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	<title>toilet Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Jul 2025 04:11:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year">भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी के 64-साल बाद भी समाज के लोग &#8216;शौचालय के महत्व&#8217; को समझ नहीं पा रहे थे। उसके मायके के घर में सदा ही शौचालय रहा, जिसे वह सात भाई-बहनों के साथ प्रयोग करती रही। उसके पिता श्री अम्मूलाल कुमरे, जो प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे, द्वारा उसे स्वतंत्रता एवं स्वच्छता के विषय में सदा ही जानकारी दी जाती रही थी । वैसे, भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में विश्व शौचालय दिवस की मेजबानी करने जा रहा है।  </strong></p>
<p>वैसे भारत में शौचालय की क्रांति सत्तर के दशक में बिहार के आरा शहर से समाजशास्त्री डॉ. बिंदेश्वर पाठक द्वारा शुरू की जा चुकी थी, लेकिन 2011 में श्रीमती अनीता की वह पहल एक अलग क्रांति को जन्म दिया। जो बाद में उसके जीवन पर आधारित फिल्म &#8211; टॉयलेट: एक प्रेम कथा &#8211; हर दिन पेज 3 पर छाने लगी। एक ऐसे घर में ब्याह कर आने के बाद – जहाँ पर शौचालय की उपलब्धता न हो – भी पिता-द्वारा दी गई शिक्षा को भुला नहीं पाई। अनीता का ससुराल से भागना एक राष्ट्रीय खबर बनी और सिद्धार्थ-गरिमा ने टॉयलेट एक प्रेम कथा कहानी लिख डाले। श्री नारायण सिंह ने इस फिल्म का निर्देशन किया। अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर और सना खान अभिनेता-अभिनेत्री और अन्य कलाकार बने। </p>
<p>मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के जितुराना गाँव की कला स्नातक अनीता नर्रे को इस साहसिक कार्य के लिए सभी ने सराहा और भारत में पहली बार ऐसी माँग करने के लिए पुरस्कृत भी किया गया, जहाँ खुले में शौच करना एक आम बात है। उनके पति शिवराम नर्रे के पास अपनी दुल्हन को वापस लाने के लिए शौचालय बनवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। अपनी पत्नी की मांग पूरी करने में उन्हें 10 दिन लग गए। </p>
<p>विज्ञान स्नातक तृतीय वर्ष का छात्र शिवराम, गुज़ारा चलाने के लिए दिहाड़ी मज़दूरी करता है। शिवराम ने कहा, &#8220;मैं अक्सर दिहाड़ी मज़दूरी के छोटे-मोटे काम करता हूँ। मुझे हर दिन के काम के लिए 100 रुपये मिलते हैं।&#8221; अनीता, जो स्नातक हो चुकी थी, भी नौकरी की तलाश में थी ताकि वे अपनी दो बेटियों को एक स्थिर जीवन दे सकें। अनीता बीए की पढ़ाई कर रही थीं जब उनके पिता ने उनकी शादी भीमपुर तहसील के शिवराम नर्रे से करने का फैसला किया। हर आज्ञाकारी बेटी की तरह, वह शिवराम से शादी करने के लिए राज़ी हो गईं, भले ही वह एक बीपीएल परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक खेतिहर मज़दूर थे और उनसे कम पढ़े-लिखे थे। </p>
<p><strong>11 अगस्त 2017 को यह फिल्म सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने पहले दिन भारत में 13.10 करोड़ कमाया । यह फिल्म अक्षय कुमार की 9 वीं सबसे बड़ी फिल्म बनी और अक्षय कुमार की उच्चतम कमाई वाली फिल्म के रूप में उभरा । अनीता, एक आदिवासी लड़की, ने अपने कार्य से शान्त जल में एक छोटा कंकड़ फेंका है, जिसने एक लहर का रूप ले लिया है। अनीता के इस उदाहरण में ‘जान ऑफ़ आर्क’ का किरदार अदा किया गया, जिसने 15वीं सदी में फ्रांस के चार्ल्स-8 से ईश्वरीय आदेश प्राप्त किया था। </strong></p>
<figure id="attachment_6969" aria-describedby="caption-attachment-6969" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg" alt="" width="2033" height="1141" class="size-full wp-image-6969" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-1536x862.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6969" class="wp-caption-text">अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल ​सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित ​करते</figcaption></figure>
<p>अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित भी किये और आर्थिक मदद स्वरुप 7 लाख रुपये भी दिए। इतना ही नहीं, भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया। जिला प्रशासन ने उनके ससुराल में एक पक्का शौचालय बनवाया।</p>
