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	<title>government Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>संसद, सांसद रवि किशन और जया बच्चन, देश, फिल्म जगत में नशा की समस्या और ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली ​पदार्थों पर कब्ज़ा &#8211; कुछ तो सही होगा ही</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/drug-problem-in-the-country-film-industry</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Jun 2025 05:56:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: कोई पांच साल पहले, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार देश का नेतृत्व संभाले थे, उस कालखंड में भारतीय जनता पार्टी के सांसद और फिल्म अभिनेता रवि किशन संसद के मौनसून सत्र के पहले दिन भारत और खासकर फिल्म जगत में, मादक पदार्थों की तस्करी का मुद्दा उठाया था, तो बॉलीवुड, टॉलीवुड, पॉलीवुड,  [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/drug-problem-in-the-country-film-industry">संसद, सांसद रवि किशन और जया बच्चन, देश, फिल्म जगत में नशा की समस्या और ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली ​पदार्थों पर कब्ज़ा &#8211; कुछ तो सही होगा ही</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: कोई पांच साल पहले, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार देश का नेतृत्व संभाले थे, उस कालखंड में भारतीय जनता पार्टी के सांसद और फिल्म अभिनेता रवि किशन संसद के मौनसून सत्र के पहले दिन भारत और खासकर फिल्म जगत में, मादक पदार्थों की तस्करी का मुद्दा उठाया था, तो बॉलीवुड, टॉलीवुड, पॉलीवुड,  सन्दलवुड, कॉलीवुड, बंगाली, असमी, भोजपुरी, हिंदी, मराठी, उड़िया, पंजाबी सिनेमा जगत में भूचाल आ गया था। </strong></p>
<blockquote><p>रवि किशन ने संसद के पटल पर कहा था कि &#8220;मैं संसद का ध्यान एक महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। हम जानते हैं कि देश में नशीली दवाओं की तस्करी और नशे की लत के मामले बढ़ रहे हैं। घातक दवाओं के वितरण के माध्यम से भारतीय युवाओं के जीवन को नष्ट करने की साजिश चल रही है। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इस साजिश में पड़ोसी देशों की भूमिका है। हर साल पंजाब और नेपाल के रास्ते चीन और पाकिस्तान से ड्रग्स की तस्करी होती है और हमारी फिल्म इंडस्ट्री में भी नशा एक गंभीर समस्या है।&#8221;</p></blockquote>
<p>वे आगे सदन को बताये थे कि &#8220;हमारी सरकार ड्रग के धंधे में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बहुत अच्छा काम कर रही है। भारत में अभिनेताओं को रोल मॉडल माना जाता है, लेकिन इंडस्ट्री में ड्रग के इस्तेमाल की समस्या बहुत बड़ी है। मैं सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि वह जल्द से जल्द आरोपियों को पकड़े और नशीली दवाओं के दुरुपयोग पर सख्ती से अंकुश लगाए। मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि वह हमारे पड़ोसी देशों द्वारा इस देश के युवाओं को बर्बाद करने की साजिश को विफल करे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6832" aria-describedby="caption-attachment-6832" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6832" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6832" class="wp-caption-text">पूछताछ के लिए जाती अदाकारा</figcaption></figure>
<p><strong>कहते हैं इधर सदन में ड्रग्स का मामला उठा और उधर सांसद महोदय को ड्रग्स माफियाओं से धमकी भी मिलने लगी। उन दिनों जब पत्रकारों ने पूछा था इस विषय पर तो उन्होंने कहा &#8220;मैंने युवाओं और फिल्म इंडस्ट्री के भविष्य के लिए आवाज उठाई है। मैंने कभी अपने जीवन की परवाह नहीं की है। मैं इन बातों से रुकने वाला नहीं हूं। उन्होंने कहा कि सदन में ड्रग्स का मामला उठाने के बाद से कई फोन आए जिसमें उन्हें प्रोजेक्ट का हिस्सा न होने की बात कही गई। लेकिन मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है।&#8221; यह भी कहा गया था कि उनकी उस आवाज से उन्हें सिनेमा जगत में कई कार्यों से हाथ थोङा पड़ा था। लेकिन यह युवाओं के हित की बात थी, राष्ट्र की बात थी, चेहरे पर सिकन नहीं होने दिया। </strong></p>
<p>कुछ समय बात वे ट्विटर पर लिखा भी:</p>
<p><em>नशा फूंक कर है बढ़ी, किसकी अबतक शान? <br />
चिता सरीखा तन जले, घर हौवै शमशान।<br />
बॉलीवुड का हित यही, समझो ध्यान लगाय, <br />
सभी नशे से मुक्त हो, ऐसा होय उपाय। <br />
वीर शिवा की भूमि पर, बंद करो यह पाप, <br />
मर्यादा का जन्म हो, तभी मिटेगा ताप।।</em></p>
<p>उन दिनों, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने बॉलीवुड में कथित &#8216;मादक पदार्थों&#8217; की जांच के तहत 26 सितंबर को अभिनेत्रियों दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर और सारा अली खान और पादुकोण की मैनेजर करिश्मा प्रकाश से पांच घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की थी । एजेंसी ने हिंदी फिल्म उद्योग में ड्रग्स की कथित आपूर्ति और खपत के क्रम में कई गिरफ्तारियां भी की। यह आरोप भी लगा था कि धर्माटिक एंटरटेनमेंट के एक कार्यकारी निर्माता &#8211; धर्मा प्रोडक्शंस की एक सहयोगी कंपनी, करण जौहर के स्वामित्व वाले एक प्रोडक्शन हाउस &#8211; मुंबई में प्रमुख ड्रग पेडलर्स के संपर्क में भी थे। कुछ पेडलर्स को भी गिरफ्तार किया गया था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6839" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/amit-shah-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>विगत माह मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा भी कि मोदी सरकार पैसे के लालच में हमारे युवाओं को नशे की अंधेरी खाई में धकेलने वाले नशा तस्करों को दंडित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अमित शाह ने कहा कि सरकार नशा मुक्त भारत के निर्माण के लिए निर्मम और सावधानीपूर्वक जांच के साथ नशीली दवाओं के खतरे का मुकाबला करना जारी रखने का संकल्प लेती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों के कारावासों में कुल 115236 अभियुक्त नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंसेस एक्ट के तहत बंद हैं। वैसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की पैनी निगाह देश के सभी राज्यों में, खासकर सिनेमा जगत पर लगी है। ब्यूरो के सूत्रों के अनुसार &#8216;हम सभी मौके की तलाश में है। जिस दिन समय सापेक्ष हुआ, सर्कार की सम्भि एजेंसियां मिलकर इस नेक्सस को तोड़-फोड़ देगी।&#8221;</p>
<p><strong>बहरहाल, जैसे ही रवि किशन सिनेमा जगत में मादक द्रव्यों के इस्तेमाल के बारे में, ड्रग माफिया की मिलीभगत के बारे में सदन के पटल पर कहे, समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन बॉलीवुड ड्रग नेक्सस के आरोप को लेकर रवि किशन पर कड़ा प्रहार किया। जया बच्चन ऐसा क्यों की, यह तो वही जानती होंगी, लेकिन उन्होंने यह कहते भी नहीं चुकी की &#8216;कुछ लोगों के कारण पूरी बॉलीवुड बिरादरी की छवि खराब नहीं की जा सकती।&#8221; राज्यसभा में उन्होंने कहा: &#8220;मनोरंजन उद्योग के लोगों को सोशल मीडिया पर कोसा जा रहा है। जिन लोगों ने इस उद्योग में अपना नाम बनाया है, उन्होंने इसे गटर कहा है। मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं और इससे खुद को अलग करता हूं। मुझे उम्मीद है कि सरकार ऐसे लोगों से कहेगी कि वे इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न करें। जो लोग खुद फिल्म उद्योग से जुड़े हैं, वे इसके खिलाफ इस तरह के बयान दे रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि कुछ लोग हैं, आप पूरे उद्योग की छवि खराब नहीं कर सकते। मैं वास्तव में शर्मिंदा हूं कि कल लोकसभा में हमारे एक सदस्य, जो फिल्म उद्योग से हैं, ने इसके खिलाफ बात की। यह एक दिखावा है।&#8221;</strong></p>
<p>लेकिन जया बच्चन कुछ भी बोलें, भारत सरकार का आंकड़ा तो यह कहता है कि विगत दस वर्षों में करीब  ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली पदार्थ देश के कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने पकडे हैं।  यह आंकड़ा फिल्म बनाने वाले राज्यों की भी सम्मिलित है। </p>
<p>बहरहाल, भारत चार दशकों से मादक पदार्थों की तस्करी के खतरे को झेल रहा है। हालांकि भारत अफीम और भांग के डेरिवेटिव का पारंपरिक उपभोक्ता रहा है, लेकिन मादक पदार्थों की तस्करी के रुझान और पैटर्न दर्शाते हैं कि पारंपरिक/प्राकृतिक दवाओं से सिंथेटिक दवाओं की ओर धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है, जिसकी तस्करी और खपत देश में हो रही है। 1980 के दशक में, विभिन्न सीमाओं के माध्यम से देश में बड़ी मात्रा में हेरोइन और हशीश की तस्करी की गई थी। हालांकि, इन नशीले पदार्थों की तस्करी अभी भी हो रही है, सिंथेटिक दवाओं की हिस्सेदारी में काफी वृद्धि हुई है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6838" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>सरकारी सूत्रों के मुताबिक, गोल्डन क्रीसेंट और गोल्डन ट्राइंगल के करीब होने के कारण, भारत इन क्षेत्रों में उत्पादित हेरोइन, हशीश और सिंथेटिक ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों और दवाओं की तस्करी के प्रति संवेदनशील रहा है। हेरोइन की तस्करी पहली बार सत्तर के दशक के मध्य में गोल्डन ट्राइंगल से भारत में की गई थी, जो अस्सी के दशक में बढ़ गई। भारत-म्यांमार सीमा के माध्यम से पूर्वोत्तर में तस्करी की गई हेरोइन की मात्रा हमेशा बहुत कम रही है क्योंकि यह केवल स्थानीय खपत के लिए होती है। दूसरी ओर, गोल्डन क्रीसेंट अस्सी के दशक की शुरुआत से देश में तस्करी की गई हेरोइन का प्राथमिक स्रोत बना हुआ है, जब तस्करों ने ईरान-इराक युद्ध के बाद भारत के माध्यम से इस क्षेत्र से हेरोइन को फिर से भेजना शुरू कर दिया था। युद्ध की समाप्ति और अस्सी के दशक के अंत में बाल्कन तस्करी मार्ग को फिर से खोलने के परिणामस्वरूप देश में हेरोइन की तस्करी में कमी आई लगभग दो दशकों के अंतराल के बाद, 2012 में इसमें पुनः तेजी आई। </p>
<p>अफगानिस्तान में अफीम का बढ़ता उत्पादन, भारत में अधिक घरेलू मांग, तथा राज्य सरकार के अधिकारियों और सीमा सुरक्षा बलों की मिलीभगत ने मिलकर, विशेष रूप से पंजाब क्षेत्र में, हेरोइन की तस्करी में वृद्धि में योगदान दिया। हेरोइन के अलावा, हशीश और मारिजुआना कैनबिस के दो ऐसे व्युत्पन्न हैं जिनकी भारत में बड़े पैमाने पर तस्करी की जाती है। हशीश और मारिजुआना की तस्करी पारंपरिक रूप से नेपाल से भारत में की जाती रही है और इसलिए, नेपाल एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है, भले ही पिछले कुछ वर्षों में इसकी हिस्सेदारी घट रही हो। यह भी कहा जाता है कि भारत में तस्करी किए जाने वाले इनमें से बहुत से नशीले पदार्थ घरेलू स्तर पर नहीं खाए जाते हैं, बल्कि यूरोप, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे गंतव्यों के लिए देश से होकर गुजरते हैं। </p>
<p><strong>नशीले पदार्थों के अलावा, भारत में 1990 के उत्तरार्ध से नशेड़ियों के बीच मनोविकार नाशक पदार्थों और औषधीय तैयारियों के उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। दक्षिण-पूर्व एशिया में विशेष रूप से गोल्डन ट्राइंगल में बड़ी मात्रा में उत्पादित एम्फेटामाइन टाइप स्टिमुलेंट और मेथमफेटामाइन को भारत-म्यांमार सीमा के माध्यम से भारत में तस्करी कर लाया जाता है। भारत बहुत सारी सिंथेटिक दवाएं और पूर्ववर्ती रसायन भी बनाता है, जिन्हें देश से बाहर तस्करी कर लाया जाता है। डेक्सट्रोप्रोपॉक्सीफीन और कोडीन युक्त औषधीय तैयारियों को पड़ोसी देशों खासकर नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार में तस्करी कर लाया जाता है। केटामाइन एक और औषधीय तैयारी है, जिसे भारत से विभिन्न दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में तस्करी कर लाया जाता है। इसी प्रकार, एटीएस के निर्माण के लिए प्रयुक्त इफेड्रिन और स्यूडोएफेड्रिन तथा हेरोइन के निर्माण के लिए प्रयुक्त एसिटिक एनहाइड्राइड को भारत से गोल्डन क्रीसेंट और गोल्डन ट्राइंगल में तस्करी कर लाया जाता है। खैर। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सहयोग से केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि 3.1 करोड़ भारतीय भांग, गांजा, चरस, हेरोइन और अफीम का सेवन करते हैं । इसने यह भी चिंता व्यक्त की कि 20 में से केवल एक नशा करने वाले को ही अस्पताल में इलाज मिल पाता है। रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया कि &#8216;पंजाब राज्य में शोधकर्ताओं का अनुभव खराब रहा है।&#8221; संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार , भारत अवैध मादक पदार्थ व्यापार के प्रमुख केन्द्रों में से एक है, जिसमें पुरानी भांग से लेकर ट्रामाडोल जैसी नई दवाएं और मेथामफेटामाइन जैसी डिजाइनर दवाएं शामिल हैं। नशीली दवाओं के व्यापार से प्राप्त धन का उपयोग आतंकवाद, मानव तस्करी, अवैध कारोबार आदि के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। इससे भारत में अपराध की स्थिति और बिगड़ गई है।</p>
<p>भारत में दुनिया की 17% आबादी रहती है, फिर भी यह सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2% और व्यापार का केवल 1% हिस्सा है। गरीबी अभी भी व्याप्त है &#8211; भारत में अभी भी 260-290 मिलियन गरीब रहते हैं। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि धीमी रही है और आय के वितरण में बहुत असमानता है। ये परिस्थितियाँ, अवैध अफीम के दुनिया के दो सबसे बड़े उत्पादकों के बीच भारत की भौगोलिक स्थिति और पारंपरिक सामाजिक पूंजी के टूटने के साथ, आंशिक रूप से बड़े पैमाने पर ग्रामीण-से-शहरी प्रवास और इसके साथ-साथ आधुनिकीकरण के प्रभावों के कारण, हाल के वर्षों में नशीली दवाओं के दुरुपयोग में वृद्धि में योगदान दिया है। नशीले पदार्थों और दवाओं की यह दो तरफा अवैध आवाजाही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। एक तो, देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन करने वाले ड्रग तस्करों का मतलब है कि उन्हीं रास्तों का इस्तेमाल हथियारों की तस्करी के साथ-साथ आतंकवादियों को देश में लाने के लिए भी किया जा सकता है। </p>
<p>मादक पदार्थों के तस्करों, आपराधिक नेटवर्क और आतंकवादियों के बीच गठजोड़ एक और बड़ा खतरा है। आतंकवादियों द्वारा हथियारों और विस्फोटकों के साथ घुसपैठ करने के लिए अच्छी तरह से स्थापित आपराधिक नेटवर्क की मदद से तस्करी के मार्गों का दोहन सीमाओं की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। इसके अलावा, मादक पदार्थों और दवाओं की अवैध बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। </p>
<p>कहते हैं कि शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देश दुनिया के लगभग 80 % अवैध अफीम व्यापार के लिए इंटरनेशनल रूट प्रदान करते हैं जो अफ़ग़ानिस्तान के कई क्षेत्रों से होकर निकलता है। हालांकि शंघाई सहयोग संगठन अपनी स्थापना के बाद से ही रीजनल एंटी टेरेरिस्ट स्ट्रक्चर के तहत नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद की रोकथाम पर अधिक से अधिक कन्वर्जेंस की अपील करता रहा है, लेकिन  शंघाई सहयोग संगठन क्षेत्र के भीतर मादक पदार्थों के इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृत्ति और नशीले पदार्थों का व्यापार संगठन की नाकामी की ओर इशारा करता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6836" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>पिछले दिनों लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय ने कहा था कि दवाओं के दुरुपयोग की समस्या का समाधान करने के लिए, सरकार ने नशीली दवाओं की मांग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीडीआर) तैयार और कार्यान्वित की है, जिसके तहत सरकार मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या को रोकने के लिए एक निरंतर और समन्वित कार्रवाई कर रही है। उनके अनुसार, देश के सभी जिलों में 10000 से अधिक मास्टर स्वयंसेवकों के माध्यम से नशा मुक्त भारत अभियान (एनएमबीए) शुरू किया गया है। इसने 4.96 करोड़ युवाओं और 2.97 करोड़ महिलाओं सहित 14.79 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंच बनाई है। नशीली दवाओं के पीड़ितों के इलाज, निवारक शिक्षा, जागरूकता पैदा करने, प्रेरक परामर्श, विषहरण/नशा मुक्ति, आफ्टर केयर और सामाजिक मुख्यधारा में पुन: एकीकरण प्रदान करने के लिए 350 एकीकृत पुनर्वास केंद्रों को सहायता प्रदान की जाती है। </strong></p>
<p>राय के अनुसार, सरकार द्वारा समर्थित 46 सामुदायिक आधारित सहकर्मी नेतृत्व हस्तक्षेप केंद्र कमजोर और जोखिम वाले बच्चों और किशोरों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। सरकार द्वारा समर्थित 74 आउटरीच और ड्रॉप इन सेंटर (ओडीआईसी) नशीली दवाओं का उपयोग करने वालों के लिए उपचार, पुनर्वास, स्क्रीनिंग, मूल्यांकन, परामर्श, रेफरल, उपचार और पुनर्वास सेवाओं के लिए सुरक्षित और संरक्षित स्थान प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के माध्यम से सरकारी अस्पतालों में 142 नशा उपचार सुविधाएं (एटीएफ) स्थापित की गई हैं और अब तक 124 जिला नशा मुक्ति केंद्र (डीडीएसी) स्थापित किए गए हैं, जो एक ही छत के नीचे आईआरसीए, ओडीआईसी और सीपीएलआई द्वारा प्रदान की जाने वाली सभी तीन सुविधाएं प्रदान करते हैं। </p>
<p>बहरहाल, देश के अख़बारों में नशीली दवाओं के दुरूपयोग और अवैध तस्करी के बारे में विगत दिनों कोई समाचार नहीं देखा, पढ़ा। जबकि कोई 38 वर्ष पहले, 7 दिसंबर 1987 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 26 जून को नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था। आंकड़ों के मुताबिक केंद्र में विगत दस वर्षों में करीब  ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली पदार्थ देश के कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने पकडे हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, यह मात्रा 2004-2014 में करीब ₹5900 करोड़ मूल्य की थी। इतना ही नहीं, गृह मंत्रालय के तहत एजेंसियों द्वारा 1,17,284 किलोग्राम नशीले पदार्थों को नष्ट किया गया। </p>
<p>नशीली दवाओं का दुरुपयोग एक वैश्विक चुनौती बनी हुई है, जो चुपचाप व्यक्तियों को नुकसान पहुँचा रही है, परिवारों को तोड़ रही है और समुदायों को कमज़ोर कर रही है। इसका प्रभाव नशे की लत से कहीं आगे तक जाता है; यह स्थायी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक क्षति का कारण बनता है। बढ़ती चिंता को पहचानते हुए, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसंबर 1987 को एक निर्णायक कदम उठाया। इसने 26 जून को नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में नामित किया। तब से, 26 जून जागरूकता बढ़ाने, निवारक उपायों को बढ़ावा देने और नशीली दवाओं के दुरुपयोग और तस्करी को रोकने के लिए राष्ट्रों के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए एक वैश्विक अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है। इस वर्ष, संगठित अपराध और नशीली दवाओं की तस्करी के चक्र को तोड़ने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। सरकार ने एक केंद्रित और संगठित दृष्टिकोण के साथ नशीली दवाओं के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाई है। भारत सरकार ने नशा मुक्त भारत के सपने को प्राप्त करने के लिए युवाओं और जनता के बीच जागरूकता फैलाकर इस लड़ाई को जन आंदोलन में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया है। केवल एक वर्ष की अवधि में, इस दृष्टिकोण के कारण देश भर में नशीली दवाओं की जब्ती, गिरफ्तारी और समन्वित कार्रवाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6835" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>2024 में, NCB सहित भारत भर में कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने लगभग ₹25,330 करोड़ मूल्य की नशीली दवाएं जब्त कीं; 2023 में जब्त किए गए ₹16,100 करोड़ से 55% ज़्यादा। 2024 में, साइकोट्रोपिक पदार्थों के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली ज़्यादा हानिकारक और नशे की लत वाली सिंथेटिक दवाओं, कोकीन और फ़ार्मास्यूटिकल दवाओं की जब्ती में काफ़ी वृद्धि हुई है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो पिछले कई सालों से एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति के ज़रिए नशीली दवाओं की तस्करी और दुरुपयोग के नेटवर्क को तोड़ने के लिए अथक प्रयास कर रहा है। पिछले एक दशक में दर्ज मामलों, गिरफ़्तारियों और जब्त की गई दवाओं की मात्रा और मूल्य में तेज़ वृद्धि देखी गई है। </p>
<p>नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की स्थापना 17 मार्च 1986 को भारत सरकार द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी और दुरुपयोग के खिलाफ राष्ट्रीय प्रयास का नेतृत्व करने के लिए की गई थी। केंद्र सरकार की देखरेख में संचालित, NCB NDPS अधिनियम और संबंधित कानूनों के तहत राज्यों और विभिन्न एजेंसियों में प्रवर्तन कार्रवाइयों का समन्वय करता है। यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के साथ भारत के अनुपालन को भी सुनिश्चित करता है, मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग का समर्थन करता है, और नशीली दवाओं के दुरुपयोग से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए अन्य मंत्रालयों के साथ काम करता है।</p>
<p><strong>देश भर में नशीली दवाओं के प्रवर्तन को बढ़ावा देने के लिए, प्रमुख संरचनात्मक विस्तार के माध्यम से नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को काफी मजबूत किया गया है। क्षेत्रीय कार्यालयों की संख्या में इजाफा कर 30 कर दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक, नशीले पदार्थों के खतरे को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, एजेंसियों ने 2024 में देश की सबसे बड़ी ऑफशोर ड्रग जब्ती हासिल की। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में, ड्रग नेटवर्क को खत्म करने और अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए सरकार का पूरा दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। NCB, नौसेना और गुजरात पुलिस द्वारा किए गए एक संयुक्त अभियान में, 3132 किलोग्राम ड्रग्स की एक बड़ी खेप जब्त की गई। सुरक्षा एजेंसियों ने एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ किया और गुजरात में 700 किलोग्राम से अधिक प्रतिबंधित मेथामफेटामाइन जब्त किया। NCB ने नई दिल्ली में 82.53 किलोग्राम उच्च श्रेणी का कोकीन जब्त किया।दिल्ली के एक कूरियर सेंटर में बड़ी मात्रा में ड्रग्स जब्त किए जाने के बाद लगभग 900 करोड़ रुपये की भारी मात्रा में ड्रग की खेप को नीचे से ऊपर तक ट्रैक किया गया। एजेंसियों ने कुल 4,000 किलोग्राम मादक पदार्थ भी जब्त किए।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6834" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/N-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>एनडीपीएस अधिनियम (1985) नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध नशीली दवाओं की तस्करी को रोकने और नियंत्रित करने के लिए भारत का मुख्य कानून है। यह नशीली दवाओं और मनोदैहिक पदार्थों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है जब तक कि चिकित्सा या वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए अनुमति न दी जाए। यह उल्लंघन के लिए सख्त दंड प्रदान करता है और नशीली दवाओं पर निर्भर लोगों के उपचार का समर्थन करता है। नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस समन्वित कार्रवाई, जागरूकता और पुनर्वास के माध्यम से नशीली दवाओं के खतरे से निपटने की तत्काल आवश्यकता की वैश्विक याद दिलाता है। शून्य-सहिष्णुता नीति, मजबूत प्रवर्तन प्रयासों और नशा मुक्त भारत अभियान जैसी जन-केंद्रित पहलों के साथ, भारत एक सुरक्षित, स्वस्थ और नशा मुक्त भविष्य के निर्माण की दिशा में दृढ़ कदम उठाना जारी रखता है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/drug-problem-in-the-country-film-industry">संसद, सांसद रवि किशन और जया बच्चन, देश, फिल्म जगत में नशा की समस्या और ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली ​पदार्थों पर कब्ज़ा &#8211; कुछ तो सही होगा ही</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-6 ✍ जहाँ आगंतुकों से पैसे नहीं मिलने पर कैदी के गुदा मार्ग में लोहे का रॉड घुसेड़ा गया था और गलती छुपाने के लिए कह दिया &#8216;बवासीर&#8217; हो गया है😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Apr 2025 04:02:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[anus]]></category>
		<category><![CDATA[atrocities]]></category>
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		<category><![CDATA[government]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: भारत में बिलंब से चलने की आदत न केवल भारतीय रेल में प्रचलित है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र से लेकर रोजी-रोजगार के लिए सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाएं और परीक्षा-फल भी ग्रसित हैं। अपवाद छोड़कर, बिरले ही कोई सरकारी कार्यक्रम, योजनाएं आदि हैं जो घड़ी की सूई [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/tihar-trauma-when-an-iron-rod-was-inserted-in-prisoners-anus">तिहाड़ जेल-6 ✍ जहाँ आगंतुकों से पैसे नहीं मिलने पर कैदी के गुदा मार्ग में लोहे का रॉड घुसेड़ा गया था और गलती छुपाने के लिए कह दिया &#8216;बवासीर&#8217; हो गया है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: भारत में बिलंब से चलने की आदत न केवल भारतीय रेल में प्रचलित है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र से लेकर रोजी-रोजगार के लिए सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाएं और परीक्षा-फल भी ग्रसित हैं। अपवाद छोड़कर, बिरले ही कोई सरकारी कार्यक्रम, योजनाएं आदि हैं जो घड़ी की सूई के साथ चलती हो। जब सभी को बिलम्ब से चलने की आदत है तो भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाला राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और उसका वार्षिक प्रतिवेदन समय पर क्यों प्रकाशित हो। यह बिमारी आज से नहीं, बल्कि दशकों से ग्रसित है। यही कारण है कि भारत सरकार का गृह मंत्रालय अथवा गृहमंत्री जब भी देश के संसद में आपराधिक गतिविधियों, खासकर जघन्य अपराध, मसलन हत्या, बलात्कार, न्यायिक / पुलिस हिरासत में मौत की संख्या के बारे में संसद को बताते हैं तो (अपवाद छोड़कर) राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की सांख्यिकी के बदले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सांख्यिकी प्रस्तुत करते हैं। इस कहानी को लिखने के समय तक भी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का वार्षिक प्रतिवेदन अभी सबसे नवीनतम 2022 का ही है जो यह दावा करता है कि 2021 की तुलना में संज्ञेय अपराधों के पंजीकरण में 4.5% की कमी आयी है, साथ ही महिलाओं के खिलाफ अपराधों और साइबर अपराध, विशेष रूप से धोखाधड़ी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।</strong></p>
<p>इसका दृष्टान्त यह है कि विगत दिनों गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय लोकसभा को बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा 2021-22 (28 फरवरी, 2022 तक) में न्यायिक हिरासत में व्यक्तियों की मौत से संबंधित कुल 2,152 मामले और पुलिस हिरासत में मौतों से संबंधित 155 मामले दर्ज किए गए, तो दावा और पक्का हो गया।उन्होंने कहा कि 2021-22 में न्यायिक हिरासत में मौतों के सबसे ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश (448) में दर्ज किए गए, जबकि उस साल पुलिस हिरासत में सबसे ज़्यादा मौतें महाराष्ट्र (29) में हुईं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2021-22 में हिरासत में मौतों के 137 मामलों में कुल 4.53 करोड़ रुपये के मुआवजे की घोषणा की, जो 2020-21 में 161 मामलों में दिए गए 4.88 करोड़ रुपये के मुआवजे से कम है। इसके विपरीत दुखद स्थिति यह है कि पिछले पांच सालों में हिरासत में मौतों के सिर्फ़ 21 मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। हालांकि, किसी भी मामले में अभियोजन को निर्देश नहीं दिया गया।</p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=129s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p><strong>राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 2020-21 में 1840 न्यायिक मौतें हुईं, 2019-20 में 1584, 2018-19 में 1797, 2017-18 में 1636 और 2016-17 में 1616 मौतें हुईं। आयोग के पास पुलिस हिरासत में मौत के मामले 2020-21 में 100, 2019-20 में 112, 2018-19 में 136, 2017-18 में 146 और 2016-17 में 145 थे। 2019 में, भारत का अनुमान है कि 1723 हिरासत में मौतें हुई हैं, जो हर दिन 5 मौतों के बराबर है। हिरासत के दौरान, पुलिस अभियुक्तों से कबूलनामा निकालने और सबूत हासिल करने के लिए विभिन्न थर्ड-डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करती है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6271" aria-describedby="caption-attachment-6271" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6271" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3553-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6271" class="wp-caption-text">​तिहाड़ जेल</figcaption></figure>
<p>इस तथ्य के बावजूद कि भारत ने टॉर्चर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन भारत ने इस कन्वेंशन की पुष्टि नहीं की है या हिरासत में हिंसा को रोकने के लिए कोई केंद्रीय कानून पारित नहीं किया है। हालांकि, व्यक्तियों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 214 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी दी गई है, जिसमें “सम्मान के साथ जीने के अधिकार” और प्रत्येक व्यक्ति की भलाई पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हिरासत में यातना सहित मानवाधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करता है। इन कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद, हिरासत में मौतों के आंकड़े मौजूदा कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से हिरासत में हिंसा को रोकने में प्रणालीगत विफलता को इंगित करता है। </p>
<blockquote><p>इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ क्रिमिनल, कॉमन एंड स्टेचुटरी लॉ 2024 में प्रकाशित ईवा वर्मा के रिपोर्ट के अनुसार, &#8220;सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर स्थिति को पहचानते हुए, हिरासत में हिंसा को भारतीय नैतिकता के अनुसार अस्वीकार्य माना है, जिसके कारण अभियुक्त की मृत्यु हो जाती है। इसे न केवल पीड़ित के खिलाफ बल्कि मानवता के खिलाफ भी अपराध के रूप में वर्गीकृत किया गया है। हिरासत में मौत भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत &#8220;जीवन के अधिकार&#8221; का स्पष्ट उल्लंघन है।&#8221; </p></blockquote>
