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	<title>yadav Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>&#8216;ब्राह्मणों&#8217; को छोड़िए हुज़ूर, जयप्रकाश नारायण की जाति के लोग, यानी &#8216;कायस्थ&#8217; भी, बिहार में &#8216;बढ़ई&#8217;, &#8216;नौआ, &#8216;मुसहर&#8217; की संख्या से कम हैं</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-caste-survey-data-released</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Oct 2023 06:55:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[brahman]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: पटना का यह ऐतिहासिक गांधी मैदान और सहस्त्र खण्डों में बंटी मैदान की यह भूमि इस बात का गवाह है कि बिहार के लोग &#8216;रक्त के आधार पर एकीकृत नहीं अपितु जाति के आधार पर सहस्त्र खण्डों में विभाजित हैं। आकंड़ों के अनुसार 13 करोड़ 7 लाख 25 हज़ार 310 &#8216;मुंडी&#8217; [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-caste-survey-data-released">&#8216;ब्राह्मणों&#8217; को छोड़िए हुज़ूर, जयप्रकाश नारायण की जाति के लोग, यानी &#8216;कायस्थ&#8217; भी, बिहार में &#8216;बढ़ई&#8217;, &#8216;नौआ, &#8216;मुसहर&#8217; की संख्या से कम हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: पटना का यह ऐतिहासिक गांधी मैदान और सहस्त्र खण्डों में बंटी मैदान की यह भूमि इस बात का गवाह है कि बिहार के लोग &#8216;रक्त के आधार पर एकीकृत नहीं अपितु जाति के आधार पर सहस्त्र खण्डों में विभाजित हैं। आकंड़ों के अनुसार 13 करोड़ 7 लाख 25 हज़ार 310 &#8216;मुंडी&#8217; वाले प्रदेश &#8216;बिहार&#8217; में सरकारी अधिकारी कुल 215 &#8216;जातियों&#8217; को ढूंढे हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (कुर्मी) और उनके कनिष्ठ तेजस्वी यादव (ग्वाला) को प्रस्तुत किये हैं। आंकड़ों के इस खेल में प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के समुदाय के लोगों का पलड़ा अपने &#8216;चचाजान&#8217; (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार) के समुदाय (कुर्मी) से तक़रीबन 12 फ़ीसदी अधिक है। ऐसा लगता है कि बिहार के लोग अपने नेता सम्मानित रामानंद यादव, सम्मानित लालू प्रसाद यादव से अधिक &#8216;प्रभावित&#8217; हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि कायस्थों की संख्या से &#8216;बढ़ई&#8217;, &#8216;नौआ (नाई), &#8216;मुसहर&#8217; की संख्या ऊपर हो गई। इतना ही नहीं, &#8216;ब्राह्मण&#8217; समुदाय (जेनऊधारी और बिना जेनऊ धारी) की जनसंख्या &#8216;गजबे तरीके से लुढ़क&#8217; गई। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, सत्तर के ज़माने में जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण (कायस्थ) अपने कदमकुआं आवास से लेकर पटना के गाँधी मैदान के रास्ते पूरे भारत में सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल बजाये, नीतीश कुमार के कालखंड में सार्वजनिक हुए इस आंकड़े में &#8216;लालाजी (कायस्थ) लोग&#8217; तो &#8216;निपट गए। यानी, जयप्रकाश बाबू द्वारा सत्ता के हस्तानांतरण के बाद बिहार के लोगों ने शनैः शनैः कायस्थ समुदाय के लोगों को दीवार के करीब पहुंचा दिए। आज इस आंकड़े में प्रदेश में कायस्थों की आवादी 0.60 फ़ीसदी आंकी गई है। </p>
<p>सरकारी आंकड़ों को वायुमंडल में आने के साथ ही, प्रदेश के शिक्षित, अशिक्षित, अनपढ़, जाहिल, गंवार, गरीब, धनाढ़्य, करिया, गोरा, लंगड़ा, लुल्हा, अकान, बहिर, आन्हर, अपंग, अपाहिज, सभी लोगों की नजर आगामी वर्ष होने वाले &#8216;आम चुनाव&#8217; और फिर विधान सभा से लेकर जिला परिषद् के चुनाव की ओर केंद्रित हो गई हैं। सभी लोग अपने-अपने फ़िराक में है कि उनकी जाति के लोगों को, समुदाय के लोगों को चुनाव में, टिकट मिलने में कितना अवसर मिलेगा। वे कितनी ताकत से &#8216;भोंपा&#8217; बजा सकते हैं।<br />
दुर्भाग्य यह है कि इस आंकड़े से प्रदेश में जातीय राजनीति प्रारम्भ हो गई। कौन जात के लोग किनके तराजू पर बैठेंगे, चर्चाएं आम हो गई है। कोई इस बात पर बोल भी नहीं रहा है लिख भी नहीं रहा है कि बिहार में इन जातियों के लोग कितने शिक्षित हैं? कितने अशिक्षित? कितने के पास हाथ में काम है? कितने सड़क पर बैठकर चिनियाबादाम और प्याज छील रहे हैं। कितने स्वस्थ्य हैं और कितने जीने के लिए सांस खींच रहे हैं ? </p>
<p>आलोचक से लेकर प्रशंसक तक भले समुद्र को स्याही बनाकर लिखते रहें, हकीकत यही है कि व्यवस्था द्वारा जारी जाति आधारित गणना के मुताबिक, बिहार में कुल आबादी 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार 310 और 215 जातियां हैं, जिसमें सबसे अधिक जनसंख्या यादव जाति की 14.26% है। अन्य जातियों की जनसंख्या दुसाध 5.31%, रविदास 5.25%, कुशवाहा 4.2%, ब्राह्मण 3.65%, राजपूत 3.45%, मुसहर 3.08%, कुर्मी 2.87%, भूमिहार 2.86%, मल्लाह 2.60%, वैश्य 2.31%, धानुक 2.13%, नोनिया 1.91%, चंद्रवंशी 1.64%, नाई 1.59%, बढ़ई 1.45%, कायस्थ 0.60% हैं। यानी कल समाज में सम्मानित &#8216;लालाजी समुदाय (कायस्थ समुदाय) आज बिहार में &#8216;बिलुप्त प्राणियों&#8217; की सूची की ओर अग्रसर हैं। यादवों की तुलना में ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार भी शीध्र &#8216;बिलुप्त प्राणी&#8217; की सूची में होंगे। इसका कारण क्या हो सकता है यह गहन शोध का विषय है। यदि जाति-श्रेणी के हिसाब से देखें, तो सबसे अधिक अत्यंत पिछड़ी जातियां 36.%, पिछड़ा वर्ग 27%, अनुसूचित जाति 19.6%, अनुसूचित जनजाति 1.6% और अनारक्षित वर्ग 15.5% है। </p>
<p>इसमें पुरुषों की कुल संख्या 6 करोड़ 41 लाख 31 हजार 990 है, जबकि महिलाओं की संख्या 6 करोड़ 11 लाख 38 हजार 460 है। अन्य की संख्या 82 हजार 836 पाई गई है। गणना के अनुसार 1000 पुरुषों पर 953 महिलाएं हैं। बिहार में साल 2011-2022 के बीच हिंदूओं जनसंख्या कम हुई है। इस दौरान मुस्लिम जनसंख्या बढ़ी है। आज जारी किए गए जातीय गणना की रिपोर्ट के साथ राज्य में धार्मिक जनसंख्या भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार में अभी हिंदू आबादी करीब 82% (81.99) और मुस्लिम आबादी 17.7% है। जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदू आबादी 82.7% और मुस्लिम आबादी 16.9% थी। </p>
<p>इस जाति आधारित गणना को दो बार में पूरा किया गया है। पहला चरण 7 जनवरी से शुरू हुआ था। इस चरण में मकानों की सूचीकरण, मकानों को गिना गया। यह चरण 21 जनवरी 2023 को पूरा कर लिया गया था, जबकि दूसरा चरण 15 अप्रैल से शुरू हुआ। इसे 15 मई को पूरा हो जाना था। आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की आबादी सबसे ज्यादा 36% (4,70,80,514) और पिछड़ा वर्ग की आबादी 27.12% (3,54,63,936) है। वहीं, अनुसूचित जाति की आबादी 19.65% (2,56,89,820) और अनुसूचित जनजाति की आबादी 1.68% (21,99,361) है। वहीं अनारक्षित आबादी यानी ऊंची जाति की संख्या 15.52% (2,02,91,679) सामने आई है।</p>
<figure id="attachment_5151" aria-describedby="caption-attachment-5151" style="width: 960px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/10/The-Searchlight.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/10/The-Searchlight.jpeg" alt="" width="960" height="649" class="size-full wp-image-5151" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/10/The-Searchlight.jpeg 960w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/10/The-Searchlight-300x203.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/10/The-Searchlight-768x519.jpeg 768w" sizes="(max-width: 960px) 100vw, 960px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5151" class="wp-caption-text">दशकों पूर्व पटना से प्रकाशित &#8216;दी सर्चलाइट&#8217; अख़बार और अख़बार में प्रकाशित पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्द</figcaption></figure>
<p><strong>डॉ. संतोष सारंग </strong>के अनुसार बिहार देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने जाति आधारित गणना के आंकड़ों को सार्वजनिक किया है। अंग्रेजों के राज में अंतिम बार 1931 में जाति जनगणना रिपोर्ट जारी हुई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर अबतक सरकारें जन कल्याणकारी योजनाएं और नीतियां बनाती रही हैं। नब्बे के दशक से देश में दो तरह की राजनीतिक और सामाजिक धाराएं बहती रही हैं &#8211; एक हिंदुत्व की और दूसरी सामाजिक न्याय की। मंडल कमीशन लागू होने के बाद सामाजिक न्याय का स्वर मुखरित हुआ, जाति की राजनीति तेज हुई और दलित-पिछड़ी आबादी को शासन-प्रशासन में हिस्सेदारी बढ़ी। लेकिन जाति की सही संख्या पता नहीं होने के कारण आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी से ये वर्ग लंबे समय तक वंचित रहे। </p>
<p>इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के साथ ही देश की राजनीति ‘धर्म बनाम जाति’ के दो धड़ों में बंट गयी है। अब राजनीतिक दल और आम लोग इस आकलन में जुट गए हैं कि इससे चुनावी फायदा किसे होगा, इंडिया गठबंधन को या फिर एनडीए को। बिहार में आरक्षण और जाति का सवाल बड़ा ही संवेदनशील मुद्दा रहा है। 1990 के बाद राज्य में लगातार दलित-पिछड़ों की कही जानेवाली सरकारें ही बनती रही हैं। डॉ. नारंग के रिपोर्ट के अनुसार, बीच-बीच में सत्ता में बीजेपी भी आई, लेकिन जेडीयू से गठबंधन के साथ ही. आज भी अकेले अपने दम पर बीजेपी के सत्ता में आने की उम्मीदें क्षीण दिखती हैं। कांग्रेस के कमजोर पड़ते ही सवर्ण और वैश्य वोटर बीजेपी के साथ चला गया, जिसे इस पार्टी का कोर वोटर कहा जाता है। </p>
<p>क्योंकि इन आंकड़ों का यदि विश्लेषण करें, तो सबसे अधिक 36 फीसदी अत्यंत पिछड़ी जातियों की आबादी है, जिनमें लगभग 100 से अधिक जातियां आती हैं। इनमें से बहुत सारी जातियां हैं, जिनका न तो किसी पार्टी के संगठनों में और न विधानसभा या विधान परिषद में प्रतिनिधित्व है। कोई कह रहे हैं कि आने वाले चुनाव में राजनीतिक पार्टियों का लिटमस टेस्ट होगा, जिसमें देखना होगा कि क्या ये पार्टियां टिकट बंटवारे के दौरान कोटि और जातियों का कितना ध्यान रखती हैं तो कोई कह रहे हैं कि बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं। अत्यंत पिछड़ी जातियां 36 फीसदी है। 40 का 36 फीसदी करीब 14 होता है। तो क्या इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव में अत्यंत पिछड़ी जातियों को 14 सीटें देंगी?</p>
