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	<title>chief ministers Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 May 2025 04:59:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना: सम्भवतः विगत तीन दिनों से देश के वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, विशेषज्ञों से पूछ रहा हूँ कि क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी राज्य का व्यक्ति अपने राज्य का राज्यपाल नहीं बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 157 के तहत राज्यपाल हेतु जो अहर्ताएं निर्धारित हैं, उसका पालन [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar">&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना: सम्भवतः विगत तीन दिनों से देश के वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, विशेषज्ञों से पूछ रहा हूँ कि क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी राज्य का व्यक्ति अपने राज्य का राज्यपाल नहीं बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 157 के तहत राज्यपाल हेतु जो अहर्ताएं निर्धारित हैं, उसका पालन होना आवश्यक है। लेकिन सबों का उत्तर &#8216;नकारात्मक&#8217; ही रहा। आज़ादी के बाद आज तक एक राज्य में जन्म लिए व्यक्ति दूसरे राज्य का राज्यपाल बनते आ रहे हैं और कहते हैं &#8216;यही परम्परा&#8217; है। वैसे प्रदेश का एक व्यक्ति का अगर अपने प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में कोई संवैधानिक अर्चन नहीं है, तो राज्यपाल / कुलाधिपति के मामले में भी देश के विद्वान-विदुषियों को, राजनीतिक विशेषज्ञों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। बदलाव की शुरुआत करने की अपेक्षा की नजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर ही उठती है, क्योंकि मोदी जी हैं तो मुमकिन है। </strong></p>
<p>जब अपने प्रदेश के नेता अपने ही पंचायत क्षेत्र, विधानसभा क्षेत्र, लोकसभा क्षेत्र, राज्यसभा क्षेत्र का विकास मतदाताओं के नाक रगड़ने पर भी नहीं करते (विधानमंडल/संसद द्वारा विधायकों/सांसदों को विकास के लिए अनुमोदित राशि का आवंटन और बिना खर्च उस राशि का पड़ा होना आंक लें), तो फिर दूसरे प्रदेश से आयातित राज्यपाल उस प्रदेश के विकास में कितना भूमिका निभाएंगे &#8211; यह एक गंभीर शोध का विषय है। वजह यह है कि आज़ादी के बाद बिहार में अब तक दूसरे राज्यों से 42 महानुभाव (मोहतरमा नदारत) आयातित हुए और राज्यपाल की कुर्सी पर विराजमान हुए। हालांकि,  प्रदेश के राज्यपाल बिहार  के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, दुर्भाग्यवश  प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने में &#8216;सूई मात्र&#8217; भी पहल नहीं किये विगत 78 वर्षों में  &#8211; कुलाधिपति का कार्यालय गवाह है। </p>
<blockquote><p>दूसरी ओर, जब आज के परिपेक्ष में प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था को देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार के वर्तमान राज्यपाल/बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, जिस कार्य की शुरुआत केरल में किये थे, बिहार में दोहरा रहे हैं। यह मैं नहीं, राजनीतिक धनुर्धर कह रहे हैं। अपनी राज्यपाल की सेवा अवधि के दौरान केरल में आरिफ मोहम्मद खान के साथ स्थानीय सरकार से नोकझोंक भी हुई थी, अखबारों के पन्ने गवाह हैं। वे &#8216;विवाद&#8217; में भी आये। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी उनकी गतिविधि &#8216;अपच्य&#8217; हो जाय। </p></blockquote>
<p>वैसे नीतीश कुमार अपने कार्यकाल में अब तक कभी भी छात्रों के साथ &#8216;पन्गा&#8217; नहीं लिए, भले प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था रसातल में चली गयी हो, चली जा रही हो। नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों से आज तक विगत 35 वर्षों में प्रदेश का कमान जिन दो व्यक्तियों &#8211; लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार &#8211; के हाथों केंद्रित रहा, प्रदेश में शिक्षा के विकास को कितना महत्व दिया, यह वर्तमान स्थिति से आँका जा सकता है। इतना ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, उनकी पत्नी पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उनके दोनों पुत्र &#8211; एक पूर्व उप-मुख्यमंत्री और दूसरे पूर्व मंत्री &#8211; की नज़रों में शिक्षा का क्या महत्व रहा, यह उनकी शैक्षणिक योग्यता दर्शाता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि &#8216;वैसे वर्तमान राज्यपाल और कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान भी छात्रों की ताकत को जानते हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो जानते ही नहीं। </p>
<figure id="attachment_6577" aria-describedby="caption-attachment-6577" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg" alt="" width="1600" height="900" class="size-full wp-image-6577" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-1536x864.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6577" class="wp-caption-text">राज्यपाल के रूप में शपथ लेते आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>आरिफ मोहम्मद अन्य राज्यपालों/कुलाधिपतियों जैसे नहीं हैं।  इनका कार्य करने का तरीका कुछ अलग है। प्रदेश के मुख्यमंत्री (पूर्व मुख्यमंत्री सहित), नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के किसी भी मंत्री से अधिक शिक्षित, जुझारू हैं। वाक्पटुता अधिक है,  क्योंकि ये भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता रह चुके हैं उसी कालखंड में जब नीतीश कुमार या लालू यादव पटना विश्वविद्यालो छात्र नेता बन रहे थे । आरिफ मोहम्मद खान अलीगढ़ मुस्लिक विश्वविद्यालय छात्र संघ के पहले सचिव (1972-73) बने और फिर अध्यक्ष (1973-74) बने। तीन साल बाद, उत्तर प्रदेश के सियाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक (1977-80) बने। फिर सातवीं, आठवीं, नवमी और बारहवीं लोकसभा में कानपुर और बहराइच से सांसद बने। केंद्र में मंत्री भी रहे। लेकिन चर्चा में अपनी वाक्पटुता के कारण आये। नीतीश और लालू के जीवनवृत भी कुछ ऐसा ही है। हाँ, ये अकेले हैं और बिहार में नीतीश &#8211; लालू का समूह है।</strong> </p>
<p>अब सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपने ही राज्य में, राज्य के बाहर से आये (ऐसा होता आया है) राज्यपाल के क्रियाकलापों पर अपनी पैनी निगाह नहीं रखे होंगे? यह माना नहीं जा सकता। आखिर विधानसभा का चुनाव आने वाला है। अगर चुनाब के मद्दे नजर प्रदेश में कोई राजनीतिक एजेंडा कार्य करना प्रारम्भ किया है तो निश्चित तौर पर नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के इस पड़ाव पर बिहार के मतदाताओं की नज़रों में हंसी के पात्र नहीं बनना चाहेंगे? नितीश कुमार को चाहे कितने भी तथाकथित अलंकरणों से नवाजा गया हो, हकीकत तो यह अवश्य है कि उन्होंने सत्ता की गलियारे से लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को बहुत दूर कर दिया। हां, वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के मद्दे नजर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि नीतीश कुमार को भी राजनीति की मुख्यधारा (मुख्यमंत्री कार्यालय) से बाहर निकालने का प्रयास नहीं हो रहा है। कोई तो है जो नेपथ्य से सब कुछ कर रहा है। ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में आरिफ मोहम्मद खान &#8211; नीतीश कुमार &#8211; लालू यादव अख़बारों की सुर्ख़ियों में छा जाएँ। गाँठ बाँध लीजिये। </p>
<figure id="attachment_6578" aria-describedby="caption-attachment-6578" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6578" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-1026x1536.jpg 1026w" sizes="(max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6578" class="wp-caption-text">पटना कॉलेज का ऐतिहासिक कॉरिडोर</figcaption></figure>
<p><strong>हाक़ी-डैगर-बन्दूक-पिस्तौल के बीच बिलखती शिक्षा </strong></p>
<p>बहरहाल, हॉकी स्टिक से डैगर, फिर डैगर से कट्टा, कट्टा से बन्दूक, पिस्टल, बम तक आने में बिहार के विश्वविद्यालय परिसरों को चार दशक भी नहीं लगा। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के कालखंड और उसके बाद जिस तरह प्रदेश ने नेताओं ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों के छात्रों का स्वहित में इस्तेमाल कर शैक्षिक वातावरण को मिट्टी में मिलाया, आज अगर पटना विश्वविद्यालय के बिहार नेशनल कॉलेज परिसर में गोलियां चली तो विश्वविद्यालय के कुलाधिपति को इतनी तकलीफ क्यों हो रही है। वे भी तो छात्र आंदोलन के उपज हैं। आज़ादी के बाद अब तक बिहार में 42 राज्यपाल बने जो पटना विश्वविद्यालय सहित, बिहार सभी विश्वविद्यालयों कुलाधिपति भी थे। लेकिन इन वर्षों में कोई भी कुलाधिपति विश्वविद्यालय परिसर में शैक्षिक वातावरण का निर्माण कैसे हो, नहीं सोचे। अगर सोचे होते तो शायद प्रदेश की शैक्षिक व्यवस्था का यह हश्र नहीं होता। </p>
<blockquote><p>आज के लोगों को ज्ञात हो अथवा नहीं, लेकिन मुद्दत पहले पटना साइंस कॉलेज के प्रोफ़ेसर बिल्टू सिंह की हत्या की गयी थी। प्रोफ़ेसर रघुजी वर्मा को मौत के घाट उतार दिया गया था। वाणिज्य महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रोफ़ेसर पी.एन. शर्मा पर बम फेंक कर कातिलाना हमला किया गया था। पटना साइंस कॉलेज के स्नातकोत्तर रसायन शास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर सिद्धेश्वर प्रसाद को 22 वर्ष पहले गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। उसकी कालखंड में पटना कॉलेज के पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष और पटना विश्वविद्यालय सीनेट के सदस्य प्रोफेसर शैलेंद्र धारी सिंह की उनके घर के पास निर्मम हत्या की गयी थी। पटना विश्वविद्यालय के ही दक्षिण एशियाई इतिहास विभाग की प्रोफ़ेसर पापिया घोष के साथ उनकी और उनकी बुज़ुर्ग नौकरानी मालती देवी की हत्या कर दी गई थी। पिछले वर्ष पटना लॉ कॉलेज परिसर में अंतिम वर्ष के एक छात्र, हर्ष राज, की हॉकी स्टिक, लोहे की रॉड, ईंट और लाठी से 10 से अधिक अज्ञात लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।</p></blockquote>
<p>सत्तर के दशक के बाद आज तक, न केवल पटना विश्वविद्यालय, बल्कि बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में कितनी गोलियां चली, कितने बम्ब फटे, कितने हॉकी स्टिक का इस्तेमाल कर अपना-किताब बराबर किया गया, यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की बिहार के शिक्षा मंदिरों को अब ईंट की दीवारों से, लोहे के ग्रिलों से जकड़ दिया गया है। आखिर इन गिरती, लुढ़कती मानसिकता, व्यवस्था के कालखंडों में भी तो इन विश्वविद्यालयों में कुलपति थे, प्रदेश में इन विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासकीय व्यवस्था को देखने के लिए कुलाधिपति थे &#8211; लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं किया। </p>
<figure id="attachment_6579" aria-describedby="caption-attachment-6579" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg" alt="" width="1363" height="1811" class="size-full wp-image-6579" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-226x300.jpg 226w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-771x1024.jpg 771w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-768x1020.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-1156x1536.jpg 1156w" sizes="(max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6579" class="wp-caption-text">पटना कॉलेज का प्रवेश द्वार</figcaption></figure>
<p><strong>प्रदेश के कुलाधिपति ही जिम्मेदार है </strong></p>
<p>बिहार में धूल चाटती शिक्षा की स्थिति का अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है बिहार के &#8216;लाट साहब&#8217;, यानी प्रदेश के प्रथम नागरिक, जो संवैधानिक दृष्टि से सबसे सबल हैं और कल से लेकर आज तक के कुल 41 विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। आज बिहार में 41 विश्वविद्यालय है जिसमें 8 राष्ट्रीय स्तर के हैं, 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, २० राज्य विश्वविद्यालय हैं, 7 निजी विश्वविद्यालय हैं, 1 डीम्ड विश्वविद्यालय है और 4 केंद्र द्वारा पोषित। इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होने के नाते क्या अब तक राज्यपाल भवन में आये 42 कुलाधिपतियों का जबाबदेही नहीं था कि अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को अव्वल बनाते? शायद नहीं। </p>
<p>आज़ादी के बाद भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित राज्यपालों, उप-राज्यपालों की कार्य अवधि और उस अवधि के दौरान राज्य का प्रथम नागरिक, संवैधानिक प्रमुख होने के नाते प्रदेशों का कितना विकास हो पाया है, इसकी विवेचना तो देश के वातानुकूलित कक्षों में बैठे राजनीतिक समीक्षक और विशेज्ञों के साथ-साथ अवकाशप्राप्त प्रदेश प्रमुख ही करेंगे, लेकिन हमारे प्रदेश बिहार में एक औसतन राज्यपालों की कार्य अवधि एक साल आठ महीने ही है। इन आठ महीनों में वे प्रदेश का विकास करने में सफल होंगे अथवा सेवा काल के समाप्ति के साथ &#8216;पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स&#8217; के साथ जीवन का समय गुजरेंगे, आज ही नहीं, आने वाले दिनों में भी राजनीतिक विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों के लिए बहुत बड़ा शोध का विषय रहेगा। दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के अलावे इन विशेषज्ञों का ध्यान प्रदेश प्रमुख की ओर जाता ही नहीं है। </p>