<p>परंतु दुर्भाग्य यह है कि &#8220;पिछले दो दशकों में, पूरे भारत में हिरासत में जितनी मौतें दर्ज की गई है, उसमें मात्र 893 मामले पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज किए गए, जबकि मात्र 358 पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों पर औपचारिक रूप से आरोप लगाए गए। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस अवधि में केवल 26 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया। यहाँ इन बातों का इसलिए जिक्र कर रहा हूँ क्योंकि देश में अभी कुल 1330 काराओं में (2022 का आंकड़ा) &#8211; 143 केंद्रीय कारा हैं, 428 जिला कारा हैं, 574 सब-जेल हैं, 34 महिलाओं के लिए कारावास हैं, 91 खुले जेल हैं, 10 बोर्स्टल स्कूल हैं, 42 स्पेशल जेल हैं और 3 अन्य जेल है &#8211; और इन कारावासों में कैदियों के साथ कैसा व्यवहार होता है, या फिर कैदी कारावास में अपने सह-कैदियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं &#8211; यह प्रशासनिक दृष्टि से सर्वविदित है। खैर। </p>
<p>अन्य कारावासों की बात आगे करेंगे, अभी चलते हैं दिल्ली सरकार के अधीन वाली ऐतिहासिक केंद्रीय कारा तिहाड़। भारतीय संसद और भारत के सर्वोच्च न्यायलय से इस कारावास की दूरी अधिकतम 15-16 किलोमीटर है। अपने स्थापना काल यानी साल 1958 से तिहाड़ जेल विगत 67 वर्षों में कई सौ ऊँची कुर्सियों पर बैठने वाले अधिकारियों से लेकर, सफ़ेद वस्त्र धारी नेताओं तक, हज़ारों समाज सेवियों से लेकर, उतनी ही संख्या और अधिक के कमाई करने वाले, कानून को धज्जी उड़ाने वाले लोगों को देखा है। तिहाड़ पर अब तक कई टन कागजों पर प्रतिवेदन बने होंगे ताकि कारावास के अंदर कैदियों को सजा भुगतते-भुगतते एक अच्छे मनुष्य के रूप में बाहर आने, समाज के मुख्य धाराओं में जुड़ने का अवसर मिले। लेकिन, आज भी जब कारावास को मानवीय दृष्टि से देखने की बात होगी तो किसी भी अन्य अधिकारियों, पदाधिकारियों, न्यायविदों का नाम लेने से पहले और शायद अंतिम नाम भारत के प्रमुख न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर का होगा। </p>
<p>न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर 1970 के दशक में लगभग सात वर्ष तक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे और अपने कार्यकाल में उन्होंने देश के सबसे बड़े न्यायालय तक आम आदमी की पहुँच को सुलभ बनाया। साल 1980 में न्यायमूर्ति अय्यर ने कहा था: &#8220;कैदी विशेषता दोहरे विकलांग होते हैं। पहली बात तो यह कि अधिकतर कैदी समाज के दुर्बल वर्गों से आते हैं, जिनका गरीबी, शिक्षा और सामाजिक स्तर अत्यंत निम्न होता है। दूसरे, जेल एक चहारदीवारी वाली दुनिया होती है, जिसका सामान्य इनसानी दुनिया से संवाद और संपर्क बहुत कम होता है, जिसके परिणामस्वरूप घोषित कैदी अदृश्य होते हैं। उनकी आवाज सुनाई नहीं देती और उनके साथ होने वाला अन्याय उपेक्षित होता है।&#8221; </p>
<p>लोग माने अथवा नहीं, लेकिन इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता है कि तत्कालीन कैदी सुनील बत्रा के कारण भारत के जेलों के अंदर होने वाले उत्पीड़न पर सं 1978 का ऐतिहासिक निर्णय आया था और यही कारण था की उच्चतम न्यायालय ने निर्जन कारावास पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। क्या आपको कभी इस बात की जानकारी थी कि वह स्वयं एक उत्पीड़क था? या आप यह जानते हैं कि दसकों पहले हमारी हिरासत में  हुई उद्योगपति राजन पिल्लई की मृत्यु की हमें कितनी महंगी कीमत चुकानी पड़ी थी? परन्तु इसके वावजूद हम अभी तक तिहाड़ में भविष्य में होने वाली हिरासती मौतों के विरुद्ध कोई प्रभावशाली कदम उठाने में आज तक विफल रहे हैं। इतना अधिक कि मौजूदा समय में सर्वाधिक बीभत्स  अपराधों का वर्ष 2012 के निर्भया केस के बलात्कारियों और हत्यारों को अन्य कैदियों के साथ छोड़ दिया गया था, जहाँ उनके मारे जाने की सम्भावना अत्यधिक प्रवाल थी। इन्हीं तमाम कारणों ने निर्भया केस के प्रमुख अभियुक्त राम सिंह को तिहाड़ के अंदर संदिग्ध परिस्थितियों में मरने को मजबूर कर दिया था।&#8221; </p>
<figure id="attachment_6272" aria-describedby="caption-attachment-6272" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6272" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3580-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6272" class="wp-caption-text">सुनील कुमार गुप्ता, पूर्व जेलर, तिहाड़ जेल</figcaption></figure>
<p>विगत दिनों हम तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता से मिले थे। उन्होंने कहा कि &#8220;सुनील बत्रा वाली घटना मेरे तिहाड़ में प्रवेश करने से काफी पहले हुयी थी। मैंने ऐसी व्यक्ति के रूप में तिहाड़ में प्रवेश किया था, जिसे शिकायतों से प्रत्यक्ष निपटना था और जो न्याय प्रक्रिया का एक अंग था और जिसे व्यवस्था बनाये रखने के लिए हिंसा का सहारा भी लेना पड़ा। मैं अँधा नहीं था की अपने इर्द गिर्द अक्सर मडराने वाली उपहास पूर्ण परिस्थितियों को अनदेखा कर देता। जब उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की बात चलती है तो मुझे सर्वाधिक स्मरणीय मामला सुनील बत्रा का दिखाई देता है। मैंने चार्ल्स शोभराज के आगे-पीछे घूमने वाले एक बिगड़ैल बच्चे के रूप में तो वह था ही, वह एक धनी प्राचीन मूर्ति विक्रेता का लाडला पुत्र था और अमीर लोगों की बस्ती सुंदर नगर में रहता था। तिहाड़ में उसका आगमन सं 1973 में एक शास्त्र डकैती के कारण हुआ था, जो इतनी भयानक सिद्ध हुई की उसमें दो लोगों की मृत्यु हो गई थी। बत्रा, जिसकी उम्र उस समय 27 वर्ष थी, को मौत की सजा दी गयी थी और उसे निर्जन कोठरी में बंद कर दिया गया था। लेकिन उसने आगे चलकर जो कार्य किया, उससे न केवल उसके जीवन का लक्ष्य बदल गया, बल्कि मृत्यु दंड प्राप्त अन्य सभी कैदियों की दशा भी बदल दी गयी थी।&#8221; </p>
<p>कहते हैं साल 1977 में सुनील बत्रा ने अपनी काल कोठरी से उच्चतम न्यायालय को एक पत्र लिखा, जिसे न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने याचिका का रूप दे दिया। अनेक कैदी न्यायधीशों और न्यायालयों को पत्र लिखते थे, परन्तु उन पत्रों की बड़ी संख्या केसों के कूड़े में जाकर विलीन हो जाती थी। यह एक सुखद संयोग की बात थी कि न्यायमूर्ति अय्यर ने केरल की पहली सरकार में  जेल मंत्री के रूप में काम किया था और जेल सुधर एक ऐसा क्षेत्र था, जिससे वे पहले से परिचित थे। इसलिए उन्होंने सुनील बत्रा के पत्र को अत्यंत गंभीरता से लिया। वास्तव में, उनके कार्यकाल में  अनेक प्रगतिशील निर्णय पारित किये गए थे। उन्होंने इस व्यापक प्रश्न का निर्णय करने हेतु एक विशेष जांच बैठा दी कि क्या निर्जन कारावास मात्रा एक दंड था या वह सुधार के उद्देश्य से घातक था? मामला अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि न्यायमूर्ति अय्यर उसमें व्यक्तिगत रूप से रूचि ले रहे थे। इसका अर्थ यह था कि हमारी जेलों के इतिहास में एक मात्र और पहली बार उच्चतम न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश तिहाड़ जेल में हेतु पधारे कि क्या वहां की स्थितियां वास्तव में बुरी थी, जितनी कि पत्र में बताई गई थी। </p>
<blockquote><p>ज्ञातव्य हो कि 5 अगस्त 1986 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिला एवं सत्र न्यायाधीश को दो महीने में कम से कम एक बार जिला जेल का दौरा करना चाहिए और बाल कैदियों, चाहे वे दोषी हों या विचाराधीन, का विशेष ध्यान रखना चाहिए तथा किसी भी उल्लंघन की ओर उनका ध्यान आकर्षित करना चाहिए। इसके चौदह साल बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा ने 29 अगस्त 2000 को तिहाड़ सेंट्रल जेल का दौरा किया। यह आयोग के किसी भी अध्यक्ष द्वारा इस जेल का पहला दौरा था । बाद में आयोग ने जेल अधिकारियों के साथ-साथ दिल्ली सरकार को निम्नलिखित सिफारिशें/निर्णय भेजे। लेकिन उसका क्या हुआ यह तो सरकार के साथ साथ जेल अधिकारी अधिक जानते हैं। </p></blockquote>
<figure id="attachment_6273" aria-describedby="caption-attachment-6273" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6273" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Ayyar-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6273" class="wp-caption-text">न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, जब न्यायमूर्ति एम एच बेग, न्यायमूर्ति पी एस कैलासम एवं न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने 23 जनवरी, 1978 को तिहाड़ जेल का दौरा किया कि स्थिति उतनी विकराल नहीं थी, जितनी की पत्र में उन्हें बताई गयी थी। इसके वावजूद, जब न्यायमूर्तियों ने पाया  कि अधिकतर कैदी  निर्जन कारावास की अपेक्षा शारीरिक दंड को अधिक प्राथमिकता देते थे तो उन्होंने निर्णय दिया कि सुनील बत्रा या किसी ने कैदी पर अब उसे लागु नहीं किया जायेगा, क्योंकि वह किसी भी उत्पीड़न से कम नहीं था। निर्जन कारावास के विरुद्ध यह ऐतिहासिक निर्णय बन गया। एक ओर जहाँ इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विभिन्न जेलों में निर्जन कारावास की व्यवस्था आज भी विद्यमान है, वह वैधानिक नहीं है और कैदियों के पास उसके विरुद्ध शिकायत करने का एक परतावधान मौजूद है। </p>
<p>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;देश के शीर्षस्थ न्यायाधीशों  से संवाद स्थापित करने और सफलता का स्वाद चखने के एक वर्ष बाद सुनील बत्रा ने 1979  पत्र लिखा। उसने एक अन्य कैदी प्रेम चंद पर किये जाने वाले अत्याचार के बारे में लिखा था। 26 अगस्त 1979 को प्रेमचंद को अत्यधिक रक्तस्त्राव के कारण लेडी इर्विंग अस्पताल ले जाया गया था। ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने पाया कि उसके गुदा में घाव हो गया है जिसके बारे में उसके साथ गए जेल कर्मचारियों ने उसे यह कहकर दरकिनार करने की कोशिश की थी कि प्रेमचंद के अधिक नशे की लत के कारण उसे रक्तस्त्राव हो रहा था। बहरहाल, डाक्टर ने उनके स्पष्टीकरण को अविश्वसनीय माना और उसके घाव को ठीक करने के लिए शल्य क्रिया करने का निर्णय लिया। उस घटना की शिकायत जब उच्च न्यायालय पहुंचा तो वह भी एक याचिका बन गई और उसकी जांच के लिए न्यायालय ने वाई.एस. चितले एवं मुकुल मुद्गल को कोर्ट द्वारा नियुक्त कर जांच कर्ता बनाया, जो कालांतर में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने। जेल के अधिकारियों ने सच्चाई दबाने की भरपूर कोशिश की थी। &#8216;पतन&#8217; कथा के अतिरिक्त उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि संभवतः प्रेमचंद बवासीर की बीमारी से ग्रस्त था और उन्होंने अपनी कहानी को मनाने के लिए प्रेमचंद पर दबाव भी बनाया था। परन्तु अंततोगत्वा सत्य बाहर आ ही गया। </p>
<p><strong>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;उच्चतम ​न्यायालय के निर्णय के अनुसार, वार्डर मग्गर सिंह ने प्रेमचंद के गुदा मार्ग में लोहे की एक रॉड घुसेड़ दी थी, क्योंकि वह प्रेमचंद से मिलने आने वाले मुलाकातियों से उसकी मुलाक़ात करवाने के बदले रिश्वत की मांग कर रहा था, जिसे पूरी कर पाने में गरीब प्रेमचंद असमर्थ था। इस नियमोलंघन की दुखद प्रकृति ने सभी को हिलाकर रख दिया था, जिससे पता चलता था कि जेल के अंदर की स्थितियां कितनी क्रूर हो सकती हैं कि वहां ऐसा जघन्य कृत किया गया। परन्तु इसके वावजूद मग्गर सिंह को जेल कर्मियों की ओर से समर्थन मिला और उन्होंने उसके अपराध को छिपाने की भरपूर कोशिश की। जांच कार्रवाई का संचालन करने वाले न्यायमूर्तियों ने सुनील बत्रा को धन्यवाद दिया, जो उस समय मौत की सजा काट रहा था (जिसे बाद में बदलकर आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया गया था , जिसने इस निर्दयता के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी और जिसने उच्चतम न्यायालय को सन् 1979 में यह कहने पर विवश कर दिया था कि कैदी भी इन्सान हैं, कोई जानवर नहीं और जेल प्रणाली में मानव कैदी के सम्मान के विरुद्ध आचरण करने वाले उसके पथभ्रष्ट &#8216;अभिभावकों&#8217; को दण्डित करने का आदेश दिया था।&#8221; </strong></p>
<p>चलिए आगे बढ़ते हैं। न्यायिक अधिकारी उत्पीड़न के अन्य प्रकारों की ओर भी सचेत हुए, जो मग्गर सिंह द्वारा किये गए उत्पीड़न के समान मुखर नहीं थे, परन्तु अब भी अत्यंत कष्टप्रद एवं अपमानजनक थे, जिसमें दूरस्थ जेलों में कैदियों का स्थानांतरण, जहाँ कोई उससे मिलने नहीं जा सकता था या शौचालय की सफाई जैसा अमानवीय कार्य कराया जाता था अथवा उन्हें शौचालय के पास सोने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्होंने महसूस किया कि कैदियों को कोड़े मारने जैसे नियम पंजाब जैसे राज्य की जेल नियमावलियों के अंग के रूप में अभी भी विद्यमान थे। वहां वयस्क कैदियों को नितम्बों पर 30 कोड़े तक और किशोरों को 15 कोड़े मारने का नियम मौजूद था। अन्य जेलरों के लिए यह सर्वाधिक पसंदीदा भौतिक अनुशासन था और सं 1971 में उन्होंने एक कैदी को इतने कोड़े मारे कि उसकी मृत्यु हो गयी। </p>
<figure id="attachment_6274" aria-describedby="caption-attachment-6274" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6274" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-683x1024.jpg 683w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-768x1151.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3575-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6274" class="wp-caption-text">तिहाड़ में प्रवेश करती एक कैदी का परिजन</figcaption></figure>
<p>सुनील गुप्ता आगे कहते हैं: &#8220;सुनील बत्रा जैसा कोई व्हिसिल ब्लोवर बलात्कारी एवं उत्पीड़क क्यों बन गया? या सदैव वह ऐसा ही था? मैं उससे मारकंडे रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद ही मिला था। तब तक उस रिपोर्ट के आधार पर उसकी शक्तियों में काफी कमी कर दी गई थी और अब उसकी कोठरी में कोई नाबालिग लड़का नहीं जाता था। सुनील बत्रा के इस दोहरे चरित्र का एक उचित कारण यह था कि  वह एक अवसरवादी व्यक्ति था। उसने निर्जन कारावास का मुद्दा केवल इसलिए उठाया था, क्योंकि उसे स्वयं वहां रखा गया था और वहां की दशन अत्यंत दयनीय हो गयी थी। परन्तु जब उसके लिए वही स्थिति सुविधाजनक लगी तो उसे अन्य कैदियों के उत्पीड़न में कोई दोष नजर नहीं आया। वास्तविकता यह है कि जेलों में अप्राकृतिक मैथुन के विषय में कुछ भी असामान्य नहीं है। मैं नहीं जानता कि बत्रा अपनी कोठरी में नाबालिगों को लाने का प्रबंध कैसे करता था, परन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि यदि उन दोनों लड़कों ने अपने खिलाफ होने वाले अप्राकृतिक यौनाचार की शिकायत जेल अधिकारियों से की होती तो उन्हें यह कहकर भगा दिया जाता &#8220;की अरे भाग।&#8221;</p>
<p>परन्तु, गुप्ता जी कहते है कि &#8220;अनेक गैर-सरकारी संगठनों द्वारा सर्वेक्षणों से पता चला है कि जेल में युवा अवस्था अपराधियों में से 50 प्रतिशत के साथ अप्राकृतिक यानाचार किया गया था। जो लोग मजबूर हैं या जेल के आसपास लम्बे समय से रह रहे हैं, वे लोग गुदा मैथुन को प्रताड़ना या अपने शक्ति प्रदर्शन के औजार के रूप में देखते हैं। मुझे नहीं मालूम कि सुनील बत्रा समलैंगिक था या नहीं, क्योंकि मैंने अनेक सीधे-सादे कैदियों को देखा था, जो जेल में समलैंगिकता की ओर मुड़ गए थे। दूरदर्शी न्यायमूर्ति अय्यर ने जेल से गैरहाजिरी यह स्वीकृत अवकाश का समर्थक होने का एक अन्य कारण यह भी था। उत्पीड़न के विरुद्ध दिए गए अपने उसी निर्णय में उन्होंने इस बड़ी समस्या को पहचाना था और कहा था कि युवा अपराधियों को बड़े अपराधियों के साथ रखा जाना या विचाराधीन कैदियों को सजायाफ्ता या दूसरे कैदियों के साथ रखा जाना अप्राकृतिक यौनाचार का कारण बन सकता था।  </p>
<figure id="attachment_6275" aria-describedby="caption-attachment-6275" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6275" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6275" class="wp-caption-text">​तिहाड़ में किरण बेदी (तस्वीर इण्डिया टुडे के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p><strong>सलाखों के पीछे रहने वाले कैदियों के लिए सेक्स निर्विवाद रूप से एक प्रासंगिक विषय था। और सम्भवतः इन्हीं कारणों से उन्होंने आकस्मिक अवकाश प्रणाली को अच्छे आचरण की एक सौगात के रूप में देखा था, ताकि कैदी अपने सछ्वासिक संबंधों को बनाये रख सकें। दरअसल, उन्होंने कैदियों को सप्ताहांत में छुट्टी दिए जाने की वकालत की थी, ताकि वे अपने परिवारों के साथ रह सकें। कालांतर में 90 के दशक के प्रारम्भ में जब किरण बेदी तिहाड़ की प्रमुख बनी, वह जेल में कंडोम बिकने की मशीन की विवादास्पद संकल्पना के साथ सामने आयीं। उनके निर्णय को न्यायालय में चुनौती भी दी गयी, लेकिन जब तक न्यायालय किरण बेदी के निर्णय पर कोई विचार करती, उससे पूर्व ही वह तिहाड़ की प्रमुख नहीं रह गयीं थी ।</strong> </p>
<figure id="attachment_6276" aria-describedby="caption-attachment-6276" style="width: 1347px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom.jpg" alt="" width="1347" height="1367" class="size-full wp-image-6276" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom.jpg 1347w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-296x300.jpg 296w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-1009x1024.jpg 1009w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-768x779.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Kiran-Bedi-Condom-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 1347px) 100vw, 1347px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6276" class="wp-caption-text">​तिहाड़ में किरण बेदी (तस्वीर इण्डिया टुडे के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p>साल 1981 में, उच्चतम न्यायालय के एक विवादस्पद निर्णय के आधार पर सुनील बत्रा की मौत की सजा को संक्षिप्त करते हुए आजीवन कारावास में बदल दिया गया था और कुछ वर्षों बाद उसे रिहा कर दिया गया था। वह कुछ वर्षों तक वकालत करने के बाद तिहाड़ वापस आया। इस बार उसे नशा सम्बन्धी अपराध में जेल लाया गया था। बहरहाल, उसकी विरासत जीवित रही और आज भी जेलों में प्रासंगिक है। यह आवश्यक नहीं है कि उत्पीड़न भौतिक या लैंगिक आघात के रूप में ही हो। अक्सर उसका अर्थ यह होता है कि संरक्षक उत्पीड़न के विरुद्ध अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। न्यायमूर्ति अय्यर ने बेशक आदेश पारित करने  मग्गर सिंह के खिलाफ दशकों पूर्व कार्रवाई करने का आदेश दिया था, परन्तु हिरासत में होने वाली ाबढ़ती मौतों की संख्या के रूप में उत्पीड़न का अस्तित्व आज भी बरकरार है। </p>
<p>तिहाड़ में सर्वाधिक उच्च स्तरीय, नाटकीय और विवादस्पद हिरासती मौत सं 1995 में बिस्कुट निर्माता राजन पिल्लई की थी। उस पुरे समय के दौरान मैं वहीँ था और मुझे याद है कि तिहाड़ ने केटीएस तुलसी और विकास पाहवा जैसे बड़े वकीलों को न्यायमूर्ति लीला सेठ, जो उस घटना की जांच कर रही थी, की अदालत में पेश होने के लिए कितना धन खर्च किया था। मेरे विचार से, वह तिहाड़ की और से अब तक सीखा गया सबसे मंहगा सबक था। </p>
<p>जिस समय ब्रिटानिया कंपनी समूह के अध्यक्ष राजन जनार्दन मोहनदास पिल्लई को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया, उस समय हम उनसे काफी परिचित थे। हमें उस कहानी का पता था कि कैसे उनके सिंगापूर स्थित कारोबारी साझेदारी के साथ उनका विवाद हुआ था और उसने पिल्लई के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई शुरू की थी।सिंगापूर की अदालत ने जब राजन पिल्लई को अप्रैल 1995 में दोषी पाया तो वहां से भागकर दिल्ली आ गए। सिंगापूर ने चुस्ती दिखाते हुएप्रत्यर्पण का नोटिश भेजा और इंटरपोल ने उसके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया, जिसका भारत को पालन करना था। सिंगापूर की ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण के मामले को न्यायमूर्ति एस.पी मेहता को सौंप दिया, जिन्होंने उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया। तीन महीने तक उसका पीछा करने के बाद 3 जून 1995 को शक्तिशाली कारोबारी को राजधानी के ह्रदय स्थली होटल ली मेरिडियन के कामना नंबर 1986 से गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी गिरफ्तारी के समय पुलिस ने उसके होटल के कमरे से दवाओं के साथ साथ शराब भी बरामद की थी। यह एक महत्वपूर्ण जानकारी थी, परन्तु किसी अज्ञात कारण से उसे उसके रिकार्डों में उस रूप में नहीं दर्ज किया गया, जैसा की उसे दर्ज किया जाना चाहिए था। </p>
<figure id="attachment_6277" aria-describedby="caption-attachment-6277" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6277" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/6-Rajan-Pillai-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6277" class="wp-caption-text">राजन जनार्दन मोहनदास पिल्लई</figcaption></figure>
<p><strong>राजन पिल्लई को मजिस्ट्रेट एस पी मेहता के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिन्हे अगली सुबह उसके प्रत्यर्पण का निर्णय करना था। उसी समय पिल्लई के वकीलों की ओर से अपोलो अस्पताल का एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें कहा गया था कि उसे चिकित्सा पर्यवेक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि वह शराब-जन्य लीवर सिरोसिस की बीमारी से पीड़ित है। सर्वाधिक महत्वपूर्व तथ्य यह था कि अस्पताल के नोट में यह भी कहा गया था कि एक दिन पहले उसे शौच के साथ रक्त स्त्राव हुआ था और उसने खून की उल्टियां भी की थी, जिसका अर्थ यह था कि वह अत्यंत गंभीर अवस्था में था। उसकी चिकित्सा टिपण्णी में इस बात की साफ़-साफ़ चेतावनी दी गयी थी कि यदि समुचित उपचार उपलब्ध नहीं कराया गया तो परिणाम घातक हो सकते थे। उस टिपण्णी में आगे यह भी परामर्श दिया गया था कि उसके लिए वंचित लेजर सर्जरी हेतु उसे एस्कार्ट अस्पताल ले जाना चाहिए। </strong></p>
<p>न्यायमूर्ति मेहता ने उसे जेल भेज दिया, परन्तु उन्होंने उसके साथ ही जेल के रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर को एक &#8216;तात्कालिक&#8217; पत्र लिखा और पूछा कि क्या तिहाड़ पिल्लई की देखभाल कर सकती है और केंद्रीय जांच ब्यूरो से पूछा की वह इसके चिकित्सा आवेदन के विषय में क्या सोचती है? उन्होंने तिहाड़ को इस बात का भी निर्देश दिया कि वह पिल्लई की चिकित्सीय समस्याओं का ध्यान रखे और दूसरी ओर अदालत आरएमओ की अगले दिन आने वाली विस्तृत रिपोर्ट की प्रतीक्षा करती रही। </p>
<p>तिहाड़ में प्रत्येक व्यक्ति को किसी अमीर कैदी को आना अच्छा लगता है, क्योंकि वह उन्हें जेल के उत्पादों को बेचकर धनार्जन का अवसर देता है। परन्तु 48-वर्षीय पिल्लई उन धनि कैदियों से बिलकुल भिन्न था। उसके अंदर ऐसा कोई घमंड या कुंठा नहीं थी, जो सामान्यतया धनि और शक्तिशाली कैदियों से जुडी होती है। वास्तव में पिल्लई एक शांत एवं विनम्र कैदी था। उसके साथ जेल में बातचीत करने वालों के वकीलों ने कहा कि वह अत्यंत कुम्हलाया हुआ था। उन्हें इस बात की बहुत काम जानकारी थी कि कैसे तेजी से चीजें उसके नियंत्रण से बाहर होती जा रही थी। </p>
<p>न्यायमूर्ति मेहता ने जो पत्र तिहाड़ के आरएमओ के पास भेजा था, वह उसके पास कभी पहुंचा ही नहीं, क्योकि उस पत्र को भेजने का दायित्व जिस व्यक्ति पर था, उसने उसकी तात्कालिकता को उतना महत्व ही नहीं दिया था। उसने उस पात्र को स्वयं आरएमओ के पास जाकर देने के वजाय कुरियर से भेज दिया था। इससे भी बुरी स्थिति यह थी कि जो डाक्टर जेल में आने वाले नए कैदियों की चिकित्सा जांच करता था, वह उस दिन अपनी ड्यूटी पर मौजूद ही नहीं था , जिस दिन पिल्लई को तिहाड़ लाया गया था। </p>
<p>अगली सुबह तक भी न्यायमूर्ति मेहता को तिहाड़ की डाक्टरों की ओर से कोई अपेक्षित जानकारी नहीं दी गयी और सीबीआई पिल्लई के ख़राब स्वास्थ्य के बारे में दिए गए किसी सुझाव को सवीकार करने को तैयार नहीं थी। सीबीआई के अधिकारियों ने अदालय को बताया था कि जिस समय उन्होंने पिल्लई को गिरफ्तार किया था, वह शराब पी रहा था। अतः पिल्लई को इलाज के बहाने एस्कॉर्ट अस्पताल भेजने का सुझाव स्वीकार्य नहीं था। इसके प्रत्युत्तर में पिल्लई के वकीलों ने उसके चिकित्सा प्रतिवेदनों को प्रस्तुत किया। परन्तु न्यायाधीश महोदय स्वतंत्र चिकित्सा परामर्श चाहते थे, जो उन्हें तिहाड़ के आरएमओ से प्राप्त करने की अपेक्षा थी, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को अगले दिन, यानी 6 जुलाई तक रोक लिया और पिल्लई को वापस जेल भेज दिया। यह पिल्लई का दुःर्भाग्य था कि जब तक वह अदालत से तिहाड़ पहुंचा, उस समय शाम के पांच बज चुके थे, यानी तिहाड़ का आरएमओ अपनी ड्यूटी समाप्त करे वापस घर जा चूका था। </p>
<blockquote><p>6 जुलाई को राजन पिल्लई को हिरासत में गए तीन दिन बीत चुके थे। उन तीन दिनों में उसने अपनी प्रस्तावित दवाइयां नहीं ली थी, क्योंकि उसकी जांच ही नहीं हुई थी। जेल प्राधिकारियों ने जज को सौंपी अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि उसके पास लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी की चिकित्सा के साधन नहीं थे, परन्तु उन्होंने कहा कि उस बिमारी की इलाज की सुविधा एम्स जैसे सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध थी। न्यायमूर्ति मेहता ने किसी निजी अस्पताल में जांच करने की पिल्लई की मांग को अस्वीकार कर दिया और 11 जुलाई तक के लिए फिर तिहाड़ भेज दिया, लेकिन उसे अपनी दवाएं लेने की अनुमति प्रदान कर दी थी। </p></blockquote>
<p>गुप्ता कहते हैं: &#8220;उस शाम राजन पिल्लई जेल नंबर 4 स्थित अपने लिए नियत वार्ड नंबर 9 में गया। वह तनावग्रस्त था। वह अदालत में ही कांपने लगा था। न्यायाधीश ने अपने आदेश में तिहाड़ के डाक्टर को उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करने का आदेश दिया था। पिल्लई के गृह राज्य केरल के एक अन्य कैदी जॉर्ज कुट्टी ने उसे पहनने के लिए लुंगी और पानी का एक बोतल दी और सोने के लिए सीमेंट का बना चबूतरा दिखाया। अगले दिन सुबह ताला खुलने के समय प्रहरियों ने पिल्लई को सीमेंट के चबूतरे पर लेते देखा था। पिल्लई के शरीर में सूजन आ गयी थी। वह नंगे पांव बार बार शौचालय गया था। इसके बावजूद किसी को उसकी सहायता के लिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वे इसे किसी नए आदमी के जेल में आने पर होने वाली असुविधा के रूप में देख रहे थे।&#8221; </p>
<p><strong>&#8220;जिस समय हमने उसे सीमेंट के चबूतरे पर लेते हुए पाया था, पिल्लई बुरी हालत में था और उसे बहुत तेज बुखार था। लेकिन उसे किसी अस्पताल में ले जाने के बजाय सामान्यतया जेल के चिकित्सक के पास ले जाया गया। जेल के चिकित्सक ने उसे &#8216;कम्पोज&#8217; के एक इंजेक्शन दिया, जिसका उपयोग आम तौर पर कैदियों में होने वाली व्यग्रता के उपचार के लिए किया जाता है। जब उसके वकील प्रदीप दीवान 7 जुलाई की शाम को चार बजे के बाद उससे मिलने आये और उन्होंने मांग की कि पिल्लई को किसी उचित अस्पताल में ले जाना चाहिए।&#8221; </strong></p>
<figure id="attachment_6278" aria-describedby="caption-attachment-6278" style="width: 1536px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC.jpg" alt="" width="1536" height="2048" class="size-full wp-image-6278" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/SC-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6278" class="wp-caption-text">​हिरासत में मौत</figcaption></figure>
<p>इस बात पर अनेक मत थे कि राजन पिल्लई कैसे और क्यों मारा, परन्तु मेरे विचार से, तिहाड़ की उपेक्षा और असावधानी ने उसकी हत्या की थी। जब पिल्लई को अस्पताल ले लाया गया, तब बहुत कीमती समय नष्ट हो चूका था, क्योंकि उस समय वहां कोई एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी। पिल्लई के परेशान वकील दीवान ने उसे अपनी कार में अस्पताल ले जाने का सुझाव दिया, परन्तु हमने उसे यह कहकर ठुकरा दिया कि वह नियमों के विरुद्ध था। इससे भी बुरी स्थिरी यह थी कि कैदी को अस्पताल ले जाने के लिए कोई सशस्त्र पुलिस उपलब्ध नहीं थी। कुल मिलकर, राजन पिल्लई को अस्पताल ले जाने में दो घंटे से अधिक का विलम्ब हो गया और वह दो घंटे उसके लिए घातक सिद्ध हुआ। </p>
<blockquote><p>पिल्लई को ले जाने वाला स्ट्रेचर एम्बुलेंस के फर्श पर रखा गया था और रास्ते में उसके मुंह से खून की उल्टियां होने लगी थी। अस्पताल पहुंचने पर वहां ड्यूटी पर मौजूद  डॉक्टरों को किसी ने यह नहीं बताया कि पिल्लई को लिवर सिरोसिस की बीमारी थी, इसलिए डॉक्टर ने उसे बचने का असफल प्रयास किया। रात को 8.30 बजे राजन पिल्लई मृत घोषित कर दिया गया। उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया कि उसकी मौत एसोफैगल वेरिस के कारण हुई थी, जिसका मौलिक अर्थ यह है कि उसके गले और पेट की बढ़ी हुयी नाड़ियों ने उसकी श्वास नाली को अवरुद्ध कर दिया था, जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई थी। ऐसी जटिलता सिरोसिस की अग्रिम अवस्था में उत्पन्न होती है। </p></blockquote>
<p><strong>पिल्लई की मृत्यु के लिए कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रत्येक स्तर पर विफलताओं की एक श्रृंखला रही थी। </strong></p>
<p>राजन पिल्लई की मृत्यु ने तिहाड़ में सुविधाओं की दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। तीन वर्ष बाद 1998 में पिल्लई के गृह राज्य केरल के सांसदों ने सरकार पर दबाव बनाना जारी रखा, जिससे तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी को विवश होकर यह आश्वासन देना पड़ा की पिल्लई की तरह सुविधाओं के भाव में किसी अन्य कैदी को अपनी जान नहीं गबानी पड़ेगी। जेल में डॉक्टरों की स्वीकृत संख्या 16 से बढ़ाकर 110 की जाय, चिकित्सा से सम्बद्ध कर्मचारियों की संख्या 80 से बढ़ाकर 200 की गयी। नए कैदियों की चिकित्सा जांच अनिवार्य कर दी गयी। आडवाणी ने वचन दिया कि इस प्रकार की घटना ​भविष्य में पुनः नहीं हो, लेकिन क्या घटना रुकी? या फिर आडवाणी तिहाड़ त्रासदी के बारे में फिर विचार किये?</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/tihar-trauma-when-an-iron-rod-was-inserted-in-prisoners-anus">तिहाड़ जेल-6 ✍ जहाँ आगंतुकों से पैसे नहीं मिलने पर कैदी के गुदा मार्ग में लोहे का रॉड घुसेड़ा गया था और गलती छुपाने के लिए कह दिया &#8216;बवासीर&#8217; हो गया है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>भारत में वेश्यावृति &#8220;कलंकित&#8221; है 😢 लेकिन उन महिलाओं का मत विधायकों और सांसदों का भविष्य निर्धारित करता है ✍</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Dec 2024 04:47:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[government]]></category>
