<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Sulabh Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
	<atom:link href="http://www.aryavartaindiannation.com/tag/sulabh/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.aryavartaindiannation.com/tag/sulabh</link>
	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
	<lastBuildDate>Wed, 16 Jul 2025 04:11:46 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>
	<item>
		<title>भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Jul 2025 04:11:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[international]]></category>
		<category><![CDATA[organisation]]></category>
		<category><![CDATA[social]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<category><![CDATA[toilet]]></category>
		<category><![CDATA[world toilet day]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=6967</guid>

					<description><![CDATA[<p>पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year">भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी के 64-साल बाद भी समाज के लोग &#8216;शौचालय के महत्व&#8217; को समझ नहीं पा रहे थे। उसके मायके के घर में सदा ही शौचालय रहा, जिसे वह सात भाई-बहनों के साथ प्रयोग करती रही। उसके पिता श्री अम्मूलाल कुमरे, जो प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे, द्वारा उसे स्वतंत्रता एवं स्वच्छता के विषय में सदा ही जानकारी दी जाती रही थी । वैसे, भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में विश्व शौचालय दिवस की मेजबानी करने जा रहा है।  </strong></p>
<p>वैसे भारत में शौचालय की क्रांति सत्तर के दशक में बिहार के आरा शहर से समाजशास्त्री डॉ. बिंदेश्वर पाठक द्वारा शुरू की जा चुकी थी, लेकिन 2011 में श्रीमती अनीता की वह पहल एक अलग क्रांति को जन्म दिया। जो बाद में उसके जीवन पर आधारित फिल्म &#8211; टॉयलेट: एक प्रेम कथा &#8211; हर दिन पेज 3 पर छाने लगी। एक ऐसे घर में ब्याह कर आने के बाद – जहाँ पर शौचालय की उपलब्धता न हो – भी पिता-द्वारा दी गई शिक्षा को भुला नहीं पाई। अनीता का ससुराल से भागना एक राष्ट्रीय खबर बनी और सिद्धार्थ-गरिमा ने टॉयलेट एक प्रेम कथा कहानी लिख डाले। श्री नारायण सिंह ने इस फिल्म का निर्देशन किया। अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर और सना खान अभिनेता-अभिनेत्री और अन्य कलाकार बने। </p>
<p>मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के जितुराना गाँव की कला स्नातक अनीता नर्रे को इस साहसिक कार्य के लिए सभी ने सराहा और भारत में पहली बार ऐसी माँग करने के लिए पुरस्कृत भी किया गया, जहाँ खुले में शौच करना एक आम बात है। उनके पति शिवराम नर्रे के पास अपनी दुल्हन को वापस लाने के लिए शौचालय बनवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। अपनी पत्नी की मांग पूरी करने में उन्हें 10 दिन लग गए। </p>
<p>विज्ञान स्नातक तृतीय वर्ष का छात्र शिवराम, गुज़ारा चलाने के लिए दिहाड़ी मज़दूरी करता है। शिवराम ने कहा, &#8220;मैं अक्सर दिहाड़ी मज़दूरी के छोटे-मोटे काम करता हूँ। मुझे हर दिन के काम के लिए 100 रुपये मिलते हैं।&#8221; अनीता, जो स्नातक हो चुकी थी, भी नौकरी की तलाश में थी ताकि वे अपनी दो बेटियों को एक स्थिर जीवन दे सकें। अनीता बीए की पढ़ाई कर रही थीं जब उनके पिता ने उनकी शादी भीमपुर तहसील के शिवराम नर्रे से करने का फैसला किया। हर आज्ञाकारी बेटी की तरह, वह शिवराम से शादी करने के लिए राज़ी हो गईं, भले ही वह एक बीपीएल परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक खेतिहर मज़दूर थे और उनसे कम पढ़े-लिखे थे। </p>
<p><strong>11 अगस्त 2017 को यह फिल्म सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने पहले दिन भारत में 13.10 करोड़ कमाया । यह फिल्म अक्षय कुमार की 9 वीं सबसे बड़ी फिल्म बनी और अक्षय कुमार की उच्चतम कमाई वाली फिल्म के रूप में उभरा । अनीता, एक आदिवासी लड़की, ने अपने कार्य से शान्त जल में एक छोटा कंकड़ फेंका है, जिसने एक लहर का रूप ले लिया है। अनीता के इस उदाहरण में ‘जान ऑफ़ आर्क’ का किरदार अदा किया गया, जिसने 15वीं सदी में फ्रांस के चार्ल्स-8 से ईश्वरीय आदेश प्राप्त किया था। </strong></p>
<figure id="attachment_6969" aria-describedby="caption-attachment-6969" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg" alt="" width="2033" height="1141" class="size-full wp-image-6969" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-1536x862.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6969" class="wp-caption-text">अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल ​सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित ​करते</figcaption></figure>
<p>अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित भी किये और आर्थिक मदद स्वरुप 7 लाख रुपये भी दिए। इतना ही नहीं, भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया। जिला प्रशासन ने उनके ससुराल में एक पक्का शौचालय बनवाया।</p>
<p>बहरहाल, आगामी 19 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त वर्ल्ड टॉयलेट डे के 25 वें संस्करण का आयोजन इस वर्ष भारत की राजधानी नई दिल्ली में होगा। इसकी मेजबानी सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा की जाएगी। यह ऐतिहासिक निर्णय सुलभ के प्रेसिडेंट कुमार दिलीप और वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक जैक सिम के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया। यह ऐतिहासिक समिट 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की समयसीमा से ठीक 5 वर्ष पूर्व आयोजित हो रही है और यह एक प्रमुख मंच प्रदान करेगी:</p>
<p><strong>• एसडीजी 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) में हुई प्रगति की समीक्षा<br />
• नवाचारों और सफलता की कहानियों को साझा करने का अवसर<br />
• शहरी स्वच्छता की चुनौतियों से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा</strong></p>
<blockquote><p>इस सम्मेलन का एक मुख्य केंद्र बिंदु होगा भारत का स्वच्छ भारत अभियान, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाया गया और जिसके अंतर्गत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ — यह सामुदायिक भागीदारी से संचालित एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। समिट का उद्देश्य यह भी होगा कि ग्लोबल साउथ के देश किस प्रकार स्थानीय, विश्वसनीय और समुदाय-आधारित समाधानों के माध्यम से मानव कल्याण से जुड़ी चुनौतियों, विशेषकर स्वच्छता जैसे विषयों से प्रभावी ढंग से निपट सकते हैं।</p></blockquote>
<p>विश्व शौचालय संगठन की शुरुआत 2001 में 15 सदस्यों के साथ हुई थी। आज इसकी संख्या 53 देशों से बढ़कर 151+ हो गई है। संगठन के सभी सदस्य शौचालय की समस्या को खत्म करने और दुनिया भर में स्वच्छता के समाधान के लिए काम करते हैं। यह संगठन सिंगापुर में 19 नवंबर 2001 को जैक सिम द्वारा स्थापित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, अकादमियों, शौचालय संघों, शौचालय हितधारकों और सरकार के लिए एक सेवा मंच और एक वैश्विक नेटवर्क के रूप में कार्य करता है। एक अनुमान के मुताबिक अब तक लगभग 2.4 अरब से अधिक लोगों की पहुँच स्वच्छता की सुविधा तक ना होने के कारण खुले में शौच करते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।</p>
<figure id="attachment_6970" aria-describedby="caption-attachment-6970" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg" alt="" width="2033" height="1141" class="size-full wp-image-6970" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-1536x862.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6970" class="wp-caption-text">राष्ट्रपति भवन की भव्यता और राष्ट्र के दिग्गजों के बीच, अमोला पाठक द्वारा अपने दिवंगत पति डॉ. बिंदेश्वर पाठक की ओर से पद्म विभूषण ग्रहण करने पर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ उनकी गरिमामय उपस्थिति इस अवसर की गंभीरता को प्रतिध्वनित करती है।</figcaption></figure>
<p>एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में शौचालयों के लिए सबसे लंबी कतारें हैं। अगर देश के सभी लोग, जो शौचालयों के बाहर इंतजार में खड़े हैं, एक लाइन में खड़े हो जाए तो इस कतार को खत्म होने में 5892 वर्ष लगेगी और यह चन्द्रमा से धरती तक लंबी लाइन बन जाएगी। हमारे देश में भी अधिकतम संख्या में लोग खुले तौर पर शौच करते हैं। हाल के जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 1.2 बिलियन लोगों सहित देश के लगभग आधा हिस्से के पास घर में शौचालय सुविधा नहीं है लेकिन इन सभी लोगों के पास मोबाइल फोन है। हालांकि इस दिशा में बहुत कुछ किया गया है परन्तु विशेषकर महिलाएं शौचालयों तक पहुंच की कमी के कारण बहुत सी समस्याओं का सामना कर रही हैं। </p>
<p><strong>विगत कई वर्षों में भारत में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन इस मुद्दे पर जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किया है। 2014 में दुनिया में पहली बार दिल्ली में 18 से 20 नवंबर तक अंतरराष्ट्रीय टॉयलेट महोत्सव के रूप में एक लंबा और अद्वितीय तीन दिन का जश्न मनाया गया था। शौचालय के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने के लिए त्योहार आयोजित किया गया था। उद्घाटन समारोह में छह देशों के करीब 1000 छात्रों ने एक श्रृंखला बनाई जिसमें उन्होंने सिर पर टॉयलेट पॉट्स रखे थे। </strong></p>
<blockquote><p>आपको जानकार आश्चर्य होगा की सुलभ इंटरनेशनल ने शौचालयों का एक ऐसा संग्रहालय बनाया है जिसमें शौचालयों और मानव सभ्यता संस्कृति के गहरे रिश्तों को दिखाया गया है। यहाँ फ्रांस के सम्राट लुई तेरहवें के राजगद्दीनुमा शौचालय से लेकर महारानी विक्टोरिया के शौचालय की अनुकृति मौजूद है, जिसमें हीरे-जवाहरात लगे हैं। संग्रहालय में दिखाई गई जानकारी के अनुसार शौचालयों का इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता जितना ही पुराना है। मोहनजोदजड़ो में शौचालय के अवशेष मिले हैं। मुग़लकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा सहित कई किलों पर शौचालय बने मिले जो अब भी देखे जा सकते हैं। इस संग्रहालय को बनाने का विचार संस्था के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक को लन्दन में मैडम तुसॉद का वैक्स म्यूज़ियम देखने के बाद आया। </p></blockquote>
<p>वैसे सरकार और व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान के मद्दे नजर अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है। लेकिन धरातल पर ये सभी कुप्रथाएं आज भी समाज में विद्यमान है। इतना ही नहीं, मानव मल-मूत्र की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में सरकारी और सामाजिक उदासीनता के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाया कोई पचास के दसक और उसके बाद भी जब तक ”सुलभ” ने सामाजिक आंदोलन नहीं चलाया, शौचालय की उपयोगिता को नहीं बताया, इन भंगी-परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया । </p>
<p><a href="https://youtu.be/A8SfTWVE5zw">अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।</a></p>
<p>कल तक जो लोग, विशेषकर समाज व्यवस्था के संभ्रांत लोग, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कॉर्पोरेट, मंत्री, अधिकारी और न जाने कौन-कौन, अपने “खाने के मेज पर शौच की बात करना मानवीयता और मनुष्यता के खिलाफ समझते थे; आज शहरों और महानगरों, यहाँ तक की कारपोरेट घरानों, सरकारी कार्यालयों में “भोजनावकाश” के समय “भोजन करते लोग मल-मूत्र के बारे में बात करते हैं, शौचालय की बात करते हैं। और इसका मुख्य कारण है कि सुलभ ने अपने पांच-दसक के प्रयास से न केवल गाँधी का सपना साकार किया जमीन पर, बल्कि “भारत से मैला ढोने की कुप्रथा को भी समाप्त किया।”</p>
<p><strong>बहरहाल, डॉ पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से मानव-मल-मूत्र उठाने की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया । उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन बन गया। आज डॉ. पाठक नहीं हैं (दो वर्ष पूर्व 15 अगस्त को उनका देहावसान हो गया), लेकिन आज भी ​याद है जब उनसे पूछा था कि &#8220;अगर सुलभ, जिसने स्वच्छता अभियान की नीव 50 वर्ष पहले डाली थी, नहीं होता तो भारत में स्वच्छता का हश्र क्या होता?” इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा: “इस बात का उत्तर मैं नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा की अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।” </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year">भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:26:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[bindeshwar]]></category>
		<category><![CDATA[hetukar]]></category>
		<category><![CDATA[jha]]></category>
		<category><![CDATA[pana college]]></category>
		<category><![CDATA[patha]]></category>
		<category><![CDATA[Sanitation]]></category>