<p>आप तो जनबे करते होंगे कि 20 जनवरी 2023 को भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में जाति आधारित जनगणना करने के लिए बिहार सरकार की अधिसूचना को चुनौती देने वाली विभिन्न दलीलों पर विचार करने से इनकार कर दिया। जाति-आधारित सर्वेक्षण के खिलाफ यूथ फॉर इक्वेलिटी समूह सहित कई याचिकाकर्ताओं द्वारा याचिका दायर की गई थी। बिहार के सम्मानित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि यह कवायद जाति जनगणना नहीं है, बल्कि यह एक जाति सर्वेक्षण है।</p>
<p>4 मई 2023 को, पटना उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में जाति आधारित सर्वेक्षण पर रोक लगा दी, और राज्य सरकार को अब तक एकत्र किए गए सर्वेक्षण डेटा को सुनवाई की अगली तारीख (3 जुलाई, 2023) तक संरक्षित रखने का निर्देश दिया। बिहार सरकार ने पटना उच्च न्यायालय को सूचित किया कि &#8220;सर्वेक्षण&#8221; का 80% पूरा हो गया था। पटना उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में बिहार सरकार से 11 बिंदुओं पर सवाल पूछे। बिहार सरकार ने प्रतिवाद किया कि एक केंद्रीय कानून, सांख्यिकी संग्रह अधिनियम, 2008 राज्य सरकार को जाति सहित सभी प्रकार की जनगणना और सर्वेक्षण करने का अधिकार देता है।</p>
<p>7 जुलाई 2023 को, पटना उच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण के विभिन्न पहलुओं को चुनौती देने वाली कुल 8 जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। बाद में, 1 अगस्त 2023 को, पटना उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि बिहार में जाति सर्वेक्षण कराना वैध और कानूनी है। मुख्य न्यायाधीश के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की खंडपीठ ने सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए अपने 101 पेज के फैसले में आदेश पारित किया। बिहार के जाति-आधारित सर्वेक्षण का दूसरा चरण 2 अगस्त 2023 को फिर से शुरू हुआ। 21 अगस्त 2023 को, पटना उच्च न्यायालय ने जाति सूची से ट्रांसजेंडरों को हटाने की मांग करने वाली एक रिट याचिका का निपटारा किया, और कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति बिहार सरकार को एक जाति के रूप में न माने जाने के लिए अभ्यावेदन दे सकते हैं।</p>
<p>बिहार सरकार ने इस याचिका पर जवाबी हलफनामा दायर कर अदालत को सूचित किया था कि 25 अप्रैल 2023 को गणनाकारों को लिंग के लिए तीन विकल्प रखने का निर्देश देकर इस विसंगति को दूर किया गया था। 21 अगस्त 2023 को, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संजीव खन्ना और एसवीएन भट्टी की पीठ ने केंद्र सरकार से सर्वेक्षण के संभावित परिणामों के संबंध में सात दिनों के भीतर जवाब देने को कहा और बाद में मामले को 28 अगस्त 2023 को फिर से सुनवाई के लिए निर्धारित किया।</p>
<p>केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर किया कि भारत की जनगणना अधिनियम 1948 केवल केंद्र सरकार को जनगणना और जनगणना जैसी कार्रवाई करने की अनुमति देता है। बाद में शाम को, यह अपने पिछले हलफनामे से पीछे हट गया और एक नया हलफनामा दायर किया जिसमें दावा किया गया कि पैराग्राफ &#8220;अनजाने में घुस गया&#8221; . बिहार सरकार ने अपनी पहले बताई गई स्थिति को दोहराया कि सांख्यिकी संग्रह अधिनियम, 2008 उसे सामाजिक न्याय के हित में इस तरह की गणना प्रक्रिया आयोजित करने का अधिकार देता है। 6 सितंबर 2023 को, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संजीव खन्ना और एसवीएन भट्टी की पीठ ने मामले को 3 अक्टूबर के लिए स्थगित कर दिया और स्पष्ट किया कि उसने सर्वेक्षण के प्रकाशन पर कोई रोक नहीं लगाई है।</p>
<p>वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर बिहार में परिवार की संख्या एक करोड़ 89 लाख थी। 12 वर्षों में इसमें एक करोड़ 61 लाख वृद्धि होने की संभावना जताई जा रही है। इसी तरह राज्य में एक से सवा करोड़ घर या बसावट होने का भी आंकलन किया जा रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार पटना में प्रति परिवार में सदस्यों की संख्या औसतन 4.1 थी जो 2022 में बढ़ाकर 5.3 हो गई है यानी प्रति परिवार सदस्यों की संख्या में 1.2 की बढ़ोतरी हुई है। पटना जिले की जनसंख्या 58 लाख से बढ़कर 73 लाख हो गई है। पिछले 11 वर्षों में पटना की जनसंख्या में 15 लाख से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। राजनीतिक जानकार तो यहाँ तो कहते हैं कि इंडिया गठबंधन की एकजुटता बनी रही और बेहतर रणनीति के साथ यदि चुनावी बिसात बछायी गई, तो राज्य में लालू-नीतीश पासा पलट सकते हैं।  ​</p>
<p><strong>डीडब्ल्यू के पत्रकार मनीष कुमार</strong> लिखते हैं कि &#8220;पीछे मुड़कर देखें तो साफ है कि मंडल कमीशन के बाद की राजनीति के कारण ही क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ। बिहार में आरजेडी और जेडीयू तथा यूपी में समाजवादी पार्टी ओबीसी का जबरदस्त समर्थन पाने में कामयाब रहे। आज भी इन पार्टियों की राजनीति इन्हीं जातियों पर आश्रित है।  अपरोक्ष रूप से इसका विरोध कर रही बीजेपी की जान सांसत में है। यही वजह है कि रिपोर्ट जारी होने के चंद घंटे बाद ही नरेंद्र मोदी ने ग्वालियर में एक जनसभा में नीतीश पर निशाना साधते हुए कहा कि, &#8220;ये लोग पहले भी जात-पात पर लोगों को बांटते रहे हैं और आज भी यही पाप कर रहे हैं।​ मोदी की बेचैनी भी उसी ओबीसी वोट बैंक को लेकर है, जिसके साथ आने से बीजेपी का जनाधार बढ़ा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को कांग्रेस से तीन गुणा अधिक ओबीसी सीट मिली थी। लोकसभा चुनाव तो दूर की बात, पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में भी बीजेपी के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई है।&#8221; </p>
<p>राजनीति के जानकार बताते हैं कि जिस भी सीट पर बीजेपी यादव को उतारती है वहां भी बीजेपी को यादवों का वोट वहीं मिलता है। आरजेडी का राजनीतिक आधार यादव-मुस्लिम समीकरण रहा है। यह अलग बात है कि विगत वर्षों में बहुत सारी जातियां खिसक कर बीजेपी के साथ चली गई। लेकिन सवाल है कि जाति गणना के आंकड़े आने के बाद क्या राजनीतिक समीकरण बदलेगा? </p>
<p><strong>क्या है आरक्षण का खेल​</strong>: राज्य में ईबीसी की आबादी 36.01 प्रतिशत है, जिसके लिए मौजूदा आरक्षण 18 प्रतिशत है, जबकि पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या 27 प्रतिशत है, जिसके लिए 12 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था ​है। यानि बिहार में ओबीसी कैटेगरी के लिए कुल आरक्षण 30 फीसद है, जबकि उनकी आबादी 63 प्रतिशत हो गई ​है। करीब 92 साल पुराने आंकड़ों के अनुसार देश में 52 प्रतिशत ओबीसी ​है। अगर देश की जातीय गणना के परिणाम इसी तरह रहे तो ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की मांग तो जोर पकड़ेगी ही, समाज में जातिगत दूरी भी ​बढ़ेगी। जानकार बताते हैं कि बिहार में जातीय गणना की रिपोर्ट में अनुमान से अधिक बढ़ी ओबीसी की आबादी को देखकर अब देशभर में ऐसी जनगणना कराने की मांग ​बढ़ेगी।  </p>
<p>जानकार का कहना है कि उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में इसकी मांग तो शुरू ही हो गई ​है। बिहार में एनडीए के सहयोगी दल हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा तथा लोक जनशक्ति पार्टी के दोनों गुट एवं रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया भी देशभर में ऐसी गणना के पक्षधर ​हैं। आने वाले दिनों में इस मांग के साथ ही केंद्र की नौकरियों में ओबीसी के लिए तय 27 प्रतिशत आरक्षण को भी बढ़ाने का दबाव ​बढ़ेगा। जातिवार गणना की रिपोर्ट जारी होने के साथ ही बिहार से दिल्ली तक के सियासी हलकों में तूफान आ गया ​है। राहुल गांधी ने भी कहा है, ‘‘बिहार में ओबीसी, एससी-एसटी 84 प्रतिशत ​है, देशभर में गणना ​हो। जितनी आबादी, उतना हक ​मिले।&#8221; </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-caste-survey-data-released">&#8216;ब्राह्मणों&#8217; को छोड़िए हुज़ूर, जयप्रकाश नारायण की जाति के लोग, यानी &#8216;कायस्थ&#8217; भी, बिहार में &#8216;बढ़ई&#8217;, &#8216;नौआ, &#8216;मुसहर&#8217; की संख्या से कम हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लोहियावादी समतामूलक संघर्ष का एक बलिष्ट स्तम्भ नहीं रहा&#8230;.</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Oct 2022 11:05:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[mulayam singh]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुलायम सिंह यादव के निधन से लोहियावादी समतामूलक संघर्ष का एक बलिष्ट स्तम्भ नहीं रहा। इतिहास में चला गया। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में रिक्तता आ गयी। अलंकारिक अभिव्यक्ति में कहा जाये तो मुलायम सिंह यादव संघर्ष के पर्याय थे। व्यक्ति तो नाम मात्र का होता है। जब वे 1977 में इटावा [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुलायम सिंह यादव के निधन से लोहियावादी समतामूलक संघर्ष का एक बलिष्ट स्तम्भ नहीं रहा। इतिहास में चला गया। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में रिक्तता आ गयी। अलंकारिक अभिव्यक्ति में कहा जाये तो मुलायम सिंह यादव संघर्ष के पर्याय थे। व्यक्ति तो नाम मात्र का होता है। जब वे 1977 में इटावा से यूपी विधानसभा पहुंचे थे तो रामनरेश यादव मुख्यमंत्री थे। इन दोनों यादवों में गहरा अंतर था। एक जनपद-स्तरीय वकील था। मगर चौधरी चरण सिंह और राजनारायण के आंकलन में बड़ा था क्योंकि वे आगे चलकर नेतृत्व को चुनौती नहीं बन सकते थे। अतः रामनरेश यादव सुगमता से मुख्यमंत्री बन गये। ‘‘पहलवान‘‘ मुलायम सिंह यादव को प्रतीक्षा करनी पड़ी।</strong></p>
<p>करीब ग्यारह वर्ष लगे मुलायम सिंह यादव को। अवसर आया 1989 में जब कांग्रेस परास्त हो गयी। पंडित नारायणदत्त तिवारी के नेतृत्ववाली कांग्रेस अपदस्थ हो गयी। मगर यह शीर्ष पद मुलायम सिंह को सरलता से नहीं मिला। तब प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अपने चहेते चौधरी अजित सिंह को चाहते थे। विधायक दल द्वारा नेता के चयन का कार्यक्रम बना। सीधी टक्कर थी मुलायम सिंह बनाम अजित सिंह के बीच। तब जनता दल के केन्द्रीय पर्यटक थे चिमनभाई पटेल जो गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके थे। जब मैं अहमदाबाद में ‘‘टाइम्स आफ इंडिया‘‘ का संवाददाता था तो चिमनभाई से आत्मीयता हो गयी थी। मुलायम सिंह जी को यह बात ज्ञात थी। अपने मन की बात मुझे बता दी। कार्य सौंपा।</p>