<p>बहरहाल, आगामी 19 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त वर्ल्ड टॉयलेट डे के 25 वें संस्करण का आयोजन इस वर्ष भारत की राजधानी नई दिल्ली में होगा। इसकी मेजबानी सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा की जाएगी। यह ऐतिहासिक निर्णय सुलभ के प्रेसिडेंट कुमार दिलीप और वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक जैक सिम के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया। यह ऐतिहासिक समिट 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की समयसीमा से ठीक 5 वर्ष पूर्व आयोजित हो रही है और यह एक प्रमुख मंच प्रदान करेगी:</p>
<p><strong>• एसडीजी 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) में हुई प्रगति की समीक्षा<br />
• नवाचारों और सफलता की कहानियों को साझा करने का अवसर<br />
• शहरी स्वच्छता की चुनौतियों से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा</strong></p>
<blockquote><p>इस सम्मेलन का एक मुख्य केंद्र बिंदु होगा भारत का स्वच्छ भारत अभियान, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाया गया और जिसके अंतर्गत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ — यह सामुदायिक भागीदारी से संचालित एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। समिट का उद्देश्य यह भी होगा कि ग्लोबल साउथ के देश किस प्रकार स्थानीय, विश्वसनीय और समुदाय-आधारित समाधानों के माध्यम से मानव कल्याण से जुड़ी चुनौतियों, विशेषकर स्वच्छता जैसे विषयों से प्रभावी ढंग से निपट सकते हैं।</p></blockquote>
<p>विश्व शौचालय संगठन की शुरुआत 2001 में 15 सदस्यों के साथ हुई थी। आज इसकी संख्या 53 देशों से बढ़कर 151+ हो गई है। संगठन के सभी सदस्य शौचालय की समस्या को खत्म करने और दुनिया भर में स्वच्छता के समाधान के लिए काम करते हैं। यह संगठन सिंगापुर में 19 नवंबर 2001 को जैक सिम द्वारा स्थापित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, अकादमियों, शौचालय संघों, शौचालय हितधारकों और सरकार के लिए एक सेवा मंच और एक वैश्विक नेटवर्क के रूप में कार्य करता है। एक अनुमान के मुताबिक अब तक लगभग 2.4 अरब से अधिक लोगों की पहुँच स्वच्छता की सुविधा तक ना होने के कारण खुले में शौच करते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।</p>
<figure id="attachment_6970" aria-describedby="caption-attachment-6970" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg" alt="" width="2033" height="1141" class="size-full wp-image-6970" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-1536x862.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6970" class="wp-caption-text">राष्ट्रपति भवन की भव्यता और राष्ट्र के दिग्गजों के बीच, अमोला पाठक द्वारा अपने दिवंगत पति डॉ. बिंदेश्वर पाठक की ओर से पद्म विभूषण ग्रहण करने पर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ उनकी गरिमामय उपस्थिति इस अवसर की गंभीरता को प्रतिध्वनित करती है।</figcaption></figure>
<p>एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में शौचालयों के लिए सबसे लंबी कतारें हैं। अगर देश के सभी लोग, जो शौचालयों के बाहर इंतजार में खड़े हैं, एक लाइन में खड़े हो जाए तो इस कतार को खत्म होने में 5892 वर्ष लगेगी और यह चन्द्रमा से धरती तक लंबी लाइन बन जाएगी। हमारे देश में भी अधिकतम संख्या में लोग खुले तौर पर शौच करते हैं। हाल के जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 1.2 बिलियन लोगों सहित देश के लगभग आधा हिस्से के पास घर में शौचालय सुविधा नहीं है लेकिन इन सभी लोगों के पास मोबाइल फोन है। हालांकि इस दिशा में बहुत कुछ किया गया है परन्तु विशेषकर महिलाएं शौचालयों तक पहुंच की कमी के कारण बहुत सी समस्याओं का सामना कर रही हैं। </p>
<p><strong>विगत कई वर्षों में भारत में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन इस मुद्दे पर जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किया है। 2014 में दुनिया में पहली बार दिल्ली में 18 से 20 नवंबर तक अंतरराष्ट्रीय टॉयलेट महोत्सव के रूप में एक लंबा और अद्वितीय तीन दिन का जश्न मनाया गया था। शौचालय के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने के लिए त्योहार आयोजित किया गया था। उद्घाटन समारोह में छह देशों के करीब 1000 छात्रों ने एक श्रृंखला बनाई जिसमें उन्होंने सिर पर टॉयलेट पॉट्स रखे थे। </strong></p>
