पटना / नई दिल्ली : उन दिनों पटना के अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टीट्यूट के सामने सफ़ेद रंग और लाल पट्टी वाले जिलाधिकारी के आवास के बाहर प्रवेश द्वार के दाहिने हाथ ‘विजय शंकर दुबे, जिलाधिकारी, पटना’ लिखा देखकर शहर के लोगों के मन में एक तरफ जहां व्यवस्था और प्रशासन पर विश्वास मजबूत बनता था, वहीं पटना के युवापीढ़ी, जो राजनितिक गतिविधियों से दूर रहते थे, स्वयं को उन्ही के तरह ‘कर्मठ अधिकारी’ बनने की कल्पना करते थे। बात जनवरी 1974 की है और मैं उन दिनों पटना की सड़कों पर पटना से प्रकाशित ‘आर्यावर्त’, ‘इंडियन नेशन’, ‘सर्चलाइट’ और ‘प्रदीप’ अख़बारों को बेचकर पढ़ने और आगे बढ़ने की तम्मना लिए नित्य उस नाम पट्टिका को देखते आया-जाया करता था।
पटना विश्वविद्यालय की ओर से आने वाली सड़क अशोकराज पथ गांघी मैदान के दाहिने छोड़ को स्पर्श करती, बस अड्डे को लांघती, निर्माणाधीन श्रीकृष्ण मेमोरियल को फांदती, रेड क्रॉस सोसाइटी भवन, पुलिस अधीक्षक का आवास के रास्ते जिलाधिकारी के आवास होते आगे गोलघर की ओर निकल जाती थी। श्रीकृष्ण मेमोरियल अपने निर्माण के अंतिम चरण में था जो 1976 में पूरा हुआ था।
दुबे जी के जिलाधिकारी बनने के 14 महीने बाद, जिन अख़बारों को मैं अपने कंधे और अपनी साईकिल पर लेकर पटना की सडकों को नापा करता था, उन्हीं अख़बारों में से ‘आर्यावर्त-इंडियन नेशन’ पत्र समूह में पत्रकारिता की सबसे निचली सीढ़ी पर 18 मार्च 1975 को महज माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण का प्रमाण पत्र लिए नौकरी की शुरुआत किया था। दुबे जी के कार्यकाल में ‘एक टेनिया’ के रूप में अपने वरिष्ठ पत्रकारों के साथ अनेकों बार पटना के जिलाधिकारी से मिला था, विशेषकर आपातकाल के दौरान। फुल-पैंट, चप्पल और हाफ बुशर्ट के शौक़ीन, मृदुभाषी दुबेजी उन दिनों पटना शहर, खासकर पटना विश्वविद्यालय के मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए ‘एक मिशाल’ थे। उनकी छवि में वे सभी स्वयं को देखते थे। आज भी कई ऐसे छात्र-छात्राएं होंगे जो उस सोच को फलीभूत कर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बने होंगे।
आज कोई पांच दशक बाद विजय शंकर दुबे, जिनके नाम से शहर में खौफ था, के मोबाईल पर घंटी टनटनाया। दुबे जी की सबसे बड़ी विशेषता जो उन दिनों भी थी और आज भी दिखी, वे फोन स्वयं उठाते हैं। उन दिनों लैंडलाइन का जमाना था, इसलिए दूसरी छोड़ से ‘हैल्लो’ की आवाज उन्हीं की आती थी; आज पचास साल बाद भी, मोबाइल पर दूसरी छोड़ से ‘हैल्लो’ की आवाज उन्हीं की आयी। आज की युवा पीढ़ी शायद उस नाम से बहुत परिचित नहीं होंगे पटना में, लेकिन आज भी जो उन्हें जानते हैं उनका नाम बाहर अदब से, शिष्टाचार से लेते हैं (अपवाद छोड़कर)। जिस कालखंड में वे पटना के जिलाधिकारी बने थे, पटना के गाँधी मैदान में कांग्रेस हटाओ के खिलाफ तलवे कद से लेकर घुटने और आदम कद के नेता अपनी-अपनी नेतागिरी को गोल बंद कर रहे थे। नब्बे के दशक के पूर्वार्ध से आज तक बिहार में जितने भी मुख्यमंत्री, मंत्री बने; सभी उसी कालखंड के पैदावार थे, हैं भी।
