बांस घाट (पटना) : बांस घाट पर बैठा हूँ। सामने एक टांग वाले कौआ को देख रहा हूँ। कहते हैं कौआ मनुष्य जाति का पूर्वज होता है। कल ही तो पितृपक्ष (श्राद्ध) समाप्त हुआ है। देश के बड़े-बड़े नेता, व्यापारी बिहार की भूमि पर अपने-अपने पितरों को पिंडदान किये हैं। आधुनिक बिहार के इतिहास में शायद ऐसा अवसर नहीं आया था जब देश के कोने-कोने से राजनेताओं के साथ-साथ बड़े-बड़े उद्योग घराने के लोग फल्गु नदी में आकर अपने पितरों को पिंडदान किये हो। लगता है बिहार में 18 वें विधानसभा के गठन के लिए चुनाव होने वाला है।
आज बांस घाट की भौगोलिक स्थिति में बदलाव देख रहा हूँ। लेकिन आज भी लोकनायक के पार्थिव शरीर की धधकती चिता में जेपी के सिद्धांतों को, विचारों को चट-चट-फट-फट-फटाक ध्वनि के साथ जलते देख रहा हूँ। आज से 46 वर्ष पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने सिद्धांतों, विचारों को अपने अनुयायियों के भरोसे छोड़कर अनंत यात्रा पर निकले थे। शायद वे नहीं जानते थे कि उनकी सांस रुकते ही उनके विचारों को, सिद्धांतों को प्रदेश के चौराहों पर उनके ही अनुयायीगण नेस्तनाबूद कर देंगे।
जयप्रकाश नारायण अपने सम्पूर्ण क्रांति से देश में ‘रामराज्य’ लाना चाहते थे। भ्रष्टाचार मिटाना चाहते थे। भ्रष्ट नेताओं को सत्ता से दूर फेंकना चाहते थे। लेकिन जैसे-जैसे गंगा की धारा शहर की भूमि से दूर होती गयी, भ्रष्टाचार सत्ता के गलियारे में अपना वर्चस्व स्थापित करता गया। अगर ऐसा नहीं होता तो इन साढ़े तीन दशकों में अपराधी विधायक नहीं होते, विधायक भ्रष्ट नहीं होते, मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होते, नेताओं के विरुद्ध पुलिस और अन्वेषणकर्ता नहीं होते, मतदाता ‘विचारहीन’ नहीं होता, लोभवश अपने मतों का प्रयोग नहीं करता। जिस मुद्दों को लेकर जयप्रकाश नारायण तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी और प्रदेश की कांग्रेसी सरकार को उखाड़कर सम्पूर्ण क्रांति का शंखनाद किये थे, आज वे सभी मुद्दे पटना के सचिवालय से लेकर दिल्ली के सचिवालय तक भरे परे हैं। भ्रष्टाचार उनके अनुयायी उत्कर्ष पर ले गए हैं।
उस दिन 9 अक्टूबर था 1979 साल का। साल 1976 में बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा के सम्मानार्थ बने गांधी मैदान के उत्तरी भाग पर स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में पांच लाख से अधिक बिहार के लोग लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर का दर्शन कर, श्रद्धांजलि देकर, उन्हें पृथ्वी से अंतिम विदाई देने आये थे। श्रीकृष्ण मेमोरियल के सामने गांधी मैदान के इस हिस्से में बने मंच से सं 1974 में जयप्रकाश नारायण केंद्र में श्रीमती इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए सम्पूर्ण क्रांति का शंखनाद किये थे। उस दिन इंदिरा गांधी भी अपने प्रिय नेता को अश्रुपूरित आँखों से विदाई दे रही थी। तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, मोरारजी देसाई, बाबू जगजीवन राम और देश विदेश के कई गणमान्य लोग जयप्रकाश नारायण के अंतिम विदाई में आये थे – श्रद्धांजलि स्वरुप।
श्रीकृष्ण मेमोरियल में फूलों की सैय्या पर जयप्रकाश नारायण का पार्थिव शरीर रखा था। क्या महिला, क्या पुरुष, क्या युवक, क्या वृद्ध सभी अपने प्रिय नेता का अंतिम दर्शन करने हेतु पंक्तिबद्ध थे। सेना के जवान वाहन फूलों से सजा रहे थे। श्रीकृष्ण मेमोरियल और बांस घाट की दूरी अधिकाधिक दो किलोमीटर थी, आज भी है।
उन दिनों सड़क के बाएं हाथ गांधी मैदान के उत्तरी कोने पर स्थिति जिलाधिकारी के आवास के अलावे कुछ नहीं था।अलबत्ता दाहिने तरफ श्रीकृष्ण मेमोरियल के बाद पुलिस लाइन, रेड क्रास, मगध महिला कालेज, पुलिस अधीक्षक का आवास, गांधी संग्रहालय, अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टीच्यूट, बांकीपुर बालिका उच्च विद्यालय और फिर निजी लोगों का आवास था।