<p>बिहार के वर्तमान राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के राज्यपाल भवन की सूची पट्टिका में 42 वें स्थान पर अंकित हैं। आज़ादी के बाद सर्वप्रथम जयरामदास दौलतराम (15 अगस्त 1947-11 जनवरी 1948) प्रदेश के राज्यपाल बनाये गए।  उनकी कार्य अवधि छः माह की थी। आज प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आधिकारिक आवास जिस सड़क पर स्थित है, वह सड़क (अणे मार्ग) बिहार के दूसरे राज्यपाल माधव श्रीहरि अणे के नाम से अंकित है। अणे 12 जनवरी 1948 &#8211; 14 जून 1952 तह राज्यपाल थे। इसने बाद आये आर. आर. दिवाकर (15 जून 1952 &#8211; 5 जुलाई 1957) और फिर  जाकिर हुसैन (6 जुलाई 1957 &#8211; 11 मई 1962) । जाकिर हुसैन के बाद एम. ए. एस. अय्यंगार (12 मई 1962 &#8211; 6 दिसम्बर 1967), नित्यानंद कानूनगो (7 दिसंबर 1967 &#8211; 20 जनवरी 1971), न्यायमूर्ति यू.एन. सिन्हा (कार्यवाहक) (21 जनवरी 1971 से 31 जनवरी 1971), देव कांत बरुआ (1 फरवरी 1971 से 4 फरवरी 1973) और रामचन्द्र धोंडीबा भंडारे (4 फरवरी 1973 से 15 जून 1976) प्रदेश के राज्यपाल बने। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg" alt="" width="1920" height="1080" class="aligncenter size-full wp-image-6580" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a></p>
<p><strong>शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि बिहार के एक लाट साहब अपने दो साल की कार्य अवधि में पटना के इतिहास को जानने और समझने में दिलचस्पी दिखाए और यत्र-तत्र-सर्वत्र धूमने की इच्छा भी जाहिर किये। प्रदेश के लाट साहब&#8217; की इच्छा थी &#8211; पूरी तो होगी ही।  लाट साहब बिहार के नहीं थे। महाराष्ट्र में जन्म लिए बाबा साहब आंबेडकर के सहकर्मी भी थे और अनुयायी भी। दो बार सांसद भी बने। जिस कालखंड में वे बिहार के राज्यपाल थे उस कालखंड में बिहार के जनसम्पर्क निदेशक थे मोहम्मद सफी साहब और सफी साहब के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी की राज्यपाल के साथ पटना के इतिहास को बताने के लिए किस महानुभाव को लिया जाय। दो व्यक्तियों का नाम बार-बार आ रहा था श्री बेदार साहब (खुदाबक्श पुस्तकालय के निदेशक) और शिक्षाविद श्री सुरेंद्र गोपाल। परन्तु के आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन समाचार संपादक श्री रामजी मिश्र मनोहर को चुने और दीघा से दीदारगंज तक गंगा में स्टीमर से भ्रमण किये। गंगा तट पर बसा प्रत्येक ऐतिहासिक स्थानों, भवनों को मनोहर साहब व्याख्या किये। अंत में भंडारे साहेब को कहना पड़ा कि &#8220;मनोहर जी आप पटना के इनसाइक्लोपीडिया हैं।&#8221; लेकिन इस भ्रमण सम्मलेन से बिहार को क्या मिला? प्रदेश के इतिहास को क्या मिला? ऐतिहासिक स्थलों को क्या मिला?</strong></p>
<p>भंडारे के बाद राज्यपाल भवन में आये जगन्नाथ कौशल (16 जून 1976 से 31 जनवरी 1979), न्यायमूर्ति के.बी.एन. सिंह (कार्यवाहक) (31 जनवरी 1979 से 19 सितंबर 1979), अखलाकुर रहमान किदवई (20 सितंबर 1979 से 15 मार्च 1985), पी. वेंकटसुब्बैया (15 मार्च 1985 से 25 फरवरी 1988), गोविंद नारायण सिंह (26 फरवरी 1988 से 24 जनवरी 1989) तक। गोविन्द नारायण सिंह के बारे में उस कालखंड में चर्चाएं आम थी कि वे प्रदेश में स्थित सभी विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होने के कारण कुलपतियों की कक्षा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। वे राज्यपाल भवन के बाहर मैदान में बैठ जाते थे, जहाँ कुलपतियों की बैठक होती थी। डांट-फटकार होती थी और फिर सभी अपने-अपने रास्ते। अख़बारों में छपता था, आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार में वाचन होता था। गोविन्द नारायण सिंह भी 11 महीने की अवधि पूरा कर घर चले गए। अब आये न्यायमूर्ति दीपक कुमार सेन (कार्यवाहक) (24 जनवरी 1989 से 28 जनवरी 1989), आर.डी. प्रधान (29 जनवरी 1989 से 2 फरवरी 1989), जगन्नाथ पहाड़िया (3 मार्च 1989 से 2 फरवरी 1990), न्यायमूर्ति जी.जी. सोहोनी (कार्यवाहक) (2 फरवरी 1990 से 16 फरवरी 1990), मोहम्मद सलीम (16 फरवरी 1990 से 13 फरवरी 1991), बी. सत्य नारायण रेड्डी (कार्यवाहक) (14 फरवरी 1991 से 18 मार्च 1991) तक। </p>
<figure id="attachment_6581" aria-describedby="caption-attachment-6581" style="width: 466px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg" alt="" width="466" height="559" class="size-full wp-image-6581" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg 466w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar-250x300.jpg 250w" sizes="auto, (max-width: 466px) 100vw, 466px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6581" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं कि 1990 के बाद जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, बिहार के विश्वविद्यालयों की स्थिति तेजी से बिगड़ गई। कुलपतियों की नियुक्ति में मेरिट की सबसे बड़ी क्षति हुई, और जातीय आधार पर नियुक्तियों की परंपरा शुरू हुई। विश्वविद्यालयों को विभिन्न जातियों के नाम पर &#8220;डिस्ट्रिब्यूट&#8221; कर कुलपति बनाए जाने लगे। राजभवन की जगह आर्य कुमार रोड की एक गली में राष्ट्रीय जनता दल के नेता रंजन प्रसाद यादव के घर कुलपतियों की बैठक होने लगी। यहीं पर उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक और इंटरमीडिएट काउंसिल के अध्यक्ष भी बैठने लगे। यहीं नीतिगत फैसले लिए जाने लगे, यहां तक कि शिक्षकों के प्रोमोशन और डिमोशन के फैसले भी वहीं होते थे। तत्कालीन राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी, जो चांसलर भी थे, ने एक बार कहा था, &#8220;अब तो रंजन यादव सुपर चांसलर हो गए हैं।&#8221; एक कुलपति, जो दिल्ली-पटना राजधानी एक्सप्रेस से नेता जी के साथ सफर कर रहे थे, उनके साथ नेता जी का परिवार भी था। बच्चे ने कोच में शौच कर दिया, और कुलपति ने अपने हाथों से सफाई की।</strong></p>
<p>लालू प्रसाद यादव के आगमन के साथ शिक्षा लज्जित होकर गंगा में गोंता लगाने लगी और पुरे प्रदेश में तथकथित नेताओं का जन्म होने लगा। इसी कालखंड में पहले राज्यपाल आये मोहम्मद शफी कुरैशी (19 मार्च 1991 से 13 अगस्त 1993), फिर आए अखलाकुर रहमान किदवई (14 अगस्त 1993 से 26 अप्रैल 1998), सुंदर सिंह भंडारी (27 अप्रैल 1998 से 15 मार्च 1999), न्यायमूर्ति बी.एम. लाल (अभिनय) (15 मार्च 1999 से 5 अक्टूबर 1999), सूरज भान (अतिरिक्त प्रभार) (6 अक्टूबर 1999 से 22 नवंबर 1999), वी. सी. पांडे (23 नवंबर 1999 से 12 जून 2003), एम आर जोइस (12 जून 2003 से 31 अक्टूबर 2004), वेद प्रकाश मारवाह (1 नवंबर 2004 से 4 नवंबर 2004), बूटा सिंह (5 नवंबर 2004 से 29 जनवरी 2006), गोपालकृष्ण गांधी (31 जनवरी 2006 से 21 जून 2006), आर. एस. गवई ( 22 जून 2006 से 9 जुलाई 2008), आर. एल. भाटिया (10 जुलाई 2008 से 28 जून 2009), देवानंद कोंवर (29 जून 2009 से 21 मार्च 2013), डी. वाई. पाटिल (22 मार्च 2013 से 26 नवंबर 2014), केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार) (27 नवंबर 2014 से 15 अगस्त 2015) आदि। </p>
<p><strong>भारत के चौदहवें राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द पटना के राज्यपाल की कुर्सी से ही आये थे। वे 16 अगस्त 2015 से 20 जून 2017) तक लाट साहब थे। कोविंद साहब का राज्यपाल भवन में समय समाप्त हुआ, वे राष्ट्रपति भवन आ गए। उनके राज्यपाल के रूप में कार्यकर्ते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोध गया भ्रमण किये थे। बिहार के लोगों को आस्वाशन दिए की गया को सांस्कृतिक शहर बनाएंगे। कोविंद साहब राष्ट्रपति बनकर अवकाश भी ले लिए, प्रधानमंत्री पहली बार से तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, गया और बोधा गया आज भी वैसा ही है। फिर राज्यपाल भवन में आये केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार) (20 जून 2017 से 29 सितंबर 2017), सत्यपाल मलिक (30 सितंबर 2017 से 23 अगस्त 2018), लालजी टंडन (23 अगस्त 2018 से 28 जुलाई 2019), फाल्गुन चौधरी (29 जुलाई 2019 &#8211; 13 फरवरी 2023), राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर 14 फरवरी 2023 से 1 जनवरी 2025 और आज विराजमान हैं आरिफ मोहम्मद खान (2 जनवरी 2025 से लगातार ) । </strong></p>
<blockquote><p>प्रदेश के विश्वविद्यालय अभी तक 42 कुलाधिपतियों को आते-जाते देखा है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था के साथ प्रदेश की अन्य व्यवस्था &#8216;अव्यवस्थित&#8217; ही रहा, और आगे भी रहेगा। क्योंकि अगर 78 वर्ष की आज़ादी में प्रदेश के राज्यपाल निवास में 42 लाट साहेब &#8216;आये और गए&#8217; तो पटना विश्वविद्यालय में अब तक 55 (आज़ादी के पहले 6 और 49 आज़ादी के बाद)  कुलपति का भी वही हश्र रहा। </p></blockquote>
<p>इन वर्षों में जे. जी. जेनिंग्स (01.10.1917 -15.10.1920), वी. एच. जैक्सन (16.10.1920 से 14.10.1923), सर एस. सुल्तान अहमद (15.10.1923 &#8211; 11.11.1930), स्टीवर्ट मैकफर्सन (12.11.1930 से 22.08.1933), न्यायमूर्ति के. एम. नूर (23.08.1933 से 22.08.1936), सचिदानंद सिन्हा (23.08.1936 से 31.12.1944), सी. पी. एन. सिंह (01.01.1945 से 20.06.1949), सारंगधर सिंह (21.06.1949 से 01.01.1952), डॉ के एन बहल (02.01.1952 से 31.01.1953), वी.के.एन. मेनन (30.03.1953 से 31.12.1953), डॉ बासुदेव नारायण (01.01.1954 से 19.03.1957), डॉ बलभद्र प्रसाद (20.03.1957 से 11.07.1960), श्री बी एन राय (12.07.1960 से 28.02.1962), डॉ जॉर्ज जैकब (14.03.1962 से 13.03.1965), डॉ. के.के.दत्ता (14.03.1965 से 13.11.1970), महेंद्र प्रताप (14.11.1970 से 20.04.1972), के. अब्राहम (21.04.1972 से 07.05.1972), सचिन दत्त (08.05.1972 से 10.08.1973), श्रीमती रमोला नंदी (11.08.1973 से 16.09.1973), श्री डी. एन. शर्मा (17.09.1973 से 07.01.1977), डॉ. ए.के. धन (11.01.1977 से 24.08.1978), जी.एस. ग्रेवाल (25.07.1978 से 01.08.1978), डॉ. टी. बी. मुखर्जी (02.08.1978 से 31.07.1979), डॉ. आर. सी. सिन्हा (05.08.1979 से 08.08.1979) पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने। </p>
<p>सत्तर के दशक के अंत में पटना कालेज के प्राचार्य, स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. केदार नाथ प्रसाद कुलपति बने। वे 09.18.1979 से 21.04.1980 तक कार्यालय में थे। लव कुमार मिश्र कहते हैं: &#8220;पहले जब शारंगधर सिंह, के.के. दत्त, सचिन दत्त और महेन्द्र प्रताप जैसे विद्वान कुलपति होते थे, वे शिक्षा मंत्री के यहां भी नहीं जाते थे। स्वयं मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह पटना विश्वविद्यालय के कुलपति से सलाह लेने उनके घर जाते थे। 1977 तक पटना विश्वविद्यालय के कुलपति का आधिकारिक आवास गांधी मैदान के दक्षिण कोने पर था, जहां अब मौर्य होटल है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. केदारनाथ प्रसाद, जो इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे, ने मुख्य सचिव को लिखित आपत्ति दी थी कि उनकी अनुमति के बिना पटना कॉलेज में डीएम ने पुलिस भेज दी। उन्होंने कहा था कि वे प्रमंडल के आयुक्त से भी वरिष्ठ हैं। जब पटना के डीएम ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में परीक्षा पर रोक लगाई, तो कुलपति अतर देव सिंह ने विरोध करते हुए परीक्षा का आयोजन कराया। वे भी इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे।&#8221;</p>
<p>अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में सबसे पहले कुलपति बने डॉ. आर. शुक्ला (22.04.1980 से 13.07.1981), डॉ. एस. पी. सिन्हा (14.07.1981 से 03.02.1983), डॉ. जी. पी. सिन्हा (04.02.1983 से 31.10.1985), डॉ. के. एन. प्रसाद (31.10.1985 से 17.04.1987), डॉ एस एन दास (18.04.1987 से 01.09.1988), डॉ ए एल साहा (02.09.1988 से 14.12.1988), डॉ. आर.के.अवस्थी (15.12.1988 से 25.06.1990), डॉ. एम. मोहिउद्दीन (26.06.1990 से 25.06.1993), राहुल सरीन (26.06.1993 से 05.05.1994), अनिल कुमार (06.05.1994 से 20.01.1995), डॉ. एस. एन. पी. सिन्हा (21.01.1995 से 20.01.1998), डॉ एस नज़र अहसन (21.01.1998 से 02.04.2001), डॉ एल एन राम (03.04.2001 से 23.06.2001), डॉ. के.के. झा (01.08.2001 से 31.07.2004), डॉ. विभाष के. यादव (01.08.2004 से 16.08.2004), डॉ.जगन्नाथ ठाकुर (16.08.2004 से 23.08.2005), डॉ सैयद एहतेशामुद्दीन (24.08.2005 से 20.11.2006), प्रो. वाई. सी. सिम्हाद्री (20.11.2006 से 21.01.2008), डॉ श्याम लाल (25.01.2008 से 24.01.2011), डॉ सुदीप्तो अधिकारी (25.01.2011 से 01.08.2011), प्रो. शंभु नाथ सिंह (02.08.2011 से 22.03.2013), प्रो. यू.के. सिन्हा (22.03.2013 से 26.04.2013), प्रोफेसर अरुण कुमार सिन्हा (26.04.2013 से 31.01.2014), प्रो. येदला सी. सिम्हाद्री (31.01.2014 से 31.01.2017), प्रो.सुधीर कुमार श्रीवास्तव (31.01.2017 से 01.05.2017), प्रो. रासबिहारी सिंह (02.05.2017 से 01.05.2020), प्रो. (डॉ.) एच.एन. प्रसाद (02.05.2020 से 23.09.2020), प्रो. (डॉ.) गिरीश कुमार चौधरी (23.09.2020 से 25.10.2023), प्रो. के.सी. सिंह (26.10.2023 से 03.05.2024), प्रो. अजय कुमार सिंह (03.07.2024 से ) और आज आरिफ मोहम्मद खान हैं। कल ये भी संख्या में जुड़ जायेंगे।  </p>
<p><strong>मिश्र कहते हैं &#8220;यदि आज विश्वविद्यालयों की स्थिति खराब है, तो उसके लिए राज्यपाल भी जिम्मेदार हैं। पिछले 15 वर्षों में बिहार में कुछ ऐसे राज्यपाल भी आए, जिन पर खुले तौर पर यह आरोप लगे कि उनके करीबियों ने दो-दो करोड़ रुपये में कुलपति पद बेचे। एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजभवन द्वारा नियुक्त छह कुलपतियों की नियुक्ति को रोक दिया था। वर्तमान में सत्ता पक्ष के अनुषांगिक संगठनों द्वारा भेजे गए नामों पर नियुक्तियाँ हो रही हैं। एक कुलपति ने दावा किया कि उनका नाम “हाई कमान” से भेजा गया था। जब हम विद्यार्थी थे, तब कुलपति भी लेक्चर लेने आते थे। मुझे स्मरण है कि सचिन दत्त, जो केंद्र में वित्त सचिव थे, सेवानिवृत्त होकर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने और पटना कॉलेज के बी.ए. लेक्चर थिएटर में इकोनॉमिक्स पढ़ाने आते थे। महेन्द्र प्रताप, जो कैम्ब्रिज से पीएचडी थे, अंग्रेजी का क्लास लेते थे। जॉर्ज जैकब और ए.के. धान, जो यूपीएससी के अध्यक्ष रहे थे, कुलपति रहते हुए भी कक्षाएं लेते थे। अब यदि राज्यपाल को पीड़ा हो रही है, रोना आता है, तो उन्होंने ऐलान कर दिया है – अब राजभवन में नहीं, कॉलेज में ही बैठकें होंगी।&#8221;</strong></p>
