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	<title>slogans Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8216;पढ़ेगी बेटी-बढ़ेगी बेटी&#8217; नारा बिहार के सरकारी नियमों के अधीन &#8216;दम तोड़ रहा है; मंत्री कहते हैं: &#8216;हम मंत्री हैं, फ़ाइल के पीछे मैं नहीं, आप दौरें, मैं नहीं दौड़ता&#8217; (भाग-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/padhegi-beti-badhegi-beti-slogan-dying-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Jun 2022 05:02:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[beti-padhao-beti-bachao]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना।  कलकत्ता : भारत की सड़कों पर, खासकर बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर कुकरमुत्तों की तरह पनप रहे राजनेताओं और उनके द्वारा सम्पोषित, संरक्षित &#8216;दुधारू विद्यालयों&#8217; में पटना के लोग, माता-पिता, अभिभावक भले अपने बच्चों को, विशेषकर बालिकाओं को प्रवेश के लिए &#8216;कुछ भी करने को तैयार&#8217; हों; लेकिन इस बात से इंकार नहीं [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/padhegi-beti-badhegi-beti-slogan-dying-in-bihar">&#8216;पढ़ेगी बेटी-बढ़ेगी बेटी&#8217; नारा बिहार के सरकारी नियमों के अधीन &#8216;दम तोड़ रहा है; मंत्री कहते हैं: &#8216;हम मंत्री हैं, फ़ाइल के पीछे मैं नहीं, आप दौरें, मैं नहीं दौड़ता&#8217; (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना।  कलकत्ता : भारत की सड़कों पर, खासकर बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर कुकरमुत्तों की तरह पनप रहे राजनेताओं और उनके द्वारा सम्पोषित, संरक्षित &#8216;दुधारू विद्यालयों&#8217; में पटना के लोग, माता-पिता, अभिभावक भले अपने बच्चों को, विशेषकर बालिकाओं को प्रवेश के लिए &#8216;कुछ भी करने को तैयार&#8217; हों; लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि तत्कालीन &#8216;अविभाजित&#8217; कालखंड में बिहार में &#8216;महिला शिक्षा&#8217; की अग्रणी महिला को बिहार के लोग भूल गए हैं। नेताओं ही नहीं, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री की बात ही नहीं करें। तभी तो विगत दिनों बिहार का एक शिक्षा मंत्री अपने दफ्तर में कुर्सी पर बैठे कह ही दिए: &#8220;मैं प्रदेश का शिक्षा मंत्री हूँ और फाईल के पीछे-पीछे मैं नहीं चलता, आपका काम है, आप चलें।&#8221; शिक्षा मंत्री महोदय के ये शब्द प्रदेश में &#8216;पुरातात्विक मोल&#8217; के विद्यालयों और वहां प्रदान की जाने वाली शिक्षा-स्तर का जीवंत &#8211; &#8216;मृत मानसिकता&#8217; &#8211; एक दृष्टान्त है।</strong> </p>
<p>प्राथमिक स्तर से प्राक-विश्वविद्यालय कक्षाओं तक बिहार की राजधानी पटना में कितने विद्यालय हैं और कितने छात्र उसमें शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, यह बात तो प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग के सम्मानित अधिकारी और शिक्षा मंत्री बताएँगे; लेकिन एक बात स्पष्ट है कि पटना शहर में महिला शिक्षा की सूत्रधार और अग्रणी कौन-कौन महिला थी, सैकड़े 99 फ़ीसदी छात्र-छात्राएं-अभिभावक-अधिकारी-मंत्री नहीं जानते होंगे। </p>
<p><strong>इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि अगर यह सवाल &#8216;कौन बनेगा करोड़पति में महानायक अमिताभ बच्चन सात-करोड़ और अधिक मूल्य के बराबर प्रश्न कर दें, तो सामने कुर्सी पर बैठे &#8216;महामानव&#8217; शायद सभी &#8220;दांत निपोड़&#8221; देंगे, &#8220;अपना &#8220;बत्तीसी&#8221; निकाल देंगे &#8211; गर्व से &#8211; और कहते भी नहीं शर्माएंगे &#8220;लाईफ लाईन&#8221; इस्तेमाल करूँगा । वैसे दिल्ली से लेकर बिहार के सभी 28 जिलों के 45,103 गावों सहित भारत के 6,28,221 गाँव में &#8216;बेटी बचाओ &#8211; बेटी पढ़ाओ&#8217; नारा का जबरदस्त व्यापारीकरण हो रहा है। नीतीश बाबू अगर समय मिले तो सोचियेगा जरूर। </strong></p>
