संसद, सांसद रवि किशन और जया बच्चन, देश, फिल्म जगत में नशा की समस्या और ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली ​पदार्थों पर कब्ज़ा – कुछ तो सही होगा ही

हमारी फिल्म इंडस्ट्री में भी नशा एक गंभीर समस्या है :रवि किशन

नई दिल्ली: कोई पांच साल पहले, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार देश का नेतृत्व संभाले थे, उस कालखंड में भारतीय जनता पार्टी के सांसद और फिल्म अभिनेता रवि किशन संसद के मौनसून सत्र के पहले दिन भारत और खासकर फिल्म जगत में, मादक पदार्थों की तस्करी का मुद्दा उठाया था, तो बॉलीवुड, टॉलीवुड, पॉलीवुड,  सन्दलवुड, कॉलीवुड, बंगाली, असमी, भोजपुरी, हिंदी, मराठी, उड़िया, पंजाबी सिनेमा जगत में भूचाल आ गया था। 

रवि किशन ने संसद के पटल पर कहा था कि “मैं संसद का ध्यान एक महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। हम जानते हैं कि देश में नशीली दवाओं की तस्करी और नशे की लत के मामले बढ़ रहे हैं। घातक दवाओं के वितरण के माध्यम से भारतीय युवाओं के जीवन को नष्ट करने की साजिश चल रही है। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इस साजिश में पड़ोसी देशों की भूमिका है। हर साल पंजाब और नेपाल के रास्ते चीन और पाकिस्तान से ड्रग्स की तस्करी होती है और हमारी फिल्म इंडस्ट्री में भी नशा एक गंभीर समस्या है।”

वे आगे सदन को बताये थे कि “हमारी सरकार ड्रग के धंधे में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बहुत अच्छा काम कर रही है। भारत में अभिनेताओं को रोल मॉडल माना जाता है, लेकिन इंडस्ट्री में ड्रग के इस्तेमाल की समस्या बहुत बड़ी है। मैं सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि वह जल्द से जल्द आरोपियों को पकड़े और नशीली दवाओं के दुरुपयोग पर सख्ती से अंकुश लगाए। मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि वह हमारे पड़ोसी देशों द्वारा इस देश के युवाओं को बर्बाद करने की साजिश को विफल करे।”

पूछताछ के लिए जाती अदाकारा

कहते हैं इधर सदन में ड्रग्स का मामला उठा और उधर सांसद महोदय को ड्रग्स माफियाओं से धमकी भी मिलने लगी। उन दिनों जब पत्रकारों ने पूछा था इस विषय पर तो उन्होंने कहा “मैंने युवाओं और फिल्म इंडस्ट्री के भविष्य के लिए आवाज उठाई है। मैंने कभी अपने जीवन की परवाह नहीं की है। मैं इन बातों से रुकने वाला नहीं हूं। उन्होंने कहा कि सदन में ड्रग्स का मामला उठाने के बाद से कई फोन आए जिसमें उन्हें प्रोजेक्ट का हिस्सा न होने की बात कही गई। लेकिन मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है।” यह भी कहा गया था कि उनकी उस आवाज से उन्हें सिनेमा जगत में कई कार्यों से हाथ थोङा पड़ा था। लेकिन यह युवाओं के हित की बात थी, राष्ट्र की बात थी, चेहरे पर सिकन नहीं होने दिया। 

कुछ समय बात वे ट्विटर पर लिखा भी:

नशा फूंक कर है बढ़ी, किसकी अबतक शान? 
चिता सरीखा तन जले, घर हौवै शमशान।
बॉलीवुड का हित यही, समझो ध्यान लगाय, 
सभी नशे से मुक्त हो, ऐसा होय उपाय। 
वीर शिवा की भूमि पर, बंद करो यह पाप, 
मर्यादा का जन्म हो, तभी मिटेगा ताप।।