<p>विगत शनिवार को बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने पटना में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आरोप लगाये कि बिहार के विश्वविद्यालय अराजक तत्वों के हाथों सौंप दिए गए हैं। राज्यपाल ने पहले बीएन कॉलेज में हुई बम की घटना में एक छात्र की मौत पर रोआंसी आवाज में कहा कि मेरा दिल रोता है, जब सुनता हूं, जो कुछ भी यूनिवर्सिटी में हो रहा है। यह हैरत की बात है कि यूनिवर्सिटी में बम मार के तीन दिन पहले बच्चे की जान ले ली गई। राज भवन में मीटिंग हुई। कुलपति से पूछा कि उस मीटिंग में जो फैसले लिए गए थे, उस पर क्या कार्रवाई हुई उसकी रिपोर्ट भी अभी तक नहीं आई है? तो कुलपति ने कहा कि रिपोर्ट आ गई है। फिर कहते हैं यूनिवर्सिटी सरस्वती का मंदिर है और इसे अराजक तत्वों  के हवाले हमने कर दिया है। फिर हाथ जोड़कर कहने लगे कि हमारा देश ज्ञान की संस्कृति है, अगर ज्ञान के मंदिर में बम चलेंगे या ऐसी घटना होती है, जिससे शर्मिंदा होना पड़े, यह तो मैं कह भी नहीं सकता हूँ। कुलाधिपति महोदय विश्वविद्यालय परिसर में भ्रमण-सम्मलेन करने निकल गए। हॉस्टल में अवैध कब्जा को लेकर नाराज हो गए। लेकिन नीतीश कुमार अपनी आँखें बंद नहीं रखे हैं।<br />
 <br />
45 साल पहले जब जगन्नाथ कौशल चंडीगढ़ से बिहार के राज्यपाल बनकर आए थे, तब उनके बच्चों ने भी पटना विश्वविद्यालय में नामांकन कराया था। उसी विवादास्पद बिहार नेशनल कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान कॉमन रूम का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था, &#8220;यदि मेरा वश चले तो मैं राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को बंद कर दूं, ताला लगा दूं।&#8221; आज की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg" alt="" width="1994" height="1213" class="aligncenter size-full wp-image-6582" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg 1994w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-300x182.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-1024x623.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-768x467.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-1536x934.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1994px) 100vw, 1994px" /></a></p>
<blockquote><p>पटना विश्वविद्यालय के एक अवकाश प्राप्त प्राध्यापक का कहना है कि “जब प्रदेश में शिक्षा को अपाहिज कर गंगा में डुबकी लगाने के लिए छोड़ दिया गया, आप सीनेट और सिंडिकेट की बात करते हैं। आज ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और भावार्थ बताने वालों की भी किल्लत है शैक्षणिक संस्थानों में। हम किस संस्कार और गरिमा की बात करते हैं? पटना विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल अपने ही प्रदेश के एक नागरिक का देन है जिन्होंने आज से सौ वर्ष पहले शिक्षा के महत्व को समझा। शिक्षाओं की बैठकी का महत्व समझा। दीक्षांत समारोह का महत्व समझा। आज अगर विश्वविद्यालय अथवा प्रदेश की सरकार उस स्थान पर मॉल या वातानुकूलित बाजार खोलने की बात कर दे तो यकीन कीजिये प्रदेश के लाखों लोग पैसे फूंकने को तैयार हो जाएंगे । आज शिक्षा का कोई मोल नहीं है। शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। प्रदेश में जो भी पढ़ने पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं हैं वे अपने जीवन निर्माण के लिए, पढ़ने के लिए प्रदेश से पहले ही बाहर निकल जाते हैं।”</p></blockquote>
<p>बहरहाल, <strong>बी.एन. कॉलेज की स्थापना 1889 में कुल्हरिया राज, भोजपुर, बिहार के दो उत्साही शिक्षाविदों और राष्ट्रवादियों बाबू बिशेश्वर सिंह और शालिग्राम सिंह </strong>ने की थी। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के बाद औपनिवेशिक शासन के दौरान, इन दोनों भाइयों ने छात्रों के बीच राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने की सख्त जरूरत महसूस की और इस कॉलेज का नाम बिहार नेशनल कॉलेज रखा, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन पर राष्ट्रीय शब्द को हटाने के लिए बहुत दबाव डाला और राजा की उपाधि और एक बहुत बड़ी जागीर देने का वादा किया। लेकिन चूंकि ये भाई इस मायने में दूसरे ज़मींदारों से अलग थे कि जहाँ दूसरे लोग शिक्षा के प्रसार को अपने अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा मानते थे, वहीं ये सिंह भाई शिक्षा के उत्कृष्ट और महान उद्देश्यों के लिए प्रतिबद्ध थे, इसलिए उन्होंने दबावों के आगे घुटने नहीं टेके। उस समय बिशेश्वर सिंह कलकत्ता कॉलेज ऑफ़ लॉ में अंतिम वर्ष (लॉ) के छात्र थे। कलकत्ता के गवर्नर जनरल ने उन्हें कॉलेज से निकाल दिया। इतना ही नहीं जब बिशेश्वर सिंह ने पीएल प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद पटना सिविल कोर्ट में वकालत शुरू की तो उन्हें बार एसोसिएशन में बैठने की भी इजाजत नहीं दी गई। उन्हें अनेक कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ा। सरकार ने उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया और अंततः शालिग्राम सिंह के पुत्र शशिशेखर सिंह, जो न्यायमूर्ति केबीएन सिंह के पिता थे, की 1942 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसलिए यह राष्ट्रीय शब्द बहुत ही सार्थक है जिसका लंबा और गौरवशाली इतिहास आज भी छात्रों में राष्ट्रवादी भावनाओं और जज्बे को भर देता है। सात शहीदों में शामिल जगपति कुमार इसी कॉलेज के छात्र थे।</p>
<p><strong>शुरू में कॉलेज में अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, हिंदी, दर्शनशास्त्र आदि की ऑनर्स स्तर तक शिक्षा दी जाती थी। बिहार में पहली बार इसी कॉलेज में लॉ की पढ़ाई शुरू हुई थी। प्रो. आत्माराम, जो बाद में पटना कॉलेज के प्राचार्य बने, लॉ संकाय के प्रथम प्रभारी थे। तीन संकायों में स्तरीय शिक्षा दी जाती है, मानविकी संकाय, विज्ञान संकाय और सामाजिक विज्ञान संकाय। स्नातकोत्तर स्तर पर अंग्रेजी में पढ़ाई होती है। चार व्यावसायिक पाठ्यक्रम: फंक्शनल इंग्लिश, बायोटेक्नोलॉजी, बीसीए और बीबीए सफलतापूर्वक और कुशलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं। कई छात्रों ने वैश्विक स्तर पर अपनी योग्यता साबित की है। 1892 में, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इसे प्रथम स्तर के कॉलेज का दर्जा दिया। 1923 में, पटना के तत्कालीन आयुक्त एकडेल एर्लियो के प्रयासों से इस कॉलेज को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया और इसे पूर्ण घाटा अनुदान कॉलेज का दर्जा दिया गया। 1952 में, इस कॉलेज को पटना विश्वविद्यालय की एक घटक इकाई में बदल दिया गया।</strong></p>
<p>श्री अक्षय कुमार मजूमदार, डॉ. डी.एन. सेन, मोइनुल हेग, डॉ. डी.पी. विद्यार्थी, डॉ. एस.के. बोस, डॉ. अमरनाथ सिन्हा, डॉ. एम.पी. सिन्हा, डॉ. पी.के. पोद्दार और अन्य जैसे गतिशील और ऊर्जावान प्राचार्यों के तहत कॉलेज ने शानदार विकास किया है। कॉलेज देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए रोल मॉडल है।  इस कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है और विभिन्न क्षेत्रों में पथप्रदर्शक और अग्रणी रहे हैं। इस कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. मोइनुल हक ने भारतीय ओलंपिक टीम का नेतृत्व किया था। उनकी याद में पटना के राजेंद्र नगर में मोइनुल हक स्टेडियम की स्थापना की गई है। भारत के पहले अटॉर्नी जनरल लाल नारायण शर्मा, 11 साल तक केंद्रीय मंत्री रहे और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक और पद्म भूषण पुरस्कार विजेता डॉ. बिंदेश्वर पाठक इसी महाविड़फयालय के छात्र रहे। भारत के माननीय न्यायमूर्ति मिहिर कुमार झा, पटना उच्च न्यायालय आदि इस कॉलेज के पूर्व छात्र रहे हैं। पद्म पुरस्कार विजेता जैसे डॉ. मोइनुल हक (1971 में पद्म श्री), डॉ. कलीम अजीज (1989 में पद्म श्री), डॉ. शैलेंद्र नाथ श्रीवास्तव (2003 में पद्म श्री), डॉ. शरफे आलम (2004 में पद्म श्री) भी इसी महाविद्यालय के छात्र थे। </p>
<p><strong>लेकिन इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि 1990 में जब प्रदेश का बागडोर लालू प्रसाद यादव के हाथों आया, जो ऐतिहासिक चारा घोटाला में मुख्य आरोपी, सजा पाने वाले रहे, इसी महाविद्यालय के छात्र थे। लव कुअमार मिश्र कहते हैं कि &#8216;हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। </strong></p>
<p>उनके अनुसार, एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है। <br />
बहरहाल, आज प्रदेश ही नहीं, देश-विदेश में रहने वाले विद्वान-विदुषियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण शोध का विषय है कि विगत 78 वर्षों में बिहार के राज्यपाल / कुलाधिपति की कार्यालय/कुर्सी पर कोई विदुषी क्यों नहीं विराजमान हुई? इतना ही नहीं इतिहास साक्षी है कि पटना विश्वविद्यालय के इतिहास में आज तक सिर्फ 37 दिनों के लिए श्रीमती रमोला नंदी (11.08.1973 से 16.09.1973) को छोड़कर कोई भी विदुषी कुलपति भी नहीं बनी और लगातार पुरुषों ने सिंहासन पर कब्ज़ा बनाये रखा। </p>
<figure id="attachment_6583" aria-describedby="caption-attachment-6583" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6583" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6583" class="wp-caption-text">डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>आइये राज्यपाल के साथ सहरसा चलते हैं </strong></p>
<p>सहरसा जिले की स्थापना &#8216;अप्रैल फूल&#8217; के दिन 1 अप्रैल, 1954 को हुआ था। विगत 71 वर्षों में सहरसा में कितना विकास हुआ सरकारी स्तर पर, यह सहरसा के मतदाता तो जानते ही हैं, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद और सरकार के नुमाइंदे भी अवगत है, चाहे समस्या शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, सड़क की हो, रोजगार की हो। आज पुरे देश में श्रमिकों का पलायन जितना सहरसा-मधेपुरा क्षेत्र से हो रहा है, दुखद है। ऐसे मुनाफा कमाने के उद्देश्य से ही सही, इन क्षेत्रों में निजी क्षेत्रों का प्रादुर्भाव एक सकारात्मक संकेत दे रहा है। इसी कड़ी के तहत डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन की अगुवाई में विगत 15 मई को सहरसा जिला के  राष्ट्रीय राजमार्ग 107 पर स्थित ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज परिसर में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो का विधिवत प्रसारण हेतु उद्घाटन किया। इस कॉलेज इसका उद्देश्य बी.एड. और डी.एल.एड. की शिक्षा देना तो है ही, ठोस नैतिक आधार पर शिक्षण के पेशे को विकसित करना है। वैसे आंकड़ों के अनुसार, भारत के 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन संचालित हैं। इन स्टेशनों को 36 निजी प्रसारकों द्वारा चलाया जाता है। 234 नए शहरों में 730 नए निजी एफएम रेडियो चैनलों की हाल ही में स्वीकृति के साथ भारत में निजी एफएम रेडियो स्टेशनों की संख्या में वृद्धि होने की उम्मीद है। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar">&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कांग्रेस की तरह बिहार भाजपा में भी &#8216;मुख्यमंत्री के दावेदारों की बाढ़&#8217;, &#8216;ठंढ़क&#8217; में होने वाले चुनाव&#8217; के लिए गर्मी में गर्मागर्मी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजीत नारायण मिश्रा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 May 2025 05:27:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chief ministers]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[janta dal]]></category>
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		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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		<category><![CDATA[vidhansabha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना: कल्पना कीजिये कि बिहार के &#8216;वर्तमान&#8217; मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राजनीतिक पदोन्नति के लिए, या फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में &#8220;फिर एक बार&#8221; बने रहने के लिए &#8220;अन्तर्वीक्षा&#8221; हो रहा है। मेज के एक तरफ &#8220;अनुशासित रूप&#8221; में सज-धज कर, सुगन्धित परफ्यूम का छिड़काव कर, आमला तेल लगा सफ़ेद शिरोरुह को कंघी कर अभ्यर्थी नीतीश कुमार [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/like-congress-bihar-bjp-too-has-a-flood-of-contenders-for-the-post-of-cm">कांग्रेस की तरह बिहार भाजपा में भी &#8216;मुख्यमंत्री के दावेदारों की बाढ़&#8217;, &#8216;ठंढ़क&#8217; में होने वाले चुनाव&#8217; के लिए गर्मी में गर्मागर्मी</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना: कल्पना कीजिये कि बिहार के &#8216;वर्तमान&#8217; मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राजनीतिक पदोन्नति के लिए, या फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में &#8220;फिर एक बार&#8221; बने रहने के लिए &#8220;अन्तर्वीक्षा&#8221; हो रहा है। मेज के एक तरफ &#8220;अनुशासित रूप&#8221; में सज-धज कर, सुगन्धित परफ्यूम का छिड़काव कर, आमला तेल लगा सफ़ेद शिरोरुह को कंघी कर अभ्यर्थी नीतीश कुमार बैठे हैं। रह-रह कर वे अपने दाहिने-बाएं हाथ को अपने मुख पर ले जाकर साफ़ कर रहे हैं। दांत से समर्थित नहीं होने के कारण दोनों होठों को सूखने से बचाने के लिए बार-बार विभिन्न दिशाओं में ले जा रहे हैं। चेहरे पर तेज तो है, लेकिन &#8216;भयभीत&#8217; भी प्रतीत हो रहे हैं। </strong></p>