		<category><![CDATA[illegal]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[legal]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना हिल (नई दिल्ली) : सन 1950 में भारत का संविधान लागू होने और स्वतंत्र भारत को एक गणराज्य घोषित होने के बाद विगत सितम्बर, 2024 तक संविधान में कुल 106 संशोधन किये गए हैं और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में संविधान के पन्नों में कुछ और नए संशोधन किये जायेंगे। लेकिन, अगर सर्वोच्च न्यायालय [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना हिल (नई दिल्ली) : सन 1950 में भारत का संविधान लागू होने और स्वतंत्र भारत को एक गणराज्य घोषित होने के बाद विगत सितम्बर, 2024 तक संविधान में कुल 106 संशोधन किये गए हैं और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में संविधान के पन्नों में कुछ और नए संशोधन किये जायेंगे। लेकिन, अगर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश में लगभग 30 लाख वेश्याओं के सामने चट्टान के तरह नहीं खड़ा हुआ होता, तो आज़ादी के 78 साल बाद भी देश के नेताओं की नजर में वेश्याओं का जीवन मूक-बधिर जानवरों के जीवन बराबर ही होता। वैसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद आज भी समाज के इन उपेक्षित महिलाओं का जीवन नारकीय जीवन से कम नहीं है, लेकिन न्यायालय का आदेश कुछ हद तक इन महिलाओं को &#8216;सांस लेने का संरक्षण&#8217; अवश्य दिया हैं। </strong></p>
<p>विगत दिनों एक महत्वपूर्ण आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने वेश्यावृत्ति को एक ‘पेशा’ के रूप में मान्यता दी है और कहा है कि इसके व्यवसायी कानून के तहत सम्मान और समान सुरक्षा के हकदार हैं। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है, क्योंकि इसमें कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए ऐसा आदेश पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है जो उसके समक्ष लंबित किसी मामले या मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो। चार वर्ष पूर्व 2020 में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने यौनकर्मियों को अनौपचारिक श्रमिकों के रूप में मान्यता दी थी ।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की मुख्य बातें यह थी कि वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाएं कानून के समान संरक्षण के हकदार हैं और आपराधिक कानून सभी मामलों में ‘आयु’ और ‘सहमति’ के आधार पर समान रूप से लागू होना चाहिए। जब यह स्पष्ट हो जाता है कि सेक्स वर्कर वयस्क है और सहमति से भाग ले रही है, तो पुलिस को हस्तक्षेप करने या कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 घोषित करता है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा। यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है। न्यायालय का आदेश था कि जब भी किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाता है, तो सेक्स वर्कर को “गिरफ्तार या दंडित या परेशान या पीड़ित” नहीं किया जाना चाहिए, “क्योंकि स्वैच्छिक सेक्स वर्क अवैध नहीं है और केवल वेश्यालय चलाना ही अवैध है”।</p>
<blockquote><p>न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि वेश्याओं के बच्चे को केवल इस आधार पर माँ से अलग नहीं किया जाना चाहिए कि वह देह व्यापार में है। मानव शालीनता और गरिमा की बुनियादी सुरक्षा वेश्याओं और उनके बच्चों के लिए भी है। इसके अलावा, अगर कोई नाबालिग वेश्यालय में या वेश्याओं के साथ रहता हुआ पाया जाता है, तो यह नहीं माना जाना चाहिए कि बच्चे की तस्करी की गई है। अगर वेश्या दावा करता है कि वह उसका बेटा/बेटी है, तो यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण किए जा सकते हैं कि क्या दावा सही है और अगर ऐसा है, तो नाबालिग को जबरन अलग नहीं किया जाना चाहिए। चिकित्सा देखभाल: यौन उत्पीड़न के शिकार सेक्स वर्करों को तत्काल चिकित्सा-कानूनी देखभाल सहित हर सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। मीडिया की भूमिका: मीडिया को गिरफ्तारी, छापेमारी और बचाव अभियान के दौरान सेक्स वर्करों की पहचान उजागर न करने के लिए “अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए, चाहे वे पीड़ित हों या आरोपी और ऐसी कोई भी तस्वीर प्रकाशित या प्रसारित न करें जिससे ऐसी पहचान उजागर हो। </p></blockquote>
<p>यह तो संवैधानिक बातें हैं। अब राजनीतिक और प्रशासनिक बातों के लिए देश की राजधानी दिल्ली के कर्तव्य पथ के रास्ते रायसीना हिल पर चलते हैं और इस बात पर विचार करते हैं कि आज़ाद भारत में देश के लगभग 2.63 लाख पंचायतों, 787 जिलों, 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेश के रास्ते भारत के लोकसभा और राज्य सभा में बैठने वाले विधायक अथवा सांसद इन वेश्याओं के बारे में सोचे हैं कभी? शायद नहीं। </p>
<p>गृह मंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रूपति कार्यालय को जोड़ने वाली रायसीना हिल सड़क के बीचो बीच खड़े एक वरिष्ठ राजनेता कहते हैं: &#8220;मैं पांचवी लोक सभा से अठारहवीं लोकसभा तक आम चुनाव के साथ-साथ राज्यों के विधान सभाओं का चुनाव देखा हूँ। सन 1971 में संपन्न लोक सभा के कुल 518 सदस्यों की संख्या में तत्कालीन कांग्रेस पार्टी को 352 स्थान मिले थे और श्रीमती इंदिरागांधी प्रधानमंत्री कार्यालय में विराजमान हुई। करीब 53-साल बाद विगत 18 वें लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी संसद के कुल 543 स्थानों में 240 स्थान जीतकर प्रधानमंत्री कार्यालय तीसरे बार पहुंचे। लेकिन, पांचवीं लोक सभा से आज 18वीं लोक सभा के साथ साथ राज्यों के विधान सभाओं अथवा ने निर्वाचित निकायों में चुनकर आने वाले प्रतिनिधियों को कभी मैं इन वेश्याओं के दरवाजे पर मत मांगने जाते नहीं देखा। यह अलग बात है कि वर्षों तक काले अक्षरों वाली निर्वाचन सूचियों में इनका नाम दिखा नहीं।&#8221;</p>
<blockquote><p>कोई अस्सी बसंत की राजनीतिक हवाओं का अनुभव रखने वाले नेताजी आगे कहते हैं: &#8220;कभी उनके बच्चों को अपने गोद में उठाकर प्यार करते, तस्वीर खिंचवाते नहीं देखा। कभी इन महिलाओं या उनके बच्चों के कल्याणार्थ संसद अथवा विधान सभाओं में आवाज उठाते नहीं देखा, सुना। जो कल भी सत्ता में थे, आज भी सत्ता में हैं, जो कल भी नौकरशाह थे, जो आज नौकरशाह हैं, अधिकारी है, पदाधिकारी हैं &#8211; इन वेश्याओं और उनके परिवार, बच्चों के लिए नहीं सोचे हैं।”“अगर भारत का न्यायालय नहीं होता, अगर न्यायालय में बैठे सम्मानित न्यायमूर्ति संवेदनशील नहीं होते, समाज का एक खास संवेदनशील वर्ग उन वेश्याओं के जीवन के प्रति विवेकहीन होता, तो शायद इन वेश्याओं का हाल आज और भी बद्तर होता। सांख्यिकी कितना सही है यह तो सरकार के विभाग बताएंगे, लेकिन मेरा मानना है कि भारत में आज भी 30 + लाख वेश्याएं देहव्यापार के क्षेत्र में कार्यरत हैं। सभी के पास आधार कार्ड है।  सभी के पास मतदान का पहचान पत्र है जो भारत का निर्वाचन आयोग द्वारा जारी है।&#8221;</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.29.52-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.29.52-PM.png" alt="" width="1255" height="707" class="alignright size-full wp-image-5979" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.29.52-PM.png 1255w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.29.52-PM-300x169.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.29.52-PM-1024x577.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.29.52-PM-768x433.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1255px) 100vw, 1255px" /></a></p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;अब सवाल यह है कि जब इन वेश्याओं का नाम निर्वाचन सूची में नहीं छपता था, उस कालखंड की बात छोड़ भी दें, आज अगर ये सभी 30+ लाख वेश्याएं सामाजिक प्रथा के तहत मान्य नहीं हैं तो इनके मत कैसे मान्य हो सकते हैं जो इन नेताओं के भविष्य का निर्माण करते हैं? नेता लोग, मंत्री लोग, अधिकारी लोग इन विषयों के दरवाजे तक, कोठों पर जाना अपने व्यक्तित्व और पुरुषार्थ के विरुद्ध समझते हैं।”“आपने कभी राजनेताओं को इन मतदाताओं के घरों में खाना खाते देखा है ? इनके बच्चों को गोदी उठाते देखा है ? बीमार, बिलखती, कलपती इन महिलाओं को सांत्वना देते देखा है ? फिर इनके मतों का इतना मोल क्यों ? कभी यह नहीं सोचते कि उनके जय-विजय में इन 30+ लाख वेश्याओं के मतों का भी मोल है। इस दृष्टि से अगर वेश्या कलंकित है, तो इन नेताओं का जय-विजय होना भी कलंक के दायरे में ही है।&#8221; वर्तमान में देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधान सभाओं और परिषदों के कुल 4557 विधायक (विधानसभा: 4131 + विधान परिषद: 245) और 788 सांसद (लोकसभा: 543 + राज्यसभा: 245) हैं। आज़ादी के बाद से पहला और अठाहरवीं लोकसभा / विधानसभाओं के बीच सदस्यों की गणना कर लें। </p>
<p>सरकारी आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश- 320024, अरुणाचल प्रदेश- 2750, असम- 52625, बिहार- 161321, छत्तीसगढ़- 12500, गोवा- 5375, गुजरात- 146950, हरयाणा- 15500, हिमाचल प्रदेश- 5375, जम्मू एवं कश्मीर- 15500, झारखंड- 20000, कर्नाटक- 200701, केरल- 68750, मध्य प्रदेश- 144338, महाराष्ट्र- 401300, मणिपुर- 4875, मेघालय- 4250, नागालैंड- 6000, उड़ीसा- 45066, पंजाब- 45000, राजस्थान-167305, सिक्किम- 425, तमिलनाडु- 303750, त्रिपुरा- 1375, उत्तर प्रदेश- 271868, उत्तराखंड- 8125, पश्चिम बंगाल- 367058, चंडीगढ़- 10750, दमन और दीव- 493, दिल्ली- 16785 और पुडुचेरी- 1400 कुल : 2827534 वेश्याएं थी दस वर्ष पूर्व। जबकि UNAIDS का आंकड़ा यह कहता है कि भारत में 2016 तक 657829 वेश्याएं हैं। </p>
<p>बहरहाल, पिछले दशक में युवा लड़कियों की तस्करी में वृद्धि सरकारी और गैर सरकारी संगठन दोनों हलकों में चिंता का कारण बन रही है। नेपाल में STOP और MAITI जैसे गैर सरकारी संगठनों की रिपोर्ट है कि भारत में (सीमा पार और देश के अंदर) सबसे अधिक तस्करी वेश्यावृत्ति के लिए होती है। और वेश्यावृत्ति में तस्करी करने वालों में से 60 प्रतिशत 12 से 16 वर्ष की आयु वर्ग की किशोर लड़कियाँ हैं। इन आंकड़ों की पुष्टि महिला एवं बाल विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश के 13 संवेदनशील जिलों में किए गए एक अध्ययन से होती है। इससे पता चलता है कि इस सर्वेक्षण का हिस्सा बनने वाली सभी यौनकर्मियों ने युवा लड़कियों के रूप में इस पेशे में प्रवेश किया था। कई ट्रांससेक्सुअल यौनकर्मी हैं। उन्हें जनता के विरोध का सामना करना पड़ता है, और रोजगार से वंचित होने पर वे भीख मांगते हैं और फिर सेक्स बाजार में प्रवेश करते हैं।बालिका वेश्याएं मुख्य रूप से निम्न-मध्यम आय वाले क्षेत्रों और व्यावसायिक जिलों में स्थित हैं और अधिकारी उन्हें जानते हैं। वेश्यालय चलाने वाले नियमित रूप से युवा लड़कियों को भर्ती करते हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.05-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.05-PM.png" alt="" width="1264" height="705" class="alignleft size-full wp-image-5980" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.05-PM.png 1264w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.05-PM-300x167.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.05-PM-1024x571.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.05-PM-768x428.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1264px) 100vw, 1264px" /></a></p>
<p>बालिका वेश्याओं को सामान्य वेश्याओं, गायिकाओं और नर्तकियों, कॉल गर्ल, धार्मिक वेश्याओं या देवदासी और पिंजरे में बंद वेश्यालय वेश्याओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा से लगे जिले, जिन्हें &#8220;देवदासी बेल्ट&#8221; के रूप में जाना जाता है, में विभिन्न स्तरों पर तस्करी संरचनाएं संचालित होती हैं। यहां महिलाएं या तो वेश्यावृत्ति में हैं क्योंकि उनके पतियों ने उन्हें छोड़ दिया है, या फिर जबरदस्ती और धोखे से उनकी तस्करी की जाती है। कई देवदासियां देवी येल्लम्मा के लिए वेश्यावृत्ति में समर्पित हैं।बालिका वेश्याओं को सामान्य वेश्याओं, गायिकाओं और नर्तकियों, कॉल गर्ल, धार्मिक वेश्याओं या देवदासी और पिंजरे में बंद वेश्यालय वेश्याओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा से लगे जिले, ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, भारत में लगभग 15 मिलियन वेश्याएँ हैं। एशिया के सबसे बड़े सेक्स उद्योग केंद्र बॉम्बे में 100,000 से अधिक महिलाएं वेश्यावृत्ति में हैं। भारत, पाकिस्तान और मध्य पूर्व में वेश्यावृत्ति में लड़कियों को प्रताड़ित किया जाता है, आभासी कारावास में रखा जाता है, यौन शोषण किया जाता है और बलात्कार किया जाता है।</p>
<p>जिन्हें &#8220;देवदासी बेल्ट&#8221; के रूप में जाना जाता है, में विभिन्न स्तरों पर तस्करी संरचनाएं संचालित होती हैं। यहां महिलाएं या तो वेश्यावृत्ति में हैं क्योंकि उनके पतियों ने उन्हें छोड़ दिया है, या फिर जबरदस्ती और धोखे से उनकी तस्करी की जाती है। कई देवदासियां देवी येल्लम्मा के लिए वेश्यावृत्ति में समर्पित हैं।ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, भारत में लगभग 15 मिलियन वेश्याएँ हैं। एशिया के सबसे बड़े सेक्स उद्योग केंद्र बॉम्बे में 100,000 से अधिक महिलाएं वेश्यावृत्ति में हैं। भारत, पाकिस्तान और मध्य पूर्व में वेश्यावृत्ति में लड़कियों को प्रताड़ित किया जाता है, आभासी कारावास में रखा जाता है, यौन शोषण किया जाता है और बलात्कार किया जाता है। बालिका वेश्याएं मुख्य रूप से निम्न-मध्यम आय वाले क्षेत्रों और व्यावसायिक जिलों में स्थित हैं और अधिकारी उन्हें जानते हैं। </p>
<p><strong>भारत में यौन कार्य की वैधता पर सवाल उठाते हुए नैतिकता, किसी के शरीर पर स्वायत्तता, गरिमा, शालीनता, बेरोजगारी, गरीबी और हताशा के सवाल उठाए गए हैं। एक पक्ष का तर्क है कि चूंकि यौन कार्य अपरिहार्य है, इसलिए इसे कानूनी पवित्रता प्रदान की जानी चाहिए ताकि अन्य कारकों के अलावा महिला यौनकर्मियों के लिए सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों, न्यायसंगत मुआवजा और गरिमा के सम्मान के लिए एक आचार संहिता स्थापित की जा सके। विरोधी दृष्टिकोण इसे &#8216;वैध दुरुपयोग&#8217; कहता है और तर्क देता है कि सरकार को इस तरह के काम के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना चाहिए क्योंकि यह मानवीय गरिमा को कम करता है, मानसिक स्वास्थ्य को कमजोर करता है और व्यक्तियों को वित्तीय लाभ के लिए अपने शरीर का उपयोग करने के लिए मजबूर करता है। महिला यौनकर्मी अपने उच्च जोखिम वाले यौन व्यवहार (जैसे, कंडोम के बिना सेक्स, कई भागीदारों के साथ सेक्स) और मादक द्रव्यों के सेवन के कारण एड्स, एसटीआई और सर्वाइकल कैंसर जैसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.22-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.22-PM.png" alt="" width="1265" height="709" class="alignright size-full wp-image-5981" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.22-PM.png 1265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.22-PM-300x168.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.22-PM-1024x574.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.22-PM-768x430.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1265px) 100vw, 1265px" /></a></p>
<p>जो लोग ऐसे वातावरण में काम करते हैं उन्हें शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक आघात का अनुभव होने की अधिक संभावना होती है, जिसका प्रभाव न केवल उन पर पड़ता है, बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है। <br />
यह कहा जाता है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने एक पायलट परियोजना शुरू की है, जिसे राष्ट्रीय महिला संसाधन केंद्र और राज्य महिला संसाधन केंद्र के साथ निकट समन्वय में सामुदायिक संगठनों, वकालत एवं अनुसंधान केंद्र (सीएफएआर) द्वारा संयुक्त रूप से क्रियान्वित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों में कमजोर और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए सामाजिक समावेश योजना की प्रक्रिया तैयार करना और यौनकर्मियों तथा यौन अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में लाना है। भारत सरकार को देह व्यापार के पेशे को वैध बनाने और यौनकर्मियों तथा उनके बच्चों के कल्याण के लिए ठोस कदम उठाने का सुझाव मिला है। भारतीय दंड संहिता द्वारा अनुपूरित अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से बच्चों सहित मानव तस्करी को प्रतिबंधित करता है और प्रक्रियाएं निर्धारित करता है।</p>
<p>महिला एवं बाल विकास मंत्रालय &#8220;उज्जवला&#8221; को क्रियान्वित कर रहा है &#8211; तस्करी की रोकथाम और वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए तस्करी के पीड़ितों के बचाव, पुनर्वास, पुनः एकीकरण और प्रत्यावर्तन के लिए एक व्यापक योजना। आज तक, इस योजना के तहत 151 सुरक्षात्मक और पुनर्वास गृहों सहित 273 परियोजनाओं को सहायता दी गई है। इन पुनर्वास केंद्रों को आश्रय और भोजन, कपड़े, चिकित्सा देखभाल, कानूनी सहायता, पीड़ितों के बच्चों के मामले में शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ पीड़ितों को वैकल्पिक आजीविका विकल्प प्रदान करने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण और आय सृजन गतिविधियों को शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। </p>
<p>भारत में वेश्यावृत्ति स्वयं &#8216;अवैध&#8217; या &#8216;कानूनी&#8217; नहीं है। इससे जुड़ी कुछ गतिविधियाँ हैं जिन्हें अनैतिक तस्करी (रोकथाम) अधिनियम, 1956 [आईटीपीए] के तहत अवैध घोषित किया गया है, जैसे दलाली करना, दलाली करना, वेश्यालय चलाना आदि। 2011 में, बुद्धदेव कर्मस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का मामला सामने आया। सुप्रीम कोर्ट (एससी) ने माना कि यौनकर्मियों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान का अधिकार है, जो जीवन और आजीविका का अधिकार सुनिश्चित करता है। इस फैसले के माध्यम से, भारत में यौनकर्मियों के अधिकारों से संबंधित एक रिपोर्ट का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक पैनल का गठन किया गया था। केंद्र ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पैनल की सिफारिशों को मसौदा कानून में शामिल किया गया था। हालाँकि, तब से कोई कानून नहीं बनाया गया है।</p>
<p>वेश्यावृत्ति से संबंधित मौजूदा कानून यौनकर्मियों के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां पैदा करते हैं। यह पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेटों को यौनकर्मियों को बचाने और पुनर्वास करने की व्यापक शक्तियां प्रदान करता है, जिसका पुलिस अक्सर असंवेदनशील और अपमानजनक तरीके से दुरुपयोग करती है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) का उपयोग अक्सर यौनकर्मियों पर &#8220;सार्वजनिक अभद्रता&#8221; या &#8220;सार्वजनिक उपद्रव&#8221; जैसे अस्पष्ट अपराधों का आरोप लगाने के लिए किया जाता है, बिना स्पष्ट रूप से परिभाषित किए कि इनमें क्या शामिल है। यहां तक कि व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, देखभाल और पुनर्वास) पर मसौदा विधेयक में समुदाय-आधारित पुनर्वास, पुनर्वास घरों के लिए धन और एक मशीनीकृत बचाव प्रोटोकॉल पर स्पष्ट दिशानिर्देश शामिल नहीं हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.56-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.56-PM.png" alt="" width="1261" height="705" class="alignright size-full wp-image-5982" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.56-PM.png 1261w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.56-PM-300x168.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.56-PM-1024x572.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Screenshot-2024-12-26-at-6.31.56-PM-768x429.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1261px) 100vw, 1261px" /></a></p>
<p><strong>2022 में, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने दस दिशानिर्देश जारी किए, जिन्होंने यौन कार्य को एक पेशे के रूप में मान्यता दी और कहा कि यौनकर्मी कानून के तहत सम्मान और समान सुरक्षा के हकदार हैं। हालाँकि, ये दिशानिर्देश अस्थायी हैं और केंद्र द्वारा किसी भी समय इन्हें खारिज किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, &#8221;यह कहने की जरूरत नहीं है कि पेशे के भारत में पहचानी गई 8.25 लाख महिला यौनकर्मियों (एफएसडब्ल्यू) में से आधे से अधिक पांच दक्षिणी राज्यों &#8211; आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना से हैं। आंध्र प्रदेश में 1.33 लाख यौनकर्मी हैं जबकि कर्नाटक में 1.2 लाख हैं। उत्तर प्रदेश में 22,060 और नई दिल्ली में 46,787 एफएसडब्ल्यू हैं।</strong></p>
<p>बावजूद, इस देश में प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। इस देश में सभी व्यक्तियों को जो संवैधानिक सुरक्षा दी गई है, उसे उन अधिकारियों द्वारा ध्यान में रखा जाएगा जिनका अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत कर्तव्य है। भारत की तरह दुनिया भी वेश्यावृत्ति को कानूनी पेशे के रूप में मान्यता देने को लेकर बंटी हुई है। उरुग्वे, नीदरलैंड, जर्मनी, तुर्की और हंगरी जैसे कुछ देशों में, यौन कार्य न केवल कानूनी है बल्कि संगठित और विनियमित है। जबकि ईरान जैसे कुछ देशों में बार-बार अपराध करने वालों को फाँसी भी दी जा सकती है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/5.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/5.png" alt="" width="1250" height="700" class="alignright size-full wp-image-5983" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/5.png 1250w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/5-300x168.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/5-1024x573.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/5-768x430.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1250px) 100vw, 1250px" /></a></p>
<p>शीर्ष अदालत ने अब कहा है कि यौनकर्मी कानून के समान संरक्षण के हकदार हैं, पुलिस से उन मामलों में हस्तक्षेप करने या कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचने की अपेक्षा की जाती है जहां यह स्पष्ट है कि यौनकर्मी वयस्क है और सहमति से भाग ले रही है। शीर्ष अदालत के आदेश में कहा गया है कि यौनकर्मियों को पुलिस द्वारा परेशान, गिरफ्तार, दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। सरकार भी, कठिन समय के दौरान यौनकर्मियों के समुदाय के बचाव में आई है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, सरकार ने कोविड-19 महामारी के दौरान यौनकर्मियों को सूखा राशन वितरित किया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ के ताजा आदेश से इस पेशे से जुड़े लोगों को कई अन्य सुरक्षाएं दी गई हैं। पीठ ने कहा है कि यौनकर्मियों के बच्चों को जबरन उनसे अलग नहीं किया जाना चाहिए और यौनकर्मियों के साथ रह रहे किसी नाबालिग को तस्करी का शिकार नहीं माना जाना चाहिए।</p>
<p>अदालत ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि यदि यौनकर्मी अपने खिलाफ हुए किसी यौन अपराध के बारे में शिकायत दर्ज करना चाहती हैं तो उनके साथ भेदभाव न किया जाए। इसने मीडिया से गिरफ्तारी, छापेमारी और बचाव कार्यों के दौरान यौनकर्मियों की पहचान उजागर न करने के लिए अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा। इसने प्रशासन को यौन अपराध की शिकार किसी भी यौनकर्मी को तत्काल चिकित्सा-कानूनी देखभाल प्रदान करने का निर्देश दिया। इस बीच, वेश्यावृत्ति को एक पेशे के रूप में पहचानने और यौनकर्मियों को गरिमापूर्ण जीवन देने का निर्देश देने वाला सुप्रीम कोर्ट का आदेश पिछले चार वर्षों में दूसरा बड़ा फैसला है जो संविधान पीठ के बाद बड़ी संख्या में लोगों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने में मदद कर सकता है। शीर्ष अदालत ने 6 सितंबर, 2018 को फैसला सुनाया कि आईपीसी की धारा 377 के प्रावधान असंवैधानिक थे क्योंकि वे भारत में LGBTQIA+ समुदाय की स्वायत्तता, अंतरंगता और पहचान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते थे।</p>
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		<title>सरकारी निर्णयानुसार साल में सात-दिन या पंद्रह-दिन के लिए सज-धज कर जब मेज पर बैठती है हिंदी  😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Dec 2024 12:34:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[government]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पहली जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस से लेकर 26 दिसंबर को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल स्थापना दिवस तक साल के ३६५ दिनों में करीब १९१+ दिनों का अलंकरण महत्वपूर्ण दिवसों के रूप में अंकित है। इन ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी&#8217; किसी दीवार से सटकर चुपचाप सहमी पड़ी होती है। अकस्मात् ७ [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पहली जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस से लेकर 26 दिसंबर को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल स्थापना दिवस तक साल के ३६५ दिनों में करीब १९१+ दिनों का अलंकरण महत्वपूर्ण दिवसों के रूप में अंकित है। इन ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी&#8217; किसी दीवार से सटकर चुपचाप सहमी पड़ी होती है। अकस्मात् ७ दिन (हिन्दी सप्ताह) और १४ दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर लोगबाग, अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री, संत्री उसे सामने की मेज पर बैठा देते हैं &#8216;दर्शनार्थ&#8217; और फिर कहते भी नहीं थकते है &#8216;हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।&#8217; उसकी स्थिति कुछ वैसी ही होती है जैसे गणतंत्र दिवस पर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को अर्पित करने वाले गीतों का गाना-बजाना। भारत के लोग, शिक्षित, अशिक्षित सभी लोग बजाते हैं। मिथिला सहित, बिहार सहित, देश के सभी ७८७ जिलों, ६४९४८१ गाँवों, २.६८ ग्राम पंचायतों में तो बजता ही है। बेचारी हिंदी। वैसे चाहे महिला (स्त्रीलिंग) सशक्तिकरण के बारे में लोगबाग, समाज, सरकार और व्यवस्था कितना भी ढ़ोल पिट लें, महिला जानती है समाज के संभ्रांत लोग, राजनेता, दबंग कितना सशक्त होने दिए हैं &#8211; उसी तरह जैसे गुड़ का मार धोकड़ा।</strong> </p>
<p>अंग्रेजी में <strong>‘कॉन्सोनेंट’</strong> और <strong>‘वॉवेल’</strong> तो नर्सरी के बच्चे भी जानते हैं परंतु क्या आपने कभी अपने बच्चों से पूछा है कि <strong>‘हिन्दी’</strong> को किस <strong>‘लिपि’</strong> में लिखा जाता है ?</p>
<p>कभी आपने अपने बच्चों को यह बताया है कि हिन्दी को जिस लिपि में लिखा जाता है उसमें कितने <strong>‘स्वर’</strong> और कितने <strong>‘व्यंजन’</strong> होते हैं ? </p>
<p>आपने कभी अपने बच्चों को पूछा है अथवा बताया है कि भारत में किस भाषा को भारतीय संविधान के तहत फक्र से <strong>‘राजभाषा’</strong> के रूप में स्वीकार किया गया है ? </p>
<p>कभी आप यह जानने और अपने छोटे स्कुल जाते बच्चे-बच्चियों को, विशेषकर जिन्हें राजनीति शास्त्र पढ़ने में, भारत में प्रजातन्त्र के स्वरुप को जानने-समझने में उत्सुकता है, बताने में अपनी अभिरुचि दिखाये हैं कि भारत के <strong>संसद</strong> में किन-किन संसदीय कार्य के लिए <strong>‘केवल हिन्दी का प्रयोग’</strong>; किन-किन कार्यों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों का प्रयोग निर्धारित है और यह भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत आवश्यक है ?  ​</p>
<p>या फिर, कभी आपने पूछा कि हम <strong>हिंदी दिवस</strong> क्यों मानते हैं? </p>
<p>नहीं न !​  वैसे मन करे तो अपने बच्चों से एक बार पूछिए जरूर कि हम &#8216;हिंदी दिवस क्यों मानते हैं? और <strong>किस दिन</strong> मनाते हैं?</p>
<p>एक ज़माने में हमारे बड़े-बुजुर्ग हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा के समाचार-पत्र, पत्रिका हाथ में देकर कहते थे ‘इसे पढ़ो, जोर से पढ़ो’, ‘इसे देखकर लिखो, शब्दों और वाक्यों में शुद्धि पर विशेष ध्यान रखना’ – हम सभी ऐसा करते थे और हिन्दी भाषा बलबान थी, हम बलबान थे, सुदृढ़ थे । आज “हिन्दुस्तान में ही हिन्दी लंगड़ी, लुल्ही हो रही है। लेखक से लेकर समाज के लोग और सरकार की नजर में यह कोई अहमियत नहीं रख पा रही है – इसलिए बेचारी लुढकती चली जा रही है।</p>
<p>इतना ही नहीं, आज भारत में प्रकाशित अधिकाँश हिन्दी समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं में समाचार लिखने वाले पत्रकारों से लेकर, कहानी, राजनीतिक समीक्षा या टिपण्णी लिखने वाले लोग भी, अपने लेखन को पाठकों के सामने ऐसे ‘हिन्दी की टाँग तोड़कर, पट्टी बाँध कर’ परोसते हैं। लेखन की क्रिया में ‘अंग्रेजी भाषा का प्रयोग धरल्ले” से हो रही है। </p>
<p>कहते हैं किसी राष्ट्र का समाचार पत्र / पत्रिकाएं उस राष्ट्र की भाषा को जीवित रखते हैं, भाषा की वजूदता बरक़रार रखते हुए उसे सुदृढ़ बनाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा पर गर्व हो, फक्र हो। ऐसा नहीं है कि पहले इन समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं में लेखन की क्रिया में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता था – प्रयोग ही नहीं होता था, क्योंकि लेखकों के पास ‘शब्दों’ का इतना अपार भण्डार था की ‘वाक्यों के विन्यास में एक शब्द ही संपूर्ण बातों को सामने रख देता था।</p>
<p>सोसल मिडिया के जन्म के पश्चयात तो सोसल मिडिया पर लोग अपने हिन्दी लेखन को जिस तरह परोसते हैं, देखकर, पढ़कर मन खिन्न हो जाता है। </p>
<p><strong>भारत में आज बच्चे कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, संत विदास, मीराबाई, रहीम, रसखान, भूषण, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बिहारी, भीष्म साहनी, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलि शरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, सियाराम शरण गुप्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’, मुंशी प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान, जैनेन्द्र कुमार, यशपाल, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, माखनलाल चतुर्वेदी, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, गया प्रसाद शुक्ल, महादेवी वर्मा, शरतचंद चट्टोपाध्याय, कमलेश्वर, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, गोपाल सिंह ‘नेपाली’, हरिवंश राय ‘बच्चन’, सोहन लाल द्विवेदी, नागार्जुन, सुमित्रानंदन पन्त, दुष्यंत कुमार, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र का नाम भी नहीं जानते होंगे, क्योंकि आज अधिकांश हिन्दी की किताबों में इनका नाम दीखता ही नहीं, या फिर बड़े-बुजुर्ग इन हिन्दी के हस्ताक्षरों के बारे में अपने बच्चों को बताने की जबाबदेही अपने कंधे से झटक दिए हैं।</strong> </p>
