
पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी के 64-साल बाद भी समाज के लोग ‘शौचालय के महत्व’ को समझ नहीं पा रहे थे। उसके मायके के घर में सदा ही शौचालय रहा, जिसे वह सात भाई-बहनों के साथ प्रयोग करती रही। उसके पिता श्री अम्मूलाल कुमरे, जो प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे, द्वारा उसे स्वतंत्रता एवं स्वच्छता के विषय में सदा ही जानकारी दी जाती रही थी । वैसे, भारत का ‘सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन’ इस वर्ष दिल्ली में विश्व शौचालय दिवस की मेजबानी करने जा रहा है।
वैसे भारत में शौचालय की क्रांति सत्तर के दशक में बिहार के आरा शहर से समाजशास्त्री डॉ. बिंदेश्वर पाठक द्वारा शुरू की जा चुकी थी, लेकिन 2011 में श्रीमती अनीता की वह पहल एक अलग क्रांति को जन्म दिया। जो बाद में उसके जीवन पर आधारित फिल्म – टॉयलेट: एक प्रेम कथा – हर दिन पेज 3 पर छाने लगी। एक ऐसे घर में ब्याह कर आने के बाद – जहाँ पर शौचालय की उपलब्धता न हो – भी पिता-द्वारा दी गई शिक्षा को भुला नहीं पाई। अनीता का ससुराल से भागना एक राष्ट्रीय खबर बनी और सिद्धार्थ-गरिमा ने टॉयलेट एक प्रेम कथा कहानी लिख डाले। श्री नारायण सिंह ने इस फिल्म का निर्देशन किया। अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर और सना खान अभिनेता-अभिनेत्री और अन्य कलाकार बने।
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के जितुराना गाँव की कला स्नातक अनीता नर्रे को इस साहसिक कार्य के लिए सभी ने सराहा और भारत में पहली बार ऐसी माँग करने के लिए पुरस्कृत भी किया गया, जहाँ खुले में शौच करना एक आम बात है। उनके पति शिवराम नर्रे के पास अपनी दुल्हन को वापस लाने के लिए शौचालय बनवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। अपनी पत्नी की मांग पूरी करने में उन्हें 10 दिन लग गए।
विज्ञान स्नातक तृतीय वर्ष का छात्र शिवराम, गुज़ारा चलाने के लिए दिहाड़ी मज़दूरी करता है। शिवराम ने कहा, “मैं अक्सर दिहाड़ी मज़दूरी के छोटे-मोटे काम करता हूँ। मुझे हर दिन के काम के लिए 100 रुपये मिलते हैं।” अनीता, जो स्नातक हो चुकी थी, भी नौकरी की तलाश में थी ताकि वे अपनी दो बेटियों को एक स्थिर जीवन दे सकें। अनीता बीए की पढ़ाई कर रही थीं जब उनके पिता ने उनकी शादी भीमपुर तहसील के शिवराम नर्रे से करने का फैसला किया। हर आज्ञाकारी बेटी की तरह, वह शिवराम से शादी करने के लिए राज़ी हो गईं, भले ही वह एक बीपीएल परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक खेतिहर मज़दूर थे और उनसे कम पढ़े-लिखे थे।
11 अगस्त 2017 को यह फिल्म सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने पहले दिन भारत में 13.10 करोड़ कमाया । यह फिल्म अक्षय कुमार की 9 वीं सबसे बड़ी फिल्म बनी और अक्षय कुमार की उच्चतम कमाई वाली फिल्म के रूप में उभरा । अनीता, एक आदिवासी लड़की, ने अपने कार्य से शान्त जल में एक छोटा कंकड़ फेंका है, जिसने एक लहर का रूप ले लिया है। अनीता के इस उदाहरण में ‘जान ऑफ़ आर्क’ का किरदार अदा किया गया, जिसने 15वीं सदी में फ्रांस के चार्ल्स-8 से ईश्वरीय आदेश प्राप्त किया था।

अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित भी किये और आर्थिक मदद स्वरुप 7 लाख रुपये भी दिए। इतना ही नहीं, भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया। जिला प्रशासन ने उनके ससुराल में एक पक्का शौचालय बनवाया।
बहरहाल, आगामी 19 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त वर्ल्ड टॉयलेट डे के 25 वें संस्करण का आयोजन इस वर्ष भारत की राजधानी नई दिल्ली में होगा। इसकी मेजबानी सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा की जाएगी। यह ऐतिहासिक निर्णय सुलभ के प्रेसिडेंट कुमार दिलीप और वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक जैक सिम के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया। यह ऐतिहासिक समिट 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की समयसीमा से ठीक 5 वर्ष पूर्व आयोजित हो रही है और यह एक प्रमुख मंच प्रदान करेगी:
• एसडीजी 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) में हुई प्रगति की समीक्षा
• नवाचारों और सफलता की कहानियों को साझा करने का अवसर
• शहरी स्वच्छता की चुनौतियों से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा
इस सम्मेलन का एक मुख्य केंद्र बिंदु होगा भारत का स्वच्छ भारत अभियान, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाया गया और जिसके अंतर्गत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ — यह सामुदायिक भागीदारी से संचालित एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। समिट का उद्देश्य यह भी होगा कि ग्लोबल साउथ के देश किस प्रकार स्थानीय, विश्वसनीय और समुदाय-आधारित समाधानों के माध्यम से मानव कल्याण से जुड़ी चुनौतियों, विशेषकर स्वच्छता जैसे विषयों से प्रभावी ढंग से निपट सकते हैं।