		<category><![CDATA[socology]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3951</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology">पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को 80वें जन्मदिन पर भारतीय समाज की ओर से शुभकामनाएं ।</p>
<p>माँ कहती थी &#8216;जब मनुष्य के शरीर की हड्डी से मांस लटकने लगे, त्वचाओं में झुर्रियां और शिराएं दिखने लगे, तो यह मत समझना कि वह मनुष्य वृद्ध हो गया है । यह सोचकर समझने के कोशिश करना कि वह अपने जीवन के कितने वसंतों की पीड़ाओं को सहकर, स्वयं को उस मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक और मानवीय उत्कर्ष पर पहुंचा पाया है, जहाँ समाज के बिरले लोग पहुंच पाते हैं। उसके शरीर के एक-एक नश, एक-एक शिराएं, त्वचा की झुर्रियां जीवन-पर्यन्त उसका चश्मदीद गवाह होता है।</p>
<p>माँ यह भी कहती थी तुम्हें तुम्हारे जीवन काल में समाज में वैसे जीतने भी जीवित प्राणी दिखें, उन्हें अन्तः मन से सम्मान करना क्योंकि वैसे मनुष्यों की माताएं &#8216;अशिक्षित&#8217;, &#8216;अनपढ़&#8217;, &#8216;निरक्षर&#8217; ही मिलेंगी, मेरी तरह। वे सभी माताएं अपने बच्चों को शिक्षा के उत्कर्ष पर देखने के लिए खुद अशिक्षित रहना श्रेयस्कर समझीं। वे अपनी भाषाओँ को छोड़कर, किसी भी अन्य भाषाओँ को नहीं जानती हैं; नहीं पहचानती, नहीं पढ़ पाती। लेकिन अपने बच्चों के होठों की गतियों को, शारीरिक हलचलों को पढ़ना जानती हैं और समझ जाती हैं की आखिर उनका संतान क्या चाहता है। आने वाले समय में ऐसे मनुष्यों की किल्लत होगी। समाज में दृष्टान्त देना तो मुश्किल होगा ही।</p>
<p>बहरहाल, यह तस्वीर माँ की समस्त बातों को समेटे हुए है। ये दो महामानव पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के हस्ताक्षर हैं। उच्चतर शिक्षा के प्रारंभिक वर्षों में दोनों सहपाठी थे, मित्र थे। एक ही कक्षा में पढ़ते थे स्नातक तक । लेकिन समय के आगे किसका चला है। समाज को बेहतर बनाने हेतु समय दोनों को दो धाराओं की ओर उन्मुख किया और समयांतराल जो सम्मान कर रहे हैं (सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संथापक डॉ बिंदेश्वर पाठक), वे छात्र हो गए और जो सम्मानित हो रहे हैं (डॉ हेतुकर झा) वे शिक्षक ।</p>
<p>पाटलिपुत्र के गंगा तट पर स्थित वाणिज्य महाविद्यालय के द्वितीय तल्ले में पटना विश्वविद्यालय का समाजशास्त्र विभाग, उसके दीवारें, ईंट-पत्थर, ब्लेक-बोर्ड, कक्षाओं की कुर्सी-टेबल सभी इनकी अद्वितीय मित्रता, एक दूसरे के प्रति सम्मान, आदर, विश्वास का चश्मदीद गवाह है। जीवन में उस अद्भुत मित्रता की डोर न कभी कमजोर हुई और न ही टूटी। जब तक शिक्षक महोदय अपनी जीवन की अंतिम सांस लेकर इस लोक से अपनी अनंत यात्रा पर निकले, मित्र हताश अवश्य हुए, आज भी हैं, लेकिन प्रकृति और प्रारब्ध के नियमों के किसका चला है यह तस्वीर महज एक तस्वीर नहीं है, बल्कि माँ की बातों का शायद &#8216;अंतिम दृष्टान्त&#8217; भी है हमारे समाज में। डॉ पाठक विगत 2 अप्रैल को अपना 80 जन्मोत्सव मनाए हैं। हम सभी कामना करते हैं कि वे स्वस्थ रहें, मुस्कुराते रहे, सुलभ के आगंतुकों को कहते हैं &#8220;मुस्कुराइए &#8230; आप सुलभ में हैं।&#8221;</p>
<p>विगत सप्ताह कबीर खान द्वारा निर्देशित और रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, पंकज त्रिपाठी, बोमन ईरानी, ताहिर राज भसीन, जीवा, साकिब सलीम, जतिन सरना जैसे कलाकारों द्वारा अभिनीत &#8220;फिल्म 83&#8221; देखा। इस फिल्म को देखकर मैं अश्रुपूरित था। कपिल देव की गेंद मुझे अपने जीवन के चालीस वर्ष पीछे लेकर चला गया। वह दिन एक तरह से मेरे जीवन का मार्मिक दिन अवश्य था, लेकिन &#8216;सकारात्मक&#8217; समय की शुरुआत के लिए &#8211; कपिल देव की तरह।</p>
<p>सन 1983 के जून महीने में 9 जून से 25 जून तक इंग्लैंड और वेल्स में वर्ल्ड कप के लिए मैच हो रहा था। सेमी फ़ाइनल में इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्ट इंडीज और भारत आया था और 25 जून को लॉर्ड्स में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच फ़ाइनल मैच खेले जाने वाला था। उन दिनों मैं पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबार में कार्य करता था। इण्डियन नेशन के सम्पादकीय विभाग में उप-संपादक के रूप में कार्यरत था। दफ्तर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी थी। कर्मचारियों को वेतन हेतु कैशियर के काउंटर पर पहुंचे महीनों बीत गए थे। कई लोगों के घरों में चूल्हे की आंच धीमी हो गयी थी। कई कर्मचारियों की बेटियों का विवाह तय होने के बाद भी, टूट गया था। बच्चों के विद्यालयों में शुल्क शैक्षिक-शुल्क की राशि भी उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। पटना की सड़कों पर तापमान एक ओर जहाँ आसमान छू रहा था, हमारे दफ्तर में सामान्य कर्मचारियों का जीवन जमीन के अंदर दबा जा रहा था।</p>
<p>उन दिनों हमारे दफ्तर में थे सुधाकर भाई (सुधाकर झा) जो संवाददाता तो थे ही, खेल-कूद, विशेषकर क्रिकेट में उन्हें बहुत अभिरुचि थी। उन दिनों अख़बारों में इलस्ट्रेशन दिल्ली से &#8216;केबीके&#8217; का छपता था जो डाक से आने के कारण औसतन तीन दिन बाद आता था। उस दिन बृहस्पतिवार था और तारीख 23 जून। मैं 9 जून से उस तारीख तक वर्ल्ड कप में खेले गए सभी देशों की अंक-तालिका बना लिया था। मेरी इक्षा थी की जब फ़ाइनल मैच हो, उस दिन उस तालिका को प्रकाशित करेंगे &#8216;केबीके&#8217; के आने से पहले। फ़ाइनल मैच में विजय देश का स्थान छोड़कर, एक बेहतरीन अंक तालिका बनाया। यह सोच लिया था जैसे ही खेल ख़त्म होगा, विजय देश का नाम लिखकर अंक तालिका का ब्लॉक बनाकर प्रकाशित करेंगे।</p>
<p>इस पूरे कार्य में सुधाकर भाई का पूरा सहयोग था। उन दिनों पटना के दो-पहिये वाहन जैसे स्कूटर, मोटर साईकिल आदि के अगले और पिछले हिस्से पर नंबर लिखा होना &#8216;बाध्यकारी&#8217; हो गया था। ट्रैफिक डीएसपी थे बनबारी बाबू। एक बेहतरीन इंसान, लेकिन अनुशाषित। मैं 10 रुपये में अनंत लोगों की गाड़ियों पर नंबर लिखा। पैसे आने से घर में चूल्हे जलने में मदद मिलता था। सुधाकर भाई हमेशा हमारे कार्य में पीछे खड़े होते थे। जब तालिका बना लिया तब सोचा कि अगर कोई इसे &#8216;स्पॉन्सर&#8217; कर दे तो &#8216;दो पैसे की आमदनी&#8217; मुझे भी हो जाएगी और संस्थान को तो होगी ही। मैं तत्कालीन विज्ञापन व्यवस्थापक और मुद्रक तथा प्रकाशक गिरीन्द्र मोहन भट्ट (अब दिवंगत) के पास पहुंचा। तालिका दिखाया और मार्गदर्शन के लिए याचना किया। भट्ट जी मेरी आंखों में मेरी भावना को पढ़ लिए। आखिर वे भी तो एक पिता थे और भूख से होने वाली पेट-पीड़ा से वे भी अवगत थे। उन्होंने एक रास्ता बताया &#8211; &#8216;आप सुलभ शौचालय के बिंदेश्वर पाठक जी के पास चले जाएँ, उन्हें दिखाएँ और कहें की भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; उन दिनों सुलभ &#8216;शौचालय&#8217; ही था।</p>
<p>23 जून। वर्ल्ड कप फ़ाइनल से 48 घंटा पूर्व। पटना की सड़कों पर तापमान कोई 48+ डिग्री। और मैं उन्मुख था पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित बिंदेश्वर पाठक के आवास की ओर। सड़कों पर मुझ जैसे &#8216;अभागा&#8217; ही चलते-फिरते दिख रहा था। कहीं कोई रिक्शावाला, तो कहीं ठेला पर सामन लिए मजदूर। बीच-बीच में अपने चेहरे को छुपाए स्कूटर, मोटर साईकिल पर लोग दिख रहे थे। सूर्यदेव सर के कुछ डिग्री पश्चिम गाल को सेक रहे थे। माँ-बाबूजी कहते थे: &#8220;समय परीक्षा की घोषणा नहीं करता। वह जीवन में कभी भी समय परीक्षा ले सकता है। इसलिए हमेशा सज्ज रहना।&#8221; माँ-बाबूजी की बातें हमारे लिए &#8216;ब्रह्मवाक्य&#8217; था और हम भी सज्ज थे। मन में कई तरह की बातें आ रही थी लेकिन साईकिल अपनी दिशा की ओर उन्मुख थी।</p>
<p>पाटलिपुत्र कालोनी में प्रवेश के बाद सड़क की बायीं ओर एक छोटे-मैदान के पास बिंदेश्वर पाठक का घर था। बाहर एक पेड़ में साईकिल को सिक्कड़ से बांधकर, चेहरे को पोछते, हनुमान चालीसा पढ़ते मैं दरवाजे पर दस्तक दिया। प्रवेश द्वार के दाहिने कोने पर स्थित &#8216;कॉल-बेल&#8217; को दबाया &#8211; ट्रिंग &#8211; ट्रिंग। कुछ ही क्षण में दरवाजा खुला। दरवाजा खुलते ही अंदर से आलू-परवल की सब्जी, बासमती चावल, अरहर दाल और अन्य भोज्य पदार्थों का सुगंध एक ही बार नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचा। माँ कहती थी &#8216;चाहे तुम कितना भी भूखा रहो, चेहरे पर शिकन नहीं आने देना।&#8217;</p>
<p>सामने एक सज्जन आये और उनके पीछे घर के अंदर डाइनिंग टेबल के पास हाथ पोछते बिंदेश्वर पाठक साहब दिखे। मैं सज्जन को कहा कि &#8216;मैं शिवनाथ हूँ और भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; पाठक जी तक्षण बाहर निकले और अंदर आने को कहा। मैं कोने पर ही खड़े-खड़े उन्हें पूरी बातें बताया, तालिका दिखाया और कहा कि &#8216;परसो विश्व कप का फ़ाइनल मैच है। यह तालिका उसी से सम्बंधित है। जो जीतेगा उसका नाम लिखकर, ब्लॉक बनाकर इसे दोनों अखबार में प्रकाशित करेंगे।&#8217;</p>
<p>पाठक जी आर्यावर्त-इण्डियन नेशन संस्थान की स्थिति से अवगत थे। वे वहां के कर्मचारियों की स्थिति को भली-भांति जानते थे। मेरी भावना और उस गर्मी में सड़क नापने का उद्देश्य वे जानते थे। आखिर वे भी वे पिता थे। पाठक जी फिर पूछते हैं: &#8220;कौन जीतेगा?&#8221; मैं सहज शब्दों में कहा: कपिल देव। मेरे तालिका के पीछे उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए और कहे कि भट्ट जी को कहियेगा कि बिल दफ्तर में भेज देंगे।&#8217; फिर अपने कुर्ता के जेब में हाथ दिए और जो भी द्रव्य था (1600/- रुपये) वे मेरे हाथ में रखते कहते हैं: &#8216;यह आपकी मेहनत और सोचने की अलग दृष्टि का पुरस्कार है।&#8221; मैं भी उसे अपनी जेब में रखा लिया और उन्हें धन्यवाद देते, प्रणाम करते विदा लिया। बाहर आते ही जब सूर्यदेव पर नजर गयी तो ऐसा लगा कि सूर्यदेव मुस्कुरा रहे हैं। शायद उनकी नजर में मैं उत्तीर्ण था। मैं साईकिल का पैडल मारते सीधा अपने घर की ओर उन्मुख हो गया।</p>
<p>उन दिनों मैं पटना के भीखना पहाड़ी मोहल्ला के सैदपुर छात्रावास के सामने रहता था। सामने एक स्कूल और स्कुल परिसर में एक विशाल पीपल का बृक्ष और उस बृक्ष के नीचे हनुमान की प्रतिमा। सूर्यदेव अस्ताचल की ओर उन्मुख थे। तेज और तप दोनों कम हो गया था। माँ बीच वाले कमरे के दरवाजे का ओट लिए बैठी थी। दरवाजा खुला था। सूर्य की किरणें उसके चेहरे के साथ क्रीड़ा कर रही थी। पीपल के पेड़ के पत्तों के बीच से सूर्य की किरणें कभी-कभी छनकर आती थी। माँ मेरी साईकिल की घंटी से अवगत थी। उसे चिंता थी कि मुझे दफ्तर जाने का समय हो रहा है और मैं अब तक वापस नहीं आया हूँ। तभी साईकिल की ट्रिंग-ट्रिंग घंटी बजी। गली के नुक्कड़ से दरवाजे की दूरी महज 20 कदम था। माँ मेरे चेहरे को पढ़ ली। &#8216;नाउम्मीद&#8217; मन आकाशमात उम्मीदों से भर गया। माँ समझ गई &#8211; कुछ अच्छा हुआ है। मैं साइकिल लगाकर माँ के हाथों में 1600/- रुपये रखा। अपनी आँचल की खूंट से अपनी आंखों को पोछते वे कहती हैं: &#8220;जुग-जुग जीबैथ बिंदेश्वर बाबू।&#8221; उस द्रव्य से कोई तीन महीने हम सभी &#8216;भर-पेट खाना खाये।</p>
<p>उस घटना के कोई तीन दशक बाद जब भारत के पूर्व कप्तान और विश्व कप &#8211; 1983 के विजेता कपिल देव से नोयडा स्थित उनके नवनिर्मित गगनचुम्बी अट्टालिका में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों का वीर-गति प्राप्त सेनानियों के आज के वंशजों की खोज से संबंधित प्रयास को लेकर मिला और उन्हें पटना की उस घटना को बताया, बिंदेश्वर पाठक जी के बारे में बताया। मेरी बातों को वे बहुत धैर्य के साथ सुने। वे निःशब्द थे। लगता था वे मेरी भावना को पढ़ रहे हैं। उन दिनों मैं ऑस्ट्रेलिआ से उदघोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (एसबीएस रेडियो, हिंदी सेवा) के लिए कार्य करता था। मेरी बातों को सुनने के बाद भारत के कप्तान कहते हैं: &#8220;हमें उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। न मैं खेल के मैदान में उस दिन उम्मीद छोड़ा था और ना ही आज। आपकी बातें एक पाठ है आज को युवाओं के लिए। आप बहुत बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को सभी नहीं समझेंगे। मैं पाठक जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। पाठक जी बहुत बेहतरीन इंसान हैं। आज़ाद भारत में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने सफाई के समाजशात्र को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जो किया, आज तक किसी ने नहीं किया। आप भी उम्मीद नहीं छोड़ें। कोई नहीं जानता आपका अंतिम प्रयास ही आपको विश्वव्यापी बना दे।&#8221; खैर।</p>
<p>आज ही नहीं, कल भी “मेरी आवाज ही पहचान है” – ये पांच शब्द सुनते ही दिवंगत लता मंगेशकर जी याद आएँगी। “मिसाईल” सुनते ही महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत ए पी जे अब्दुल कलाम साहब याद आएंगे। क्रिकेट के मैदान में जब भी वर्ल्ड कप की चर्चा होगी पहले कपिल देव ही नाम लिया जायेगा। उसी तरह आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भारत में स्वच्छता और भंगी-मुक्ति आंदोलन, यानी “सामाजिक बदलाव” और “मानवीय विकास” के अग्रणी का नाम लिया जायेगा, तो सबों के जुबान पर एक ही नाम आएगा &#8216;सुलभ&#8217; और उनके संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक &#8211; और जब डॉ बिंदेश्वर पाठक अपने आप से पूछेंगे तो शायद अपने परम मित्र, सहपाठी, शिक्षक और प्राथमिक सलाहकार डॉ हेतुकर झा को कभी नहीं भूलेंगे।</p>
