* भारत की आज़ादी की खबर 15 अगस्त, 1947 की सुबह 5:30 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर आधिकारिक तौर पर प्रसारित की गई थी । जाने-माने एक्टर और न्यूज़रीडर पूर्णम विश्वनाथन ने 5:30 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर घोषणा की। ऑल इंडिया रेडियो ने सत्ता के ऐतिहासिक हस्तांतरण का प्रसारण किया। जवाहरलाल नेहरू का मशहूर “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” भाषण आधी रात को देशभर में प्रसारित किया गया।
* उस दिन शुक्रवार था। शाम के 5:20 बजे थे। महात्मा गांधी को गोली मारी थी। महात्मा गांधी की मौत की खबर ऑल इंडिया रेडियो 6:00 प्रसारित किया था। इस प्रसारण के बाद बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रेडियो पर प्रसारण हुआ ‘लाइट स्नफड आउट’ ।
* प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में मौत की खबर का ऐलान ऑल इंडिया रेडियो ने 11 जनवरी, 1966 को उनकी मौत के कुछ ही समय बाद आधिकारिक तौर पर किया था। शास्त्री का निधन 11 जनवरी, 1966 को सुबह 1:32 बजे (ताशकंद समय) हुआ, जो भारतीय समय के अनुसार लगभग 2:02 बजे था।
* 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान, ऑल इंडिया रेडियो और कोलकाता में गुप्त “स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र” 25 मार्च, 1971 को पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई के तुरंत बाद युद्ध की खबरें एक्टिव रूप से प्रसारित करना शुरू कर दिया था। स्वतंत्रता की घोषणा और 10 अप्रैल को अंतरिम सरकार के गठन सहित मुख्य घटनाओं को प्रसारित किया गया। ऑल इंडिया रेडियो के समाचार वाचक देबदुलाल बंद्योपाध्याय भारत और पूर्वी पाकिस्तान दोनों में श्रोताओं के लिए एक प्रमुख आवाज़ बन गए थे।
* इंदिरा गांधी की मौत की आधिकारिक घोषणा ऑल इंडिया रेडियो ने 31 अक्टूबर, 1984 की शाम करीब 6:00 बजे की थी, जबकि उन्हें सुबह 9:20 बजे गोली मारी गई थी। गोलीबारी की खबरें पहले ही फैल गई थीं, लेकिन उनकी मौत की आधिकारिक पुष्टि शाम तक नहीं की गई थी।

* 23 मार्च, 1979 को दोपहर 1:10 बजे अपने रेगुलर प्रोग्राम को रोककर यह घोषणा की कि जयप्रकाश नारायण का बॉम्बे के जसलोक अस्पताल में निधन हो गया है, यह जानकारी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने लोकसभा को गलत दी थी। इस गलती को लगभग 30-60 मिनट बाद सुधारा गया, जिससे जनता पार्टी सरकार को बहुत शर्मिंदगी हुई। वास्तविक रूप में 8 अक्टूबर, 1979 को जेपी का निधन पटना में उनके घर पर सुबह लगभग 5:45 बजे हुआ। कुछ पल बाद, इस खबर की पुष्टि होने के बाद ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित की गई।
सन 1947 में, जब देश आज़ाद हुआ था, देश की आवादी करीब 39 करोड़ थी। आज 145 करोड़ है। संवाद के क्षेत्र में भले आज उम्मीद से अधिक परिवर्तन हुआ हो, भारत के लगभग 40 करोड़ से अधिक लोग रेडियो के श्रोता है, चाहे वे दिल्ली के कर्तव्य पथ पर सुनते हों या बिहार के दरभंगा ले लालबाग चौक पर या लखनऊ के घंटाघर और बड़ा इमामबाड़ा में। लोग माने अथवा नहीं, विज्ञान में इतने विकास के बाद भी, रेडियो आज भी भारत सरकार या सत्ता के गलियारे में बैठे लोगों के लिए, सरकार की नीतियों के लिए, सरकार की आवाज के लिए, बल्कि भारत के आम लोगों के लिए कल भी एक महत्वपूर्ण यंत्र था, आज भी अपनी औकात बरकरार रखे है, बिना किसी आंच के ।
