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	<title>voters Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; 2.70+करोड़ 18-45 वर्ष के मतदाताओं के लिए &#8216;चुनावी लॉलीपॉप&#8217; बा !!😢विधानसभा चुनाव में 56+नए चेहरे दिखेंगे👁</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/nitish-kumar-threw-the-election-bomb-of-bihar-youth-commission</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Jul 2025 05:03:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 74-वर्ष की आयु में, वह भी दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद और 18 वीं विधानसभा चुनाव से पूर्व, प्रदेश के युवाओं के बारे में &#8216;सोच&#8217; आयी है। &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन कर दिए। बिहार में 15 से 44 वर्ष की [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 74-वर्ष की आयु में, वह भी दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद और 18 वीं विधानसभा चुनाव से पूर्व, प्रदेश के युवाओं के बारे में &#8216;सोच&#8217; आयी है। &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन कर दिए। बिहार में 15 से 44 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या आज 27012426+ है। राजनीति में चाहे जितनी तालियाँ बजा लें, बिहार के लोग, खासकर मतदाता, आज गांठ बांध लें कि &#8216;इस आयोग का भी हश्र वही होगा, जैसे प्रदेश में अब तक बने कमेटी और कमीशन का होता आया है।&#8217; या फिर, यह आयोग “अपने लोगों को अंतः मन से आभार व्यक्त करने के लिए विश्रामगृह बन जायेगा &#8211; चुनवोपरांत। </strong></p>
<blockquote><p>वैसे वर्तमान सत्ताधारियों को &#8216;इंदिरा गांधी का नाम आज भी हजम नहीं होगा,&#8217; लेकिन इस आयोग के गठन को देखकर देश की पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी याद आ गई। उस जमाने में किसी हादसा होने के बाद शासन प्रशासन के विरुद्ध उठती आवाज को बंद करने के लिए कमेटी या कमीशन का गठन हो जाता था। केंद्र में स्वयं श्रीमती गांधी अथवा प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा होता था, और राज्यों में उनके &#8216;पसंदीदा मुख्यमंत्रियों&#8217; द्वारा। कमेटी/कमीशन के प्रमुख की, सदस्यों की नियुक्ति हो जाती थी, सरकारी कोष से पैसे निकल जाते थे। समयांतराल लोग उस घटना को भी भूल जाते थे और सरकार तो भुलाने के लिए ही इनका गठन करती ही थी। यकीन मानिए अंतिम मतदान की तारीख के बाद युवा आयोग वृद्धावस्था तक याद नहीं किए जाएंगे, क्योंकि बिहार के लोगों को भूलने की आदत प्रबल हैं । </p></blockquote>
<p><strong>दिल्ली में यमुना पार और नई दिल्ली को जोड़ने वाला  &#8216;विकास मार्ग&#8217;, जिसका आईटीओ चौराहे पर आकर “विकास” का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और आगे दीनदयाल उपाध्याय मार्ग के नाम से जाना जाता है; चर्चाएं आम हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव के बाद एक बार मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे नीतीश कुमार और रायसीना पहाड़ पर बैठे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की उठती-झुकती निगाहों को देख रहे हैं &#8216;नतमस्तक&#8217; होकर। </strong></p>
<p>वजह यह है कि नीतीश कुमार या उनकी जनता दल युनाइटेड पार्टी की &#8216;अपनी&#8217;, &#8216;स्वयं की&#8217; इतनी क्षमता नहीं रही कि वे अकेले सरकार का गठन कर लेंगे। विगत वर्षों की राजनीतिक घटनाएं, सरकार बनने, बिखरने की परम्परा गवाह हैं। नीतीश कुमार को किसी न किसी राजनीतिक पार्टी का, चाहे राष्ट्रीय जनता दल ही क्यों न हो, बैशाखी जैसा सहारा लेना ही पड़ा है और पड़ेगा। वैसी स्थिति में न्यूनतम संख्या के बाद भी मुख्यमंत्री बनना &#8216;राजनीतिक बर्चस्वता&#8217; नहीं, अपितु, &#8216;करुणामय&#8217; आधार पर सरकार बनाना है। रायसीना पहाड़ पर लोग कहते भी हैं कि प्रधानमंत्री अपने किसी &#8216;उपासक&#8217; को &#8216;अतृप्त&#8217; नहीं छोड़े हैं, संभव है अगर उनकी कृपा रही तो नीतीश कुमार का यह भी मनोरथ पूरा हो सकता है, बन भी सकते हैं, इतिहास का सवाल है। बिहार को अब तक 22 मुख्यमंत्री मिला चुका है। </p>
<p><strong>लेकिन असली बात यह है कि प्रदेश के सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों से प्राप्त सांख्यिकी के आधार पर प्रदेश के सभी राजनीतिक पार्टियों के करीब 23 फीसदी प्रतिनिधि, जो वर्तमान में विधानसभा के सदस्य हैं, “पूर्व सदस्य” की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाएँगे। &#8220;पूर्व विधायक&#8221; बनने वालों में नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड के भी विधायक सम्मिलित है। सांख्यिकी के अनुसार, आज के 243  विधानसभा सदस्यों में से कोई 56 विधायकों का चेहरा &#8216;नवीन&#8217; होगा और वर्तमान में विधानसभा के “कौन क्या है” डायरी में आज के चेहरे बदल जाएँगे। </strong></p>
<p>रायसीना पहाड़ के एक विश्वस्त सूत्र का कहना है कि &#8216;इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कालखंड में जिस तरह कांग्रेस का मुख्यालय दिल्ली से देश के सभी राज्यों के कांग्रेस मुख्यालयों पर अपना आधिपत्य रखता था, आज के इस बदलते समय में दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी का मुख्यालय देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ही नहीं, जिला मुख्यालयों के साथ-साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सभी पार्टियों के मुख्यालयों को अपने सीसीटीवी के अधीन रखती है। विश्वास नहीं है तो पूछ लें नितीश कुमार जी से या उनके मंत्रिमंडल से लेकर दिल्ली के लोकसभा सभा और राज्यसभा में &#8216;जनता दल युनाइटेड के रूप में&#8217; बैठे &#8216;भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधियों&#8217; से। </p>
<p>बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भी उस सीसीटीवी के अधीन ही हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि आज नीतीश कुमार 80 फीसदी से अधिक भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के हो चुके हैं। शेष जो दिख रहे हैं, वे प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करने और अभी तक बचे 45 विधायकों को संतुष्ट करने के लिए है। आगामी विधानसभा चुनाव में यह संख्या न केवल आधी भी हो सकती है, बल्कि किन महाशयों और किन माननीया को चुनाव में टिकट दिया जाएगा, इसका निर्णय नीतीश कुमार या प्रदेश के जनता दल यूनाइटेड के लोग नहीं करेंगे, बल्कि दीनदयाल उपाध्याय मार्ग करेगा, खासकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह। क्योंकि नीतीश कुमार महज एक डगरा पर रखा बैगन&#8217; हो गए हैं।&#8221;  </p>
<p><strong>सूत्रों की बात सुनकर &#8216;आश्चर्य&#8217; नहीं लग रहा था। विगत 25 वर्षों में, देश ने नीतीश कुमार का जो राजनीतिक चरित्र देखा है &#8211; अधोगति की ओर उन्मुख &#8211; इस बात का गवाह है कि वे उत्तरोत्तर पार्टी की मुख्यधारा पर अपना प्रभुत्व खोते ही नहीं जा रहे हैं, बल्कि अपनी सत्ता को शनै-शनै भाजपा को सुपुर्द भी करते जा रहे हैं। आज के परिपेक्ष में भले नीतीश कुमार स्वयंभू &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; या &#8216;प्रदेश का &#8216;लौह पुरुष&#8217; भले समझते हैं, हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे चरण में आगमन के बाद वे नीतीश कुमार को उनकी वास्तविक स्थिति और छवि से अवगत कराते आ रहे हैं। </strong></p>
<figure id="attachment_6931" aria-describedby="caption-attachment-6931" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6931" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6931" class="wp-caption-text">बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भी उस सीसीटीवी के अधीन ही हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि आज नीतीश कुमार 80 फीसदी से अधिक भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के हो चुके हैं।</figcaption></figure>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि बिहार में आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भी ‘शेर-ए-बिहार’ और बिहार का ‘लौह पुरुष’ की चर्चा होगी, चाहे किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोग होंगे, चाहकर भी रामलखन सिंह यादव को नजर अंदाज नहीं कर सकते। रामलखन सिंह यादव की मृत्यु के बाद उस स्थान को लालू प्रसाद यादव अधिपत्य ज़माने की कोशिश किये, लेकिन महज यादव उपनाम&#8217; से कोई शेर-ए-बिहार नहीं हो सकता है। लालू के जेल जाने के बाद, या यूँ कहें कि सत्ता से पदच्युत होने के बाद नीतीश कुमार स्वयंभू ‘शेर-ए-बिहार’ बनने, दलितों का, प्रदेश के गरीब-गुरबों का ‘स्वयंभू’ नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं।  लेकिन बन नहीं पाए। रामलखन सिंह यादव सं 1952 से 1991 तक बिहार विधान सभा में मुस्तैद रहे। जिसका हुए, उसका कभी हाथ नहीं छोड़े और जिसका नहीं हुए, उसका कभी ऊँगली भी नहीं पकड़े। लेकिन न तो लालू किसी का हुए और ना ही नीतीश कुमार किसी का हो सके।</strong> </p>
