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	<title>singh Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>चाहे राजनीति हो, समाजनीति हो, संस्कृत हो, कला हो, पत्रकारिता हो, प्रशासन हो, मानवीयता हो ✍ कुमार गंगानंद सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था 🙏 (भाग &#8211; 6)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-personality-of-kumar-ganganand-singh-was-multifaceted</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Oct 2022 04:40:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[adityanath jha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / पटना : सत्तर के दशक के मध्य से अस्सी के दशक के उत्तरार्ध तक, जब तक पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त-इण्डियन नेशन&#8217; पत्र समूह में कार्य करता था, शायद ही कोई दिन ऐसा रहा होगा तब तत्कालीन सम्पादकों &#8211; दीनानाथ झा, हीरानंद झा &#8216;शास्त्री, परमानन्दन &#8216;शास्त्री&#8217;, रामजी मिश्र &#8216;मनोहर&#8217;, &#8216;काशीकांत झा, भाग्य नारायण झा, [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-personality-of-kumar-ganganand-singh-was-multifaceted">चाहे राजनीति हो, समाजनीति हो, संस्कृत हो, कला हो, पत्रकारिता हो, प्रशासन हो, मानवीयता हो ✍ कुमार गंगानंद सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था 🙏 (भाग &#8211; 6)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / पटना : सत्तर के दशक के मध्य से अस्सी के दशक के उत्तरार्ध तक, जब तक पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त-इण्डियन नेशन&#8217; पत्र समूह में कार्य करता था, शायद ही कोई दिन ऐसा रहा होगा तब तत्कालीन सम्पादकों &#8211; दीनानाथ झा, हीरानंद झा &#8216;शास्त्री, परमानन्दन &#8216;शास्त्री&#8217;, रामजी मिश्र &#8216;मनोहर&#8217;, &#8216;काशीकांत झा, भाग्य नारायण झा, सीता शरण झा, ज्वालानंदन सिंह, कृष्णानंद झा, गजेंद्र नारायण चौधरी आदि और सम्पादकीय विभाग के शीर्षस्थ पत्रकारों के मुख से दो व्यक्तियों का नाम नहीं सुनते थे। </p>
<p>एक: कुमार गंगानन्द सिंह और दो: सुरेंद्र झा &#8216;सुमन&#8217;</strong> । </p>
<p>सत्तर के दशक में जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में &#8216;इंदिरा हटाओ &#8211; कांग्रेस हटाओं &#8211; गाय बछड़ा भगाओ &#8211; का नारा बुलंद हो रहा था, दरभंगा संसदीय क्षेत्र से कट्टर कांग्रेसी&#8217;, जो बाद में &#8216;जनसंघी&#8217; हो गए, शिक्षक से पत्रकार हो गए, पत्रकार से फिर नेता, छठे लोक सभा में मिथिला के लोगों का नेतृत्व करने दरभंगा लोक सभा क्षेत्र से दिल्ली के लोक सभा में पहुंचें। उन दिनों अख़बार के पन्नों पर शायद ही कोई दिवस ऐसा रहता होगा, जब &#8216;सुरेंद्र झा &#8216;सुमन&#8217; के बारे में, उनकी उक्तियाँ, उनकी छवि प्रकाशित नहीं होती थी। एक तो मैथिली साहित्य के हस्ताक्षर थे, दूसरे दरभंगा राज घराने से बेपनाह मजबूत सम्बन्ध रखते थे। </p>
<figure id="attachment_4573" aria-describedby="caption-attachment-4573" style="width: 1579px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3.png"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3.png" alt="" width="1579" height="1077" class="size-full wp-image-4573" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3.png 1579w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3-300x205.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3-1024x698.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3-768x524.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3-1536x1048.png 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-3-218x150.png 218w" sizes="(max-width: 1579px) 100vw, 1579px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4573" class="wp-caption-text">कुमार गंगानन्द सिंह एक कार्यक्रम में</figcaption></figure>
<p>सुरेंद्र झा &#8216;सुमन&#8217; को दिल्ली के लाल कोठी और दरभंगा के लाल किला से जब भी समय मिलता था, पटना के मजहरुल पथ, यानी फ़्रेज़र रोड में केंद्रीय कारा के सामने ऐतिहासिक &#8216;दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड&#8217;, जो &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;द इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;मिथिला मिहिर&#8217; का प्रकाशक भी था; के प्रवेश द्वार से दूध जैसा सफ़ेद धोती, कुर्ता, पहले, कंधे पर द्वितीय-वस्त्र रखे, पैर में काले रंग का हाफ़ जूता, कभी-कभार हाथ में छाता लिए प्रवेश लेते थे। उनके प्रवेश के साथ ही, दफ्तर के अहाते में उनके गाँव, मोहल्ले के लोगबाग &#8216;आपका दर्शनाभिलाषी&#8217; होने के लिए दोनों तरफ के भवनों के बरामदों पर एकत्रित दिखाई भी देते थे। &#8220;सुमन जी&#8221; आये हैं, &#8220;दरभंगा के सांसद हैं&#8221;, बहुत &#8216;विद्वान हैं&#8217;, &#8216;मैथिली साहित्य के हस्ताक्षर&#8217; हैं &#8230;.. आदि-आदि बातें सुनने को मिलता था। मैं उन दिनों प्रूफ-रीडर-अनुवादक के पद पर कार्य करता था और &#8216;द इण्डियन नेशन&#8217; के सम्पादकीय विभाग में मन-ही-मन एक बेहतर पत्रकार बनने का जीवंत-स्वप्न देख रहा था। </p>
<p>&#8216;सुमन जी&#8217; पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरे गुरुदेव दुर्गानाथ झा (अब दिवंगत) को बहुत स्नेह करते थे। दुर्गानाथ जी &#8216;द इण्डियन नेशन&#8217; अख़बार के बेहतरीन संवाददाता थे और वे दरभंगा के सी.एम. कालेज में पहले अंग्रेजी विभाग के और बाद में स्नातकोत्तर मैथिली विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर रमानाथ झा के पुत्र थे । &#8216;सुमन जी&#8217; और रमानाथ बाबू की मित्रता उत्कर्ष पर थी। वे शिक्षक थे, लेखक थे, पत्रकार थे, राजनेता थे, मिथिला मिहिर के मुख्य संपादक भी थे, भारत छोडो आंदोलन के दौरान &#8216;स्वदेश&#8217; मासिक पत्रिका में, फिर दैनिक स्वदेश में, वैदेही में पत्रकारिता में भी अपना योगदान दिए थे । </p>
<p><strong>ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में मैथिली विभाग में &#8216;रीडर&#8217; और विभागाध्यक्ष थे। बिहार राज्य साहित्यकार-कलाकार कल्याण समिति के सदस्य थे। विभिन्न विश्वविद्यालयों में &#8216;परीक्षा और पाठ्यक्रम समिति के सदस्य थे। मैथिली अकादमी, साहित्य अकादमी के कार्यकारी सदस्य थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दरभंगा जिला संचालक थे। बिहार विधान परिषद्स के सदस्य थे .. न जाने क्या क्या थे। यह बात इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ कि बनैली राज पर लिखने के क्रम में जब श्रीनगर ड्योढ़ी के कुमार गंगानंद सिंह की चर्चा हुई, तो सुरेंद्र झा &#8216;सुमन&#8217; की लेखनी को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।</strong> </p>
<figure id="attachment_4574" aria-describedby="caption-attachment-4574" style="width: 1445px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-4.png"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-4.png" alt="" width="1445" height="935" class="size-full wp-image-4574" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-4.png 1445w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-4-300x194.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-4-1024x663.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-4-768x497.png 768w" sizes="(max-width: 1445px) 100vw, 1445px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4574" class="wp-caption-text">रंग, गुलाल, होली, हारमोनियम और कुमार गंगानन्द सिंह</figcaption></figure>