देश के करीब 40 करोड़ से अधिक रेडियो के श्रोता, जो मतदाता भी हैं, और देश की संस्कृति के साथ-साथ ऐतिहासिक घरोहरों को संजोने में भी विश्वास भी रखते हैं। सन 2014 में जब नरेंद्र मोदी देश का प्रधानमंत्री बने, उस वर्ष महात्मा गांधी के जन्मदिवस के दूसरे दिन, यानी 3 अक्टूबर, 2014 से रेडियो पर ‘मन की बात’ का प्रसारण होना शुरू हुआ। प्रधानमंत्री अलग-अलग सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने मन की बात कहते गए। भारत के श्रोताओं ने उनके शब्दों को ह्रदय से ग्रहण किया। विगत माह 25 जनवरी, 2026 तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मन की बात” रेडियो प्रोग्राम के 130 एपिसोड प्रसारित हो चुके हैं। 130वां एपिसोड 2026 का पहला प्रसारण था।
आज समय आ गया है कि देश के करीब 40 करोड़ से अभी अधिक रेडियो श्रोता, जो मतदाता भी हैं, और देश की संस्कृति के साथ-साथ ऐतिहासिक घरोहरों को संजोने में भी विश्वास रखते हैं, के मन की बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुनें। साथ ही, उसपर यथाशीघ्र निर्णय लेने के लिए अनुरोध किया है। मन की बात सुनने, सुनाने का कार्य एकतरफा नहीं हो। साल 2011 में यूनेस्को के सदस्य देशों द्वारा घोषित और 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (A/RES/67/124) द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में अपनाए जाने के बाद, 13 फरवरी विश्व रेडियो दिवस के अवसर पर देश के सैकड़ों रेडियो श्रोता संघ ने देश में एक राष्ट्रीय रेडियो संग्रहालय की स्थापना के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी रेडियो दिवस मनाने का आग्रह किया है।

भारत के कोने-कोने में आज भी अनेक रेडियो प्रेमी, तकनीकी जानकार एवं संग्राहक ऐसे हैं, जिन्होंने निजी स्तर पर दशकों पुराने, दुर्लभ और ऐतिहासिक रेडियो सेट सुरक्षित रखे हुए हैं। ये रेडियो केवल यंत्र नहीं हैं, बल्कि भारत के सामाजिक जीवन, सूचना क्रांति, स्वतंत्रता आंदोलन और वैज्ञानिक प्रगति के साक्षी रहे हैं। यह पहल किसी एक समाज, वर्ग या संगठन तक सीमित नहीं है। यह सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और तकनीकी विरासत से जुड़ा हुआ विषय है, जिसमें हर समाज की सहभागिता आवश्यक है। यह महज विरासत के संरक्षण का ही मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रेडियो संग्रहालय होने से आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को सुरक्षित करने का भी प्रयास होगा।
देश के रेडियो श्रोता संघों का कहना है कि रेडियो अपनी सभी विविधताओं में मानवता का जश्न मनाने का एक शक्तिशाली माध्यम तो है ही, यह लोकतांत्रिक चर्चा के लिए एक मंच है। वैश्विक स्तर पर, रेडियो सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला माध्यम कल भी था और आज भी बना हुआ है। सबसे ज़्यादा श्रोताओं तक पहुँचने की इस अनोखी क्षमता का मतलब है कि रेडियो समाज के विविधता के अनुभव को आकार दे सकता है, सभी आवाज़ों को बोलने, प्रतिनिधित्व करने और सुने जाने का एक मंच बन सकता है, बशर्ते समाज और व्यवस्था इसे वह सम्मान दे, जिसे यह हकदार है । क्योंकि रेडियो हमेशा से विविध समुदायों की सेवा करती आयी है विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों से, दृष्टिकोण और सामग्रियों को प्रदान कर श्रोताओं की विविधताओं को प्रतिबिंबित करता आया है, कर रहा है।
