<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>darbhangaraaj Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
	<atom:link href="http://www.aryavartaindiannation.com/tag/darbhangaraaj/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.aryavartaindiannation.com/tag/darbhangaraaj</link>
	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
	<lastBuildDate>Tue, 20 Jan 2026 13:21:28 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.0.7</generator>
	<item>
		<title>माधवेश्वर ​शमशान में ​भी दरभंगा राज की महिलाओं को​ वह सम्मान नहीं मिला​, जिसका वे भी हकदार थीं​ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Jan 2026 12:17:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[creamation]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[female]]></category>
		<category><![CDATA[madhveshwar]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
		<category><![CDATA[women]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=7244</guid>

					<description><![CDATA[<p>दरभंगा : दरभंगा राज के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी महारानी काम सुंदरी देवी की मृत्यु के बाद उनकी चिता स्थल पर मंदिर बनाने की चर्चा उत्कर्ष पर है। दरभंगा लाल किला (रामबाग किला) से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है माधवेश्वर शमशान स्थल। इसी स्थान पर दरभंगा राज [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved">माधवेश्वर ​शमशान में ​भी दरभंगा राज की महिलाओं को​ वह सम्मान नहीं मिला​, जिसका वे भी हकदार थीं​ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा : दरभंगा राज के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी महारानी काम सुंदरी देवी की मृत्यु के बाद उनकी चिता स्थल पर मंदिर बनाने की चर्चा उत्कर्ष पर है। दरभंगा लाल किला (रामबाग किला) से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है माधवेश्वर शमशान स्थल। इसी स्थान पर दरभंगा राज परिवार के लोगों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया है। महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह के अनुज राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह चिता भूमि सामने दिख रहा है। एक विशालकाय वृक्ष और उसके चतुर्दिक चबूतरा। बरगद के इस वृक्ष के चारो तरफ दरभंगा की महिलाओं का वट सावित्री पूजन का गवाह &#8211; लाल रंग का घागा &#8211; दिख रहा है। चबूतरे के ऊपर स्थानीय लोग, जो इस चबूतरे का इस्तेमान &#8216;बैठकी&#8217; के लिए भी करते हैं, का जूता भी अपने स्वामी के पैर की प्रतीक्षा में है। इस स्थान का देखरेख करने वाले हाथ में फूलझाड़ू लिए वृक्ष से अलग हुए सूखे पत्तों की सफाई कर रहे हैं। </strong></p>
<blockquote><p>इसके अलावे इस चबूतरे का निर्माणकर्ताओं का नाम एक शिलालेख पर भी अंकित है ताकि इस शमशान में आने वाले भ्रमणकारी लोग देख सकें। पार्थिव शरीर तो पढ़ नहीं सकता। काले रंग के पत्थर पर राजा बहादुर के दो पोतों का नाम &#8211; राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह &#8211; अंकित है। दरभंगा के महाराजा अथवा उनके अनुज राजा बहादुर अपनी मृत्यु के बाद दरभंगा के लोगों के लिए सामाजिक कार्य हेतु जितनी सम्पतियाँ छोड़ गए, वे कभी नहीं सोचे होंगे कि जहाँ उनके मृत्यु के बाद चिता सजेगी, समयांतराल उस स्थान पर कुछ मिट्टी और कुछ ईंटों से चबूतरा बनाने के बाद उनका पोता अपना नाम गुदवायेगा।</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-scaled.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-scaled.jpg" alt="" width="1808" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7245" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-scaled.jpg 1808w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-212x300.jpg 212w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-723x1024.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-768x1087.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-1085x1536.jpg 1085w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-7-1447x2048.jpg 1447w" sizes="(max-width: 1808px) 100vw, 1808px" /></a></p>
<p>दरभंगा ही नहीं देश के किसी कोने में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपने पूर्वज की चिता स्थल पर अपना नाम नहीं गुदवायेगा। अपने जीवन में अब तक ऐसा दृश्य नहीं देखा था। मन दुःखी हो गया। ईश्वर न करें किसी जीवित व्यक्ति का नाम शमशान भूमि में अंकित दिखे। इस दृश्य को देखकर सोचने को विवश हो गया कि कभी दरभंगा राज में विद्वान सिपा सलाहकार होते थे जो &#8216;मानवीय मूल्यों को बरकरार रखने का सलाह देते थे। आज चाटुकार, चापलूसों का साम्राज्य हो गया है।अच्छे,बुरे,शुभ,अशुभ में फ़र्क़ नहीं दिखता।</p>
<p><strong>वैसे राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह के पिता, यानी दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र दिवंगत कुमार शुभेश्वर सिंह अथवा उनकी दिवंगत पत्नी का अपने दिवंगत पूर्वजों के आँगन में कहीं नामोनिशान नहीं दिखा। राजा बहादुर के अन्य दो पुत्रों &#8211; जीवेश्वर सिंह और यज्ञेश्वर सिंह का चिता स्थल भी सुना-सुना दिखा। इतना ही नहीं, इस स्थान को शमशान भूमि में अंकित होने के बाद दरभंगा राज के अनेकानेक महिलाओं &#8211; रानियों, बहुओं &#8211; की भी मृत्यु हुई है, उन्हें भी इसी प्रांगण में अग्नि को सुपुर्द किया गया था। महाराजा रमेश्वर सिंह की बड़ी पत्नी &#8216;राजमाता&#8217; के चिता स्थल पर &#8216;अन्नपूर्णा मंदिर&#8217; भले स्थापित हो; श्यामा काली और अन्नपूर्णा मंदिर के बीच उनकी दूसरी पत्नी के चिता स्थल पर आज तक मंदिर कर कार्य पूरा नहीं हो सका। यह भी दुःख की ही बात है।</strong> </p>
<p>कहते हैं महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को काशी लाभ हुआ। श्यामा मंदिर के सामने &#8216;तारा माय&#8217; को समर्पित करते &#8216;तारा मंदिर&#8217; का निर्माण कर और उसमें एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित कर उसे स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। इसे अपवाद ही माना जा सकता है। अन्नपूर्णा मंदिर​ छोटी राजमाता की चिता स्थान पर है। इस अपवाद छोड़कर दरभंगा राज की किसी भी महिला, रानी को, पुत्र बधुओं  को माधवेश्वर शमशान प्रांगण में भले अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ हो, उन्हें अब तक वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे सभी हकदार थीं, जहाँ तक मंदिर निर्माण का सवाल है। विद्वान और विदुषी दरभंगा राज के बारे में जो भी शब्द का विन्यास करें, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दरभंगा राज में न जीते जी और ना ही मरने के बाद, महिलाओं को जो शिक्षा और सम्मान मिलना चाहिए था, जिसके वे हकदार थीं, नहीं मिला। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7247" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे राज परिसर से महिला सशक्तिकरण की बात करते लोग थकते नहीं। यथार्थ तो यह है कि इस शमशान भूमि में भी &#8216;पुरुषों&#8217; का बाहुल्य आज भी कायम है। पुरुषों में भी जो &#8216;अर्थ से संपन्न&#8217; थे, या महाराजा के &#8216;मन के लोग&#8217; थे। राजा माधव सिंह, जिनका देहावसान दरभंगा में नहीं हुआ था, उनके द्वारा निर्मित &#8216;माधवेश्वर महादेव मंदिर&#8217; प्रांगण में उनका अस्थि कलश अवस्थित है। इतना ही नहीं, लोगों का कहना है कि, परंपरा के अनुसार, इस प्रांगण में जितने भी पार्थिव शरीर लाये जाते हैं, सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से उस पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द करने के पूर्व यहाँ रखना आवश्यक है। </p>
<blockquote><p>&#8216;अन्नपूर्णा&#8217; और &#8216;श्याम तारा&#8217; मंदिर के अलावे दरभंगा राज की किसी भी महिलाओं को इस परिसर में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका एक महारानी अथवा उनकी पुत्र वधु होने के कारण उनके पार्थिव शरीर को भी वह सम्मान मिलता। यह भी उतना ही सत्य है कि राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी का देहांत दरभंगा में नहीं हुआ, लेकिन उनके सम्मानार्थ उनके अस्थि कलश को इस धार्मिक भूमि में अर्पित किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।</p></blockquote>
<p>विद्वज्जनों का कहना है कि <strong>संकर्षण ठाकुर</strong> के वंश में दसवें पीढ़ी पर थे चंद्रपति ठाकुर, जो चान ठाकुर के भी नाम से जाने जाते थे। ये दुबे ठाकुर के नाम से प्रसिद्द श्रीपति ठाकुर के पुत्र थे। तीन भाई थे ये &#8211; हरपति ठाकुर, नरपति ठाकुर और चंद्रपति ठाकुर। ये तीनों सोनकारियां-कर्माहा मूल के गंगेश्वर सूत श्रीधर के दोभित्र थे। इनके ही बालक थे महामहोपाध्याय महेश ठाकुर, जिन्हे अकबर से मिथिला राज्य के सनद प्राप्त हुआ था।  कहते हैं इनके शिष्य रघुनन्दन झा को सनद मिला था जो गुरुदक्षिणा में अपने गुरु महेश ठाकुर को दे दिए। यहीं से प्रारम्भ होता है दरभंगा राज और उसका इतिहास। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7248" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>इस राज्य के पुरुष तो शुरू से ही शिक्षित, विद्वान, महामहोपाध्याय रहे थे, लेकिन स्त्री शिक्षा का सदैव अभाव रहा। दूसरे वंश से भी जो महिलाएं विवाहोपरांत इस वंश में आयीं, उन्हें भी शिक्षा में मामले में कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। इसका ज्वलंत दृष्टान्त है राजा राघव सिंह की दो पत्नियों में बड़ी महारानी राघव कान्ता, जो अपने समय में अपने भाइयों को तो शिक्षित कर पायी, लेकिन अपनी प्रतिभा को दिखने से वंचित रह गयी। </strong></p>
<p>शिक्षा के मामले में यह भी कहा जाता है कि ओईनिवार मूल के राजा कंसनरायण लक्ष्मी नाथ के वंश में स्त्री शिक्षा को बहुत बढ़ावा मिला। कहा जाता है कि कंस नारायण का विवाह भी मनु झा की बेटी सूरमा से तभी हुआ जब वे शास्त्रार्थ में हिस्सा लिए। बाद में कविकोविद जैसे कई दरवारी विद्वानों ने अपने अपने गीतों में विदुषी सोरमा की योग्यता का उल्लेख किये हैं। इसी राज में दूसरी विदुषी थी &#8216;बहुला&#8217; जिनका श्लोक संस्कृत साहित्य में प्रसिद्द है। </p>
<p><strong>विहस्य यस्य षष्ट्यन्ते चतुर्थ्यन्त विहाय च<br />
द्वितीयंतमह: तस्य द्वितीया स्यामहं कथं </strong></p>
<p>दरभंगा के विद्वानों का कहना है कि दरभंगा राज के पिछले राजवंश में स्त्री शिक्षा को बहुत प्रश्रय मिला, लेकिन समयांतराल स्त्री शिक्षा की परंपरा कोई भी बचा कर नहीं रख सके। दरभंगा राज में 1557 से 1962 तक कायम रहा। इस बीच दरभंगा राज परिवार में 22 व्यक्ति राजा हुए, जिसमें 10 व्यक्ति अपने बड़े भाई से सत्ता हासिल किये। अनेकों राजा अपने-अपन नामों पर नगर बसाने के साथ-साथ पोखर बनबाये, दान दक्षिणा दिए, अपने भाई और भतीजे को राज्य सौंपते गए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दरभंगा राज में अधिकांश राज &#8216;नावल्द&#8217; रहे। यह भी कहा जाता है कि जब मिथिला राज्य का अकबर से प्राप्त सनद को रघुनन्दन राय अपने गुरु को सौंप दिए, तब उनकी पत्नी महेश ठाकुर को श्राप दिए थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7249" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, राजा राघव सिंह की पहली पत्नी की मृत्यु के बाद इनकी छोटी (सौतन) राघवप्रिया के पुत्र राजा विष्णु सिंह इनके सारा पर, जहाँ इनका अंतिम संस्कार हुआ था, भौड़ागढ़ी (मधुबनी) में मंदिर बनाये। दरभंगा राज में &#8216;सारा&#8217; पर परिवार के सदस्य के सारा पर यह दूसरा मंदिर है। पहला मंदिर था अपने भाई महिनाथ ठाकुर से राज भार लेने वाले नरपति ठाकुर की धर्मपत्नी उर्वशी देवी के सारा पर रहिका (मधुबनी) में निर्माण। दरभंगा में सारा पर मंदिर बनाने का इसके बाद शुरू हुआ। माधवेश्वर मंदिर वैसे सारा पर नहीं है, लेकिन इस मंदिर के समक्ष माधव सिंह सिंह का अस्थि कलश रखा हुआ है। महाराज रामेश्वर सिंह के सारा पर श्यामा मंदिर है।</strong> </p>
<p>दरभंगा के लोगों का कहना है कि यह पूरा माधवेश्वर शमशान परिसर पचास एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ है। प्रवेश द्वार पर महादेव की प्रतिमा है। स्वाभाविक भी है। मृत्योपरांत प्रत्येक शमशान में महादेव और उनके गनों का ही वास होता है। प्रवेश के साथ दाहिने हाथ माधवेश्वर मंदिर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाराजा माधव सिंह आज से कोई 220 वर्ष पूर्व किये थे। इस परिसर का यह सबसे पुराना मंदिर हैं और यही कारण है कि इस पुरे परिसर को इस मंदिर के नाम से अलंकृत किया गया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5.jpg" alt="" width="2047" height="1275" class="aligncenter size-full wp-image-7250" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-1024x638.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-768x478.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-5-1536x957.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>राजा माधव सिंह की मृत्यु दरभंगा में नहीं हुयी थी। इसलिए इस परिसर में उनकी चिता स्थान पर कोई मंदिर नहीं है। अलबत्ता, जिस मंदिर का निर्माण उनके काल खंड में हुआ था, उस मंदिर के आगे उनका अस्थि कलश रखा है। लोग यह भी कहते हैं कि इस परिसर में माधवेश्वर महादेव मंदिर के अलावे जितने भी मंदिर हैं उन सभी मंदिरों में देवी की प्रतिमा स्थापित है और तंत्र विद्या के साधक, चाहे वे मिथिला के किसी भी क्षेत्र में रहते हों, यहाँ अपनी साधना करने अवश्य आते हैं। अधिकांश साधकों के लिए देवी ही उनका इष्ट होती हैं। परिसर के लोगों का कहना है कि माधवेश्वर में महाराजा माधव सिंह के पुत्र महाराजा छत्र सिंह का भी चिता स्थल नहीं है, इसलिए मंदिर भी नहीं है। छत्र सिंह अपनी अंतिम सांस बनारस में लिए थे। हाँ, महाराजा छत्र सिंह के पुत्र महाराजा रूद्र सिंह की चिता भूमि पर एक मंदिर अवश्य है जो माँ रुद्रेश्वरी काली के नाम से जाना जाता है। </p>
<p>रामेश्वर सिंह महान तंत्र साधक थे, अतः उनके चिता पर श्यामा मंदिर का निर्माण कई। देवी श्यामा की इतनी बड़ी प्रतिमा महाराजा रामेश्वर सिंह जो कामाख्या से वापस आये थे, मधुबनी के राजनगर किला में स्थापित किया था। राजनगर में काली की जो प्रतिमा है वह उनका बात्सल्य रूप है जबकि दरभंगा के माधवेशत में देवी काली का रौद्र रूप हैं। इसका निर्माण 1933 में हुआ था जहाँ देवी काली भगवान् शिव के छाती पर अवस्थित हैं। इस मंदिर परिसर में प्रवेश के साथ ही नहीं, आस-पास भी एक अदृश्य आकर्षण का अनुभव होता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-scaled.jpg" alt="" width="1808" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7251" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-scaled.jpg 1808w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-212x300.jpg 212w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-723x1024.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-768x1087.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-1085x1536.jpg 1085w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-8-1447x2048.jpg 1447w" sizes="auto, (max-width: 1808px) 100vw, 1808px" /></a></p>
<p><strong>मेरे पिता स्वयं तांत्रिक थे, और महाराजा रमेश्वर सिंह की तांत्रिक विद्या के साथ-साथ कामाख्या में उस सिद्ध पीठ के उपासक रहे थे। वे कहते थे कि पुरुषों के चिता स्थान की अपेक्षा महिलाओं कि चिता स्थान पर बने देवी की मंदिर अधिक शक्तिशाली होती है। वे यह भी कहते थे कि किसी भी शमशान में, जलते चिताओं के बीच एक अदृश्य शक्ति की उपस्थिति होती है। इस मंदिर में काल भैरव भी हैं, वटुक भैरव की भी उपस्थिति है और गणेश की प्रतिमा तो है ही। यह अलग बात है कि कालांतर में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के पिता रमेश्वर सिंह के सारा पर जब जब श्यामा मंदिर का निर्माण हुआ, परिसर उनके नाम से विख्यात हो गया। रमेश्वरी श्यामा मंदिर में तांत्रिक और वैदिक दोनों रीतियों से पूजा होती है, जबकि अन्य मदिरों में पूजा पद्धति तांत्रिक विधि पर आधारित है। यहाँ प्रत्येक मंदिर में &#8216;बलि प्रदान&#8217; होता है।</strong> </p>
<p>इस मंदिर से आगे पश्चिमी दिशा में दरभंगा राज की दो महारानियों महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की बड़ी और मझली पत्नियों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया जाया था। यहाँ कोई भी मंदिर अथवा सम्मानीय स्थान नहीं है। महारानियों के इस चिता स्थल से आगे ऐतिहासिक तालाब के दक्षिण भाग पर राजा बहादुर विश्वेशर सिंह के बड़े पुत्र राज कुमार जीवेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। जीवेश्वर सिंह के चिता स्थल के पास ही उनके अनुज का अंतिम संस्कार किया गया था। </p>
<p>पोखर के आगे पश्चिम-दक्षिण भाग में दरभंगा के अंतिम संतानहीन राजा कामेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। उनकी चिटा भूमि पर ही कामेश्वरी श्यामा मंदिर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी ने अपने सुहाग के गहने बेच कर कराया था। कामेश्वरी श्यामा मंदिर के पास ही महाराजा कामेश्वर सिंह के पहली पत्नी, यानी बड़ी महारानी राजलक्ष्मी का अंतिम संस्कार किया गया था। दुर्भाग्य यह है कि उनके सम्मान में भी यहाँ कोई घार्मिक मंदिर का निर्माण नहीं हो सका अब तक। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-scaled.jpg" alt="" width="1808" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7252" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-scaled.jpg 1808w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-212x300.jpg 212w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-723x1024.jpg 723w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-768x1087.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-1085x1536.jpg 1085w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madan-10-1447x2048.jpg 1447w" sizes="auto, (max-width: 1808px) 100vw, 1808px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, कहते हैं दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपनी मृत्यु से छः साल पहले महज 21,274/- रुपये के लिए पटना उच्च न्यायालय से भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक एक कर दिये थे। यह पैसे महाराजा द्वारा बनाए गए धार्मिक न्यास को प्रदत्त भूमि से मिलने वाली कमाई का हिस्सा था। सरकार के नियमानुसार यह राशि “आयकर” नियमों के अधीन था, जबकि महाराजाधिराज के लोगों का कहना था कि चूँकि यह राशि महाराजाधिराज द्वारा धार्मिक न्यास को दी गयी कृषि-भूमि की कमाई का हिस्सा है, और न्यास को आयकर अधिनियम से छूट है; अतः यह राशि आयकर विभाग को भुगतान नहीं करनी चाहिए। आश्चर्य तो यह है कि उन दिनों भी महाराज के आस-पास रहने वाले मिथिला के विद्वान और विदुषी यह नहीं कह सके कि “एक ही राशि ‘दो व्यक्ति’ अथवा ‘दो संस्था’ के लिए अलग-अलग नियमों के अधीन होती है। जो राशि धार्मिक न्यास के लिए आयकर नियमों के अधीन नहीं है, वह राशि महाराजाधिराज के लिए आयकर अधिनियम के अधीन है।” परन्तु ‘बात तो दरभंगा राज की थी’, और उस दिन भी दरभंगा राज में राग-दरबारियों की किल्लत नहीं थी, आज तो पूछिए ही नहीं। </strong></p>
<p>जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया तो सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन  माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे सी शाह और  न्यायमूर्ति एस के दास “Income Tax- Exemption from taxation Agricultural income from trust properties-Trustee’s remuneration a Percentage of such income and  resting  on  trust deed-Remuneration,  whether agricultural  income-Indian  Income-tax Act,  1922  (11  of 1922), SS. 2(1),4(3)(viii) के मद्दे नजर महाराजाधिराज के याचिका की सुनवाई किए।  महाराजा ने दलील दिये कि वे एक ट्रस्टी के हैसियत से ट्रस्ट को प्रदान की गई भूमि से मिलने वाली आय का 15 फीसदी अपनी सेवा के लिए लेते थे, एक रेम्युनेरेशन के रूप में। उन्होंने आयकर विभाग को कहा कि उक्त भूमि के इस्तेमाल से एक ट्रस्टी के रूप में जो भी आमदनी उन्हें प्राप्त होती है वह कृषक सम्पत्तियों के इस्तेमाल से होने वाली कृषक आय है जो की भारतीय आयकर अधिनियम 1922 के धारा  s. 4 (3) (viii) के अधीन आयकर से मुक्त है, साथ ही, कृषि आय से उन्हें तो रेम्युनेरेशन दिया जाता है, वह भी आयकर से मुक्त है क्योंकि उस आय का स्रोत कृषि है जो मंदिरों, ठाकुरबाड़ियों को दी गयी है उसके सफल सञ्चालन के लिए।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7.jpg" alt="" width="2047" height="1275" class="aligncenter size-full wp-image-7253" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-1024x638.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-768x478.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-7-1536x957.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>महाराजाधिराज दरभंगा ही नहीं, बिहार प्रान्त और देश के अन्य हिस्सों में जिन-जिन मंदिरों, मठों और धार्मिक स्थानों की देख-रेख करने का दायित्व लिए थे, उसका समुचित संरक्षण हो; इस निमित्त अपने राज का एक बहुत बड़ा हिस्सा का कृषि जमीन कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास को दे दिए थे, ताकि आमदनी का स्रोत बना रहे । परन्तु, आज दरभंगा राज रेसिडुअरी ट्रस्ट, कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट या महाराजाधिराज द्वारा सामाजिक-धार्मिक कल्याणार्थ बनाये गए अन्य न्यासों से “अधिक स्वस्थ” कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास का भी नहीं है। </p>
