजपथ पर करीब पांच लाख से अधिक लोग अश्रुपूरित निगाहों के साथ पीछे-पीछे चल रहे थे। श्रीमती इंदिरा गांधी जिन्हे सत्ता से पदच्युत करने के लिए जय प्रकाश नारायण ने शपथ लिए थे, उन्हें कुर्सी से हटाकर जनता की सरकार (जनता पार्टी) दिल्ली के सिंहासन पर बैठाये थे, श्रीमती गांधी उनके पार्थिव शरीर के साथ चल रही थी। कौन थे, कौन नहीं थे की गणना असंभव था। शायद उस दिन के बाद आज तक पटना कभी किसी हार-मांस वाले पार्थिव शरीर की यात्रा के साथ इतने लोगों को नहीं देखा है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1.jpg" alt="" width="2048" height="1365" class="aligncenter size-full wp-image-6525" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-1-1536x1024.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>लेकिन, उस यात्रा के कुछ ही पल बाद गंगा के किनारे क्या हुआ यह उस कालखंड के, उक्त अवसर पर उपस्थित लोग चश्मदीद गवाह होंगे। घाट पर बिहार के नेताओं की बात छोड़िये, केंद्र के नेताओं के साथ-साथ देश विदेश के अनेकानेक गणमान्य व्यक्ति, पत्रकार समूह, छायाकार, विद्वान, विदुषी, लेखक सभी घाट पर उपस्थित थे। श्रीमती इंदिरा गांधी प्रवेश के साथ बाएं हाथ अन्य नेताओं के साथ थीं। मुखाग्नि की तैयारी हो रही थी। लाखों की भीड़ में चिता से कुछ दूर दाहिने कोई व्यक्ति अपने बाएं हाथ के तलहत्थी पर खैनी मल रहा था। इधर सम्पूर्ण राष्ट्र शोकाकुल था। इंदिरा गांधी भी अश्रुपूरित थी क्योंकि अब उन्हें &#8216;इंदू&#8217; कहकर सम्बोधित करने वाला कोई नहीं था। अपने प्रिय नेता के अंतिम यात्रा के लिए अग्नि सज्ज थी। </p>
<p><strong>सन 1979 में बिहार का शैक्षिक दर भी 30 फीसदी पार नहीं किया था। आंकड़े यही कहे थे कि 29.76 फीसदी शैक्षिक दर था जिसमें पुरुषों की साक्षरता 36.00% और महिलाओं की 21. 70 % थी। पचास वर्ष बाद आज प्रदेश की सरकार साक्षरता दर के ग्राफ को भले 61.8 फीसदी, जिसमें पुरुषों की साक्षरता 71.2 % और महिलाओं की साक्षरता 51.5 फीसदी (राष्ट्रीय साक्षरता दर 74.04% से भी नीचे) दिखाए, कदमकुआं के जगत नारायण लाल रोड की गलियों में रहने वाले जयप्रकाश नारायण के घरों के दीवार, ईंट, पत्थर गवाह है कि आज भी हम उनके लिए शिक्षित नहीं हुए हैं। </strong></p>
<blockquote><p>उस दिन भी नहीं थे। उस दिन जैसे ही मुखाग्नि दी जा रही थी, दूर लोग अपने तलहथी पर खैनी ठोक रहे थे। उपस्थित लोग उसे ताली समझकर पूरे आसमान को ताली की गड़गड़ाहट में बदल दिया। इंदिरा गांधी के साथ-साथ अपने-अपने राजनीतिक मनमुटाव को छोड़कर, सैकड़ों नहीं, हज़ारों लोग उन तालियों की गड़गड़ाहट को रोकने का असफल प्रयास कर रहे थे। उधर जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को अग्नि अपने में विलय कर रही थी, उधर लोग ताली बजने के अवसर को भी आंकने में विफल हो रहे थे। आज जब जयप्रकाश नारायण के घर को देखता हूँ तो नेताओं की मृत मानसिकता भी दिखाई देती है उसी ताली की गड़गड़ाहट की तरह। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3.jpg" alt="" width="2048" height="1365" class="aligncenter size-full wp-image-6526" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/1-3-1536x1024.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>तत्कालीन विपक्षीय और असंतुष्ट राजनेताओं की नजरों में  सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक इंदिरा गांधी का देश की राजनीतिक-प्रशासनिक ब्रह्मांड पर एकाधिकार स्थापित हो चुका था।  उसी कालखंड में रेडिकल ह्यूमैनिस्ट में एक लेख प्रकाशित हुआ था &#8211; गांधी एक एकाधिकारवादी &#8211; और उस लेख के लेखक थे जयप्रकाश नारायण। उस लेख को इंडियन एक्सप्रेस भी प्रकाशित किया था । एक्सप्रेस में प्रकाशन के साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठी श्रीमती इंदिरा गांधी की भृकुटी तन गई थी। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण उन दिनों समाचार भारती के अध्यक्ष थे। और किसी कार्यवश श्रीमती गांधी से मिलना आवश्यक हो गया था। परंतु श्रीमती गांधी रेडिकल ह्यूमैनिस्ट और एक्सप्रेस की कहानी के कारण जयप्रकाश नारायण से नहीं मिली। जब उनके टेबल पर मिलने के लिए निवेदन संबधी कागज आए, श्रीमती गांधी दो टूक में कहबा दी कि इस कार्य के लिए वे आई.के. गुजराल से मिल लें, मुझसे मिलने की जरूरत नहीं है। अलबत्ता वे जयप्रकाश नारायण को तिरस्कृत कर रही थी। नारायण गुजराल से बिना मिले पटना आ गए। </p>
<p>इस बीच नई दिल्ली के राजपथ, संसद मार्ग से लेकर पटना के अशोक राजपथ-मोइनुल हक पथ के रास्ते सचिवालय तक बदलाव वाली राजनीतिक गर्मी चढ़ने लगी थी। पटना की सड़कों पर आंदोलनकारियों में कुछ सचेत लोग जय प्रकाश नारायण से मिले और उन्हें आंदोलन को नेतृत्व देने के लिए निवेदन किए। बहुत बातें हुईं, लेकिन अन्य बातों में एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हम नेतृत्व करेंगे बसरते आंदोलन शांतिपूर्ण हो, हिंसा का कोई स्थान नहीं। तत्कालीन छात्रों के आंदोलन को नेतृत्व मिला। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6527" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/raghu-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>उस दिन साल 1974 का अप्रैल माह का 8 तारीख था। इंदुप्रभा जी, श्रीमती वीणा रानी श्रीवास्तव, रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, राधारमण जी और जयप्रकाश नारायण की अगुआई में एक मौन जुलूस निकला गया था। एक खुली जीप पर जयप्रकाश नारायण खड़े थे। दाहिने-बाएं दिनकर, रेणु, श्रीमती श्रीवास्तव और जेपी को ह्रदय से चाहने वाले उनके अनुयायी-महिला-पुरुष- जीप के पीछे-पीछे कांग्रेस व्यवस्था के प्रति अपना विरोध दिखाते, अपने-अपने मुख पर काला पट्टी बांधे चले जा रहे थे। </strong></p>
<p>डाक बांग्ला चौराहे से कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद जुलुस जब इमाम पैलेस से आगे बढ़ा, फ़्रेज़र रोड स्थित बन्दर बगीचा के नुक्कड़ पर स्थित <strong>प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया</strong> के तत्कालीन राज्य प्रमुख <strong>एस.के. घोष यानी मोंटू दा</strong> बाहर झरोखे पर खड़े दिखे। मोंटू दा समाचार के दुनिया में एक जाना-पहचाना चेहरा थे। उनके शब्द बहुत ही तीखी, लेकिन सत्यता के उत्कर्ष पर होता था। मोंटू डा को देखते ही उनके सम्मानार्थ जयप्रकाश नारायण (उम्र में अधिक होने के बाद भी) अपने दोनों हाथों को एक साथ मिलाकर आसमान की ओर देखते सम्मानपूर्ण प्रणाम किया। अब तक झरोखे पर दो-चार लोग और आ गए थे। यह जुलुस आगे <strong>आर्यावर्त-इण्डियन नेशन</strong> अख़बार के दफ्तर के सामने जैसे पहुंचा, सभी कर्मचारी, पत्रकार, संपादक उनके सम्मानार्थ सड़क पर खड़े थे। सभी जयप्रकाश नारायण और जीप पर उपस्थित गणमान्यों को प्रणाम का जबाब प्रणाम से दिए। कुछ क्षण बाद पीटीआई तीन-टेक में उस शांति जुलूस का समाचार प्रसारित किया जो भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने तक पहुंचा। </p>
