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	<title>advani Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>भाजपा को नया अध्यक्ष&#8217; मिल गया है, &#8216;स्थायी&#8217; नहीं, &#8216;तत्काल के लिए&#8217;, क्योंकि &#8216;जग घूमेया थारे जैसा ना कोई 👁 &#8216;नड्डा&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Jul 2025 03:53:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : साल 2014 में नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण के दो साल बाद अली अब्बास की कथा और निर्देशन में एक फिल्म बनी थी &#8216;सुलतान&#8217;, जिसे आदित्य चोपड़ा ने बनाया था। इस फिल्म में सलमान खान, अनुष्का शर्मा, रणदीप हुडा, अमित साध जैसे कलाकार काम किये थे। इस [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : साल 2014 में नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण के दो साल बाद अली अब्बास की कथा और निर्देशन में एक फिल्म बनी थी &#8216;सुलतान&#8217;, जिसे आदित्य चोपड़ा ने बनाया था। इस फिल्म में सलमान खान, अनुष्का शर्मा, रणदीप हुडा, अमित साध जैसे कलाकार काम किये थे। इस फिल्म में सलमान खान और अनुष्का शर्मा पर एक रूमानी गीत फिल्माया गया था जिसके शब्द थे इरशाद कामिल की, संगीत दिया था विशाल-शेखर का और गाये थे रहत फ़तेह अली खान साहब ने। गीत के बोल थे :</strong></p>
<p><em>ओ.. ना वो अखियाँ रूहानी कहीं<br />
ना वो चेहरा नूरानी कहीं<br />
कहीं दिल वाली बातें भी ना<br />
ना वो सजरी जवानी कहीं<br />
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई<br />
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई</p>
<p>ना तो हंसना रूमानी कहीं<br />
ना तो खुशबू सुहानी कहीं<br />
ना वो रंगली अदाएं देखीं<br />
ना वो प्यारी सी नादानी कहीं<br />
जैसी तू है वैसी रहना</em></p>
<figure id="attachment_6910" aria-describedby="caption-attachment-6910" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1.jpg" alt="" width="1600" height="900" class="size-full wp-image-6910" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-1536x864.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6910" class="wp-caption-text">जगत प्रकाश नड्डा</figcaption></figure>
<p><strong>आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह को जब देखता हूँ तो कहीं न कहीं वर्तमान भाजपा के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के प्रति उनके मन में इस गीत का स्वर गुनगुनाते पाता हूँ। क्योंकि न तो मोदी जी को और ना ही अमित शाह को अभी तक जगत प्रकाश नड्डा के बराबर, या फिर कुछ हद तक ही सही&#8217;, समरूप गुणों वाले व्यक्ति, विश्वासपात्र, भाजपा के प्रति समर्पित अभ्यर्थी नहीं मिल पाये हैं, जिनके नाम भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष का मुहर लगा दें। आप इस बात को स्वीकार करें अथवा नहीं। </strong></p>
<p>जगत प्रकाश नड्डा के बाद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेंगे? कोई कह रहे हैं &#8216;पुरुष&#8217; बैठेंगे, कोई महिला सशक्तिकरण का दृष्टान्त देकर कह रहे हैं &#8216;महिला&#8217; बैठेंगी। लेकिन भाजपा में सत्ता के गलियारे में &#8216;गोपनीयता&#8217; अटल बिहार वाजपेयी के ज़माने में भी थी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में तो है ही, वह भी &#8216;उत्कर्ष&#8217; पर। बहरहाल, गिनती शुरू कर दें क्योंकि भाजपा को &#8220;तत्कालीन अध्यक्ष&#8221; मिल गया है और जगत प्रकाश नड्डा के समतुल्य अभ्यर्थी की खोज जारी है। </p>
<p><strong>आज भी याद है जब 1998 में प्रधानमंत्री कार्यालय से दिल्ली के अख़बारों के दफ्तर में फोन की घंटी टनटनाया और कहा गया कि &#8216;वाजपेयी जी अख़बार वालों से तुरंत मिलना चाहते हैं&#8217;, दिल्ली दरबार के पत्रकार अपने-अपने कार्यालयों से निकल कर गंतव्य तक पहुँचने में &#8216;क्या-क्या नहीं सोचे&#8217;, कहानियां भी गढ़े, इंट्रो भी बनाये। लेकिन किसी को भी पता नहीं वाजपेयी जी किस विषय पर बोलने वाले हैं। पोखरण-II परमाणु परीक्षण  में सोचना तो नामुमकिन था। </strong></p>
<figure id="attachment_6911" aria-describedby="caption-attachment-6911" style="width: 894px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM.png"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM.png" alt="" width="894" height="588" class="size-full wp-image-6911" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM.png 894w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM-300x197.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM-768x505.png 768w" sizes="(max-width: 894px) 100vw, 894px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6911" class="wp-caption-text">अटल बिहारी वाजपेयी</figcaption></figure>
<p>मई 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पोखरण-II परमाणु परीक्षण किए गए थे। आधिकारिक तौर पर ऑपरेशन शक्ति के रूप में जाने जाने वाले इन परीक्षणों में राजस्थान के पोखरण परीक्षण रेंज में पाँच परमाणु विस्फोट शामिल थे। पहले तीन परीक्षण 11 मई, 1998 को और शेष दो 13 मई, 1998 को किए गए थे। इन परीक्षणों को करने का निर्णय एक महत्वपूर्ण निर्णय था। तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने परीक्षणों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब वाजपेयी जी सैकड़ों संवाददाताओं और छायाकारों के बीच पोखरण परीक्षण के बारे में बताये, अखबार वाले, टीवी वाले सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उधर दफ्तर में संपादक महोदय भाजपा और प्रधानमंत्री कार्यालय को कवर करने वालों को भृकुटि तान कर देख रहे थे। </p>
<p>उस घटना के 27-साल बाद विगत मई, 2025 को जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में &#8216;ऑपरेशन सिंदूर&#8217; किया गया, इस बात का गंध लोगों को, खासकर प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय या सत्ता के गलियारे में चहलकदमी करने वाले किसी भी पत्रकार बंधू-बांधवों को गंध&#8217; तक नहीं लगा। सत्ता के गलियारे में &#8216;गोपनीयता&#8217; अपने उत्कर्ष पर होता है। इस घटना के बाद लेखक, विश्लेषक, आलोचक जो भी लिखें। आजकल दिल्ली सल्तनत में भारतीय जनता पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा चर्चाएं आम है। कोई पुरुष नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं तो कोई महिला नेताओं को। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से लेकर झंडेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय तक, सभी चुप हैं। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि 1980 में भाजपा के गठन के बाद <strong>अटल बिहारी वाजपेयी</strong> इसके पहले अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में भाजपा ने खुद को एक मध्यमार्गी पार्टी के रूप में पेश किया जो भारतीय जनसंघ की कटु राजनीति से अलग हटकर थी। वाजपेयी, जिन्हें अक्सर भाजपा के उदारवादी चेहरे के रूप में देखा जाता था। बाद में वाजपेयी देश का प्रधानमंत्री भी बने और अपना कार्यकाल भी पूरा किया। </p>
<figure id="attachment_6912" aria-describedby="caption-attachment-6912" style="width: 966px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM.png"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM.png" alt="" width="966" height="580" class="size-full wp-image-6912" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM.png 966w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM-300x180.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM-768x461.png 768w" sizes="(max-width: 966px) 100vw, 966px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6912" class="wp-caption-text">लाल कृष्ण आडवाणी</figcaption></figure>