<p>कोई &#8216;साईकिल&#8217; बाँट रहा है तो कोई &#8216;लैपटॉप&#8217;, कोई &#8216;आटा दे रहा है, तो कोई लवणच्युस&#8217;, कोई कपड़ा बाँट रहा है तो कोई बक्सा&#8217; &#8211; दुर्भाग्य यह है कि &#8216;बेहतर सोच वाली मानसिकता&#8217; कोई नहीं मजबूत कर रहा है। क्योंकि बिहार ही नहीं, देश के राजनेता कभी नहीं चाहेंगे की उसके विधानसभा, विधान परिषद्, लोक सभा क्षेत्रों में शिक्षा का वास्तविक प्रसार हो, चुनाव क्षेत्र में शिक्षित, विचारवान मतदाता हों, उनकी पकड़ हो। क्योंकि राजनेताओं की दुकानदारी बंद हो जाएगी। शिक्षा का उनके जीवन में कोई महत्व होता तो सातवीं, आठवीं,नवमीं-दसवीं, इंटर, या फिर कभी &#8216;विद्यालय का मुख&#8217; नहीं देखने वाला व्यक्ति प्रदेश के विधान सभा में नहीं बैठता और समाज के लोग अपने मत का प्रयोग उन अशिक्षितों के लिए करते भी नहीं। पतन दोनों तरफ बराबर का है। </p>
<p>शिक्षा विभाग में एक नियम &#8216;विद्यालय को खुशहाल बनाने के लिए हैं, वहीं दूसरा नियम ऐसा है जिसके तहत कोई विद्यालय खुल ही नहीं सकता। गाँव, टोले, महल्ले के बच्चे पढ़ ही नहीं सकते। क्योंकि ऐसे विद्यालयों के लिए &#8216;शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है। जिस व्यक्ति के पास ऐसी सोच होता है, वह अर्थ से दरिद्र&#8217; होता है। और वर्तमान राजनीतिक &#8211; सामाजिक &#8211; प्रशासनिक व्यवस्था में &#8216;दरिद्रों की जरूरत नहीं है। समाज के संभ्रांत लोग, जो प्रदेश के राजनीतिक &#8211; सामाजिक &#8211; प्रशासनिक गलियारे में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते हैं, &#8216;प्रातः-सांध्य कालीन भ्रमण-सम्मेलन करते हैं, वे तो उन विद्यालयों को समाप्त कर देना चाहते हैं ताकि उस भूमि पर विशालकाय गगनचुंबी इमारत बनाकर लक्ष्मी जी की अगुवाई कर सकें, सरस्वती को भगाकर। </p>
<p><strong>अगर ऐसा नहीं होता तो पटना के अशोक राज पथ पर खुदाबक्श ओरिएंटल पुस्तकालय के सामने नयाटोला की ओर लुढ़कने वाली खजांची रोड के मध्य में एक ऐतिहासिक मकान &#8220;जर्जर&#8221; नहीं होता। मुझे विश्वास है कि प्रदेश के विगत 24 मुख्यमंत्रियों की श्रृंखला में आज तक शायद ही कोई महानुभाव मुख्यमंत्री खजांची रोड से गुजरे होंगे, इस भवन को देखे होंगे। हां, केदार पांडेय, दरोगा प्रसाद राय नयाटोला के एक मकान में अवश्य जाते थे, अपने मित्र के घर, लेकिन मार्ग खजांची रोड नहीं होता था।&#8221;</strong></p>
<p>टी के घोष अकादमी के पूर्ववर्ती छात्र, पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र रॉय का जन्म खजांची रोड के इसी भवन में हुआ था। डॉ बिधान चंद्र राय के नाम पर भारत के करीब 12 लाख से अधिक ऐलोपैथी चिकित्सक &#8220;डॉक्टर्स दिवस मानते हैं। डॉ बिधान चंद्र रॉय का वह ऐतिहासिक स्थान और उस स्थान पर कई दशक से चल रही &#8216;बालिका विद्यालय&#8217; का यह हश्र नहीं होता अगर विगत 75 वर्षों में सत्ता के सिंहासन पर बैठे &#8220;सफेदपोश&#8221; राजनेताओं के साथ समाज के लोगों की मानसिकता सकारात्मक होती । कुल 16 शिक्षकों में 12 शिक्षकों को &#8220;चंदा कर मासिक वेतन&#8217; नहीं दिया जाता। बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के अधिकारी, प्रदेश के शिक्षा मंत्री इस ऐतिहासिक विद्यालय को सरकारी अनुदान, सहायता से इसलिए बंचित नहीं कर देते कि &#8216;विद्यालय के पास उपलब्ध जमीन में 40 वर्गफीट जमीन कम है जो नियमानुसार आवश्यक है।&#8221;</p>
