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	<title>social Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Jul 2025 04:11:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year">भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पालम गाँव (दिल्ली) : अगर श्रीमती अनीता विवाहोपरान्त अपनी ससुराल से भाग नहीं गयी होती तो शायद अक्षय कुमार “टॉयलेट: एक प्रेम कथा” सिनेमा नहीं बनाते। अनीता अपने ससुराल से इसलिए नहीं भागी की वह मशहूर होना चाहती थी, किन्तु इसलिए भागी की उसके ससुराल में शौचालय नहीं था और शौचालय उसकी आवश्यकता थी। लेकिन आज़ादी के 64-साल बाद भी समाज के लोग &#8216;शौचालय के महत्व&#8217; को समझ नहीं पा रहे थे। उसके मायके के घर में सदा ही शौचालय रहा, जिसे वह सात भाई-बहनों के साथ प्रयोग करती रही। उसके पिता श्री अम्मूलाल कुमरे, जो प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे, द्वारा उसे स्वतंत्रता एवं स्वच्छता के विषय में सदा ही जानकारी दी जाती रही थी । वैसे, भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में विश्व शौचालय दिवस की मेजबानी करने जा रहा है।  </strong></p>
<p>वैसे भारत में शौचालय की क्रांति सत्तर के दशक में बिहार के आरा शहर से समाजशास्त्री डॉ. बिंदेश्वर पाठक द्वारा शुरू की जा चुकी थी, लेकिन 2011 में श्रीमती अनीता की वह पहल एक अलग क्रांति को जन्म दिया। जो बाद में उसके जीवन पर आधारित फिल्म &#8211; टॉयलेट: एक प्रेम कथा &#8211; हर दिन पेज 3 पर छाने लगी। एक ऐसे घर में ब्याह कर आने के बाद – जहाँ पर शौचालय की उपलब्धता न हो – भी पिता-द्वारा दी गई शिक्षा को भुला नहीं पाई। अनीता का ससुराल से भागना एक राष्ट्रीय खबर बनी और सिद्धार्थ-गरिमा ने टॉयलेट एक प्रेम कथा कहानी लिख डाले। श्री नारायण सिंह ने इस फिल्म का निर्देशन किया। अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर और सना खान अभिनेता-अभिनेत्री और अन्य कलाकार बने। </p>
<p>मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के जितुराना गाँव की कला स्नातक अनीता नर्रे को इस साहसिक कार्य के लिए सभी ने सराहा और भारत में पहली बार ऐसी माँग करने के लिए पुरस्कृत भी किया गया, जहाँ खुले में शौच करना एक आम बात है। उनके पति शिवराम नर्रे के पास अपनी दुल्हन को वापस लाने के लिए शौचालय बनवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। अपनी पत्नी की मांग पूरी करने में उन्हें 10 दिन लग गए। </p>
<p>विज्ञान स्नातक तृतीय वर्ष का छात्र शिवराम, गुज़ारा चलाने के लिए दिहाड़ी मज़दूरी करता है। शिवराम ने कहा, &#8220;मैं अक्सर दिहाड़ी मज़दूरी के छोटे-मोटे काम करता हूँ। मुझे हर दिन के काम के लिए 100 रुपये मिलते हैं।&#8221; अनीता, जो स्नातक हो चुकी थी, भी नौकरी की तलाश में थी ताकि वे अपनी दो बेटियों को एक स्थिर जीवन दे सकें। अनीता बीए की पढ़ाई कर रही थीं जब उनके पिता ने उनकी शादी भीमपुर तहसील के शिवराम नर्रे से करने का फैसला किया। हर आज्ञाकारी बेटी की तरह, वह शिवराम से शादी करने के लिए राज़ी हो गईं, भले ही वह एक बीपीएल परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक खेतिहर मज़दूर थे और उनसे कम पढ़े-लिखे थे। </p>
<p><strong>11 अगस्त 2017 को यह फिल्म सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने पहले दिन भारत में 13.10 करोड़ कमाया । यह फिल्म अक्षय कुमार की 9 वीं सबसे बड़ी फिल्म बनी और अक्षय कुमार की उच्चतम कमाई वाली फिल्म के रूप में उभरा । अनीता, एक आदिवासी लड़की, ने अपने कार्य से शान्त जल में एक छोटा कंकड़ फेंका है, जिसने एक लहर का रूप ले लिया है। अनीता के इस उदाहरण में ‘जान ऑफ़ आर्क’ का किरदार अदा किया गया, जिसने 15वीं सदी में फ्रांस के चार्ल्स-8 से ईश्वरीय आदेश प्राप्त किया था। </strong></p>