<p>और मेज के दूसरे तरफ अन्तर्वीक्षा लेने बैठे हैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह। दोनों प्रदेश में राजनीतिक निर्णय लेने के लिए सुबह-सवेरे दिल्ली से पटना पदार्पित हुए हैं। अन्तर्वीक्षा कक्ष का आकार-प्रकार कोई 30 वर्ग फुट में हैं। चतुर्दिक पारदर्शी शीशा लगा है। शीशे के दूसरे तरफ पटना ही नहीं, भारत वर्ष के छोटे-बड़े स्ट्रिंगर्स से लेकर संपादक तक खचाखच भरे हैं। प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता की आवाज सुनने के लिए &#8216;ठेकेदारी प्रथा के तहत&#8217; बेहतरीन आधुनिक उपकरणों की व्यवस्था है। कक्ष का तापमान 16 डिग्री है। सन्नाटा पसरा है। </p>
<p>इससे पहले कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेश से गृहमंत्री श्री अमित शाह प्रश्न पूछने के लिए तैयार हों, नीतीश कुमार अपने जेब से द्वितीय वस्त्र निकालकर पसीना पोछते हैं और मेज पर रखे पानी से भरे गिलास को उठाकर दंतहीन मुख तक ले जाते हैं। प्रधानमंत्री उनकी शारीरिक भाषा को देखते अपने सामने रखे कागज पर कुछ लिखते हैं। उधर शीशे के दूसरे तरफ खड़े नीतीश कुमार के &#8216;तथाकथित समर्थक&#8217;, जिसमें कुछ मंत्री, कुछ राजनीतिक ठेकेदार भी हैं जिनका मंत्रियों और अधिकारियों से जबरदस्त साठ-गाँठ है, नीतीश ,कुमार को हतास नज़रों से देखते हैं। अन्तर्वीक्षा कक्ष और उस कक्ष के बाहर परिसर में तापमान धीरे-धीरे उष्मता के तरफ़ बढ़ रहा है। कक्ष के कोने में सूखते कंठ को तरल बनाये रखने के लिए पानी के छोटे-छोटे प्लास्टिक वाला गिलास रखा है। <br />
तभी प्रधानमंत्री प्रश्न पूछते हैं: नीतीश जी बिहार के छठे और सातवें मुख्यमंत्री कौन थे और दोनों कितने दिन कार्यालय में रहे? </p>
<blockquote><p>प्रश्न सुनते ही नीतीश कुमार अपने मुँह को पोछने लगते हैं। जिह्वा को मुख के अंदर इंडिया गेट गोल चक्कर जैसा घुमाने लगते हैं। सामने शीशे के उस पार खड़े उनके तथाकथित हितैषी अपने मोबाइल और लैपटॉप पर गूगल खोज करने लगते हैं। प्रश्न का उत्तर नहीं मिलने पर प्रधान मंत्री कागज पर फिर कुछ लिखते हैं।</p></blockquote>
<p> <br />
तभी श्री अमित शाह कहते हैं “नीतीश जी सीधा बिंदु पर आते हैं। आगामी चुनाव में आप मुझे अपनी पार्टी का के वर्तमान संख्या से कितना स्थान दे रहे हैं? प्रश्न पूरा भी नहीं हुआ था कि नीतीश कुमार कहते हैं “हम आपके हो गए सनम” सभी आपका ही है। चौबीस पहले दिए, चौबीस और ले लें। लेकिन  …. &#8221;</p>
<p><strong>तभी प्रधानमंत्री बीच में कहते हैं: आप धृतराष्ट्र हो गए हैं नीतीश जी । धृतराष्ट्र को पुत्र मोह हो गया था और आपको मुख्यमंत्री कार्यालय में रखी कुर्सी से। मोह का त्याग करें। आप पवन कुमार चामलिंग, नवीन पटनायक, ज्योति बसु, जी अपंग, लाल थनहवला, वीरभद्र सिंह, माणिक सरकार, एम करुणानिधि, प्रकाश सिंह बादल, यशवंत सिंह पंवार, नेफ्यू रिओ, श्रीकृष्ण सिन्हा, शिवराज चौहान, मोहनलाल सुखदिआ जैसे &#8216;विरासत मुख्यमंत्रियों&#8217; की सूची में हैं। यह एक इतिहास है। आपके अंक को पार करने वाला आने वाले समय में शायद कोई नहीं होगा। आगामी वर्ष में आप अपने जीवन का हीरक जयंती मनाएंगे। अब युवाओं को मुख्यमंत्री कार्यालय में आने के लिए स्थान छोड़ दें। अधिक जिद अच्छा नहीं होता। अब तक आप जो कहे, हम मानते गए।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_6471" aria-describedby="caption-attachment-6471" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6471" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6471" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री के मुख से जैसे-जैसे शब्द निकल रहे थे, अभ्यर्थी नीतीश कुमार का मुख मलिन हो रहा था। मुखमण्डल का प्रकाश &#8216;बादलमय&#8217; हो रहा था। शीशे के दूसरे तरफ उपस्थित लोगों के चेहरों पर भी सहस्त्र फांक दिख रहा था। कुछ हंस रहे थे, कुछ मन ही मन व्यथित हो रहे थे। कुछ भाजपा में प्रवेश के लिए &#8216;हरी पत्ती&#8217; प्राप्त कर लिए थे, कुछ संदेह के घेरे में लिपट रहे थे। इस बीच नीतीश कुमार के जीवन में चलने वाली सांस की तरह चिपके उनके &#8216;अपने लोग&#8217; अपना भविष्य देख रहे थे। बाहर उपस्थित पत्रकार दीर्घा में टिकर पर कहानियों की श्रृंखला लिखी जा रही थी। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज आ रहा था। </p>
<p>बहरहाल, पटना में गर्मी अभी से उफान पर है। वैसे बिहार में इन दिनों कुछ ज्यादा ही गर्मी पड़ रही है। मौसम के साथ-साथ राजनीतिक गर्मी से भी राज्य उबलने लगा है। अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसको लेकर सभी पार्टियां तैयारियों में जुट चुकी हैं। चुनाव को लेकर हमेशा एक कदम आगे रहने वाला एनडीए अभी से ही जोश में है। भाजपा के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह बिहार के नेताओं के साथ चुनावी रणनीति बना रहे हैं। दिल्ली के बाद अब बिहार में फिर से अपनी सरकार बनाने को उतावली भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है और शायद इसलिए पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को लाडला संबोधित कर यह जता दिया था कि बिहार में इस बार भी नीतीश ही सीएम फेस रहेंगे। हालांकि अभी से इस पर भी बात होने लगी है कि इस बार भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर अस्वस्थता के कारण चुनाव बाद भाजपा उनके बदले किसी और को रिप्लेस कर सकती है। </p>
<p>बिहार की राजनीति सीधे केंद्र की राजनीति पर असर डालती है, इसलिए केंद्र की किसी भी सरकार के लिए बिहार का समीकरण इंपाॅर्टेंट होता है। राज्य की राजनीति कब किस तरह से करवट लेगी, कहना मुश्किल है, पर इतना तो तय है कि इस बार भी बिहार का चुनाव नीतीश कुमार के इर्द गिर्द बुना जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में 243 सीटों की विधानसभा में भाजपा 110 सीटों तथा जदयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इस बार सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी व सौदेबाजी देखने को मिल सकती है, क्योंकि पिछली बार जेडीयू मात्र 43 सीटों जीत पाई थी। नीतीश का स्वास्थ्य भी अभी अच्छा नहीं चल रहा है, इसलिए भाजपा हरसंभव कोशिश करेगी कि जदयू को कम से कम सीटें दी जाए। हालांकि सबकुछ उस समय की परिस्थिति पर ही निर्भर करेगा। अगर राजद को अच्छी सीटें आती हैं तो नीतीश कुमार के पास आरजेडी के साथ जाने का विकल्प बना रहेगा और इसका डर भाजपा को भी है। </p>
<p><strong>अपने मजबूत वोटबैंक की वजह से पक्ष-विपक्ष के केंद्र में नीतीश</strong></p>
<p>नीतीश कुमार 74 साल के हो गए हैं, ऐसे में इस बार वे सीएम कुर्सी पर बैठेंगे या नहीं, इस पर संशय है। बिहार की राजनीति को करीब से जानने वाले वरीय पत्रकार उमाकांत लखेड़ा कहते हैं कि नीतीश में अब वो दम नहीं, जो बिहार को अपने मनमुताबिक चला सके। अभी ही वे बीमार लग रहे हैं और कुछ भी बोल जा रहे हैं। बिहार के लिए भले ही उन्होंने बहुत काम किया है, पर लोगों को भी लगने लगा है कि अगले पांच साल के लिए नीतीश तो बिलकुल फिट नहीं हैं। नीतीश कुमार ने अपने बाद जदयू में दूसरी पंक्ति का कोई नेता उभरने ही नहीं दिया और 23 साल से पूरी पार्टी उनके ही इर्द-गिर्द घूम रही है। दूसरी पंक्ति में अब उनके बेटे निशांत कुमार को आगे किया जा रहा है, पर 40 की उम्र पार कर रहे निशांत राजनीतिक विरासत संभालने में कितने सफल हो पाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। </p>
<p>राजनीति विश्लेषकों की मानें तो नीतीश के बाद जेडीयू का अस्तित्व मुश्किल में लग रहा है। सबसे बड़ी बात नीतीश कुमार के पास 14 प्रतिशत वोट है और भाजपा भी इस बात को मानती है कि नीतीश जिस तरफ जाते हैं, जीत उसी की होती है। इसी कारण बिगड़ते स्वास्थ्य व बोल के बावजूद भी नीतीश भाजपा के लाडला बने हुए हैं। एक बार मान भी लें कि अगर नीतीश को अलग-थलग किया गया, तो अति पिछड़ा वर्ग का वोट टूटेगा। इस टूट का बड़ा हिस्सा भाजपा में जाएगा, तो राजद को भी फायदा मिलेगा। यह वही वोटबैंक है जो राजद से टूटकर जदयू में आया है। राज्य में 15 साल की सरकार के बाद भी विपक्षी पार्टी राजद का वोट प्रतिशत लगातार 26 से 27 प्रतिशत के बीच बना हुआ है। अति पिछड़ा वर्ग काफी जद्दोजहद के बाद जेडीयू के साथ गया है। अगर राजद को इस वोटबैंक में सेंध लगानी है तो टिकट बंटवारे में उस जमात को प्रतिनिधित्व देना पड़ेगा। </p>
<figure id="attachment_6472" aria-describedby="caption-attachment-6472" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6472" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6472" class="wp-caption-text">बिहार विधान सभा</figcaption></figure>
<p>2020 में एनडीए को जीत मिली और नीतीश के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ था, पर 2022 के अगस्त में नीतीश महागठबंधन में चले गए और राजद संग सरकार बना ली। इस दौरान &#8216;सर्वमान्य नेता&#8217; ने विपक्षी दलों को एकजुट किया और &#8216;इंडिया गठबंधन&#8217; की नींव रखी, पर जनवरी 2024 में फिर मन बदला और वापस एनडीए में लौट गए। तबसे नीतीश कुमार कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि वह अब कहीं नहीं जाने वाले हैं। पर, मन और दिल कब बदल जाये, कौन जानता है? अमित शाह के हालिया बयान के बाद पक्ष-विपक्ष के केंद्र में आ चुके नीतीश इतने सालों बाद भी क्यों सत्ता के शीर्ष पर बने हैं? </p>
<blockquote><p>राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है, परिस्थितियां बहुत कुछ बदल देती हैं। ऐसे भी राजनीति में &#8216;खेला&#8217; आम हो चुका है। बिहार में भी समय-समय पर &#8216;खेला&#8217; होते रहा है, इसलिए लोगों को लगता है कि 2025 के चुनाव से पहले राज्य में एक बार फिर &#8216;पलटबाजी&#8217; हो सकती है, पर यह अफवाह या &#8216;वायरल भविष्यवाणी&#8217; कितनी सच होगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल एनडीए में सबकुछ सामान्य है या ऐसे कहें कि सामान्य दिखाने की कोशिश जारी है। दरअसल, बिहार राजनीति में फिर से नीतीश कुमार ट्रेंड कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बिहार के सीएम फेस को लेकर कहा था कि यह पार्लियामेंट्री बोर्ड तय करेगा कि सीएम कौन होगा?</p></blockquote>
<p>उसके बाद से कयास लगाए जाने लगे कि नीतीश कुमार फिर से असहज हो गए हैं। हालांकि अमित शाह के बयान पर जेडीयू ने साफ कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। दो कदम आगे बढ़ते हुए जदयू ने कई पोस्ट भी जारी कर दिए, जिसमें संदेश दिया गया कि 2025 में अगर एनडीए की सरकार बनी, तो चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। जब बात बिहार की हो, नाम सिर्फ नीतीश कुमार का हो। क्यों करें विचार, जब हैं ही नीतीश कुमार। इस तरह के स्लोगन प्रेशर पॉलिटिक्स की एक बानगी हो सकती है, पर यह भी सच्चाई है कि भाजपा के लिए अब भी मजबूरी हैं नीतीश कुमार। </p>
<p><strong>भाजपा नेताओं को शाह का गुरुमंत्र, जनता के बीच जाकर मोदी के कामकाज बताएं</strong></p>
<p>एक-दूसरे के वोटबैंक में सेंधमारी की कोशिशें भी जारी हैं। भाजपा के प्रदेश परिषद की बैठक में भाजपा यह कहने तक में संकोच करती रही कि पार्टी अकेले सरकार बनाने की इच्छा रखती है। हालिया मंत्रिपरिषद विस्तार में भी भाजपा ने अपने वोटबैंक सवर्ण व वैश्य को साधते हुए कुर्मी, कोइरी सहित अति पिछड़ों को भी साधा है। कल्याणकारी योजनाओं से भाजपा अति पिछड़ा वर्ग के पास जा रही है, तो जदयू की मुख्य वोटर महिलाओं में भी पैठ बढ़ा रही है। </p>
<p>पिछले महीने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा नेताओं को आगामी चुनावों की तैयारी के लिए गुरुमंत्र दिया। उनका कहना था कि बिहार में मतदाता प्रतिशत बढ़ाने व कमजोर क्षेत्रों को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने पार्टी नेताओं से वोट शेयर को बढ़ाने की रणनीति पर काम करने को कहा। अमित शाह का कहना था कि मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भाजपा को कभी 23 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले थे, वहीं महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में यह आंकड़ा 21 प्रतिशत के आसपास ही था, पर पार्टी ने ऐसे वीक प्वाइंट को पहचान कर उसपर काम किया और रिजल्ट सबके सामने है। बिहार में भी उन्होंने नेताओं से कमजोर बूथों को चिह्नित कर वहां काम करने और जनता का भरोसा जीतने को कहा है।<br />
 <br />
<figure id="attachment_6473" aria-describedby="caption-attachment-6473" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6473" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6473" class="wp-caption-text">आप राजनीतिक गुरु हैं अमित जी, ध्यान रखिएगा &#8211; प्लीज</figcaption></figure></p>
<p>दरअसल, राज्य में विपक्षी गठबंधन की कमजोरियां भाजपा के लिए एक बड़ा अवसर है। अगले छह महीनों के लिए एक विस्तृत रोडमैप पेश किया गया। इसमें बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग, मतदाता जागरूकता अभियान, सोशल मीडिया के जरिए प्रचार और स्थानीय मुद्दों को उठाने जैसे बिंदु शामिल है। इसके साथ ही यहां की जनता के बीच केंद्र सरकार की उपलब्धियों जैसे उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और किसानों के लिए शुरू की गई योजनाओं को जोर-शोर से प्रचारित करने की आवश्यकता बताई। दरअसल, भाजपा इस बार किसी हाल में बिहार में अपनी मौजूदगी को और बेहतर करना चाहती है, ताकि अगर चुनाव बाद नीतीश का मन बदले तो जोड़-तोड़ कर किसी तरह से सरकार बनाने में सफल हो जाए। भाजपा फिलहाल संभल कर राजनीति कर रही है, ताकि नीतीश कुमार दूर भी न जाएं और वह अपने पैरों पर खड़ी भी हो जाए। </p>
<p><strong>माहौल अभी से बनने लगा है, इधर भी और उधर भी&#8230;  </strong></p>