<p>वजह यह है कि 1987 में उन्हें साहित्य अकादमी की मैथिली परामर्श समिति द्वारा मैथिली साहित्य के उन्नेता-प्रणेता के रूप में कुमार गंगानंद सिंह के जीवन परिचय पर एक पुस्तक प्रस्तुत करने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे वे गृहीत किये। उनके निकटस्थ होने के कारण यह दायित्व उन्हें सौंपा गया। अपनी &#8216;लेखकीय&#8217; में उन्होंने जिक्र किया है कि &#8216;तत्काल स्वीकार तो कर लिया लेकिन जब लिखने की मनःस्थिति में आया तब चरित्र नायक के व्यक्तित्व-कृतित्व की व्यापकता देख सांख्यकारिका के कथनानुसार &#8216;अतिदुरात सामीप्यात&#8217; अर्थात जिस तरह दूर-दराज रहने से बस्तु-बोध बाधित होता है, उसी तरह अत्यंत निकट होने पर भी प्राकृत निरूपण जटिल हो जाता है। क्या कहें, कितना कहें कितना छोड़ जाए, कितना जोड़ा जाए इसका निश्चय करने में मन द्विविधाग्रस्त (इतस्तत) हो शिथिल रहा।&#8221;</p>
<p>सुरेंद्र जी आगे कहते हैं: &#8220;दूसरी कठिनाई यह थी कि कुमार गंगानंद सिंह का व्यक्तित्व इतना बहुआयामी &#8211; राजनीति, समाजनीति, संस्कृत-कला, पत्रकारिता एवं प्रशासन में विकीर्ण था कि कुछ समेटते, छाँटते, सहितोन्मुखी प्रवृति को अलग करने में मन उलझा (अपस्यांत) रहा। उनका कृतित्व कुछ इस तरह की विविधता से, विस्तार की जटिलता से बोझिल था कि उस सुलझाकर कहने में कम परेशानी नहीं थी। इसी उधेड़बुन में समय बीतता गया। जब भी परामर्श समिति की बैठक हो, अगली बैठक से पूर्व प्रस्तुत करने की प्रतिश्रुति करते हुए भी पीछे रहा। इसके बावजूद अकादमी के बारम्बार अनुरोध से सारी शिथिलता को श्थल कर लिखने को विवश किया।&#8221;</p>
<p>&#8216;सुमन जी&#8217; के अनुसार: &#8220;कुमार गंगानंद सिंह एक रोबदार व्यक्तित्व के धनी थे और परिचय के बिना भी उन्हें एक प्रज्ञासम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में दूर से ही पहचाना जा सकता था। राज नेताओं से घिरे होने के बावजूद उनकी साहित्यिक छवि तथा अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए भी वे सामान्य समाज के लिए निरंतर आत्मीय बने रहे। वे एक बहुआयामी प्रतिभा संपन्न एवं दूर-दृष्टि कृति व्यक्तित्व थे। शिक्षा, राजनीति, समाज शास्त्र और भाषा विज्ञान के क्षेत्र में उनकी सेवाओं को सदैव याद किया जाता रहा है। मिथिला तथा मैथिली का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहाँ उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की छाप नहीं पड़ी हो। बिहार के अभिजात वर्ग के अंतिम प्रतिमान के रूप में विख्यात कुमार साहेब के बारे में यह मिथक प्रचलित रहा कि उन्होंने जो कुछ लिखा वह साहित्यिक थाती बन गई। साथ ही, यह धरना भी व्यक्त की जाती रही कि विभिन्न क्षेत्रों में उन जैसी लोकप्रियता देश के कम ही लोगों को प्राप्त हुई है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4575" aria-describedby="caption-attachment-4575" style="width: 1627px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2.png"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2.png" alt="" width="1627" height="1111" class="size-full wp-image-4575" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2.png 1627w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2-300x205.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2-1024x699.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2-768x524.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2-1536x1049.png 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-2-218x150.png 218w" sizes="(max-width: 1627px) 100vw, 1627px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4575" class="wp-caption-text">कुमार गंगानन्द सिंह एक कार्यक्रम में</figcaption></figure>
<p>बहरहाल,<strong> बनैली राज के गिरिजानन्द सिंह जी के अनुसार,</strong> राजा कमलानन्द सिंह के बड़े पुत्र कुमार गंगानंद सिंह का जन्म 24 सितम्बर, 1898 को हुआ। परिवार की बिगड़ती आर्थिक दशा देखकर कुमार साहब ने दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के सचिव का पद ग्रहण करना स्वीकार किया। सं 1923 में कुमार गंगानंद सिंह ने राजनैतिक क्षेत्र में प्रवेश किये । उस समय वे भारतीय-व्यवस्था-सभा में पूर्णियां, भागलपुर और संथाल परगना के प्रतिनिधि सदस्य के रुप में चुने गये। सन 1928 ई0 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस के मंत्री पद पर चुने गये। सन 1939-1941 के बीच हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। बाद में, 1954 ई0 में वे बिहार विधान परिषद के नामांकित सदस्य बने और 1960 ई0 में एम0 एल0 ए0 के रुप में प्रतिष्ठित हुए। 1962 ई0 में वे बिहार के शिक्षा मंत्री बने।&#8221;</p>
<p>गिरिजानंद सिंह कहते हैं : &#8220;अपने चाचा कुमार कालिकानंद सिंह, राजा कीर्त्यानंद  सिंह और मालद्वार के राजा टंकनाथ चौधरी के साथ मिलकर उन्होंने जिस प्रकार कलकत्ता विश्वविद्यालय में मैथिली भाषा की पढाई आरम्भ करवायी और उसका पोषण किया वह सदैव अविस्मरणीय रहेगा। श्रीनगर का बुनियादी विद्यालय जो बाद में उच्च विद्यालय में परिणत हुआ और संस्कृत विद्यालय कुमार गंगानंद सिंह की देन है। </p>
<p><strong>कुमार गंगानंद सिंह विशेषकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा के लिये जाने जाते हैं। हिन्दी में उनके द्वारा लिखित &#8216;युकिलिप्टस&#8217;, &#8216;द्वितीय भोज&#8217;, साहित्य सरोज कवि कुलचंद्र श्रीनगर राज्याधिपति राजा कमलानंद सिंह, भारतेन्दु स्मृति, महाराजाधिराज के साथ, बाल्मीकि का अपने काव्य में आत्मप्रकाश और विद्यापति के काव्य का &#8216;भक्तिपक्ष&#8217; नामक आलेख प्रसिद्ध हुए। मैथिली में उनकी निम्नलिखित रचनायें हैंः  जीवन संघर्ष, आमक गाछी, पंच परमेश्वर, पंडित पुत्र, मनुष्यक मोल, बिहाड़ि, विवाह, अगिलहि, आह्वान, निबन्धक प्रगति, मैथिली साहित्यक विकास, राष्ट्रीय एकताक महत्व और सतरहम ओ अठारहम शताब्दीक मैथिली नाटक।</strong></p>
<figure id="attachment_4577" aria-describedby="caption-attachment-4577" style="width: 650px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/3588acad-7cf6-4030-9c1a-e6463b55273b-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/3588acad-7cf6-4030-9c1a-e6463b55273b-1.jpg" alt="" width="650" height="676" class="size-full wp-image-4577" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/3588acad-7cf6-4030-9c1a-e6463b55273b-1.jpg 650w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/3588acad-7cf6-4030-9c1a-e6463b55273b-1-288x300.jpg 288w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/3588acad-7cf6-4030-9c1a-e6463b55273b-1-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4577" class="wp-caption-text">गिरिजानंद सिंह</figcaption></figure>
<p>गिरिजानंद सिंह कहते हैं कि कुमार गंगानंद सिंह सन 1966 ई0 में दरभंगा के कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति बने। परन्तु इस कालखंड के महज चार साल बाद, जान गणतंत्र भारत अपने गणतंत्र की स्थापना का 20-वर्ष मनाने वाला था, कुमार गंगानंद सिंह १७ जनवरी, 1970 को अंतिम सांस ले लिए। </p>
<p>गिरिजानंद सिंह के अनुसार, राजा वेदानंद सिंह कुमार रुद्रानंद सिंह और राजा वेदानंद सिंह के आपसी बंटवारे के बाद रुद्रानंद सिंह अपने पिता की बनैली-ड्योढ़ी में ही रहते रहे। उनकी मृत्यु के कुछ दिनों के  बाद ही बनैली बाढ़ ग्रसित हुआ और उसके पश्चात् भयंकर महामारी फैली जिसके फलस्वरूप रुद्रानंद सिंह के एकमात्र बेटे श्रीनंद सिंह को बनैली छोड़कर एक नए  स्थान पर जाना पड़ा जिसका नाम श्रीनगर रखा गया। बनैली घराने की यह शाखा श्रीनगर राज कहलायी।</p>
<p>गिरिजानंद जी कहते हैं कि &#8220;1880 ई0 में 34 वर्ष की अल्पायु में ही श्रीनंद सिंह की मृत्यु हो गयी। जिस समय उनकी मृत्यु हुई, उनके इस्टेट की वार्षिक आय 2 लाख 68 हजार थी। श्रीनंद सिंह के तीन पुत्र हुए, नित्यानंद सिंह, कमलानंद सिंह और कलिकानन्द सिंह । आपसी अनबन के कारण कुमार नित्यानंद सिंह अपना हिस्सा लेकर दोनों सौतेले भाइयों से अलग हो गए और बगल के गाँव तारा नगर में उन्होंने अपनी ड्योढ़ी बनायी। वे अत्यधिक खर्च करने लगे और गले तक कर्ज में डूब गये। अंत में उनका इस्टेट नीलामी के कगार पर पहुँच गया। शुरु में कुमार कमलानंद सिंह और कुमार कालिकानंद सिंह  का इस्टेट कोर्ट ऑफ़  वार्डस के अधीन था और दोनों कुमारों के बालिग होने पर जब इस्टेट, कोर्ट से मुक्त हुआ तब उसकी आर्थिक हालत काफी अच्छी थी। लेकिन कमलानंद सिंह बड़े खर्चीले स्वभाव के थे । अपने मैनेजर मिस्टर वेदरॉल  के मना करने के बावजूद उन्होंने 1900-01 ई0 में दरभंगा राज्य से 3.5 लाख का कर्ज लिया।</p>