<figure id="attachment_6969" aria-describedby="caption-attachment-6969" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg" alt="" width="2033" height="1141" class="size-full wp-image-6969" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BBB-1536x862.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6969" class="wp-caption-text">अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल ​सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित ​करते</figcaption></figure>
<p>अनीता के उस अदम्य साहस के लिए, समाज में जागरूकता लाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक उसे सम्मानित भी किये और आर्थिक मदद स्वरुप 7 लाख रुपये भी दिए। इतना ही नहीं, भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया। जिला प्रशासन ने उनके ससुराल में एक पक्का शौचालय बनवाया।</p>
<p>बहरहाल, आगामी 19 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त वर्ल्ड टॉयलेट डे के 25 वें संस्करण का आयोजन इस वर्ष भारत की राजधानी नई दिल्ली में होगा। इसकी मेजबानी सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा की जाएगी। यह ऐतिहासिक निर्णय सुलभ के प्रेसिडेंट कुमार दिलीप और वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक जैक सिम के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया। यह ऐतिहासिक समिट 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की समयसीमा से ठीक 5 वर्ष पूर्व आयोजित हो रही है और यह एक प्रमुख मंच प्रदान करेगी:</p>
<p><strong>• एसडीजी 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) में हुई प्रगति की समीक्षा<br />
• नवाचारों और सफलता की कहानियों को साझा करने का अवसर<br />
• शहरी स्वच्छता की चुनौतियों से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा</strong></p>
<blockquote><p>इस सम्मेलन का एक मुख्य केंद्र बिंदु होगा भारत का स्वच्छ भारत अभियान, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाया गया और जिसके अंतर्गत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ — यह सामुदायिक भागीदारी से संचालित एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। समिट का उद्देश्य यह भी होगा कि ग्लोबल साउथ के देश किस प्रकार स्थानीय, विश्वसनीय और समुदाय-आधारित समाधानों के माध्यम से मानव कल्याण से जुड़ी चुनौतियों, विशेषकर स्वच्छता जैसे विषयों से प्रभावी ढंग से निपट सकते हैं।</p></blockquote>
<p>विश्व शौचालय संगठन की शुरुआत 2001 में 15 सदस्यों के साथ हुई थी। आज इसकी संख्या 53 देशों से बढ़कर 151+ हो गई है। संगठन के सभी सदस्य शौचालय की समस्या को खत्म करने और दुनिया भर में स्वच्छता के समाधान के लिए काम करते हैं। यह संगठन सिंगापुर में 19 नवंबर 2001 को जैक सिम द्वारा स्थापित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, अकादमियों, शौचालय संघों, शौचालय हितधारकों और सरकार के लिए एक सेवा मंच और एक वैश्विक नेटवर्क के रूप में कार्य करता है। एक अनुमान के मुताबिक अब तक लगभग 2.4 अरब से अधिक लोगों की पहुँच स्वच्छता की सुविधा तक ना होने के कारण खुले में शौच करते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।</p>
