
पटना / नई दिल्ली : जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की ललकार पर सन 1974 के अगस्त महीने तक रंग चढ़ रहा था। आज बिहार की राजनीतिक गलियारे में जितने भी ‘तथाकथित मठाधीश’ बैठे हैं, पटना के साथ-साथ प्रदेश की गलियों, सड़कों पर चप्पल घिस रहे थे। उधर सचिवालय और मंत्रिमंडल की कुर्सीयों पर ‘शातिर राजनेता’ बैठे थे।
जंगे आज़ादी के दौरान ‘अगस्त क्रांति’ भी 32-वर्ष पुराना हो गया था। 8-अगस्त 1942 को महात्मा गाँधी की अगुवाई में तत्कालीन बम्बई गावलिया टैंक मैदान से उठा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में, जिसमें पटना के सचिवालय के सामने युवकों ने अपने प्राणों की आहुति देकर एक अध्याय जोड़ा था, के सम्मान में 8 अथवा 9-अगस्त को प्रभात फेरी भी निकलना बंद हो गया था।
लेकिन 9 अगस्त को दो घटनाएं महत्वपूर्ण घटी – एक: भारत में घटी और दूसरी: अमेरिका में। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के 37 वें राष्ट्रपति रिचर्ड एम. निक्सन को ऐतिहासिक राजनीतिक घोटाले के कारण उन पर महाभियोग लगा और उन्हें अपने कार्यकाल के मध्य में ही सिंहासन को छोड़ना पड़ा। आज भी वह घटना न केवल अमेरिका के इतिहास में, बल्कि विश्व के राजनीतिक इतिहास में काला अध्याय के रूप में अंकित है और पूरा विश्व उसे ‘वॉटरगेट घोटाला’ के नाम से जानता है। उसकी शुरुआत 17 जून 1972 की रात को हुई थी जब पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
वजह था कि वाटरगेट कॉम्प्लेक्स में स्थित डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के कार्यालयों में जासूसी उपकरण स्थापित करने का प्रयास किया था। इन लोगों पर जासूसी का आरोप लगाया गया था निक्सन पुनर्निर्वाचन समिति से जुड़ें। उस वाटरगेट घोटाला को वाशिंगटन पोस्ट के पत्रकार बॉब वुडवर्ड और कार्ल बर्नस्टीन ने खोजा था। कहते हैं कि निक्सन का इस्तीफा महाभियोग के चार दिन बाद देना पड़ा और फिर उनकी जगह उप-राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड राष्ट्रपति का शपथ लिए।
उधर भारत में, 9 अगस्त को भारत में आई.एस. जौहर के निर्माण और निर्देशन में एक फिल्म भारत के सिनेमा घरों के पर्दों पर आया। नाम था 5-राइफल्स। इस सिनेमा में राजेश खन्ना, शशि कपूर के अलावे आई.एस. जौहर स्वयं अभिनय किये थे। इस सिनेमा में एक गीत था गीतकार नाज़ा शोलापुरी का, जिसके संगीतकार थे अजीज नाजां और गायक भी अजीज नाज़ां ही थे। वह गीत भारत की नहीं विश्व के लोगों बहुत पसंद आया था। पचास वर्ष बाद आज भी संगीत की दुनिया में वह गीत बादशाह बनकर, लोगों के होठों पर मौजूद है।
आज अंगूर की बेटी से मोहब्बत कर ले
शैख़ साहेब की नसीहत से बग़ावत कर लेउस की बेटी ने उठा रक्खी है सर पर दुनिया
ये तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ
लेकिन यह पचास साल पहले की बात है। आज तो बिहार ही नहीं, पूरे भारत में एक तरफ जहाँ राजनीतिक गलियारे में राजनेताओं के बेटा-बेटियों का साम्राज्य स्थापित हो रहा है, वहीं कुछ राज्यों में नेताओं ने ‘मधु’ की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। लेकिन कहते हैं न पानी के बहाव को कौन रोक सकता है। शराब भी तो पानी का ही स्वरुप है। वैसे, राज्य ही नहीं, देश में जो भी प्रतिबंधित है, जो भी गैर क़ानूनी है, जो भी असंवैधानिक है, उन घटनों और क्रियाओं की सांख्यिकी भी बहुत अधिक है। और वही प्रतिबन्ध ‘बदलाव’ भी लाया है, चाहे आपातकाल ही क्यों न हो।
घोटालों, चाहे आर्थिक हो या राजनीति की गिनती करना मुश्किल नहीं तो नामुमकिन है। अपराध, चाहे हत्या हो या बलात्कार, की गिनती नहीं की जा सकती है। इन तमाम वारदातों के बीच एक बात राजनीतिक क्षितिज पर हावी हो गया है – नाना-नानी, दादा-दादी, माँ-बाबूजी, बेटा-बेटी, भाई-बहन, साला-साली, मौसा-मौसी, फूफा-फूफी के बाल बच्चों का राजनीति में प्रवेश, वह भी ताल ठोककर। और चुनावी मौसम की तो बात ही नहीं करें। ‘वंशवाद’ तो चुनाव के समय ताड़ का पेड़ जैसा हो जाता है।