<p>दहशत’ था ‘शेर-ए-बिहार’ का ‘सम्मान’ के साथ। ‘लोग’ दूर से डरते अवश्य थे, लेकिन पास आते ही पिघल जाते थे। लोग घबराते जरूर थे, लेकिन ‘थरथराते’ नहीं थे। आज के नेता इस सम्मान के बारे में सोच नहीं सकते, चाहे ‘ब्राह्मण’ हों, ‘क्षत्रिय’ हो, ‘वैश्य’ हो, ‘शूद्र’ हो, ‘यादव’ हों, ‘कुर्मी’ हो, ‘कायस्थ’ हो, ‘पासवान’ हो, ‘कुशवाहा’ हो; क्योंकि ‘सम्मान’ ‘अर्जित’ किया जाता है बहुत मसक्कत से, और वर्तमान राजनीतिक गलियारे में, चाहे पटना का सरपेंटाइन रोड हो या दिल्ली का संसद मार्ग औसतन 90 फीसदी से अधिक नेतागण उस सम्मान से कोसों दूर हैं । विगत 35-वर्षों में बिहार में जितने भी नेता जन्म लिए, मंत्री से मुख्यमंत्री तक, वह सम्मान नहीं पा सके, जो शेर-ए-बिहार के नाम से अंकित था। </p>
<p>बहरहाल, आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम को प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक नीतीश कुमार पटना को गंगा के उस पार के लोगों से जोड़ने के लिए, आवागमन की सुविधा को बेहतर बनाने के लिए अपने कालखंड में भले बेहतर कार्य करने का दावा करते हों, हकीकत यह है कि मिथिला राज्य के निर्माण के लिए प्रस्तावित जिलों के करीब 60 फीसदी मतदाता अपने अपने वर्तमान विधायकों से खुश नहीं हैं और वे परिवर्तन को औचित्य बताते हैं। इन विधायकों में जनता दल यूनाइटेफ़ के अलावे राष्ट्रीय जनता दल के भी हैं, भारतीय जनता पार्टी के भी हैं और कुछ अन्य भी हैं। सीतामढ़ी के एक मतदाता का कहना है कि “राजनीतिक पार्टियों ने अपने अपने पार्टियों के नामकरण में जनता शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल किए हैं, लेकिन वे और उनके विधायकगण जनता के कभी नहीं हुए। </p>
<p>आजादी के बाद अब तक के मंत्रिमंडल में भले तथाकथित रूप से सामाजिक सरोकार रखने का दावा करने वाले सफेदपोश या रंग बिरंगे वस्त्रों को धारण करने वाले जनहित की बात करें, अखबारों, पत्रिकाओं में  उनका नाम प्रकाशित हों; लेकिन प्रदेश के 324 विधानसभा, 40 लोक सभा, 16 राज्य सभा और 75 विधान परिषद क्षेत्र (63 निर्वाचित और 12 मनोनीत) के रोते, बिलखते, पेट-पीठ एक किए, अशिक्षित, बेरोजगार, बीमार, पीड़ित मतदाता से बड़ा दूसरा कोई उद्धरण नहीं हो सकता है। आने वाले समय में भारत के शोधकर्ता ही नहीं, विश्व के प्रतिष्ठित शोध संस्थाओं के दिग्गज आज़ादी के बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लड़ी गयी दूसरी जंगे आज़ादी और उस आंदोलन से जन्म लिए तथाकथित नेताओं पर गहन शोध अवश्य करेंगे। और 18 वीं विधानसभा हेतु होने वाली चुनाव से पूर्व नीतीश कुमार द्वारा &#8216;युवा आयोग&#8217; का गठन भी एक मुख्य विषय होगा। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण के सिद्धांतों को, उनके विचारों को उनके ही अनुयायियों द्वारा धज्जी उड़ाते देखना हो तो बिहार का भ्रमण सम्मेलन कर लें। अपने को जयप्रकाश नारायण-कर्पूरी ठाकुर का शिष्य कहने वाले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार जैसे अनुयायी अगर करोड़पति हो सकते हैं, तो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद बिहार की धरती पर जन्म लेने वाले, राज्यसभा, लोकसभा, विधान सभा या विधान परिषद में बैठने वाले &#8216;सम्मानित&#8217; नेतागण अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं।  वैसे आज 74 वर्ष के हैं नीतीश कुमार। 25 वर्ष पहले 2000 में बिहार की सत्ता में आये थे। यानी उस समय उनकी आयु 49 वर्ष की थी। उस समय प्रदेश के युवाओं के बारे में ज्ञान नहीं हुआ उन्हें। आज 74 वर्ष की आयु में, वह भी जब प्रदेश 18 वीं विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है, और यह भी देख रहे हैं कि मोदी जी कृपा रही तो फिर एक बाद बैठिये जायेंगे कुर्सी पर, युवा आयोग बनाने का लॉलीपॉप फेके &#8211; वैसे उनका जनता दल युनाइटेड का आकर भी संकुचित होगा। </p>
<p>बिहार सरकार ने युवाओं को आत्मनिर्भर और रोजगारोन्मुखी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘बिहार युवा आयोग’ के गठन को मंजूरी दी है। यह फैसला मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया, जिसमें कुल 43 प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई। इनमें विकास योजनाएं, नियुक्तियों की प्रक्रिया और आर्थिक प्रस्ताव भी शामिल हैं। आयोग में एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष और सात सदस्य होंगे, जिनकी अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष तय की गई है। यह आयोग राज्य के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दिलाने वाली नीतियों के पालन की निगरानी भी करेगा।</p>
<figure id="attachment_6932" aria-describedby="caption-attachment-6932" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6932" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6932" class="wp-caption-text">इस बार चुनाव के बाद मुख्यमंत्री आवास में कौन रहेंगे?</figcaption></figure>
<p><strong>मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म ‘एक्स’ पर जानकारी देते हुए कहा कि बिहार के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने, उन्हें प्रशिक्षित करने तथा सशक्त और सक्षम बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने बिहार युवा आयोग के गठन का निर्णय लिया है। यह आयोग इस बात की निगरानी करेगा कि राज्य के स्थानीय युवाओं को राज्य के भीतर निजी क्षेत्र के रोजगारों में प्राथमिकता मिले। साथ ही राज्य के बाहर अध्ययन करने वाले और काम करने वाले युवाओं के हितों की भी रक्षा हो। सामाजिक बुराईयों को बढ़ावा देने वाले शराब एवं अन्य मादक पदार्थों की रोकथाम के लिए कार्यक्रम तैयार कर और ऐसे मामलों में सरकार को अनुशंसा भेजना भी इसका महत्वपूर्ण कार्य होगा। राज्य सरकार की दूरदर्शी पहल का उद्देश्य है कि इस आयोग के माध्यम से युवा आत्मनिर्भर, दक्ष और रोजजगारोन्मुखी बनें, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो।</strong></p>
<p>आयोग के सदस्यों की अधिकतम उम्र सीमा 45 वर्ष होगी। यह आयोग राज्य सरकार को युवाओं के कल्याण, शिक्षा, रोजगार और उनके सर्वांगीण विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाह देगा। आयोग विभिन्न सरकारी विभागों के साथ समन्वय करेगा ताकि युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिल सकें। राज्य के बाहर जो युवा काम करने जाते हैं, उनके हितों की रक्षा करना भी इस आयोग का कार्य होगा। इनमें से सबसे बड़ा ऐलान मूल निवासी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण और युवा आयोग के गठन को लेकर किया गया है।</p>
<p>24 साल पहले तीन मार्च, 2000 को नीतीश कुमार ने पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. हालांकि, उनकी यह सरकार सात दिनों तक ही चल पायी. बहुमत का जुगाड़ नहीं हो पाने के कारण उन्होंने 10 मार्च, 2000 को इस्तीफा दे दिया। दूसरी बार वे पूरे बहुमत के साथ नवंबर 2005 में एनडीए सरकार के मुखिया बने। तीसरी बार पांच साल बाद हुए 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए एक बार फिर भारी बहुमत से सत्ता में आया और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। जदयू ने वर्ष 2013 में भाजपा से नाता तोड़ लिया था। लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, नीतीश कुमार भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेवारी लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने थे। जीतन राम मांझी करीब एक साल तक मुख्यमंत्री रहे। </p>
<p>वर्ष 2015 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ जदयू ने गठबंधन किया और महागठबंधन की सरकार बिहार में बानी और उस सरकार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि 2015 में बनी महागठबंधन सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं सर सकी। 2017 में तेजस्वी यादव पर सीबीआई की ओर से लगे आरोपों के बाद नीतीश कुमार ने महागठबंधन से रिश्ता तोड़ लिया। महागठबंधन से अलग होकर नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई और खुद छठवीं बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता दल युनाइटेड और बीजेपी साथ मैदान में उतरी। इसमें लोकसभा की 39 सीटों पर एनडीए को जीत मिली। लोकसभा चुनाव के ठीक एक साल बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव 2020 में भी जेडीयू ने एनडीए साथ रही। इस गठबंधन को जनता का भरपूर साथ मिला और सूबे में एनडीए की फिर से सरकार बनी। 2020 में जेडीयू को कम सीटें मिली, लेकिन बीजेपी ने नीतीश कुमार को सातवीं बार सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया।</p>
<p>हालांकि दो साल बाद ही 2022 में नीतीश कुमार और बीजेपी के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू एनडीए से अलग हो गई। राज्य में एनडीए की सरकार गिर गई। नीतीश कुमार ने फिर एक बार राजद के साथ मिलकर बिहार में महागठबंधन की सरकार बना ली। इस बार भी सीएम नीतीश कुमार ही रहे। यह आठवीं बार था जब नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार भी करीब डेढ़ साल ही टिक सकी। फिर नीतीश कुमार बीजेपी के संग मिलकर नौंवी बार सीएम बन रहे हैं। अब दसवीं की तैयार है बिहार के युवाओं को &#8216;युवा आयोग&#8217; और कर्पूरी ठाकुर के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित कर। शेष कार्य तो मतदाता करेंगे। </p>