<figure id="attachment_6970" aria-describedby="caption-attachment-6970" style="width: 2033px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg" alt="" width="2033" height="1141" class="size-full wp-image-6970" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC.jpg 2033w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/CCC-1536x862.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2033px) 100vw, 2033px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6970" class="wp-caption-text">राष्ट्रपति भवन की भव्यता और राष्ट्र के दिग्गजों के बीच, अमोला पाठक द्वारा अपने दिवंगत पति डॉ. बिंदेश्वर पाठक की ओर से पद्म विभूषण ग्रहण करने पर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ उनकी गरिमामय उपस्थिति इस अवसर की गंभीरता को प्रतिध्वनित करती है।</figcaption></figure>
<p>एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में शौचालयों के लिए सबसे लंबी कतारें हैं। अगर देश के सभी लोग, जो शौचालयों के बाहर इंतजार में खड़े हैं, एक लाइन में खड़े हो जाए तो इस कतार को खत्म होने में 5892 वर्ष लगेगी और यह चन्द्रमा से धरती तक लंबी लाइन बन जाएगी। हमारे देश में भी अधिकतम संख्या में लोग खुले तौर पर शौच करते हैं। हाल के जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 1.2 बिलियन लोगों सहित देश के लगभग आधा हिस्से के पास घर में शौचालय सुविधा नहीं है लेकिन इन सभी लोगों के पास मोबाइल फोन है। हालांकि इस दिशा में बहुत कुछ किया गया है परन्तु विशेषकर महिलाएं शौचालयों तक पहुंच की कमी के कारण बहुत सी समस्याओं का सामना कर रही हैं। </p>
<p><strong>विगत कई वर्षों में भारत में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन इस मुद्दे पर जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किया है। 2014 में दुनिया में पहली बार दिल्ली में 18 से 20 नवंबर तक अंतरराष्ट्रीय टॉयलेट महोत्सव के रूप में एक लंबा और अद्वितीय तीन दिन का जश्न मनाया गया था। शौचालय के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने के लिए त्योहार आयोजित किया गया था। उद्घाटन समारोह में छह देशों के करीब 1000 छात्रों ने एक श्रृंखला बनाई जिसमें उन्होंने सिर पर टॉयलेट पॉट्स रखे थे। </strong></p>
<blockquote><p>आपको जानकार आश्चर्य होगा की सुलभ इंटरनेशनल ने शौचालयों का एक ऐसा संग्रहालय बनाया है जिसमें शौचालयों और मानव सभ्यता संस्कृति के गहरे रिश्तों को दिखाया गया है। यहाँ फ्रांस के सम्राट लुई तेरहवें के राजगद्दीनुमा शौचालय से लेकर महारानी विक्टोरिया के शौचालय की अनुकृति मौजूद है, जिसमें हीरे-जवाहरात लगे हैं। संग्रहालय में दिखाई गई जानकारी के अनुसार शौचालयों का इतिहास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता जितना ही पुराना है। मोहनजोदजड़ो में शौचालय के अवशेष मिले हैं। मुग़लकाल में अकबर के राजभवन के अलावा राजस्थान के गोलकुंडा सहित कई किलों पर शौचालय बने मिले जो अब भी देखे जा सकते हैं। इस संग्रहालय को बनाने का विचार संस्था के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक को लन्दन में मैडम तुसॉद का वैक्स म्यूज़ियम देखने के बाद आया। </p></blockquote>
<p>वैसे सरकार और व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान के मद्दे नजर अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है। लेकिन धरातल पर ये सभी कुप्रथाएं आज भी समाज में विद्यमान है। इतना ही नहीं, मानव मल-मूत्र की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में सरकारी और सामाजिक उदासीनता के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाया कोई पचास के दसक और उसके बाद भी जब तक ”सुलभ” ने सामाजिक आंदोलन नहीं चलाया, शौचालय की उपयोगिता को नहीं बताया, इन भंगी-परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया । </p>
<p><a href="https://youtu.be/A8SfTWVE5zw">अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।</a></p>