<figure id="attachment_4576" aria-describedby="caption-attachment-4576" style="width: 1371px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7.jpg" alt="" width="1371" height="1550" class="size-full wp-image-4576" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7.jpg 1371w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7-265x300.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7-906x1024.jpg 906w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7-768x868.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Ganga-7-1359x1536.jpg 1359w" sizes="auto, (max-width: 1371px) 100vw, 1371px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4576" class="wp-caption-text">कुमार गंगानन्द सिंह</figcaption></figure>
<p><strong>कहते हैं, इतना ही नहीं, यह जानते हुए कि कर्जे से लदा हुआ नित्यानंद सिंह का इस्टेट निलामी के कगार पर खड़ा था, कुमार कमलानंद सिंह और कालिकानंद सिंह ने कर्ज सहित वह इस्टेट खरीद लिया और उक्त इस्टेट खरीदने के लिए इन लोगों ने राज बनैली से और कर्ज ले लिया। बाद में मुंगेर के राजा रघुनंदन प्रसाद सिंह से भी एक बड़ी रकम कर्ज में ली गयी। इस प्रकार कर्जो का एक सिलसिला चला जो अंततः श्रीनगर इस्टेट के लिए घातक सिद्ध हुआ।</strong> </p>
<p>राजा कमलानंद सिंह हिन्दी के प्रख्यात लेखक और कवि थे। राजा कमलानंद सिंह और उनके अनुज कुंवर कालिकानंद सिंह के दरबार में तत्कालीन युग के लगभग सभी कवियों और लेखकों को संरक्षण और अर्थाश्रय प्राप्त था । उनकी रचनाओं में प्रमुख हैः  व्यास शोक प्रकाश, दुष्यन्त के प्रति शकुन्तला का प्रेमपत्र, आलोचक और आलोचना, महामहोपाध्याय  कविवर विद्यापति ठाकुर, वीरांगना काव्य, वोट पचीसी, एडवर्ड बतीसी और हैजा स्तोत्र। </p>
<p>कहते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य काल में उन्होंने एक जमींदार होने के बावजूद बंकिमचन्द्र के क्रांतिकारी उपन्यास आनंद-मठ का हिंदी में अनुवाद किया था।  कानपुर की रसिक कवि सभा ने इन्हें साहित्य-सरोज की उपाधि दी थी।  कुमार कालिकानंद सिंह ने, निलामी के कगार पर खड़े अपने इस्टेट को अपने अथक प्रयास से अधिक समय तक बचाकर रखने की कोशिश की। 1930 ई0 में कुमार कालिकानंद सिंह की मृत्यु हो गयी।</p>
<p><strong>क्रमशः</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-personality-of-kumar-ganganand-singh-was-multifaceted">चाहे राजनीति हो, समाजनीति हो, संस्कृत हो, कला हो, पत्रकारिता हो, प्रशासन हो, मानवीयता हो ✍ कुमार गंगानंद सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था 🙏 (भाग &#8211; 6)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>रामबाग परिसर में रहने वाली आज की पीढ़ी तो फोन भी नहीं उठाते, सुभाष चंद्र बोस के लिए लिखित इस पत्र की अहमियत को क्या समझेगी ?</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/book/people-of-mithila-ignores-maharaja-of-darbhanga</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Jan 2022 07:10:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / दिल्ली : जल्लियांवाला बाग़ निर्मम हत्याकांड का अभी 19-वर्ष हुआ था। साल था सन 1938 और देश में बिहार और बंगाल के नेताओं के बीच कमर-कस उठापटक हो रहा था। बंगाल के अग्रणी नेता थे सुभाष चंद्र बोस। सुभाष बोस को बिहार के नेताओं के साथ ठन गई थी। दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / दिल्ली : जल्लियांवाला बाग़ निर्मम हत्याकांड का अभी 19-वर्ष हुआ था। साल था सन 1938 और देश में बिहार और बंगाल के नेताओं के बीच कमर-कस उठापटक हो रहा था। बंगाल के अग्रणी नेता थे सुभाष चंद्र बोस। सुभाष बोस को बिहार के नेताओं के साथ ठन गई थी। दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के अतिरिक्त भारतवर्ष में कोई भी दूसरा महात्मन नहीं था, जो बिहार के नेताओं और सुभाष बोस के बीच मध्यस्थता कर दोनों के चेहरों पर मुस्कान ला सकें। महाराजा डॉ सर कामेश्वर सिंह अपने पिता महाराजा रामेश्वर सिंह और चाचा महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह से संवेदनशील होने, बने रहने का वह सभी पाठ पढ़े थे, जो तत्कालीन भारतीय समाज, बिहार के समाज और मिथिला के समाज के उन्नयन के लिए आवश्यक था। खैर&#8230;. आज की पीढ़ी के लिए यह बात महत्वहीन है।</strong> </p>
<p>उधर, भारतीय राजनीतिक मानचित्र पर आज़ादी हासिल करने के लिए इन्किलाब-जिंदाबाद के नारे बुलंद हो रहे थे। तभी कलकत्ता के श्री एच एन गुहा रे को एक बात सूझी &#8211; क्यों न महाराजाधिराज दरभंगा को बिहार के नेताओं और सुभाष बोस के बीच की खाई को समतल करने के लिए लाया जाए क्योंकि उनके अलावे दूसरा कोई विकल्प नहीं था। उन दिनों बिहार का नेता का वास्तविक अर्थ &#8216;देश का नेता&#8221; होना होता था। आज जैसी स्थिति नहीं थी की सभी बिहारी नेता अपना-अपना मुंह फाड़े दिल्ली की ओर देखते रहें। जो दिल्ली उवाचेगी, वही मान्य होगा। अपनी सोच, समाज और राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य बोध को पटना के गांधी मैदान में नीलाम कर, सामाजिक सरोकार को तिलांजलि देकर, स्वहित में कारोबार करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो आज बिहार का हश्र भी ऐसा नहीं होता। अभी क्या हुआ है, धीरज रखें &#8211; आने वाला समय बदतर होने वाला है।     </p>
<p>उस दिन बैसाख का अंतिम दिन था। श्री एच एन गुहा रे दिनांक 14 अप्रैल, 1938 को दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह को एक पत्र लिखे। पत्र में लिखा था: </p>
<p><strong>&#8220;Your Highness,</p>
<p>My respectful Pronam to your Highness on the last day of Baishakh which falls on to-day. I pray to God for your Highness &#8216;long, healthy and peaceful life.&#8217;</p>
<p>I saw Boses &#8211; they have already spoken about the compromise to Behar leaders. Mr. Sarat Bose, who will proceed to Darjeeling for some time, asked me to get a copy of the terms of Compromise so that he may send me, with a letter of introduction to Behar leaders &#8211; if you approve of it kindly instruct.Awaiting the pleasure of hearing from you soon.</p>
<p>I remain,<br />
Your Highness&#8217;<br />
Most obedient servant&#8221;</strong><br />
   <br />
महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह को मृत्यु को प्राप्त किये महज 60 वर्ष हो रहे हैं। उन्होंने अपने पिता-चाचा से जो संवेदनशीलता, विश्वसनीयता का सबक सीखा, जिसके कारण सुभाष बोस जैसा परिवार निर्णय लेने में महाराजा के विचारों को महत्व दिया, उनके निर्णय को स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं किया &#8211; क्या &#8216;संतानहीन&#8217; महाराजाधिराज की अगली पीढ़ियां ऐसे सम्मान को स्वप्न में भी देख सकते हैं? शायद नहीं। मिथिला के लोगों की तो बात ही छोड़ें। आज का रामबाग परिसर चतुर्दिक चाटुकारों, चमचों, स्वार्थियों से घिरा है और उस &#8216;सिमटते परिसर&#8217; में रहने वाले लोग क्या इस पत्र की अहमियत को समझ पाएंगे? शायद नहीं। अगर समझते तो आज दरभंगा ही नहीं, बिहार ही नहीं, भारत की राजधानी दिल्ली में दरभंगा राज का यह हश्र नहीं होता। अगर समझते तो आज दिल्ली में महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा रामेश्वर सिंह, महाराजा डॉ सर कामेश्वर सिंह की प्रतिमा भी दिखाई देती । </p>
<p>उन दिन 11 अप्रैल था। शायद सं 1942 का साल रहा होगा। उस दिन दिवाकर प्रातः पांच बजकर 45 मिनट पर ब्रह्माण्ड को प्रकाशित किये थे। उसी ब्रह्माण्ड में दरभंगा भी था। कोई 13 घंटा 15 मिनट आकाश में बने रहने के बाद 6 बजकर 15 मिनट में अस्ताचल की ओर उन्मुख हुए थे सूर्यदेव । वह दिन दरभंगा राज और महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के लिए ऐतिहासिक था। नेताजी सुभाष बोस के परिवार का दरभंगा के महाराजा के प्रति सम्मान और विश्वास अपने उत्कर्ष पर था क्योंकि &#8220;श्री सुभाष चंद्र बोस के परिवार के सदस्यगण दरभंगा आये थे, महाराजाधिराज से मिलने। </p>