उधर, बाएं हाथ जिलाधिकारी के आवास के बाद एक सरकारी कार्यालय, फिर गोलघर और आगे निजी लोगों का आवासीय मोहल्ला। सड़क के किनारे के साथ-साथ एक मंजिला, दो मंजिला कमानों के बालकोनी में, छतों पर, मुडेरों पर, यहाँ तक कि गोलघर पर भी पटना के लोगों की उपस्थिति देखी जा रही थी। सभी भाव-विह्वल थे। कई लोग तत्कालीन टेलीफोन के खंभों और पेड़ों पर चढ़े दिख रहे थे। पटना शहर शायद उस तारीख से पहले किसी के पार्थिव शरीर की यात्रा में इतने लोगों की भागीदारी का अनुभव नहीं किय्या था।
कोई दस मिनट की दूरी को तय करने में कोई दो घंटा लगा था। बांस घाट पर लोगों की उपस्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। बांस घाट के सामने स्थिति मंदिर के साथ-साथ चतुर्दिक लोगों का सैलाब दिख रहा था। सेना के चार अधिकारी जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को उठाये थे। उन अधिकारियों के बाएं-दाहिने तीन-तीन अन्य अधिकारी भी साथ चल रहे थे ताकि रास्ते में कन्धों को बदला जा सके।
जय प्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर के पीछे सेना के करीब 21 अधिकारी, अपने-अपने राइफलों को झुकाए चल रहे थे। साथ चलने वाले एक वृद्ध उस दिन कहे भी थे ‘मैंने महात्मा गांधी के पार्थिव शरीर की यात्रा में भाग नहीं लिया था, इसलिए उस दृश्य के बारे में नहीं कह सकता; आज जो दृश्य देख रहा हूँ यह इस हार-मांस के शरीर के प्रति सम्मान है। शायद यह सम्मान आने वाले दिनों में किसी व्यक्ति को मिले अथवा नहीं, कह नहीं सकता। बिहार में तो नहीं ही मिलेगा। यह भी तय है।”
आज उनकी बात बांस घाट पर बैठे-बैठे मानस पटल पर ताजा हो गया है। आज पटना का बांस घाट का स्वरुप भी बदल गया है। काश यहाँ के नेताओं की मानसिकता भी बदल जाती। जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को सेना के अधिकारी अंतिम सैय्या तक ले जा रहे थे। उधर जयप्रकाश नारायण के भतीजे रत्नेश्वर प्रसाद उनके सम्मान में मुंडन करा रहे थे। हिन्दू विधि विधान में अग्नि देने वाला मुंडन करता है। आज समाज में सामाजिक समीकरण भी बदल गया है।
उस दिन सैकड़ों नाविक गंगा में अपने नाव पर लोगों को बैठाकर अपने प्रिय नेता का अंतिम दर्शन करा रहे थे। सैकड़ों लोग पानी में भी खड़े थे। बांस घाट के प्रवेश के साथ बाएं हाथ बने स्थान पर ऊपर राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, श्रीमती इंदिरा गाँधी, मोरारजी देसाई, बाबू जगजीवन राम और कई अन्य राजनेता लोक नायक को अंतिन विदाई दे रहे थे। सात दिन का राष्ट्रीय शोक मनाया गया।
सन 1979 के 8 अक्टूबर को दिल का दौड़ा पड़ने के कारण जेपी अंतिम सांस लिए। जयप्रकाश नारायण एक प्रभावशाली शांतिवादी-क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1970 के दशक के मध्य में इंदिरा गांधी सरकार के विरोध का नेतृत्व किया था। 1975 में आपातकालीन शासन के दौरान उन्हें हिरासत में लिया गया। एक समय उन्हें जवाहरलाल नेहरू का तार्किक उत्तराधिकारी माना जाता था। लेकिन नारायण ने 1950 के दशक में राजनीतिक पद त्याग दिया और सेवानिवृत्त हो गए।
जयप्रकाश नारायण 1974 में सक्रिय राजनीति में लौट आए और श्रीमती गांधी की सरकार के विरुद्ध खड़े हुए। जून 1975 में जब विवादास्पद आपातकाल लागू किया गया, नारायण जेल में बंद विपक्षी नेताओं में सबसे आगे थे। गिरते स्वास्थ्य के कारण रिहाई तक उन्होंने पाँच महीने एकांत कारावास में बिताए। जब 1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने श्रीमती गांधी को हराया, तो नारायण ने प्रधानमंत्री पद लेने से इनकार कर दिया और मोरारजी देसाई को इस पद के लिए चुनने में मदद की। देसाई उन राजनीतिक मित्रों और विरोधियों में शामिल थे, जो राजकीय अंतिम संस्कार के दौरान शव यात्रा के साथ दाह संस्कार स्थल तक गए। भारत सरकार ने उन्हें 1999 में मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया।
आज बांस घाट के इस परिसर ने जब जयप्रकाश नारायण की धधकती चिता को साक्षी मानकर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिवेश को देखता हूँ तो यह कहने में, लिखने में तनिक भी तकलीफ नहीं हो रही है कि जयप्रकाश नारायण द्वारा शंखनाद सम्पूर्ण क्रांति से जितने भी नेता जन्म लिए, उनके जीवन काल में भी प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति को भी नेस्तनाबूत कर दिया – अपने-अपने स्वार्थ के लिए।