उन दिनों, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने बॉलीवुड में कथित ‘मादक पदार्थों’ की जांच के तहत 26 सितंबर को अभिनेत्रियों दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर और सारा अली खान और पादुकोण की मैनेजर करिश्मा प्रकाश से पांच घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की थी । एजेंसी ने हिंदी फिल्म उद्योग में ड्रग्स की कथित आपूर्ति और खपत के क्रम में कई गिरफ्तारियां भी की। यह आरोप भी लगा था कि धर्माटिक एंटरटेनमेंट के एक कार्यकारी निर्माता – धर्मा प्रोडक्शंस की एक सहयोगी कंपनी, करण जौहर के स्वामित्व वाले एक प्रोडक्शन हाउस – मुंबई में प्रमुख ड्रग पेडलर्स के संपर्क में भी थे। कुछ पेडलर्स को भी गिरफ्तार किया गया था। 

विगत माह मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा भी कि मोदी सरकार पैसे के लालच में हमारे युवाओं को नशे की अंधेरी खाई में धकेलने वाले नशा तस्करों को दंडित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अमित शाह ने कहा कि सरकार नशा मुक्त भारत के निर्माण के लिए निर्मम और सावधानीपूर्वक जांच के साथ नशीली दवाओं के खतरे का मुकाबला करना जारी रखने का संकल्प लेती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों के कारावासों में कुल 115236 अभियुक्त नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंसेस एक्ट के तहत बंद हैं। वैसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की पैनी निगाह देश के सभी राज्यों में, खासकर सिनेमा जगत पर लगी है। ब्यूरो के सूत्रों के अनुसार ‘हम सभी मौके की तलाश में है। जिस दिन समय सापेक्ष हुआ, सर्कार की सम्भि एजेंसियां मिलकर इस नेक्सस को तोड़-फोड़ देगी।”

बहरहाल, जैसे ही रवि किशन सिनेमा जगत में मादक द्रव्यों के इस्तेमाल के बारे में, ड्रग माफिया की मिलीभगत के बारे में सदन के पटल पर कहे, समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन बॉलीवुड ड्रग नेक्सस के आरोप को लेकर रवि किशन पर कड़ा प्रहार किया। जया बच्चन ऐसा क्यों की, यह तो वही जानती होंगी, लेकिन उन्होंने यह कहते भी नहीं चुकी की ‘कुछ लोगों के कारण पूरी बॉलीवुड बिरादरी की छवि खराब नहीं की जा सकती।” राज्यसभा में उन्होंने कहा: “मनोरंजन उद्योग के लोगों को सोशल मीडिया पर कोसा जा रहा है। जिन लोगों ने इस उद्योग में अपना नाम बनाया है, उन्होंने इसे गटर कहा है। मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं और इससे खुद को अलग करता हूं। मुझे उम्मीद है कि सरकार ऐसे लोगों से कहेगी कि वे इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न करें। जो लोग खुद फिल्म उद्योग से जुड़े हैं, वे इसके खिलाफ इस तरह के बयान दे रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि कुछ लोग हैं, आप पूरे उद्योग की छवि खराब नहीं कर सकते। मैं वास्तव में शर्मिंदा हूं कि कल लोकसभा में हमारे एक सदस्य, जो फिल्म उद्योग से हैं, ने इसके खिलाफ बात की। यह एक दिखावा है।”

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लेकिन जया बच्चन कुछ भी बोलें, भारत सरकार का आंकड़ा तो यह कहता है कि विगत दस वर्षों में करीब  ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली पदार्थ देश के कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने पकडे हैं।  यह आंकड़ा फिल्म बनाने वाले राज्यों की भी सम्मिलित है। 

बहरहाल, भारत चार दशकों से मादक पदार्थों की तस्करी के खतरे को झेल रहा है। हालांकि भारत अफीम और भांग के डेरिवेटिव का पारंपरिक उपभोक्ता रहा है, लेकिन मादक पदार्थों की तस्करी के रुझान और पैटर्न दर्शाते हैं कि पारंपरिक/प्राकृतिक दवाओं से सिंथेटिक दवाओं की ओर धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है, जिसकी तस्करी और खपत देश में हो रही है। 1980 के दशक में, विभिन्न सीमाओं के माध्यम से देश में बड़ी मात्रा में हेरोइन और हशीश की तस्करी की गई थी। हालांकि, इन नशीले पदार्थों की तस्करी अभी भी हो रही है, सिंथेटिक दवाओं की हिस्सेदारी में काफी वृद्धि हुई है। 