<p><strong>यह बात मैं नहीं, दस्तावेज कहता है। महाराजाधिराज की बड़ी पत्नी अपनी डायरी में इस बात का जिक्र की हैं। महारानी अपने जीवन के अंतिम समय तक अपने दिन चर्चा के बारे में लिखती थी। खैर, इस डायरी में लिखे शब्दों के महत्व को दरभंगा राज की आज की पीढ़ी नहीं समझेगी &#8211; अगर समझती तो आज महाराजाओं की कीर्तियों को, भारत के समाज में उनकी गाथाओं को, दरभंगा राज की गरिमा को दरभंगा के रामबाग पैलेस से दूर-बहुत दूर तक शिलालेख पर उद्धृत कर गौरवान्वित करते होते । </strong></p>
<p>लेकिन यहाँ तो सब कुछ विपरीत हैं &#8211; जो न केवल दरभंगा राज को, बल्कि मिथिला के समाज को शर्मसार करती हैं। महाराजा तीन विवाह किये थे। बड़ी महारानी राज्यलक्ष्मी, जिन्होंने सुभाष बाबू के परिवार का दरभंगा आने का जिक्र किया, उनकी मृत्यु महाराजा की मृत्यु के बाद हुई। महाराजा की दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया महाराजा के जीवन काल में ही मृत्यु को प्राप्त की। तीसरी पत्नी महारानी कामसुन्दरी आज भी जीवित हैं। </p>
<p>बहरहाल, विगत कुछ दिनों से दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, उनके अनुज महाराजा रामेश्वर सिंह, उनके पुत्र महाराजा कामेश्वर सिंह का भारतीय राजनीतिक, शैक्षिक, आर्थिक, धार्मिक इत्यादि क्षेत्रों में योगदान की बातों को आधुनिक भारत के सामाजिक क्षेत्र के संवाद-सूत्र के मसीहा, आजकल उन्हें वैज्ञानिक अधिष्ठाता भी कहा जा रहा है; जो समाज से &#8216;भ्रम&#8217; से &#8216;आक्रांत&#8217; तक, &#8216;ज्ञान&#8217; से &#8216;विज्ञान&#8217; तक, &#8216;निर्माण&#8217; से &#8216;विनाश&#8217; तक, जनजागरण&#8217; से &#8216;त्रादसी&#8217; तक की बातें ऊँगली पर प्रचारित-प्रसारित करते हैं &#8211; बांट रहे हैं। </p>
<figure id="attachment_3741" aria-describedby="caption-attachment-3741" style="width: 1220px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha.jpg" alt="" width="1220" height="1600" class="size-full wp-image-3741" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha.jpg 1220w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha-229x300.jpg 229w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha-781x1024.jpg 781w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha-768x1007.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/Letter-Guha-1171x1536.jpg 1171w" sizes="auto, (max-width: 1220px) 100vw, 1220px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3741" class="wp-caption-text">श्री एच एन गुहा रे दिनांक 14 अप्रैल, 1938 को दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह को एक पत्र लिखे</figcaption></figure>
<p>मैं दरभंगा महाराज के वर्तमान पीढ़ियों जैसा मानसिक स्थिति नहीं रखता &#8211; आप चाहे फ़ोन की कितनी भी घंटियां टनटना दें, सैकड़ों, हज़ारों, लाखों संवाद लिख दें, आपको उत्तर नहीं मिलेगा। स्मार्ट शहर में रहने वाला व्यक्ति, यहाँ तक कि देश की राजधानी में दरभंगा राज के अधिष्ठाता (वैसे अकबर रोड के दरभंगा लें में स्थित दरभंगा हॉउस अब दरभंगा का नहीं रहा, बेच दिया गया) के रूप में स्वयं को स्थापित भले महसूस करते हों, एपल जैसे स्मार्ट फोन का नया संस्करण हाथ में, जेब में, लिए, गर्दन में लटकाये भले घूमते हों; आप &#8216;स्मार्ट मानसिकता धारक&#8217; हों, यह आवश्यक नहीं है। </p>
<p>वैसी स्थिति में  दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, उनके अनुज महाराजा रामेश्वर सिंह, उनके पुत्र महाराजा कामेश्वर सिंह अपने जीवन काल में क्या किये, क्या नहीं किये, इन बातों पर वे क्यों ध्यान दें। अगर उतने सचेतक होते तो आज दरभंगा राज का यह हश्र नहीं होता।  यहाँ तक कि वे सभी तो दरभंगा राज में महाराजा के परिवार के लोग भी (उनके भी सम्बन्धी हैं) भी अगर मृत्यु को प्राप्त करते हैं तो उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता &#8211; क्योंकि स्थानीय अख़बारों में, स्थानीय यूट्यूब चैनलों के माध्यम से यह घोषणा कर दिया जाता है कि &#8220;साहब अभी दरभंगा राज, मिथिला की संस्कृति को पुनः स्थापित करने, बरकरार रखने की योजनाओं का अध्ययन कर रहे हैं। </p>
<p>वैसी स्थिति में स्वाभाविक हैं मैं अपने मोबाईल पर जैसे ही ट्रिंग-ट्रिंग होता है, फोन उठाता हूँ, जी भरकर बतियाता हूँ।  संवाद पेटी में आये शब्दों को पढता हूँ। समझने की कोशिश करता हूँ। आखिर जिस महाशय ने मुझे संवाद प्रेषित किये हैं, फोन की घंटी टनटनाये हैं, मुझे उस काबिल अवश्य समझे होंगे। &#8220;सम्मान&#8221; पर सबों का समान अधिकार है &#8211; चाहे मजदूर हो या महाराजा। लेकिन इस बात को वही समझ सकता हैं जो &#8220;सम्मान&#8221; का वास्तविक और व्यावहारिक अर्थ समझता हो। मैं तो समझता हूँ। अब अगर सामने वाला उस योग्य नहीं है तो मैं कुछ कर भी नहीं सकता। अतः, इसे मेरी राय अथवा ज्ञान देना नहीं समझें; याचना अवश्य समझें कि अगर आपके फोन की घंटी टनटनाये तो &#8220;हेलो&#8221; अवश्य कर दें। संवाद पेटी में कुछ शब्द टपके तो उसे पढ़ अवश्य लें &#8211; क्या पता यह बताने के लिए कोई फोन कर रहा हों कि आपके माता-पिता, दादा-दादी, सगे-सम्बन्धी, परिजन ईश्वर को प्राप्त कर लिए। खैर।  </p>
<p><strong>विगत दिनों से सोसल मीडिया के इंटरनेट संस्करण पर कोई 403 शब्दों की कहानी निरंतर आगे प्रेषित हो रही है। इस 403 शब्दों में कोई 20 शब्द से अधिक नहीं, मूल लेखक द्वारा लिखा गया है, जो उस संवाद के जन्मदाता हैं। शेष शब्द भारतीय गूगल बाज़ार से काट कर अपने आँगन की शोभा बढाकर, अपने मोबाईल फोन में लिखित नम्बरों पर, जो &#8216;व्हाट्सएप&#8217; पर उपलब्ध हैं; उन्हें &#8216;टनाटन&#8221; बाँट रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे वे दरभंगा राज, वहां के महाराजाओं की कीर्तियों से वे कितने प्रभावित हैं, साथ ही, उन कीर्तियों को मिथिला के समाज में बरकरार रखने के लिए कितना सरोकार रखते हों। </strong></p>
<p>विगत कई महीनों से मेरे फोन में भी बिना समय को ध्यान में रखे &#8220;टनाटन&#8221; बजा रहे हैं। कट-पेस्ट का जमाना है और मूल लेखक भी कट-पेस्ट में सम्पूर्णता के साथ विश्वास रखकर बाँट रहे हैं। बांटने में यह अवश्य ध्यान रखा जाता होगा कि प्राप्त कर्ता मिथिलांचल का अवश्य हो। क्योंकि झज्झर के लोगों को दरभंगा महाराज से क्या लेना देना &#8211; वह भी बातें जब 1888 की हो, बाते 1916 की हो जब बनारस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, बातें 1917 की हो जब पटना विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, बातें 1920 की हो जब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, बातें 1946 की हो जब दरभंगा मेडिकल कालेज की स्थापना की गई। </p>
<p>व्हाट्सएप संवाद में इस बात का जिक्र अवश्य होता है कि दरभंगा के महाराजाओं ने यह किया, उन्होंने वह किया, वे फलनमा काम किए, वे ढिमकाना काम किये &#8211; लेकिन कांग्रेस पार्टी यह नहीं कि, फलाना नेता वह नहीं किये &#8211; आरोप-प्रत्यारोप से शब्दों का गजब का विन्यास करते हैं। भारत में कोई चार करोड़ मैथिली भाषा-भाषी हैं। दरभंगा के अंतिम महाराजा महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के अनुज के तीसरी पीढ़ी के भी वंशज उन्हीं मैथिली भाषा-भाषी लोगों में एक हैं, जो दरभंगा के रामबाग परिसर में चापलूसों, चाटुकारों, चमचों, जुहुजुरी करने वालों, गुमनाम हैं। </p>
<p>महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह तीन-तीन पत्नियों के होते हुए, &#8216;संतानहीन&#8217; मृत्यु को प्राप्त किये। उनके अनुज राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह की दो पत्नियों में तीन पुत्र हुए। सभी तीन पुत्र और उनकी पत्नियां अब इस संसार में नहीं हैं। पीढ़ियां आगे बढ़ गयी है। इसी तरह दरभंगा और मिथिला में भी लोगों के परिवारों की पीढ़ियां तीसरी-चौथी पीढ़ियों के रूप में समाज में विचरण कर रही है। अब सवाल यह है कि अगर हम अपने परिवार, अपने पुरखों की कीर्तियों को बरकरार रखने, उनकी बातों को आज की पीढ़ियों को बताने का समर्थ नहीं रखते, यह दुर्भाग्य है। खैर </p>