नब्बे के दशक में जयप्रकाश नारायण (1974) के आंदोलन से निकले नेताओं ने तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के कच्छा-बनियान को खींचकर अगर बिहार की राजनीति में अपना अस्तित्व बनाए थे, आज वे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए प्रदेश के दबंगों, अपराधियों, बाहुबलियों के कच्छे-बनियान को धोने के लिए सज्ज हो रहे हैं। इसे ही तो कहते हैं राजनीति का अपराधीकरण या फिर अपराधियों का राजनीतिकरण।
बिहार में सभी मुख्यमंत्री ही बनना चाहता है
आप माने अथवा नहीं, लेकिन इन साढ़े तीन दशकों में एक ओर जहाँ प्रदेश के नेताओं के कदों में, चाहे किसी भी राजनीतिक पार्टियों से संबंध रखते हों, मिट्टी जैसा कटाव हुआ है, राजनीति और राजनेताओं के विचारधाराओं में घिसावट और गिरावट हुआ है; दवंगों, अपराधियों और बाहुबलियों का मोल अमेरिकन डॉलर जैसा मंहगा हुआ है। भारत के संविधान में, भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में भले सैकड़ों नियम और प्रावधान हों इन दबंगों, अपराधियों और बाहुबलियों को दण्डित करने के लिए, भुक्त-भोगियों को न्याय दिलाने के लिए; परन्तु ‘आज के नेता’ इस बात को ग्राह्य कर चुके हैं कि दोनों एक दूसरे के पूरक है।
शायद अस्सी के दशक का प्रारंभिक वर्ष था। आज के भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर, उन दिनों बिहार विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष थे। आठवां विधानसभा का चुनाव हो चुका था। आठवें विधान सभा कालखंड में कांग्रेस के दो-दो महारथी – डॉ. जगन्नाथ मिश्र और चंद्रशेखर सिंह – मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए थे। डॉ. मिश्र दूसरी बार 8 जून, 1980 से 14 अगस्त, 1983 तक और चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त, 1983 से 12 मार्च, 1985 तक मुख्यमंत्री रहे। कांग्रेस अपने घर के तत्कालीन नेताओं के आपसी कलह के कारण रसातल की ओर निकल चुका था।
नवमी विधानसभा के लिए चुनाव का समय आ गया था। यह कालखंड 1985 से 1990 का था। प्रदेश में राजनीतिक स्थिरता डगरा पर रखे गोल बैंगन जैसा था। बिहार के नेता शुतुरमुर्ग की तरह रायसीना हिल की ओर टकटकी निगाहों से देखा करते थे। पटना से दिल्ली की ओर जाने वाली ट्रेनों को, हवाई जहाजों को मन ही मन नित्य प्रणाम किया करते थे ‘काश!! आला कमान की नज़रों में उनका भी चेहरा आये। अंतिम सांस से पहले, चाहे शरीर का हो अथवा पार्टी का, एक बार मुख्यमंत्री कार्यालय में रखी कुर्सी पर बैठ जाएँ।
उन दिनों तत्कालीन अग्रणी नेता गण एक-दूसरे को देखकर भले मुस्कुरा देते थे, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के लिए अन्तःमन से ‘साम-दाम-दंड-भेद’ जैसे प्रयासों का अख्तियार करने में तनिक भी कोताही नहीं करते थे। बिहार की यही तो खास विशेषता है। यहाँ ‘झोलटन छाप आदमी’ भी, जो स्पष्ट बोलने के बजाय ‘हकलाकर’ बोलता हो, ‘तालव्य’ और ‘दन्त’ में अंतर नहीं समझता हो, ‘वॉवेल’ और ‘कॉन्सोनेंट’ में फर्क नहीं समझता हो – वह भी मुख्यमंत्री बनना चाहता था। लेकिन ‘शिक्षित’ और ‘अशिक्षित’ में, ‘चालाक’ और ‘मूर्ख’ में, ‘उदंड’ और ‘विनम्र’ में फर्क को चरितार्थ करते पहले बिंदेश्वरी दुबे, फिर भागवत झा ‘आज़ाद’, फिर सत्येंद्र नारायण सिन्हा, फिर डॉ. जगन्नाथ मिश्र जैसे ‘तथाकथित’ चार ‘महान विचारक’, प्रदेश के ‘उत्थानकर्ता’, ‘गरीबों के मशीहा’ मुख्यमंत्री बने।
यह वह कालखंड था जब बिहार में कांग्रेस पार्टी का ‘मृत्युलेख’ लिखा जा रहा था और सत्ता पर उसकी पकड़ फिसलती जा रही थी। अंततः सत्ता का बागडोर जयप्रकाश नारायण के ‘चेलों’ में अग्रणी लालू प्रसाद यादव के हाथ में 10 मार्च, 1990 को आ ही गया। आठवीं और नवमीं विधानसभा कालखंड में 30 जून, 1980 से 12 फरवरी, 1988 तक तत्कालीन जनता पार्टी (सेकुलर) के तरफ से कर्पूरी ठाकुर बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे।आज प्रदेश की जो स्थिति है, खासकर राजनीतिक क्षेत्र में, वह किसी से छिपा नहीं है।
