​भारतीय जनता पार्टी को अभी कई चुनाव और देखने होंगे बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए

​नीतीश कुमार

पटना/दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : भारतीय जनता पार्टी को अभी कुछ साल और इंतज़ार करनी होगी जब उसके लोग प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में स्थापित होंगे। अगर संसद में 2 सीट (1984) से 240 सीट  (2024) आने में भारतीय जनता पार्टी को 42-वर्ष लगे, तो बिहार में साल 1980 में 21 सीट से 45 साल बाद 2025 में 89 ही हो पाया है और बहुमत से मीलों दूर हैं। इस दृष्टि से अभी उसे ‘पिछलग्गू’ ही बनकर ही रहना होगा। यानी स्थानीय राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को तुरंत पटक कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना ‘स्वप्न’ ही रहेगा। 

वैसे भी, प्रदेश में आज की तारीख में और आने वाले दिनों में भी, ऐसे कोई भी भाजपा के नेता नहीं दिखते हैं, मुखरा नहीं है जो केंद्रीय नेतृत्व, यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखौटा के बिना राजनीतिक क्षेत्र में ‘जीवित’ रह सकें। जो व्यक्ति भाजपा को बिहार में पहचान दिया, स्थायित्व दिया, घर-घर तक पहुँचाया – सुशील मोदी –  अंततः उन्हें भी वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। शब्द कटु है, लेकिन सत्य यही है।

राजनीतिक परंपरा के अनुसार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज औपचारिक रूप से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेता चुने गए। इससे पहले वे जनता दल (यूनाइटेड) विधायक दल का नेता चुने गए। अब वे राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को अपना इस्तीफा सौंपेंगे और सरकार गठन के लिए एनडीए के सभी सहयोगियों का समर्थन पत्र पेश करेंगे। आज 17वीं विधानसभा का अंतिम दिन है और कल 18 वीं विधानसभा के गठन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में होगा। यहीं मुख़्यमंत्री सहित अन्य मंत्रीगण शपथ लेंगे। 

नीतीश कुमार प्रदेश में दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब एक व्यक्ति किसी प्रदेश का दसवीं बार मुख्यमंत्री बनेगा। विगत चुनाव में 243 में से 202 सीटें जीतकर शानदार जीत हासिल की, जिसमें भाजपा ने 89 और जेडी(यू) ने 85 सीटें जीतीं। 

वैसे प्रदेश में जातीय जनगणना और चुनाव आयोग द्वारा ‘SIR’ प्रथा के बाद आगामी सरकार के निर्माण में सभी जातियों के लोगों का भागीदारी हो सरकार में, मंथन चल रहा है। राजनीतिक गलियारे में चर्चाएं आम हैं कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते, भाजपा के पास सबसे अधिक मंत्री पद होने की उम्मीद है और वह दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ-साथ अपने स्वयं के विधानसभा अध्यक्ष को भी नामित कर सकती है। इन प्रमुख भूमिकाओं में जातिगत संतुलन सुनिश्चित करने के लिए एक सूत्र लागू किया जाएगा: यदि विधानसभा अध्यक्ष उच्च जाति से है, तो दो उपमुख्यमंत्री ओबीसी/ईबीसी और दलित समुदायों से चुने जा सकते हैं। इसके विपरीत, यदि विधानसभा अध्यक्ष ओबीसी/ईबीसी या दलित समूहों से है, तो एक उपमुख्यमंत्री उच्च जाति से और दूसरा ओबीसी/दलित पृष्ठभूमि से हो सकता है। एक महिला उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।

वैसे, विगत बिहार विधानसभा चुनाव में जनसुराज पार्टी का हारना उसकी सबसे बड़ी जीत है, आप माने या नहीं। यह बात मैं नहीं, प्रधानमंत्री आवास से एक किलोमीटर दूर चाणक्यपुरी स्थित बिहार भवन के दीवार का सहारा लिए एक चाय की दूकान पर बैठा एक बुजुर्ग कर रहा था। दिल्ली के लाल किले पर स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराते देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से नरेंद्र मोदी तक प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने का द्रष्टा होने वाला वह वुजूर्ग कहता है कि अगर संसद में भारतीय जनता पार्टी को अपनी पहचान बनाने में 41-वर्ष लगे, और बिहार में अब तक अपनी पहचान नहीं बना पायी है, तो कल का बिहार जनसुराज पार्टी का ही होगा – गाँठ बाँध लीजिये महामहिम। 