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		<title>​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Apr 2025 12:32:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>डाक बंगला चौराहा (पटना): सत्तर के दशक से जिस तरह बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में अधिकारियों ने स्वयं अपना राजनीतिकरण प्रारम्भ कर दिया है। यानी कल राजनीति का अपराधीकरण हुआ था, आज राजनीति का अधिकारीकरण हो रहा है। वैसे सभी यही ताल ठोकते हैं कि &#8216;वे प्रदेश की भलाई के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar">​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डाक बंगला चौराहा (पटना): सत्तर के दशक से जिस तरह बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में अधिकारियों ने स्वयं अपना राजनीतिकरण प्रारम्भ कर दिया है। यानी कल राजनीति का अपराधीकरण हुआ था, आज राजनीति का अधिकारीकरण हो रहा है। वैसे सभी यही ताल ठोकते हैं कि &#8216;वे प्रदेश की भलाई के लिए कर रहे हैं, लेकिन इससे प्रदेश की कितनी भलाई हुई अथवा होगी, इस बात से वे भी भिज्ञ हैं और मतदाता तो अनभिज्ञ हैं ही नहीं, लाचार है। </strong>  </p>
<blockquote><p>अपराधियों ने जब सत्तर के कालखंड में इस बात को महसूस किया कि उनके बिना तत्कालीन राजनेताओं का अस्तित्व खतरे में आ सकता है, अपने अस्तित्व को मजबूत करने के लिए या फिर नेताओं का परस्पर लाभार्थी होने के उद्देश्य से स्वयं राजनीति में आने लगे। समय बदला और इस बदलते समय में राजनेताओं के पिछलग्गू अधिकारी जब इस बात को महसूस किए कि वे भी राजनीति में गोता लगा सकते हैं; अपने राजनीतिक मास्टर के बगल में बराबर की ऊँचाई में खड़े हो सकते है, अधिकारियों ने अपराधियों के राजनीतिक लाभ के तर्ज पर स्वयं का राजनीतिकरण शुरू कर दिया। वैसे भी प्रदेश का शैक्षिक दर इतना कम है कि मतदाता बात खुलकर बोल सकता है और न सोच सकता। उधर, चाहे अधिकारी हों या नेता, वे कभी चाहते ही नहीं कि मतदाता विचारवान हो। शब्द कटु है, लेकिन सत्य है और दुखद भी</p></blockquote>
<p>यह बोलने अथवा लिखने की आवश्यकता नहीं है, जहाँ तक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का प्रश्न है। इसका दृष्टान्त नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयोग टी.एन. शेषन से बेहतर और कोई नहीं हो सकता। स्वतंत्र भारत में चुनावी गंदगी को साफ़ करने में अगर किसी का नाम लिया जाता है, या आने वाले दिनों में भी लिया जायेगा तो टी.एन. शेषन का नाम सर्वोपरि होगा। साल 1990-96 के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में शेषन ने चुनावी प्रणाली को साफ करने की प्रक्रिया शुरू की थी। मतदाताओं के लिए फोटो पहचान पत्र की शुरुआत इसी दिशा में एक कदम था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि आदर्श आचार संहिता, जिसे तब तक अकादमिक हित का दस्तावेज माना जाता था, को पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा गंभीरता से लिया जाए। अपने पद से बाहर जाने के लिए आलोचनाओं का सामना करने के बावजूद, श्री शेषन ने बाहरी दुनिया को दिखाया कि उनका पद कोई आसान काम नहीं है।</p>
<figure id="attachment_6307" aria-describedby="caption-attachment-6307" style="width: 1984px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg" alt="" width="1984" height="2264" class="size-full wp-image-6307" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-263x300.jpg 263w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-897x1024.jpg 897w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-768x876.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-1346x1536.jpg 1346w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-1795x2048.jpg 1795w" sizes="(max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6307" class="wp-caption-text">पूर्व चुनाव आयुक्त (दिवंगत) टी एन शेषन और पूरब भारतीय पुलिस के अधिकारी डॉ. अजय कुमार, अब राजनीति में (Pic: from Kumar&#8217;s Twitter page)</figcaption></figure>
<p>शेषन अवकाश के बाद भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी के विरुद्ध गांधीनगर से चुनाव लड़े, हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1997 में आर.के.नारायणन के विरुद्ध राष्ट्रपति के लिए चुनाव लड़े, हार का सामना करना पड़ा। अंततोगत्वा मन में अधूरे कार्यों को पूरे करने की इक्षा लिए 10 नवम्बर, 2019 को अनंत यात्रा पर निकल गए। शेषन महज एक दृष्टान्त थे एक अधिकारी के रूप में जो अपने कार्यकाल में वैसा बहुत कुछ किये, जो एक अधिकारी को करना चाहिए। उन्हें भी अंत में राजनीति में आने की लालसा हुई, लेकिन अधूरी रह गयी। हम पूरे देश की बात नहीं करेंगे, लेकिन जब बिहार की बात आएगी तो यह कहते, लिखते पीछे भी नहीं रहेंगे कि बिहार लोकसेवा आयोग के साथ-साथ संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अव्वल आने के बाद, एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपना स्थान बनाने के बाद, सेवाकाल के दौरान अथवा सेवानिवृति के बाद, यहाँ तक कि नौकरी से त्यागपत्र देकर राजनीति में गोता लगाने के लिए आज अधिकारियों की संख्या क्यों बढ़ रही है?  </p>
<p><strong>विगत पचास वर्षों का इतिहास अगर देखा जाए उन अधिकारियों का जो प्रशासनिक अथवा पुलिस सेवा के बाद/बीच में त्यागपत्र देकर अगर राजनीति में आये तो उससे प्रदेश को क्या मिला? जिन मतदाताओं ने उनके लिए अपनी बाएं हाथ की तर्जनी पर चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित स्याही लगाए ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो, वे अधिकारी से राजनेता बने लोग उन मतदाताओं के चेहरों पर कालिख पोतने के अलावे क्या दिए? उनके विधानसभा अथवा संसदीय क्षेत्र के मतदाता एक घूंट पानी के लिए, एक टुकड़ा दवाई के लिए, एक रोटी के लिए, एक नियोजन के लिए, अपने बाल-बच्चों की पढ़ाई के लिए उम्मीद की आस लिए सांस लेते लेते अंतिम सांस ले लिए, लेकिन न प्रदेश का हित हुआ और ना ही मतदाता का। आप माने अथवा नहीं, लेकिन यह एक गहन शोध का विषय है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जी. कृष्णाया की हत्या भी एक दृष्टान्त है। मधेपुरा के तत्कालीन राज नेता आनंद मोहन ने 5 दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या कर दी थी। आनंद मोहन उक्त अधिकारी को उनकी आधिकारिक कार से बाहर खींच लिया गया और पीट-पीट कर मार डाला था। सन 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जी कृष्णैया वर्तमान तेलंगाना के महबूबनगर के रहने वाले थे। आनंद मोहन की रिहाई के तत्काल बाद जी कृष्णैया की विधवा ‘आश्चर्य’ व्यक्त की। आश्चर्य व्यक्त करना स्वाभाविक भी है। जी कृष्णैया की मृत्यु के बाद आनंद मोहन भले कारावास में हों, उनकी पत्नी श्रीमती लवली आनंद भारत के संसद में थी और बाद में पुत्र बिहार विधानसभा में विधायक। लेकिन जी कृष्णैया के बारे में, उनके परिवार के बारे में न तो व्यवस्था सोची और न ही राजनीतिक पार्टियों के नेता चाहे पटना के हों या दिल्ली में बैठे हों। वैसे चेतन आनंद यह कहते हैं कि ‘उस घटना के बाद दोनों परिवार काफी कुछ सहा है।’ </p>
<p>समय का तकाजा देखिए। जिस राष्ट्रीय जनता दल के शीर्षस्थ नेता, जो बाद में ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड में पहले आरोपी बने और फिर सजाभोक्ता के साथ-साथ मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर भी हुए, आनंद मोहन को कभी हाथ नहीं पकड़े, मदद नहीं किये। आज आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद बिहार के शिवहर से राष्ट्रीय जनता दल के विधायक हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की देखरेख में प्रदेश सरकार द्वारा जेल मैनुअल के नियमों में संशोधन किया गया और एक आधिकारिक अधिसूचना के आधार पर आनंद मोहन सहित 27 आपराधिक-कैदियों को जो 14 साल या 20 साल कारावास की सजा काट चुके, रिहा करने का आदेश दिया गया। रिहाई से पहले 15 दिनों तक वे ‘पे-रोल’ पर थे। </p>
<p><strong>अगर ख़बरों पर विश्वास करें तो आज 200 से अधिक भारतीय प्रशासनिक, पुलिस सेवा के अधिकारी, चिकित्सक, अधिवक्ता, और विभिन्न व्यवसायों के लोग विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के झंडों को अपने गले में बांध रहे हैं, उसके हो रहे हैं। वे कहते हैं बिहार का उद्धार होगा। सेवानिवृत्त पुलिस सेवा के अधिकारियों में आर. के.  मिश्रा, एस. के. पासवान, के. के. वर्मा और के. बी. सिंह शामिल हैं। मिश्रा पूर्व डीजी (होमगार्ड) थे जबकि एसके पासवान छत्तीसगढ़ के डीजी (जेल) के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इसके अलावे अजय कुमार द्विवेदी (पश्चिम चंपारण, सेवानिवृत्त विशेष सचिव, कैबिनेट, बिहार सरकार); अरविंद कुमार सिंह (भोजपुर, सेवानिवृत्त सचिव, पूर्व जिला मजिस्ट्रेट, कैमूर और पूर्णिया); ललन यादव (मुंगेर, सेवानिवृत्त आयुक्त, पूर्णिया, डीएम, नवादा, कटिहार); तुलसी हजार (पूर्वी चंपारण; सेवानिवृत्त प्रशासक बेतिया राज, बिहार सरकार); सुरेश शर्मा (गोपालगंज, सेवानिवृत्त संयुक्त सचिव, स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार) और गोपाल नारायण सिंह (औरंगाबाद, सेवानिवृत्त संयुक्त (सचिव, ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार सरकार) का भी नाम आता है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6306" aria-describedby="caption-attachment-6306" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6306" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6306" class="wp-caption-text">डॉ. अजय कुमार, अब राजनीति में (Pic: from Kumar&#8217;s Twitter page)</figcaption></figure>