<p>न्यास के बारे में बहुत बातें हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पास ‘सम्पूर्णता के साथ’ ऐसी कोई सूची है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि इस न्यास को बनाते समय महाराजधिराज ने अमुक-अमुक मंदिरों / मठों के निर्माण, रख-रखाव, पंडित/पुजारी के वेतन, प्रसाद, घुपबत्ती, अगरबती, घूमन, भगवान अथवा भगवती के लिए वस्त्र आदि-आदि मदों पर प्रत्येक दिन अथवा प्रत्येक वर्ष होने वाले खर्च कहाँ से आएंगे? क्या उन मंदिरों और मठों के निमित्त सुरक्षित जमीनों की सूची है कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पास ? क्या उन जमीनों के लिए न्यास सरकार के कोषागार में अथवा निबंधन कार्यालय में भूमि-कर का भुगतान कर रखा है? क्या कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के तहत सभी मंदिरों, मठों की स्थिति बेहतर है? क्या उन भूमियों की खरीद-बिक्री में तो हाथ नहीं लगाया गया है? कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के तहत संचालित और संरक्षित मंदिरों/मठों के पुजारियों की कोई सूची उपलब्ध है? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7254" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Madh-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>सूत्रों का कहना है कि कोई 108 मंदिर और ठाकुरवाड़ी हैं जो कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के अधीन माना जाता है। इतना ही नहीं, यह भी कहा जाता है कि कानपुर स्थित बाजीराव पेशवा – II के महल में स्थित मंदिर का देखभाल सहित, देश में अनेकानेक ‘ऐतिहासिक लोगों द्वारा स्थापित मंदिर है जिसका देखभाल महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने अपने जिम्मे लिय्या था और इसका दायित्व कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास को सौंपा था। बिहार के कुल 38 जिलों में तक़रीबन 534 ब्लॉक हैं और कोई 45,103 गाँव हैं। उन्हीं गाँव में दरभंगा में कुल 1251 गाँव है, और ऐसा कोई गाँव नहीं है जहाँ धार्मिक आस्था से जुड़े स्थान नहीं है। बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद ने 2007 में श्यामा माई मंदिर को अधिग्रहण किया। फिर श्यामा माई मंदिर न्यास समिति का गठन हुआ। </strong></p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved">माधवेश्वर ​शमशान में ​भी दरभंगा राज की महिलाओं को​ वह सम्मान नहीं मिला​, जिसका वे भी हकदार थीं​ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/even-at-madhaveshwar-crematorium-the-women-of-darbhanga-raj-did-not-receive-the-respect-they-deserved/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दरभंगा राज की मिट्टी फिर धंसी, शहर-रामबाग को जोड़ने वाली सड़क फिर टूटी &#8211; &#8216;सरकार निद्रा में&#8217;😪</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/state/darbhanga-raj-soil-sank-again-connectivity-broken</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/state/darbhanga-raj-soil-sank-again-connectivity-broken#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Dec 2022 05:23:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[adminsitratin]]></category>
		<category><![CDATA[bloodlines]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[kapileshwar singh]]></category>
		<category><![CDATA[maharaja]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
		<category><![CDATA[rambag]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=4689</guid>

					<description><![CDATA[<p>दरभंगा (रामबाग) : दरभंगा ही नहीं, प्रदेश सहित देश-विदेश को कल तक दरभंगा का लालकिला से जोड़ने वाला यह पथ, जो कभी राष्ट्र की राजनीतिक धाराओं को नियंत्रित करता था, आज उसी लालकिले के उत्तराधिकारियों की उपेक्षा के कारण धराशायी होना पड़ा।  वजह &#8211; &#8220;सरकार सोये हुए हैं और दरभंगा राज सहित मिथिला की संस्कृति [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/state/darbhanga-raj-soil-sank-again-connectivity-broken">दरभंगा राज की मिट्टी फिर धंसी, शहर-रामबाग को जोड़ने वाली सड़क फिर टूटी &#8211; &#8216;सरकार निद्रा में&#8217;😪</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा (रामबाग) : दरभंगा ही नहीं, प्रदेश सहित देश-विदेश को कल तक दरभंगा का लालकिला से जोड़ने वाला यह पथ, जो कभी राष्ट्र की राजनीतिक धाराओं को नियंत्रित करता था, आज उसी लालकिले के उत्तराधिकारियों की उपेक्षा के कारण धराशायी होना पड़ा।  वजह &#8211; &#8220;सरकार सोये हुए हैं और दरभंगा राज सहित मिथिला की संस्कृति बहाल हो रही है &#8211; सोये-सोये।&#8221;</strong></p>
<p>शहर के साथ साथ लालकिले के अंदर दरभंगा राज परिवार के लोगों को जानने-पहचानने वाले तो कुछ और कह रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि इस ऐतिहासिक मार्ग को देखने वाला कोई नहीं है। वैसे किले के अंदर रहने वाले और सम्पत्तियों के स्वामी यह कहते नहीं थकते कि &#8220;वे दरभंगा राज परिवार की, मिथिला की गरिमा और संस्कृति को पुनः स्थापित करने, बहाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।&#8221; लेकिन इस पुल के अस्तित्व को देखकर दरभंगा के लोग कुछ और सोच रहे हैं। </p>
<p>स्थानीय लोग, स्थानीय प्रशासन को दोषी करार करते हैं कि प्रशासन का इस दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है। लेकिन दरभंगा के ही अन्य लोगों का कहना है कि &#8220;यह मार्ग निजी है और उसकी देखरेख, रखरखाव करने का एकमात्र दायित्व दरभंगा राज और ट्रस्ट के लोगों का है। चुकी इस परिसर के अंदर की जमीनों को ट्रस्ट-डीड के विरुद्ध जाकर निजी लाभ के लिए निजी लोगों के हाथों बेचा गया है, इस दृष्टि से विक्रेता का और भी महत्वपूर्ण दायित्व होता है कि वह क्रेताओं को बेहतर मार्ग प्रशस्त करे। बहरहाल, स्थानीय पुलिस इस मामले में एक ट्रेक्टर को पकड़ी है। बेचारा ट्रेक्टर !!!</p>
<p><strong>दरभंगा के आशीष कुमार (पत्रकार) का कहना है कि &#8220;आज पुल अंतिम सांसे गिन रहा है। जिन्हें खतरे का आभास है वो तो बच कर निकल जाते पर अनजान लोगों के लिए जान पर आफत है। आज भी एक दर्दनाक हादसा होते होते बचा है। एक बालू लदा ओवरलोडेड ट्रक पुल से जा रहा था, जानकारी के अभाव में ट्रक समेत टूटे पूल के कारण पोखर में समा गया, उसे तत्काल तत्परता दिखाते हुए अपने जान को जोखिम में डाल कर ट्रक को निकाल दिया गया।&#8221; </strong></p>
<p>दरभंगा के रामबाग पैलेस के मुख्य द्वार पर दरभंगा राज के पूर्व के 20 महाराजाओं की ‘ना’ ‘सही, महाराजा माधव सिंह के बाद से लेकर महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह तक के “सात राजाओं की आत्मा” अवश्य बिलखती होगी, सोचती होगी कि इस परिसर में कल तक तो ‘अनुशासन’ अपनी ‘पराकाष्ठा’ पर थी, रास्ता ‘खास’ था – आज ‘आम’ कैसे हो गया? छोड़िये पीपल के पेड़ को। रहने दें बरगद के बृक्षों को जो दरभंगा के रामबाग किले के चारो तरफ दीवारों में जहाँ-जहाँ छेद दिखा, अपनी जड़ें मजबूत करने में लग गया। यह बात सिर्फ पेड़-पौधों के साथ नहीं, बल्कि दरभंगा के अंतिम महाराजा सर कामेशर सिंह के शरीर को पार्थिव होने के बाद उस चारदीवारी के अंदर या फिर कुछ अपने, कुछ दूर-दराज के सम्बधी, सभी अपना-अपना ठिकाना उन्हीं बृक्षों की भांति रामबाग के छत्रछाया में करने लगे, कुछ जीवन-यात्रा सफल कर लिए, कुछ मसक्कत कर रहे हैं । महाराज की पत्नी महारानी राज्यलक्ष्मी की मृत्यु के बाद इस परिसर का स्वामित्व जिनके हाथों आया उनसे दरभंगा राज की, महाराज की, संस्कृति की, पुरातत्व की, घरोहर की सुरक्षा और संरक्षित रहने की बात सोचा नहीं जा सकता। </p>
<figure id="attachment_4691" aria-describedby="caption-attachment-4691" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2.jpg" alt="" width="1600" height="1090" class="size-full wp-image-4691" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-1024x698.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-768x523.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-1536x1046.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/2-218x150.jpg 218w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4691" class="wp-caption-text"><br />दरभंगा के ऐतिहासिक रामबाग परिसर को शहर, प्रदेश और देश से जोड़ने वाला पुल मिट्टी में धंसा &#8211; तस्वीर आशिष कुमार पत्रकार</figcaption></figure>
<p><strong>दिनांक 5 जुलाई, 1961 को “दि लास्ट विल एंड टेस्टामेंट” में दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपना वसीयत बनाते समय वसीयत के आठवें पैरा में लिखा है: “I, bequeath the property mentioned in Schedule “A” to my wife Maharani Rajyalakshmi for her life for her residence (and for no other purposes). She shall be entitled to reside in the said house and use the furniture and fittings only without let or hindrance by anybody. After her demise the said property shall vest in my youngest nephew Rajkumar Subheshawra Singh absolutely.“ और महारानी राज्यलक्ष्मी अपने पति और दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज की मृत्यु के 16-वर्ष बाद अंतिम सांस ली। दस्तावेज के अनुसार उक्त संपत्ति महाराजाधिराज के छोटे भतीजे कुमार शुभेश्वर सिंह का हो गया “अब्सॉल्युटली” – आगे कुमार शुभेश्वर सिंह भी मृत्यु को प्राप्त किये। स्वाभाविक है यह संपत्ति उनके दो पुत्रों को हस्तगत हुआ होगा। </strong></p>
<p>लेकिन आज जब महाराजाधिराज के इस ऐतिहासिक परिसर के प्रवेश द्वार पर प्रवेश कर्ज का यह हाल देखा तो मन विह्वलित हो उठा। महाराजाधिराज की आत्मा विलखती होगी। क्योंकि महाराजधिराज वसीयत के 11वें पारा में ऐसा क्यों लिखा की उनकी दोनों पत्नियों की मृत्यु के बाद संपत्ति का एक-तिहाई हिस्सा उनके सबसे छोटे भतीजे, राजकुमार शुभेश्वर सिंह के “हिन्दू ब्राह्मण समुदाय” की पत्नी द्वारा उत्पन्न बच्चों का होगा। </p>
<p>महाराज की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को होती है। उनकी पत्नी महारानी राज्यलक्ष्मी सन 1978 में मृत्यु को प्राप्त कर अपने पति के पास पहुँचती हैं, और 1934  में दरभंगा के लालकिला, यानी रामबाग परिसर के प्रवेश के साथ बाहरी दीवार और किले के अंदर प्रवेश करने के द्वार के बीच बना ऐतिहासिक 86-वर्ष का वृद्ध पुल अपनी रख-रखाव, इस विशाल परिसर के स्वामित्व रखने वाले की उपेक्षा के कारण आंशिक रूप से मृत्यु को प्राप्त करता है, ध्वस्त हो जाता है। कहते हैं  कभी दरभंगा राज परिवार के लोग इसी पुल से एक किले से दूसरे किले जाते थे। यह भी एक धरोहर ही था। ध्वस्त हो भी क्यों नहीं? देखते ही देखते कभी “खास” रास्ता “आम” हो गया। कहते हैं यह पुल तब धंसा जब एक जरूरत-से-अधिक सामानों से लदा ट्रक इस रास्ते से गुजर रही थी। </p>
<p>इतना ही ”ओवरलोडेड”  मानसिक स्थिति होती तो आज महाराजाधिराज का नाम, उनकी संपत्ति इस तरह “ध्वस्त” नहीं ऐसी घटना पहले भी हो चुकी है। उस समय विश्वविद्यालय थाना में ट्रक के मालिक पर प्राथमिकी दर्ज किया गया था। जिला प्रशासन से कई बार ये मांग की थी कि पुल पर से भारी वाहनों को गुजरने से रोका जाय। लेकिन किसी ने रामबाग पैलेस के स्वामी की ओर ऊँगली नहीं उठाया। किसी ने यह नहीं पूछा, जो रास्ता कल तक “खास” था, आज “आम” कैसे हो गया ? कहा जाता है कि इस भव्य किले का निर्माण कोई 240 वर्ष पूर्व राजा प्रताप सिंह के काल में हुआ था। बाद में राजा माधव सिंह के काल-खंड में कुछ पुनर्निर्माण और विस्तार हुआ । </p>
<p>ज्ञातब्य हो कि महाराजाधिराज दिल्ली के लाल किले के तर्ज पर अपने 85 एकड़ की जमीन पर एक किला बनाना प्रारम्भ किये थे जिसका प्रारम्भ 1934 के ऐतिहासिक भूकंप के बाद प्रारम्भ हुआ था। इस किले के निर्माण के लिए ब्रिटिश फर्म के ठेकेदार बैग कैगटीम को जिम्मेदारी दी गई थी। किले के तीन तरफ लगभग 90 फ़ीट ऊंची यह दीवार तैयार की गयी। तीन तरफ तो दीवार बन गई, चौथी तरफ, यानी, पश्चिम इलाके में यह दीवार नहीं बन सका । कुछ लोग कहते हैं कि तीन तरफ दीवार बनते-बनते देश आज़ाद हो गया, जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई, इसलिए पश्चिमी दीवार अछूता रह गया। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि इस किले के पश्चिम इलाके में रहने वाले लोगों शिकायत की कि इस दीवार से उनके घरों में आने वाली रोशनी अवरुद्ध हो गयी है। सभी न्यायालय से न्याय मांगे और और फिर अदालत ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी। खैर।इस किले में लाल ईंटों का प्रयोग किया गया | इसका डिज़ाइन फतेहपुर, सिकरी के बुलंद दरवाज़ा से प्रेरित है | </p>
<figure id="attachment_4692" aria-describedby="caption-attachment-4692" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3.jpg" alt="" width="1600" height="1201" class="size-full wp-image-4692" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-1024x769.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/12/3-1536x1153.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4692" class="wp-caption-text"><br />दरभंगा के ऐतिहासिक रामबाग परिसर को शहर, प्रदेश और देश से जोड़ने वाला पुल मिट्टी में धंसा &#8211; तस्वीर आशिष कुमार पत्रकार</figcaption></figure>
<p>इस किले के अंदर दो महल हैं। ऐसा माना जाता है कि राज परिवार की “कुल देवता” यहीं हैं । विगत कई भूकम्पों के दौरान महल नष्ट हो गया। लालकिला कई जगहों से दरक गया। लेकिन तब इसकी मरम्मत का कोई काम नहीं हुआ। फिर 2015 के तेज भूकंप में कई जगहों पर न सिर्फ छतिग्रस्त हुआ बल्कि किले के ऊपरी हिस्से का मलबा सड़को पर भी गिर था। किले की मरम्मत नहीं होने से किला लगातार जर्जर हाल होता जा रहा है। जगह-जगह.दीवाल पर बड़े-बड़े पेड़ निकल आए हैं। कई जगहों पर 10 से 20 फ़ीट तक ऊंची दीवारों में दरार साफ दिखाई दे रही है। दीवार के दक्षिण इलाके में 90 फ़ीट की दीवार घट कर 20-25 फ़ीट ही रह गई है। </p>
<p>महाराजाधिराज के इस ऐतिहासिक किले का क्षेत्रफल में उत्तरोत्तर कमी हो रही है। किले की दक्षिण दीवार की ऊंचाई में भी क्रमशः कम हो रही है। महाराजा कामेश्वर सिंह की जब मृत्यु हुई उसके बाद, उनके उत्तराधिकारियों ने कई महलों के भूखंड को  बेचना शुरू कर दिया था । उन प्लॉटों को खरीदने वाले लोगों ने कॉलोनियों और घरों का निर्माण किया। तो कही,होटल, रेस्तरां और दुकानों को खोला गया |  महाराजाधिराज के वसीयत के शिड्यूल ‘A’ और ‘B’ में उद्धृत सम्पत्तियाँ, यानी महारानी राजलक्ष्मी और महारानी कामसुंदरी को जीवन पर्यन्त रहने के लिए जिन भवनों को महाराज बहुत “स्नेह” और “प्रेम” से लिखा था, ताकि उन्हें महाराज के बिना भी, अपनी अंतिम सांस तक “तकलीफ” नहीं हो; महाराजा की मृत्यु के बाद विगत छः दशकों से उन महलों की दीवारें, महलों की ईंट, बरामदे, खम्भे, छत, परिसर सभी टकटकी निगाहों से सूर्य की रोशनी में प्रत्येक आवक-जावक जीव को देखता आ रहा है, सोचता आ रहा है – कोई उसका भी हाल पूछे !! बारिस में बादलों की गर्जन के साथ भवनों के एक-एक ईंटों के रूह काँप जाते हैं। सभी डर से थर-थर कांपते हैं। परन्तु कोई नहीं आता, कोई नहीं पूछता। चतुर्दिक ‘उपेक्षाओं के पेड़-पौधे, घास-फूस कुकुरमुत्तों जैसा फ़ैल गया है। </p>
<p>बहरहाल, कोई सात सात पहले, बिहार सरकार द्वारा बिहार के एन्सिएंट मोनुमेंट्स एंड आर्किओलॉजिकल साईट्स के अधीन दरभंगा के रामबाग पैलेस को एन्सिएंट मोन्यूमेंट की श्रेणी में रखने से पूर्व लोगों से उनका विचार, ऑब्जेक्शन मांगी थी। जैसे ही लोगों से आपत्ति मांगने से संबंधित सूचना के प्रकाशन के साथ ही दरभंगा राज फोर्ट में रहने वाले लोगों में खलबली मच गई। कोर्ट-मुकदमा हो गया। कला, संस्कृति और युवा विभाग, बिहार सरकार के सचिव, विभाग के उप-सचिव, पुरातत्व विभाग के निदेशक, अधीक्षक (पटना अंचल), दरभंगा के जिला मजिस्ट्रेट, सब-डिविजनल अधिकारी और अंचल अधिकारी प्रतिवादी बन गए।  महाराजाधिराज के भतीजे दिवंगत कुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह – पटना उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि बिहार सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी, आर्ट, कल्चर और यूथ डिपार्टमेंट द्वारा दिनांक 17 अगस्त, 2010 को जारी एक अधिसूचना, जिसमें उपरोक्त अधिकारी ने ‘आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1976 के अधीन लोगों से ‘ऑब्जेक्शन’ मांगे थे की दरभंगा स्थित महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के दरभंगा राज फोर्ट को क्यों नहीं “बिहार एन्सिएंट मोनुमेंट्स एंड आर्किओलॉजिकल साईट्स रिमेंस” के अधीन ले लिया जाय, निरस्त कर दिया जाय। </p>
<p>वादी का कहना था कि नियमानुसार उसी स्थान / भवनों को उक्त नियमों के तहत ‘एन्सिएंट मोनुमेंट्स’ के रूप में नहीं माना जा सकता है जो न्यूनतम 100-वर्ष पूरे नहीं किये हों। और नियमानुसार, दरभंगा राज फोर्ट 100 वर्ष की आयु के नहीं हैं, अतः नियमनुसार यह ‘एन्सिएंट मोनुमेंट्स’ के रूप में नहीं माना जा सकता। नियमों के अनुसार, कोई भी ऐसी चीज जो 100 साल या इससे अधिक पुरानी हो तो वह ‘पुरातात्विक’ है। इस ऐतिहासिक निर्णय का श्रेय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के एंटीक्वटीज एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1972 को जाता है। यह कानून 1976 से लागू हुआ। इसका मकसद भारतीय सांस्कृतिक विरासत की बहुमूल्य वस्तुओं की लूट और उन्हें गैर-कानूनी माध्यमों से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाना था। वैसे, इसके सिर्फ नकारात्मक और अनपेक्षित परिणामों का अतिरेक ही सामने आया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह कानून इतने कड़े और अभावग्रस्त नियमों से भरा हुआ है कि बेईमान ‘कला के सौदागर’ सरकारी अधिकारियों और कस्टम अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अपना रास्ता निकाल ही लेते है।  </p>
<p><strong>सवाल यह है कि रामबाग परिसर में पैसे के लिए जमीन बिकेगी, भवन निर्माण होगा तो जमीन के क्रेता/भवन निर्माण कर्ता तो भवन निर्माण सामग्री लाएंगे ही। दूकान ही खोल दिए। पिछले कुछ सालों में एक बड़ी आबादी बस गई है। आप कुछ कर सकते नहीं। बेचारे महाराजाधिराज की आत्मा भी रामबाग परिसर में कराहती होगी। दरभंगा के लोगों का मानना है कि दरभंगा राज की नींव क्रमशः कमजोर हो रही है। उनके पुरखों का उदाहरण देकर जिस दरभंगा राज की गरिमा की, यहाँ के राजा-महाराजाओं की वर्चस्व की चर्चाएं की जाती थी, आज समय के गर्त में धूमिल हो गई है। आज दरभंगा राज की गरिमा समाप्त हो गयी है। लेकिन वे स्वयं में इतना सामर्थ नहीं जुटा पा रहे हैं कि वे दरभंगा राज की गरिमा को पुनः स्थापित कर सकें। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/state/darbhanga-raj-soil-sank-again-connectivity-broken">दरभंगा राज की मिट्टी फिर धंसी, शहर-रामबाग को जोड़ने वाली सड़क फिर टूटी &#8211; &#8216;सरकार निद्रा में&#8217;😪</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/state/darbhanga-raj-soil-sank-again-connectivity-broken/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वे कभी खुद बाहर निकलकर संगीतज्ञों का स्वागत नहीं किये, लेकिन शरीर पार्थिव होने के बाद भी बिस्मिल्लाह खां सुपुर्दे ख़ाक होकर दरभंगा राज के प्रति सम्मान बरकरार रखे (श्रृंखला-79)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/book/bismillah-khan-and-darbhanga-raj</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/book/bismillah-khan-and-darbhanga-raj#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 May 2022 07:34:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
		<category><![CDATA[bismillah khan]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[ganga]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[shahnai]]></category>
		<category><![CDATA[shubheshwar singh]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=4007</guid>