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, गोल्डन क्रीसेंट और गोल्डन ट्राइंगल के करीब होने के कारण, भारत इन क्षेत्रों में उत्पादित हेरोइन, हशीश और सिंथेटिक ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों और दवाओं की तस्करी के प्रति संवेदनशील रहा है। हेरोइन की तस्करी पहली बार सत्तर के दशक के मध्य में गोल्डन ट्राइंगल से भारत में की गई थी, जो अस्सी के दशक में बढ़ गई। भारत-म्यांमार सीमा के माध्यम से पूर्वोत्तर में तस्करी की गई हेरोइन की मात्रा हमेशा बहुत कम रही है क्योंकि यह केवल स्थानीय खपत के लिए होती है। दूसरी ओर, गोल्डन क्रीसेंट अस्सी के दशक की शुरुआत से देश में तस्करी की गई हेरोइन का प्राथमिक स्रोत बना हुआ है, जब तस्करों ने ईरान-इराक युद्ध के बाद भारत के माध्यम से इस क्षेत्र से हेरोइन को फिर से भेजना शुरू कर दिया था। युद्ध की समाप्ति और अस्सी के दशक के अंत में बाल्कन तस्करी मार्ग को फिर से खोलने के परिणामस्वरूप देश में हेरोइन की तस्करी में कमी आई लगभग दो दशकों के अंतराल के बाद, 2012 में इसमें पुनः तेजी आई। 

अफगानिस्तान में अफीम का बढ़ता उत्पादन, भारत में अधिक घरेलू मांग, तथा राज्य सरकार के अधिकारियों और सीमा सुरक्षा बलों की मिलीभगत ने मिलकर, विशेष रूप से पंजाब क्षेत्र में, हेरोइन की तस्करी में वृद्धि में योगदान दिया। हेरोइन के अलावा, हशीश और मारिजुआना कैनबिस के दो ऐसे व्युत्पन्न हैं जिनकी भारत में बड़े पैमाने पर तस्करी की जाती है। हशीश और मारिजुआना की तस्करी पारंपरिक रूप से नेपाल से भारत में की जाती रही है और इसलिए, नेपाल एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है, भले ही पिछले कुछ वर्षों में इसकी हिस्सेदारी घट रही हो। यह भी कहा जाता है कि भारत में तस्करी किए जाने वाले इनमें से बहुत से नशीले पदार्थ घरेलू स्तर पर नहीं खाए जाते हैं, बल्कि यूरोप, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे गंतव्यों के लिए देश से होकर गुजरते हैं। 

नशीले पदार्थों के अलावा, भारत में 1990 के उत्तरार्ध से नशेड़ियों के बीच मनोविकार नाशक पदार्थों और औषधीय तैयारियों के उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। दक्षिण-पूर्व एशिया में विशेष रूप से गोल्डन ट्राइंगल में बड़ी मात्रा में उत्पादित एम्फेटामाइन टाइप स्टिमुलेंट और मेथमफेटामाइन को भारत-म्यांमार सीमा के माध्यम से भारत में तस्करी कर लाया जाता है। भारत बहुत सारी सिंथेटिक दवाएं और पूर्ववर्ती रसायन भी बनाता है, जिन्हें देश से बाहर तस्करी कर लाया जाता है। डेक्सट्रोप्रोपॉक्सीफीन और कोडीन युक्त औषधीय तैयारियों को पड़ोसी देशों खासकर नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार में तस्करी कर लाया जाता है। केटामाइन एक और औषधीय तैयारी है, जिसे भारत से विभिन्न दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में तस्करी कर लाया जाता है। इसी प्रकार, एटीएस के निर्माण के लिए प्रयुक्त इफेड्रिन और स्यूडोएफेड्रिन तथा हेरोइन के निर्माण के लिए प्रयुक्त एसिटिक एनहाइड्राइड को भारत से गोल्डन क्रीसेंट और गोल्डन ट्राइंगल में तस्करी कर लाया जाता है। खैर। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सहयोग से केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि 3.1 करोड़ भारतीय भांग, गांजा, चरस, हेरोइन और अफीम का सेवन करते हैं । इसने यह भी चिंता व्यक्त की कि 20 में से केवल एक नशा करने वाले को ही अस्पताल में इलाज मिल पाता है। रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया कि ‘पंजाब राज्य में शोधकर्ताओं का अनुभव खराब रहा है।” संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार , भारत अवैध मादक पदार्थ व्यापार के प्रमुख केन्द्रों में से एक है, जिसमें पुरानी भांग से लेकर ट्रामाडोल जैसी नई दवाएं और मेथामफेटामाइन जैसी डिजाइनर दवाएं शामिल हैं। नशीली दवाओं के व्यापार से प्राप्त धन का उपयोग आतंकवाद, मानव तस्करी, अवैध कारोबार आदि के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। इससे भारत में अपराध की स्थिति और बिगड़ गई है।