<p>इससे पहले के वर्षों में डॉ. अजय कुमार, जो 1986-1996 तक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे, जमशेदपुर के पुलिस अधीक्षक भी थे, राजनीति में प्रवेश किये। रामचन्द्र प्रसाद सिंह, भाप्रसे के अधिकारी थे, नीतीश कुमार के मुख्य सचिव भी थे, राजनीति में चादर ढंक लिए, कहे प्रदेश का भलाई करेंगे। कभी जनता दल यूनाइटेड में रहे, कभी भाजपा में कटवत बदल लिए फिर अपनी पार्टी बनाये। उससे भी पहले दिल्ली के पुलिस आयुक्त निखिल कुमार, जिनका परिवार प्रदेश की राजनीति में ही सांस लिया, सेवा के पश्चात सांसद बने, फिर राजनीति में गोता लगाते गए। </p>
<p>भाप्रसे के एक और अधिकारी यशवंत सिन्हा 24 वर्ष सरकारी सेवक रहने के बाद पहले जनता दल के हुए, फिर बाद में भाजपा के हो गए। केंद्र में मंत्री भी बने। बाबू जगजीवन राम की पुत्री श्रीमती मीरा कुमार, 1973 में भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी बनी, राजनीति में डुबकी लगा दीं। लोक सभा की अध्यक्षा भी बनी। 1975 बैच के भाप्रसे राजकुमार सिंह जिन्होंने लालू यादव के कहने पर लाल कृष्ण आडवाणी को उनके प्रथम रथयात्रा के दौरान गिरफ्तार किया था, भाजपा के हो गए, केंद्र में मंत्री भी बने। गुप्तेश्वर पाण्डे अवकाश के पूर्व नौकरी छोड़ दिए और राजनीति में कम्बल ढँक लिए। सुनील कुमार आज नितीश के मंत्रिमंडल में बैठे हैं। लेकिन बिहार को छोड़िये, उनके संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं को क्या मिला ? </p>
<blockquote><p>उसी भाप्रसे-भापुसे यात्रा की अगली कड़ी में विगत दिनों भारतीय पुलिस सेवा के एक और अधिकारी बिहार में बहती राजनीतिक धारा में गोंता लगा दिए। महाराष्ट्र के मूलवासी शिवदीप लांडे, अब महाराष्ट्र के लोगों के लिए नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ेंगे। महाराष्ट्र के &#8216;शिवसेना&#8217; के तर्ज पर लांडे ने &#8216;हिंद सेना&#8217; नाम से नई राजनीतिक पार्टी की शुरुआत की। पटना में प्रेस सम्मेलन में उन्होंने इसकी घोषणा करते कहा कि उनकी पार्टी बिहार के लोगों के हक के लिए लड़ेगी और सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनके अनुसार, आजादी के 78 साल के बाद भी प्रदेश में जो बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए थी, वह नहीं पहुंची। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास को अपनी पार्टी का प्रमुख कार्य सूची बताया। </p></blockquote>
<p>लांडे के अनुसार, वे पुलिसिंग किये हैं, इसलिए जानते हैं कि बिहार में हर साल करीब 2700 से 3000 हत्याएं होती हैं। इनमें से करीब 57% हत्या जमीन विवाद को लेकर होती हैं। यानी हर साल 1500 से ज्यादा लोग सिर्फ जमीन के झगड़े में मारे जाते हैं। हर दिन 4 से 5 लोग मारे जाते हैं। वैसी स्थिति में एक आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा?  उनका कहना है कि &#8216;बहुत से लोग सोचते हैं कि न्याय उनकी जेब में है लेकिन उनकी पार्टी का &#8216;न्याय&#8217; का अवधारणा सिर्फ उनके लिए है जो सच्चे गरीब, वंचित और पीड़ित हैं। लांडे ने कहा कि उनकी पार्टी का प्रतीक &#8216;त्रिपुण्ड और खाकी&#8217; होगा, जो उनके अब तक के जीवन दर्शन को दर्शाता है। यह प्रतीक मानवता, न्याय और सेवा को दर्शाएगा। </p>
<figure id="attachment_6308" aria-describedby="caption-attachment-6308" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6308" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6308" class="wp-caption-text">महाराष्ट्र के मूलवासी और पूर्व भापुसे अधिकारी शिवदीप लांडे, ​अब महाराष्ट्र के लोगों के लिए नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ेंगे।</figcaption></figure>
<p>2006 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे लांडे ने पिछले साल सितंबर में सेवा से इस्तीफा दे दिया था। लांडे ने कहा, &#8220;18 साल तक वर्दी में बिहार की सेवा करने के बाद अब मैं जनता के बीच एक नई भूमिका में आना चाहता हूं। हिन्दू सेना पार्टी बिहार को बदलने और विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए काम करेगी।&#8221; महाराष्ट्र के अकोला जिले में जन्मे लांडे ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद सिविल सेवा में कदम रखा था। बिहार में उनकी पहली पोस्टिंग नक्सल प्रभावित मुंगेर जिले में हुई थी। स्वयं को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करते शिवदीप लांडे ने कहा कि अब हमारा उद्देश्य युवाओं को जोड़ना, संगठन खड़ा करना और चुनाव के लिए वैचारिक ताकत तैयार करना है। शायद लांडे साहब इस बात से भिज्ञ नहीं हैं कि 1974 में जयप्रकाश नारायण ने भी &#8216;छात्रों को, युवाओं को संगठित कर सत्ता की लड़ाई लड़े थे। आज वही लड़ाकू सत्ता की गलियारे में बैठे हैं और प्रदेश का क्या हश्र है, यह न तो पुलिस फाइल से छिपा है और ना ही अदालत से।&#8221; खैर। </p>
<p>बिहार के राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि &#8220;बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या 7.80 करोड़ है। इनमें 18-19 साल के सर्वाधिक कम उम्र के मतदाताओं की संख्या आठ लाख है। युवा में शुमार 30-39 आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 2.04 करोड़ है। आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादातर प्रौढ़ या बुजुर्ग मतदाता किसी न किसी दल के कोर वोटर होते हैं, जबकि युवा मतदाताओं का दिमाग कोरे स्लेट की तरह होता है। यानी ये फ्लोटिंग वोटर हैं। इन्हें जिस भी किसी दल या नेता पर विश्वास जम गया, वे उसी की ओर मुखातिब हो जाते हैं। बिहार में चूंकि ऐसे वोटरों की तादाद एक चौथाई है, इसलिए हर नया दल युवा को ही टारगेट करता है। जन सुराज के प्रशांत किशोर भी युवाओं की बात शिद्दत से रखते हैं। अब हिन्द सेना के शिवदीप लांडे भी युवाओं को लेकर ही राजनीति करने की बात कह रहे हैं।&#8221;</p>
<p>चलिए आगे बढ़ते हैं। मोहम्मद यूनुस (1 अप्रैल, 1937 से 19 जुलाई, 1937) और श्रीकृष्ण सिन्हा (20 जुलाई, 1937 से 31 अक्टूबर, 1939 तथा 23 मार्च, 1946 से 14 अगस्त, 1947 तथा 15 अगस्त, 1947 से 31 जनवरी, 1961) तक के मुख्यमंत्री कार्यालय का कालखंड कुछ क्षण के लिए अलग रखते हैं। साल 1961 के बाद साल 2025 तक बिहार को कुल 22 चेहरे मुख्यमंत्री के रूप में मिला। प्रदेश का आवाम साठ के दशक के कालखंड में क्या सोचता था, उसे भी अगर विश्रामावस्था में रखते हैं तो आज के मतदाताओं की नजर में इन 22 मुख्यमंत्रियों में कौन कैसा है? यह सभी &#8216;मन-आत्मा और शरीर से जीवित&#8217; पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ राजनेता जानते हैं।</p>
<blockquote><p>बिहार के लोगों का मानना है कि &#8220;इन 22 मुख्यमंत्रियों में सिवाय श्री भोला पासवान शास्त्री के अलावे कोई भी मुख्यमंत्री अग्निकुंड में प्रवेश कर अपनी छवि, अपनी ईमानदारी, मतदाता के प्रति अपनी वफ़ादारी की परीक्षा देने का कूबत नहीं रखता है। भ्रष्टाचार से लेकर अपराधों की दुनिया से प्रत्यक्ष ना सही, अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध रखता ही है। अगर भारत के निर्वाचन आयोग अपने कार्यालय में इन सम्मानित महानुभावों और राजनीतिक पार्टियों के झंडे तले राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले नेताओं द्वारा प्रस्तुत हलफनामे की तहकीकात करे, तो शायद दूघ और पानी की धाराएं अलग-अलग प्रवाहित दिखाई देगी। लेकिन निर्वाचन आयोग ऐसा नहीं कर सकती हैं और वह भी संविधान की धाराओं से बंधी है।&#8221; </p></blockquote>
<p> <br />
भारत को आज़ादी मिलने के बाद 15 अगस्त, 1947 से आज तक अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। </p>
<figure id="attachment_6309" aria-describedby="caption-attachment-6309" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6309" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6309" class="wp-caption-text">यशवंत सिन्हा</figcaption></figure>
<p>इन विगत वर्षों में मतदाता जितने ही गरीबी की रेखाओं से कई मील नीचे धंस रहे हैं, उनके नेता जमीन के ऊपर उतने ही उठ रहे हैं। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण प्रदेश के अधिकारी सरकारी नौकरियों को छोड़कर सरकार ही बनने के लिए आकर्षित होते हों।खैर। </p>
<p><strong>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक।</strong> </p>
<p>डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता – सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है – का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा। </p>
<figure id="attachment_6310" aria-describedby="caption-attachment-6310" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6310" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6310" class="wp-caption-text">​मीरा कुमार</figcaption></figure>