<p>सियासी हलकों में चर्चा गर्म है कि क्या एनडीए से नीतीश कुमार का फिर मोहभंग होता जा रहा है? क्या नीतीश कुमार का समाजवाद फिर जाग उठेगा और वे फिर से लालू यादव को पुराना मित्र बताने लगेंगे? सवाल कई हैं, जिसका जवाब सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार के ही पास है, क्योंकि अब भी नीतीश कुमार कब, कौन सी चाल चलेंगे, यह सिर्फ उन्हें ही पता होता है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कुछ समय पहले कहा था कि सीएमओ को बीजेपी वाले चला रहे हैं, सीएम नीतीश का सरकार पर कंट्रोल नहीं है। हाल के दिनों पक्ष-विपक्ष में नीतीश कुमार को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। राजद नेता का कहना है कि विपक्ष में रहते हुए तेजस्वी यादव ने कभी भी नीतीश कुमार का अपमान नहीं किया, जबकि भाजपा के नेता सम्राट चौधरी नीतीश कुमार को ‘पागल’ तक कह चुके हैं। </p>
<blockquote><p>राजद नेता भाई वीरेंद्र का कहना है कि नीतीश कुमार का मन सांप्रदायिक शक्तियों के साथ रहकर भर गया है तो वो इधर आ सकते हैं, इधर उनका स्वागत रहेगा। किसी का तो यहां तक कहना है कि बिहार में भाजपा बहुमत में आएगी तो सीएम बदल देगी। अपना सीएम बनाएगी महाराष्ट्र जैसा, नीतीश जी सजग और सतर्क रहें, वरना उनके साथ खेला तय है। </p></blockquote>
<p>हालांकि, जानकारों की मानें तो नीतीश कुमार फिलहाल ऐसा कोई फैसला नहीं करने जा रहे हैं, कम से कम आगामी विधानसभा चुनाव तक तो बिल्कुल भी वे कहीं नहीं जा रहे हैं, पर चर्चाओं का बाजार गर्म है और राजनीति में कब क्या हो जाए यह कोई नहीं जानता। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर का कहना है नीतीश कुमार ही एनडीए का चेहरा होंगे। जदयू एनडीए के साथ लड़े या महागठबंधन के साथ, अगले चुनाव में उन्हें 20 सीटें भी नहीं मिलेंगी। ऐसा इसलिए क्योंकि आज अगर बिहार की जनता सबसे ज्यादा किसी से नाराज है, तो वो हैं नीतीश कुमार। जनता नीतीश के अफसर राज से परेशान है। </p>
<p>भाजपा भी जानती है कि नीतीश कुमार आज राजनीतिक बोझ बन चुके हैं और कोई उनका भर उठा नहीं सकता, हालांकि नियति ने भी ऐसी व्यवस्था बना दी है कि भाजपा की मजबूरी हो गई है कि अगला चुनाव नीतीश के नेतृत्व में ही लड़ना लड़ेगी। प्रशांत किशोर ने चुनौती तक दे दी है कि अगर हिम्मत है तो बीजेपी अगला चुनाव नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके लड़े। अगर ऐसा हुआ तो जो 2020 के चुनाव में जेडीयू के साथ हुआ, वह इस बार जदयू के साथ-साथ भाजपा का भी होगा। दरअसल, बिहार के बच्चों की चिंता करने की जगह भाजपा ने दिल्ली में चंद सांसदों के लालच में बिहार को नीतीश कुमार के हवाले कर दिया। </p>
<p><strong>महागठबंधन में सीट बंटवारा राजद के लिए किसी मैच जीतने से कम नहीं</strong></p>
<p>वैसे, देशभर में भले ही मोदी नाम की धूम है, मोदी के नाम पर भाजपा चुनाव जीत जा रही है, पर बिहार में अब भी नीतीश हैं तो मुमकिन है। भाजपा का काई भी ऐसा नेता नहीं है, जो नीतीश कुमार की बराबरी कर सके। 2013 में जब नीतीश कुमार ने गठबंधन बदल राजद के साथ गए और वापस एनडीए में आए तब भी भाजपा ने उनका स्वागत किया। अभी की सरकार में ही देखिए, भाजपा के दो उप मुख्यमंत्री और 21 मंत्री हैं, तो जदयू के सिर्फ 13 मंत्री हैं। पिछली बार जेडीयू को 43 सीट आई थी और भाजपा को 74 पर जीत हासिल हुई थी। </p>
<p>हालांकि कुछ ऐसा ही महगठबंधन में भी है। कांग्रेस पिछली बार की तरह इस बार भी 70 सीट पर लड़ना चहती है, पर राजद 30 से ज्यादा देने के मूड में नहीं है। वाम दल अलग ही राग अलाप रहे हैं। पिछली बार 19 में से 12 सीटों पर माले को जीत मिली थी, वहीं 2-2 पर भाकपा व माकपा जीतने में कामयाब रही। अब तो भाकपा-माले के दो सांसद भी हो गए हैं। आप कह सकते हैं कि कांग्रेस भले बिहार में अपनी मौजूदगी की लड़ाई लड़ रही है, वाम दलों का जनाधार बढ़ा है तो इस बार अधिक सीटों की उनकी दावेदारी भी बनेगी ही। उधर, महागठबंधन की सरकार में उपमुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए मुकेश सहनी भी सम्मानजनक सीट का दावा करेंगे। पर, इन सबके बीच पिछली जीत से उत्साहित राजद इस बार अधिक से अधिक सीटों पर लड़ना चाहती है। </p>
<p>2020 में राजद ने 243 में 144 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, वहीं वाम दलों ने 29 सीटों पर उम्मीदवार दिए थे, जिसमें भाकपा माले ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था। भाकपा ने 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। माकपा के चार उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे। कांग्रेस को गठबंधन में 70 सीटें मिली थे, पर जीत महज 19 पर मिली। बिहार में इस बार अपनी पार्टी के अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्ण अल्लावारु भी बहुत सधे हुए शब्दों में आक्रामक दिखने की कोशिश कर रहे हैं। राजद ने अभी तक कुछ कहा नहीं है, पर कांग्रेस की सीटें कम करने और सीपीआईएमएल की सीट बढ़ाने की चर्चा है। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस व राजद के बीच चुनाव तक उठापटक बढ़ने की आशंका है। हालांकि इंडिया गठंबंधन के लिए अच्छा यही है कि जितनी जल्दी हो सके चीजों का बंटवारा करके सार्वजनिक घोषणा करें, क्योंकि जनमानस में धारणा बहुत मायने रखती है।</p>
<p><strong>एनडीए में नीतीश के नाम पर सहमति, पर सब मान रहे इस बार सीएम कुर्सी पर नया चेहरा</strong></p>
<p>प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति को लेकर दावा किया है कि नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। इस बार चुनाव में चाहे कोई भी पार्टी जीते, नीतीश जी की कुर्सी जाएगी। जनता बदलाव चाहती है और प्रशांत किशोर का जन सुराज अभियान इसी बदलाव की बात लोगों तक पहुंचा रहा है। पीके कहते हैं कि अगर एनडीए जीतता है, तो भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाएगी। अगर एनडीए हारता है, तब भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। मतलब साफ है कि इस बार बिहार को एक नया मुख्यमंत्री मिलेगा। हालांकि पीएम मोदी कह चुके हैं कि अब भी नीतीश ही उनके लाडले हैं, पर राजनीति में लाडला कब खटक जाए, पता नहीं चलता। जीतन राम मांझी व चिराग पासवान भी नीतीश कुमार के नाम पर पहले ही अपनी मुहर लगा चुके हैं। </p>
<p>इतना तो साफ है कि कुछ भी हो एनडीए नीतीश कुमार के नाम पर ही चुनावी मैदान में उतरने वाला है। भाजपा कोटे के मंत्री प्रेम कुमार का कहना है कि मुख्यमंत्री के सवाल पर विचार चुनाव के बाद होगा, वहीं बिहार भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल का कहना है कि चुनाव तो नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, हालांकि मुख्यमंत्री कौन होगा इसका फैसला भाजपा का संसदीय बोर्ड करता है। इधर, जदयू भी निशांत कुमार के जरिये भाजपा पर लगातार दबाव बना रहा था कि नीतीश कुमार को ही एनडीए का सीएम फेस घोषित कर दिया जाए, जो कामयाब नजर आता दिख रहा है। </p>
<p><strong>राजद को पीके से नुकसान, एनडीए की राह हो सकती है आसान</strong></p>
<p>कहा जाता है बिहार की राजनीति जातियों पर आधारित है। राज्य में छोटी पार्टियों के नेताओं की एक विशेष जाति पर पूरी पकड़ है, जैसे चिराग पासवान का एक अपना वोट बैंक है, तो जीतन राम मांझी का एक अलग वोट बैंक है। मुकेश साहनी की भी अपनी जाति पर अच्छी पकड़ है। इनके जातिगत वोट बैंक को हासिल करने के लिए गठबंधन की जरूरत है। राजद के लिए अच्छा यही रहेगा कि कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के बजाय अपनी सीटों पर प्रत्याशी उतारे, तो ज्यादा फायदा होगा। भाजपा भी अपना फुटप्रिंट बनाने की कोशिश कर रही है। </p>
<figure id="attachment_6474" aria-describedby="caption-attachment-6474" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6474" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6474" class="wp-caption-text">दम है तो कोई मुख्यमंत्री बन के दिखा दीजिये</figcaption></figure>
<p>चिराग पासवान को जितनी सीटें मिलती रही है उतनी ही मिलेगी, जीतन राम मांझी की भी जहां पकड़ है, वहां सीटें दी जाएगी। बाकी छोटी पार्टियों की भूमिका कुछेक क्षेत्रों तक सीमित है। हालांकि चुनाव में इस बार जनसुराज पार्टी भी एक फैक्टर है, पर यह कितना काम करेगा यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा। प्रशांत किशोर भले अपने दम पर कुछ नहीं कर पाएं, पर नुकसान सबका करेंगे यह तो तय है। पीके को जितने भी प्रतिशत वोट आएंगे, वह महागठबंधन से ही निकलेगा, जिससे एनडीए की राह आसान हो जाएगी। <br />
आज भी नीतीश, कल भी नीतीश&#8230; सबकी पसंद में हमेशा &#8216;बीस&#8217; <br />
 <br />
2025 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि एनडीए की तरफ से कौन होगा मुख्यमंत्री का चेहरा? 30 दिसंबर से चंपारण से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी &#8216;प्रगति यात्रा&#8217; शुरू कर चुके हैं। हालांकि पहला फेज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निधन के बाद स्थगित करना पड़ा, पर इस यात्रा के दौरान उन्होंने विकास की कई योजनाओं के साथ रीगा चीनी मिल की विधिवत शुरुआत करके लोगों के बीच एक बार फिर से विकास की किरण जगाई है। नीतीश की इस यात्रा के बाद जनवरी के दूसरे सप्ताह से जदयू की जिला व प्रमंडलीय बैठक भी शुरू होने वाली है। उधर, 6 और 7 जनवरी को भाजपा के वरिष्ठ नेता और गृहमंत्री अमित शाह भी बिहार आने वाले हैं, जो एनडीए के सहयोगी दलों के साथ बैठकर आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगे। </p>
<p>नीतीश के साथ-साथ नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की भी यात्रा चल रही है। दरअसल, इस बार तेजस्वी भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। भाजपा, जदयू, राजद के अलावा लगभग सभी दल अपनी चुनावी चौपड़ बिछाने में लगे हैं। चुपके चुपके होते होते अब सार्वजनिक तौर पर चर्चा छिड़ गई है कि नीतीश कुमार तो हैं ही, अगर वो नहीं तो कौन होगा उनके बाद? हालांकि अमित शाह के बयान के बाद जिस तरह से विपक्ष ने नीतीश को लेकर भाजपा को घेरना शुरू कर दिया, उससे बचने के लिए एक के बाद एक भाजपा नेता यह कहते दिखे कि अगला चुनाव एक बार फिर से नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ जाएगा। अब भी केंद्र में नरेंद्र मोदी और बिहार में नीतीश कुमार सर्वमान्य नेता हैं।<br />
 <br />
नीतीश के नाम में अब भी कोई इफ बट नहीं है। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने भी साफ कर दिया है कि अगला चुनाव नीतीश कुमार और पीएम मोदी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। वहीं, बिहार भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने भी नीतीश कुमार की ही अगुवाई में चुनाव लड़ने की बात कही है। जेडीयू कह चुका है नीतीश कुमार की अगुवाई में ही चुनाव लड़ा जाएगा। बिहार की राजनीति को करीब से जानने वालों का मानना है कि स्लोगन देकर जदयू ने सहयोगियों से विरोधियों तक सबको यह संदेश दे दिया है कि सीएम पद की बात होगी तो पार्टी अपने नेता के नाम से टस से मस नहीं होगी। </p>
<p><strong>बिहार की राजनीति में सबकुछ सामान्य तो बिल्कुल नहीं है!</strong></p>
<p>एक बार कुछ महीनों की क्रोनोलॉजी को देखेंगे तो पूरे मामले को समझ जाएंगे, पहले बिहार में सीएम फेस को लेकर अमित शाह का बयान, फिर भीम राव आंबेडकर को लेकर गृहमंत्री के बयान को लेकर केजरीवाल की नीतीश को चिट्ठी, फिर एनडीए की बैठक से पहले सीएम का बीमार हो जाना और अब सम्राट चौधरी से लेकर दिलीप जायसवाल तक द्वारा नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात करना, कहीं न कहीं इस बात की ओर इंगित करता है कि बिहार की राजनीति में सबकुछ सामान्य बिल्कुल नहीं है। भाजपा नेताओं को यहां तक बोलना पड़ा कि एनडीए में नीतीश कुमार के नेतृत्व को लेकर विपक्ष द्वारा अफवाह फैलाया जा रहा है। सम्राट चौधरी, विजय कुमार सिन्हा, गिरिराज सिंह, प्रेम कुमार, दिलीप जायसवाल जैसे लगभग सभी बड़े भाजपा नेताओं को बोलना पड़ गया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही सरकार चल रही है और आगे भी चलती रहेगी। सबसे बड़ा बवाल उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के बयान से मच गया था, पहले उन्होंने कहा था कि बिहार में जब अपनी सरकार बनेगी तो अटल बिहारी वाजपेयी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, पर बाद में अपने बयान को सुधारते हुए कहा कि बिहार में अटल बिहारी वाजपेयी के सोच के अनुकूल सरकार बनेगी और नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार आगे भी रहेगी। </p>
<p>वहीं, केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी साफ तौर पर कह दिया है कि 2025 का चुनाव भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। हम के नेता और मंत्री संतोष सुमन ने भी कहा है कि नीतीश कुमार की कोई नाराजगी नहीं है एनडीए में सब एक है। विपक्ष के सवाल पर संतोष सुमन का कहना था कि विपक्ष को कोई काम नहीं है, इसलिए विपक्ष इस तरह की बातें कर रहा है। सरकार में रहते नीतीश को खरी-खरी सुनाने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार और नवीन पटनायक को भारत रत्न देने की मांग कर नया शिगूफा छोड़ दिया है। गिरिराज ने कहा कि बिहार को एक ऊंचाई पर ले जाने का काम नीतीश कुमार ने किया है। ओडिशा में नवीन पटनायक ने भी सालों तक सेवा की। ऐसे व्यक्ति को देश में पुरस्कृत किए जाने की जरूरत है। </p>
<figure id="attachment_6475" aria-describedby="caption-attachment-6475" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6475" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/A-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6475" class="wp-caption-text">निर्णय हम करेंगे नहीं तो खेला हो जायेगा</figcaption></figure>
<p>चाहे वह जिस भी पद पर रहा हो, काम करने वाले को भारत रत्न से नवाजा जाए। गिरिराज का यह बयान महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है, क्योंकि अक्टूबर में उनकी &#8216;स्वाभिमान यात्रा&#8217; को लेकर जदयू भड़क गई थी। जदयू का कहना था कि बिहार में सभी लोग सुरक्षित हैं और सौहार्द बना हुआ है तो फिर इस तरह की यात्रा की क्या जरूरत? इसपर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल को बीच में आकर बोलना पड़ा था कि गिरिराज की यात्रा से पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे भी नीतीश कुमार और गिरिराज सिंह के बीच कभी भी बहुत मधुर संबंध नहीं रहे हैं, जिसकी गाहे-बगाहे चर्चा होती रहती है। अब नीतीश को लेकर ऐसे बयान देकर गिरिराज ने कहीं न कहीं यह जताने की कोशिश की है कि एनडीए में सबकुछ सामान्य है। </p>