<p>जो संवाद व्हाट्सएप पर दौड़ रहा है, वह निम्न प्रकार है: &#8220;दरभंगा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थे। 1888 में कांग्रेस सत्र इलाहाबाद में होना था, अंग्रेजी सरकार ने निषेधा लगा दिया की किसी सार्वजनिक जगह पर कार्यक्रम नहीं हो सकता है। देशभर से कार्यकर्ता आने वाले थे, अब सार्वजनिक मैदान नहीं मिलेगा तो लोग कहां जुटेंगे, सब चिंतित थे। दरभंगा महाराज ने रातों रात इलाहाबाद का सबसे बड़ा महल खरीद लिया, अगले दिन उसी परिसर में कांग्रेस का भव्य  कार्यक्रम हुआ, कार्यक्रम के बाद महाराज ने वो महल कांग्रेस को ही दान कर दिया। आज महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह जी जन्मतिथि है। आज कांग्रेस नेतृत्व से एक ट्वीट नहीं हो पाया श्रद्धांजलि का।&#8221;</p>
<p>&#8220;श्रद्धांजलि तो BHU भी शायद ही कभी देता है महाराज रामेश्वर सिंह जी को। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के स्थापना में सब मदन मोहन मालवीय का नाम लेते हैं, लेकिन कोई नहीं बताता की दरभंगा महाराज यूनिवर्सिटी स्थापना के सबसे बड़े आर्थिक सहयोगी थे, उन्हीं के रिफरेंस से देशभर के महाराजाओ ने विश्वविद्यालय के लिए दान दिया। युनिवर्सिटी स्थापना के लिए जो हिंदू यूनिवर्सिटी सोसाइटी की स्थापना हुई थी उसके प्रेजिडेंट महाराज रामेश्वर सिंह ही थे। स्थापना के लिए फंड लक्ष्य था 1 करोड़ जुटाना, अकेले महाराज ने पहला डोनर बन 50 लाख रुपया एकमुश्त दिया।&#8221;</p>
<p>&#8220;शायद ही कभी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अपने स्थापना के सबसे बड़े गैर मुस्लिम डोनर महाराज दरभंगा को याद करता है। ना बिहार सरकार कभी याद करती है बिहार राज्य गठन आंदोलन के सबसे बड़े सहयोगी दरभंगा महाराज को। PMCH को आज सबसे बड़ा अस्पताल बनाने में लगी है सरकार, किंतु शायद ही किसी को पता हो की उसकी स्थापना में महाराज का क्या योगदान था। DMCH में एम्स बन रहा है, सोचिए तनिक की वो कैसा महाराजा रहा होगा जिसने 70 साल पहले अपने राजधानी के बीचों बीच 250 एकड़ परिसर में अस्पताल बनवाया था। वो कैसा महाराजा रहा होगा जिसके बनाए एयरपोर्ट्स दरभंगा और पूर्णिया में उस वक्त एक्टिव हवाई सेवा थी, आ वो कैसा महाराजा रहा होगा जिसके काल में रेलवे, बिजली जैसी चीजें दिल्ली के समकाल में दरभंगा आ गई थी। वो महाराज जो  हिंदी में आर्यावर्त, इंग्लिश में इंडियन नेशन और मैथिली में मिथिला मिहिर नाम से अखबार चलाता था। वो महाराज जिनके बनाए चीनी मिल, जुट मिल, सूत मिल, पेपर मिल आदि के बंद पड़े कारखानों से स्क्रैप बेचकर लोग करोड़पति हो गए। खैर मैं कांग्रेस, BHU, AMU आदि को क्या दोष दूं, जब खुद मैथिल याद नहीं करते। जन्मतिथि पर दरभंगा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह जी को नमन श्रद्धांजलि &#8221;</p>
<p>बस खुश हो जाइए। </p>
<figure id="attachment_3742" aria-describedby="caption-attachment-3742" style="width: 1126px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy.jpeg" alt="" width="1126" height="1059" class="size-full wp-image-3742" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy.jpeg 1126w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy-300x282.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy-1024x963.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy-768x722.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/01/rsz_1dairy-24x24.jpeg 24w" sizes="auto, (max-width: 1126px) 100vw, 1126px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3742" class="wp-caption-text">दरभंगा की बड़ी महारानी राजलक्ष्मी का दस्तावेज &#8211; सुभाष चंद्र बोस का परिवार आये थे</figcaption></figure>
<p><strong>दिल्ली सल्तनत में स्थित 98-वर्ष पुराना इस  ऐतिहासिक महल और परिसर पर “दरभंगा राज” का अंत हो गया है। जिस सल्तनत की बुनियाद 25/25 A दरभंगा हॉउस और परिसर तथा 7, मानसिंह रोड के रूप में दरभंगा के तत्कालीन महाराजा रामेश्वर सिंह सं 1923 में रखे थे; जिस बुनियाद को उनके पुत्र महाराज अधिराज सर कामेश्वर सिंह अपने शरीर को पार्थिव होने के पूर्व अंतिम सांस तक सीचें थे; दरभंगा राज का वह ऐतिहासिक इतिहास अब दरभंगा राज का नहीं, बल्कि भारत सरकार का हो गया । वह “ऐतिहासिक हस्ताक्षर” अब दिल्ली सल्तनत के 141 पुरातत्व भवनों और पुरातत्व परिसरों का एक हिस्सा हो गया है।</strong></p>
<p>Delhi, F. No. 4/2/2009/UD/l 6565 अधिसूचना के अनुसार दिल्ली के 141 पुरातत्व भवनों की सूची में 32वें स्थान पर 25/25A, दरभंगा हॉउस और परिसर तथा 7, मानसिंह रोड, नई दिल्ली का नाम लिखा था। लोगों से आपत्ति और विचार माँगा गया था। अब इन ऐतिहासिक धरोहरों पर भारत सरकार का आधिपत्य हो गया – ऑफिसियली। यह अलग बात है कि दरभंगा के “लाल किले” में रहने वालों से लेकर, दिल्ली के जंतर मंतर पर मिथिला राज्य बनाने हेतु मुद्दत से प्रयासरत मिथिला के लोग इस ऐतिहासिक भवन और परिसर पर महारानी अधिरानी काम सुंदरी का, दरभंगा राज का, आधिपत्य बना रहे, के लिए कभी “चूं” तक नहीं किये। </p>
<p>महरानीअधिरानी कामसुन्दरी की बड़ी बहन के पुत्र श्री उदय नाथ झा, जो जीवन पर्यन्त महारानी के साथ रहे और महारानी द्वारा स्थापित महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फॉउंडेशन के को-ट्रस्टी भी हैं, कहते हैं: “25/25A दरभंगा हाउस/कल्याणी निवास और 7, मानसिंह रोड स्थित भवन और परिसर भारत सरकार द्वारा पुरातत्व भवन / पुरातत्व परिसर के रूप में अधिग्रहण कर लिया गया है । मानसिंह रोड स्थित 7-नंबर भवन और परिसर पर भारत सरकार का पूर्व से ही अधिपत्य था। 25/25A दरभंगा हाउस/कल्याणी निवास से सभी वस्तुओं को हम सभी हटा लिए हैं। एक छोटे हिस्से में अभी ताला लगा हुआ है हमलोगों का, लेकिन सरकार को यह बता दिया गया है कि जिस दिन भी उसे हस्तगत करने का आदेश प्रेषित करेगी, तक्षण ताला खोलकर चावी उन्हें सौंप दिया जायेगा। हम सभी प्रतीक्षा में हैं।” </p>
<p>कोई 98-वर्ष पूर्व परतंत्र भारत (दिल्ली) के तत्कालीन चीफ़ कमिश्नर दिल्ली के साथ दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह के साथ सम्पन्न एक दस्तावेज के अनुसार : “This Indenture made ninth day of August, 1923 between the Secretary of State for India in Council, hereinafter called the Lessor of the one part, and The Hon’ble Bahadur Sir Rameshwar Singh, G.C.I.E, Maharaja of Darbhanga hereinafter called the Lessee of the other part.” दस्तावेज में आगे लिखा है: “Whereas under the instruction of the Government of India relating to the disposal of building sites in the New Capital the Chief Commissioner, Delhi has agreed on behalf of the Secretary of State to demise the plot of Nazul land hereinafter described to the Lessee in the manner hereinafter appearing.”</p>
<p>इन शब्दों को लिखते समय आखें अश्रुपूरित है। जिस इतिहास की रचना के लिए, मिथिलांचल के लोगों की गरिमा और प्रतिष्ठा को सातवें आसमान तक पहुँचाने में दरभंगा राज के 20 राजा-महाराजाओं ने अपनी-अपनी भूमिका निभाए; जिस दरभंगा राज की संस्कृति, गरिमा को परतंत्र भारत से स्वतंत्र भारत तक बेदाग़ बनाये रखने में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह, उनके अनुज महाराजा रामेश्वर सिंह, उनके पुत्र महाराज अधिराज सर कामेश्वर सिंह ने अहम भूमिका अदा किये; महाराजाधिराज की मृत्यु के 60 वर्ष आते-आते दरभंगा राज का 400+ वर्ष पुराना इतिहास नेश्तोनाबूद हो गया। 25/25A दरभंगा हाउस /कल्याणी निवास और 7, मानसिंह रोड भी उसी इतिहास का हिस्सा था। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि सन 1911 में तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाया । महाराजा रामेश्वर सिंह का रुतबा इतना बलिष्ठ था की वे सत्ता के पास हमेशा रहते थे और सत्ता उन्हें हमेशा अपने पास रखती थी । आज के परिपेक्ष में यदि देखा जाए तो दिल्ली में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का निवास स्थान जहाँ अवस्थित है, आज भी विभिन्न रूपों में स्थित है। परन्तु, दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के समय काल से प्रारम्भ होने वाली आधिपत्य ठीक सौवें साल आते-आते अपना अधिकार वाला आधिपत्य समाप्त कर दिया है। </p>