<p>लेकिन, प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में ”चाराचोर” के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के वावजूद राबड़ी देवी प्रदेश की मतदाताओं के विश्वास और अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतरीं। इसका मुख्य कारण था ‘अशिक्षा’, जिसे पति-पत्नी द्वय अपने जीवन में कभी महत्व नहीं दिए। अगर देते तो शायद अपनी अगली पीढ़ी के दोनों पुत्रों को शिक्षा की दुनिया में अव्वल बनाते। यही कारण है कि बिहार में शिक्षा का जो पतन कर्पूरी ठाकुर (आज भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत हैं) के कालखंड से प्रारम्भ हुआ, लालू यादव – राबड़ी देवी – नीतीश कुमार के कालखंड आते आते नेश्तोनाबूद हो गया, ध्वस्त हो गया। दृष्टान्त प्रदेश की साक्षरता दर है। </p>
<p>वैसे भारतीय राजनीति में ‘रामायण’ का चाहे जितना भी दृष्टान्त दिया जाय, वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में ‘विभीषणों’ का भरमार है और ‘भरत’ का घोर किल्लत है। यह किल्लत देश में तो है ही, बिहार में तो यत्र-तत्र-सर्वत्र है। अवसर की तलाश में गिद्ध जैसे लोग बैठे हैं। सत्ता में बने रहने और सत्ता से बाहर रहने पर शक्ति में जो कमी होती है, लालू यादव इस बात को मन ही मन स्वीकार लिए थे। लेकिन भारत का न्यायालय, देश की जाँच एजेंसियों की निगाह चौबीसों घंटा लालू यादव पर टिकी थी। जैसे ही चारा घोटाला काण्ड अख़बारों के पन्नों पर, न्यायालयों के फाइलों में आया, नितीश कुमार अवसर का लाभ उठाने हेतु सज्ज होने लगे। राजनीतिक शतरंज की गोटियां बिछने लगी। कल तक लालू यादव को बड़े भाई कहने वाले नीतीश कुमार सत्ता की गलियारे में लालू यादव की मुख्यमंत्री पत्नी को परास्त करने के लिए आगे आ गए। </p>
<p>नीतीश कुमार के बारे में उनके राजनीतिक गुरु जॉर्ज फर्नांडिस की सोच को जया जेटली ने भी उद्धृत किया है एक किताब में : “वे (जॉर्ज फर्नांडिस) हमेशा कहते थे कि नीतीश कुमार एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके दिमाग को वे कभी नहीं समझ सकते। सबसे बढ़कर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति होने के नाते, जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने की तारीख पर सहमत होने से इनकार कर देते थे या ऐसी बैठकों के दौरान बनी आम सहमति को पलट देते थे, तो वे रात में अकेले उनसे मिलने आते थे और अपने विचार रखते थे, जिस पर वे अमल करने पर ज़ोर देते थे। अक्सर, इस वजह से पार्टी ने अच्छे लोगों को भाजपा में खो दिया; ये वे लोग थे जो अक्सर मेरे साथ चाय पीते थे और नीतीश कुमार के बारे में अपनी पीड़ाएँ साझा करते थे। मैंने जॉर्ज फर्नांडिस को ऐसी बातें बताना अपना कर्तव्य समझा, लेकिन मैं यह भी जानता था कि इससे अनजाने में उनकी चिंताएँ बढ़ जाएँगी। वे हमेशा बड़े लक्ष्य की खातिर तर्कहीन बातों को तर्कसंगत बनाने के लिए उनके आगे झुक जाते थे।”</p>
<figure id="attachment_6311" aria-describedby="caption-attachment-6311" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6311" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6311" class="wp-caption-text">​निखिल कुमार</figcaption></figure>
<p>खैर। राजनीतिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो विगत 35 वर्षों से बिहार के सत्ता के सिंहासन पर दो व्यक्तियों का आधिपत्य रहा है – लालू यादव और कंपनी तथा नीतीश कुमार। 35 वर्षों का आधिपत्य होना और प्रदेश का उत्तरोत्तर पिछड़ा होते जाना – इस बात का प्रमाण है कि दोनों को प्रदेश के विकास से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता, 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव और उनके परिवार जिस तरह सत्ता के ऊपर कब्ज़ा किये, वह आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में काले अक्षर से लिखा जायेगा। आज भी उनके परिवार में दोनों पुत्र विधान सभा और दो संसद में (पत्नी-राज्य सभा और पुत्री लोक सभा) में बैठी है। अगर समुदाय की ही बात करें तो जिस गरीब-गुरबा, पिछड़ा, यादव आदि जातियों के नाम पर वे राजनीति में बरकरार रहे, उनके परिवार से बाहर कोई उस योग्य नहीं है? </p>
<p><strong>लालू के कालखंड में हत्या, अपहरण, फिरौती के लिए अपहरण आम था। उस काल खंड के जो भुक्तभोगी हैं, आज भी कलाप रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के राज में, जिन्हें सभी ‘सुशासन बाबू’ के नाम से अलंकृत किये हैं, रिश्वतखोरी की प्रथा अनियंत्रित है, अपने उत्कर्ष पर है और यह कतई नहीं माना जायेगा कि इसमें सत्ता के गलियारे में बैठे लोग, सत्ता से संरक्षित अधिकारियों, नेताओं का हाथ नहीं है।”  और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जिला स्तर से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक, बिहार के बारे में, बिहार की राजनीति के बारे में, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति, स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में लिखने वाले कभी इन बातों को उजागर नहीं किये, कर रहे हैं। नीतीश के राज में जो बुनियादी ज़रूरत है – शिक्षा, स्वास्थ्य सभी चरमरायी हुई है।</strong> </p>
<p>2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि  सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे। </p>
<figure id="attachment_6312" aria-describedby="caption-attachment-6312" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6312" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6312" class="wp-caption-text">​राज कुमार सिंह</figcaption></figure>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। </p>
<p>11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे – सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं। </p>
<figure id="attachment_6313" aria-describedby="caption-attachment-6313" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6313" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6313" class="wp-caption-text">आर सी पी सिंह</figcaption></figure>
<p><strong>एक दशक पहले 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक, उस समय बिहार के नवनिर्वाचित 243 विधायकों में से 142 यानी 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के अध्ययन के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल विधायकों में से 90 (40 फीसदी) पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। 70 विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। अध्ययन के मुताबिक, ‘अपने खिलाफ आपराधिक मामले बताने वाले 142 विधायकों में से 70 (49 फीसदी) ने बताया है कि अदालत उनके खिलाफ पहले ही आरोप तय कर चुकी है।’ 11 विधायकों पर हत्या या हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। इनमें से चार राष्ट्रीय जनता दल के हैं। </strong></p>
<p>एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) की ओर से किए गए विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्रशासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों की ओर से चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए शपथ पत्रों की पड़ताल की गई और संबंधित विवरण प्राप्त किया गया। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और दो केंद्र शासित प्रदेशों में 4,033 में से कुल 4,001 विधायकों का विवरण शामिल है। एडीआर ने कहा कि विश्लेषण में शामिल विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं। </p>
<p>इस रिसर्च में खुलासा हुआ है कि बिहार के 67 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार के 242 विधायकों में से 161 विधायक दागी हैं। यानी इन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। विधायकों के आंकड़ों को देखें तो केरल में 135 में से 95 विधायकों यानी 70 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इसी तरह दिल्ली में 70 में से 44 विधायक (63 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 284 में से 175 विधायक (62 प्रतिशत), तेलंगाना में 118 विधायकों में से 72 विधायक (61 प्रतिशत) और तमिलनाडु में 224 विधायकों में से 134 (60 प्रतिशत) ने अपने हलफनामे में स्वयं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले घोषित किए हैं।</p>
<figure id="attachment_6314" aria-describedby="caption-attachment-6314" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6314" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6314" class="wp-caption-text">​बिहार विधान सभा</figcaption></figure>
<p>कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24) और दिलीप कुमार जायसवाल (2024 से अब तक) ये सभी पिछले 44 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। सवाल यह है कि इन लोगों के कार्यकाल में भाजपा मजबूत हुआ, पार्टी मजबूत हुयी, भाजपा में बिहार के मतदाताओं का रुझान क्या रहा, यह इस बात का ,प्रमाण है कि आज भी 43 विधायकों के साथ नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और भाजपा के नेता उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। 2015 में विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या भले 53 से बढ़कर 17वीं विधानसभा में 74 हो गया हो; लेकिन यह संख्या भाजपा की अपनी नहीं है। यह संख्या नीतीश कुमार द्वारा दान स्वरुप हैं। 2015 में जनता दल यूनाइटेड की विधानसभा में संख्या 71 थी, जो 17वीं विधानसभा में 43 हो गयी। राष्ट्रीय जनता दल की संख्या भले 80 से घटकर 75 हो गया हो, लेकिन आज भी मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ है। </p>