विश्व शौचालय संगठन की शुरुआत 2001 में 15 सदस्यों के साथ हुई थी। आज इसकी संख्या 53 देशों से बढ़कर 151+ हो गई है। संगठन के सभी सदस्य शौचालय की समस्या को खत्म करने और दुनिया भर में स्वच्छता के समाधान के लिए काम करते हैं। यह संगठन सिंगापुर में 19 नवंबर 2001 को जैक सिम द्वारा स्थापित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, अकादमियों, शौचालय संघों, शौचालय हितधारकों और सरकार के लिए एक सेवा मंच और एक वैश्विक नेटवर्क के रूप में कार्य करता है। एक अनुमान के मुताबिक अब तक लगभग 2.4 अरब से अधिक लोगों की पहुँच स्वच्छता की सुविधा तक ना होने के कारण खुले में शौच करते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में शौचालयों के लिए सबसे लंबी कतारें हैं। अगर देश के सभी लोग, जो शौचालयों के बाहर इंतजार में खड़े हैं, एक लाइन में खड़े हो जाए तो इस कतार को खत्म होने में 5892 वर्ष लगेगी और यह चन्द्रमा से धरती तक लंबी लाइन बन जाएगी। हमारे देश में भी अधिकतम संख्या में लोग खुले तौर पर शौच करते हैं। हाल के जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 1.2 बिलियन लोगों सहित देश के लगभग आधा हिस्से के पास घर में शौचालय सुविधा नहीं है लेकिन इन सभी लोगों के पास मोबाइल फोन है। हालांकि इस दिशा में बहुत कुछ किया गया है परन्तु विशेषकर महिलाएं शौचालयों तक पहुंच की कमी के कारण बहुत सी समस्याओं का सामना कर रही हैं।
विगत कई वर्षों में भारत में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन इस मुद्दे पर जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किया है। 2014 में दुनिया में पहली बार दिल्ली में 18 से 20 नवंबर तक अंतरराष्ट्रीय टॉयलेट महोत्सव के रूप में एक लंबा और अद्वितीय तीन दिन का जश्न मनाया गया था। शौचालय के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने के लिए त्योहार आयोजित किया गया था। उद्घाटन समारोह में छह देशों के करीब 1000 छात्रों ने एक श्रृंखला बनाई जिसमें उन्होंने सिर पर टॉयलेट पॉट्स रखे थे।
आपको जानकार आश्चर्य होगा की सुलभ इंटरनेशनल ने शौचालयों का एक ऐसा संग्रहालय बनाया है जिसमें शौचालयों और मानव सभ्यता संस्कृति के गहरे रिश्तों को दिखाया गया है। यहाँ फ्रांस के सम्राट लुई तेरहवें के राजगद्दीनुमा शौचालय से लेकर महारानी विक्टोरिया के शौचालय की अनुकृति मौजूद है, जिसमें हीरे-जवाहरात लगे हैं। संग्रहालय में दिखाई गई जानकारी के अनुसार शौचालयों का इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता जितना ही पुराना है। मोहनजोदजड़ो में शौचालय के अवशेष मिले हैं। मुग़लकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा सहित कई किलों पर शौचालय बने मिले जो अब भी देखे जा सकते हैं। इस संग्रहालय को बनाने का विचार संस्था के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक को लन्दन में मैडम तुसॉद का वैक्स म्यूज़ियम देखने के बाद आया।
वैसे सरकार और व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान के मद्दे नजर अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है। लेकिन धरातल पर ये सभी कुप्रथाएं आज भी समाज में विद्यमान है। इतना ही नहीं, मानव मल-मूत्र की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में सरकारी और सामाजिक उदासीनता के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाया कोई पचास के दसक और उसके बाद भी जब तक ”सुलभ” ने सामाजिक आंदोलन नहीं चलाया, शौचालय की उपयोगिता को नहीं बताया, इन भंगी-परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया ।
कल तक जो लोग, विशेषकर समाज व्यवस्था के संभ्रांत लोग, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कॉर्पोरेट, मंत्री, अधिकारी और न जाने कौन-कौन, अपने “खाने के मेज पर शौच की बात करना मानवीयता और मनुष्यता के खिलाफ समझते थे; आज शहरों और महानगरों, यहाँ तक की कारपोरेट घरानों, सरकारी कार्यालयों में “भोजनावकाश” के समय “भोजन करते लोग मल-मूत्र के बारे में बात करते हैं, शौचालय की बात करते हैं। और इसका मुख्य कारण है कि सुलभ ने अपने पांच-दसक के प्रयास से न केवल गाँधी का सपना साकार किया जमीन पर, बल्कि “भारत से मैला ढोने की कुप्रथा को भी समाप्त किया।”
बहरहाल, डॉ पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से मानव-मल-मूत्र उठाने की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया । उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन बन गया। आज डॉ. पाठक नहीं हैं (दो वर्ष पूर्व 15 अगस्त को उनका देहावसान हो गया), लेकिन आज भी याद है जब उनसे पूछा था कि “अगर सुलभ, जिसने स्वच्छता अभियान की नीव 50 वर्ष पहले डाली थी, नहीं होता तो भारत में स्वच्छता का हश्र क्या होता?” इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा: “इस बात का उत्तर मैं नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा की अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।”