					<description><![CDATA[<p>दरभंगा/बनारस : सन 1974 के बाद भारत के शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खां अपने जीवन के अंतिम सांस तक फिर कभी दरभंगा किला के अंदर नहीं आये। वे अन्तःमन से दुखी थे। कसम भी खा रखे थे। संगीत और संगीतज्ञ का अपमान हुआ था। यह भी कहा जाता है कि राजा बहादुर के सबसे छोटे पुत्र यानी कुमार [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/bismillah-khan-and-darbhanga-raj">वे कभी खुद बाहर निकलकर संगीतज्ञों का स्वागत नहीं किये, लेकिन शरीर पार्थिव होने के बाद भी बिस्मिल्लाह खां सुपुर्दे ख़ाक होकर दरभंगा राज के प्रति सम्मान बरकरार रखे (श्रृंखला-79)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा/बनारस : सन 1974 के बाद भारत के शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खां अपने जीवन के अंतिम सांस तक फिर कभी दरभंगा किला के अंदर नहीं आये। वे अन्तःमन से दुखी थे। कसम भी खा रखे थे। संगीत और संगीतज्ञ का अपमान हुआ था। यह भी कहा जाता है कि राजा बहादुर के सबसे छोटे पुत्र यानी कुमार शुभेश्वर सिंह को संगीत-शिक्षा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। जब कोई संगीतज्ञ उनके ज़माने में भी दरभंगा किला परिसर में आते थे, तो वे निजी तौर पर खुद कभी बाहर निकलकर उनका स्वागत या सम्मान नहीं करते थे। कभी किसी नौकर को भेज दिए तो कभी किसी जी-हुजूरी करने वाले को। लेकिन बिस्मिल्लाह खां और कुमार शुभेश्वर सिंह में एक समानता थी जिसे कभी कोई देखा नहीं, सोचा नहीं। बिस्मिल्लाह खान के 91 वें जन्मदिन के अगले दिन कुमार शुभेश्वर सिंह का हँसता-मुस्कुराता शरीर &#8216;पार्थिव&#8217; हो गया और उस तारीख के पांचवें महीने में बिस्मिल्लाह खां का शरीर सुपुर्दे ख़ाक हो गया  &#8211;  महज तारीख का ही तो अंतर था 22 मार्च और 21 अगस्त, साल तो 2006 ही था। आपने कभी सोचा क्या?</strong></p>
<p>उस दिन बनारस के गदौलिया चौक से सराय हरहा की तंग गलियों की ओर उन्मुख था। साईकिल की ट्रिंग-ट्रिंग, रिक्शे का पों-पों, ऑटो वालों का, स्कूटर वालों का, चार-पहिया पर बैठे मोहतरमाओं और मोहतरमों का हॉर्न और इस बीच में सांढ़ और गाय का बेदखल प्रवेश और निकास &#8211; चतुर्दिक बनारस की सड़कों पर आपसी स्नेह-प्रेम-सम्मान अपने-अपने पराकाष्ठा पर दिख रहा था। उस समय तक बनारस में सम्मानित नरेंद्र मोदी जी का अवतरण नहीं हुआ था। मैं एक रिक्शा पर अपने पैर को रिक्शा चालक के बैठने की जगह के पीछे वाले हिस्से में लगे लोहे से सहारा लिए सतर्कता के साथ बैठा था। रिक्शा वाले महोदय मेरे डर को भांप गए थे। रिक्शा वाले महात्मा एक बार पूछ भी बैठे की पहली बार रिक्शा पर बैठे हैं? </p>
<p>मैं बहुत हिम्मत के साथ कहा की नहीं, चलाया नहीं हूँ पेट भरने के लिए, अन्यथा आपकी जैसे बैठकी पर बैठते-बैठते मेरा पिछवाड़ा भी उसी तरह हो गया है जैसा कुत्तों का होता है। आम तौर पर जानबरों का, जो शहरों की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मोहतरमाओं और मोहतरम के गोद में नहीं पलते और जिन्हे जीने के लिए भारत की सड़कों पर, जेद्दोजेहद करना पड़ता है, उन कुत्तों की शारीरिक स्थिति कुछ वैसी ही होती है। मेरी बात सुनकर रिक्शा चालक इतना तो समझ गए कि यह तनिक पढ़ा लिखा व्यक्ति है और जीवन के रहस्य को भी जानता है। तभी घूमकर वह फिर कहता है साहब आपकी मूंछ बहुत बेहतर है, तिलक की तरह। </p>
<p><strong>मैं समझ गया वह &#8216;बनारस का लेप&#8217; लगा रहा है। मैं मुस्कुराते कहा कि सब बाबा विश्वनाथ की कृपा है और मैं &#8216;तिलक&#8217; नहीं, &#8216;मिट्टी का भस्म&#8217; हूँ। वह मुस्कुरा दिया। अब तक वह समझ गया था की मैं गुस्सा नहीं करता। उसकी रिक्शा बहुत तीव्र तो नहीं थी, लेकिन घीमी भी नहीं थी। बनारस में लोगों की आदत है खुद बचकर निकलना। तभी हम मुख्य सड़क से दाहिने करबट लेने वाले ही थे कि गली के नुक्कड़ पर एक विशाल पत्थर पर लिखा दिखा &#8220;भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां मार्ग&#8221; &#8211; उस पत्थर और लेखनी को देखते ही आत्मा विकल हो गयी । मन रोने लगा। उसी पत्थर पर चतुर्दिक जूते &#8211; चप्पल बेचने वाले अपनी-अपनी दुकानों के सामानों को ग्राहकों को लुभाने के लिए लटका रखे थे, ससम्मान । </strong></p>
<p>वैसे भी बनारस में ठगों की किल्लत नहीं है, आज भी। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों में चतुर्दिक भरे परे हैं। उस रास्ते नाक की सीध में कुछ दूर चलने के बाद बाएं हाथ मुड़ा और दस कदम पर रिक्शा वाले बाबू के हाथों भारतीय मुद्रा देते हुए उन्हें नमस्कार किया। उस दिन तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक अमेरिकन डॉलर के लिए 45.31 भारतीय मुद्रा का मोल था। आज जो जो स्थिति है उसे कहने में भी मन दुःखी हो जाता है। फिर भी लिखना तो पड़ेगा ही &#8211; एक डॉलर = 75.53 रुपये। हाथ में कड़कड़ एक-टकिया के तीन पत्ते देखकर रिक्शावाला महात्मा अन्तःमन से आशीष दिए। गली के इस नुक्कड़ से आगे पैदल चलता था गली में। पैदल &#8216;शरीर&#8217; से समझेंगे। क्योंकि इस गली में जिसका निवास था वह शरीर से तनिक कमजोर अवश्य हो गया था, लेकिन उनकी जैसी आत्मा भारत के कुछ सौ लोगों से अधिक में नहीं होगी। उन सौ में मैं खुद एक था क्योंकि मैं मन और आत्मा से पैदल नहीं था। खैर। </p>
<p>सीधा, बाएं, दाहिने, सीधा, दाहिने, बाएं धूमते हम गली के सामने वाले एक मकान के पास पहुंचे। मकान का दरवाजा हरा रंग में रंगा था। दो दरवाजे थे। सामने वाला दरवाजा बैठकी में प्रवेश देता था, जबकि दाहिने हाथ वाला दूसरा दरवाजा आँगन जैसा विशाल कक्ष के लिए खुलता था । दरवाजे पर लिखा था &#8216;बिस्मिल्लाह खां&#8217; और उस नाम पट्ट पर अभी हाल में हुए मकान के पोचारे (शहर वाले और खासकर अंग्रेजी के जानकार &#8216;वाइटवाश&#8217; भी कहते हैं) के कारण नाम का कुछ शब्द सफ़ेद हो गया था। एक नजर में पढ़ने पर &#8216;अल्लाह&#8217; लिखा दीखता था। यदि देखा जाय तो मेरी नजर में वह &#8216;अल्लाह&#8217; का ही घर था। माँ सरस्वती और उनके पुत्र बिस्मिल्लाह खां उसी घर में रहते थे।</p>
<p>हमारा आना सुनिश्चित था। अतः बिना किसी अवरोध के हम सीधे तीसरे तल्ले की ओर उन्मुख हुए। ऊपर खां साहब एक छोटे से कमरे में सीढ़ी के विपरीत दिशा में रहते थे। आगे हमारा पुत्र था जो दूसरी कक्षा में पढता था। फिर उसकी माँ थी जो उसे उसके ही विद्यालय में पढ़ाती थी और मैं पीछे-पीछे आ रहा था। बिस्मिल्लाह खां अपने कमरे के सामने हम तीनों को देखकर मुस्कुराये, फिर हाथ से इशारा करते कहते हैं: &#8220;अंदर आओ बेटा &#8230;. बैठो। और वे मेरे पुत्र के सर को सहलाये पूछते हैं क्या नाम है आपका ? प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता दोनों के उम्र में महज अस्सी वर्ष का फर्क था। फिर मेरी पत्नी जब उन्हें पैर छूकर प्रणाम करने को झुकीं, वे अचानक उनका हाथ पकड़कर कहने लगे: &#8220;अरे&#8230;नहीं&#8230;नहीं। ..आप तो दरभंगा की बेटी हैं, बहु हैं। आप मेरा पैर नहीं छुएं। अल्लाह मुझे माफ़ नहीं करेगा। मैं चुपचाप उस इन्शान का इंसानियत देख रहा था क्योंकि उस आंकने की क्षमता मुझमें नहीं थी। </p>
<p>फिर दरभंगा की बात होने लगी। महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की बात होने लगी। राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह की बात होने लगी। राजकुमार जीवेश्वर सिंह की बात होने लगी। उन दिनों की बातें उस्ताद कहने लगे, जैसे कल की ही बात हो। हम सभी उनकी बातों को, होठों के सञ्चालन को, शारीरिक भाव-भंगिमा को जो आत्मा से जुड़ा था, देख रहे थे, सुन रहे थे, अनुभव कर रहे थे । उनके शब्दों में दरभंगा के राजाओं के प्रति जो सम्मान था, शायद आज ही नहीं, आने वाली चौथी, पांचवीं, छठी, सातवीं पीढ़ियां भी उस भाव को समझ नहीं पायेगी। वैसे विज्ञानं तो कहता है की महिलाओं में तीसरी पीढ़ी में ही डीएनए बदल जाता है, जबकि पुरुषों में छठी-सातवीं पीढ़ी आते-आते। महाराजाधिराज तो &#8216;संतानहीन&#8217; ही मृत्यु को प्राप्त किये, राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र के पुत्र के पुत्र यानी आज चौथी पीढ़ी आ गयी है। शेष तो आप सभी पाठक जानते ही हैं। </p>
<p><strong>सं 1974 की एक बात बताता हूँ। आप माने अथवा नहीं। उस दिन भले भारत के शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान “भारत रत्न” से अलंकृत नहीं हुए थे, लेकिन उनकी अन्तः आत्मा से निकली आवाज दरभंगा के लाल किले की ईंट को हिला दिया। आज मिथिला के लोग साक्षात्व देख रहे हैं और आने वाली पीढ़ियां इससे भी दयनीय स्थिति देखने को सज्ज हैं। वहां उपस्थित मिथिलाञ्चल के विद्वानों, विदुषियों के बीच इधर ‘उस्ताद की शहनाई’ और ‘मंगल ध्वनि’ का अपमान हुआ, उधर दरभंगा राज की कुल-देवता ‘रूठ’ गईं। राजा महेश ठाकुर से लेकर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह तक दरभंगा राज के 20 राजाओं, महाराजाओं द्वारा 410-साल की अर्जित संपत्ति और शोहरत सुपुर्दे ख़ाक की ओर अग्रसर होने लगी। कहाँ भगवान्, कहाँ भगवती, कहाँ पूजा, कहाँ पाठ, कहाँ प्रसाद, कहाँ आरती, कहाँ पंडित, कहाँ पुरोहित – सभी समाप्त हो गए। मंदिर की घंटी की आवाज शांत हो गई। शंखनाद समाप्त हो गया। शायद आप विश्वास नहीं करेंगे – परन्तु सच यही है। अक्षरों के “अधिपति” “प्रथम-पूज्य” और माँ सरस्वती भी परिसर से बाहर निकल गई। कभी फुर्सत हो तो आराम से विचार करेंगे।</strong>  </p>
<p>कोई 48-वर्ष पहले सन 1974 में भारत के शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान दरभंगा किले के अंदर अपनी साँसों को रोकते, शहनाई की धुन को कुछ पल ‘वाधित’ करते दरभंगा राज के तत्कालीन सभी ‘धनाढ्यों’ के सम्मुख, वहां उपस्थित मिथिलाञ्चल के तथाकथित ज्ञानी-महात्माओं के सम्मुख बिना किसी भय के कहते हैं: “मैं राजा बहादुर की शादी में शहनाई बजाया। मैं युवराज कुमार जीवेश्वर सिंह के विवाह में शहनाई की धुन से नई बहु का स्वागत किया। आज उसी शहनाई के धुन से युवराज की सबसे बड़ी बेटी की मांग में उसके शौहर द्वारा सुंदर भरते समय सुखमय जीवन का आशीर्वाद देता हूँ।&#8221;</p>
<p><strong>फिर कुछ क्षण के लिए बिस्मिल्लाह खां रुके। लम्बी उच्छ्वास लिए। बगल में रखे गमछी से अपनी आखों को पोछते अवरुद्ध गला से कहते हैं: &#8220;&#8230;&#8230;.. और आज से यह प्रण लेता हूँ कि आज के बाद कभी दरभंगा राज परिसर में, इस लाल किले के अंदर नहीं आऊंगा, कभी शहनाई नहीं बजाऊंगा। आज महाराजाधिराज के लिए, राजा बहादुर के लिए मन व्याकुल हो रहा है। उनकी अनुपस्थिति खल रही है। आज उनके बिना रोने का मन कर रहा है। आज इस भूमि पर उन दो महारथियों की अनुपस्थिति ने संगीत की दुनिया को अस्तित्वहीन महसूस कर रहा हूँ। आज शहनाई का मंगल ध्वनि बिलख गया है। आज युवराज को देखकर दरभंगा राज का भविष्य देख रहा हूँ। इस लाल किले की दीवारों के ईंटों से सरस्वती जाती दिख रही हैं।  इस दीवार का रंग और भी लाल होना इसका प्रारब्ध है। आज बड़ी महारानी को छोड़कर कोई भी बिस्मिल्लाह खान की शहनाई को देखने वाला, पूछने वाला, समझने वाला नहीं रहा …… और वे फ़ुफ़क फ़ुफ़क कर रोने लगे।&#8221;</strong></p>
<p>उनकी साँसे जिस रफ़्तार से ”रीड” के रास्ते ”पोली” होते हुए ”शहनाई” तक पहुँच रही थी, और जिस प्रकार का धुन निकल रहा था, वह न केवल महाराजाधिराज, राजाबहादुर और युवराज के लिए समर्पण था, बल्कि जीवन में कभी फिर दरभंगा के उस लाल किले में पैर नहीं रखने का वादा भी था। मंगल ध्वनि बजाने वाला वह नायक अपने शब्दों पर जीवन पर्यन्त खड़ा उतरा – कभी पैर नहीं रखा। बिस्मिल्लाह खान अपनी शहनाई से राजकुमार जीवेश्वर सिंह और उनकी प्रथम पत्नी श्रीमती राजकिशोरी जी की पहली बेटी कात्यायनी देवी का विवाह संस्कार में मङ्गल ध्वनि बजा रहे थे । </p>
<p>उस घटना के 32 साल बाद सन 2006 का मार्च महीना था और तारीख 21 मार्च। बिस्मिल्लाह खान का 90 वां जन्मदिन मानना था। हमने एक किताब बनाया था &#8220;मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खां&#8221; और इस किताब में  उन तमाम बातों को, तथ्यों को समेटने की कोशिश किया था जो बनारस और बिस्मिल्लाह खां को गंगा के तट पर एकीकृत करता था। इस किताब को उस्ताद को खुद लोकार्पित कर भारत के लोगों को समर्पित करना था। </p>
<p>मार्च महीने में उस तारीख से पूर्व दो बहुत ही दर्दनाक घटनाएं हुई &#8211; एक: सात मार्च को संकटमोचन सहित बनारस के अन्य स्थानों पर ब्लास्ट हुआ था, काफी लोग हताहत हुए। और उसके पंद्रह दिन बाद, यानी 22 मार्च को राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, जिनके विवाह में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई की मंगल ध्वनि बजाए थे; उनके सबसे छोटे पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह का इंतकाल हो गया था देश की राजधानी दिल्ली के कैलाश कॉलोनी स्थित एक छोटे से मकान में। </p>
<p>कुमार शुभेश्वर सिंह सम्भवतः दरभंगा राज परिवार के तीसरे व्यक्ति थे जिनका देहांत दरभंगा से बाहर तो हुआ ही, उनका दाह-संस्कार हेतु ऐतिहासिक माधवेश्वर में चिता नहीं सजी, जबकि माधवेश्वर में उनके माता-पिता की आत्माएं अपने पुत्र को स्नेह स्वरुप गले लगाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे । कुमार शुभेश्वर सिंह के पूर्व महाराजा माधव सिंह का देहांत दरभंगा में नहीं हुआ था। साथ ही, महाराजा माधव सिंह के पुत्र महाराजा छत्र सिंह का देहांत बनारस में हुआ था। करीब 51 एकड़ में माधवेश्वर परिसर का निर्माण  महाराजा माधव सिंह ने 1806 में करवाए थे । स्थानीय लोगों का कहना है कि चूँकि महाराजा माधव सिंह का निधन दरभंगा में नहीं हुआ, इसलिए उनकी चिता भूमि इस परिसर में नहीं है। लेकिन उनका अस्थि कलश महादेव मंदिर के आगे रखा हुआ है। राज परिवार के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार से पूर्व इस कलश के पास रखने की परंपरा है। माधव सिंह के पुत्र महाराजा छत्र सिंह का निधन भी काशी में हुआ, इसलिए उनकी चिता भी यहां नहीं है। </p>
<p>दरभंगा के हस्ताक्षरों का कहना है कि महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की इष्ट &#8216;तारा&#8217; थीं, अतः उनकी चिता भूमि पर माता तारा की प्रतिमा स्थापित की गयी। इनके समीप  मां रामेश्वरी श्यामा का स्थान है । यह महाराजा रामेश्वर सिंह की चिता भूमि पर स्थित है। कामेश्वरी श्यामा मंदिर में माँ श्यामा की प्रतिमा दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की चिता पर है। महारानी राजलक्ष्मी अपने पति के सम्मानार्थ इस मंदिर का निर्माण की थी। इसी स्थान पर महारानी राजलक्ष्मी की चिता स्थान जहाँ उनके पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। यह इस तथ्य को भी स्पष्ट करता है कि महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद दरभंगा राज में &#8220;संस्कारों&#8221; का, &#8220;गरिमाओं&#8221; का पतन किस तरह हुआ। वैसे अगर गिनती करें तो इस परिसर में सात चिता-स्थलों पर ही मंदिर है और आठवें पर निर्माणाधीन। ऐसा क्यों हुआ यह तो शोध का विषय है, लेकिन दरभंगा राज के अन्य लोगों के चितास्थलों पर पीपल-बरगद के पेड़ फल-फूल रहे हैं। वैसे यह परिसर महाराजा कामेश्वर सिंह न्यास के तहत है, लेकिन सवाल यह है कि जब राजा ही नहीं रहा, फिर&#8230;&#8230;&#8230; । </p>
<p>बहरहाल, फिर अपनी आखों को पोछते उस्ताद बिस्मिल्लाह खां कहते हैं: &#8220;आप दरभंगा की बेटी हैं।  आप दरभंगा की बहू हैं।आपको देखकर मुझे अपना बचपन याद आ गया। मैं अपने शेष जीवन का कुछ अनमोल पल एक बार दरभंगा में बिताना चाहता हूँ। महाराजाधिराज, राजा बहादुर, युवराज की मिट्टी में लोट-पोट होना चाहता हूँ। राजा साहेब के पोखर में डुबकी लगाना चाहता हूँ। लाल-किले की दीवारों को छू कर महाराजा को, राजा बहादुर को, युवराज को अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता हूँ। आप ही यह काम कर सकती हैं। मैं आपको इस पुनीत कार्य के लिए राजा बहादुर की शादी में मिला सोने का असर्फी दूंगा ….. &#8221;</p>
<p>और फिर बनारस के सराय हरहा स्थित बिस्मिल्लाह खान के मकान के तीसरे तल्ले पर सन्नाटा छा गया।सम्पूर्ण वातावरण भाव-विह्वल हो गया था। लगता था कि दरभंगा के महाराजा सर कामेश्वर सिंह, राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह शहनाई सम्राट भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को उनके उस कुटिया के एक कोने में खड़े होकर उन्हें देख रहे हैं। उनकी उनकी व्यथा को महसूस कर रहे थे  – एक मनुष्य का एक मनुष्य के प्रति सम्मान कैसा होता है, मरणोपरांत भी, अगर आप मानव हैं, तो महसूस कर सकते हैं । लेकिन बिस्मिल्लाह खां को नहीं मालूम था कि दरभंगा राज और दरभंगा किले की मिट्टी में अब वह  मानवता नहीं जिसका वे चश्मदीद गवाह थे। आज वहां कुछ और पल रहे हैं, फल-फूल रहे हैं। </p>
<p>महाराजाधिराज के समय में या उसके पूर्व भी दरभंगा और दरभंगा राज, भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रमुख केंद्रों में से एक था । दरभंगा राज के राजा संगीत, कला और संस्कृति के महान संरक्षक थें। दरभंगा राज से कई प्रसिद्ध संगीतकार जुड़े थे। उनमें प्रमुख थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, उस्ताद गौहर जान, पंडित राम चतुर मल्लिक, पंडित रामेश्वर पाठक, पंडित सियाराम तिवारी इत्यादि। दरभंगा राज ध्रुपद के मुख्य संरक्षक थे, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक मुखर शैली थी। ध्रुपद का एक प्रमुख विद्यालय आज दरभंगा घराना के नाम से जाना जाता है। आज भारत में ध्रुपद के तीन प्रमुख घराने हैं: डागर घराना, बेतिया राज (बेतिया घराना) के मिश्र और दरभंगा (दरभंगा घराना) के मिश्र। </p>
<p>कहा जाता है कि महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह एक अच्छे सितार वादक थें। इतना ही नहीं, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कई वर्षों तक दरभंगा राज के दरबारी संगीतकार भी रहे। उन्होंने अपना बचपन दरभंगा में बिताया। महाराजा और राजा बहादुर के अलावे मेरे ससुर भी उनके बचपन के मित्र थे। दरभंगा राज ने ग्वालियर के नन्हे खान के भाई मुराद अली खान का समर्थन किया। मुराद अली खान अपने समय के सबसे महान सरोद वादकों में से एक थें। मुराद अली खान को अपने सरोद पर धातु के तार और धातु के तख्ती प्लेटों का उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति होने का श्रेय दिया जाता है, जो आज मानक बन गया है। इतना ही नहीं, कुंदन लाल सहगल महाराजा कामेश्वर सिंह के छोटे भाई राजा विश्वेश्वर सिंह के मित्र थे। जब भी दोनों दरभंगा के बेला पैलेस में मिले, गजल और ठुमरी की बातचीत और गायन के लंबे सत्र देखे गए। कुंदन लाल सहगल ने राजा बहादुर की शादी में भाग लिया, और शादी में अपना हारमोनियम निकाला और “बाबुल मोरा नैहर छुरी में जाए” गाया। </p>
<p>यह भी कहा जाता है कि दरभंगा राज का अपना सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और पुलिस बैंड था। मनोकामना मंदिर के सामने एक गोलाकार संरचना थी, जिसे बैंड स्टैंड के नाम से जाना जाता था। बैंड शाम को वहाँ संगीत बजाता था। आज बैंडस्टैंड का फर्श अभी भी एकमात्र हिस्सा है। लेकिन आज दरभंगा राज में संगीत को समझने वाला, सुनने वाला कोई नहीं है ।  बिस्मिल्लाह खान उन दिनों मल्लिक जी के घर पर रहे थे। आज क्या संगीत, क्या घराना – आज तो राज दरभंगा में कुछ और ही संगीत बज रहा है – संपत्ति का, दौलत एकत्रित करने का। संस्कृति और संस्कार अब नहीं है। सबसे बड़ी बात, छोटा कुमार, यानी कुमार शुभेश्वर सिंह को संगीत-शिक्षा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। कहा जाता है कि जब कोई संगीतज्ञ उनके ज़माने में भी रामबाग परिसर आते थे, तो वे निजी तौर पर खुद कभी बाहर निकलकर उनका स्वागत या सम्मान नहीं करते थे। कभी किसी नौकर को भेज दिए तो कभी किसी जी-हुजूरी करने वाले को। जबकि महाराजाधिराज या राजबहादुर या फिर बड़ी महारानी के समयकाल में संगीतज्ञ, विद्वानों की बात छोड़िये, कोई भी साधारण मनुष्य उनके सामने बहुत सम्मानित होता था। आज “सम्मान” शब्द का महत्व दरभंगा राज परिसर में नहीं है। </p>
<p><strong>खैर &#8230;&#8230;&#8230; खान साहब, कुमार साहब आप सबों को श्रद्धांजलि। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/bismillah-khan-and-darbhanga-raj">वे कभी खुद बाहर निकलकर संगीतज्ञों का स्वागत नहीं किये, लेकिन शरीर पार्थिव होने के बाद भी बिस्मिल्लाह खां सुपुर्दे ख़ाक होकर दरभंगा राज के प्रति सम्मान बरकरार रखे (श्रृंखला-79)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/book/bismillah-khan-and-darbhanga-raj/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मिथिला के धरोहर पुरुष &#8216;अयाची मिश्र&#8217; : बालोऽहं जगदानन्द नमे बाला सरस्वती। अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ।।</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/mithila-and-heritage-of-sarisab-pahi</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/mithila-and-heritage-of-sarisab-pahi#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Apr 2022 11:25:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पुरातत्व]]></category>
		<category><![CDATA[ayachi mishra]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[madhubani]]></category>
		<category><![CDATA[mandan mishra]]></category>
		<category><![CDATA[painting]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[sarisab]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3966</guid>