<p><strong>नीतीश नहीं तो कौन? भाजपा में एक नहीं कई हैं &#8216;सीएम इन वेटिंग&#8217; </strong></p>
<p>अंदरूनी झगड़े और पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार होना भाजपा की सबसे बड़ी समस्या है। पार्टी के अंदर एक नहीं कई नाम हैं, जो खुद को &#8216;सीएम इन वेटिंग&#8217; मानते हैं। इस आकांक्षा की पहली पंक्ति में डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम सबसे पहले आता है। राजद छोड़ जबसे सम्राट भाजपा जॉइन किए हैं, तभी से उन्हें लगने लगा है कि भाजपा का सीएम उम्मीदवार वही हैं। हालांकि पार्टी में आते ही उन्हें बड़ी बड़ी जिम्मेवारी देकर कहीं न कहीं उनकी ऐसी भावना को और भड़काया गया है। उनके बाद दूसरे डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा भी कहीं न कहीं यह मानते हैं कि पार्टी में वही सर्वसम्मत नेता हैं, और गाहे-बगाहे बयान देकर ऐसा जताते भी रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल भी इस रोग से अछूते नहीं हैं। उनके चाहने वालों का मानना है कि सम्राट चौधरी से अध्यक्ष की कुर्सी उन्हें इसलिए दी गई है, ताकि सीएम उम्मीदवार के लिए उनका नाम सबसे आगे रहे। </p>
<p>इसके अलावा केन्द्रीय गृह मंत्री नित्यानंद राय और गिरिराज सिंह में भी वो काबिलियत पूरी है, जो एक सीएम बनने में होती है। हाँ, ये बात और है कि भाजपा आलाकमान को कौन पसंद आता है, ये तो वक्त बताएगा। वैसे, बिहार एनडीए के अन्य घटक दलों के नेता चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता भी नीतीश कुमार को 2025 के चुनाव रिजल्ट के बाद एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाने की बातें कह चुके हैं। 2019 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी के खिलाफ कैंडिडेट देने वाले चिराग पासवान ने तो यहां तक कह दिया है कि 2025 में भी नीतीश कुमार ही एक बार फिर से शपथ लेंगे। इसलिए भाजपा नेताओं की उम्मीद कितनी पूरी होगी यह अभी कहना मुश्किल है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/like-congress-bihar-bjp-too-has-a-flood-of-contenders-for-the-post-of-cm">कांग्रेस की तरह बिहार भाजपा में भी &#8216;मुख्यमंत्री के दावेदारों की बाढ़&#8217;, &#8216;ठंढ़क&#8217; में होने वाले चुनाव&#8217; के लिए गर्मी में गर्मागर्मी</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार का सत्यानाश (भाग-4) विशेष कहानी : 1990 से पूर्व 19 मुख्यमंत्रियों ने मिलकर किया, 1990 के बाद शेष कार्य दो मुख्यमंत्रियों ने कर दिखाया, प्रयास जारी है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ruins-of-bihar-and-bihars-chief-ministers</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Jan 2025 11:11:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chief ministers]]></category>
		<category><![CDATA[economy]]></category>
		<category><![CDATA[lalu yadav]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[rabdi devi]]></category>
		<category><![CDATA[runis of bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>महावीर स्थान, पटना जंक्शन : भारत के प्रथम गणतंत्र से देश के 75 वें गणतंत्र तक अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत 75 [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>महावीर स्थान, पटना जंक्शन : भारत के प्रथम गणतंत्र से देश के 75 वें गणतंत्र तक अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत 75 वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। आज भले प्रदेश के नेताओं को, लोगों को, मतदाताओं को दिखाई नहीं दे सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण, आने वाली पीढ़ियां कभी माफ़ नहीं करेगी &#8211; न नेताओं को और ना ही मतदाताओं को।</strong> </p>
<p>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor.jpg" alt="" width="1869" height="1049" class="aligncenter size-full wp-image-6042" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor.jpg 1869w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/CM-fotor-1536x862.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1869px) 100vw, 1869px" /></a></p>
<blockquote><p>डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; की कविता &#8211; सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है &#8211; का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा। </p></blockquote>
<p>लेकिन, प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में &#8221;चाराचोर&#8221; के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे। </p>
<p>लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के वावजूद राबड़ी देवी प्रदेश की मतदाताओं के विश्वास और अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतरीं। इसका मुख्य कारण था &#8216;अशिक्षा&#8217;, जिसे पति-पत्नी द्वय अपने जीवन में कभी महत्व नहीं दिए। अगर देते तो शायद अपनी अगली पीढ़ी के दोनों पुत्रों को शिक्षा की दुनिया में अव्वल बनाते। यही कारण है कि बिहार में शिक्षा का जो पतन कर्पूरी ठाकुर (आज भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत हैं) के कालखंड से प्रारम्भ हुआ, लालू यादव &#8211; राबड़ी देवी &#8211; नीतीश कुमार के कालखंड आते आते नेश्तोनाबूद हो गया, ध्वस्त हो गया। दृष्टान्त प्रदेश की साक्षरता दर है। </p>
<p><strong>वैसे भारतीय राजनीति में &#8216;रामायण&#8217; का चाहे जितना भी दृष्टान्त दिया जाय, वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में &#8216;विभीषणों&#8217; का भरमार है और &#8216;भरत&#8217; का घोर किल्लत है। यह किल्लत देश में तो है ही, बिहार में तो यत्र-तत्र-सर्वत्र है। अवसर की तलाश में गिद्ध जैसे लोग बैठे हैं। सत्ता में बने रहने और सत्ता से बाहर रहने पर शक्ति में जो कमी होती है, लालू यादव इस बात को मन ही मन स्वीकार लिए थे। लेकिन भारत का न्यायालय, देश की जाँच एजेंसियों की निगाह चौबीसों घंटा लालू यादव पर टिकी थी। जैसे ही चारा घोटाला काण्ड अख़बारों के पन्नों पर, न्यायालयों के फाइलों में आया, नितीश कुमार अवसर का लाभ उठाने हेतु सज्ज होने लगे। राजनीतिक शतरंज की गोटियां बिछने लगी। कल तक लालू यादव को बड़े भाई कहने वाले नीतीश कुमार सत्ता की गलियारे में लालू यादव की मुख्यमंत्री पत्नी को परास्त करने के लिए आगे आ गए। </strong></p>
<p>नीतीश कुमार के बारे में उनके राजनीतिक गुरु <strong>जॉर्ज फर्नांडिस</strong> की सोच को <strong>जया जेटली</strong> ने भी उद्धृत किया है एक किताब में : &#8220;वे (जॉर्ज फर्नांडिस) हमेशा कहते थे कि नीतीश कुमार एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके दिमाग को वे कभी नहीं समझ सकते। सबसे बढ़कर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति होने के नाते, जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने की तारीख पर सहमत होने से इनकार कर देते थे या ऐसी बैठकों के दौरान बनी आम सहमति को पलट देते थे, तो वे रात में अकेले उनसे मिलने आते थे और अपने विचार रखते थे, जिस पर वे अमल करने पर ज़ोर देते थे। अक्सर, इस वजह से पार्टी ने अच्छे लोगों को भाजपा में खो दिया; ये वे लोग थे जो अक्सर मेरे साथ चाय पीते थे और नीतीश कुमार के बारे में अपनी पीड़ाएँ साझा करते थे। मैंने जॉर्ज फर्नांडिस को ऐसी बातें बताना अपना कर्तव्य समझा, लेकिन मैं यह भी जानता था कि इससे अनजाने में उनकी चिंताएँ बढ़ जाएँगी। वे हमेशा बड़े लक्ष्य की खातिर तर्कहीन बातों को तर्कसंगत बनाने के लिए उनके आगे झुक जाते थे।&#8221;</p>
<p>खैर। राजनीतिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो विगत 35 वर्षों से बिहार के सत्ता के सिंहासन पर दो व्यक्तियों का आधिपत्य रहा है &#8211; लालू यादव और कंपनी तथा नीतीश कुमार। 35 वर्षों का आधिपत्य होना और प्रदेश का उत्तरोत्तर पिछड़ा होते जाना &#8211; इस बात का प्रमाण है कि दोनों को प्रदेश के विकास से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता, 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव और उनके परिवार जिस तरह सत्ता के ऊपर कब्ज़ा किये, वह आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में काले अक्षर से लिखा जायेगा। आज भी उनके परिवार में दोनों पुत्र विधान सभा और दो संसद में (पत्नी-राज्य सभा और पुत्री लोक सभा) में बैठी है। अगर समुदाय की ही बात करें तो जिस गरीब-गुरबा, पिछड़ा, यादव आदि जातियों के नाम पर वे राजनीति में बरकरार रहे, उनके परिवार से बाहर कोई उस योग्य नहीं है? </p>
<figure id="attachment_6043" aria-describedby="caption-attachment-6043" style="width: 944px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant.jpg" alt="" width="944" height="960" class="size-full wp-image-6043" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant.jpg 944w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant-295x300.jpg 295w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant-768x781.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Manikant-48x48.jpg 48w" sizes="auto, (max-width: 944px) 100vw, 944px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6043" class="wp-caption-text">बीबीसी के पूर्व पत्रकार मणिकांत ठाकुर</figcaption></figure>
<p><strong>बीबीसी</strong> में मुद्दत तक सेवा दिए बिहार के वरिष्ठ पत्रकार <strong>मणिकांत ठाकुर</strong> कहते हैं : 35 साल का समय कम नहीं होता है जहां दो व्यक्ति सत्ता के सिंहासन पर बैठे रहे और प्रदेश रसताल की ओर जाता रहा। इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता है प्रदेश के लिए। जिस आधार पर लोगों ने दोनों को सत्ता के गलियारे में जगह दिया, लोगों को विश्वास दिलाया, एक भी विश्वास और भरोसा पर खड़ा नहीं उतरे, न लालू यादव और ना ही नीतीश कुमार । लोगों के, मतदाताओं के सपनों को चकनाचूर कर दिया इन दोनों नेताओं ने। </p>
<p>मणिकांत ठाकुर आगे कहते हैं: &#8220;नीतीश को ही लें, पटना से लेकर दिल्ली और राष्ट्रीय अखबारों, पत्रिकाओं में नीतीश कुमार को सुशासन बाबू के नाम से अलंकृत किया पत्रकारों ने। लेकिन तार्किक आधार पर कोई भी लेखक और पत्रकार इस बात को सिद्ध नहीं कर सके कि वे नीतीश कुमार को &#8216;सुशासन बाबू&#8217; क्यों कह रहे हैं, लिख रहे हैं। यह प्रायोजित है। हकीकत यह है कि नितीश कुमार का सम्पूर्ण कालखंड &#8216;कुशासन का प्रतीक&#8217; रहा है। आप पीछे के समय में चलिए जब लालू के कालखंड को जंगल राज के रूप में कुख्यात किया गया था लोगों ने, लेखकों ने, पत्रकारों ने । इस बात में क़तई दो राय नहीं है कि लालू के साढ़े सात वर्ष के कालखंड में, जो बाद में राबड़ी देवी के नाम से भी वर्षों तक चला और लालू यादव नेपथ्य से राज किए, प्रदेश में अपराध का जो गणित, भूगोल और राजनीति था, नीतीश के कालखंड में कम हुआ। साधु यादव और सुभाष यादव का जो रंगदारी वाला प्रकोप था, अपराध था, उड़ंडता &#8211; कम हुआ, लेकिन वह प्रथा आज भी जारी है कुछ अलग परिभाषा और स्वरूप में । </p>
<figure id="attachment_6046" aria-describedby="caption-attachment-6046" style="width: 1984px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1.jpg" alt="" width="1984" height="1391" class="size-full wp-image-6046" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1-300x210.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1-1024x718.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1-768x538.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1-1536x1077.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/1-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6046" class="wp-caption-text">समय: लालू यादव और उनकी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी &#8211; बिहार के दो &#8220;निर्माता&#8221;</figcaption></figure>
<p>लालू के कालखंड में हत्या, अपहरण, फिरौती के लिए अपहरण आम था। उस काल खंड के जो भुक्तभोगी हैं, आज भी कलाप रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के राज में, जिन्हें सभी &#8216;सुशासन बाबू&#8217; के नाम से अलंकृत किये हैं, रिश्वतखोरी की प्रथा अनियंत्रित है, अपने उत्कर्ष पर है और यह कतई नहीं माना जायेगा कि इसमें सत्ता के गलियारे में बैठे लोग, सत्ता से संरक्षित अधिकारियों, नेताओं का हाथ नहीं है।&#8221;  और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जिला स्तर से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक, बिहार के बारे में, बिहार की राजनीति के बारे में, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति, स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में लिखने वाले कभी इन बातों को उजागर नहीं किये, कर रहे हैं। नीतीश के राज में जो बुनियादी ज़रूरत है &#8211; शिक्षा, स्वास्थ्य सभी चरमरायी हुई है। </p>
<p><strong>आज नहीं, आने वाले दिनों में शायद फिर कोई जोगिन्दर सिंह जैसा लोग होगा जो प्रदेश के बारे में मिलीभगत को वजागर करेगा और तत्कालीन राजनेता उसका भरपूर फायदा उठाएगा मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान होने के लिए। यह बाहर बसा घोटाला है जिसे नीतीश कुमार अनियंत्रित छोड़ दिए हैं। इस बात से इंकार नहीं कर सकते की प्रदेश में बेहतरीन सड़क व्यवस्था बन गई है, लेकिन इसके लिए नीतीश कुमार का पीठ नहीं ठोका जा सकता है। यह अटल बिहारी वाजपेयी की देन है और यह सिर्फ़ बिहार नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सभी राज्यों में है। नीतीश कुमार  अपने &#8216;ऐतिहासिक कार्यकाल&#8217; में राजनीतिक घोषणा अधिक किए परन्तु उन घोषणाओं पर अमल शून्य हुआ। यह बहुत बड़ी विफलता है।</strong> </p>