आज तलवे कद के नेता हो या घुटने कद के, सभी स्वयं को आदमकद का ही नेता मानते हैं। सभी प्रदेश के लोगों का, मतदाताओं का भाग्य विधाता मानते हैं। हकीकत यह है कि कोई भी नेता मतदाता का नहीं है। राजनीतिक क्षेत्र में राजनीति का व्यापार हो रहा है। सभी अपने-अपने हिस्से का अंश निकाल रहे हैं। अन्यथा अगर ऐसा नहीं होता तो जिला परिषद् के चुनाव से लेकर विधान सभा और विधान परिषद् के रास्ते लोकसभा और राज्यसभा तक जाने वाले नेताओं की आर्थिक स्थिति उनके नामांकन के समय की आर्थिक स्थिति से कई हज़ार गुना अधिक नहीं होता।
आज सरकारी क्षेत्र के जितने भी ठेका है, निजी क्षेत्र के जितने भी शैक्षणिक संस्थाएं हैं, चिकित्सा केंद्र हैं, अस्पताल है, औसतन सभी क्षेत्रों में इन नेताओं का संरक्षण अथवा भागीदारी अवश्य है। ऐसी बात नहीं है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री अथवा कानून प्रवर्तन संस्थाएं या अधिकारी इस बात को नहीं जानते, लेकिन आखिर वे भी तो सरकारी अधिकारी ही हैं और नियमतः बिना सरकारी निर्णय के वे एक कदम भी नहीं बढ़ा सकते हैं। प्रदेश में भोला पासवान शास्त्री के अलावे कोई भी मुख्यमंत्री नहीं हुआ जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हो। साठ -सत्तर के ज़माने में प्रदेश की राजनीति में अपराध और अपराधियों के लिए कोई स्थान नहीं था (अपवाद छोड़कर) । आज बाहुबली, दबंग, घनाढ्य के लिए राजनीति एक पेशा हो गया है, एक व्यवसाय हो गया है, एक स्टार्टअप हो गया है। सभी जानते हैं लेकिन सभी मूक-बधिर बने हैं।
सत्तर के कालखंड की शुरुआत और बाद के समय में भ्रष्टाचार और अपराध दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलने गए। दृष्टान्त: उन दिनों कदम कुआं, जहां जयप्रकाश नारायण का आवास महिला चरखा समिति है, के कुछ ही दूरी पर एक दो-मंजिला मकान में पटना नागरिक बैंक की स्थापना की गई थी। इसके पहले और अंतिम अध्यक्ष कांग्रेस के विधान सभा सदस्य नवल किशोर सिन्हा चुने गए। बैंक के प्रमोटर्स में मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र और उनके राजनीतिक सचिव श्री जीवानंद झा भी शामिल थे। बैंक प्रारंभ से ही विवादों में रहा। विधान सभा की प्राक्कलन समिति ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट, जो सभा पटल पर रखी गई और सभी सदस्यों व पत्रकारों के बीच वितरित हुई, में सनसनीखेज खुलासा किया। इसमें कई अनुलग्नक भी थे।

तुम्हीं हो बंधु, सखा तुम्हीं हो
बिनोदानंद झा से लेकर आजतक 22 मुख्यमंत्री बने हैं बिहार में, लेकिन बिहार ही नहीं, प्रदेश के बाहर दिल्ली में, नोएडा में, गाजियाबाद में, लखनऊ में, कानपुर में, कोलकाता में,चेन्नई में, मुंबई में, राजस्थान में, मध्यप्रदेश में, उत्तराखंड में नेताओं का, मंत्रियों का, अधिकारीयों का, ठेकेदारों का, दबंगों का और शासन-व्यवस्था के नजदीकियों का कितना बड़ा संपत्ति-साम्राज्य है, यह सर्वविदित है। के बी सहाय, महामाया प्रसाद सिंह, सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडेय, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्रा, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिंह, लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार – इन सभी मुख्यमंत्रियों का तथाकथित राजनीतिक संरक्षण से सभी चाहे मंत्री हों, अधिकारी हों, बाहुबली हों सबों ने मिलकर बिहार का चतुर्दिक लुटे और लूट रहे हैं। खैर।
श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले।
लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। आज भले प्रदेश के नेताओं को, लोगों को, मतदाताओं को दिखाई नहीं दे सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण, आने वाली पीढ़ियां कभी माफ़ नहीं करेगी – न नेताओं को और ना ही मतदाताओं को।