<p>1986 में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद <strong>लाल कृष्ण आडवाणी</strong> भाजपा के अध्यक्ष बने। कहते हैं यह घटना आमतौर पर भाजपा की विचारधारा में कट्टर हिंदुत्व की ओर बदलाव से जुड़ी है, जिसका उदाहरण 1990 में आडवाणी द्वारा हिंदू राष्ट्रवाद की अपील करके चुनावी समर्थन जुटाने के प्रयास के तहत निकाली गई राम रथ यात्रा है। उन्होंने 1973 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था। भाजपा के विचारक मुरली मनोहर जोशी 1991 में भाजपा अध्यक्ष बने। वे कई दशक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। अपने पूर्ववर्ती लालकृष्ण आडवाणी की तरह, उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान, भाजपा पहली बार मुख्य विपक्षी दल बनी।</p>
<figure id="attachment_6918" aria-describedby="caption-attachment-6918" style="width: 1024px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6918" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6918" class="wp-caption-text">मुरली मनोहर जोशी</figcaption></figure>
<p>आडवाणी के आक्रामक प्रचार अभियान ने 1996 के चुनावों के बाद भारतीय संसद के निचले सदन में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनने में मदद की। हालांकि वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, लेकिन आडवाणी को पार्टी के भीतर ताकत के रूप में देखा गया और बाद में उन्होंने उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। </p>
<figure id="attachment_6919" aria-describedby="caption-attachment-6919" style="width: 1024px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6919" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6919" class="wp-caption-text">कुषा भाऊ ठाकरे</figcaption></figure>
<p>कुषा भाऊ ठाकरे 1942 से ही आरएसएस से जुड़े हुए थे। 1998 में जब वे भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद अध्यक्ष बने, तब वे भाजपा के बाहर ज़्यादा मशहूर नहीं थे। कहते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान भाजपा ने हिंदुत्व पर अपना ज़ोर कम कर दिया, जैसे कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग, ताकि एक बड़े गठबंधन के विचारों को समायोजित किया जा सके।</p>
<figure id="attachment_6913" aria-describedby="caption-attachment-6913" style="width: 1024px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6913" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6913" class="wp-caption-text">बंगारू लक्ष्मण</figcaption></figure>
<p>लंबे समय से आरएसएस के सदस्य रहे <strong>बंगारू लक्ष्मण</strong> 2000 में भाजपा के पहले दलित अध्यक्ष बने। एक साल बाद तहलका पत्रिका के स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें रिश्वत लेते हुए दिखाया गया, जिसके बाद लक्ष्मण ने तुरंत इस्तीफा दे दिया। वे 2012 तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहे, जब उन्हें भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लक्ष्मण के इस्तीफे के बाद <strong>जाना कृष्णमूर्ति</strong> कार्यवाहक अध्यक्ष बने और कुछ ही समय बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उन्हें अध्यक्ष के रूप में पुष्टि कर दी। एक साल बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया जब वे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में कैबिनेट फेरबदल के तहत मंत्री बन गए।</p>
<figure id="attachment_6914" aria-describedby="caption-attachment-6914" style="width: 1024px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6914" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6914" class="wp-caption-text">जाना कृष्णमूर्ति</figcaption></figure>
<p>जाना कृष्णमूर्ति को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के बाद <strong>वेंकैया नायडू</strong> भाजपा अध्यक्ष चुने गए। टिप्पणीकारों ने उनके चुनाव को लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी के रूढ़िवादी हिंदू-राष्ट्रवादी विंग द्वारा फिर से नियंत्रण स्थापित करने के उदाहरण के रूप में देखा। हालांकि नायडू को पूर्ण कार्यकाल के लिए चुना गया, लेकिन एनडीए द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से 2004 के भारतीय आम चुनाव हारने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उस समय लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में कार्यरत आडवाणी, 2004 के भारतीय आम चुनाव के बाद वेंकैया नायडू के इस्तीफा देने के बाद तीसरी बार भाजपा अध्यक्ष बने। आडवाणी विपक्ष के नेता के रूप में अपने पद पर बने रहे। 2005 में आडवाणी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, जब उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में वर्णित किया, जिससे विवाद पैदा हो गया।</p>
<figure id="attachment_6915" aria-describedby="caption-attachment-6915" style="width: 942px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM.png" alt="" width="942" height="602" class="size-full wp-image-6915" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM.png 942w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM-300x192.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM-768x491.png 768w" sizes="auto, (max-width: 942px) 100vw, 942px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6915" class="wp-caption-text">वेंकैया नायडू</figcaption></figure>
<p>दिसंबर 2005 में <strong>राजनाथ सिंह सिंह</strong> ने आडवाणी के कार्यकाल के शेष समय के लिए भाजपा अध्यक्ष का पद संभाला। उन्हें 2006 में पूर्ण कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त किया गया। सिंह ने आरएसएस और भाजपा के लिए कई पदों पर कार्य किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा की युवा शाखा के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना शामिल है। उन्होंने हिंदुत्व मंच पर वापसी की वकालत की। एनडीए के 2009 के भारतीय आम चुनाव हारने के बाद सिंह ने इस्तीफा दे दिया। साल 2009 में <strong>नितिन गडकरी</strong> भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष बने। लंबे समय से आरएसएस के सदस्य रहे गडकरी महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार में मंत्री और भाजपा युवा शाखा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें आरएसएस नेतृत्व का भरपूर समर्थन प्राप्त था। गडकरी ने मंत्री रहते हुए घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के अन्य आरोपों के बाद 2013 में इस्तीफा दे दिया था।</p>
<figure id="attachment_6916" aria-describedby="caption-attachment-6916" style="width: 1024px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6916" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6916" class="wp-caption-text">राजनाथ सिंह</figcaption></figure>