<p>आपको यह बताकर तकलीफ भी हो रही है कि रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जो भारत के ‘राष्ट्रकवि’ हैं, उनकी साहित्य ही नहीं, उनके पैतृक घर को, स्थानीय लोगों के अतिरिक्त कोई पूछने वाला भी कोई नहीं है । </p>
<p>इतना ही नहीं; हरिवंश राय ‘बच्चन’ को अब लेखक के रूप में भारत के स्कूल जाते बच्चे नहीं जानते, वे जानते हैं की वे फिल्म जगत के महान कलाकार अमिताभ बच्चन के पिता है, जबकि अमिताभ बच्चन के एक और भाई हैं। यह है स्थिति हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य लेखकों, कवियों की। </p>
<p>भारत में हिन्दी की स्थिति चाहे सामाजिक दृष्टि से देखें, साहित्यिक दृष्टि से देखें, सांस्कृतिक दृष्टि से देखें, बोलचाल की दृष्टि से देखें या फिर आप जिस भी नजर से भी देखें “मरी” तो नहीं है, परंतु मुद्दत से मरणासन्न” होती चली जा रही है। कब दम तोड़ देगी, कहा नहीं जा सकता ! </p>
<p><strong>बिडम्बना यह है कि हिन्दी को, जिसे भारतीय संविधान के तहत राजभाषा का दर्जा प्राप्त है – अलग बात है की भारत के पंचायत से संसद तक होने वाले संपूर्ण कार्यों में, यहाँ तक की बोलचाल की भाषा में भी, हिन्दी का प्रयोग “अछूत” की तरह किया जाता है – सरकारी-स्तर पर प्रत्येक साल संपूर्ण देश के सरकारी, गैर-सरकारी, स्वायत्त और निजी संस्थानों में “हिन्दी सप्ताह, हिन्दी – पखवारा” मनाकर लोग-बाग़ अपनी हिन्दी, राजभाषा को नमन और श्रद्धांजलि अगले एक साल के लिए पुनः दे देते हैं। यानि, साल के ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी किसी दीवाल से सटकर चुपचाप पड़ी होती है और अकस्मात् ७ दिन (हिन्दी सप्ताह) और १४ दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर सामने की मेज पर बैठा दी जाती है। </strong></p>
<p>संसद में विचार व्यक्त करने के लिये आज भी धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा हो। हिन्दी के आवेदन पत्र पर अंग्रेजी में ही अपनी राय, विचार लिखने की परम्परा हावी हो गयी है । अंग्रेजी बोलने वालों को तेज तरार, बुद्धिमान एवं प्रतिष्ठित समझने एवं हिन्दी बोलने वालों को अनपढ़, गवार जानने के परम्परा हावी हो गयी । अंग्रेजी विद्यालय में बच्चों को शिक्षा के लिये भेजना शान शौकत बन चुका है , तो कैसे कोई कह सकता है, यह वही देश हैं जिस देश की 90 प्रतिशत जनता हिन्दी जानती समझती एवं बोलती है और जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। </p>
<p>हिन्दी की आज यहीं वर्तमान दशा है, जहां हिन्दी अपने ही लोगों से पग-पग पर उपेक्षित हो रही है। इस दशा में क्या दिशा मिल सकती है, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। दोहरेपन की नीति के कारण आज तक स्वतंत्रता के ७० वर्ष उपरान्त भी इस देश को सही मायने में एक भाषा नहीं दे पाये जिसमें पुरा देश बातचीत कर सके। </p>
<p>जिस भाषा को अंग्रेजों ने हमारे ऊपर थोपा, उसे आज भी बड़े शौक से अपनी दिनचर्या में उतारे बैठे है। अंग्रेज तो इस देश से चले गये, पर अंग्रेजियत आज भी हावी है। जब भी हिन्दी दिवस आता है, हिन्दी पखवाड़ा, सप्ताह का आयेजन कर, हिन्दी पर लम्बे – लम्बें वक्तव्य देकर, प्रतियोगिता आयोजित कर कुछ लोगों को हिन्दी के नाम पर सम्मान, इनाम देकर इतिश्री कर ली जाती हैं। </p>
<p>अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए विश्व के किसी देश ने भी अंग्रेजी को नहीं अपनाया । भारत को छोड़ हर मुल्क की आज अपनी भाषा है। इसी कारण विदेश दौरे पर गये भारतीय प्रतिनिधि द्वारा अपना संबोधन अंग्रेजी में देते ही यह सुनना पड़ा कि क्या भारत की अपनी कोई भाषा नहीं ? </p>
<p>हिन्दी भाषा सिर्फ भारत में ही नहीं बोली जाती है बल्कि भारत और अन्य देशों मसलन फिजी, मॉरीसस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल, संयुक्त राज्य अमेरिका दक्षिण अफ्रीका यमन, युगांडा, सिंगापूर, नेपाल, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान आदि देशों में भारत से प्रवासित लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं, समझते हैं, लिखते हैं, पढ़ते हैं। </p>
<p>राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा होती है। जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है । यह तभी संभव है जब हम सभी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपने जीवन में अपनाने की शपथ मन से लें। तभी सही मायने में हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप उजागर हो सकेगा। हिन्दी के राष्ट्रीय स्वरुप उजागर होने की आज महत्ती आवश्यकता है। जिसमें देश की एकता अस्मिता समाहित है। </p>
<p><strong>वैसे हिन्दी भाषा की एक लंबी संघर्ष–यात्रा रही है। आज भी हिंदी से जुड़े अनेक यक्ष प्रश्नों का समाधान अपेक्षित है, जैसे– हिंदी भाषा की आज क्या स्थिति है? सूचना प्रौद्योगिकी की भाषा के रूप में हिंदी भाषा कितनी उपयुक्त है? देश में हिंदी भाषा का क्या स्थान है? अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हिंदी का प्रसार संतोषजनक है अथवा नहीं? हिंदी में अनुवाद की क्या स्थिति है? हिंदी भाषा कहाँ और किस रूप में होनी चाहिए? हिंदी भाषा का साहित्यिक रूप कैसा हो? मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी भाषा से क्या अपेक्षाएं हैं? संपर्क भाषा के रूप में तथा अध्ययन के माध्यम की भाषा के रूप में हिंदी भाषा के स्वरूप में क्या अंतर होना चाहिए? हिंदी भाषा के मानकीकरण को प्रभावी बनाने के लिए क्या प्रावधान होने चाहिए?</strong></p>
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		<title>दारू वाले मकान में ‘अकादमी’, टेंट लगाने वाले को ‘संस्कृति’ बचाने का भार, गांधी की विचारधारा से ‘परहेज’ और कागज पर मुद्रित गांधी से ‘प्यार’</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/maithili-bhojpuri-akadami-becomes-white-elephant</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Sep 2024 04:17:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[arvind kejriwal]]></category>
		<category><![CDATA[corruption]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi Chief Minister]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi LG]]></category>
		<category><![CDATA[Education Minister]]></category>
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		<category><![CDATA[Manish Sisodiya]]></category>
		<category><![CDATA[Mithili Bhojpuri Akadami]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : यह दिल्ली सरकार द्वारा स्थापित और संचालित मैथिली-भोजपुरी अकादमी के वेबसाइट का पहला पृष्ठ है। यह पृष्ठ काफी है इस बात को स्पष्ट करने के लिए कि दिल्ली सल्तनत में इस अकादमी का क्या वजूद है। वैसे दिल्ली के राज्यपाल, दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के शिक्षा मंत्री और इस विभाग को देखने [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : यह दिल्ली सरकार द्वारा स्थापित और संचालित मैथिली-भोजपुरी अकादमी के वेबसाइट का पहला पृष्ठ है। यह पृष्ठ काफी है इस बात को स्पष्ट करने के लिए कि दिल्ली सल्तनत में इस अकादमी का क्या वजूद है। वैसे दिल्ली के राज्यपाल, दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के शिक्षा मंत्री और इस विभाग को देखने वाले मंत्री महोदय अधिक विस्तार से प्रकाश डाल सकते हैं। सवाल यह है कि सरकार के महकमें में बैठे ये सभी सम्मानित लोग वास्तविक रूप से इन अकादमियों के प्रति कितने संवेदनशील हैं? </p>
<p>क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल या उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया या मंत्री सौरभ भारद्वाज को यह ज्ञात है कि दिल्ली सरकार द्वारा गठित और संचालित मैथिली-भोजपुरी अकादमी में बिहार-झारखण्ड-उत्तर प्रदेश और नेपाल की तराई वाले क्षेत्रों से विस्थापित लोगों का महान धार्मिक पर्व &#8216;छठ&#8217; में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करने का जवाबदेही एक &#8216;टेंट हाउस&#8217; को दिया गया है वह भी अकादमी के स्थापना के बाद पहली बार &#8216;निविदा&#8217; द्वारा। वैसे निविदा का आमंत्रण &#8216;पारदर्शिता&#8217; के उद्देश्य से भी हो सकता है, लेकिन जिस कदर दिल्ली के नेताओं को विभिन्न भ्रष्टाचार के आरोपों में राष्ट्र के कारावास तिहाड़ में रहना पड़ा है, पारदर्शिता पर बहुत बड़ा प्रश्न लगता है। </strong></p>
<p>सोलह वर्ष पूर्व सन 2008 में &#8216;राजनीतिक उद्देश्य&#8217; से ही सही, तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित द्वारा मैथिली-भोजपुरी अकादमी की स्थापना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुई। दिल्ली से साथ संसदीय और 70 विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले मैथिली-भोजपुरी भाषा-भाषियों को शायद लगा होगा कि इसकी स्थापना से राजधानी में मैथिली व भोजपुरी भाषाओं के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति का उन्नयन और पल्लव होगा। यह अलग बात है कि बिहार में मैथिली अथवा भोजपुरी बोलने वालों लोगों की किल्लत हो गई है। शहरीकरण के बाद गाँव से पलायित लोग न तो मैथिली बोलते हैं और ना ही भोजपुरी। विश्वास नहीं हो तो शहर घूमकर देख लीजिये। मैथिली-भोजपुरी अकादमी में गैर-मैथिल-भोजपुरी भाषा भाषी राज कर रहे हैं। जो वरिष्ठ अधिकारी है उनके कंधे पांच-छः विभाग है। कुछ विभाग तो &#8216;दुधारू&#8217; भी है और दूध तो भारत पीता है। वजह भी है।  गाँधी की विचारधारा से बहुतों को परहेज है, लेकिन कागज पर मुद्रित गांधी से सभी को प्रेम हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/1.jpg" alt="" width="723" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-5747" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/1.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/1-212x300.jpg 212w" sizes="auto, (max-width: 723px) 100vw, 723px" /></a></p>
<p><strong>शायद मिथिलांचल और भोजपुरी इलाकों से रोजी-रोजगार, शिक्षा हेतु पलायित बिहार के मतदाता (उन दिनों) जो बाद में दिल्ली के मतदाता होते चले गए, शायद यह सोचे होंगे यह अकादमी विलुप्त होती लोक-संस्कृति के उन पक्षों को प्रबल करेगा जिनकी मूल्यवत्ता की कीमत बची हुई है। लेकिन विगत सोलह वर्षों में दिल्ली शहर में मिथिला, मैथिली भाषा, भोजपुरी भाषा  अथवा संस्कृति का कितना विकास हुआ, किन-किन विलुप्त होती संस्कृति को यह बचा पाया, यह बात दिल्ली में रहने वाले लाखों लोग, मतदाता, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री या वे सभी लोग जो इससे ताल्लुकात रखते हैं, अपने कलेजे पर हाथ रखकर प्रश्न कर सकते हैं, उत्तर पा सकते हैं। </strong></p>
<p>दिल्ली ही नहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भाषाओं के नाम पर जिस तरह की राजनीति हो रही है, भाषाओं के नाम पर जिस तरह अधिकारी, पदाधिकारी, पार्षदों, विधायकों, सांसदों लाभान्वित हो रहे हैं, यह एक गहन शोध का विषय है। लेकिन यह शोध करेंगे कौन? यह भारत में रहने वाले करीब साढ़े तीन करोड़ मैथिली और करीब साढ़े पांच करोड़ भोजपुरी भाषा भाषी स्वयं अपने कलेजे पर हाथ रखकर स्वयं से पूछ सकते हैं। यह तो बहुत अच्छा हुआ की मान्यवर भिखारी ठाकुर और मान्यवर विद्यापति मृत्यु को प्राप्त कर लिए।  अन्यथा आज मैथिली और भोजपुरी भाषाओं को देश की राजधानी से लेकर गाँव के खेत खलिहानों तक देखकर मृत्यु को प्राप्त कर लेते। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/2.jpg" alt="" width="724" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-5748" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/2.jpg 724w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/2-212x300.jpg 212w" sizes="auto, (max-width: 724px) 100vw, 724px" /></a></p>
<p><strong>वस्तुतः जब बिहार के मिथिला क्षेत्र में मिथिला के लोग मैथिली भाषा को नहीं बचा सके, मिथिला की संस्कृति को नहीं बचा सके, फिर मिथिला क्षेत्र के बाहर हम मैथिली भाषा और संस्कृति की बात, उसे बचने की बात कैसे कर सकते हैं। क्या दिल्ली सल्तनत के किनारे प्रदूषित यमुना नदी में मैथिली या भोजपुरी गीत-संगीत का ढ़ोल-नगारा पीटकर बचा सकते हैं। छठ पर्व के अवसर पर गैर-मैथिली-भोजपुरी भाषाओँ और सिनेमा के धुनों पर आधारित रंगारंग संगीत से मैथिली-भोजपुरी संस्कृति बच सकती है?  इतना ही नहीं, मैथिली भाषा और भोजपुरी भाषा दोनों अलग है, दोनों की गहराई हिंदमहासागर जैसी है। और दिल्ली में इन दोनों भाषाओँ को एक अकादमी बनाकर दिल्ली सरकार द्वारा संचालित दारू की दूकानों, बोतलों, खरीद-बिक्री, लाभ-हानि का जोड़-घटाव किया जाता है वाले भवन के कोने पर स्थापित कर दिया गया। </strong></p>
<p>हकीकत यह है कि न तो दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में कुर्सी तोड़ने वाले नेताओं को, मंत्रियों को, अधिकारियों को भाषा और संस्कृति से कोई मतलब है और ना ही इस भाषाओँ के क्षेत्रों से पलायित लोगों को। अगर ऐसा होता तो छठ के नाम पर दिल्ली सल्तनत में टेंट की दूकान चलाने वाले गैर-मैथिली, गैर-भोजपुरी वाले को करोड़ों रुपये का &#8216;निविदा&#8217; नहीं दिया जाता कि वास्वा छठ के अवसर पर दुर्गन्धित यमुना के किनारे गीत-संगीत का आयोजन कराये और आयोजन के बाद पैसे के लिए कलाकारों को यमुना के घर घाट पर दंड-बैठकी करना पड़े। लेकिन दिल्ली सरकार में मंत्रालय में बैठे मंत्री महोदय से लेकर करोलबाग की तंग गलियों में दारू की बोतल गिनने वाले कार्यालय में बैठे अधिकारी तक &#8211; किसी को क्या फर्क पड़ता है कि भाषा बचेगी या नहीं, संस्कृति बचेगी या नहीं, लोक संगीत बचेगा या नहीं ?</p>
<p>इसका एक कारण यह भी है कि जिस स्थान पर मैथिली-भोजपुरी अकादमी स्थित है,  जिस स्थान पर रात के अँधेरे में वहां रखी वाहनों के बीच लघुशंका से लोग बाग निवृत होते हैं, उस अकादमी में बैठे अधिकारियों की सोच भी तो वैसी ही होगी । इस दृष्टि से दिल्ली सरकार, दिल्ली प्रशासन, दिल्ली में रहने वाले मैथिली और भोजपुरी भाषा भाषी लोगों का इस अकादमी के प्रति मान-सम्मान है, यह भी स्पष्ट दिखा है। आखिर यहाँ कार्य करने वाले अधिकारी क्या कर सकते हैं ? जब सरकार  की नजर में, जिनके लिए यह अकादमी बनाया गया, जिस उद्देश्य की पूरी के लिए बनाया गया &#8211; महत्वहीन है, तो उसकी देखरेख करने वाले क्या कर सकते हैं? </p>
<figure id="attachment_5749" aria-describedby="caption-attachment-5749" style="width: 1061px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot-2024-09-01-at-8.33.37-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot-2024-09-01-at-8.33.37-AM.png" alt="" width="1061" height="565" class="size-full wp-image-5749" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot-2024-09-01-at-8.33.37-AM.png 1061w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot-2024-09-01-at-8.33.37-AM-300x160.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot-2024-09-01-at-8.33.37-AM-1024x545.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot-2024-09-01-at-8.33.37-AM-768x409.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1061px) 100vw, 1061px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5749" class="wp-caption-text">आपूर्ति भवन, जहाँ दिल्ली सरकार द्वारा बेस जाने वाले दारू और बोतलों का हिसाब-किताब रखा जाता है, इसी भवन के सामने कोने में मैथिली-भोजपुरी अकादमी का कार्यालय है। प्रदेश के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल या दिल्ली में रहने वाले मैथिली-भोजपुरी भाषा भाषी की नज़रों में इस अकादमी का क्या महत्व है, यह तो रम, बियर, विस्की का बोतल ही बता सकता है</figcaption></figure>
<p><strong>चलिए पहले दारू का हिसाब-किताब करते हैं फिर छठ के नाम पर टेंट वाले को दिए गए सांस्कृतिक कार्यक्रम करने की बात करेंगे। दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित कुल 2400 विद्यालय हैं और नगर निगम द्वारा संचालित विद्यालयों की संख्या 1735 है। यानी कुछ 4135 विद्यालय हैं। अब अगर दिल्ली सरकार की शराब की दुकानों (585) और शिक्षा निदेशालय के विद्यालयों की सांख्यिकी (2400) की तुलना करें तो औसतन चार सरकारी विद्यालयों पर एक एक सरकारी शराब का ठेका है। परन्तु कोई भी सरकारी ठेका विक्रेता से लेकर शराब-मादक-मदिरा से जुड़े विभाग और मंत्रालय की कोई भी कुर्सी खाली नहीं है। अलबत्ता, अधिकारी से लेकर पदाधिकारी तक, अगर कहीं कोई स्थान ‘रिक्त’ दीखता है तो एक अधिकारी के मथ्थे दो-चार विभाग लगा दिया गया है।</strong></p>
<p>इतना ही नहीं, दिल्ली सरकार का प्रत्येक शराब का ठेका ‘आधुनिक साज-सज्जा’ से लैस है, जबकि सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों में ‘प्राचार्य’, ‘हेड-मास्टर’ ‘वरीय शिक्षकों’ की बात तत्काल नहीं करें तो ‘डस्टर’, ‘पेन्सिल’, ‘मानचित्र’, ‘झाडू’, ‘कुर्सी’, ‘किताब’, ‘पेन्सिल’ की घोर किल्लत है। हालांकि अंदर के लोग यह कहते हैं कि ‘स्थान तो कागज पर रिक्त है लेकिन निजी क्षेत्र से ठेका प्रथा के अधीन लोगों को भर दिया गया है।’ विगत दिनों नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा था। नगर निगमों की विद्यालयों को छोड़ दें तो दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित 1024 विद्यालयों के एक अध्ययन के अनुसार में सिर्फ 203 विद्यालयों में प्राचार्य अथवा विद्यालय के सर्वोच्च अधिकारी हैं। यानी 2400 विद्यालयों में से 1024 विद्यालयों में से 824 विद्यालयों में सर्वोच्च अधिकारी नहीं हैं। </p>
<p>एनसीपीसीआर ने तो पत्र में यह भी लिखा था कि ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ की बात यदि छोड़ भी दें, तो अधिकांशतः विद्यालयों में विद्यालय प्रमुख (Head of School-HoS) की कुर्सी खली होने के कारण परिसर के किसी कोने में राखी दिखी। वैसे दिल्ली सरकार और सरकार के आला अधिकारी भी कम चालाक नहीं हैं। तक्षण उन्होंने इस जबाबदेही को दिल्ली सल्तनत के उपराज्यपाल के मथ्थे मढ़ दिया। कहने में तनिक भी देर नहीं किये कि प्राचार्यों/सर्वोच्च पदाधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार उपराज्यपाल के पास है। इसी को राजनीति कहते हैं। </p>
<p><strong>यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि दिल्ली की वर्तमान आबादी (32,941,000) में पियक्कड़ों की संख्या उम्मीद से अधिक है। यह बात भी अलग है कि सरकार शराब की बोतलों पर अंग्रेजी में, हिंदी में, पंजाबी में, उर्दू में, चाहे जिस भाषा में लिखकर चिपकते रहे – शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैसे अलग बात है कि विगत दिनों दारू की दुकानों को लेकर दिल्ली सरकार और उसके मंत्री, संत्री, आला अधिकारी सभी चर्चा में रहे, जांच के अधीन हैं । अख़बारों में और टीवी पर सुर्खियों में रह रहे हैं । लेकिन बावजूद इसके दिल्ली सल्तनत में दिल्ली सरकार 2022-2023 वित्तीय वर्ष में 762 करोड़ और अधिक शराब से भरी बोतलों को बेचकर 6,821 करोड़ रुपये सरकारी कोष में जमा की। मज़ाक बात नहीं है इतनी राशि का एकत्रीकरण । </strong></p>
<figure id="attachment_5750" aria-describedby="caption-attachment-5750" style="width: 917px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/4.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/4.jpeg" alt="" width="917" height="1280" class="size-full wp-image-5750" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/4.jpeg 917w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/4-215x300.jpeg 215w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/4-734x1024.jpeg 734w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/4-768x1072.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 917px) 100vw, 917px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5750" class="wp-caption-text">पढ़ें जरूर</figcaption></figure>
<p>इतना ही नहीं, अगर इन शराब के बोतलों को गिनने वाले स्थान पर किसी ‘उम्दा भारतीय भाषाओँ का अकादमी’ भी खोल दें तो उस भाषा को बोलने वालों को, लेखकों को, सम्बद्ध लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर ऐसा नहीं होता तो शराब नियंत्रण कक्ष में ‘मैथिली-भोजपुरी अकादमी’ कराहता नहीं। आखिर भाषा की उन्नति पर विचार तो शराब पर चर्चा के बाद ही होगा। इसी को कहते हैं भाषा के नाम पर राजनीति। लेकिन आपको क्या? </p>
<p><strong>यह बात इसलिए लिख रहा हूँ कि जिस भवन में शराब की बोतलों की गिनती होती हैं, बोतलों की बिक्री से एकत्रित पैसों की गिनती होती है – उसी भवन के नीचले तल्ले के कोने में “मैथिली-भोजपुरी अकादमी” स्थित है। भवन का नाम है – 7-9 आपूर्ति भवन, आराम बाग़, पहाड़गंज, नई दिल्ली। वैसी स्थिति में दिल्ली सरकार के लिए ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा की क्या अहमियत है आप स्वयं निर्णय करें। ‘मैथिली-भोजपुरी अकादमी’ में बैठने वाले कर्मचारी ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा को शायद अपने जीवन में कभी नहीं सुने होंगे। वैसी स्थिति ‘विद्यापति’ और ‘भिखारी ठाकुर’ बारे में पूछना कुल्हाड़ी पर अपना पैर पटकना है। कांग्रेस के ज़माने में श्रीमती शीला दीक्षित इन दो समुदाय के लोगों का उपयोग महज राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती आई है। मैथिली और भोजपुरी भाषा के विकास से इन अकादमी का कुछ भी लेना देना नहीं है।</strong></p>
<p>फिर भारत के संसद के सामने, विजय चौक के इस नव-निर्मित बैठकी पर बैठकर सोचने लगा कि मिथिला के लोग अगर वास्तविक रूप में मिथिला के विकास के लिए प्रखर होते तो आज मिथिला वहां तो अवश्य नहीं होता, जहाँ आज है। मिथिला के राजा और उनके पूर्वज भी स्वर्ग से अपने मिथिला को देखकर अश्रुपूरित होते होंगे। कल के मिथिला में विद्वानों-विदुषियों का भरमार था, आज चापलूसों, चाटुकारों की बाढ़ है। हज़ारों-हज़ार संस्थाएं मिथिला के विकास करने में लगे हैं। लेकिन खुद मेहनत से अधिक विकसित हो रहे हैं और मिथिला अपने भाग्य पर रो रही है। वैसी स्थिति में दिल्ली सरकार के लिए ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा की क्या अहमियत है आप स्वयं निर्णय करें। </p>
<figure id="attachment_5751" aria-describedby="caption-attachment-5751" style="width: 857px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5.png" alt="" width="857" height="875" class="size-full wp-image-5751" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5.png 857w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5-294x300.png 294w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5-768x784.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5-24x24.png 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/5-48x48.png 48w" sizes="auto, (max-width: 857px) 100vw, 857px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5751" class="wp-caption-text">पढ़ें जरूर</figcaption></figure>
<p>यह तो अच्छा हुआ कि ‘विद्यापति’ और ‘भिखारी ठाकुर’ पहले मृत्यु को प्राप्त किये। आज अगर जीवित होते तो सर पटक-पटक कर रोते। कांग्रेस के ज़माने से, यानि श्रीमती शीला दीक्षित के ज़माने से आज तक, इन दो समुदाय के लोगों का उपयोग महज राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती आई है। मैथिली और भोजपुरी भाषा के विकास से इन अकादमी का कुछ भी लेना देना नहीं है। महज यह एक राजनीतिक लाभ हेतु मंच बनाया गया है। </p>
<p>चलिए, अब अकादमी की संस्कृति बचाने सम्बन्धी प्रयास के बारे में चर्चा करते हैं। विगत दिनों अखबारवाला001 यूट्यूब के लिए कहानी https://www.youtube.com/watch?v=SdXxvLK8vHg&#038;t=1s   करने के क्रम में घंटों मैथिली-भोजपुरी अकादमी में था। मैं मैथिली और भोजपुरी अकादमी देख, मैथिली और भोजपुरी भाषा में बात करना चाहा। शुरुआत भी किया।  लेकिन भवन के सबसे अंत वाले कमरे के सामने कोने में बैठे सज्जन मेरा मुख देख रहे थे। ज्ञान हुआ कि उन्हें इन भाषाओँ के बारे में कोई ज्ञान नहीं है। जब उनसे पूछा कि यहाँ आने वाले लोगों से आप कैसे बात करते हैं? वे कहते हैं &#8216;हिंदी&#8217; में। मेरा कलेजा दो फांक यहीं हो गया। आगे उनका कहना था कि 26 जनवरी या 15 अगस्त को सौ-दो सौ लोग आते हैं। झंडोत्तोलन करते हैं। उसके बाद पुरे साल लोगों का आना-जाना नगण्य ही होता है। मुझे अकादमी की सार्थकता का दिव्य ज्ञान हो गया। </p>
<p>पिछले दिनों जब मुंबई में कार्य करने वाले <strong>मैथिली गीतकार-संगीतकार श्री सुनील पवन </strong> का एक संवाद आया जिसमें उन्होंने लिखा था कि &#8220;मैथिली भोजपुरी अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार खुलकर सामने आया &#8211; कलाकार साल भर से पारिश्रमिक के लिए चक्कर लगा रहे हैं।&#8221; इस बात को पढ़कर मन व्याकुल तो हुआ, व्यथित नहीं हुआ। आखिर सरकार के लिए यह अकादमी तो महज एक संस्था है जहाँ सरकारी कोष से मैथिली और भोजपुरी भाषा और संस्कृति के विकास के लिए, उन्नयन के लिए राशि निर्गत होती है। हां, इन राशियों पर जो भाषा उद्धृत है, उसे पढ़ने अथवा समझने में मैथिली या भोजपुरी भाषा का ज्ञाता होना कटाई आवश्यक नहीं है। अनपढ़, अशिक्षित लोग भी भारतीय ही नहीं विदेशी मुद्राओं की भाषा और मोल को समझते हैं। वैसी स्थिति में छठ के अवसर पर यमुना के तट पर सांस्कृतिक कार्यक्रम करने का ठेका किसी किसी टेंट वाले को दे दिया जाय, तो इसमें आश्चर्य क्या है? लेकिन एक बात तो पक्का है, आज नहीं तो कल, जब भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कैग) दिल्ली सरकार के इन विभागों की जांच-पड़ताल करेगा तो निश्चय ही उसकी ऊँगली भी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर उठेगी। </p>
<p><strong>वैसे प्रदेश के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया वैसे &#8216;भ्रष्टाचार उन्मूलन आंदोलन&#8217; के ही उपज है, लेकिन उन्होंने भी जिस बुजुर्ग अन्ना हज़ारे के कंधे को कुचलकर कुर्सी पर विराजमान हुए, या फिर दिल्ली के भ्रष्टाचार के कारण दिल्ली के तिहाड़ कारावास की पुस्तिका पर नाम अंकित करवाए &#8211; तो फिर मैथिली &#8211; भोजपुरी अकादमी के अधिकारी, पदाधिकारी, कर्मी, ठेकेदार किस खेत की मूली हैं ? समय की बात है। </strong></p>
<p><strong>सुनील पवन ने अपने संवाद में लिखा कि &#8220;19 नवंबर 2023 को छठ पूजा के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत की गई जिसमें सैकड़ों कलाकारों ने हिस्सा लिया। अकादमी द्वारा कलाकारों की पारिश्रमिक का भुगतान हो गया है लेकिन कलाकारों को अभी तक पैसा नही मिल पाया है।&#8221; उन्होंने यह भी लिखा कि &#8220;कलाकार लगातार अकादमी का चक्कर लगा रहे हैं लेकिन संबंधित  अधिकारी आना कानी करते हुए पारिश्रमिक की धन राशि डकारने के फिराक में है।&#8221; उस कार्यक्रम के संयोजक श्री पवन ही थे और उनके अनुसार, &#8220;कलाकार पारिश्रमिक को लेकर बेहद चिंतित है जिसके कारण वे (सुनील पवन) अपना स्टूडियो का कार्य छोड़कर दिल्ली मुंबई का चक्कर लगा रहे है और अकादमी के ये तथाकथित अधिकारी रोज टालते जा रहे है।&#8221;</strong></p>
<p>उन्होंने यह भी लिखा कि &#8220;इस संबंध में ज्ञात हो कि 15 साल पूर्व जब से अकादमी का गठन हुआ है पहली बार ऐसा हुआ है जब टेंडर के माध्यम से कलाकारों को काम दिया गया। इससे पहले हमेशा कलाकारों को डायरेक्ट काम मिलता था  और पारिश्रमिक उसके अकाउंट में सीधे पहुंच जाता था। टेंडर का दुष्परिणाम यह हुआ कि डेढ से दो लाख का टेंडर लेने के बाद कलाकारों को 40 से 50 हजार पर साइट दिए जाने की बात कही गई और पिछले 9 महीने बीत जाने के बाद भी कलाकारों को पारिश्रमिक नहीं मिला।&#8221; वे दिल्ली सरकार तथा अधिकारी संजीव झा से मांग की है कि अकादमी के ऐसे मामलों की जांच हो और दोषी अधिकारी को दंडित कर अकादमी की छवि सुधारने का काम किया जाए।&#8221;</p>
<p>पवन जी ने बताया कि पिछले साल रोहिणी में बत्रा टेंट हॉउस के नाम से व्यवसाय करने वाले श्री कमल बत्रा जी के दूकान से फोन आया। पहले कोई अन्य सज्जन थे, बाद में श्री बत्रा साहब फोन पर आये और उन्होंने कहा है दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी द्वारा आगामी छठ पर्व के अवसर पर करीब 70 से 80 स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, जिसमें गाना -बजाना, नृत्य आदि का समावेश है, करना है, क्या आप इसके लिए इक्षुक हैं? उन्होंने पूछा कि कितने स्थानों पर कर सकते हैं? पवन ने कहा कि 40 से 50 स्थानों पर कार्य करने का हामी भरा। फिर वे कहे की मीटिंग के लिए आ सकते हैं? मैंने उनसे पूछा की क्या इस कार्यक्रम के बारे में अकादमी से पुष्टि (कन्फर्मेशन) है? वे कहे की &#8216;हो जायेगा।&#8217; </p>
<figure id="attachment_5752" aria-describedby="caption-attachment-5752" style="width: 1156px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3.jpeg" alt="" width="1156" height="1197" class="size-full wp-image-5752" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3.jpeg 1156w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3-290x300.jpeg 290w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3-989x1024.jpeg 989w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3-768x795.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/3-24x24.jpeg 24w" sizes="auto, (max-width: 1156px) 100vw, 1156px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5752" class="wp-caption-text">पढ़ें जरूर</figcaption></figure>
<p><strong>बाद में पुष्टि होने पर फिर उनका फोन आया कि मीटिंग के लिए आएं। मैं मुंबई में था अतः मैं भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी श्री आर एन झा की पत्नी श्रीमती कुमकुम झा को भेजा। बात तो हुई लेकिन भुगतान के मामले पर आ कर अटक गयी। बाद में संगीत नाटक अकादमी के श्री पवन झा, जो अछिंजल नामक संस्था भी चलाते हैं, को भेजा। बात तय हो गई और करारनामा भी बना। इस करारनामे के बाद 15-11-2023 को अग्रिम राशि स्वरुप ₹ 50 000 मिला। अगले दिन यानी 16 नवम्बर को ₹ 2,50,000 और मिला। जिन स्थानों पर कार्यक्रम करने का करारनामा हुआ था उसमें प्रति स्थान ₹ 45,000 रुपये निर्धारित हुआ था। साथ ही 20 फीसदी राशि &#8216;वर्किंग चार्ज&#8217; के रूप में। इस ₹ 45, 000 राशि में ₹ 15, 000 राशि नृत्य करने वाले कलाकारों के लिए और ₹ 30, 000 अन्य प्रति कलाकार के लिए तय हुआ।</strong>  </p>
