दिल्ली के रायसीना हिल पर या प्रदूषित यमुना के तट पर आईटीओ के उपरगामी पथ के बाएं हाथ गगनचुंबी इमारत में बैठे गणमान्यों, शासन, प्रशासन, विधि-विधान, पुलिस व्यवस्था और सरकार के ख़िलाफ़ जो भी आवाज उठानी हो, भारत के आवाम के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक ही “धरना चौक या हड़ताली चौक है। दिल्ली के संसद मार्ग, जनपथ और रायसीना रोड के बीच कोने का एक स्थल। यह क्षेत्र कभी जयसिंह -II द्वारा निर्मित ऐतिहासिक जंतर-मंतर पुरातत्व के नाम से जाना जाता था। आज लोग बाग़ भले जंतर मंतर का नाम उच्चारित करते हों, लेकिन अन्तःमन से उस स्थान का शाब्दिक अर्थ हड़ताली चौक से हैं।
विगत कई वर्षों से भारत का आवाम यहीं आकर अपनी बातों को, भडासों को, तकलीफों को, मांगों को लाउडस्पीकरों पर, आधुनिक वाद्ययंत्रों से सज्ज अन्य ध्वनि उपकरणों से चिल्लाकर, कहकर भले स्वयं-संतुष्ट हो जाएँ, सोसल मीडिया के विभिन्न पन्नों पर, कुछ दैनिक अख़बारों में, टीवी चैनलों में कहानी और तस्वीरों को देखकर खुश हो जाएँ, कतरन काटकर आंदोलन-पुस्तिका में चिपका लें – हकीकत तो यही है कि इस स्थान से भारतीय संसद, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री कार्यालयों में कुछ की आवाज पहुँचती है, कुछ आवाज दिल्ली के प्रदूषित वायु में, प्रदूषित ध्वनियों में गुम हो जाती है।
एक संवाददाता के रूप में देश के कई शहरों में भारत की मतदाताओं को अपनी आवाज बुलंद करते देखा हूँ। उनकी आवाज़ को शंखनाद जैसा सुना हूँ। मसलन देश के व्यावसायिक शहर मुंबई में जब लोगों को अपनी आवाज बुलंद करनी होती है, वे आज़ाद मैदान में एकत्रित होते हैं। आज़ाद मैदान की आवाज मंत्रालय तक बेखौफ पहुँचती है गगनचुम्बी अट्टालिकाओं को चीरती-फाड़ती। पटना में हो तो बेलीरोड हड़ताली चौक पर। हैदराबाद में विरोध प्रदर्शन इंदिरा पार्क में धरना चौक पर एकत्रित होते हैं। हरियाणा-पंजाब सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए चंडीगढ़ रैली ग्राउंड में आते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हजरतगंज आते हैं चौराहे पर।कलकत्ता में बीबीडी बाग में और चेन्नई में चेपक स्टेडियम में। लेकिन जब राष्ट्रीय राजधानी में आवाज बुलंद करने की बात होती है तो लोगों को एक ऐसे स्थान पर धरना देने, अपनी आवाज उठाने के लिए दिया गया है, जहाँ आवाज तो उठती है, लेकिन बाहर नहीं निकल पाती – चतुर्दिक बंद।
सन 1724 में जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित जंतर-मंतर आज संसद मार्ग के नुक्कड़ पर भले स्थित हो, इसका अंदर का परिसर शहर के मजनुओं, प्रेमी-प्रेयसी के अलावे अब किसी का नहीं है। देशी-विदेशी सभी पर्यटक यहाँ आते हैं इस ऐतिहासिक पुरातत्व को देखने के लिए, यहाँ प्रवेश द्वार पर सुरक्षाकर्मी भी है, अंदर का परिसर स्वच्छ और साफ़ भी है – लेकिन अंदर प्रवेश के साथ जब दूसरे छोड़ तक पहुँचते हैं, संभ्रांत पर्यटक ‘वापस’ आ जाते हैं। ऐसी बात नहीं है कि शहर के मजनु, प्रेमी-प्रेयसी सिर्फ यहीं अपना ठिकाना बनाए हैं, दिल्ली का कोई भी ऐतिहासिक स्थान अब अछूता नहीं रहा। खैर।