<p><strong>​क्रमशः &#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar">​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>मोदीजी का नारा &#8220;पढ़ेगा इण्डिया-तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; झरिया (झारखण्ड) के भाजपा विधानसभा अभ्यर्थी पर लागू नहीं होता है, झरिया विधानसभा की मिट्टी गवाह है (भाग-2)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Nov 2024 11:09:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>झरिया (धनबाद) : झरिया और घनबाद के स्थानीय लोग, यहाँ तक कि भाजपा के कार्यकर्त्ता भी यह कहते नहीं थक रहे हैं कि &#8216;प्रधानमंत्रो नरेंद्र मोदी का &#8220;पढ़ेगा इण्डिया तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; का नारा झरिया विधान सभा के मतदाताओं के कानों तक पहुंचा भले हो, लेकिन भाजपा के अभ्यर्थी के कानों तक नहीं पहुंचा। शिक्षा के महत्व को [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/modis-padhega-india-badhega-india-slogan-not-apply-for-jharia-candidate">मोदीजी का नारा &#8220;पढ़ेगा इण्डिया-तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; झरिया (झारखण्ड) के भाजपा विधानसभा अभ्यर्थी पर लागू नहीं होता है, झरिया विधानसभा की मिट्टी गवाह है (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>झरिया (धनबाद) : झरिया और घनबाद के स्थानीय लोग, यहाँ तक कि भाजपा के कार्यकर्त्ता भी यह कहते नहीं थक रहे हैं कि &#8216;प्रधानमंत्रो नरेंद्र मोदी का &#8220;पढ़ेगा इण्डिया तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; का नारा झरिया विधान सभा के मतदाताओं के कानों तक पहुंचा भले हो, लेकिन भाजपा के अभ्यर्थी के कानों तक नहीं पहुंचा। शिक्षा के महत्व को दर्शाते हुए पांच वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में इस नारा को बुलंद किये थे। दुर्भाग्य यह रहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में हार के 1825 दिन बाद भी श्रीमती रागिनी सिंह को शिक्षा के प्रति लालसा जागृत नहीं हो पाया, वे विद्यालय/महाविद्यालय तक नहीं पहुँच सकीं।</strong></p>
<p>आगामी 20 नवम्बर को 18 वर्ष की आयु और अधिक के मतदाता जो अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, का कहना है कि &#8216;अगर रागिनी सिंह चाहती तो इन विगत वर्षों में अपनी शैक्षिक योग्यता में इजाफा अवश्य कर लेती। अगर चयनित उम्मीदवार शिक्षित नहीं होगा तो क्षेत्र में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कैसे करेगा? ऐसे स्थिति में भाजपा का यह नारा &#8216;पढ़ेगा इण्डिया तो बढ़ेगा इण्डिया&#8217; झरिया विधानसभा क्षेत्र में तो लागु नहीं होता है। यह दुर्भाग्य है। </p>
<blockquote><p>मतदाताओं का माने तो उनकी बातों में दम है। लोगबाग तो यह भी कह रहे हैं कि शिक्षा के मामले में झरिया से कांग्रेस के उम्मीदवार और श्रीमती रागिनी सिंह के देवर (दिवंगत) की पत्नी श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह का जबाब नहीं है। इतना ही नहीं, मतदाता तो यह भी कह रहे हैं कि &#8216;जिस सुरक्षा कवच में उनके प्रतिनिधि (श्रीमती रागिनी सिंह) मतदाताओं से मुखातिब होती हैं, वह मतदाता-मत-और मतदान के बीच बहुत बड़ा फासला को दर्शाता है। यह अलग बात है कि 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा की रागिनी सिंह कांग्रेस की श्रीमती पूर्णिमा सिंह से महज आठ फीसदी मतों से पीछे रही। खैर। राजनीति में शिक्षित लोगों की जरूरतअब रही कहाँ जब से राजनीति का अपराधीकरण हो गया या फिर अपराधियों का राजनीतिकरण होने लगा और झरिया-धनबाद कोयलांचल की मिट्टी से अधिक गवाही और कौन दे सकता है। </p></blockquote>
<p>बहरहाल, पैंतालीस वर्ष बीत गए। उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1979 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब &#8216;हां&#8217; में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा। करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।</p>
<p>धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर तत्कालीन कलकत्ता तक, पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है। समय सब देख रहा था। सभी समय के सीसीटीवी कैमरा में थे। </p>
<figure id="attachment_5831" aria-describedby="caption-attachment-5831" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1.jpg" alt="" width="2048" height="1152" class="size-full wp-image-5831" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5831" class="wp-caption-text">भाजपा के श्रीमती रागिनी सिंह (तस्वीर उनके फेसबुक पृष्ठ से) साथ खड़े हैं श्री सिद्धार्थ सिंह गौतम, सूर्यदेव सिंह के सबसे छोटे पुत्र</figcaption></figure>
<p><strong>आज साढ़े चार दशक बाद सिंह मैंशन के &#8216;गौतम&#8217; अपने दो भाभियों की राजनीतिक युद्ध में अपनी चचेरी भाभी कांग्रेस की अभ्यर्थी श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह के विरुद्ध अपनी भाभी श्रीमती रागिनी सिंह के साथ खड़े हैं। एक तरफ &#8216;हार&#8217; और दूसरे तरफ &#8216;जीत&#8217; के बीच चुनाव की धारा बाह रही है। श्रीमती पूर्णिमा सिंह के पति और झरिया के पूर्व विधायक नीरज सिंह (गौतम के चचेरे भाई) की हत्या के जुर्म में श्रीमती रागिनी सिंह के पति संजीव सिंह (गौतम के सगे भाई) जेल में बंद हैं। आज सिंह मैंशन में भले भारतीय जनता पार्टी का झंडा लहराते-फहराते दिखे, लेकिन अन्तःमन से सभी सूर्यदेव सिंह की ताकत से आशीष की प्रार्थना कर रहे हैं। वैसे चुनाव में झरिया का मतदाता किसके पक्ष में अपना मतदान करेगा यह तो मतदाता जाने।</strong></p>
<figure id="attachment_5832" aria-describedby="caption-attachment-5832" style="width: 1614px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh.jpg" alt="" width="1614" height="1350" class="size-full wp-image-5832" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh.jpg 1614w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-300x251.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-1024x857.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-768x642.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-1536x1285.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1614px) 100vw, 1614px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5832" class="wp-caption-text">कांग्रेस की अभ्यर्थी श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह</figcaption></figure>
<p>कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। झरिया विधान सभा की मिट्टी आज भी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।</p>
<p>25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।</p>
<p>कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।</p>
<p>आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।</p>
<p>पिछले दिनों सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी। रामधीर सिंह बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।  उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। विनोद सिंह बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।</p>
<p>15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड़तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेसडर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।</p>
<p>कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे। </p>
<p>सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा और कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही। धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगे। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़े हुए थे, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर। इस चुनाब के बाद परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई।</p>
<p><strong>सूर्यदेव सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी कुंती देवी को लोगों ने धनबाद जिले के झरिया विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक बनाया। उनकी राजनीतिक जमीन झरिया में इतनी पुख्ता थी कि उनके बेटे संजीव सिंह को लोगों ने विधानसभा भेजा। सूर्यदेव सिंह का धनबाद में बना आवास सिंह मेंशन आज भी है, फर्क सिर्फ इतना ही है कि सिंह मेंशन में रहने वाले पांच भाइयों में चार का कुनबा आज बिखर गया है। सूर्यदेव सिंह पांच भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह (अब दिवंगत) बच्चा सिंह (अब दिवंगत) और रामधीर  सिंह (आजीवन कारावास) सूर्यदेव सिंह (अब दिवंगत) के साथ रहे। उन दिनों सूर्यदेव सिंह पर प्रशासन अपनी पकड़ बना रही थी, उसी काल खंड में सूर्यदेव सिंह आरा लोक सभा से चुनाव लड़ने लगे। उधर चन्द्रमा सिंह बलिया लोक सभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने को ठान लिए। उन दिनों बलिया में सूर्यदेव सिंह के राजनितिक गुरु चंद्रशेखर चाहते थे कि चन्द्रमा सिंह अपनी उम्मीदवारी वापस ले ले। वजह यह था कि बलिया में चंद्रशेखर के अभ्यर्थी चुनावी मैदान में थे। </strong></p>