हालांकि, वंशवाद पर बहस में नेहरू-गांधी परिवार पर अधिक तंज कस्ते हैं लोग, लेकिन यह संस्कृति उत्तर से दक्षिण, पश्चिम से पूर्व तक, सभी राजनीतिक दलों और क्षेत्रों में पनप कर एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया है। वंशवादी राजनीति इस हद तक है कि कुछ परिवारों के सदस्य न केवल राजनीतिक विभाजन से परे, बल्कि राज्य की सीमाओं से भी परे हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि वंशवादी राजनीति की शुरुआत देश के सबसे उत्तरी राज्य जम्मू-कश्मीर से होती है, जहाँ दो परिवार – अब्दुल्ला और मुफ़्ती से प्रारम्भ हुआ। इन दोनों में से ज़्यादा प्रमुख अब्दुल्ला परिवार रहा, जिनके परिवार से तीन पीढ़ियों में कम से कम चार मुख्यमंत्री बने हैं। वर्तमान नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) नेता उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जबकि उनके पिता फारूक अब्दुल्ला कई बार राज्य की सत्ता संभाल चुके हैं और 2009 से 2014 के बीच यूपीए-2 सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं। उमर के दादा शेख अब्दुल्ला, जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘शेर-ए-कश्मीर’ (कश्मीर का शेर) कहा जाता है।
राज्य के शीर्ष पद से परिवार का नाता यहीं खत्म नहीं होता। फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह 1980 के दशक में मुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा, शेख अब्दुल्ला के भाई शेख मुस्तफा कमाल राज्य में मंत्री रहे, जबकि फारूक के चचेरे भाई शेख नजीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के सबसे लंबे समय तक महासचिव रहे और लगभग तीन दशकों तक इस पद पर रहे। 2015 में उनका निधन हो गया। मुफ्ती परिवार के मुखिया मुफ्ती मोहम्मद सईद, जो पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के संस्थापक थे, और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। सईद के बेटे, तस्सदुक मुफ्ती, जो एक सिनेमैटोग्राफर हैं, मुफ्ती परिवार से राजनीति में आने वाले नए चेहरे हैं।
पंजाब में, बादल परिवार दशकों से राजनीति पर हावी रहा है, जिसमें शिरोमणि अकाली दल के संस्थापक और चार बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल अग्रणी भूमिका में हैं। उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल 2009 से 2017 के बीच राज्य के उप-मुख्यमंत्री रह चुके हैं। सुखबीर लोकसभा सांसद भी रहे हैं और 1998 में मात्र 13 महीने की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कुछ समय के लिए केंद्रीय मंत्री भी रहे थे। सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर बादल लोकसभा सांसद और मोदी सरकार में मंत्री हैं। हरसिमरत के भाई, विवादास्पद बिक्रम सिंह मजीठिया, भी अकाली दल के नेता हैं और अकालियों के सत्ता में रहने के दौरान राज्य के कैबिनेट मंत्री थे।
प्रकाश सिंह बादल के भाई, गुरदास सिंह बादल, हालांकि अब अलग हो चुके हैं, भी सांसद रह चुके हैं। गुरदास के बेटे मनप्रीत सिंह बादल, परिवारों के बीच रिश्तों में खटास आने से पहले, अकाली दल में बड़े पदों पर पहुँचने के लिए तैयार दिख रहे थे। वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के परिवार के अन्य सदस्य भी राजनीति में हैं। उनकी पत्नी प्रीनीत कौर तीन बार लोकसभा सांसद रह चुकी हैं और यूपीए-2 सरकार में मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में शामिल थीं, जबकि उनके बेटे रणइंदर सिंह भी कांग्रेस पार्टी में हैं।
राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में राजनीतिक राजवंशों का अपना एक अलग, मज़बूत समूह है। राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट, दिवंगत राजेश पायलट के पुत्र हैं – जो एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता, केंद्रीय मंत्री, लोकसभा सांसद और एक शक्तिशाली गुर्जर नेता थे। सचिन की माँ रमा पायलट हिंडोली से विधायक और दौसा से सांसद रही हैं। मूल रूप से मध्य प्रदेश के ग्वालियर के रहने वाले सिंधिया परिवार का राजनीतिक वंश न केवल पार्टी विभाजन से परे, बल्कि राज्य की सीमाओं से भी जुड़ा है।