दुबे जी के फोन पर घंटी बजने का एक उद्देश्य था और वह था पटना के ऐतिहासिक डाक बंगला चौराहे के बाएं नुक्कड़ पर लखनऊ स्वीट हॉउस के बाएं हाथ भारत काफी हॉउस के बारे में उनका अनुभव जानना। दुबे जी पटना के जिलाधिकारी के रूप में उस समय आये जब एक ओर शहर में कालाबाज़ारी अपने चेहरे को निर्लज्जता के साथ काले रंग में रंग लिया था, वहीँ दूसरी और पूरा कालखंड खाद्यान्न की किलत के दौर से गुजर रहा था। पटना से प्रकाशित अख़बारों का शायद ही कोई पन्ना ऐसा होता था जहाँ इन मामलों को लेकर खबरें चीत्कार मारते फैली नहीं होती थी। एक ओर जहाँ समाज में काला बाजारों का ‘संरक्षित’ और ‘सुरक्षित’ माफियागिरी सर उठाकर बोल रहा था, वहीँ तत्कालीन पटना के लोग हताश मन से प्रशासन के आला अधिकारियों के कार्यालयों में टटकी निगाहों से देख रहे थे। चोर-चोर मौसेरे भाई का नारा बुलंद हो रहा था।

उसी कालखंड में विजय शंकर दुबे का आगमन पटना के जिलाधिकारी के रूप में होता है। वे साल 1974 के जनवरी के महीने में कार्यालय में आये और लगातार साढ़े तीन साल तक, यानी जुलाई 1977 तक विराजमान रहे। वही दौर देश में देश में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का दौर था, आपातकाल लगने जून 25, 1975 और समाप्त होने मार्च 21, 1977 का दौर था। शहर ही नहीं, पूरे प्रदेश में सत्ता के लिए लालायित नेता चतुर्दिक उभर रहे थे। आज भी सत्ता के सिंहासन पर जो बैठे हैं, उस दिन दिनकर की कविता ‘सिंहासन खली करो कि जनता आ रही है का नारा बुलंद कर रहे थे। लम्बी बातचीत हुई और उस ज़माने के सभी पत्रकारों को नाम से याद भी किये। खैर।
बातचीत के क्रम में जब उनसे कहा कि कल के भारत कॉफी हॉउस की संस्कृति को बीच में रखकर आज की संस्कृति यानी पटना शहर में कॉफी और अन्य भोज्य पदार्थों को आधुनिक तरीके से परोसने से सम्बंधित स्टार्टअप के बारे में बताया और उनका विचार जानना चाहा तो दुबे जी कहते हैं: “वाह !! यह नयी पीढ़ी की नयी सोच है, बेहतर तो होगा ही।” दुबे जी कहते हैं: “वैसे उन दिनों भी मैं भारत काफी हॉउस भ्रमण-सम्मेलन करने वाले नित्य के लोगों में नहीं था, विवाह हुए बहुत अधिक समय भी नहीं हुआ था, इसलिए महीने-दो महीने में आवास से निकलता था, पचास पैसे में रिक्शावाला घर से डाक बंगला चौराहे पर स्थित भारत कॉफी हॉउस पहुँच देता था। वहां चालीस-पचास पैसे में डोसा मिलता था, 15-20 पैसे में काफी, खा-पीकर हँसते-मुस्कुराते रिक्शा से वापस होते थे।”
दुबे जी उन दिनों भी सरकारी वाहनों का निजी अथवा पारिवारिक उपयोग के लिए इस्तेमाल नहीं करते थे। इस बात का जिक्र तत्कालीन अख़बारों में प्रकाशित होते थे। आज की तो बात ही नहीं है। वे कभी सूचित भी नहीं होने देते थे कि वे डोसा खाने या काफी पीने आ रहे हैं सपरिवार। फुलपैंट, चप्पल और हाफ बुशर्ट पहने वाले दुबे जी कहते हैं कि “पटना ही नहीं, भारत में जहाँ-जहाँ काफी हॉउस था, या आज भी है, वह सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, कला, संस्कृति आदि से सरोकार रखने वालों का एक जबरदस्त जमावबाड़ा था। शहर के पत्रकार, संभ्रांत, शिक्षक, अध्यापक सभी संध्याकाळ में एकत्रित होते थे। विभिन्न विषयों पर चर्चाएं करते थे तो तत्कालीन समाज के लिए उपयोगी होता था। गजब का समय था, गजब के लोग थे। आज तो शहर में है ही नहीं। तत्कालीन स्थितियों के बारे में दुबे जी पर विस्तृत कहानी अगले अंक में, बहरहाल, कॉफी की कहानी को लेकर आगे बढ़ते हैं।