इसी जंतर मंतर हड़ताली स्थल पर नर्मदा बचाओ का आंदोलन हुआ था, यहीं अन्ना हज़ारे भी ‘भ्रष्टाचार’ के खिलाफ आवाज उठाये थे, लोकपाल बिल के लिए अनशन किये थे। आम आदमी पार्टी का जन्म भी हुआ। खैर। विस्तृत विवरण तो आप सभी जानते ही हैं। कहते हैं कि इस धरना-स्थल का ‘लोकतंत्र’ से मजबूत रिश्ता हो गया है। है अथवा नहीं, या तो विद्वान-विदुषी अधिक जानते होंगे।
धरना स्थल के रूप में जंतर मंतर का जन्म 1993 में हुआ। धरना या हड़ताल जंतर-मंतर के पास आने से पहले बोट क्लब पर था। सन 1988 में उत्तर प्रदेश में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत करीब पांच लाख किसानों और मवेशियों के साथ बोट क्लब पर अपना घर-द्वार बना लिए। दिल्ली कभी ऐसी भीड़ देखी नहीं थी। यहाँ से संसद ही नहीं, प्रधानमंत्री, उनका कार्यालय, राष्ट्रपति सभी बहुत नजदीक थे। फिर बोट क्लब पर धरना-प्रदर्शन “प्रतिबंधित” हो गया। 1993 में केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद ही धरना और प्रदर्शन स्थल के तौर पर जंतर मंतर को चिन्हित किया गया। फिर 30 अक्टूबर 2018 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली की इस जगह पर आकर विरोध करने पर पाबंदी लगा दी। एनजीटी को लगा कि यहां प्रदर्शन होते रहने से इस जगह की हरियाली और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। खैर, फिर भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश के लोगों की आवाज को प्रतिबंधित करने के खिलाफ ,सकारात्मक निर्णय दिया। आज भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी एकत्रित होते हैं, आवाज बुलंद करते हैं, चाहे उनकी आवाज संसद तक पहुंचे अथवा नहीं।
बहरहाल, इस कहानी को करने के क्रम में जंतर-मंतर के धरना स्थल पर बैठा था। एक अपराध संवाददाता के रूप में इस स्थान को देख रहा था। संसद की ओर से कनॉट प्लेस की ओर बढ़ने से जब हम पार्लियामेंट थाना-स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया लाल बत्ती से दाहिने हाथ मुड़ते है, कुछ कदम चलने के बाद एक रास्ता जनपथ की ओर निकलती है और दूसरी सीधी अशोक रोड गोलचक्कर को पार करते रायसीना रोड की ओर। अशोक रोड गोल चक्कर और जंतर मंतर के इस छोड़ के बीच सड़क के बाएं-दाहिने दोनों तरफ कोई आठ फीट ऊँची दीवार भी है और सरकारी दफ़्तरें भी, जिसका प्रवेश कुछ इस तरफ से भी है। लेकिन प्रदर्शन के समय उम्मीद है इस तरफ का मार्ग कोई नहीं लेता होगा। इस धरना स्थल के प्रवेश और निकास के बीच जिस कदर बेर्रिकेट दिखा (प्रदर्शन के समय तो रहता ही है) लगा जैसे ‘दिल्ली के जलियांवाला बाग़ स्वरुप स्थान पर भारत के लोगों को अपनी आवाज उठाने की स्वीकृति मिलती है। क्या आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी भारत के लोग खुले वातावरण में, स्वच्छ हवाओं में, अपनी आवाज बुलंद नहीं कर सकते ?