कुलमाता विजया राजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा की एक प्रमुख नेता थीं। उनकी बेटियाँ यशोधरा और वसुंधरा राजे उनके नक्शेकदम पर चलते हुए प्रमुख भाजपा नेताओं के रूप में उभरी हैं। वसुंधरा राजे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, जबकि उनके बेटे दुष्यंत भाजपा सांसद हैं। विजया राजे के बेटे माधवराव और पोते ज्योतिरादित्य ने एक अलग रास्ता अपनाया है। पिता और पुत्र वरिष्ठ कांग्रेस नेता होने के साथ-साथ केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। माधवराव सिंधिया की 2001 में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
हरियाणा राजनीतिक परिवारों से भरा पड़ा है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के संरक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और उनके छोटे बेटे अभय चौटाला, उनके बड़े बेटे अजय सिंह चौटाला और अजय के बेटों दुष्यंत और दिग्विजय सभी राजनीति में गोलबंद हैं। अजय चौटाला की पत्नी नैना हरियाणा के डबवाली से विधायक हैं। हालांकि, ओम प्रकाश पहली पीढ़ी के राजनेता नहीं हैं। उनके पिता देवीलाल 1989 से 1991 के बीच भारत के उप-प्रधानमंत्री रहे और हरियाणा के मुख्यमंत्री भी रहे। ओम प्रकाश के छोटे भाई रणजीत सिंह भी हरियाणा विधानसभा के सदस्य रहे हैं।
हरियाणा के हुड्डा परिवार भी शक्तिशाली राजनेताओं का एक समूह है। कांग्रेस के नेता रणबीर सिंह हुड्डा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे और संविधान सभा के सदस्य भी। उनके बेटे भूपेंद्र सिंह हुड्डा, जो एक प्रभावशाली जाट नेता हैं, राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जबकि उनके पोते दीपेंद्र हुड्डा कांग्रेस के सांसद हैं। उद्योगपति ओ.पी. जिंदल एक वरिष्ठ राजनेता थे, जिन्होंने राज्य में मंत्री के रूप में कार्य किया, जबकि उनकी पत्नी सावित्री जिंदल भी मंत्री रही हैं। उनके बेटे नवीन जिंदल कुरुक्षेत्र से पूर्व लोकसभा सांसद हैं।हरियाणा के शक्तिशाली परिवारों से पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल का भी संबंध रहा है। उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई राज्य में विधायक हैं और कुलदीप की पत्नी रेणुका भी। 2017 में, बिश्नोई ने अपनी पार्टी, हरियाणा जनहित कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर दिया।
बिहार में नेता के बेटा-बेटी और राजनीति
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू यादव की भी राजनीतिक पृष्ठभूमि समाजवाद और 1970 के दशक के ‘जेपी आंदोलन’ (जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में) से जुड़ी है। अपनी बुद्धिमता, भाषा के आकर्षक प्रयोग, कुशाग्र राजनीतिक बुद्धि और कुख्यात चारा घोटाले के लिए जाने जाने वाले लालू के अलावा अब उनके चार रक्त संबंधी भी राजनीति में हैं। उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, जबकि उनके बेटे तेजस्वी बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। बड़े बेटे तेज प्रताप राज्य में मंत्री थे। बेटी मीसा भारती सांसद हैं। ससुराल के लोगों की तो बात ही नहीं करें। सभी राजनेता हैं।
बिहार की राजनीति में चाचा-भतीजे की लड़ाई सभी ने देखी। कैसे रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके भाई पशुपति पारस ने चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के दो फाड़ कर लिए और पार्टी के सभी सांसदों को अपने खेमे में मिलाकर खुद मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बन गए थे। हालांकि चिराग पासवान ने राजनीति का गुण अपने पिता से सीखा था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने किया और अपने चाचा से बदला ले लिया। चिराग पासवान के नेतृत्व में उनकी पार्टी ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ उन्होंने सभी 5 सीटों पर जीत हासिल की। अब वो मोदी सरकार 3.0 में केंद्रीय मंत्री हैं। चिराग भी अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