<figure id="attachment_6528" aria-describedby="caption-attachment-6528" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu.jpg" alt="" width="2048" height="1380" class="size-full wp-image-6528" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-300x202.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-1024x690.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-768x518.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rahu-1536x1035.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6528" class="wp-caption-text">रघु राय (बीच में), अशोक कर्ण (बाएं) और एक पत्रकार दाहिने</figcaption></figure>
<p>पटना से प्रकाशित <strong>सर्चलाइट जो बाद में हिंदुस्तान टाइम्स बना, के तत्कालीन छायाकार अशोक कर्ण</strong> उन दिनों पुनाईचक मोहल्ला में रहते थे। पटना विश्वविद्यालय के बी.एन. कालेज के छात्र थे, लेकिन कैमरा से दोस्ती हो गयी थी उनकी। जय प्रकाश नारायण की क्रांति अपने उत्कर्ष पर थी। उस क्रांति का चश्मदीद गवाह वे खुद भी थे और उनका कैमरा तो था ही। जय प्रकाश नारायण के घर जाना, वहां उनसे मिलने आने वाले देश-विदेश के लोगों, स्थानीय नेताओं को अपने कैमरे में कैद करना नित्य का क्रियाकलाप था। दशकों बाद वे एक बार फिर अपने पटना की यात्रा के दौरान जन नायक स्वर्गीय जय प्रकाश नारायण जी के आवास पर दोबारा पहुंचे। </p>
<p>कर्ण कहते हैं कि &#8220;कदमकुआं क्षेत्र में स्थित इस ऐतिहासिक स्थान पर मेरी पिछली यात्रा को काफी समय बीत गया था। एक मीडिया पेशेवर के रूप में, जब भी अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसे प्रमुख केंद्रीय नेता जेपी को श्रद्धांजलि देने आते थे, तब मैं इस आवास पर रिपोर्टिंग करता था। अनेक बार यहां आने के कारण, मैंने इस आवास को 1970 के दशक के छात्र आंदोलन का केंद्र बनते देखा। जहां जेपी जी रहते थे और जहां 8 अक्टूबर 1979 को उनका निधन हुआ, वहां खड़े होकर मैंने देखा कि यह स्थान बहुत अच्छी तरह से संरक्षित है। उनकी निजी वस्तुएं सम्मानपूर्वक सजाई गई थी और पूरा घर साफ-सुथरा और सुव्यवस्थित था।&#8221;</p>
<p><strong>कर्ण आगे कहते हैं: &#8220;जो बात सबसे ज़्यादा खली, वह थी यहां आने वालों की कमी। केयरटेकर से बातचीत करने पर पता चला कि यह स्मारक बहुत कम लोगों द्वारा देखा जाता है। आज की युवा पीढ़ी जेपी और उनके कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन से उतनी परिचित नहीं है। दुख की बात है कि उस आंदोलन से उभरे कुछ नेता, जो आज उच्च पदों पर हैं, इस ऐतिहासिक स्थल पर एक साधारण सी यात्रा करने की ज़रूरत भी महसूस नहीं करते। यहां तक कि जेपी की जयंती या पुण्यतिथि पर भी यह स्थान अक्सर सुनसान रहता है। आज जेपी का घर मोहल्ले में बने अन्य मकानों के सामने बौना हो गया है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था।&#8221;</strong></p>
<p>कर्ण का कहना है कि &#8220;आज के शांत और सीमित आयोजन उस दौर से एकदम विपरीत हैं जब लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और सुशील मोदी जैसे नेता यहां आकर श्रद्धांजलि अर्पित करते थे। अब राजनीतिक दल एक-दूसरे पर जेपी की विरासत को भुलाने का आरोप लगाते हैं, पर अपने-अपने कार्यालयों में छोटे-मोटे आयोजन करके कर्तव्य पूरा मान लेते हैं। पटना हवाई अड्डे का नाम जेपी के नाम पर है, और कंकड़बाग में एक बड़ा अस्पताल भी उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। हालांकि, महिलाओं के लिए स्थापित महिला चरखा समिति और उससे जुड़ी पुस्तकालय में भी अब उपस्थिति कम हो गई है। जो दुखद है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira.jpg" alt="" width="2042" height="1129" class="aligncenter size-full wp-image-6529" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira.jpg 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-300x166.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-1024x566.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-768x425.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-1536x849.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Indira-696x385.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि राष्ट्र का ध्यान बॉम्बे के जसलोक अस्पताल के एक कमरे पर केंद्रित था, जहाँ जनता पार्टी के संरक्षक संत जयप्रकाश नारायण जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। एक तरह से, राष्ट्र ने उन्हें उनके सबसे गंभीर संकट के समय में फिर से खोजा। इससे पहले, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पदभार ग्रहण करने के बाद से सरकार की सबसे असंवेदनशील गलती की, जब जेपी की &#8220;मृत्यु&#8221; की खबर लोकसभा में घोषित की गई।</p>
<p>ऐतिहासिक फोटो-पत्रकार/संपादक’ <strong>रघु राय</strong> जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के चश्मदीद गवाह थे। जिस दिन जय प्रकाश नारायण पर पटना की सड़कों पर लाठी प्रहार हुआ था, रघु राय उनके बगल में, उसी जीप पर सवार थे चालक के पास लटके हुए। जेपी पर लाठी प्रहार की वह तस्वीर दो दिन बाद दिल्ली से प्रकाशित स्टेट्समैन अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी। उधर संसद अपने सत्र में था। उस तस्वीर को देखकर एक और जहाँ सत्ता पक्ष के लोग लाठी प्रहार को गलत कह रहे थे, सत्ता से पदच्युत करने वाले सत्ताधारियों की तीव्र आलोचना कर रहे थे। रघु राय की वह तस्वीर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में भूचाल ला दी थी उन दिनों। पटना से लेकर भारत के प्रत्येक राज्यों में, दिल्ली में रघु राय ‘राय साहब’ हो गए। </p>
<p><strong>रघु राय</strong> कहते हैं: “उस दिन 4 नवम्बर था। मैं दिल्ली से पटना पहुँच गया था। सुबह-सवेरे तैयार होकर, कैमरे उठाकर मैं जयप्रकाश नारायण के कदमकुआं स्थित घर पर पहुँचने निकल गया था। घर पर बहुत उथल-पुथल नहीं था। शांति थी। एक जीप सामने लगी थी। कुछ तीन-चार छात्र वाहिनी के युवक-युवतियां उपस्थित थी। लोगों की उपस्थिति नहीं देखकर किसी ने जेपी साहब को सलाह दिया कि या तो यात्रा रोक देते हैं अथवा कुछ समय और प्रतीक्षा करते हैं। इन शब्दों को सुनकर जेपी साहब कहते हैं ‘ना’ ‘ना’, हम जो भी हैं निकलेंगे और निकल लिए। “जब चलने की बात आई तब मैं जेपी साहब से कहा कि क्या मैं चालक के तरफ रह सकता हूँ? मैं किसी तरह कुछ स्थान बनाकर चालक की ओर खड़ा हो गया। तस्वीर लेने के लिए हमें कुछ स्थान भी चाहिए था और सामने जेपी साहब भी। हम लोग जब निकले अधिकाँश लोगों के घरों के द्वार बंद थे। कुछ चलने पर एक-दो- मंजिले मकान की खिड़कियों पर खड़े दो-चार लोग दिखे जो जेपी साहब को नमन कर रहे थे, हौसला बढ़ा रहे थे। जिंदाबाद – जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। यह देखकर हम सबों का मनोबल बढ़ा। मैं और मेरा कैमरा अपना काम कर रहा था – क्लिक-क्लिक।” </p>