<p>जब भी &#8216;सोशियोलॉजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; पर चर्चा की जाएगी डॉ पाठक के साथ-साथ उनके मित्र-सह-शिक्षक-सह-सलाहकार डॉ हेतुकर झा का नाम स्वतः मुख पर आ जायेगा। यही कारण है कि डॉ पाठक की तुलना इब्राहिम लिंकन से भी लोगों ने किया। जिस तरह लिंकन अमेरिका में काले-गोरों में भेदभाव को मिटाने के लिए याद किये जाते हैं, डॉ पाठक भारत में समाज के दबे-कुचले, समाज से उपेक्षित सर पर मैला ढोने वाले महिला-पुरुषों को समाज की मुख्यधाराओं में जोड़ने के लिए याद किये जायेंगे। और उन्ही यादों में &#8216;सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; के रचयिता डॉ हेतुकर झा का नाम भी आएगा। यदि सही कहा जाय तो पटना में डॉ पाठक और उनके मित्र डॉ हेतुकर झा पटना के रास्ते, अपने प्रदेश, देश और विश्व में सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; की बुनियाद को मजबूत किये।</p>
<p>साठ के दशक के मध्य की बात है। हेतुकर बाबू पटना के राजेंद्र नगर इलाके में रोड नंबर 16 में रहते थे। पटना के ऐतिहासिक मोइनुल हक़ स्टेडियम के ठीक सामने। इनका आवास दूसरे तल्ले पर था। उसी मकान में नीचे बेचन बाबू रहते थे। आम तौर पर उन दिनों हेतुकर बाबू अपने आवास से विश्वविद्यालय रिक्शा से जाते थे। यदि रास्ता ठीक-ठाक रहा तो रिक्शा सैदपुर स्थित राष्ट्रभाषा परिषद् कार्यालय से होते हुए भिखना पहाड़ी स्थित डॉ कमला आचारी के घर के सामने से या तो रमना रोड होते विश्वविद्यालय परिसर आती थी अथवा साइंस कालेज के सामने निकल कर अशोकराज पथ से विभाग पहुँचते थे। वे अपने छात्र-जीवन में वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी लड़े थे । पद था उपाध्यक्ष।</p>
<p>26 जनवरी, 1968 को पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के.के.दत्ता का लिखा और हस्ताक्षरित यह पत्र हेतुकर बाबू के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दृष्टान्त देता है। के.के.दत्ता लिखता हैं: &#8221; Shri Hetukar Jha has been intimately known to me as a student of the Patna University. I have been favourably impressed with all that I have seen of him. With good academic record he has developed a liberal and cultural outlook. He is intelligent, industrious and conscientious. What I liked most in him is his genuine interest of creative activities and as Vice-President of the Patna University Students Union he has rendered valuable services to me in fostering a feeling of fellowship in the University campus. Hias manners and conducts are excellent. I wish him all success in his life.&#8221;</p>
<p>हेतुकर बाबू से हमारा रिश्ता पारिवारिक था। साथ ही, नोवेल्टी एंड कंपनी के कारण पटना विश्वविद्यालय के लगभग सभी प्राध्यापकों को जानते थे। उन दिनों पाठक जी साइकिल से हेतुकर बाबू के घर राजेंद्र नगर आते थे। एक मित्र के रूप में दोनों ढ़ेर सारी बातें करते थे। बातों का ध्रुवीकरण सामाजिक क्षेत्र के कार्यों से जुड़ा होता था। पाठक जी के मन में प्रारम्भ से ही समाज में एक बदलाव लाने की तम्मन्ना थी और उस कार्य में हेतुकर बाबू की भूमिका को आज तक पाठक साहब भी नहीं भुला पाए। जैसे-जैसे समय में बदलाव आ रहा था, पाठक जी पहले एक पुरानी मोटरसाइकिल (राजदूत) की सवारी करने लगे फिर एक पुराना एम्बेसेडर कर। उन दिनों भी हेतुकर बाबू के पास एक आसमानी रंग फिएट (DHA 6200) हुआ करता था । दोनों की मित्रता एक शिक्षक-छात्र से अधिक एक अद्वितीय मित्र के रूप में था। पटना कालेज ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय के ही नहीं, बल्कि बिहार से दिल्ली तक, जहाँ भी सामाजिक सरोकार पर, स्वच्छता पर, अछूतों के उत्थान पर, उन्हें समाज के मुख्य धाराओं में जोड़ने की बात पर चर्चा होती थी; पाठक जी और हेतुकर बाबू का नाम अवश्य आता था। यदि कहा जाय तो दोनों की मित्रता, सम्मान, सम्बन्ध बहुत ही उत्कर्ष का था। उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है।</p>
<p>जब डॉ. पाठक ने 1970 में बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखी, पटना विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के अध्यापक हेतुकर बाबू उनके पीछे खड़े थे। हेतुकर बाबू को अपने मित्र पर अटूट विश्वास था और उन्हें यह भी विश्वास था कि आने वाले समय में पाठक जी न केवल पटना, बिहार या भारत, अपितु विश्व के अन्य देशों में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर &#8216;समाजशात्र&#8217; की परिभाषा को पुनः लिखेंगे। वे गाँधी की विचारधाराओं, जिससे वे अधिक प्रभावित थे, को अक्षरसः व्यवहार में अनुवाद करेंगे । आज भी याद है इन महान समाजशास्त्रियों के सुयोग्य नेतृत्व में कमाऊ शौचालयों को कम लागत वाले फ्लश शौचालयों अर्थात् ‘सुलभ शौचालयों’ में बदलने का एक क्रान्तिकारी अभियान शुरू किया। उन दिनों परम्परागत कमाऊ शौचालय पर्यावरण को प्रदूषित करते थे और दुर्गन्ध फैलाते थे। साथ ही, उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता पड़ती थी। कम लागत वाले सुलभ शौचालय उपयोग की दृष्टि से व्यावहारिक थे, आज भी हैं और उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रकार यह एक व्यवहार्य विकल्प है जो इसका उपयोग करने वालों के साथ ही सफाई कर्मियों के लिए भी वरदान सिद्ध हुआ है।</p>
<p>उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर मुसी राजा साहब, प्रोफ़ेसर सरदार देवनंदन सिंह साहब, प्रोफ़ेसर सतीश कुमार साहब, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार साहब, प्रोफ़ेसर (श्रीमती) फुलोरा सिंह, प्रोफ़ेसर ज़ियाउद्दीन अहमद जैस समाजशात्र के महान हस्ताक्षर थे। प्रोफ़ेसर हेतुकर बाबू की हमेशा इक्षा होती थी की समाज में उनके द्वारा, उनके सहयोग से कुछ ऐसी संस्थागत व्यवस्था हो जो आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासकर उनकी शिक्षा-शोध में लाभकारी हो। परिणाम यह हुआ कि हेतुकर बाबू-पाठक जी के सहयोग से मिथिला में पंजीकरण व्यवस्था पर शोध कर कार्य करने की बात हुई। इस सिलसिले में देश के कई विश्वविद्यालयों से भी वार्तालाप हुई। इतना ही नहीं, पटना में समाजशास्त्र और सामाजिक व्यवस्था पर उच्चस्तरीय शोध के लिए दोनों ने सुलभ इंस्टीटूट ऑफ़ सोसल स्टडीज की स्थापना की गई जिसका कोई ढ़ाई साल तक हेतुकर बाबू ऑर्जेनाइजिंग डाइरेक्टर भी थे। दोनों यह चाहते थे कि पटना में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की जाय जो भविष्य में सामाजिक क्षेत्र के कार्यों पर शोध करने वाले शोधार्थी को मदद मिल सके &#8211; एक केंद्रीय संस्था के रूप में। लेकिन तत्कालीन व्यवस्था और हुकुमनानों के साथ &#8216;तालमेल नहीं बैठने के कारण पटना में स्थापित होने वाला वह संस्था दिल्ली आ गया।</p>
<p>समयांतराल हेतुकर बाबू &#8220;सोसिऑलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8221; नामक मुलभुत किताब की रचना किये जिसे पाठक जी ने प्रकाशित भी किया। यह किताब वस्तुतः &#8216;सेनिटेशन&#8217; के मामले में एक इन्साइक्लोपीडिया है जो किसी भी शोधार्थी के लिए महत्वपूर्ण है। इन तमाम कार्यों में डॉ पाठक की भूमिका अद्वितीय है। यही कारण है कि जब सत्तर के दशक का सुलभ शौचालय समयांतराल सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन बना, सामाजिक क्षेत्र में हेतुकर बाबू की भूमिका के सम्मानार्थ डॉ पाठक नजरअंदाज नहीं किये।</p>
<p>कहते हैं डॉ पाठक का जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ था। विगत चार दशकों और अधिक समय में पाठक जी से अनेकों बार सुना: “जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया , जिसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है।” डॉ पाठक के अनुसार वे जिस घर में पीला-बढे उसमे वैसे नौ कमरे तो थे, परन्तु एक भी शौचालय नहीं था। जब वे सोते थे तो सुबह-सवेरे अर्धनिद्रा में कुछ आवाजें सुनते थे, कोई बाल्टी उठा रहा होता था, कोई पानी भर रहा होता था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं। कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था। कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था। यह कहानी महज उनके घर या गाँव की नहीं बल्कि यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की थी। उनकी शिक्षा चार स्कूलों में हुई और दुर्भाग्यवश किसी में भी शौचालय नहीं था।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्हें 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला। समिति ने उन्हें सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाय। ब्राह्मण परिवार के जन्म लिए एक व्यक्ति के लिए यह सबसे “नीच कार्य” समझा जाता था, परन्तु डॉ पाठक इसे सहर्ष स्वीकार किया – यह स्वीकार्यता न केवल उनके व्यक्तित्व में बदलाव लाया परन्तु उनके जीवन को एक नयी दिशा भी दिया। डॉ पाठक के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब वे बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गए।</p>
<p>उस समय देश में जाति-प्रथा उत्कर्ष पर थी। उनके साथ रहते हुए डॉ पाठक ने जो देखा-सीखा-पीड़ा का अनुभव किया, वह सभी बातें इन्हे अपने जीवन को स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ओर उन्मुख कर दिया – पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी दूसरे कार्य में पुनर्वासित किया जा सके। आज उन्होंने मानवीय सिद्धांतों के साथ तकनीकी नवाचार को मिलाकर संगठन शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकारों, पर्यावरण स्वच्छता, ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों, अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। संगठन 50,000 स्वयंसेवकों की गिनती करता है।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय का यह समाजशात्री आज भारत सरकार के पद्मभूषण से अलंकृत है। उनका नाम ग्लोबल 500 रोल ऑफ़ ऑनर, स्टॉकहोम जल पुरस्कार, लीजेंड ऑफ़ प्लेनेट पुरस्कार, इंडियन अफेयर्स सोशल रिफॉर्मर ऑफ द ईयर 2017 का पुरस्कार, ऑर्डर पटेल अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, न्यूयॉर्क शहर के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल को बिंदेश्वर पाठक दिवस के रूप में घोषित किये। आज प्रोफेसर हेतुकर बाबू नहीं हैं, लेकिन दोनों समाजशास्त्रियों की स्वच्छता सम्बन्धी सोच ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर दी। करीब पांच दशक जिस अभियान को शुरू किया गया था, वह एक विशाल आंदोलन के रूप में, सामाजिक क्रांति के रूप में, सामाजिक चेतना के रूप में विश्व में अवतरित हुआ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology">पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मानवीयता सिर्फ &#8216;माँ&#8217; में होती है चाहे &#8216;विधवा&#8217; ही क्यों न हो, राजनेताओं में नहीं !!!</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/mother-humanity-and-politics</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/mother-humanity-and-politics#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Mar 2019 05:35:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<category><![CDATA[vrindavan]]></category>
		<category><![CDATA[widow]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=964</guid>

					<description><![CDATA[<p>वृन्दावन/गोवा/नई दिल्ली : गोआ के पूर्व मुख्य मंत्री मनोहर पर्रिकर को बनारस, मथुरा, वृन्दावन की विधवाएँ जानती नहीं थीं, देखी भी नहीं थीं परन्तु अश्रुपूरित आखों से होली-कार्यक्रम स्थगित की। लेकिन गोवा के राजनेतागण नए मुख्य मंत्री के चुनाब और शपथ ग्रहण रात दो बजे सम्पन्न किये &#8211; कहीं मौका हाथ से निकल नहीं जाय। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/mother-humanity-and-politics">मानवीयता सिर्फ &#8216;माँ&#8217; में होती है चाहे &#8216;विधवा&#8217; ही क्यों न हो, राजनेताओं में नहीं !!!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>वृन्दावन/गोवा/नई दिल्ली : गोआ के पूर्व मुख्य मंत्री मनोहर पर्रिकर को बनारस, मथुरा, वृन्दावन की विधवाएँ जानती नहीं थीं, देखी भी नहीं थीं परन्तु अश्रुपूरित आखों से होली-कार्यक्रम स्थगित की। लेकिन गोवा के  राजनेतागण नए मुख्य मंत्री के चुनाब और शपथ ग्रहण रात दो बजे सम्पन्न किये &#8211; कहीं मौका हाथ से निकल नहीं जाय। इसे कहते हैं &#8220;राजनीति&#8221; और राजनीति में &#8220;मानवीयता&#8221; का कोई स्थान नहीं होता। मानवीयता तो सिर्फ &#8220;माँ&#8221; में होती है चाहे &#8220;विधवा&#8221; ही क्यों न हो और यान मानवीयता चाहे अपने संस्तान के लिए हो अथवा किसी अपरिचित के लिए। </p>
<p>बनारस, मथुरा, वृन्दावन में दसकों से रहने वाली विधवाएँ जो अपने ही परिवार और परिजनों से मुदत्तों से उपेक्षित रह जीवन की अंतिम साँसे गिन रहीं है; गोवा के दिवन्गत मुख्य मन्त्री मनोहर पर्रिकर को नहीं जानती थीं, देखने की बात तो दूर; लेकिन जैसे ही उनकी अन्तिम साँस बंद होने की बात देश को मालूम हुआ; वृन्दावन में उपस्थित हज़ारों विधवाएं जो पिछले सात वर्षों से रंगों का पर्व &#8220;होली&#8221; खेलकर अपने जीवन में खुशियां लाती थीं, उस अदृश्य मानव-पुत्र के लिए सम्पूर्ण कार्यक्रम रद्द कर दीं । </p>
<p>उन विधवाओं का कहना था : &#8220;हमारा बेटा मर गया फिर होली कैसे खेलें।&#8221; </p>