<p>कल तक जो लोग, विशेषकर समाज व्यवस्था के संभ्रांत लोग, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कॉर्पोरेट, मंत्री, अधिकारी और न जाने कौन-कौन, अपने “खाने के मेज पर शौच की बात करना मानवीयता और मनुष्यता के खिलाफ समझते थे; आज शहरों और महानगरों, यहाँ तक की कारपोरेट घरानों, सरकारी कार्यालयों में “भोजनावकाश” के समय “भोजन करते लोग मल-मूत्र के बारे में बात करते हैं, शौचालय की बात करते हैं। और इसका मुख्य कारण है कि सुलभ ने अपने पांच-दसक के प्रयास से न केवल गाँधी का सपना साकार किया जमीन पर, बल्कि “भारत से मैला ढोने की कुप्रथा को भी समाप्त किया।”</p>
<p><strong>बहरहाल, डॉ पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से मानव-मल-मूत्र उठाने की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया । उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन बन गया। आज डॉ. पाठक नहीं हैं (दो वर्ष पूर्व 15 अगस्त को उनका देहावसान हो गया), लेकिन आज भी ​याद है जब उनसे पूछा था कि &#8220;अगर सुलभ, जिसने स्वच्छता अभियान की नीव 50 वर्ष पहले डाली थी, नहीं होता तो भारत में स्वच्छता का हश्र क्या होता?” इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा: “इस बात का उत्तर मैं नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा की अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।” </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/indias-sulabh-international-social-service-organisation-will-host-world-toilet-day-in-delhi-this-year">भारत का &#8216;सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइज़ेशन&#8217; इस वर्ष दिल्ली में &#8216;विश्व शौचालय दिवस&#8217; की मेजबानी करेगा </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>महिला सुरक्षाकर्मियों को #मासिकधर्म के समय भी &#8216;अवकाश&#8217; नहीं, सेनेटरी पैड नहीं &#8211; लेकिन &#8216;बेटी बचाओ का नारा&#8217;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/there-is-no-facility-for-women-security-personnel-even-during-menstruation</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Sep 2023 06:22:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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		<category><![CDATA[justice]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बाबूजी कहते थे कि &#8220;ठेस तभी लगेगी, जब चलोगे। गिरोगे तब, जब दौड़ोगे। कभी देखा हैं बैठे-बैठे, सोये-सोये ठेस लगते, गिरते किसी को?&#8221; बाबूजी का यह शब्द मुझ जैसा अज्ञानी के लिए अनमोल है। धनाढ्य या फिर वे जिन्हें बपौती में संपत्ति मिलती है, मेरे बाबूजी की बात नहीं समझेंगे। अगर समझते तो दरभंगा के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/there-is-no-facility-for-women-security-personnel-even-during-menstruation">महिला सुरक्षाकर्मियों को #मासिकधर्म के समय भी &#8216;अवकाश&#8217; नहीं, सेनेटरी पैड नहीं &#8211; लेकिन &#8216;बेटी बचाओ का नारा&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाबूजी कहते थे कि &#8220;ठेस तभी लगेगी, जब चलोगे। गिरोगे तब, जब दौड़ोगे। कभी देखा हैं बैठे-बैठे, सोये-सोये ठेस लगते, गिरते किसी को?&#8221;</strong></p>
<p>बाबूजी का यह शब्द मुझ जैसा अज्ञानी के लिए अनमोल है। धनाढ्य या फिर वे जिन्हें बपौती में संपत्ति मिलती है, मेरे बाबूजी की बात नहीं समझेंगे। अगर समझते तो दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की संपत्ति और उनका नामोनिशान इतनी जल्दी मिट्टी में नहीं मिल जाती। </p>
