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	<title>widows Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>न्याय, गरिमा और आर्थिक शक्ति​ विषय के साथ ​भारत में विधवाओं को हमें सशक्त करना होगा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 May 2026 02:54:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[social justice]]></category>
		<category><![CDATA[widowhood]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: जनवरी को छोड़े। फरवरी महीने के 14 तारीख को जिस कदर विश्व के लोग &#8211; महिला, पुरुष, बच्चे &#8211; &#8216;प्यार का त्यौहार&#8217; (वेलेंटाइंस डे) मनाते हैं, मई के महीने में दूसरे रविवार को वैश्विक स्तर पर &#8216;मातृ दिवस&#8217; मनाते हैं, इसके अलावे संयुक्त राष्ट्र के निर्णयानुसार प्रत्येक वर्ष 365 दिनों में 218 दिनों [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: जनवरी को छोड़े। फरवरी महीने के 14 तारीख को जिस कदर विश्व के लोग &#8211; महिला, पुरुष, बच्चे &#8211; &#8216;प्यार का त्यौहार&#8217; (वेलेंटाइंस डे) मनाते हैं, मई के महीने में दूसरे रविवार को वैश्विक स्तर पर &#8216;मातृ दिवस&#8217; मनाते हैं, इसके अलावे संयुक्त राष्ट्र के निर्णयानुसार प्रत्येक वर्ष 365 दिनों में 218 दिनों को मानव जीवन, इतिहास, पर्यावरण और अन्य के नाम पर मानते हैं ताकि विश्व में जागरूकता बनी रहे; क्या &#8216;विधवा दिवस&#8217; के प्रति हम जागरूक हो पाए हैं? शायद नहीं। आइये, आज समय आ गया है कि हमें भारत की नहीं, वैश्विक स्तर पर &#8216;विधवाओं&#8217;, जो सिर्फ पति हीन होती हैं, संतानहीन नहीं; के नाम पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित एक भारतीय की पहल को भारत के 28 राज्यों, आठ केंद्र शासित प्रदेशों के2,67,000 ग्राम पंचायतों में रहने वाले लोगों में जागरूकता फैलाएं, ताकि जीवन के अंतिम वसंत में एक पति हीन माँ, यानी विधवा, सम्मान के साथ जी सके।</strong></p>
<p><a href="https://youtu.be/WyEJFEeLH3o">#लूम्बा #फाउंडेशन के संस्थापक और #लंदन के #हॉउस #ऑफ़ #लॉर्ड्स के सदस्य #लार्ड #राज #लुम्बा</a></p>
<blockquote><p>&#8220;न्याय, गरिमा और आर्थिक शक्ति&#8221; &#8211; 23 जून, 2026 को संपन्न होने वाले अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस का विषय (थीम) है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में औसतन 14 महिलाओं में एक विधवा होने के बाद भी, आज आज़ादी के 80 साल तक हम इन विधवाओं को सच में न्याय, गरिमा दे पाए या उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत कर पाए जिससे वे परिवार और समाज के सामने बिना अपना हाथ फैलाये अपने जीवन की शेष साँसे ले सकें? अगर सरकारी स्तर पर देखें तो प्रश्न उठना लाजिमी है। लेकिन जब निजी क्षेत्र के लोकोपकारकों को देखते हैं तो ऐसा संभव कर पाना &#8216;कठिन&#8217; नहीं दीखता।</p></blockquote>
<p>अगर वैश्विक स्टार पर देखें तो विश्व के किसी भी देशों की तुलना में भारत में विधवाओं की संख्या सबसे अधिक है। इतना ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में पति हीन महिलाओं की जो स्थिति है, चाहे वह सामाजिक हो, पारिवारिक हो, शैक्षिक हो, आर्थिक हो, न्यायिक हो, की तुलना में भारत की विधवाओं की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। </p>
<figure id="attachment_7746" aria-describedby="caption-attachment-7746" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1.jpg" alt="" width="2033" height="1313" class="size-full wp-image-7746" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1-300x194.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1-1024x661.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1-768x496.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-6-1-1536x992.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7746" class="wp-caption-text">लार्ड राज लूम्बा और उनकी पत्नी</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से बात करते हुए वैश्विक स्तर पर स्थापित <strong>लूम्बा फाउंडेशन के संस्थापक और लन्दन के हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्य राज लूम्बा </strong>का कहना है: &#8220;भारत की विधवाओं की दयनीय स्थिति को जड़ से मिटाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं और कोशिश है कि हम भारत के सभी राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों में स्थित लगभग 2,67,000 ग्राम पंचायतों के माध्यम से प्रत्येक घरों में रहने वाली विधवाओं तक पहुंचूं और उनके जीवन के अंतिम वसंत में ही सही, उन्हें जीने और हंसने का वजह दे सकूँ। मैं उनके मृत पतियों को जीवित नहीं कर सकता हूँ, लेकिन अपनी सोच से, अपने क्रियाकलाप से उन्हें इस उम्र में भी अर्थ से सक्षम बना सका हूँ कि वे शेष जीवन जी सकें।&#8221;</p>
<p>अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस, हर साल 23 जून को मनाया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित एक विशेष दिन है। यह दिन लाखों विधवाओं और उनके आश्रितों द्वारा झेली जा रही गरीबी और अन्याय को दूर करने के लिए समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र जनगणना ब्यूरो का कहना है कि अमेरिका में 13 मिलियन से ज्यादा ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवनसाथी को खो दिया है, और इनमें से 11 मिलियन से ज्यादा महिलाएं हैं। अपने जीवनसाथी को खोना और फिर अकेला जीवन जीना कभी भी आसान नहीं होता। इसलिए हमारा, समाज का, परिवार का यह दायित्व है कि हम दुनिया भर की विधवाओं की स्थिति के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाएँ।</p>