<p>​वैसे होली के एक-दो दिन पूर्व यहाँ हज़ारों-हज़ार विधवाएं सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के तत्वावधान में आयोजित होली-मिलन-खेल वृन्दावन के ठाकुर गोपीनाथ मंदिर में पिछले सात वर्षों से धूमधाम से मनाते आये हैं। इस  सामूहिक होली कार्यक्रम के कवरेज के लिए देश-विदेश से करीब ढाई-तीन सौ पत्रकार एवं फोटो जर्नलिस्ट भी उपस्थित हुए थे। </p>
<p>​परन्तु मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद​ भले ही उनके पार्थिव शरीर का अन्तिम संस्कार भी नहीं हो पाया था,​ गोवा में सियासी उठापटक ​अपने उत्कर्ष पर पहुँच गया था। राजनीतिक हालात ​ऐसी हो गयी थी की रात के दो बजे एक विशेष आयोजन करना पड़ा और प्रमोद सावंत ​को​ गोवा ​का नया मुख्यमंत्री ​बनाया गया। सावंत ने​ रात 2 बजे राजभवन में आयोजित समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ ​ली। सावंत को गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने पद और गोपनीयता की शपथ ​दिलाई। </p>
<p>प्रमोद सावंत के साथ-साथ दो ​उप-मुख्य मंत्री भी शपथ ​लिए। एम जी पी के सुदिन धवलिकर और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई ​उप-मुख्य मंत्री बनाए ​गए। देर रात आयोजित समारोह में प्रमोद सावंत और दो ​ उप-मुख्य मंत्री​ के अलावा 9 विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ​ली।  शपथ समारोह से पहले प्रमोद सावंत ने कहा कि पार्टी ने जो जिम्मेदारी मुझे दी है उसे निभाने की मेरी पूरी कोशिश ​रहेगी। &#8220;मैं जो भी कुछ हूं मनोहर पर्रिकर की वजह से ही ​हूँ। उन्होंने ही मुझे राजनीति में ​लाये और उन्हीं के बदौलत मैं गोवा विधानसभा का स्पीकर ​बना। &#8221;</p>
<p>ठाकुर गोपीनाथ मंदिर में उपस्थित विधवाएं होली त्यौहार आने से कोई महीनो पहले से इस रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन अन्तःमन से करतीं हैं। जीवन के अंतिम वसंत में सुलभ संस्था के संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक उन्हें &#8220;जीने का वजह&#8221; दिए। जीवन में अस्सी से अधिक पतझड़ देखने के बाद अब इस वसंत को देखकर वे सभी जीना चाहती है। परिवार और परिजनों से उपेक्षित होने के वावजूद आज भी उनके मन में मानवीयता की मृत्यु नहीं हुयी है और यही कारण है कि मनोहर पर्रिकर जैसे लोग की मृत्यु के बाद उन्हें हंसना गँवारा नहीं हुआ जबकि राजनीतिक गलियारे में ऊनि मृत्यु पर को दुःख हो अथवा नहीं, सभी राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की निगाहें मुख्य मंत्री की कुर्सी पर केंद्रित थी। </p>
<p>सुलभ फाउण्डेशन के संस्थापक डा. बिन्देश्वर पाठक ने कहा​: &#8220;विधवाओं और महिलाओं ने स्वयं यह प्रस्ताव रखा कि पर्रिकर के निधन के चलते होली मनाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया जाए, जिसे सभी ने पूर्ण सम्मान के साथ शिरोधार्य कर लिया।​&#8221;  </p>
<p>गौरतलब है कि सुलभ फाउण्डेशन वर्ष 2012 से उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर वृन्दावन, वाराणसी तथा उत्तराखण्ड आदि में रहकर भजन-कीर्तन और भिक्षावृत्ति के सहारे अपना बाकी जीवन जैसे-तैसे काट रहीं विधवा एवं परित्यक्त महिलाओं को सम्मानजनक जीवन देने का प्रयास कर रहा है। इस प्रयास के तहत इन महिलाओं को रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया कराने के अलावा सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए होली, दिवाली, रक्षाबंधन तथा दुर्गापूजा आदि त्यौहारों के अवसर पर समाज के अन्य वर्गों के समान ही खुशी मनाने तथा खुशियां बांटने का मौका देने की शुरुआत की गई।   </p>
<p>पर्रिकर केंद्रीय रक्षा मंत्री के पद से मार्च 2017 में इस्तीफ़ा दे चौथी बार गोवा के मुख्यमंत्री बनकर अपने गृह राज्य लौट गए ​थे। हालांकि पर्रिकर ने पहले ही घोषित कर दिया था कि ये उनका अंतिम कार्यकाल है और आगे से चुनाव नहीं ​लड़ेंगे। उन्होंने एक टीवी चैनल से एक बार कहा था​:, &#8220;मैं अपनी ज़िंदगी के अंतिम 10 साल ख़ुद के लिए जीना चाहता ​हूँ। मैंने राज्य को काफ़ी कुछ वापस दिया ​है। मैं इस कार्यकाल के बाद मैं चुनाव लड़ने या चुनाव का हिस्सा नहीं बनूंगा, चाहे पार्टी की ओर से कितना ही दबाव ​आये। &#8221;</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/mother-humanity-and-politics">मानवीयता सिर्फ &#8216;माँ&#8217; में होती है चाहे &#8216;विधवा&#8217; ही क्यों न हो, राजनेताओं में नहीं !!!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/mother-humanity-and-politics/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>काश !! विधवाओं के रक्षार्थ प्रधान मन्त्री &#8216;एक कानून&#8217; बना देते, हज़ारों विधवाएँ तो &#8216;राखी भी बाँधी थी&#8217; उन्हें</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Nov 2018 12:36:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[law]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<category><![CDATA[vrindavan]]></category>
		<category><![CDATA[widows]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=842</guid>

					<description><![CDATA[<p>वृन्दावन / बनारस / नई दिल्ली : काशी &#8211; मथुरा &#8211; काशी &#8211; प्रयाग &#8211; वृन्दावन में अपने जीवन की अन्तिम साँसें गिनती हज़ारो विधवाएँ प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी की कलाईयों पर राखी बाँधती रहीं, उन्हें दुआएं देती रहीं, जीवन के अंतिम वसंत में भर-पेट भोजन और सुरक्षा मांगती रहीं, उनसे गुजारिश करती रहीं की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection">काश !! विधवाओं के रक्षार्थ प्रधान मन्त्री &#8216;एक कानून&#8217; बना देते, हज़ारों विधवाएँ तो &#8216;राखी भी बाँधी थी&#8217; उन्हें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>वृन्दावन / बनारस / नई दिल्ली  : काशी &#8211; मथुरा &#8211; काशी &#8211; प्रयाग &#8211; वृन्दावन में अपने जीवन की अन्तिम साँसें गिनती हज़ारो विधवाएँ प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी की कलाईयों पर राखी बाँधती रहीं, उन्हें दुआएं देती रहीं, जीवन के अंतिम वसंत में भर-पेट भोजन और सुरक्षा मांगती रहीं, उनसे गुजारिश करती रहीं की केन्द्र सरकार एक कानून बनाये  उनके कल्याणार्थ । लेकिन केन्द्र सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। शिव की नगरी बनारस से लेकर कृष्ण की नगरी मथुरा-वृन्दावन सहित देश की लगभग 3.60 करोड़ विधवाएं बहुत दुःखी है केन्द्र सरकार, कानून मन्त्री रविशंकर प्रसाद और माननीय प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी से। </p>
<p>पिछले कई वर्षों से वृन्दावन-मथुरा-काशी-प्रयाग की विधवाएं इस आशा और विस्वास से जी रहीं थीं एक इस सरकार की समय समाप्ति से पूर्व &#8220;दयावान&#8221; प्रधान मन्त्री उन विधवाओं की सुरक्षा व्यवस्था हेतु संसद में एक विधेयक लाकर कानून बनाएगी, ताकि अपने-अपने घरों से निर्वासित इन वृद्ध माताओं, विधवाओं को सहारा मिले, परन्तु ऐसा नहीं हो पाया। यह अलग बात है कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस पर कहे थे की कानून मंत्रालय विधवाओं के कल्याण के लिए एक निर्णायक कार्य करेगा। लेकिन उनका आश्वासन भी &#8220;विधवा&#8221; ही रह गया। </p>
<p>​भारत में करीब 3.60 करोड़ विधवाएं हैं ​जिनकी हितों की रक्षा के लिए सरकार की पहल होनी चाहिए थी । ज्ञातब्य है कि सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संथापक डॉ बिन्देश्वर पाठक, जिन्होंने विधवाओं के कल्याणार्थ ऐतिहासिक कार्य किये हैं; विधवाओं की हितों में कानून बनाने के लिए एक बिल का मसौदा तैयार किया था और इस दिशा में देश के सभी राजनीतिक दलों के सहयोग की अपील भी किया था।  </p>
<p>उन्होंने कहा&#8221; &#8220;हमें पूर्ण विस्वास है कि इन उपेक्षित वृद्ध माताओं, विधवाओं के कल्याण और सुरक्षा के लिए सरकार जरूर पहल करेगी।&#8221; </p>
<p>​उनके अनुसार,​ ‘समाज में विधवाओं की दयनीय दशा में सुधार के लिए कानून बनाए जाने की दृष्टि से मैंने एक विधेयक का प्रस्ताव किया है। हम चाहते हैं कि सरकार उपेक्षित विधवाओं के संरक्षण, कल्याण और सहायता के लिए कानून बनाकर एक विधवा कल्याण बोर्ड का गठन करे और उनके लिये अलग से निधि बनायी जाए।​ विधवाएं समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और सरकार का यह  ​दायित्व है की वे उनकी रक्षा करे। &#8221;</p>
<p>डॉ पाठक ने कहा की कानून तो बनना ही चाहिए लेकिन साथ ही विधवाओं को लेकर समाज को अपनी सोच भी बदलनी चाहिए और अल्पायु में विधवा होने वाली युवतियों और महिलाओं के पुनर्विवाह को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह बताते हुए कि देश की कुल आबादी में विधवाओं की संख्या लगभग तीन प्रतिशत के बराबर है और इनमें से 50 प्रतिशत बुजुर्ग, असहाय और अशक्त हैं, जिनके पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है। </p>
<p>​​कहा जाता है कि विधवाओं की बुरी हालत को देखकर कृष्ण भक्त मध्यकालीन कवि चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को जीवन के आखिरी पल वृंदावन में कृष्ण भक्ति करते हुए गुजारने की परम्परा डाली और विधवाओं को लेकर वृंदावन आ गए। तब मकसद यह था कि अपने परिवारों की उपेक्षा झेल रही विधवाओं को मन्दिर और आश्रम आसरा देंगे और उनकी जिन्दगी गुजर जाएगी। लेकिन कालांतर में हालात सामान्य नहीं रहे। परिवारों ने अपनी ही अजीज रही विधवाओं को खुद पर बोझ मानना शुरू किया और वृंदावन लाकर उन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ने लगे। कुछ साल पहले तक वृंदावन में विधवाएँ सड़कों पर भीख माँगते दिख जाती थीं। इतना ही नहीं “अमानवीयता का पराकाष्ठा इस बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी के कारण जब उनकी मौत हो जाती थी तो उन्हें सामान्य और सहज अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं होता था। उनके शव को टुकड़ों में काटकर बोरी में बाँधकर यमुना में फेंक दिया जाता था।</p>
<figure id="attachment_845" aria-describedby="caption-attachment-845" style="width: 1169px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/Capture.jpg"><img decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/Capture.jpg" alt="एक नजर इसे भी देखें " width="1169" height="872" class="size-full wp-image-845" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture.jpg 1169w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-300x224.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-768x573.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-1024x764.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-80x60.jpg 80w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-265x198.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-910x679.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-696x519.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-1068x797.jpg 1068w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/Capture-563x420.jpg 563w" sizes="(max-width: 1169px) 100vw, 1169px" /></a><figcaption id="caption-attachment-845" class="wp-caption-text">एक नजर इसे भी देखें</figcaption></figure>
<p>इस बात की खबर एक स्वयंसेवी संगठन को पता चली तो उसने सुप्रीम कोर्ट में विधवाओं की हालत सुधारने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त जब विधवाओं की बदहाली की जानकारी हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश महिला आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा जिला प्रशासन और सम्बन्धित विभागों को जबर्दस्त लताड़ लगाई थी। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यूयू ललित की सामाजिक पीठ ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या विधवाओं को राहत दिलाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल से बात की जा सकती है।</p>
<p>जब इस पर सहमति बनी तो डॉक्टर पाठक के पास वृंदावन की विधवाओं की मदद के लिए अगस्त 2012 में चिट्ठी आई। उन्होंने अपने सुलभ होप फाउण्डेशन के जरिए वृंदावन की विधवाओं को पहले एक हजार रुपए महीना और बाद में दो हजार रुपए महीने की सहायता देनी शुरू की। इससे वृंदावन की विधवाओं की हालत सुधर गई है। अब उन्हें भोजन के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वृंदावन में उदासीन बाबा का आश्रम अब सुबह-शाम सुलभ की सहायता से चलने वाले भजन कार्यक्रमों से गूंजता रहता है। इतना ही नहीं इनमें जो जवान और काम करने लायक हालत में विधवाएँ हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सिलाई-कढ़ाई जैसे कामों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा अशिक्षित विधवाओं को पढ़ाने का काम भी किया जा रहा है।</p>
<p>वृंदावन की तरह काशी भी विधवाओं के लिए मशहूर रहा है। हालाँकि यहाँ विधवाओं की संख्या वृंदावन की तुलना में कम है। विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर,​ शहर के हर कोने और चौक पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।’ इसके आलावा अगरबती बनाना, कपडे सिलना, फूल के माला बनाना, मोमबती बनाना। इससे जो आमदनी होती है वह उनके सर्वांगीण विकास पर खर्च की जाती है ताकि उन चेहरे पर प्रसन्नता रहे।</p>