<p>2013 में गडकरी के पद छोड़ने के बाद राजनाथ सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुना गया। सिंह ने 2014 के भारतीय आम चुनाव के लिए भाजपा के अभियान में बड़ी भूमिका निभाई, जिसमें भाजपा के भीतर विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भी शामिल था। पार्टी की शानदार जीत के बाद, सिंह ने गृह मंत्री का पद संभालने के लिए पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। वर्तमान प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी विश्वासपात्र <strong>अमित शाह</strong>, राजनाथ सिंह के पहले मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद उनके कार्यकाल के शेष समय के लिए भाजपा अध्यक्ष बने। टिप्पणीकारों ने शाह की नियुक्ति को भाजपा पर मोदी के नियंत्रण का प्रदर्शन बताया। शाह को 2016 में पूरे तीन साल के कार्यकाल के लिए फिर से चुना गया।</p>
<figure id="attachment_6917" aria-describedby="caption-attachment-6917" style="width: 1024px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6917" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6917" class="wp-caption-text">नितिन गडकरी</figcaption></figure>
<p>इसके बाद,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे समय से जुड़े जगत प्रकाश नड्डाको 2019 में भाजपा का &#8220;कार्यकारी अध्यक्ष&#8221; चुना गया और अध्यक्ष चुने जाने से पहले उन्होंने एक साल तक अमित शाह के साथ पार्टी चलाने की जिम्मेदारी साझा की और आज तक बने हैं । <br />
<strong>भाजपा के स्थापना काल से अब तक 11 अध्यक्ष बने हैं और बारहवें की खोज जारी है। लेकिन यह आश्चर्यजनक है, अगर चौंकाने वाला नहीं है, तो यह है कि मोदी और शाह पिछले एक साल में नड्डा का विकल्प नहीं ढूंढ पाए। ऐसा नहीं है कि मोदी-शाह ने कोशिश नहीं की, लेकिन ऐसा लगता है कि वे सफल नहीं हुए। नड्डा को पहले ही दो बार सेवा विस्तार मिल चुका है। नड्डा को मोदी का करीबी माना जाता है। नड्डा, जो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हैं, 2020 से पार्टी अध्यक्ष पद पर हैं। उनका कार्यकाल 2023 में समाप्त हो रहा था, लेकिन भाजपा ने इसे 2024 तक बढ़ा दिया ताकि वह लोकसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व कर सकें।</strong></p>
<p>अख़बारों में, टीवी के स्क्रीन पर आजकल मनोहर लाल खट्टर, भूपेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान के नाम कभी आते हैं, कभी गायब हो जाते हैं। ऐसी अटकलें भी लोग लगा रहे हैं कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए महिला चेहरे की तलाश कर रही है, क्योंकि पार्टी ने हाल के दिनों में महिला मतदाताओं को प्रभावित करने में सफलता देखी है। इसके अलावा, भाजपा ने 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पर भी जोर दिया, जिसे संसद के दोनों सदनों ने मंजूरी दे दी। विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग की गई है। पार्टी के लिए एक महिला अध्यक्ष की नियुक्ति से यह स्पष्ट संदेश भी जाएगा कि भाजपा इस विधेयक के साथ है।</p>
<p><strong>लोगबाग यह भी लिख रहे हैं कि निर्मला सीतारमण को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता हैं क्योंकि वह पार्टी की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि वह 2019 से वित्त मंत्री का पद संभाल रही हैं, जब भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई थी। इसके अलावा, तमिलनाडु में उनकी जड़ें भी भाजपा के लिए एक फायदा हो सकती हैं, क्योंकि पार्टी दक्षिण में आगे बढ़ रही है। अगर सीतारमण को चुना जाता है, तो यह भाजपा के दक्षिणी क्षेत्र में पहुंच बनाने में मदद कर सकता है और परिसीमन के बाद लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के साथ तालमेल का संकेत दे सकता है।</strong></p>
<p>इसी तरह, <strong>दग्गुबाती पुरंदेश्वरी</strong> के नाम पर भी लोग लिख रहे हैं  जो भाजपा की पूर्व आंध्र प्रदेश इकाई की प्रमुख थीं। वह सरकार के ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थीं, जिसने यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, यूरोपीय संघ, इटली और डेनमार्क में देश के आतंकवाद विरोधी रुख का प्रतिनिधित्व किया था। कई भाषाओं में पारंगत पुरंदेश्वरी ने मंत्री पद और संसदीय अनुभव के साथ एक बहुपक्षीय राजनीतिक करियर बनाया है। वनथी श्रीनिवासन  उछाल रहे हैं जो भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं। 2021 में उन्होंने अभिनेता और मक्कल निधि मैयम (एमएनएम) के संस्थापक कमल हासन को हराकर तमिलनाडु की कोयंबटूर (दक्षिण) सीट जीती थी। वह 1993 से भाजपा से जुड़ी हैं और 2022 में भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनीं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6920" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे उम्मीद है कि आगामी दस दिनों में भारत को भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल जायेगा। अपवाद छोड़कर, अधिकांश राज्यों में संगठनात्मक चुनाव पूरे हो चुके हैं और पदाधिकारियों का चुनाव हो चुका है, और शेष कुछ राज्यों में जल्द ही चुनाव पूरे हो जाएंगे। भाजपा की 36 संगठनात्मक इकाइयों में से 32 में राज्य इकाई के चुनाव महीनों पहले शुरू हो चुके थे, जिनमें राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं।</p>
<p><strong>वैसे आरएसएस ने साफ कर दिया है कि वह दूसरे दलों से आए नेताओं के बजाय घरेलू नेताओं को प्राथमिकता देता है। सांसदों को राज्य प्रमुख नियुक्त करने से हतोत्साहित किया गया। इसके बजाय, राज्य स्तर के विधायकों, एमएलसी और अनुभवी संगठनात्मक कार्यकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। जो लोग अपने राज्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया है और संगठन के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। दलबदलुओं की नियुक्ति अपवाद होगी, नियम नहीं। तरीके में यह बदलाव चुने गए नामों में स्पष्ट है। </strong></p>
<p>मध्य प्रदेश में विष्णु दत्त शर्मा की जगह गोपाल खंडेलवाल को चुना गया। पश्चिम बंगाल में भाजपा के राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य को पार्टी का नेतृत्व करने के लिए चुना गया। महाराष्ट्र में पुराने नेताओं में से एक भरोसेमंद नेता रवींद्र चव्हाण को नियुक्त किया गया। मिजोरम को डॉ. के. बेचुआ मिले, जो एक अनुभवी राजनेता हैं और 2023 में भाजपा में शामिल हो गए थे। आंध्र प्रदेश ने पी.वी.एन. माधव को लाया, जबकि तेलंगाना में एन. रामचंदर राव की वापसी हुई। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में क्रमशः राजीव बिंदल और महेंद्र भट्ट की फिर से नियुक्ति हुई &#8211; दोनों को ही आरएसएस से मजबूत जुड़ाव वाले स्थिर व्यक्तित्व के रूप में देखा गया। पुडुचेरी में वी.पी. रामलिंगम को चुना गया और अंडमान और निकोबार में अनिल तिवारी ने कार्यभार संभाला।</p>
<p>हालांकि, पार्टी के तीन सबसे महत्वपूर्ण गढ़ों- उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा अभी तक नए राज्य प्रमुखों पर आम सहमति नहीं बना पाई है। ये देरी आकस्मिक नहीं है। तीनों राज्यों में आंतरिक गुटबाजी और रणनीतिक दांव अधिक हैं। संघ कथित तौर पर गहरी वैचारिक नींव वाले उम्मीदवारों पर जोर दे रहा है, जबकि राज्य के नेता राजनीतिक रूप से सुविधाजनक नामों की पैरवी कर रहे हैं। पुरानी प्रवृत्ति और नए अनुशासन के बीच संघर्ष के कारण इन राज्यों में अभी भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। जाहिर है, भाजपा ने आरएसएस से विभिन्न राज्य इकाइयों में संगठन मंत्री (महासचिव-संगठन) के रूप में 14 पूर्णकालिक प्रचारकों को नियुक्त करने के लिए कहा है। संगठन मंत्रियों के लिए इस नए प्रयास को व्यापक संगठनात्मक कसावट के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6921" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आंतरिक सूत्रों का कहना है कि एकीकरण का यह चरण इस बात को रेखांकित करता है कि भाजपा अब संघ की प्राथमिकताओं के साथ कितनी निकटता से जुड़ी हुई है। भले ही मोदी और शाह का प्रभाव अभी भी बहुत ज्यादा है, लेकिन राज्य स्तर की नियुक्तियों में उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से कम हो गई है। सूत्रों के अनुसार नया अध्यक्ष कोई स्थायी व्यक्ति नहीं हो सकता। मोदी पहले ही अपने तीसरे कार्यकाल में हैं और भाजपा अपने चरमोत्कर्ष के बाद के चरण में प्रवेश कर रही है, इसलिए अगला पार्टी प्रमुख वह व्यक्ति हो सकता है जिसे 2029 में संगठन का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया हो।</strong></p>