					<description><![CDATA[<p>सरिसब-पाही (मधुबनी) : आज से कोई पचास दिन पूर्व फेसबुक के आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम पेज पर एक याचना लिखा था। याचना मिथिला के लोगों के लिए था। कहते हैं मिथिला में विद्वानों और विदुषियों की किल्लत नहीं है। बड़े-बुजुर्ग तो यहाँ तक कह दिए कि मिथिला में दरबाजे पर जो जीव-जंतु बंधे होते हैं, वह स्थानीय हवाओं [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/mithila-and-heritage-of-sarisab-pahi">मिथिला के धरोहर पुरुष &#8216;अयाची मिश्र&#8217; : बालोऽहं जगदानन्द नमे बाला सरस्वती। अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ।।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सरिसब-पाही (मधुबनी) : आज से कोई पचास दिन पूर्व फेसबुक के <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम </strong>पेज पर एक याचना लिखा था। याचना मिथिला के लोगों के लिए था। कहते हैं मिथिला में विद्वानों और विदुषियों की किल्लत नहीं है। बड़े-बुजुर्ग तो यहाँ तक कह दिए कि मिथिला में दरबाजे पर जो जीव-जंतु बंधे होते हैं, वह स्थानीय हवाओं में बौद्धिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, मानवीय गुणवत्ताओं की प्रचुरता के कारण उसका व्यवहार भी मानवीय व्यवहारों के पराकाष्ठा जैसा होता है। याचना में लिखे थे कि &#8220;मिथिलाक्षेत्र ऐतिहासिक पुरातत्वों/धरोहरों का गढ़ हैं। आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम उन सभी पुरातत्वों/धरोहरों पर एक श्रृंखला प्रारम्भ करने जा रहा है । आपका भी स्वागत है अगर आप भी लिखना चाहें &#8211; न्यूनतम शब्द 3000 और कहानियों में तस्वीरों की संख्या बीस&#8221; &#8211; उक्त याचना विगत 7 अप्रैल को अपरान्ह काल 4.22 बजे पोस्ट किये थे। </strong></p>
<p>विगत 50 दिनों में 184 महामानवों तक वह पहुंचा। दरभंगा के श्री सरोज मिश्र जी उक्त पोस्ट पर &#8216;बधाई&#8217; लिखे और &#8216;प्रणाम&#8217; का &#8216;इमोजी&#8217; चिपकाये। आठ जगह जो &#8216;मैथिलों&#8217; और &#8216;श्रोत्रियों&#8217; का गढ़ है, बांटे भी। आश्चर्य की बात तो यह है कि फेसबुक पर मिथिला के रहने वाले, चाहे वे मिथिला क्षेत्र में रहते हों, अथवा शहरों में, महानगरों में गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से लेकर संकीर्ण गली-कूचियों में, फेसबुक पर या अन्य सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर उपस्थित अवश्य हैं। </p>
<p>विगत दिनों मिथिला क्षेत्र में, मिथिला के &#8216;विकास&#8217; के लिए कार्य करने वाले कई लोगों से गुफ़्तगू किये। सबों का कार्य &#8216;सम्मानित&#8217; मिला। लेकिन बातचीत के दौरान 90 फीसदी से अधिक लोगों का अंतिम कथन यही था कि &#8216;इन कार्यों से प्रचार-प्रसार होता है, लोग-बाग़ जानते हैं, पहचानते हैं। यह सभी जान-पहचान आने वाले समय में जब वे अथवा उनकी संस्थाओं के लोग राजनीति में प्रवेश लेंगे, चाहे पंचायत के लिए चुनाव लड़े, जिला परिषद के लिए, विधान सभा के लिए, विधान परिषद के लिए, या लोक सभा के लिए &#8211; उनका वह सामाजिक कार्य मददगार होगा। अंतिम पंक्ति सुनकर मन हताश हो गया। लेकिन उससे भी अधिक कष्ट तब हुआ जब लोगों ने &#8216;याचना&#8217; पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिखाया। </p>
<p>कल क्या हो जाये, कहा नहीं जा सकता। संभव है जिस मिथिला क्षेत्र में आज &#8216;खेती के अलावे (मोहतरमा बाढ़ जी की त्रादसी के अधीन) ऐसा कोई भी साधन अथवा व्यवस्था नहीं है, जो एक अलग राज्य के लिए उपयुक्त हो, &#8216;मिथिला राज्य&#8217; के रूप में देश का 29 वां राज्य बनकर उपस्थित हो जाए । क्योंकि कुछ भी कहा नहीं जा सकता की कब दिल्ली में बैठे नेताओं को एक बार फिर बिहार को दो फांक में काटकर स्थानीय नेताओं के हाथों &#8216;खिलौना&#8217; स्वरुप हस्तगत करा दें। </p>
<p>खैर, वर्तमान काल में बिहार के कुल 9 डिवीजन्स, 38 जिलों, 101 सब-डिवीजन्स, 207 सिटीज और टाउन्स, 534 ब्लॉकों, 8,406 पंचायतों और 45,103 गांव में शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा, जहाँ की मिट्टी की अपनी इतिहास नहीं होगी। वह इतिहास या पुरातत्व चाहे निर्जीव हो अथवा सजीव, उस गाँव की मिटटी की, वहां की मानसिकता की, वहां की शिक्षा के, वहां की बौद्धिक स्तर की सम्पूर्णता के साथ व्याख्या करता है। दुर्भाग्य यह है कि इस कार्य की जिम्मेदारी भी प्रशासन और सरकार पर थोप दी गई है। </p>
<p>कल की ही तो बात है &#8211; सम्पूर्ण बिहार बाबू कुंवर सिंह के बारे में चर्चा कर रहा था। सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर हज़ारो लोग बाबू कुंवर सिंह की तस्वीर के साथ अपनी तस्वीर चिपकाकर दूर-दूर तक फैला रहे थे। लेकिन क्या कोई इस बात पर मंथन किये कि बाबू कुंवर सिंह के परिवार के कोई आज जीवित हैं अथवा नहीं? बाबू कुंवर सिंह के सेना प्रमुख बाबू जसपाल सिंह के वंशज आज जीवित है अथवा नहीं? शायद नहीं।यह महज एक बड़ा दुर्भाग्य नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाता है। </p>
<p>अगर सम्पूर्ण बिहार के गाँव की बात तत्काल नहीं भी करें तो उत्तर बिहार, खासकर मिथिला के क्षेत्र में मानवीय धरोहरों की तो कमी है ही नहीं, उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ियां आज भी हैं। लेकिन प्राकृतिक पुरातत्व की भी किल्लत नहीं है चाहे बेगूसराय का क्षेत्र हो, मुंगेर का क्षेत्र हो, सहरसा का क्षेत्र हो, भागलपुर का क्षेत्र हो, दरभंगा का क्षेत्र हो, मधुबनी का क्षेत्र हो। किल्लत है खोजकर्ताओं, शोधकर्ताओं, जिज्ञासुओं, पिपासुओं की।  </p>
<p><strong>खैर, आज मधुबनी जिला के ऐतिहासिक सरिसब-पाही के पाही ग्राम के सम्मानित श्री अमल कुमार झा का आज पहला लेख आया आयाची मिश्र पर। अमल जी धरोहर प्रेमी, पाण्डुलिपि एवं दुर्लभ ग्रंथों के संग्रहकर्ता, सजग पाठक एवं गुरु भक्त हैं। ये विगत तीस वर्षों से लगातार अपने ग्रामीण परिसर की ऐतिहासिकता एवं पुरातात्विक अवशेषों के खोज में लगे हुए हैं। इन्होंने अपने ग्रामीण परिसर के अक्षर पुरुषों एवं उनकी कृतियों का संग्रह कर अपने ज्ञान वर्धन के लिए एक विलक्षण पुस्तकालय का निर्माण किया है। </strong></p>
<figure id="attachment_3968" aria-describedby="caption-attachment-3968" style="width: 780px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/amal.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/amal.jpeg" alt="" width="780" height="1040" class="size-full wp-image-3968" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/amal.jpeg 780w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/amal-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/amal-768x1024.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3968" class="wp-caption-text">अमल कुमार झा दरभंगा के अंतिम महारानी अधिरानी काम सुंदरी जी के साथ बात करते हुए  </figcaption></figure>
<p><strong>अमल जी </strong>लगातार तीन वर्षों से यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय द्वारा दिए जाने वाले एक वर्ष में पुस्तकालय जा कर सबसे ज्यादा पुस्तक पढ़ कर पंडित श्यामानंद झा स्मृति पाठक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। जो इन्हें एक सजग पाठक घोषित करता है। विगत वर्ष इन्हें इनके शिक्षा एवं शिक्षा के प्रचार प्रसार के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए श्री श्याम नाथ मिश्र फाउंडेशन, भट्टपुरा, दरभंगा द्वारा सम्मानित किया गया है। ये विगत कई वर्षों से लगातार निःशुल्क ऑनलाइन एवं ऑफलाइन कार्यशालाओं का आयोजन गृहणियों एवं स्कूली छात्र &#8211; छात्राओं के लिए कर रहे हैं। इनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपने परिसर के लोगों को अपने परिसर के कला, संस्कृति एवं इतिहास से अवगत कराना है।</p>
<p>कहा जाता है कि मिथिला की पुण्य भूमि के जितने पूज्य स्थल हैं उनमें सबसे विशिष्ट सरिसब ग्राम रत्न है। जब से मिथिला का इतिहास उपलब्ध है तब से इस ग्राम का इतिहास उपलब्ध है अपने अनेकों गौरव गाथाओं के साथ जो इसे अन्य सभी पूज्य स्थलों में विशिष्ट दर्शाता है। सरिसब एक विशाल ग्राम है जो मिथिला के प्राचीन नगर अमरावती के मध्य में स्थित है। इसके उत्तर में &#8216;भौर&#8217; और &#8216;रैयाम&#8217;, पृर्व में &#8216;लोहना&#8217; और &#8216;खररख&#8217;, दक्षिण में &#8216;गंगौली&#8217; और &#8216;सखवाड़&#8217; तथा पश्चिम में &#8216;पण्डौल&#8217; स्थित है। ये सभी ग्राम प्राचीन हैं और सभी ग्रामों का इतिहास उपलब्ध है परन्तु सरिसब इन सभी से सबसे प्राचीन है।</p>
<p><strong>सरिसब</strong> का अर्थ संस्कृत में &#8216;गौर सर्षप&#8217; है जिसका पर्यायवाची शब्द &#8216;सिद्धार्थ&#8217; है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में &#8216;गौर सर्षप&#8217; की खेती होती थी जिस कारण यह क्षेत्र &#8216;सिद्धार्थ&#8217; क्षेत्र से प्रसिद्ध हुआ। सिद्धार्थ क्षेत्र का उल्लेख पुराणों है। कपिल मुनि के आश्रम से दो योजन पूर्व सिद्धार्थ क्षेत्र अवस्थित है। कपिल  मुनि का एक आश्रम कपिलेश्वर में स्थित है। सरिसब की ग्राम देवता मां सिद्धेश्वरी हैं जिनकी प्रतिमा आज भी सरिसब ग्राम के मध्य में स्थित एक विशाल मन्दिर में पूजी रही है। <br />
माँ सिद्धेश्वरी की प्रतीमा का उल्लेख तेरहवें शक शताब्दी के उत्तरार्द्ध में महामहोपाध्याय भवनाथ मिश्र प्रसिद्ध अयाची ने एक श्लोक द्वारा किया है:</p>
<p><strong>दुष्‍टप्राणहरी गिरीन्द्रतनया नागेन्द्रहाराञ्चिता<br />
भक्तिप्रस्वसुपर्वनायकशिरोरत्नाञ्चिताङिध्रद्वया।<br />
भक्तानुग्रहहेतवे वटतटे स्थानं विधाय स्थिता<br />
भूयाद् भव्यकरी पराभवहरी सिद्धेश्वरी मादृशाम्।।</strong></p>
<p>वराह पुराण में अध्याय 160 श्लोक 44-45 में लिखा है कि बलभद्र की उपास्य देवी मां सिद्धेश्वरी थीं तथा बलभद्र की मिथिला वास पुराण की प्रसिद्ध कथा है।</p>
<figure id="attachment_3969" aria-describedby="caption-attachment-3969" style="width: 780px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/230b048c-3548-46c0-bd4c-1b87d043016d.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/230b048c-3548-46c0-bd4c-1b87d043016d.jpg" alt="" width="780" height="1040" class="size-full wp-image-3969" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/230b048c-3548-46c0-bd4c-1b87d043016d.jpg 780w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/230b048c-3548-46c0-bd4c-1b87d043016d-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/230b048c-3548-46c0-bd4c-1b87d043016d-768x1024.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3969" class="wp-caption-text">अयाची​ मिश्र</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मिथिला के सोदरपुर सरिसब मूल के अवदात कुल में महामहोपाध्याय भवनाथ मिश्र का जन्म हुआ था। आजीवन अयाचना व्रत के पालन के कारण भवनाथ मिश्र अयाची नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका मातृकुल और पितृकुल आदिकाल से विद्या &#8211; वैभव से प्रशस्त रहा है। इनके पितामह विश्वनाथ मिश्र मीमांसा के पण्डित थे और पिता न्याय शास्त्र के उद्भट विद्वान थे। इनके मातामह वटेश्वर ने न्याय दर्शन में दर्पण नाम के ग्रन्थ का प्रणयन किया तथा मिमांसा में प्रभाकर संप्रदाय के महार्णव नाम के ग्रन्थ की रचना की।</p>
<p>अयाची मिश्र  किसी गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त नहीं की । उन्होंने अपने घर में अपने अग्रज जीवनाथ मिश्र से सभी शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। अर्जित ज्ञान को  समय समय पर अपने शिष्यों और औरस पुत्र शंकर मिश्र को समर्पित करते रहे। शंकर मिश्र ने पाँच वर्ष से कम आयु में ही अपूर्व मेधा का परिचय स्वरचित श्लोक द्वारा दे कर राजा द्वारा सम्मानित हुए। </p>
<p>यह श्लोक &#8211;  </p>
<p><strong>बालोऽहं जगदानन्द नमे बाला सरस्वती।<br />
अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम्।  </strong></p>
<p>अद्वितीय मेधा प्राप्ति हेतु आज भी बच्चों को रटाया जाता है। शंकर मिश्र ने सम्मान स्वरूप जो धन प्राप्त किया उसे अपनी माँ को समर्पित किया। शंकर मिश्र के जन्म के समय में उनकी मां ने  चमाइन (दाई) को कुछ नहीं दे पाने के कारण वचन दिया था कि बच्चे का पहला उपार्जित धन तुम्हें अर्पित करुँगी ,वचन को  पूर्ण करते हुए सारा धन चमाइन को समर्पित किया। चमाइन ने उस अकूत धन को देव कृपा मान जन कल्याण हेतु एक डाबर का निर्माण में खर्च दिया। जो आज भी जनमानस को अपने पवित्र जल से प्राण दान दे रहा है। </p>
<p>शंकर मिश्र ने अपने पिता से न्याय तथा वैशेषिक दर्शन के मौलिक ग्रंथों को पढ़कर मौलिक ग्रंथों का प्रणयन तथा दुरूह ग्रंथों की व्याख्या कर अपने अर्जित विद्याधन को अपने उत्तर साधकों में बाँट दिया। शंकर मिश्र द्वारा लिखित न्याय वैशेषिक दर्शन के अतिरिक्त साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं &#8211; कणाद रहस्य, भेद रत्न, वादि विनोद, रसार्णव, मनोभव पराभव, गौरी दिगम्बर प्रहसन तथा कृष्ण विनोदी नाटिका, उदयनाचार्य के आत्म तत्व विवेक की कल्पलता व्याख्या, न्यायकुसुमाञ्जलि की आमोद व्याख्या, श्रीहर्ष के खण्डन खण्ड खाद्य के आनन्दवर्धिनी और शांकरी व्याख्या तथा वल्लभाचार्य के न्याय लीलावती की कण्ठाभरण व्याख्या प्रकाशित है। </p>
<p>अयाची मिश्र ने  कभी कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। यद्यपि मीमांसा शास्त्र का एक ग्रन्थ नयविवेक नाम साम्य के कारण चर्चा में आता है पर मीमांसा कुसुमांजलि में महामहोपाध्याय डा0उमेश मिश्र ने स्पष्ट लिखा है कि मधुबनी जिलान्तर्गत भट्ट सिमरी गांव के निवासी भवनाथ द्वारा लिखित है। शंकर मिश्र अपने सभी कृतियों में अपने पिता के पाण्डित्य के प्रति भक्ति, श्रद्धा तथा आत्मविश्वास अभिव्यक्त किया है। </p>
<figure id="attachment_3970" aria-describedby="caption-attachment-3970" style="width: 480px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/636ad65f-9001-478d-a0e7-ea24d8f5abd9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/636ad65f-9001-478d-a0e7-ea24d8f5abd9.jpg" alt="" width="480" height="853" class="size-full wp-image-3970" /></a><figcaption id="caption-attachment-3970" class="wp-caption-text">अयाची​ मिश्र की माँ</figcaption></figure>
<p>अयाची ने निःशुल्क विद्यादान कर अपने शिष्यों से कम से कम दस विद्यार्थियों को निःशुल्क विद्यादान करने का वचन गुरु दक्षिणा स्वरूप माँगा। शिष्यों ने इस क्रम को अनन्त काल तक उत्तरोत्तर हस्तान्तरित कर निःशुल्क विद्यादान और गुरु शिष्य परम्परा को जीवित रखा। <br />
आज भी सरिसब के अनेक विद्वान निःशुल्क विद्यादान कर रहे हैं। सरिसब विद्या का केंद्र रहा। लगातार पाण्डुलिपियों का लेखन होता रहा। पाण्डुलिपियों को चुराने और नष्ट करने के उद्देश्य से अनेक आक्रमण हुए। अनेक षड्यंत्र रचे गए। सरिसब की एक राज नटी ने दुर्लभ पांडुलिपियों की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। </p>
<p>हर धर्म जाति के लोगों ने सरिसब के ज्ञान परम्परा का लोहा माना और अपनी श्रद्धा व्यक्त करते रहे। सरिसब आज भी अनेक स्कूलों और कॉलेजों के कारण विद्या का केन्द्र बना हुआ है। वाचनालय शास्त्र चर्चा के लिए प्रसिद्ध है। अनेक कला का जन्म और विकास सरिसब में होता रहा है। आज भी सिक्की, लाख, खाधी, धातु, मिष्ठान, पकवान और तार के पत्तों से बने हस्तशिल्पियों का केन्द्र है। अनेक कलाकार केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा सम्मानित हैं। युवा और किशोर समाज सेवा कर रहे हैं। समाज को सदा जागरूक रखते हैं। आपसी सद्भाव बना हुआ है। </p>
<p>सरिसब के प्रवेश पर सिद्धेश्वर नाथ महादेव का मन्दिर और मस्जिद का अगल बगल अवस्थित होना गंगा यमुनी तहजीब का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। सरिसब बाजार आदि काल से अनेक व्यवसाय के लिए प्रसिद्ध रहा है और अनेको बार  अपनी समृद्धि के कारण लूटा भी गया है । यह गांव आज भी लगातार बढ़ रहा है। समृद्ध हो रहा है। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि सरिसब गाँव धीरे धीरे  शहर के रूप में तब्दील हो रहा है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/mithila-and-heritage-of-sarisab-pahi">मिथिला के धरोहर पुरुष &#8216;अयाची मिश्र&#8217; : बालोऽहं जगदानन्द नमे बाला सरस्वती। अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ।।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/mithila-and-heritage-of-sarisab-pahi/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम का एक प्रयास: &#8216;कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट&#8217; में &#8216;मिथिला का प्रतिनिधित्व&#8217; हो, अधिकारी ने कहा: &#8220;वंडरफुल इनिसिएटिव&#8221; </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/mithilas-representation-in-kamrup-kamakhya-trust</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/mithilas-representation-in-kamrup-kamakhya-trust#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Apr 2022 06:20:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[assam]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[goverrnment]]></category>
		<category><![CDATA[kamakhya]]></category>
		<category><![CDATA[maharaja]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
		<category><![CDATA[temple]]></category>
		<category><![CDATA[trsut]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3910</guid>

					<description><![CDATA[<p>गौहाटी :  आज जब सम्पूर्ण भारत &#8220;आज़ादी का अमृत महोत्सव&#8221; मन रहा है, आज़ादी के पूर्व और आज़ादी भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों के विकास में अहम् भूमिका अदा करने वाले दरभंगा के महाराजाओं &#8211; लक्ष्मेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और डॉ सर कामेश्वर सिंह &#8211; के सम्मानार्थ तथा मिथिला की सांस्कृतिक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/mithilas-representation-in-kamrup-kamakhya-trust">आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम का एक प्रयास: &#8216;कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट&#8217; में &#8216;मिथिला का प्रतिनिधित्व&#8217; हो, अधिकारी ने कहा: &#8220;वंडरफुल इनिसिएटिव&#8221; </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गौहाटी :  आज जब सम्पूर्ण भारत &#8220;आज़ादी का अमृत महोत्सव&#8221; मन रहा है, आज़ादी के पूर्व और आज़ादी भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों के विकास में अहम् भूमिका अदा करने वाले दरभंगा के महाराजाओं &#8211; लक्ष्मेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और डॉ सर कामेश्वर सिंह &#8211; के सम्मानार्थ तथा मिथिला की सांस्कृतिक गरिमा को पुनः बहाल करने के उद्देश्य से नीलांचल पहाड़ पर स्थित कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट में &#8220;मिथिला का एक प्रतिनिधि&#8221; हेतु एक विशेष पहल किया गया है। इस पहल को कामरूप कामाख्या के अधिकारी ने &#8220;वंडरफुल इनिसिएटिव&#8221; बताया और विश्वास दिलाया कि परिणाम &#8220;सकारात्मक&#8221; ही होगा।  </p>
<p>भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के गुमनाम क्रांतिकारियों के वंशजों की खोज कर रहे INDIANMARTYRS.IN नामक संस्था और दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डाक्टर सर कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित &#8216;दी इण्डियन नेशन और &#8216;आर्यावर्त&#8217; (अब मृत) अख़बारों के नामों को और महाराजाओं की गरिमा को पुनः स्थापित करने वाला वेबसाइट https://www.aryavartaindiannation.com  प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री हिमंता बिस्वा सर्मा और कामरूप कामाख्या के प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र भी लिखा है। </strong></p>
<p>कोई 40-पृष्ठ के दस्तावेजों के साथ लिखे गए पत्र में असम सरकार और कामरूप कामाख्या के अधिकारियों से निवेदन किया गया है कि नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर और उसके ऊपर भुनेश्वरी मंदिर में, आस-पास के इलाकों के विकास में दरभंगा के तत्कालीन महाराजा रामेश्वर सिंह और तत्पश्चाय्त उनके बड़े पुत्र महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह का योगदान आज भी जीवित है। इस बात का जिक्र करते कि असम और गौहाटी के लोग आज भी दरभंगा के महाराजाओं की उदारता को याद रखे हुए हैं, पत्र आगे लिखता है कि मिथिला के महाराजाओं और भारत में कोई चार करोड़ मैथिलों के सम्मानार्थ कामाख्या मंदिर ट्रस्ट में मिथिला से एक प्रतिनिधि को स्थान दिया जाय।    </p>