<p>गौर​​लब है की कुछ वर्ष पहले तक वृंदावन में बड़ी संख्या में विधवा स्त्रियां सफेद साड़ी में मंदिरों में भटकते हुए और भीख मांगते देखी जाती थीं। भगवान कृष्ण की नगरी कहे जाने वाले शहर में निर्धन और कुपोषण की शिकार इन विधवाओं में से कई इतनी कमजोर थीं कि सिर्फ हड्डियों और मांस का ढांचा मात्र रह गई थीं।</p>
<p><iframe loading="lazy" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/FmrHZp9Q2tg?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>संडेपोस्ट से बातचीत करते डॉ पाठक कहते हैं: “यह सुलभ आंदोलन के लिए सौभाग्य की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधवाओं की दुर्दशा पर सुनवाई के वक्त सुलभ को महत्व दिया। सरकार से सुलभ से पूछकर बताने को कहा गया कि हम बदहाल विधवाओं को खिलाने का इंतजाम कर सकती है या नहीं। न्यायमूर्ति के जेहन से इस नेक काम के लिए सुलभ का जिक्र होना हमारे लिए गौरव की बात है। हम मैला ढोने वाली महिलाओं को समाजिक हक दिलाने के लिए पहले से सक्रिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने समाज की परित्यक्ता बनकर जीने के विवश वृंदावन औऱ वाराणसी की विधवाओं की मदद के लिए हमें उतार दिया। यहां की आश्रमों में रहने वाली विधवाओं के लिए खाने- पीने, पहनने ओढने की समस्या के साथ अंतिम संस्कार तक में समुचित सम्मान नहीं मिलने की मुसीबत थी। सर्वोच्च न्यायालय में मरने के बाद इन विधवाओं के शरीर को बोटी बोटी कर यमुना में फेंके जाने के मामले की सुनवाई के लिए पहुंचा था। सुलभ के प्रयास से आज यहां के आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को दो हजार रुपए प्रतिमाह का अनुदान दिया जा रहा है। हालत में बदलाव के लिए हिंदी, अंग्रेजी और बांगला में शिक्षा का इंतजाम किया गया है। पुनर्वास के अन्य जरूरी सुविधाओं का ख्याल रखा जा रहा है।”</p>
<p>​​</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection">काश !! विधवाओं के रक्षार्थ प्रधान मन्त्री &#8216;एक कानून&#8217; बना देते, हज़ारों विधवाएँ तो &#8216;राखी भी बाँधी थी&#8217; उन्हें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/law/no-law-for-widows-protection/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>&#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; की घोर किल्लत है सरकारी क्षेत्रों में; फिर कार्य कैसे होगा, ​कौन करेगा ? ​</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/india-needs-will-power-not-speech</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/india-needs-will-power-not-speech#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Nov 2018 06:23:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[Sanitation]]></category>
		<category><![CDATA[sever lines]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<category><![CDATA[toilet]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=834</guid>

					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ​आप शायद विस्वास नहीं करेंगे, लेकिन यह सत्य है। भारत में जहाँ प्रत्येक ७०९ लोगों पर एक पुलिसकर्मी है, वहीँ प्रत्येक ४०० व्यक्तियों पर एक-एक गैर-सरकारी संगठन भी हैं। यदि आंकड़ों को माना जाय तो वर्तमान समय में देश में जितने प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यालय हैं, उनसे दो-गुना अधिक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/india-needs-will-power-not-speech">&#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; की घोर किल्लत है सरकारी क्षेत्रों में; फिर कार्य कैसे होगा, ​कौन करेगा ? ​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ​आप शायद विस्वास नहीं करेंगे, लेकिन यह सत्य है। भारत में जहाँ प्रत्येक ७०९  लोगों पर एक पुलिसकर्मी  है, वहीँ प्रत्येक ४०० व्यक्तियों पर एक-एक गैर-सरकारी संगठन भी हैं। यदि आंकड़ों को माना जाय तो वर्तमान समय में देश में जितने प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यालय हैं, उनसे दो-गुना अधिक और यक़ीनन सरकारी अस्पतालों से २५० गुना अधिक गैर-सरकारी संगठन कागज़ पर &#8221;भाग-मिल्खा-भाग&#8221; कर रहे हैं, दौड़ रहे हैं।</p>
<p>भारत में ३१ लाख से अधिक गैर-सरकारी संगठन देश के २६ राज्यों में निबन्धित हैं जो सरकारी और अन्य क्षेत्रों से मिलने वाली राशियों में से न्यूनतम २० प्रतिशत राशि &#8220;कुर्सी के नीचे से&#8221; सम्बंधित विभागाध्यक्षों, कर्मचारियों को देकर जीवित हैं, फल -फूल रहे हैं। हाँ, विशेष परिस्थिति में कईयों को ब्लैकलिस्ट भी किया गया है। लेकिन हथकंडों के विभिन्न रूपों का इस्तेमाल कर &#8221;व्हाईट लिस्ट&#8221; में शामिल होने में इन्हे देर नहीं लगता। इस ३१ लाख गैर-सरकारी संगठनो के अतिरिक्त केंद्र शासित प्रदेशों में इनकी संख्या लगभग ८२,००० है। </p>
<p>पिछले दिनों आधुनिक भारत के स्वच्छता अभियान के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक, देश में पहली बार एक गैर-सरकारी संगठन &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन &#8211; की ओर से सीवर-लाइनों की सफाई में जुड़े लाखों कर्मचारियों को यह आस्वस्त किये की सफाई करने के दौरान किसी भी कर्मचारी की अब मृत्यु नहीं होगी, उनकी पत्नियां अब विधवा नहीं होंगी, उनके बच्चे अब अनाथ होंगे, सीवर लाईन कभी भी जाम नहीं होगा &#8211; बसर्ते इस सफाई कार्य के लिए जिम्मेदार विभाग, अधिकारीगण, अन्य महानुभाव उन कर्मचारियों के जीवन &#8211; मोल को समझें। डॉ पाठक का कहना था की अब वे यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते की देश में ऐसे उपरकण नहीं है, जो सीवर लाइनों की सफाई कार्य में मदद कर सके और जान-माल को रोक सके। </p>
<p><figure id="attachment_836" aria-describedby="caption-attachment-836" style="width: 300px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/2-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/2-1-300x200.jpg" alt="भारत में स्वच्छता के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक ​जिन्होंने सर पर मैला धोने की कुप्रथा का अंत किये ​" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-836" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-910x607.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-696x464.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-630x420.jpg 630w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-836" class="wp-caption-text">भारत में स्वच्छता के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक ​जिन्होंने सर पर मैला धोने की कुप्रथा का अंत किये ​</figcaption></figure><br />
&#8220;मैं, यानि सुलभ, सीवर की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की होने वाली मौत की रोकथाम के लिए स्वदेशी तकनीक से विकसित अत्याधुनिक ‘सीवर सफाई मशीन’ ​लेकर उपस्थित हूँ। यह मशीन देश पहली बार आया है, जिसे मैं लेकर आया हूँ। ​यह मशीन कैमरा और अन्य सुविधाओं से लैस ​है और ​इस मशीन से मैनहोल को साफ किया जा सकेगा।​ इससे सीवर के अंदर जाकर सफाई की जा ​सकती तथा जहरीली गैस से लोगों की होने वाली मौत पर नियंत्रण लगाया जा ​सकता है ।​ यदि मैनहोल के अंदर लोगों को जाना भी पड़े तो उसके लिए सुरक्षा उपकरणों को भी लगाया गया है।​ अब यह सम्बद्ध विभाग, सरकारी संस्थाओं, सरकारों, नगर निगमों की  ईक्षा शक्ति पर निर्भर करता है कि वे इस मशीन को प्राथमिकता दें, या कर्मचारियों की जान-माल को नजर-अंदाज करें। अब वे यह नहीं कह सकते की आधुनिक उपकरण देश में ;उपलब्ध नहीं है, क्योंकि सुलभ मानव जीवन को नुकसान पहुंचाये बिना गहरे सीवरों की सफाई सुनिश्चित करने के लिए एक अनूठा उपकरण खरीदा है।​&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों ने सुरक्षा उपायों के सुझाव दिये और इस कार्य को करने के लिए आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था की गयी।​ डॉ पाठक ​के अनुसार नयी मशीन मैनहोल के आवधिक यांत्रिक सफाई के लिए आदर्श है​, इसमें शक्तिशाली जेट पंप लगा है जो प्रति मिनट 150 लीटर पानी के प्रवाह के लिए सक्षम है​ और विशेष रूप से डिजाइन किए गए लचीले स्टील रॉड का उपयोग करके डी-चोकिंग सीवर लाइन में भी सक्षम है।​ ​नयी सुलभ सीवर सफाई मशीन वाहन सुरक्षा, इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक रूप से संचालित​ है।  यह सीवर जेटिंग सह रॉडिंग सह मैकेनिकल मैनहोल डिस्लीटिंग मशीन के साथ​ व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और सीवर त्वरित दृश्य पाइप निरीक्षण कैमरा के साथ है​, जो सीएनजी चालित है जिसे आठ फुट चौड़ी गलियों में भी ले जाया जा सकता है।​ ज्ञातब्य है कि ​पिछले तीन वर्षों के दौरान,सीवर लाइनों की​सफाई के दौरान 1300 से ज्यादा सफाई कर्मचारियों की मौत हुई हैं।</p>
<p>​पिछली जनगणना के अनुसार देश में कुल ७९३५ शहर हैं​,​ जिसमे करीब ३७७ मिलियन लोग, यानि देश की आवादी का ३१.२ फ़ीसदी रहते हैं। देश में करीब २०५ नगर निगमें हैं। </p>
<p>शहर विकास मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि जब तक सरकार, चाहे केंद्र​ की सरकार हो या राज्यों ​की; नगर निगमों में बैठे अधिकारीगण किसी के जीवन के महत्व को नहीं समझेंगे, इस उपकरण का इस्तेमाल होना प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है और इसका सबसे बड़ा कारण है इस कार्य के निमित्त आवण्टित राशियों का बन्दर-बाँट।<br />
<figure id="attachment_837" aria-describedby="caption-attachment-837" style="width: 300px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/3-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/3-1-300x200.jpg" alt="​बच्चों को स्वच्छता के बारे में बताते डॉ पाठक ​" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-910x607.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-696x464.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-630x420.jpg 630w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-837" class="wp-caption-text">​बच्चों को स्वच्छता के बारे में बताते डॉ पाठक ​</figcaption></figure><br />
कोई भी व्यक्ति, जिनके हाथों में अधिकार है (अपवाद छोड़कर) कभी नहीं चाहेंगे की वे इस नवीन उपकरण को लगाकर खुद आर्थिक रूप से कमजोर होते चले जाएँ। उनका कहना है कि सम्पूर्ण आवंटित राशियों में से न्यूनतन २० फीसदी राशि इन अधिकारीयों के लिए सुरक्षित हो जाता है ​निर्गत होने से पहले ही ​- दूसरे शब्दों में, अगर किसी ठेकेदार​ को किसी तरह का कार्य, चाहे सफाई ही क्यों न हो​, आवंटित किया जाता है तो उसे २० प्रतिशत राशि &#8220;देना पड़ता&#8221; है​ ​। अब बचे ८० फीसदी राशि में कितना कार्य होगा और कितना बंदरबाँट​,​ यह सम्पूर्ण रूप से ठेकेदारों के विवेक पर निर्भर करता है। </p>
<p>​अधिकारी का कहना है इस नवीनतम मशीन की कीमत अगर ४० लाख है तो देश के सभी २०५ नगर निगम खरीद सकते हैं &#8211; एक मशीन नहीं, दस-दस मशीन। लेकिन उन्हें २० फीसदी राशि नहीं मिल पायेगी, क्योंकि इसकी कीमत सर्वविदित है। अगर २० फीसदी दिए बिना खरीदने बात नहीं होती है तो स्वाभाविक है की मशीन की गुणवत्ता ख़राब होगी। आखिर वह भी कहाँ से पैसा देगा ?</p>
<p><iframe loading="lazy" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/llXr85LJmIo?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>जब डॉ पाठक से इस विषय पर पूछा तो उनका कहना था की सरकार को, नगर निगमों को देश में जो &#8221;सफ़ेद गैर-सरकारी संस्थाएं&#8221; हैं, जो सरकार को अपनी कमाई का एक-एक पैसे का हिसाब देती है, समय पर कर चुकाती है, जिनकी छवियों पर कोई दाग नहीं है, देश का दो-दो शहरों में सफाई का सम्पूर्ण कार्य &#8211; सीवर लाइनों की सफाई सहित &#8211; उन्हें दे दें। अब यदि सरकारी आंकड़ों को देखें तो देश में कोई ३००० ऐसे गैर-सरकारी संस्थाएं तो जरूर हैं जो &#8220;बेदाग़&#8221; हैं और जिनके कार्य-कलापों पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकते। लेकिन इसके लिए &#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; का होना नितांत आवश्यक है।  </p>
<p>डॉ पाठक एक बात और कहे: उनका कहना था की जिस किसी भी अधिकारी की लापरवाही के कारण सीवर लाइनों में कार्य करने वाले कर्मचारियों की मृत्यु हो; सम्बद्ध नगर निगम मृतक के परिवारों का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा का सम्पूर्ण जबाबदेही ले, साथ ही, उस अधिकारी को न्यूनतम २० वर्षों की सजा हो। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/india-needs-will-power-not-speech">&#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; की घोर किल्लत है सरकारी क्षेत्रों में; फिर कार्य कैसे होगा, ​कौन करेगा ? ​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/india-needs-will-power-not-speech/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मेरे काम का एक ही मकसद रहा है: “स्वच्छता की संस्कृति को बदलना”​ &#8211; डॉ बिन्देश्वर पाठक ​</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/health/sole-moto-of-my-work-change-cleaniness-culture</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/health/sole-moto-of-my-work-change-cleaniness-culture#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Desk Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Jul 2018 06:38:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[स्वास्थ]]></category>