बीकानेर (राजस्थान) के रेडियो संग्रहकर्ता दिनेश माथुर का कहना है कि रेडियो को दुनिया भर में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले माध्यमों में से एक माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, रेडियो में “समाज के विविधता को देखने के तरीके को प्रभावित करने की शक्ति है। यह सभी आवाजों को बोलने के लिए एक मंच प्रदान करता है। रेडियो कैसे काम करता है? यह रेडियो तरंगों को प्रसारित और प्राप्त करके काम करता है, जो एक प्रकार का इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन है। ट्रांसमीटर एंटीना में बहने वाली बिजली इलेक्ट्रॉनों को ऊपर और नीचे कंपन कराती है। इससे रेडियो तरंगें उत्पन्न होती हैं। रेडियो तरंगों की एक आवृत्ति होती है, जो प्रति सेकंड एक निश्चित बिंदु से गुज़रने वाली तरंगों की संख्या होती है। AM रेडियो आवृत्ति को मापने के लिए किलोहर्ट्ज़ (kHz) का उपयोग करता है। FM रेडियो आवृत्ति को मापने के लिए मेगाहर्ट्ज़ (MHz) का उपयोग करता है।
इतना ही नहीं, वे यह भी कहते हैं कि रेडियो एक कम लागत वाला माध्यम है जो विशेष रूप से दूरदराज के समुदायों और कमज़ोर लोगों तक पहुँचने के लिए उपयुक्त है, जो लोगों के शैक्षिक स्तर की परवाह किए बिना सार्वजनिक बहस में हस्तक्षेप करने के लिए एक मंच प्रदान करता है। यह आपातकालीन संचार और आपदा राहत में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रेडियो समुदायों को एक साथ लाने और बदलाव के लिए सकारात्मक बातचीत को बढ़ावा देने के लिए विशिष्ट रूप से स्थित है। अपने दर्शकों को सुनकर और उनकी ज़रूरतों का जवाब देकर, रेडियो सेवाएँ उन चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक विचारों और आवाज़ों की विविधता प्रदान करती हैं जिनका हम सभी सामना करते हैं।
बहरहाल, राजनीतिक मानचित्र पर वायसराय लिनलिथगो के कालखंड (1936-1944) में कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी, कुछ मीठी तो कुछ खट्टी। लेकिन उनके कालखंड में जो हुआ वह भारत के इतिहास में मील का पत्थर भी सिद्ध हुआ। वायसराय लिनलिथगो सबसे लम्बे समय तक सेवा करने वाले वायसराय रहे। अगर द्वितीय विश्वयुद्ध की घटना को, जिसमें भारतीय समर्थन के लिए क्रिप्स मिशन आया था, कुछ पल के लिए दर किनार कर दें, तो उनके समय में भारत सरकार अधिनियम, 1935 लागू हुआ, 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन का सूत्रपात भी उन्हीं के समय में हुआ, भले उसे दबाने की कोशिश की गई हो। आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन भी उन्हीं के कालखंड में हुआ। बंगाल का विनाशकारी अकाल भी इन्हीं के समय में हुआ। लेकिन इनके ही कालखंड में जो हुआ वह भारत की आवाज भी बन गयी – आप माने अथवा नहीं।

इतिहास के अनुसार ब्रॉडकास्टिंग के पहले कंट्रोलर लियोनेल फील्डन ने एक दावत के बाद वायसराय लिनलिथगो को कहा कि इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस, जो 1930 में दो साल के लिए एक्सपेरिमेंटल बेसिस पर शुरू हुई थी, नाम काफी नौकरशाही था। वायसराय मानना था कि यह नाम काफी लंबा है। जब ब्रॉडकास्टर उनसे बार-बार कुछ अलग सुझाने के लिए निवेदन कर रहा था तो वायसराय लिनलिथगो ने धीरे से कहा, “ऑल इंडिया रेडियो”, अच्छा रहेगा? ब्रॉडकास्टर ख़ुशी से नाच उठे। कितना बेहतरीन ‘आद्याक्षर (इनिशियल्स)’ हैं! अतः ऑल इंडिया रेडियो नाम जब भी होठों पर आएगा, वायसराय लिनलिथगो का नाम स्वतः आएगा, आप माने अथवा नहीं।