बहरहाल, ‘चाय पे चर्चा’, ‘कॉफी पे चर्चा’, कॉफी विथ एक्स’, कॉफी विथ वाई’ शब्दों की दुकानदार आज भले राजनीतिक, सामाजिक, फ़िल्मी दुनिया के बाज़ारों में हो रही हो; लेकिन भारत में ‘कॉफी हॉउस’ सबसे बड़ा ‘अड्डा’ तत्कालीन समाज के संभ्रांतों से लेकर कलाकारों, क्रांतिकारियों, लेखकों, साहित्यकारों, समाज के सुधारकों के लिए रहा है। बिहार के लोगों को, खासकर पटना के लोगों को शायद यह ज्ञात नहीं होगा कि बेली रोड-न्यू डालबंगला रोड-मोइनुलहक पथ के मिलन स्थान पर कभी ऐतिहासिक डाक बंगला हुआ करता था और उसके सामने भारत कॉफी हॉउस जो साठ के दशक से लेकर अपने जीवन की अंतिम सांस तक प्रदेश की इतिहास को पन्नों-दर-पन्नों समेटकर अलविदा कह दिया। लोग कहते हैं प्रदेश में, शहर में ‘विकास का मार्ग प्रशस्त’ हो रहा है, लेकिन डाक बंगला चौराहे (आज का रविंद्र चौक) का एक-एक जीव और निर्जीव उन दस्तानों को अपने ह्रदय में समेटे है, आज भी।

आइये, पटना के डाकबंगला चौराहे पर आते हैं भारत कॉफी हाउस। यह स्थान अपने स्थापना काल से लेकर अंतिम सांस तक कॉफी – डोसा -उत्थप्पम के बहाने समसामयिक विषयों पर कुछ गंभीर चर्चा करने का एक बेहतरीन स्थान था। ये लेखकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं, कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों और थिएटर कलाकारों सहित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और राजनेताओं के लिए जीवन का एक अंग बन गया था। रामधारी सिंह दिनकर, उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु, रामवृक्ष बेनीपुरी, नागार्जुन, नलिन विचलन शर्मा, राजकमल चौधरी, जानकी वल्लभ शास्त्री, बिस्मिल अजीमाबादी, मजहर इमाम, सुरेंद्र झा सुमन, परमानन्द झा शास्त्री के अलावे शहर के प्रख्यात पत्रकारों, शिक्षकों, श्रमिक नेताओं आदि का एक चुनिंदा स्थान था। इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति की बुनियाद अगर जयप्रकाश नारायण के घर पर हुई, तो उसके क्रियान्वयन की व्यूहरचना भारत कॉफी हाउस में हुआ था।
समय बदला। लोग बदले। सोच बदले । व्यवसाय बदला। तभी तो कल तक पटना के लोग दूर-दूर से काफी, डोसा और अन्य भोज्य पदार्थों का लुफ्त उठाने, यहाँ तक कि पटना के जिलाधिकारी भी, रिक्शे पर बैठकर सपरिवार भारत कॉफी हाउस आते थे; आज उसी शहर में नयी सोच के अधीन ‘काफी और अन्य स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ स्वयं चलकर दूर-दरसत लोगों के दरवाजे पर पहुँच रहा है। इसे ही कहते हैं स्टार्टअप और इस स्टार्टअप में पटना शहर का ‘CAFE HIDEOUT एक अनोखी रेस्ट्रो-कैफ़े भोजन और पेय पदार्थों की असाधारण गुणवत्ता के साथ पुरे शहर में फ़ैल रहा है। CAFE HIDEOUT का माहौल अलग ही आत्मीयता, सम्मान और उत्साह से भरपूर है। यह मेहमानों को अपने लिए समय बिताने का बेहतरीन अनुभव प्रदान करने पर केंद्रित है।
अंजेश शांडिल्य ने CAFE HIDEOUT को एक रेट्रो-कैफ़े श्रृंखला के रूप में शुरू किया, जो बेहतरीन कॉफी के साथ बेहतरीन भोजन प्रदान करती है। उन्हें भारतीय एफएंडबी बाजार की संभावनाओं पर पूरा भरोसा है और उन्हें लगता है कि दुनिया की शीर्ष पांच कॉफी चेन में एक प्रमुख घरेलू कॉफी ब्रांड होना चाहिए। यहाँ मेनू इस तरह से डिजाइन किया गया है कि मेहमान अक्सर खुद को ट्रीट कर सकें। बेहतरीन पेय पदार्थों और बेहतरीन कॉफी के साथ विभिन्न श्रेणियों में विभिन्न प्रकार के भोजन का चयन कुछ ऐसा है जो हमें अद्वितीय और अलग बनाता है। इस कैफे में, स्टार्टअप के रूप में, अपने अवयवों को ताज़े खेतों या सर्वश्रेष्ठ ब्रांडों से प्राप्त करते हैं जो उपभोक्ताओं के खाने वाली मेज तक आते-आते हर चीज़ का पहले विशेषज्ञों द्वारा अच्छी तरह से परीक्षण किया जाता है।