<blockquote><p>आपको जानकार आश्चर्य होगा की सुलभ इंटरनेशनल ने शौचालयों का एक ऐसा संग्रहालय बनाया है जिसमें शौचालयों और मानव सभ्यता संस्कृति के गहरे रिश्तों को दिखाया गया है। यहाँ फ्रांस के सम्राट लुई तेरहवें के राजगद्दीनुमा शौचालय से लेकर महारानी विक्टोरिया के शौचालय की अनुकृति मौजूद है, जिसमें हीरे-जवाहरात लगे हैं। संग्रहालय में दिखाई गई जानकारी के अनुसार शौचालयों का इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता जितना ही पुराना है। मोहनजोदजड़ो में शौचालय के अवशेष मिले हैं। मुग़लकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा सहित कई किलों पर शौचालय बने मिले जो अब भी देखे जा सकते हैं। इस संग्रहालय को बनाने का विचार संस्था के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक को लन्दन में मैडम तुसॉद का वैक्स म्यूज़ियम देखने के बाद आया। </p></blockquote>
<p>वैसे सरकार और व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान के मद्दे नजर अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है। लेकिन धरातल पर ये सभी कुप्रथाएं आज भी समाज में विद्यमान है। इतना ही नहीं, मानव मल-मूत्र की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में सरकारी और सामाजिक उदासीनता के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाया कोई पचास के दसक और उसके बाद भी जब तक ”सुलभ” ने सामाजिक आंदोलन नहीं चलाया, शौचालय की उपयोगिता को नहीं बताया, इन भंगी-परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया । </p>
<p><a href="https://youtu.be/A8SfTWVE5zw">अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।</a></p>
<p>कल तक जो लोग, विशेषकर समाज व्यवस्था के संभ्रांत लोग, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कॉर्पोरेट, मंत्री, अधिकारी और न जाने कौन-कौन, अपने “खाने के मेज पर शौच की बात करना मानवीयता और मनुष्यता के खिलाफ समझते थे; आज शहरों और महानगरों, यहाँ तक की कारपोरेट घरानों, सरकारी कार्यालयों में “भोजनावकाश” के समय “भोजन करते लोग मल-मूत्र के बारे में बात करते हैं, शौचालय की बात करते हैं। और इसका मुख्य कारण है कि सुलभ ने अपने पांच-दसक के प्रयास से न केवल गाँधी का सपना साकार किया जमीन पर, बल्कि “भारत से मैला ढोने की कुप्रथा को भी समाप्त किया।”</p>
<p><strong>बहरहाल, डॉ पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से मानव-मल-मूत्र उठाने की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया । उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन बन गया। आज डॉ. पाठक नहीं हैं (दो वर्ष पूर्व 15 अगस्त को उनका देहावसान हो गया), लेकिन आज भी ​याद है जब उनसे पूछा था कि &#8220;अगर सुलभ, जिसने स्वच्छता अभियान की नीव 50 वर्ष पहले डाली थी, नहीं होता तो भारत में स्वच्छता का हश्र क्या होता?” इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा: “इस बात का उत्तर मैं नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा की अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।” </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year">भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; की घोर किल्लत है सरकारी क्षेत्रों में; फिर कार्य कैसे होगा, ​कौन करेगा ? ​</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Nov 2018 06:23:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[Sanitation]]></category>
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		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ​आप शायद विस्वास नहीं करेंगे, लेकिन यह सत्य है। भारत में जहाँ प्रत्येक ७०९ लोगों पर एक पुलिसकर्मी है, वहीँ प्रत्येक ४०० व्यक्तियों पर एक-एक गैर-सरकारी संगठन भी हैं। यदि आंकड़ों को माना जाय तो वर्तमान समय में देश में जितने प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यालय हैं, उनसे दो-गुना अधिक [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ​आप शायद विस्वास नहीं करेंगे, लेकिन यह सत्य है। भारत में जहाँ प्रत्येक ७०९  लोगों पर एक पुलिसकर्मी  है, वहीँ प्रत्येक ४०० व्यक्तियों पर एक-एक गैर-सरकारी संगठन भी हैं। यदि आंकड़ों को माना जाय तो वर्तमान समय में देश में जितने प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यालय हैं, उनसे दो-गुना अधिक और यक़ीनन सरकारी अस्पतालों से २५० गुना अधिक गैर-सरकारी संगठन कागज़ पर &#8221;भाग-मिल्खा-भाग&#8221; कर रहे हैं, दौड़ रहे हैं।</p>