रायपुर (मध्यप्रदेश) के रेडियो संग्रहकर्ता मनोहर डेनवानी का कहना है कि आज देश में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपना जीवन रेडियो को समर्पित कर दिया है। आज भी उनके पास सैकड़ों ही नहीं, हज़ारों की संख्या में पुराने और दुर्लभ रेडियो उपलब्ध हैं। और अपने संसाधनों से इस विरासत को संजोकर रखा है। परंतु अब इन धरोहरों के संरक्षण, रखरखाव और भावी पीढ़ी तक सुरक्षित रूप से पहुँचाने में गंभीर कठिनाइयाँ सामने आ रही हैं।वैसी स्थिति में अगर दिल्ली के पालिका बाजार स्थित ‘चरखा संग्रहालय’ के तर्ज पर यदि देश में राष्ट्रीय स्तर का रेडियो संग्रहालय स्थापित किया जाता है, तो इन अमूल्य रेडियो सेटों का वैज्ञानिक व ऐतिहासिक संरक्षण संभव होगा, युवा पीढ़ी भारत के संचार इतिहास से परिचित हो सकेगी, रेडियो से जुड़े अनाम योगदानकर्ताओं को राष्ट्रीय पहचान मिलेगी, भारत की तकनीकी विरासत को वैश्विक मंच पर सम्मान प्राप्त होगा।
विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी को मनाया जाता है। इस दिन का मकसद रेडियो के ज़रिए शिक्षा, जानकारी और अभिव्यक्ति की आज़ादी को बढ़ावा देना है। इस साल, 2025 में, विश्व रेडियो दिवस की थीम है – “रेडियो और जलवायु परिवर्तन: जलवायु कार्रवाई के लिए एक शक्तिशाली उपकरण”। ऑल इंडिया रेडियो दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्कों में से एक है। 3 जुलाई 2001 को, रेडियो सिटी बैंगलोर लॉन्च हुआ, जो पहला निजी FM रेडियो स्टेशन बना। रेडियो का आविष्कार गुग्लिल्मो मार्कोनी ने किया था। उन्होंने 1890 के दशक में रेडियो ट्रांसमीटर का आविष्कार किया था। हालांकि, जगदीश चंद्र बोस पहले व्यक्ति थे जिन्होंने रेडियो तरंगों को पकड़ने के पीछे के वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रदर्शन किया। उन्हें अक्सर वायरलेस दूरसंचार का जनक कहा जाता है।
भारत में राष्ट्रीय प्रसारण दिवस 1927 में शुरू होने के बाद से देश के प्रसारण क्षेत्र के विकास की याद दिलाता है। यह दिन भारत के विकास, शैक्षिक पहुंच और सांस्कृतिक संरक्षण में प्रसारण द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है। सामुदायिक रेडियो जैसी पहलों पर सरकार का जोर दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचने और स्थानीय विकास को बढ़ावा देने में प्रसारण के स्थायी महत्व को रेखांकित करता है। जैसे ही भारत एक और राष्ट्रीय प्रसारण दिवस मना रहा है, वह एक ऐसे भविष्य की कल्पना करता है जहां प्रसारण राष्ट्रीय एकता, शिक्षा और नागरिक सशक्तिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में अनुकूलन और सेवा करना जारी रखेगा।