<p>राय साहब कहते हैं: “जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए दो, चार, दस, बीस लोग साथ होते गए। सड़क पर स्थानीय प्रशासन के तरफ से बहुत अधिक मात्रा में सुरक्षा की व्यवस्था थी। स्थानीय पुलिस (पटना पुलिस, बिहार पुलिस) के अलावे केंद्रीय रिजर्व पुलिस के बल तैनात थे। लेकिन टुकड़ियों में लोगों का हम लोगों के साथ मिलने के कारण जन सैलाब क्रमशः बढ़ रहा था। जैसे-जैसे घडी की सुई आगे बढ़ रही थी, जेपी साहब के प्रति लोगों का विस्वास भी बढ़ रहा था। उनके घर से आगे निकलने पर धीरे-धीरे उनके जीप के पीछे, आगे, दाहिने-बाएं सैकड़ों, हज़ारों की संख्या में लोग चलने लगे थे। रास्ते में विशाल जन सैलाब हो गया था।”  </p>
<p>“कई घंटे बाद हम सभी आयकर चौराहे के पास पहुंचे थे। वहां की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही मजबूत थी। एक तरफ जनसैलाब था तो दूसरे तरफ वर्दी-टोपी धारी पुलिस बल। अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ होने वाला है। मैं तो जेपी के साथ था, इसलिए यह देख नहीं पाया कि और कितने छायाकार है। तभी अचानक पहले अश्रु गैस के गोले चले और फिर लाठी प्रहार। उस भगदड़ में कैमरा और स्वयं को सँभालते, सुरक्षित रखते क्लिक-क्लिक करता रहा। </p>
<figure id="attachment_6530" aria-describedby="caption-attachment-6530" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor.jpg" alt="" width="2042" height="1129" class="size-full wp-image-6530" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor.jpg 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-300x166.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-1024x566.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-768x425.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-1536x849.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Surendra-Kishor-696x385.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6530" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री सुरेंद्र किशोर</figcaption></figure>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री सुरेंद्र किशोर</strong> कहते हैं कि &#8220;जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों को समझना और उसे पालन करना आज के नेताओं के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। जयप्रकाश नारायण के आदर्शों को समझना आज के नातों के वंश में नहीं है। आज उनकी नजरों में सिर्फ और सिर्फ जातिगत सामाजिक समीकरण, जो अंततः मतों में बदलता है, महत्वपूर्ण है।&#8221;</p>
<p><strong>सरयू राय, लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील मोदी, राम बहादुर राय, वशिष्ठ नारायण सिंह, विक्रम सिंह, राम जतन सिन्हा, अशोक प्रियदर्शी और न जाने कितने तत्कालीन छात्र नेताओं ने जय प्रकाश के कन्धों का इस्तेमाल किया गद्दी तक पहुँचने के लिए। लेकिन जो उस कालखंड के गवाह है वे शायद यह भी जानते होंगे की इन छात्र नेताओं का जेपी के साथ सानिग्ध 1974 के बाद हुई। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जेपी की मृत्यु से पहले जेपी के नाम और गरिमा को इन नेताओं ने जितना शोषण किया, शायद कोई नहीं किया होगा। इन नेताओं ने जेपी के आदर्श सिद्धांतों, विचारों को कभी ग्रहण नहीं किया बल्कि सत्ता में बैठने के लिए साम-दंड-भेद सभी हथकंडों का इस्तेमाल किया। जेपी के सिद्धांतों को अमल करना या उस पर चलना इन नेताओं के कूबत में नहीं है। जिस आंदोलन के मूल्य को लेकर जेपी चले थे, इन नेताओं की नज़रों में उसका मूल्य बदल गया। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद कदमकुआं स्थित जेपी के घर अथवा उस मंदिर का जहाँ दूसरी स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद पड़ी थी, आज यह हश्र नहीं होता। आज कदमकुआं की उस तंग गलियों में जेपी का घर गम हो गया है। बड़े-बड़े महल, अट्टालिकाएं चतुरदिक बमन गयी है। </strong></p>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र</strong> कहते हैं: &#8220;यही अंतर है कांग्रेस की सोच में और गैर-कांग्रेसी नेताओं में। हम देश की बात नहीं करेंगे अभी, लेकिन पटना में रहने वाले जान उन छात्र नेताओं को एक नजर याद करते हैं तो पाते हैं कि वे सभी नेता जिन्हें पैजामा का नारा बाँधने का ज्ञान नहीं था जयप्रकाश नारायण द्वारा 1974 आंदोलन का नेतृत्व सँभालने, आज आकाश में कहाँ से कहाँ उड़ रहे हैं, जबकि जेपी का वह ऐतिहासिक घर, परिसर रसातल में चला गया है, उपेक्षित पड़ा है। चाहिए तो यह कि उस सम्पूर्ण परिसर का इतना विकास किया जाता कि विश्व के लोग यहाँ आते। उस संत के विचारों से अवगत होते। </p>
<figure id="attachment_6531" aria-describedby="caption-attachment-6531" style="width: 1441px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan.jpg" alt="" width="1441" height="1126" class="size-full wp-image-6531" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan.jpg 1441w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan-300x234.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan-1024x800.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Gyaan-768x600.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1441px) 100vw, 1441px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6531" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र</figcaption></figure>
<p>ज्ञानवर्धन आगे कहते हैं: कुंभरार के विधायक अरुण कुमार सिंह का घर इसी कदमकुआं इलाके के लोहानीपुर में है। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के पुत्र नितिन नवीन आज नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में मंत्री हैं। वे बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। प्रदेश के डिप्टी मुख्यमंत्री विजय सिन्हा का विशालकाय भवन इसी इलाके में हैं। लेकिन सवाल यह ही कि ऊँचे-ऊँचे,  बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले चमचमाता मकानों में रहने का अर्थ तो यह नहीं है कि मानसिकता भी बेहतर हो, सोच भी बेहतर हो जो जेपी जैसे संत का सम्मान कर सके।  इतिहास को जीवित रखकर अगली पीढ़ियों को सौंपने का काम कर सके। लालू यादव, नीतीश कुमार या ने लोगों की बात करना ही व्यर्थ है। ये सभी नेता जन्मदिन और मृत्यु दिवस पर माल्यार्पण करने के लिए ही अवतरित हुए हैं। आपको दृष्टान्त देखना है तो इन मंत्रियों के आवास के सामने से निकलने वाली सड़कें जो जेपी के घर तक जाती है &#8211; दुर्दशा देख लें।&#8221;</p>