<p>अटकलें यह भी बढ़ रही हैं कि यह संगठनात्मक फेरबदल केंद्र में कैबिनेट फेरबदल के साथ हो सकता है। इस विषय पर <strong>वरिष्ठ पत्रकार अभिनन्दन मिश्र</strong> लिखते हैं कि 15 जुलाई या उससे पहले भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ही बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी के केंद्रीय संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल होने की संभावना है। </p>
<figure id="attachment_6922" aria-describedby="caption-attachment-6922" style="width: 783px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi.jpg" alt="" width="783" height="605" class="size-full wp-image-6922" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi.jpg 783w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi-300x232.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi-768x593.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 783px) 100vw, 783px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6922" class="wp-caption-text">अभिनन्दन मिश्र</figcaption></figure>
<p>अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पार्टी स्तर पर ये बदलाव दिखावटी नहीं बल्कि महत्वपूर्ण होने की संभावना है। छह राष्ट्रीय महासचिवों में से कम से कम दो को बदले जाने की संभावना है और ग्यारह राष्ट्रीय सचिवों में से कई को भी हटाया जा सकता है या फिर उनकी जगह नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। यह व्यवस्था के भीतर गतिरोध को दूर करने, नए चेहरों के लिए जगह बनाने और उच्च-दांव वाले चुनावों से पहले दिशा-निर्देशों को सही करने के लिए किया जा रहा है। जिन लोगों पर इसका असर पड़ने की संभावना है, उनमें वे नेता भी शामिल हैं जो अपने-अपने राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में थे और जिनके नाम मीडिया में मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के संभावित प्रतिस्थापन के रूप में सामने आ रहे थे।</p>
<p><strong>अभिनन्दन मिश्र</strong> का कहना है कि इसके साथ ही, मंत्रिस्तरीय प्रदर्शन के आंतरिक आकलन के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की भी संभावना है। पिछले कई महीनों से शासन का मुख्य काम मुख्य रूप से प्रधानमंत्री मोदी, पीएमओ और कुछ प्रमुख मंत्रालयों के पास रहा है। कई अन्य कमज़ोर पड़ गए हैं &#8211; ख़ास तौर पर काम के निष्पादन के मामले में। सूत्रों ने बताया कि उनके पदों की समीक्षा की गई है और उन्हें कमज़ोर पाया गया है। हटाए गए कुछ मंत्रियों को संगठनात्मक भूमिकाओं में भेजा जाएगा, जबकि कुछ &#8211; ख़ास तौर पर बिहार से &#8211; को आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा जा सकता है, जैसा कि मध्य प्रदेश में किया गया था। बिहार में, राजनीतिक संदर्भ इन बदलावों को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर के अंत के करीब होने के साथ, भाजपा राज्य में प्रमुख ताकत के रूप में उभरने के लिए काम कर रही है।</p>
<p>हालांकि, पार्टी मुख्यमंत्री पद का चेहरा पेश किए बिना चुनाव में उतरेगी। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, भाजपा के पास वर्तमान में राज्य में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसकी पूरे बिहार में मौजूदगी हो या जिसे व्यापक स्वीकार्यता हो और जिसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके। दूसरा, और उतना ही महत्वपूर्ण, नीतीश कुमार चुनाव परिणाम घोषित होने तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे और भाजपा चुनाव से पहले इस नाजुक व्यवस्था को &#8211; थोड़ा भी &#8211; बदलने के लिए इच्छुक नहीं है। बिहार भाजपा के भीतर भी मंथन चल रहा है। पिछले कुछ सालों में दरकिनार किए गए कई वरिष्ठ नेता आगामी फेरबदल को एक संभावित अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनके समर्थकों को उम्मीद है कि नए पार्टी अध्यक्ष के तहत, पहले हाशिए पर धकेले गए कुछ लोगों को फिर से प्रमुखता दी जा सकती है। हालांकि, केंद्रीय पार्टी पदाधिकारियों ने संकेत दिया है कि राज्य में वर्तमान में प्रमुख लोगों में से कुछ को हटाया भी जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो उन्हें हटाया जाना मौजूदा निर्णयों के पैटर्न के अनुरूप होगा।</p>
<figure id="attachment_6923" aria-describedby="caption-attachment-6923" style="width: 1024px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6923" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6923" class="wp-caption-text">भाजपा मुख्यालय</figcaption></figure>
<p><strong>केंद्रीय नेतृत्व ने हाल के महीनों में वरिष्ठता या दृश्यता के बजाय प्रदर्शन और राजनीतिक उपयोगिता को स्पष्ट प्राथमिकता दी है। संगठन/मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पद की प्रबल उम्मीद रखने वालों में कुछ ऐसे चेहरे भी हैं, जिन्हें मोदी सरकार के पहले दो कार्यकाल में जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया। समग्र राजनीतिक कैलेंडर समयसीमा को और भी तंग कर देता है। प्रधानमंत्री मोदी के 10 जुलाई तक अपने पांच दिवसीय विदेश दौरे से लौटने की उम्मीद है। संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक निर्धारित है। अधिकांश अपेक्षित निर्णय &#8211; नए पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति, संगठनात्मक बदलाव और कैबिनेट फेरबदल &#8211; इस तीन सप्ताह की अवधि के भीतर होने की संभावना है। अगस्त के बाद बहुत कम समय बचा है। </strong></p>
<p>यदि बिहार चुनाव अक्टूबर में होते हैं, जैसा कि व्यापक रूप से अनुमान लगाया जा रहा है, तो पार्टी के पास इन बदलावों को लागू करने और उन्हें व्यवस्थित करने के लिए एक संकीर्ण समय होगा। यह उल्लेख करना उचित है कि एक अत्यधिक देरी के बाद, तेजी से आगे बढ़ते हुए, भाजपा ने दस दिनों में अपने संगठनात्मक अभियान के हिस्से के रूप में आठ नए राज्य/इकाई अध्यक्षों की नियुक्ति की है। इनमें महाराष्ट्र शामिल है, जहां मराठा नेता रवींद्र चव्हाण ने कार्यभार संभाला है; पश्चिम बंगाल, जहां अब समिक भट्टाचार्य शीर्ष पर हैं; आंध्र प्रदेश, जहां पी.वी.एन. माधव ने डी. पुरंदेश्वरी का स्थान लिया है; और तेलंगाना, जहां एन. रामचंदर राव ने जी. किशन रेड्डी का स्थान लिया है। मध्य प्रदेश में, वी.डी. शर्मा की जगह हेमंत खंडेलवाल को नया प्रमुख नियुक्त किया गया। पार्टी ने डॉ. के. बेचुआ को मिजोरम का अध्यक्ष और वी.पी. रामलिंगम को पुडुचेरी का अध्यक्ष नियुक्त किया। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में, अनिल तिवारी को नए पार्टी अध्यक्ष के रूप में प्रभार दिया गया। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम को अंतिम रूप देने से पहले उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, ओडिशा और गुजरात में नए प्रमुखों की नियुक्ति करेगी।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/bjp-has-got-a-new-president-not-a-permanent-one-but-an-immediate-one">भाजपा को नया अध्यक्ष&#8217; मिल गया है, &#8216;स्थायी&#8217; नहीं, &#8216;तत्काल के लिए&#8217;, क्योंकि &#8216;जग घूमेया थारे जैसा ना कोई 👁 &#8216;नड्डा&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संवाददाता के लेखन-पुस्तिका से ✍ अफ़जल अमानुल्लाह नहीं चाहे आडवाणी को गिरफ्तार करना धनबाद में, नहीं किये; जो किये वे रायसीना पहाड़ पर भाजपा के मंत्री बने</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Feb 2025 11:50:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : बात कोई 35-साल पहले की है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय के अध्यक्ष थे लाल कृष्ण आडवाणी। आडवाणी जी भाजपा को तीन बार अपना नेतृत्व दिए। साल 1986-91, 1993-98 और 2004-2005 में पार्टी के अध्यक्ष रहे। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में  केंद्र में सरकार बनी, वे गृह मंत्री बने फिर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/afzal-amanullah-did-not-want-to-arrest-advani-in-dhanbad">संवाददाता के लेखन-पुस्तिका से ✍ अफ़जल अमानुल्लाह नहीं चाहे आडवाणी को गिरफ्तार करना धनबाद में, नहीं किये; जो किये वे रायसीना पहाड़ पर भाजपा के मंत्री बने</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : बात कोई 35-साल पहले की है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय के अध्यक्ष थे लाल कृष्ण आडवाणी। आडवाणी जी भाजपा को तीन बार अपना नेतृत्व दिए। साल 1986-91, 1993-98 और 2004-2005 में पार्टी के अध्यक्ष रहे। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में  केंद्र में सरकार बनी, वे गृह मंत्री बने फिर उप-प्रधान मंत्री का भी पद संभाला। आज देश का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, वह भी तीसरी बार, लेकिन वे कभी पार्टी का नेतृत्व नहीं किये &#8211; प्रत्यक्ष रूप से। </strong></p>
<p>लाल कृष्ण आडवाणी से मैं पहली बार रूबरू हुआ था धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में। उन दिनों गोल्ड ग्राउंड में धनबाद के छोटे-छोटे बच्चे क्रिकेट, फुलबॉल खेलते थे। बड़े-बुजुर्ग सुबह-शाम मैदान में बर्जिस करते थे। स्थानीय पुलिस यहीं अपना अभ्यास भी करती थी। आज तो गोल्फ ग्राउंड का भी राजनीतिकरण हो गया है। अब इसका नाम रणधीर प्रसाद वर्मा स्टेडियम हो गया। </p>
<p>इस गोल्फ ग्राउंड में प्रवेश और निकास के तीन रास्ते थे उन दिनों। एक मुख्य मार्ग से। दूसरे एसएसएलएनटी कॉलेज और राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ कार्यालय से आगे दाहिने हाथ से और एक हाउसिंग कालोनी के तरफ से। जो रास्ता महिला कालेज की ओर से आती थी उसी रास्ते के दाहिने हाथ पर पुलिस अधीक्षक का आवास था। रणधीर वर्मा भी उस आवास में रहे थे। जिस दिन वे अपनी अनंत यात्रा पर निकले थे, सुबह इसी गोल्फ ग्राउंड में बर्जिस किये थे। खैर।  </p>
<p>रणधीर वर्मा, जो समय धनबाद के पुलिस अधीक्षक थे और उनका पदोन्नति डीआईजी, बोकारो के लिए हुआ था, 3 जनवरी, 1991 को मृत्यु को प्राप्त किये। जब रणधीर वर्मा हीरापुर के बैंक ऑफ़ इण्डिया में बैंक लुटेरों की गोलियों का शिकार हुए तो सबसे पहले उनके नाम का राजनीतिक लाभ उनकी पत्नी को मिली। श्रीमती रीता वर्मा धनबाद का सांसद बन गयी। उसी वर्ष मई और जून में दसवीं लोक सभा के लिए चुनाव हुआ। भारतीय जनता पार्टी श्रीमती रीता वर्मा को चुनावी मैदान में उतार दी। श्रीमती वर्मा 1991-1996, 1996-1998, 1988-1999 और 1999-2004 यानी 14 वर्ष धनबाद को भारत के संसद में प्रतिनिधित्व की। </p>
<blockquote><p>आज 35 वर्ष बीतने के बाद भी धनबाद के लोगों का जो सम्मान तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रणधीर वर्मा के लिए है, या आगे भी रहेगा, वहां की पूर्व सांसद और रणधीर वर्मा की पत्नी श्रीमती रीता वर्मा को नहीं प्राप्त हुआ। आज जब धनबाद के लोग उनके कालखंड में मतदाताओं और संसदीय क्षेत्र को एक साथ देखते हैं तो रोना आता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि 14 साल सांसद होने के बाद भी अपने क्षेत्र के लिए श्रीमती रीता वर्मा का योगदान &#8220;शून्य&#8221; रहा। खैर। </p></blockquote>
<p>तत्कालीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी 20 अक्टूबर, 1990 को धनबाद के इस गोल्फ ग्राउंड में पधारे थे अपने रथ यात्रा के क्रम में। भारत के आज के 70 फीसदी से अधिक पत्रकार, लोगबाग, विश्लेषक शायद उस दृश्य को नहीं देखे होंगे। मैं वहाँ था एक संवाददाता के रूप में। हज़ारों लोगों की तायदात थी वहां उपस्थित। स्थानीय पत्रकार तो थे ही, पटना, कलकत्ता, दिल्ली से प्रकाशित अख़बारों के संवाददाता और छायाकार भी उपस्थित थे। </p>
<p>आडवाणी जी के साथ पत्रकारों का एक काफिला भी चल रहा था उनके साथ ताकि पग-पग की कहानी अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं को प्रेषित कर सकें। उसी दिन धनबाद डाकधार में टेलेक्स और टेलीप्रिंटर की विशेष व्यवस्था की गयी थी। कुछ अख़बारों के दफ्तर भी थे वहां जहाँ टेलीप्रिंटर लगा था। कलकत्ता समाचार भेजने के लिए डाकघर के टेलीप्रिन्टर का इस्तेमाल करते थे।<br />
 <br />
उस ज़माने में भी कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार अपने स्थानीय पत्रकारों को बहुत अहमियत देता था, संभवतः सम्भतः आज भी देता होगा। अभी तक दी टेलीग्राफ अखबार के तत्कालीन संपादक एमजे अकबर का नाम ही अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित होता था। यह अलग बात है कि कुछ ही समय बात अकबर अपने अखबार और स्वयं से जुड़े सभी लोगों को एक पत्र द्वारा सूचित किये थे कि आखिर वे पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में क्यों प्रवेश ले रहे हैं 1991 लोक सभा चुनाब में किशनगंज से लड़ने। खैर। उनकी अलग कहानी है। </p>
<p><strong>अब आइये आडवाणी जी और मोदी जी के कालखंडों को एक नजर से देखते हैं। आडवाणी जी पत्रकारों का काफ़िला लेकर चलते थे और श्री मोदी जी बंद कमरे में अपना काफ़िला बनाते हैं। वैसे समय में परिवर्तन के साथ-साथ यह होना भी लाज़िमी है, लेकिन जब दोनों कालखंडों की तुलना करते हैं तो सोचता हूँ सब विज्ञान की माया है। </strong></p>
<p>जिस कालखंड में आडवाणी जी कदमताल कर रहे थे, उस ज़माने में क्वींसवे राजपथ ने नाम से चर्चित था और गूगल बाबू विज्ञान के गर्भ में उत्पन्न भी नहीं हुए थे। जबकि सम्मानित नरेंद्र मोदी जी के ज़माने में राजपथ कर्तव्य पथ बन गया, औरंगजेब रोड डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम निबंधित हो गया और गूगल महाशय ही नहीं, पारम्परिक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, टीवी चैनलों के अलावे पूरा ब्रह्माण्ड एक कमरे में सिमट गया &#8211; जहाँ तक लिखने-लिखाने, छपने-छापने, वितरण करने, पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाने का सवाल है। </p>
<p>इस दृष्टि से श्रीमान आडवाणी जी की तुलना में सम्मानित मोदी जी अधिक भाग्यशाली है। वैसे मोदी जी तो भाग्यशाली हैं ही, एक नहीं तीसरी बार देश का नेतृत्व कर रहे हैं। जिस ज़माने में वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, दिल्ली के नेता उन्हें घास भी नहीं डालते थे। लोग माने अथवा नहीं, आडवाणी जी भी उन नेताओं में एक थे। सब समय का खेल है। कल उनका था, आज इनका है और फिर कल किसी और का होगा। </p>