		<category><![CDATA[Campaign]]></category>
		<category><![CDATA[Clean]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=620</guid>

					<description><![CDATA[<p>पचास साल से शौचालय और सफाई को लेकर जारी मेरे काम का एक ही मकसद रहा है, स्वच्छता की संस्कृति को बदलना। 1960 के दशक तक तो स्वच्छता को लेकर खास संस्कृति भी नहीं थी। इसका उदाहरण है कि जब भी कभी हमलोग किसी के यहां शौचालय को लेकर बात करने जाते थे तो लोगों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/health/sole-moto-of-my-work-change-cleaniness-culture">मेरे काम का एक ही मकसद रहा है: “स्वच्छता की संस्कृति को बदलना”​ &#8211; डॉ बिन्देश्वर पाठक ​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>पचास साल से शौचालय और सफाई को लेकर जारी मेरे काम का एक ही मकसद रहा है, स्वच्छता की संस्कृति को बदलना। 1960 के दशक तक तो स्वच्छता को लेकर खास संस्कृति भी नहीं थी। इसका उदाहरण है कि जब भी कभी हमलोग किसी के यहां शौचालय को लेकर बात करने जाते थे तो लोगों का पहला सुझाव यह होता था कि पहले चाय पी लेते हैं, फिर शौचालय की बात करते हैं। पचास साल की कोशिशों का अब बदलाव नजर आने लगा है। अब लोग खुलकर शौचालय की बात करने लगे हैं। स्वच्छता की संस्कृति पर बात करने को लेकर कोई हिचक नजर नहीं आती। वैसे भी 2014 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपिता गांधी की डेढ़ सौंवीं जयंती तक देश को खुले में शौचालय से मुक्त करने का जो अभियान शुरू किया है, उसने भी देश में स्वच्छता को लेकर नई जागरूकता पैदा की है। शायद एक यह भी वजह है कि स्वच्छता के प्रति मेरी ललक व अनुभव को देखते हुए रेलवे ने तरजीह दी और सबसे बड़ी परिवहन सेवा के साथ मुझे जुड़ने का सौभाग्य मिला।</p>
<p>हमारा मानना है कि सफाई की संस्कृति तब और ज्यादा तेजी से विकसित होगी, जब इसे सेवा भाव से लिया जाय। हमारा भारत देश विशाल है और इस देश में जब तक सेवा भाव से काम नहीं किया जाएगा, स्वच्छता की संस्कृति को जन-जन तक पहुंचा पाना और उनकी तरफ से सहज स्वीकारोक्ति हासिल कर पाना आसान नहीं होगा। देश में करीब आठ हजार रेलवे स्टेशन हैं और इसी तरह करीब साढ़े चार लाख स्कूल हैं। यद्यपि रेलवे ने अपने स्टेशनों की सफाई के लिए अभियान शुरू कर रखा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि देश के दूरदराज के ज्यादातर स्टेशनों पर सफाई की उचित व्यवस्था नहीं हो पायी है। हमने एक कार्य योजना बनाई है कि रेलवे स्टेशनों की सफाई के प्रति जागरूकता अभियान में स्कूलों के बच्चों को शामिल किया जाएं, इससे न केवल बच्चों में स्वच्छता की भावना का विकास होगा, बल्कि रेलवे स्टेशनों पर भी स्वच्छता का असर दिखाई देने लगेगा।</p>
<p>इस योजना के तहत प्रत्येक रेलवे स्टेशन के नजदीक के स्कूलों के बच्चों को हफ्ते या महीने में एक-दो दिन स्टेशन पर बुलाया जाय और उन्हें उन स्टेशनों की सफाई के लिए प्रेरित किया जाय। इस कार्य में हिस्सा लेने वाले छात्रों को सर्टिफिकेट दिए जाएंगे, ताकि उनका उत्साह बना रहे। भविष्य के सूत्रधार बच्चों में एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा और वे गांवों और कस्बों तक इसे पहुंचाने में बहुत मददगार साबित होंगे। बच्चें व युवा वास्तव में किसी भी समाज के वास्तविक ब्रांड अंबेस्डर होते है, यदि हम स्वच्छता के प्रति उनके मन में एक विचार, एक कौंध जागृत कर दें, तो समाज और राष्ट्र वास्तव में लाभांवित होगा।</p>
<p>भारतीय रेल प्रतिदिन दो करोड़ लोगों को गंतव्य तक पहुंचाती हैं। जब यात्रा के दौरान स्टेशन पर पहुंचने और उतरने के समय स्वच्छ टॉयलेट उपलब्ध हो, तो व्यक्ति के लिए वास्तव में यह राहत की बात होती है। यात्रा सचमुच सुखद लगती है। वैसे करीब तीन सौ रेलवे स्टेशनों पर सुलभ की ओर से शौचालयों का रखरखाव किया जा रहा है। सुलभ इंटरनेशनल को रेलवे के साथ काम करने का अनुभव है। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस काम में कोई दिक्कत नहीं आएगी।</p>
<p>मैंने महसूस किया है कि रेलवे स्टेशनों पर शौचालयों और मूत्रालयों की काफी कमी है। अगर हैं भी तो उनकी साफ-सफाई पर ध्यान कम है। हम इस दिशा में भी काम करेंगे। हम चाहेंगे कि रेलवे स्टेशनों पर मूत्रालयों और शौचालयों की संख्या बढ़े। वैसे रेल मंत्री सुरेश प्रभु के प्रस्ताव पर पहले से पांच रेलवे स्टेशनों पुरानी दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद, ग्वालियर और गोरखपुर में शौचालय के रख-रखाव का काम कर रहे हैं और उन स्टेशनों को साफ रखने के काम में अपना दायित्व निभा रहे हैं।</p>
<p>रेलवे ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर दो शौचालयों के रखरखाव का जिम्मा दिया है तो दो को बनाने की हमें जिम्मेदारी दी है और हम इस दिशा में काम करेंगे। देशभर के रेलवे प्लेटफॉर्मों पर शौचालयों और मूत्रालयों की कमी है, इसे पूरा कर पाना आसान नहीं है। हमारा मानना है कि इस कार्य को बैंकों से कर्ज लेकर पूरा किया जा सकता है और एक बार शौचालय बन गए तो उन्हीं के जरिए बैंक के कर्ज को भी दिया जा सकता है। सुलभ यह काम करने को तैयार है। हम रेलवे से आग्रह करेंगे कि वह सुलभ की गारंटी बैंकों को दे तो यह काम आसानी से पूरा किया जा सकता है। हम प्लेटफॉर्म की सफाई के लिए लोगों से सुझाव मांगेंगे, ताकि जन भागीदारी के तहत इस कार्य को सफल बनाया जाए। इसके लिए पूरे साल हम साफ-सफाई करने के अभियान के साथ-साथ सेमिनार और नुक्कड़ नाटकों के जरिए लोगों में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास करेंगे। हमारे देश भर में अभियान से अनेक स्वंय सेवक जुड़े हैं इन सभी के सेवाभाव और सहयोग से आज हम शौचालय और सफाई की इस मुकाम तक पहुंचे हैं, हमें इसका दायरा और बढ़ाना है।</p>
<p>हम सिर्फ स्वच्छता की संस्कृति को ही बढ़ावा देने के लिए काम नहीं कर रहे, बल्कि हमने समाज में निचले स्तर पर मैला ढोने वाले लोगों के पुनर्वास से भी जुड़े है। इसके साथ ही हमारे पास दुनिया का एकमात्र टॉयलेट म्यूजियम है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता के प्रति जन जागरूकता अभियान की शुरूआत की है। यदि हम सभी देशवासी अपने आसपास एवं सार्वजनिक स्थलों, पार्कों,दर्शनीय स्थलों, रेलवे स्टेशनों पर स्वच्छता रखेंगे, तो निश्चय ही भारतवर्ष स्वच्छता का लक्ष्य पा सकेगा। रेल हमारे समाज की जीवन-रेखा है। स्टेशन और शौचालयों की स्वच्छता यात्रियों को सुखद एहसास प्रदान करती है और गंतव्य तक पहुंचना राहत से भरपूर होता है। आइए इस महत्वपूर्ण कार्य में हम सब अपना योगदान करें।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/health/sole-moto-of-my-work-change-cleaniness-culture">मेरे काम का एक ही मकसद रहा है: “स्वच्छता की संस्कृति को बदलना”​ &#8211; डॉ बिन्देश्वर पाठक ​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/health/sole-moto-of-my-work-change-cleaniness-culture/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सुलभ द्वारा &#8220;विधवा&#8221; ​विनीता का विवाह ​राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर के विचारों का पुनःस्थापना है।</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/remarriage-of-uttarakhand-widow-by-sulabh</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/remarriage-of-uttarakhand-widow-by-sulabh#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 May 2018 10:21:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[ishwarchand vidyasagar]]></category>
		<category><![CDATA[raja rammohum roy]]></category>
		<category><![CDATA[remarriage]]></category>
		<category><![CDATA[shivnath jha]]></category>
		<category><![CDATA[society]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<category><![CDATA[tradition]]></category>
		<category><![CDATA[widow marriage]]></category>
		<category><![CDATA[widows]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=606</guid>

					<description><![CDATA[<p>गुप्तकाशी (उत्तराखण्ड) आपदा की पीड़िता विनीता महज एक विधवा नहीं थी बल्कि राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर ​का एक &#8220;विषय&#8221; भी थी, जिसका बीजारोपण राममोहन रॉय और विद्यासागर कोई दो से अधिक शताब्दी पूर्व समाज, विशेषकर महिलाओं के उत्थान के लिए किया था &#8211; महिलाओं का सर्वांगीण विकास और विधवा विवाह की शुरुआत। आज [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/remarriage-of-uttarakhand-widow-by-sulabh">सुलभ द्वारा &#8220;विधवा&#8221; ​विनीता का विवाह ​राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर के विचारों का पुनःस्थापना है।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>गुप्तकाशी (उत्तराखण्ड) आपदा की पीड़िता विनीता महज एक विधवा नहीं थी बल्कि राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर ​का एक &#8220;विषय&#8221; भी थी, जिसका बीजारोपण राममोहन रॉय और विद्यासागर कोई दो से अधिक शताब्दी पूर्व समाज, विशेषकर महिलाओं के उत्थान के लिए किया था &#8211; महिलाओं का सर्वांगीण विकास और विधवा विवाह की शुरुआत। आज राजाराम मोहन रॉय का २४६ वां जन्मदिन है। ​</p>
<p>​दुष्यन्त कुमार ने कहा था : &#8220;कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता &#8211; एक पथ्थर तो तबियत से उछालो यारो।&#8221; चौदह शब्द और जीवन की पूरी दास्तान। लेकिन उनके लिए जिन्हे अपनी परिश्रम, सोच और विस्वास पर नाज़ है और जो समाज में आमूल परिवर्तन लाना चाहते हैं।</p>
<p>शायद आज की पीढ़ी महान दार्शनिक और समाजसेवी राजा राममोहन रॉय और ​ईश्वरचन्द विद्यासागर को नहीं जानता हो या उनके नामों से परिचित नहीं हो, लेकिन इतिहास साक्षी है कि आज से कोई १६२ साल पूर्व, इधर जब मेरठ में मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के  खिलाफ बिगुल बजाया था; उधर भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक महान परिवर्तन के लिए ईश्वरचन्द विद्यासागर भारत में एक उच्च जाति की विधवा महिला की दोबारा विवाह कराया था। वर्ष था १८५६ और तारीख ७ दिसंबर।</p>
<p>​इससे पहले भारतीय समाज में उच्च जातियों में विधवा को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी।  </p>
<p>​पश्चिम मिदनीपुर के बिरसिंघा गांव में 26 सितंबर 1820 जन्म लिए ईश्वरचंद विद्यासागर के प्रयासों से 26 जुलाई 1856 को विधवा विवाह को कोलकाता (तब कलकत्ता) के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने मंजूरी दी थी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर में पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ ​था । </p>
<p>कहा जाता है कि १८५३ में हुए एक सर्वे के ​अनुमान कलकत्ता में लगभग १२ हज़ार से भी अधिक ​वेश्याएं रहती थीं। ईश्वरचन्द विद्यासागर उनकी इस हालत को परिमार्जित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। अक्षय कुमार दत्ता के सहयोग से ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिन्दू  समाज में स्थान दिलवाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके प्रयासों द्वारा १८५६ में अंग्रेजीसरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर इस अमानवीय मनुष्य प्रवृत्तिपर लगाम लगाने की कोशिश की। </p>
<p>विद्यासागर नारी शिक्षा के समर्थक थे और उनके प्रयास से ही कलकत्ता में लड़कियों के लिए कई जगह स्कूलों की स्थापना ​हुयी थी ​। उन्हें सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता ​है। इतिहास साक्षी है कि 1856-60 के बीच इन्होंने 25 विधवाओं का पुनर्विवाह ​कराये थे। </p>
<p>उस समय हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ही शोचनीय थी। विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित तो हुआ था ​लेकिन समाज में इसे लागू कराना आसान नहीं ​था। तब विद्यासागर ने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से करवाया ​था। </p>
<p>इतने वर्षों में इतनी सामाजिक क्रांति के बाद आज भी समाज में विधवाओं को वो दर्जा नहीं मिलता, जिनकी वे हकदार ​हैं। आम औरतों के तरह वे समाज में चैन से नहीं रह ​पातीं। ​बहरहाल, राजाराम मोहन रॉय और ​ईश्वरचन्द विद्यासागर को प्रवर्तक मानने वाले आधुनिक भारत में विधवाओं के मशीहा और सुलभ संस्था के संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक भी इस क्रांति के प्रवल समर्थक हैं और अगर ऐसा नहीं होता हो केदारनाथ की आपदा में पति को खो चुकी 24 वर्षीय विनीता की जिन्दगी में नया उजाला ​नहीं आया होता। ​पिछले वर्ष विनीता एक नए जीवनसाथी के साथ एक बार फिर सात फेरे लेकर १६१ साल बाद भी ईश्वरचन्द विद्यासागर के प्रयास को पुनः जीवित की ।  </p>
<p>2013 में केदारनाथ त्रासदी में उत्तराखंड के भनीग्राम पंचायत में गुप्तकाशी के पास देवली नामक गांव के रहने वाले 32 नौजवान भी बाढ़ में बह गए थे। ये सभी आजीविका कमाने निकले थे। इनमें विनीता का पति महेशचंद्र भी था। विनीता की छह महीने पहले ही शादी हुई थी। रुद्रप्रयाग जिले के गांव तिलवाड़ा निवासी टैक्सी ड्राइवर राकेश की विनीता से मुलाकात हुई। इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया। राकेश ने बताया कि 26 अगस्त 2014 को उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली। अब दोनों के दो बच्चे भी हैं। </p>
