​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​’दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र ‘राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे’ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)

इस तस्वीर को देखें। फिर सोचें। ये दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी हैं। मृत्योपरांत इनके पार्थिव शरीर को इसी अवस्था में होना चाहिए था?प्लास्टिक के बोतल में पानी (संभव है गंगाजल ही हो)। बोतल के ठेपी से मुख में गंगाजल देना - दुखद

दरभंगा : कल का दरभंगा राज का बेला पैलेस और आज का पोस्ट ऑफिस ट्रेनिंग सेंटर का कार्यालय के सामने खड़े लोग आपस में बात कर रहे हैं। ​कहते हैं इस महल में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों सहित कई प्रमुख हस्तियों ने दौरा किया है महाराजाओं के कालखंडों में । महल की वास्तुकला में मुगल, राजपूत और यूरोपीय शैलियों का मिश्रण है। आज यह भवन भारत के छह पोस्टल ट्रेनिंग सेंटरों में से एक है।​ यह केंद्र बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल सर्कल की ट्रेनिंग ज़रूरतों को पूरा करता है। ​यह भी कहते हैं कि यहाँ​ डाक विभाग से जुड़े कई श्रेणियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण दी जाती हैं। खैर।

शहर का तापमान अठारह डिग्री के आस पास है। जो भी लोग उपस्थित हैं उनमें बीड़ी और सिगरेट पीने वाले नहीं हैं, अन्यथा इस तापमान पर तो कितने डिब्बे सिगरेट और कितने बंडल बीड़ी फूंके गए होते। बातचीत का सिलसिला जारी है। दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित ‘दी इंडियन नेशन’ अख़बार के अस्सी के ज़माने के तत्कालीन संपादक श्री दीनानाथ झा कहे थे ‘एक संवाददाता के लिए सबसे आवश्यक है कि वह अच्छा श्रोता हो। आँख खुला रखता हो और बिना कलम का इस्तेमाल किये अपने मानस पटल पर लिखने की क्षमता रखता हो।’ बेला पैलेस के सामने उनकी याद बहुत आ रही है।

दरभंगा मैथिली भाषा का केंद्र है, परन्तु यहाँ उपस्थित निनानबे फ़ीसदी लोग हिंदी में बात कर रहे हैं। शब्दों का उच्चारण कभी कभी मुख में दाँत के अभाव के कारण अथवा तंबाकू और गुटका भरे होने के कारण, जिस तरह क्रिकेट खेल में बॉल स्लीप और गली से निकल जाता, शब्द भी फिसल रहे हैं। मिथिला के बुजुर्ग इसलिए कहते हैं कि ‘न दंतहीन सर्प अच्छा होता और न ही दंतहीन व्यक्ति शब्दों का सही उच्चारण कर पाता। यहाँ दृष्टान्त देख रहा हूँ।

महारानी को अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकले आज पांच दिन हो गया। शहर में अब महारानी के प्रति वेदना-संवेदना की बात, चर्चाएं थम सी गयी है। जैसे-जैसे समय एकादशा, द्वादशा और मांस-माँछ तिथि की ओर बढ़ रहा है, जहाँ भोज में अनेकानेक व्यंजन, दही, रसगुल्ला परोसे जायेंगे, दरभंगा के लोग, खासकर जिनका प्रवेश दरभंगा के लालकोठी (रामबाग परिसर) या कल्याणी निवास में ‘आम’ या ‘खास’ है, महारानी की मृत्युभोज के बारे में, मरणोंपरांत कर्म के दौरान दान स्वरुप मिलने वाली वस्तुओं, आभूषणों के बारे में चर्चाएं कर रहे हैं।