<p>चिमनभाई लखनऊ मेल से चारबाग स्टेशन पहुंचे। प्लेटफार्म पर ही उन्हें लेकर स्टेशन अधीक्षक के कक्ष में ले गया। सैकड़ो पार्टीजन भी मुझ अनजाने व्यक्ति को घूर रहे थे कि यह अदना शख्स है कौन ? वहां मैंने चिमनभाई से केवल एक ही बात कही: ‘‘आप खेडूत (किसान) पुत्र हैं। मुलायम सिंह भी आप के सदृश हैं। यह सत्पुरूष अजित सिंह अमेरिका से सीधे पधारे हैं, हवाई मार्ग से। अजित और घनश्याम ओझा में साम्य है। इंदिरा गांधी के चेले ओझा को हराकर चिमनभाई गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। यह तुलना कारगर हुयी। चुनाव सीधा हुआ। हालांकि प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पूरा दमखम चौधरी अजित सिंह के लिये लगा दिया था। यह सारा माजरा मुलायम सिंह समझ गये थे। वे लोहिया के कट्टर समर्थक थे और लोहिया हमारे प्रणेता रहे। फिलहाल केन्द्रीय नेतृत्व का दबाव पर्यवेक्षक चिमनभाई पर कतई नहीं पड़ा। आगे का इतिहास जानामाना है।</p>
<p>तभी मुख्यमंत्री बन कर मुलायम सिंह ने एक उपकार किया। वरिष्ठ आईएएस अधिकार नृपेन्द्र मिश्र उनके सचिव थे। मेरा आग्रह था कि लोहिया की जयंती यादगार ढंग से मनायी जाये। उसी वक्त मुलायम सिंह यादव ने कई जनोन्मुखी योजनायें लागू की। जयंती की तारीख थी 23 मार्च, जो डा. लोहिया कभी नहीं मनाते थे। कारण ? उसी तारीख को भगत सिंह को उनके साथियों के साथ फांसी दी गयी थी। </p>
<p>लेकिन राम मंदिर आंदोलन के जनसमर्थन का मुलायम सिंह सही आंकलन नहीं कर पाये। फिर उठापटक हुयी। भाजपा सत्ता पर आ गयी। मगर वाह रे मुलायम सिंह जी ! कुश्ती में माहिर, वे नया दांव चले और शीघ्र सत्ता पर फिर आ गये। पर मायावती और कांशीराम का कुटिल दांव नहीं भाप पाये। तबसे सारे समीकरण बदल गये।</p>
<p>मुलायम सिंह यादव को याद किया जायेगा यूपी शासन में हिन्दी प्रसार और अलाभकारी जोतों पर कर में छूट हेतु। हिन्दी पर उनकी जिद का तो मेरा निजी अनुभव है। अंग्रेजी दैनिक का संवाददाता होने के कारण मैं सरकारी आवास आवंटन की दरख्वास्त अंग्रेजी में टाइप करके ले गया। पहले तो मुलायम सिंह यादव ने लेने से इंकार कर दिया। किन्तु मेरी बेबसी समझ गये। बोले: ‘‘आखिरीबार यह अंग्रेजी में पत्र ले रहा हूं। याद रखिये।‘‘ मैंने भी प्रण कर लिया। आखिर 1957 में हम सब लखनऊ विश्वविद्यालय के ‘‘अंग्रेजी हटाओ‘‘ आंदोलन की उपज रहे थे।</p>
<p>सीमांत किसानों पर थोपे गये अवांछनीय कर का तो खुद लोहिया ने 1953 विरोध किया था और जेल भी गये थे। सोशलिस्टो का नारा था: ‘‘जिन जोतो पर लाभ नहीं, उनपर लगे लगान नहीं।‘‘ अर्थात अपने ही जनांदोलन को मुलायम सिंह कैसे अपमानित करते ?</p>
<p>मुलायम सिंह यादव के प्रति भारत राष्ट्र तथा हर लोकतंत्रप्रेमी सदैव आभारी रहेगा क्योंकि उनकी वजह से एक यूरेशियन महिला (सोनिया गांधी) भारत की प्रधानमंत्री नहीं बन पायी। तब सोनिया ने राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के समक्ष दावा पेश (21 अप्रैल 1999) किया था। नारायणन तो जवाहरलाल द्वारा मनोनीत विदेश सेवा अफसर थे। कुटुंब के झंडाबरदार रहे। शपथ ग्रहण की राष्ट्रपति भवन में तब तैयारी भी हो गयी थी। सोनिया गांधी की मां और अन्य संबंधी भी रोम से नयी दिल्ली पहुंच गये थे। मगर उसी वक्त मुलायम सिंह यादव जॉर्ज फर्नांडिस के घर पहुंचे तथा बताया कि समाजवादी सांसद सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने वाले प्रस्ताव का विरोध करेंगे। राष्ट्रपति नारायणन को विवश होकर सोनिया को बताना पड़ा कि उनके द्वारा दी गयी सांसदों की सूची में समाजवादी सदस्यों की संख्या काटने के बाद उनका बहुमत खत्म हो गया। अर्थात मुलायम सिंह यादव ने मशहूर चरखा दांव चला और सोनिया चारो खाने पस्त हो गयीं। उसी दौर में विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय में एक जनसभा थी। मैं भी वक्ताओं में था। एक ही वाक्य में सारांश कहा मैंने: ‘‘मुलायम सिंह जी, आपने भारत को दूसरी बार यूरोपियन गुलामी से बचा लिया।‘‘ श्रोता प्रमुदित थे।</p>
<p>मुलायम सिंह यादव मुझे सदैव प्रिय रहेंगे क्योंकि वे हमारे हमदर्द रहे। वे याद करते रहे कि उनके नेता जॉर्ज फर्नांडिस और मैं फांसी की सजा निश्चित पाते यदि इंदिरा गांधी मार्च 1977 में राय बरेली सीट फिर जीत जाती। हम दोनों बड़ौदा डाइनामाइट केस में अभियुक्त प्रथम व द्वितीय थे। अर्थात मुलायम हमारी भयावह नियति के प्रति संवेदनशील रहे। आखिर तक। </p>
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		<title>शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 May 2022 08:07:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chiefminister]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[kb sahar]]></category>
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		<category><![CDATA[paliganj]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[ramlakhan singh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। बिहार में जब भी &#8216;यादव&#8217; उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर &#8216;लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते&#8217; आये हैं। अब इसे उनका &#8216;सौभाग्य&#8217; कहिये या मतदाताओं का &#8216;दुर्भाग्य&#8217; &#8211; बिहार के लोग प्रारम्भ [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। बिहार में जब भी &#8216;यादव&#8217; उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर &#8216;लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते&#8217; आये हैं। अब इसे उनका &#8216;सौभाग्य&#8217; कहिये या मतदाताओं का &#8216;दुर्भाग्य&#8217; &#8211; बिहार के लोग प्रारम्भ से &#8216;लपेटे&#8217; में आते रहे हैं। आज़ाद भारत में सन 1947 के बाद अगर बिहार की गलियों में चौथी पीढ़ी के मतदाता हो गए हैं, तो प्रदेश के विधानसभा और विधान परिषद् में भी &#8216;उस ज़माने के लोग&#8217; कहाँ बचे हैं। आज नीतीश कुमार, लालू यादव, सुशील मोदी, रवि शंकर प्रसाद, राधा मोहन सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा, उपेंद्र कुशवाहा, मीरा कुमार, नन्द किशोर यादव, चिराग पासवान जैसे &#8216;जनता से कटे &#8211; कुर्सी से जुड़े&#8217; नेताओं को तो सभी जानते हैं; कोई &#8216;अनुयायी&#8217; हैं तो कोई &#8216;पिछलग्गू&#8217; &#8211; लेकिन आज बिहार के चौथी पीढ़ी के मतदाता शायद &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; और बिहार के &#8216;लौह पुरुष&#8217; को जानता होगा। </strong></p>
<p>#आर्यावर्त #इण्डियन नेशन अखबार उन दोनों &#8216;महामानवों&#8217; को देखा है और आज के परिपेक्ष में ही नहीं, आने वाले समय में भी, जब भी लिखने की बात होगी &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; और बिहार का &#8216;लौह पुरुष&#8217; को एक दूसरे से अलग रखकर शब्दबद्ध नहीं किया जा सकता है। अन्य राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चाएं होंगी, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उस ज़माने में &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रति बहुत अधिक प्रतिबध्द थे। सामाजिक क्षेत्र के मीडिया के अभ्युदय और शब्दकोषों में बदलते शाब्दिक अर्थों के मद्दे नजर अगर आज की मीडिया &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को शिक्षा जगत से जोड़कर देखेगी तो तत्काल उन्हें &#8216;शिक्षा माफिया&#8217; शब्द से अलंकृत करने में तनिक भी बिलम्ब नहीं करेगी। </p>
<p>लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकत है कि अविभाजित बिहार में &#8216;आरएलएसवाई&#8217; नामक शैक्षिक संस्थाओं का प्रदेश में &#8216;शैक्षिक-दर&#8217; बढ़ाने में योगदान अवश्य है, चाहे &#8216;पांच फ़ीसदी&#8217; ही क्यों न हो। अगर पांच फीसदी को ही आधार माने तो वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के साथ-साथ प्रदेश के आला अधिकारी अगर प्रदेश का शैक्षिक दर 69.83 का आंकड़ा मानते हैं तो स्वाभाविक है कि &#8216;आरएलएसवाई&#8217; का पांच फ़ीसदी योगदान है। इससे भी बड़ी बात यह है कि कुछ देर के लिए अगर &#8216; शेर-ए-बिहार&#8217; को उस ज़माने के &#8216;शिक्षा माफिया&#8217; मान भी लें, तो बिहार के मतदाता से लेकर जो मतदान के दिन घर से नहीं निकलते हैं, इस बात को स्वीकार अवश्य करेंगे की &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; के बेटे के पास &#8216;स्नातक&#8217; का प्रमाण पत्र अवश्य है। जबकि सन नब्बे से 2005 तक प्रदेश का बागडोर सँभालने वाले &#8216;यादवों की अगली पीढ़ी के नेता&#8217; के बेटों ने दसवीं-बारहवीं का प्रमाण पत्र भी नहीं प्राप्त कर सके। यानी  मानसिकता में &#8216;अंतर&#8217; तो है, जहाँ तक शिक्षा का सवाल है। खैर। </p>
<figure id="attachment_4054" aria-describedby="caption-attachment-4054" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg" alt="" width="640" height="629" class="size-full wp-image-4054" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-300x295.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-48x48.jpeg 48w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4054" class="wp-caption-text"><br />श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और उनका परिवार।  साल 1963</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, आप माने या नहीं, जब &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; वृद्ध हो गए, तब बिहार की राजनीतिक मानचित्र पर लालू यादव अवतरित हुए थे &#8211; &#8216;स्वयंभू यादव नेता&#8217; बनकर। वैसे लालू यादव स्वयं को यादवों का, दलितों का, प्रदेश के गरीब-गुरबों का &#8216;स्वयंभू&#8217; नेता कह लें, हकीकत तो यह है कि असली नेता तो रामलखन सिंह यादव थे जो सं 1952 से 1991 तक बिहार विधान सभा में मुस्तैद रहे। जिसका हुए, उसका कभी हाथ नहीं छोड़े और जिसका नहीं हुए, उसका कभी ऊँगली भी नहीं पकड़े। सं 1991 में बिहार विधान सभा से निकलकर दिल्ली लोक सभा में विराजमान हुए। रसायन और उर्वरक के कैबिनेट मंत्री बने, बिहार की राजनीतिक इतिहास में, खासकर शिक्षा के विस्तार और विकास के अध्याय में जो पन्ने लिखे, जोड़े; आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी उस पन्ने से अधिक पन्ना कोई नहीं लिख सका।</strong> </p>
<p>&#8216;दहशत&#8217; था &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; का &#8216;सम्मान&#8217; के साथ। &#8216;लोग&#8217; दूर से डरते अवश्य थे, लेकिन पास आते ही पिघल जाते थे। लोग घबराते जरूर थे, लेकिन &#8216;थरथराते&#8217; नहीं थे। आज के नेता इस सम्मान के बारे में सोच नहीं सकते, चाहे &#8216;ब्राह्मण&#8217; हों, &#8216;क्षत्रिय&#8217; हो, &#8216;वैश्य&#8217; हो, &#8216;शूद्र&#8217; हो, &#8216;यादव&#8217; हों, &#8216;कुर्मी&#8217; हो, &#8216;कायस्थ&#8217; हो, &#8216;पासवान&#8217; हो, &#8216;कुशवाहा&#8217; हो; क्योंकि &#8216;सम्मान&#8217; &#8216;अर्जित&#8217; किया जाता है बहुत मसक्कत से, और वर्तमान राजनीतिक गलियारे में, चाहे पटना का सरपेंटाइन रोड हो या दिल्ली का संसद मार्ग औसतन 90 फीसदी से अधिक नेतागण उस सम्मान से कोसों दूर हैं । वह तो &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217;  ही थे कि तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री पी वी नरसिम्हा राव की सरकार &#8216;नो कॉन्फिडेंस मोशन&#8217; में बची थी। खैर। </p>