<p>अब प्रदेश के शिक्षा विभाग के अधिकारियों, शिक्षा मंत्रियों, मुख्यमंत्री महोदय को कैसे बताया जाय कि जिस दिन इस विद्यालय की स्थापना हुई थी, उस दिन प्रदेश के मानचित्र पर उनका कहीं कोई अता-पता नहीं था। जिस महिला ने इस विद्यालय की स्थापना की थी, वह महिला &#8220;बिहार में महिला शिक्षा की अग्रणी थी, सूत्रधार थी&#8221; । उससे पूर्व तत्कालीन बम्बई (अब मुंबई) से बैलगाड़ी पर चलकर, कोई आठ महीने में पहुँचने वाली पांच महिलाएं (सिस्टर मारिया ग्रोेप्पनेर, सिस्टर अंगेलहॉफ, सिस्टर अलोय्सिआ माहेर, सिस्टर अंटोनिआ फ़ेथ और सिस्टर चैथेरिने स्क्रैबमा) पटना में रोमन कैथलिक चर्च (1850) के तहत भारत में बनी पहला &#8216;मदर्स हॉउस&#8217; और संत जोसेफ़ कान्वेंट स्कूल का सञ्चालन की थी। कितनी मसक्कत की थी वे महिलाएं बिहार की राजधानी पटना में महिला शिक्षा के प्रसार-प्रसार के लिए, आज के राजनेता, आज के लोगबाग सोच नहीं सकते। खैर, यह बात आज की &#8216;महिला&#8217; भी नहीं समझेंगी, &#8220;पुरुष राजनेतागण&#8221; की तो बात ही नहीं करें। अशोक राज पथ और गंगा नदी के बीच (महेन्द्रू घाट के समीप) संत जोसेफ कान्वेंट स्कूल और रोमन कैथलिक चर्च की स्थापना दस एकड़ भूमि में की गई थी । </p>
<p>बिहार के शिक्षा जगत से जुड़े &#8216;वास्तिविक&#8217; और &#8216;तथाकथित&#8217; महामानव, जो पटना की सड़कों से प्रदेश के विधान सभा तक प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर. विशेषकर &#8216;महिला शिक्षा के प्रसार-प्रसार&#8217; पर &#8216;घड़ियाली आंसू&#8217; बहाकर &#8216;राजनीति&#8217; कर रहे हैं, उन्हें शायद यह भी नहीं मालूम होगा कि &#8216;आज गोलघर के सामने स्थित जिस विद्यालय (बांकीपुर महिला विद्यालय) का नाम और उसकी उपलब्धि अपने सरकारी बही-खाते में लिखकर दिल्ली तक अपना माथा ऊँचा करते हैं; उस विद्यालय की स्थापना और नामकरण भी उसी महिला ने की थी, जो खजांची रोड के चार-पांच कमरों में रहती थी और खजांची रोड के उसी भवन से बांकीपुर महिला विद्यालय&#8217; के नाम से महिला शिक्षा की शुरुआत की थी । खुद &#8216;बेहतर शिक्षा दे सके, पटना से हज़ारीबाग जाकर, वहां की शिक्षक-प्रशिक्षण संस्था से पढाई कर, सीखकर फिर पटना आयी और महिला शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए &#8216;घड़ियाली आंसू&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;खून-पसीना&#8217; बहायी थी। आज पटना के लोग उस महिला को जानते भी नहीं। </p>
<p>बहरहाल, अब तक अशोकराज पथ &#8211; गंगा के बीच संत जोसेफ़ कान्वेंट आ गया था। पटना की महिला शिक्षा, ऑर्फन्स की देखरेख करने का कार्य प्रारम्भ हो गया था। संत जोसेफ कान्वेंट में शिक्षा-व्यवस्था (दाखिला) के लिए दो भाग थे &#8211; एक अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारियों के बच्चों के लिए और उसी के बराबर भारतीय बच्चों के लिए। विद्यालय परिसर में छात्राओं के चमड़े के रंग में भले काले-गोरे का अंतर होता था; शिक्षा देने में कोई अंतर नहीं था। </p>
<p>इसी विद्यालय से कोई एक किलोमीटर दूर पटना समाहरणालय के रास्ते सन 1786 में निर्मित तत्कालीन &#8220;दी ग्रैनरी&#8221; *(आज का गोलघर) के सामने गंगा के किनारे उस महिला की बांकीपुर महिला विद्यालय&#8217; एक नए परिसर में आ गया। लेकिन वह अपनी पुस्तैनी जगह को नहीं छोड़ी। महिला का नाम था &#8211; श्रीमती अघोरकामिनी &#8216;बिधान&#8217;, जो प्रकाश चंद्र रॉय की पत्नी थी और श्री प्राणकाली रॉय, जो उस समय ब्रह्मपुर (मुर्शिदाबाद, बंगाल) के समाहरणालय में कार्यरत थे, की बहु थी। श्री प्रकाश चंद्र राय पटना समाहरणालय में कार्य करते थे। श्रीमती अघोरकामिनी जी के पिता ब्रह्मपुर (मुर्शिदाबाद) के एक विख्यात जमींदार थे, नाम था श्री बिपिन चंद्र बसु  महिला पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र राय की माँ थी। <br />