<p>विगत वर्ष जेपी के जन्म स्थान सिताब दियारा गए थे <strong>केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह </strong>जेपी की भूमिका पर वे अपने भाषण में कहे 1973 में गुजरात में तत्कालीन सरकार ने सार्वजनिक रूप से धन उगाही का काम सरकार को दे दिया, जिससे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार शुरू हो गया। इसके खिलाफ श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गुजरात के छात्रों ने एक सशक्त आंदोलन किया और गुजरात में सरकार बदल दी। इसके बाद बिहार में भी आंदोलन हुआ। आपातकाल की घोषणा कर दी गई और जयप्रकाश नारायण के साथ-साथ विपक्ष के कई नेताओं को जेल में डाल दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल लगाने वाली भ्रष्ट और अन्यायी सरकार के खिलाफ पूरे विपक्ष को एकजुट करके देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। जे.पी. ने सत्ता से बाहर रहकर देश के सामने परिवर्तन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।</p>
<p><strong>बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और जाने मने राजनीतिक विशेषज्ञ लव कुमार मिश्र </strong>कहते हैं &#8216;आज बिहार के सिंहासन से लेकर बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले दिल्ली के संसद और मंत्रालय में बैठने वाले सैकड़े नब्बे फीसदी नेता जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के उपज है। अगर जेपी अपना कन्धा नहीं दिया होता तो शायद उनकी वह पहचान नहीं हो पाती जो आज स्वयं को कह रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस कंधे का इस्तेमाल कर वे ऊपर बढ़ें ऊपर चढ़ें अपने राजनीतिक गुरु को ही राजनीति में चढ़ावा चढ़ा दिया। जेपी अपने जीवन में 76 वर्ष में अंतिम सांस लिए। साल 1979 था। उनके देहांत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय में दस लोग मुख्यमंत्री बने। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि किसी ने भी सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप में जयप्रकाश नारायण को वह सम्मान नहीं दिए जिसके वे हकदार थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6532" aria-describedby="caption-attachment-6532" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law.jpg" alt="" width="2048" height="1448" class="size-full wp-image-6532" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-300x212.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-1024x724.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-768x543.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-1536x1086.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6532" class="wp-caption-text">बिहार​ के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p>मिश्रा का कहना है &#8220;जय प्रकाश नारायण के सिद्धांतों में कहीं इस बात का दृष्टान्त नहीं मिलता है कि आप राष्ट्र की उन्नति, प्रदेश के विकास को त्याग कर अपने, अपने परिवार, अपने इष्ट-अपेक्षित, सगे सम्बन्धियों का विकास करें। तत्कालीन  प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सत्तर से पदच्युत कर आम लोगों के प्रतिनिधित्व को सत्ता के सिंहासन पर बैठने का हिम्मत कोई कर सका तो वह जय प्रकाश नारायण थे। लेकिन आज ने नेताओं की मानसिक स्थिति को देखकर कभी नहीं लगता कि उन्हें अपने राजनीतिक पथ-प्रदर्शक के प्रति कोई भी सम्मान है। वे जन्मदिन और मृत्यु दिवस पर हनुमान मंदिर के पास से गेंदा का माला लेकर उन्हें अर्पित कर देते हैं, जेपी के प्रति उनका सम्मान वहीँ समाप्त हो जाता है। आज सभी अवसरवादी है। आज के नेताओं को, यहाँ तक कि जो उस आंदोलन के पैदाइश हैं, जेपी के सिद्धांतों, विचारों से कोई वास्ता नहीं है। वैसी स्थिति में उनके आवास को एक धरोहर के रूप में विकसित करने की बात उन्हें सोचना, उनकी सोच से परे हैं।&#8221;</p>
<p><strong>अमित शाह</strong> ने कहा था कि 1974 में जयप्रकाश जी ने बिहार में जो अराजनीतिक आंदोलन शुरू किया था, उसमें सभी विचारधाराओं के छात्रों ने हिस्सा लिया था। जेपी का नाम लेकर राजनीति में आए लोग अब पाला बदल कर जेपी के सिद्धांतों को दरकिनार कर सत्ता के सुख के लिए विपक्ष की सरकार में बैठे हैं। उनके अनुसार आने वाली पीढ़ी जेपी के विचारों से प्रेरणा लेकर देश के विकास को नई गति दे सके, इसके लिए यहां स्मारक के साथ ही एक शोध केंद्र बनाने का भी निर्णय लिया। यहां शोध केंद्र बनने के बाद छात्र जेपी के सिद्धांतों और ग्रामीण विकास के लिए किए गए उनके कार्यों पर शोध कर सकेंगे। लेकिन किसी ने भी यह प्रश्न नहीं पूछा कि &#8216;सिताब दियारा&#8217; क्यों, कदमकुआं क्यों नहीं?&#8221; </p>
<figure id="attachment_6533" aria-describedby="caption-attachment-6533" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant.jpg" alt="" width="2048" height="1448" class="size-full wp-image-6533" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-300x212.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-1024x724.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-768x543.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-1536x1086.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Manikant-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6533" class="wp-caption-text">बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व संवाददाता मणिकांत ठाकुर</figcaption></figure>
<p>पटना की गलियों के साथ-साथ  गाँव-गाँव से परिचित <strong>बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व संवाददाता मणिकांत ठाकुर </strong>कहते हैं: &#8220;इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है। हम सभी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के प्रथम द्रष्टा हैं। हम भी देखे हैं, लिखें हैं, आप भी देखे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि जिस सपने को लेकर जय प्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा बुलंद किये, जिस सिद्धांत को लेकर वे राष्ट्र के युवकों, खासकर बिहार के तत्कालीन युवकों को आह्वान किये &#8211; परिवर्तन हो &#8211; सत्ता, समाज, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक क्षेत्रों में मौलिकम बदलाव आये &#8211; वह सपना ही चकनाचूर हो गया। आज बिहार में जितने भी सफेदपोश नेता दिख रहे हैं, उसमें अधिकांशतः उस आंदोलन के हिस्सा हैं। लेकिन जयप्रकाश नारायण शायद यह नहीं समझते थे कि आज जो स्वयं को उनका अनुयायी कह रहे हैं, कल प्रदेश को जातिवाद, परिवादवाद, घोटलावाद और सभी प्रकार के कुकर्मों में धकेल देंगे।&#8221;</p>
<p>मणिकांत ठाकुर कहते है: आज जयप्रकाश के सिद्धांतों पर आज के नेताओं का कुकर्म अधिक भारी हो गया है। फिर उनके सिद्धांतों के बारे में, उनके घरों के बारे में कौन सोचेगा? मैं तो यह भी कहूंगा कि शायद आज के नेताओं को आत्मग्लानि होती होगी। वे जेपी की तस्वीरों से भी नजर मिलाने लायक स्वयं को नहीं पाते होंगे। आज जेपी के घर तक पहुँचने वाली गली नेताओं की बंद मानसिकता का द्योतक बन गयी हैं। यह दुर्भाग्य है।&#8221;</p>