<p><strong>वैश्विक स्तर पर, करीब 258 महिलाएं विधवा है और इसमें भारत का योगदान अधिक का है। आज देश की विधवाएं कई तरह की मुश्किलों का सामना कर रही हैं, और उन्हें ठीक से समझने और उनका समाधान करने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम उन इलाकों से जानकारी हासिल करें और समाधान का उपाय ढूंढें।</strong> </p>
<figure id="attachment_7747" aria-describedby="caption-attachment-7747" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4.jpg" alt="" width="2047" height="1356" class="size-full wp-image-7747" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-4-1536x1017.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7747" class="wp-caption-text">भारत की एक विधवा। तस्वीर: शिवनाथ झा</figcaption></figure>
<blockquote><p>लार्ड राज लूम्बा कहते हैं: &#8220;हमारी कोशिश है कि हम अपने स्तर पर लाखों ऐसी विधवाओं के दरवाजे तक पहुंचें और उनकी समस्याओं का समाधान करें। हमारी कोशिश यह भी है कि भारत के राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित करीब 800 से अधिक जिलाधिकारियों और हज़ारों अन्य अधिकारियों के माध्यम से, प्रदेशों के समाज कल्याण मंत्रालयों, बाल विकास मंत्रालयों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में, प्रखंडों में, अंचलों में रह रही ऐसी माताओं को ढूंढे और फिर एक स्थायी रूप से उन्हें सामाजिक न्याय के साथ-साथ गरिमा के साथ जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करें। मेरा मानना है कि मानवीयता के लिए यह कार्य सबसे बड़ा समर्पण होगा।&#8221;</p></blockquote>
<p>ज्ञातव्य हो कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 दिसंबर, 2010 को 23 जून को आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के रूप में अपनाया। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस 2005 से ही लूम्बा फाउंडेशन द्वारा मनाया जा रहा था। राजिंदर लूम्बा, जो यूनाइटेड किंगडम में हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्य हैं, ने विकासशील देशों में विधवा होने पर महिलाओं को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उन पर काम करने के लिए लूम्बा फाउंडेशन की स्थापना की। उन्हें इस फाउंडेशन को शुरू करने की प्रेरणा तब मिली, जब उन्होंने देखा कि उनकी माँ को 1954 में 37 साल की उम्र में विधवा होने के बाद किन-किन मुश्किलों से गुज़रना पड़ा था। </p>
<figure id="attachment_7748" aria-describedby="caption-attachment-7748" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5.jpg" alt="" width="2047" height="1356" class="size-full wp-image-7748" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-5-1536x1017.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7748" class="wp-caption-text">प्रेरणास्रोत: ​लार्ड राज लूम्बा की माँ श्रीमती पुष्पा वती लुम्बा (दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>2005 में शुरू होने के बाद, लूम्बा फाउंडेशन ने संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त करने के लिए पाँच साल का एक वैश्विक अभियान चलाया। इसके परिणामस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस को एक वार्षिक &#8216;वैश्विक कार्य दिवस&#8217; के रूप में अपनाने का निर्णय लिया। चूंकि किसी भी रूप में किसी प्रियजन को खोना कठिन और दुखद होता है, इसलिए इस दिन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया भर की विधवाओं को उस बेहद कठिन समय से गुज़रने के लिए ज़रूरी सहायता मिले। क्योंकि कई देशों में, लोग—विशेषकर महिलाएँ जो विधवा हो जाती हैं—ऐसी स्थितियों में फँस जाती हैं जहाँ उन्हें विरासत के अपने अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कुछ ऐसी संस्कृतियाँ भी हैं, जहाँ विधवाओं को शापित माना जाता है या उन्हें जादू-टोने से जोड़कर देखा जाता है। यह गलत सोच उन्हें उनके समुदाय से, और यहाँ तक कि उनके अपने बच्चों से भी अलग कर देती है।</p>
<p><strong>लार्ड लूम्बा कहते हैं: &#8220;हमने यह समझा कि विधवा होना न केवल एक व्यक्तिगत दुख है, बल्कि यह एक वैश्विक मानवाधिकार का मुद्दा भी है &#8211; एक ऐसा मुद्दा जो गहरी जड़ों वाली सांस्कृतिक प्रथाओं, कानूनी बहिष्कार और सामाजिक उपेक्षा के कारण बना हुआ है। इस सच्चाई को बदलने के लिए अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास की जरूरत है। इस बदलाव की शुरुआत करने के लिए, फाउंडेशन ने 26 मई 2005 को अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस की शुरुआत की, और 23 जून &#8211; जिस तारीख को 1954 में मेरी माँ, श्रीमती पुष्पा वती लूम्बा विधवा हुई थीं &#8211; को वैश्विक कार्रवाई दिवस के रूप में घोषित किया। हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में घोषित इस अभियान का उद्देश्य लाखों विधवाओं के अनदेखे दुखों को दुनिया के सामने लाना और दुनिया भर की सरकारों, गैर-सरकारी संस्थाओं, व्यवसायों और समुदायों को इस दिशा में सक्रिय करना था।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_7750" aria-describedby="caption-attachment-7750" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8.jpg" alt="" width="2033" height="1313" class="size-full wp-image-7750" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8-300x194.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8-1024x661.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8-768x496.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/W-8-1536x992.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7750" class="wp-caption-text">भारत की एक विधवा। तस्वीर: शिवनाथ झा</figcaption></figure>