 <br />
<strong>कहते हैं जो बंगाल आज़ादी के आंदोलन के समय भारत को क्रांतिकारियों का फ़ौज दिया, बंगाल के मिदनीपुर पुर से बिहार के मुजफ्फरपुर तक, कलकत्ता के राइटर्स बिल्डिंग से पटना सचिवालय के रास्ते दिल्ली के एसेम्ब्ली तक स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों का फ़ौज दिया, आज उसी बंगाल के दिवंगत मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र राय, उनकी माँ श्रीमती अघोर कामिनी जी को, उनके पुस्तैनी भवन, ऐतिहासिक विद्यालय को पूछने वाला न बंगाल में है और ना ही बिहार में। ऐसा लगता है जैसे सभी &#8220;अंतिम सांस की प्रतीक्षा&#8221; कर रहे हों, सोच रहे हों कब सांस रुके और उस &#8216;ऐतिहासिक भूमि&#8217; को &#8216;बहुमूल्य भूमि&#8217; में बदलकर गहन अर्जित किया जाय। &#8216;अर्थ के आभाव&#8217; में आज भवन की दशा &#8216;दर्दनाक&#8217; हो गई है, जो &#8216;वर्तमान व्यवस्था, वर्तमान समाज, लोगों के लिए निंदनीय है।&#8221;</strong></p>
<p>आज आलम यह है कि जिस बंगाल की महिला ने बिहार में महिला शिक्षा का बीजारोपण की थी, जिसने तीन महिला छात्राओं को लेकर महिला प्रदेश में महिला शिक्षा का श्रीगणेश की थी, महिलाओं को शिक्षा के बारे में &#8216;क&#8217; &#8216;ख&#8217; &#8216;ग&#8217; सिखाई थी; आज आज़ादी के 75 वर्ष बाद बिहार के शिक्षा विभाग के अधिकारियों, मंत्रियों के सामने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए &#8216;भीख&#8217; मांग रही है, &#8216;गुहार&#8217; कर रही है &#8211; इधर बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में &#8216;पढ़ेगी बेटी &#8211; बचेगी बेटी&#8217; का नारा बुलंद हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि &#8216;बेटियों की सांस अटक रही है। पढ़ने-लिखने आगे बढ़ने की बात तो कागज पर पन्ना-दर-पन्ना दौड़ रही है। </p>
<p><strong>कल पढ़ेंगे: अघोर शिशु विद्यामंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष कैप्टन (डॉ) डी के सिन्हा से बातचीत। डाक्टर साहेब की पीड़ा &#8216;असहनीय&#8217; है वर्तमान महिला शिक्षा के प्रति </strong></p>
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		<title>&#8220;नारों&#8221; से सल्तनत बनता है, ढ़हता है क्योंकि किस्सा-कहानी तो सिर्फ कुर्सी के लिए है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 02 Feb 2019 03:59:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8220;सोच बदलो &#8211; देश बदलेगा&#8221; नहीं कहिए हुज़ूर !!! &#8220;सोच बदलो &#8211; सरकार बदलेगी&#8221; कहिये हुकुम !!!! ​दिल्ली मेट्रो में एक हिन्दी साहित्य के हस्ताक्षर बुदबुदा रहे थे, शायद आने वाले आम-चुनाब के लिए &#8220;शब्दों का कशीदाकारी&#8221; कर रहे थे &#8230;. नई दिल्ली: इधर चुनाब का घोषणा हुआ नहीं की सम्पूर्ण देश में हिन्दी के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&#8220;सोच बदलो &#8211; देश बदलेगा&#8221; नहीं कहिए हुज़ूर !!! &#8220;सोच बदलो &#8211; सरकार बदलेगी&#8221; कहिये हुकुम !!!!  ​दिल्ली मेट्रो में एक हिन्दी  साहित्य के हस्ताक्षर बुदबुदा रहे थे, शायद आने वाले आम-चुनाब के लिए &#8220;शब्दों का कशीदाकारी&#8221; कर रहे थे &#8230;. </strong></p>
<p>नई दिल्ली: इधर चुनाब का घोषणा हुआ नहीं की सम्पूर्ण देश में हिन्दी के मूर्धन्य लोग अपने-अपने शब्दों को राजनीतिक बाज़ार में बेचने के लिए, अपने पसन्दीदा राजनेताओं, राजनीतिक पार्टियों को जिताने हेतु आकर्षक &#8220;नारों&#8221; को बनाने में शब्दों का कशीदाकारी करना शुरू कर दिए हैं। कहते हैं की वे सभी बजट का इंतज़ार कर रहे थे। चुनाबी दौर में नारों का विशेष महत्व है। नारों के बिना भला कैसे हो सकता है चुनाब । चुनावी नारे सिर्फ प्रचार के लिए नहीं होते। इन नारों से सरकारें बनती और गिरती भी हैं।</p>