<p>कहानी लिखने से पहले मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कर्ताधर्ता श्री अरुण कुमार झा को एक संवाद लिखा। श्री झा दानिक्स कैडर के एक वरिष्ठ अधिकारी है और मिथिला-मैथिली के उन्नयन के लिए जागृत भी हैं। श्री झा मैथिली-भोजपुरी अकादमी के अलावे संस्कृत अकादमी, अंतराष्ट्रीय अकादमी, दिल्ली भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (डीबीओसीडब्ल्यूडब्ल्यूओ) आदि दिल्ली सरकार की संस्थाओं को भी देखते हैं। DBOCWWB की स्थापना 02 सितंबर, 2002 को &#8216;द बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (रेगुलेशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विसेज) एक्ट 1996&#8217; की धारा 18 (1) के तहत की गई थी। यह संस्था निर्माण कार्यों में कार्यरत निर्माण मज़दूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के लिए कार्य करती है। विगत 25-11-2021 की अधिसूचना संख्या एफ/8-1/2010 / S / I Pt.file के द्वारा अरुण कुमार झा को नियोजन विभाग का भी संयुक्त सचिव बनाया गया। </p>
<p><strong>मैंने लिखा: &#8220;एक महाशय कुछ कागजात प्रेषित किये हैं। उनका कहना है कि पिछले छठ के अवसर पर अकादमी एक टेंट हॉउस वाले को दिल्ली में छठ के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम करने के टेंडर दिया था। उनका यह भी कहना है कि विगत 15 वर्षों में पहली बार अकादमी द्वारा टेंडर के आधार पर कलाकारों को बुलाया गया, जबकि अकादमी में कलाकारों की पूरी सूची है। उनका यह भी कहना है कि जिस राशि पर उनका करारनामा हुआ, उस राशि में ₹ 4,76,000/- अब तक नहीं मिले हैं। वे सभी यह भी कहते हैं कि जब तक आपका आदेश नहीं होगा टेंट हाउस वाले, जिन्हें निविदा आवंटित किया गया, पैसा नहीं देगा। मैं एक कहानी लिखने से पहले आपसे निवेदन करूँगा की स्थिति के बारे में आप अवगत करा दें ताकि कहानी में तथ्य गलत नहीं हों।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_5756" aria-describedby="caption-attachment-5756" style="width: 1259px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Maithili-Akademi.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Maithili-Akademi.png" alt="" width="1259" height="707" class="size-full wp-image-5756" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Maithili-Akademi.png 1259w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Maithili-Akademi-300x168.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Maithili-Akademi-1024x575.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Maithili-Akademi-768x431.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1259px) 100vw, 1259px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5756" class="wp-caption-text">​मैथिली-भोजपुरी अकादमी का कार्यालय</figcaption></figure>
<p>कुछ काल बाद सम्मानित अरुण कुमार झा का जवाब आया: &#8220;Namaskar Jha ji!! I appreciate your effort to reach to me to know truth for a fair story in the matter. I know &#8230;. this gentleman might be a person named Sunil Pawan . He is running pillar to post to malign the Maithili Bhojpuri Academy with flimsy claims and his imaginative stories.</p>
<p>1.⁠ ⁠The Executive Committee of the Academy decided to organise cultural programs at 100 chhath ghats across delhi. At each place, 2 singers, 5 membered 1 dance team , 5 membered one music band, one banner, one anchor etc has to be deployed at each of 100 locations on the same day for chhath puja celebration.</p>
<p>2.⁠ ⁠⁠Since the event was bigger, therefore it was also decided to engage an event management company for this event for supply of singers, musicians, band etc.</p>
<p>3.⁠ ⁠⁠tender was floated and one bidder was selected following due process as per existing rules and regulations.</p>
<p>4.⁠ ⁠⁠Academy does not has any  such database of singers, musicians and  bands etc therefore a company was selected to provide them through this tendering process. Plus, there were operational challenges also to deploy them simultaneously.</p>
<p>After the end of the event, the company submitted its bills along with photos and videos and other required documents. After necessary verification, bills of 68 sites were passed and paid to the company.</p>
<p>Now, this gentleman has provided some singers , musicians etc to the company on his own terms and rates. Academy has nothing to do with this. This is entirely between this gentleman and that company. Academy has not hired  this gentleman&#8217;s service therefore the academy does not owe any payments to him. Whatever money is to be given to him, is only and only from the company to whom he provided singers. He may take whatever action he wishes against that company. The Academy has absolutely no say  in this matter. &#8211; Regards.&#8221;</p>
<p>इस कहानी को प्रकाशित करने के पूर्व <strong>श्री कमल बत्रा साहब </strong>को एक संवाद प्रेषित किया। संवाद में लिखा: &#8220;सम्मानित श्री बत्रा साहेब। नमस्कार। मैं मैथिली भोजपुरी अकादमी पर एक कहानी कर रहा हूँ। कहानी मैथिली अकादमी द्वारा पिछले छठ के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम से संबंधित है जिसका निविदा आपको मिला था। कलाकार का शिकायत है कि उन्हें उतने पैसे नहीं मिले जिसके लिए करार हुआ था। मैं झा साहब को भी लिखा था। उनका जबाब आ गया है। मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि उक्त विषय पर अपनी बात स्पष्ट कर दें।&#8221; </p>
<p>कमल बत्रा का कहना था कि उनके सहयोगी योगेंद्र गौड़ इस विषय से अवगत हैं। कुछ काल बाद गौड़ साहब का फोन आया। वे इस विषय की वस्तुस्थिति को लिखित रूप में स्पष्ट करने में असमर्थता दिखाए।  उन्होंने कहा कि अगले दो दिन अवकाश का दिन है, अगले सप्ताह कार्यालय जाऊंगा।  मेरे कुछ हिसाब लंबित हैं। मुझे विश्वास है कि मुझे लंबित पैसे निर्गत कर दिए जाएंगे। अगर निर्गत हुए तो स्वाभाविक है मैं जो भी शेष राशि बची है, वार्तालाप के बाद निर्गत कर दूंगा।  अगर ऐसा नहीं हुआ तो &#8230;..&#8221; </p>
<p>उधर सुनील साहब का कहना है कि &#8220;मैं दसवीं महीने में पहुंच चुका हूं, अपने पारिश्रमिक को लेकर लड़ाई लड़ते-लड़ते डर-डर के ठोकर खाने के बाद आखिर योगेंद्र गौड़ ने मुझे बुलाया  27 अगस्त को उसके बाद फिर उन्होंने कहा की लिस्ट देखता हूं। कल मैं देख कर बताता हूं फिर आप ऐसा करिए परसों आ जाइए उन्होंने आज का 2:00 बजे का समय दिया था लेकिन जब मैं पहुंचा तो वहां योगेंद्र गौर जी नहीं थे वहां केवल कमल बत्रा एक अपने सहयोगी के साथ बैठे हुए थे। मैं वहां एक डेढ़ घंटे तक इंतजार किया उसके बाद कमल बत्रा ने मुझे बताया कि आप फिर कल आ जाइए लेकिन मैं आपको ढाई लाख रुपए कम दूंगा जो आपकी मेहनत आने हैं वह मैं नहीं दूंगा अब इसके पीछे क्या मंशा है उनकी पता नहीं मुझे ₹276,000 कलाकारों को देने हैं और मेरे मेहनत के जो ₹200000 होते । उसे देने से वह साफ़ इनकार कर रहे हैं जबकि हमारी बातचीत हुई थी हमारी पहली इनवॉइस में भी यह 20% की बात थी और उसके बाद ही हमारी ड्रिलिंग शुरू हुई थी। उनको यह इनवॉइस में 16 नवंबर को पहले एडवांस पाने के बाद और 22 या 23 नवंबर को दूसरा रो इनवॉइस भेजा था जिसमें यह मेंशन है लेकिन उसके बावजूद भी वह घूम रहे हैं परेशान कर रहे हैं मैं हताश हूं लेकिन कलाकारों के द्वारा बहुत दबाव के कारण मैं उनके पास गया था मैं अत्यंत दुखी हूं।</p>
<p><strong>सवाल यह है कि मैथिली &#8211; भोजपुरी अकादमी</strong> के स्थापना के बाद क्या यह अकादमी दिल्ली स्थित मैथिली और भोजपुरी के कलाकारों की कोई सांख्यिकी नहीं बना सका? क्या इन सोलह वर्षों में अकादमी के अधिकारी या इस अकादमी से जुड़े मैथिली-भोजपुरी भाषा भाषी कभी इस दिशा में अग्रमुख नहीं हुए कि अगर उनके प्रदेश की सांस्कृतिक गरिमा को बचाने के लिए दिल्ली प्रदेश की सरकार कटिबद्ध होने का दावा करती है, तो उनकी प्रतिबद्धता कहा गई जिन्हें अपने प्रदेश की भाषा और संस्कृति की गरिमा को बचाना है। क्या कभी किसी महाशय या महोदय अकादमी के क्रिया कलाप के बारे में कोई प्रश्न किये? क्या यह प्रश्न पूछा गया कि गैर-मैथिली और गैर-भोजपुरी भाषा के लोग इस अकादमी की गुणवत्ता को कैसे बढ़ाएंगे? विगत सोलह वर्षों में शायद एक भी प्रश्न नहीं पूछा गया कि आखिर दिल्ली शहर में मैथिली और भोजपुरी अकादमी की स्थापना जिस उद्देश्य से की गयी थी, उस उद्देश्य की कितनी प्राप्ति हुयी है? शायद नहीं। सभी इस अकादमी के झंडे तले राजनीति कर रहे हैं या फिर इस संस्था को दुधारू गाय समझकर सरकारी कोष से निकलने वाली राशियों का बन्दर-बाँट कर रहे हैं। <strong>(क्रमशः) </strong></p>
<p><strong>आगे पढ़िए: कौन चोर कौन साध? क्या मैथिली-भोजपुरी अकादमी दुधारू गाय है जहाँ भाषा के झंडे तले नेता-अधिकारी राजकोष का बंदरबांट करते हैं ? </strong></p>
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		<title>पार्श्ववर्ती प्रवेश (लेटरल एंट्री) : रुक्मणी रुक्मणी, शादी के बाद क्या क्या हुआ &#8211; कौन हारा कौन जीता, खिड़की मे से देखो ज़रा &#8230;&#8221;  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Aug 2024 12:30:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[centre]]></category>
		<category><![CDATA[government]]></category>
		<category><![CDATA[jitendra singh]]></category>
		<category><![CDATA[lateral entry]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नॉर्थ ब्लॉक (नई दिल्ली): आज से 32-वर्ष पहले लेखिका सुजाता की कहानी पर मणिरत्नम के निर्देशन में  एक सिनेमा बना था जो 15 अगस्त, 1992 को भारत के छवि गृहों में आया था। नाम था &#8216;रोजा&#8217; और इस सिनेमा में संतोष सिवन और मधुबाला मुख्य भूमिका में थे। इस सिनेमा में संगीत दिया था ए आर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/centre-takes-back-lateral-entry-ad">पार्श्ववर्ती प्रवेश (लेटरल एंट्री) : रुक्मणी रुक्मणी, शादी के बाद क्या क्या हुआ &#8211; कौन हारा कौन जीता, खिड़की मे से देखो ज़रा &#8230;&#8221;  </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नॉर्थ ब्लॉक (नई दिल्ली): आज से 32-वर्ष पहले लेखिका सुजाता की कहानी पर मणिरत्नम के निर्देशन में  एक सिनेमा बना था जो 15 अगस्त, 1992 को भारत के छवि गृहों में आया था। नाम था &#8216;रोजा&#8217; और इस सिनेमा में संतोष सिवन और मधुबाला मुख्य भूमिका में थे। इस सिनेमा में संगीत दिया था ए आर रहमान। आर्थिक कमाई की बात छोड़ दें तो इस फिल्म से मणिरत्नम और रहमान साहब को एक नई पहचान मिली। दोनों के झोली में अनेकानेक सम्मान आये। यह सिनेमा पहले तमिल में बनी, फिर हिंदी में। इस सिनेमा में एक मधुर गीत था जिसे शब्दबद्ध किये थे पीके मिश्रा और गाये थे बाबा सहगल तथा श्वेता शेट्टी। </strong></p>
<p><em>गीत के बोल थे:  &#8220;रुक्मणी रुक्मणी, शादी के बाद क्या क्या हुआ &#8211; कौन हारा कौन जीता, खिड़की मे से देखो ज़रा &#8230;&#8221; </em> </p>
<p>श्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में सम्मानित राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रधानमंत्री कार्यालय और कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय राज्यमंत्री  डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को पार्श्व प्रवेश (लेटरल एंट्री) के तहत 45 वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन को तत्काल प्रभाव से रद्द करने का अनुरोध पढ़कर रोजा सिनेमा का यह गीत होठों पर आ गया। चार दिन पहले विज्ञापन का निकलना और चार दिन बाद उसे निरस्त कर देना &#8211; किसकी जीत अथवा किसकी हार मानी जाएगी यह 140 करोड़ मतदाताओं का प्रश्न है।</p>
<p>भारत के संसद में सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष में महज 59 अंकों का फासला है। सत्तारूढ़ एनडीए के पास 543 कुर्सियों में एक ओर जहाँ 293 कुर्सियां हैं, वहीँ इंडिया गठबंधन के पास 234 कुर्सियां हैं। अन्य के पास 17 कुर्सियां हैं। विगत दस वर्षों का भारत का राजनीतिक इतिहास, विशेषकर सरकारी स्तर पर लिए गए फैसले के मद्देनजर इस बात को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि पार्श्व प्रवेश (लेटरल एंट्री) के तहत संघ लोक सेवा आयोग द्वारा जिन 45 वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, उसकी जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं हो, अथवा उनके अनुशंसा के बिना आयोग को प्रेषित किया गया हो। पार्श्व प्रवेश भर्ती विज्ञापन के महज 96-घंटे के अंदर केंद्र सरकार द्वारा वापस लेना किसकी जीत अथवा किसकी हार मानी जाएगी यह 140 करोड़ मतदाताओं का प्रश्न है।</p>
<p><strong>संघ लोक सेवा आयोग की अध्यक्ष श्रीमती प्रीति सूडान को लिखे गए पत्र में डॉ. जितेंद्र सिंह, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय ने लिखा है: &#8220;It is important that the Constitutional mandate towards social justice is upheld so that the deserving candidates from marginalized communities get their rightful representation in the government services. Since these position have been treated as specialized and designated as single-cadre posts, there has been no provision for reservation in these appointments. This aspect needs to be reviewed and reformed in the context of the Hon&#8217;ble Prime Minister&#8217;s focus on ensuring social justice. Hence, I urge the UPSC to cancel the advertisement for lateral entry recruitment issued on 17.8.2024. This step would be a significant advance in the pursuit of social justice and empowerment.&#8221;</strong><br />
 <br />
<figure id="attachment_5728" aria-describedby="caption-attachment-5728" style="width: 1000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Singh.jpg" alt="" width="1000" height="631" class="size-full wp-image-5728" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Singh.jpg 1000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Singh-300x189.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Singh-768x485.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5728" class="wp-caption-text">राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रधानमंत्री कार्यालय और कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय राज्यमंत्री  डॉ. जितेंद्र सिंह</figcaption></figure></p>
<p>सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री, उनके मंत्रिमंडल के लोगों को इस निर्णय से पहले, यानी विज्ञापन निर्गत करने के पहले इन बातों का ज्ञान नहीं हुआ, जो विज्ञापन निकलने के चार दिन बाद हुआ! अपने पत्र में जितेंद्र सिंह ने कहा, &#8216;हमारी सरकार का प्रयास प्रक्रिया को संस्थागत रूप से संचालित, पारदर्शी और खुला बनाने का रहा है। प्रधानमंत्री का दृढ़ विश्वास है कि पार्श्व प्रवेश की प्रक्रिया को हमारे संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के संबंध में। प्रधानमंत्री के लिए सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण हमारे सामाजिक न्याय ढांचे की आधारशिला है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना और समावेशिता को बढ़ावा देना है।&#8217;</p>
<p>पत्र में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सार्वजनिक सेवा में आरक्षण के हिमायती हैं और हमारी सरकार सामाजिक न्याय को मजबूत करने को लेकर प्रतिबद्ध है, इसलिए हम आपसे अनुरोध करते हैं कि उन रिक्त स्थान की भर्ती सम्बन्धी विज्ञापन को रद्द कर दिया जाए।पत्र में लिखा गया कि : &#8220;It is well known that, as principle, lateral entry was endorsed by the Second Administrative Reforms Committee which was constituted in 2005, chaired by Shri Veerappa Moily. The recommendation of the Sixth pay Commission in 2013 were also in the same direction. However, both before and after that there have been many high profile cases of lateral entrants. Under earlier governments, posts as important as that of Secretary in various ministries, leadership of UIDAI etc.,have been given to lateral entrants without following any process of reservation. Further, it is well known that the members of the famous National Advisory Council used to run a super-bureaucracy that controlled the Prime Minister;&#8217;s Office.&#8221;</p>
<p>पूरा विपक्ष लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती के विरोध में खड़ा था। विपक्ष ने इसे सत्तारूढ़ बीजेपी की मनमानी बताते हुए &#8216;संविधान का उल्लंघन&#8217; करार दिया। अखिलेश यादव ने इस फैसले के खिलाफ दो अक्टूबर से प्रदर्शन करने की चेतावनी भी दी। कांग्रेस ने कहा कि केंद्र में &#8216;लेटरल एंट्री&#8217; के माध्यम से भर्ती अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण से दूर रखने की सरकार की साजिश है। कांग्रेस ने आरोप भी लगाया कि सोची समझी साजिश के तहत बीजेपी जानबूझकर नौकरियों में ऐसे भर्ती कर रही है, ताकि आरक्षण से अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ावर्ग को दूर रखा जा सके। इस तरह की कार्रवाई से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण खुलेआम छीना जा रहा है। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री संघ लोक सेवा आयोग के बजाय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के माध्यम से लोक सेवकों की भर्ती करके संविधान पर हमला कर रहे हैं।</p>
<p><strong>आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में सहयोगी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी इस तरह से सरकारी पदों पर नियुक्तियों के किसी भी कदम की आलोचना की और कहा कि वह केंद्र के समक्ष यह मुद्दा उठाएंगे। उन्होंने कहा कि “किसी भी सरकारी नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं है। निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है और अगर सरकारी पदों पर भी यह लागू नहीं किया जाता है तो यह जानकारी मेरे लिए चिंता का विषय है।” </strong></p>
<p>सरकार का तर्क है कि पार्श्ववर्ती प्रवेश के तहत उच्च पदों पर नियुक्ति कोई पहली बार नहीं की जा रही हैं, बल्कि इस प्रकार की नियुक्ति पूर्व में भी की जाती रही है। अंतर केवल इतना है कि इस बार इन नियुक्तियों के लिये आवेदन आमंत्रित किये गए हैं। दूसरी ओर इस प्रकार की नियुक्तियों का विरोध करने वालों का कहना है कि इससे संघ लोक सेवा आयोग एक असहाय संस्था बनकर रह जाएगी और आरक्षण व्यवस्था को भी नुकसान पहुँचेगा। सरकार का कहना है कि ऐसा करने से विकास की नई अवधारणा से नौकरशाही खुद को सीधे तौर पर जोड़ सकेगी। इसी प्रकार कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार नौकरशाही में सुधार करके काम करने की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहती है, तो उसका विरोध नहीं होना चाहिये। </p>
<p>निजी क्षेत्र से संयुक्त सचिवों की सीधी भर्ती ऐसा ही एक कदम है, क्योंकि निजी क्षेत्र में दक्षता और पारदर्शिता की मदद से ही कोई कामयाब हो सकता है, जबकि सरकारी तंत्र के लिये ऐसा होना आवश्यक नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि नौकरशाही में सुधार की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा करने से पहले इसे राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने की भी आवश्यकता है। देश में संयुक्त सचिव के कुल 341 पद हैं, जिनमें से 249 पदों पर IAS अधिकारी ही नियुक्त होते हैं तथा शेष 92 पदों पर विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाती है, जो गैर-IAS भी होते हैं। लेकिन इसके लिए अब तक किसी तरह का विज्ञापन जारी नहीं किया जाता था और सरकार इन पदों पर नियुक्तियां कर देती थी। </p>
<p><strong>जुलाई 2017 में सरकार ने नौकरशाही में देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली सिविल सेवाओं में परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति के अलावा अन्य क्षेत्रों अर्थात पार्श्ववर्ती प्रवेश से प्रवेश का प्रावधान पर विचार करने की बात कही थी। सरकार चाहती है कि निजी क्षेत्र के अनुभवी उच्चाधिकारियों को विभिन्न विभागों में उपसचिव, निदेशक और संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर नियुक्त किया जाए। इसके लगभग एक वर्ष बाद केंद्र सरकार ने पार्श्ववर्ती प्रवेश की अधिसूचना जारी करते हुए पदों के लिये आवेदन आमंत्रित किये थे। इसके अलावा, नीति आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि यह जरूरी है कि पार्श्ववर्ती प्रवेश के तहत विशेषज्ञों को मुख्यधारा में शामिल किया जाए। इसका उद्देश्य नौकरशाही को गति देने के लिये निजी क्षेत्र से विशेषज्ञों की तलाश करना था। जिसके तहत सबसे पहले विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव के 9 पदों के लिये निजी क्षेत्र के आवेदकों को चुना गया है जिसमें अंबर दुबे (नागरिक उड्डयन), अरुण गोयल (वाणिज्य), राजीव सक्सेना (आर्थिक मामले), सुजीत कुमार बाजपेयी (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन), सौरभ मिश्रा (वित्तीय सेवाएँ), दिनेश दयानंद जगदाले (नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा), सुमन प्रसाद सिंह (सड़क परिवहन और राजमार्ग), भूषण कुमार (शिपिंग) और काकोली घोष (कृषि, सहयोग और किसान कल्याण) शामिल हैं। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय को इन पदों के लिये 6077 आवेदन मिले थे। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-1.jpg" alt="" width="724" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-5730" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-1.jpg 724w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-1-212x300.jpg 212w" sizes="auto, (max-width: 724px) 100vw, 724px" /></a></p>
<p>संघ लोक सेवा आयोग ने पार्श्ववर्ती प्रवेश के जरिए सीधे 𝟒𝟓 संयुक्त सचिव, उप-सचिव और निदेशक स्तर की नौकरियां निकाली है जिनमें 10 संयुक्त सचिव और 35 निदेशक/उप सचिव के पद शामिल थी । शुरुआत में सरकार 10 मंत्रालयों, मसलन, राजस्व विभाग, वित्तीय सेवा विभाग, आर्थिक कार्य विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, जहाजरानी मंत्रालय, नागर विमानन मंत्रालय, पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में विशेषज्ञ संयुक्त सचिवों को नियुक्त करने की बात थी।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-2.jpg" alt="" width="724" height="1024" class="aligncenter size-full wp-image-5731" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-2.jpg 724w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/J-2-212x300.jpg 212w" sizes="auto, (max-width: 724px) 100vw, 724px" /></a></p>
<p>इन पदों पर आवेदन के लिये न्यूनतम आयु सीमा 40 वर्ष रखी गई थी, जबकि अधिकतम आयु सीमा तय नहीं की गई थी। इनका वेतन केंद्र सरकार के अंतर्गत काम करने वाले संयुक्त सचिव के समान बनाया गया था तथा अन्य सुविधाएं भी उसी अनुरूप मिलने की बात की गई थी। सभी नियुक्त लोगों को सर्विस रूल के तहत काम करना था । इस प्रकार संघ लोक सेवा आयोग से नियुक्त होने वाले संयुक्त सचिवों का कार्यकाल उनकी कार्य-निष्पादन क्षमता के अनुसार 3 से 5 साल का था । केवल अन्तर्वीक्षा के आधार पर इनका चयन होना था तथा मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता में बनने वाली कमेटी उनका इंटरव्यू लेती । योग्यता के अनुसार सामान्य ग्रेजुएट और किसी सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई, विश्वविद्यालय के अलावा किसी निजी कंपनी में 15 साल का अनुभव निर्धारित किया गया था। </p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि आज़ादी के चार साल बाद सं 1951 में प्रशासन की कार्यशैली पर एन.डी. गोरेवाला की रिपोर्ट ‘लोक प्रशासन पर प्रतिवेदन’ नाम से आई। रिपोर्ट के अनुसार कोई भी लोकतंत्र स्पष्ट, कुशल और निष्पक्ष प्रशासन के अभाव में सफल नियोजन नहीं कर सकता। इस रिपोर्ट में अनेक उपयोगी सुझाव थे, लेकिन क्रियान्वयन नहीं हुआ। 1952 में केंद्र ने प्रशासनिक सुधारों पर विचार करने के लिए अमेरिकी विशेषज्ञ पॉल एपिलबी की नियुक्ति की। उन्होंने ‘भारत में लोक प्रशासन सर्वेक्षण का प्रतिवेदन’ प्रस्तुत किया। इस रिपोर्ट में भी अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव थे, लेकिन जड़ता जस-की-तस बनी रही। स्वाधीनता के 19 वर्ष बाद 1966 में पहला प्रशासनिक सुधार आयोग बना, जिसने 1970 अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश की।इसके लगभग 30 वर्ष बाद 2005 में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था। नौकरशाही में पार्श्ववर्ती प्रवेश का पहला प्रस्ताव 2005 में आया था; लेकिन तब इसे सिरे से खारिज कर दिया गया। </strong></p>
<p>इसके बाद 2010 में दूसरी प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट में भी इसकी अनुशंसा की गई थी, लेकिन इसे आगे बढ़ाने में समस्याएँ आने पर सरकार ने इससे हाथ खींच लिये। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में इसकी संभावना तलाशने के लिये एक कमेटी बनाई, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की अनुशंसा की। नौकरशाही के बीच इस प्रस्ताव पर विरोध और आशंका दोनों रही थी, जिस कारण इसे लागू करने में विलंब हुआ। अंतत: पहले प्रस्ताव में आंशिक बदलाव कर इसे लागू कर दिया गया। पहले के प्रस्ताव के अनुसार सचिव स्तर के पद पर भी पार्श्ववर्ती प्रवेश की अनुशंसा की गई थी, लेकिन वरिष्ठ नौकरशाही के विरोध के कारण अभी संयुक्त सचिव के पद पर ही इसकी पहल की गई है। </p>
<p>देश का नौकरशाही इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री थे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। उन्हें 1971 में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया गया था और उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा नहीं दी थी। उन्हें 1972 में वित्त मंत्रालय का मुख्य आर्थिक सलाहकार भी बनाया गया था और यह पद भी संयुक्त सचिव स्तर का ही होता है। इसी प्रकार मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री रघुराम राजन को अपना मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया था और वे भी संघ लोक सेवा आयोग से चुनकर नहीं आए थे, लेकिन संयुक्त सचिव के स्तर तक पहुँच गए थे और बाद में रिज़र्व बैंक के गवर्नर बनाए गए थे। </p>
<p>वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव तथा योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अलावा शंकर आचार्य, राकेश मोहन, अरविंद विरमानी और अशोक देसाई ने भी पार्श्ववर्ती प्रवेश के माध्यम से सरकार में जगह पाए थे । जगदीश भगवती, विजय जोशी और टी.एन. श्रीनिवासन ने भी इसी प्रकार सरकार को अपनी सेवाएँ दी। इनके अलावा योगिंदर अलग, विजय केलकर, नीतिन देसाई, सुखमॉय चक्रवर्ती जैसे न जाने कितने नाम हैं, जिन्हें लैटरल एंट्री के ज़रिये सरकार में उच्च पदों पर काम करने का मौका मिला।राज्य स्तर पर देखें तो शशांक शेखर सिंह इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं, जो 2007 से 2012 के बीच उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के समय राज्य के कैबिनेट सचिव थे और IAS अधिकारी होने के बजाय एक पायलट थे। </p>
<p>इन्फोसिस के प्रमुख कर्त्ता-धर्त्ताओं में एक नंदन निलेकणी भी इसी प्रकार आधार कार्ड जारी करने वाली संवैधानिक संस्था UIDAI के चेयरमैन नियुक्त किये गए थे। इसी प्रकार बिमल जालान ICICI के बोर्ड मेंबर थे जिन्हें सरकार में पार्श्ववर्ती प्रवेश मिली और वह रिज़र्व बैंक के गवर्नर बने। रिज़र्व बैंक के वर्तमान गवर्नर उर्जित पटेल भी पार्श्ववर्ती प्रवेश से इस पद पर आए हैं। पूर्व में इंदिरा गांधी ने मंतोश सोंधी की भारी उद्योग में उच्च पद पर बहाली की थी। इससे पहले वह अशोक लेलैंड और बोकारो स्टील प्लांट में सेवा दे चुके थे तथा उन्होंने ही चेन्नई में हैवी व्हीकल फैक्ट्री की स्थापना की थी। NTPC के संस्थापक चेयरमैन डी.वी. कपूर ऊर्जा मंत्रालय में सचिव बने थे। BSES के CMD आर.वी. शाही भी 2002-07 तक ऊर्जा सचिव रहे। </p>
<p>लाल बहादुर शास्त्री ने डॉ. वर्गीज़ कुरियन को NDBB का चेयरमैन नियुक्त किया था, जो तब खेड़ा डिस्ट्रिक्ट कोआपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन के संस्थापक थे। हिंदुस्तान लीवर के चेयरमैन प्रकाश टंडन को स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन का प्रमुख बनाया गया था। केरल स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन के.पी.पी. नांबियार को राजीव गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की ज़िम्मेवारी सौंपी थी। इसी प्रकार उन्होंने सैम पित्रौदा को भी कई अहम ज़िम्मेदारियाँ सौंपी थी।जगदीश भगवती, विजय जोशी ने भी इसी प्रकार सरकार को अपनी सेवाएँ दीं। </p>
<p>देश में प्रशासनिक सुधारों की अनुशंसा करने के लिये अब तक दो प्रशासनिक सुधार आयोगों का गठन किया जा चुका है।सर्वप्रथम इस आयोग की स्थापना 5 जनवरी, 1966 को की गई थी और तब मोरारजी देसाई को इसका अध्यक्ष बनाया गया था। मार्च 1967 में मोरारजी देसाई देश के उपप्रधानमंत्री बन गए, तो के. हनुमंतैया को इसका अध्यक्ष बनाया गया।इस आयोग का काम यह देखना था कि देश में नौकरशाही को किस तरह से और बेहतर बनाया जा सकता है। तब इस आयोग ने अलग-अलग विभागों के लिये 20 रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें 537 बड़े सुझाव थे। सुझावों पर अमल करने की रिपोर्ट नवंबर 1977 में संसद के पटल पर रखी गई थी। तब से लेकर 2005 तक देश की नौकरशाही इसी आयोग की सिफारिशों के आधार पर चलती रही। </p>
<p>सिविल सेवा रिव्यू कमेटी के अध्यक्ष योगेन्द्र अलघ ने 2002 में अपनी रिपोर्ट में पार्श्ववर्ती प्रवेश का सुझाव देते हुए कहा था कि जब अधिकारियों को लगता है कि उनका प्रतियोगी आने वाला है तो उनके अंदर भी ऊर्जा आती है उनमें भी नया जोश आता है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिका में स्थायी सिविल सर्वेंट और मिड करियर प्रोफेशनल्स का चलन है। वहाँ पर इनकी सेवा ली जाती है। हमारे देश में भी अंतरिक्ष, विज्ञान तथा तकनीक, बायोटेक्नोलोजी, इलेक्ट्रॉनिक्स ऐसे विभाग हैं, जहाँ पर इनकी सेवा ली जाती है; लेकिन इसका विस्तार करने की ज़रूरत है तथा अन्य विभागों में भी इनकी सेवा ली जा सकती है। इसके अलावा समिति ने सिफारिश की थी कि जितने भी प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती है, उन्हें कम-से-कम तीन साल के लिये किसी निजी कंपनी में काम करने के लिये भेजा जाना चाहिए, ताकि वे निजी कंपनी में काम करने के तौर-तरीके सीखे और फिर उसे ब्यूरोक्रेसी में भी लागू करें, लेकिन सरकार ने इस सिफारिश को नकार दिया। </p>