जीतन राम मांझी भी परिवारवाद की मिसाल हैं। उनके बेटे संतोष सुमन मंत्री हैं, बहू दीपा मांझी सक्रिय राजनीति में हैं और समधन ज्योति देवी भी चुनाव लड़ चुकी हैं। कोसी की राजनीति पर पकड़ शकुनी चौधरी लंबे समय तक मंत्री रहे। आज उनके बेटे सम्राट चौधरी भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और अब डिप्टी सीएम पद तक पहुंच चुके हैं। उनकी पत्नी पार्वती देवी भी विधायक रह चुकी हैं। डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा, जो बिहार के पहले उपमुख्यमंत्री रहे, उनके परिवार ने भी राजनीति में गहरी पकड़ बनाई। उनके बेटे सत्येंद्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री बने। बहू किशोरी सिन्हा राजनीति में सक्रिय रहीं और पौत्र निखिल कुमार राज्यपाल व सांसद रह चुके हैं।
मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा का परिवार भी राजनीति में सक्रिय रहा। उनके बेटे नीतीश मिश्रा मंत्री बने और पौत्र ऋषि मिश्रा विधायक रहे। पिछड़े वर्ग की पकड़ रामलखन सिंह यादव का परिवार भी राजनीति में मजबूत रहा। उनके पौत्र जयवर्धन यादव आज राजनीति में सक्रिय चेहरा हैं।दलित राजनीति का राष्ट्रीय चेहरा उपप्रधानमंत्री रहे बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष तक बनीं। उनके नाती अंशुल अविजीत भी राजनीति में हाथ आजमा रहे हैं। समाजवादी आंदोलन की धरोहर पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का परिवार भी राजनीति में सक्रिय रहा है। उनके बेटे रामनाथ ठाकुर वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं।
राजनीति में लगातार उपस्थिति रामानंद तिवारी के बेटे शिवानंद तिवारी लंबे समय तक मंत्री रहे और पौत्र राहुल तिवारी विधायक बने। वित्त मंत्री से लेकर विधायक तक तुलसीदास मेहता के बेटे आलोक मेहता मंत्री बने, जबकि बेटी सुहेली मेहता भी राजनीति में हैं। लालू के करीबी पूर्व मंत्री जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर सिंह वर्तमान में सांसद हैं। सीमांचल की राजनीति पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम सांसद बने, जबकि दूसरे बेटे शाहनवाज आलम मंत्री रहे। भाजपा से जुड़ा परिवार पूर्व सांसद मदन प्रसाद जायसवाल के बेटे डॉ. संजय जायसवाल भाजपा सांसद रहे हैं और प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। बाहुबली से सियासी ताकत तक बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद सांसद हैं और बेटा चेतन आनंद राजद से विधायक है। राजनीति और खेल का संगम पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की बेटी श्रेयसी सिंह राजनीति में उतरीं और अब विधायक हैं।
उत्तर प्रदेश की तो बात ही नहीं करें
यहाँ समाजवादी पार्टी (सपा) के यादव वंश सबसे प्रसिद्ध वंश हैं, लेकिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के वंश जैसे अन्य वंश भी हैं। चौधरी चरण सिंह के पुत्र, अजीत सिंह ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) की स्थापना की (दोनों दिवंगत) – पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक प्रभावशाली पार्टी है। उनके पुत्र, जयंत चौधरी, एक सक्रिय राजनीतिज्ञ हैं और 2009 से 2014 के बीच मथुरा से सांसद रहे।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी नेता मुलायम सिंह (दिवंगत) के बेटे अखिलेश यादव, जो स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री हैं, ने समाजवादी पार्टी (सपा) की कमान लिए हैं। अखिलेश यादव के चाचा राम गोपाल यादव और शिवपाल यादव सभी राजनीति में हैं। इतना ही नहीं, अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव कन्नौज से लोकसभा सांसद हैं, जबकि उनके छोटे बेटे प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव भी राजनीति में अपना स्थान बनाने की कोशिश कर रहीं हैं। कल के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं। बहन रीता बहुगुणा जोशी, उत्तर प्रदेश की भाजपा की वरिष्ठ नेता नहीं। विजय के बेटे, साकेत और सौरभ, भी राजनीति में सक्रिय हैं।