बिहार में राजनीति के बड़े पैमाने पर अपराधीकरण के रूप में देखा जा सकता है, राज्य में विधानसभा चुनाव 2015 के विश्लेषण से पता चलता है कि 57 प्रतिशत मौजूदा सांसदों और विधायकों तथा चुनाव के लिए 30 प्रतिशत उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक आरोप घोषित किए हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और बिहार इलेक्शन वॉच (बीईडब्ल्यू) की एक रिपोर्ट, जिसने बिहार में सांसदों, विधायकों और उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों का विश्लेषण किया, ने कहा कि 2015 के राज्य विधानसभा चुनाव में, कुल विधानसभा सीटों (243) में से 43 प्रतिशत पर आपराधिक रिकॉर्ड वाले पांच या अधिक उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। 2005 और 2010 में, नीतीश कुमार को भ्रष्टाचार और अपराध से बिहार की छवि को साफ करने के वादे पर सत्ता में लाया गया था।
जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए थे, मंत्रिमंडल पुनर्गठन के बाद मंत्रियों के शपथ-पत्र और अन्य विवरणों का विश्लेषण के आधार पर एडीआर और इलेक्शन वॉच ने सार्वजनिक किया था कि नए शपथ लेने वालों में 70% से अधिक मंत्री आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। एडीआर ने जिन 32 मंत्रियों के चुनावी हलफनामों में आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक विवरण का विश्लेषण किया, उनमें से 23 (लगभग 72%) के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। विश्लेषण किए गए हलफनामों के अनुसार, 17 (53%) मंत्रियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। पार्टी के हिसाब से देखें तो राजद के 17 मंत्रियों में से 15 (88%) ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जबकि 11 (65%) के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। रिपोर्ट के अनुसार नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पिछली एनडीए सरकार में 31 मंत्रियों में से 18 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। 14 मंत्रियों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे।
भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), राजद और कांग्रेस में पिछले दो बिहार विधानसभा चुनावों में 50 प्रतिशत से अधिक दागी विधायक शामिल थे। 2015 में, राजद के 81 विधायकों में से 46 विधायकों (64%) के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे, उसके बाद भाजपा – 53 में से 36 विधायकों की पृष्ठभूमि आपराधिक है और जदयू – जिसके 71 सीटों में 34 दागी विधायक हैं। इसी तरह, 2010 के विधानसभा चुनाव में 32 प्रतिशत उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज थे, जबकि 2005 के चुनावों में यह संख्या 27 प्रतिशत थी। 2005 में आपराधिक आरोपों वाले केवल 98 विधायक थे, 2010 में यह संख्या बढ़कर 23 प्रतिशत (121 विधायक) हो गई। 2015 की विधानसभा में पिछली विधानसभा की तुलना में 16 प्रतिशत अधिक दागी विधायक थे।
डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता – सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है – का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा।
लेकिन, प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में ”चाराचोर” के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे।
अपराधियों का राजनीतिकरण
राजनीतिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो विगत 35 वर्षों से बिहार के सत्ता के सिंहासन पर दो व्यक्तियों का आधिपत्य रहा है – लालू यादव और कंपनी तथा नीतीश कुमार। 35 वर्षों का आधिपत्य होना और प्रदेश का उत्तरोत्तर पिछड़ा होते जाना – इस बात का प्रमाण है कि दोनों को प्रदेश के विकास से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता, 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव और उनके परिवार जिस तरह सत्ता के ऊपर कब्ज़ा किये, वह आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में काले अक्षर से लिखा जायेगा। आज भी उनके परिवार में दोनों पुत्र विधान सभा और दो संसद में (पत्नी-राज्य सभा और पुत्री लोक सभा) में बैठी है। अगर समुदाय की ही बात करें तो जिस गरीब-गुरबा, पिछड़ा, यादव आदि जातियों के नाम पर वे राजनीति में बरकरार रहे, उनके परिवार से बाहर कोई उस योग्य नहीं है?