<p>इसके बाद 5 अगस्त, 2005 को वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया। इस आयोग को केंद्र सरकार को प्रत्येक स्तर पर देश के लिये एक सक्रिय, प्रतिक्रियाशिल, जवाबदेह और अच्छा प्रशासन चलाने के दौरान आ रही कठिनाइयों की समीक्षा करने और उसका समाधान खोजने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा इस आयोग को भारत सरकार के केंद्रीय ढाँचे, शासन में नैतिकता, अधिकारियों को भर्ती करने की प्रक्रिया को चलाया जाने वाला प्रशासन, ई-प्रशासन, संकट प्रबंधन और आपदा प्रबंधन के बारे में भी रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा गया था। इस प्रशासनिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय नौकरशाही में भारी फेरबदल की संभावना की बात कही थी। इसने सुझाव दिया था कि संयुक्त सचिव के स्तर पर विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाएँ तथा इन्हें बिना परीक्षा पास किये केवल इंटरव्यू के माध्यम से इस पद पर लाया जा सकता है। </p>
<p>सरकार यह मानती है कि विगत 30-40 वर्षों में कई बार उच्चाधिकारियों की नियुक्ति इस प्रकार पार्श्ववर्ती प्रवेश से की गई है और अनुभव कोई बुरा नहीं रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकारियों के चयन का अधिकार संघ लोक सेवा आयोग को ही होना चाहिये।पार्श्ववर्ती प्रवेश की प्रक्रिया से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है। केंद्र सरकार की तुलना में भारत के राज्यों में भ्रष्टाचार अधिक है और यदि किसी को उत्तरदायी ठहराए बिना किसी पद पर नियुक्त कर दिया जाता है तो उस पर अनुशासनात्मक नियंत्रण रखना कठिन हो जाएगा। </p>
<p>ऐसा करने से उनकी ज़िम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है और उनके कार्य की समीक्षा भी हो सकती है। इस प्रकार की नियुक्तियाँ उन्हीं हालातों में की जानी चाहिये, जब किसी उच्च सेवा के तहत किसी कार्य विशेष को करने के लिये विशेषज्ञ उपलब्ध न हों। इस प्रकार की सीधी नियुक्तियों की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिये तथा उसमें किसी प्रकार के भाई-भतीजावाद का स्थान का पर कार्यकाल निश्चित होना चाहिये, क्योंकि इन्हें नीतियाँ बनाने से लेकर उन्हें लागू करने की प्रक्रिया में लंबे समय तक काम करना होता है। </p>
<p>यह सरकारी नौकरी तीन सालों के लिए ‘ठेका-पट्टा’ के आधार पर होगी। संयुक्त सचिव पद पर 15 साल, निदेशक के लिए 10 साल और उप-सचिव के लिए 7 साल का कार्य अनुभव माँगा गया है। वहीं, पदों के हिसाब से शैक्षणिक योग्यता भी निर्धारित की गई है। इसके लिए राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश में इसके समकक्ष पदों पर सरकारी नौकरी करने वाले अफसर आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा लोक उद्यमों, स्वायत्त निकायों, वैधानिक संगठनों, विश्वविद्यालय,  मान्यता प्राप्त शोष संस्थान, निजी संस्थान, बहुराष्ट्रीय संस्थान में कार्यरत लोग भी इन पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/centre-takes-back-lateral-entry-ad">पार्श्ववर्ती प्रवेश (लेटरल एंट्री) : रुक्मणी रुक्मणी, शादी के बाद क्या क्या हुआ &#8211; कौन हारा कौन जीता, खिड़की मे से देखो ज़रा &#8230;&#8221;  </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>देश में प्रतिघंटे 51 प्राथमिकी दर्ज होने के बीच महिला और बाल कल्याण मंत्री ने कहा सरकार साइबर अपराधों पर विशेष ध्यान दे रही है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 01 Aug 2024 11:45:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[annapurna devi]]></category>
		<category><![CDATA[child]]></category>
		<category><![CDATA[cybre]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट के आधार पर भारत में प्रति घंटे 51  प्राथमिक सूचना रिपोर्ट लिखे जाने और देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भयानक वृद्धि के बीच सरकार निर्भया कोष के अंतर्गत महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध रोकथाम (सीसीपीडब्ल्यूसी) की एक योजना लागू की है। एनसीआरबी के एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले 2022 में 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो हर घंटे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/with-51-firs-being-filed-every-hour-in-the-country-the-government-is-paying-special-attention-to-cyber-crimes">देश में प्रतिघंटे 51 प्राथमिकी दर्ज होने के बीच महिला और बाल कल्याण मंत्री ने कहा सरकार साइबर अपराधों पर विशेष ध्यान दे रही है </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट के आधार पर भारत में प्रति घंटे 51  प्राथमिक सूचना रिपोर्ट लिखे जाने और देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भयानक वृद्धि के बीच सरकार निर्भया कोष के अंतर्गत महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध रोकथाम (सीसीपीडब्ल्यूसी) की एक योजना लागू की है। एनसीआरबी के एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले 2022 में 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो हर घंटे लगभग 51 एफआईआर के बराबर है. यह आंकड़ा 2021 और 2020 से गंभीर वृद्धि को उजागर करता है। आंकड़े के अनुसार प्रति लाख आबादी पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर 66.4 थी, जबकि ऐसे मामलों में आरोप पत्र दायर किया गया था। </strong></p>
<p>केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी। महिलाओं  और  बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों पर विशेष ध्यान देने साथ सभी प्रकार के साइबर अपराधों की रिपोर्ट करने के लिए  सीसीपीडब्ल्यूसी के अंतर्गत एक राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल भी शुरू किया गया है। सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एक टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1930 भी चालू है।</p>
<p>भारत और अमेरिका के गुमशुदा और शोषित बच्चों के लिए राष्ट्रीय केंद्र (एनसीएमईसी) के बीच 26.04.2019 को गुमशुदा और शोषित बच्चों के लिए राष्ट्रीय केंद्र (एनसीएमईसी) से बाल अश्लीलता और बाल यौन शोषण सामग्री की जानकारी प्रदान करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं। निर्भया फंड के अंतर्गत कुछ परियोजनाएं/योजनाएं प्रौद्योगिकी-संचालित हैं। इनमें शामिल हैं, आपातकालीन राहत सहायता प्रणाली (ईआरएसएस)-112 को सभी 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में चालू किया गया है और 30 अप्रैल 2024 तक 14.36 से अधिककॉल के साथ 36.29 करोड़ से अधिक कॉल को दर्ज किया गया है। सुरक्षित शहर परियोजनाएं शहर की पुलिस और नगर निगमों द्वारा अपनी महिला नागरिकों की को ध्यान में रखते हुए और मौजूदा बुनियादी ढांचे में किसी भी कमी को दूर करने के लिए विकसित की गई व्यापक और एकीकृत परियोजनाएं हैं।</p>
<p>उधर, मंत्रालय ने यह भी ढाबा किया है कि सरकार पिछड़े क्षेत्रों सहित पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। सरकार ने महिलाओं के शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण के मुद्दे को संबोधित करने के लिए जीवन चक्र निरंतरता आधार पर बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है, जिससे वे देश के विकास की प्रक्रिया का नेतृत्व कर सकें। पिछले कुछ वर्षों में, झारखंड सहित पूरे देश में महिलाओं के समग्र विकास और सशक्तिकरण के लिए अनेक पहल की गई हैं।</p>
<p><strong>महिला एवं बाल विकास मंत्रालय वित्तीय वर्ष 2022-23 से 15वें वित्त आयोग की अवधि में &#8216;मिशन शक्ति&#8217; नामक अम्ब्रेला योजना लागू कर रहा है। इसका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण के लिए मध्यवर्तन को मजबूत करना है तथा जीवन-चक्र निरंतरता के आधार पर महिलाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों को संबोधित करके “महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास” के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को साकार करना है। यह मंत्रालयों/विभागों और शासन के विभिन्न स्तरों पर अभिसरण में सुधार लाने के लिए कार्यनीतियों पर ध्यान केंद्रित करता है। यह डिजिटल अवसंरचना को समर्थन, अंतिम मील ट्रैकिंग और जन सहभागिता को मजबूत करने के अलावा, पंचायतों और अन्य स्थानीय स्तर के शासन निकायों की अधिक भागीदारी और समर्थन को बढ़ावा देता है। मिशन शक्ति की दो उप-योजनाएं हैं &#8211; &#8216;संबल&#8217; और &#8216;समर्थ्य&#8217;।</strong></p>
<p>&#8220;संबल&#8221; उप-योजना महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षा के लिए है। इसमें वन स्टॉप सेंटर (ओएससी), महिला हेल्पलाइन (डब्ल्यूएचएल), बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी) और नारी अदालत का एक नया घटक शामिल हैं। &#8220;समर्थ्य&#8221; उप योजना महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए है। इसमें प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई), शक्ति सदन, सखी निवास, पालना और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए गैप फंडिंग का एक नया घटक यानी संकल्प: महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए हब (एचईडब्ल्यू) है जिससे केंद्र, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश और जिला स्तरों पर महिलाओं के लिए योजनाओं और कार्यक्रमों के अंतर-क्षेत्रीय अभिसरण की सुविधा प्राप्त हो सके ताकि एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जा सके जिसमें महिलाओं को अपनी पूरी क्षमता का एहसास हों। महिलाओं को एचईडब्ल्यू के अंतर्गत सहायता उनके सशक्तिकरण और विकास के लिए विभिन्न संस्थागत और योजनाबद्ध सेटअप के लिए मार्गदर्शन, लिंक और सहायता प्रदान करती है, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, करियर और व्यावसायिक परामर्श/प्रशिक्षण, वित्तीय समावेशन, उद्यमिता, बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज, श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता तक पहुंच शामिल है।</p>
<p>मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के अंतर्गत आंगनवाड़ी सेवाएं एक सार्वभौमिक, प्रवेश निषेध योजना है जिसके अंतर्गत गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं पूरक पोषण कार्यक्रम (एसएनपी) सहित सेवाएं प्राप्त करने की पात्र हैं। सरकार ने प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) भी लागू की है जिसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं (पीडब्लू और एलएम) को मजदूरी के नुकसान के आंशिक मुआवजे के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से नकद प्रोत्साहन प्रदान करना है ताकि महिला प्रसव से पहले और बाद में पर्याप्त आराम कर सके और अपने स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार में सुधार ला सके। यह योजना दूसरे बच्चे के लिए अतिरिक्त नकद प्रोत्साहन प्रदान करके बालिका के प्रति सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देने की भी कोशिश करती है, अगर वह एक बालिका है। इस योजना के माध्यम से 3.44 करोड़ से अधिक महिलाओं को लाभ प्रदान किया गया है। इसके अलावा, बच्चों को डे केयर सुविधाएं और सुरक्षा प्रदान करने के लिए सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एक उप-योजना ‘पालना’ लागू की गई है। अधिक से अधिक माताओं को काम करने और देखभाल करने वालों को कार्यबल में भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए आंगनवाड़ी सह क्रेच (एडब्ल्यूसीसी) के माध्यम से बच्चों की देखभाल की सेवाओं का विस्तार किया गया है।</p>
<p>किशोरियों के लिए योजना (एसएजी) को 2019-20 से मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के अंतर्गत लाया गया है। 01.04.2022. इस योजना के अंतर्गत लक्षित लाभार्थियों में आकांक्षी जिलों और सभी उत्तर-पूर्वी राज्यों में 14 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की लड़कियां शामिल हैं।</p>
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		<title>स्थिर पानी जैसा &#8216;महकने&#8217; लगी है नीतीश कुमार की सरकार, कभी &#8216;संभोग&#8217; का ज्ञान देते तो कभी बालिकाओं के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य योजना चलाते हैं 300 रुपये प्रति वर्ष</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/nitish-kumars-government-has-started-smelling-like-stagnant-water</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jul 2024 06:04:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[finacial aids]]></category>
		<category><![CDATA[government]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अशोक राजपथ (पटना) से: यह अलग बात है कि बिहार में लम्बे समय तक कुर्सी पर बैठे रहने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार &#8216;यौन शिक्षा&#8217; के मामले में प्रदेश के विधान सभा में सार्वजनिक रूप से दिए गए &#8216;संभोग&#8217; सम्बन्धी शारीरिक भाषा के साथ  बयान वापस ले लिए हैं, अपनी निंदा भी किये और माफ़ी भी मांगे। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/nitish-kumars-government-has-started-smelling-like-stagnant-water">स्थिर पानी जैसा &#8216;महकने&#8217; लगी है नीतीश कुमार की सरकार, कभी &#8216;संभोग&#8217; का ज्ञान देते तो कभी बालिकाओं के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य योजना चलाते हैं 300 रुपये प्रति वर्ष</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अशोक राजपथ (पटना) से: यह अलग बात है कि बिहार में लम्बे समय तक कुर्सी पर बैठे रहने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार &#8216;यौन शिक्षा&#8217; के मामले में प्रदेश के विधान सभा में सार्वजनिक रूप से दिए गए &#8216;संभोग&#8217; सम्बन्धी शारीरिक भाषा के साथ  बयान वापस ले लिए हैं, अपनी निंदा भी किये और माफ़ी भी मांगे। लेकिन बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, विश्व में रहने वाली समस्त महिलाओं का उन्होंने उन शब्दों से जो अपमान किया &#8211; क्या उनकी उस निर्लज्जता के लिए भारत की महिलाएं, बिहार की महिलाएं माफ़ कर सकती हैं? शायद नहीं। महिलाओं सहित प्रदेश के लोगों का मानना है कि &#8216;इतनी स्थिरता भी अच्छी बात नहीं है। स्थिर पानी जैसा हाल है। अब महकने लगी है सरकार।&#8217;</strong></p>
<p>लेकिन अपनी &#8216;राजनीतिक छवि&#8217; को बनाए रखने के निमित्त प्रदेश की महिलाओं के &#8216;तथाकथित उत्थान&#8217; के लिए (जैसा वे और उनकी सरकार दावा करती है) अनेकानेक योजनाएं चला रही है। उन्हीं योजनाओं में एक है विद्यालयों में 7वीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक की बालिकाओं के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य योजना जिसके तहत प्रत्येक बालिका को 300 रुपये प्रति वर्ष दिया जाता है। राजनीतिक लाभ की दृष्टि से भले इसे &#8216;महत्वपूर्ण&#8217; माना जाय, सामाजिक दृष्टि से यह &#8216;निर्लज्जता का पराकाष्ठा&#8217; प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, इन योजनाओं के नाम पर &#8216;सरकारी कोष से पैसों का इस कदर बंटवारा किया जा रहा है जैसे मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के लोग, अधिकारी, पदाधिकारी अपने-अपने वेतन से दे रहे हों। </p>
<p>बहुत सी बातें हैं जिसे अपने जन्म से 104 वर्ष एक दिन पहले स्थापित (9 जनवरी, 1863) पटना कॉलेज प्रवेश द्वार के सामने खड़ा होकर देख रहा हूँ । सं 1965 से लगातार पटना कालेज का सम्पूर्ण  परिसर तत्कालीन विद्यार्थियों के लिए आज महत्वपूर्ण हो अथवा नहीं, उनके ह्रदय में इसकी मिट्टी की इज्जत हो अथवा नहीं, लेकिन हम मोहल्ले वालों के लिए आज भी पटना कॉलेज का परिसर पूज्यनीय है, वंदनीय है। क्योंकि हम सभी यहाँ पढ़े अथवा नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं होता, यहीं की मिट्टी में खेलकूद कर पले-बड़े हुए, संवेदनशील हुए, सामाजिक सरोकार के प्रति सचेष्ट बने तभी तो आज पचास साल बाद भी खुलकर, जमकर, स्पष्ट लिखने की क्षमता रखता हूँ। </p>
<p><strong>आज पटना कॉलेज के प्रवेश द्वार के सामने खड़ा होकर सं 1974 का वह दृश्य देख रहा हूँ जब पटना पुलिस आंदोलनकारियों को भागने के लिए अशोक राजपथ से महाविद्यालय परिसर में अश्रु गैस के गोले फेंक रही थी। आंदोलनकारियों का उद्देश्य था बिहार और अन्य राज्यों के साथ-साथ केंद्र में सत्ता का परिवर्तन। उस दिन कॉलेज परिसर का प्रवेश द्वार मोटे लोहे के जंजीर से बंद था और उसमें कोई दो किलो वजन का &#8216;नवताल&#8217; ताला लटका था। ताला बांधने का कार्य महाविद्यालय के तत्कालीन चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी श्री रामाशीष जी किये थे। इधर बाहर सड़क पर सैकड़ों केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कर्मी लाठी, डंडा, अश्रु गैस छोड़ने वाले मशीन और राईफल कंधे पर लटकाये आदेश का प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रशासन भी दो फांक में बंटी थी। जातिगत आधार पर सहस्त्र फांक अलग। उधर महाविद्यालय परिसर से ईंट, पत्थर हवा के रास्ते सड़क पर बिछ रही थी। इसी बीच सुरक्षा के मद्दे नजर खाकी वर्दीधारी अश्रु गैस के गोले महाविद्यालय परिसर में फेंकने लगे। </strong></p>
<p>उन दिनों मैं पटना महाविद्यालय प्रवेश द्वार के ठीक सामने श्री ननकूजी के होटल के ऊपर जगदीश जी पान वाले के मकान में किराये पर रहता था माँ, बाबूजी, भाई-बहनों के साथ। दसवीं कक्षा में पढ़ता था और पटना से प्रकाशित अख़बारों को बेचा करता था ताकि पेट भी भरे और पेट के ऊपर के हिस्से जिसे विद्वान-विदुषी मस्तिष्क कहते हैं, उसे परिपक्क करने के लिए पढ़-लिख सकूँ, आगे बढ़ सकूँ। हमारे मालिक मकान श्री जगदीश जी की पान की दूकान घर से पंद्रह कदम बाएं कमाल बाइंडिंग हॉउस के पास थी। उनकी दूकान से दस कदम आगे पीपुल्स बुक हॉउस था जहाँ सन 1974 आंदोलन के तत्कालीन क्रांतिकारी खड़े होकर प्रदेश और देश से कांग्रेस की सरकार को पदच्युत कर सिंहासन पर विराजमान होना चाहते थे। </p>
<p><strong>हम सभी चश्मदीद गवाह हैं उस आंदोलन के और आंदोलनकारियों और नेताओं द्वारा जनता को विश्वासघात करने का। सन 1974 से आज 2024 हो गए । पटना कालेज प्रवेश द्वार के बाहर से जितने भी अश्रु गैस के गोले परिसर के परिसर के अंदर फेंके जा रहे थे, कोई भी गोला परिसर के अंदर दाहिने हाथ भूगोल विभाग के जालीदार नुमा दीवार के अंतिम छोड़ को भी पार नहीं कर पाता था। यानी अधिकाधिक 25 फुट अंदर पहुँचता था। उस दिनों भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष थे डॉ. परमेश्वर दयाल साहब। हम मोहल्ले के बच्चों को बहुत लाड़-प्यार करते थे। जब वे सुने कि सीआरपीएफ द्वारा छोड़े गए अश्रु गैस के गोले उनके विभाग की दीवारों को भी पार नहीं कर पाता था, वे बहुत हँसे थे। </strong></p>
<p><strong>उसका दो कारण था </strong> &#8211; एक: जंगे आज़ादी में अंग्रेजी हुकुमनामों के जो अस्त्र-शास्त्र बच गए थे वही आज़ादी के बाद बिहार पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस को मिला था। सभी गांधी मैदान के पास गंगा के तट पर स्थित पुलिस लाइन में रखे थे। शहर में कभी गोली-बारूद की जरुरत हुई नहीं थी। श्री कृष्णबल्लभ सहाय के कालखंड में जो गोली कांड हुआ, सीधा आंदोलनकारियों के माथे को सहस्त्र फांक में फाड़ते निकल गयी थी। जयप्रकाश नारायण के कालखंड में आंदोलनकारियों से निपटने के लिए अस्त्र-शस्त्र में भी राजनीति हो गई थी। यह सभी बातें गहन शोध का विषय है। उसी तरह जैसे हम कल कारगिल दिवस मनाये। लेकिन शायद भारत के 90 से अधिक फीसदी लोगों को मालूम नहीं होगा कि कारगिल युद्ध काल में जितने अस्त्र-शस्त्र मंगाए गए थे, सभी युद्ध के बाद आया था। यह बात मैं नहीं, भारत का महा अभिलेखागार कहता है। </p>
<p><strong>दूसरे </strong> &#8211; उचित प्रशिक्षण के अभाव में सभी गोले आसमान की ओर निशाना साधकर फेंका जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि आम और जामुन के मौसम में जिस कदर हम पत्थर या ढ़ेला फल को तोड़ने के लिए ऊपर फेंकते हैं या फुलबॉल खेल में गोलपोस्ट पर पास देते हैं &#8211; लम्बा फेंक कर &#8211; वैसे में जैसे ही अश्रु गैस का गोला परिसर के अंदर गिरता था, आंदोलनकारी छात्र तक्षण उसे उठाकर या तो वापस फेंक देते थे यह बगल के नाले में भरे पानी में फेंक देते थे या फिर कोई न कोई उस पर पेशाब कर उसे शांत कर देता था। उधर प्रवेश द्वार के बाहर सड़क पर खड़ी सुरक्षा कर्मी इस क्रिया-कलाप को देखकर मुस्कुराते भी थे और कुछ उत्तेजित भी हो रहे थे। यह क्रिया तब तक जारी रहा जब तक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रवेश द्वार के ताला को एक गोली से तोड़कर आंदोलनकारियों को पीछे गंगा तट को ओर खदेड़े नहीं था। सन 1974 के आंदोलन से जन्म लिए प्रदेश और देश के नेता प्रदेश और देश के विकास के लिए कितने संवेदनशील होंगे यह तो द्वितीय स्वाधीनता आंदोलन के बाद नेताओं के विरुद्ध दर्जनों नहीं सैकड़ों, हज़ारों दर्ज आपराधिक मामले, हत्या, लूट-पाट, भ्रष्टाचार गवाह हैं। वैसे यह अलग बात है कि इस आंदोलन के बाद जब गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी जय प्रकाश नारायण स्वयं विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अभ्यर्थियों का नाम उत्तीर्ण करबाते थे जो उनके आंदोलन में साथ थी, प्रमुख थे। खैर। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति और उसके बाद लगातार बिहार के आज के मठाधीश पटना से प्रकाशित आर्यावर्त इण्डियननेशन सर्चलाइट प्रदीप अख़बारों और आकाशवाणी के समाचार कक्षों में नित्य उसी तरफ मत्था टेकते थे, जिस तरह बनारस-मथुरा और अन्य तीर्थ स्थलों में दर्शनाभिलाषी। मार्च 18, 1975 से पहले एक अखबार विक्रेता के रूप में और इस ऐतिहासिक तारीख के बाद समाचार पत्र कार्यालय का एक कर्मचारी होने के नाते मैं चश्मदीद गवाह हूँ। आज जो मठाधीश बने हैं राजनीतिक गलियारे में वे कोई साइकिल से, कोई वेस्पा-बजाज स्कूटर से, कोई लेम्ब्रेटा से, कोई फिएट से, कोई रिक्शा से इन अख़बारों के दफ्तरों में संपादक और संवादाताओं के सामने मत्था टेकने सभी आते थे। किन्ही के पैजामा फटे होते थे तो कोई समाचार के लिए पैजामा-कुर्ता में छिद्र बना लेते थे। आज वे सभी लोग भले  स्वयंभू राजा, महात्मन समझें, खुद को समाज के संभ्रांतों और बड़े लोगों की श्रेणी में स्थापित कर लें &#8211; लेकिन मुझे विश्वास है कि जब अपनी नजर में देखते होंगे तो शायद स्वयं से भी लज्जित होते होंगे। किसने किसको मुर्ख बनाया ? वैसे कलयुग है और लज्जा अब किसे आती है, खासकर राजनीति में। </p>
<p><strong>यह भी सोचता हूँ कि आज अगर इण्डियन नेशन अखबार के संपादक श्री दीनानाथ झा, श्री सीताशरण झा, श्री गजेंद्र नारायण चौधरी, आर्यावर्त  अख़बार के श्री हीरानंद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, &#8216;परमानन्द झा &#8216;शास्त्री&#8217;, श्रीकांत ठाकुर &#8216;विद्यालंकार&#8217;, सर्चलाइट अख़बार के श्री के.के.मक्कड़, इंडियन एक्सप्रेस के श्री कृपाकरण जी, हिन्दू अख़बार के श्री रमेश उपाध्याय, यूएनआई के श्री डी.एन. झा, श्री बी.ऍन. झा आदि होते तो नीतीश कुमार को देखकर यह कहते &#8220;पगला गया है नीतीश।  लालू तो प्रदेश को सत्यानाश कर ही दिया, शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, खेती-बारी, व्यापार, उद्योग का सत्यानाश कर ही दिया, अब प्रदेश के मतदाताओं से सडकों पर भीख मंगबायेगा। लूट-खसोट का जो कार्य जगन्नाथ मिश्र ने शुरू किया, लालू-नितीश उसे गोलघर बना दिया।&#8221; </strong></p>
<p>आज स्थिति ऐसी है जैसे बिहार के गंगा तराई, खासकर बेगूसराय, मुंगेर, बाढ़, बख्तियारपुर, खगड़िया, मोकामा आदि इलाकों में एक कहावत प्रचलित है &#8211; किसी पुरुषार्थ वाले कार्यों संपन्न करने की जब बात होती थी, गाँव-घर-अंचल-जिला की रक्षा करने की जब बात होती थी तो बूढ़-पुरैनिया कहती थी:  &#8220;पुरुख के बजा, पुरुख के बजा (पुरुष को बुलाओ, पुरुष को बुलाओ) ।&#8221; आज प्रदेश को मजबूत बनाने की आड़ में चिल्लाते हैं &#8220;पैसा लाओ, पैसा लाओ&#8221; चाहे प्रदेश के मुख्यमंत्री हों, &#8216;इच्छाधारी नेता हों, मंत्री हों, संत्री हों।&#8221; क्योंकि सभी जानते हैं कि पैसा का उपयोग कैसे होने वाला है और उसमें भी जब चुनाव सर पर हो। </p>
<p><strong>वैसे डाक बंगला चौराहे इस बात की चर्चा खुलेआम है कि जिस प्रकार आपातकाल के समय पुरुषों को पकड़कर-पकड़कर &#8216;बधिया&#8217; किया जाता था और फिर उनके लाभार्थ कम्बल, पांच किलो आटा, दो किलो आलू, कमीशन काट काट 70 रूपया नकद दिया जाता था ताकि लोग बाग़ &#8216;बधिया केंद्रों&#8217; की ओर आएं, जबरदस्ती पकड़कर लाये जाएँ &#8211; कुछ अपने, कुछ उनके लाभार्थ । आज सामाजिक और आर्थिक परिभाषा तनिक बदल सा गया है और गरीब एक किलो आटा और एक किलो आलू के लिए आजकल अपना बहुमूल्य मत देता हैं। उन दिनों लोगों को जनसँख्या बिस्फोट से अवगत कराने के वजाय, परिवार में अधिक बच्चे/ सदस्य होने से होने वाली तकलीफों से अवगत करने के वजाय उन्हें लोभ के जाल में फंसाया जाता था। पचास वर्ष बाद भी राजनेताओं, अधिकारियों, पदाधिकारियों, मंत्रियों, संतरियों की सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। बच्चों को विद्यालय बुलाने के लिए लोभ दीजिये &#8211; खिचड़ी से लेकर किताब-कॉपी-पेन्सिल तक (सभी निजी क्षत्र के व्यापारियों द्वारा उत्पादित) ताकि सरकारी कोष से पैसे निकले, मंत्री से अधिकारी तक बन्दर-बाँट हो।</strong></p>
<p>जो आई.ए तक पढ़ी और वियाह नहीं की उसे 25000, जो बीए तक पढ़ी और वियाह नहीं की उसे 50000 नकद दीजिये। जो भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रिलिमिनरी में उत्तीर्ण की, भले राज्य सरकार उन्हें चपरासी की नौकरी भी मुहैय्या करने में असमर्थ रहे, उसे एक लाख  दीजिये &#8211; क्योंकि पैसा दे दिए, विकास हो गया। जबाड़ेही सम्पत । इतना ही नहीं सार्वजनिक रूप से महिलाएं अपने पति के साथ कैसे रहते हैं, कैसे सम्भोग करते हैं, आवादी कैसे बढ़ती है इसका सार्वजनिक रूप से शारीरिक इशारों से ज्ञान दीजिये और उपस्थित लोगों, यहाँ तक कि पत्रकारों से पूछिए भी &#8211; आप लोग भी समझिये इस बात को !! अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा &#8216;सोच बदलो-देश बदलेगा&#8217; का बिहार में यही प्रभाव है तो निश्चित रहिये नीतीश बाबू की स्थिति भी उसी जमाव वाला पानी जैसा हो गया है जो अधिक दिनों तक जमाव होने से महकने लगता है। </p>
<p>डाक बंगला चौराहे पर तो मगही पान में तुलसी, 120, खुशबू डालने के बाद भी पान खाने वाले मतदाता कहते हैं &#8216;पता नहीं पटना नगर निगम वाले इस जमाव वाला पानी को साफ़ मैं नहीं करता, मतदाता विचार क्यों नहीं करता और मोदी जी पैसा देकर कब तक मतदाता को लुभाते रहेंगे। इस बजट में जो पैसे दिए प्रदेश के सभी विधायक, चाहे सत्तारूढ़ हों या विपक्ष या बिना किसी पार्टी के, टकटकी निगाह से देख रहे हैं कि कब चेक राज्य सरकार के कोष में आये और विकास के नाम पर पैसा लिया जाय। वैसे भी कहावत है &#8216;गए माघ बस उन्तीस बाकि&#8217;, विधान सभा का चुनाब तो अगले वर्ष ही है। &#8221;</p>
<p><strong>कल तक नरेंद्र मोदी का प्रत्यक्ष रूप से आलोचना करने वाले नीतीश बाबू आजकल पैर सहला कर हँसते हैं। उम्र में अधीन फासला नहीं है, लेकिन सोच में तो पूछिए ही नहीं। कुर्सी के लिए कुछ भी करेंगे । उधर मोदी जी भी देख रहे हैं कि बिहार का &#8216;कनिष्ठ मोदी&#8217; अब रहे नहीं, जिन्हें आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जाय और बिहार में शेष जो है भाजपा के नेता, उनकी अपनी छवि उतनी बेहतर नहीं है कि उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा। प्रयोग की शुरुआत तो हो गयी है। वैसे लोग बाग कहते हैं कि मोदी जी पार्टी में &#8216;एक आदमी &#8211; एक पद&#8217; की बात कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश के ज्ञानी-महात्मा जो मोदी जी को जानते हैं, वे कहते हैं की &#8216;मोदी जी अभी मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक फ्रायड की तरह ट्रायल एंड एर्रर सिद्धांत&#8217; का प्रयोग कर रहे हैं। </strong></p>
<p>बिहार के लोग बाग़ तो यह भी कहते हैं कि प्रदेश में भाजपा के दो चेहरा है &#8211; एक बाबू नित्यानंद राय और बाबू नन्द किशोर यादव &#8211; अच्छे छवि वाले लेकिन दुर्भाग्य यह है कि दोनों जैसे मिथिलाकी कहावत &#8211; &#8216;सुतल छी आ वियाह होइए (सोये हुए हैं और शादी हो रही है) &#8211; को अधिक चरितार्थ करते हैं। बाबू नित्यानंद राय दिल्ली से उजियारपुर और उजियारपुर से दिल्ली &#8211; इसके अलावे उनका प्रदेश के लोगों से उनका कोई ताल्लुकात नहीं है । इसी तरह बाबू नन्द किशोर यादव जैसे मन से शांत हैं वैसे ही शरीर से भी शांत हैं। ये सभी न तो प्रत्यक्ष रूप से सशरीर दीखते हैं और ना ही अख़बारों के पन्नों पर, टीवी के स्क्रीनों पर। अगर यह हालात रहा तो समय दूर नहीं है जब लोगबाग़ चेहरा भी भूल जायेंगे।&#8221;</p>
<p>विगत दिनों जब भाजपा ने विधान पार्षद व राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल को नया प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत किया जाना मोदी जी के उसी प्रयोग का नतीजा है। लोग बाग़ भले जायसवाल जी को माला पहनाएं, अंदर से फूल के एक-एक पत्ती को अलग-अलग कर देख रहे हैं। उनका तो यह भी कहना है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी बिना रीढ़ के हड्डी वाले हैं। पार्टी के अध्यक्ष के रूप में फैसला लेने का अधिकार उन्हें नहीं है। प्रधानमंत्री या गृह मंत्री का जो आदेश होता है उसे अमल में ला देते हैं, कागज पर हस्ताक्षर कर देते हैं। वैश्य में कलवाड़ समुदाय से आने वाले दिलीप जायसवाल पूर्व में पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। </p>
<p>उधर नीतीश कुमार सोचते हैं कि अब संख्या 45-46 होने तक तो मुख्यमंत्री बन ही गए, आगामी चुनाव में सागर सन्यास ले भी लेते हैं तो उनके रिकॉर्ड को तोड़ने में बहुत समय लगेगा। स्वाभाविक भी है। नेता इतना निर्लज्ज होगा भी नहीं कि कुर्सी के लिए सभी शर्त मान्य है कहता चला जाय। लोग बाग़ तो यह कह रहे हैं कि आगामी वर्ष होने वाले विधान सभा के चुनाव में सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के दावेदार नहीं होंगे &#8211; यह तय हो गया है दिन दयाल उपाध्याय मार्ग पर जहाँ भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय है। विगत पांच दशकों में, खासकर सन 1974 के आंदोलन के बाद प्रदेश का राजनीतिक दृष्टि से कितना पतन हुआ है, नेता लोग अपने-अपने क्षेत्रों के विकास की तुलना में, अपना-अपना कितन विकास किये हैं, यह तो उनका आकार-प्रकार से लेकर धन-संपत्ति-बैंक राशि, माकन, मॉल आदि बताता है। उससे भी अधिक बताता है उनके द्वारा जो कागजात निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत किया जाता है। </p>