जैसे-जैसे भारत डिजिटल युग में आगे बढ़ रहा है, ध्यान एक व्यापक, समावेशी और तकनीकी रूप से उन्नत प्रसारण प्रणाली बनाने पर केंद्रित हो रहा है जो वैश्विक गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हुए अपनी आबादी की विविध आवश्यकताओं को पूरा करती है। भारत की रेडियो यात्रा राज्य के दखल से बहुत पहले, कलकत्ता (1923) और मद्रास (1924) में शौकिया रेडियो क्लबों के साथ शुरू हुई। 23 जुलाई, 1927 को, बॉम्बे स्टेशन ने इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (IBC) के तहत भारत का पहला औपचारिक प्रसारण किया।IBC आर्थिक रूप से विफल हो गई और 1930 में ब्रिटिश सरकार ने इसे इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (ISBS) के रूप में अपने कब्जे में ले लिया। 1936 में, ISBS का पुनर्गठन किया गया और इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो (AIR) कर दिया गया, जिसे श्रम और उद्योग विभाग के तहत रखा गया।
ऑल इंडिया रेडियो 1936 में इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस से विकसित होकर उभरा। स्वतंत्रता के बाद, ऑल इंडिया रेडियो का तेजी से विस्तार हुआ, और 1956 में “आकाशवाणी” नाम अपनाया। आज, ऑल इंडिया रेडियो 591 स्टेशनों का संचालन करता है, जो भारत की 98% आबादी तक पहुंचता है और 23 भाषाओं और 146 बोलियों में प्रसारण करता है।विविध भारती 1957 में लॉन्च किया गया था, जिसमें लोकप्रिय मनोरंजन और फिल्मी संगीत शामिल था। 1947 में AIR के पास सिर्फ 6 स्टेशन थे, जो भारत के 2.5% क्षेत्र और 11% आबादी को कवर करते थे।
गाजियाबाद के अधिवक्ता और दशकों से रेडियो श्रोता सुदीप शाहू कहते हैं: “भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी हर माह के आखिरी इतवार को मन की बात कार्यक्रम के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हैं। ‘मन की बात’ में वो उन लोगों की बातें करते हैं जिनको दुनिया नहीं जानती है। विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करते हैं। हम रेडियो प्रेमी और देश भर के पुराने रेडियो के संग्रहकर्ताओं की प्रधानमंत्री जी से गुजारिश करते हैं कि देश की राजधानी में राष्ट्रीय चरखा संग्रहालय के तर्ज पर एक राष्ट्रीय रेडियो संग्रहालय की भी स्थापना हो। रेडियो संग्रहालय स्थापित करने की घोषणा 13 फरवरी विश्व रेडियो दिवस पर प्रधानमंत्री स्वयं करें तो बेहद खुशी होगी। उत्तर प्रदेश गजरौला निवासी राम सिंह बौद्ध , बीकानेर राजस्थान निवासी दिनेश माथुर , रायपुर छत्तीस गढ़ निवासी मनोहर लाल डेंगियानी, संभाजी नगर के संजय पवार, जमशेदपुर के चिन्मया महतो, बंगलौर कर्नाटक के उदय कलबुर्गी, गुवाहटी असम के परिवहन विभाग के देबो कुमार, पुथियारा चकवाड के सेथालीकुट्टी देश के रेडियो संग्रहकर्ता हैं। सभी चाहते हैं कि उनके संग्रह को राष्ट्रीय रेडियो संग्रहालय बनाकर सुरक्षित और संरक्षित किया जाये।”
ऑल इंडिया रेडियो का बाहरी सेवा प्रभाग 100 से अधिक देशों में प्रसारण करता है, जो विश्व स्तर पर भारत की आवाज को प्रोजेक्ट करता है और प्रवासी भारतीयों से जुड़ता है। FM चैनलों की शुरुआत और डिजिटल रेडियो मोंडियल (DRM) तकनीक का उपयोग करके डिजिटल प्रसारण में संक्रमण ऑल इंडिया रेडियो की आधुनिकीकरण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत में ब्रॉडकास्टिंग की शुरुआत आज़ादी से पहले के समय से हुई है और तब से इसमें काफी बदलाव आया है। इस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली नीतियां सख्त सरकारी नियंत्रण से बदलकर ज़्यादा उदार और विविध हो गई हैं। ये बदलाव तकनीकी प्रगति, सामाजिक ज़रूरतों और बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को दर्शाते हैं।