<p>भारत में ३१ लाख से अधिक गैर-सरकारी संगठन देश के २६ राज्यों में निबन्धित हैं जो सरकारी और अन्य क्षेत्रों से मिलने वाली राशियों में से न्यूनतम २० प्रतिशत राशि &#8220;कुर्सी के नीचे से&#8221; सम्बंधित विभागाध्यक्षों, कर्मचारियों को देकर जीवित हैं, फल -फूल रहे हैं। हाँ, विशेष परिस्थिति में कईयों को ब्लैकलिस्ट भी किया गया है। लेकिन हथकंडों के विभिन्न रूपों का इस्तेमाल कर &#8221;व्हाईट लिस्ट&#8221; में शामिल होने में इन्हे देर नहीं लगता। इस ३१ लाख गैर-सरकारी संगठनो के अतिरिक्त केंद्र शासित प्रदेशों में इनकी संख्या लगभग ८२,००० है। </p>
<p>पिछले दिनों आधुनिक भारत के स्वच्छता अभियान के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक, देश में पहली बार एक गैर-सरकारी संगठन &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन &#8211; की ओर से सीवर-लाइनों की सफाई में जुड़े लाखों कर्मचारियों को यह आस्वस्त किये की सफाई करने के दौरान किसी भी कर्मचारी की अब मृत्यु नहीं होगी, उनकी पत्नियां अब विधवा नहीं होंगी, उनके बच्चे अब अनाथ होंगे, सीवर लाईन कभी भी जाम नहीं होगा &#8211; बसर्ते इस सफाई कार्य के लिए जिम्मेदार विभाग, अधिकारीगण, अन्य महानुभाव उन कर्मचारियों के जीवन &#8211; मोल को समझें। डॉ पाठक का कहना था की अब वे यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते की देश में ऐसे उपरकण नहीं है, जो सीवर लाइनों की सफाई कार्य में मदद कर सके और जान-माल को रोक सके। </p>
<p><figure id="attachment_836" aria-describedby="caption-attachment-836" style="width: 300px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/2-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/2-1-300x200.jpg" alt="भारत में स्वच्छता के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक ​जिन्होंने सर पर मैला धोने की कुप्रथा का अंत किये ​" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-836" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-910x607.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-696x464.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-630x420.jpg 630w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-836" class="wp-caption-text">भारत में स्वच्छता के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक ​जिन्होंने सर पर मैला धोने की कुप्रथा का अंत किये ​</figcaption></figure><br />
&#8220;मैं, यानि सुलभ, सीवर की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की होने वाली मौत की रोकथाम के लिए स्वदेशी तकनीक से विकसित अत्याधुनिक ‘सीवर सफाई मशीन’ ​लेकर उपस्थित हूँ। यह मशीन देश पहली बार आया है, जिसे मैं लेकर आया हूँ। ​यह मशीन कैमरा और अन्य सुविधाओं से लैस ​है और ​इस मशीन से मैनहोल को साफ किया जा सकेगा।​ इससे सीवर के अंदर जाकर सफाई की जा ​सकती तथा जहरीली गैस से लोगों की होने वाली मौत पर नियंत्रण लगाया जा ​सकता है ।​ यदि मैनहोल के अंदर लोगों को जाना भी पड़े तो उसके लिए सुरक्षा उपकरणों को भी लगाया गया है।​ अब यह सम्बद्ध विभाग, सरकारी संस्थाओं, सरकारों, नगर निगमों की  ईक्षा शक्ति पर निर्भर करता है कि वे इस मशीन को प्राथमिकता दें, या कर्मचारियों की जान-माल को नजर-अंदाज करें। अब वे यह नहीं कह सकते की आधुनिक उपकरण देश में ;उपलब्ध नहीं है, क्योंकि सुलभ मानव जीवन को नुकसान पहुंचाये बिना गहरे सीवरों की सफाई सुनिश्चित करने के लिए एक अनूठा उपकरण खरीदा है।​&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों ने सुरक्षा उपायों के सुझाव दिये और इस कार्य को करने के लिए आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था की गयी।​ डॉ पाठक ​के अनुसार नयी मशीन मैनहोल के आवधिक यांत्रिक सफाई के लिए आदर्श है​, इसमें शक्तिशाली जेट पंप लगा है जो प्रति मिनट 150 लीटर पानी के प्रवाह के लिए सक्षम है​ और विशेष रूप से डिजाइन किए गए लचीले स्टील रॉड का उपयोग करके डी-चोकिंग सीवर लाइन में भी सक्षम है।