<p><strong>जब दिल्ली के 7, मानसिंह रोड और 25 अकबर रोड को देखते हैं, कलकत्ता के 42 चौरंगी (दरभंगा हॉउस) को देखते हैं, मुंबई के दरभंगा मैंशन को देखते हैं, या फिर मुंबई के ही दरभंगा हॉउस आयकर कॉलोनी को देखते हैं, रांची स्थित सेन्ट्रल कोलफील्ड लिमिटेड के मुख्यालय को देखते हैं, पटना विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग को देखते हैं, शिमला के कैथू में दरभंगा हॉउस को देखते हैं, बनारस में दरभंगा पैलेस को देखते हैं, इलाहाबाद में दरभंगा हॉउस और दरभंगा कैसल को देखते हैं या दार्जिलिंग में दरभंगा हॉउस को देखते हैं – तो अन्तःमन से उन तमाम जीवित अथवा पार्थिव लोगों को, अधिकारियों को धन्यवाद देते हैं जो आजतक “दरभंगा” शब्द को जीवित रखे हैं। </strong></p>
<p>क्योंकि असली दरभंगा में जो तत्कालीन दरभंगा राज की, दरभंगा हॉउस की, लाल कोठी की या फिर महाराजाओं के गौरवों से जुड़ी चल और अचल सम्पत्तियों का हाल है, उसे देखकर मिथिला का प्रत्येक नागरिक, चाहे शुद्धता के साथ मैथिली बोलता हो या तुतलाकर, महाराजा का नाम सुना हो अथवा नहीं, महाराजाधिराज और उनके पिता का नाम पढ़-लिख सकता हो अथवा नहीं – “अश्रुपूरित” अवश्य हो जाता है। यह बात उन लोगों पर लागू नहीं होता जो महाराजाधिराज के अंतिम वसीयत और फिर फैमिली सेटेलमेंट के बाद उनकी चल-अचल सम्पत्तियों के लाभार्थी बने।वजह यह है कि अगर वे भी “अश्रुपूरित” होते तो शायद दरभंगा राज का विनाश नहीं हुआ होता।   </p>
<p>उस दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 93वें जन्मदिन का जश्न देश अगले 24 घंटे में मनाने वाला था। पूरा राष्ट्र सत्य और अहिंसा की बात कर रहा था। महात्मा गांधी का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व स्वतंत्र भारत का बच्चा-बच्चा अपने सर पर उठा रखा था। “सबको सन्मति दे भगवान्” का नारा बुलंद हो रहा था। लेकिन, विभाजित भारत को मिले कुल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के अधीन, उत्तर बिहार के गंगा के उस पार, विद्यापति की नगरी में, राजा जनक की नगरी के एक कोने में स्थित दरभंगा जिले के नरगौना पैलेस के अंदर “किसी की तो सन्मति” मारी गयी थी। कोई तो “लोभ के जाल” में फंस गया था। कोई तो दरभंगा के अंतिम ‘संतानहीन’ राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की अंतिम सांस की प्रतीक्षा कर रहा था। कोई तो “मृत्यु का जाल” बिछा दिया था। </p>
<p>तभी तो 24 घंटे बीत भी नहीं पाए थे कि दरभंगा के नरगौना पैलेस स्थित शौचालय-स्नानागार के इस बाथटब में पांच फुट आठ+ इंच का महाराजा का शरीर पार्थिव मिला। खबर बिजली जैसी चतुर्दिक फैली। सबों की निगाहें एक-दूसरे के प्रति “शक” से उठी। कुछ बाएं देखें कुछ दाहिने। कुछ नजर से “ओझल” हुए, तो कुछ की नजरें “बोझिल” हुई। कुछ वहाँ उपस्थित थे। कुछ दौड़ कर वहां एकत्रित हुए। कुछ देखते-ही-देखते रफूचक्कर हो गए – परन्तु सभी अपने थे महाराजाधिराज के, लेकिन “उनके रक्त” नहीं थे । अपराधी बेख़ौफ़ वहीं रहा होगा। परंतु यह निर्जीव “बाथटब” बदनाम हो गया। आज तक अपनी बदनामी को “धो” नहीं पाया है। साठ वर्ष बीतने को आ गए और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन भी दरभंगा के साथ-साथ भारत के लोग 102 वां वर्ष मनाएंगे – परन्तु इस बाथटब को न्याय नहीं मिला अभी तक।</p>
<p><strong>दरभंगा के नरगौना पैलेस के शौचालय-स्नानागार में रखा यह “बाथ-टब” विगत उनसठ वर्षों से नित्य सुबह-शाम, सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक, दरभंगा राज के कुलदेवता से, राज-परिसर में स्थित देवी-देवताओं से, प्रदेश में आने-जाने वाले शीर्षस्थ राजनेताओं से, दर्जनों मुख्यमंत्रियों से, आला-अधिकारियों से, पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठे प्रधानमंत्रियों से करबद्ध प्रार्थना करते आ रहा है, कहता आ रहा है “एक निर्जीव प्राणी” की तरह – मुझे न्याय दिला दे भगवान्…..मुझे न्याय दें मिथिला के लोग। लेकिन क्या कभी मिथिला के लोग यह सवाल पूछे? शायद नहीं। </strong></p>
<p>“मुझे न्याय दिला दें मुख्यमंत्री जी, मुझे न्याय दिला दें प्रधानमंत्री जी। मैं निर्जीव हूँ। बोल नहीं सकता। आप सभी तो सजीव हैं। मेरी भाषा आप समझ सकते हैं। मैंने अपने महाराजाधिराज को नहीं मारा। उनके हँसते-मुस्कुराते-सुडौल शरीर को पार्थिव नहीं बनाया। मैं तो उनके शरीर के मैल को साफ़ करता था। हमारे परिसर के पानी से पूछ लीजिये। वह चश्मदीद गवाह है। वह भी निर्जीव ही है, बोल नहीं सकता। जो बोल सकता है वह खुलेआम घूमता रहा। मुझे 59-वर्षों से बंद कर रखा है हुकुम। मैं विनती करता हूँ कि मेरी अस्तित्व की समाप्ति से पूर्व मुझे न्याय दिला दें ।  मैं अपनी मृत्यु के बाद अपने पार्थिव शरीर के साथ वह कलंक नहीं ले जाना चाहता हूँ कि मैंने मिथिला नरेश, दरभंगा के अंतिम ‘संतानहीन’ राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह को मारा है। वे अपने जीवन की अंतिम सांस हमारे इस प्रांगण (बाथटब) में लिए। दया करो हे भगवान्,” यह रोता-बिलखता आवाज इस ‘निर्जीव बाथटब’ का है। इस बाथटब के ऊपर ‘क़त्ल’ का आरोप है। </p>
<p><strong>दरभंगा राज के तत्कालीन लोगबाग, प्रदेश के तत्कालीन राजनेतागण, आला-अधिकारीगण (कुछ को छोड़कर), दिल्ली सल्तनत के राजनेतागण सभी इसके ऊपर लगे आरोपों को स्वीकृत कर शांत हो गए। सबों का ‘जीवित’ शरीर की आत्मा ‘पार्थिव’ हो गई। कोई “चूं” तक नहीं किये। किसी ने आवाज नहीं उठाये आखिर यह निर्जीव बाथटब महाराजाधिराज को कैसे मार सकता है? सभी जानते थे कि महाराजाधिराज का ‘मानसिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक-आर्थिक चरित्र इतना दृढ़ था कि ‘चुल्लू भर पानी में मरने’ वाला मुहबरा नरगौना पैलेस ही नहीं, विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवें स्थान (3,287,263 वर्ग किलोमीटर) पर रहने वाला भारत के किसी भी हिस्से में स्थित पानी में नहीं है। फिर नरगौना पैलेस के इस शौचालय-स्नानागार में रखे इस बाथटब में, जिसमें शायद 42 गैलन पानी आता होगा, कैसे मृत्यु हो सकती हैं? यह बाथटब तो चिल्ला-चिल्ला कर कहता रहा कि महाराज संध्याकाळ के बाद शराब नहीं पीते थे। स्नान करने के बाद सो जाया करते थे। उस शाम भी महाराज स्वस्थ थे जब स्नान करने आये थे। गुनगुना भी रहे थे। फिर “मैं (बाथटब) कैसे आरोपी हो गया कि महाराजाधिराज को मैंने मारा।” लेकिन ‘निर्जीवों’ की बातों को कौन सुनता है – जब धन-दौलत के चकाचौंध में सजीव भी निर्जीव जैसा व्यवहार करने लगे।</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/people-of-mithila-ignores-maharaja-of-darbhanga">रामबाग परिसर में रहने वाली आज की पीढ़ी तो फोन भी नहीं उठाते, सुभाष चंद्र बोस के लिए लिखित इस पत्र की अहमियत को क्या समझेगी ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लल्लू यादव को &#8216;लल्लू&#8217; शब्द से परहेज था, जबकि लल्लू बाबू फक्र करते थे अपने नाम पर </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 04 Jan 2022 11:21:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chandrashekhar]]></category>
		<category><![CDATA[chief minister]]></category>