देवेगौड़ा परिवार को अक्सर कर्नाटक का अप्पा-मक्कल पक्ष (पिता-पुत्रों की पार्टी) कहा जाता है। उनके बेटों – वर्तमान मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी और लोक निर्माण मंत्री एच.डी. रेवन्ना ने भी आगे बढ़ाया है। उधर, रेवन्ना और कुमारस्वामी के दोनों बेटे – प्रज्वल और निखिल – भी सक्रीय राजनीति में कुस्ती लड़ रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे – बी.वाई. राघवेंद्र और बी.वाई. विजयेंद्र सक्रिय राजनीति में हैं।
महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना की तूती बोलती थी, हालांकि बाल ठाकरे का ये सिद्धांत था कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य खुद राजनीति में नहीं उतरेगा। पार्टी की राजनीति में उनका परिवार चुनाव नहीं लड़ेगा। हालांकि उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने अपने पिता के इस सिद्धांत को तोड़ दिया और वो महाराष्ट्र के सीएम बन गए और उन्होंने अपनी सरकार में अपने ही बेटे आदित्य ठाकरे को मंत्री पद सौंप दिया। अब बाल ठाकरे की शिवसेना दो फाड़ में बंट चुकी है, एक की कमान उद्धव के हाथ में है और दूसरे के कर्ता एकनाथ शिंदे हैं। शरद पवार की बेटी बेटी सुप्रिया अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे ले जा रही हैं।
नंदमुरी तारक राम राव (एनटीआर) 1982 में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की स्थापना की थी, लेकिन अब उनके दामाद और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राजनीतिक बागडोर संभाली है। नायडू ने 1995 में एक तख्तापलट के ज़रिए पार्टी की कमान संभाली, लेकिन एनटीआर के बेटे हरिकृष्णा और एक अन्य दामाद डी. वेंकटेश्वर राव को विधायक और डी. वेंकटेश्वर राव को मंत्री बनाकर उन्हें अपने साथ शामिल कर लिया। एनटीआर के बेटे नंदमुरी बालकृष्णा भी राजनीति में हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के बेटे के.टी. रामा राव और बेटी के. कविता निज़ामाबाद भी राजनीति में हैं।
इतना ही नहीं, एनटीआर की बेटी दग्गुबाती पुरंदेश्वरी परिवार की सबसे सफल राजनेताओं में से एक हैं। बापटला और विशाखपत्तनम लोकसभा क्षेत्रों से दो बार कांग्रेस सांसद रहीं दग्गुबाती तेलंगाना राज्य के गठन के तुरंत बाद भाजपा में शामिल हो गईं। उधर, नायडू के बेटे नारा लोकेश अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए सज्ज हो रहे हैं। आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाई. राजशेखर रेड्डी की पत्नी भी राजनीति में रही है और उनके बच्चे – वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी और शर्मिला – पिता की राजनीतिक विरासत को बढ़ा रहे हैं।
1968 से पाँच बार मुख्यमंत्री रहे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के मुखिया करूणानिधि की राजनीतिक विरासत पुत्र एम.के. स्टालिन, बेटी कनिमोझी, परपोते दयानिधि मारन के रूप में जीवित है। सुष्मिता देव, असम के वरिष्ठ कांग्रेस नेता संतोष मोहन देव और सिलचर से विधायक रहीं बिथिका देव की बेटी हैं। त्रिपुरा के किरीट बिक्रम देब बर्मन, श्रीमती बिभु कुमारी देबी का राजनीतिक वंश प्रद्योत देब बर्मन के रूप में है। भारतीय सियासत के इतिहास को खंगाला जाए, तो ऐसी सूची बड़ी लंबी होगी जिसमें बड़े-बड़े दिग्गज नेताओं ने अपने बेटे या बेटी के हाथों में राजनीतिक विरासत सौंप दी।
पटना से कमला कान्त पाण्डे लिखते हैं: बेटे को टिकट दिलाने के लिए पटना से दिल्ली तक लॉबिंग कर रहे हैं ये BJP के 10 दिग्गज नेता