<p>सामान्यतया आम चुनाब और विधान सभाओं के चुनाब में नारों के नब्ज में अंतर होता है। जहाँ देश में आम चुनाब में देश का मतदाता भारत भाग्य विधाता को नजर में रखकर नारों की रस्सी को कसता है, वहीँ विधान सभाओं के चुनाब में पंचायत से उठने वाला गर्जन प्रदेश की राजधानी की सड़कों पर आकर दम तोड़ देती है। जो साँसे बचती है उन्ही साँसों के बलपर प्रदेश मुख्य मंत्री शपथ ग्रहण करते हैं &#8211; भले ही बंद कमरों में विधायकों की खरीद-बिक्री में सफल नहीं होने पर उनकी सरकार जमीन पर लेटने लगे। परन्तु, आम चुनाब में दम तोड़ती आवाज भी दिल्ली के राजपथ तक आती ही है &#8211; मेराथन की तरह &#8211; और इस आवाज में देश के धनाढ्य, व्यापारी, निवेशक, बनिया, चोर-उचक्के, बाहुबली सबों का भरपूर समर्थन होने के कारण कोई निकल जाता है तो कोई पिछड़ जाता हैं। </p>
<p>देश की राजनीति में नारों की ताकत से उम्मीदवारों का खेल बनता और बिगड़ता है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी, नरेन्द्र मोदी सभी नारों की बदौलत सत्ता को प्राप्त किये और देश पर राज किया, प्रधानमंत्री बने।</p>
<p>दिल्ली के एक हिन्दी दैनिक के हस्ताक्षर, जिन्होंने पिछले कई चुनाबों में शब्दों के साथ कुस्ती लड़कर अपने पसंदीदा पार्टी के नेताओं को नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, प्रधान मंत्री कार्यालय, शास्त्री भवन, कृषि भवन में लाल-बत्ती वाली गाड़ी से स्वयं उताड़कर कुर्सी पर बैठाये हैं, कहते हैं: &#8220;नारा तो शब्दों का खेल है। हम शब्दों से राजनीतिक पार्टी (आप समझें एक महिला) को सजाते हैं, सवांरते हैं, हॉट बनाते हैं; ताकि लोग उसे देखें, आकर्षित हों और उसके जाल में फंसकर अपने मत का प्रयोग उसके पक्ष में करें। यह एक प्रकार का सम्मोहन है जो मतदाता हो कुछ और सोचने नहीं देने को विवश करता है। आप इसे वशीकरण मन्त्र भी कह सकते हैं।&#8221;</p>
<p>लखनऊ विश्वविद्यालय के मुकुल श्रीवास्तव ने राजनीतिक नारों का बहुत ही बारिकी के साथ विश्लेषण किया है। उनके अनुसार भारतीय लोकतंत्र में कोई भी चुनाव बगैर नारों के सम्पन्न नहीं हो सकते। नारे न तो कविता हैं न ही कहानी, इन्हें साहित्य की श्रेणी में रखा गया है, पर वे नारे ही हैं जो लोगों को किसी दल और उसकी सोच को जनता के सामने लाते हैं। नारों को अगर परिभाषित करना हो तो कुछ ऐसे परिभाषित किया जा सकता है &#8211; राजनीतिक, वाणिज्यिक, धार्मिक और अन्य संदर्भो में, किसी विचार या उद्देश्य को बारंबार अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त एक यादगार आदर्श वाक्य या सूक्ति को नारा कहा जाता है। इनकी आसान अभिव्यक्ति विस्तृत विवरणों की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती है और इसलिए शायद वे अभीष्ट श्रोताओं के लिए प्रक्षेपण की बजाय, एकीकृत उद्देश्य की सामाजिक अभिव्यक्ति के रूप में अधिक काम करते हैं।  </p>
<p>पहले के चुनाव नारों पर लड़े जाते थे, पर अब चेहरों पर लड़े जा रहे हैं। सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल शासन का कैसा चेहरा देंगे जोर इस पर नहीं, बल्कि कौन सा चेहरा शासन करेगा जोर इस पर है। जब चेहरे शासन करने लग जाएं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोकतंत्र में कैसे राजतंत्र प्रवेश कर गया है। नारे तो अभी भी गढ़े जा रहे हैं, लेकिन न तो उनमें वो वैचारिक स्पष्टता और न ही नैतिक प्रतिबद्धता है जिससे मतदाता उनसे प्रभावित हो या वोट देते समय नारे उसके निर्णय को प्रभावित करें। गरीबी हटाओ जैसा नारा आज भी लोगों को याद है। भले ही व्यवहार में गरीबी देश से न खत्म हुई हो, लेकिन कहा जा सकता है कि गरीबी जैसे विषय को सरकार की प्राथमिकता जरूर मिली।</p>