कई लोगों के मुख से यह भी कहते सुना हूँ कि अगर भारत-चीन के दौरान सन बासठ में दरभंगा राज की ओर से तत्कालीन महारानी (बड़ी महारानी) और तत्कालीन ट्रस्टी (श्री लक्ष्मीकांत झा) के प्रयास से (राजनीति ही सही) 15 मन सोना दान किया जा सकता है, तो महादेव की नगरी में महारानी की आत्मा को जगह मिले, वे अपने पति देव महाराजा कामेश्वर सिंह से, अपनी दोनों बड़ी बहनों (महाराजा की दो पत्नियां) से मिलें, तदर्थ अन्य दानों के अलावे स्वर्णदान अवश्य करेंगे। पंद्रह मन ना सही, पंद्रह किलो का ही दान होना चाहिए। विदित हो कि महारानी काम सुंदरी की मृत्यु के बाद दरभंगा ही नहीं, पटना ही नहीं, देश-विदेश से प्रकाशित अख़बारों में, इंटरनेटों पर, वेबसाइटों पर 15 मन सोना दान करने का श्रेय महारानी कामसुन्दरी को दिया गया। खैर।

दिवंगत महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह और उनकी तीसरी पत्नी (दिवंगत) महारानी काम सुंदरी देवी

महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा रमेश्वर सिंह, राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, महाराजा कामेश्वर सिंह की अथवा दरभंगा राज में अब तक मृत्यु को प्राप्त किये महिलाओं के मृत्यु भोज में इस डाक ट्रेनिंग कार्यालय के सामने खड़े लोग (कुछ को छोड़कर) सरिक नहीं हुए थे। इनमें से किसी भी व्यक्ति का उस काल खंड में जन्म भी नहीं हुआ था। जो दरभंगा में सत्तर-अस्सी वसंत देखे हैं (उनकी संख्या बहुत कम है) वे महाराजा के साथ-साथ राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, उनके पुत्र जीवेश्वर सिंह, बड़ी महारानी, जीवेश्वर सिंह की पत्नी आदि की मृत्यु और मृत्युभोज में सरिक अवश्य हुए थे, लेकिन किन्ही भी दो व्यक्तियों के मृत्यु भोज अथवा मृत्यु कर्म में समानता नहीं थी। लोगों को तो यहाँ तक कहते सुना कि जीवेश्वर सिंह, जो दरभंगा राज के उस काल खंड से लेकर आज के काल खंड तक, सभी पुरुषों से सबसे मेधावी और यशस्वी थे, उनकी पत्नी के देहावसान के समय दरभंगा राज के लोगों का ह्रदय नहीं पसीजा था। सब समय है।

महारानी काम सुंदरी देवी भले 64-वर्ष विधवा का जीवन व्यतीत कीं, उनकी मृत्यु के बाद उनके शव के समक्ष कल्याणी निवास में ‘राजनीति’ भले हुआ हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वे ‘भाग्यशाली’ भी थी। उनकी शव यात्रा में उनका सबसे बड़ा पौत्र कन्धा दिया था। उनके शव के पीछे दरभंगा शहर के लोग, इष्ट अपेक्षित, संबंधी, तथाकथित संबंधी सभी साथ थे। सभी का अश्रुपूरित था।

भले उनका देहावसान 96 वर्ष में हुआ हो, सभी इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि दरभंगा की महारानी (भले देख रेख के भाव में उन्हें बेड सोर हो गया हो, कमजोरी के कारण पिछले कुछ दिनों से बोलने, आँखें खोलने में असमर्थ रही हो, लोगबाग स्वयं को ‘महारानीहीन समझ रहे थे। मिथिला की यही तो गरिमा है। यही तो संस्कृति है। समाज में कुछ होने पर समाज के लोगों में हर्ष और विषाद होता है, भले परिवार के लोग संवेदनहीन हो जाएँ।

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तभी एक महाशय कहते हैं: “महाराजा की मृत्यु के बाद वसीयत में महारानी को महाराजा की संपत्ति पर जो भी अधिकार या उपयोग करने का अधिकार दिया गया हो, वे भले संतानहीन रही हों, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन काल में गाँव, समाज के सैकड़ों परिवारों को पाली पोसी। कई लोगों को अपने पास रखकर शिक्षित करने की कोशिश की।”