<p>क्रमशः </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-leaders-of-bihar-used-those-shoulders-to-move-ahead-sacrificed-their-political-gurus-principles">जिस कंधे का इस्तेमाल कर बिहार के नेता ऊपर बढ़े, ऊपर चढ़े, समयांतराल अपने राजनीतिक गुरु, उनके कंधे और सिद्धांतों को ही चढ़ावा चढ़ा दिया (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Sep 2021 11:35:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[1974]]></category>
		<category><![CDATA[dakbungalow]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
		<category><![CDATA[jp]]></category>
		<category><![CDATA[movement]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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		<category><![CDATA[rajiv]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : सत्तर के दशक में पटना में डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर स्थित सत्कार होटल के नीचे खड़ा होना, उस विशाल भवन के सतही-तल्ले पर बाएं तरफ रीडर्स कॉर्नर से किताब, दिल्ली वाला अखबार, पत्रिका खरीदना; इस भवन से कोई दस कदम आगे चलकर भारत कॉफी हॉउस में मसाला डोसा खाना या [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists">पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : सत्तर के दशक में पटना में डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर स्थित सत्कार होटल के नीचे खड़ा होना, उस विशाल भवन के सतही-तल्ले पर बाएं तरफ रीडर्स कॉर्नर से किताब, दिल्ली वाला अखबार, पत्रिका खरीदना; इस भवन से कोई दस कदम आगे चलकर भारत कॉफी हॉउस में मसाला डोसा खाना या कॉफी पीना पटना के तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में &#8220;गर्व&#8221; और &#8220;गौरव&#8221; की बात होती थी। उसी सड़क पर स्टेशन की ओर कोई 500 कदम आगे पिंटू होटल की &#8216;ब्रुक-बॉन्ड पत्ती&#8221; की चाय और &#8220;सफ़ेद सगुल्ला&#8221; मगध की राजधानी की गरिमा में गिनी जाती थी। अगर पतलून के पिछवाड़े वाले जेब में, अथवा देशी-विदेश बटुआ में, भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर लक्ष्मीकांत झा द्वारा हस्ताक्षरित कागज के टुकड़ों की मोटाई होती थी; तो डाक बंगला रोड चौराहे से दाहिने हाथ एग्जिविशन रोड की ओर जाने वाली सड़क के ठीक बाएं कोने पर स्थित लखनऊ स्वीट हॉउस या इस दूकान के प्रवेश द्वार से 135 डिग्री कोण पर स्थित पाल स्वीट्स की दूकान से सफ़ेद रसगुल्ला या छेना वाला कोई भी मिठाई खाने, या फिर उसे बंधवाकर घर, परिवार, परिजनों, मित्रों के लिए ले जाना &#8211; सामाजिक संभ्रांतों की सूची में सबसे ऊपर नाम दर्ज होता था। लोग बाग़ डब्बे पर लिखा नाम देखकर ही कुर्सी आगे कर देते थे। </strong></p>
<figure id="attachment_3381" aria-describedby="caption-attachment-3381" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3381" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3381" class="wp-caption-text">चंद्रशेखर का नमन स्वीकार करें जय प्रकाश जी</figcaption></figure>
<p>यह अलग बात थी कि उन दिनों भी बेली रोड स्थित डॉ जगन्नाथ मिश्र वाले इण्डियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ बिजनेस एंड पर्सनल मैनेजमेंट शैक्षणिक ससंस्थान के दाहिने हाथ बोरिंग रोड चौराहे की ओर जाने वाली सड़क और चौराहे के दाहिने तरफ कोने पर भी पॉल स्वीट्स की दूकान हुआ करती थी; परन्तु डाक बंगला की बात ही कुछ और थी। उन दिनों घर के छोटे-छोटे बच्चे तो इस दूकान से मिठाई खा लेते थे, लेकिन जब &#8220;मिष्ठान&#8221; खाने की बात होती थी, तब क्या बोरिंग रोड, क्या बोरिंग केनाल रोड, क्या पाटलिपुत्र कालोनी, क्या राजवंशी नगर, क्या गर्दनीबाग &#8211; सभी डाक बंगला की ओर ही उन्मुख होते थे। डाक बंगला चौराहे की बात ही कुछ और थी। चाहे लखनऊ स्वीट हॉउस हो या पाल स्वीट्स, शीशे के अंदर रखी बेहतरीन मिष्ठानों की अधिकतम कीमत अठन्नी भी नहीं होती थी। छेना वाला सफ़ेद रसगुल्ला की कीमत महज 20 पैसे हुआ करता था। यह बात भी अलग थी कि पटना की आवादी सत्तर के दशक के प्रारम्भिक वर्षों से मध्य तक सात लाख भी नहीं थी, लेकिन तत्कालीन समाज के आम लोगों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की लखनऊ स्वीट हॉउस या पाल स्वीट्स से मिष्ठान खरीद पाते। औसतन एक हज़ार में पांच से दस लोग ही मिष्ठान खरीद पाते थे। शेष हम लोग जैसा व्यक्ति दो वक्त की रोटी, गुड़ और मसूर दाल के लिए उस दिन भी जेद्दोजेहद करते थे, आज भी करते हैं। अब सभी तो रामानंद तिवारी, डॉ जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार तो हो नहीं सकते। यह चौराहा कितने &#8220;कुकुरमुत्तों&#8221; की तरह &#8220;सफ़ेद-सफ़ेद&#8221; वस्त्र पहनने वालों को नेता बना दिया, तो वहीँ क्लिक-क्लिक करने वाले राष्ट्रीय स्तर के फोटोग्राफर बन गए। </p>
<figure id="attachment_3382" aria-describedby="caption-attachment-3382" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3382" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3382" class="wp-caption-text">सहरसा-मधेपुरा के लिए रवाना होने राजीव</figcaption></figure>
<p>संध्याकाल इधर घड़ी की सूई साढ़े पांच बजे घड़ी की बड़ी सूई छोटी सूई पर चढ़ाई करती थी, उधर पटना के संभ्रांत लोग, उनका परिवार सच-धज कर, इत्र-परफ्यूम छिड़ककर डाक बंगला चौराहे के इर्द-गिर्द दिखाई देने लगते थे। लखनऊ स्वीट हॉउस के तरफ ही एग्जिविशन रोड की ओर उन्मुख होने पर कुछ दुकानों के बाद एक दर्जी की दूकान थी। सिलाई दूकान में वस्त्र नापने वाले से लेकर सिलाई करने वाले तक, सभी पटना के अन्य सिलाई-दुकानों के कारीगरों से बिलकुल अलग होते थे। उनकी प्रतिष्ठा, शानो-शौकत वैसे ही हुआ करता था जैसे अनपढ़-गवाँर-जाहिल क़स्बा में एक सांस में दो से 19 तक पहाड़ा गिनने वाला। यहाँ पुरुषों के वस्त्रों की सिलाई नहीं होती थी। पुरुष कारीगर &#8220;महिलाओं के वस्त्रों&#8221; को सिलने में माहिर थे। </p>
<p>डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर &#8220;शंकर पानवाला&#8221; सुबह आठ बजे से देर रात 12 बजे तक सपरिवार सुबह पाली से लेकर दोपहर पाली के रास्ते रात्रि पाली तक अपनी &#8211; अपनी ड्यूटी बजाते थे। हंसमुख चेहरा बाप-बेटा सबों का। जो दूकान में काम भी करता था, उसकी मुस्कान भी मगही पान जैसा सुगन्धित होता था। उन दिनों पटना की पान खाने वाली संभ्रांत महिलाएं भी पान की दूकान पर कहीं-कहीं दिखती थी। अन्यथा वे भी सड़क और समाज का सम्मान करती थी, और सड़क तथा समाज भी उनका अन्तःमन से, ह्रदय से सम्मान करता था। जो रास्ता बेली रोड की ओर जाती थी, आगे कुछ कदम दाहिने हाथ एक पेट्रोल पम्प हुआ करता था और बाएं हाथ तत्कालीन डाक बंगला का बाउंड्री वाल होता था। इस बाउंड्री वाल पर पटना के लोग, नेतागण, रिक्शावाला, पैदल यात्री, छोटे-छोटे व्यापारी, जो सड़क पर अपने जूते रगड़ कर आगे बढ़ रहे थे, किसी भी समय &#8216;लघु शंका&#8217; से मुक्त होने में देरी नहीं करते थे। इस बाउंड्री वॉल के अंदर पीले रंग के खपड़ैल वाला ब्रितानिया सरकार के ज़माने में बना डाक बंगला में बिहार के अन्य क्षेत्रों से, जिलों से आये नेतालोग, अधिकारीगण शरणागत होते थे। गजब का मौहौल था उन दिनों। </p>