<p>2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि  सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे। </p>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2.jpg" alt="" width="2013" height="1319" class="aligncenter size-full wp-image-6047" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2.jpg 2013w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2-300x197.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2-1024x671.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2-768x503.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/2-1536x1006.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2013px) 100vw, 2013px" /></a></p>
<p>11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे &#8211; सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं। </p>
<p>एक दशक पहले 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक, उस समय बिहार के नवनिर्वाचित 243 विधायकों में से 142 यानी 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के अध्ययन के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल विधायकों में से 90 (40 फीसदी) पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। 70 विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। अध्ययन के मुताबिक, &#8216;अपने खिलाफ आपराधिक मामले बताने वाले 142 विधायकों में से 70 (49 फीसदी) ने बताया है कि अदालत उनके खिलाफ पहले ही आरोप तय कर चुकी है।&#8217; 11 विधायकों पर हत्या या हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। इनमें से चार राष्ट्रीय जनता दल के हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1.jpg" alt="" width="1676" height="1220" class="aligncenter size-full wp-image-6048" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1.jpg 1676w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1-300x218.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1-1024x745.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1-768x559.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1-1536x1118.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/A-1-324x235.jpg 324w" sizes="auto, (max-width: 1676px) 100vw, 1676px" /></a></p>
<p>2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में जीते 228 विधायकों के बारे में जानकारी जुटाई गई थी। उस वक्त पता चला था कि इन 228 में से 76 (33 फीसदी) पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके अतिरिक्त, एडीआर ने बताया कि दिल्ली में 70 में से 37 विधायक (53 प्रतिशत), बिहार में 242 में से 122 विधायक (50 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 284 में से 114 विधायक (40 प्रतिशत), झारखंड में 79 में से 31 विधायक (39 प्रतिशत), तेलंगाना में 118 में से 46 विधायक (39 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश में 403 में से 155 विधायकों (38 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं। विश्लेषण में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित परेशान करने वाले आंकड़े भी सामने आए। जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है, कुल 114 विधायकों ने महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामलों की घोषणा की है, जिनमें से 14 ने विशेष रूप से बलात्कार (भादंसं की धारा-376) से संबंधित मामलों की घोषणा की है।</p>
<p><strong>एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू)</strong> की ओर से किए गए विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्रशासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों की ओर से चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए शपथ पत्रों की पड़ताल की गई और संबंधित विवरण प्राप्त किया गया। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और दो केंद्र शासित प्रदेशों में 4,033 में से कुल 4,001 विधायकों का विवरण शामिल है। एडीआर ने कहा कि विश्लेषण में शामिल विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं। </p>
<p>इस रिसर्च में खुलासा हुआ है कि बिहार के 67 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार के 242 विधायकों में से 161 विधायक दागी हैं। यानी इन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। विधायकों के आंकड़ों को देखें तो केरल में 135 में से 95 विधायकों यानी 70 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इसी तरह दिल्ली में 70 में से 44 विधायक (63 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 284 में से 175 विधायक (62 प्रतिशत), तेलंगाना में 118 विधायकों में से 72 विधायक (61 प्रतिशत) और तमिलनाडु में 224 विधायकों में से 134 (60 प्रतिशत) ने अपने हलफनामे में स्वयं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले घोषित किए हैं।</p>
<figure id="attachment_6044" aria-describedby="caption-attachment-6044" style="width: 762px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/rsz_gyan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/rsz_gyan.jpg" alt="" width="762" height="660" class="size-full wp-image-6044" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/rsz_gyan.jpg 762w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/rsz_gyan-300x260.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/rsz_gyan-534x462.jpg 534w" sizes="auto, (max-width: 762px) 100vw, 762px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6044" class="wp-caption-text">हिंदी दैनिक &#8216;आज&#8217; के पूर्व संपादक और खबर मन्त्र के धनबाद के स्थानीय संपादक ज्ञान वर्धन मिश्र</figcaption></figure>
<p>हिंदी दैनिक<strong> &#8216;आज&#8217;</strong> के पूर्व संपादक और <strong>खबर मन्त्र</strong> के धनबाद के <strong>स्थानीय संपादक ज्ञान वर्धन मिश्र</strong> कहते हैं:  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद में सत्ता पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए जबरदस्त शीत युद्ध चल रहा है। दोनों सत्ता की कुर्सी को दांत से प[पकडे रहना चाहते हैं । कोई किसी के लिए दरवाजा खुला रखने की बात करता है,  तो कोई अब यहीं हैं, इधर उधर कहीं नहीं जायेंगे को बारम्बार कह रहा है। हकीकत यह है कि पिछले दशकों से नीतीश कुमार के राजनीतिक चरित्र के मद्दे नजर विश्वास कायम करना मुश्किल प्रतीत होता है। आज स्थिति यह है कि मेरी कमीज से तुम्हारी कमीज ज्यादा सफेद क्यों?&#8221; की बात दोहराई जा रही है। </p>
<p>ज्ञान वर्धन मिश्र कहते हैं कि &#8220;सन 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री रहीं। तीसरे किसी को उभरने ही नहीं दिया। मुस्लिम-यादव समीकरण बना कर मुसलमानों को भ्रम में रखा। लालू यादव के प्रति वफादार रहे अब्दुल बारी सिद्दीकी को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दिया। राष्ट्रीय जनता दल को इधर लालू यादव और जनता दल (यूनाइटेड) को उधर नीतीश कुमार अपनी-अपनी घरेलू पार्टी बनाकर न केवल राजनीति को शाशन कर रहे हैं, बल्कि, प्रदेश के मतदाताओं के साथ पिछले 35 वर्षों से खिलवाड़ भी कर रहे हैं ।</p>
<blockquote><p>मिश्र का कहना है कि &#8220;नीतीश कुमार बहुत बड़े ईगोइस्ट हैं। वे राष्ट्रिय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ रह सकते थे, रह सकते हैं, लेकिन इगो पर चोट लगने ओर वे भी तिलमिला जाते हैं। इन पर भाई भतीजावाद का आरोप तो नहीं लगा लेकिन लेखी कृष्ण को लेकर आरसीपी टैक्स सुर्खियों में था। अब आरसीपी सिंह भी इनके साथ नहीं हैं। जिस तरह का अपराध लालू के कालखंड में था, उन अपराधों का किस्म तो बदल गया है, लेकिन प्रवृत्ति नहीं बदली है। अपहरण उद्योग का सफाया हुआ लेकिन अन्य प्रकार के अपराध का होना जारी है। इसका मुख्य कारण समूचे पुलिस तंत्र का शराब सूंघवा हो जाना है।&#8221;</p></blockquote>
<p>अब आइये पहले 11 अशोका रोड और दिन दयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय कार्यालय के रास्ते 8 वीरचंद पटेल पथ जहाँ भाजपा का प्रदेश मुख्यालय है। देश के राजनीतिक विशेषज्ञ, भाजपा के बड़े-बड़े नेता इस बात को माने अथवा नहीं, आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम का मानना है कि भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने बिहार में अपनी पार्टी को उतना नहीं उभरने दिया, जितने का वह हकदार था। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में भले बिहार के जगत प्रकाश नड्डा को लाकर युवाओं में सन्देश देनी चाही, हकीकत यह था कि नरेंद्र मोदी के आने के बाद भाजपा के केंद्रीय कक्ष में एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो मूक-बधिर हो। अगर बिहार में भाजपा की स्थिति को देखा जाय तो जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद अगर प्रदेश में भाजपा को दिखने, दिखाने में, राजनीतिक मंच पर जीवित रखने में किसी भी एक व्यक्ति का हाथ रहा तो वह थे कद्दावर नेता सुशील कुमार मोदी।  यह अलग बात है कि सुशील कुमार मोदी भी 1990 और उसके बाद से अप्रत्यक्ष रूप से लालू यादव का चारा घोटाला कांड को बेचकर ही राजनीति में कायम रहे, और भाजपा को हमेशा नीतीश का अनुयायी बनाकर स्वयं &#8216;उप-मुख्यमंत्री&#8217; की कुर्सी से संतुष्ट रहे। लेकिन हकीकत यह भी है कि भाजपा के कुछ बड़े नेताओं ने आगे बढ़ने नहीं दिया। </p>
<p>इस बात को वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र भी मानते हैं और मणिकांत ठाकुर भी। उनका भी कहना है कि &#8220;सुशील मोदी और उनके समूह के सम्माननीय विधायकों के पर को हमेशा कतरनें की पूरी कोशिश की गई, साजिश रची गई। वैसे जाति की बात हर राजनीतिक पार्टियां करती हैं, भाजपा में भी है, लेकिन उनके जीवन के अंतिम कालखंड में उनकी जिस तरह उपेक्षा की गई, वे सहन नहीं कर सके।&#8221; भाजपा के केंद्रीय नेता कभी भी प्रदेश में इस पार्टी को मजबूत करने की कोशिश नहीं किए। समयांतराल, केंद्रीय नेता यहां भी जाति की राजनीति किये। </p>
<p>कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24) और दिलीप कुमार जायसवाल (2024 से अब तक) ये सभी पिछले 44 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। सवाल यह है कि इन लोगों के कार्यकाल में भाजपा मजबूत हुआ, पार्टी मजबूत हुयी, भाजपा में बिहार के मतदाताओं का रुझान क्या रहा, यह इस बात का ,प्रमाण है कि आज भी 43 विधायकों के साथ नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और भाजपा के नेता उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। 2015 में विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या भले 53 से बढ़कर 17वीं विधानसभा में 74 हो गया हो; लेकिन यह संख्या भाजपा की अपनी नहीं है। यह संख्या नीतीश कुमार द्वारा दान स्वरुप हैं। 2015 में जनता दल यूनाइटेड की विधानसभा में संख्या 71 थी, जो 17वीं विधानसभा में 43 हो गयी। राष्ट्रीय जनता दल की संख्या भले 80 से घटकर 75 हो गया हो, लेकिन आज भी मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ है। </p>
<p>वैसे <strong>पटना जंक्शन</strong> रेलवे स्टेशन के सामने <strong>पटना सचिवालय</strong> की ओर जाने वाली सड़क पर मुद्दत से पटना से प्रकाशित अख़बारों को बेचने वाला वे अखबार विक्रेता का कहना है कि &#8220;बिहार में कुकुरमुट्टीओं की तरह नेताओं की उत्पत्ति होती है। प्रदेश के सभी 38 जिलों के करीब 45 हज़ार से अधिक गाओं, 8406 पंचायतोनं 534 ब्लॉकों और १०२ सबडिवीजनों में शायद ही कोई हिस्सा होगा जहाँ जहाँ नेता बनाने का उद्योग नहीं लगा है। जन्म लेने के बाद बच्चे, खासकर पुरुष, विद्यालय जाने के बजाय गली-मोहल्ला, नुक्कड़ पर राजनीति करने की पढाई करने लगता है। कुछ महीने अथवा साल के बाद डाकबंगला चौराहे पर आकर बड़का नेता बन जाता है और दो महीने बाद बेली रोड के रास्ते पटना सचिवालय में मुख्यमंत्री कार्यालय में राखी कुर्सी पर भी दावा ठोकने लगता है। अब अगर डाकबंगला चौराहे पर उनसे कोई पूछ दे कि बेली रोड कइने नाम पर अंकित है, तो दांत निपोड़ देंगे।&#8221; </p>
<blockquote><p>अखबार विक्रेता आगे कहता है कि &#8220;कृष्ण बल्लभ सहाय (बिहार के चौथे मुख्यमंत्री) के ज़माने से पटना शहर को देखा हूँ। कई गोली कांड देखा हूँ। कई आंदोलन देखा हूँ। लेकिन सत्ता के गलियारे में आज जिस तरह मछली बाजार बना है, पहले कभी नहीं था। आज किसी भी विधायक को, किसी भी सांसद को, किसी भी मतदाता को एक-दूसरे पर विश्वास नहीं है। सभी अपने-अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। प्रदेश को नोच-नोच कर खा रहे हैं। जो कल रिक्शा पर चलते थे, परन्तु रिक्शावाले को किराया भी नहीं देते थे, आज ऊँची-ऊँची गाड़ियों पर सीढ़ी लगाकर चढ़ते हैं। उन्हें जमीं पर रेंगते, कुहरते मतदाताओं से क्या लेना है। आज कोई देखने वाला, लिखने वाला, पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाला भी नहीं है बाबूजी। लोगबाग वही लिखते हैं, वही छापते हैं जिसमें उन्हें मुनाफ़ा होता है। बहुत बातें हैं, बहुत दुःख है गरीबों का।&#8221;</p></blockquote>
<p>भाजपा की कोशिश रही कि यादव अथवा पिछड़ी जाति के लोगों को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बना देने से प्रदेश के यादव समुदाय, अथवा दलित और पिछड़ी जाती के मतदाता, जो आज लालू यादव के साथ हैं, भाजपा के साथ हो जायेंगे &#8211; यह सोच ही गलत है। इस बात को वातनुकूलत कक्ष में बैठे भाजपा के नेता, सफ़ेद स्त्रीदार, बिना किसी सिलवट के वस्त्र पहने, खंभो की तरह चलने वाले नेता, ताकि वस्त्र में दाग न लग जाय, सिलवट ख़राब न हो जाय &#8211; नहीं समझ सकते हैं। आज ऐसे नेताओं की संख्या बिहार में गली-कूचियों में भाड़े-पड़े हैं। मणिकांत ठाकुर भी इस बात को स्वीकारते हैं कि भाजपा अपने सिद्धांतों से, स्थानीय नेताओं की मदद से अपना आधार बनाने के बजाय, हमेशा जाती के आधार पर प्रयोग कर रही है। उस प्रयोग में कभी यादव आये हैं तो कभी यादव आते हैं तो कभी राय, कभी ठाकुर आते हैं तो कभी जायसवाल, कभी कोइरी तो कभी धानुक ।  </p>