<p>डॉ पाठक कहते हैं : इस युवक द्वारा लिया गया यह कदम आज के लोगों के लिए एक सन्देश भी है और प्रेरणा भी। आम तौर पर हमारे समाज में विधवाओं को एक तरह से अलग-थलग कर दिया जाता है। यहां तक कि उन्हें किसी शुभ समारोह में भी शामिल नहीं किया जाता। </p>
<p>​उनका जीवन दूभर हो जाता है। कभी-कभी तो उनके बच्चे बनारस-मथुरा-वृन्दावन की तंग गलियों में मरने के लिए भी छोड़ आते हैं। और अगर ऐसा नहीं होता तो आज बनारस-मथुरा-वृन्दावन में ऐसी विधवाएं नहीं होतीं। हम और हमारा संस्थान ऐसे हज़ारों विधवाओं का परवरिश कर रहे हैं।&#8221;</p>
<p>डॉ पाठक फिर कहते हैं : &#8220;विनीता का विवाह होना ईश्वरचन्द विद्यासागर और राजा राममोहन रॉय के प्रयासों को जीवित रखना है ताकि समय के साथ-साथ समाज की सोच में बदलाव आये। सम्पूर्ण वैदिक और सामाजिक रीती-रिवाजों के साथ विनीता का विवाह करवाना एक देशव्यापी अभियान है और ​हमें उम्मीद है यह अभियान समाज में एक क्रांति अवश्य लाएगा, ​इसे पूरे देश में जारी रखा जाएगा।​&#8221;​ </p>
<p>सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के दिशा में अपनी तरह से सुलभ ऐसे सकारात्मक कदम उठा रहा है। सदियों से अंधेरी जिंदगी गुजार रहीं विधवाओं की जिंदगी रोशन करने की कोशिश संस्था पिछले तीन साल से लगातार कर रही है। </p>
<p>​उस विवाह के ​मौके पर सुलभ संस्था द्वारा विधवाओं को गिफ्ट के तौर पर साड़ियां भी दी गईं। विधवाओं ने मंदिर में रंगों से रंगोली सजाई, साथ ही दीये भी जलाए। उत्सव में शामिल हुईं सभी वृद्ध विधवाओं के चेहरे से खुशी झलक रही थी।   </p>
<figure id="attachment_608" aria-describedby="caption-attachment-608" style="width: 850px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh.jpg" alt="विनीता और राकेश को आशीष देते लोग" width="850" height="540" class="size-full wp-image-608" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh.jpg 850w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-300x191.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-768x488.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-696x442.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/blessing-to-vinita-and-rakesh-661x420.jpg 661w" sizes="auto, (max-width: 850px) 100vw, 850px" /><figcaption id="caption-attachment-608" class="wp-caption-text">विनीता और राकेश को आशीष देते लोग</figcaption></figure>
<p>​विनीता की न केवल धूम-धाम से शादी कराई गई ​थी ​बल्कि उसमें 500 से भी अधिक विधवाओं ने भाग लिया और दांपत्य जीवन की सफलता के लिए दंपती को आशीर्वाद भी दिया। खास बात यह थी कि विवाह में सारी रस्में विधवा महिलांओं ने ही संपन्न कराई। इस आयोजन में मेहंदी, हल्दी तेल की रस्म के साथ गीतों का आयोजन भी विधवाओं द्वारा हुआ । मंदिर प्रांगण में सजे मंडप में विनीता ने अपने जीवन साथी के साथ सात फेरे लेकर अपना नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत की। </p>
<figure id="attachment_609" aria-describedby="caption-attachment-609" style="width: 850px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita.jpg" alt="मेंहन्दी लगवाती विनीता" width="850" height="540" class="size-full wp-image-609" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita.jpg 850w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-300x191.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-768x488.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-696x442.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/mehendi-ceremony-of-vinita-661x420.jpg 661w" sizes="auto, (max-width: 850px) 100vw, 850px" /><figcaption id="caption-attachment-609" class="wp-caption-text">मेंहन्दी लगवाती विनीता</figcaption></figure>
<p>​​​विधवाविवाह अधिनियम १८५६ ब्रिटिश भारत में ब्राह्मण, राजपूतों, बनिया और कायस्थ जैसे कुछ अन्यजातियों के बीच मुख्य रूप से विधवापन अभ्यास पर रोक लगाने हेतु पारित किया गया था| यह कानून बच्चे और विधवाओं के लिए एक राहत के रूप में तैयार किया गया था जिसके पति की समय से पहले मृत्यु हो गई हो|</p>
<p>विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 हिंदू जाति में जो पूर्व की विवाह परंपरा थी उसमें विवाह अधिनियम १८५६ के अधिनियम के द्वारा सभी अड़चने द्वेष आदि को इस अधिनियम के तहत समाप्त कर दिया गया और इसमें नवीन पद्धतियों को जन्म दिया गया उस समय भारत ब्रिटिश अधीन था इसलिए भारत को ब्रिटिश भारत कहा जाता था यह सुधार हिंदू विवाह के विधवाओं केलिए सबसे बड़ा सुधार था पुरातन समय में किसीऔरत के पति की मृत्यु हो जाने पर उसे उसकी चिता के साथ जलना होता था या सरमुंडवाना होता था आदि ऐसी जटिल प्रक्रियाएं थी लेकिन इस अधिनियम के तहत कुछ प्रमुख सुधार लाए गएमसलन यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती हैतो वह पुनर्विवाह कर सकती हैं।  </p>
<p>इस विवाह में उसके सगे संबंधी अर्थात माता पिता भाई दादा नाना नानी आदि संबंधियों के द्वाराबात करके दूसरे विवाह को मंजूरी दी जा सकती है यथा पुनर्विवाह करने वाली महिला अल्पवयस्क ​है। ​</p>
<p>जिस घर कि वह पहले बहु थी अर्थात उसके मृत्यु वाले पति का घर उस पर उसका कोई संपत्ति के तौर पर अधिकार नहीं होगा जहां वह पुनर्विवाह के बाद जाएगी वहां उसका अधिकार माना जाएगा</p>
<p>निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हिंदू जाति कि जो पुरातन समय के अनुसार जोविवाह की परंपरा थी वह कई रूप से आज की अपेक्षा बिखरी हुई थी जिससे कि उस मेंकई बंधित नियम थे जिसमें एक पति की मृत्यु होने के पश्चात उसकी पत्नी को उसकी चिता पर जिंदा जलना या बाल मुंडवा देना या दूसरी शादी ना करना आदि कई<br />
​ ​<br />
सारी परंपराएं सम्मिलित थी जिसके अनुसार १८५६ में ब्रिटिश इंडिया हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बनाया गया जिसमें कई सुधार लाए ​गए। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/remarriage-of-uttarakhand-widow-by-sulabh">सुलभ द्वारा &#8220;विधवा&#8221; ​विनीता का विवाह ​राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर के विचारों का पुनःस्थापना है।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/remarriage-of-uttarakhand-widow-by-sulabh/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कलयुग में भी &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; आते है, विस्वास नहीं है तो मथुरा-वृन्दावन में &#8216;अन्तिम साँस</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/even-in-kalyug-chaitanya-mahaprabhu-comes</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/even-in-kalyug-chaitanya-mahaprabhu-comes#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 May 2018 11:15:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[malnutrition]]></category>
		<category><![CDATA[mass movement]]></category>
		<category><![CDATA[rehabilitation]]></category>
		<category><![CDATA[shivnath]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<category><![CDATA[widows]]></category>
		<category><![CDATA[yamuna]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=599</guid>

					<description><![CDATA[<p>आप ही नहीं, कोई भी विस्वास नहीं करेगा की कलयुग में भी ईश्वर अथवा ईश्वर-तुल्य मनुष्य जन्म लेता है &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; जैसा​ मथुरा-वृन्दावन में​। परन्तु जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/even-in-kalyug-chaitanya-mahaprabhu-comes">कलयुग में भी &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; आते है, विस्वास नहीं है तो मथुरा-वृन्दावन में &#8216;अन्तिम साँस</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>आप ही नहीं, कोई भी विस्वास नहीं करेगा की कलयुग में भी ईश्वर अथवा ईश्वर-तुल्य मनुष्य जन्म लेता है &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; जैसा​ मथुरा-वृन्दावन में​। परन्तु जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक साँस को जोड़ते-छोड़ते जी रही हैं, उन विधवाओं से मिलकर पूछेंगे की आखिर जीवन के अन्तिम बसन्त को वे क्यों देखना चाहती हैं? क्यों अब जीना चाहती हैं ? क्यों जीने की अभिलाषा मरने के समय बढ़ती जा रही है? क्यों उनसे मिलने के लिए मन बेचैन रहता हैं? आपको उत्तर मिल जायेगा &#8211; क्योंकि ​उनका &#8220;अभागा&#8221; सन्तान अपनी &#8220;विधवा माता&#8221; को​ ​मथुरा-वृन्दावन की तंग गलियों में, सड़कों पर मरने के लिए छोड़ ​दिया है और अब उनकी रक्षा &#8221;कलयुग के चैतन्य&#8221; कर रहे हैं, जो उनके लिए &#8220;महाप्रभु&#8221; हैं। </p>
<p>​भले भारत के लोगों के ह्रदय में, खासकर उन सन्तानों के ह्रदय में जीवन के अन्तिम बसंत में सांस- जोड़ती, सांस-तोड़ती माताओं के लिए कोई स्पन्दन नहीं हो, और अगर होता तो चैतन्य महाप्रभु के युग से आजतक मथुरा-वृन्दावन में विधवाएं नहीं आतीं रहतीं, पटकी नहीं जाती सड़कों-गलियों में भीख मांगने के लिए। लेकिन इसी देश का एक सन्तान उन विधवा माताओं को जीवन के अंतिम दिनों में वह सभी सुख दे रहा हैं जो दसकों बाद उन्हें जीने की लालच बढ़ा रही है। कलयुग के चैतन्य महाप्रभु है सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनिजेशन के संस्थापक पद्मश्री-पद्मभूषण उपाधि से अलंकृत डॉ बिन्देशवर पाठक। </p>
<p>भारत में विद्वानों की कमी नहीं है। धनाढ्यों की किल्लत नहीं है। नेताओं का अपार भण्डार है। समाजसेवियों का कारखाना है &#8211; लेकिन जिनके ह्रदय में मानवता और मानवीयता हो, ऐसे महापुरुषों का भारत-राष्ट्र में घोर अकाल है। और अगर ऐसा नहीं होता तो १२५ करोड़ की आवादी देश में भारत का सर्वोच्च न्यायालय डॉ पाठक और उनके ​संस्थान &#8220;सुलभ&#8221; के सामने यह प्रस्ताव क्यों लाती &#8211; क्या आप उन विधवाओं को दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त ​उनकी मृत्यु तक कर सकते हैं? क्या आप बीमारी की  उन्हें दबाइयाँ दे सकते हैं ? क्या आप उनकी मृत्यु के पश्चयात सम्पूर्ण विधि-विधान से उनका दाह &#8211; संस्कार कर सकते हैं ? ​बहुत ही विचित्र, परन्तु सत्य बात है। </p>
<p>कहा जाता है कि विधवाओं की बुरी हालत को देखकर कृष्ण भक्त मध्यकालीन कवि चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को जीवन के आखिरी पल वृंदावन में कृष्ण भक्ति करते हुए गुजारने की परम्परा डाली और विधवाओं को लेकर वृंदावन आ गए। तब मकसद यह था कि अपने परिवारों की उपेक्षा झेल रही विधवाओं को मन्दिर और आश्रम आसरा देंगे और उनकी जिन्दगी गुजर जाएगी। लेकिन कालांतर में हालात सामान्य नहीं रहे। परिवारों ने अपनी ही अजीज रही विधवाओं को खुद पर बोझ मानना शुरू किया और वृंदावन लाकर उन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ने लगे। कुछ साल पहले तक वृंदावन में विधवाएँ सड़कों पर भीख माँगते दिख जाती थीं।  </p>
<p><iframe loading="lazy" width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/eHaYcR5t4ug" frameborder="0" allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen></iframe></p>
<p>इतना ही नहीं &#8220;अमानवीयता का पराकाष्ठा इस बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी के कारण जब उनकी मौत हो ​जाती थी तो उन्हें सामान्य और सहज अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं होता था। उनके शव को टुकड़ों में काटकर बोरी में बाँधकर यमुना में ​फेंक दिया जाता था। </p>
<p>इस बात की खबर एक स्वयंसेवी संगठन को पता चली तो उसने सुप्रीम कोर्ट में विधवाओं की हालत सुधारने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त जब विधवाओं की बदहाली की जानकारी हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश महिला आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा जिला प्रशासन और सम्बन्धित विभागों को जबर्दस्त लताड़ लगाई थी। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यूयू ललित की सामाजिक पीठ ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या विधवाओं को राहत दिलाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल से बात की जा सकती है। </p>
<p>जब इस पर सहमति बनी तो डॉक्टर पाठक के पास वृंदावन की विधवाओं की मदद के लिए अगस्त 2012 में चिट्ठी आई। तब डॉक्टर पाठक को द्वारका में प्रसाद मिली कृष्ण की बाँसुरी की याद आई और उन्होंने अपने सुलभ होप फाउण्डेशन के जरिए वृंदावन की विधवाओं को पहले एक हजार रुपए महीना और बाद में दो हजार रुपए महीने की सहायता देनी शुरू की। इससे वृंदावन की विधवाओं की हालत सुधर गई है। अब उन्हें भोजन के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वृंदावन में उदासीन बाबा का आश्रम अब सुबह-शाम सुलभ की सहायता से चलने वाले भजन कार्यक्रमों से गूंजता रहता है। इतना ही नहीं इनमें जो जवान और काम करने लायक हालत में विधवाएँ हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सिलाई-कढ़ाई जैसे कामों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा अशिक्षित विधवाओं को पढ़ाने का काम भी किया जा रहा है।</p>