नियामक ढांचा सार्वजनिक हित, राष्ट्रीय सुरक्षा और विविध कंटेंट की बढ़ती मांग को संतुलित करने के लिए लगातार खुद को ढालता रहा है। भारत की ब्रॉडकास्टिंग नीतियां सरकारी नियंत्रण से एक विविध, विनियमित इकोसिस्टम में विकसित हुई हैं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सामाजिक ज़िम्मेदारी के साथ संतुलित करती हैं। यह ढांचा पारंपरिक से डिजिटल मीडिया तक, तकनीकी बदलावों के अनुसार खुद को ढालता है। जैसे-जैसे यह क्षेत्र विकसित होता रहेगा, नीतियां इस संतुलन को बनाए रखने के लिए खुद को समायोजित करती रहेंगी, साथ ही इनोवेशन को बढ़ावा देंगी और नई चुनौतियों का सामना करेंगी।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई राष्ट्रीय प्रसारण नीति 2024 का लक्ष्य प्रसारण क्षेत्र के लिए एक मज़बूत भविष्य को परिभाषित करना है। यह एक ऐसे जीवंत उद्योग की कल्पना करती है जो भारत की सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा दे और डिजिटल अर्थव्यवस्था में उसके बदलाव का समर्थन करे। परामर्श और हितधारकों के साथ बातचीत के बाद, TRAI ने सितंबर 2023 में एक प्री-कंसल्टेशन पेपर जारी किया, जिसमें सुझाव आमंत्रित किए गए और 2023 के अंत और 2024 की शुरुआत में देश भर में बैठकें आयोजित की गईं। यह प्रक्रिया एक कंसल्टेशन पेपर में समाप्त हुई जो इनपुट को संश्लेषित करता है और राष्ट्रीय प्रसारण नीति के लिए रणनीतिक दिशाओं की रूपरेखा तैयार करता है, जो भारत के प्रसारण परिदृश्य में संरचित विकास और तकनीकी अनुकूलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि प्रसारण क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सरकारी पहल डिजिटल इंडिया: इस प्रमुख कार्यक्रम का लक्ष्य भारत को एक डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था में बदलना है। भारतनेट परियोजना का उद्देश्य देश की सभी ग्राम पंचायतों को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी प्रदान करना है। ब्रॉडकास्ट इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क डेवलपमेंट योजना का उद्देश्य प्रसार भारती के प्रसारण बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है। प्रसारण का स्वचालन सम्बन्धी पहल AIR और दूरदर्शन के स्थलीय ट्रांसमीटरों और स्टूडियो के डिजिटलीकरण पर केंद्रित है। सामुदायिक रेडियो सहायता योजना यह योजना सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। पिछले 9 वर्षों में, इस क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है और सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की संख्या 2014 में 140 से बढ़कर 2023 में 481 हो गई है।
इतना ही नहीं, भारत सरकार देशव्यापी रेडियो कवरेज का विस्तार करने के उद्देश्य से FM रेडियो चैनल आवंटन के लिए एक पारदर्शी ई-नीलामी प्रणाली लागू कर रही है। वर्तमान में, रेडियो भारत के 80% भौगोलिक क्षेत्र और 90% से अधिक आबादी तक पहुँचता है। इस पहुँच को और बढ़ाने के लिए, सरकार ने ई-नीलामी के तीसरे बैच के तहत 284 शहरों में 808 चैनलों की नीलामी की घोषणा की है। इस पहल को देशव्यापी रेडियो पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो संभावित रूप से पहले से वंचित क्षेत्रों और आबादी तक रेडियो सेवाएं ला सकता है। (क्रमशः …..)
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