<p>बाबूजी को यह बात कहे कोई चार दशक से अधिक हो गया और उन्हें अनंत यात्रा पर निकले तीन दशक एक साल। आज ही के दिन (आज 29 सितम्बर) है, सन 2010 में माँ, बाबूजी के पास पहुँचने के लिए अनंत यात्रा पर निकली थी। </p>
<p>लेकिन आज अचानक बाबूजी का यह अनमोल शब्द उस समय याद आया जब महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के नाम को, उनकी गरिमा को अपने सामर्थ्यभर यथासाध्य जीवित रखने के लिए आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम और इसी वेबसाइट का यूट्यूब चैनेल #अख़बारवाला001 के लिए एक कहानी के क्रम में दक्षिण दिल्ली के क़ुतुब मीनार स्थित दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक और शासक (1210-1236) इल्तुतमिश के दरगाह पर खड़ा था। </p>
<p>इल्तुतमिश का यह दरगाह कोई 787 वर्ष पुराना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार का संस्कृति/पर्यटन मंत्रालय के अधीन है। इससे भी बड़ी बात यह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट की सूची में भी अंकित है। </p>
<p>आश्चर्य तो यह है कि दरभंगा के महाराजाओं द्वारा निर्मित भवनों, किलों और दीवारों की हालत तो सौ साल आते-आते दम तोड़ दिया। आज इल्तुतमिश का दरगाह भले दो-फांक में टूट रहा है, लेकिन आज भी यह इतिहास जीवित है। और यही कारण है कि विश्व के लगभग सभी देशों के लोग इस ऐतिहासिक स्थल को जीते-जी देखने आते हैं। </p>
<p>यह अलग बात है कि भारत के स्कूली पाठ्यक्रमों में इतिहास के बहुत सारे पन्ने राजनीतिक नेताओं और सरकारी अधिकारियों, पदाधिकारियों, चापलूसों, चाटुकारों के हाथों मृत्यु को प्राप्त किया और कर रहा है। लेकिन दरभंगा के महाराजाधिराज का किला या तो अपना अस्तित्व समाप्त कर दिया है या फिर सहस्त्र फांक हो गया है। बाबूजी कहते थे &#8216;सब प्रारब्ध का खेल है।&#8217;</p>
<p>पिछले ही दिन तो देश के लोग भारत का 76 वां जश्ने आज़ादी मनाये हैं। क़ुतुब मीनार के परिसर में एक कोने में बैठकर सोच रहा था कि आज़ाद भारत में जब भी किसी राजनेता की मृत्यु हुई हैं तो दूसरे राजनेता को उनके राजनीतिक जीवन में इजाफा हुआ है &#8211; इतिहास गवाह है। इसी विषय पर कहानी कर रहा था। इतिहास कहता है कि यह स्थान विश्व को &#8216;स्लेवरी&#8217; और &#8216;स्लेव डाइनेस्टी&#8217; का जीवंत दृष्टान्त देता है। </p>
<p><strong>दिल्ली सल्तनत में जितने भी ऐतिहासिक स्थल हैं अधिकांशतः आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया के अधीन हैं और उन परिसरों में बिहार के पूर्व राज्य सभा के सांसद श्री आर के सिन्हा के स्वामित्व वाला SIS सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। वैसे देश में करीब छः मिलियन निजी क्षेत्र में काम करने वाले सुरक्षाकर्मी हैं। आम तौर पर इन स्थानों पर तैनात सुरक्षा कर्मियों को यह कान में फूंक दिया गया है कि मोबाईल फोन/कैमरा से तस्वीर ले सकते हैं/वीडियो भी बना सकते हैं। लेकिन उसमें आधा इंच का भी माइक नहीं लगा सकते क्योंकि यह गैर क़ानूनी है। परिसर में किसी भी प्रकार से अपनी बात रिकार्ड नहीं कर सकते, गैर क़ानूनी है। खैर !!! &#8216;कानून&#8217; का तो हम बहुत &#8216;स्वागत&#8217; करते हैं। </strong></p>
<p>समझ में नहीं आ रहा था की देश को आज़ाद हुए 76 वर्ष हो गए और एक स्वतंत्र देश का नागरिक होने के नाते कोई 787 वर्ष पूर्व के इस परिसर में जो स्लेवरी का प्रतिक रहा है, आज भी आज़ादी का कोई मोल नहीं है। तभी सिन्हा साहब के कंपनी के SIS सुरक्षाकर्मी वहां उपस्थित हुए। उनका कहना था कि &#8216;यह आदेश है और वे नौकरी करते हैं।&#8217; </p>
<p>मैं तो ठहरा रिपोर्टर, और विगत दिनों ही सुरक्षाकर्मियों की दशा पर कहानी भी किया था &#8216;कर्तव्य पथ&#8217; से। वहां उपस्थित सुरक्षा कर्मी से पूछे कि क्या आपको 30 दिनों की तनख्वाह मिलती है या 26 दिनों की?</p>