<p>भ्रष्टाचार के विरोध में जब पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी तो ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ जैसे नारों से उनका स्वागत किया गया और उन्होंने सामाजिक न्याय के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी सरकार कुर्बान करनी पड़ी। कथनी करनी के अंतर की यह कहानी सारी हकीकत खुद बयां कर रही है। अब तो यह आलम है कि सुबह नेता टिकट के लिए किसी दल की लाइन में लगे हैं और वहां से निराश होने पर शाम को किसी और दल की लाइन में लग लिए। इंदिरा गांधी जहां अपने ‘गरीबी हटाओ’ जैसे नारों के लिए जानी जाती हैं वहीं उनके खाते में कुछ ऐसे नारे भी हैं जो आपातकाल की भयावहता को बताते हैं- ‘जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में, द्वार खड़ी औरत चिल्लाए, मेरा मर्द गया नसबंदी में।’  </p>
<p>नारों में आक्रामकता जरूर रहती थी पर राजनीतिक चुहल भी खूब चलती थी। जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल (साठ के दशक में जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक था जबकि कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी थी)। इसका जवाब कुछ इस तरह दिया गया- ‘इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं।’ आज के नारों को अगर समाजशास्त्रीय नजरिये से देखा जाए तो ये चुनावी नारे कुछ शब्दों का संग्रह मात्र हैं जिनमें लफ्फाजी ज्यादा है। देश बदलना सुनने में भले ही अच्छा लगे पर यह होगा कैसे, इसकी कोई रूपरेखा कोई भी दल नहीं दे पा रहा है। साठ के दशक में राम मनोहर लोहिया ने जब नारा दिया था- ‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ तो ये महज नारा नहीं एक बदलाव की पूरी तस्वीर थी।  </p>
<p>जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के नारे ने 1970 के दशक में पूरे देश की राजनीति को व्यापक तौर पर प्रभावित किया था जिसकी चरम परिणिति सरकार परिवर्तन के रूप में सामने आई। श्रीकांत वर्मा ने अपने संग्रह ‘मगध’ में इसी वैचारिक खालीपन को कुछ यूं बयान किया था- राजसूय पूरा हुआ, आप चक्रवर्ती हुए, सिर्फ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं, जैसे कि यह कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता, कोसल में विचारों की कमी है।  </p>
<p>राजनीतिक दलों के नारे अक्सर देश की जनता का मूड भांपने की किसी दल की क्षमता को स्पष्ट करते हैं। एक अच्छा नारा धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा के आधार पर बंटे हुए लोगों को एक सूत्र में बांध सकता है जिनसे एक नागरिक के तौर पर प्राथमिकताएं स्पष्ट होती हैं, लेकिन एक खराब नारा राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बर्बाद भी कर सकता है। भारत में राजनीतिक नारों में से कई ऐसे भी हुए हैं जो यादगार रहे हैं, मसलन ‘गरीबी हटाओ’, ‘इंडिया शाइनिंग’, ‘जय जवान, जय किसान’।  </p>
<p>अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को मौका मिला भी था. पर 2004 में अटल को काउंटर करने के लिए नारा निकला – तुमको देखा एक ही बार, तुम निकले सबसे मक्कार. ये बड़ा डैमेजिंग था. इसी मुकाबले में कांग्रेस ने नारा दिया – कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ. ये इफेक्टिव रहा. पर 2014 के चुनाव में अबकी बार मोदी सरकार सब पर भारी रहा. ‘अच्छे दिन आने वाले हैं, मोदी जी आने वाले हैं’ भी था. तुरंत कनेक्ट कर लेता था ये नारा.  </p>