<figure id="attachment_602" aria-describedby="caption-attachment-602" style="width: 624px" class="wp-caption alignright"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1.jpg" alt="डॉ बिन्देश्वर पाठक और उनकी पत्नी श्रीमती अमोला पाठक जो पिछले ५४ सालों से उनके मानवीय प्रयास में साथ दे रहीं हैं ​" width="624" height="868" class="size-full wp-image-602" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1.jpg 624w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1-216x300.jpg 216w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1-302x420.jpg 302w" sizes="auto, (max-width: 624px) 100vw, 624px" /><figcaption id="caption-attachment-602" class="wp-caption-text">डॉ बिन्देश्वर पाठक और उनकी पत्नी श्रीमती अमोला पाठक जो पिछले ५४ सालों से उनके मानवीय प्रयास में साथ दे रहीं हैं ​</figcaption></figure>
<p>वृंदावन की तरह काशी भी विधवाओं के लिए मशहूर रहा है। हालाँकि यहाँ विधवाओं की संख्या वृंदावन की तुलना में कम है। काशी के बारे में एक कहावत भी मशहूर है- रांड़, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी / इनते बचैं तो सेवैं काशी… लेकिन यह भी सच है कि यहाँ की विधवाओं की हालत वृंदावन की विधवाओं जितनी खराब नहीं है और ना ही वृंदावन जितनी विधवाएँ यहाँ हैं भी। फिर भी सुलभ होप फाउण्डेशन वाराणसी की भी विधवाओं को मासिक सहायता देता है।</p>
<p>विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं।​ कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर,<br />
 शहर के हर कोने और चौक ​पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई ​देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।&#8217;</p>
<p>सुलभ ने वृंदावन के मंदिरों में सुबह भजन गाकर जीविका कमाने वाली विधवा स्त्रियों को सम्मान दिलाने और कई कदम ​उठाये हैं। ​देश में स्वच्छता अभियान चलाने वाली प्रमुख गैर सरकारी संस्था सुलभ ने वृंदावन की विधवाओं की मूलभूत जरूरतों भोजन से लेकर स्वास्थ्य का ध्यान रखने ​लगा है। ​उनके ​रहने खाने की व्यवस्था मुफ़ ​है। विधवाओ को सिलाई बुनाई इत्यादि ​का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। ​<br />
​<br />
इसके आलावा अगरबती बनाना, कपडे सिलना, फूल के माला बनाना​,​ मोमबती ​बनाना। इससे जो आमदनी ​होती है वह उनके सर्वांगीण विकास पर खर्च की जाती है ताकि उन चेहरे पर प्रसन्नता रहे। </p>
<p>गौरालब है की ​कुछ वर्ष पहले तक वृंदावन में बड़ी संख्या में विधवा स्त्रियां सफेद साड़ी में मंदिरों में भटकते हुए और भीख मांगते देखी जाती थीं। भगवान कृष्ण की नगरी कहे जाने वाले शहर में निर्धन और कुपोषण की शिकार इन विधवाओं में से कई इतनी कमजोर थीं कि सिर्फ हड्डियों और मांस का ढांचा मात्र रह गई थीं।​ ​</p>
<p>​संडेपोस्ट से बातचीत करते डॉ पाठक कहते हैं: &#8220;​यह सुलभ आंदोलन के लिए सौभाग्य की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधवाओं की दुर्दशा पर सुनवाई के वक्त सुलभ को महत्व दिया। सरकार से सुलभ से पूछकर बताने को कहा गया कि हम बदहाल विधवाओं को खिलाने का इंतजाम कर सकती है या नहीं। न्यायमूर्ति के जेहन से इस नेक काम के लिए सुलभ का जिक्र होना हमारे लिए गौरव की बात है। हम मैला ढोने वाली महिलाओं को समाजिक हक दिलाने के लिए पहले से सक्रिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने समाज की परित्यक्ता बनकर जीने के विवश वृंदावन औऱ वाराणसी की विधवाओं की मदद के लिए हमें उतार दिया। यहां की आश्रमों में रहने वाली विधवाओं के लिए खाने- पीने, पहनने ओढने की समस्या के साथ अंतिम संस्कार तक में समुचित सम्मान नहीं मिलने की मुसीबत थी। सर्वोच्च न्यायालय में मरने के बाद इन विधवाओं के शरीर को बोटी बोटी कर यमुना में फेंके जाने के मामले की सुनवाई के लिए पहुंचा था। सुलभ के प्रयास से आज यहां के आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को दो हजार रुपए प्रतिमाह का अनुदान दिया जा रहा है। हालत में बदलाव के लिए हिंदी, अंग्रेजी और बांगला में शिक्षा का इंतजाम किया गया है। पुनर्वास के अन्य जरूरी सुविधाओं का ख्याल रखा जा रहा है।​&#8221;​</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/even-in-kalyug-chaitanya-mahaprabhu-comes">कलयुग में भी &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; आते है, विस्वास नहीं है तो मथुरा-वृन्दावन में &#8216;अन्तिम साँस</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/even-in-kalyug-chaitanya-mahaprabhu-comes/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अगर &#8220;सुलभ&#8221; नहीं होता तो आज भी &#8216;समाज का एक विशाल समुदाय&#8217; अपने माथों पर देश के सम्भ्रान्तो का मल-मूत्र ढोता रहता</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/health/easy-toilets-of-india</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/health/easy-toilets-of-india#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 May 2018 08:35:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[स्वास्थ]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
		<category><![CDATA[Campaign]]></category>
		<category><![CDATA[Clean]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[Ministry]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[Sanitation]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.sundaypost.in/?p=596</guid>

					<description><![CDATA[<p>आज भारत सरकार और देश की विभिन्न राज्य सरकारें &#8220;स्वच्छ भारत अभियान&#8221; के नाम का &#8220;ताल&#8221; चाहे जितना &#8220;ठोक&#8221; ले, इस अभियान के नाम पर चाहे जितना &#8220;कबड्डी खेल&#8221; ले, अभियान की सफलता का चाहे जितना &#8220;चौका&#8221; &#8220;छक्का&#8221; फेंके; सच तो यही है कि आज से पचास साल पूर्व अगर &#8220;सुलभ शौचालय&#8221; दसकों से चली [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/health/easy-toilets-of-india">अगर &#8220;सुलभ&#8221; नहीं होता तो आज भी &#8216;समाज का एक विशाल समुदाय&#8217; अपने माथों पर देश के सम्भ्रान्तो का मल-मूत्र ढोता रहता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>आज भारत सरकार और देश की विभिन्न राज्य सरकारें &#8220;स्वच्छ भारत अभियान&#8221; के नाम का &#8220;ताल&#8221; चाहे जितना &#8220;ठोक&#8221; ले, इस अभियान के नाम पर चाहे जितना &#8220;कबड्डी खेल&#8221; ले, अभियान की सफलता का चाहे जितना &#8220;चौका&#8221; &#8220;छक्का&#8221; फेंके; सच तो यही है कि आज से पचास साल पूर्व अगर &#8220;सुलभ शौचालय&#8221; दसकों से चली आ रही एक घृणित और अमानवीय कार्य के प्रति देशव्यापी आन्दोलन नहीं चलाया होता, अपनी सोच को जमीन पर क्रियान्वित नहीं किया होता, तो आज भी समाज का एक विशाल समुदाय, एक विशाल मतदादातों का समूह, जो राजनीतिक बाज़ार में सरकार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह, उसकी पत्नियाँ, उसके बेटे-बेटियाँ, बहुएँ अपने-अपने सर पर भारतीय सम्भ्रान्तों का &#8220;मल-मूत्र-टट्टी-पैखाना उठाते रहता&#8221; और दरवाजे से दूर रात की बची रोटियाँ लोगबाग फेंककर उसे देते रहते। पढ़ने-पढ़ाने शिक्षित होने, रोजगार-नौकरी पाने की बात तो वह अपने सपने में भी नहीं सोच सकता था &#8211; न जीवित और न ही मरणोपरान्त।  </p>
<p>यदि देखा जाय तो ​आज गाँधी के विचार और उनके सपने राजनीतिक बाजार में बिक रहे हैं, खुलेआम। जबकि सच तो यह है कि कोई भी शाशन, व्यवस्था या सरकार कभी भी भंगी-समाज का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक उत्थान चाहती ही नहीं थी। और अगर ऐसा नहीं था तो आज़ादी के बाद भी सरकार इस विशाल समुदाय को विकास की मुख्यधारा में क्यों जोड़ी &#8211; पूर्णतः। </p>
<p><iframe loading="lazy" width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/A8SfTWVE5zw" frameborder="0" allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen></iframe></p>
<p>वैसे सरकार और व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान के मद्दे नजर अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है। लेकिन धरातल पर ये सभी कुप्रथाएं आज भी समाज में विद्यमान है। इतना ही नहीं, मानव मल-मूत्र की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में सरकारी और सामाजिक उदासीनता के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाया कोई पचास के दसक और उसके बाद भी जब तक &#8221;सुलभ&#8221; ने सामाजिक आंदोलन नहीं चलाया, शौचालय की उपयोगिता को नहीं बताया, इन भंगी-परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया ।  </p>
<p>कल तक जो लोग, विशेषकर समाज  व्यवस्था के संभ्रांत लोग, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कॉर्पोरेट, मंत्री, अधिकारी और न जाने कौन-कौन, अपने &#8220;खाने के मेज पर शौच की बात करना मानवीयता और मनुष्यता के खिलाफ समझते थे; आज शहरों और महानगरों, यहाँ तक की कारपोरेट घरानों, सरकारी कार्यालयों में &#8220;भोजनावकाश&#8221; के समय &#8220;भोजन करते लोग मल-मूत्र के बारे में बात करते हैं, शौचालय की बात करते हैं। और इसका मुख्य कारण है कि सुलभ ने अपने पांच-दसक के प्रयास से न केवल गाँधी का सपना साकार किया जमीन पर, बल्कि &#8220;भारत से मैला ढोने की कुप्रथा को भी समाप्त किया।&#8221;</p>
<p>अब तो जो हो रहा है विभिन्न अभियानों के तहत, वह तो महज &#8220;शौचालयों का राजनीतिकरण&#8221; है और अगर ऐसा नहीं है तो १२० करोड़ की आवादी वाले देश में, ऐसा अनुमान है कि प्रत्येक १४०० व्यक्तियों पर एक शौचालय है। वैसे केंद्र सरकार के लोग बाग़ यह कहते नहीं थक रहे हैं कि आगामी २०१९ तक प्रत्येक घरों में शौचालय हो जायेगा। इसके लिए तो ब्रह्माण्ड से विश्वकर्मा को ही धरती पर अवतरित होना होगा। </p>
<p>बहरहाल, डॉ पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से मानव-मल-मूत्र उठाने  की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया । उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाईजेशन बन गया। </p>
<p>जब संडेपोस्ट उनसे पूछा: &#8220;अगर सुलभ, जिसने स्वच्छता अभियान की नीव ५० वर्ष पहले डाली थी, नहीं होता तो &#8220;भारत में स्वच्छता का हश्र क्या होता?&#8221; इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा: &#8220;इस बात का उत्तर मैं नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा की अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।&#8221; </p>
<p>कुछ समाज शास्त्रियों का मानना है कि ‘खुले में शौच की प्रथा को खत्म करने का पहला सर्वाधिक प्रभावकारी तरीका है सुलभ शौचालय का निर्माण जिसका आधार है दो गड्ढों वाला (टू पीट फोर फ्लश) शौचालय, जिसमें मौके पर ही बिना हाथ लगाए सफाई हो जाती है। यह किफायती है, सांस्कृतिक दृष्टि से स्वीकार्य और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और जलवायु संबंधित स्थितियों के लिए उपयुक्त है। मैले की मौके पर सफाई एक नई अवधारणा है जिसे यदि वैश्विक स्तर पर स्वीकार कर लिया जाए तो वह बहुत बड़े पैमाने पर हमारी नदियों को प्रदूषण मुक्त और शहरों को साफ-सुथरा रखेगी। </p>
<p>उनका कहना है कि अभी तक तो हमारे पास सीवेज अपजल निस्तारण विधि रही है, जो कि मंहगी है, प्रदूषण पैदा करती है और जिसके लिए स्कैवेंजर की जरुरत होती है। सुलभ की दो गड्ढे वाली शौचालय प्रणाली इन सभी समस्याओं का निदान है और यही कारण है कि सुलभ की इस तकनीक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। उसे निजी घरों और सार्वजनिक शौचालय परिसरों में लगाया गया है।</p>
<p>अकेले कानून हाथों से की जाने वाली स्कैवेंजिंग को खत्म नहीं कर सकता । राज्य-सरकारों तथा केंद्र-सरकार ने कानून बनाए हैं- स्कैवेंजरों के पुनर्वास के लिए निधि की व्यवस्था भी की है, लेकिन यह उस स्तर तक कारगर साबित नहीं हुआ है, जितना कि होना चाहिए। सरकार ने हाथ से सफाई करने वाले स्कैवेंजरों के लिए १०० करोड़ रुपए की व्यवस्था की थी, लेकिन किसी भी राज्य से धन नहीं लिया क्योंकि यह जानते ही नहीं थे कि हाथों से सफाई करने वाले स्कैवेंजरों को किस तरह पुनर्वासित किया जाए।</p>
<p>इसलिए जब हम शौचालय की बात करते हैं, तब हम समूची सभ्यता की बात करते हैं- अर्थव्यवस्था सामाजिक मूल्य, विचारधारा, धार्मिक विश्वास, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएं। सामाजिक परिवर्तन घटित होने में समय लगता है, क्योंकि वह सामाजिक विकास, आर्थिक विकास, शिक्षा और सामाजिक मूल्य से जुड़ा होता है। अब हमें वह प्रक्रिया शुरू करनी है। वह हमने कर ली है। हमने सामाजिक परिवर्तन की राह में लंबी दूरी तय की है, उसके लिए एक संपूर्ण स्वच्छता व्यवस्था गठित करके। (क्रमशः)</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/health/easy-toilets-of-india">अगर &#8220;सुलभ&#8221; नहीं होता तो आज भी &#8216;समाज का एक विशाल समुदाय&#8217; अपने माथों पर देश के सम्भ्रान्तो का मल-मूत्र ढोता रहता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/health/easy-toilets-of-india/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