<p><strong>मेरी बात सुनते ही वे अपना गर्दन नीचे कर 26 दिनों की स्वीकृति दिए और &#8216;स्लेव डाइनेस्टी&#8217; के समय जो मिट्टी-पत्थर इस परिसर में फेके गए थे, इसके निर्माण के समय, उसे निहारते कहते हैं: &#8217;26 दिन का ही मिलता है सर। कोई आवाज भी नहीं उठा सकता है। बोलने पर नौकरी चली जाएगी। यह पूछ भी नहीं सकते कि सरकार कम्पनी को एक सुरक्षाकर्मी के लिए कितना पैसा देती है? हमलोगों से कपड़ा जूता टोपी का भी पैसा लेती है कंपनी। हमलोगों को कोई छुट्टी नहीं। बीमार पड़ने पर दवा-दारू के लिए कोई भी सुविधा नहीं है। माँ-बाबूजी अगर मर भी जायेंगे तो तन्खाह काटकर ही उनका संस्कार करने जाना होगा।&#8221;</strong></p>
<p>76-वर्ष आज़ादी के बाद आज दिल्ली सल्तनत ही नहीं, देश में कोई छः लाख करोड़ वाला निजी क्षेत्र का सुरक्षा व्यवस्था &#8216;स्लेवरी&#8217; और &#8216;स्लेव डाइनेस्टी&#8217; का जीता-जागता दृष्टान्त हैं। </p>
<p>वैसे भारतीय संविधान की धारा 498 के अनुसार पत्नी को भी घरेलू हिंसा (पति के विरुद्ध भी) के खिलाफ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करने का हक है। किसी भी महिला आरोपी को सूर्यास्त यानी शाम 6 बजे के बाद या सूर्योदय यानि सुबह 6 बजे से पहले गिरफ्तार किया जाता है तो वह भी कानून के खिलाफ है। धारा 160 के अनुसार अगर किसी महिला से पूछताछ भी करनी है तो उसके लिए एक महिला कांस्टेबल या उस महिला के परिवार के सदस्यों की मौजूदगी होना जरूरी है। इतना ही नहीं, अगर किसी महिला का उसके ऑफिस में या किसी भी कार्यस्थल पर शारीरिक उत्पीड़न या यौन उत्पीड़न किया जाता है तो उत्पीड़न करने वाले आरोपी के खिलाफ महिला शिकायत दर्ज कर सकती है। </p>
<p>इतना ही नहीं, अब तो लोकसभा और राज्य सभा भी महिला आरक्षण विधेयक 2023 (128वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक) यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कर दिया। यह विधेयक लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिये एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। लेकिन यह 2024 के लोकसभा चुनाव में लागू नहीं होगा। संविधान (एक सौ अट्ठाईसवां) संशोधन विधेयक, 2023 को विधेयक के पारित होने के बाद आयोजित नवीनतम जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके, परिसीमन अभ्यास पूरा होने के बाद ही लागू किया जा सकता है। </p>
<p>अगला परिसीमन अभ्यास, या निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, 2026 में होने वाला है। प्रभावी रूप से, इसका मतलब है कि लोकसभा में महिलाओं के कोटा का जल्द से जल्द कार्यान्वयन अगले साल के चुनावों के बजाय 2029 के आम चुनाव में हो सकता है। यानी &#8216;सैद्धांतिक रूप से 2029 चुनाव का आईना दिखा दिया गया है। वैसे भी महिला मतदाता भारत में कम थोड़े हैं। </p>
<p>इसी सोच-विचार में था ही कि वहां एक महिला सुरक्षाकर्मी दिखीं। वे भी हाँ-में-हाँ मिला रही थीं। उनके चेहरे पर भी उदासी थी। यह देखते मैं एक प्रश्न उनसे किया और पूछा: &#8220;मोहतरमा एक प्रश्न पूछें आपसे? </p>
<p>वे सहर्ष स्वीकारते हामी भरीं। </p>
<p><strong>मैंने पूछा: &#8220;क्या जब उन्हें माहवारी का समय होता है तो उस कठिन पांच दिनों में कंपनी के तरफ से कोई सुविधा उपलब्ध है अथवा नहीं है? मसलन &#8216;छुट्टी की व्यवस्था, जहाँ आप काम करती हैं वहां सेनेटरी पैड की व्यवस्था? या इस परिसर में आम महिला पर्यटकों के लिए सेनेटरी पैड की व्यवस्था?&#8221; </strong></p>
<p>मेरा प्रश्न सुनते ही उनका चेहरा लाल हो गया। मुझे उम्मीद हैं ऐसी प्रश्न कोई पुरुष पत्रकार नहीं करते होंगे। वजह भी था कि पिछले दिनों जब &#8216;माहवारी&#8217; पर एक कहानी कर रहा था तो कनॉट प्लेस में कुछ नवयुवतियां प्रश्नों को सुनकर &#8216;तिलमिलाने के जगह फक्र से कहीं कि महिलाएं स्वयं अपनी समस्याओं को समाप्त करने में आगे नहीं आती हैं। यह दुखद है। </p>