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भारत में दुनिया की 17% आबादी रहती है, फिर भी यह सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2% और व्यापार का केवल 1% हिस्सा है। गरीबी अभी भी व्याप्त है – भारत में अभी भी 260-290 मिलियन गरीब रहते हैं। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि धीमी रही है और आय के वितरण में बहुत असमानता है। ये परिस्थितियाँ, अवैध अफीम के दुनिया के दो सबसे बड़े उत्पादकों के बीच भारत की भौगोलिक स्थिति और पारंपरिक सामाजिक पूंजी के टूटने के साथ, आंशिक रूप से बड़े पैमाने पर ग्रामीण-से-शहरी प्रवास और इसके साथ-साथ आधुनिकीकरण के प्रभावों के कारण, हाल के वर्षों में नशीली दवाओं के दुरुपयोग में वृद्धि में योगदान दिया है। नशीले पदार्थों और दवाओं की यह दो तरफा अवैध आवाजाही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। एक तो, देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन करने वाले ड्रग तस्करों का मतलब है कि उन्हीं रास्तों का इस्तेमाल हथियारों की तस्करी के साथ-साथ आतंकवादियों को देश में लाने के लिए भी किया जा सकता है। 

मादक पदार्थों के तस्करों, आपराधिक नेटवर्क और आतंकवादियों के बीच गठजोड़ एक और बड़ा खतरा है। आतंकवादियों द्वारा हथियारों और विस्फोटकों के साथ घुसपैठ करने के लिए अच्छी तरह से स्थापित आपराधिक नेटवर्क की मदद से तस्करी के मार्गों का दोहन सीमाओं की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। इसके अलावा, मादक पदार्थों और दवाओं की अवैध बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। 

कहते हैं कि शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देश दुनिया के लगभग 80 % अवैध अफीम व्यापार के लिए इंटरनेशनल रूट प्रदान करते हैं जो अफ़ग़ानिस्तान के कई क्षेत्रों से होकर निकलता है। हालांकि शंघाई सहयोग संगठन अपनी स्थापना के बाद से ही रीजनल एंटी टेरेरिस्ट स्ट्रक्चर के तहत नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद की रोकथाम पर अधिक से अधिक कन्वर्जेंस की अपील करता रहा है, लेकिन  शंघाई सहयोग संगठन क्षेत्र के भीतर मादक पदार्थों के इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृत्ति और नशीले पदार्थों का व्यापार संगठन की नाकामी की ओर इशारा करता है। 

पिछले दिनों लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय ने कहा था कि दवाओं के दुरुपयोग की समस्या का समाधान करने के लिए, सरकार ने नशीली दवाओं की मांग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीडीआर) तैयार और कार्यान्वित की है, जिसके तहत सरकार मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या को रोकने के लिए एक निरंतर और समन्वित कार्रवाई कर रही है। उनके अनुसार, देश के सभी जिलों में 10000 से अधिक मास्टर स्वयंसेवकों के माध्यम से नशा मुक्त भारत अभियान (एनएमबीए) शुरू किया गया है। इसने 4.96 करोड़ युवाओं और 2.97 करोड़ महिलाओं सहित 14.79 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंच बनाई है। नशीली दवाओं के पीड़ितों के इलाज, निवारक शिक्षा, जागरूकता पैदा करने, प्रेरक परामर्श, विषहरण/नशा मुक्ति, आफ्टर केयर और सामाजिक मुख्यधारा में पुन: एकीकरण प्रदान करने के लिए 350 एकीकृत पुनर्वास केंद्रों को सहायता प्रदान की जाती है। 