शांडिल्य CAFE HIDEOUT को तेजी से बढ़ते ब्रांड के रूप में विकसित कर रहे हैं। कॉफी के साथ उनके प्रयोग ने जुनून और निरंतर प्रयासों से प्रेरित एक अद्भुत उद्यम बनाया है। अंजेश शांडिल्य पेशे से आईटी स्नातक हैं और जुनून से भोजन और यात्रा के शौकीन हैं। उनका मानना है कि इसके संचालन के लगभग सभी क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी के अधिकतम उपयोग के साथ हमारा लक्ष्य आने वाले समय में नई ऊंचाइयों को छूना है। भोजन कला और जुनून का विषय है। उनका दृढ़ विश्वास है कि बड़े पैमाने पर पहुंचने के लिए उनकी टीम को बारीक से बारीक काम करना होगा। उनका कहना है कि ‘अगर आपको खाने के जादू पर विश्वास है और बढ़िया कॉफी के साथ बढ़िया खाने के हमारे प्रयोग पर भरोसा है, तो इस शानदारता को इस देश के हर इलाके में ले जाने की हमारी यात्रा में हमारे साथ जुड़ें।’ वे यह भी मानते हैं कि ‘पैसे से ज़्यादा, उन्हें जुनून, प्रयासों में निरंतरता और रवैये में बारीकियों पर ध्यान देने की ज़रूरत है।’
कहते हैं, बिहार अब वह बिहार नहीं रहा। यहाँ नौकरी-पेशा के लिए शहर से दूर कभी जाने वाले युवा पीढ़ी वापस अपने शहर में, गाँव में आ रहे हैं, नई सोच के साथ, नए व्यवसाय को अनुवादित करने। आज हालात यह है कि अब बहुत ही कम पैसे में अपना कारोबार शुरू किया जा सकता है। आज यहाँ के युवा पीढ़ी उन क्षेत्रों में भी हाथ आजमा रहे हैं जिनमें वह पहले कभी व्यापार करने के बारे में सोचता भी नहीं थे। यहां के युवा न सिर्फ नई नई टेक्नोलॉजी विकसित कर रहे हैं बल्कि नए नए उद्योगों में भी अपना हाथ आजमा रहे हैं। इन सभी बातों को मद्देनजर रखते हुए अब तो सरकार भी यहां पर व्यापार/व्यवसाय के लिए तरह-तरह के लोन भी प्रदान करती है। और इसी क्रम में कॉफी का व्यवसाय भी अब बिहार में फल-फूल रहा है।
कॉफी के बहाने चलिए बिहार के किशनगंज जिले में जहाँ सैकड़ों एकड़ में चाय की खेती होती है। सबसे पहले वहां के व्यवसायी राजकरण दफ्तरी ने चाय की खेती शुरू की थी। अब बाकी किसान भी चाय की खेती करते हैं। इसी तर्ज पर अब कटिहार में एक किसान ने कॉफी की खेती शुरू की है। कटिहार जिले के कोढ़ा प्रखंड के किसान ने खेती की अच्छी खासी फसल उगाई है। प्रशांत चौधरी नाम है किसान का। उन्होंने प्रयोग के तौर पर कॉफी की खेती को आगे बढ़ाने का विचार किया। परिणाम काफी बेहतर निकला। प्रखंड के अन्य किसान चर्चा सुनकर अब कॉफी की खेती देखने पहुंच रहे हैं।

ज्ञातव्य हो कि भारत सरकार ने पारंपरिक क्षेत्रों में कॉफी उगाने के लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर 2,500-3,500 अमेरिकी डॉलर की सब्सिडी देने की पहल की है। योजनाओं के तहत जल संवर्धन, उपकरण, विपणन और संवर्धन के लिए अतिरिक्त सहायता भी प्रदान की जाती है। सरकार कॉफी विकास कार्यक्रम (सीडीपी) के तहत गैर-पारंपरिक कॉफी उगाने वाले क्षेत्रों का भी समर्थन करती है। इसके अतिरिक्त, आदिवासी विकास की राष्ट्रीय नीति के तहत, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसे गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में कॉफी की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
भारत दुनिया भर के 50 से ज्यादा देशों को कॉफी निर्यात करता है। इटली, जर्मनी, रूसी संघ और बेल्जियम भारत से कॉफी के सबसे बड़े आयातक हैं, जिनकी औसत कुल हिस्सेदारी लगभग 45% है। अन्य कॉफ़ी आयातक देश लीबिया, पोलैंड, जॉर्डन, मलेशिया, अमेरिका, स्लोवेनिया और ऑस्ट्रेलिया हैं। भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार इटली, बीन कॉफी निर्यात का 20% हिस्सा है। यूरोप, जहाँ लोग रोबस्टा मिश्रण के तुलनात्मक रूप से अधिक कड़वे और मजबूत स्वाद पसंद करते हैं, भारत के निर्यात का 70% हिस्सा बनाता है। अरेबिका कॉफ़ी मिश्रण की मध्य पूर्व क्षेत्र से उच्च मांग है, जिसका पता अरब क्षेत्र से लगाया जा सकता है। साथ ही, मणिपुर राज्य में उत्पादित सभी कॉफी को खरीदने के जापान सरकार के आश्वासन से चंदेल, लिटन और नोंगमाईचिंग हिल्स जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कॉफी उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, जिन्हें कभी कॉफी उत्पादन के लिए अनुपयुक्त माना जाता था।