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल बजने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर एक नई सियासी हलचल शुरू हो गई है। जिस पार्टी ने हमेशा वंशवाद की राजनीति का मुखर विरोध किया है, अब उसी के कई कद्दावर नेता ‘पुत्र मोह’ में घिरे नजर आ रहे हैं। 70 साल की उम्र पार कर चुके ये दिग्गज नेता, जिनके अपने टिकट कटने की प्रबल संभावना है, अब दिल्ली से पटना तक अपने बेटों के लिए विधानसभा टिकट सुनिश्चित करने की जोर-आजमाइश में जुट गए हैं। यह स्थिति भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें वरिष्ठ नेताओं के अनुभव और पार्टी के युवा चेहरे पेश करने के संतुलन के बीच पुत्र मोह की इस नई लहर से निपटना होगा।
नंदकिशोर यादव – बिहार विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष और पटना साहिब से नौ बार विधायक रहे नंदकिशोर यादव (70+ वर्ष) का नाम भी टिकट कटने वालों की सूची में हैं। वे अपने बेटे नितिन कुमार ‘रिंकू’ को पटना साहिब से टिकट दिलाने को प्रयासरत हैं। पार्टी के कद्दावर नेता और वर्तमान में बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह भी अपने बेटे सुशांत रंजन और प्रशांत रंजन को राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं। उनका पसंदीदा विधानसभा क्षेत्र आरा है। इसी तरह, पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव के बेटे अभिमन्यु यादव अपने संगठन ‘टीम अभिमन्यु’ के नाम से फतुहा क्षेत्र में सक्रिय हैं। रामकृपाल यादव अपने बेटे के लिए फतुहा से टिकट चाहते हैं, जहां पिछली बार भाजपा के सत्येन्द्र सिंह चुनाव लड़कर हार गए थे। केंद्रीय मंत्री रह चुके अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत भी भागलपुर से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। एक बार भागलपुर से चुनाव लड़कर हार चुके हैं। अर्जित 2018 की भागलपुर सांप्रदायिक घटना में भी चर्चा में रहे थे और हाल ही में सनातन महाकुंभ में काफी सक्रिय थे।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद रहे आरके सिन्हा के बेटे ऋतुराज सिन्हा पहले पटना साहिब से लोकसभा का टिकट चाहते थे। अब चर्चा है कि वे पटना की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। वे अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं और संगठन में अभी राष्ट्रीय सचिव की भूमिका निभा रहे हैं। आरा विधानसभा से लगातार जीतते रहे कद्दावर नेता अमरेंद्र प्रताप सिंह (70+ वर्ष) भी अपनी विरासत अपने बेटे को सौंपने की तैयारी में हैं और आरा विधानसभा से अपने बेटे को टिकट दिलाना चाहते हैं। मधुबनी से विधायक रहे विनोद नारायण झा, जो पूर्व में लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री भी रहे, अब अपने बेटे डॉ. विभय झा को राजनीति में उतारना चाहते हैं। हालांकि, डॉ. विभय झा वर्तमान में चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (रामविलास) में सक्रिय हैं।
कुम्हरार विधानसभा क्षेत्र से लगातार (2005-2020) जीतते रहे विधायक अरुण कुमार सिन्हा (70+ वर्ष) भी अपने बेटे अशीष सिन्हा के लिए कुम्हरार विधानसभा से टिकट चाह रहे हैं। अशीष सिन्हा पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में भाजपा युवा मोर्चा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसी सीट से भाजपा नेता और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय चुनावी मैदान में उतरने के लिए तैयार बैठे हैं। इसी सीट पर पहले सम्राट चौधरी चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन अब मन डोल रहा है। बिहार सरकार में पूर्व पीएचईडी मंत्री और मधुबनी के राजनगर से विधायक रामप्रीत पासवान भी अपने बेटे दीपक कल्याण को टिकट दिलाने के लिए पैरवी कर रहे हैं। दीपक कल्याण क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। गया शहर से 8 बार लगातार विधायक रहे और वर्तमान में सहकारिता मंत्री प्रेम कुमार (70 वर्ष) भी अपने बेटे के लिए गया शहर से टिकट चाह रहे हैं। उनकी लोकप्रियता के बावजूद, उम्र का फैक्टर उनके लिए चुनौती बन सकता है।