<p>चंद्रशेखर सूर्यदेव सिंह को बात-बार कहे कि चन्द्रमा सिंह को उम्मीदवारी वापस लेने को कहो। सूर्यदेव सिंह के कहने पर भी चन्द्रमा सिंह ऐसा नहीं किये। बाद में जब सूर्यदेव सिंह चंद्रशेखर से बात करना चाहे तो चंद्रशेखर बात करने से मन कर दिए और यहीं अंत हो गया सूर्यदेव सिंह का सूर्य। उधर सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद बच्चा सिंह झरिया के विधायक बने और सिंह मैंशन के तर्ज पर &#8216;सूर्योदय&#8217; बना लिया और राजन सिंह का परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहती रही । सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद &#8216;सूर्योदय&#8217; और &#8216;सिंह मैंशन&#8217;  में कभी मधुर सम्बन्ध नहीं रहा, जहाँ तक नयी पीढ़ियों का सवाल है। नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। अब बच्चा सिंह नहीं हैं। </p>
<p>उन दिनों सूर्यदेव सिंह अपने उत्कर्ष पर थे। उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा। चंद्रशेखर अब तक प्रधान मंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने।</p>
<p>एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। पर कोयलांचल में अभी भी ‘‘सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा है, अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया और चारों भाईयों एवं उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है।</p>
<p>खैर। कहने वाले तो कह रहे हैं कि इतने समय के बाद भी, इतने पैसे के बाद भी, इतनी हत्याओं के बाद भी, इतने नेताओं की उपस्थिति के बाद भी धनबाद में कोई ‘आमूल’ परिवर्तन नहीं हुआ। जिस अधिकारी के सेवा काल में सूर्यदेव सिंह पर कमान कैसा गया, सैकड़ों अधिकारी आये, दर्जनों डिप्टी कमिश्नर बदले गए, दर्जनों पुलिस अधीक्षक आये-गए; सैकड़ों – हज़ारों नेता बने, कोई पटना एक्सपोर्ट हुए तो कोई रांची और कोई दिल्ली।</p>
<p><strong>आगे जारी है &#8230;&#8230;&#8230;</strong></p>
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		<title>&#8216;कैसे मनाऊँ पियवा गुन मेरे एकहू नाहीं&#8217; &#8230;&#8230;. शेष तो आप जनबे करते हैं</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/nitish-versus-bjp-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Aug 2022 12:11:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नीतीश कुमार अगस्त क्रांति के पूर्व संध्या तक सुशासन बाबू कहलाते थे। 11 अगस्त 2022 से दुशासन बन गये। दुर्योधन के अनुज के नाम वाले। कारण ? सत्ता का उन्होंने एक बार फिर चीर हरण कर डाला। दो दशकों में कितनी बार पल्ला झाड़ा? पलटूराम बने। होडल (हरियाणा) के विधायक श्री गया लाल (1967) की [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नीतीश कुमार अगस्त क्रांति के पूर्व संध्या तक सुशासन बाबू कहलाते थे। 11 अगस्त 2022 से दुशासन बन गये। दुर्योधन के अनुज के नाम वाले। कारण ? सत्ता का उन्होंने एक बार फिर चीर हरण कर डाला। दो दशकों में कितनी बार पल्ला झाड़ा? पलटूराम बने। होडल (हरियाणा) के विधायक श्री गया लाल (1967) की भांति जिन्होंने एक ही दिन में दो बार पार्टी बदली। आया राम-गया राम कहलाये। वे भी नीतीश से उन्नीस ही पड़े। हालांकि विगत 7 मई 2022 को ही आभास हो गया था कि नीतीश पार्टी उलटेंगे। उसी दौर में मुख्यमंत्री सरकारी आवास (1 एमएस अणे मार्ग, पटना) को तजकर वे अपने पुराने मकान (7 सर्कुलर रोड) चले गये थे। साथ में अपनी 17 गायों को भी ले गये थे। उनकी रूष्टता का कारण था कि रामविलास पासवान के पुत्र चिराग ने चुनाव में उनकी पार्टी की रोशनी गुल कर दी थी। नीतीश की पार्टी जनता दल (यू) केवल 43 विधायक ही जीती। भाजपा 74 जीत ले गयी। तभी नीतीश समझ गये थे कि अब डेरा बदलना होगा। भगवा को तजना होगा। यूं भी अप्रैल माह में जब लालू यादव की इफ्तार पार्टी में बकरा और चूूजा चबाया जा रहा था तो उसमें बड़ी गर्मजोशी से मुख्यमंत्री भाग लिया। कुर्मी-यादवों का ऐसा समागम मगध इतिहास में दिलचस्प रहा। नीतीश कुमार कुर्मी सिरमौर हैं। यूपी में बाबू बेनी प्रसाद वर्मा कभी होते थे।</strong></p>
<p>फिलहाल नीतीश द्वारा एक बार पासा पलटने के पीछे अलग-अलग वजह बतायी जाती हैं। वे उपराष्ट्रपति नहीं चयनित हुये तो मन उचट गया।  अगला कारण है कि वे वैकल्पिक प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। पिछले आम चुनाव में वे सोनिया से वार्ता हेतु भी  मिलने भी गये थे। सोनिया का धूर्तताभरा उत्तर था: ‘‘राहुलजी सब देख रहे हैं।‘‘ एक सीट पर दो कैसे बैठते ? नीतीश तो रेल मंत्री भी रह चुके हैं। भलीभांति जानते हैं कि आरएसी (प्रतीक्षारत सीट) केवल एक ही को मिलती है। राहुल के मुकाबले नीतीश कहा ठहरते ? फिर वे ममता को भी पसंद नहीं करते थे। एक बार दोनों संसद भवन में रेल मंत्री के कमरे के लिये आपस में तेजी  से भिड़ चुके है। भला हो जार्ज फर्नांडिस का कि साथी नीतीश को मना लिया। जिद्दन बंगालन को कमरा मिल गया। भारत के दो काबीना मंत्री एक अदना कक्ष के लिये लड़े !! वाह !</p>
<p>ऐसा ही एक और वाकया था। नीतीश कुमार अपने रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में अपनी ही समता पार्टी मंत्री (बाकां के सांसद) दिग्विजय सिंह को दोबारा राज्य मंत्री स्वीकारने के लिये तैयार नहीं थे। पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दबाव डलवा कर पार्टी ने उन्हें बनवा दिया। इसी बीच शरद यादव से गठजोड़ कर नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडिस को पार्टी अध्यक्ष पद पर से हटवा दिया।</p>
<p>तो कुल मिलाकर अवधारण यही बनी थी कि सत्पुरूष नीतीश धोखा, दगा, कपट और विश्वासघात में भी अपना दखल रखते हैं। उनके झासें में लालू यादव, जो स्वयं शातिर और पलट जाने में माहिर हैं, भी नीतीश के खेमे में भीतर बाहर आते जाते रहे। जेपी आन्दोलन के ये दोनों भाई समूचे बिहार को रेहन बना चुके हैं, बंधक भी।</p>
<figure id="attachment_4317" aria-describedby="caption-attachment-4317" style="width: 1562px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1.jpg" alt="" width="1562" height="997" class="size-full wp-image-4317" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1.jpg 1562w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1-300x191.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1-1024x654.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1-768x490.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/Tejswi-Yadav-1-1536x980.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1562px) 100vw, 1562px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4317" class="wp-caption-text">तेजस्वी यादव</figcaption></figure>
<p>अदला बदली से अब नीतीश पर आमजन की बची खुची आस्था भी लुप्त हो जायेगी। सवाल है कि ऐसा मानसिक रूप से अस्थिर पुरूष उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा केन्द्रीय मंत्री  बन जाये तो? खुदा खैर करे।</p>
<p>अचरज होता है कि ये दोनों, (लालू यादव और नीतीश कुमार) भ्रष्ट कांग्रेसी मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को हटाने के संघर्ष में जेल गये थे। मगर यही भ्रष्ट कांग्रेसी मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर बाद में नीतीश कुमार की समता पार्टी के अगुवा बन गये। उन्हें चाभी दी किसने ?</p>
<p>गत सप्ताह की घटनाओं का एक कारण यह भी है कि भाजपायी मंत्री शाहनवाज हुसैन ने कह दिया था कि नीतीश कुमार केवल 2025 (तीन साल और) तक ही मुख्यममंत्री बने रहेंगे। अब नीतीश को खुद समझना चाहिये कि भाजपा में राजनीतिक रिटायरमेंट आयु सत्तर पर है। उसके बाद मार्गदर्शक मण्डल में नामित हो जाते हैं। नीतीश कहां जाते ? तो क्या तब तक नीतीश भाजपा के हमबिस्तर रहते, मुसलमानों के प्यारे बने रहते या लालूपुत्र तेजस्वी के तेज में झुलसते रहते ! यह नागवार गुजरता। फिर भी नेहरू-टाइप प्रवृत्ति से ग्रसित रहकर नीतीष तिरंगे में लिपट कर ही जाना चाहते है, तो क्यों सिंहासन छोड़े? भले ही जनता ललकारती रहे।</p>
<p>एक किस्सा और। बिहार का आधुनिक इतिहास गवाह है कि बिहार का यह सियासी पुरोधा देश की मीडिया में छाया रहा। चूंकि नीतीश एनडीए के मुख्यमंत्री थे अतः यूपी के योगी आदित्यनाथ जी ने नीतीश कुमार को एक सुझाव दिया। इस्लामी नाम बदलने वाली अपनी रौ में योगी जी ने कहा कि पड़ोसी बिहार में नालन्दा से सटा बख्तियारपुर शहर है जो अभी भी पुराने नाम के बोझ तले दबा हुआ है। परिवर्तन की मांग उठ रही है। योगीजी की इस मांग में काफी दम है। नालन्दा विश्वविद्यालय मानव इतिहास में ज्ञान की अमूल्य धरोहर थी। कट्टर इस्लामी हमलावर ने उसे जला दिया। इतिहास साक्षी है कि बौद्ध शोध कार्य, धर्म, इतिहास आदि की पुस्तकें नालन्दा संग्रहालय में अकूत थीं। इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने सब नष्ट कर दिया। विक्रमशिला विश्वविद्यालय को भी इसी लुटेरे बख्तियार ने राख में बदल दिया था।</p>
<p>इस्लामी क्रूरता और असहिष्णुता के ऐसे बटमारों के नाम पर रखा गया है जेडीयू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का विधानसभा क्षेत्र और कौटुम्बिक गांव। रेलवे स्टेशन अभी भी बख्तियारपुर जंक्शन कहलाता है। योगीजी ने याद दिलाया कि पूर्वी यूपी का मुगलसराय स्टेशन अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कहलाता है। यहीं पर भाजपा चिंतक की हत्या हुई थी। नीतीश कुमार दशकों से राज करते रहे पर मुस्लिम वोट के खातिर अपने क्षेत्र का नाम नहीं बदल सके। इसीलिये योगीजी ने राय दी। वोटों का दबाव ? </p>