<p>आज &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि आज से कोई नौ दिन बाद बिहार के लोग अपने प्रदेश के &#8216;लौह पुरुष&#8217; को श्रद्धांजलि देंगे। सन 1974 के 3 जून को बिहार के लौह पुरुष बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी के.बी. सहाय &#8216;आकस्मिक मृत्यु&#8217; को प्राप्त किये। लगभग इन पांच दशकों में यह सार्वजानिक नहीं हो पाया की बाबू के बी सहाय को किसने मारा, क्यों मारा जब वे अपने हिंदुस्तान एम्बेसेडर (BRM 101) की अगली सीट पर बैठे थे और एक ट्रक उनके हँसते-मुस्कुराते शरीर को &#8220;पार्थिव&#8221; बना दिया। पटना-हज़ारीबाग की वह सड़क आज तक उस घटना को नहीं भूल पायी है। </p>
<figure id="attachment_4055" aria-describedby="caption-attachment-4055" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg" alt="" width="640" height="640" class="size-full wp-image-4055" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-96x96.jpeg 96w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4055" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय तत्कालीन बिहार के हज़ारीबाग में। साल: 1963</figcaption></figure>
<p>पालीगंज, अनिशाबाद, औरंगाबाद, बख्तियारपुर, रांची, नालंदा, कोडरमा, बेतिया, गया, नवादा और न जाने कितने शहर हैं बिहार के, जो उन दिनों भले &#8216;स्मार्ट शहरों&#8217; की गिनती में नहीं थे, लेकिन उन शहरों में स्थित रामलखन सिंह यादव के नाम की शैक्षणिक संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त कर छात्र-छात्राएं अपने परिवार, समाज और प्रदेश का नाम रोशन किये थे। कल की ही तो बात हैं बिहार के बाइसवें मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार पटना विश्वविद्यालय के मगध महिला कॉलेज में भले यह स्वीकार कर लिए हों कि &#8220;जब वे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते थे, महिलाएं नहीं होती थी, जब कोई महिला कालेज परिसर में आती थी सभी उसे देखने लगते थे।&#8221; परन्तु, हकीकत यह है कि रामलखन सिंह यादव अपनी शैक्षणिक संस्थाओं में महिलाओं को विशेष स्थान दिए थे। वे महिला शिक्षा के पक्षधर ही नहीं, अग्रणी भी थे। यह बात अलग है कि नीतीश कुमार अपनी बात 2022 में कह रहे हैं, जबकि सत्तर के दशक और उसके पूर्व से ही रामलखन सिंह यादव के महाविद्यालयों में महिलाएं शिक्षा प्राप्त करती थी। </p>
<p>बहरहाल, बिहार में तीसरी विधान सभा काल में दो व्यक्ति मुख़्यमंत्री कार्यालय में बैठे। सन 1962 के चुनाव के बाद श्री बिनोदानंद झा के नेतृत्व में सरकार बनी। बिनोद बाबू &#8216;राजमहल&#8217; विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर आये थे। लेकिन पांच साल नहीं चले  और उन्हें महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर सं 1963 में मुख्यमंत्री की कुर्सी के बी सहाय के हाथ सौंपना पड़ा। सहाय बाबू 2 अक्टूबर, 1963 से 5 मार्च, 1967 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। तीसरी विधान सभा के बाद से लगातार बिहार में &#8216;आया राम &#8211; गया राम&#8217; सिद्धांत पर सरकार बन रही थी, चल रही थी, जा रही थी। चौथे विधान सभा, जिसका चुनाव 1967 में हुआ था, चार मुख्यमंत्री महोदय, मसलन जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा, शोषित दल के सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल और कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री का मुख्यमंत्री कार्यालय में &#8216;उदय&#8217; और &#8216;अस्त&#8217; हुआ। इसी तरह पांचवी विधान सभा (1969) में हरिहर प्रसाद, भोला पासवान शास्त्री, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर का उदय-अस्त हुआ। लेकिन आज अगर पिछले 22 मुख्यमंत्रियों को एक नजर में देखें, तो बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़कर, कुछ ही मुख्यमंत्री हैं जिन्हें आज भी बिहार के लोग, बिहार के मतदाता, प्रदेश के विद्वान-विदुषी से लेकर अशिक्षित और अज्ञानी तक &#8211; नहीं भुला है और शायद भूल भी नहीं पायेगा। उन्हीं &#8216;ना भूलने वाले मुख्यमंत्रियों&#8221; की सूची में एक हैं बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय। </p>
<p>31 दिसंबर, 1998 को, यानि अपनी मृत्यु से कोई आठ साल पहले &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; राम लखन सिंह यादव ने &#8216;बिहार के लौह पुरुष&#8217;  के बी सहाय के बारे में, उनके साथ अपनी सानिग्धता के बारे में, अपने प्रेम-सम्मान और विश्वास के बारे में, जनता के प्रति उनकी सोच के बारे में कुछ शब्द लिखे थे। यह लेख पटना से प्रकाशित &#8216;आज&#8217; समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। इस लेख को सहाय साहब के पौत्र राजेश सहाय अपने ब्लॉग पर बहुत सम्मान के साथ सुरक्षित रखे हैं। विगत दिनों जब &#8216;सोडा फ़ाउंटेंन&#8217; की कहानी &#8216;खादी ग्रामोद्योग&#8217; आगजनी की कहानी, पुलिस गोली काण्ड की कहानी लिखा, तो ऐसा लगा कि आज की पीढ़ी को बाबू राम लखन सिंह यादव का बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय के प्रति कितना सम्मान था, उन दिनों की राजनीतिक हालात कैसी थी, क्यों वह सब हुआ &#8211; इस बात को अगर आज की पीढ़ी के लोग देखेंगे, पढ़ेंगे तो जानकारी स्वरुप ही सही, बेहतर अवश्य होगा। &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; राम लखन सिंह यादव के शब्दों को हम राजेश सहाय को धन्यवाद अर्पित करते हूबहू यहाँ रख रहे हैं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg" alt="" width="899" height="769" class="alignleft size-full wp-image-4056" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg 899w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS-300x257.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS-768x657.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 899px) 100vw, 899px" /></a></p>
<p>&#8220;स्वर्गीय कृष्ण बल्लभ सहाय जो आम तौर पर के.बी.सहाय के नाम से जाने जाते थे, जन्मकाल से ही एक विलक्षण प्रतिभा संपन्न, स्मरण शक्ति में बेजोड़, अंग्रेजी (साहित्य) भाषा के अच्छे ज्ञाता, छात्र जीवन में अपने समय में मेट्रिक परीक्षा में प्रदेश में सर्वोत्तम, अंग्रेजी आनर्स में विश्वविद्यालय भर में सर्वोत्तम और गेट गोल्ड मेडलिस्ट विचार एवं व्यवहार तथा आचार में पक्के समाजवादी, गरीबों विशेष कर पिछड़े वर्गों हरिजन, आदिवासियों तथा अल्प संख्यकों के पक्के हिमायती, किसानों के प्रणेता, ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन के भारत भर में सर्वप्रथम जनक तथा बिहार के लौह पुरुष के रूप में बराबर याद किये जायेंगें। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू का जन्म इकतीस दिसम्बर 1898 को पटना ज़िले में फतुआ थाना अन्तर्गत शेखपुरा ग्राम में एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री गंगा प्रसाद पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर पदस्थापित थे। इनकी माँ एक अनुशासन प्रिय एवं दृढ इच्छा शक्ति की धनी महिला थी। जो बात उनके मन में बैठ जाती उस पर वे दृढ रहती थी। ऐसी ही एक घटना कृष्ण बल्लभ बाबू के जन्म के बाद सात वर्ष बीतते-बीतते घटी। कृष्ण बल्लभ बाबू तीन भाई थे। एक की मृत्यु तो हमलोगों से संपर्क से पहले हो चुकी थी, जिनके पुत्र आज भी तारा बाबू के रूप में जीवित हैं। दूसरे भाई डॉक्टर दामोदर प्रसाद एक कुशल डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा में आजीवन लगे रहे। दरियापुर पटना स्थित इनके मकान में कृष्ण बल्लभ बाबू के साथ अन्य राजनीतिज्ञों का जमावड़ा रहता था, जिसमें श्री के. पी. सहाय श्री गंगा शरण सिंह एवं श्री उमाकांत की चर्चित त्रिगुट मंडली प्रतिदिन यहाँ बैठा करती थी।  </p>
<p>सन 1906 में कृष्ण बल्लभ बाबू के बहन की शादी तय हुई। इनके दादा ने शादी तय की थी। लेकिन पता नहीं कैसे इनकी माँ को सूचना हो गयी कि होने वाले वर के पेट में पिलही रोग है। उन्होने इनके पिता दरोगाजी को मजबूर किया कि वे स्वयं जा कर लड़के को देखें कि हकीकत क्या है। वे जाने को तैयार भी हुए लेकिन गांवों और विशेषकर गांवों की महिलाओं की चर्चा के दवाब में आकर जाने के समय अपनी यात्रा स्थगित कर दी क्योंकि पिता के प्रति यह अविश्वास होता। बदकिस्मती से ठीक शादी होने के बाद मंडप में इनकी माँ ने परिक्षण के समय देख लिया कि लड़के के पेट में पथरी है और वह वहीं पर मूर्छित हो कर गिर गया। बरात विदाई के ठीक चौथाडी के दिन उस लड़के का देहांत हो गया। इसके बाद इनकी माँ ने तय किया कि अब वह किसी भी हालात में शेखपुरा में नहीं रहेंगीं और बाध्य होकर उनके दादा को भी उनकी ज़िद के सामने झुकना पड़ा। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू सात वर्ष की उम्र में ही अपने भाई बहन के साथ माँ के आदेशानुसार माँ के साथ पुनपुन स्टेशन आकर ट्रैन से हजारीबाग के लिए रवाना हो गए जहाँ वे अपने परिवार समेत आजीवन रहे। </p>
<p>प्राइमरी शिक्षा उन्होनें हजारीबाग धर्मशाला प्राइमरी विद्यालय से तथा मेट्रिक तक की शिक्षा ज़िला स्कूल हजारीबाग से प्राप्त की। मेट्रिक की परीक्षा में उन्होनें बिहार भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 1916 में मेट्रिक परीक्षा पास करने के बाद 1919 में संत कोलंबस कॉलेज से अंग्रेजी स्नातक परीक्षा में गोल्ड मैडल के साथ पास किया। तत्कालीन गवर्नर श्रीमान  गेट  के  हाथों  उन्हें  यह गोल्ड  मैडल  मिला। इसके बाद उन्होनें एम.ए. (अंग्रेजी) में तथा लॉ प्रथम वर्ष में एडमिशन लिया। एक वर्ष तक दोनों विषयों को पढने के बाद 1921 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर अपने उज्जवल भविष्य को तिलांजलि देकर अपना जीवन पूर्ण रूप से राष्ट्र को समर्पित करते हुए 1921, 1928, 1929, 1932, 1934, 1940, 1942 में तमाम आज़ादी की लड़ाईयों में साक्रिय रूप से हिस्सा लेने कारण उन्हें वर्षों जेल में जीवन बिताना पड़ा। </p>