राय के अनुसार, सरकार द्वारा समर्थित 46 सामुदायिक आधारित सहकर्मी नेतृत्व हस्तक्षेप केंद्र कमजोर और जोखिम वाले बच्चों और किशोरों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। सरकार द्वारा समर्थित 74 आउटरीच और ड्रॉप इन सेंटर (ओडीआईसी) नशीली दवाओं का उपयोग करने वालों के लिए उपचार, पुनर्वास, स्क्रीनिंग, मूल्यांकन, परामर्श, रेफरल, उपचार और पुनर्वास सेवाओं के लिए सुरक्षित और संरक्षित स्थान प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के माध्यम से सरकारी अस्पतालों में 142 नशा उपचार सुविधाएं (एटीएफ) स्थापित की गई हैं और अब तक 124 जिला नशा मुक्ति केंद्र (डीडीएसी) स्थापित किए गए हैं, जो एक ही छत के नीचे आईआरसीए, ओडीआईसी और सीपीएलआई द्वारा प्रदान की जाने वाली सभी तीन सुविधाएं प्रदान करते हैं। 

बहरहाल, देश के अख़बारों में नशीली दवाओं के दुरूपयोग और अवैध तस्करी के बारे में विगत दिनों कोई समाचार नहीं देखा, पढ़ा। जबकि कोई 38 वर्ष पहले, 7 दिसंबर 1987 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 26 जून को नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था। आंकड़ों के मुताबिक केंद्र में विगत दस वर्षों में करीब  ₹ 25300 करोड़ मूल्य के नशीली पदार्थ देश के कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने पकडे हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, यह मात्रा 2004-2014 में करीब ₹5900 करोड़ मूल्य की थी। इतना ही नहीं, गृह मंत्रालय के तहत एजेंसियों द्वारा 1,17,284 किलोग्राम नशीले पदार्थों को नष्ट किया गया। 

नशीली दवाओं का दुरुपयोग एक वैश्विक चुनौती बनी हुई है, जो चुपचाप व्यक्तियों को नुकसान पहुँचा रही है, परिवारों को तोड़ रही है और समुदायों को कमज़ोर कर रही है। इसका प्रभाव नशे की लत से कहीं आगे तक जाता है; यह स्थायी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक क्षति का कारण बनता है। बढ़ती चिंता को पहचानते हुए, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसंबर 1987 को एक निर्णायक कदम उठाया। इसने 26 जून को नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में नामित किया। तब से, 26 जून जागरूकता बढ़ाने, निवारक उपायों को बढ़ावा देने और नशीली दवाओं के दुरुपयोग और तस्करी को रोकने के लिए राष्ट्रों के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए एक वैश्विक अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है। इस वर्ष, संगठित अपराध और नशीली दवाओं की तस्करी के चक्र को तोड़ने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। सरकार ने एक केंद्रित और संगठित दृष्टिकोण के साथ नशीली दवाओं के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाई है। भारत सरकार ने नशा मुक्त भारत के सपने को प्राप्त करने के लिए युवाओं और जनता के बीच जागरूकता फैलाकर इस लड़ाई को जन आंदोलन में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया है। केवल एक वर्ष की अवधि में, इस दृष्टिकोण के कारण देश भर में नशीली दवाओं की जब्ती, गिरफ्तारी और समन्वित कार्रवाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