<p>लार्ड लूम्बा कहते हैं: &#8220;अपनी शुरुआत से ही, अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस ने ज़ोर पकड़ा। 2005 में पहली बार यह दिवस लंदन, भारत, नेपाल, श्रीलंका, युगांडा और दक्षिण अफ्रीका में मनाया गया। अगले कुछ वर्षों में, फाउंडेशन ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जन-जागरूकता अभियान आयोजित किए, जिनमें कोफी अन्नान और सीनेटर हिलेरी क्लिंटन से लेकर योको ओनो, प्रिंस ऑफ़ वेल्स और चेरी ब्लेयर जैसी वैश्विक हस्तियों ने हिस्सा लिया। 22 दिसंबर 2010 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस को संयुक्त राष्ट्र के एक आधिकारिक वैश्विक दिवस के रूप में मान्यता दे दी &#8211; यह एक असाधारण परिणाम था जो फाउंडेशन के दृढ़ संकल्प और गैबॉन के नेतृत्व में सदस्य देशों के समर्थन से संभव हुआ। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, हरदीप सिंह पुरी का अटूट समर्थन अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में निर्णायक साबित हुआ।&#8221;</p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त पहला अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस 23 जून 2011 को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मनाया गया। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व, विभिन्न देशों के मंत्रियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने लॉर्ड लूम्बा और फाउंडेशन की अध्यक्ष, चेरी ब्लेयर के साथ एक सम्मेलन में हिस्सा लिया, जिसकी अध्यक्षता महासचिव की पत्नी, यू सून-टैक ने की। आज, हर साल 23 जून को, संयुक्त राष्ट्र की महिलाएं, सभी सदस्य देशों के लिए विधवाओं की दुर्दशा पर एक बयान जारी करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता मिलने के बाद से, फाउंडेशन एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका &#8211; लंदन ब्रिज और ट्राफलगर स्क्वायर से लेकर वाराणसी, नैरोबी और कोलंबो तक &#8211; विभिन्न जगहों पर कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया भर में जागरूकता फैलाने का काम लगातार कर रहा है। जमीनी स्तर के और राष्ट्रीय साझेदार रैलियों, सेमिनारों, व्यावसायिक सशक्तिकरण प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ इस दिन को मनाते हैं।</strong></p>
<p>अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस मनाने का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस बात को स्वीकार करना है कि विधवाएँ नीति निर्माताओं की नज़र में अब तक अनदेखी रह गई हैं । नीतियाँ आम नागरिकों, मज़दूरों, बेरोज़गार युवाओं और समाज के अन्य पीड़ितों पर केंद्रित होती हैं; हालांकि, नीति-निर्माण बैठकों में विधवाओं के बारे में विशेष रूप से कोई चर्चा भी नहीं की जाती है। इस तरह के उपेक्षापूर्ण रवैये का मतलब है कि 258 मिलियन से अधिक लोगों के मुद्दे अनसुलझे रखना। यदि देखा जाय तो &#8216;अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस&#8217; विधवाओं के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने के वैश्विक आंदोलन की धीरे-धीरे आधारशिला बन गया है, लेकिन आज भी जागरूकता की कमी है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/one-in-every-fourteen-women-in-india-is-a-widow">न्याय, गरिमा और आर्थिक शक्ति​ विषय के साथ ​भारत में विधवाओं को हमें सशक्त करना होगा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>काश !! विधवाओं के रक्षार्थ प्रधान मन्त्री &#8216;एक कानून&#8217; बना देते, हज़ारों विधवाएँ तो &#8216;राखी भी बाँधी थी&#8217; उन्हें</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Nov 2018 12:36:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>वृन्दावन / बनारस / नई दिल्ली : काशी &#8211; मथुरा &#8211; काशी &#8211; प्रयाग &#8211; वृन्दावन में अपने जीवन की अन्तिम साँसें गिनती हज़ारो विधवाएँ प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी की कलाईयों पर राखी बाँधती रहीं, उन्हें दुआएं देती रहीं, जीवन के अंतिम वसंत में भर-पेट भोजन और सुरक्षा मांगती रहीं, उनसे गुजारिश करती रहीं की [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>वृन्दावन / बनारस / नई दिल्ली  : काशी &#8211; मथुरा &#8211; काशी &#8211; प्रयाग &#8211; वृन्दावन में अपने जीवन की अन्तिम साँसें गिनती हज़ारो विधवाएँ प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी की कलाईयों पर राखी बाँधती रहीं, उन्हें दुआएं देती रहीं, जीवन के अंतिम वसंत में भर-पेट भोजन और सुरक्षा मांगती रहीं, उनसे गुजारिश करती रहीं की केन्द्र सरकार एक कानून बनाये  उनके कल्याणार्थ । लेकिन केन्द्र सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। शिव की नगरी बनारस से लेकर कृष्ण की नगरी मथुरा-वृन्दावन सहित देश की लगभग 3.60 करोड़ विधवाएं बहुत दुःखी है केन्द्र सरकार, कानून मन्त्री रविशंकर प्रसाद और माननीय प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी से। </p>
<p>पिछले कई वर्षों से वृन्दावन-मथुरा-काशी-प्रयाग की विधवाएं इस आशा और विस्वास से जी रहीं थीं एक इस सरकार की समय समाप्ति से पूर्व &#8220;दयावान&#8221; प्रधान मन्त्री उन विधवाओं की सुरक्षा व्यवस्था हेतु संसद में एक विधेयक लाकर कानून बनाएगी, ताकि अपने-अपने घरों से निर्वासित इन वृद्ध माताओं, विधवाओं को सहारा मिले, परन्तु ऐसा नहीं हो पाया। यह अलग बात है कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस पर कहे थे की कानून मंत्रालय विधवाओं के कल्याण के लिए एक निर्णायक कार्य करेगा। लेकिन उनका आश्वासन भी &#8220;विधवा&#8221; ही रह गया। </p>
<p>​भारत में करीब 3.60 करोड़ विधवाएं हैं ​जिनकी हितों की रक्षा के लिए सरकार की पहल होनी चाहिए थी । ज्ञातब्य है कि सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संथापक डॉ बिन्देश्वर पाठक, जिन्होंने विधवाओं के कल्याणार्थ ऐतिहासिक कार्य किये हैं; विधवाओं की हितों में कानून बनाने के लिए एक बिल का मसौदा तैयार किया था और इस दिशा में देश के सभी राजनीतिक दलों के सहयोग की अपील भी किया था।  </p>