<p>पत्र में इस बात की भी चर्चा की गई है कि दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह, जो कामाख्या शक्तिपीठ के एक सिद्ध पुरुष भी थे, जिन्होंने भुनेश्वरी मंदिर के एक गेस्ट हॉउस भी बनाया था (आज उस पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्ज़ा है) की मृत्यु 1929 में हुई। महाराजा रामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह दरभंगा राज का बाग़-डोर संभाले। कामाख्या के विकास और असम के लोगों के विकास के लिए उनका भी योगदान अक्षुण रहा। डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु आज से कोई छः दशक पूर्व देश की आज़ादी के कोई 14 वर्ष बाद 1 अक्टूबर, 1962 को हुई।</p>
<figure id="attachment_3912" aria-describedby="caption-attachment-3912" style="width: 1000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya.jpeg" alt="" width="1000" height="1503" class="size-full wp-image-3912" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya.jpeg 1000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya-200x300.jpeg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya-681x1024.jpeg 681w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Kamakhya-768x1154.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3912" class="wp-caption-text">कामरूप कामाख्या मंदिर</figcaption></figure>
<p><strong>महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद दरभंगा राज में उनका अपना कोई रक्त-सम्बन्ध नहीं था, सिवाय उनकी पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के अलावे। महाराजाधीरज की तीन पत्नियां थी, लेकिन सभी संतानहीन रहीं।  उनकी मृत्यु के बाद उनके द्वारा बनाये गए वसीयत नामा और बाद में फेमिली सेटेलमेंट के तहत दरभंगा राज की सम्पत्तियाँ उनकी &#8220;विधवाओं&#8221; और उनके छोटे भाई राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के संतानों में विभक्त कर दिया गया। सम्पत्तियों की ओर सबों का रुझान इतना अधिक हो गया की दरभंगा राज की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक और अन्य क्षेत्रों की गरिमा क्रमशः मिट्टी पलीद होती चली गई।</strong> </p>
<p>पत्र में यह भी लिखा गया है कि चुकी महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी (विधवा) महारानी अधिरानी कामसुन्दरी भी अपने जीवन के 92 वें वसंत को पार कर चुकी हैं और ढलती उम्र तथा गिरते स्वास्थ्य के कारण वे अपने पति और ससुर की इक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ पा रही हैं। कोई चौदह वर्ष पूर्व सं 2008 के जून महीने में महारानी कामरूप कामाख्या मंदिर में स्वयं पूजा-अर्चना की थी और उस समय इस बात पर चर्चा की गई थी की मिथिला के लोगों के सम्मानार्थ, महाराजाओं के सम्मानार्थ कामरूप कामाख्या मंडित ट्रस्ट में मिथिला का एक प्रतिनिधि को स्थान मिले। </p>
<p>लेकिन दरभंगा राज के तरफ से, खासकर जो उनके पति की मृत्यु के बाद उनकी सम्पतियों के लाभार्थी हुए, किसी के तरफ से कोई यत्न नहीं किया गया। आज महारानी अधिरानी कामसुन्दरी का स्वास्थ्य बहुत बेहतर नहीं है। ईश्वर न करे, लेकिन प्रारब्ध और नियति को कौन टाल सकता है; महारानी अधिरानी अगर आँख बंद कर लेती हैं तो दरभंगा राज में दरभंगा के महाराजा के &#8220;प्रत्यक्ष रक्त सम्बन्ध&#8221; का मनुष्य का भी अंत हो जायेगा, साथ ही, वे अपने पति और ससुर की सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक गरिमा को बिना बहाल किये, पूरा किये इस लोक से प्रस्थान कर लेंगी, जो अच्छा संकेत नहीं होगा। </p>
<p><strong>पत्र में लिखा गया है: &#8220;आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम और इण्डियनमार्टियर्स(डॉट)इन का आपसे निवेदन है कामाख्या ट्रस्ट में स्थापना काल से महाराजा रामेश्वर सिंह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उनके पश्चयात महाराजा कामेश्वर सिंह भी सकारात्मक कार्य किये। लेकिन महाराजा की मृत्यु के बाद दरभंगा राज में ऐसा कोई &#8216;पुरुष&#8217; नहीं बचा जो दरभंगा राज की, महाराजाधिराज की गरिमा और संस्कृति को बचा सके। समयांतराल कामरूप कामाख्या में भी दरभंगा की भूमिका नगण्य होती गयी और लोगों के मानस पटल से मिथिला का नाम मिटने लगा, मिट गया। कामाख्या ट्रस्ट में दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह की भूमिका को मद्दे नजर, भुनेश्वरी मंदिर के निर्माण में उनकी भूमिका को ध्यान में रखकर, मिथिला के लोगों के सम्मानार्थ, दरभंगा राज के सम्मानार्थ &#8211; कामरूप कामाख्या ट्रस्ट में एक स्थायी स्थान दिया जाय। हम सबों का यह प्रयास सम्पूर्ण मिथिला के लिए बहुत प्रभावकारी होगा।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_3913" aria-describedby="caption-attachment-3913" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1.jpeg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-3913" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/kamakhya-temple-history-in-1280x720-1-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3913" class="wp-caption-text">कामरूप कामाख्या</figcaption></figure>
<p>दोनों संस्थाओं के इस पहल को &#8220;बेहतर&#8221; बताये हुए, कामरूप कामाख्या के अधिकारी ने कहा कि &#8220;यह एक अद्भुत, आश्चर्यजनक प्रयास है। इस दिशा में हम कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट के लोगों से बात कर इस विषय को अवश्य देखेंगे।&#8221; सूत्रों के अनुसार कामरूप कामाख्या के अधिकारियों और कामरूप प्रशासन शीघ्र ही कामाख्या मंदिर ट्रस्ट के चयनित पदाधिकारियों से ट्रस्ट में मिथिला (दरभंगा राज) के करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए &#8220;एक स्थान&#8221; हेतु वार्तालाप करेगी। कामाख्या मंदिर में दशकों पूर्व दरभंगा के महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह के योगदान को मद्दे नज़र मंदिर के ट्रस्ट में मिथिला/दरभंगा राज की और से एक प्रतिनिधि को उचित स्थान मिले; के लिए प्रदेश के राज्यपाल जगदीश मुखी से भी मिलने का कार्यक्रम है। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि दरभंगा के महाराजा सर लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु 122 वर्ष पहले हुयी। उनकी मृत्यु के उपरांत दरभंगा राज की गद्दी पर बैठने वाले उनके अनुज महाराजा सर रामेश्वर सिंह की मृत्यु भी करीब 91 वर्ष पहले हुई । तत्पश्चाय्त महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह को भी 59 वर्ष से अधिक जो गए इस पृथ्वी को छोड़े हुए। परन्तु 12 जून सं 1897 से लेकर आज तक महाराजा का वचन पूरा नहीं हो सका। हो भी कैसे? महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद तो दरभंगा राज की सम्पत्ति कौड़ी-जैसा लोगों ने लुटा – कुछ अपने, कुछ पराए – फिर शक्तिपीठ कामरूप कामाख्या मंदिर में दिए गए उस सम्मानित वचन को पूरा करने वाला शायद आज की पीढ़ी मेंकोई है अथवा नहीं, यह खरबों का प्रश्न है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्यादरभंगा राज की वर्तमान पीढ़ी मिथिलाञ्चल के लोगों की सांस्कृतिक अस्तित्व औरगरिमा बचा पायेगी जिसके लिए दरभंगा के महाराजाओं ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिए ? </p>
<p>कोई चौदह वर्ष पहले महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की पत्नी महरानी अधिरानी कामसुन्दरी देवी कामाख्या की यात्रा पर थीं। एक उत्सव था महारानी की यात्रा। उस  यात्रा के दौरान कामाख्या मंदिर अथवा नीलांचल पर्वत श्रंखला पर स्थित शायद ही कोई मनुष्य रहा होगा, जो उस उत्सव में शामिल नहीं हुआ होगा। कामाख्या मंदिर के सभी पण्डितगण महारानी की अगुआई किए थे। महारानी भी अपने पुरखों द्वारा संपन्न सभी कार्यों को देखीं। वे भुनेश्वरी मंदिर भी देखीं जहाँ उनके ससुर महाराजा रामेश्वर सिंह माँ काली की साधना करते थे । उस यात्रा के दौरान एक सवाल व्ही उठाया गया था कि “असम के इस कामरूप कामख्या मंदिर के अध्यक्ष थे उनके ससुर – महाराजा रामेश्वर सिंह और दरभंगा राज और महाराजाओं का इस मंदिर और आसपास के क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान – था, फिर कामाख्या मंदिर के ट्रस्ट में राज दरभंगा का एक स्थायी-सदस्य क्यों नहीं है? वैसे भी महाराजा रामेश्वर सिंह कामाख्या मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। लोगों ने महारानी साहेब के इस कथन का ह्रदय से स्वागत किया था, सर-आंखों पर लिया। </p>
<p>लेकिन फिर क्या हुआ? क्यों नहीं दरभंगा राज के वंशज इस दिशा में अग्रसर हुए? क्या राज दरभंगा की सदस्यता सिर्फ मिथिलाञ्चल के करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करता? क्या दरभंगा राज की आज  की पीढ़ियों में इतनी क्षमता नहीं है जो अपने पूर्वजों की संस्कृति-गरिमा को बचा सकें? अनंत सवाल है। </p>
<figure id="attachment_3914" aria-describedby="caption-attachment-3914" style="width: 872px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1.jpeg" alt="" width="872" height="543" class="size-full wp-image-3914" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1.jpeg 872w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1-300x187.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/1-768x478.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 872px) 100vw, 872px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3914" class="wp-caption-text">महाराजा रामेश्वर सिंह</figcaption></figure>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह का कामाख्या मंदिर में ऐतिहासिक योगदान है। सर हेनरी कॉटन के ज़माने में जब भयंकर भूकंप आया था, महाराजा रमेश्वर सिंह कामाख्या मंदिर, भुनेश्वरी मंदिर , आस-पास के क्षेत्रों का विकास किया था। असम में लाखों-लाख एकड़ जमीन दरभंगा राज का है। महाराजा रामेश्वर सिंह कामाख्या मंदिर के अध्यक्ष भी थे। दशकों पहले डॉ हेतुकर झा, जो महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन के संस्थापक-प्रबंधक ट्रस्टी थे, आवाज भी बुलंद किये की क्यों न कामाख्या मंदिर ट्रस्ट में राज दरभंगा का एक स्थायी सदस्य पुनः स्थापित किया जाय. साथ ही, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से दरभंगा महाराजाओं की कीर्तियों को बरकरार कर पुनः स्थापित करे। </p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य है। शिक्षित मनुष्य अथवा जो आज ही नहीं, आने वाले समय में भी शिक्षा के महत्व को समझेगा, वही दरभंगा राज या महाराजा श्री लक्ष्मेश्वर सिंह से लेकर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह तक के ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से इन तथ्यों को समझेगा, बचाने का प्रयास करेगा। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज के समय में सम्पूर्णता के साथ शिक्षा और सोच का नामोनिशान ख़त्म हो गया है, ख़त्म हो रहा ही। राज दरभंगा के महाराजा की कीर्तियाँ मिट्टी में मिल गई हैं। सबों की निगाहें अंततः उनकी संपत्तियों पर जा टिकी है, फिर आप क्या उम्मीद करते हैं कि महाराजा, महाराजाधिराज या महारानीजी की सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक इत्यादि क्षेत्रों में जो योगदान हैं – वह बच पायेगा ? कभी नहीं। </p>
<p>जब महाराजा रमेश्वर सिंह अपने मानवीय-धार्मिक-राजनीतिक कार्यों के उत्कर्ष पर थे उसी समय सर हेनरी कॉटन भारत के असम के तत्कालीन चीफ़ कमीशनर से प्रभार लेकर असम के नए कमीश्नर बन गए थे। इन राज्यों में 12 जून, 1897 को भूकंप आया था। इस भूकंप और उसके बाद महाराजा रमेश्वर सिंह का योगदान ‘स्वर्णाक्षरों” में लिखने योग्य है।  लेकिन लिखेगा कौन? यहाँ तो सभी सोने के पीछे भाग रहे हैं। </p>
<p>टाईम्स ऑफ़ इण्डिया ने एक बेहतरीन सम्पादकीय भी लिखा था उन दिनों जो इस बात का गवाह है कि तत्कालीन महाराजा दरभंगा श्री रामेश्वर सिंह जी और उनके पूर्व उनके अग्रज महाराजा श्री लक्ष्मेश्वर सिंह न केवल अपने सल्तनत के लोगों के लिए चिंतित रहते थे, बल्कि देश की सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा के विकास और आर्थिक उन्नति के लिए भी उतने ही संवेदनशील थे। उनके ह्रदय में अपने परिवार और परिजनों के प्रति सकारात्मक विचार प्रति-पल उद्वलित होते थे। लेकिन आज और आज की पीढ़ी अपने पूर्वजों के उस सम्मान को, उस संवेदना को, बरकरार रखी ? असम के लोग कहते हैं – नहीं। </p>
<figure id="attachment_3915" aria-describedby="caption-attachment-3915" style="width: 594px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2.jpeg" alt="" width="594" height="1024" class="size-full wp-image-3915" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2.jpeg 594w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/2-174x300.jpeg 174w" sizes="auto, (max-width: 594px) 100vw, 594px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3915" class="wp-caption-text">उन दिनों लिखा गया टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का सम्पादकीय</figcaption></figure>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह, दरभंगा, मिथिला एक असाधारण देवी रहस्य के जानकार और साधक तथा देवी रहस्य के विज्ञान और तकनीकी के प्रतिपादक  थे। उनकी दिनचर्या था कि वे 2 बजे पूर्वाहन में उठकर बिछावन पर हीं दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ पूर्ण करने के उपरांत 3.30 बजे स्नान करने के बाद संध्या वंदन और सहस्त्र गायत्री जप तदुपरांत एक मन चावल से पिण्ड दान, फिर ब्रह्म मुहूर्त में पार्थिव शिवलिंग की पूजा के बाद देवी भगवती के मंदिर के लिए प्रस्थान करते थे, वहां तांत्रिक विधि से तंत्र  संध्या, पात्रस्थापन के बाद भगवती  काली की उपासना आवरण पूजा, जप, पञ्चांग पाठ और उसके बाद पुष्पांजलि के साथ ककरदी  सहस्त्रनाम उसके बाद कुमारी, सुवासिनी, बटुक का पूजन तर्पण और महा प्रसाद लेने के बाद एक घंटा आराम के बाद 11 बजे से 3.30 बजे तक राजकाज  देखते थे । </p>
<p>उसके बाद स्नान करने के बाद  वैदिक संध्या वंदन और गयात्री जप और प्रदोष समय के अन्तराल में पार्थिव पूजा संपन्न करते थे l रात्रि में वे सांगोपांग निशार्चन, 108 ब्राह्मण सामूहिक रूप से दुर्गा सप्तसती का पाठ और 51 ब्राह्मण से  रुद्राभिषेक संपन्न कराते थे । महाराजा अपनी पूरी जीवन महानुष्ठान में परिवर्तित कर दिये थे l वे काफी पढ़े लिखे और महान विद्वान थे l अंग्रेजी, फ्रेंच, बंगाली,  मैथिलि, हिंदी, संस्कृत, फारसी  के विशेषज्ञ थे l वे तंत्र विज्ञान के मास्टर के साथ वेदान्त, सांख्य योग . व्याकरण के अच्छे जानकार थे।” </p>
<p>12 जून, 1897 उत्तर-पूर्व भारत में आये भूकंप के बाद जिस सम्मान के साथ दरभंगा राज के महाराजाओं ने गौहाटी के ऐतिहासिक कामाख्या मंदिर का जीर्णोद्धार किये, जिस तरह नीलांचल पर्वत पर स्थित भुनेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार किये, उसी नीलांचल पर्वत श्रृंखला पर ऐतिहासिक आठ-कमरों का आवास बनाये, कामाख्या संस्था को दरभंगा की मिट्टी रहते मंदिर  और उसके आस-पास के क्षेत्रों का विकास करने के प्रति वचनबद्धता दिखाए, जिस तरह कामाख्या संस्था के तत्कालीन पंडितों से लेकर अधिकारियों तक दरभंगा राज के एक सदस्य को कामाख्या ट्रस्ट में आजीवन-सदस्यता हेतु वचनबद्धता दिखाए – आज तक किसी ने चूं तक नहीं किये। </p>
<p>परिणाम: असम राज्य में महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह से लेकर महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह तक अर्जित लाखों-लाख एकड़ भूमि और अन्य सम्पत्तियाँ न केवल मिथिलांचल से प्रवासित लोगों ने अधिपत्य जमा लिए। इतना ही नहीं भुनेश्वरी मंदिर के पास नीलांचल पर्वत पर बना वह पुरात्तव जैसा आवासीय महल पर भी कब्ज़ा है। कामाख्या के स्थानीय लोगों का कहना है कि उस भवन में कोई व्यक्ति विगत पांच दसक से भी अधिक समय से रह रहे हैं। इस दिशा में न तो कभी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट अथवा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाऊंडेशन द्वारा पहल किया गया। </p>
<p>टाईम्स ऑफ़ इण्डिया का यहसम्पादकीय महाराजा सर रामेश्वर सिंह की कामाख्या यात्रा के साथ-साथ स्थानीय लोगोंकी शिकायतों के निवारण के इर्द-गिर्द लिखा गया है। इस लेख से यह भी स्पष्ट है किकैसे महाराजा रामेश्वर सिंह अपने बड़े भाई महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह के कार्यों कीभूरी-भूरी प्रसंशा किये थे; बल्कि इस बात को भी स्पष्ट लिखा है कि वे सामाजिककार्यों में, स्थानीय लोगों के कल्याणार्थ, अपने बड़े भाई के पदचिन्हों पर ही चलेंगे।यह भी उद्धृत किया है कि कैसे महाराजा साहेब ने तत्कालीन असम के कमिश्नर द्वाराकिये गए कार्यों की प्रशंसा किये हैं। साथ ही, तत्कालीन हुकूमत और व्यवस्था मेंदरभंगा राज की पकड़ के कारण लोगों को विस्वास दिलाये की वे स्थानीय लोगों केकल्याणार्थ वह सभी कार्य निष्पादित करेंगे, जो बड़े भाई करते थे। साथ ही, यह भीविस्वास दिलाया की उनकी बातों को व्यवस्था कभी भी ठुकराएगी नहीं</p>
<p>अपने बड़े भ्राता के मृत्यु के उपरान्त वे सन 1898 में  महाराजा बने और जीवन पर्यन्त महाराजा रहे। वे भारतीय सिविल सेवा में भर्ती हुए थे और दरभंगा, छपरा तथा भागलपुर में सहायक मजिस्ट्रेट भी रहे। लेफ्टिनेंट गवर्नर की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले वे पहले भारतीय थे। वह 1899 में भारत के गवर्नर जनरल की भारत परिषद के सदस्य थे और 21 सितंबर 1904 को एक गैर-सरकारी सदस्य नियुक्त किये गए थे जो बम्बई प्रान्त के गोपाल कृष्ण गोखले के साथ बंगाल प्रांतों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।</p>
<p>वे बिहार लैंडहोल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष, ऑल इंडिया लैंडहोल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष, भारत धर्म महामंडल के अध्यक्ष, राज्य परिषद के सदस्य, कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल के ट्रस्टी, हिंदू विश्वविद्यालय सोसायटी के अध्यक्ष, एम.ई.सी. बिहार और उड़ीसा के सदस्य और भारतीय पुलिस आयोग के सदस्य(1902–03) थें। उन्हें 1900 में कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया गया था। वे भारत पुलिस आयोग के एकमात्र सदस्य थे, जिन्होंने पुलिस सेवा के लिए आवश्यकताओं पर एक रिपोर्ट के साथ असंतोष किया, और सुझाव दिया कि भारतीय पुलिस सेवा में भर्ती एक ही परीक्षा के माध्यम से होनी चाहिए। केवल भारत और ब्रिटेन में एक साथ आयोजित किया जाएगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भर्ती रंग या राष्ट्रीयता पर आधारित नहीं होनी चाहिए। इस सुझाव को भारतीय पुलिस आयोग ने अस्वीकार कर दिया। </p>
<p>उन्हें 26 जून 1902 को नाइट कमांडर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एंपायर (KCIE) के नाम से जाना गया, 1915की बर्थडे ऑनर्स लिस्ट में एक नाइट ग्रैंड कमांडर (GCIE) में पदोन्नत किया गया और उन्हें नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का नाइट कमांडर नियुक्त किया गया, 1918 बर्थडे ऑनर्स लिस्ट में सिविल डिवीजन (KBE) में। </p>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह जिनके चिता पर दरभंगा (मिथिला ) में श्यामा काली की भव्य मूर्ति स्थापित है, भारत के महान साधक थे l  वे असम के कामाख्या मंदिर के प्रेसिडेंट थे और असम में  हुए1898 के भूकंप से हुए क्षतिग्रस्त मंदिर का निर्माण कराये थे। वे एक उदार राजा थे जरूरतमंद को मदद करते थे । उनकी अदम्य इच्छा थी कि  तंत्र के वैज्ञानिक  पहलू को लोग समक्षे । इसी निमित 1908 में उन्होंने तंत्र के सभी प्रमुख विद्वानों का कांफ्रेंस दरभंगा में आयोजित किये थे जिसमे विद्वान ब्राह्मण, महान साधक और वैज्ञानिक उपस्थित हुए थे । </p>
<p>वैधनाथ धाम के पंडित प्रकाश नन्द झा, काशी के पंडित शिवचरण भट्टाचार्य, श्रीविद्या साधक पंडित सुब्रमन्यम शास्त्री, जॉन वुडरोफ्फ़ अगम अनुसंधान समिति कोलकाता के प्रेसिडेंट प्रमुख थे। वह जॉन वुड रुफ्फ़ थे जिन्हें तंत्र ज्ञान और रहस्य को पश्चिमी जगत को रूबरू कराने का श्रेय जाता है उनके साथ इवान स्टीवेंसन, ब्रिटेन के महान चिकित्सक और वैज्ञानिक जिनका नाम विलियम होप्किंसों भी आये थे। इस अवसर पर महाराजा रमेश्वर सिंह के मित्र पटियाला के महाराज भूपेंद्र सिंह भी आये थे । वे भी देवी शक्ति  के बड़े साधक हो गये थे । महाराजा  स्वंय अपने मेहमान को नजदीक के स्थान भगवती उग्रतारा पीठ, महिषी ले गये थे । </p>
<p>तीन- चार दिनों के इस भ्रमण में विदेशी विद्वानों ने तंत्र साधना के वैज्ञानिक सत्य को आत्मसात करना प्रारम्भ कर दिया था। इसलिए आज प्रातः इस विशेष सम्मेलन का प्रारम्भ हुआ तो वे भी उत्साहपूर्वक भागीदारी कर रहे थे। इसकी अध्यक्षता का भार पं. शिवचन्द्र भट्टाचार्य पर था, जिन्होंने स्वयं महाराज को तन्त्र साधना के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन दिया था। इसी के साथ वह जॉन वुडरफ के भी दीक्षा गुरु थे। महाराज जी की प्रेरणा से ही सर जॉन वुडरफ ने पण्डित शिवचन्द्र भट्टाचार्यसे शक्ति साधना की दीक्षा ली थी। वह कह रहे थे- तन्त्र दरअसल सृष्टि के विराट अस्तित्त्व में एवं व्यक्ति के स्वयं के व्यक्तित्व में प्रवाहित विविध ऊर्जा प्रवाहों के अध्ययन- अनुसन्धान एवं इनके सार्थक सदुपयोग का विज्ञान है। तंत्र मानता है कि जीवन एवं सृष्टि का हर कण शक्ति से स्पन्दित एवं ऊर्जस्वित है। यह बात अलग है कि कहीं यह शक्ति प्रवाह सुप्त है तो कहीं जाग्रत्। इस शक्ति की अभिव्यक्ति यूं तो अनन्त रूपों में है, पर इसकी मूलतः दशमहाधाराएँ हैं, जिन्हें दश महाविद्या कहा जाता है। </p>