अपने धोती के खूंट से अपनी अश्रुपूरित आंखों को पोछते एक महाशय कहते हैं: “करीब 64 वर्ष विधवा जीवन व्यतीत की महारानी। अपने जीवन के अंतिम सांस तक वाट जोहते रही अपने पोतों की। रत्नेश्वर बाबू को छोड़कर कभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक नहीं दिया। काश !! दरभंगा राज के ‘तथाकथित’ या ‘स्वयंभू’ युवराज कभी अपने हाथों से एक गिलास पानी पिलाए होते !! काश !!! थर-थर काँपते हाथों से दवाई लेकर, रुग्ण अवस्था में बेडसोर से पीड़ित अपनी दादी को उठाकर दो शब्द बात किए होते। दुखद हैं। खैर !!! कहते हैं भगवान सब देखता है, यह भी देखा होगा।”

तभी वहां खड़े कोई चालीस वर्षीय युवक कहता है : “जीवन में दोनों के बीच संपत्ति को लेकर कई मुकदमें हुए। शायद दो बार मिले उनके जीवन काल में ‘स्वयंभू युवराज’ और दोनों बार सबसे पहले दूसरे अख़बारों में ही फोटो छपा। महाराजा द्वारा स्थापित अख़बारों को तो बेच-बाचकर सभी डकार लिए। अब महारानी के मरने के बाद देश, विदेश के राजा आएं, मंत्री आएं संत्री आएं, भोज करें, अख़बार में नाम छपायें, इससे लोगों को क्या? दरभंगा राज के आज के सबसे बड़े पुरुष, जिन्होंने मुखाग्नि दिए, उनसे भी सम्बन्ध एकादशा और द्वादशा तक ही रहेगा। माँछ -मौस आते-आते संधि युक्त नहीं संधि विच्छेद हो जायेगा। पत्रकार लोग भी गजब का प्रश्न करते हैं “श्राद्ध का इंतज़ाम कैसा होगा?”

महारानी का पार्थिव शरीर

उनकी बातों को काटते एक अन्य व्यक्ति एक स्थानीय पत्रकार के प्रश्न पर चुटकी लेते कहते हैं: “पिछले पाँच और अधिक वर्षों में, जबसे महारानी का शरीर शिथिल हुआ, एक भी पत्रकार दो शब्द उस दर्दनाक काल का नहीं लिखा (अपवाद छोड़कर), आज प्रश्न पूछ रहा है कौन-कौन राजा आ रहे हैं? श्राद्ध का कैसा इन्तज़ाम होगा, कहाँ चूल्हा लगेगा, कहाँ पत्तल, क्या क्या उपहार मिलेगा? ओह !!”

इस बीच धोती कुर्ता कोट पहने, ऊनी चादर से सर और कान ढँके, लाठी का सहारा लिए एक बुजुर्ग का प्रवेश होता है। डाक विभाग के कार्यालय के पास उपस्थित लोगों की ओर देखते कहते है “यह भी पूछना चाहिए कि भोज का आयोजन करने वाले केश कटायेंगे अथवा नहीं? अमेरिका और दिल्ली में रहने वाले की संस्कृति कुछ अलग होती है।” चलते चलते बुजुर्ग कहते हैं, “जो भी हो, इस अवस्था में महारानी का जाना उनके शरीर के लिए अच्छा हुआ। बेडसोर होने के कारण बहुत कष्ट में थी। वैसे भी दरभंगा के कितने लोग, जिनकी आयु आज पचास वर्ष भी है, महारानी को देखे हैं? हम सभी तो महारानी शब्द के प्रति ही संवेदना व्यक्त कर रहे हैं। एक युग का अंत हो गया। अब दरभंगा के शब्दकोष से ‘महारानी’ शब्द निरस्त हो गया। दरभंगा राज में महिलायें पहले विधवा होती हैं, और वर्षों बाद विधवा जीवन जी कर मृत्यु को प्राप्त करती है, यही होता आया है। आगे महादेव की मर्जी।”