लालू के कालखंड में हत्या, अपहरण, फिरौती के लिए अपहरण आम था। उस काल खंड के जो भुक्तभोगी हैं, आज भी कलाप रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के राज में, जिन्हें सभी ‘सुशासन बाबू’ के नाम से अलंकृत किये हैं, रिश्वतखोरी की प्रथा अनियंत्रित है, अपने उत्कर्ष पर है और यह कतई नहीं माना जायेगा कि इसमें सत्ता के गलियारे में बैठे लोग, सत्ता से संरक्षित अधिकारियों, नेताओं का हाथ नहीं है।” और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जिला स्तर से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक, बिहार के बारे में, बिहार की राजनीति के बारे में, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति, स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में लिखने वाले कभी इन बातों को उजागर नहीं किये, कर रहे हैं। नीतीश के राज में जो बुनियादी ज़रूरत है – शिक्षा, स्वास्थ्य सभी चरमरायी हुई है।

प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया।
10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी।
11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे – सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं।
2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में जीते 228 विधायकों के बारे में जानकारी जुटाई गई थी। उस वक्त पता चला था कि इन 228 में से 76 (33 फीसदी) पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके अतिरिक्त, एडीआर ने बताया कि दिल्ली में 70 में से 37 विधायक (53 प्रतिशत), बिहार में 242 में से 122 विधायक (50 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 284 में से 114 विधायक (40 प्रतिशत), झारखंड में 79 में से 31 विधायक (39 प्रतिशत), तेलंगाना में 118 में से 46 विधायक (39 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश में 403 में से 155 विधायकों (38 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं। विश्लेषण में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित परेशान करने वाले आंकड़े भी सामने आए। जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है, कुल 114 विधायकों ने महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामलों की घोषणा की है, जिनमें से 14 ने विशेष रूप से बलात्कार (भादंसं की धारा-376) से संबंधित मामलों की घोषणा की है।
एक दशक पहले 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक, उस समय बिहार के नवनिर्वाचित 243 विधायकों में से 142 यानी 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के अध्ययन के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल विधायकों में से 90 (40 फीसदी) पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। 70 विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। अध्ययन के मुताबिक, ‘अपने खिलाफ आपराधिक मामले बताने वाले 142 विधायकों में से 70 (49 फीसदी) ने बताया है कि अदालत उनके खिलाफ पहले ही आरोप तय कर चुकी है।’ 11 विधायकों पर हत्या या हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। इनमें से चार राष्ट्रीय जनता दल के हैं।
“बिहार में कुकुरमुट्टीओं की तरह नेताओं की उत्पत्ति होती है। प्रदेश के सभी 38 जिलों के करीब 45 हज़ार से अधिक गाओं, 8406 पंचायतोनं 534 ब्लॉकों और १०२ सबडिवीजनों में शायद ही कोई हिस्सा होगा जहाँ जहाँ नेता बनाने का उद्योग नहीं लगा है। जन्म लेने के बाद बच्चे, खासकर पुरुष, विद्यालय जाने के बजाय गली-मोहल्ला, नुक्कड़ पर राजनीति करने की पढाई करने लगता है। कुछ महीने अथवा साल के बाद डाकबंगला चौराहे पर आकर बड़का नेता बन जाता है और दो महीने बाद बेली रोड के रास्ते पटना सचिवालय में मुख्यमंत्री कार्यालय में राखी कुर्सी पर भी दावा ठोकने लगता है। अब अगर डाकबंगला चौराहे पर उनसे कोई पूछ दे कि बेली रोड कइने नाम पर अंकित है, तो दांत निपोड़ देंगे।”