<p>उन्होंने कहा&#8221; &#8220;हमें पूर्ण विस्वास है कि इन उपेक्षित वृद्ध माताओं, विधवाओं के कल्याण और सुरक्षा के लिए सरकार जरूर पहल करेगी।&#8221; </p>
<p>​उनके अनुसार,​ ‘समाज में विधवाओं की दयनीय दशा में सुधार के लिए कानून बनाए जाने की दृष्टि से मैंने एक विधेयक का प्रस्ताव किया है। हम चाहते हैं कि सरकार उपेक्षित विधवाओं के संरक्षण, कल्याण और सहायता के लिए कानून बनाकर एक विधवा कल्याण बोर्ड का गठन करे और उनके लिये अलग से निधि बनायी जाए।​ विधवाएं समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और सरकार का यह  ​दायित्व है की वे उनकी रक्षा करे। &#8221;</p>
<p>डॉ पाठक ने कहा की कानून तो बनना ही चाहिए लेकिन साथ ही विधवाओं को लेकर समाज को अपनी सोच भी बदलनी चाहिए और अल्पायु में विधवा होने वाली युवतियों और महिलाओं के पुनर्विवाह को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह बताते हुए कि देश की कुल आबादी में विधवाओं की संख्या लगभग तीन प्रतिशत के बराबर है और इनमें से 50 प्रतिशत बुजुर्ग, असहाय और अशक्त हैं, जिनके पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है। </p>
<p>​​कहा जाता है कि विधवाओं की बुरी हालत को देखकर कृष्ण भक्त मध्यकालीन कवि चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को जीवन के आखिरी पल वृंदावन में कृष्ण भक्ति करते हुए गुजारने की परम्परा डाली और विधवाओं को लेकर वृंदावन आ गए। तब मकसद यह था कि अपने परिवारों की उपेक्षा झेल रही विधवाओं को मन्दिर और आश्रम आसरा देंगे और उनकी जिन्दगी गुजर जाएगी। लेकिन कालांतर में हालात सामान्य नहीं रहे। परिवारों ने अपनी ही अजीज रही विधवाओं को खुद पर बोझ मानना शुरू किया और वृंदावन लाकर उन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ने लगे। कुछ साल पहले तक वृंदावन में विधवाएँ सड़कों पर भीख माँगते दिख जाती थीं। इतना ही नहीं “अमानवीयता का पराकाष्ठा इस बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी के कारण जब उनकी मौत हो जाती थी तो उन्हें सामान्य और सहज अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं होता था। उनके शव को टुकड़ों में काटकर बोरी में बाँधकर यमुना में फेंक दिया जाता था।</p>
<figure id="attachment_845" aria-describedby="caption-attachment-845" style="width: 1169px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/Capture.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/Capture.jpg" alt="एक नजर इसे भी देखें " width="1169" height="872" class="size-full wp-image-845" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture.jpg 1169w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-300x224.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-768x573.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-1024x764.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-80x60.jpg 80w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-265x198.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-910x679.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-696x519.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-1068x797.jpg 1068w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-563x420.jpg 563w" sizes="auto, (max-width: 1169px) 100vw, 1169px" /></a><figcaption id="caption-attachment-845" class="wp-caption-text">एक नजर इसे भी देखें</figcaption></figure>
<p>इस बात की खबर एक स्वयंसेवी संगठन को पता चली तो उसने सुप्रीम कोर्ट में विधवाओं की हालत सुधारने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त जब विधवाओं की बदहाली की जानकारी हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश महिला आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा जिला प्रशासन और सम्बन्धित विभागों को जबर्दस्त लताड़ लगाई थी। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यूयू ललित की सामाजिक पीठ ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या विधवाओं को राहत दिलाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल से बात की जा सकती है।</p>
<p>जब इस पर सहमति बनी तो डॉक्टर पाठक के पास वृंदावन की विधवाओं की मदद के लिए अगस्त 2012 में चिट्ठी आई। उन्होंने अपने सुलभ होप फाउण्डेशन के जरिए वृंदावन की विधवाओं को पहले एक हजार रुपए महीना और बाद में दो हजार रुपए महीने की सहायता देनी शुरू की। इससे वृंदावन की विधवाओं की हालत सुधर गई है। अब उन्हें भोजन के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वृंदावन में उदासीन बाबा का आश्रम अब सुबह-शाम सुलभ की सहायता से चलने वाले भजन कार्यक्रमों से गूंजता रहता है। इतना ही नहीं इनमें जो जवान और काम करने लायक हालत में विधवाएँ हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सिलाई-कढ़ाई जैसे कामों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा अशिक्षित विधवाओं को पढ़ाने का काम भी किया जा रहा है।</p>
<p>वृंदावन की तरह काशी भी विधवाओं के लिए मशहूर रहा है। हालाँकि यहाँ विधवाओं की संख्या वृंदावन की तुलना में कम है। विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर,​ शहर के हर कोने और चौक पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।’ इसके आलावा अगरबती बनाना, कपडे सिलना, फूल के माला बनाना, मोमबती बनाना। इससे जो आमदनी होती है वह उनके सर्वांगीण विकास पर खर्च की जाती है ताकि उन चेहरे पर प्रसन्नता रहे।</p>
<p>गौर​​लब है की कुछ वर्ष पहले तक वृंदावन में बड़ी संख्या में विधवा स्त्रियां सफेद साड़ी में मंदिरों में भटकते हुए और भीख मांगते देखी जाती थीं। भगवान कृष्ण की नगरी कहे जाने वाले शहर में निर्धन और कुपोषण की शिकार इन विधवाओं में से कई इतनी कमजोर थीं कि सिर्फ हड्डियों और मांस का ढांचा मात्र रह गई थीं।</p>