कई साल पहले की एक डायरी पर लिखे शब्दों को देखकर बुजुर्ग बिहार के विगत चुनाव परिणाम पर तीखी टिप्पणी करते कहता है: ‘बिहार में किसी पार्टी की विजय नहीं हुयी है। प्रदेश में चुनाव चतुर्भुज चुनाव था जिसमें – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पुत्रों के उम्र के राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और जनसुराज पार्टी के बीच थी। प्रदेश में भाजपा के किसी भी अभ्यर्थी की अपनी कोई कमाई नहीं थी जो मत में बदल सके। भाजपा को मत सिर्फ़ और सिर्फ़ नरेंद्र मोदी के कारण मिला, न कि पार्टी को। 

नीतीश कुमार को कुछ अपने और कुछ अभ्यर्थियों के निजी छवि के कारण मिला। जबकि तेजस्वी यादव को कुछ पिता, कुछ अपने और कुछ अपनी छवि के कारण मिला। चाहे जितनी भी आलोचना की जाय, आज देश में सभी भाजपाइयों के लिए नरेंद्र मोदी एक मुखौटा हैं। आज हालात यह है की नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी ऊपर की छवि बन गए हैं। यह अलग बात है कि देश में लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर है। आज दस हज़ार पर बिका, कल बीस-पच्चीस हज़ार पर अपना मत बेच देगा। वजह भी है। जब व्यापारी पैसा लगाएगा राजनीति में तो वर्चस्व भी उसी का होगा और मुनाफा भी लेगा। 

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साल 1984 में भाजपा 229 स्थानों पर लोक सभा चुनाव लड़ी थी । लेकिन सिर्फ दो स्थानों पर विजय हासिल कर सकी। सभी 227 अभ्यर्थिओ चारो खाने चित हो गए। 1989 और 1991 में यह संख्या 85 और 120 पहुंची। 11 वीं लोकसभा चुनाव 1996 में 161, 1998 और 1999 में 182 स्थान पर रही। 2004 में 138 स्थान मिले, जबकि 2009 में सीटों की संख्या 116 हो गयी। जब भाजपा के नेतृत्व में चेहरे में बदलाव आया 2014 के चुनाव में 282, 2019 में 303 और फिर 2024 के चुनाव में 240 हो गयी। भाजपा की जो भी आज स्थिति है वह पार्टी के कारण नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष की छवि के कारण है। जो कार्य दीनदयाल उपाध्याय अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जोशी नहीं कर सके, नरेन्द्र मोदी अमित शाह की जोड़ी कर दिखाया। आप माने या नहीं। 

2025 विधानसभा चुनाव, जिसे पत्रकारों से लेकर, दिल्ली  राजनीतिक विशेषज्ञ ‘अनोखा चुनाव और अनोखा परिणाम’ से संबोधित कर रहे हैं, वे शायद इस बात को माने अथवा नहीं, बिहार विधानसभा के इस परिणाम से भाजपा का कोई ऐतिहासिक विजय नहीं हुआ और ना ही नीतीश कुमार का और ना ही तेजस्वी यादव का पराजय, आप माने अथवा नहीं। 

आज भी आरजेडी को जितनी ही संख्या में सीटें मिली हैं, उसमें 80 से अधिक फीसदी लालू यादव को चारा चोर होने के बाद भी, उनकी ही कमाई का फल है। तेजस्वी अभी नीतीश को राजनीतिक टक्कर देने लायक नहीं हुए हैं, वहीँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ भाजपा के अन्य केंद्रीय अथवा प्रदेश के नेता नीतीश के बराबर कद पर खड़े होने लायक भी नहीं हुए हैं। आज नितीश कुमार को जो भी 85 सीटें मिली हैं, यह उनकी अपनी कमाई है। जबकि भाजपा भले 74 से 89 स्थान पर पहुंची हो, यह प्रदेश भाजपा के किसी भी सदस्य के निजी कमाई की ताकत से परे है। अगर नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे नहीं होता तो इस बात को नजर अंदाज नहीं कर सकते थे कि यह संख्या आधी-अधूरी भी नहीं होती। 