कुछ देर पहले लाल बाग की ओर से आती सड़क जो आगे विश्वविद्यालय और राम बाग परिसर से होते निकलती है, खड़ा था यहाँ से दाहिने हाथ संस्कृत विश्वविद्यालय प्रवेश द्वार होते कल्याणी निवास की ओर बढ़ा था। इसी आवास में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाऊंडेशन का कार्यालय भी है। विशालकाय सफ़ेद रंग का घर। बीच के हिस्से में आसमानी रंग को पोताई जिसे एक फूल का पौधा आधी दीवार को ढंका है, दिखा। दाहिने हाथ दो तीन गाड़ियां लगी दिखी । कुछ कुर्सियां भी लगी थीं आगंतुकों के लिए। महारानी की मृत्यु की जिज्ञासा करने आये कई लोग कुर्सियों पर बैठे दिखे तो कई खड़े होकर बात करते दिखे। शहर का तापमान वैसे 20 डिग्री के आस-पास थी, लेकिन लोगों के शरीर पर स्वेटर, कोट और अन्य ऊनी वस्त्रों का जमाव है। अपवाद छोड़कर सभी लोग कान गुलेबन्द से ढंके हैं।

इसी बीच पैर के नीचे एक मोटा गद्दा रखे, सफ़ेद वस्त्र में, शरीर पर मात्र ठंढ़ से परहेज करने के कारण कुछ वस्त्र पहने दरभंगा राज के सबसे बड़े पुरुष रत्नेश्वर सिंह बैठे थे। वस्त्र के ऊपर ‘उतरी’ लटका दिख रहा था। चेहरे पर शालीनता दिख रही थी। यह भी दिख रहा था कि परिवार में अब कोई वृद्ध नहीं रहा। रत्नेश्वर के पिता का हाल ही में देहांत हुआ है। माँ जीवित हैं।

वैसे महारानी की मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देने से पूर्व इस कल्याणी निवास में बहुत बड़ी राजनीति का बीजारोपण हुआ था, लेकिन बड़ा प्रपौत्र होने के नाते रत्नेश्वर ही महारानी काम सुंदरी जी को अग्नि के रास्ते महादेव और उनके पति तक भेजने का दायित्व लिया। उनके मुखाग्नि के साथ ही महारानी को अपने पति महाराजा कामेश्वर सिंह, अपने ससुर महाराजा रमेश्वर सिंह और महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, देवर (महाराजा के छोटे भाई) राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, उनके पुत्र यज्ञेश्वर सिंह से मुलाकात होगी। रत्नेश्वर सिंह राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के तीन पुत्रों में एक पुत्र यज्ञेश्वर सिंह के पुत्र रत्नेश्वर सिंह हैं।

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रत्नेश्वर सिंह के बाएं हाथ कोई पांच फूट की दूरी पर राजा बहादुर के सबसे छोटे पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह के कनिष्ठ पुत्र कपिलेश्वर सिंह बैठे दिखे। कपिलेश्वर सिंह पैंट, कमीज, गोल गले वाला (हाईनेक) स्वेटर, जूता पहने थे। कभी कभार काले रंग का चश्मा भी आँखों के सामने आ जाता था। उनके पीछे कई लोग खड़े थे। सामने कुछ पत्रकारों का जमाव दिखा। सामने उपस्थित सभी लोगों के हाथों में वीडियो बनाने के लिए ‘स्मार्ट फोन’ भी तैयार दिखा।