<p><iframe loading="lazy" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/FmrHZp9Q2tg?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>संडेपोस्ट से बातचीत करते डॉ पाठक कहते हैं: “यह सुलभ आंदोलन के लिए सौभाग्य की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधवाओं की दुर्दशा पर सुनवाई के वक्त सुलभ को महत्व दिया। सरकार से सुलभ से पूछकर बताने को कहा गया कि हम बदहाल विधवाओं को खिलाने का इंतजाम कर सकती है या नहीं। न्यायमूर्ति के जेहन से इस नेक काम के लिए सुलभ का जिक्र होना हमारे लिए गौरव की बात है। हम मैला ढोने वाली महिलाओं को समाजिक हक दिलाने के लिए पहले से सक्रिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने समाज की परित्यक्ता बनकर जीने के विवश वृंदावन औऱ वाराणसी की विधवाओं की मदद के लिए हमें उतार दिया। यहां की आश्रमों में रहने वाली विधवाओं के लिए खाने- पीने, पहनने ओढने की समस्या के साथ अंतिम संस्कार तक में समुचित सम्मान नहीं मिलने की मुसीबत थी। सर्वोच्च न्यायालय में मरने के बाद इन विधवाओं के शरीर को बोटी बोटी कर यमुना में फेंके जाने के मामले की सुनवाई के लिए पहुंचा था। सुलभ के प्रयास से आज यहां के आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को दो हजार रुपए प्रतिमाह का अनुदान दिया जा रहा है। हालत में बदलाव के लिए हिंदी, अंग्रेजी और बांगला में शिक्षा का इंतजाम किया गया है। पुनर्वास के अन्य जरूरी सुविधाओं का ख्याल रखा जा रहा है।”</p>
<p>​​</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection">काश !! विधवाओं के रक्षार्थ प्रधान मन्त्री &#8216;एक कानून&#8217; बना देते, हज़ारों विधवाएँ तो &#8216;राखी भी बाँधी थी&#8217; उन्हें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>सुलभ द्वारा &#8220;विधवा&#8221; ​विनीता का विवाह ​राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर के विचारों का पुनःस्थापना है।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 May 2018 10:21:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[ishwarchand vidyasagar]]></category>
		<category><![CDATA[raja rammohum roy]]></category>
		<category><![CDATA[remarriage]]></category>
		<category><![CDATA[shivnath jha]]></category>
		<category><![CDATA[society]]></category>
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		<category><![CDATA[widow marriage]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गुप्तकाशी (उत्तराखण्ड) आपदा की पीड़िता विनीता महज एक विधवा नहीं थी बल्कि राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर ​का एक &#8220;विषय&#8221; भी थी, जिसका बीजारोपण राममोहन रॉय और विद्यासागर कोई दो से अधिक शताब्दी पूर्व समाज, विशेषकर महिलाओं के उत्थान के लिए किया था &#8211; महिलाओं का सर्वांगीण विकास और विधवा विवाह की शुरुआत। आज [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/remarriage-of-uttarakhand-widow-by-sulabh">सुलभ द्वारा &#8220;विधवा&#8221; ​विनीता का विवाह ​राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर के विचारों का पुनःस्थापना है।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>गुप्तकाशी (उत्तराखण्ड) आपदा की पीड़िता विनीता महज एक विधवा नहीं थी बल्कि राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर ​का एक &#8220;विषय&#8221; भी थी, जिसका बीजारोपण राममोहन रॉय और विद्यासागर कोई दो से अधिक शताब्दी पूर्व समाज, विशेषकर महिलाओं के उत्थान के लिए किया था &#8211; महिलाओं का सर्वांगीण विकास और विधवा विवाह की शुरुआत। आज राजाराम मोहन रॉय का २४६ वां जन्मदिन है। ​</p>
<p>​दुष्यन्त कुमार ने कहा था : &#8220;कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता &#8211; एक पथ्थर तो तबियत से उछालो यारो।&#8221; चौदह शब्द और जीवन की पूरी दास्तान। लेकिन उनके लिए जिन्हे अपनी परिश्रम, सोच और विस्वास पर नाज़ है और जो समाज में आमूल परिवर्तन लाना चाहते हैं।</p>
<p>शायद आज की पीढ़ी महान दार्शनिक और समाजसेवी राजा राममोहन रॉय और ​ईश्वरचन्द विद्यासागर को नहीं जानता हो या उनके नामों से परिचित नहीं हो, लेकिन इतिहास साक्षी है कि आज से कोई १६२ साल पूर्व, इधर जब मेरठ में मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के  खिलाफ बिगुल बजाया था; उधर भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक महान परिवर्तन के लिए ईश्वरचन्द विद्यासागर भारत में एक उच्च जाति की विधवा महिला की दोबारा विवाह कराया था। वर्ष था १८५६ और तारीख ७ दिसंबर।</p>
<p>​इससे पहले भारतीय समाज में उच्च जातियों में विधवा को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी।  </p>
<p>​पश्चिम मिदनीपुर के बिरसिंघा गांव में 26 सितंबर 1820 जन्म लिए ईश्वरचंद विद्यासागर के प्रयासों से 26 जुलाई 1856 को विधवा विवाह को कोलकाता (तब कलकत्ता) के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने मंजूरी दी थी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर में पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ ​था । </p>
<p>कहा जाता है कि १८५३ में हुए एक सर्वे के ​अनुमान कलकत्ता में लगभग १२ हज़ार से भी अधिक ​वेश्याएं रहती थीं। ईश्वरचन्द विद्यासागर उनकी इस हालत को परिमार्जित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। अक्षय कुमार दत्ता के सहयोग से ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिन्दू  समाज में स्थान दिलवाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके प्रयासों द्वारा १८५६ में अंग्रेजीसरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर इस अमानवीय मनुष्य प्रवृत्तिपर लगाम लगाने की कोशिश की। </p>
<p>विद्यासागर नारी शिक्षा के समर्थक थे और उनके प्रयास से ही कलकत्ता में लड़कियों के लिए कई जगह स्कूलों की स्थापना ​हुयी थी ​। उन्हें सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता ​है। इतिहास साक्षी है कि 1856-60 के बीच इन्होंने 25 विधवाओं का पुनर्विवाह ​कराये थे। </p>