<p>SIS की महिला सुरक्षाकर्मी 787 साल पुराने &#8216;स्लेव डाइनेस्टी&#8217; के प्रतिक चिन्ह के सामने खड़ी थीं और आज़ाद भारत में विधि-विधानों के साथ-साथ भारत के तथाकथित &#8216;संभ्रांतों&#8217;, &#8216;व्यापारियों&#8217;, व्यवसायिओं&#8217;, &#8216;नेताओं&#8217;, &#8216;अभिनेताओं&#8217; का चेहरा दिख रहा था। </p>
<p>तभी मोबाईल पर घंटी बजी। नंबर अनजान था। </p>
<p>हेल्लो!!! कहा ही था कि दूसरे छोड़ से आवाज आयी &#8216;शिवनाथ जी !!&#8221; </p>
<p>मैं &#8216;हुकुम&#8217; शब्द से उनका अभिनन्दन किया। उनकी आवाज से उम्र का अंदाजा लग रहा था। कोई 80 वर्ष के अवश्य थे। </p>
<p><strong>फिर कहते हैं: &#8220;आप शायद मुझे पहचान जायेंगे। मैं आपको नब्बे के दशक से जानता हूँ जब आपकी कहानी संडे पत्रिका में पढ़ा था। वह कहानी संडे पत्रिका का कवर था और विषय था &#8216;फूलन देवी&#8217; FROM DACOIT QUEEN TO CELEBRITY आपने लिखा था: She is better known than Madhuri Dixit, attracts bigger crowds than Sri Devi, has more political clout than Maneka Gandhi, and has a higher international media profile than Medha Patekar.&#8221;  मैं आपको जानता हूँ। आपसे मेरी बात भी हुई हैं।&#8221;</strong></p>
<p>उनकी बातें मानस पटल पर राजधानी एक्सप्रेस जैसे दौड़ रही थी। अचानक क्षमा याचना करते प्रणाम किया। वे फोन पर ही हंसने लगे। मैं फिर क्षमा याचना किया। </p>
<p>वे कहते हैं: &#8220;मैं आपको फूलन देवी की उस कहानी के बाद से लगातार पढ़ते आया हूँ। आप जिन-जिन अख़बारों में काम किये जानता हूँ, पढता आया हूँ। आपकी एक कहानी ऑस्ट्रेलिया के रेडियो पर भी सुना था। फिर आपके बारे में वॉइस ऑफ़ अमेरिका, बीबीसी पर भी सुना। मेरा आशीष है आपको। आप दरभंगा के महाराजा द्वारा स्थापित अख़बार, जो कई वर्ष पहले बंद हो गया, वेबसाइट भी बनाये हैं।&#8221; </p>
<p>उनकी बातों को सुनकर मैं स्तब्ध था। वे भारतीय पत्रकारिता के साथ-साथ मुंबई बॉलीवुड का एक हस्ताक्षर हैं, वर्षों से। वे बॉलीवुड में अभिनेता भी नहीं हैं, अभिनेता बनाते हैं।&#8221;</p>
<p>फिर कहते हैं: &#8220;आपके आर्यावर्तइण्डियननेशन वेबसाइट पर अभी एक कहानी देखा हूँ । बहुत बेहतरीन लिखा है आपने। मुद्दत बाद पढ़ा हूँ ऐसी कहानी, सत्यता के उत्कर्ष की। बहुत अच्छी कहानी है। बहुत अच्छा लिखें हैं। मैं एक फिल्म निर्माता हूँ। स्वाभाविक है मैं कहानी को उस नजर से देखूंगा। यह एक बेहतरीन फिल्म स्क्रिप्ट है। इसे आप डेवेलप करें। इस कहानी से सम्बंधित अपनी नजर से उन सभी बातों को एकत्रित करें, शोध करें। आप स्क्रिप्ट लिखें। मैं सुधार दूंगा। इस पर काम करें। एक बेहतरीन फिल्म बनाएंगे।&#8221; </p>
<p>इल्तुतमिश के इस दरगाह पर जहाँ एक ओर आज़ादी के 76 साल बाद भी निजी क्षेत्र के सुरक्षा एजेंसियों का मालिक महिलाओं को मासिक धर्म के समय भी &#8216;अधर्मी&#8217; होकर &#8216;अवकाश&#8217; नहीं देते, छुट्टी नहीं देते, सेनेटरी पैड उपलब्ध नहीं कराते, वे भी बेटी बचाओ का नारा देते हैं &#8211; वहीँ दूर से कोई सत्यता को उजागर करने के लिए खुलकर लिखने को कहते हैं। ओह !!!!! </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/there-is-no-facility-for-women-security-personnel-even-during-menstruation">महिला सुरक्षाकर्मियों को #मासिकधर्म के समय भी &#8216;अवकाश&#8217; नहीं, सेनेटरी पैड नहीं &#8211; लेकिन &#8216;बेटी बचाओ का नारा&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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