वित्त वर्ष 2024 के दौरान भारत दुनिया का सातवाँ सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक बन गया। भारतीय कॉफी अपनी उच्च गुणवत्ता के कारण दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कॉफी में से एक है और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रीमियम मानी जाती है। भारत दो प्रकार की कॉफी का उत्पादन करता है: अरेबिका और रोबस्टा। अपने हल्के सुगंधित स्वाद के कारण अरेबिका का बाजार मूल्य रोबस्टा कॉफ़ी से अधिक है। रोबस्टा कॉफी का उपयोग इसके तीखे स्वाद के कारण विभिन्न मिश्रण बनाने में किया जाता है। रोबस्टा एक प्रमुख रूप से निर्मित कॉफ़ी है, जिसकी भारतीय कॉफी के कुल उत्पादन में 72% हिस्सेदारी है। यह उद्योग भारत में दो मिलियन से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है।

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय कॉफी बाजार के 2028 तक 8.9% चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, भारत के आउट-ऑफ-होम कॉफी बाजार के 2028 तक 15-20% चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़कर 2.6 – 3.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। भारतीय कॉफ़ी बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025 में कॉफ़ी उत्पादन में मामूली वृद्धि का अनुमान लगाया है, जो वित्त वर्ष 2024 में 3.605 लाख टन की तुलना में 3.633 लाख टन है। बोर्ड का लक्ष्य 2047 तक उत्पादन को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाकर 9 लाख टन करना भी है। बोर्ड ने मौजूदा सीज़न में 1 लाख टन से बढ़कर 1.13 लाख टन अरेबिका का उत्पादन होने का अनुमान लगाया है, जबकि रोबस्टा का उत्पादन 2.52 लाख टन से बढ़कर 2.61 लाख टन होने का अनुमान है।
वैसे, कॉफी का उत्पादन भारत के दक्षिणी भाग में होता है। कर्नाटक सबसे बड़ा उत्पादक है, जो भारत में कुल कॉफी उत्पादन का लगभग 71% हिस्सा पैदा करता है। केरल कॉफ़ी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन कुल उत्पादन का केवल 20% ही पैदा करता है। तमिलनाडु भारत के कुल कॉफी उत्पादन का 5% हिस्सा लेकर तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। तमिलनाडु की आधी कॉफ़ी नीलगिरि जिले में बनती है, जो एक प्रमुख अरेबिका उत्पादक क्षेत्र है। उड़ीसा और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में उत्पादन का अनुपात कम है। कहते हैं कि 30 अगस्त 2024 तक, भारतीय कॉफी का निर्यात 1.19 बिलियन अमेरिकी डॉलर (जनवरी-अगस्त) था, जो 2023 में इसी अवधि की तुलना में 45% की वार्षिक वृद्धि के साथ था।
















Bahut sundar jankari mila. Pahle Asam, Darjiling sabmen chay (☕) ka utpadan hota tha. Uske baad aab harek chij men badlao bhi hua jo dekha anubhav kiya. Bihar ke bhi kuchh jilom men chay coffee ☕ ka utpadan badhta ja raha hai. Aagami samay men aur Bahut kuchh dekhne ko mil sakta hai.
Hardik Dhanyabaad jo itne achhe jankari sajha jarte hai 💐👌👍🙏