<p><strong>आज मोदीजी के राज में जब सामाजिक क्षेत्र के मीडिया घरों पर, मसलन ट्विटर, X, फेसबुक आदि देखता हूँ जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से पृष्ठ है, क्षण-क्षण का समाचार, विश्लेषण, तस्वीर प्रकाशित होते हैं। मन प्रसन्न हो जाता है। सोचता हूँ आज़ाद भारत के 78 वर्ष में देश को [पहला प्रधानमंत्री मिला जो जिसके नाम से पृष्ठ है। भले लिखने वालों की, शुद्धिकरण करने वालो की, तथ्यों की जांच-पड़ताल करने वालों की फ़ौज हो उस कमरे में, लेकिन नाम तो मोदी जी का ही है। तभी तो पारम्परिक पत्र-पत्रिकाएं, यहाँ तक की टीवी वाले भी उन प्रकाशित तथ्यों को उद्धृत करते हैं प्रधानमंत्री के नाम से। आडवाणी जी के कालखंड में ऐसी बात नहीं थी, तभी तो वे काफिला लेकर चलते थे।</strong> </p>
<p>उन दिनों भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्रकाशित पारम्परिक पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय विभाग भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय के हल्के पीले रंग वाले लिफाफे में बंद प्रेस विज्ञप्ति के साथ-साथ दिल्ली की सरकारी तस्वीरों की प्रतीक्षा करते थे। गोदरेज या हाल्दा मशीन से टंकित शब्दों की कहानियों के लिए इंतज़ार करते थे। भारत सरकार द्वारा अनुशंसित कागज के कोटों को बरकरार रखने के लिए, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा निर्गत विज्ञापनों को प्राप्त करने के लिए प्रकाशन करते थे। मन में भय बना होता था कि अगर प्रकाशित नहीं करेंगे तो कहीं न्यूजप्रिंट का कोटा न काम हो जाये, कहीं विज्ञापन न रद्द हो जाये, स्वाभाविक भी था। बाज़ार में निजी क्षेत्र से विज्ञापनों के पैदाइश नहीं थी इतनी। अगर थी भी तो उनके पास पैसे नहीं थे अखबार में छापने के लिए। आज समय बदला-बदला सा है। </p>
<p>बहरहाल, आडवाणी जी का रथ 19 अक्टूबर, 1990  को बिहार में प्रवेश किया था। दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह बैठे थे। उधर पटना सचिवालय में नए-नए मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव बैठे थे। शायद लालू को मुख्यमंत्री बने सात महीने भी नहीं हुए थे। &#8216;मंदिर वहीँ बनाएंगे&#8217; का नारा धनबाद का बच्चा बच्चा बोल रहा था &#8211; कुछ तुतलाकर, कुछ हकलाकर। वजह भी था। वैसे बच्चे नहीं जानते थे कि आडवाणी कौन हैं और यह रथ यात्रा क्या है ? </p>
<p>उस समय कोयला अंचल के इस कोयला माफिया वाले इलाके की आबादी करीब आठ लाख से कुछ अधिक थी। जिसमें अनुसूचित जाति के कोई सवा दो लाख और अनुसूचित जनजाति के करीब पौने दो लाख लोग थे। इस आबादी का मूल भोजन भात था, वह भी अगर रात का बासी भात मिल जाय तो सोना में सुहागा। धनबाद में अन्य जो थे वे सभी भारत के विभिन्न शहरों से नौकरी की तलाश में, रोजी रोटी की तलाश में या फिर दबंगता और माफियागिरी करने, पैसे लूटने के लिए यहाँ आये थे। वीपी सिंह के साथ लालू का तार जुड़ा था। लेकिन सिंह साहब चिंतित इसलिए थे कि उन्हें सरकार में भाजपा और बामपंथियों का सहयोग था। कुछ भी उन्नीस-बीस होने से सरकार धड़ाम। और ऐसा ही हुआ। </p>
<p><strong>उस ज़माने में गोल्फ ग्राउंड में उपस्थित लोग जो देख रहे थे, वह तो विश्वसनीय था ही, जो नहीं देख रहे थे वह एक विश्वसनीय जानकारी के रूप में वहां के उपायुक्त के कार्यालय से प्राप्त हो रहा था। धनबाद से प्रकाशित अख़बारों का अपना अलग रुतबा था, लेकिन कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ धनबाद के पाठकों के बीच अपना अलग महत्व रखता था। स्वाभाविक है उस अख़बार का स्थान उपयुक्त के कार्यालय में भी सर्वोपरि था अलावे इसके कि उस अखबार का संवाददाता कोई हाई प्रोफ़ाइल पत्रकार नहीं था। आज इतने दिन बाद भी तत्कालीन उपायुक्त मित्रवत हैं।</strong> </p>
<p>उपायुक्त कार्यालय में बैठे थे भारत के पूर्व विदेश सेवा के अधिकारी से राजनेता बने सैय्यद सहाबुद्दीन के दामाद अफ़ज़ल अमानुल्लाह। बेहद साफ़ सुधरे व्यक्तित्व के अधिकारी। सैय्यद सहाबुद्दिबन बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के संयोजक भी थे। बहुत सारी बातें थी। अंदर-ही-अंदर, पटना-दिल्ली गर्म तार से जुड़ा था और बीच-बीच में लालू यादव उछल-कूद रहे थे ताकि आडवाणी की गिरफ्तारी हो जाय। अफ़ज़ल समय की गंभीरता को समझ रहे थे। बहुत सारी बातें वे अपनी नज़रों से इशारा कर देते थे ताकि समाचार लिखते समय तथ्यों में कोई गड़बड़ी नहीं हो। वे जानते थे कि अगर लालू के चक्कर में आ जायेंगे, आडवाणी को गिरफ्तार कर लेंगे तो धनबाद में क्या हो जायेगा, कहा नहीं जा सकता। </p>
<p><strong>अपरान्ह काल होते-होते अडवाणी का रथ धनबाद की सीमा को पार किया। दो दिन बाद 23 अक्टूबर को पटना के रास्ते समस्तीपुर पहुंचा जहाँ वे सर्किट हॉउस में रुके। उधर पटना में लालू लगातार न्यूज में बने रहने के कारण पटना के जिलाधिकारी आर के सिंह को आडवाणी की गिरफ़्तारी का भार सौंपे। और अगले सुबह आडवाणी गिरफ्तार। उनकी गिरफ़्तारी के साथ ही राजा साहेब की 11 महीने पुरानी सरकार रायसीना पहाड़ पर धड़ाम से गिरी और नीचे लुढ़क गयी। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/afzal-amanullah-did-not-want-to-arrest-advani-in-dhanbad">संवाददाता के लेखन-पुस्तिका से ✍ अफ़जल अमानुल्लाह नहीं चाहे आडवाणी को गिरफ्तार करना धनबाद में, नहीं किये; जो किये वे रायसीना पहाड़ पर भाजपा के मंत्री बने</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लालकृष्ण आडवाणी देश का 50वें &#8216;भारत रत्न&#8217; बने। जब प्रधानमंत्री उन्हें &#8216;स्टेट्समैन&#8217; शब्द से अलंकृत किये, &#8216;दी स्टेट्समैन&#8217; की वह कहानी याद आ गई</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Feb 2024 14:14:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[advani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक, अयोध्या में राम मंदिर बनाने संबधी प्रयास के प्रणेता 96-वर्षीय लाल कृष्ण आडवाणी को भारत रत्न से अलंकृत किया जायेगा। आज जब प्रधानमंत्री उन्हें भारत रत्न से अलंकृत करने का ऐलान किये और यह कहे कि &#8216;वे हमारे देश के सबसे सम्मानित स्टेट्समैन है,&#8217; मुझे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/bharat-ratn-for-lalkrishn-advani">लालकृष्ण आडवाणी देश का 50वें &#8216;भारत रत्न&#8217; बने। जब प्रधानमंत्री उन्हें &#8216;स्टेट्समैन&#8217; शब्द से अलंकृत किये, &#8216;दी स्टेट्समैन&#8217; की वह कहानी याद आ गई</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक, अयोध्या में राम मंदिर बनाने संबधी प्रयास के प्रणेता 96-वर्षीय लाल कृष्ण आडवाणी को भारत रत्न से अलंकृत किया जायेगा। आज जब प्रधानमंत्री उन्हें भारत रत्न से अलंकृत करने का ऐलान किये और यह कहे कि &#8216;वे हमारे देश के सबसे सम्मानित स्टेट्समैन है,&#8217; मुझे दो दशक से अधिक समय पहले आडवाणी के घर की एक घटना याद आ गयी। और वह घटना &#8216;स्टेट्समैन&#8217; अखबार से संबंधित था। आडवाणी उन दिनों भारत के उप-प्रधान मंत्री के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्री भी थे। </strong></p>
<p>उस दिन पंडारा पार्क स्थित अपने घर पर एक खास वजह से स्थानीय पत्रकारों को, जो भारतीय जनता पार्टी तो देखते ही थे, गृह मंत्रालय भी देखते थे, आमंत्रित किया था। सैकड़ों सम्मानित पत्रकार, महिला, पुरुष, युवक, युवती, वृद्ध सभी तरह के लोग उपस्थित थे। जिन्हे कम तनखाह मिलता था उनके पोशाक भी मेरे ही तरह थे। जो धनाढ्य थे, अपने-अपने संस्थानों में ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठकर मोटी मोटी रकम उठाते थे, उनके पोशाक मुग़ल कालीन, अंग्रेजी हुकूमत के समय का था। सम्पूर्ण परिसर गमागम सुगन्धित था। अंग्रेजी पोशाक में (शूट -बूट ) में आडवाणी जी भी सजे थे। आज 96 &#8211; वर्ष के हो गए हैं, आज यादास्त कितनी है नहीं कह सकते, लेकिन उन दिनों आडवाणी जी की एक खास विशेषता यह थी कि वे पहचानते सभी को थे, नाम  के साथ। और भूलते किसी को नहीं थे। </p>