<p>जैसा कि मैंने प्रारम्भ में ही इनके कई गुणों के बारे में लिखा है, कुछ व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं से पता चल जाएगा कि वे गुण इनमें किस प्रकार कूट कूट कर भरे थे। कृष्ण बल्लभ बाबू की पत्नी की मृत्यु के बाद तीन शादियां हुई थी। पहली शादी उनके छात्र जीवन में ही नवादा ज़िले के दरियापुर ग्राम में तत्कालीन पुलिस दरोगा श्री विशेश्वर नाथ की पुत्री से हुई। ससुराल में प्रथम बार एक शादी में सम्मलित होने गए। तेज़ छात्र होने के नाते उन्हें देखने के लिए उनके संबंधी और ग्राम के लोग भीड़ लगाए थे। बरात आने के दिन करीब दस हलवाई और अन्य नौकर बहुत सुबह से ही मिठाई और पूरी लोगों के खाने के लिए तैयार करते रहे। दोपहर में उन्हें खाने के लिए सूखा चूड़ा एवं गुड़ दिया गया तभी उनके ससुर दरोगाजी आकर उन नौकरों को पीटने लगे कि काम छोड़ कर नाश्ता क्यों कर रहा है? इस घटना ने कृष्ण बल्लभ बाबू के दिमाग पर गहरा असर किया और उन्होंने तय किया कि इन गरीबों के मार खाने के बाद इनके द्वारा तैयार किया गया भोजन करना भारी गुनाह है। उन्होंने बहाना किया कि उनके पेट में दर्द हो गया है और उन्हें शीघ्र पटना पहुंचा दिया जाए। उनकी सास ने अपने पति की बातों की अवहेलना करते हुए कृष्ण बल्लभ बाबू की इच्छानुसार बिना समय गंवाए उन्हें शीघ्र पटना भेज दिया। यह घटना साबित करती है कि गरीबों के प्रति उनके दिल में कितना दर्द था। </p>
<p>दूसरी घटना हजारीबाग ज़िले के गिद्धौर थाने में घटी जहां उनके पिता पदस्थापित थे। गर्मियों की छुट्टी में पिताजी के आदेशानुसार वे वहीं थाना में छुट्टी बिताने गए। संयोगवश कुछ दिनों के लिए उनके पिता एक पठान जमादार को उनके गार्डियन के रूप में सौंप कर कहीं बाहर गए। कृष्ण बल्लभ बाबू खाते, गाय का दूध पीते और बचा हुआ दूध नौकर को पिला देते थे। एक दिन सुबह जमादार उनके पास आये और जब उन्हें मालूम हुआ कि गाय का दूध नौकर पिता है तब उसने उस नौकर को लाठी से इतना मारा कि वह बेहोश हो गया। उसने उन्हें भी डांटा तुम नौकर को आगे दूध पिलाओगे तो तुम्हारी गति भी यही होगी। वह नौकर खैनी खाता था इसलिए चुक्का में चूना रखता था। कृष्ण बल्लभ बाबू ने अपने हाथ से हल्दी पीस कर चूना के साथ गर्म कर के उसके बदन में पूरा लेप दिया। रात्रि में जब उसकी तबियत ठीक हुई तब उससे उन्होंने कहा कि पिताजी के आने पर कह देना कि आवश्यक कार्यवश मैं आज ही पटना जा रहा हूँ। इस घटना के बाद कृष्ण बल्लभ बाबू पिता के लाख कहने के बाद भी किसी थाने में नहीं गए। इससे गरीबों के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा एवं भाव प्रकट होता है। </p>
<figure id="attachment_4057" aria-describedby="caption-attachment-4057" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg" alt="" width="640" height="460" class="size-full wp-image-4057" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2-300x216.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4057" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और अन्य गणमान्य लोग &#8211; साल: 1963</figcaption></figure>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू ने समाजवाद को अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में मूर्त रूप दिया। रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक जीवन, लोगों के प्रति उनका व्यवहार, उनके द्वारा किये गए काम, जिस पर भी आप नज़र डालें उसकी झलक साफ़ दृष्टिगोचर होती है। वे भीतर और बाहर पारदर्शी थे वे स्पष्टवादी, ईमानदार एवं निसंकोच, सच्चाई के साथ अपने बातों को स्पष्ट रूप से रखने के आदि थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी। सात वर्ष की उम्र से जबसे वे अपने गांव शेखपुरा छोड़ कर हजारीबाग गए आजीवन छोटी या बड़ी घटनाएं समय और तिथि समेत अच्छी तरह याद रहती थी। आवश्यकतानुसार बिना किसी कागज़ को देखे सारी घटनाएं वे बतला देते थे। जब बिहार की राजनीति में तात्कालिक मुख्यमंत्री से कुछ विभेद पैदा हुआ और उनके ऊपर कई तरह के गंभीर आरोप और आक्षेप समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया गया था तब उन्होंने सब का जवाब एक लंबे वक्तव्य में दिया। </p>
<p>उन दिनों वे हजारीबाग में थे। 1957 में चुनाव हारने के बाद उन्होनें आवास एवं गाडी से झंडा उतरवाया। सभी कर्मचारियों को एक साथ खड़ा कर उन्हें धन्यवाद् दिया। सबको एक एक सर्टिफिकेट दिया और वहीं से गाडी में बैठ कर रवाना होने से पूर्व सभी कर्मचारियों को सरकार में जहां भी रहे अनुशासन, ईमानदारी एवं निष्ठा से कार्य करने की सलाह दी। सरकारी आवास में पुनः उन्होंने पैर नहीं रखा। मुझसे इतना ही पुछा कि मैं हजारीबाग में उन्हें खबर कर दूं कि एक दिन के बाद वे कहाँ आवेंगें। मैंने उनके साथ रहने का प्रबंध पहले ही कर लिया था इसलिए कहा कि निसंकोच सीधे मेरे घर पहले आ जाएँ। वे ठीक तीसरे दिन आये और मेरे ही निवास के निकट नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आई. एन. ए. की सरकार के मंत्री स्वर्गीय परमानन्द जी का बड़ा मकान जो गुलाब गार्डन के नाम से मशहूर था उसी में उनका निवास रखा गया। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उन्होनें बड़े मकान को छोड़ कर उसी प्रांगण में उनके नौकरों के रहने का तीन रूम का मकान था उसमे बिना किसी से राय लिए रहने लगे। </p>
<p>उन दिनों समाचार पत्रों में छपी अनर्गल बातों का जवाब देना हुआ तब उन्होनें हजारीबाग से संध्या समय फ़ोन किया कि दो अंग्रेजी स्टेनोग्राफर को सुबह से ही तैयार रखें। आदेशानुसार सब कुछ तैयार रखा गया और वे हजारीबाग से चल कर सीधे सात बजे सुबह गुलाब गार्डन पहुँच गए। गार्डन में ही एक पेड़ के नीचे बैठ कर बिना हाथ में कागज़ या चिट लिए दोनों स्टेनोग्राफरों को एक एक कर डिक्टेशन अंग्रेजी में देते रहे और पूरा टाइप होने पर यथोचित संशोधन किया। वक्तव्य लंबा था। उसकी कई प्रतियां तैयार की गयी और यह कह कर कि मैं इसे प्रेस में प्रकाशनार्थ भेज दूंगा, वे उसी संध्या को हजारीबाग के लिए रवाना हो गए। मैं चाहता था कि वह अभी प्रकाशित न हो क्योंकि इससे बहुत झगडे पैदा होंगें। लेकिन हजारीबाग पहुंचने के बाद भी उन्होनें कहा कि इसे प्रकाशित करा ही देना चाहिए। तब मैंने उसे प्रकाशनार्थ भेज दिया। उसके सम्बन्ध में बहुत प्रचार किया गया कि यह वक्तव्य कदम कुआँ के ब्रेन ट्रस्ट लोगों ने सप्ताहों बैठ कर सब कागज़ात निकाल कर ड्राफ्ट किया है। मैं और श्री एल. एन. झा को ही यह पता था यह कैसे और कहाँ ड्राफ्ट हुआ था। कृष्ण बल्लभ बाबू की स्मरण शक्ति क्या थी यह तो इसका सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण था। </p>
<p>बिहार में सर्वप्रथम ज़मींदारी उन्मूलन का कानून बनाया गया वे इसके जनक थे। उसके चलते बिहार के ज़मींदारों से, बड़े-बड़े लोगों से और ख़ास कर रामगढ के राजा कामाख्या नारायण सिंह ने जन्म भर उनकी राजनैतिक शत्रुता और मुकदमे लगे रहे, चूँकि कृष्ण बल्लभ बाबू ही राजस्व और जंगल विभाग के मंत्री बराबर रहे। मुझे याद है लैंड सीलिंग बिल को पेश करते हुए उन्होने कहा था कि ज़मींदारों और बड़े-बड़े भूपतियों का जो रवैया है पता नहीं यह कानून कब लागू होगा। लेकिन मैं तो कम से कम रास्ता प्रशस्त कर रहा हूँ कि आगे शीघ्रताशीघ्र ही इसे लागू करने के लिए कानून बनाने में समय खर्च न हो। इस कानून का भी बड़ा विरोध हुआ और मुकदमे में कई दिनों तक लटका रहा। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को बढ़ने सहयोग करने ज़मीन माँगने में भी कृष्ण बल्लभ बाबू आगे रहे। सबसे बड़ी बात यह हुई कि 1954 में देश में सबसे पहले कृष्ण बल्लभ बाबू के द्वारा ही बिहार भूदान एक्ट बनाया गया। कहा जा सकता है कि ज़मीन संबंधी सारे प्रगतिशील कदम बिहार में उन्हीं के द्वारा उठाये गए।  </p>
<p>1967 का चुनाव सारे उत्तर भारत विशेष कर बिहार के लिए बहुत ही मील का पत्थर साबित हुआ। इस साल आम चुनाव के पूर्व से ही आम मतभेद, अराजपत्रित कर्मचारियों एवं छात्रों के बीच विरोधी दलों द्वारा उन्हें तरह-तरह की मांगों को सरकार द्वारा स्वीकृत करवाने के मुद्दों पर आक्रामक और हिंसक रास्ते पर ले जाकर भयंकर आंदोलन करवाने के चलते कांग्रेस की बड़ी क्षति हुई। कृष्ण बल्लभ बाबू पटना शहर से ही उम्मीदवार बने और उनका विरोध महामाया प्रसाद सिन्हा ने किया। पटना में हिंसक आंदोलन पर बहुत लाचार होकर पुलिस और मजिस्ट्रेट को आगज़नी से शहर को बचाने तथा आत्मरक्षार्थ गोली चलानी पड़ी। खादी भवन जैसी संस्था में भी लोगों ने आग लगायी। </p>
<p>मैं स्वयं भी दक्षिण पटना से उम्मीदवार था। उक्त घटनाओं के चलते हमलोगों के चुनाव पर बुरा असर पड़ा। कृष्ण बल्लभ बाबू को हम लोगों ने बहुत समझाया बुझाया लेकिन वे अपने हर चुनाव भाषण में पटना में मतदाताओं को कहते रहे कि मेरे रहते जिस तरह की हिंसक घटनाएं घाटी हैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता हूँ और किसी प्रकार की जांच करवाने को तैयार नहीं हूँ। हाँ आप चाहें तो मुझे वोट न दें और जिसे चाहे गद्दी पर बिठा दें। </p>
<figure id="attachment_4058" aria-describedby="caption-attachment-4058" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg" alt="" width="640" height="529" class="size-full wp-image-4058" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet-300x248.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4058" class="wp-caption-text">सम्पादकों के साथ बैठक। चित्र में आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन संपादक श्रीकांत ठाकुर &#8216;विद्यालंकार&#8217; भी है</figcaption></figure>
<p>उन दिनों राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष कामराज नादर थे उन्होनें पटना आगमन पर उन्हें समझाया कि यहां जो गोलीकांड हुआ है उसी कि न्यायिक जांच करवा दी जाए। श्री नादर ने जब यह प्रस्ताव कृष्ण बल्लभ बाबू के समक्ष रखा तब बिना किसी प्रकार की बात किये उन्होंने अपना त्याग पत्र बिहार कांग्रेस पार्टी नेतृत्व एवं मुख्यमंत्री पद से उनके हाथ में दे दिया क्योंकि जांच का आदेश देकर वे प्रशासन को नाजायज़ ढंग से हतोत्साहित नहीं करना चाहते थे। हारने के बावजूद उनके ऊपर जरा सी भी उदासी नहीं आई। इससे स्पष्ट है कि वे कितने सख्त प्रशासक थे और प्रजातंत्र में उनका कितना विश्वास था। जिस कारगर ढंग से मजबूती से स्वयं जाकर जमशेदपुर, रांची आदि जगहों पर उन्होंने मुसलमानों पर हुए दंगों को दबाया वह अद्वितीय था। </p>