2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे।
आज के राजनेता चाहे जो भी गणित और ज्यामिति की नजर से राजनीति को देखें, हकीकत यह है कि नीतीश कुमार अपने से अधिक प्रबल, ज्ञाता, निपुणता – चाहे वह सामाजिक क्षेत्र में हो या राजनीतिक क्षेत्र में – साथ नहीं चलना पसंद नहीं करते। वे अहंकार से ग्रसित है। वे अवसरवादी है। महत्वाकांक्षी हैं। जिद्दी हैं। स्वयं के आगे किसी को दक्ष नहीं समझते। बहुत तरह के उपसर्ग और प्रत्यय हैं उनके साथ। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद उस व्यक्ति को, जिन्होंने उन्हें बिहार की राजनीतिक मानचित्र पर पहला कदम रखने का अवसर दिया, उसके पैर नहीं काटे होते। आज नीतीश कुमार जिस जनता दल (यूनाइटेड) के बल पर प्रदेश की राजनीति का सूर्योदय और सूर्यास्त करने का दावा करते हैं, उस जनता दल (यूनाइटेड) का मानसिक संस्थापक नीतीश कुमार नहीं, बल्कि जॉर्ज फर्नांडिस थे।
क्या लिखी हैं श्रीमती जया जेटली
उन दिनों जयप्रकाश नारायण के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राम मनोहर लोहिया, विश्वनाथ प्रताप सिंह, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर जैसे दिग्गज नेता चल रहे थे। नीतीश कुमार युवक थे अपने अन्य सहकर्मियों, सहपाठियों की तरह। यह मंच नीतीश कुमार सहित अन्य सहपाठियों को तत्कालीन राजनीतिक दिग्गजों के समीप लाया। जॉर्ज फर्नांडिस भले अपने राजनीतिक जीवनकाल में (जब तक बिहार से सांसद रहे) प्रदेश और अपने संसदीय क्षेत्र के, मतदाताओं के विकास के लिए कुछ भी सकारात्मक कार्य नहीं किये, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से जॉर्ज का प्रदेश के राजनीतिक उथल पुथल में महत्वपूर्ण हाथ रहा।
तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था के भविष्य को देखते जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार के साथ 14 सांसदों को लेकर जनता दल को नमस्कार कर पहले जनता दल (जॉर्ज) बनाये, बाद में यह समता पार्टी के नाम से जाना गया। अब तक नीतीश कुमार को राजनीति और सत्ता का लोभ मानस पटल पर छा गया था। उस कालखंड में लालू प्रसाद यादव का ऐतिहासिक चारा घोटाला काण्ड नहीं आया था। लेकिन सं 1995 में जब चुनाव हुआ उसमें समता पार्टी लालू के सामने घुटने तक दी। समता पार्टी को महज सात स्थान प्राप्त हुआ । एक साल बाद, यानी 1996 में जब अटल बिहार वाजपेयी की सरकार बनी थी, समता पार्टी तब तक सहयोगी बन गया था। वाजपेयी के सरकार में सभी सहयोगी हिस्सेदार बने। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री बने। उस वर्ष (1996) के चुनाव में समता पार्टी को आठ और दो वर्ष बाद 1998 के चुनाव में 12 स्थान मिले थे।
यह जार्ज फर्नांडिस का ही प्रयास था (नीतीश कुमार भले स्वीकार नहीं करें) कि 2000 में बीजेपी की मदद से नीतीश कुमार 8 दिन के लिए ही सही बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी खुली आँखों से देखे थे। इतना ही नहीं, दिल्ली सल्तनत में रहने वाले, नार्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक के इर्द-गिर्द घूमने वाले छोटे-मोटे पत्रकार जानते हैं कि अगर 2003 में जॉर्ज फर्नांडिस का साथ नहीं होता तो शायद भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन तोड़कर जनता दल (यूनाइटेड) नहीं बना पाते। आगे क्या हुआ, देश ही नहीं प्रदेश के लोग जानते हैं की नितीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी से चिपक गए।