<p>पर आज की राजनीति जैसे विचार शून्यता की शिकार हो चली है। नेता तो आ रहे हैं दल भी बढ़ रहे हैं, पर विचार खत्म हो रहे हैं। परिवारवाद हर राजनीतिक दल में बढ़ता जा रहा है। हमें यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि नारे किसी भी लोकतंत्र के शासन के प्राथमिक माध्यम हैं। ऐसे में नारे अगर विचार केंद्रित न होकर व्यक्ति केंद्रित हो जाएं तो हमें समझ लेना चाहिए कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। किसी भी लोकतंत्र में नए विचारों का न आना एक तरह की राजनीतिक शून्यता पैदा कर देता है जो शासन की दृष्टि से उचित नहीं होगा। नारे लोकतंत्र के शासन के प्राथमिक माध्यम हैं। नारे अगर विचार केंद्रित न होकर व्यक्ति केंद्रित हो जाएं तो समझ लेना चाहिए कि सामाजिक राजनीतिक स्तर पर सब दुरुस्त नहीं है। (क्रमशः)</p>
<p>आजादी के बाद कांग्रेस ​पार्टी ने सरकार बनायी। लेकिन विपक्ष को संतोष नहीं था इसलिए विपक्ष में बैठे कम्युनिस्टों ने एक नारा दिया था​:</p>
<p>​&#8221;​देश की जनता भूखी है यह आजादी झूठी है​&#8221;​<br />
​उस ज़माने में ​कम्युनिस्टों​ ​का एक और नारा बहुत लोकप्रिय ​हुआ था :<br />
​&#8221;​लाल किले पर लाल निशान मांग रहा है हिन्दुस्तान​&#8221;.</p>
<p>60 के दशक में ही जनसंघ ने नारा दिया था​:</p>
<p>&#8220;जली झोंपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल​&#8221;​<br />
इसका करारा जवाब हुए कांग्रेस ने नारा दिया था​:<br />
​&#8221; इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं​&#8221;​</p>
<p>​उस ज़माने में ​‘दो बैल’ कांग्रेस का चुनाव चिह्न हुआ करता था और ‘दीपक’ जनसंघ ​का।  जनसंघ ने एक और नारा दिया था गोरक्षा को लेकर​:</p>
<p>&#8220;गाय हमारी माता है, देश धर्म का नाता है​&#8221;<br />
जनसंघ का एक और नारा ​बहुत प्रचलित हुआ था:<br />
&#8220;हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी​&#8221;.</p>
<p>​जब शश्रीमती इंदिरा गाँधी राजनीति में प्रवेश लीं तो सम्पूर्ण राजनीतिक परिवेश ही बदल गया। ​नारे भी ​आग उगलने लगे। उन दिनों विपक्षों ने इंदिरा गाँधी के खिलाफ एक नारा दिया था देश में चीनी, किरासन तेल और पेट्रोल की कमी को लेकर, जो बहुत ही प्रचलित हुआ, वाबजूद इसके की इंदिरा गाँधी को ही लोगों ने चुना :</p>
<p>​&#8221;​ये देखो इंदिरा का खेल, खा गई शक्कर पी गई तेल​&#8221;.<br />
​विपक्ष के नारों का जबाब देती कांग्रेस एक ऐसा नारा दिया जो जान-मानस के मस्तष्क पर छा गया :<br />
​&#8221;आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे​&#8221;<br />
​फिर आया १९७१ का चुनाब और कांग्रेस &#8220;गरीबी ह‍टाओ​&#8221;​ का नारा देकर ​चुनाब जीत गयी और इन्दिरागांधी की सरकार बनी।<br />
​आपातकाल के दौरान विपक्षों ने इंदिरागांधी और कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए अनेकानेक नारों की रचना ​किया। सम्पूर्ण देश इंदिरा गाँधी के खिलाफ बगावत कर दी। जय प्रकाश नारायण नेतृत्व कर रहे थे आंदोलन का। उस समय बहुत नारे मशहूर हुए और कांग्रेस को सत्ताहीन होना पड़ा।<br />
​&#8221;​सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास तुम्हारा है​&#8221;<br />
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की पंक्तियाँ भी नारे में इस्तेमाल हुए:<br />
&#8220;सिंहासन खाली करो कि जनता आती है​&#8221;<br />
उसी दौरान नसबंदी के खिलाफ भी जबरदस्त नारेबाजी हुए:<br />
&#8220;जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी ​में।<br />
द्वार खड़ी औरत चिल्लाए, मेरा मर्द गया नसबंदी ​में ।।&#8221;<br />
​आपातकाल के दौरान दी ​कांग्रेस नेता देव कांत बरुआ ​द्वारा दिया गया नारा बहुत मशहूर हुआ:<br />
&#8220;इंदिरा भारत हैं और भारत इंदिरा ​है&#8221;<br />
​विपक्षों की राजनीतिक अपरिपक़्कता को देखते श्रीकांत वर्मा ने जब नारा दिया​:<br />