<p>इसी प्रकार की एक और घटना घटी। भारत के गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने बेतिया राज के साठी की जमीन को लेकर श्री कृष्ण सिंह को देहरादून में सफाई देने के लिए बुला भेजा। श्री बाबू बहुत ही मर्माहत हुए। कृष्ण बल्लभ बाबू ने उन्हें जाने से रोक स्वयं सरदार पटेल से मिले सुश्री मणि देवी पटेल और सरदार पटेल के सचिव श्री शंकर के समक्ष ही सरदार पटेल ने कृष्ण बल्लभ बाबू को और कुछ कहने से पहले ही कहा कि कृष्ण बल्लभ साठी की ज़मीन वापस करनी होगी। कृष्ण बलभ बाबू ने जवाब दिया &#8220;साठी कि ज़मीन कभी वापस नहीं होगी।“ सरदार गुस्से से गुर्राते हुए बोले &#8220;क्यों?&#8221; कृष्ण बल्लभ बाबू का जवाब था आप केवल केंद्र सरकार के उपप्रधान मंत्री ही नहीं अपितु सारे देश के और कांग्रेसजनों की इज़्ज़त के संरक्षक भी हैं। बिना सुने आपके द्वारा फाँसी की सजा नहीं होनी चाहिए। सरदार ने शांतिपूर्वक जब सारे कागज़ात देखे और कृष्ण बल्लभ बाबू ने बिहार सरकार के निर्णय पर जो सफाई दी उससे सरदार पटेल पूर्णरूपेण संतुष्ट हुए। उलटे जिन लोगों ने चार्ज लगाया था उन्हीं के ऊपर सरदार पटेल ने अपनी नाराज़गी जाहिर किया। सरदार पटेल के आग्रह पर उनकी राय के अनुसार साठी ज़मीन के बारे में कानून बना। लेकिन जैसा कृष्ण बल्लभ बाबू ने कहा था वह कानून कोर्ट द्वारा रद कर दिया गया। उक्त घटना से उनके सख्त प्रशासक और नीडर राजनेता होने का प्रमाण साबित होता है। </p>
<p>जब-जब बिहार को विपत्ति का सामना करना पड़ा कृष्ण बल्लभ बाबू ने आगे बढ़ कर कुशल नेतृत्व प्रदान किया। बाढ़ से उत्पन्न परिस्थिति, भयंकर भूकंप या फिर 1966-67 के भयंकर अकाल की परिस्थिति में कृष्ण बल्लभ बाबू ने श्री जय प्रकाश नारायण की अध्यक्षता में सक्षम लोगों के साथ एक केंद्रीय सहायता समिति बना कर चारो ओर से स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकारों से सहायता लेकर बिहार की जनता को भीषण दुर्भिक्ष से बचाया। जब वे मंत्री नहीं थे तब बिहार निर्माता कोष समिति बनाकर राशि संग्रह कर राजेंद्र बाबू, श्री बाबू और अनुग्रह बाबू की याद में जनता की सेवा हेतु संस्थाओं को जन्म दिया। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू ने यो तो सारे बिहार की सेवा आजीवन की, जिसके लिए वे बराबर याद किये ही जायेंगें- छोटानागपुर जहां आदिवासी, हरिजन एवं पिछड़े जातियों का ही बाहुल्य है वहां के मूल निवासी सबसे गरीब लेकिन जहां ज़मीन के नीचे अतः खनिज पदार्थ भरा पड़ा है और उससे सारा देश लाभान्वित हो रहा है, कृष्ण बल्लभ बाबू आजीवन इन गरीबों की सेवा करते रहे। भिन्न-भिन्न संस्थाओं के माध्यम से सेवा तो करते ही थे, उनके मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार सरकार छोटानागपुर में कुछ महीने बैठा करती थे। लेकिन उनके मुख्यमंत्री पद से हट जाने के बाद से आज तक छोटानागपुर की हालात बाद से बदतर होती जा रही है। आज छोटानागपुर को बाध्य होकर अलग राज्य बनाने पर विचार हो रहा है। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू समाज सेवा और कांग्रेस के लिए सरदार पटेल, किदवई, इन्द्रभानु गुप्त जैसे लोगों की श्रेणी में आते हैं जो करोड़ों रुपये पार्टी फण्ड के लिए इकठ्ठा करते रहे लेकिन इसका उपयोग कभी भी अपने या अपने परिवार के लिए नहीं किया। जब कभी सौ दो सौ रुपये उनकी पत्नी घर खर्च के लिए उनसे मांगती थी -लाखों रुपये पारी फण्ड के होने के बावजूद उन्होनें नहीं दिया। कभी-कभी तो हमलोग भी उनके घर के निजी खर्च के लिए पैसे देते थे और पैसे आने पर वे उसे अवश्य लौट दिया करते थे। अपने राजनैतिक और सामाजिक जीवन के नज़दीकी लोगों से वे सख्त हिसाब लिया करते थे। श्री दीनानाथ पांडेय के गोलीकांड में मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री श्री बाबू के कहने पर मुझे छात्रों के बीच कार्य करने के लिए कुछ पैसे दिए गए। सभी खर्चे की विधिवत रसीद मैंने दी लेकिन मात्र इक्कीस रुपये का मैंने अन्यान्य खर्च हुए उस पर कृष्ण बल्लभ बाबू ने बड़ी कड़ाई से मुझसे हिसाब लिया। उनकी प्रतिदिन की आदत थी कि वे रात्रि में दिन भर का हिसाब रजिस्टर में दर्ज करने के बाद जांच कर अपना दस्तखत कर दिया करते थे।</p>
<figure id="attachment_4059" aria-describedby="caption-attachment-4059" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg" alt="" width="640" height="473" class="size-full wp-image-4059" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-300x222.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4059" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और अन्य गणमान्य लोग &#8211; साल: 1963</figcaption></figure>
<p>जब ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन और जंगल कटाई को लेकर राजा रामगढ और कृष्ण बल्लभ बाबू में भयंकर मुक़दमेबाज़ी हुई तब बिहार मंत्रिमंडल ने बार-बार स्वीकृति प्रस्ताव लाने के बजाय खर्च करने के लिए उन्हें इजाज़त दे दी। उनके निजी सचिव श्री राणा जो उनके जेल के समय के सहयोगी थे मुकदमा के खर्चे का हिसाब रखते थे। कुछ महीने का हिसाब उन्होंने नहीं दिया। मुक़दमे के ही सिलसिले में श्री लाल नारायण सिंह, श्री बजरंग सहाय श्री कृष्ण बल्लभ बाबू के साथ ट्रैन से दिल्ली जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने अपने निजी सचिव श्री राणा से पूछा कि हिसाब आप क्यों नहीं दे देते हैं? श्री लाल नारायण सिंह और श्री बजरंग सहाय के कहने पर उन्होंने श्री राणा से लौटकर रांची में हिसाब देने की बात मान ली। संयोगवश एक विशेष घटना घटी। उस दिन रांची में मैं शत्रुघ्न बाबू एवं कामता बाबू (प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार कामता प्रसाद सिंह काम जो डॉ. शंकर दयाल शर्मा, भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्यपाल के पिता थे) मौजूद थे। हिसाब माँगने पर श्री राणा ने कृष्ण बल्लभ बाबू को कहा &#8220;मैंने आपको धोखा दिया है और ट्रेज़री से रुपये निकाल कर निजी मद में खर्च कर दिया है।“ जब हमलोगों को मालूम पड़ा तब श्री राणा को सबसे पहले पकड़ा गया। श्रीबाबू ने मुख्य सचिव श्री एल.पी.सिंह को बुला कर इस सम्बन्ध में राय ली। श्री एल.पी.सिंह ने सही राय दी कि जितनी राशि राणा ने ट्रेज़री से नाजायज़ ढंग से निकाली है उतनी राशि पहले जमा कर दी जाए अन्यथा विरोधी लोग बवाल पैदा करेंगें। कृष्ण बल्लभ बाबू के कुछ समर्थकों ने रुपये लेकर जमा किया एवं राणा से उतना क़र्ज़ के रूप में हैण्ड नोट लिखवा लिया ताकि पीछे धोखा न दे। बात यहीं दब गयी। पटना ट्रेज़री कोषागार का लगातार चार दिनों तक तात्कालिक ज़िलाधिकारी ने रात दिन परिश्रम कर एक-एक कागज़ का मुआयना किया। लेकिन श्री राणा द्वारा निकाली गयी राशि का कोई सुराग नहीं मिला। </p>
<p>1967 में महामाया सरकार पांच व्यक्तियों पर मेरे समेत पांच जांच कमीशन बैठाई। सी.बी.आई. के डी.आई.जी. इंचार्ज थे। कमीशन के फैसले के बाद डी.आई.जी. ने मुझसे कहा लगभग सारे देश में विशेष कर राजनीतिज्ञों पर मैं जांच करता रहा हूँ लेकिन कृष्णा बल्लभ सहाय जैसा ईमानदार व्यक्ति बिरले मिला क्योंकि इस व्यक्ति के पास करोड़ों रुपये का लिखित हिसाब 1946 से अब तक मिला। इसके अतिरिक्त भी पार्टी फंड का पैसा उन्होंने अपने और अपने परिवार के किसी कार्य में नहीं लगाया। बाकी लोगों के हिसाब का तो पता नहीं चलता है कि राजनीतिज्ञ कैसे खर्च करते हैं।  कृष्ण बल्लभ बाबू अपने जीवन में राजनीती में रहने वाले गरीब कार्यकर्ताओं, जो लोग मर जाते उनकी विधवा या उनके आश्रितों के लिए एक अभिभावक के रूप में हमेशा मदद किया करते थे। </p>
<p>श्री बाबू की मृत्यु के बाद हम सब लोगों ने पंडित विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री बनाने में बहुत ही मेहनत की। लेकिन पंडित झा ने बिलकुल सौ प्रतिशत झूठा षड्यंत्र रच कर पूरे कागज़ का पोथी बनाकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथ में दे दिया कि मैं उन्हें मछली में विष दे कर मारने का षड्यंत्र रचा हूँ। मुझ समेत 36 लोगों को मुजरिम बना दिया गया। पंडित नेहरू ने आई.बी. इंटेलिजेंस के तात्कालिक निदेशक श्री मल्लिक द्वारा जांच करवाई। डी.आई.जी. श्री शुक्ल जांच अधिकारी बनाये गए। चार दिनों तक मुझसे पूछताछ की गयी। प्रधानमंत्री जी को भी मैंने सारी बातें बताई। श्री मल्लिक की ही रिपोर्ट पर पंडित विनोदानंद झा को पंडित नेहरू ने मुख्यमंत्री पद से हटाया और बाद में श्री कृष्ण बल्लभ बाबू मुख्यमंत्री बने। जब मुझ पर पंडित विनोदानंद झा ने षड्यंत्र का मुकदमा किया, तब मैंने एक बार कृष्ण बल्लभ बाबू की आँखों में आंसू गिरते हुए देखा था। मैंने उनसे कहा कि यदि वे मेरी वजह से विनोदानंद झा के सामने झुके, तब मैं अपना प्राण त्याग दूंगा। मैंने कहा कि ईश्वर पर मुझे पूरा भरोसा है और विनोदानंद झा स्वयं मुख्यमंत्री पद से हटाये जायेगे और हुआ भी वही। श्री मल्लिक ने जांच कर एक पत्र पंडित नेहरू को दिया कि पंडित विनोदानंद झा जैसे व्यक्ति को एक दिन भी मुख्यमंत्री पद पर रखना खतरनाक है। तात्कालिक गृह मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री और श्री सत्येंद्र बाबू स्वयं इन बातों से वाकिफ थे।&#8221;</p>
<p><strong>अख़बार का कतरन बिहार के लौह पुरुष श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के पौत्र राजेश सहाय के ब्लॉग के सौजन्य से &#8211; राजेश सहाय संभवतः बिहार के किसी भी राजनेता के वंशज होंगे जिन्होंने अपने पूर्वज का दस्तावेजों को इस कदर सहेज कर रखें हैं। आपको मौका मिले तो अवश्य भ्रमण करें </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar">शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जब &#8216;समाजवादी&#8217; मुलायम सिंह यादव मन ही मन बुदबुदाए: &#8220;जाओ अपर्णा बहु !!! अपनी जिंदगी जी लो, अपनी पहचान बना लो&#8230;..&#8221;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/mulayams-daughter-in-law-joins-bjp</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Jan 2022 08:21:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[aparna]]></category>