<p>उस दिन देखते ही कहने लगे कि आज सुबह-सवेरे आपके संपादक (स्टेट्समैन के संपादक) सी आर ईरानी को फोन करके बताया कि आपके अख़बार में जो खबर प्रकाशित हुई है वह गलत है। मोहन सहाय जिन्होंने कहानी लिखे हैं, गलत कहानी लिखे हैं। सभी लोग मुंह फाड़े आडवाणी जी को सुन रहे थे। उनके सामने कई ऐसे लोग भी थे जो उनके पत्रकार समूह के हिस्सा थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आडवाणी जी मुझे कहानी बता रहे हैं या अन्य पत्रकारों को सुना रहे हैं ताकि अन्य अख़बारों में जगह मिले। हम सिर्फ सुन रहे थे और अन्य उनकी बातों पर उत्तर-प्रतिउत्तर भी दे रहे थे। </p>
<p>मैं कहानी की अंदर की कथा-व्यथा से उस क्षण बहुत वाकिफ नहीं था। मोहन सहाय पटना के दिनों से, यानी सत्तर के दशक से पटना के पत्रकारों से लेकर दिल्ली तक, उस ज़माने के सभी सहकर्मियों के बीच बहुत ही सम्मानित थे, आज भी हैं। पटना में उन्हें उनके हम उम्र के लोगों से लेकर हमारे उम्र के लोग &#8220;देवानंद&#8221; कहते हैं, आज भी। वजह यह है कि वे देवानंद के बहुत बड़े शुभेक्षु तो हैं ही, एक-एक गीत उनके होठों पर है। वे देवानंद वाला ही प्लेड कैप, जिसे देवानंद &#8216;ज्वेलथीफ&#8217; फिल्म में पहने थे, आज भी पहनते हैं। वापस दफ्तर आने पर सहाय बाबू को पंडरा रोड की कहानी बताये। वे हंस दिए। आडवाणी ऐसे ही हैं। </p>
<p>परन्तु बात यह थी कि उन दिनों पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव होना था और ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी केंद्र में अटल बिहारी के साथ सरकार में थी।  उसी समय 24-परगना में कुछ लोगों को मार दिया गया था। इस घटना पर आडवाणी और जॉर्ज फर्नाडिस पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के मांग कर दिए। आडवाणी और फर्नाडिस के उक्त वक्तव्य पर तत्कालीन राष्ट्रपति &#8216;सुओ-मोटो&#8217; लिए। शाम में प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया ने एक कहानी चला दी जिसमें लिखा था कि अडवाणी राष्ट्रपति से मिले और स्थिति की जानकारी दिए। जो कि गलत था।</p>
<p><strong>उन दिनों नम्बूदरीपाद डिप्टी प्रेस सचिव थे। मोहन सहाय उन्हें फोन करके इस बात से आश्वस्त होना चाहते थे कि क्या सच में आडवाणी राष्ट्रपति से मिले थे? जबाब &#8216;ना&#8217; था। फिर मोहन सहाय कोई चार बार आडवाणी के घर पर फोन किये कहानी लिखने से पहले पक्का करने के लिए। किसी भी बार फोन का जवाब नहीं मिला। बार बार यह कहा गया कि मीटिंग में हैं। यह भी कहा गायणा कि यह &#8216;प्रोटोकॉल&#8217; मीटिंग था राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की यात्रा के बारे में बताने के लिए। </strong></p>
<p>दिनों वाजपेयी जी विदेश यात्रा पर थे। आम तौर पर &#8216;प्रोटोकॉल&#8217; यह कहता है कि जब देश का प्रधानमंत्री किसी विदेश के यात्रा पर जाते हैं तो वे जाने से पहले निजी तौर पर राष्ट्रपति से मिलकर उन्हें अपनी यात्रा के बारे में बताते हैं, यात्रा का उद्देश्य बताते हैं। जब प्रधान मंत्री वापस आते हैं तो पुनः &#8216;डिब्रिफ&#8217; करते हैं यात्रा के बारे में। आडवाणी कहीं भी नहीं थे। </p>
<p>बाद में तत्कालीन वरिष्ठ सम्पादकों, खासकर चन्दन मित्र को फोन किया गया मोहन सहाय के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए। मित्रा साहेब मोहन सहाय को कई दशकों से जानते थे। स्वाभाविक है सहाय जी के बारे में कुछ भी नकारात्मक सोच रख ही नहीं सकते थे। फिर आडवाणी जी दी स्टेट्समैन के संपादक सी आर ईरानी को कलकत्ता फोन किये और उस कहानी के बारे में बताये। आडवाणी जी बार बार कहते रहे कि कहानी &#8216;बेसलेस&#8217; है। ईरानी बहुत बेहतर संपादक थे। वे आडवाणी को सुने और फिर कहे कि &#8220;अगर यह कहानी बेसलेस है तो आप लिखित में पूरा वृतांत दें। हमारा अखबार उसी प्राथमिकता के साथ उसे प्रकाशित करेगा। &#8221; आडवाणी जी पीछे हट गए। लिखित में नहीं दे सकते थे क्योंकि उनकी बातें ही गलत थी और स्टेट्समैन की कहानी बिल्कुल सच्ची थी। मोहन सहाय की पत्रकारिता पर ऊँगली उठाना गलत था। </p>
<figure id="attachment_5316" aria-describedby="caption-attachment-5316" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/ndtv.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/ndtv.jpg" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-5316" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/ndtv.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/ndtv-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/ndtv-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/ndtv-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5316" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी PIC NDTV</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, आज जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने X पर लिखा कि &#8220;देश के विकास के लिए उनका योगदान कोई भूल नहीं सकता। वे हमारे समय के सबसे सम्मानित &#8216;स्टेट्समैन&#8217; हैं। देश के विकास के लिए उनका योगदान कोई भूल नहीं सकता। उन्होंने जमीनी स्तर से काम शुरू किया था और वे देश के उपप्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। वे देश के गृहमंत्री और सूचना-प्रसारण मंत्री भी रहे। उनकी  संसदीय कार्यशैली हमेशा अनुकरणीय रहेगी। </p>
<p>सार्वजनिक जीवन में आडवाणी जी दशकों तक पारदर्शिता और अखंडता के प्रति अटूट प्रतिबद्ध रहे। उन्होंने राजनीतिक नैतिकता में एक अनुकरणीय मानक स्थापित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को आगे बढ़ाने की दिशा में अभूतपूर्व प्रयास किए हैं। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना मेरे लिए बहुत भावुक क्षण है। मैं इसे हमेशा अपना सौभाग्य मानूंगा कि मुझे उनके साथ बातचीत करने और उनसे सीखने के अनगिनत मौके मिले।&#8217; पंडारा रोड की कहानी को लिखे बिना नहीं रहा गया। </p>
<p>नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर लालकृष्ण आडवाणी को बधाई दी। कुछ दिन पहले ही केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने का फैसला किया था। भारत रत्न अलंकरण श्रृंखला में आडवाणी जी का नाम 50 वे स्थान पर दर्ज हो गया। साल 2014 में सत्ता संभालने के बाद बीजेपी ने आडवाणी समेत कुल सात लोगों को भारत रत्न दिया है, जिनमें से पांच लोगों को यह पुरस्कार दिया जा चुका है। </p>
<p>बीजेपी समर्थक लंबे समय से लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देने की मांग कर रहे थे। वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा के संस्थापक सदस्य नाना जी देशमुख के बाद ये सम्मान पाने वाले भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े तीसरे नेता हैं। उन्होंने अपने सियासी जीवन में आधा दर्जन यात्राएं निकालीं। इनमें राम रथ यात्रा, जनादेश यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, भारत उदय यात्रा, भारत सुरक्षा यात्रा, जन चेतना यात्रा शामिल हैं।</p>