<figure id="attachment_3383" aria-describedby="caption-attachment-3383" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3383" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3383" class="wp-caption-text">वो सरकार निकम्मी है</figcaption></figure>
<p>आज लोग सोच नहीं सकते हैं। आज जैसे ही युवकों को, युवतियों को कहते हैं कि यहां एक डाक बंगला हुआ करता था। उस डाक बंगला के पीछे खाली मैदान नुमा स्थान था। एक रास्ता बन्दर बगीचा के रास्ते एक महिला कालेज की ओर उन्मुख होता था। आज जहाँ विशालकाय गगनचुम्बी ईमारतें खड़ी हैं, कल पटना के लोग भाग, संभ्रांतों के साथ, कुछ खड़े, कुछ बैठकर &#8220;लघुशंका&#8221; से मुक्त हुआ करते थे। रात्रि के अँधेरे में दीर्घशंका से भी मुक्ति पाते थे। उन दिनों तक दिल्ली के पालम वाले बिंदेश्वर पाठक वाला सुलभ शौचालय का अभ्युदय नहीं हुआ था। पटना के लोगों की न तो सोच बदला था और न शौचालय। आज उसी स्थान पर पटना के संभ्रांत खड़े-खड़े &#8220;गोलगप्पा&#8221; खाते हैं, &#8220;चीन-निर्मित&#8221; खाने के अनेकानेक व्यंजनों का आनंद लेते हैं।  </p>
<p>आज के लोग बाग़ शायद नहीं जानते होंगे अथवा जानते भी होंगे तो अगली पीढ़ी को बताने में संकोच करते हैं कि बैद्यनाथ मिश्र यानी नागार्जुन, रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; और फणीश्वर नाथ &#8216;रेणु&#8217; फोटोग्राफी के बहुत शौक़ीन थे। और पटना का यह डाक बंगला चौराहा उन लोगों के लिए एक पसंदीदा स्थान हुआ करता था। तत्कालीन समाज में, खासकर पटना के फोटोग्राफर उन्हें बहुत पसंद करते थे और ये त्रिमूर्ति भी छायाकारों को बहुत चाहते थे। रेणु जी ने तो साठ और सत्तर के ज़माने और उससे पहले के एक छायाकार मित्र सत्यनारायण दूसरे जी के क्रियाकलापों का अनेकों बार अपनी रचनाओं में उद्धृत किये थे। नागार्जुन और रेणु जी जब भी उन दिनों डाक बंगला कोने पर, तत्कालीन आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के छायाकारों को देखते थे, राजीव सहित, मन में एक इक्षा दोनों को अवश्य होतो थी की एक तस्वीर हो जाए। आज भी पटना के उन दिनों के छायाकारों के पास दिनकर, नागार्जुन और रेणु की असंख्य तस्वीरें होंगी। दिनकर जी का देहावसान 24 अप्रैल, 1974 को हुआ जबकि रेणु जी 11 अप्रैल, 1977 को और नागार्जुन 5 नबम्बर, 1998 को ईश्वर के शरणागत हुए।  उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन सम्पादकीय विभाग में संपादक से लेकर सम्पादकीय विभागों तक, सभी लोग विद्वान तो होते ही थे, आत्मीयता और आत्मसम्मान भी उत्कर्ष पर था। और इन तीन विद्वानों को और क्या चाहिए। समय समय पर वे इस दफ्तर में अवश्य आते थे। खासकर नागार्जुन।  </p>
<figure id="attachment_3384" aria-describedby="caption-attachment-3384" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3384" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3384" class="wp-caption-text">बिहार  की जनता और लालकृष्ण आडवाणी</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, समय बदल रहा था। आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कृषि, विज्ञान आदि के क्षेत्रों में आधारभूत प्रतिवर्तन हो, प्रदेश के लोग बाग़, गरीब-गुरबा का जीवन भी हंसमुख हो, रिक्शावाले को, जूता सिलने वाले को, कपड़ा सिलने वाले को भी भर पेट भोजन मिले, उसके बच्चे भी विद्यालय जायँ; इसके बारे में पटना के लोग, बिहार के लोग, विद्वान-विदुषी, नेता भले नहीं सोचें; लेकिन सबों के मानस-पटल पर पटना के बेली रोड से दिल्ली के राजपथ तक यह अवश्य था की देश में राजनितिक सत्ता के गलियारे में जो बैठे हैं, उन्हें उठाकर बाहर फेक दिया जाय। जो कल तक उस गलियारे का हिस्सा थे, उस दिन झंडा लेकर विरुद्ध में खड़े हो गए थे। स्वाभाविक है प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों की गद्दीदार कुर्सियां किसे नहीं अच्छी लगेगी। बिहार के तत्कालीन नेता अपने-अपने कपाल को तो साफ़ कर ही रहे थे, अपने-अपने पिछवाड़े के वस्त्र को भी उन कुर्सियों के उपयुक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। बिहार के लोगों में यह आम बात होती है। </p>
<p>सन चौहत्तर की क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। विद्यालय से महाविद्यालय तक, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से पटना, मगध, बिहार विश्वविद्यालय तक आंदोलन के बिगुल का आवाज पहुँच गया था। एक ओर छात्राएं अपने-अपने घरों में सीमित हो गयी थी, वहीँ दूसरी ओर &#8216;राजनीति में अपना-अपना जीवन संवारने वाले, प्रदेश तत्कालीन नेतागण अपने घरों को भरने के लिए सड़क पर उतर गए थे। कोई मूंछ-दाढ़ी कटा रहे थे तो कोई मूंछ &#8211; दाढ़ी को अपनी पहचान का मन्त्र मान रहे थे। अगर भारत के निर्वाचन आयोग के दफ्तर में तत्कालीन नेताओं द्वारा पेश किये गए आर्थिक दस्तावेजों की तुलना विगत लोक सभा और विधान सभा के दस्तावेजों से कर लें, खुद को संतुष्ट कर लें की उनकी सम्पत्तियों में कितना इजाफ़ा हुआ है, मतदाता तो वहीँ का वहीँ है । जो उस समय बिहार के वेटेनरी कालेज के चपरासी क्वाटर्स में रहते थे, आज कितने भवनों के मालिक हैं। जो उस समय गांधी मैदान स्थित भारतीय स्टेट बैंक में पैसे की निकासी के लिए पंक्तिबद्ध होते थे, आग बैंकों के अध्यक्ष घर पर पेटियां पहुंचते हैं। ऐतिहासिक गांधी मैदान की घास को पटना के ही लोग अपने अपने पैरों तले उसे दफना रहे थे। </p>
<figure id="attachment_3385" aria-describedby="caption-attachment-3385" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3385" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3385" class="wp-caption-text">आडवाणी, जाबिर हुसैन और आर के सिन्हा<br /></figcaption></figure>
<p>अब तक जून का महीना आ गया था और साल था सन चौहत्तर। पांच जून, 1974 को गांधी मैदान में एक सभा हुई। मंच पर जय प्रकाश नारायण थे और कर्पूरी ठाकुर भी थे। विगत तीन दशकों से बिहार की सत्ता के गलियारे में जो राज किये, कर रहे हैं, सभी वहां &#8220;चवन्नी छाप&#8221; नेता के रूप में, मैले-कुचैले कपड़े पहने खड़े थे। देख रहे थे कि जय प्रकाश जी की नजर में उनकी उपस्थिति दर्ज हो रही है अथवा नहीं। सुई रखने का जगह नहीं थी गांधी मैदान में। अपने जीवन में जय प्रकाश नारायण भी ऐसा जनसैलाब नहीं देखे थे। इसी मंच पर उपस्थित थे फणीश्वरनाथ रेणु, जिन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता पाठ कर रहे थे :</p>
<p>&#8220;सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,<br />
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,<br />
सिंहासन खाली करो कि &#8220;जनता&#8221; आती है । </p>