राम नाम सत्य है – महारानी अनंत यात्रा पर

इस बीच एक व्यक्ति कहते हैं: “आजकल नेता बनने के चक्कर में हैं। इसलिए स्थानीय अख़बारों में तस्वीर की पूर्ति बनी रहे, सोशल मीडिया पर कहानियां, वीडियो और तस्वीरें चिपकती रहे, कई लोगों को इस कार्य पर लगा रखे हैं। उनकी बातें ख़त्म हुई भी नहीं थी कि एक अन्य व्यक्ति जो न्यूनतम सत्तर वसंत देखे होंगे, कहते हैं: “सब पैसा का खेल है। सुनते हैं नेताओं के संसर्ग में हैं। यह शायद नहीं जानते कि नेताओं के कारण भी दरभंगा राज का यह हश्र हुआ है। आज अगर अपना अख़बार जिन्दा होता तो महारानी के ऊपर क्या-क्या नहीं लिखा जाता। ‘आर्यावर्त’ और ‘इंडियन नेशन’ अख़बार में नामी रिपोर्टर थे। विश्वास नहीं होता है तो जिस दिन महाराजाधिराज की मृत्यु हुयी थी, अगले दिन का अखबार देख लो। नेताओं ने ही दरभंगा राज को, अख़बारों को नेश्तोनाबूद कर दिया। खैर भगवान् अच्छजा करें, यही प्राथना करता हूँ।

वैसे महारानी की मृत्यु के बाद अथवा उनकी पार्थिव शरीर जब तक अग्नि में सुपुर्द नहीं हुआ था, वे राष्ट्र की राजधानी, जहाँ वे रहते हैं, से दरभंगा के कल्याणी निवास अथवा माधवेश्वर, जहाँ महारानी का अंतिम संस्कार हुआ, नहीं आये थे। प्रवेश द्वार के बाएं हाथ खड़े कुछ लोग आपस में बात करते सुना कि ‘रत्नेश्वर जी सीधा-साधा आदमी है। जब तक महारानी जिन्दा थी, कभी कोई नहीं पूछा था सिवाय रत्नेश्वर के। मेरी आयु आज 65 साल हो गयी है, लेकिन दरभंगा के अख़बारों में कभी नहीं पढ़ा, फोटो नहीं देखा की छोटा कुमार का बेटा महारानी से मिलने, हाल-चाल पूछने आया हो। तभी एक अन्य बुजुर्ग कहते हैं: ‘सुनते हैं महाराजा का सभी संपत्ति अब उसी के नाम हो गयी है। जब तक महारानी जीवित थी, तब तक कागजात में जो भी उनके हिस्से ही संपत्ति थी, उनकी थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद दरभंगा राज की सभी संपत्ति अब छोटे वाले को मिल गयी है।” मैं उनकी बातों को सुन रहा था।

इस बीच उन लोगों की बात को काटते धोती-कुर्ता और स्वेटर, कोट पहने एक शिक्षित व्यक्ति कहते हैं: “छोटका कुमार के बेटा सब संपत्ति के लेल महारानी पर केस केने छलै। दरभंगा के अख़बार में पढ़ने रहिये। खजाना से आभूषण के चोरी के समाचार सेहो छपल रहै।” विगत 12 जनवरी को दरभंगा राज की अंतिम महारानी काम सुंदरी देवी का इसी भवन के अंदर लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था। महारानी अपनी अंतिम सांस, ऐसा कहा जाता है, सुबह-सवेरे 3 बजे के आस-पास ली, लेकिन उनकी मृत्यु को कई घंटों तक सार्वजानिक नहीं होने दिया गया था। ऐसा क्यों हुआ यह तो दरभंगा राज से जुड़े लोग, या फिर जो महारानी की देखरेख करते आ रहे थे, बेहतर बताएँगे।

लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि कल्याणी निवास से जब यह खबर कल्याणी फॉउंडेशन के बनाने वाले प्रोफ़ेसर हेतुकर झा (अब दिवंगत) के घर पहुंचा, उनके पुत्रद्वय यहाँ पहुंचे। उनका कहना था कि यह महज एक महिला की मृत्यु नहीं हुयी है, बल्कि दरभंगा राज की अंतिम महारानी, जो महाराजा डॉ कामेश्वर सिंह की मृत्यु के करीब 64 वर्ष तक विधवा रही, जिसके कारण ही दरभंगा राज की अब तक की गरिमा बची रही, के अंतिम संस्कार के समय तक उनके परिवार के सभी लोगों का उपस्थित होना आवश्यक है।

इस बीच शुभेश्वर सिंह के छोटे पुत्र कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से दरभंगा की ओर निकल गए थे, लेकिन हवाई जहाज में विलम्ब हो रहा था। उनके बड़े भाई राजेश्वर सिंह अमेरिका में सूचित कर दिया गया था और वे भी दरभंगा की ओर निकल गए थे। कुछ लोगों का कहना था कि सभी को कपिलेश्वर सिंह की प्रतीक्षा करनी चाहिए, आखिर खून हैं।

इसके अन्य जो भी कारण हो, सैद्धांतिक रूप में महारानी की मृत्यु के बाद दरभंगा राज से सम्बंधित, ट्रस्ट्स से सम्बंधित जितनी भी आधिकारिक जवाबदेही है, सम्पत्तियों का स्वामित्व है, ‘संपत्ति की वसीयत’ के अनुसार’ स्वतः कपिलेश्वर सिंह को प्राप्त होना है। कपिलेश्वर सिंह भले अपने जीवन काल में अब तक महारानी (उनकी दादी) से अधिकतम तीन बार मिले हों, सम्पत्तियों के लिए उनपर मुकदमें किये हों, उन्हें न्यायालय लाये हों; लेकिन क़ानूनी तौर पर महारानी की मृत्यु के बाद सभी सम्पत्तियों पर उन्हीं का हक़ है। लेकिन हवाई जहाज में बिलम्ब के कारण वे समय निकलता चला जा रहा था।

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इसी बीच उस दिन किसी कोने से ‘अपशब्द’ हवा में उछला और फिर चाटों की आवाज जो सम्पूर्ण वातावरण को घूमिल कर दिया। कुछ लोग उनका भी इंतज़ार नहीं करना चाहते थे और आनन् फानन में महारानी को मुखाग्नि देकर उन्हें विदा करना चाहते थे, जो व्यावहारिक रूप से गलत था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विगत कई वर्षों से महारानी की देखरेख करने के लिए महारानी के नैहर के एक सम्बन्धी और उनका परिवार करते आया है। स्वाभाविक है, अंतिम संस्कार करने के लिए उनका आगे आना। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह गलत हो जाता है जब महारानी के परिवार के लोग, प्रपौत्र जीवित हैं और वे सबसे बड़े भी हैं।

राम नाम सत्य है – महारानी अनंत यात्रा पर

स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, इंटरनेट पर इस खबर को ‘कुछ और तरीके से’ प्रस्तुत किया गया, जो दरभंगा राज के लिए शुभ संकेत नहीं देता है। इतना ही नहीं, महारानी को उन अख़बारों में, ख़बरों में जिस तरह प्रस्तुत किया गया – भारत चीन युद्ध के दौरान उनकी भूमिका, स्वर्ण दान – यह भी तथ्य से परे था। भारत चीन युद्ध के दौरान महारानी काम सुंदरी की कोई भूमिका नहीं थी, अलबत्ता, बड़ी महारानी राजलक्ष्मी देवी तत्कालीन ट्रस्टी लक्ष्मीकांत झा के द्वारा भारत सरकार के मंत्री मोरार जी देसाई को दी थी। महारानी काम सुंदरी बड़ी महारानी को ‘माँ’ स्वरुप मानती थी। मड़ई महारानी की मृत्यु सत्तर के दशक के मध्य हुई।

दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थी, परन्तु कोई संतान नहीं था उन तीनों पत्नियों से। दो महारानियां की मृत्यु पहले हो गई थी। महाराजाधिराज के अंतिम सांस के समय दो महारानियां (बड़ी और सबसे छोटी) और तीन भतीजे थे। ये तीनों भतीजे महाराजाधिराज के भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के पुत्र थे। इन तीनों भाइयों में सबसे बड़े थे राजकुमार जीवेश्वर सिंह, फिर थे राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और सबसे छोटे थे राजकुमार शुभेश्वर सिंह। महाराजाधिराज की मृत्यु के समय सिर्फ राजकुमार जीवेश्वर सिंह का ही विवाह हुआ था और उनकी पत्नी थी श्रीमती राजकिशोरी जी। शेष दो भाई – राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह नाबालिग थे।

राजकुमार जीवेश्वर सिंह अपनी प्रथम पत्नी श्रीमती राजकिशोरी जी के रहते हुए भी, दूसरी शादी भी किए। कुमार जीवेश्वर सिंह के प्रथम पत्नी से दो बेटियां – कात्यायनी देवी और दिब्यायानी देवी हुई और दूसरी पत्नी से पांच बेटियां – नेत्रायणी देवी, चेतना, द्रौपदी, अनीता, सुनीता – हुई । कहा जाता है की जीवेश्वर सिंह दूसरी शादी अपने ही घर के एक ब्राह्मण, जो उनके पूजा-पाठ इत्यादि का बंदोबस्त करते थे, फूल तोड़ते थे, की बेटी से किये। जीवेश्वर सिंह को दोनों पत्नियों से पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। यह भी कहा जाता है कि किसी भी अन्य सदस्यों की तुलना में जीवेश्वर सिंह अधिक शिक्षित थे और महाराजाधिराज के समय-काल में दुनिया भी देखे थे। दरभंगा राज के लोग उन्हें “युवराज” भी कहते थे।

कहा जाता है कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद कुमार जीवेश्वर सिंह को महाराजा की संपत्ति से “बेदखल” कर दिया गया। ऐसा क्यों हुआ यह तो शोध का विषय तो है, लेकिन शोध से परे नहीं है। विवाह के बाद जब तक महाराजाधिराज जीवित थे, राज किशोरी दरभंगा के नरगौना पैलेस में ही रहती थीं। बाद में, अपने पति के साथ वे बेला पैलेस आ गई ।तत्कालीन सरकार ने दरभंगा राज के ही किसी ‘महत्वकांक्षी’ व्यक्ति के ताल-मेल से जब बेला पैलेस पर अपनी निगाहें जमा ली, तो राज किशोरी यूरोपियन गेस्ट हाउस में रहने लगीं। लेकिन सरकार की नजर उनके साथ-साथ चल रही थी। यूरोपियन गेस्ट हॉउस भी दरभंगा राज के स्वामित्व से फिसल गया। इसके बाद वे बलभद्रपुर स्थित आवास में ही उनका शेष समय बीता। अपने पति की मृत्यु के बाद राज किशोरी बेहद एकांत में रहने लगी थी। पिछले वर्ष श्रीमती राज किशोरी का देहांत हो गया। वे दरभंगा के लहेरियासराय के बलभद्रपुर मोहल्ले स्थित आवास पर अंतिम सांस ली।

राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह, जो राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के मझले बेटे थे, को तीन बेटे हुए – कुमार रत्नेश्वर सिंह, कुमार रश्मेश्वर सिंह और कुमार राजनेश्वर सिंह। इसमें कुमार रश्मेश्वर सिंह की अकाल मृत्यु हो गई थी। अपने मझले बेटे की अकाल-मृत्यु के बाद वे अपने अन्तःमन से टूट गए। जबकि राजबहादुर के सबसे छोटे पुत्र राजकुमार शुभेश्वर सिंह के दो पुत्र हुए – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह। कुमार शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी दोनों वर्षों पहले मृत्यु को प्राप्त किये।

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