​ ​नयी सुलभ सीवर सफाई मशीन वाहन सुरक्षा, इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक रूप से संचालित​ है।  यह सीवर जेटिंग सह रॉडिंग सह मैकेनिकल मैनहोल डिस्लीटिंग मशीन के साथ​ व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और सीवर त्वरित दृश्य पाइप निरीक्षण कैमरा के साथ है​, जो सीएनजी चालित है जिसे आठ फुट चौड़ी गलियों में भी ले जाया जा सकता है।​ ज्ञातब्य है कि ​पिछले तीन वर्षों के दौरान,सीवर लाइनों की​सफाई के दौरान 1300 से ज्यादा सफाई कर्मचारियों की मौत हुई हैं।</p>
<p>​पिछली जनगणना के अनुसार देश में कुल ७९३५ शहर हैं​,​ जिसमे करीब ३७७ मिलियन लोग, यानि देश की आवादी का ३१.२ फ़ीसदी रहते हैं। देश में करीब २०५ नगर निगमें हैं। </p>
<p>शहर विकास मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि जब तक सरकार, चाहे केंद्र​ की सरकार हो या राज्यों ​की; नगर निगमों में बैठे अधिकारीगण किसी के जीवन के महत्व को नहीं समझेंगे, इस उपकरण का इस्तेमाल होना प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है और इसका सबसे बड़ा कारण है इस कार्य के निमित्त आवण्टित राशियों का बन्दर-बाँट।<br />
<figure id="attachment_837" aria-describedby="caption-attachment-837" style="width: 300px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/3-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/3-1-300x200.jpg" alt="​बच्चों को स्वच्छता के बारे में बताते डॉ पाठक ​" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-910x607.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-696x464.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-630x420.jpg 630w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-837" class="wp-caption-text">​बच्चों को स्वच्छता के बारे में बताते डॉ पाठक ​</figcaption></figure><br />
कोई भी व्यक्ति, जिनके हाथों में अधिकार है (अपवाद छोड़कर) कभी नहीं चाहेंगे की वे इस नवीन उपकरण को लगाकर खुद आर्थिक रूप से कमजोर होते चले जाएँ। उनका कहना है कि सम्पूर्ण आवंटित राशियों में से न्यूनतन २० फीसदी राशि इन अधिकारीयों के लिए सुरक्षित हो जाता है ​निर्गत होने से पहले ही ​- दूसरे शब्दों में, अगर किसी ठेकेदार​ को किसी तरह का कार्य, चाहे सफाई ही क्यों न हो​, आवंटित किया जाता है तो उसे २० प्रतिशत राशि &#8220;देना पड़ता&#8221; है​ ​। अब बचे ८० फीसदी राशि में कितना कार्य होगा और कितना बंदरबाँट​,​ यह सम्पूर्ण रूप से ठेकेदारों के विवेक पर निर्भर करता है। </p>
<p>​अधिकारी का कहना है इस नवीनतम मशीन की कीमत अगर ४० लाख है तो देश के सभी २०५ नगर निगम खरीद सकते हैं &#8211; एक मशीन नहीं, दस-दस मशीन। लेकिन उन्हें २० फीसदी राशि नहीं मिल पायेगी, क्योंकि इसकी कीमत सर्वविदित है। अगर २० फीसदी दिए बिना खरीदने बात नहीं होती है तो स्वाभाविक है की मशीन की गुणवत्ता ख़राब होगी। आखिर वह भी कहाँ से पैसा देगा ?</p>
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<p>जब डॉ पाठक से इस विषय पर पूछा तो उनका कहना था की सरकार को, नगर निगमों को देश में जो &#8221;सफ़ेद गैर-सरकारी संस्थाएं&#8221; हैं, जो सरकार को अपनी कमाई का एक-एक पैसे का हिसाब देती है, समय पर कर चुकाती है, जिनकी छवियों पर कोई दाग नहीं है, देश का दो-दो शहरों में सफाई का सम्पूर्ण कार्य &#8211; सीवर लाइनों की सफाई सहित &#8211; उन्हें दे दें। अब यदि सरकारी आंकड़ों को देखें तो देश में कोई ३००० ऐसे गैर-सरकारी संस्थाएं तो जरूर हैं जो &#8220;बेदाग़&#8221; हैं और जिनके कार्य-कलापों पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकते। लेकिन इसके लिए &#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; का होना नितांत आवश्यक है।  </p>
<p>डॉ पाठक एक बात और कहे: उनका कहना था की जिस किसी भी अधिकारी की लापरवाही के कारण सीवर लाइनों में कार्य करने वाले कर्मचारियों की मृत्यु हो; सम्बद्ध नगर निगम मृतक के परिवारों का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा का सम्पूर्ण जबाबदेही ले, साथ ही, उस अधिकारी को न्यूनतम २० वर्षों की सजा हो। </p>
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