		<category><![CDATA[singh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : नब्बे के दशक में जब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने तो तत्कालीन पत्रकार जगत के लोग उन्हें अख़बारों के पन्नों में लल्लू यादव लिखने लगे। सुबह-सवेरे लाखों-लाख की संख्या में बिकने वाले अख़बारों के पहले पन्ने पर जब अपना नाम का अपभ्रसिंत रूप देखते थे तो वे &#8220;हथ्थे से [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/lallu%e2%80%8b-yadav%e2%80%8b-avoid%e2%80%8bs-word%e2%80%8b-lallu%e2%80%8b-whereas%e2%80%8b-lallu%e2%80%8b-babu%e2%80%8b-feels-proud%e2%80%8b-of%e2%80%8b-%e2%80%8bhis%e2%80%8b-name">लल्लू यादव को &#8216;लल्लू&#8217; शब्द से परहेज था, जबकि लल्लू बाबू फक्र करते थे अपने नाम पर </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : नब्बे के दशक में जब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने तो तत्कालीन पत्रकार जगत के लोग उन्हें अख़बारों के पन्नों में लल्लू यादव लिखने लगे। सुबह-सवेरे लाखों-लाख की संख्या में बिकने वाले अख़बारों के पहले पन्ने पर जब अपना नाम का अपभ्रसिंत रूप देखते थे तो वे &#8220;हथ्थे से कबर&#8221; जाते थे। पता लगाने लगते थे कि किसने लिखा है। उन दिनों पटना के अख़बारों में अधिकाशंतः पढ़े-लिखे, विचारवान, ऊँची जाति के पत्रकारों का जमघट था। लल्लू यादव का &#8220;हथ्थे से कबरना&#8221; स्वाभाविक भी था। जैसे जैसे बिहार में &#8220;लल्लू यादव&#8221; का प्रकरण और अध्याय बढ़ता गया, मजबूत होता गया, अख़बारों के पन्नों पर भी &#8220;लल्लू&#8221; शब्द में &#8220;ल्लू&#8221; शब्द निरस्त होता गया और &#8220;लालू प्रसाद यादव&#8221; हो गया । आगे कुछ और परिवर्तन हुआ &#8211; &#8220;यादव&#8221; शब्द भी &#8220;निरस्त&#8221; हो गया और लल्लू यादव &#8216;लालू प्रसाद यादव&#8217; के रास्ते &#8216;लालू प्रसाद&#8217; हो गए।</strong></p>
<p>लेकिन, नब्बे के दशक से पूर्व, यानी आज़ादी के 36 वें वर्षगांठ से एक रात पहले, जब जमुई जिले के लल्लू बाबू अविभाजित बिहार (बिहार और झारखण्ड) के 16 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए, तो उन्हें पटना ही नहीं, बिहार के किसी भी कोने से, गली से, मोहल्ले से, सड़क से प्रकाशित होने वाले किसी भी समाचार पत्र के पत्रकारों से शिकायत नहीं हुई थी, जब लोगों ने लिखा था &#8216;जमुई के लल्लू बाबू अब बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे&#8217; &#8211; हाँ, एक व्यक्ति अंदर से अवश्य कुहके थे। लेकिन &#8216;प्रारब्ध&#8217; को कौन टाल सकता है। </p>
<p>आठवें विधान सभा में जून, 1980 से अगस्त, 1983 तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे डॉ जगन्नाथ मिश्र को जब कुर्सी से उतारा गया था, तब दिल्ली के आदेशानुसार जमुई वाले लल्लू बाबू यानी चंद्रशेखर सिंह 16 वें मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश का कमान संभाला। लल्लू बाबू 14 अगस्त, 1983 से 12 मार्च 1985 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे थे। </p>
<p>बहरहाल, भारतीय रेल की दिल्ली-हावड़ा मेन लाइन पर जब पटना से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर आगे हावड़ा की ओर बढ़ते हैं तो एक जगह आती है, मलयपुर, जिला जमुई लगता है। यहीं के एक बड़े जमींदार परिवार में चंद्रशेखर सिंह उर्फ लल्लू बाबू का जन्म हुआ था। आजादी मिलते वक्त 20-21 साल के लल्लू बाबू इकनॉमिक्स में एमए कर रहे थे। पिता को लगा, अंग्रेजों के जाने पर प्रशासन में पढ़े लिखों को सीधे एसडीएम और डिप्टी एसपी बनाया जा रहा है, चंद्रशेखर भी ऐसा ही करेगा। लेकिन उनका इरादा सियासत का था। </p>
<p><strong>1952 में पहले चुनाव हुए। इसके लिए नियम था, 25 साल उम्र जरूरी हो। चुनाव मार्च अप्रैल 1952 में हुए, मगर चंद्रशेखर 17 अगस्त 1952 को 25 साल के हो रहे थे। लेकिन तब नामांकन में वैसी सख्ती नहीं होती थी। साधारण सा प्रपत्र जिसमें बस जन्म का साल लिखना होता था। कोई सपोर्टिंग डॉक्युमेंट भी नहीं। नाम, जन्म का वर्ष, गांव-जिला, दो चार प्रस्तावक और पार्टी का सिंबल, बस काम हो गया। चंद्रशेखर का काम पहले ही चुनाव से बन गया। चकाई विधानसभा से विधायक बन वह पटना पहुंचे तो पाया, सबसे कम उम्र के माननीय बन गए हैं। सिलसिला चल निकला। अध्ययनशील चंद्रशेखर ने विधानसभा की बहसों में हिस्सा लिया तो वरिष्ठों का उन पर ध्यान गया। सत्तर के दशक से लाल बत्ती भी मिलने लगी। केदार, गफूर और जगन्नाथ मिश्र की सरकार में। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलीं 1980 के एक चुनावी मुकाबले से।</strong> </p>
<p>ये मुकाबला था महाराष्ट्र के समाजवादी नेता और बिहार के बांका से सांसद मधु लिमये से। ये वही मधु लिमये थे, जिन्होंने जनता पार्टी में जनसंघ वालों की दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठा बवाल काट दिया लिमये का तर्क था कि जनता पार्टी के नेता सांप्रदायिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में सक्रिय नहीं रह सकते। इस अड़ेबाजी के फेर में आगे चलकर पार्टी और सरकार, दोनों टूटे। लिमये की एक और पहचान थी &#8211; धारदार वक्ता, संसद में खड़े होते तो तर्कों और प्रमाणों से मंत्रियों की सियासी बलि ले लेते। </p>
<p>80 के लोकसभा चुनाव में बांका लोकसभा सीट पर इन्हीं मधु लिमये का मुकाबला कांग्रेस (आई) यानी इंका के उम्मीदवार चंद्रशेखर सिंह से था। दोनों के बीच 1977 के लोकसभा चुनाव में भी मुकाबला हुआ था लेकिन तब बाजी जनता पार्टी के मधु लिमये के हाथ लगी थी। 1980 के चुनाव में दोनों की पार्टी बदल गई थी। 1977 में जनता पार्टी से चुनाव लड़े मधु लिमये इस बार चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में जनता पार्टी के टूटे धड़े जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार बने, जबकि 1977 में कांग्रेस के उम्मीदवार रहे चंद्रशेखर सिंह इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के टूटे धड़े कांग्रेस (ई) यानी इंका के उम्मीदवार बने। नतीजे आए तो विजेता के खांचे के आगे नाम लिखा था, चंद्रशेखर सिंह। </p>
<p>चंद्रशेखर अनुभवी विधायक थे और बड़े विपक्षी नेता को हरा दिल्ली पहुंचे थे। इंदिरा ने इसका ख्याल रखा और उन्हें मंत्रिपरिषद में स्थान दिया।  पटना में राज्य मंत्रिपरिषद चला रहे थे जगन्नाथ मिश्र। तीन साल के अंदर गुटबाजी,विवादास्पद प्रेस बिल, बॉबी हत्याकांड, को-ऑपरेटिव की कथित धांधली, मिनरल पॉलिसी का विरोध। इन सब सुर्खियों के बाद पार्टी के ताकतवर महासचिव राजीव गांधी ने तय किया। भ्रष्ट छवि वाले मुख्यमंत्रियों को विदा किया जाए। महाराष्ट्र के एआर अंतुले, कर्नाटक के गुंडूराव और बिहार के जगन्नाथ की विदाई हो गई। अगस्त के पहले हफ्ते में जगन्नाथ मिश्र का इस्तीफा हो गया। और शुरू हो गई नए मुख्यमंत्री की खोज। </p>
<p><strong>इंका आलाकमान ने दो पर्यवेक्षकों (वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और ‘बक्सावाले’ अरुण नेहरू) को पटना भेजा। एक-एक कर विधायकों की राय ली गई लेकिन कोई सहमति बनती दिखी नहीं। कई लोग दावेदार हो गए थे। इंका कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी, इंदिरा कैबिनेट में शहरी विकास मंत्री भीष्म नारायण सिंह का नाम जोर शोर से चल रहा था। ऐसे में पर्यवेक्षकों को दिल्ली से फोन पर संदेश मिला, मैराथन बैठकें होने लगीं और एक हफ्ते में सहमति बन गई। 13 अगस्त 1983 को प्रणव मुखर्जी ने चंद्रशेखर सिंह को इंका विधायक दल का नेता चुने जाने की घोषणा की। इस घोषणा में कंसेंसस शब्द पर बहुत जोर था। इससे पहले विधायक दल की बैठक में जगन्नाथ मिश्र से ही चंद्रशेखर सिंह के नाम का प्रस्ताव रखवाया गया जबकि उनकी सरकार के शिक्षा मंत्री करमचंद भगत ने प्रस्ताव का समर्थन किया। राजीव ने जगन्नाथ के पूरी तरह पर कतरने का फैसला किया था। इसलिए अगले रोज जब चंद्रशेखर ने कैबिनेट समेत शपथ ली तो जगन्नाथ खेमे के लोगों का खेत खलिहान लुटा नजर आया।</strong> </p>
<p>चंद्रशेखर कैबिनेट में बड़े नेताओं के सगे-संबंधियों की भरमार थी। बिहार के पहले मुख्यमंत्री रहे श्रीकृष्ण सिंह के बेटे बंदीशंकर सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री विनोदानंद झा के बेटे कृष्णानंद झा, केन्द्रीय मंत्री भीष्म नारायण सिंह के समधी ब्रजकिशोर सिंह जैसे लोग मंत्री बना दिए गए। रघुनाथ झा जैसे जगन्नाथ मिश्र समर्थक गायब कर दिए गए। एक दिलचस्प बात और जान लीजिए। पहली बार के विधायक जीतन राम मांझी भी इस सरकार में पहली दफा राज्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर सिंह ने बांका की सीट पर विधायकी का उपचुनाव जीतकर विधानसभा भी पहुंच गए। लेकिन चर्चे हुए उनके कहीं भी बिना लाल बत्ती की गाड़ी के पहुंच जाने के। ताकि जमीनी हकीकत से वाकिफ रहें। फिर मौके से ही प्रशासनिक अमले को खुराक दी जाती। चंद्रशेखर सिंह ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को भी दुरुस्त किया। इन्हीं सब वजहों से उन्हें धोती कुर्ते वाला आईएएस कहा जाने लगा। इंका महासचिव राजीव गांधी को भी इसी तरह के लोग पसंद आते थे। यानी फिलहाल के लिए कुर्सी सुरक्षित थी। लेकिन इसी फिलहाल के दौरान जगन्नाथ भी एक्टिव थे। </p>