पत्रकार कमलाकांत पांडे कहते हैं कि “नीतीश कुमार को 2020 के चुनाव में मोदी जी के हनुमान ने उनको 43 विधायक वाली पार्टी बना दिया था। इस चुनाव में भाजपा और जदयू दोनों 101 और 101 सीटों पर लड़े। संख्या के हिसाब से नीतीश भले विधानसभा में दूसरे स्थान पर हैं, लेकिन यह ध्यान रखने की ज़रूरत है कि नीतीश की 43 विधायकों वाली पार्टी से 85 विधायकों वाली पार्टी बनी है और भाजपा 74 विधायकों वाली पार्टी से 89 बनी। यानी नीतीश कुमार 42 नई सीट जीते जबकि भाजपा सिर्फ़ 15 नई सीटें जीत पाई। भले ही भाजपा तकनीकी तौर पर अपने गठबंधन में सबसे बड़ी दिखती है, लेकिन हकीकत में नीतीश कुमार इस गठबंधन में सबसे आगे हैं। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा उन पर कृपा नहीं कर रही है। और यह बात नरेंद्र मोदी भी समझते हैं और अमित शाह भी। प्रदेश के लोग और भाजपाई नेता तो समझते ही हैं।”

पांडे जी कहते हैं कि सम्पूर्ण हिंदी पट्टी में बिहार ही एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां भाजपा अब तक अपनी सरकार नहीं बना पाई है। बिहार बुद्ध की धरती है। यहीं चंपारण के सत्याग्रह के ज़रिए महात्मा गाँधी संपूर्ण देश में जाने गये। यह लोहिया और जयप्रकाश के संघर्ष की धरती है। इस धरती ने अब तक स्वतंत्र रूप से हिंदुत्व की विचारधारा को अपनी धरती पर फलने फूलने नहीं दिया है। आज भी भाजपा यहां अन्य दलों से आयातित लोगों के कंधों पर ही टिकी हुई है।”

जहाँ तक प्रदेश में भाजपा का नेतृत्व और लोगों पर उसकी पकड़ का प्रश्न है, वह अभी 20 फीसदी से अभी अधिक नहीं है। अगर इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं होता तो औसतन 60 फीसदी से अधिक अभ्यर्थी मुंह के बल गिरते। कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24) और दिलीप कुमार जायसवाल (2024 से अब तक) ये सभी पिछले 44 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। 

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सवाल यह है कि इन लोगों के कार्यकाल में भाजपा मजबूत हुआ, पार्टी मजबूत हुयी, भाजपा में बिहार के मतदाताओं का रुझान क्या रहा, यह इस बात का ,प्रमाण है कि आज भी 43 विधायकों के साथ नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और भाजपा के नेता उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। 2015 में विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या भले 53 से बढ़कर 17वीं विधानसभा में 74 हो गया हो; लेकिन यह संख्या भाजपा की अपनी नहीं है। यह संख्या नीतीश कुमार द्वारा दान स्वरुप हैं। 2015 में जनता दल यूनाइटेड की विधानसभा में संख्या 71 थी, जो 17वीं विधानसभा में 43 हो गयी। राष्ट्रीय जनता दल की संख्या भले 80 से घटकर 75 हो गया हो, लेकिन आज भी मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ है।

बहरहाल, आज़ाद भारत में अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत 75 वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। आज भले प्रदेश के नेताओं को, लोगों को, मतदाताओं को दिखाई नहीं दे सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण, आने वाली पीढ़ियां कभी माफ़ नहीं करेगी – न नेताओं को और ना ही मतदाताओं को। 

बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। 

प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। 

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डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता – सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है – का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा। 

10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। 

11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में ”चाराचोर” के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के वावजूद राबड़ी देवी प्रदेश की मतदाताओं के विश्वास और अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतरीं।

10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। 

11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे – सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं। 

1 COMMENT

  1. Bahut sundar baat likhe hai Sir. Gathbandhan dharma palan ke sath apna isthit behtarin karne ke liye wo Nitish Kumar jee ko (Swaksh chhavi) punah gathbandhan dharma ka neta banaya. Baad men to samay aane pe asha hi nahin purna vishwash hai ki aagami din BJP ka CM hoga hi. Hardik Mangal Kamna 💐🙏

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