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		<title>नितीश जी कहते है वे प्रदेश के &#8216;शिल्पकार&#8217; हैं, लेकिन मतदाता भी एक बार सोचे जरूर &#8216;ऊँगली में कालिख़ पोतने से पहले&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Oct 2020 16:23:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[Nitesh]]></category>
		<category><![CDATA[political-craftsman]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अगर बिहार के वर्तमान मुख्य मंत्री नितीश कुमार वाला जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य सहयोगी पार्टियाँ चुनाव जीतकर वापस आती हैं और नितीश कुमार की आगुआई में पुनः सरकार बनाते हैं, तो देश में अब तक 43 सबसे अधिक दिनों तक मुख्य मंत्रियों की कुर्सियों पर बैठने वाले सातवें स्थान से छठे स्थान पर आ [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>अगर बिहार के वर्तमान मुख्य मंत्री नितीश कुमार वाला जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य सहयोगी पार्टियाँ चुनाव जीतकर वापस आती हैं और नितीश कुमार की आगुआई में पुनः सरकार बनाते हैं, तो देश में अब तक 43 सबसे अधिक दिनों तक मुख्य मंत्रियों की कुर्सियों पर बैठने वाले सातवें स्थान से छठे स्थान पर आ जायेंगे। आकंड़ों के हिसाब से अब तक उनकी अवधि 15 साल के करीब है। </p>
<p>नितीश कुमार पहली बार 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने, पर्याप्त बहुमत नहीं था इस लिए इस्तीफा दे दिया। दूसरी बार 24 नवंबर 2005 से 24 नवंबर 2010 तक बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई, पूरे पांच साल तक चली सरकार। तीसरी बार ये 26 नवंबर 2010 से 17 मई 2014 तक बीजेपी के साथ मिलकर फिर सरकार बनाई, परन्तु, लोकसभा चुनाव के पहले गठबंधन टूटने के कारण जीतनराम मांझी को सीएम बनाया।  चौथी बार 22 फरवरी 2015 से अभी तक बीजेपी के सहयोग से मुख्य मंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं। </p>
<p>अब तक की सांख्यिकी के अनुसार नितीश कुमार से अधिक समय तक बिहार के मुख्य मंत्री बने रहने में श्री कृष्ण सिंह का ही नाम है। इतना ही नहीं, देश के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी श्री नितीश कुमार से लगभग तीन साल कम अवधि तक गुजरात के मुख्य मंत्री थे। </p>
<p>लेकिन सबसे बड़ा सवाल, वह भी गोलघर और बिस्कोमान की ऊंचाई से अभी ऊँचा, यह है कि इन 15 सालों में नितीश कुमार बिहार के विकास के लिए क्या किये ? बिहार के मतदाताओं के लिए क्या किये ? बिहार की महिलाओं के लिए क्या किये ? स्कूल-जाते बच्चे-बच्चियों के लिए क्या किये ? सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के लिए क्या किये ? प्रदेश के बेरोजगार युवक/युवतियों के लिए क्या किये ? प्रदेश के पुलिस कर्मियों के लिए क्या किये ? सरकारी दफ्तरों में अनुशासन कायम हो &#8211; इसके लिए क्या किये ? प्रदेश में भ्रष्टाचार में गोता लगाने वाले बाबू लोगों के लिए क्या किये ? प्रदेश में कितने उद्योगों का स्थापना किये ? कितने रुग्ण, बंद उद्योंगो को खोलकर रोजगार का इंतज़ाम किये ? यानि &#8220;रिपोर्ट कार्ड पहले &#8211; अंगूठा करना बाद में। </p>
<p>अगर प्रदेश के मतदाता अपने-अपने क्षेत्रों के सभी 243 विधायकों को रिपोर्ट-कार्ड प्रस्तुत करने के लिए बाध्य कर दे, या  झंडा उठा ले की बिना रिपोर्ट-कार्ड की प्रस्तुति के वे आगामी आगामी चुनाव में उन्हें मतदान नहीं करेंगे, अथवा &#8220;नो&#8221; वाला बटन दबा दें, तो आगामी महीनों में अपनी-अपनी मूछों पर तेल-घी लेपने वाले विधायक और विधायक के नेता क्या करेंगे? </p>
<p>सवाल बहुत बड़ा है। सवाल का उत्तर सिर्फ यह नहीं है कि &#8220;वर्चुअल रैली&#8221; में अपनी सरकार का &#8216;रिपोर्ट कार्ड&#8217; &#8220;वर्चुअली&#8221; प्रस्तुत कर देना की हमने, हमारी पार्टी ने विगत 15 -सालों में 600,000  लोगों को रोजगार दिया &#8211; तो यह हज़म नहीं होता। और अपनी कामयाबी की तुलना राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव और उनकी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी से करें और यह कहें की &#8220;फलनमा मुख्य मंत्री 95 734 लोगों को ही रोजगार दे पायी अपने 15 साल की सत्ता में &#8211; यह गलत है। यानि जनता दल (यूनाइटेड) नेता की सोच राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं तक ही सीमित हो जाती है, जहाँ तक तुलनात्मक अध्यन का सवाल है। /</p>
<p>इस बात पर सन 1974 की बिहार विद्यालय परीक्षा परिणाम से सम्बंधित एक बात बताता हूँ। परिणाम घोषित होने के बाद एक ग़रीब पिता, पुत्र का परीक्षा परिणाम घोषित होते ही पूछे: &#8220;क्या हुआ रिजल्ट/&#8221; बेटा इधर-उधर दखते कहता है: बाबूजी, इंजिनियर साहेब का बेटा जो पटना कॉलेजिएट में पढता था, वह फेल कर गया। पिता की बेचैनी बढ़ने लगी।  फिर पूछे: तुम्हारा क्या हुआ।  बेटा कुछ क्षण रूककर कहा: आपके मित्र डाक्टर साहेब का भी बेटा फेल कर गया। अब तक बाबूजी हथ्थे से कबड़ गए थे, फिर पूछे, तुम्हे क्या हुआ? बेटा मुस्कुराते कहता है: &#8220;हम कउनो उससे अधिक पढ़ाकू थे क्या?</p>
<p>नितीश बाबू, अपनी उपलब्धि अथवा अनुपलब्धियों की तुलना अगर आप राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव या राबड़ी देवी के मुख्य मंत्रित्वकाल से करते हैं, प्रदेश के लोगों को, देश के लोगों को या विश्व को बताते हैं &#8220;मुस्कुराते हुए&#8221; तो यह आपकी सोच का, आपकी मानसिकता का मजाक उड़ाता है। तुलनात्मक सांख्यिकी ही देना था, सोचना ही था तो श्रीकृष्ण सिंह के साथ तुलना करते; गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से तुलना करते। देखिये न !! गुजरात के मुख्य मंत्री देश का प्रधान मंत्री बन गए और जिनसे आप स्वयं को, अपनी पार्टी की उपलब्धियों की तुलना किये वे &#8220;न्यायालय&#8221; का &#8220;जेल&#8221; का चक्कर लगा रहे हैं। </p>
<p>नितीश जी, बात करैला और नीम से भी कड़ुआ है, लेकिन सत्य तो यही है। आप मन ही मन मानेंगे भी। </p>
<p>बहरहाल, नितीश कुमार भले &#8220;स्वयंभू प्रवक्ता होकर कोविड -19 के बारे में कहते फिरें की वे कैसे इसे रोके, ताकि प्रदेश के लोगों में जान-माल कम हो, यह तो उनकी आत्मा ही गवाह होगी। ऐसा भी नहीं हो सकता है कि देश के सभी लोग, प्रदेश के सभी लोग, सम्वाद की दुनिया से जुड़े सभी लोग &#8220;झूठे&#8221; हैं, और नितीश बाबू और उनके चेले-चपाटी हरिश्चन्द्र हैं। वैसे बोलने की स्वतंत्रता तो सभी को। संविधान के सूची में लिखा है। </p>
<p>अभी था तो हम सभी 3Rs पढ़ते थे, जानते थे। नितीश बाबू के लोग अब 3Cs को शब्दकोष में ढुकाए, यानि क्राईम , करप्शन और कम्युनलिज्म। हम सभी अपराधों की श्रेणियों पर ध्यान नहीं देते और सिर्फ एक सांख्यिकी देते हैं कि आपके राज्य में विगत 10 सालों में, यानि 2010 से अब तक कुल 63,974 लोगों की हत्या हुयी है। क्या आप या आपकी सरकार, पुलिस यह बता सकती है कि जो मारे गए, उनके परिवार को न्याय मिला? क्या जिन्होंने जघन्य हत्या किये, उन्हें आपकी सरकार दण्डित की? आप तो तुरंत कह देंगे की हमारा काम, हमारी पुलिस का काम उस अपराधी को पकड़ना है, दंड देना या नहीं देना तो न्यायलय का काम है १ हैं न नितीश बाबू?</p>
<p>नितीश बाबू, आप तो पराकाष्ठा उस समय पार कर दिए जब आपने आधिकारिक तौर पर यह कह दिए कि &#8220;प्रदेश के आज की पीढ़ी को नशाबंदी के बारे में बापू (महात्मा गाँधी) का पाठ पढ़ने की जरुरत नहीं है। हमारी सरकार प्रदेश के युवाओं और महिलाओं के मांग पर शराब-बंदी किये।&#8221;</p>
<p>नितीश बाबू, आपका शराब बंदी का फैसला निश्चित रूप से बेमिशाल है, और इसमें आपके तत्कालीन डी जी पी गुप्तेश्वर पांडे का बहुत ही बेहतरीन सहयोग रहा है। लेकिन  आज तक की स्थिति  अवलोकन किया जाय तो ऐसा लगता है  आप न केवल अपने प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का राजनीतिक दृष्टि से किया, स्वहित में; बल्कि उन महिलाओं के कंधे पर बन्दुक रखकर चलाया जो &#8220;अशिक्षित&#8221; ही नहीं, &#8220;अनपढ़&#8221; और &#8220;गंवार&#8221; हैं। आपके प्रदेश में महिलाओं की साक्षरता दर 52 फीसदी के आस-पास  है, पुरुषों की साक्षरता दर से 20+ फ़ीसदी कम है। एक संयुक्त अभियान के तहत इन्ही 20 + फीसदी महिलाओं की को लेकर &#8220;शराब-बंदी&#8221; की राजनीति हुई। आज नहीं तो कल, यह बात बिहार के अधिकारी ही कहेंगे, वह भी प्रेस कांफ्रेंस करके &#8211; फिर नहीं कहियेगा की &#8220;सब राजनीति है&#8221; और मुझे बदनाम करने के लिए किया गया है। </p>
<p>खैर, हम सभी आपको शुभकामनाएं देते हैं आप विजय हों, भाग्यशाली हों, इतिहास के रचनाकार को, बिहार की राजनीति के शिल्पकार हों &#8211; लेकिन महादेव से प्रार्थना भी करते हैं कि प्रदेश के मतदाताओं को भी &#8220;सोचने&#8221; की शक्ति अवश्य दे &#8211; वह भी &#8220;ऊँगली में कालिख़ पोतने से पहले। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/nitish-ji-you-are-the-political-craftsman-of-the-state">नितीश जी कहते है वे प्रदेश के &#8216;शिल्पकार&#8217; हैं, लेकिन मतदाता भी एक बार सोचे जरूर &#8216;ऊँगली में कालिख़ पोतने से पहले&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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