<p>चंद्रशेखर सिंह ने कार्यकाल के शुरू से ही बिहार कांग्रेस में जगन्नाथ मिश्र के विरोधियों को तवज्जो दी। नागेन्द्र झा (जिनके बेटे मदन मोहन झा अभी बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं), ललितेश्वर प्रसाद शाही, शिवचंद्र झा जैसे लोगों की धाक जमने लगी। इसके बाद प्रदेश इंका अध्यक्ष रामशरण प्रसाद सिंह ने चुन-चुन कर जगन्नाथ मिश्र समर्थक जिला अध्यक्षों की भी छुट्टी कर दी। फिर दबी छुपी खबर आई कि जिस बंगले में जगन्नाथ मिश्र जनता दरबार लगाते थे, वहां हड्डियां मिलीं।जगन्नाथ समर्थक अब मुखर हो गए। मुख्यमंत्री के खिलाफ साजिश करने के आरोप लगने लगे। खुद जगन्नाथ भाषा कार्ड खेलने में जुट गए। उन्होंने मैथिल अखबार निकाला और इस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का राग भी अलावा। चंद्रशेखर ने इसके काउंटर में राजपूत कार्ड खेला और आरा जाकर वीर कुंवर सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी बनाने का ऐलान कर दिया। लोगों ने कहा कि अधिकारियों की नियुक्ति में भी राजपूतवाद हावी हो गया। </p>
<p>ये सब खबरें 24 अकबर रोड पहुंच रही थीं। राजीव ने फौरन बिहार मामलों की निगरानी के लिए तीन सदस्यों (जी के मूपनार, चंदूलाल चंद्राकर और सी एम स्टीफन) की कमेटी बनाई। फिर केसी पंत को पटना भेजकर दोनों गुटों को एक मेज पर बैठाया गया और कुछ वक्त के लिए दिखावे की एकता कायम हो गई। इसी बीच 31 अक्टूबर 1984 को इन्दिरा गांधी की हत्या हो गई और राजीव प्रधानमंत्री बन गए। पूरे देश में सिख विरोधी दंगे भड़के। बिहार के पटना, जमशेदपुर, धनबाद समेत कई शहर चपेट में आए। फिर लोकसभा चुनाव हुए तो इंका को बड़ी सफलता मिली। 54 में से 48 सीटें। मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह की पत्नी मनोरमा सिंह भी बांका से सांसद हो गईं। कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव थे। लेकिन उसके पहले संगठन में एक नियुक्ति की गई और यहीं से खेल पलट गया। </p>
<p>फरवरी-मार्च 1985 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ। इसके पहले राजीव गांधी ने धनबाद के मजदूर नेता और नसबंदी के दौर में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री रहे बिंदेश्वरी दुबे को इंका का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। दुबे को इसलिए लाया गया ताकि जगन्नाथ मिश्र और चंद्रशेखर सिंह का विवाद चुनावों को प्रभावित न कर सके। बिंदेश्वरी दुबे किसी गुट के नेता नहीं थे। लेकिन जब चुनाव के लिए टिकटों का बंटवारा शुरू हुआ तब जगन्नाथ मिश्र समर्थक 22 लोगों का टिकट काट दिया गया। इनमें रघुनाथ झा और सदानंद सिंह भी शामिल थे। रघुनाथ जगन्नाथ के लिए लॉबीइंग के चक्कर में रह गए। हालांकि चुनाव उन्होंने लड़ा, जनता पार्टी के टिकट पर। शिवहर से और जीते भी। विधानसभा अध्यक्ष राधानंदन झा बॉबी हत्याकांड के चलते निपटे।  लेकिन लोगों को अचरज भीष्म नारायण सिंह के समधी ब्रजकिशोर सिंह के टिकट कटने पर हुआ, वो चंद्रशेखर सिंह के समर्थक माने जाते थे। </p>
<p><strong>ब्रजकिशोर सिंह पूर्वी चंपारण की मधुबन सीट से विधायक थे। चंद्रशेखर सिंह की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी थे। वह 2 वजहों से विवादों में आ गए। पहली वजह : पूर्वी चंपारण के डीएम राजकुमार सिंह (वर्तमान में नरेंद्र मोदी सरकार में ऊर्जा मंत्री) ने अवैध अतिक्रमण हटाने के क्रम में मोतीहारी में ब्रजकिशोर सिंह के घर की बाउंड्री वॉल को गिराया। मंत्री जी ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और आरके सिंह का ट्रांसफर हो गया। मगर ऊपर बात नोट कर ली गई। दूसरी वजह : 1984 के लोकसभा चुनाव में शिवहर लोकसभा सीट पर इंका कैंडिडेट रामदुलारी सिन्हा से भितरघात का इल्जाम। ब्रजकिशोर की एक कठित चिट्ठी वायरल हुई, उनकी अपनी हैंड राइटिंग में। इसमें वो समर्थकों से रामदुलारी के मुकाबले जनता पार्टी उम्मीदवार हरिकिशोर सिंह को तरजीह देने की बात कर रहे थे। इस चिट्ठी की एक प्रति राजीव गांधी तक पहुंच गई। उलटी गिनती यहीं से शुरू हो गई। </strong></p>
<p>अब 1985 के विधानसभा चुनाव पर लौटते हैं। इंका ने 324 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 198 सीटें जीतीं। मगर चंद्रशेखर सिंह खुश नहीं दिख रहे थे। उन्हें दिल्ली में बैठे मित्रों से कुछ और ही संकेत मिल रहे थे। फिर पटना पहुंचे केंद्रीय रेल मंत्री और हरियाणा के नेता बंसीलाल। उन्होंने विधायकों से एक एक कर मुलाकात की। फिर राजीव को फोन पर बताया &#8211; मान्यवर, चंद्रशेखर के पक्ष में 30 जबकि विपक्ष में 100 से ज्यादा विधायक हैं। बाकी कह रहे हैं, जो आप तय करें। राजीव तो पहले ही तय करे बैठे थे, उन्होंने बंसीलाल को बिंदेश्वरी दुबे के नाम का ऐलान करने को कह दिया। और इस तरह चुनाव जीतकर भी सत्ता गंवाने वाले चंद्रशेखर सिंह बिहार के इकलौते मुख्यमंत्री बन गए। ठाकुरवाद और भ्रष्टाचार के आरोप चुनावी सफलता पर भारी पड़े। </p>
<p>मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सिंह को अपनी कैबिनेट में एडजस्ट करने की योजना बनाई। चंद्रशेखर सिंह की पत्नी मनोरमा सिंह ने बांका की लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। 1985 के आखिर में उपचुनाव तय हुए। और आ गया कहानी में ट्विस्ट। 1984 में बिहार की मुजफ्फरपुर छोड़ बेंगलुरु सीट से लड़े और हारे जनता पार्टी के फायरब्रैंड नेता जॉर्ज फर्नांडिस बांका आ गए। जोरदार मुकाबला और दोनों तरफ से गड़बड़ी। जनसत्ता अखबार के लिए चुनाव कवर कर रहे थे सुरेंद्र किशोर। उनकी खबर का शीर्षक था, दो तरफा धांधली। चंद्रशेखर सिंह के लिए प्रशासनिक अमला लगा था तो जॉर्ज के लिए धनबाद के बाहुबली सूर्यदेव सिंह छपाई कर रहे थे। आखिर में सरकार भारी पड़ी। चंद्रशेखर सांसद और फिर मंत्री हो गए। पहले राज्य मंत्री और फिर पेट्रोलियम का कैबिनेट प्रभार। इस बीच उन्हें कैंसर हो गया। एम्स में इलाज शुरू हुआ और यहां 9 जुलाई 1986 को उनका निधन हो गया। </p>
<p>बांका में फिर उपचुनाव हुआ। इंका की तरफ से चंद्रशेखर की पत्नी और पूर्व सांसद मनोरमा सिंह। जनता पार्टी से एक बार फिर जॉर्ज को लाया। मनोरमा जीत गईं। लेकिन 1989 में उन्हें जनता दल के टिकट पर लड़ रहे वीपी सिंह के समधी प्रताप सिंह ने हरा दिया। चंद्रशेखर की राजनीतिक विरासत यहीं पर थमी। उनके बेटे विधुशंकर सिंह I.R.S. अधिकारी हैं और दिल्ली में रहते हैं जबकि बेटी कंचन सिंह अपने परिवार के साथ जमशेदपुर में रहती हैं। </p>
<p><strong>(&#8216;लल्लनटॉप.कॉम के &#8216;पोलिटिकल किस्से&#8217; के सहयोग से) </strong></p>
<p><strong>(तस्वीर में</strong> : बिहार के 16 वें मुख्यमंत्री का शपथ लेने के बाद <strong>लल्लू बाबू</strong>, यानी चंद्रशेखर सिंह <strong>&#8216;आर्यावर्त&#8217;</strong> और <strong>&#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217;</strong> अख़बार के दफ्तर पहुंचे। लल्लू बाबू &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; के <strong>तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा</strong> को ह्रदय से चाहते थे, उनका बहुत सम्मान करते थे। वजह भी था दीनानाथ झा द्वारा शब्दों का निष्पक्ष चयन और संवाददाताओं को लिखने की स्वतंत्रता। दीनानाथ झा और लल्लू बाबू आमने सामने। बीच में दिख रहे हैं <strong>दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमटेड</strong> के <strong>सचिव कृष्णानंद झा</strong> )</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/lallu%e2%80%8b-yadav%e2%80%8b-avoid%e2%80%8bs-word%e2%80%8b-lallu%e2%80%8b-whereas%e2%80%8b-lallu%e2%80%8b-babu%e2%80%8b-feels-proud%e2%80%8b-of%e2%80%8b-%e2%80%8bhis%e2%80%8b-name">लल्लू यादव को &#8216;लल्लू&#8217; शब्द से परहेज था, जबकि लल्लू बाबू फक्र करते थे अपने नाम पर </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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