<p>उस समय हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ही शोचनीय थी। विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित तो हुआ था ​लेकिन समाज में इसे लागू कराना आसान नहीं ​था। तब विद्यासागर ने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से करवाया ​था। </p>
<p>इतने वर्षों में इतनी सामाजिक क्रांति के बाद आज भी समाज में विधवाओं को वो दर्जा नहीं मिलता, जिनकी वे हकदार ​हैं। आम औरतों के तरह वे समाज में चैन से नहीं रह ​पातीं। ​बहरहाल, राजाराम मोहन रॉय और ​ईश्वरचन्द विद्यासागर को प्रवर्तक मानने वाले आधुनिक भारत में विधवाओं के मशीहा और सुलभ संस्था के संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक भी इस क्रांति के प्रवल समर्थक हैं और अगर ऐसा नहीं होता हो केदारनाथ की आपदा में पति को खो चुकी 24 वर्षीय विनीता की जिन्दगी में नया उजाला ​नहीं आया होता। ​पिछले वर्ष विनीता एक नए जीवनसाथी के साथ एक बार फिर सात फेरे लेकर १६१ साल बाद भी ईश्वरचन्द विद्यासागर के प्रयास को पुनः जीवित की ।  </p>
<p>2013 में केदारनाथ त्रासदी में उत्तराखंड के भनीग्राम पंचायत में गुप्तकाशी के पास देवली नामक गांव के रहने वाले 32 नौजवान भी बाढ़ में बह गए थे। ये सभी आजीविका कमाने निकले थे। इनमें विनीता का पति महेशचंद्र भी था। विनीता की छह महीने पहले ही शादी हुई थी। रुद्रप्रयाग जिले के गांव तिलवाड़ा निवासी टैक्सी ड्राइवर राकेश की विनीता से मुलाकात हुई। इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया। राकेश ने बताया कि 26 अगस्त 2014 को उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली। अब दोनों के दो बच्चे भी हैं। </p>
<p>डॉ पाठक कहते हैं : इस युवक द्वारा लिया गया यह कदम आज के लोगों के लिए एक सन्देश भी है और प्रेरणा भी। आम तौर पर हमारे समाज में विधवाओं को एक तरह से अलग-थलग कर दिया जाता है। यहां तक कि उन्हें किसी शुभ समारोह में भी शामिल नहीं किया जाता। </p>
<p>​उनका जीवन दूभर हो जाता है। कभी-कभी तो उनके बच्चे बनारस-मथुरा-वृन्दावन की तंग गलियों में मरने के लिए भी छोड़ आते हैं। और अगर ऐसा नहीं होता तो आज बनारस-मथुरा-वृन्दावन में ऐसी विधवाएं नहीं होतीं। हम और हमारा संस्थान ऐसे हज़ारों विधवाओं का परवरिश कर रहे हैं।&#8221;</p>
<p>डॉ पाठक फिर कहते हैं : &#8220;विनीता का विवाह होना ईश्वरचन्द विद्यासागर और राजा राममोहन रॉय के प्रयासों को जीवित रखना है ताकि समय के साथ-साथ समाज की सोच में बदलाव आये। सम्पूर्ण वैदिक और सामाजिक रीती-रिवाजों के साथ विनीता का विवाह करवाना एक देशव्यापी अभियान है और ​हमें उम्मीद है यह अभियान समाज में एक क्रांति अवश्य लाएगा, ​इसे पूरे देश में जारी रखा जाएगा।​&#8221;​ </p>
<p>सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के दिशा में अपनी तरह से सुलभ ऐसे सकारात्मक कदम उठा रहा है। सदियों से अंधेरी जिंदगी गुजार रहीं विधवाओं की जिंदगी रोशन करने की कोशिश संस्था पिछले तीन साल से लगातार कर रही है। </p>
<p>​उस विवाह के ​मौके पर सुलभ संस्था द्वारा विधवाओं को गिफ्ट के तौर पर साड़ियां भी दी गईं। विधवाओं ने मंदिर में रंगों से रंगोली सजाई, साथ ही दीये भी जलाए। उत्सव में शामिल हुईं सभी वृद्ध विधवाओं के चेहरे से खुशी झलक रही थी।   </p>
<figure id="attachment_608" aria-describedby="caption-attachment-608" style="width: 850px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh.jpg" alt="विनीता और राकेश को आशीष देते लोग" width="850" height="540" class="size-full wp-image-608" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh.jpg 850w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-300x191.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-768x488.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-696x442.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-661x420.jpg 661w" sizes="auto, (max-width: 850px) 100vw, 850px" /><figcaption id="caption-attachment-608" class="wp-caption-text">विनीता और राकेश को आशीष देते लोग</figcaption></figure>
<p>​विनीता की न केवल धूम-धाम से शादी कराई गई ​थी ​बल्कि उसमें 500 से भी अधिक विधवाओं ने भाग लिया और दांपत्य जीवन की सफलता के लिए दंपती को आशीर्वाद भी दिया। खास बात यह थी कि विवाह में सारी रस्में विधवा महिलांओं ने ही संपन्न कराई। इस आयोजन में मेहंदी, हल्दी तेल की रस्म के साथ गीतों का आयोजन भी विधवाओं द्वारा हुआ । मंदिर प्रांगण में सजे मंडप में विनीता ने अपने जीवन साथी के साथ सात फेरे लेकर अपना नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत की। </p>
<figure id="attachment_609" aria-describedby="caption-attachment-609" style="width: 850px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita.jpg" alt="मेंहन्दी लगवाती विनीता" width="850" height="540" class="size-full wp-image-609" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita.jpg 850w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-300x191.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-768x488.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-696x442.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-661x420.jpg 661w" sizes="auto, (max-width: 850px) 100vw, 850px" /><figcaption id="caption-attachment-609" class="wp-caption-text">मेंहन्दी लगवाती विनीता</figcaption></figure>
<p>​​​विधवाविवाह अधिनियम १८५६ ब्रिटिश भारत में ब्राह्मण, राजपूतों, बनिया और कायस्थ जैसे कुछ अन्यजातियों के बीच मुख्य रूप से विधवापन अभ्यास पर रोक लगाने हेतु पारित किया गया था| यह कानून बच्चे और विधवाओं के लिए एक राहत के रूप में तैयार किया गया था जिसके पति की समय से पहले मृत्यु हो गई हो|</p>
