​सलौना (बेगूसराय) का ऐतिहासिक धरोहर और प्रशासन की उपेक्षा ​

​सलौना
​सलौना

जिला बेगूसराय (बिहार) का एक छोटा सा कस्बा है सलौना जो बखरी प्रखंड में स्थित है, आज भी कई ऐतिहासिक धरोहरों को अपने दामन मे समेटे कहानियाँ सुना रहा है और अतीत के गहराइयो मे धीरे-धीरे दफन होते जा रहा है। वैसे ऐतिहासिक धरोहरों का नेस्तोनाबूद होना, बिहार में ही नहीं, भारत में कोई नयी बात नहीं है, क्योंकि सिर्फ वही धरोहर जीवित हैं जिनका राज्य अथवा देश में सांस्कृतिक और पर्यटन बज़्ज़ार में मोल है – एक दुधारू गाय की तरह।

सम्पूर्ण बिहार में ऐतिहासिक धरोहरों का खान है। परन्तु प्रशासन और स्थानीय लोगों की उपेक्षा के कारण सभी ऐतिहासिक धरोहरों की ईंटें मिली में मिलती चली जा रही है चाहे राजनगर स्थित महाराजा दरभंगा का किला हो या सलौना गाँव का ठाकुरबाड़ी। जिन धरोहरों को कभी यहाँ का गौरव माना जाता था, आज अपने हालत पर आँसू बहा रहे हैं, और इस गौरवशाली इतिहास की धरोहरों को ना सरकार, ना स्थानीय लोग ही देख रेख का जिम्मा ले रहे है।

ऐसी ही एक अदभुत धरोहर है सलौना की बड़ी ठकुरबाड़ी।

कहते है इस मंदिर के सर्वप्रथम सेवक हुए इटावा यूपी से स्वामी मस्तराम जी महाराज। जो 3600 बीघा के स्वामी थे। इसी जमीन से हुई उपज राम लला के देख रेख मे उपयोग की जाती थी । उनके बाद क्रमशः लक्ष्मी दास जी,उनके बाद विष्णु दास जी, फिर स्वामी भागवत दास जी ,श्री महंत रामस्वरूप दास जी, जो पूरी तरह से कर्तव्यनिष्ठ होकर मंदिर के प्रांगण और राम लला की सेवा मे समर्पित होकर जीवन प्रयन्त इस धरोहर की नींव बने रहे। उसके बाद इस मंदिर के दिवारों को बचाते रहे स्वर्गीय बिपिन बिहारी दास जो पिछले ही साल दिवंगत हो गए और उसी के साथ शुरु हुआ मंदिर का बदहाल समय। मंदिर से सब दूर होते चले गए।

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स्वर्गीय बिपिन बिहारी दास जो पटना में करीब 30 साल से रहते थे। लाल पत्थर से निर्मित यह बहुत ही अद्भुत कलाकृति शायद बिहार में कही और देखने को ना मिले। स्थानीय लोग कहते है इस तरह का मंदिर एक हरिद्वार में देखा गया है। बरवस यह मंदिर पूरी के जग्गरनाथ मंदिर के जैसा भी एहसास देता है |
कहते है इस मंदिर को बनाने में लगभग 16 साल लगे और यह 250 साल लगभग पुराना है।

इसमें लगभग सवा सौ मिस्त्री और आठ लोहार,जो सिर्फ छेनी बनाने का काम करते थे और उस समय 500000 रुपये से इसकी शुरुआत की गई और 3600 बीघा जमीन की उपज से जो भी रकम आता था, वो इस मंदिर मे ही लगाया जाता था। इस मंदिर को निर्माण में जहाँ पैसे पानी की तरह बहाये गए वही कहते है करोड़ों की मूर्ति राम सीता की मुर्ति भी यहाँ स्थापित थी।जो इस मंदिर की कभी शोभा हुआ करती थी वो भी अब नहीं है ,चोरी हो गयी।

निश्चित रूप से अतीत को संजोकर ही हम वर्तमान को बेहतर कर सकते हैं। मंदिर का भविष्य: मंदिर मे आकर और इस धरोहर को देखकर कई-कई सवाल मन मे आते है की कैसे कभी इस मंदिर के सहारे बसा यह गाँव आज अपने आराध्य और उनकी बाड़ी को भूल गया है।

मंदिर का पुनरुद्धार नितान्त आवश्यक है और मंदिर के सहारे बहुत कुछ बेहतर किया जा सकता है।अगर
यहां स्वास्थ्य या शिक्षा का केंद्र बनाकर विस्तार किया जाए तो एक अदभुत प्रयास होगा।जो ना सिर्फ इस ठाकुरबाड़ी की बल्कि सलौना और स्थानीय लोगो का भी भविष्य बदल देगा। जिस ठाकुर बाड़ी ने
सलौना रेलवे स्टेशन ,सलौना प्राइमरी स्कूल इत्यादि सलौना को दिया और एक स्वर्णिम काल भी यहाँ के लोगो ने देखा। आज वही ठाकुरबाड़ी आज अपनी बदहाली पर मौन खड़ा रास्ता देख रहा है की शायद कभी कोई भगीरथी आयेगा और इस मंदिर का भी उद्धार होगा।

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कहीं ना कहीं सरकार या प्रशासन की नजर इस पर पड़ती तो शायद इसका कुछ बेहतर होता। पता नही हम किस समाज मे रहते हैं जो दिया घर को रोशन करता रहा उसी दिये की लौ जरा सा क्या थरथरायी लोगो ने दिये से ही रिश्ता तोड़ लिया। सलौना ठाकुरबाड़ी को अगर ऐतिहासिक विरासत घोषित कर दिया जाए तो यह फिर यहाँ का इतिहास बदल कर रख देगा।पर पता नही कब किसी की नज़र पड़ेगी इस जर्जर होती धरोहर पर जो इसे फिर से जीवंत करेगी।

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