<p>वैसे नीतीश कुमार के मुताबिक बजट 2024 से उनकी उम्मीदें पूरी हुई है। आम बजट 2024 में बिहार के लिए विशेष राहत पैकेज का ऐलान किया गया है और कुमार साहब केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद भी दिया है। वित्त मंत्री ने बजट में बिहार में चार नए एक्सप्रेस-वे बनाने के प्रस्ताव दिए हैं। आम बजट में बिहार में सड़क प्रोजेक्ट के लिए 26 हजार करोड़ के पैकेज की घोषणा की गई। इसके अलावा 21 हजार करोड़ के पावर प्लांट का भी ऐलान किया गया। केंद्र सरकार ने पटना से पूर्णिया के बीच एक्सप्रेस-वे बनाने के लिए फंड देने का ऐलान किया है। इसके अलावा बक्सर से भागलपुर के बीच हाईवे बनाया जाएगा। साथ ही बोधगया से राजगीर, वैशाली होते हुए दरभंगा तक हाईवे बनेगा। बक्सर में गंगा नदी पर दो लेन का एक पुल भी बनाया जाएगा। केंद्र सरकार बिहार में कई एयरपोर्ट, मेडिकल कॉलेज और स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना करेगी। पीरपैंती में 2,400 मेगावाट का पावर प्लांट स्थापित किया जाएगा।</p>
<p><strong>आश्चर्य तो यह है कि एक तरफ नीतीश कुमार महिलाओं की मर्यादा को तोड़ने में तनिक भी बिलम्ब नहीं करते, चाहे &#8216;सम्भोग और बच्चा जन्म देने की बात हो,&#8217; या सदन के पटल पर खुलेआम एक महिला विधायिका को कहें कि &#8216;आप महिला हैं, बैठ जाओ, नहीं समझोगी&#8217;, लेकिन प्रदेश में महिला सशक्तिकरण के लिए अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति का ढिंढोरा पीटने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं। उनके मंत्री और अधिकारी कहते हैं कि &#8220;उन्होंने महिलाओं के लिए कई अग्रणी कदम उठाकर बिहार अन्य राज्यों के लिए एक ट्रेंडसेटर बनने की ओर अग्रसर है। इसे पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण प्रदान करने के कदम से देखा जा सकता है, जिसने एक सामाजिक क्रांति की नींव रखी। इस क्रांति को कई नई योजनाओं और नीतिगत पहलों द्वारा पूरक बनाया गया है &#8211; मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना, मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना , जिनमें से महिला साक्षरता योजनाओं में मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना का एक अलग स्थान है</strong>।&#8221;</p>
<p>इतना ही नहीं, महिलाओं को सार्वजनिक रूप से भले &#8216;सम्भोग कैसे करते हैं&#8217; का ज्ञान दें, लेकिन यह कहते नहीं थकते महिलाओं से सम्बंधित विकास योजना उनके और उनकी सरकार के लिए एक &#8216;गेम-चेंजर&#8217; योजना है, जिसमें जीवन चक्र दृष्टिकोण शामिल है और यह सार्वभौमिक&#8217; है। अब सवाल यह है कि जब अपनी योजनाओं को &#8216;गेम चेंजर&#8217; शब्द से अलंकृत करते हैं तो व्यावहारिक रूप से इसका जो भी असर पड़े, हकीकत यह है कि यह प्रदेश के मतदाताओं के साथ, खासकर महिलाओं के साथ खेल खेल रहे हैं और उन्हें विस्वास है कि यह खेल उनके पक्ष में ही बदलाव लाएगा।&#8217;</p>
<p>बिहार सरकार के अधिकारी कहते है कि &#8216;समग्र योजना&#8217; के तहत &#8216;बालिका के जन्म से लेकर उसके स्नातक होने तक 54,100 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इंटरमीडिएट स्तर पास करने पर बालिका को स्नातक में दाखिला लेने के लिए प्रोत्साहन के रूप में 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। इसके बाद, स्नातक की पढ़ाई पूरी करने पर 25,000 रुपये की पुरस्कार राशि दी जाएगी। जीवन के विभिन्न चरणों में विभिन्न चरणों में दी जाने वाली वित्तीय सहायता, शिक्षा की लागत के कारण पढ़ाई छोड़ने की संभावना के खिलाफ निवारक उपाय के रूप में उपयुक्त रूप से काम करेगी।&#8217; इसी तरह, &#8216;समावेशी दृष्टिकोण&#8217; वाली योजना की कोई सीमा नहीं है क्योंकि यह जाति, आय या धर्म पर आधारित नहीं है। इस प्रकार, यह कार्यक्रम वास्तव में सार्वभौमिक है, अन्य योजनाओं के विपरीत जो मुख्य रूप से हाशिए पर पड़े छात्रों को लक्षित करती हैं।&#8217;</p>
<p><strong>आधिकारिक सूत्र यह कहता है कि &#8216;इससे पहले किसी भी योजना ने शिक्षा में मासिक धर्म प्रबंधन के मुद्दे को एमकेयूवाई की तरह संबोधित नहीं किया है। यह न केवल संबोधित करता है बल्कि इसे सुनिश्चित करने की दिशा में एक ठोस कदम भी उठाता है। यह योजना मासिक धर्म के दिनों में स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए सातवीं से बारहवीं कक्षा तक की प्रत्येक बालिका को प्रतिवर्ष 300 रुपये प्रदान करती है। सरकार मानती है कि &#8216;यह नकद हस्तांतरण प्रदान करके गरीबी, विवाह और मासिक धर्म संबंधी समस्याओं के कारण पढ़ाई छोड़ने के खिलाफ एक निवारक उपाय के रूप में काम करता है, कक्षा 12 पूरी करने पर अविवाहित होने की शर्त सुनिश्चित करता है।&#8217; आज़ादी के 76 वर्ष बाद बिहार के मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारी, पदाधिकारी की सोच &#8216;नैपकिन पैड&#8217; तक ही सीमित रहेगी, यह जानकार तकलीफ होती है। धन्यवाद के पात्र हैं आप नीतीश बाबू। </strong></p>
<p>अधिकारी कहते हैं कि “मुख्यमंत्री बालिका प्रोत्साहन योजना” के तहत, बिहार सरकार लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और स्कूलों में लैंगिक अंतर को पाटने के लिए समर्पित है। यह योजना आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों की लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करती है। यह छात्रवृत्ति, मुफ़्त पाठ्यपुस्तकें, यूनिफ़ॉर्म और साइकिल प्रदान करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि लड़कियों को स्कूल जाने और अकादमिक रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के समान अवसर मिलें। इसी तरह, “बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड” योजना का उद्देश्य मेधावी छात्रों को बिना किसी वित्तीय बाधा के उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम बनाना है। इस योजना के तहत, छात्र बिना किसी जमानत के कम ब्याज दर पर ₹4 लाख तक का शिक्षा ऋण प्राप्त करने के पात्र हैं। यह पहल छात्रों को अपने सपनों को पूरा करने, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने और बिहार के विकास में योगदान करने का अधिकार देती है।&#8217;</p>
<p>अधिकारी आगे कहते हैं कि “मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति उच्च शिक्षा प्रोत्साहन योजना” का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों का उत्थान करना है। यह योजना पेशेवर पाठ्यक्रमों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले एससी/एसटी छात्रों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इसमें ट्यूशन फीस, किताबें, आवास और अन्य शैक्षिक आवश्यकताओं जैसे खर्चों को शामिल किया जाता है। यह पहल हाशिए के समुदायों के छात्रों के लिए समान अवसर प्रदान करती है और समावेशी विकास सुनिश्चित करती है। इसी तरह,  “मुख्यमंत्री बालक/बालिका प्रोत्साहन योजना” डिजिटल शिक्षा को अपनाती है और इसका उद्देश्य बिहार में डिजिटल विभाजन को पाटना है। इस योजना के तहत, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों को प्री-लोडेड शैक्षिक सामग्री के साथ टैबलेट/लैपटॉप मिलते हैं। यह पहल न केवल छात्रों के सीखने के अनुभव को बढ़ाती है बल्कि उन्हें 21वीं सदी के नौकरी बाजार के लिए आवश्यक डिजिटल कौशल से भी लैस करती है।&#8217;</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/nitish-kumars-government-has-started-smelling-like-stagnant-water">स्थिर पानी जैसा &#8216;महकने&#8217; लगी है नीतीश कुमार की सरकार, कभी &#8216;संभोग&#8217; का ज्ञान देते तो कभी बालिकाओं के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य योजना चलाते हैं 300 रुपये प्रति वर्ष</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;कैसे कहूँ मैं मन की बात&#8221;: &#8216;नरेंद्र&#8217; बुढ़ा दिखने लगे, कल सरकार बन रही है कल गिरने के लिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Jun 2024 06:13:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सम्मानीय श्री नरेंद्र मोदी जी, प्रधानमंत्री, भारत प्रणाम। विगत 3 जून, 2024 को संध्याकाळ से आपका चेहरा देख रहा हूँ। अच्छा नहीं लग रहा है। विगत दस वर्षों में आपके चेहरे पर जो आकर्षण की प्रतिभा झलकती थी, अकस्मात बिलिन हो गयी। आपके चेहरे और शारीरिक भाषा-चलन को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा कि उधर [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सम्मानीय श्री नरेंद्र मोदी जी,<br />
प्रधानमंत्री,<br />
भारत<br />
प्रणाम। </strong><br />
विगत 3 जून, 2024 को संध्याकाळ से आपका चेहरा देख रहा हूँ। अच्छा नहीं लग रहा है। विगत दस वर्षों में आपके चेहरे पर जो आकर्षण की प्रतिभा झलकती  थी, अकस्मात बिलिन हो गयी। आपके चेहरे और शारीरिक भाषा-चलन को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा कि उधर 18वीं लोकसभा चुनाव में डाले गए मतों की गिनती शुरू हुई, उधर चेहरे की लालिमा घटती गई। आप हमसे बुजुर्ग हैं और निजी तौर पर मैं बुजुर्गों का बहुत सम्मान करता हूँ। ईश्वर से हमेशा प्रार्थना करता हूँ कि देश में बुजुर्ग स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहे &#8211; बिना दो घूंट दवा पिए। </p>
<p>सम्मानित मोदी जी, जब चुनाव परिणाम आना शुरू हुआ तो मेरे मन में एक उम्मीद जगी कि आप विगत दस वर्षों में भारत के जिन-जिन क्षेत्रों में भ्रमण-सम्मेलन किये, उस स्थान की भाषा में बात कर, वहां के लोगों को संबोधित कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिए, लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का अथक प्रयास किये। लोग भी आपके बारे में चर्चाएं घरों में, गलियों में, नुक्कड़ों पर, चाय की दुकानों पर यत्र-तत्र-सर्वत्र करने लगे। आपकी गौरव गाथाएं गाने लगे। परन्तु जब चुनाव परिणाम  आना शुरू हुआ, लोगों की आशाएं बढ़ने लगी कि आप वहां के मतदाताओं को उनकी ही भाषा में &#8216;धन्यवाद ज्ञापित&#8217; करेंगे। लेकिन आपभी अन्य नेताओं की तरह &#8216;जोड़-घटाव-गुणा-भाग&#8221; में लग गए और उन मतदाताओं को भूल गए जिन्हे आप उनकी भाषा में बात कर सम्वोधित किये थे।  </p>
<p>मोदी जी, मेरे एक बड़े भाई हैं उनका नाम भी &#8216;नरेंद्र&#8217; <strong>(श्री नरेंद्र कुमार झा) </strong>है। वे पटना के एक महत्वपूर्ण, प्रतिष्ठित और वेबाक प्रकाशक हैं। वे न तो झूठ बोलते हैं और ना ही अपने लाभार्थ लोगों को बरगलाते हैं। वे भी अस्सी वसंत अब तक देख चुके हैं जिसमें कोई सत्तर वसंत देश के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जैसे लोगों के सानिग्ध में। उनके घर और दिनकर के घर के बीच दस कदम की दूरी है। मैं अपना बचपन भी इसी घर की मिट्टी में गुजारा  हूँ। विगत दिनों जब बिहार में सुशील  मोदी के देहावसान के बाद आप उनके घर श्रद्धांजलि देने गए थे, पटना के &#8216;नरेंद्र&#8217; भी राजेंद्र नगर गोल चक्कर के पास आपका अभिनंदन करने कतारबद्ध थे। लेकिन आप उन्हें नहीं पहचानते थे। जबकि पटना ही नहीं, बिहार के लोगों के लिए वे बहुत श्रद्धेय हैं। </p>
<p>दिल्ली में मेरे एक मित्र हैं उसका नाम भी &#8216;नरेंद्र&#8217; (<strong>श्री नरेंद्र बिष्ठ</strong> है। पेशे से वह छाया-पत्रकार हैं। विगत चार दशकों और अधिक समय वह छाया-पत्रकारिता में अपना जीवन समर्पित किया है। पहाड़ का रहने वाला है। कभी उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहने वाला पहाड़ का वह भाग सन 2000 के 9 नवम्बर को राजनीती का शिकार हो गया &#8211; उत्तर प्रदेश का दो फांक हो गया। एक अलग वजूद होने के बाद भी नवनिर्मित उत्तराखंड में विकास के वे अवसर नहीं उपलब्ध हो सका, जिसका वह हकदार था। राजनेता लोग स्वहित में राज्य का निर्माण करने में सफल तो हो गए, लेकिन राज्य के लोगों को उचित शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और अन्य अवसर बनाने, देने में विफल रहे। नेता जैसे-जैसे विकसित होते गए, प्रदेश गरीबी रेखा के नीचे जाता गया। अपनी घोर उपेक्षा और शोषण के कारण पहाड़ पिघलने लगा, टूटने लगा । स्वाभाविक है पहाड़ के लोग भी अपने जान-माल के रक्षार्थ समतल पर आने लगे। आज कई हज़ार गाँव वीरान है। मेरे मित्र &#8216;नरेंद्र बिष्ठ&#8217; आपको जानता है, क्योंकि आप प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं, लेकिन आप उसे नहीं जानते, क्योंकि वह राजनीतिक गलियारे की चमचागिरी, खुशामदी से मीलों दूर रहता है। </p>
<p>मोदीजी, मेरे एक <strong>&#8216;आदर्श&#8217;</strong> हैं और उनका नाम भी &#8216;नरेंद्र&#8217; ही है। दुर्भाग्यवश वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। कई दशक पूर्व वे इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए। मेरे आदर्श की बड़ी बहन श्रीमती सूर्यमणी देवी की चौथी पीढ़ी के वंशज आज भी जीवित है। आपके प्रधानमंत्री बनने से पूर्व बनारस पर कार्य करने के दौरान मेरी पुस्तक &#8220;रीविजिटिंग बनारस&#8221; में श्रीमती सूर्यमणी देवी के वंशज भी 990-शब्द उस पुस्तक में लिखे हैं कि आखिर क्यों उसके पूर्वज को बनारस के लोगों ने &#8216;तिरस्कृत&#8217; कर दिया और उनके मरणोपरांत बनारस ही नहीं, पूरा विश्व उनके नाम का, उनके विचारों का स्वहित में &#8216;राजनीतिकरण&#8217; कर दिया। </p>
<p>यह अलग बात है कि आज सैकड़े 95 से अधिक फीसदी भारत ही नहीं, विश्व के लोग, मेरे उस आदर्श के असली नाम भी नहीं जानते हैं। मेरे वे आदर्श अपने जीवन काल में तीन बार बनारस आये। उनकी इक्षा थी कि बनारस के घाट पर एक मठ बनाया जाय अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए। लेकिन उस ज़माने के लोगों ने उनके साथ राजनीति कर दिए। मेरे ही तरह वे &#8216;अर्थ से दीन&#8217; थे, लेकिन &#8216;मस्तिष्क&#8217; से मजबूत थे। उस राजनीति का परिणाम यह हुआ कि बनारस में उनका मठ नहीं बन पाया और वे अंतिम बार बनारस की गंगा को प्रणाम कर चल दिए फिर कभी नहीं आने के लिए। अपने अंतिम सांस तक वे कभी बनारस नहीं आये और उनका मठ भी नहीं बना। पिछले दिनों आप बनारस में नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में उस स्थान पर साधना भी किये हैं जो मेरे आदर्श के नाम से विख्यात है।  </p>
<p>मैं जानता हूँ कि आप मेरे आदर्श को जानते हैं, नाम से, ज्ञान से &#8211; लेकिन वे आपको नहीं जानते वे, क्योंकि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। जानते हैं उनका नाम क्या है? श्री नरेन्द्रनाथ दत्त। भारत ही नहीं विश्व के लोग उन्हें स्वामी विवेकानंद के नाम से जानते हैं। क्या इत्तेफाक है। खैर। यह बात इसलिए लिख रहा हूँ कि आप का शुरूआती दिन, यानी जब आप देश का नेतृत्व करने का दायित्व अपने हाथों लिए, भारत के लोगों को एक उम्मीद जगी थी। लेकिन विगत दस वर्षों में भारत में जिस तरह एक तरफ पेड़-पौधों का कटाव हुआ, आपके इर्द-गिर्द के चमचे, चाटुकार, खुसामद करने वालों, चापलूसी करने वालों, झूठी तारीफ करने वालों, मक्खन लगाने वालों की तायदात कुकुरमुत्तों जैसा बढ़ता गया &#8211; समाज का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा, चाहे लेखक हों, पत्रकार हों, विशेषज्ञ हों, विद्वान हों, विदुषी हों &#8211; सभी कतारवद्ध हो गए आपका गुणगान करने, चाहे आप गलत ही क्यों न हों । कोई किताब लिखने लगे तो कोई आपकी तस्वीरों पर लेख लिखने लगे। परन्तु जो बात आप तक पहुंचनी थी, सच, वह रास्ते में ही &#8216;छन&#8217; गए। खैर। </p>
<p>श्री मोदी जी। आप देश के प्रधानमंत्री हैं। नेतृत्व आपके हाथ में है। अतः हमारा यह दायित्व है कि आपका सम्मान करें। साथ ही आपसे भी निवेदन है कि आप भी सच सुनने की हिम्मत रखें। जो सच की तरह दिखे वह नहीं सुनें क्योंकि  आपका वही सुनना विगत 3-4 और 5 जून का चुनाव परिणाम है। आपकी दशा और आने वाले दिनों में राष्ट्र की दिशा के बारे में आज सोच ही रहा था तभी आज अचानक सन 1971 के दशक की एक फिल्म &#8216;शर्मीली&#8217; याद आ गयी। वजह था इस फिल्म में भी &#8216;नरेंद्र&#8217; नाम का पात्र है। इस फिल्म में शशि कपूर, राखी, नरेन्द्रनाथ, नज़ीर हुसैन, अनीता गुहा, असित सेन आदि शीर्षस्थ कलाकार काम किये थे। इस फिल्म के निर्माता थे श्री सुबोध मुखर्जी और निर्देशन किया था समीर गांगुली। इस फिल्म में श्री गोपालदास सक्सेना यानी श्री नीरज साहब ने एक गीत लिखा था जिसमें संगीत दिया था श्री सचिन देव वर्मन और गायक लता मंगेशकर। यह गीत राग &#8216;पतदीप&#8217; पर आधारित थी। वैसे राजनीतिक बाजार में इस बात पर गुफ्तगू होती है कि इस गीत के तीन शब्दों को निवर्तमान और फिर वर्तमान सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के अग्रणी नेता अपने &#8216;सम्वोधन&#8217; का शीर्षक भी रखा था। उम्मीद हैं आप सभी के जेहन में आज भी शर्मीली फिल्म का वह गीत और उसके बोल जरूर होंगे। </p>
<p><strong>सब के आंगन दिया जले रे,<br />
मोरे आंगन जिया<br />
हवा लागे शूल जैसी,<br />
ताना मारे चुनरिया  &#8211; २<br />
कैसे कहूँ मैं मन की बात,<br />
बैरन बन गई निंदिया<br />
बता दे मैं क्या करूँ</strong></p>
<p>इस गीत का जिक्र यहाँ दो कारणों से किया हूँ। एक: आपकी &#8216;मन की बात&#8217; या आपकी वर्तमान मनोदशा की व्याख्या यह गीत कर रहा है जिसे आपकी पसंदीदा गायिका लता जी गायी हैं। और दूसरे यह गीत सत्तर के दशक के मेरे गुरुदेव की सत्यता को भी बताता है। आज भारतीय पत्रकारिता में चाहे-अनचाहे में जिस कदर शब्दों का प्रयोग हो रहा है, शब्दों के रंग बदल रहे हैं, भाव-भंगिमा बदल रहे हैं सम्पादकों का, मालिकों का, वह सोचनीय है। </p>
<p>&#8220;बता दें मैं क्या करूँ&#8221; के बदले &#8220;बता दें मैं क्या लिखूं&#8221; पूछे थे उसी ज़माने में आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन सहायक संपादक आचार्य परमानन्दन झा शास्त्री जब एक दिन के अवकाश&#8217; के लिए &#8216;सच&#8217; लिखे थे। जिन शब्दों का प्रयोग किया था वह सभी शब्द सत्यता के उत्कर्ष पर था। उन दिनों आर्यावर्त अख़बार के रविवासरीय संस्करण में सम्पादकीय पृष्ठ के अगले पृष्ठ पर बाएं हाथ पहला-दूसरा खंड में एक लेख प्रकाशित होता था &#8220;बहिरा नाचे अपने ताल&#8221; के शीर्षक से। सम्मानित शास्त्रीजी का एक और साप्ताहिक लेख था &#8220;चुटकुलानन्दजी की चिठ्ठी&#8217; जो समकालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक गतिविधियों पर आधारित होता था। बिहार के पाठक भले उस लेख के लेखक को नहीं पहचानते थे शरीर और चेहरे से, लेकिन उनका वह लेख, उसके शब्द ही उनकी पहचान बन गई थी गौतम बुद्ध, महावीर, चाणक्य के प्रदेश में। सभी इस बात का कदर करते थे कि कोई तो है जो &#8216;सच जैसा झूठ&#8217; नहीं बोलता है, लिखता है। </p>
<p>बाएं कंधे पर पीछे से काला छाता लटकाये, महात्मा गांधी जैसा ठेंघुना से ऊपर धोती, आधा शरीर में वस्त्र पहने जब वे अपने दफ्तर पहुँचते थे। कई लोग दो शब्द बात करने आगे आते थे, तो कई लोग जो उनकी प्रतिभा को सह नहीं सकते थे, दो कदम पीछे हो ले लेते थे। कई लोग यह भी इंतज़ार करते थे कि वे आएं तो मिलकर, प्रणाम कर ही जाऊंगा; कई लोग इस इंतज़ार में रहते थे कि जब वे चले जायेंगे, फिर उस ओर उन्मुख होंगे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे &#8220;झूठ&#8221; नहीं बोलते थे और &#8220;चमचागिरी कहें या मक्खनबाजी&#8221; कहें &#8211; नहीं करते थे। उनके विचार और कार्य के प्रति निष्ठा के कारण मेरे  बाबूजी के साथ उनका बहुत मधुर सम्बन्ध था। यदाकदा बाबूजी उन्हें श्रीमद्भगवदगीता के श्लोकों को उद्धृत कर कर्तव्य के प्रति निष्ठा की बात को दोहराते थे।</p>
<p>उसी कालखंड में उन्हें एक विशेष कार्य हेतु एक दिन का अवकाश लेना था। वे संपादक के नाम लिखित आवेदन में उस कार्य को उद्धृत किये जिसके कारण वे अवकाश चाहते थे। उनके आवेदन को पढ़ते ही बिजली की तरह बातें सम्पूर्ण संस्थान में फ़ैल गई। कई लोग उस आवेदन में लिखे शब्दों को &#8216;सही&#8217; मान रहे थे तो कई &#8216;गलत&#8217;, लेकिन कार्य और उद्धृत शब्दों में गहरा सम्बन्ध था। कार्य था: &#8220;अपनी बकरी को बोतू के पास ले जाना ताकि बकरी के शरीर की जैविक मांग पूरी हो सके और वह अपना वंश बढ़ाए।&#8221; उन दिनों बिहार की आवादी (बकरी की नहीं) कोई 42126236 के आस-पास थी और जनसँख्या में वृद्धि दर भी कम नहीं था तभी तो आज पचास वर्षों में हम 130725310 पहुँच गए हैं। बकरी की जनसँख्या कितनी बढ़ी यह बात प्रदेश की सरकार और उसके अधिकारी जनगणना में नहीं बताये। वजह भी था &#8211; बकरी का राजनीतिक बाजार में कोई मोल नहीं है। उन्होंने लिखा था कि &#8216;अमुक&#8217; कार्य के लिए मुझे जाना है और मैं कार्यालय आने में असमर्थ रहूँगा। </p>
<p>मेरे बाबूजी कहते भी थे कि &#8220;आधुनिक युग में पुरुषों का पुरुषार्थ उसकी शारीरिक क्षमता से नहीं, बल्कि धन-दौलत, जमीन-जायदात, बैंक में राखी राशियां, राजनीति में उसका दबदवा आदि तत्व होंगे तो उसके पुरुषार्थ को निर्धारित करेगा। बाबूजी यह भी कहते थे कि जब किसी व्यक्ति को सड़क पर जमीन मिल जाय, सड़क पर मकान मिल जाय, सड़क पर दूकान मिल जाय, उसकी हैसियत बढ़ जाती है। लेकिन जब वह व्यक्ति खुद सड़क पर आ जाय तो उसका पुरुषार्थ मिट्टी पलीद हो जाता है। बबजू सच कहते थे। आज देश के राजनीतिक बाज़ार में अपने ही देश के प्रधानमंत्री को देखकर मन दुखी हो गया क्योंकि परोक्ष रूप से वे सड़क पर ही थे। </p>
<p>उन दिनों आर्यावर्त ही नहीं, पटना से प्रकाशित सभी अख़बारों, मसलन इंडियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप, कौमी आवाज, जनशक्ति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी किउस कार्यालय में कार्य करने वाले कोई भी पत्रकार अथवा लेखक &#8220;झूठ&#8221; खबर नहीं लिखता था, प्रकाशित करता था। सम्पादकीय विभाग से लेकर संवाददाता था, चाहे प्रदेश के मुख्यालय में पदस्थापित हों अथवा प्रदेश के सभी 52 जिलों में पदस्थापित जिला संवाददाता &#8211; अपवाद छोड़कर झूठ कोई नहीं लिखता था। इसका जीवंत परिणाम यह दीखता था कि उन दिनों प्रदेश के सरकारी अथवा गैर-सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले हाकिम से लेकर चपरासी तक, अख़बारों में काम करने वाले चपरासी से भी &#8216;तमीज&#8217; और &#8216;तहजीब&#8217; से बात करते थे, उन्हें सम्मान देते थे। यह तब की बात थी जब अख़बारों के पन्नों पर काळा अक्षरों में लोगों का सफ़ेद करतूत प्रकाशित होता था। लेकिन जैसे जैसे अक्षरों के रंग बदलते गए, अक्षर रंग-बिरंगा होता गया, अक्षर अपना वजूद खोता गया। लिखने-बोलने वाले भी अपने सम्मान को नहीं बचा सके। </p>
<p>आज सुबह-सवेरे जब एफएम रेडियो पर &#8216;शर्मीली&#8217; फिल्म का यह गीत सुने और साथ ही टीवी पर भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं की तस्वीरों को आते-जाते देखे, तो अचानक बनारस के घाट वाली बात याद आ गई। पहले शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और फिर बाद में बनारस पर कार्य करते समय एक बात याद आ गई। आज &#8216;बनारस&#8217; के लोग भी &#8216;उस नरेंद्र&#8217; को नहीं जानते जिसे बनारस के लोग &#8216;स्वामी विवेकानंद&#8217; के नाम से जपते हैं, पूजते हैं। भारतीय राजनीतिक बाजार में स्वार्थी लोगों के हाथों खूब बिके, आज भी बिक रहे हैं और कल भी बिकते रहेंगे स्वामी विवेकानंद, लेकिन नरेंद्र नाथ के विचारों को, उनकी योग्यता को अपनानाने वाला आज भारत में शायद  व्यक्ति नहीं है। </p>
<p>श्री मोदी जी आज अचानक आपके चेरे पर &#8216;उम्र&#8217; दिखने लगी। आपको देखकर लगने लगा की आप सच में 74 वर्ष के हो गए हैं। मोदी जी का जन्म 17 सितम्बर, 1950 को, यानी भारतीय संविधान के लागू होने के आठवें महीने में हुआ था। जब भारत गणराज्य घोषित हुआ था उसके आठवें महीने में सम्मानित मोदी जी अवतरित हुए थे। जबकि बिहार के नीतीश कुमार भी पहली मार्च, 1951 को ही जन्म लिए थे और अभी 73 वर्ष के हैं। इतना ही नहीं, मोदी जी के अभी दंतहीन नहीं हुए हैं। बोलने के समय उनके होठ इधर-उधर लड़खड़ाते नहीं हैं, जबकि नितीश बाबू को बोलते समय उनके मुखमण्डल के साथ-साथ होठ, गाल की क्रियाकलापों को देखिये। सर पर सफेदी दोनों के पास है। अब सम्मानित नरेंद्र मोदीजी दस वर्षों से प्रधानमंत्री रहे, आगे बनने जा रहे हैं, स्वाभाविक है चेहरे पर तेज अधिक होगा। जबकि नीतीश बाबू कितना तेजी दिखाएंगे। मोदी जी, आज भी लिख लें &#8220;बिहार में वैसे कोई भी नेता बिहार के कल्याणार्थ, विकासार्थ कभी चिंतित नहीं हुए। जैसे जैसे प्रदेश के नेता आर्थिक रूप से स्वस्थ और मजबूत होते गए, प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख होता गया और नीतीश कुमार भी अछूता नहीं हैं।&#8221;</p>
<p>आज नरेंद्र मोदी की तेजी धराशायी दिख रही थी। मुख मलिन था। चेहरे पर जो रौनक इस माह के प्रारंभिक सप्ताह में था, वह रौनक नीतीश कुमार के चेहरे पर हस्तांतरित हो गया था। भाजपा या उनके सहयोगी दल और नेता मेज भले ठोक रहे थे जब राजनाथ सिंह मोदी गान कर रहे थे। साथ ही कई लोगों को तख़्त ठोकने के बाद अपना तलहत्थी भी देखते देखा। श्री परमानंदजी शास्त्री कहते थे &#8220;बौआ यौ!!!! समय से आगू नै भागु। समय के नीचा नै देखौ।&#8221; इसका ज्वलंत दृष्टान्त है मोदी जी और आप इसे स्वीकार करें। वैसे भारत के पत्रकारिता जगत के लोग, आपके चाटुकार, चापलूसी करने वाले आपको ताड़ के पेड़ पर चढ़ा रहे हैं, यह कहते थक नहीं रहे हैं कि पंडित नेहरू के बाद आप इतिहास बना रहे हैं।  लेकिन यह कोई नहीं कह रहे हैं कि आपकी पकड़ न केवल देश पर, भारत के मतदाताओं पर कमजोर हो गयी है, अपितु आपकी पार्टी और पार्टी के नेताओं से भी हाथ फिसल रही है। सभी प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, स्वास्थ्य मंत्री बनना चाह रहे हैं।  </p>
<p>तनिक विचार कीजिये : इस बार बनारस में आपके पक्ष में 54 . 2 फीसदी मतदान हुआ यानी उन्हें 612970 मत मिले जबकि इन विरोधी अजय राज को 460457 मत मिले (40.7) यानी 152513 मतों से विजय हुए। एक प्रधानमंत्री के लिए यह अंक उसके सम्पूर्ण क्षमता, दक्षता को मिट्टी पलीद करता है मोदी जी।सोचिये न मोदी जी। आपके पार्टी के ही विदिशा लोक सभा संसदीय क्षेत्र से मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवराज चौहान आठ लाख मतों के अंतर से विजय हुए। जबकि असम के धुबरी लोकसभा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रकीबुल हुसैन दस लाख मतों के अंतर से विजय हुए। अनेकानेक दृष्टान्त हैं मोदी जी जो &#8216;विचारणीय&#8217; है। वैसे अनुयायी, चमचे कुछ भी कहें, कुछ भी लिखें। जिस अमेठी को आप चुनाव की नाक बनाये थे, वहां कृष्णा लाल के हाथों आपकी ही पार्टी की नेता श्रीमती स्मृति ईरानी की नाक कट गई। इतना ही नहीं, जिस अयोध्या को लेकर, राम के आगमन को लेकर 17 वीं लोकसभा से 18 वीं लोकसभा की यात्रा तय की गई, लोगों को रमा-राम का पाठ पढ़ाये, उसी अयोध्या में राम भाजपा के घर से निकलकर कहीं और चले गए। </p>
<p>बहरहाल, विगत 84-दिवस पूर्व जब देश में 18वीं लोक सभा के गठन और तदनुसार आम चुनाव की घोषणा हुई, एक दिन पूर्व 15 मार्च, 2024 को भारत के निर्वाचन आयोग में दो आयुक्तों की नियुक्ति हुई। श्री ज्ञानेश कुमार और श्री सुखबीर सिंह संधू ने चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला। उस दिन था तो शुक्रवार लेकिन शनि की दशा प्रारम्भ हो गई थी। उस दिन एक और जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त श्री राजीव कुमार ने निर्वाचन सदन में नवनियुक्त चुनाव आयुक्तों का स्वागत किया, चुनाव आयुक्‍तों के लिए आगामी बारह सप्ताह अति व्‍यस्‍त और चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं शब्दों का शंखनाद किया, इन दोनों चुनाव आयुक्‍तों के शामिल होने के महत्व पर जोर दिया &#8211; 80 वें दिवस आते-आते रामचरित मानस की  चौपाई  &#8220;जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता&#8221; चरितार्थ होने लगे और निर्वाचन आयोग के प्रवेश द्वार पर सत्तारूढ़ पार्टी के नेता लोग देखकर &#8216;अनदेखा&#8217; करने लगे। यानी इन दो चुनाव आयुक्तों का पैर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए शुभकारी नहीं हुआ। अबकी बार 400 पार का नारा कसा नहीं जा सका, बल्कि खुला गया। </p>
<p>कल चुनाव आयोग के तीनों आयुक्त महोदय देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति से मिले। तस्वीरों को देखने से ऐसा लगा कि कौन कितने खुश हैं। उनके द्वारा माननीया राष्ट्रपति को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के संदर्भ में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अधिसूचना की एक प्रति सौंप दी गई, जिसमें 18वीं लोकसभा के आम चुनावों के बाद लोक सभा के लिए निर्वाचित सदस्यों के नाम शामिल हैं। ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के जबकि डॉ. सुखबीर सिंह संधू उत्तराखंड कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1988 सत्र के अधिकारी हैं। इतना ही नहीं, चुनाव से पूर्व पुरे देश में चुनाव पर पैनी निगाह रखने के लिए लाखों-लाख सैन्य वल तैनात किये क्योंकि मन में &#8216;हिंसा का भय था&#8217;, लेकिन कल शाम &#8216;महात्मा गाँधी की आत्मा से मिलने राजघाट भी पहुंचे। यह भी कहे महात्मा गांधी के अहिंसा के संदेश ने शांतिपूर्ण और हिंसा मुक्त चुनाव के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को प्रेरित किया। राष्ट्रपिता को राजघाट पर राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित भी किये। </p>
<p>फिर कहते रुके भी नहीं कि “हम यहां राष्ट्र द्वारा हमें सौंपे गए पवित्र कार्य, 18वीं लोकसभा के आम चुनाव सम्‍पन्‍न कराने के बाद राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए खड़े हैं। हम भारत के लोगों की इच्छा को लगभग अहिंसक तरीके से उत्प्रेरित करने के बाद अपने दिल में विनम्रता लिए हुए यहां खड़े हैं। &#8220;लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है&#8221;, यह वह स्पष्ट प्रतिबद्धता थी जिसके साथ 16 मार्च, 2024 को 18वीं लोकसभा के चुनावों की घोषणा की गई थी। चुनावी प्रक्रिया को हिंसा से मुक्त रखने की इस प्रतिज्ञा के पीछे हमारी प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे। उन्होंने इंसान के बीच समानता की वकालत की और सभी के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों की वकालत की।&#8221; </p>
<p>हम इस शपथ के साथ अपनी बात समाप्त करते हैं कि भारत के निर्वाचन आयोग की राष्ट्र के प्रति सेवा, जो अब अपने 76वें वर्ष में है, अडिग समर्पण के साथ जारी रहेगी। हमने अफवाहों और निराधार संदेहों के साथ चुनावी प्रक्रिया को दूषित करने के सभी प्रयासों को खारिज कर दिया, जो अशांति भड़का सकते थे। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपार आस्था रखने वाले आम आदमी की ‘इच्छा’ और ‘बुद्धि’ की जीत हुई है। हम नैतिक और कानूनी रूप से स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव आयोजित करके हमेशा इसी भावना को बनाए रखने के लिए बाध्य हैं। </p>
<p>मोदी जी। न आप और ना ही आपके इर्दगिर्द के लोग &#8216;जनसत्ता&#8221; के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार संजया कुमार सिंहकी लिखनी को ध्यान दिए। संजया जी ने लिखा भी था: &#8220;मैंने भाजपा को 240 सीटें ही मिलने का हिसाब लगाया था। मेरा हिसाब आसान है। 2014 में जैसी भाजपा थी उसे 282 सीटें मिली थीं। अब कांग्रेस तब से बेहतर है। उसके 12 सीटें घटा कर 270 मान लीजिये। दस साल में हम भाजपा, संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी को जान गये हैं और जो जाना है उसके 30 लक्षणों के लिए 30 सीटें कम कर दीजिये तो 240 बचती हैं। यही आनी थीं, आईं। अब जब कहा जा रहा है कि जनादेश मोदी सरकार के खिलाफ है तो समर्थक कह रहे हैं कि मोदी की सीटें ज्यादा हैं। इंडिया गठबंधन की कम हैं। मोदी सरकार की सीटें ज्यादा हैं उसके निम्नलिखित 20 कारणों के लिए 40 सीटें कम कर दीजिये तो भाजपा कहां टिकती है?&#8221;</p>