		<category><![CDATA[mulayamsinghyadav]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[pradesh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लखनऊ / दिल्ली : अगर राजनीतिक दृष्टि से देखा जाय तो 2014 आम चुनाव के बाद &#8220;घर वापसी&#8221; और &#8220;घर विघटन&#8221; कहीं हुआ है तो पहला मध्य प्रदेश के राजा सिंधिया के घर में और फिर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के घर में। माधव राव सिंधिया के पुत्र राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/mulayams-daughter-in-law-joins-bjp">जब &#8216;समाजवादी&#8217; मुलायम सिंह यादव मन ही मन बुदबुदाए: &#8220;जाओ अपर्णा बहु !!! अपनी जिंदगी जी लो, अपनी पहचान बना लो&#8230;..&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लखनऊ / दिल्ली : अगर राजनीतिक दृष्टि से देखा जाय तो 2014 आम चुनाव के बाद &#8220;घर वापसी&#8221; और &#8220;घर विघटन&#8221; कहीं हुआ है तो पहला मध्य प्रदेश के राजा सिंधिया के घर में और फिर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के घर में। माधव राव सिंधिया के पुत्र राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने &#8216;पैतृक (पिता तक लें) राजनीतिक पार्टी को तिलांजलि देकर अपनी राजनीतिक भविष्य को संवारने के लिए &#8216;दादी&#8217; और &#8216;बुआ&#8217; की राजनीतिक पार्टी &#8211; भारतीय जनता पार्टी &#8211; में शरण ले लिए। कांग्रेस पार्टी के प्रति उनका &#8216;प्रेम&#8217;, &#8216;सम्मान&#8217;, &#8216;मित्रता&#8217;, &#8216;बंधन&#8217; &#8216;निबंधन&#8217; सब दर किनार हो गया और वे &#8216;मंत्री पद के साथ भाजपा&#8217; के हो गए। रातो-रात उनके समर्थक जो उस सूर्यास्त तक &#8216;कांग्रेस के लिए &#8216;ताली&#8217; ठोकते थे, अगले सूर्योदय में भाजपा के लिए &#8216;ताली&#8217; ठोकने लगे। आज राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में नागरिक उड्डयन मंत्री हैं और हवाई जहाज उड़ा रहे हैं। जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद आज भी भारत के अनेकानेक जमींदारों, राजाओं, महाराजाओं के वंशज राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीतिक छवि को देखकर कुंठित हो रहे हैं। सभी सोच रहे हैं &#8220;सच में !!! कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली।&#8221; खैर। महाराजाधिराज दरभंगा भी स्वर्ग से देखते होंगे तो मन मलिन हो जाता होगा &#8211; इतनी संपत्ति दिए, लेकिन राजनीतिक छवि दरभंगा म्युनिसिपलिटी में भी नहीं बना सका। </strong></p>
<p>राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया भारतीय राजनीतिक अखाड़े का महज एक दृष्टान्त हैं। यह दृष्टान्त आने वाले समय में इस बात का भी गवाही देगा कि &#8216;सत्ता और सिंघासन&#8217; के लिए सब कुछ क्षम्य है। अब लोग भी उस मुहाबरे को भूल गए हैं जिसमें कहा जाता था कि &#8216;एवरीथिंग इज फेयर इन लव एंड वॉर&#8217; &#8211; अब तो &#8216;एवरीथिंग इज फेयर फॉर सत्ता एंड सिंघासन&#8217; &#8211; और इस बात को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की छोटी बहु श्रीमती अपर्णा यादव &#8216;साईकिल&#8217; को पंचर कर &#8216;कमल&#8217; को हाथ में लेकर चलना द्योतक है । कल ही तो, दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में एक और जहाँ &#8216;साईकिल&#8217; गिरी पड़ी दिखी थी, देश के अख़बारों, टीवी चैनलों और इंटरनेट पर श्रीमती अपर्णा यादव छायी हुयी थी। बीजेपी में शामिल होने से पूर्व अपर्णा यादव कहती है: &#8220;मैं प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों, सिद्धांतों से बहुत प्रभावित है।&#8221; कोई &#8220;ससुर&#8221; कैसे सुन सकता है अपनी बहु के मुख से इस तरह की बातें। खैर, राजनीति में कुछ भी समझ पाना बहुत मुश्किल है। वैसे जो मुलायम सिंह यादव को जानते हैं, वे सभी मुलायम सिंह यादव की वर्तमान राजनितिक पीड़ा को भी समझते होंगे। जिस समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की गलियों में, खेत-खलिहानों में लेकर आगे बढे, आज छत-विछत हो रहा है। अंततः मुलायन सिंह यादव मन ही मन कह ही दिए होंगे: &#8220;जाओ बहु !!! अपना जीवन ख़ुशी-ख़ुशी जी लो, परिवार के सभी सदस्य एक-एक पार्टी पकड़ लो। सबों का कल्याण हो।&#8221;</p>
<p><strong>वैसे, मुलायम सिंह यादव के करीबी का कहना है कि &#8220;नेताजी परिवार की वर्तमान स्थिति से बहुत क्षुब्ध थे। उन्हें इस बात का अंदेशा था, खासकर जब उनके छोटे पुत्र प्रतीक यादव की पत्नी और उनकी छोटी बहू अपर्णा यादव राम मंदिर के निर्माण के लिए 11 लाख रुपये का सहयोग की थी। प्रतीक &#8216;नेताजी&#8217; की दूसरी पत्नी श्रीमती साधना गुप्ता के पुत्र हैं। प्रतीक और अपर्णा दस वर्ष पूर्व दाम्पत्य जीवन की शुरुआत किये थे। लेकिन नेताजी कुछ बोल नहीं सकते थे। आखिर सबों को स्वतंत्रता है। अपर्णा यादव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह काफी शिक्षित है। वे उत्तर प्रदेश शासन की वरिष्ठ अधिकारी श्री अरविन्द सिंह बिष्ट की पुत्री हैं तथा यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनचेस्टर से इंटरनेशल रिलेशन्स एंड पॉलिटिक्स में स्नातकोत्तर हैं।&#8221; सूत्र का यह भी कहना है कि &#8216;कैंट से टिकट नहीं मिलना अथवा अखिलेश यादव द्वारा नहीं देना, तो महज एक बहाना है। सत्य तो यह है कि अपर्णा यादव की सोच मुलायम सिंह यादव के परिवार की सोच से बहुत भिन्न और बेहतर है, वर्तमान समय के अनुकूल है। फिर तो स्वाभाविक भी है &#8211; अपना रास्ता चुनो, आगे बढ़ो। वैसे &#8216;नेताजी&#8217; (मुलायम सिंह यादव) भी तो वर्षों पहले वही किये जब समाजवादी पार्टी को खड़ा करने वाला अमर सिंह को परिवार-पुत्र मोह में बहार का रास्ता दिखा दिए थे।&#8221;</strong></p>
<p><strong>बहरहाल, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक समीक्षक और पुस्तक लेखक चंद्र प्रकाश झा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को &#8216;उंगली&#8217; पर गिने हैं। उनके कार्यों को आंके हैं और यह भी लिखे हैं कि &#8216;आगे कौन?&#8221; यानी वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को, वर्मन सरकार का कार्यों को वे &#8220;शक&#8221; के दायरे में रखे हैं जिसका हिसाब-किताब आगामी चुनाव में मतदाता निर्धारित करेंगे। </strong></p>
<p>चंद्र प्रकाश झा लिखित हैं: &#8220;भारत की राजनीतिक व्यवस्था में लोक सभा और विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री निर्वाचित नहीं किये जाते है। पर विभिन्न सियासी पार्टियों की तरफ से नई सरकार बनाने के उनके दावेदार अवाम के बीच इन चुनाव के परिणाम से भी पहले पेश करने का रिवाज-सा कायम हो गया है। ये रिवाज कब, कैसे शुरू हुआ इसके बारे में सर्वमान्य मत नहीं है। निर्विवादित तथ्य है कि ब्रिटिश हुक्मरानी से 15 अगस्त 1947 को भारत की सियासी आजादी के बाद देश में कांग्रेस के लंबे अरसे के लगभग एकछत्र राज में चुनावों में नई सरकार के प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पेश करने का रिवाज नहीं था। राजनीतिक दलों के लिए ऐसा करना भारत के मौजूदा संविधान के तहत जरूरी भी नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के प्रावधान के मुताबिक राज्यपाल, विधानसभा चुनावों में किसी पार्टी के बहुमत प्राप्त नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है। चुनाव चर्चा के आज के अंक में हम मुख्यमंत्री पद दावेदारों के चुनावी इतिहास और भविष्य की संभावनाओं का जायजा लेंगे।&#8221;<br />
भारत के गणराज्य घोषित होने के बाद उत्तर प्रदेश में अब तक 20 व्यक्ति मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इन 20 व्यक्तियों के अतिरिक्त, तीन व्यक्ति बहुत कम दिनों के लिए कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहे हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 19 मार्च 2017 से इस पद पर हैं। राज्य की चार बार मुख्यमंत्री रही सुश्री मायावती को सबसे ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री रहने का गौरव है। </p>
<figure id="attachment_3725" aria-describedby="caption-attachment-3725" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/parna.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/parna.jpeg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-3725" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/parna.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/parna-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/parna-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/parna-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3725" class="wp-caption-text">मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू भाजपा में शामिल, अब अपनी अलग पहचान होगी<br /></figcaption></figure>
<p>चंद्र प्रकाश झा कहते हैं: &#8220;बहुजन समाज पार्टी ( बसपा ) की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने विधान सभा का नया चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा की है। उन्होंने ये भी साफ कह दिया कि बसपा के नंबर दो समझे जाने वाले नेता सतीश चंद्र मिश्र भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसका यह मतलब नहीं है कि बहिन जी और बसपा ने नई सरकार बनाने की अपनी दावेदारी छोड़ दी है। ऐसा पहले हो चुका है बहिन जी चुनाव लड़े बिना ही बसपा की सरकार बनाकर मुख्यमंत्री बन गई।&#8221;</p>
<p>मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को नई दिल्ली के एक मध्यम वर्ग परिवार में हुआ था। उनके पिता, प्रभु दास, गौतम बुद्ध नगर में डाकघर कर्मचारी थे। उनके 6 पुत्र और 2 पुत्री हुई। उन्होंने 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कॉलेज से कला में स्नातक की,1976 में मेरठ विश्वविद्यालय से बीएड और 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की। राजनीति में आने से पहले वह दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षक थी। वह 1977 में दलित नेता कांशीराम ( अब दिवंगत) के सम्पर्क में आने पर उनके संगठन, डीएस 4 की पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गईं। मायावती ने पहला चुनाव 1984 में बसपा की स्थापना होने के बाद 1989 में बिजनौर लोकसभा सीट से लड़ा और वह सफल रही। </p>
<p>चंद्र प्रकाश झा लिखते हैं: &#8220;बहन जी की बात ही कुछ और है। वह एक अरसे से प्रधानमंत्री पद की भी दावेदार रही है। ये दीगर बात है कांग्रेस ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी और 1990 के दशक के मध्य में चुनावी गठबंधन का दौर शुरू होने पर केंद्र में नई सरकार बनने की सियासत में भूमिका निभानी वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के वामपंथी मोर्चा ( वामो) ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए बहन जी की दावेदारी कभी स्वीकार नहीं की। वह चार बार लोकसभा, तीन बार राज्यसभा , दो बार विधान सभा और दो बार राज्य विधान परिषद की भी सदस्य रह चुकी हैं।&#8221;</p>
<p>कांग्रेस ने भी यूपी विधानसभा में मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावेदार पेश नहीं किया है। मगर प्रियंका गांधी वढेरा मुख्यमंत्री पद की उसकी दावेदार मानी जाती है। उनके चुनाव लड़ने के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। उत्तर प्रदेश चुनाव के पार्टी टिकट की घोषणा के समय पूछने पर कि वह खुद चुनाव लड़ेंगी या नहीं तो उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया। वैसे वह कई बार कह चुकी हैं उनकी पार्टी चाहेगी तो वह किसी भी जिम्मेदारी के लिए हमेशा आगे खड़ी रहेंगी।</p>