लेकिन जॉर्ज फर्नांडफिस के साथ उनकी परछाई के रूप में रही श्रीमती जया जेटली अपनी पुस्तक ‘लाइफ अमंग द स्कार्पियन्स: मेमोयर्स ऑफ़ अ वूमन इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में लिखी हैं कि “दिलचस्प बात यह है कि उनकी परेशानियाँ समता पार्टी के भीतर ज़्यादा थीं, जहाँ बिहार के कई राजनीतिक नेता एक-दूसरे के खिलाफ़ काम कर रहे थे और नीतीश कुमार से लड़ रहे थे या उनसे समझौता कर रहे थे, जबकि जॉर्ज फ़र्नांडिस के पास सभी को शांत रखने और अपनी जगह पर बनाए रखने का एक दयनीय काम था। वे हमेशा कहते थे कि नीतीश कुमार एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके दिमाग़ को वे कभी नहीं समझ सकते। सबसे बढ़कर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति होने के नाते, जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने की तारीख़ पर सहमत होने से इनकार कर देते थे या ऐसी बैठकों के दौरान बनी आम सहमति को पलट देते थे, तो वे रात में अकेले उनसे मिलने आते थे और अपने विचार रखते थे, जिस पर वे अमल करने पर ज़ोर देते थे। अक्सर, इस वजह से पार्टी ने अच्छे लोगों को भाजपा में खो दिया; ये वे लोग थे जो अक्सर मेरे साथ चाय पीते थे और नीतीश कुमार के बारे में अपनी पीड़ाएँ साझा करते थे। मैंने जॉर्ज फ़र्नांडिस को ऐसी बातें बताना अपना कर्तव्य समझा, लेकिन मैं यह भी जानता था कि इससे अनजाने में उनकी चिंताएँ बढ़ जाएँगी। वे हमेशा बड़े लक्ष्य की खातिर तर्कहीन बातों को तर्कसंगत बनाने के लिए उनके आगे झुक जाते थे।
जया जेटली आगे लिखती हैं: “1998 में, एनडीए सरकार ने जॉर्ज फर्नांडिस को गठबंधन का संयोजक चुना। उन्होंने शासन के लिए साझा एजेंडा तैयार करने में मदद की थी और भाजपा का मानना था कि उन्होंने गठबंधन को वह वैधता दी है जो सभी ‘क्या हम धर्मनिरपेक्ष हैं/क्या हम नहीं हैं?’ सहयोगियों को आश्वस्त करने के लिए आवश्यक है ताकि वे स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर सकें। इसने मधु दंडवते और सुरेंद्र मोहन जैसे उनके कई समाजवादी सहयोगियों को अलग-थलग कर दिया, लेकिन वे भी युवा और अधिक महत्वाकांक्षी लोगों के बीच विभाजित थे जो रुके रहे क्योंकि वे एक सक्रिय राजनीतिक जीवन जीना चाहते थे और उन्हें लगा कि जॉर्ज फर्नांडिस भाजपा के साथ गठबंधन में उन्हें इसे हासिल करने में मदद करने के लिए सबसे अच्छा दांव थे।”
श्रीमती जेटली के अनुसार: “उन्हें (जॉर्ज फर्नांडिस) हमेशा ऐसे सहयोगियों के बीच रहना अच्छा लगता था जो जुझारू थे और चुनावी राजनीति को अच्छी तरह समझते थे। इस प्रकार उन्होंने उन लोगों को नजरअंदाज कर दिया जो अलग-थलग थे, जब तक कि वे भी कभी-कभार स्कूल और अस्पताल में भर्ती होने जैसे छोटे-मोटे व्यक्तिगत उपकार मांगने नहीं आते, जिसे वे खुशी-खुशी पूरा करते थे। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, पार्टी कार्यकर्ता और यहां तक कि गठबंधन के सहयोगी भी लगातार उपकार मांगते थे, नकदी से लेकर मुफ्त यात्रा पास तक और समितियों में पद तक जो उनके अनुयायियों को कुछ प्रभाव दे सकते थे; यहां तक कि परीक्षा में फेल होने वाले बच्चों को भी पास करने और इंटरव्यू में शामिल करने के लिए अनुरोध किए गए। वह हमेशा इस बात से नाराज या दुखी रहता था, यह सोचकर कि बदले में कुछ मांगे बिना सेवा करने का जोश कहां गायब हो गया। इसके बाद ऐसे अधिकांश लोगों ने उसके खिलाफ शिकायत की, यह कहते हुए कि अगर अन्य पार्टियां और राजनेता अपने लोगों की मदद करते हैं, तो वह क्यों नहीं कर सकता। संरक्षण और उदारता बांटना उसकी शैली नहीं थी, क्योंकि उसने कभी अपने लिए ऐसी चीजों की मांग नहीं की थी।”
बिहार विधानसभा चुनाव पर कहानियों की श्रृंखला जारी है …..
