<figure id="attachment_3386" aria-describedby="caption-attachment-3386" style="width: 196px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/7-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/7-2.jpg" alt="" width="196" height="274" class="size-full wp-image-3386" /></a><figcaption id="caption-attachment-3386" class="wp-caption-text">जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी &#8211; जेपी के निवास पर</figcaption></figure>
<p>दिनकर जी अरविन्द के भक्त थे। जय प्रकाश नारायण की इस क्रांति-तिथि से कोई दो माह पूर्व दिनकर जी दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। कहा जाता है कि वे आश्रम पहुंचे और अपने आराध्य के कहें: &#8220;मैं आ गया&#8221; आपके शरण में। दिनकर की मृत्यु ह्रदय गति रुकने के कारण वे अंतिम सांस लिए । बाद में उनका पार्थिव शरीर पटना लाया गया।  उस पार्थिव शरीर को कदमकुआं के हिंदी साहित्य सम्मेलन परिसर में श्रद्धांजलि स्वरुप रखा गया। अनेकानेक प्रगतिशील विचारधरा वाले लेखक श्रद्धांजलि देने भी नहीं पहुंचे। लेकिन आगंतुकों की संख्या कम नहीं थी। फिर लेखकों और उनके कलमों को साक्षी मानकर, जहाँ रेणु जी भी उपस्थित थे, गंगा तट पर गायघाट में अग्नि को सुपुर्द किया गया। </p>
<p>सन चौहत्तर की क्रांति और जय प्रकाश नारायण का नेतृत्व ऐसा फैल गया कि देखते ही देखते राजनीति का चेहरा ही पूरी तरह बदल गया। वह आंदोलन करीब एक साल चला। फिर आपातकाल का समय आया।  जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए वचनबद्ध थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई इस क्रांति में बाद में बहुत सी चीजें जुड़ गई। गांधी मैदान में सभा को संबोधित करने से पहले जेपी ने दोपहर सर्वोदय संगठन के कई कार्यकर्ताओं व अन्य के साथ जुलूस में शामिल हो राजभवन की ओर प्रस्थान किया। राजभवन में तत्कालीन राज्यपाल को पत्र सौंप सभा के लिए वापस गांधी मैदान लौटने लगे तो रास्ते में जुलूस पर फायरिंग की गई। संपूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने कोने में फैलकर आग बनकर भड़क रही थी। </p>
<figure id="attachment_3387" aria-describedby="caption-attachment-3387" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3387" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3387" class="wp-caption-text">खामोश</figcaption></figure>
<p>उस ज़माने में बेगूसराय जिला के मझौल गाँव के महान क्रांतिकारी परिवार का एक परिवार बिमला कांत प्रसाद और अहिल्या देवी पटना के गर्दनीबाग रोड नंबर &#8211; 4 में रहते थे। बिमला कांत बाबू बिहार सरकार के एक विभाग में कार्यरत थे। बाद में वे पटना के आयुक्त आर आर एस पी सिन्हा के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी भी बने। बिमला कांत जी और अहिल्या देवी के एक पुत्र राजीव थे, आज भी स्वस्थ हैं। राजीव साहब के परिवार का, उनके पुरखों का देश की आज़ादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। मुंगेर, बेगुसराय आदि इलाकों में इनके दादाजी और उनके भाइयों की राजनीतिक गलियारे में तूती बोलती थी आज़ादी से पहले। सभी क्रांतिकारी विचारधारा के थे और महात्मा गांधी की चम्पारण यात्रा और उसके बाद के सभी आंदोलनों में राजीव जी के पूर्वजों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। कहा जाता है कि तत्कालीन क्रांतिकारी युगल किशोर प्रसाद सिन्हा, अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा, इन्दु बाबू सबों ने महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस सबों के साथ आज़ादी की लड़ाई में सक्रीय भूमिका निभाए। </p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम </strong>से बातचीत करते राजीव जी कहते हैं: &#8220;सन 1942 के आंदोलन में जब पटना सचिवालय के सामने राष्ट्रध्वज फहराने के लिए क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे, उनमें मेरे फूफा जी जगत नंदन सहाय भी थे। आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक रूप ले लिया । पुलिस क्रांतिकारियों को आगे बढ़ने से रोक रही थी और क्रांतिकारी आगे बढ़कर राष्ट्रध्वज को लहराना चाह रहे थे। दोनों तरफ भारतीय ही थे। एक लड़ रहे थे, दूसरा रोक रहा था। इस बीच ब्रितानिया सरकार की हुकूमत की ओर से गोलियों का बौछार हो गया। भीड़ तीतर-बितर हो गयी। लेकिन सात छात्र मृत्यु को प्राप्त किये। मेरे फूफा जी उस गोली कांड में घायल एक क्रांतिकारी को अपने कंधे पर लादकर, साईकिल से एक और मित्र के सहारे पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए। गर्दनीबाग इलाके से काफी संख्या में क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे, जो घायल हुआ था उसका नाम &#8216;जगत नारायण लाल&#8217; था। इस बीच कुछ लोग घर में आकर यह कह दिए कि &#8220;जगत नारायण मर गया,&#8221; इस बात को बुआ बर्दाश्त नहीं कर सकी और तत्काल ह्रदय गति रुकने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। शाम में जब फूफा जी घर आये तब सभी कहने लगे &#8211; भूत आया &#8211; भूत आया &#8211; यह घटना हमारे परिवार को हिलाकर रख दिया था।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3388" aria-describedby="caption-attachment-3388" style="width: 717px" class="wp-caption alignright"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg" alt="" width="717" height="976" class="size-full wp-image-3388" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg 717w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2-220x300.jpg 220w" sizes="auto, (max-width: 717px) 100vw, 717px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3388" class="wp-caption-text">जेपी और देसाई &#8211; कदमकुआं में</figcaption></figure>
<p>राजीव आगे कहते हैं: &#8220;यही कारण था कि जब जय प्रकाश नारायण की क्रांति सन 1942 की क्रांति के कोई 32 साल बाद एक बार फिर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से लेकर पटना की सड़कों पर दिखने लगा था; जब भी बाहर निकलता था, घर के सभी लोग कहते थे &#8220;किसी भी हालत में गिरफ्तार नहीं होना है&#8221;, सभी यह सोचते थे कि गिरफ्तार होने पर पुलिस कहीं मार न दे। घर के बड़े-बुजुर्ग, खासकर महिलाओं में यह बात घर कर गयी थी कि सं 1942 में भी भारत के लोग, बिहार के लोग, पटना के लोग पुलिस में थे; आज भी वही लोग हैं। कहीं आवाज बुलंग करने पर गिरफ्तार कर मार नहीं दे।&#8221;</p>
<p>राजीव का कैमरा पकड़ना और फिर कैमरे के क्लिक-क्लिक से इतिहास बनाना भी एक इत्तिफाक ही था। राजीव जी कहते हैं: &#8221; सन सत्तर की बात है। मेरे घर में चोरी हुई। चोर घर से एक-एक सामान को उठाकर ले गया। तत्कालीन बक्से में कपडा-लत्ता, पैसा-कौड़ी, गहने सभी ले गया। उन्ही बक्सा में बाबूजी का एक कैमरा था। चूँकि बाबूजी बिहार सरकार की नौकरी में थे और उस समय बिहार का पर्यटन विभाग को बढ़ावा देने के लिए भरपूर प्रयास किता जा रहा था; इसलिए बाबूजी जहाँ कहीं भी जाते थे, उस कैमरे से तस्वीर खींचकर सरकारी कार्यों में उपयोग करते थे। चोर ने सभी सामान छांट &#8211; छाँट कर ले लिया। जो उसके जरुरत के नहीं थे, उसे सामने एक सूखे कुएं में फेक सिया। बाबूजी का बी-2 आकार का कैमरा भी वहीँ फेका मिला। बाद में यह कैमरा ही मेरे जीवन का निर्माता बना। उस कैमरे में आठ फिल्म (निगेटिव) लगता था और परिणाम बहुत बेहतर होता था।&#8221;</p>