<figure id="attachment_6049" aria-describedby="caption-attachment-6049" style="width: 1984px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3.jpg" alt="" width="1984" height="1293" class="size-full wp-image-6049" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3-300x196.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3-1024x667.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3-768x501.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/3-1536x1001.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6049" class="wp-caption-text">पत्रकारों के बीच लालू यादव</figcaption></figure>
<p>वैसे कहने के लिए तो लालू यादव पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर है और नीतीश कुमार जी ने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पटना से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। दोनों राजनीतिक परवरिश देश के महान समाजवादी राजनेताओं के इर्द-गिर्द हुई। राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, वी.पी सिंह जैसे राजनैतिक दिग्गजों की देख-रेख में लालू यादव और नीतीश कुमार ने राजनीति के सभी दृष्टिकोणों समझा और परखा। दोनों 1974 से 1977 तक चले जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। दोनों के अंदर तथाकथित रूप से &#8216;समाजवाद की ऐसी छाप पड़ी&#8217; और राजनीतिक सफर के लिए दोनों ने &#8216;समाजवाद&#8217; का नारा बुलंद किया। लेकिन दोनों वास्तविक रूप से कितने समाजवादी हो पाए यह दिवंगत राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, जय प्रकाश नारायण की आत्माएं बताएंगी। </p>
<p>1985 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बिहार विधानसभा पहुंचे थे नीतीश कुमार और 1987 में युवा लोक दल के अध्यक्ष भी बने। तत्पश्चात 1989 में बिहार में जनता दल इकाई के महासचिव और नौवीं लोकसभा के सदस्य चुने गए। लोकसभा में अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार केंद्रीय राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। वर्ष 1991 में नीतीश कुमार दोबारा लोकसभा के लिए चुने गए और साथ ही राष्ट्रीय स्तर के महासचिव बनाए गए। वे लगातार वर्ष 1989 से लेकर 2004 तक बाढ़ निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीतते रहे। वर्ष 2001 से 2004 के बीच कैबिनेट मंत्री के तौर पर रेल मंत्रालय जैसी जिम्मेदारी को भी बखूबी संभाला। बिहार की जनता ने नीतीश कुमार जी को अब तक सात बार बिहार के मुख्यमंत्री बनाया है। पहली बार मार्च 2000 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला। आजकल लोग उन्हें &#8220;सुशासन बाबू&#8221; के नाम से अलंकृत किये हैं लेकिन वास्तविक रूप से कितने सुशासन बाबू कहलाने के लायक हैं, यह वे बेहतर जानते हैं। </p>
<figure id="attachment_6045" aria-describedby="caption-attachment-6045" style="width: 515px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/sanjeet.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/sanjeet.jpg" alt="" width="515" height="645" class="size-full wp-image-6045" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/sanjeet.jpg 515w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/sanjeet-240x300.jpg 240w" sizes="auto, (max-width: 515px) 100vw, 515px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6045" class="wp-caption-text">बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संजीत नारायण मिश्र</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार</strong> के वरिष्ठ पत्रकार <strong>संजीत नारायण मिश्र</strong> कहते हैं: &#8220;राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है, परिस्थितियां बहुत कुछ बदल देती हैं। ऐसे भी राजनीति में &#8216;खेला&#8217; आम हो चुका है। बिहार में भी समय-समय पर &#8216;खेला&#8217; होते रहा है, इसलिए लोगों को लगता है कि 2025 के चुनाव से पहले राज्य में एक बार फिर &#8216;पलट बाजी&#8217; हो सकती है, पर यह अफवाह या &#8216;वायरल भविष्यवाणी&#8217; कितनी सच होगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल एनडीए में सबकुछ सामान्य है या ऐसे कहें कि सामान्य दिखाने की कोशिश जारी है।&#8221;</p>
<p>पटना से प्रकाशित विभिन्न हिंदी अख़बारों में अपनी भूमिका निभाने वाले संजीत मिश्र का मानना है कि &#8220;बिहार राजनीति में नीतीश कुमार ट्रेंड कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विधानसभा चुनाव में बिहार के सीएम फेस को लेकर कहा था कि यह पार्लियामेंट्री बोर्ड तय करेगा कि सीएम कौन होगा?  उसके बाद से कयास लगाए जाने लगे कि नीतीश कुमार फिर से असहज हो गए हैं। हालांकि अमित शाह के बयान पर जेडीयू ने साफ कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। दो कदम आगे बढ़ते हुए जदयू ने कई पोस्ट भी जारी कर दिए, जिसमें संदेश दिया गया कि 2025 में अगर एनडीए की सरकार बनी, तो चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। &#8216;क्यों करें विचार, जब हैं ही नीतीश कुमार&#8217;, इस तरह के स्लोगन प्रेशर पॉलिटिक्स की एक बानगी हो सकती है, पर यह भी सच्चाई है कि भाजपा के लिए अब भी मजबूरी हैं नीतीश कुमार।&#8221;</p>
<p><strong>इनका कहाँ है कि &#8220;अंदरूनी झगड़े और पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार होना भाजपा की सबसे बड़ी समस्या है। पार्टी के अंदर एक नहीं कई नाम हैं, जो खुद को &#8216;सीएम इन वेटिंग&#8217; मानते हैं। इस आकांक्षा की पहली पंक्ति में डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम सबसे पहले आता है। राजद छोड़ जबसे सम्राट भाजपा जॉइन किए हैं, तभी से उन्हें लगने लगा है कि भाजपा का सीएम उम्मीदवार वही हैं। हालांकि पार्टी में आते ही उन्हें बड़ी बड़ी जिम्मेवारी देकर कहीं न कहीं उनकी ऐसी भावना को और भड़काया गया है। उनके बाद दूसरे डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा भी कहीं न कहीं यह मानते हैं कि पार्टी में वही सर्वसम्मत नेता हैं, और गाहे-बगाहे बयान देकर ऐसा जताते भी रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल भी इस रोग से अछूते नहीं हैं।&#8221;</strong></p>
<p>इतना ही नहीं, मिश्र का मानना है कि &#8220;सम्राट चौधरी से अध्यक्ष की कुर्सी उन्हें इसलिए दी गई है, ताकि सीएम उम्मीदवार के लिए उनका नाम सबसे आगे रहे। इसके अलावा केंद्रीय गृह मंत्री नित्यानंद राय और गिरिराज सिंह में भी वो काबिलियत पूरी है, जो एक सीएम बनने में होती है। हाँ, ये बात और है कि भाजपा आलाकमान को कौन पसंद आता है, ये तो वक्त बताएगा। वैसे, बिहार एनडीए के अन्य घटक दलों के नेता चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता भी नीतीश कुमार को 2025 के चुनाव रिजल्ट के बाद एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाने की बातें कह चुके हैं। 2019 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी के खिलाफ कैंडिडेट देने वाले चिराग पासवान ने तो यहां तक कह दिया है कि 2025 में भी नीतीश कुमार ही एक बार फिर से शपथ लेंगे। इसलिए भाजपा नेताओं की उम्मीद कितनी पूरी होगी यह अभी कहना मुश्किल है। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ruins-of-bihar-and-bihars-chief-ministers">बिहार का सत्यानाश (भाग-4) विशेष कहानी : 1990 से पूर्व 19 मुख्यमंत्रियों ने मिलकर किया, 1990 के बाद शेष कार्य दो मुख्यमंत्रियों ने कर दिखाया, प्रयास जारी है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>✍ एक देश, एक तिरंगा 🇮🇳 एक संविधान 📙 फिर &#8216;एक सार्वभौमिक पुलिस अधिनियम&#8217;🪖क्यों नहीं ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2023 02:20:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[chief ministers]]></category>
		<category><![CDATA[governors]]></category>
		<category><![CDATA[home minister o india]]></category>
		<category><![CDATA[lok sabha speaker]]></category>
		<category><![CDATA[politicians]]></category>
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<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/one-country-one-tricolour-one-constitution-one-police-act">✍ एक देश, एक तिरंगा 🇮🇳 एक संविधान 📙 फिर &#8216;एक सार्वभौमिक पुलिस अधिनियम&#8217;🪖क्यों नहीं ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : पिछले दिनों जब देश के गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोक सभा में एक लिखित प्रश्न का उत्तर देते यह कहा कि देश के कुल 17,535 कार्यरत थानों में से 63 पुलिस थानों में कोई वाहन नहीं है, तो सुनकर, पढ़कर कोई आश्चर्य नहीं लगा था। आज एक तरफ जहाँ देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में तकनीकी और संचार के जगत में क्रांति लाने की बात कर रहे हैं, वहीँ उनके की मंत्रिमंडल के मंत्री यह भी स्वीकार किया कि देश में 628 पुलिस थानों में &#8216;संचार&#8217; की कोई व्यवस्था नहीं है, यानी 628 थानों में &#8216;टेलीफोन&#8217; की भी सुविधा नहीं है। अतः स्वाभाविक है कि ये सभी 628 थाने देश की पुलिसिंग की मुख्यधारा से कटे हैं। </strong></p>
<p>आगे सुनिए। मंत्री महोदय यह भी जवाब दिए कि देश के 285 पुलिस स्टेशनों में &#8216;वायरलेस सेट&#8217; या &#8216;मोबाइल फोन&#8217; भी नहीं है। अगर सरकारी आंकड़े सही हैं तो विगत 9 दिसंबर, 2022 तक दूरसंचार विभाग के डैशबोर्ड पर उपलब्ध कराए गए मोबाइल टावरों की संख्या के अनुसार, दूरसंचार नेटवर्क चलाने वाले चार ऑपरेटरों द्वारा नवंबर 2022 तक 7.37 लाख टावरों और 23.7 लाख बेस स्टेशनों का उपयोग किया जा रहा है। दिसंबर 2017 से टावरों और बीटीएस में क्रमशः लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि और 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। </p>
<p>सरकारी आंकड़े यह भी कहते हैं कि सालाना, टावरों को लगभग स्थिर दर पर जोड़ा जा रहा है, जिसमें साल-दर-साल 45,000-55,000 जोड़े जाते हैं। टेलीकॉम टावर की तरफ और बीटीएस की तरफ 50,000-65,000 नेट जुड़ता है। जबकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने कहा कि 17,535 पुलिस स्टेशनों में से सिर्फ 14,834 पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी उपलब्ध हैं। झारखंड के 564 पुलिस स्टेशनों में से 47 में कोई वाहन नहीं है, 211 में कोई टेलीफोन कनेक्शन नहीं है और 31 बिना मोबाइल फोन या वायरलेस सेट के हैं।</p>
<p>यह तो आंकड़े की बात हुई। अब जरा पैसे की बात देख लें। सांख्यिकी के अनुसार केंद्र हर साल &#8216;पुलिस स्टेशनों के मॉडलाइजेशन के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को आर्थिक मदद करता है। 2019-20 में सरकार ने 781.12 करोड़ रुपये जारी किए। वहीं 2020-21 में 103.25 करोड़ रुपये और 2021-22 में 158.57 करोड़ रुपये जारी किए। यानी पैसा केंद्र से लें, और नियम अपना चलाएं। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=8WnF10Bx5Jk&#038;t=39s"></a></p>
<p>विश्व में पहला केंद्रीय रूप से संगठित और वर्दीधारी पुलिस बल 1667 में किंग लुईस XIV की सरकार द्वारा पेरिस शहर, जो उस समय यूरोप का सबसे बड़ा शहर था, की निगरानी के लिए बनाया गया था। लॉर्ड कार्नवालिस (1786-1793) ने पुलिस सुधारों के एक भाग के रूप में दरोगा प्रणाली की शुरुआत की। प्रत्येक जिले की पुलिस को जिला न्यायाधीश के अधीन रखा गया। प्रत्येक जिले को थाने/पुलिस सर्किलों में विभाजित किया गया था, जिसका नेतृत्व एक भारतीय अधिकारी दरोगा करेगा, जिसकी सहायता कांस्टेबलों द्वारा की जाएगी। </p>
<p>देश की आज़ादी के लिए सन 1857 का विद्रोह तत्कालीन भारत की कानून व्यवस्था को झकझोड़ दिया। उस आंदोलन को कुचलने का सम्पूर्ण प्रयास किया गया। तत्कालीन वाइसराय वॉरेन हास्टिंग ने पुलिस व्यवस्था में सुधार की आवशयकता समझे इसलिए आज भी उन्हें पुलिस सुधार शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने ही 1861 के पुलिस अधिनियम बनाया। आज भी स्वतंत्र भारत में पुलिस के मामले में जो अधिनियम है वह उसी 1861 अधिनियम पर आधारित है। उस पुलिस अधिनियम के तहत पुलिस को लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और कानून के शासन के सम्मान के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करने की परिकल्पना की गई है। </p>
<p>स्वतंत्र भारत में उक्त पुलिस अधिनियम की उपस्थिति में भी प्रत्येक राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वे अपने प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए अपने तरह से विधि-विधान बनायें। लेकिन 1861 का अधिनियम भी रहेगा। अब सवाल यह है कि 1861 अधिनियम के होते हुए अगर राज्य सरकार अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार पुलिस नियम बनाये/बनाएंगे, वैसी स्थिति में 1861 अधिनियम का क्या औचित्य रह जायेगा।?</p>
<p>अब प्रश्न यह है कि अगर देश एक है, देश का राष्ट्रीय ध्वज एक है, देश का संविधान एक है जिसके तहत भारत का प्रत्येक नागरिक है &#8216;बराबर&#8217; है, वैसी स्थिति में पूरे राष्ट्र के लिए एक पुलिस अधिनियम क्यों नहीं है? कहने को तो वॉरेन हस्टिंग के कालखंड में निर्मित 1861 पुलिस अधिनियम है, लेकिन भारत के राज्यों में अपनी अलग-अलग पुलिस नियम हैं? ऐसा क्यों?  भारत के राष्ट्रपति, देश के प्रधानमंत्री, देश का संसद भारत के संविधान के अधीन एक ऐसी व्यवस्था करें जिससे भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस &#8216;एक अधिनियम&#8217; के तहत आएं।</p>
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