&#8220;जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर​&#8221;<br />
तो ​यह नारा सम्पूर्ण राजनितिक माहौल को बदलकर इंदिरा​ गाँधी को पुनः सत्ता में लाया।<br />
फिर 1980 के चुनावों से पहले चिकमंगलूर के उपचुनाव में जब इंदिरा​ गाँधी  जीत गईं तो नारा बना​:<br />
&#8220;एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर​&#8221;<br />
इसके बाद जनता पार्टी की अस्थिरता को लेकर इंदिरा ने नारा दिया​:<br />
&#8220;मजबूत सरकार​&#8221;<br />
​सन १९८४ में ​इंदिरा गांधी की हत्या ​के बाद कई नारे विपक्षों को दूर फेंका और कांग्रेस सत्ता में बनी रही:<br />
​&#8221;इंदिरा तेरी यह कुर्बानी याद करेगा हिंदुस्तानी​&#8221;<br />
&#8220;जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा​&#8221;’<br />
​इसके बाद राजीव गांधी के लिए नारे लगे​:<br />
​&#8221;​पानी में और आंधी में, विश्वास है राजीव गांधी में​&#8221;<br />
​&#8221;उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं​&#8221;​<br />
पर जब वी पी सिंह राजीव के खिलाफ खड़े हुए तो नये नारे गढ़े गए​:<br />
​&#8221;​राजा नहीं फकीर है​ -​ देश की तकदीर है​&#8221;​<br />
इसके जवाब में कांग्रेस ने नया नारा बना लिया​:<br />
​&#8221;​फकीर नहीं राजा है, सीआईए का बाजा है​&#8221;<br />
इसके बाद 80 और 90 के दशक में देश में राजन्मभूमि विवाद ने तूल पकड़ ​लिया। हर बात में हिंदुत्व खींच लाया ​जाता  और अधिकांश नारे हिन्दू &#8211; ​हिंदुत्व को लेकर गढ़े जाने लगे:<br />
​&#8221;आपका वोट राम के नाम​&#8221;<br />
​&#8221;​सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे​&#8221;<br />
​&#8221;​कल्याण सिंह कल्याण करो मंदिर का निर्माण करो​​<br />
​&#8221;​राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे​&#8221;​<br />
​&#8221;​ये तो केवल झांकी है, काशी मथुरा बाकी है​&#8221;​<br />
और उसी के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को देश का सबसे बड़ा नेता साबित करने की जुगत में ये नारा दिया गया, जो कि सफल भी हुआ​:<br />
​&#8221;सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी​&#8221;​<br />
इसके बाद जब सत्ता में वापस लौटना हुआ तो भाजपा ने नया नारा दिया-<br />
​&#8221;​कहो दिल से, अटल फिर से​&#8221;<br />
&#8220;इंडिया शाइनिंग​&#8221; ​<br />
पर ये नारे चले नहीं. क्योंकि कांग्रेस ने नई चीज खोज ली ​थी। महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त जनता को ये चीजें लुभा ​गईं :<br />
​&#8221;कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ​&#8221;​<br />
&#8220;कांग्रेस को लाना है देश को बचाना है​&#8221;​<br />
​&#8221;उठे हजारों हाथ सोनिया जी के साथ​&#8221;<br />
&#8220;सोनिया नहीं ये आंधी है, दूसरी इंदिरा गांधी है​&#8221;<br />
​ये नारे कांग्रेस ने 2014 के चुनाव में भी इस्तेमाल किए, पर चले ​नहीं।<br />
&#8220;कट्टर सोच नहीं, युवा जोश&#8221;<br />
&#8220;हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्‍की&#8221;<br />
&#8220;जनता कहेगी दिल से, कांग्रेस फिर से&#8221;<br />
जवाब में ये नारे भी बनाये गये थे​:<br />
​&#8221;​सोनिया जिसकी मम्मी है वो सरकार निकम्मी है​&#8221;<br />
​&#8221;देखो देखो कौन आया, हिंदुस्तान का शेर आया​&#8221;​<br />
&#8220;अबकी बार मोदी सरकार​&#8221;​ </p>
<p>​अब २०१९ का चुनाब दस्तक दे रहा है और देखना है कि भारत की जनता सही में अपना वर्तमान सोच बदलकर बदलाव लाती है या फिर&#8230;&#8230;.. जो भी हो चुनाब तो निर्णायक होगा ही। (​मुकुल श्रीवास्तव​ और लल्लनटॉप के सहयोग से)​</p>
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