<p>राजीव कहते हैं: &#8220;जयप्रकाश नारायण की क्रांति के दौरान शिक्षा में सुधार, बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर क्रांति किया गया था। लेकिन यदि सच पूछें तो जो स्थिति उन दिनों थी, आज भी बहुत बेहतर नहीं है, जहाँ तक बिहार का सवाल है। इंदिरा गांधी चाहती थी कि जेपी का आंदोलन बिहार से बाहर न जाय। इंदिरा गाँधी के विरुद्ध कचहरी का आदेश जेपी आंदोलन को एक नया आयाम दिया। इस आंदोलन के दौरान जेपी सहित कई हज़ार क्रांतिकारी और नेतागण गिरफ्तार किये गए थे। गुजरात की चमनभाई पटेल सरकार के खिलाफ छात्रों का आंदोलन जेपी आंदोलन का बुनियाद था। जेपी आंदोलन से नेताओं की ऐसी फौज निकली जो बाद में राज्यों एवं केंद्र की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई। अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे अनेक नेता हैं जो जेपी आंदोलन से निकले। इस क्रांति में वामपंथी व कांग्रेस को छोड़कर समाज के सभी तबके के लोग, मसलन साहित्यकार, डॉक्टर, किसान नेता, वकील, कर्मचारी, महिलाएं, रिक्शावाला, मजदूर भी शामिल थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3389" aria-describedby="caption-attachment-3389" style="width: 853px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg" alt="" width="853" height="1280" class="size-full wp-image-3389" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg 853w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-682x1024.jpg 682w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-768x1152.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 853px) 100vw, 853px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3389" class="wp-caption-text">नागार्जुन</figcaption></figure>
<p>राजीव आगे कहते हैं: &#8220;जिस दिन कई लाख चिट्ठियों को एक ट्रक पर लादकर लाखों की संख्या में लोग जय प्रकाश नारायण की अगुआई में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आर डी भंडारे को देने जा रहे थे, जुलूस वैसे निकला तो कदमकुआं से था, लेकिन कुछ समय के बाद यह निश्चित कर पाना कठिन हो गया था की जुलुस का  प्रारंभिक छोड़ कहा पहुंचा । कई लोग यह कह रहे थे कि अगली छोड़ जब राज्यपाल के निवास पर पहुँच गया था, कदमकुआं में उस प्रराम्भित स्थान पर हज़ारों लोग एकत्रित थे। उस समय पटना की सड़कों पर मैं अपने 120/बी-2 कैमरा से क्लिक-क्लिक तो कर ही रहा था, आर्यावर्त &#8211; इण्डियन नेशन के लिए फोटो का काम करने वाला कृष्ण मुरारी किशन भी दिखाई देता था। मुरारीजी उम्र में हमसे छोटे थे, लेकिन कैमरे पर उनकी पकड़ बहुत बेहतर थी। हम पुलिस से बहुत डरते थे। इसलिए जैसे ही किसी पुलिस की गाड़ी देखते थे, मैं कहीं छिप जाता था। इस दौरान गर्दनीबाग से कदमकुआं की दूरी कम होती गई और हम जेपी के नजदीक आते गए। उस ज़माने में जेपी की तस्वीर के लिए मुरारी और इण्डियन नेशन के विक्रम जी को छोड़कर शायद ही कोई दिखाई देता था। बाद में आपातकाल के बाद, सन 1978 के पूर्वार्ध अशोक कर्ण और प्रभाकर दिखने लगे। उन दिनों &#8216;यासिका डी-120&#8217; कैमरा होता था।  फिर बाद में &#8216;लोवीटल&#8217; कैमरा हुआ। उन कैमरों को लेकर पटना की सड़कों पर क्लिक-क्लिक करते रहे, इतिहास का हिस्सा बनते गए।&#8221;</p>
<p>उस ज़माने में पटना में इंदिरा गांधी की यात्रा का वर्णन करते राजीव कहते हैं: गाँधी मैदान में आल इण्डिया कॉंग्रेस सेवा दल का सम्मलेन था। इंदिरा गाँधी राजीव गाँधी को लेकर आयी थी। उस ज़माने में गांधी मैदान में सुरक्षा की दृष्टि से छोटे-छोटे पॉकेट बनाये गए थे। फोटोग्राफर्स की संख्या भी दस से अधिक नहीं रही होगी। इंदिरा जी को सबों से मिलना संभव नहीं था। अतः वे एक खुले जीप पर आगे खड़ी हो गयी और सभी पॉकेट में घूम रही थीं, ताकि मिल भी लें और छायाकारों को तस्वीर भी बन जाय। हम सभी भी एक जीप पर थे। अचानक हम सबों की जीप पलट गयी। इसे देखते ही इंदिराजी आगे बढ़ी और जोर-जोर से कहने लगी, उठाओ सबको, देखों किसी को चोट तो नहीं लगी। मैं सबसे नीचे था। चूँकि मैं कुछ पहलवान जैसा था लम्बा-चौड़ा, इसलिए सबों की निगाहें मुझ पर जल्दी रूकती थी। इसी तरह, जान जेपी बीमार हुए, तब इंदिराजी उनसे मिलने आयी थी। उन दिनों राजनीतिक रिश्ते राजनेताओं की चाहे जैसे रहती हो, कटु या मधुर, लेकिन आत्मीयता में कमी नहीं होती थी। इंदिरा जी में भी वह बात थी।&#8221;  </p>
<figure id="attachment_3390" aria-describedby="caption-attachment-3390" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3390" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3390" class="wp-caption-text">लालू, नितीश और अन्य सभी अंडा-कढ़ी दबोच रहे हैं &#8211; समाजवाद</figcaption></figure>
<p>आज जब कंकड़बाग देखता हूँ और सन 1984 से तुलना करता हूँ तो आसमान जमीन सा फर्क दीखता है। उस  ज़माने में चिरैयांटांड पुल पार करने के बाद जब बाईपास पर आते थे, तो कुछ दूर दाहिने &#8211; बाएं दुकाने थी, पेट्रोल पम्प था, फिर अचानक दुकानों, मकानों की संख्या कम होने लगती थी। बाईपास ओर रेलवे लाइन बराबर दीखता था। उस ज़माने में कंकड़बाग में एच आई जी और एम आई जी नहीं बना था। एक बहुत बड़ा खाली मैदान हुआ करता था। राष्ट्रीय जनता पार्टी का सम्मलेन हुआ था। उस सम्मलेन में देश के शायद ही  कोई ऐसे बड़े नेता रहे होंगे जो अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराये थे।चंद्रशेखर, चौधरी देवी लाल, राजनारायण, सुरेंद्र मोहन, राम कृष्ण हेडगे, शहाबुद्दीन, राम बिलास पासवान, कपिल देव सिंह, सत्येंद्र नारायण सिंह, जॉर्ज फर्नांडिस, मोहन धारिया, मधु दंडवते, प्रमिला दंडवते, सुब्रम्हण्यम स्वामी, जाबिर हुसैन, सुबोध कांत सहाय, सुषमा स्वराज इत्यादि सभी आये थे। सत्तारूढ़ को छोड़कर। चंद्रशेखर के नेतृत्व में 8 मार्च से 11 मार्च, 1984 तक ऐतिहासिक सम्मलेन हुआ था। सम्मलेन सुवह से शाम तक तीन सत्र में हुआ करता था । खाना, नास्ता चाहे बड़े हो या छोटे, सभी कार्यकर्त्ता पंडाल में ही किया करते थे। </p>
<p>आज राजीव जी के परिवार में उनका एक बेटा रोहित है जो वस्त्र निर्माण की दुनिया में है। उसकी पत्नी सौम्या एक फैशन डिजाइनर है।​ बेटी सरस्वती है।​राजीव कहते हैं : समय बहुत बदल गया लेकिन आज भी डाक बंगला का चौराहा का नाम आते ही मन कुछ क्लिक-क्लिक करने लगता है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists">पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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