<p>12 जनवरी 1972 को दिल्ली में पैदा हुई प्रियंका अभी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय महासचिव हैं। वह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) प्रमुख सोनिया गांधी की दूसरी संतान है। उनकी दादी इंदिरा गांधी और नाना जवाहर लाल नेहरू भी भारत के प्रधानमंत्री रहे। उनके दादा फिरोज गांधी, उत्तर प्रदेश से ही सांसद थे। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा नई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल और कॉन्वेंट ऑफ़ जीसस एंड मैरी से प्राप्त की। दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातक हैं प्रियंका शौकिया रेडियो संचालक है। उन्होंने यूपी में अपनी माँ और छोटे भाई राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में नियमित चुनावी दौरा किया है। उनका विवाह रॉबर्ट वाड्रा से हुआ। दोनों के रेहान और मिराया नाम के दो बड़े बच्चे हैं।</p>
<p>अखिलेश सिंह यादव पर लिखते हुए चंद्र प्रकाश झा कहते हैं: &#8220;समाजवादी पार्टी ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावेदार औपचारिक रूप से पेश नहीं किया है। लेकिन लगभग तय सी बात है कि सपा के नई सरकार बनाने की स्थिति में आने पर उसके नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही मुख्यमंत्री बनेंगे। इस बार का विधानसभा चुनाव लड़ने के बारे में उनका स्पष्ट जवाब नहीं मिला है। वह कुशल राजनीतिज्ञ हो चुके है। इसलिए अपने पत्ते खोलने के बजाय सिर्फ यह कहते रहे हैं उनकी पार्टी तय करेगी कि वो चुनाव लड़ेंगे या नहीं। </p>
<figure id="attachment_3726" aria-describedby="caption-attachment-3726" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/12.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/12.jpeg" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-3726" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/12.jpeg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/12-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/12-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/12-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3726" class="wp-caption-text">मुलायम सिंह यादव के छोटे पुत्र प्रतीक, प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव और ससुर</figcaption></figure>
<p>इटावा जिले के सैफई गांव में 1 जुलाई 1973 को पैदा हुए अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और उनकी पहली पत्नी मालती देवी के पुत्र हैं। उन्हें प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री रहने का गौरव प्राप्त है। वह लगातार तीन बार सांसद भी रह चुके हैं। उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा का नेतृत्व किया था। तब सपा ने विधान सभा की 224 सीटें जीती थी। उन्होंने 15 मार्च 2012 को प्रदेश के मुख्यमंत्री की शपथ ली थी। उनका विवाह डिम्पल यादव से 24 नवंबर 1999 को हुआ था जो सांसद रह चुकी हैं। पर वह 2019 में लोकसभा चुनाव हार गई थी। दोनों के तीन बच्चे हैं। अखिलेश ने राजस्थान मिलिट्री स्कूल, धौलपुर से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने मई 2009 में लोकसभा की फिरोजाबाद सीट पर उपचुनाव में निकटतम प्रतिद्वंद्वी एवं बसपा प्रत्याशी एसपीएस बघेल को हराया था। बाद के आम चुनाव में वह फिरोजाबाद और कन्नौज की दो सीटों से जीते। उन्होंने कन्नौज सीट पास रखी।</p>
<p>बहरहाल, वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में वे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। भाजपा ने प्रदेश के 22वें एवं मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर शहर से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। पाँच बार गोरखपुर लोकसभा सीट जीत चुके है। योगी जी गोरखपुर के गोरखनाथ मठ के महन्त (मुख्य पुजारी) और हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी है। वह 12 सितंबर, 2014 को अपने धर्मपिता महंत अवैद्यनाथ के निधन के बाद महंत बने थे। योगी जी का जन्म 5 जून 1972 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिला के पनचूर गाँव में हुआ था। उनके पिता आनंद सिंह बिष्ट फॉरेस्ट रेंजर थे।चार भाईयों और तीन बहनों में वह दूसरे नंबर पर है। वह हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपना घर-बार छोड़ अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन में शामिल हो गए। उसी दौरान वह महंत अवैद्यनाथ के शिष्य हो गए। नाथ संप्रदाय के सन्यासी की दीक्षा लेने के बाद उनका नाम अजय सिंह बिष्ट से बदलकर योगी आदित्यनाथ कर दिया गया। वह अपने पैतृक गाँव जाते रहे हैं जहां उन्होंने 1998 में स्कूल खोला था। </p>
<p>खैर, परिणाम तो आने वाला समय बताएगा, इधर, न्यूयॉर्क टाइम्स ने योगी जी को 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना है। इंडिया टुडे ने अगस्त 2020 के अपने सर्वे में योगी जी को सर्वोत्तम मुख्यमंत्री माना था। क्रिस्टोफे जेफ़रलौट ने अपनी किताब, मोदीज इंडिया : हिन्दू नेशनलिज़्म एण्ड द राइज ऑफ एथनिक डेमोकेसी‘ में लिखा है कि योगी जी उसी हिन्दुत्व सियासत के वाहक हैं जिसके तहत महंत की अगुवाई में 22 दिसंबर 1949 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद पर कब्जा कर वहाँ भगवान राम के बाल्य रूप की प्रतिमा स्थापित कर दी थी। योगी जी और महंत अवैद्यनाथ उसी हिन्दू महासभा के साथ थे जिसमें विनायक सावरकर भी रहे थे। दोनों ही हिन्दू महासभा के प्रतिनिधि के रूप में लोकसभा सदस्य भी रहे। 1980 के दशक में भाजपा के राम मंदिर आंदोलन में खुलकर शामिल हो जाने के बाद महंत अवैद्यनाथ 1991 के आम चुनाव में भाजपा के साथ हो लिए। योगी आदित्यनाथ 12वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुने गए। तब वह 26 बरस के सबसे युवा सांसद थे। वह 1998 ,1999 , 2004 , 2009 और 2014 में लगातार पाँच बार लोकसभा के लिए चुने गए। </p>
<p>लेकिन भाजपा से योगी आदित्यनाथ के संबंध हमेशा बहुत अच्छे नहीं रहे है। 2002 में उन्होंने हिन्दू महासभा की तरफ से गोरखपुर सीट पर राधा मोहन दास अग्रवाल को खड़ा कर दिया जिनसे तत्कालीन भाजपा सरकार में केबिनेट मंत्री शिव प्रताप शुक्ला परास्त हो गए। मार्च 2010 में योगी जी ने लोक सभा में महिला आरक्षण विधेयक का अपनी ही पार्टी के ह्विप का उल्लंघन किया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी जी ने गृह और राजस्व समेत 26 विभाग अपने पास रखे। उनकी सरकार बनने पर 2017 में ‘ राजनीति से प्रेरित ‘ करीब 20 हजार पुलिस मामले वापस ले लिए जिनमें कई खुद उनके खिलाफ थे। </p>
<p>भारत के गणराज्य घोषित होने तक उत्तर प्रदेश में निर्दलीय मुहम्मद अहमद सईद खान 3 अप्रैल 1937 से 16 जुलाई 1937, कांग्रेस के गोविंद वल्लभ पंत 17 जुलाई 1937 से 2 नवंबर 1939 और फिर 1 अपैल 1946 से 25 जनवरी 1950 तक मुख्यमंत्री रहे थे। </p>
<p>* भारत के गणराज्य घोषित होने के बाद गोविंद वल्लभ पंत 26 जनवरी 1950 से 27 दिसम्बर 1954</p>
<p>* कांग्रेस के सम्पूर्णानंद (वाराणसी शहर दक्षिण) 28 दिसम्बर 1954 से 9 अपैल 1957 और 10 अप्रैल 1957 से 6 दिसम्बर 1960, </p>
<p>* कांग्रेस के चंद्रभानु गुप्ता ( रानीखेत ) 7 दिसंबर 1960 से 14 मार्च 1962 और 14 मार्च, 1962 से 1 अक्टूबर 1963, </p>
<p>* कांग्रेस की सुचेता कृपलानी (मेंधवाल ) 2 अक्टूबर 1963 से 13 मार्च 1967 </p>
<p>* चंद्रभानु गुप्ता 14 मार्च 1967 से 2 अप्रैल 1967, </p>
<p>* भारतीय क्रांति दल के चरण सिंह 3 अप्रैल 1967 से 25 फ़रवरी 1968 , </p>
<p>* चंद्रभानु गुप्ता 26 फ़रवरी 1969 से 17 फ़रवरी 1970, </p>
<p>* चरण सिंह (छपरौली) 18 फ़रवरी 1970 से 1 अक्टूबर 1970, </p>
<p>* कांग्रेस के त्रिभुवन नारायण सिंह 18 अक्टूबर 1970 से 3 अप्रैल 1971, </p>
<p>* कांग्रेस के कमलापति त्रिपाठी (छंदरौली) 4 अप्रैल 1971 से 12 जून 1973 , </p>
<p>* कांग्रेस के हेमवती नंदन बहुगुणा ( बारा ) 8 नवम्बर 1973 से 29 नवम्बर 1975) </p>
<p>* कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी ( काशीपुर) 21 जनवरी 1976 से 30 अप्रैल 1977, </p>
<p>* जनता पार्टी के राम नरेश यादव 23 जून 1977 से 27 फ़रवरी 1979, </p>
<p>* बनारसी दास ( हापुड़) 28 फ़रवरी 1979 से 17 फ़रवरी 1980, </p>
<p>* कांग्रेस के विश्वनाथ प्रताप सिंह (तिंदवार) 9 जून 1980 से 18 जुलाई 1982, </p>
<p>* श्रीपति मिश्र 19 जुलाई 1982 से 2 अगस्त 1984, </p>
<p>* नारायणदत्त तिवारी ( काशीपुर) 3 अगस्त 1984 से 24 सितम्बर 1985</p>
<p>* कांग्रेस के वीर बहादुर सिंह (पनियारा) 24 सितम्बर 1985 से 24 जून 1988, </p>
<p>* नारायणदत्त तिवारी 25 जून 1988 से 5 दिसम्बर 1989, </p>
<p>* जनता दल के मुलायम सिंह यादव (जसवंतनगर) 5 दिसम्बर 1989 से 24 जून 1991, </p>
<p>* भाजपा के कल्याण सिंह ( अतरौली) 24 जून 1991 से 6 दिसम्बर 1992, </p>
<p>* सपा के मुलायम सिंह यादव (जसवंतनगर ) 4 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1995, </p>
<p>* बसपा की मायावती 3 जून 1995 से 18 अक्टूबर 1995 और फिर 21 मार्च 1997 से 21 सितम्बर 1997, </p>
<p>* कल्याण सिंह , 21 सितम्बर 1997 से 12 नवम्बर 1999, </p>
<p>* भाजपा के रामप्रकाश गुप्त 12 नवम्बर 1999 से 28 अक्टूबर 2000, </p>
<p>* भाजपा के राजनाथ सिंह ( हैदरगढ़) 28 अक्टूबर 2000 से 8 मार्च 2002, </p>
<p>* मायावती 3 मई 2002 से 29 अगस्त 2003, </p>
<p>* मुलायम सिंह यादव 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007, </p>
<p>* मायावती 13 मई 2007 से 7 मार्च 2012, </p>
<p>* सपा के अखिलेश यादव ( विधान परिषद सदस्य) 15 मार्च 2012 से 19 मार्च 2017 तक मुख्यमंत्री रहे। </p>
<p>भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 19 मार्च 2017 से इस पद पर काबिज हैं। गौरतलब है कि भाजपा ने उन्हें या अन्य किसी को भी 2017 के चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावेदार घोषित नहीं किया था । कहा जाता है उस चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत के बाद मोदी जी, योगी जी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने तत्कालीन रेल राज्य मंत्री और पूर्वी उत्तर प्रदेश गाजीपुर के लोकसभा सदस्य मनोज सिन्हा (अभी जम्मू–कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर ) की तरफदारी की थी। लेकिन आरएसएस के जोर पर मोदी जी की नहीं चली और योगी जी मुख्यमंत्री बन गए । बहरहाल , देखना है कि हिंदुस्तान में आबादी के हिसाब से इस सबसे बड़े राज्य के नए चुनाव के बाद नया मुख्यमंत्री बनने का मौका किसे मिलता है।</p>
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