<figure id="attachment_3916" aria-describedby="caption-attachment-3916" style="width: 775px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3.jpeg" alt="" width="775" height="450" class="size-full wp-image-3916" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3.jpeg 775w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3-300x174.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/3-768x446.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 775px) 100vw, 775px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3916" class="wp-caption-text">उन दिनों लिखा गया टाइम्स ऑफ़ इण्डिया</figcaption></figure>
<p>पं. शिवचन्द्र भट्टाचार्य तन्त्र के मूलभूत वैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित कर रहे थे। वे बता रहे थे कि विराट् ब्रह्माण्ड में प्रवाहित ये शक्ति प्रवाह व्यक्ति में प्राण प्रवाह के रूप में प्रवाहित हैं। ब्रह्माण्ड में इन्हीं प्रवाहों से सृष्टि सृजन हुआ है। इसी के साथ उन्होंने निवेदन किया कि व्यक्ति में प्राण प्रवाह के रूप में प्रवाहित इन शक्ति धाराओं का स्वरूप विवेचन महाराज रमेश्वर  सिंह करेंगे एवं ब्रह्माण्ड व्यापी इनके स्वरूप की विवेचना स्वयं महापण्डित सुब्रह्मण्यम् शास्त्री करेंगे। आचार्य शिवचन्द्र के इस निर्देश को थोड़ा संकोचपूर्वक स्वीकारते हुए महाराज उठे। उनका भरा हुआ गोल चेहरा, रौबदारमूँछे, औसत कद, गेहुँआ रंग, माथे पर श्वेत भस्म का ऊर्ध्व तिलक उन्हें भव्य बना रहे थे।  </p>
<p>उन्होंने कहना प्रारम्भ किया- योग शास्त्र में वर्णित पाँच प्राण एवं पाँच उपप्राण ही दरअसल व्यक्ति के अस्तित्त्व में व्याप्त दश महाविद्याएँ हैं, जो व्यक्ति को विराट् से जोड़ती हैं। इनमेंआदिविद्या महाकाली एवं तारा अपान एवं इसके उपप्राण कूर्म के रूप में जननेन्द्रिय में वास करती हैं। षोडशी एवं भुवनेश्वरी प्राण एवं इसके उपप्राण नाग के रूप में हृदय में स्थित है। भैरवी एवंछिन्नमस्ता उदान एवं देवदत्त के रूप में कण्ठ स्थान में निवास करतीहैं। धूमावती एवं बगलामुखीसमान एवं कृकल के रूप में नाभिप्रदेश में स्थित हैं। मातंगी एवं कमला व्यान एवं धनञ्जय के रूप मेंमस्तिष्क में अवस्थित हैं। ऐसा कहकर महाराज थोड़ा रूके और बोले- मैंने महामायाके इन रूपों का स्वयं में इसी तरह से साक्षात्कार किया है। </p>
<p>महाराज के अनुभव परक ज्ञान ने सभी को विमुग्ध किया। आचार्य शिवचन्द्र का संकेत पाकर महाराज के बैठने के पश्चात् महापण्डित सुब्रह्मण्यम् शास्त्री उठे। इन्होंने अभी कुछ वर्षों पूर्व महाराज रमेश्वर  सिंह को तन्त्र साधना की साम्राज्य मेधा नाम की विशिष्ट दीक्षा दी थी। उनका स्वर ओजस्वी था, उन्होंने गम्भीर वाणी में कहना प्रारम्भ किया- इस अखिल ब्रह्माण्ड में आदिविद्यामहाकाली शक्ति रात्रि १२ से सूर्योदय तक विशेष सक्रिय रहती हैं। ये आदि महाविद्या हैं, इनके भैरव महाकाल हैं और इनकी उपासना महारात्रि में होती है। </p>
<p>महाविद्या तारा के भैरव अक्षोम्य पुरुष हैं, इनकी विशेष क्रियाशीलता का समय सूर्योदय है एवं इनकी उपासना का विशेष समय क्रोधरात्रि है। षोडशी जो श्रीविद्या है, इनके भैरव पञ्चमुख शिव हैं। इनकी क्रियाशीलता का समय प्रातःकाल की शान्ति में है। इनकी उपासना काल दिव्य रात्रि है। चौथी महाविद्या भुवनेश्वरी के भैरव त्र्यम्बकशिवहैं। सूर्य का उदय काल उनकी सक्रियता काल है। इनकी उपासना सिद्धरात्रि में होती है। पाँचवीमहाविद्या भैरवी है इनके भैरव दक्षिणामूर्ति हैं। इनका सक्रियता काल सूर्योदय के पश्चात् है। इनकी उपासना कालरात्रि में होती है छठवी महाविद्या छिन्नमस्ता है, इनके भैरव कबन्धशिव हैं। मध्याह्न सूर्य का समय उनकी सक्रियता काल है, इनकी उपासना काल वीर रात्रि है। </p>
<p>धूमावती सातवीं महाविद्या हैं, इनके भैरव अघोर रूद्र हैं। मध्याह्न के पश्चात् इनका सक्रियता काल है एवं उनकी उपासना दारूण रात्रि में की जाती है। बगलामुखी आठवी महाविद्या हैं, इनके भैरव एक वक्त्र महारुद्र हैं। इनकी सक्रियता का समय सायं हैं। उनकी उपासना वीर रात्रि में होती है। मातंगी नौवीं महाविद्या है, उनके भैरव मतंग शिव हैं। रात्रि का प्रथम प्रहर इनका सक्रियता काल है। इनकी उपासना मोहरात्रि में होती है। भगवती कमला दशम महाविद्या है। इनके महाभैरव सदाशिव हैं, रात्रि का द्वितीय प्रहर इनका सक्रियता काल है। इनकी उपासना महारात्रि में की जाती है। इन दस महाविद्याओं से ही सृष्टि का व्यापक सृजन हुआ है। इसलिए ये सृष्टि विद्या भी हैं। </p>
<p>इसी के साथ महाराज द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में तन्त्रविज्ञान की व्यापक परिचर्चा होते- होते सांझ हो आयी। महाराज की विशेष अनुमति लेकर उनकी सायं साधना के समय जॉन वुडरफ के साथ आए वैज्ञानिकों ने महाराज का विभिन्न यंत्रों से परीक्षण किया। इस परीक्षण के बाद उन्हें आश्चर्यपूर्वक कहना पड़ा- कि तन्त्र साधक में प्राण विद्युत् एवं जैव चुम्बकत्व सामान्य व्यक्ति की तुलना में आश्चर्यजनक ढंग से अधिक होता है। उनके इस कथन पर महाराज रामेश्वर  सिंह हँसते हुए बोले- दरअसल यह दृश्य के साथ अदृश्य के संयोग के कारण है। इसका वैज्ञानिक अध्ययन ज्योतिर्विज्ञान के अन्तर्गत होता है।बहरहाल, कामाख्या का यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। </p>
<p>यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है। इसका महत् तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है। देश भर मे अनेकों सिद्ध स्थान है जहाँ माता सुक्ष्म स्वरूप मे निवास करती है प्रमुख महाशक्तिपीठों मे माता कामाख्या का यह मंदिर सुशोभित है हिंगलाज की भवानी, कांगड़ा की ज्वालामुखी, सहारनपुर की शाकम्भरी देवी, विन्ध्याचल की विन्ध्यावासिनी देवी आदि महान शक्तिपीठ श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र एवं तंत्र- मंत्र, योग-साधना के सिद्ध स्थान है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/mithilas-representation-in-kamrup-kamakhya-trust">आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम का एक प्रयास: &#8216;कामरूप कामाख्या मंदिर ट्रस्ट&#8217; में &#8216;मिथिला का प्रतिनिधित्व&#8217; हो, अधिकारी ने कहा: &#8220;वंडरफुल इनिसिएटिव&#8221; </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/mithilas-representation-in-kamrup-kamakhya-trust/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारत के &#8216;शैक्षिक-दर&#8217; आकंड़े के &#8220;शेष 25 फ़ीसदी अज्ञानी, अनपढ़ लोग&#8221; भी इन ढ़हती दीवारों को देखकर &#8216;अश्रुपात&#8217; है; दीवारें &#8220;मालिकों को ढूंढ रहा है&#8221;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/crumbling-empire-of-darbhanga-raaj-2</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/crumbling-empire-of-darbhanga-raaj-2#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Mar 2022 07:24:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पुरातत्व]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[boundrywall]]></category>
		<category><![CDATA[crumbling]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[empire]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[kameshwarsingh]]></category>
		<category><![CDATA[maharaja]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3894</guid>

					<description><![CDATA[<p>दरभंगा: भारत की सम्पूर्ण आवादी का कोई 25 फीसदी लोग अज्ञानी, अनपढ़ हैं। यह भारत सरकार का शिक्षित-दर का आकंड़ा है। इस आंकड़े के अधीन रहने वाले लोग भी इस ढ़हती, टूटती दीवारों को देखकर इसके वर्तमान स्वामी की &#8220;मानसिक स्थिति के प्रति संवेदना&#8221; व्यक्त करता होगा। उन पच्चीस फ़ीसदी आवाम को जब यह मालूम होगा कि [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/crumbling-empire-of-darbhanga-raaj-2">भारत के &#8216;शैक्षिक-दर&#8217; आकंड़े के &#8220;शेष 25 फ़ीसदी अज्ञानी, अनपढ़ लोग&#8221; भी इन ढ़हती दीवारों को देखकर &#8216;अश्रुपात&#8217; है; दीवारें &#8220;मालिकों को ढूंढ रहा है&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा: भारत की सम्पूर्ण आवादी का कोई 25 फीसदी लोग अज्ञानी, अनपढ़ हैं। यह भारत सरकार का शिक्षित-दर का आकंड़ा है। इस आंकड़े के अधीन रहने वाले लोग भी इस ढ़हती, टूटती दीवारों को देखकर इसके वर्तमान स्वामी की &#8220;मानसिक स्थिति के प्रति संवेदना&#8221; व्यक्त करता होगा। उन पच्चीस फ़ीसदी आवाम को जब यह मालूम होगा कि इस गगनचुम्बी दीवार को दिल्ली के लाल किले के तर्ज पर मिथिला नरेश और दरभंगा के अंतिम राजा महराजधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह ने आज से कोई अठ्ठासी वर्ष पूर्व मिथिला और अपने राज की गरिमा को मूर्तिवान किया था, इस बिलखती दीवारों को देखकर वह भी चीत्कार मारने लगेगा। अगर वह आवाम नेत्रों से दिव्यांग होगा, फिर भी दीवारों की ईंटों के नीचे दबी मिट्टियों को सूंघकर यह निर्णय दे सकता है कि दरभंगा राज की वर्तमान पीढ़ी, जो इन सम्पत्तियों का मालिक है; कितना &#8216;मानवीय&#8217; हैं &#8216;निर्जीवों&#8217; के लिए। </strong></p>
<p>बहरहाल, दरभंगा राज रेसिडुअरी इस्टेट और महाराजाधिराज डॉ कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों में आप मिथिलावासी कुमार कपिलेश्वर सिंह को कहीं देखे हैं? कुमार कपिलेश्वर सिंह कुमार शुभेश्वर सिंह के छोटे पुत्र हैं। कुमार शुभेश्वर सिंह महाराजाधिराज के अनुज राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के सबसे छोटे पुत्र थे। कुमार कपिलेश्वर सिंह दरभंगा के लाल किले के मुख्य प्रवेश द्वार के साथ किले की सुरक्षा-व्यवस्था हेतु चतुर्दिक बने तालाब के उस पार दाहिने हाथ वाले कोठी में रहते हैं &#8211; अब नजर नहीं आ रहे हैं। </p>
<p><strong>रामबाग ही नहीं, दरभंगा शहर में लोगों के बीच चर्चाएं आम है कि जीएम रोड बंगला नंबर-4 में हुए हादसे के बाद से &#8220;सिंह साहब&#8221; कहीं दृष्टिगोचित नहीं हो रहे हैं, जिससे कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट अथवा दरभंगा राज रेसिडुअरी एस्टेट के तहत होने वाले सभी कार्य वाधित हैं &#8211; यह दीवार गवाह है। उनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाने वाले चाटुकार, सलाहकार भी आजकल दिख नहीं रहे हैं। चर्चाएं यह भी है कि &#8220;सिंह साहब&#8221; दिल्ली स्थित अपने &#8220;फ्लैट&#8221; में भी दृष्टिगोचित नहीं हैं । अफवाह यह भी है कि वे अपने बड़े भाई कुमार राजेश्वर सिंह के पास अमेरिका चले गए हैं।</strong></p>
<p>दरभंगा के रामबाग के लोगों में एक पक्ष का कहना है कि अगर वे भारत के किसी कोने में होते तो इस गिरती, ढ़हती दीवारों से रूबरू होने अवश्य आते या फिर अपने किसी चापलूसों, चाटुकारों को देखने अवश्य भेजते। जबकि दूसरे पक्ष के लोग कहते हैं कि अगर उन्हें महाराजाधिराज की परम्पराओं, दरभंगा राज की गरिमा और संस्कृति की चिंता होती तो शायद दरभंगा का यह हाल नहीं होता। इस कोठी में कुमार शुभेश्वर सिंह रहते थे। उनकी मृत्यु के बाद आज उनका छोटा पुत्र कपिलेश्वर सिंह दरभंगा प्रवास के दौरान  &#8216;सपरिवार&#8217; रहते हैं &#8211; यदा-कदा। महाराजाधिराज के वसीयत के हिसाब से रामबाग फोर्ट का मालिक वे दोनों भाई ही है।</p>
<p>कहा जाता है कि सन 1934 के भयानक भूकंप-त्रादसी के बाद मुगलिया सल्तनत के लाल किले के तर्ज पर ब्रिटिश फर्म के ठेकेदार बैग कैगटीम की देखरेख में 85 एकड़ की जमीन पर इस किले का निर्माण किया था। आज उस ऐतिहासिक किले की गगनचुम्बी दीवारों पर पीपल-बरगद जैसे जीवों ने अपना अधिपत्य जमा लिया है। ऐसा लगता है जैसे महाराजाधिराज के ह्रदय को चिड़ते-फाड़ते ये बृक्ष आकाश की ओर उन्मुख हो रहे हैं, उनसे मिलने के लिए । रामबाग परिसर के लोगों का यह भी कहना है कि इन दृश्यों को देखकर महाराजाधिराज की आत्मा कलपती होगी, बिलखती होगी, तड़पती होगी, दुखी होगी, विलाप करती होगी, आँहें भरती होगी &#8211; लेकिन इसे देखने वाला कोई नहीं है। </p>
<p>दरभंगा के रामबाग पैलेस के मुख्य द्वार पर दरभंगा राज के पूर्व के 20 महाराजाओं की &#8216;ना&#8217; &#8216;सही,  महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की आत्मा बिलखती अवश्य होगी। सोचती होगी कि जिस परिसर में कल तक अनुशासन अपनी पराकाष्ठा पर थी, रास्ता &#8216;खास&#8217; था &#8211; आज &#8216;आम&#8217; कैसे हो गया। रास्ते टूट गए।  पुल घँस गए। दीवारें फांक-फांक हो गए। पीपल के पेड़,  बरगद के बृक्षों ने दरभंगा किले के चारो तरफ दीवारों में छेद दिया। अपनी जड़ें मजबूत करने में लग गया। यह बात सिर्फ पेड़-पौधों के साथ नहीं, बल्कि महाराजा के शरीर को पार्थिव होने के बाद उस चारदीवारी के अंदर कुछ अपने, कुछ दूर-दराज के सम्बधी, सभी अपना-अपना ठिकाना उन्हीं बृक्षों की भांति बना लिए । महाराज की पत्नी महारानी राज्यलक्ष्मी की मृत्यु के बाद इस परिसर का स्वामित्व जिनके हाथों आया उनसे दरभंगा राज की, महाराज की, संस्कृति की, पुरातत्व की, घरोहर की सुरक्षा और संरक्षित रहने की बात सोचा नहीं जा सकता। तस्वीरें गवाह हैं। </p>
<figure id="attachment_3896" aria-describedby="caption-attachment-3896" style="width: 720px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/44b47712-b7ef-4032-9115-8b855e916822.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/44b47712-b7ef-4032-9115-8b855e916822.jpg" alt="" width="720" height="1600" class="size-full wp-image-3896" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/44b47712-b7ef-4032-9115-8b855e916822.jpg 720w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/44b47712-b7ef-4032-9115-8b855e916822-135x300.jpg 135w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/44b47712-b7ef-4032-9115-8b855e916822-461x1024.jpg 461w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/44b47712-b7ef-4032-9115-8b855e916822-691x1536.jpg 691w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3896" class="wp-caption-text">यह दीवार गवाह है दरभंगा राज ढह रहा है,पुरातत्व बचाने में सामर्थहीन है वर्तमान पीढ़ी</figcaption></figure>
<p>इस किले के तीन तरफ लगभग 90 फ़ीट ऊंची यह दीवार तैयार की गयी। तीन तरफ तो दीवार बन गई, चौथी तरफ, यानी, पश्चिम इलाके में यह दीवार नहीं बन सका । कुछ लोग कहते हैं कि तीन तरफ दीवार बनते-बनते देश आज़ाद हो गया, जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई, इसलिए पश्चिमी दीवार अछूता रह गया। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि इस किले के पश्चिम इलाके में रहने वाले लोगों शिकायत की कि इस दीवार से उनके घरों में आने वाली रोशनी अवरुद्ध हो गयी है। सभी न्यायालय से न्याय मांगे और और फिर अदालत ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी। खैर।</p>
<p>इस किले में लाल ईंटों का प्रयोग किया गया | इसका डिज़ाइन फतेहपुर, सिकरी के बुलंद दरवाज़ा से प्रेरित है | इस किले के अंदर दो महल हैं। ऐसा माना जाता है कि राज परिवार की “कुल देवता” यहीं हैं । विगत कई भूकम्पों के दौरान महल नष्ट हो गया। लालकिला कई जगहों से दरक गया। लेकिन तब इसकी मरम्मत का कोई काम नहीं हुआ। फिर 2015 के तेज भूकंप में कई जगहों पर न सिर्फ छतिग्रस्त हुआ बल्कि किले के ऊपरी हिस्से का मलबा सड़को पर भी गिर था। किले की मरम्मत नहीं होने से किला लगातार जर्जर हाल होता जा रहा है। कई जगहों पर 10 से 20 फ़ीट तक ऊंची दीवारों में दरार साफ दिखाई दे रही है। दीवार के दक्षिण इलाके में 90 फ़ीट की दीवार घट कर 20-25 फ़ीट ही रह गई है। </p>
<p>महाराजाधिराज का कोई संतान नहीं था। उनके भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के तीन पुत्र थे – (1) राजकुमार जीवेश्वर सिंह, (2) राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह। वैसे आज महाराजाधिराज की तीसरी पत्नी और राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह की पत्नी को छोड़कर, उस पीढ़ी के सभी महिला-पुरुष मृत्यु को प्राप्त किये। कहते हैं कि महाराजाधिराज वसीयत लिखे जाने के समय इन तीनों भाइयों में राजकुमार जीवेश्वर सिंह ‘बालिग’ हो गए थे और उनका विवाह श्रीमती राज किशोरी जी के साथ संपन्न हो गया था। शेष दो भाई – राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह नाबालिग थे। समयांतराल, राजकुमार जीवेश्वर सिंह प्रथम पत्नी के होते हुए भी, दूसरी शादी भी किए। कुमार जीवेश्वर सिंह के दोनों पत्नियों से सात बेटियां – कात्यायनी देवी, दिब्यायानी देवी, नेत्रायणी देवी, चेतना दाई, द्रौपदी दाई, अनीता दाई, सुनीता दाई – हुई । जीवेश्वर सिंह को दोनों पत्नियों से पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। किसी भी अन्य सदस्यों की तुलना में जीवेश्वर सिंह अधिक विद्वान थे, काफी शिक्षित थे और महाराजाधिराज के समय-काल में दुनिया देखे थे। दरभंगा राज के लोग उन्हें “युवराज” भी कहते थे। कुमार यज्ञेश्वर सिंह के तीन बेटे थे – कुमार रत्नेश्वर सिंह, कुमार रश्मेश्वर सिंह और कुमार राजनेश्वर सिंह। इसमें कुमार रश्मेश्वर सिंह की मृत्यु हो गई थी। </p>
<p>अगर दस्तावेजों को माने तो महाराजाधिराज के इस ऐतिहासिक किले का क्षेत्रफल में उत्तरोत्तर कमी हो रही है। किले की दक्षिण दीवार की ऊंचाई में भी क्रमशः कम हो रही है। महाराजा की जब मृत्यु हुई उसके बाद, उनके उत्तराधिकारियों ने कई महलों के भूखंड को  बेचना शुरू कर दिया था । उन प्लॉटों को खरीदने वाले लोगों ने कॉलोनियों और घरों का निर्माण किया। तो कही, होटल, रेस्तरां और दुकानों को खोला गया |  सवाल यह है कि रामबाग परिसर में पैसे के लिए जमीन बिकेगी, भवन निर्माण होगा तो जमीन के क्रेता/भवन निर्माण कर्ता तो भवन निर्माण सामग्री लाएंगे ही। दूकान ही खोल दिए। पिछले कुछ सालों में एक बड़ी आबादी बस गई है। आप कुछ कर सकते नहीं। बेचारे महाराजाधिराज की आत्मा भी रामबाग परिसर में कराहती होगी।</p>
<p>महाराजाधिराज अपने जीते-जी अपनी वसीयत में लिखे थे: &#8220;शिड्यूल &#8216;A&#8217; में वर्णित संपत्ति उनकी पत्नी महारानी राज्यलक्ष्मी को उनके जीवंत पर्यन्त रहने के लिए दिया जाता है। वे इस महल का रहने के अतिरिक्त किसी और ने उद्देश्य में नहीं करेंगी। वे इस भवन में रह सकती हैं, यहाँ के सभी फर्नीचरों और अन्य सुख-सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकती हैं। कोई भी व्यक्ति उनके इस कार्य में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं कर सकता है। जब उनकी मृत्यु हो जाएगी तब यह संपत्ति हमारे सबसे छोटे भतीजे राजकुमार शुभेश्वर सिंह को सम्पूर्णता के साथ चली जाएगी।&#8221; शिड्यूल &#8216;A&#8217; में रामबाग यानि दरभंगा राज फोर्ट के अंदर वाला विशालकाय भवन है। यानि महारानी राज्यलक्ष्मी की मृत्यु के बाद यह संपत्ति राजकुमार शुभेश्वर सिंह की हो जाएगी। महारानी राजलक्ष्मी की मृत्यु सन 1976 में, यानी महाराजाधिराज की मृत्यु के 14 वर्ष बाद हुई और कुमार शुभेश्वर सिंह भी अब इस दुनिया में नहीं रहे।</p>
<p>महाराजाधिराज के वसीयत के शिड्यूल ‘A’ और ‘B’ में उद्धृत सम्पत्तियाँ, यानी महारानी राजलक्ष्मी और महारानी कामसुंदरी को जीवन पर्यन्त रहने के लिए जिन भवनों को महाराज बहुत “स्नेह” और “प्रेम” से लिखा था, ताकि उन्हें महाराज के बिना भी, अपनी अंतिम सांस तक “तकलीफ” नहीं हो; महाराजा की मृत्यु के बाद विगत छः दशकों से उन महलों की दीवारें, महलों की ईंट, बरामदे, खम्भे, छत, परिसर सभी टकटकी निगाहों से सूर्य की रोशनी में प्रत्येक आवक-जावक जीव को देखता आ रहा है, सोचता आ रहा है – कोई उसका भी हाल पूछे !! बारिस में बादलों की गर्जन के साथ भवनों के एक-एक ईंटों के रूह काँप जाते हैं। सभी डर से थर-थर कांपते हैं। परन्तु कोई नहीं आता, कोई नहीं पूछता। चतुर्दिक ‘उपेक्षाओं के पेड़-पौधे, घास-फूस कुकुरमुत्तों जैसा फ़ैल गया है। सूर्य की किरण फटते भवनों के छत-खंभे-दीवारें आपस में गुफ्तगू करना प्रारम्भ कर देते हैं, दुःख-दर्द बांटते हैं और सूर्यास्त होने के साथ ही, सभी एक-दूसरे को हताश निगाहों से देखते पृथक हो जाते हैं। उन्हें तो यह भी ज्ञात नहीं होता कि अगले दिन वे एक-दूसरे से मिल पाएंगे अथवा नहीं ? वे सोचते रहते हैं कहीं महाराजाधिराज की तरह “आकस्मिक रूप से” वे भी अपनी भव्यता को सुबह-सवेरे जमीन पर असहाय और पार्थिव अवस्था में तो पड़ा नहीं पाएंगे ।</p>
<figure id="attachment_3897" aria-describedby="caption-attachment-3897" style="width: 720px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/51177373-db8b-4894-a68a-2a991538209d.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/51177373-db8b-4894-a68a-2a991538209d.jpg" alt="" width="720" height="1600" class="size-full wp-image-3897" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/51177373-db8b-4894-a68a-2a991538209d.jpg 720w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/51177373-db8b-4894-a68a-2a991538209d-135x300.jpg 135w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/51177373-db8b-4894-a68a-2a991538209d-461x1024.jpg 461w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/51177373-db8b-4894-a68a-2a991538209d-691x1536.jpg 691w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3897" class="wp-caption-text">हे महाराज!!!!! कहाँ चले गए</figcaption></figure>