<p>उधर  आडवाणी ने भारत रत्न मिलने पर कहा- &#8216;मैं अत्यंत विनम्रता और कृतज्ञता के साथ भारत रत्न स्वीकार करता हूं जो आज मुझे प्रदान किया गया है। यह न सिर्फ एक व्यक्ति के रूप में मेरे लिए सम्मान की बात है, बल्कि उन आदर्शों और सिद्धांतों के लिए भी सम्मान है, जिनकी मैंने अपनी पूरी क्षमता से जीवन भर सेवा करने की कोशिश की। 2015 में आडवाणी को देश के दूसरे सबसे नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। इसी साल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया गया था। तब के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी खुद उनके घर गए थे और उन्हें यह सम्मान दिया।&#8217;</p>
<p>आडवाणी ने कहा- जब से मैं 14 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक के रूप में शामिल हुआ, तब से मैंने केवल एक ही कामना की है। जीवन में मुझे जो भी कार्य सौंपा गया है, उसमें अपने देश की समर्पित और निस्वार्थ सेवा की। जिस चीज ने मेरे जीवन को प्रेरित किया है वह आदर्श वाक्य है &#8216;इदं न मम&#8217; ─ &#8216;यह जीवन मेरा नहीं है, मेरा जीवन मेरे राष्ट्र के लिए है। &#8216;उन्होंने कहा, आज मैं उन दो व्यक्तियों को कृतज्ञतापूर्वक याद करता हूं जिनके साथ मुझे करीब से काम करने का सम्मान मिला &#8211; पंडित दीनदयाल उपाध्याय और भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी।आडवाणी ने सम्मान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम मोदी को भी धन्यवाद दिया। साथ ही भाजपा संघ और दिवंगत पत्नी कमला आडवाणी को भी याद किया। </p>
<p>आडवाणी राम जन्मभूमि आंदोलन में भाजपा का चेहरा बने। 80 के दशक में विश्व हिंदू परिषद ने ‘राम मंदिर’ निर्माण आंदोलन शुरू किया। 1991 का चुनाव देश की सियासत का टर्निंग पॉइंट रहा। भाजपा मंडल कमीशन की काट के रूप में मंदिर मुद्दा लेकर आई और राम रथ पर सवार होकर देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी।</p>
<p>बहरहाल, वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव ने लिखा है भारत रत्न मिल जाना चाहिए था आडवाणी जी को 20 वर्ष पूर्व ही (अप्रैल 1999 पर)। तब दिल्ली के तख्त पर लालचंद्र किशनचंद्र आडवाणी ने एक विदेशी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने और तीन मूर्ति भवन पर कब्जा करने से रोका था। आडवाणी जी के साथ समाजवादी विपक्ष के पुरोधा, लोहियावादी, मुलायम सिंह यादव को भी तभी पद्म विभूषण मिलना चाहिए था। सैफई (इटावा) के इस पहलवान ने कुश्ती वाले दांव धोबी पाटा से ही सोनिया गांधी को पटखनी दी। उनके अरमान दिल में मर गए। वर्ना इतिहास लिखता कि लॉर्ड माउंटबेटन के बाद दूसरा यूरोपीय राष्ट्राध्यक्ष इटली से आया था।</p>
<p>यह घटना अप्रैल 1999 की है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार, अटल बिहारी वाजपेई वाली, बस एक वोट से गिर गई थी। उड़ीसा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग द्वारा भुवनेश्वर से दिल्ली लाकर वोट डलवाया गया। उन्हीं का एक वोट था। राष्ट्रपति के. आर. नारायण ने अटलजी से लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया था। कारण था कि अन्नाद्रमुक नेता की जे. जयललिता ने राजग सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। बहुमत नहीं रहा।</p>
<p>मगर ऐसी स्थिति आई कैसे ? धोखा देने के खेल में सरकार के चेहरे पर वक्त से पहले ही मुस्कान आ गई थी। लेकिन कुछ लोगों ने नोट किया कि किसी ने लोकसभा के सेक्रेट्री जनरल एस गोपालन की तरफ़ एक चिट बढ़ाई है। गोपालन ने उस पर कुछ लिखा और उसे टाइप कराने के लिए भेज दिया। उस कागज़ में लोकसभाध्यक्ष जीएमसी बालयोगी द्वारा दी गई रूलिंग थी जिसमें काँग्रेस साँसद गिरधर गोमाँग को अपने विवेक के आधार पर वोट देने की अनुमति प्रदान की गई थी। गोमाँग फ़रवरी में ही ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन उन्होंने अपनी लोकसभा की सदस्यता से तब तक इस्तीफ़ा नहीं दिया था।</p>
<p>अटलजी की सरकार गिरने के पीछे एक नारी का हाथ था। राजग सरकार को समर्थन देने के ऐवज में अन्ना द्रमुक के नेता जे. जयललिता ने संकट पैदा कर रखा था। जयललिता चाहती थीं कि उनके ख़िलाफ़ सभी मुकदमे वापस लिए जाएं। तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्ख़ास्त किया जाए। इसके अलावा वे सुब्रमण्यम स्वामी को वित्त मंत्री बनवाने पर भी ज़ोर दे रही थीं। वाजपेयी इसके लिए तैयार नहीं हुए। जयललिता चाहती थीं कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे इन्कम टैक्स केसों में उन्हें मदद मिले।</p>
<p>इतना सारा नाटक होने के बाद 21 अप्रैल को सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति नारायणन से मिलकर दावा किया कि उन्हें 272 साँसदों का समर्थन प्राप्त है। लगभग उसी समय मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव आगे किया।</p>
<p>सीपीएम 1996 के विपरीत इसके लिए तैयार भी दिखी लेकिन काँग्रेस इस बार किसी दूसरी पार्टी को नेतृत्व देने के लिए राज़ी नहीं हुई। बाद में मुलायम सिंह ने काँग्रेस का साथ देने से साफ़ इंकार कर दिया। इस फैसले में बहुत बड़ी भूमिका रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस की रही। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब &#8216;माई कंट्री, माई लाइफ़&#8217; में इसका ब्योरा देते हुए लिखा है : &#8220;21 या 22 अप्रैल को देर रात मेरे पास जॉर्ज फ़र्नांडिस का फ़ोन आया। उन्होंने कहा लालजी मेरे पास आपके लिए अच्छी ख़बर है। सोनिया गाँधी अगली सरकार नहीं बना सकतीं। विपक्ष के एक बड़े नेता आपसे मिलना चाहते हैं। लेकिन ये बैठक न तो आपके घर पर हो सकती है और न ही मेरे घर पर।&#8221;</p>
<p>आडवाणीजी ने लिखा : &#8220;तय हुआ कि ये मुलाकात जया जेटली के सुजान सिंह पार्क वाले घर में होगी। जब मैं जया जेटली के घर पहुंचा तो वहाँ मैंने मुलायम सिंह यादव और जॉर्ज फ़र्नांडिस को बैठे हुए पाया। फ़र्नांडिस ने मुझसे कहा कि मेरे दोस्त ने मुझे आश्वस्त किया है कि उनके 20 साँसद किसी भी हालत में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के प्रयास को समर्थन नहीं देंगे। मुलायम सिंह यादव ने भी ये बात मेरे सामने दोहराई। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि आडवाणी जी इसके लिए मेरी एक शर्त है। मेरी इस घोषणा के बाद कि हमारी पार्टी सोनिया गांधी को सरकार बनाने में मदद नहीं करेगी, आपको ये वादा करना होगा कि आप दोबारा सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करेंगे। मैं चाहता हूँ कि अब नए चुनाव करवाएं जाएं।&#8221;</p>
<p>तब तक एनडीए के घटक दलों का भी मन बन चुका था कि फिर से सरकार बनाने के बजाए मध्यावधि चुनाव का सामना किया जाए। राष्ट्रपति नारायणन ने वाजपेयी को राष्ट्रपति भवन तलब किया और उनको सलाह दी कि वो लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश करें। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश की लेकिन इस सिफ़ारिश में साफ़ लिखा गया कि वो ऐसा राष्ट्रपति नारायणन की सलाह पर कर रहे हैं। राष्ट्रपति भवन इससे खुश नहीं नज़र आया लेकिन तब तक वाजपेयी को इस बात की फ़िक्र नहीं रह गई थी कि राष्ट्रपति इस बारे में क्या सोच रहे हैं।</p>
<p>इस सारी उठापटक के दौरान सोनिया गांधी के मैके से सारे कुटुंब जन 10 जनपथ, नई दिल्ली आ गए थे। कहावत है कि प्याले और ओंठ के दरम्यान फासला होता है। सत्ता का प्याला छूट गया। सोनिया जहां थीं वहीं रह गईं। मगर लालकृष्ण आडवाणी ने जॉर्ज फर्नांडिस और मुलायम सिंह के साथ भारत पर दुबारा यूरोपीय राज नहीं आने दिया।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/bharat-ratn-for-lalkrishn-advani">लालकृष्ण आडवाणी देश का 50वें &#8216;भारत रत्न&#8217; बने। जब प्रधानमंत्री उन्हें &#8216;स्टेट्समैन&#8217; शब्द से अलंकृत किये, &#8216;दी स्टेट्समैन&#8217; की वह कहानी याद आ गई</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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