<p>विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 हिंदू जाति में जो पूर्व की विवाह परंपरा थी उसमें विवाह अधिनियम १८५६ के अधिनियम के द्वारा सभी अड़चने द्वेष आदि को इस अधिनियम के तहत समाप्त कर दिया गया और इसमें नवीन पद्धतियों को जन्म दिया गया उस समय भारत ब्रिटिश अधीन था इसलिए भारत को ब्रिटिश भारत कहा जाता था यह सुधार हिंदू विवाह के विधवाओं केलिए सबसे बड़ा सुधार था पुरातन समय में किसीऔरत के पति की मृत्यु हो जाने पर उसे उसकी चिता के साथ जलना होता था या सरमुंडवाना होता था आदि ऐसी जटिल प्रक्रियाएं थी लेकिन इस अधिनियम के तहत कुछ प्रमुख सुधार लाए गएमसलन यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती हैतो वह पुनर्विवाह कर सकती हैं।  </p>
<p>इस विवाह में उसके सगे संबंधी अर्थात माता पिता भाई दादा नाना नानी आदि संबंधियों के द्वाराबात करके दूसरे विवाह को मंजूरी दी जा सकती है यथा पुनर्विवाह करने वाली महिला अल्पवयस्क ​है। ​</p>
<p>जिस घर कि वह पहले बहु थी अर्थात उसके मृत्यु वाले पति का घर उस पर उसका कोई संपत्ति के तौर पर अधिकार नहीं होगा जहां वह पुनर्विवाह के बाद जाएगी वहां उसका अधिकार माना जाएगा</p>
<p>निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हिंदू जाति कि जो पुरातन समय के अनुसार जोविवाह की परंपरा थी वह कई रूप से आज की अपेक्षा बिखरी हुई थी जिससे कि उस मेंकई बंधित नियम थे जिसमें एक पति की मृत्यु होने के पश्चात उसकी पत्नी को उसकी चिता पर जिंदा जलना या बाल मुंडवा देना या दूसरी शादी ना करना आदि कई<br />
​ ​<br />
सारी परंपराएं सम्मिलित थी जिसके अनुसार १८५६ में ब्रिटिश इंडिया हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बनाया गया जिसमें कई सुधार लाए ​गए। </p>
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		<title>कलयुग में भी &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; आते है, विस्वास नहीं है तो मथुरा-वृन्दावन में &#8216;अन्तिम साँस</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 May 2018 11:15:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आप ही नहीं, कोई भी विस्वास नहीं करेगा की कलयुग में भी ईश्वर अथवा ईश्वर-तुल्य मनुष्य जन्म लेता है &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; जैसा​ मथुरा-वृन्दावन में​। परन्तु जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>आप ही नहीं, कोई भी विस्वास नहीं करेगा की कलयुग में भी ईश्वर अथवा ईश्वर-तुल्य मनुष्य जन्म लेता है &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; जैसा​ मथुरा-वृन्दावन में​। परन्तु जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक साँस को जोड़ते-छोड़ते जी रही हैं, उन विधवाओं से मिलकर पूछेंगे की आखिर जीवन के अन्तिम बसन्त को वे क्यों देखना चाहती हैं? क्यों अब जीना चाहती हैं ? क्यों जीने की अभिलाषा मरने के समय बढ़ती जा रही है? क्यों उनसे मिलने के लिए मन बेचैन रहता हैं? आपको उत्तर मिल जायेगा &#8211; क्योंकि ​उनका &#8220;अभागा&#8221; सन्तान अपनी &#8220;विधवा माता&#8221; को​ ​मथुरा-वृन्दावन की तंग गलियों में, सड़कों पर मरने के लिए छोड़ ​दिया है और अब उनकी रक्षा &#8221;कलयुग के चैतन्य&#8221; कर रहे हैं, जो उनके लिए &#8220;महाप्रभु&#8221; हैं। </p>
<p>​भले भारत के लोगों के ह्रदय में, खासकर उन सन्तानों के ह्रदय में जीवन के अन्तिम बसंत में सांस- जोड़ती, सांस-तोड़ती माताओं के लिए कोई स्पन्दन नहीं हो, और अगर होता तो चैतन्य महाप्रभु के युग से आजतक मथुरा-वृन्दावन में विधवाएं नहीं आतीं रहतीं, पटकी नहीं जाती सड़कों-गलियों में भीख मांगने के लिए। लेकिन इसी देश का एक सन्तान उन विधवा माताओं को जीवन के अंतिम दिनों में वह सभी सुख दे रहा हैं जो दसकों बाद उन्हें जीने की लालच बढ़ा रही है। कलयुग के चैतन्य महाप्रभु है सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनिजेशन के संस्थापक पद्मश्री-पद्मभूषण उपाधि से अलंकृत डॉ बिन्देशवर पाठक। </p>
<p>भारत में विद्वानों की कमी नहीं है। धनाढ्यों की किल्लत नहीं है। नेताओं का अपार भण्डार है। समाजसेवियों का कारखाना है &#8211; लेकिन जिनके ह्रदय में मानवता और मानवीयता हो, ऐसे महापुरुषों का भारत-राष्ट्र में घोर अकाल है। और अगर ऐसा नहीं होता तो १२५ करोड़ की आवादी देश में भारत का सर्वोच्च न्यायालय डॉ पाठक और उनके ​संस्थान &#8220;सुलभ&#8221; के सामने यह प्रस्ताव क्यों लाती &#8211; क्या आप उन विधवाओं को दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त ​उनकी मृत्यु तक कर सकते हैं? क्या आप बीमारी की  उन्हें दबाइयाँ दे सकते हैं ? क्या आप उनकी मृत्यु के पश्चयात सम्पूर्ण विधि-विधान से उनका दाह &#8211; संस्कार कर सकते हैं ? ​बहुत ही विचित्र, परन्तु सत्य बात है। </p>
<p>कहा जाता है कि विधवाओं की बुरी हालत को देखकर कृष्ण भक्त मध्यकालीन कवि चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को जीवन के आखिरी पल वृंदावन में कृष्ण भक्ति करते हुए गुजारने की परम्परा डाली और विधवाओं को लेकर वृंदावन आ गए। तब मकसद यह था कि अपने परिवारों की उपेक्षा झेल रही विधवाओं को मन्दिर और आश्रम आसरा देंगे और उनकी जिन्दगी गुजर जाएगी। लेकिन कालांतर में हालात सामान्य नहीं रहे। परिवारों ने अपनी ही अजीज रही विधवाओं को खुद पर बोझ मानना शुरू किया और वृंदावन लाकर उन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ने लगे। कुछ साल पहले तक वृंदावन में विधवाएँ सड़कों पर भीख माँगते दिख जाती थीं।  </p>
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<p>इतना ही नहीं &#8220;अमानवीयता का पराकाष्ठा इस बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी के कारण जब उनकी मौत हो ​जाती थी तो उन्हें सामान्य और सहज अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं होता था। उनके शव को टुकड़ों में काटकर बोरी में बाँधकर यमुना में ​फेंक दिया जाता था। </p>