<p>उनका कहना था कि &#8220;चुनाव जीतने के लिए जो सब किया गया उसमें: भारत रत्न लुटाये गये (पांच),  सीएए लागू किया गया, जेबी केंचुआ का गठन, दस साल सिर्फ हिन्दू मुसलमान, आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचानने दावा, तुष्टिकरण का विरोध, संतुष्टिकरण का दावा, प्रमुख विपक्षी दल का खाता फ्रीज होना, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पर आरोप, महिला आरक्षण मातृशक्ति चरण वंदना, तस्वीर और प्रचार, बसपा, बीजद और पल्टू चाचा की निष्पक्षता और स्वतंत्रता (16 का हिसाब है), इंडिया गठबंधन के खिलाफ प्रचार, झूठ और निराधार आरोप, व्हाट्सऐप्प पर झूठ, अफवाह और कार्रवाई नहीं, न्याय यात्रा और नेशनल हेराल्ड केस शुरू, दस साल में एक भी भ्रष्टाचारी कांग्रेसी नहीं मिला, इंडिया गठबंधन या समूह को इंडी गठबंधन बोलना, आम आदमी पार्टी के खिलाफ सबूत न होना और अनुभवी चोर कहना, लालू यादव का मामला ना कांग्रेसी है ना 2014 के बाद का, इसी से नतीजों के बाद हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं, संसदीय मर्यादाओं के हत्यारे का फिर जीतना खबर नहीं है, बेअंत सिंह के बेटे की जीत खबर है &#8211; यह हमारे लोकतंत्र का हाल है।&#8221;</p>
<p>उन्होंने यह भी लिखा था कि &#8220;2014 में भाजपा को 282 सीटें मिली थीं। अभी उससे खराब स्थिति है। 270 सीटें मान लीजिये। तीस कारण हैं और हरेक कारण के लिए एक यानी कुल 30 सीटें घटा दीजिये। 240 से जो ज्यादा आये तो उसका श्रेय सीबीआई, ईडी, केचुआ और ईवीएम को बराबर दीजिये। अगर पहले जानना चाहते हैं तो इन शाखाओं से मिल सकने वाली सीटें अपने हिसाब से जोड़ लीजिये। एक दम सही सीटें मिलनी चाहिये।&#8221; </p>
<p>बहरहाल, मोदी जी आपको अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की सहित विश्व के कई नेताओं ने लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की जीत पर बधाई दे रहे हैं, साथ ही,  आपके साथ मिलकर काम करने की इच्छा व्यक्तकर रहे हैं।</p>
<p>कल आप मंत्रिमंडल का शपथ लेंगे। तीसरी बार सरकार बनाएंगे। लेकिन मोदी जी,  भारत और अमेरिका के बीच मित्रता, भारत-रूस के बीच मित्रता,  भारत-ब्रिटेन के बीच  सम्बन्ध सभी बातें अच्छी हैं, बेहतर है &#8211; लेकिन मोदी जी भारत के मतदाताओं को तबज्जो देना अधिक जरुरी है। आपको अमेरिका, ब्रिटेन, लंका, नेपाल, रूस, ऑस्ट्रेलिया, क़तर, जिम्बावे, डेनमार्क, ओमान, पुर्तगाल, पोलैंड, जर्मनी, जापान, फ़्रांस,  स्पेन आदि विश्व के 195 देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बधाई और सम्बन्ध मधुर बनाने, होने की बात तभी आएगी जब भारत के लोग आपके प्रति, आपकी पार्टी के प्रति विश्वास रखेंगे। अगर विश्वास होता तो 543 लोकसभा क्षेत्रों में आप 240 पर कैसे सिमट जाते ?  यानी देश के 45  फीसदी मतदाता आपके पक्ष में मतदान किये यानी आप को सरकार बनाने के लिए जो दो तिहाई बहुमत चाहिए, नहीं मिला। आपकी भी स्थिति नीतीश कुमार जैसी ही हो गयी। नीतीश कुमार शर्त  रख दिए थे &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; हम ही रहेंगे तभी &#8216;लालू&#8217; का साथ छोड़ेंग। आप भी शर्त मंजूर कर लिए। आज आपकी स्थिति नीतीश कुमार जैसी है। </p>
<p>खैर।  यह राजनीति है मोदी जी। आपकी सरकार कल बनने जा रही हैं कल गिरने के लिए &#8211; क्योंकि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडु इन बातों का चिंतन जरूर करेंगे कि अगर कहीं उन्होंने मोदी को अपनी-अपनी पार्टी का समर्थन दे दिया तो साल भर के अंदर उन्हें वह दिन देखना पड़ेगा, जब एक दिन सुबह वह उठेंगे तो उनके सारे सांसद मय पार्टी के भाजपा में शामिल हो चुके होंगे और वे निपट अकेले खड़े होंगे। शरद पवार और उद्धव ठाकरे यह दर्द झेल चुके हैं।</p>
<p>कई वर्ष तक पर्दे के पीछे से बार बार भाजपा की मदद करने वाले नवीन पटनायक आज अपने राज्य से बेदख़ल हो चुके हैं। न जाने किस अज्ञात दबाव में भाजपा से डरने वाली मायावती जी भारत की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी से शून्य पर पहुँच चुकी है। कभी पंजाब में दबदबा रखने वाले भाजपा के लंबे समय से गठबंधन सहयोगी रहे अकाली आज एक सीट पर सिमट गए हैं। भाजपा की सोहबत में रह कर कभी तमिलनाडु की बहुत बड़ी शक्ति होने वाली जयललिता की पार्टी आज मृतप्राय हो चुकी है। हरियाणा में कुछ साल पहले नई शक्ति के तौर पर उभरी जजपा एक ही बार भाजपा के मोहपाश में फँसी और राजनीतिक रसातल में पहुँच गई।</p>
<p>भाजपा के साथ कश्मीर में सरकार चलाने वाली महबूबा मुफ़्ती की पार्टी का आज कुछ पता नहीं है। और ख़ुद नीतीश कुमार बिहार की सबसे बड़ी शक्ति से घटकर विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी बन गए थे। भाजपा से पुराने रिश्तों के कारण ही चंद्रबाबू नायडू एक ज़माने में आँध्र प्रदेश के सर्वोच्च नेता से घटते घटते ग़ायब हो गए थे और फिर क़िस्मत से वापस आए हैं। ममता_बनर्जी ने समय रहते भाजपा से अपना संबंध ख़त्म कर दिया था और वे आज भी शान से बंगाल की मुख्यमंत्री है।</p>
<p><strong>इसलिए हे पार्थ !!! </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/government-is-being-formed-tomorrow-to-fall">&#8220;कैसे कहूँ मैं मन की बात&#8221;: &#8216;नरेंद्र&#8217; बुढ़ा दिखने लगे, कल सरकार बन रही है कल गिरने के लिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>140-करोड़ का प्रश्न ✍ श्रीमती सरला ग्रेवाल के बाद सुश्री विनी महाजन भारत सरकार की दूसरी कैबिनेट सचिव हो सकती हैं?</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/140-crore-question-can-ms-vini-mahajan-be-the-second-cabinet-secretary-of-the-government-of-india-after-mrs-sarla-grewal</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 May 2024 11:51:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[amit shah]]></category>
		<category><![CDATA[cabinet]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: अगले 91-दिनों में देश की राजनीतिक व्यवस्था में चाहे जो भी बदलाव हो, भारत सरकार के कैबिनेट सचिव के रूप में एक नया अधिकारी अवश्य पदस्थापित होगा। यह अधिकारी पुरुष भी हो सकते हैं और महिला भी। यदि आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नई सरकार बनती है, नए केंद्रीय मंत्रिमंडल बनता [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: अगले 91-दिनों में देश की राजनीतिक व्यवस्था में चाहे जो भी बदलाव हो, भारत सरकार के कैबिनेट सचिव के रूप में एक नया अधिकारी अवश्य पदस्थापित होगा। यह अधिकारी पुरुष भी हो सकते हैं और महिला भी। यदि आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नई सरकार बनती है, नए केंद्रीय मंत्रिमंडल बनता है तो नए कैबिनेट सचिव भी होंगे। वर्तमान कैबिनेट सचिव राजीव गौबा आगामी अगस्त महीने में अवकाश प्राप्त करने जा रहे हैं। वैसे उनके उत्तराधिकारी को लेकर सत्ता के गलियारों, खासकर नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बैठी नौकरशाही के बीच काफी कानाफूसी हो रही है, अटकलें लगाई जा रही हैं &#8211; सुश्री विनी महाजन भी हो सकती हैं। अगर ऐसा होता है तो स्वतंत्र भारत में श्रीमती सरला ग्रेवाल के बाद सुश्री दूसरी महिला कैबिनेट सचिव होंगी। </strong></p>
<p>75 वें गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर यानी 25 जनबरी को #अखबारवाला001 भारत के राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से, गृहमंत्री अमित शाह से, वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन् से या उन सभी महानुभावों, मोहतरमाओं, राजनेताओं, अधिकारियों, पदाधिकारियों से जो देश के प्रशासन, कानून व्यवस्था, प्रशासन से जुड़े हैं और सत्ता के गलियारे में क़ुतुब मीनार जैसा अस्तित्व रखते हैं, से एक प्रश्न किया था। </p>
<p><strong>सवाल था :</strong>भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारियों की विश्वसनीयता, कर्मठता पर कोई सवाल है क्या? फिर सुश्री ग्रेवाल को छोड़कर एक भी गृह/कैबिनेट सचिव क्यों नहीं नहीं? अगर ऐसा नहीं है तो आज़ाद भारत में अब तक 31 कैबिनेट सचिव और 37 गृह सचिव बने, लेकिन &#8216;सरला ग्रेवाल&#8217; (कैबिनेट सचिव) को छोड़कर कोई भी महिला कैबिनेट और गृह सचिव के लायक नहीं हुई। उम्मीद है 77वें स्वाधीनता दिवस आते-आते शायद भारत को दूसरी महिला कैबिनेट सचिव मिले।  </p>
<p>प्रधानमंत्री कार्यालय, नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक के आला अधिकारियों की गुफ्तगू और शीर्षस्थ सूत्रों को उद्धृत करते दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार <strong>राजीव रंजन नाग </strong>लिखते हैं कि &#8220;इस पद की दौड़ में तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शामिल हैं। मौजूदा कैबिनेट सचिव राजीव गौबा अगस्त में अपने कार्यकाल के अंत में पद छोड़कर इतिहास रचेंगे। 1982 बैच के झारखंड कैडर के अधिकारी तब भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले कैबिनेट सचिव होंगे। वह अपने पूर्ववर्ती पीके सिन्हा का रिकॉर्ड तोड़ देंगे, जो चार साल से कुछ अधिक समय तक इस पद पर रहे थे।&#8221;</p>
<p>नाग साहब आगे लिखित हैं कि &#8220;अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इनमें से किसी पर भी ध्यान दें तो श्री गौबा की जगह लेने की दौड़ में शामिल अधिकारी भी इतिहास रच सकते हैं। मोदी चौंकाने वाले फैसलों के लिए जाने जाते हैं। कैबिनेट सचिव के मामले में भी कोई अनोखा फैसला हो जाए तो शायद आश्चर्य नहीं होगा। कैबिनेट सचिव पद के लिए विचाराधीन तीन अधिकारी 1987 बैच के हैं &#8211; वित्त सचिव टीवी सोमनाथन, गुजरात के मुख्य सचिव राजकुमार और जल शक्ति सचिव विनी महाजन।&#8221;</p>
<p>#अखबारवाला001 ने सवाल किया था कि क्या सुश्री सरला ग्रेवाल को छोड़कर आज़ाद भारत में विगत 77 वर्षों में कोई भी महिला भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी भारत सरकार के कैबिनेट सचिव और गृह सचिव की कुर्सी पर बैठने योग्य नहीं हुईं?इस पुरुष प्रधान नौकरशाही और राजनीतिक ब्रह्माण्ड में सुश्री सरला ग्रेवाल ही एक भाप्रसे के अधिकारी हो पायी जो कैबिनेट सचिव की कुर्सी तक पहुंची। अगर देश के वर्तमान प्रधानमंत्री की महिला सशक्तिकरण सम्बन्धी विभिन्न योजनाओं को देखें तो आखिर महिला भाप्रसे भी तो इसी देश की नागरिक है, मतदाता हैं और वे भी संविधान में प्रदत्त अधिकार-कर्तव्यों के अधीन हैं &#8211; फिर उनके साथ भेदभाव कैसा? प्रश्न जटिल अवश्य हैं लेकिन सोचनीय, शोधनीय भी हैं। </p>
<p>अखबारवाला001  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री तमाम लोगों से प्रश्न किया था कि क्या महिला सशक्तिकरण की बात सिर्फ भारत के 664,369 गाँव में रहने वाली, खेतों की आड़ पर जीवन यापन करने वाली, पुरुषों की तुलना में 14.4 फीसदी कम साक्षरता का आंकड़ा (पुरुष: 84.7 फीसदी और महिला 70.3 फीसदी) वाला बोर्ड गर्दन में लटकाई महिलाओं के लिए ही है?क्या भारत के शिक्षित, मेधावी, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वयं को, देश की गरिमा को स्थापित करने वाली महिलाएं उस सशक्तिकरण का हिस्सा नहीं है? घर में तो उन्हें &#8216;रसोई घर&#8217; में सीमित कर ही देते हैं परिवार के &#8216;पुरुष&#8217;, शैक्षिक रूप से अव्वल होने के बावजूद दफ्तर में भी &#8216;राजनीतिक मास्टर&#8217; और &#8216;पुरुष अधिकारी&#8217; &#8216;दरकिनार&#8217; कर देते हैं उन्हें ? फिर कैसा सशक्तिकरण? </p>
<p>कहते हैं कि &#8220;भाप्रसे के अधिकारी (महिला सहित) इस संवर्ग के किसी भी पद को अपनी वरीयता एवं योग्यता के आधार पर पहुँच सकती हैं बशर्ते उन्हें किसी विभागीय कार्रवाई में सजा नहीं मिली हो या विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिला हो को छोड़कर । विभागीय कार्रवाई और विजिलेंस क्लीयरेंस सबके लिए ज़रूरी है,&#8221; यह तो सत्यता का उत्कर्ष है। परन्तु, केंद्रीय सतर्कता आयोग की &#8216;सतर्कता&#8217; पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। लेकिन अगर आज से 23-साल पहले 2001 में आयोग के तत्कालीन प्रमुख एन. विठ्ठल द्वारा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक पद पर नियुक्ति संबंधी केंद्र सरकार को प्रेषित &#8216;सिफारिश&#8217; को देखा जाय, तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि &#8216;कभी-कभी सतर्कता आयोग के आला अधिकारी भी पारदर्शी निर्णय नहीं लेते हैं। </p>
<p>यह बात यहाँ इसलिए लिख रहा हूँ कि स्वतंत्र भारत में भले लाखों लोग भारतीय प्रशासनिक सेवा के अभ्यर्थी से अधिकारी बने हों, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि &#8216;एक महिला के अतिरिक्त&#8217; आज तक कोई भी भाप्रसे के महिला अधिकारी रायसीना हिल स्थित गृह मंत्रालय में गृह सचिव या फिर कैबिनेट सचिव नहीं बन पाई हैं। विगत 77 वर्षों में सिर्फ एक महिला कैबिनेट सचिव की कुर्सी तक पहुंची, जबकि देश में उत्तम श्रेणी के महिला भाप्रसे अधिकारियों की किल्लत नहीं है। यह एक गहन शोध का विषय है।<br />
  <br />
<strong>सूत्रों का हवाला देते राजीव रंजन नाग का कहना है कि इधर, वर्तमान परिपेक्ष में इन तीनों में एक ऐसा अधिकारी शामिल है, जिसे अपने करियर की शुरुआत में ही अपनी तत्कालीन राजनीतिक बॉस जे जयललिता के साथ तीखी लड़ाई के बाद सेवा से बाहर कर दिया गया था, हालांकि जयललिता ने हठपूर्वक उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था। टीवी सोमनाथन, जिन्हें उनके सहकर्मी प्यार से टीवीएस के नाम से जानते हैं। तमिलनाडु कैडर के 1987 बैच के आईएएस अधिकारी श्री सोमनाथन को अप्रैल 2021 में पीएम के नेतृत्व वाली कैबिनेट कमेटी ऑन अपॉइंटमेंट्स (सीसीए) द्वारा केंद्र में वित्त सचिव नियुक्त किया गया था।</strong></p>
<p>टीवीएस के वित्तीय कौशल का इतना सम्मान किया जाता है कि विश्व बैंक के पूर्व प्रमुख ने तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से टीवीएस को सेवा प्रदान करने का अनुरोध किया। हालाँकि, TVS की अभी भी कई साल की सेवा बाकी थी। डॉ. सिंह ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया. यह मुख्य कारण हो सकता है कि प्रधान मंत्री मोदी, क्योंकि वह अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन को संभावित तीसरे कार्यकाल का फोकस बनाते हैं, वर्तमान वित्त सचिव पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि अपनी बेदाग ईमानदारी के लिए जाने जाने वाले श्री सोमनाथन का अपने करियर की शुरुआत में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के साथ कड़वाहट भरा विवाद था। उन्होंने अपने द्वारा संभाले गए एक मामले की सतर्कता जांच का आदेश दिया था। टीवीएस के आदेश से मुख्यमंत्री इतनी नाराज हुईं कि उन्होंने उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए राज्य से मुक्त करने से भी इनकार कर दिया. वित्त सचिव ने कैबिनेट में सभी सचिवों की आखिरी व्यापक प्रस्तुति में शुद्ध हिंदी में बोलकर अपने सहयोगियों को प्रभावित किया।</p>
<p>सूत्रों के मुताबिक, शीर्ष पद के लिए एक अन्य उम्मीदवार पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात के मुख्य सचिव राज कुमार हैं। पीएम मोदी के केंद्र में कार्यभार संभालने के कुछ महीने बाद 2015 में श्री कुमार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आए। केंद्र सरकार में श्री कुमार की आखिरी पोस्टिंग बेहद चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील थी &#8211; वह रक्षा मंत्रालय में सचिव, रक्षा उत्पादन थे। केंद्र में एक उत्कृष्ट कार्यकाल के बाद, वह 2021 में अपने मूल कैडर गुजरात लौट आए। उनकी वापसी के बाद, गुजरात सरकार ने उन्हें संवेदनशील गृह विभाग का प्रभार दिया।</p>
<p>पिछले साल जनवरी में उन्हें मुख्य सचिव पद पर पदोन्नत किया गया था। एक सुलझे हुए नौकरशाह के रूप में जाने जाने वाले श्री कुमार यूपी के बदांयू से हैं। उनके बैच साथियों के अनुसार, उनके पक्ष में एक बड़ा कारण, दूसरों की तुलना में कहीं अधिक, वह अंतर्निहित विश्वास है जो प्रधानमंत्री ने उन पर व्यक्त किया है। दौड़ में तीसरी अधिकारी, और शायद वरीयता क्रम में, विनी महाजन हैं। यदि प्रधान मंत्री उन्हें नियुक्त करते हैं, तो यह इतिहास बनाएगा क्योंकि वह भारत की पहली महिला कैबिनेट सचिव होंगी क्योंकि यह पद स्वतंत्रता से पहले बनाया गया था।</p>
<p>अखबारवाला001 का सवाल था कि क्या 15 अगस्त, 1947 को जब देश आज़ाद हुआ, उस दिवस से लेकर आज तक भारत में जितने भी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हुए या हैं, उनमें कोई भी महिला अधिकारी (सुश्री ग्रेवाल को छोड़कर) ऐसी नहीं हो पायी जो भारत सरकार के कैबिनेट सचिव और गृह मंत्रालय के सचिव पद पर बैठ पाती? क्या इस पद पर पदस्थापित होने के लिए जितनी भी क़ानूनी-प्रक्रिया हैं, मसलन केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा &#8216;क्लीयरेंस&#8217; प्रमाणपत्र, विभागीय जांच आदि में &#8216;सफल&#8217; नहीं हो पायी?  अगर ऐसा है तो या &#8216;एक शोध का विषय&#8217; है, अगर ऐसा नहीं है तो यह &#8216;विचारणीय विषय&#8217; है।</p>
<p>15 अगस्त, 1947 में जब सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह मंत्री बने, उस समय से लेकर अमित शाह तक कुल 29 राजनेता नॉर्थ ब्लॉक के गृहमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। सरदार पटेल के बाद जवाहरलाल नेहरू, सी राजगोपालाचारी, कैलाशनाथ काटजू, गोविंद बल्लभ पंत, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, यशवंत राव चवन, इंदिरा गांधी, उमा शंकर दीक्षित, के बी रेड्डी, चरण सिंह, मोरारजी देसाई, हिरुभाई पटेल, जैल सिंह, आर वेंकटरमण, पी सी सेठी, पी वी नरसिम्हा राव, बूटा सिंह, मुफ़्ती मोहम्मद सईद, चंद्रशेखर, शंकर राव चवन, मुरली मनोहर जोशी, देवगौड़ा,इंद्रजीत गुप्त, लालकृष्ण आडवाणी, शिवराज पाटिल, पी चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, राजनाथ सिंह और अमित शाह गृह मंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए। </p>
<p>लेकिन इन काल खण्डों में एक भी महिला भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी गृह मंत्रालय में गृह सचिव की कुर्सी तक नहीं आयी। एक अपवाद अवश्य है जब श्रीमती इंदिरा गांधी गृह मंत्री थी, उस समय महिला मंत्री और पुरुष गृह सचिव रहे। आज तक ऐसा कोई अवसर नहीं है जहाँ पुरुष गृहमंत्री और महिला गृह सचिव हों। व्यावहारिक रूप से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश का केबिनेट कमिटी ही ऐसे वरिष्ठ पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति करता है। </p>
<p>पिछले दिनों (23 मार्च, 2022) को जब भारत के संसद में सरकार की ओर से कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत में (1 जनवरी, 2022 तक) कुल 5317 पद भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों के लिए है जिसमें 1472 पदों पर कोई नहीं हैं और रिक्त पड़े हैं &#8211; यह आंकड़ा स्वयं में ही एक शोध का विषय है कि राजनेता, मंत्री, विभाग, सरकार भाप्रसे के अधिकारियों को कितना महत्व देते हैं । आम तौर पर सरकार संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षाओं के आधार पर प्रतिवर्ष 180 भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को नियुक्त करती है।</p>
<p>अब जहां तक आरक्षण का सवाल है उसमें सेंट्रल डेपुटेशन के लिए 40 %, राज्य डेपुटेशन के लिए 25%, ट्रेनिंग के लिए 3 . 5 % लीव/जूनियर के लिए 16. 5 % पद आरक्षित हैं। यह आरक्षण जाति के आधार वाले आरक्षण नहीं है। वैसे जाती के आधार पर अगर देखा जाय तो मसलन मुस्लिम, दलित, पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों को शायद ही कभी गृह सचिव के पद पर आसीन किया गया होगा। वैसे यह शोध के अधीन है। पद पर आरक्षण कोटि से आने वाले अभ्यर्थियों की बात नहीं कर रहा हूँ। ज्ञातव्य हो कि 5 मई 1947  से 2 जुलाई  1948 तक आर एन बनेर्जी पहला गृह सचिव बने केंद्र सरकार में। फिर आये एच वी आर अयंगर जो 1 अगस्त 1948 से 28 फरवरी 1953 तक विराजमान रहे। पहली मार्च 1953 को ए वी पाई नए गृह सचिव बने जो 14 जनवरी 1958 तक बने रहे। श्री पाई के बाद 15 जनवरी 1958 से 26 नवम्बर 1961 तक बी एन झा भारत सरकार के गृह सचिव रहे। साठ के दशक में आये वी विश्वनाथन। विश्वनाथन 27 नवम्बर 1961 से 18 सितम्बर 1964 तक कार्यालय में रहे। फिर 18  सितम्बर 1964 से 1  जनवरी 1971 तक एल पी सिंह गृह सचिव रहे।इनके बाद आये गोविन्द नारायण जो 1  जनवरी 1971 से 18 मई 1973 तक कार्यालय में रहे। 4  जुलाई 1973 से 23 जून 1975 तक निर्मल कुमार मुखर्जी गृह सचिव रहे। 23 जून 1975 से 30 मार्च 1977 तक एस एल खुराना कार्यालय में रहे। टीसीए श्रीनिवास वर्धन 31 मार्च 1977 से 29 फरवरी 1980 तक गृह सचिव थे।  एस एम एच बर्नी 29 फरवरी 1980 से 12 अगस्त 1981 तक कार्यालय में रहे। फिर आये टी एन चतुर्वेदी जो 12 अगस्त 1981 से 29 फ़रवरी 1984 तक गृह सचिव थे। </p>
<p>चतुर्वेदी के बाद क्रमशः एम एम के वाली (1 मार्च 1984 से 4 नवम्बर 1984), प्रेम कुमार (6  नवम्बर 1984 से 15 जनवरी 1985 तक) आर डी प्रधान (15 जनवरी 1985 से 30 जून 1986 तक), सी जी सोमाह (1 जुलाई 1986 से 16 अक्टूबर 1988 तक), जे ए कल्याणाकृष्णन (17 अक्टूबर 1988 से 29 दिसम्बर 1989 तक), सिरोमनि श्रम (29 दिसंबर 1989 से 20 मार्च 1990), नरेश चंद्र (21 मार्च 1990 से 11 दिसंबर 1990 तक), आर के भार्गव (12 दिसंबर 1990 से 3 अक्टूबर 1991), माधव गोडबोले (4 अक्टूबर 1991 से 23 मार्च 1993 तक) । फिर बने एन एन वोहरा जो 6 अप्रैल 1993 से 31 मई 1994 तक कार्यालय में रहे। वोहरा के बाद बने के पद्मनाभैया जो 1 जून 1994 से 31 अक्टूबर 1997 तक कार्यालय में रहे। फिर आये बाल्मीकि प्रसाद सिंह जो 1 नवम्बर 1997 से 4 मई 1999 तक गृह सचिव थे। </p>
<p>5 मई 1999 से 15 अक्टूबर 2002 तक कमल पांडे पद पर विराजमान रहे। फिर एन गोपालस्वामी (15 अक्टूबर 2002 से 8 फरवरी 2004 तक), अनिल बैजल (8 फरवरी 2004 से 1 जुलाई 2004), धीरेन्द्र सिंह (1 जुलाई 2004 से 31 मार्च 2005), वीके दुग्गल (31 मार्च 2005 से 31 मार्च 2007), मधुकर गुप्ता (31 मार्च 2007 से 30 जून 2009), गोपाल कृष्ण पिल्लई (30 जून 2009 से 30 जून 2011), आर के सिंह (30 जून 2011 से 30 जून 2013), अनिल गोस्वामी (30 जून 2013 से 4  फरवरी 2015) , फिर आये एल सी गोयल (5 फरवरी 2015 से 31 अगस्त 2015), राजीव महर्षि (31 अगस्त 2015 से 30 अगस्त 2017) राजीव गौबा (31 अगस्त 2017 से 22 अगस्त 2019) और फिर अजय कुमार भल्ला 22 अगस्त 2019 से पदस्थापित हैं। </p>
<p>इसी तरह, स्वतंत्र भारत में अब तक 31 कैबिनेट सचिव बने। इसमें 30 पुरुष ही कुर्सी पर चिपके। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की प्रधान सचिव रही 1952 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सुश्री सरला ग्रेवाल इकलौती महिला अधिकारी हैं जो कैबिनेट सचिव बन पायी। सुश्री ग्रेवाल इस पुरुष प्रधान नौकरशाह और राजनेताओं की गढ़ को तोड़कर कैसे उस पद पर पहुंची यह भी एक शोध का विषय है। सुश्री ग्रेवाल 1989-90 में मध्य प्रदेश की राज्यपाल भी बनी। कहते हैं भारत के कैबिनेट सचिव भारत के सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी और वरिष्ठ सरकारी अधिकारी हैं। कैबिनेट सचिव सिविल सेवा बोर्ड, कैबिनेट सचिवालय, भारतीय प्रशासनिक सेवा के  अध्यक्ष और भारत सरकार के नियमों के तहत सभी सिविल सेवाओं के प्रमुख हैं। </p>
<p>अब तक से अगर सभी कैबिनेट सचिव और गृह सचिवों के नामों का अवलोकन करते हैं तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब तक जितने भी अधिकारी इन पदों पर बैठे, वे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से (अगर वरीयता को ध्यान में रखा जाए) किसी न किसी तरह अपने-अपने &#8216;राजनीतिक मास्टर के ब्लू-आइड ही रहे। अगर ऐसा नहीं होता तो अधिकारियों के संघ में भी मनमुटाव नहीं होता। </p>
<p>वैसे भारत का राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति लिंग समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्‍य को महिलाओं के पक्ष में किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने की भी बात करता है।  अगर ऐसा है तो क्या यह उन महिलाओं के लिए नहीं है जो संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित देश के कठिनतम परीक्षाओं अव्वल आकर कुर्सी पर बैठती हैं। महाभारत में तो &#8216;अभिमन्यु&#8217; चक्रव्यूह को नहीं तोड़ सके, क्योंकि वे सो गए थे (भगवान् यही प्रारब्ध लिखे थे), लेकिन भारत की ये सभी महिलाएं इस राजनीतिक और पुरुष प्रधान नौकरशाही द्वारा रचित चक्रव्यूह को क्यों न तोड़ पा रही हैं ।</p>
<p>लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के ढांचे के अंतर्गत हमारे कानूनों, विकास संबंधी नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों में विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उन्नति के उद्देश्य बनाया गया है। पांचवी पंचवर्षीय योजना (1974-78) से महिलाओं से जुड़े मुद्दों के प्रति कल्याण की बजाय विकास का दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। हाल के वर्षों में, महिलाओं की स्थिति को अभिनिश्चित करने में महिला सशक्तिकरण को प्रमुख मुद्दे के रूप में माना गया है।</p>
<p>महिलाओं के अधिकारों एवं कानूनी हकों की रक्षा के लिए अनेकानेक कानून हैं भारत के संविधान में। भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों और मानवाधिकार लिखतों की भी पुष्टि की है। मेक्सिको कार्य योजना (1975), नैरोबी अग्रदर्शी रणनीतियां (1985), बीजिंग घोषणा और प्लेटफार्म फॉर एक्‍शन (1995) और जेंडर समानता तथा विकास और शांति पर संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र द्वारा 21वीं शताब्दी के लिए अंगीकृत &#8220;बीजिंग घोषणा एवं प्लेटफार्म फॉर एक्शन को कार्यान्वित करने के लिए और कार्रवाइयां एवं पहले&#8221; नामक परिणाम दस्‍तावेज को समुचित अनुवर्ती कार्रवाई के लिए भारत द्वारा पूर्णतया पृष्ठांकित कर दिया गया है।  </p>
<p>वैसे सरकार यह मानती है कि भारत में लिंग संबंधी &#8216;असमानता&#8217; है और यह लिंग संबंधी असमानता कई रूपों में उभरकर सामने आ रही हैं जिसमें से सबसे प्रमुख विगत कुछ दशकों में जनसंख्या में महिलाओं के अनुपात में निरंतर गिरावट की रूझान है। लेकिन संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में तो ये महिलाएं पुरुषों के बराबर, अधिक ऊँचा स्थान बनती हैं ! </p>
<p>इन सशक्तिकरण और नीतियों की बात यहाँ इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि देश में पुरुष, महिला या अन्य लिंग के रहने वाले सभी लोग, चाहे वे सरकारी क्षेत्र में, निजी क्षेत्र में कार्य करते हों अथवा नहीं। अगर देश के नागरिक हैं तो वे देश के नियम के अधीन हैं। मेरे मन में एक सवाल उठा रहा है कि क्या देश के संविधान, कानून व्यवस्था या अन्य लिखित विधि-विधानों के अंतर्गत, जिससे देश का कानून व्यवस्था, प्रशासन चलता हैं, उसमें ऐसी कोई बात उद्धृत हैं की भारत सरकार के गृह मंत्रालय के शीर्षस्थ अधिकारी, यानी गृह सचिव महिला योनि के नहीं होंगे। अगर ऐसा नहीं है तो अब तक बने 36 गृह सचिवों में महिला अधिकारी कोई क्यों नहीं नियुक्त/चयनित हुए। </p>
<p>यह अलग बात है कि स्वतन्त्रव भारत में अब तक 29 राजनेता भारत सरकार में गृह मंत्री बने हैं, जिसमें श्रीमती इंदिरा गाँधी को छोड़कर, शेष सभी 28 पुरुष हैं। श्रीमती इंदिरा गाँधी पहली बार 9 नवम्बर से 13 नवम्बर 1966 में चार दिन के लिए, फिर 27 जून, 1970 से 5 फरबरी, 1973 तक कुल दो वर्ष 223 दिन गृह मंत्री भी थी। वे यशवंतराव चवण से पदभार ग्रहण की थी और उमा शंकर दीक्षित को पदभार सौंपी थी। अब सवाल यह है कि 29 राजनेताओं में एक महिला गृहमंत्री बनी और 36 गृह सचिवों में एक भी महिला नहीं। जबकि हम अपनी आज़ादी का 77 वन और गणतंत्र का 75 वन वर्षगांठ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में मना रहे हैं। </p>
<p>वैसे राज्य सरकारों में महिला गृह सचिवों का पदस्थापना देखने को मिलता है। वर्तमान काल में ही कोई 25 वर्ष बाद पश्चिम बंगाल सरकार श्रीमती नंदिनी चक्रवर्ती को गृह सच्ची बनायीं है। श्रीमती चक्रवर्ती बी पी गोपालिका से पढ़भर ग्रहण की हैं। श्री गोपालिका अब प्रदेश के मुख्य सचिव  पर बैठे हैं। किसी भी प्रदेश अथवा केंद्र सरकार के अधीन मंत्रालय में महिला सचिव का होना &#8216;आम बात&#8217; है। लेकिन जब मुख्य सचिव, गृह सचिव की बात होती है तब सरकार, सरकारी नियम, सरकारी नेता &#8216;महिला सशक्तिकरण&#8217; के बारे में क्यों नहीं सोचते ? पश्चिम बंगाल सरकार में 1996-1998 के कालखंड में सुश्री लीना चक्रवर्ती पहली महिला अधिकारी थी जो प्रदेश के गृह सचिव के पद पर आसीन हुई थी। </p>
<p><strong>बहरहाल, सूत्रों का कहना है कि विनी महाजन भी उसी आईएएस बैच से हैं। वह अत्यधिक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य पंजाब की मुख्य सचिव थीं, जो उनका गृह कैडर था। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के करीबी माने जाने वाले अधिकारी को उनकी ही सरकार के खिलाफ आधी रात को तख्तापलट के बाद राज्य कांग्रेस नेतृत्व ने हटा दिया था।</strong></p>
<p>दूसरी पीढ़ी की नौकरशाह विनी महाजन पंजाब के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बीबी महाजन की बेटी हैं। बीबी महाजन केंद्र में खाद्य मंत्रालय में सचिव रह चुकी हैं. एक समर्पित, ईमानदार नौकरशाह, वह अपनी तर्कसंगत सोच और व्यवस्थित योजना के लिए जानी जाती हैं। भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) कोलकाता से एमबीए सुश्री महाजन, प्रधान मंत्री कार्यालय के कामकाज में व्यापक अनुभव वाली एकमात्र महिला हैं। महाजन ने लंबे समय तक मनमोहन सिंह के पीएमओ में काम  किया है। ये तीनों पहली बार आईएएस अधिकारी बने हैं, ये तीनों अपने बैच में सबसे कम उम्र के हैं और इनमें से दो मुख्य सचिव रह चुके हैं। साथ ही, ये तीनों बेहद साफ-सुथरे होने के लिए जाने जाते हैं।</p>
<p>पंजाब की सबसे ताकतवर जोड़ी डीजीपी पंजाब दिनकर गुप्ता और मुख्य सचिव विनी महाजन आज मनोनीत मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को बधाई देने उनके आवास पर पहुंचे। चन्नी ने मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ उनका स्वागत किया। यह उल्लेख करना उचित है कि डीजीपी और सीएस पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पसंद थे और उन्हें पूर्व सीएम का पूरा विश्वास प्राप्त था।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/140-crore-question-can-ms-vini-mahajan-be-the-second-cabinet-secretary-of-the-government-of-india-after-mrs-sarla-grewal">140-करोड़ का प्रश्न ✍ श्रीमती सरला ग्रेवाल के बाद सुश्री विनी महाजन भारत सरकार की दूसरी कैबिनेट सचिव हो सकती हैं?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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