<p>दिनांक 5 जुलाई, 1961 को “दि लास्ट विल एंड टेस्टामेंट” में दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपना वसीयत बनाते समय वसीयत के आठवें पैरा में लिखा है: &#8220;I, bequeath the property mentioned in Schedule &#8220;A&#8221; to my wife Maharani Rajyalakshmi for her life for her residence (and for no other purposes). She shall be entitled to reside in the said house and use the furniture and fittings only without let or hindrance by anybody. After her demise the said property shall vest in my youngest nephew Rajkumar Subheshawra Singh absolutely.&#8220; और महारानी राज्यलक्ष्मी अपने पति और दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज की मृत्यु के 16-वर्ष बाद अंतिम सांस ली। दस्तावेज के अनुसार उक्त संपत्ति महाराजाधिराज के छोटे भतीजे कुमार शुभेश्वर सिंह का हो गया “अब्सॉल्युटली” – आगे कुमार शुभेश्वर सिंह भी मृत्यु को प्राप्त किये। स्वाभाविक है यह संपत्ति उनके दो पुत्रों को हस्तगत हुआ होगा। </p>
<p>साथ ही, महाराजधिराज वसीयत के 11वें पारा में ऐसा क्यों लिखा की उनकी दोनों पत्नियों की मृत्यु के बाद संपत्ति का एक-तिहाई हिस्सा उनके सबसे छोटे भतीजे, राजकुमार शुभेश्वर सिंह के “हिन्दू ब्राह्मण समुदाय” की पत्नी द्वारा उत्पन्न बच्चों का होगा, यह तो महाराजाधिराज की आत्मा ही जानती होगी। यह सच है कि वसीयत बनाते समय राजकुमार शुभेश्वर सिंह “नाबालिग” थे। परन्तु, दो बड़े महारथियों के द्वारा शब्दों का चयन, लेखनी और फिर हस्ताक्षर इस बात का गवाह जरूर है कि  महाराजाधिराज को बात का अंदेशा अवश्य था कि उनकी मृत्यु के बाद दरभंगा राज का अस्तित्व खतरे में पड़ेगा। इस बात से भी सशंकित रहे होंगे कि दरभंगा राज परिवार के पुरुष आने वाले समय में अपनी जाति और संप्रदाय से बाहर भी विवाह कर सकता है, विशेषकर तब जब राज परिसर में &#8216;अभिभावक और अनुशाशन&#8217; की किल्लत हो जाएगी। उस पीढ़ी को बिना किसी मेहनत और मसक्कत से संपत्ति का विशाल पहाड़ मिल जायेगा। महाराजाधिराज &#8216;लक्ष्मण रेखा&#8217; तो खींचे, परन्तु अगली पीढ़ी में &#8220;लक्ष्मणजी&#8221; ख़ुद रेखा को लांघ दिए। यानी, दरभंगा राज की संस्कृति का विराम हो गया यहाँ। </p>
<p>शिड्यूल ‘A’ में रामबाग यानि दरभंगा राज फोर्ट के अंदर वाला विशालकाय भवन है। यानि महारानी राज्यलक्ष्मी की मृत्यु के बाद यह संपत्ति राजकुमार शुभेश्वर सिंह की हो जाएगी। महारानी राजलक्ष्मी की मृत्यु सन 1976 में, यानी महाराजाधिराज की मृत्यु के 14 वर्ष बाद हुई। शिड्यूल ‘’B’ में नरगौना पैलेस, इससे लगे गार्डन जिसके उत्तर में कंपाउंड वाल है, दक्षिण में सड़क है जो महाबीर मार्बल मंदिर के तरफ जाती है। महाराजाधिराज और महारानी राजलक्ष्मी की तरह, कुमार शुभेश्वर सिंह भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। महाराज की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को हुई और कुमार शुभेश्वर सिंह उनके हिस्से आई आर्यावर्त-इण्डियन नेशन समाचार पत्रों की अंतिम सांस लेने के कोई दो वर्ष बाद 2004 में हुयी। महाराज द्वारा नियुक्त तीनो ट्रस्टीगण भी मृत्यु को प्राप्त किये। </p>
<p>आपको याद भी होगा कि नब्बे के दशक के उत्तरार्ध कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति  विशेश्वर नाथ खरे और उनके सहयोगी न्यायमूर्तियों के समक्ष सिविल प्रोसेड्यूर कोड के सेक्शन 90 और आदेश 36 के तहत, सन 1963 के प्रोबेट प्रोसीडिंग्स संख्या 18 के तहत, दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह बहादुर के वसीयत नामा के अधीन नियुक्त ट्रस्टियों के द्वारा इण्डियन ट्रस्ट एक्ट के सेक्शन 34, 37, 39, 60 और 74 के अधीन एक याचिका से निवेदन किए थे कि उन्हें  रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टीशिप से “मुक्त” किया जाय। लक्ष्मी कांत झा उक्त कार्य को सम्पन्न करते हुए 3 मार्च, 1978 को मृत्यु को प्राप्त करते हैं। </p>
<figure id="attachment_3898" aria-describedby="caption-attachment-3898" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-3898" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2057-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3898" class="wp-caption-text">रामबाग का प्रवेश द्वार</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने 1977-78 में इस किले का सर्वेक्षण भी कराया था। बिहार सरकार द्वारा बिहार के एन्सिएंट मोनुमेंट्स एंड आर्किओलॉजिकल साईट्स के अधीन दरभंगा के रामबाग पैलेस को एन्सिएंट मोन्यूमेंट की श्रेणी में रखने से पूर्व लोगों से उनका विचार, ऑब्जेक्शन मांगी थी कि दरभंगा राज फोर्ट को क्यों नहीं &#8220;बिहार एन्सिएंट मोनुमेंट्स एंड आर्किओलॉजिकल साईट्स रिमेंस&#8221; के अधीन ले लिया जाय। ऑब्जेक्शन मांगने के पीछे लोगों का विचार आमंत्रित करना था, ताकि विभाग और सरकार इस दिशा में समुचित कार्रवाई कर सके। यदि किसी को इस दिशा में आपत्ति होगी, स्वाभाविक है, उनके विचार को भी विभाग और सरकार बहुत ही प्राथमिकता से अध्ययन और जांच करेगी ताकि निर्णय लेने में सरकार के तरफ से कोई चूक या भूल नहीं हो जाय । जैसे ही लोगों से आपत्ति मांगने से संबंधित सूचना के प्रकाशन के साथ ही दरभंगा राज फोर्ट में रहने वाले लोगों में खलबली मच गई। कला, संस्कृति और युवा विभाग, बिहार सरकार के सचिव, विभाग के उप-सचिव, पुरातत्व विभाग के निदेशक, अधीक्षक (पटना अंचल), दरभंगा के जिला मजिस्ट्रेट, सब-डिविजनल अधिकारी और अंचल अधिकारी प्रतिवादी बन गए। </p>
<p>वादी का कहना था कि नियमानुसार उसी स्थान / भवनों को उक्त नियमों के तहत ‘एन्सिएंट मोनुमेंट्स’ के रूप में नहीं माना जा सकता है जो न्यूनतम 100-वर्ष पूरे नहीं किये हों। और नियमानुसार, दरभंगा राज फोर्ट 100 वर्ष की आयु के नहीं हैं, अतः नियमनुसार यह ‘एन्सिएंट मोनुमेंट्स’ के रूप में नहीं माना जा सकता। नियमों के अनुसार, कोई भी ऐसी चीज जो 100 साल या इससे अधिक पुरानी हो तो वह ‘पुरातात्विक’ है। इस ऐतिहासिक निर्णय का श्रेय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के एंटीक्वटीज एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1972 को जाता है। यह कानून 1976 से लागू हुआ। इसका मकसद भारतीय सांस्कृतिक विरासत की बहुमूल्य वस्तुओं की लूट और उन्हें गैर-कानूनी माध्यमों से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाना था। वैसे, इसके सिर्फ नकारात्मक और अनपेक्षित परिणामों का अतिरेक ही सामने आया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह कानून इतने कड़े और अभावग्रस्त नियमों से भरा हुआ है कि बेईमान ‘कला के सौदागर’ सरकारी अधिकारियों और कस्टम अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अपना रास्ता निकाल ही लेते है। बहरहाल, मई 4, 2015 को पटना उच्च न्यायालय दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के रामबाग पैलेस से सम्बंधित एक याचिका को रद्द दिया । </p>
<p>अधिनियम के अनुच्छेद 2(1) (अ) के अनुसार कोई भी ऐसी चीज जो &#8216;ऐतिहासिक महत्व&#8217; की हो या 100 साल या इससे अधिक पुरानी हो तो वह &#8216;पुरातात्विक&#8217; है। और हर किसी को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास ऐसी प्रत्येक वस्तु का पंजीकरण कराना और उसके चित्र खिंचवाना अनिवार्य होता है फिर भले ही चाहे वह कोई व्यक्ति हो, कोई संगठन हो या कोई संस्थान (उदाहरण के तौर पर कोई मंदिर) । कानून का अनुच्छेद 11 पुरावशेषों और कलाकृतियों के आयात, निर्यात और देश के भीतर भी एक जगह से दूसरी जगह लाने-ले जाने को नियंत्रित करता है और किसी भी व्यक्ति के ऐसा करने पर प्रतिबंध लगाता है। ऐसा करने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार या उसकी किसी एजेंसी को होता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करना चाहे तो उसे (यदि वस्तु काे देश के भीतर ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है) इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी. यदि उस वस्तु का आयात या निर्यात किया जाना है तो विदेश व्यापार के महानिदेशक एवं कस्टम विभाग से अनुमति लेनी होगी। बहरहाल, इस नियम में अनेकानेक खामियों के मद्दे नजर, पूर्व केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के समय में कानून मंत्रालय के एक सेवानिवृत्त सचिव को काम सौंपा कि वे इस कानून की सभी खामियों को दूर करने, सुधार के उपायाें और नए सिरे से कानून बनाने पर प्रस्ताव बनाये जाए। हालांकि, सेवानिवृत्त न्यायाधीश मुकुल मुदगल समिति ने इस कानून में सुधार के लिए अपनी रिपोर्ट के रूप में 2012 में प्रस्तावित उपायों का जो चिट्ठा सौंपा था। </p>
<p>अदालत का मानना था कि नियम के सेक्शन 3 (1) के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह ऐसी स्थिति में किसी भी प्रकार की सूचना जारी करें। इन बातों का कोई महत्व नहीं है की किस नियम के किस सेक्शन, सब-सेक्शन के तहत क्या लिखा है। यह महज लोगों से आपत्ति लेने सम्बन्धी सूचना है। अदालत का कहना था कि अगर वादी पक्ष यह मानता है कि दरभंगा राज फोर्ट की आयु 100 वर्ष नहीं हुई है, और इसे किसी भी कानून के तहत एन्सिएंट मोनुमेंट्स&#8217; की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है तो उन्हें स्वतंत्रता है कि वे इस सम्बन्ध में अपना सम्पूर्ण विचार, आपत्ति, सम्बद्ध विभाग के अधिकारी के पास प्रस्तुत करें। अदालत यह भी स्वीकार किया कि उस समय इस मामले में अदालत का हस्तक्षेप ठीक नहीं होगा। और इस तरह वादी राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह द्वारा दायर याचिका निरस्त हो जाता है।  </p>
<figure id="attachment_3899" aria-describedby="caption-attachment-3899" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-3899" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/IMG_2068-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3899" class="wp-caption-text">रामबाग का प्रवेश द्वार</figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य हो की कुछ समय पूर्व रामबाग परिसर के प्रवेश के साथ बाहरी दीवार और किले के अंदर प्रवेश करने के द्वार के बीच बना ऐतिहासिक 86-वर्ष का वृद्ध पुल अपनी रख-रखाव, इस विशाल परिसर के स्वामित्व रखने वाले की उपेक्षा के कारण आंशिक रूप से मृत्यु को प्राप्त करता है, ध्वस्त हो जाता है। कहते हैं  कभी दरभंगा राज परिवार के लोग इसी पुल से एक किले से दूसरे किले जाते थे। यह भी एक धरोहर ही था। ध्वस्त हो भी क्यों नहीं? देखते ही देखते कभी &#8220;खास&#8221; रास्ता &#8220;आम&#8221; हो गया। </p>
<p>कहा जाता है कि दरभंगा राज लगभग 2410 वर्ग मील में फैला था, जिसमें कोई 4495 गाँव थे, बिहार और बंगाल के कोई 18 सर्किल सम्मिलित थे। दरभंगा राज में लगभग 7500 कर्मचारी कार्य करते थे। आज़ादी के बाद जब भारत में जमींदारी प्रथा समाप्त हुआ, उस समय यह देश का सबसे बड़ा जमींदार थे। इसे सांस्कृतिक शहर भी कहा जाता है। लोक-चित्रकला, संगीत, अनेकानेक विद्याएं या क्षेत्र की पूंजी थी। आज भवन की कीमत जो भी आँका जाय, इस सम्पूर्ण क्षेत्र यानी दरभंगा के ह्रदय में स्थित 85 एकड़ भूमि की व्यावसायिक कीमत क्या होगी, यह आम आदमी नहीं सोच सकता है। वजह भी है : सरकारी आंकड़े के अनुसार &#8220;दरभंगा के लोगों का प्रतिव्यक्ति आय 15, 870/- रूपया आँका गया है और इतनी आय वाले लोग लाख, करोड़, अरब, खरब रुपयों के बारे में सोच भी नहीं सकते। वह जीवन पर्यन्त उस राशि पर कितने &#8220;शून्य&#8221; होंगे, सोचते जीवन समाप्त कर लेगा। परन्तु सोच नहीं पायेगा। </p>
<p>अनेकानेक लेख प्रकाशित हैं इस किले के बारे में । किले की दीवारों का निर्माण लाल ईंटों से हुई है | इसकी दीवार एक किलोमीटर लम्बी  है | किले के मुख्य द्वार जिसे सिंहद्वार कहा जाता है पर वास्तुकला से दुर्लभ दृश्य उकेड़े गयें है | किले के भीतर दीवार के चारों ओर खाई का भी निर्माण किया गया था। उस वक्त खाई में बराबर पानी भरा रहता था। कहा जाता है कि महाराजा महेश ठाकुर के द्वारा स्थापित एक दुर्लभ कंकाली मंदिर भी इसी किले के अंदर स्थित है। कहा जाय है कि महाराजा महेश ठाकुर को देवी कंकाली की मूर्ति यमुना में स्नान करते समय मिली थी | प्रतिमा को उन्होंने लाकर रामबाग के किले में स्थापित किया था। यह मंदिर राज परिवार की कुल देवी के मन्दिर से भिन्न है और आज भी लगातार श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। किले के अंदर दो महल भी स्थित हैं | सन 1970 के भूकम्प में किले की पश्चिमी दीवार क्षतिग्रस्त हो गयी , इसके साथ ही दो पैलेस में से एक पैलेस भी आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गयी | इसी महल में राज परिवार की कुल देवी भी स्थित हैं | यह महल आम लोगों के दर्शनार्थ हेतु नहीं खोले गए हैं|वैसे दुखद बात यह है की दरभंगा महाराज की यह स्मृति है अब रख – रखाव के अभाव में एक खंडहर में तब्दील हो रहा है | शहर की पहचान के रूप में जाने वाले इस किले की वास्तुकारी पर फ़तेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाजे की झलक मिलती है |</p>
<p>बहरहाल, दरभंगा के लोगों का मानना है कि दरभंगा राज की नींव क्रमशः कमजोर हो रही है। उनके पुरखों का उदाहरण देकर जिस दरभंगा राज की गरिमा की, यहाँ के राजा-महाराजाओं की वर्चस्व की चर्चाएं की जाती थी, आज समय के गर्त में धूमिल हो गई है। आज दरभंगा राज की गरिमा समाप्त हो गयी है। लेकिन वे स्वयं में इतना सामर्थ नहीं जुटा पा रहे हैं कि वे दरभंगा राज की गरिमा को पुनः स्थापित कर सकें। उनका मानना है कि इस ऐतिहासिक राज की गरिमा को पुनः स्थापित करने के लिए सबसे अधिक आवश्यक है राज परिवार के लोगों के बीच, विशेषकर पुरुषों के बीच, सामंजस्य का होना, जिसकी किल्लत है। प्रत्येक बात का निदान कचहरी में नहीं हो सकता। राज दरभंगा के लोगों का मानना है कि आज भी वैसे समस्याएं कुछ भी नहीं है, परन्तु जब सभी बातों की पहली और अंतिम छोड़ संपत्ति और अधिपत्य से निकलती है, स्वाभाविक है समस्याएं उत्पन्न होंगी ही। फिर भी, ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका निदान आपसी भाईचारे, बातचीत, सामंजस्य, सोच-विचार से नहीं हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन्ही चीजों की किल्लत है दरभंगा के लाल-किला के अंदर।  </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/crumbling-empire-of-darbhanga-raaj-2">भारत के &#8216;शैक्षिक-दर&#8217; आकंड़े के &#8220;शेष 25 फ़ीसदी अज्ञानी, अनपढ़ लोग&#8221; भी इन ढ़हती दीवारों को देखकर &#8216;अश्रुपात&#8217; है; दीवारें &#8220;मालिकों को ढूंढ रहा है&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/crumbling-empire-of-darbhanga-raaj-2/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दरभंगा: जीएम रोड-4: बाजार मूल्य Vs अंतिम देय मूल्य, क्रेता-विक्रेता का गुंडागर्दी, कलकत्ता उच्च न्यायालय का &#8216;अवमानना&#8217; (भाग-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/darbhanga-gm-road-muder-case</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/darbhanga-gm-road-muder-case#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Feb 2022 12:36:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhangaraaj]]></category>
		<category><![CDATA[gmroad]]></category>
		<category><![CDATA[kapileshwarsingh]]></category>
		<category><![CDATA[muder]]></category>
		<category><![CDATA[rajeshwarsingh]]></category>
		<category><![CDATA[sisters]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3825</guid>

					<description><![CDATA[<p>कलकत्ता / दरभंगा : नब्बे के दशक के उत्तरार्ध रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने भारत के सर्वोच्च न्यायलय सहित कलकत्ता उच्च न्यायालय को लिखित याचना देकर न्यायालय से गुहार किये थे कि उन्हें  रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्टसे कार्यमुक्त [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/darbhanga-gm-road-muder-case">दरभंगा: जीएम रोड-4: बाजार मूल्य Vs अंतिम देय मूल्य, क्रेता-विक्रेता का गुंडागर्दी, कलकत्ता उच्च न्यायालय का &#8216;अवमानना&#8217; (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता / दरभंगा : नब्बे के दशक के उत्तरार्ध रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने भारत के सर्वोच्च न्यायलय सहित कलकत्ता उच्च न्यायालय को लिखित याचना देकर न्यायालय से गुहार किये थे कि उन्हें  रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्टसे कार्यमुक्त कर दिया जाय। उन्होंने कहा कि जीवन के अंतिम वसंत में वे &#8216;बेइज्जत&#8217; नहीं होना चाहते हैं। याचकों ने कचहरी को कहा था कि चुकी इस सम्पूर्ण कार्य में अनेकानेक लोगों का &#8216;स्वार्थ&#8217; निहित है, अतः बढ़ती उम्र और ढ़लती स्वास्थ्य के मद्दे नजर, वे अपने कार्य को निष्पादित करने में असहाय हैं, नहीं कर सकते हैं। अतः वे न्यायालय से निवेदन किये कि उन्हें &#8216;मुक्ति&#8217; दिया जाय और सम्पूर्ण कार्य को निष्पादित करने के लिए न्यायालय एक प्रशासक की नियुक्ति कर दे । </strong> </p>
<p>तीन दशक, बाद उसी कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेष अधिकारियों का अवमानना करते हुए, दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह द्वारा अर्जित संपत्ति को लेकर, उसी दरभंगा राज की भूमि पर कुछ ऐसे कारनामे हुए हैं, जो न केवल निरीह लोगों की जान लिया, बल्कि कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त तीन विशेष अधिकारियों का &#8220;खुलेआम, सार्वजनिक रूप से अवमानना&#8221; भी किया। माँ के गर्भ में पल रहे आठ-माह के नौनिहाल के साथ-साथ उसकी माँ और मामा दोनों मृत्यु को प्राप्त किये। </p>
<p><strong>वजह: 30.20 डिसमल (13155. 13 वर्ग फुट या 9.66 कट्ठा) जमीन और उसमें बना घर और स्थान था 4-जी एम रोड। इंटरनेट पर उपलब्ध डाटा के अनुसार 4-जीएम रोड पर जिस जमीन और जमीन पर बने स्ट्रक्चर के कारण घटना हुई है; वह जमीन के साथ स्ट्रक्चर 28,720,800 रुपये में बेची गई है। इस जमीन और स्ट्रक्चर को बेचने वाले कुमार कपिलेश्वर सिंह और कुमार राजेश्वर सिंह हैं। ये दोनों दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के अनुज राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के छोटे पुत्र दिवंगत कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र-द्वय हैं। विडंबना यह है कि उस जमीन और स्ट्रक्चर में रहने वाला परिवार और कोई नहीं, बल्कि सिंह-भाइयों की माँ की अपनी छोटी बहन, यानी अपनी मौसी और उसके बच्चे थे। शायद उस कमजोर परिवार से उन्हें भय था कि वह उस जमीन को, उस संपत्ति को, जो बाज़ार में कई करोड़ का है, हड़प न ले। </strong></p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से बात करते हुए दरभंगा के पूर्व सांसद और युवा नेता <strong>कीर्ति झा &#8216;आज़ाद&#8217;</strong> दरभंगा राज की वर्त्तमान पीढ़ियों के वंशजों के क्रिया-कलापों से क्षुब्ध है। कीर्ति आज़ाद कहते हैं: &#8220;दरभंगा राज की मिट्टी को विगत दिनों की घटना कलंकित कर दिया। महाराजाधिराज जिस दरभंगा राज को, यहाँ की मिट्टी को अपने पसीने से सींचा था, अपनी सोच से पाला-पोसा था, यहाँ के लोगों को सुरक्षा और संरक्षण दिया था; आज उन्ही के परिवार के लोग दरभंगा की मिट्टी को लहू-लहुआन कर रहे हैं। विधि द्वारा स्थापित सम्पूर्ण पद्धति का अवमानना कर रहे हैं। चतुर्दिक चाटुकार, चापलूसों का जमघट है। यह समझ पाना मुश्किल है कि आखिर उनके सिपा-सलाहकार कौन हैं? गुंडा-गर्दी से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि निरीह, कमजोर और अपनों की जान जाती है, बस। और दरभंगा के जीएम रोड-4 के बंगला में ऐसा ही हुआ। &#8221;</p>