<p>इस बात की खबर एक स्वयंसेवी संगठन को पता चली तो उसने सुप्रीम कोर्ट में विधवाओं की हालत सुधारने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त जब विधवाओं की बदहाली की जानकारी हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश महिला आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा जिला प्रशासन और सम्बन्धित विभागों को जबर्दस्त लताड़ लगाई थी। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यूयू ललित की सामाजिक पीठ ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या विधवाओं को राहत दिलाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल से बात की जा सकती है। </p>
<p>जब इस पर सहमति बनी तो डॉक्टर पाठक के पास वृंदावन की विधवाओं की मदद के लिए अगस्त 2012 में चिट्ठी आई। तब डॉक्टर पाठक को द्वारका में प्रसाद मिली कृष्ण की बाँसुरी की याद आई और उन्होंने अपने सुलभ होप फाउण्डेशन के जरिए वृंदावन की विधवाओं को पहले एक हजार रुपए महीना और बाद में दो हजार रुपए महीने की सहायता देनी शुरू की। इससे वृंदावन की विधवाओं की हालत सुधर गई है। अब उन्हें भोजन के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वृंदावन में उदासीन बाबा का आश्रम अब सुबह-शाम सुलभ की सहायता से चलने वाले भजन कार्यक्रमों से गूंजता रहता है। इतना ही नहीं इनमें जो जवान और काम करने लायक हालत में विधवाएँ हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सिलाई-कढ़ाई जैसे कामों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा अशिक्षित विधवाओं को पढ़ाने का काम भी किया जा रहा है।</p>
<figure id="attachment_602" aria-describedby="caption-attachment-602" style="width: 624px" class="wp-caption alignright"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1.jpg" alt="डॉ बिन्देश्वर पाठक और उनकी पत्नी श्रीमती अमोला पाठक जो पिछले ५४ सालों से उनके मानवीय प्रयास में साथ दे रहीं हैं ​" width="624" height="868" class="size-full wp-image-602" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1.jpg 624w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1-216x300.jpg 216w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1-302x420.jpg 302w" sizes="auto, (max-width: 624px) 100vw, 624px" /><figcaption id="caption-attachment-602" class="wp-caption-text">डॉ बिन्देश्वर पाठक और उनकी पत्नी श्रीमती अमोला पाठक जो पिछले ५४ सालों से उनके मानवीय प्रयास में साथ दे रहीं हैं ​</figcaption></figure>
<p>वृंदावन की तरह काशी भी विधवाओं के लिए मशहूर रहा है। हालाँकि यहाँ विधवाओं की संख्या वृंदावन की तुलना में कम है। काशी के बारे में एक कहावत भी मशहूर है- रांड़, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी / इनते बचैं तो सेवैं काशी… लेकिन यह भी सच है कि यहाँ की विधवाओं की हालत वृंदावन की विधवाओं जितनी खराब नहीं है और ना ही वृंदावन जितनी विधवाएँ यहाँ हैं भी। फिर भी सुलभ होप फाउण्डेशन वाराणसी की भी विधवाओं को मासिक सहायता देता है।</p>
<p>विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं।​ कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर,<br />
 शहर के हर कोने और चौक ​पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई ​देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।&#8217;</p>
<p>सुलभ ने वृंदावन के मंदिरों में सुबह भजन गाकर जीविका कमाने वाली विधवा स्त्रियों को सम्मान दिलाने और कई कदम ​उठाये हैं। ​देश में स्वच्छता अभियान चलाने वाली प्रमुख गैर सरकारी संस्था सुलभ ने वृंदावन की विधवाओं की मूलभूत जरूरतों भोजन से लेकर स्वास्थ्य का ध्यान रखने ​लगा है। ​उनके ​रहने खाने की व्यवस्था मुफ़ ​है। विधवाओ को सिलाई बुनाई इत्यादि ​का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। ​<br />
​<br />
इसके आलावा अगरबती बनाना, कपडे सिलना, फूल के माला बनाना​,​ मोमबती ​बनाना। इससे जो आमदनी ​होती है वह उनके सर्वांगीण विकास पर खर्च की जाती है ताकि उन चेहरे पर प्रसन्नता रहे। </p>
<p>गौरालब है की ​कुछ वर्ष पहले तक वृंदावन में बड़ी संख्या में विधवा स्त्रियां सफेद साड़ी में मंदिरों में भटकते हुए और भीख मांगते देखी जाती थीं। भगवान कृष्ण की नगरी कहे जाने वाले शहर में निर्धन और कुपोषण की शिकार इन विधवाओं में से कई इतनी कमजोर थीं कि सिर्फ हड्डियों और मांस का ढांचा मात्र रह गई थीं।​ ​</p>
<p>​संडेपोस्ट से बातचीत करते डॉ पाठक कहते हैं: &#8220;​यह सुलभ आंदोलन के लिए सौभाग्य की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधवाओं की दुर्दशा पर सुनवाई के वक्त सुलभ को महत्व दिया। सरकार से सुलभ से पूछकर बताने को कहा गया कि हम बदहाल विधवाओं को खिलाने का इंतजाम कर सकती है या नहीं। न्यायमूर्ति के जेहन से इस नेक काम के लिए सुलभ का जिक्र होना हमारे लिए गौरव की बात है। हम मैला ढोने वाली महिलाओं को समाजिक हक दिलाने के लिए पहले से सक्रिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने समाज की परित्यक्ता बनकर जीने के विवश वृंदावन औऱ वाराणसी की विधवाओं की मदद के लिए हमें उतार दिया। यहां की आश्रमों में रहने वाली विधवाओं के लिए खाने- पीने, पहनने ओढने की समस्या के साथ अंतिम संस्कार तक में समुचित सम्मान नहीं मिलने की मुसीबत थी। सर्वोच्च न्यायालय में मरने के बाद इन विधवाओं के शरीर को बोटी बोटी कर यमुना में फेंके जाने के मामले की सुनवाई के लिए पहुंचा था। सुलभ के प्रयास से आज यहां के आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को दो हजार रुपए प्रतिमाह का अनुदान दिया जा रहा है। हालत में बदलाव के लिए हिंदी, अंग्रेजी और बांगला में शिक्षा का इंतजाम किया गया है। पुनर्वास के अन्य जरूरी सुविधाओं का ख्याल रखा जा रहा है।​&#8221;​</p>
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