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2024 में, NCB सहित भारत भर में कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने लगभग ₹25,330 करोड़ मूल्य की नशीली दवाएं जब्त कीं; 2023 में जब्त किए गए ₹16,100 करोड़ से 55% ज़्यादा। 2024 में, साइकोट्रोपिक पदार्थों के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली ज़्यादा हानिकारक और नशे की लत वाली सिंथेटिक दवाओं, कोकीन और फ़ार्मास्यूटिकल दवाओं की जब्ती में काफ़ी वृद्धि हुई है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो पिछले कई सालों से एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति के ज़रिए नशीली दवाओं की तस्करी और दुरुपयोग के नेटवर्क को तोड़ने के लिए अथक प्रयास कर रहा है। पिछले एक दशक में दर्ज मामलों, गिरफ़्तारियों और जब्त की गई दवाओं की मात्रा और मूल्य में तेज़ वृद्धि देखी गई है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की स्थापना 17 मार्च 1986 को भारत सरकार द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी और दुरुपयोग के खिलाफ राष्ट्रीय प्रयास का नेतृत्व करने के लिए की गई थी। केंद्र सरकार की देखरेख में संचालित, NCB NDPS अधिनियम और संबंधित कानूनों के तहत राज्यों और विभिन्न एजेंसियों में प्रवर्तन कार्रवाइयों का समन्वय करता है। यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के साथ भारत के अनुपालन को भी सुनिश्चित करता है, मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग का समर्थन करता है, और नशीली दवाओं के दुरुपयोग से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए अन्य मंत्रालयों के साथ काम करता है।

देश भर में नशीली दवाओं के प्रवर्तन को बढ़ावा देने के लिए, प्रमुख संरचनात्मक विस्तार के माध्यम से नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को काफी मजबूत किया गया है। क्षेत्रीय कार्यालयों की संख्या में इजाफा कर 30 कर दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक, नशीले पदार्थों के खतरे को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, एजेंसियों ने 2024 में देश की सबसे बड़ी ऑफशोर ड्रग जब्ती हासिल की। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में, ड्रग नेटवर्क को खत्म करने और अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए सरकार का पूरा दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। NCB, नौसेना और गुजरात पुलिस द्वारा किए गए एक संयुक्त अभियान में, 3132 किलोग्राम ड्रग्स की एक बड़ी खेप जब्त की गई। सुरक्षा एजेंसियों ने एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ किया और गुजरात में 700 किलोग्राम से अधिक प्रतिबंधित मेथामफेटामाइन जब्त किया। NCB ने नई दिल्ली में 82.53 किलोग्राम उच्च श्रेणी का कोकीन जब्त किया।दिल्ली के एक कूरियर सेंटर में बड़ी मात्रा में ड्रग्स जब्त किए जाने के बाद लगभग 900 करोड़ रुपये की भारी मात्रा में ड्रग की खेप को नीचे से ऊपर तक ट्रैक किया गया। एजेंसियों ने कुल 4,000 किलोग्राम मादक पदार्थ भी जब्त किए।

एनडीपीएस अधिनियम (1985) नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध नशीली दवाओं की तस्करी को रोकने और नियंत्रित करने के लिए भारत का मुख्य कानून है। यह नशीली दवाओं और मनोदैहिक पदार्थों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है जब तक कि चिकित्सा या वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए अनुमति न दी जाए। यह उल्लंघन के लिए सख्त दंड प्रदान करता है और नशीली दवाओं पर निर्भर लोगों के उपचार का समर्थन करता है। नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस समन्वित कार्रवाई, जागरूकता और पुनर्वास के माध्यम से नशीली दवाओं के खतरे से निपटने की तत्काल आवश्यकता की वैश्विक याद दिलाता है। शून्य-सहिष्णुता नीति, मजबूत प्रवर्तन प्रयासों और नशा मुक्त भारत अभियान जैसी जन-केंद्रित पहलों के साथ, भारत एक सुरक्षित, स्वस्थ और नशा मुक्त भविष्य के निर्माण की दिशा में दृढ़ कदम उठाना जारी रखता है।

1 COMMENT

  1. Sarkar ek tataf Nasha Mukti abhiyan chala ke usko safal banane ka yogna chalai hai. Lekin ye abhiyan hathi ke khane aur dikhane ke daant ke taraf lagta hai.

    Prasasan agar chah le to ankush lag sakta hai. Lekin prasasan ka abhi ka rabaiya dekh ummid nahin kiya ja sakta hai.

    Prasasan dwara jabta nasha bali padarth jahan rakha jata hai wo padarth dhire dhire kam hone lagta hai. Jaise chuha kha gya hai ya dibal nigal gaya ha🙁

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