<p>कीर्ति झा &#8216;आज़ाद&#8217; कहते हैं: &#8220;यह एक अमानुषिक घटना है। संपत्ति की खरीद-बिक्री क़ानूनी तौर पर किसी भी हालत में गलत नहीं है। लेकिन जिस तरह से इस संपत्ति पर क्रेता अपना अधिकार ज़माने की कोशिश किया है, जिस तरह से विक्रेता संपत्ति को बेचा है; स्पष्ट रूप से कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेशों का अवमानना है। क्रेता और विक्रेता में आपसी क्या बातचीत हुई, किस परिस्थिति में वह उस जमीन और स्ट्रक्चर को ख़रीदा गया या बेचा बेचा, यह पूर्ण रूप से अन्वेषण का विषय है। लेकिन इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि विक्रेता को उस स्थान/मकान में रहने वाले परिवार को क़ानूनी रूप से लिखित सूचना देनी चाहिए था। उन्हें यह स्पष्ट कर देना चाहिए था कि वे उस प्रॉपर्टी को बेच रहे हैं क्योंकि उस पर उनका ही अधिकार है। अपने अधिवक्ता के माध्यम से भी सूचित कर सकते थे। चुकी उस स्थान पर रहने वाला परिवार कोई और नहीं बल्कि उनकी अपनी मौसी-मौसा-भाई-बहन थे, अतः मानवता और मानवीयता भी यही कहता है कि वे व्यक्तिगत रूप से इस समस्या का समाधान कर लेते। लेकिन जहाँ तक मुझे जानकारी है, ऐसा नहीं हुआ।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3827" aria-describedby="caption-attachment-3827" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/645f9ead-9aa1-4bbc-a49b-df1e2195246e.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/645f9ead-9aa1-4bbc-a49b-df1e2195246e.jpg" alt="" width="1280" height="605" class="size-full wp-image-3827" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/645f9ead-9aa1-4bbc-a49b-df1e2195246e.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/645f9ead-9aa1-4bbc-a49b-df1e2195246e-300x142.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/645f9ead-9aa1-4bbc-a49b-df1e2195246e-1024x484.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/645f9ead-9aa1-4bbc-a49b-df1e2195246e-768x363.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3827" class="wp-caption-text">घटना स्थल के आस-पास का दृश्य</figcaption></figure>
<p>कीर्ति आज़ाद आगे कहते हैं: &#8220;बात करने से भारत-पाकिस्तान की समस्या, अमेरिका-रूस की समस्या, जर्मनी-जापान की समस्या या यूँ कहें की विश्व की किसी भी आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक, वैचारिक समस्याओं का समाधान होता आया है, होता रहेगा। लेकिन जहाँ तक मैं जानता हूँ, दरभंगा के जीएम रोड &#8211; 4 के बंगले में ऐसा नहीं हुआ। यहाँ तक कि क्रेता के तरफ से भी आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई पहल नहीं हुई। प्रॉपर्टी खरीदने से पहले क्रेता यह भी कह सकता था कि उसे उस स्थान पर रहने वाले लोगों को खाली करवा दे। अगर आपसी सुलह से संभव नहीं था, तो स्थानीय प्रशासन, पुलिस की मदद से इस कार्य को संपन्न किया जा सकता था। अगर दरभंगा प्रशासन से नहीं हो पाता तो आगे प्रशासन की श्रृंखला है। लेकिन स्थानीय प्रशासन की चुप्पी, उसकी निष्क्रियता, उसकी शिथिलता, क्रेता &#8211; विक्रेता का भूमिगत हो जाना, प्रशासन की ओर से किसी भी प्रकार की सकारात्मक पहल नहीं करना और अंत में एक परिवार के तीन सदस्यों का मृत्यु को प्राप्त करना &#8211; सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था को, सम्पूर्ण न्यायिक व्यवस्था को, सम्पूर्ण मानवीयता को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। न्याय तो मिलना ही चाहिए उस परिवार को।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3828" aria-describedby="caption-attachment-3828" style="width: 1024px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/MithilaConnect.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/MithilaConnect.jpeg" alt="" width="1024" height="575" class="size-full wp-image-3828" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/MithilaConnect.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/MithilaConnect-300x168.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/MithilaConnect-768x431.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3828" class="wp-caption-text">दरभंगा समाहरणालय &#8211; लोगों का विश्वास जीतना होगा।  तस्वीर मिथिला कनेक्टस के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>बहरहाल, अगर <strong>http://bhumijankari.bihar.gov.in/BiharPortal/Admin/AdvSearch/AdvSearch.aspx </strong>पर दी गई जानकारी को सही माना जाय, जहाँ संपत्ति की खरीद-बिक्री की जानकारी उपलब्ध है, तो &#8220;टोकन नंबर 12429 के तहत बुक नंबर &#8211; 1 के सीरियल नंबर 12171 और निबंधन संख्या 2017 के अधिक 13350 संख्या का डीड फाइल हुआ था। यह डीड दिनांक 23 अगस्त, 2017 को फाइल किया गया और उसी तारीख को DSRO /SRO दरभंगा को पेश भी किया गया। पेश करने वाले थे राजकुमार गंज, थाना &#8211; टाऊन, दरभंगा के निवासी नवो नारायण झा के पुत्र शिव कुमार झा। इस दस्तावेज में पार्टी के बारे में जो विवरण दिया गया है उसमें इस डीड के एक्सेक्युटेंट थे रामबाग पैलेस,  थाना-ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा निवासी राज कुमार शुभेश्वर सिंह (ये जीवित हैं अथवा मृत इसका विवरण इस साईट पर नहीं लिखा गया है) के पुत्र कपिलेश्वर सिंह। </p>
<p><strong>इस डीड के दो क्लेमण्ट हैं। पहला रामबाग़ पैलेस, थाना ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के राजेश्वर सिंह (पीओए) और दूसरे क्लेमण्ट हैं राजकुमार गंज, थाना-टाउन, दरभंगा निवासी नवो नारायण झा के पुत्र शिव कुमार झा। मिथिला में एक कहावत है &#8220;हड़बड़ी में वियाह आ कनपट्टी में सिंदूर&#8221; &#8211; इस डीड में भी कुछ ऐसा ही हुआ है अगर इंटरनेट पर अंकित जानकारी को माना जाय। &#8216;क्लेमण्ट &#8211; 1&#8217; में राजेश्वर सिंह का नाम है, साथ ही, उन्हें रामबाग पैलेस का निवासी बताया गया है। लेकिन उनके पिता का नाम भी &#8216;राजेश्वर सिंह&#8217; लिखा गया है। और तहकीकात के दौरान रामबाग पैलेस परिसर में ऐसा कोई भी राजेश्वर सिंह नहीं मिले, जिनके पिता का नाम भी राजेश्वर सिंह ही हो।</strong> </p>
<figure id="attachment_3829" aria-describedby="caption-attachment-3829" style="width: 1314px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2.jpg" alt="" width="1314" height="779" class="size-full wp-image-3829" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2.jpg 1314w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2-1024x607.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2-768x455.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1314px) 100vw, 1314px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3829" class="wp-caption-text">http://bhumijankari.bihar.gov.in/BiharPortal/Admin/AdvSearch/AdvSearch.aspx पर दी गई जानकारी</figcaption></figure>
<p><strong>जहाँ तक प्रॉपर्टी के बारे में अंकित विवरण का सवाल है, इंटरनेट पर लिखा है कि &#8216;स्ट्रक्चर के साथ इस भूमि की खरीद/निबंधन हुई है जो DSRO /SRO दरभंगा, सर्किल-दरभंगा अर्बन, थाना &#8211; सैफूल्लाहगंज, स्थानीय निकाय &#8211; नगर निगम के अधीन आती है। भूमि टाइप में आवासीय (मेन रोड) लिखा हैं। जानकारी में इस बात को भी लिखा गया है कि इस संपत्ति का मार्केट मूल्य: 810000 रुपये हैं और इसे 28720800/- रुपये फ़ाइनल मूल्य पर ख़रीदा/निबंधित किया गया है। इस प्रॉपर्टी खाता संख्या n/a है। इसका प्लाट नंबर &#8211; 644 है। जमीन और स्ट्रक्चर के साथ कुल 30.20 डिस्मिल एरिया में यह प्रॉपर्टी है। विवरण में यह भी लिखा गया है कि इस प्रॉपर्टी के पूर्व दिशा में आशु दत्त झा और अन्य रहते हैं। पश्चिम दिशा में रंजू मिश्र रहते हैं। उत्तर दिशा में प्लाट नंबर &#8211; 9521 है जो खाली स्थान है और दक्षिण दिशा में रोड है। इस विवरण के नीचे &#8220;डिपार्टमेंट ऑफ़ रजिस्ट्रेशन एक्साइज और प्रोहिबिशन बिहार सरकार&#8221; लिखा है।</strong></p>
<figure id="attachment_3830" aria-describedby="caption-attachment-3830" style="width: 1303px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2A.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2A.jpg" alt="" width="1303" height="543" class="size-full wp-image-3830" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2A.jpg 1303w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2A-300x125.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2A-1024x427.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/Story-2A-768x320.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1303px) 100vw, 1303px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3830" class="wp-caption-text">(बहरहाल, इस कहानी को अपलोड करने के समय अनेकानेक बार कोशिश करने के बावजूद वेबसाइट नहीं खुला और कुछ ऐसा दिखा मिला ) </figcaption></figure>
<p>खैर, नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में राज दरभंगा के इतिहास में शायद यह पहली घटना होगी जब 84-वर्षीय, 72-वर्षीय और 69-वर्षीय वृद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर उससे विनती किया हो कि उन्हें कार्य मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त किया जाय, कार्यमुक्त किया जाय । याचिका में लिखा है: “It is submitted that the applicants are being harassed unnecessarily by the various quarters having vested interest. They are also being confronted with various problems. The applicants further submitted that due to their old age, falling health and other difficulties they are not in a position to continue to function as Trustees. It is the sincere desire of the applicants that they may be relieved of the responsibilities of the office of the Trustees of the Residuary Estate of Maharaja of Darbhanga and also of the Charitable Trust.”</p>
<p>याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय से अनुरोध की कि ढलती उम्र और गिरती स्वास्थ्य के कारण वे सभी अब इस अवस्था में नहीं हैं की इस पद पर कार्य कर सकें। स्वाभाविक है कि इन ट्रस्टियों ने न्यायालय से अनुरोध किये कि उन्हें रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभनगा और चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी के पदों से मुक्त कर दिया जाय। यह भी कहा गया कि याचिका कर्ताओं ने न्यायालय द्वारा अनुशंसित सभी कार्यों के बहुत ही दक्षता के साथ, साथ ही जितनी भी बाकी-बकियौता था, उनमे अधिकांश को पूरा कर दिए हैं। याचिका दायर करने के दिन द्वारकानाथ झा की आयु 72 वर्ष थी, जबकि मदन मोहन मिश्र और कामनाथ झा क्रमशः 84 और 69 वर्ष के थे। याचिका में इस बात का उल्लेख किया गया कि द्वारकानाथ झा एक बार ह्रदय रोग से पीड़ित हो चुके हैं। </p>
<p>साथ ही, मदन मोहन झा भी शरीर से अधिक अस्वस्थ रहते हैं और प्रबंधन का कार्य नियमित रूप से नहीं कर सकते हैं। जहाँ तक कि उनकी शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे याचिका पर अपना हस्ताक्षर भी कर सकें । द्वारकानाथ झा दरभंगा इस्टेट को विगत 30 वर्ष से देख-रेख कर रहे हैं। अतः, सभी ट्रस्टियों ने यह निर्णय लिए की रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और चेरिटेबल ट्रस्ट का कार्यभार न्यायालय द्वारा नियुक्त “प्रशासक” को सौंप दिया जाय। वैसे भारत का सर्वोच्च न्यायालय इन सभी ट्रस्टियों को सम्पूर्णता के साथ अधिकार दिए थे जिससे रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और चेरिटेबल ट्रस्ट का कार्य सुचारु रूप से चले। फिर भी सलाह के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में तो आवेदन किया ही गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने ही यह आदेश दिया की आवेदन की एक प्रति कलकत्ता उच्च न्यायालय में भी पेश कर दिया जा।</p>
<p>न्यायालय का यह मानना कि “The estate of the deceased (Maharajadhiraj Sir Kameshwar Singh) is in limbo. The mechanism of the committee of management being requested to administer the estate failed. The committee of management has been in place for over 11 years. They are yet to administer the estate. The first Special officer could not complete the administration . The Second special officer resigned in view of unsavoury statements made against him by one of the members of the committee of management .</p>
<p>न्यायालय ने आगे कहा: “The fact that the estate requires protection is ‘disputed’ by any of the appearing parties. They seek an appropriate mechanism so that the estate is administered properly. They seek a mechanism by which the entire litigation between the parties come to an end as expeditiously as possible. In view of the factual situation, it would be appropriate to discharge the present committee of management with immediate effect. They will not operate any bank account of the estate any further. In the facts and circumstances in the instant case, it would be appropriate that three Special Officers are appointed to administer the estate.</p>
<figure id="attachment_3831" aria-describedby="caption-attachment-3831" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/6e539cf3-0841-416f-984b-0163aca25fd4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/6e539cf3-0841-416f-984b-0163aca25fd4.jpg" alt="" width="1280" height="605" class="size-full wp-image-3831" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/6e539cf3-0841-416f-984b-0163aca25fd4.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/6e539cf3-0841-416f-984b-0163aca25fd4-300x142.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/6e539cf3-0841-416f-984b-0163aca25fd4-1024x484.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/6e539cf3-0841-416f-984b-0163aca25fd4-768x363.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3831" class="wp-caption-text">घटना स्थल की ओर &#8211; जीएम रोड, बंगला नंबर &#8211; ४</figcaption></figure>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि अंतिम दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु दिनांक पहली अक्टूबर 1962 को हुई। महाराजाधिराज अपनी मृत्यु के पूर्व 5 जुलाई 1961 को एक वसीयत बनाए थे। इस वसीयत को कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा 27 जून, 1963 को न्यायमूर्ति श्री लक्ष्मीकांत झा को एकमात्र एस्क्यूटर घोषित किया गया। महाराजा के वसीयतनामे के अनुसार, महाराजा का दरभंगा राज का सम्पूर्ण अधिकार न्यायमूर्ति झा के पास जाता है। महाराजा के वसीयतनामे में तीन ट्रस्टियों का नाम भी उद्धृत किये थे जिनकी नियुक्ति “सेटलर” द्वारा किया गया – वे थे: पंडित एल के झा (स्वयं), पंडित जी एम मिश्रा और ओझा मुकुंद झा। उपरोक्त “एस्क्यूटर” को अपना सम्पूर्ण कार्य समाप्त करने के बाद दरभंगा राज का सम्पूर्ण क्रियाकलाप इन ट्रस्टियों को सौंपना था। महाराजा के वसीयतनामे में इस बात पर बल दिया गया था कि ट्रस्टियों की मृत्यु अथवा त्यागपत्र के बाद, दूसरे ट्रस्टी द्वारा रिक्तता को भरा जायेगा और वर्तमान ट्रस्ट उक्त दस्तावेज में उल्लिखित नियमों के अधीन ही नियुक्त किये जायेंगे।</strong></p>
<p>न्यायमूर्ति पंडित लक्ष्मीकांत झा संभवतः सन 1978 साल के मार्च महीने के 3 तारीख को मृत्यु को प्राप्त किये । न्यायमूर्ति पंडित लक्ष्मीकांत झा की मृत्यु के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय न्यायमूर्ति (अवकाश प्राप्त) एस ए मसूद और न्यायमूर्ति शिशिर कुमार मुखर्जी (अवकाश प्राप्त) को दरभंगा राज के “प्रशासक” के रूप में नियुक्त किया गया था । इसके बाद तत्कालीन न्यायमूर्ति सब्यसाची मुखर्जी अपने आदेश, दिनांक 16 मई, 1979 के द्वारा उपरोक्त “प्रशासकों” को “इन्वेंटरी ऑफ़ द एसेट्स’ और ‘लायबिलिटीज ऑफ़ द इस्टेट’ बनाने का आदेश दिया थे ताकि वह दरभंगा राज के ट्रस्टियों को सौंपा जा। उक्त दस्तावेज के प्रस्तुति की तारीख के अनुसार तत्कालीन ट्रस्टियों ने महाराजाधिराज दरभंगा के रेसिडुअरी इस्टेट का कार्यभार 26 मई, 1979 को ग्रहण किया। कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेशानुसार, महाराजाधिराज की सम्पत्तियों के सभी लाभार्थी (यानी परिवार के सदस्य) इस ट्रस्ट के ट्रस्टीज बने । बाद में महाराज के कई पारिवारिक सदस्यों ने कई मुकदमें किये।अंततः यह मामला माननीय उच्चतम न्यायालय में गया और 5 अक्टूबर 1987 को फॅमिली सेटलमेंट हुआ ।</p>
<p>इस बीच, 27 मार्च, 1987 को सम्बद्ध लोगों के बीच हुए फेमिली सेटेलमेंट को लेकर दायर अपील को सर्वोच्च न्यायालय दिनांक 15 अक्टूबर, 1987 को “डिक्री” देते हुए ख़ारिज कर दिया। तदनुसार, फेमिली सेटेलेमनट के क्लॉज 1 के अनुसार, सिड्यूल II में वर्णित शर्तों को मद्दे नजर रखते, महारानी अधिरानी कामसुन्दरी सिड्यूल II में उल्लिखित सभी सम्पत्तियों की स्वामी बन गयी। स्वाभाविक है, उन सम्पत्तियों पर उनका एकल अधिकार हो गया। इसी तरह, फेमिली सेटेलेमनट के क्लॉज 2 के अनुसार, कुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र, यानी राजेश्वर सिंह, जो उस समय बालिग हो गए थे, और उनके छोटे भाई, कपिलेश्वर सिंह, जो उस समय नाबालिग थे, सिड्यूल III में वर्णित शर्तों को मद्दे नजर रखते सिड्यूल III में उल्लिखित सम्पत्तियों के मालिक हो गए। आगे इसी तरह, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 3 के अंतर्गत सिड्यूल IV में वर्णित सभी नियमों के अनुरूप में सभी सिड्यूल IV में उल्लिखित सम्पत्तियों का मालिक पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टीज हो गए। फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 5 के अधीन, श्रीमती कात्यायनी देवी, श्रीमती दिव्यायानी देवी, श्रीमती नेत्रयानी देवी (कुमार जीवेश्वर सिंह के सभी बालिग पुत्रियां) और सुश्री चेतना दाई, सुश्री दौपदी दाई, सुश्री अनीता दाई (कुमार जीवेश्वर सिंह के सभी नबालिग पुत्रियां), श्री रत्नेश्वर सिंह, श्री रश्मेश्वर सिंह (उस समय मृत), श्री राजनेश्वर सिंह (कुमार याजनेश्वर सिंह) सिड्यूल V में उनके नामों के सामने उल्लिखित, साथ ही, उसी सिड्यूल में उल्लिखित शर्तों के अनुरूप, सम्पत्तियों के मालिक होंगे।</p>
<figure id="attachment_3832" aria-describedby="caption-attachment-3832" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/4659c360-43a9-4773-b7a1-6830ac19b938.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/4659c360-43a9-4773-b7a1-6830ac19b938.jpg" alt="" width="1280" height="605" class="size-full wp-image-3832" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/4659c360-43a9-4773-b7a1-6830ac19b938.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/4659c360-43a9-4773-b7a1-6830ac19b938-300x142.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/4659c360-43a9-4773-b7a1-6830ac19b938-1024x484.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/4659c360-43a9-4773-b7a1-6830ac19b938-768x363.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3832" class="wp-caption-text">घटना स्थल की ओर &#8211; जीएम रोड, बंगला नंबर &#8211; 4</figcaption></figure>
<p>फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 5 के तहत, पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टीज को यह अधिकार दिया गया कि वे सिड्यूल I में वर्णित ‘लायबिलिटीज’ को समाप्त करने के लिए, सिड्यूल VI में उल्लिखित सम्पत्तियों को बेचकर धन एकत्रित कर सकते हैं, साथ ही, परिवार के लोगों में फेमिली सेटेलमेंट के अनुरूप शेयर रखने का अधिकार दिया गया। साथ ही, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 6 के अनुसार, महारानी अधिरानी कामसुन्दरी और राज कुमार शुभेश्वर सिंह या उनके नॉमिनी (दूसरे क्षेत्र के लाभान्वित लोगों के प्रतिनिधि) द्वारा बनी एक कमिटी लिखित रूप से सम्पत्तियों की बिक्री, शेयरों का वितरण आदि से सम्बंधित निर्णयों को लिखित रूप में ट्रस्टीज को देंगे जहाँ तक व्यावहारिक हो, परन्तु किसी भी हालत में पांच वर्ष से अधिक नहीं या फिर न्यायालय द्वारा जो भी समय सीमा निर्धारित हो।</p>
<p>फैमली सेटेलमेंट के तहत, महाराजाधिराज के उस सम्पूर्ण संपत्ति स्वरुप सिक्के को जिन चार भागों में विभक्त किया गया उसमें एक – चौथाई भाग महाराजाधिराज पत्नी महारानी कामसुन्दरी को मिला। एक – चौथाई हिस्सा राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह को मिला। एक – चौथाई हिस्सा राजकुमार जीवेश्वर सिंह और यज्ञेश्वरा सिंह को मिला और अंतिम एक – चौथाई टुकड़ा चेरिटेबल ट्रस्ट के हिस्से आया। सेटेलमेंट के क्लॉज 11 के तहत, यह बात स्पष्ट किया गया कि ‘समय आने पर ट्रस्ट का निर्माण’ किया जायेगा जिसका नाम ‘कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट’ होगा और इस ट्रस्ट के सभी सदस्यों का चयन, रखरखाव आदि-आदि नियमानुसार होगा। आगे, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 14 के अधीन न्यायालय के आदेश केदिनांक 15 अक्टूबर, 1987 से पांच साल के अंदर इस सेटेलमेंट को लागू करना था। बाद में, दिनांक 7 मई, 1993 को न्यायलय ने सेटेलमेंट को दिनांक 15 अक्टूबर, 1995 तक बढ़ा दिया।</p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/darbhanga-gm-road-muder-case">दरभंगा: जीएम रोड-4: बाजार मूल्य Vs अंतिम देय मूल्य, क्रेता-विक्रेता का गुंडागर्दी, कलकत्ता उच्च न्यायालय का &#8216;अवमानना&#8217; (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/darbhanga-gm-road-muder-case/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
